📜 अन्तरा - १
(पहाड़ी लोक धुन की तान और नगाड़े की गूंज)
मोह माया के जाल में, उलझ कर हारा आदमी!
कहता मैंने खरीदा है यह आसमान और जमीं।
बच नहीं पाया हवश की आग से ये आदमी ,पतंगे सा झुलस गया ये आवारा आदमी!
कव्वाल की गुफ़्तगू (व्याख्या):
"चेहरे पर हँसी और दिल में लंपटता...
अपने पापों हिसाब आज तक नहीं इनको नहीं पता।
ढूँढता सुकून, पर लम्पटता इसके हाव-भावों में!
एक खोखलापन रह गया है आज आदमी के दावों में!
📜 अन्तरा -२
झूठे रिश्तों की आड़ में, करता रहा छल पल-पल!
ये बदलता है मुखौटे, जब मतलब जाता है, निकल।
मौत के खौफ़ से , ये छुपा है कई नकावों में !
एक खोखलापन रह गया है आदमी के दावों में!
📜 अन्तरा -
(राजस्थानी और हिमांचली दोनों वाद्यों का सम्मिलित तीव्र नाद)
दहलीज़-ए-दुनिया' पर जो लोग सिर झुकाते हैं,
भीख मांगते भिखारिययों से और गिड़गिड़ाते हैं।
वे ही लोग तिलक लगाकर के लोगों को ठगने जाते हैं
आदमी की जिन्दगी ढल जाती है, फर्जी दिखावों में!
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एक खोखलापन रह जाता है उसके सारे दावों में!
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