महा-आरती आलेख: श्री आजादपुर वाली मइया
(स्वरसाधना- संगीत मण्डली की विशेष प्रस्तुति — परिकल्पना एवं निर्देशन: यादव योगेश कुमार रोहि)
सांगीतिक पृष्ठभूमि और नवीन राग की परिकल्पना
यह महा-आरती एक नवनिर्मित राग "मरु-पहाड़ी" (राजस्थानी 'मांड' और गढ़वाली 'पहाड़ी' धुन का अपूर्व खमाज-थाट आधारित संगम) में निबद्ध है। जहाँ राजस्थानी लोक संगीत की खड़ताल, मोरचंग और रावणहत्था मरुभूमि की गूँज पैदा करते हैं, वहीं गढ़वाली रणसिंघा, डौंर और थाली पहाड़ की आध्यात्मिक ऊँचाइयों का अहसास कराते हैं। द्रुपद शैली के गांभीर्य को बनाए रखते हुए आरती का मुख्य भाग द्रुत शूलताल (१० मात्रा) और द्रुत कहरवा (राजस्थानी खेमटा चाल) में पिरोया गया है।
दृश्य विधान और नाद-ब्रह्म का उदय
मंच पर अंधकार है। पृष्ठभूमि में काली नदी की कलकल ध्वनि और पीपल के पत्तों की सरसराहट गूँजती है। अचानक गढ़वाली 'रणसिंघा' की एक लंबी, गगनभेदी ध्वनि वातावरण को चीरती है, जिसके ठीक बाद राजस्थानी 'मोरचंग' और 'कमाइचा' का धीमा, रहस्यमयी स्वर जुड़ता है। मंच पर धीमा नीला और श्वेत प्रकाश फैलता है।
युवा कन्याओं का दूरदेशीय सरग़मी आलाप (नेपथ्य से)
पहाड़ी घाटियों से टकराकर आती हुई ध्वनि की भाँति, आठ से दस युवा कन्याओं का समूह दूर से अत्यंत बारीक, सुरीली और गूँजती हुई आवाज़ में सरगम का आलाप लेता है। यह आलाप मींड और गमक से युक्त है, जो श्रोताओं के रोंगटे खड़े कर देता है:
(अत्यंत विलम्बित और गूँजते हुए स्वरों में)
"आ... सा... रे म प... ग म रे सा...
नि̣ धा̣ प̣... म̣ प̣ नि̣ सा...
सां नि धा प, म ग रे सा..."
(कन्याओं की आवाज़ हवा में तैरती हुई विलीन हो जाती है, और तुरंत ही पखावज की जोरदार थाप पड़ती है।)
द्रुपद अंग में नोम-तोम आलाप और महा-आरती का आरंभ
मुख्य गायक (निर्देशक के नेतृत्व में) और सह-गायक अत्यंत भारी और गंभीर स्वर (मन्द्र सप्तक) में ध्रुपद शैली का आलाप लेते हैं— नारे तारे दानी, तुम नोम तनोम...
इसके पश्चात् गढ़वाली ढोल, दमाऊं और राजस्थानी नगाड़े एक साथ द्रुत ताल में बज उठते हैं। शंख और घंटों की गगनभेदी ध्वनि के बीच महा-आरती द्रुत लय में आरंभ होती है।
महा-आरती (द्रुत लय - राग मरु-पहाड़ी)
(समवेत स्वर में उच्च ग्राम - राजस्थानी और पहाड़ी लोक-मिश्रित ध्रुपद पदावली)
जय भवानी, रुद्राणी, कल्याणी!
म्हारी आजादपुर री मावड़ी, पहाड़ीपुर री राणी!
काली नदी रे तीरे मइया, रम्मो रम्य बसेरो।
पीपल री पावन छांव में, लाग्यो थारो डेरो!
जय मइया! जय मइया! जय मइया!
(मुख्य गायक - द्रुत शूलताल की चौगुन लय में)
श्वेत साटिका अंग बिराजे, भाल तेज अति भारी।
सूप हाथ में सजे भवानी, पाप-ताप संहारी!
दूजे कर में झाड़ू सोहे, बुहारे कर्म विकारा।
जाके मन में कपट बसे है, वाको होय निस्तारा!
(सह-गायक और कन्याओं का युगल स्वर - गढ़वाली लोक धुन का पुट)
हो... ओ...
छम-छम बाजे घूँघरू मइया, खड़ताल बाजे साथ।
रोगी-शोगी, दीन-दुखी सब, जोड़े थारे हाथ।
लौटा जल को जो भी चढ़ावे, शुद्ध भाव मन लावे।
सिद्धि नवनिद्धि द्वार तिहारे, बिन मांगे ही पावे!
(संगीत का चरम - झाला और द्रुत कहरवा)
(यहाँ पखावज, गढ़वाली ढोल और राजस्थानी खड़ताल के बीच एक तीव्र जुगलबंदी (तिहाई) होती है। संगीत अपनी सबसे तेज़ गति (द्रुत लय) में पहुँच जाता है। कन्याओं का सरगम (सा नि धा प म ग रे सा) पीछे से बहुत तेज़ गति में चलता रहता है।)
(समवेत स्वर - द्रुत गति में)
अहीर भगत री आरति गावें, बाजै ढोल-मृदंग।
भूत-प्रेत की बाधा छूटै, देख भवानी रंग!
तू ही भर्ता, तू ही कर्ता, दुष्ट दलन हुंकारी।
दूर-देश रा आवैं सवाली, जावैं ना कोई खाली!
जावैं ना कोई खाली मइया! जावैं ना कोई खाली!
समापन (तिहाई और महा-जयकारा)
(गायन और वादन एक साथ तीन बार जोरदार तिहाई लेते हैं)
कर्म के बंधन काट भवानी... धा धा धिन!
कर्म के बंधन काट भवानी... धा धा धिन!
कर्म के बंधन काट भवानी... धा धा धा, तिक्क धा!
(मंच पर पूर्ण प्रकाश, सभी वाद्य यंत्र एक साथ बजते हुए शांत होते हैं। केवल नेपथ्य से एक गूँजती हुई राजस्थानी अलगोजा और पहाड़ी बांसुरी की मिश्रित तान सुनाई देती है।)
मुख्य गायक (बिना किसी वाद्य के, खुली और बुलंद आवाज़ में):
बोलिए, काली नदी तट वासिनी, श्वेताम्बरी, आजादपुर वाली मइया की...
समस्त समूह और दर्शक:
जय!!!
(मंच पर शंखनाद के साथ पर्दा गिरता है।)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें