उद्घोष करें:
इस सुंदर और दार्शनिक बंदिश के आधार पर, आइए इस भावमयी गीत को और अधिक विस्तृत और काव्यात्मक रूप में पिरोते हैं, जो राग मेघ मल्हार के गंभीर, सात्विक और करुणामयी वातावरण को जीवंत कर दे।
गीत: आजादपुर वाली मइया की जय"
राग: मेघ मल्हार
ताल: कहरवा
यह भक्ति गीत स्वरसाधना- संगीत मण्डली के द्वारा यादव योगेश कुमार रोहि के निर्देशन में निर्मित किया गया है ।
(जयकारा: बोल आजादपुर वाली मइया की जय !
स्थाई (मुखड़ा)
जय मइया आजादपुर वाली,
तू पहाड़ीपुर तक रहने वाली !
काली नदी तट तेरा रम्य वसेरा।
पावन भूमि जहाँ आजादुर डेरा।
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी।
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।
हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती पहाड़ीपुर तक रखवाली!
...
अंतरा-१ (पर रिदम का चतुर्थ स्वर कोमल करें)
,दु:खियों ने तुमको आकर जब टेरा ! तब तब तुमने सुख दिया घनेरा।
यहाँ भूत प्रेत की वाधा मिटती, रोग मिटे, सब मिटे अंधेरा !
बजे मृदंग ढोल और ताली !
जय मइया आजादपुर वाली,
तू पहाड़ीपुर तक रहने वाली !
काली नदी तट तेरा रम्य वसेरा।
पावन भूमि जहाँ आजादुर डेरा।
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी।
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।
अन्तरा-२
तेरे भक्त अहीरों ने फिर आज आरति तेरी गायी। रोग कष्ट मिट जाते हैं सब जिसने तेरी रस्म निभाई।
मइया तुझको जो शुद्धि से ध्यावे ! वो साधक ही सिद्धि को पावे ...
काली नदी के तट पर विचरण ! तेरी कृपा भक्तों पर क्षण क्षण।
माँ तेरी शक्ति अजब निराली। दूर दूर से आते सबाली।
कोई ज्ञानी कोई मानी ,और चले आते अज्ञानी।
जय मइया आजादपुर वाली,
तू पहाड़ीपुर तक रहने वाली !
अंतरा-२
श्वेत साटिका पीपल वाटिका। सूप थमा है एक हाथ में तेरे । और दूसरे में हाथ में मइया, झाढू लगी जामें सींक बहुतेरे।
मइया के दर आते बहुत हैं। पर पाक साफ कुछ ही आते हैं।
ईमान, मान और ध्यान सदा, कुछ ही भगत हैं जो अपनाते हैं।
मइया से अरदास हमारी यह तेरे दास पर है कंगाली।
हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती तू पहाड़ीपुर तक रखवाली!
काली नदी तट रम्य वसेरा। पावन भूमि आजादुर डेरा।
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी।
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।
हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती पहाड़ीपुर तक तु करती रखवाली!
...अन्तरा-३
मइया पीपल की छांव बिराजे, संख मृदंग बहु घंटा वाजे।
हाथ में सूप लिए जग त्राता ,
तुम हो पाप- ताप की घाता।
जैसे धान से भूसी को छांटे,
वैसे ही कर्मों के बंधन तू काटे...
जो भी चरणों में तेरे चित्त लाऐ,
वह सारे संकट से तर जाए !
जिस मूर्ख ने तेरी महिमा न जानी । आँखों के सामने मिटा वो गुमानी । तू दुष्टों की क्रूर संहर्ता। तू ही भर्ता तू ही कर्ता ,,
समापन (आरतीमयी पुट)
हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती तू पहाड़ीपुर तक रखवाली!
काली नदी तट तेरा रम्य वसेरा। पावन भूमि जहाँ आजादुर डेरा।
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी।
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।
हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती तू पहाड़ीपुर तक रखवाली!
महा आरती की स्क्रिप्ट द्रुपद गीत शैली में लिखें जिसमें राजस्थानी लोक संगीत का पुट व पड़ाडी गढ़वाली लोक धुनों को राजस्थानी लोक धुन से सम्बद्ध करते हुए नये राग में आरती गीत की द्रुत ताल पर ऑडियो जनरेट करें !
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