सोमवार, 21 सितंबर 2026

गीत लेखन -


​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा-(१)

कल जो हाल था अपना, वह बिल्कुल आज नहीं हैं ! जो असल सबाल था अपना अब भी आज वहीं है।

ये दुनियाँ की तब्दीली हैं। या बंदिश मन की ढीली हैं। कब क्या होगा ! ये किसे पता ! राहें यहाँ बड़ी कटीली हैं।

तुझे मंजिलों का रोहि नहीं अभी अनुमान!

 ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(२) आदमी का संसार, उसकी खुशीयों का आकार! उसके मन की तरंगें हैं। 

तू मन को समझाना,पल पल ये बताना तेरे सपने  कहाँ तेरे संगे हैं। मिट जाऐंगे जहाँ से तेरे नामोनिशान !

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(३)

​अपनी साँसों का भी कोई पल , हमको विदित नहीं हैं। पल पल नयीं आशाऐं  जीवन क्यों समर्पित यहीं है।

कोई दौलत का दीवाना है , कोई मोहब्बत का दीवाना है ,कोई शौहरत का दीवाना हैं। कोई खोजता, अपना ठिकाना है !  ये ही आदमी का ताना वाना है। क्यों  अपना नहीं तुझे ज्ञान ! 

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(४)

अरमान जो  हमने सम्हाले हैं । वो भी खाक में मिलने वाले हैं । सोचता हूँ देखता रहूँ नजारों को यों हीं। दुनियाँ की हर शय वक्त के हवाले है ?

भटका हुआ ,लटका हुआ, काम सब अटका हुआ। प्रयास करता तू बहुत ! पर काम करती है दुआ। सच को तू पहचान!

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(५) मन की इच्छाऐं अनन्त और जीवन की जरूरतें छोटी !  रहने, सोने को घर विस्तर. रोहि जिन्दा रहने को रोटी। पर नीयत खोटी कर देती सब हान! 

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(५)पर घाती उत्पाती है ये मन , यदि बुद्धि का न हो इसपे नियमन।  कुसंग से इसको बचाते रहो ! तुम भजन मइया के गाते रहो। फिर मइया ही सम्हालेगी वान !

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

                   



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