बुधवार, 23 सितंबर 2026

कब्बाली देश की हालत!

यह लोक फ्यूजन यादव योगेश कुमार रोहि के द्वारा लिखित व उन्हीं के निर्देशन में 'स्वर साधना संगीत संस्था' द्वारा प्रस्तुत है।

(इस रचना को कव्वाली और लोकगीत के फ्यूजन के रूप में, तालियों की थाप, ढोलक की तेज़ लय और कोरस के साथ गाने की कल्पना करें)

(आलाप - धीमी और गंभीर आवाज़ में)

मुख्य गायक 1:

(मुखड़ा)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(कोरस - तालियों की थाप के साथ शुरुआत)

अरे जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं!

बड़ी विलक्षण ये माया!

(मुखड़ा - तेज़ लय में)

मुख्य गायक 2:

झूठ का बाज़ार देखो, हर तरफ है सज रहा,       गाँव सीधा किसान इसे ही सच समझ रहा।

मिलावटों के दौर से, हर आदमी गुजरने लगा। और मंहगायी के बाजार से खून सब जरने लगा। 

मेहनत की महीनों की कमाई, पल भर में ही निबट रही, जिन्दगी अब अभावों में गरीबों की कट रही।

ईमानदारी चली गयी, बेईमानी अभी तक डट रही। भखों की ये भीड़ हैं जो रोटियाँ झपट रही।हड़डीयों के कंकाल हैं और खाल से लिपटी काया

मुख्य गायक 1:

विज्ञापनों शोर सुनकर, आदमी घर से निकलकर, बड़ी खरीददारी कर रहा! पर उसको क्या पता, कौन गद्दारी कर रहा!

(कोरस)

अरे उसको क्या पता, कौन गद्दारी कर रहा!

(अंतरा 1 - मिलावट का ज़हर)

मुख्य गायक 1:

मिलावटें इस कदर हैं, आज अपने देश में,

अपराधी भी घूम रहे, संन्यासीयों के वेष में!

बेसन में मक्के का आटा, कहीं देसी घी में चर्बी है, मिठास  खोजता आदमी अब तो चीनी भी कर्बी है।

मुख्य गायक 2:

सीमेंट के कट्टों में देखो, पावर हाउस की राख है,

पेट्रोल में केरोसिन, अब आदमी की क्या साख है।

पीली ईंट घिसी हल्दी में, धनिया में गधे की लीद है,

काली मिर्च में बीज पपीता, नहीं शुद्धता की उम्मीद है ! आदमी को मोशन हो गया ! जब रिफाइड उसने खाया।  

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(अंतरा 2 - अर्थव्यवस्था और विज्ञापन का झूठ)

मुख्य गायक 2:

विज्ञापनों पर जोर देखो, लाउड स्पीकर बज रहा ,भोला गरीब लुट रहा,नहीं वह कुछ समझ रहा!

सत्तासीन नेता कहें, अब जीडीपी में उछाल है,

उद्योगों की क्वालिटी, बिल्कुल ही बेमिसाल है।

मुख्य गायक 1:

विज्ञापन का झूठ देखो, चमक-दमक में तुल गया,

खाने-पीने की चीज़ों में, जाने क्या-क्या घुल गया!

मिलावटी बाज़ार अब तो हर कौने वे  खुल गया,

 फिर इन्सान कमजोर है माल उसने बहुत खाया

(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(अंतरा 3 - शादियों का बाज़ार)

मुख्य गायक 2:

पहले थी रस्में-कसमें, अब तो मंडपों में व्यापार है, शादीयाँ शोदे हैं अब तो यहाँ आशनाई  प्यार है

मुख्य गायक 1:

बोली लगती है दूल्हों की, जहाँ रुपयों का अंबार है,

जिसकी जितनी मोटी गड्डी, मोटा उसका सत्कार है!

(कोरस)

जिसकी जितनी मोटी गड्डी, मोटा उसका सत्कार है! बही बड़ा आदमी है अब जिसने हराम का खाया।


मुख्य गायक 2:

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(कोरस)


(अंतरा 4 - बिकाऊ न्याय व्यवस्था)

मुख्य गायक 1:

इंसाफ की देवी की आँखों पे, नोटों की पट्टी बाँधी  है। बिना खर्चा पानी के कोई काम नहीं, हर विभाग में आँधी है।

मुख्य गायक 2:

मुजरिम तो सरेआम घूमे, पहन के चोला साधू का,

कानून भी अब गुलाम हो गया, पैसे वाले जादू का!

(कोरस)

अरे पैसे वाले जादू का, पैसे वाले जादू का !

मुख्य गायक 1:


(अंतरा 5 - शिक्षा का पतन)

मुख्य गायक 2:

विद्या के मंदिर में भी अब, विद्या का सम्मान नहीं,

डिग्रियां बिकती हैं  लाखों में, लेकिन बंदों में ज्ञान नहीं !

मुख्य गायक 1:

गुरु-शिष्य की वो मर्यादा, अब धूमिल सी ज्योति है। विद्या की अरथी को ढोते ,संज्ञा विद्यार्थी होती है।

तालीम नहीं कोई इल्म नहीं डिग्रीयों की खरीददारी है। अयोग्यों का उन पदों पे होना शिक्षा से गद्दारी है। ये  नैतिक मूल्यों का सफाया ।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(मक़्ता / क्लाइमैक्स - बहुत तेज़ और जोश में)

दोनों गायक एक साथ:

बाहर से है चकाचौंध, भीतर से सब खोखला है,

ये विकास नहीं है यारों, ये तो बस  घपला है!

पैसे का पहिया चल रहा, इंसानियत को कुचल कर। रोहि कोई एक चल रहा है इस भीड़ में सम्हलकर। जो सच को जान पाया।

(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, यहाँ फरेबों का है साया।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

जयकारा:

बोल आजादपुर वाली मइया। की जय!

(संगीत की तेज़ थाप और ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अंत)

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