गुरुवार, 17 सितंबर 2026

वक्त बैठा है 'मजलिस-ए-गवाह' में ! आदमी मशगूल रोहि आज हर गुनाह में !

जयकारा: बोल ! आजादपुर वाली मइया की जय! जोर से -
बोल ! आजादपुर वाली मइया की जय! जोर से -
यादव योगेश कुमार रोहि जनपद अलीगढ़ के गाँव आजाद पुर में आजादपुर वाली मइया के मंच से यह भक्ति गीत- प्रस्तुत कर रहे हैं।
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वक्त बैठा है 'मजलिस-ए-गवाह' में ! 
आदमी मशगूल रोहि हर गुनाह में !
(मुखड़ा)
इंसान वासनाओं के प्रवाह में,
गुमराह है अपनी चाह में !
उसे नहीं पता, उसे नहीं पता...
कितना डूबा है गुनाह में !
इंसान वासनाओं के प्रवाह में,
गुमराह है अपनी चाह में!

​[गिराह / शेर का तड़का]
​मुख्य कव्वाल:
अन्तरा-१
जब चोट लगी तो आदमी बहुत घबराया। 
कुछ वक्त गुजरने पर होश उसको फिर आया,
वही मंजर वही नजर  अपना घर वही पाया।
इंसान जब आहत हुआ, एक दर्द था रोहि उसकी आह में!
कहीं आहत कहीं राहत कहीं चाहत कहीं थी निगाह में।
​ [रिपीट कोरस - मुखड़ा]
​मुख्य कव्वाल व कोरस (एक साथ जोरदार ताली के साथ):
इंसान वासनाओं के प्रवाह में,
गुमराह है अपनी चाह में!
उसे नहीं पता, उसे नहीं पता...
कितना डूबा है वह गुनाह में  !
इंसान वासनाओं के प्रवाह में,
गुमराह है अपनी चाह में!
उसे नहीं पता.. वह कितना डूबा है गुनाह में  !

​[अंतरा २ - चरमोत्कर्ष / तान]
​मुख्य कव्वाल (ऊँचे सुर में):
दर्द और आनंद के पड़ाव, विपरीत-विपरीत राह में!
निसार कर दी ज़िंदगी, झूठी चाहत की छाँव में!
​सह-कव्वाल:
झूठी चाहत की छाँव में!
​मुख्य कव्वाल:
होश जब आया तो उम्र ढल चुकी थी...
उसे नहीं पता..जिन्दगी बदल चुकी थी।            वह आग उसके पापों की भभक कर जल चुकी थी। 
 वह जीता रहा एक अफवाह में 
उसने जीवन बिताया गुनाह में!
​[समापन - तेज़ गति / तिहाई]
​मुख्य कव्वाल व कोरस (तेज़ ताली और ढोलक की अंतिम तिहाई):
उसे नहीं पता... जीवन बिताया गुनाह में!
उसे नहीं पता... जीवन बिताया गुनाह में!
वह गुमराह है अपनी चाह में...
इंसान वासनाओं के प्रवाह में,
गुमराह है अपनी चाह में!
उसे नहीं पता, उसे नहीं पता...
वह जीता रहा अफवाह में-
वक्त बैठा है 'मजलिस-ए-गवाह' में ! 
आदमी मशगूल रोहि हर गुनाह में !
जयकारा: बोल ! आजादपुर वाली मइया की जय! जोर से -
बोल ! आजादपुर वाली मइया की जय! जोर से -



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