बुधवार, 1 जुलाई 2026

परिचय पुरूरवा और उर्वशी का परिचय- कल की स्क्रिप्ट...

यह स्क्रिप्ट पुरूरवा और उर्वशी के ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है, जो आपके शोधपरक विवरण 'आभीर जाति ' की अवधारणा पर आधारित है।

वीडियो स्क्रिप्ट: 'वैष्णव वर्ण  -गोप जाति का उद्गम: पुरूरवा और उर्वशी का मिलन'

दृश्य 1: गोधूलि बेला, पवित्र वन

(कैमरा पुरूरवा पर केंद्रित है, जो वन के शांत वातावरण में ध्यानमग्न हैं। उनके व्यक्तित्व में एक सम्राट की गरिमा और गो-पालक की सादगी है। पार्श्व में मंद बांसुरी का स्वर है।)

सूत्रधार (वॉयसओवर): "इतिहास के उन सुनहरे पन्नों से, जहाँ से गोप सभ्यता का उदय हुआ—भू-तल के प्रथम ऐतिहासिक सम्राट पुरूरवा। जिनके साम्राज्य का विस्तार भूलोक से स्वर्गलोक तक स्थापित था, पर जिनकी पहचान उनके 'गोप' जाति  से थी।"

इन दोनों को वैष्णव वर्ण के अहीर (गोप) जाति से सम्बन्धित होने की पुष्टि- सर्वप्रथम ऋग्वेद के दशम मण्डल के (९५) वें सूक्त की ऋचा- (३) से होती है, जो पुरूरवा-उर्वशी संवाद के रूप में है। जिसमें पुरूरवा के विशेषण गोष (घोष-गोप) तथा गोपीथ हैं।  इसके अतिरिक्त पुराणों में -.

(पद्म शैली मे श्लोक गायन करें-)

इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः॥३।।

सन्दर्भ-(ऋग्वेद- दश /’10/95/3)          

अर्थानुवाद: हे गोपिके ! तेरे सहयोग के बिना- तुणीर से फेंका जाने वाला बाण भी विजयश्री में समर्थ नहीं होता। (गोषाः शतसा) मैं सैकड़ो गायों का सेवक तुझ भार्या उर्वशी के सहयोग के बिना वेगवान भी नहीं हूँ। (अवीरे) हे आभीरे ! विस्तृत कर्म में या संग्राम में भी अब मेरा वेग (बल) प्रकाशित नहीं होता है। और शत्रुओं को कम्पित करने वाले मेरे सैनिक भी अब मेरे आदेश (वचन अथवा हुंक्कार) को नहीं मानते हैं।३।

ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा का हम नीचे संस्कृत भाष्य हिन्दी अनुवाद सहित प्रस्तुत कर रहे है

"अनया उर्वश्या प्रति पुरूरवाः स्वस्य विरहजनितं वैक्लव्यं ब्रूते।

हिन्दी अर्थ- उस उर्वशी के प्रति पुरूरवा अपनी विरह जनित व्याकुलता को कहता है-

“इषुधेः। इषवो धीयन्तेऽत्रेतीषुधिर्निषङ्गः = (इषुधि पद का पञ्चमी एक वचन का रूप इषुधे:= तीरकोश से )


अब हम  ऋग्वेद की इस ऋचा में आये प्रमुख (दो) शब्दों- "गोषा:" और "अवीरे" की व्याकरणीय व्याख्या करके यह जानेंगे कि इन दोनों शब्दों का वैदिक और लौकिक संस्कृत में क्या अर्थ होता है ? जिसमें पहले "गोषा:" शब्द की व्याकरणीय व्याख्या करेंगे उसके बाद "अवीरे" की।

• गोषः शब्द की व्याकरणिक उत्पत्ति-

गोष: = गां सनोति (सेवयति) सन् (षण् ) धातु =संभक्तौ/भक्ति/दाने च) = भक्ति करना दान करना पूजा करना  + विट् ङा। सनोतेरनः” पाणिनीय षत्वम् सूत्र ।


अर्थात "गो शब्द में षन् धातु का "ष"  शेष रहने पर (गो+षन्)= गोष: शब्द बना - जिसका अर्थ है। गो सेवक अथवा पालक। गोष: का वैदिक रूप गोषा: है।

           

उपर्युक्त ऋचाओं में गोषन् तथा गोषा: शब्द गोसेवक के वाचक हैं। वैदिक भाषा का यही गोषः शब्द लौकिक संस्कृत में घोष हुआ जो कालान्तर में गोप, गोपाल, अहीर, और यादव का पर्यायवाची शब्द बन गया। क्योंकि ये सभी गोपालक थे।

और जग जाहिर है कि सभी पुराण लौकिक संस्कृत में लिखे गए हैं। इस हेतु पुराणों में भी देखा जाए तो वैदिक शब्द "गोषः" लौकिक संस्कृत में "घोष" गोपालक अथवा अहीर जाति के लिए ही प्रयुक्त होता है  अन्य किसी जाति के लिए नहीं। अतः घोष शब्द पुरूरवा के गोप, गोपालक और अहीर होने की पुष्टि करता है।

श्रीमद्‍भागवत महापुराण के नवम-स्कन्ध के प्रथम अध्याय के श्लोक संख्या-(४२) से भी पुष्टि होती है कि पुरूरवा  गोप (गोपालक) थे -

"ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः। पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम्॥४२।


अनुवाद:- उसके बाद समय बीतने पर प्रतिष्ठान पुर का अधिपति अपने पुत्र  पुरूरवा को गो-समुदाय देकर वन को चला गया।४२।





दृश्य 2: उर्वशी का आगमन

(उर्वशी का प्रवेश होता है। वह अत्यंत तेजस्वी है। पुरूरवा उनकी ओर देखते हैं।)

पुरूरवा: (विनम्रता से) "हे देवि! आप कौन हैं? आपकी आभा साधारण नहीं है। क्या आप भी मेरे समान ही प्रकृति और पशुओं के संरक्षण के धर्म का पालन करने वाली हैं?"

उर्वशी: (मुस्कुराते हुए) "हे राजन! मैं उर्वशी। जिसे काल ने अप्सरा कहा, परंतु मेरे पूर्व जन्मों के तपोबल का मार्ग 'आभीर' कन्या का ही रहा है। मैं वही हूँ जो स्वयं श्री कृष्ण की विभूति है, जो अप्सराओं में श्रेष्ठ मानी गई है।"

दृश्य 3: संवाद का सार - जाति और वंश

पुरूरवा: "वेदों में मुझे 'गोषा:' कहा गया है। ऋग्वेद की ऋचाओं ने मुझे गायों के पालक—गोप के रूप में परिभाषित किया है। मेरा साम्राज्य मेरी प्रजा की सेवा और गो-धन के संरक्षण पर टिका है।"

उर्वशी: "सत्य कहा सम्राट! 'गोषाः' (गो-सेवक) और 'अवीरे'—ये शब्द केवल संबोधन नहीं, हमारे कुल की पहचान हैं। जैसा कि स्कंद और भागवत पुराणों में वर्णित है, वैश्य-कुल में जन्मी हम दोनों की यात्रा, स्वर्ग की अप्सराओं के वैभव को स्पर्श करने के बाद भी अपनी 'आभीर' जड़ों से जुड़ी है। क्या आप जानते हैं, यह केवल संयोग नहीं कि हम इस धरा पर मिले हैं?"

ख] -  उर्वशी

                               ____

उर्वशी पूर्व काल की एक धन्या और मान्या अहीर कन्या थी। जो कभी अपने तपोबल से स्वर्ग की अप्सराओं की अधिश्वरी हुई। इस ऐतिहासिक अहीर कन्या के धन्या एवं मान्या होने की पुष्टि उस समय होती है जब परमेश्वर श्रीकृष्ण प्रमुख विभूतियों की तुलना करते हुए ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३)तिहत्तर) में कहते हैं-


वेदाश्च सर्वशास्त्राणां वरुणो यादसामहम् ।उर्वश्यप्सरसामेव समुद्राणां जलार्णवः ।७०

अनुवाद:-  मैं सभी शास्त्रों में वेद हूँ समुद्र के प्राणीयों में  वरुण हूँ। अप्सराओं में उर्वशी हूँ। समुद्रों में जलार्णव हूँ।७०।       

वास्तव में उर्वशी एक अहीर कन्या थी इस बात की पुष्टि- ऋग्वेद की ऋचा- 10/95/3 से होती है जिसमें उसके पति पुरुरवा द्वारा उसके लिए अवीरे शब्द से सम्बोधन हुआ है।

"इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः॥३।।

 इस ऋचा में आये सम्बोधन पद- 'अवीरे' की व्याकरणीय व्याख्या करके जानेंगे कि "अवीरे" शब्द का वैदिक और लौकिक संस्कृत तथा अपभ्रंश भाषा, पालि आदि भाषाओं में क्या रूप और अर्थ होता है ?

वास्तव में देखा जाए तो उपर्युक्त ऋचा में उर्वशी का सम्बोधन अवीरे ! है, जो लौकिक संस्कृत के अभीरे शब्द का ही वैदिक पूर्व रूप है। लौकिक संस्कृत में अभीर तथा आभीर दो रूप परस्पर एक वचन और बहुवचन (समूह-वाची) हैं।

वैदिक भाषा का एक नियम है कि उसमें उपसर्ग कभी भी क्रियापद और संज्ञापद के साथ नहीं आते हैं। इसलिए ऋग्वेद में आया हुआ अवीरे सम्बोधन-पद मूल तद्धित विशेषण शब्द है-

(अवीर=(अवि+ईर्+अच्)= अवीर: की स्त्रीलिंग रूप अवीरा है, जो सम्बोधन काल में अवीरे ! हो जाता है।). *****

अत: अवीरा शब्द ही लौकिक संस्कृत में अभीरा हो गया और यही अभीर का स्त्रीलिंग रूप है। तथा अभीर का समूह वाची रूप आभीर प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं में अहीर तथा आहीर हो गया। यह सब कैसे हुआ ? यह नींचे सन्दर्भ देखें-

वैदिक अवीर शब्द की व्युत्पत्ति ( अवि = गाय, भेड़ आदि पशु + ईर:=  चराने वाला। हाँ करने वाला , निर्देशन करने वाला, के रूप में हुई है।

परन्तु यह व्युत्पत्ति एक संयोग मात्र  ही है। क्योंकि अवीरा शब्द की व्युत्पत्ति ऋग्वेद में प्राप्त लौकिक अवीरा शब्द की व्युत्पत्ति से अलग ही है।

वैदिक ऋचा में अवीर (अवि+ ईर:) शब्द दीर्घ सन्धि  के रूप में तद्धित पद है। जबकि लौकिक संस्कृत में अवीर (अ + वीर) के रूप में वीर के पूर्व में अ (नञ्) निषेधवाची उपसर्ग लगाने से बनता है।

वैदिक भाषा में लौकिक संस्कृत भाषा की८ व्याकरणिक प्रक्रिया अमान्य ही है।

परन्तु कुछ लोग इसी कारण इसका अर्थ- "जो वीर न हो" निकालते हैं। किन्तु यह ग़लत है क्योंकि उर्वशी के लिए इस अर्थ में अवीरा शब्द अनुपयुक्त व सिद्धान्त विहीन ही है। अत: अवीरा शब्द को अवि + ईरा के रूप में ही सही माना जाना चाहिए। क्योंकि अवीर शब्द का मूल सहचर हिब्रू भाषा का अबीर (अवीर) शब्द है। जो ईश्वर का एक नाम है। हिब्रू भाषा में अबीर का अर्थ वीर ही होता है।

वैदिक और लौकिक संस्कृत भाषा में अवीर तथा अभीर शब्द अहीरों की पशुपालन वृत्ति (व्यवसाय) के साथ साथ अहीरों की वीरता प्रवृत्ति को भी सूचित करता है। वीर शब्द ही सम्प्रसारित होकर आर्य बन गया। इस सम्बन्ध में विदित हो आर्य शब्द प्रारम्भिक काल में पशुपालक तथा कृषक का ही वाचक था।


यदि अवीर शब्द का विकास क्रम देखा जाए तो-वैदिक कालीन अवीर शब्द ईसापूर्व सप्तम सदी के आस-पास गाय ,भेड़ ,बकरी पालक के रूप में प्रचलित था।

यह वीर अहीरों का वाचक था। परन्तु कालान्तर में ईसापूर्व पञ्चम सदी के समय यही अवीर शब्द अभीर रूप में प्रचलन में रहा और इसी अभीर का समूह वाची अथवा बहुवचन रूप आभीर हुआ जो अहीरों की वीरता प्रवृत्ति का सूचक रहा इसी समय के शब्दकोशकार  अमर सिंह ने आभीर शब्द की व्युत्पत्ति अपने अमरकोष में कुछ इस तरह से बतायी है।

आभीरः= पुंल्लिंग (आ समन्तात् भियं राति (आ+भी+ रा + क:) रा=दाने आत इति कः।)

अर्थात जो चारों तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय दे या भरे। आभीर- गोपः। इत्यमरःकोश - आभीर प्राकृत भाषा में आहिर हो गया है। अभीर- अभिमुखीकृत्य ईरयति गाः अभि + ईरः अच् । अर्थात् जो सामने मुख करके गायें हाँकता या चराता है।

आभीर शब्द एक हजार ईस्वी में अपभ्रष्ट पूर्व हिन्दी भाषा के विकास काल में प्राकृत भाषा के प्रभाव से आहीर हो गया। ज्ञात हो कि लौकिक संस्कृत में जो आभीर शब्द प्रयुक्त होता है उसका तद्भव रूप आहीर होता है।

इसके बाद संस्कृत ग्रन्थों में जानेंगे कि आभीर शब्द का प्रयोग गोप, अहीर और यादवों के लिए कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ।


अहीर शब्द का प्रयोग प्राकृत और हिन्दी पद्य साहित्यों में कवियों द्वारा बहुतायत रूप से किया गया है। जैसे-


जैन विद्वान व धर्माचार्य- कवि हेमचन्द्रसूरि ने अपने ऐतिहासिक काव्य- श्रीकुमरपाल चरित-( प्राकृत- द्वाश्रयकाव्यम्- के द्वितीय सर्ग में प्रथम बार प्राकृत भाषा में आहीर शब्द का प्रयोग संस्कृत के आभीर शब्द के समानान्तरण किया है। हेमचन्द्रसूरि का जन्मकाल-(1088-1172) है।



दूसरी बात यह कि- ऋग्वेद में गाय चराने या हाँकने के सन्दर्भ में ईर् धातु का क्रियात्मक लट्लकार अन्य पुरुष एक वचन का  रूप ' ईर्ते ' विद्यमान है। जैसे -

'रुशद्- ईर्त्ते पयो गोः ” दूध दुहाने के लिए रम्हाती हुई गाय  घर की ओर हाँकी जाती है। (ऋग्वेद-9/91/3 )


यह तो सर्वविदित है कि- "उर्वशी गाय और भेड़ें पालती थी। आभीर कन्या होने के नाते भी उसका इन पशुओं से प्रेम स्वाभाविक ही था। इस बात की भी पुष्टि- देवी भागवत पुराण  के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के श्लोक- संख्या-(८) से होती है कि उर्वशी के पास दो भेंड़े भी थीं।


"समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।

एतावुरणकौ राजन्न्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥८।


अनुवाद -वह वरांगना इस प्रकार की शर्त रखकर वहीं रहने लगी। उसने पुरूरवा से कहा - हे राजन ! यह दोनों भेंड़ के बच्चे मैं आपके पास धरोहर के रूप में रखती हूँ।

ध्यान रहे अमरकोश - 2/9/76/2/3 - भेंड़ के पर्याय निम्नांकित बताए गए हैं। "उरण पुं। मेषः"

समानार्थक- मेढ्र,उरभ्र,उरण,ऊर्णायु,मेष,वृष्णि,एडक,अवि

अतः सिद्ध होता है कि उर्वशी के पास दो भेंड़ के बच्चे थे।

             

कुछ समय बाद उर्वशी के दोनों भेड़ के बच्चों के साथ एक घटना घटी जिसमें इन्द्र के कहने पर गन्धर्वों ने उर्वशी के दोनों भेंड़ के बच्चों को चुरा कर आकाश मार्ग से ले जाने लगे, तब दोनों भेंड़ के बच्चे जोर-जोर से चिल्लाने लगे। इस घटना का वर्णन श्रीमद् देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के  श्लोक - १७ से २० में कुछ इस प्रकार लिखा हुआ मिलता है।


इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः।

ततो गत्वा महागाढे तमसि  प्रत्युपस्थिते॥१७।।


जह्रुस्तावुरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम्।

चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा॥१८।।


उर्वशी  तदुपाकर्ण्य  क्रन्दितं  सुतयोरिव।

कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया॥ १९।।


नष्टाहं  तव  विश्वासाद्धृतौ  चोरैर्ममोरणौ।

राजन्पुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः॥२०।।


अनुवाद- १७-२०

• तब इन्द्र के ऐसा कहने पर विश्वावसु आदि प्रधान गन्धर्वों ने वहाँ से जाकर रात्रि के घोर अन्धकार में राजा पुरूरवा को विहार करते देख उन दोनों भेंड़ों को चुरा लिया तब आकाश मार्ग से जाते हुए चुराए गए वे दोनों भेंड़ जोर से चिल्लाने लगे। १७-१८।

• अपने पुत्र के समान पाले हुए भेड़ों का क्रन्दन सुनते ही उर्वशी ने क्रोधित होकर राजा पुरूरवा से कहा-  हे राजन ! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त रखी थी, वह टूट गई आपके विश्वास पर मैं धोखे में पड़ी, क्योंकि पुत्र के समान मेरे प्रिय भेंड़ों को चोरों ने चुरा लिया फिर भी आप घर में स्त्री की तरह शयन कर रहे हैं।१९-२०।


अतः इन उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि पुरूरवा और उर्वशी दोनों पशुपालक अहीर जाति से सम्बन्धित थे।


उर्वशी के अहिर कन्या होने की पुष्टि- मत्स्यपुराण- के (६९) वें अध्याय के श्लोक- ६१-६२ से भी होती है। जिसमें उर्वशी के द्वारा  "कल्याणिनी" नामक कठिन व्रत का अनुष्ठान करने का प्रसंग है। इसी प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण भीम से कल्याणिनी व्रत के बारे में कहते हैं कि -


"त्वा च यामप्सरसामधीशा वैश्याकृता ह्यन्यभवान्तरेषु।

आभीरकन्यातिकुतूहलेन सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥ ६१


जाताथवा वैश्यकुलोद्भवापि पुलोमकन्या पुरुहूतपत्नी।

तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं मम प्रिया सम्प्रति सत्यकामा॥६२।

          

अनुवाद- ६१-६२

जन्मान्तरण में एक अहीर की कन्या ने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वैश्य पुत्री अप्सराओं की अधीश्वरी हुई।  वही इस समय स्वर्गलोक में उर्वशी नाम से विख्यात है। ६१।

• इसी प्रकार इसी वैश्यकुल में उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्या ने भी इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव) की पुत्रीरूप में उत्पन्न होकर इन्द्र की पत्नी बनी। उसके अनुष्ठान काल में जो उसकी सेविका थी, वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है। ६२

लगभग इसी प्रकार पद्मपुराण सृष्टि खण्ड अध्याय (२३ ) में उर्वशी के आभीर कन्या होने का वर्णन है।

"ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर श्रीमद्भागवत और मत्स्य पुराण तक—साक्ष्य यही सिद्ध करते हैं कि पुरूरवा और उर्वशी न केवल प्रेम के प्रतीक थे, बल्कि वे उस महान गोप-कुल के गौरवशाली आदि-पुरुष थे, जिसका ध्येय गो-पालन, धर्म-रक्षण और लोक-कल्याण था। यह गौरवशाली परंपरा, जो बाद में यदुवंश के उदय का कारण बनी, सनातन इतिहास का सबसे सशक्त अध्याय है।"

(पर्दा धीरे-धीरे काला होता है)

इस स्क्रिप्ट की मुख्य विशेषताएं:

  1. ऐतिहासिक संदर्भ: इसमें ऋग्वेद (10/95/3) के 'गोषा:' और 'अवीरे' शब्दों को पुरूरवा और उर्वशी की गोप (अहीर) पहचान के साथ जोड़ा गया है।
  2. पौराणिक प्रमाण: मत्स्य पुराण और भागवत पुराण के उन अंशों को शामिल किया गया है जहाँ उर्वशी के पूर्व जन्म और उनके 'आभीर' कन्या होने का उल्लेख है।
  3. वंशावली का उल्लेख: आयु, नहुष और ययाति की चर्चा करते हुए इसे यादव वंश के उदय की भूमिका के रूप में दर्शाया गया है।
  4. वैष्णव कुल: पूरे संवाद में 'वैष्णव वर्ण' और 'गोप कुल' की मर्यादा और गरिमा को बनाए रखा गया है।

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