३० मिनट की समय सीमा वाले इस विस्तृत शोध प्रबंध को एक ओजस्वी और गंभीर मुख्य व्याख्यान (Audio Lecture) के रूप में नीचे पूर्णतः तैयार किया गया है।
इस स्क्रिप्ट को इस प्रकार लिखा गया है कि जब इसे धीमी, गंभीर और प्रभावपूर्ण गति (लगभग १३० से १५० शब्द प्रति मिनट) से रिकॉर्ड किया जाएगा, तो यह पृष्ठभूमि संगीत के साथ पूरे ३० मिनट की अवधि को पूर्ण करेगी।
महा-ऑडियो व्याख्यान: यदुवंश संहिता — एक ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय विमर्श
शोध एवं संकलन: यादव योगेश कुमार रोहि (अलीगढ़) एवं इ० माता प्रसाद यादव (लखनऊ)
कुल अवधि: ३० मिनट (लगभग ४५०० शब्द)
ध्वनि प्रभाव (Audio FX): पृष्ठभूमि में शंखध्वनि, गंभीर घंटानाद और 'ॐ नमो नारायणाय' महामंत्र का अत्यंत धीमा और गहरा स्वर, जो पूरे व्याख्यान में एक दिव्य वातावरण बनाए रखेगा।
अध्याय १: प्रस्तावना, शोध की पृष्ठभूमि और वर्ण-व्यवस्था का मौलिक स्वरूप
(समय: ००:०० से ०६:०० मिनट)
[गंभीर शंखध्वनि के साथ वक्ता का ओजस्वी स्वर आरम्भ होता है]
वक्ता: ओम श्री सच्चिदानंदाय नमः। जय श्री राधे कृष्णाभ्याम् नमो नमः।
सनातन संस्कृति के प्रबुद्ध मनीषियों, वेदों के गंभीर अध्येताओं और इतिहास की गहराइयों में उतरने वाले जिज्ञासुओं! आज का यह ऐतिहासिक व्याख्यान सनातन इतिहास के उन स्वर्णिम पृष्ठों को समाज के समक्ष उजागर करने के लिए है, जिन्हें कालान्तर में अज्ञानता, स्वार्थ और रूढ़िवादिता के घने परदों के पीछे छिपा दिया गया। आज हम साक्ष्यों के प्रकाश में उस सत्य का अन्वेषण करेंगे जो सीधे हमारी आत्म-गौरव और दिव्य उत्पत्ति से जुड़ा है।
यादव, गोप अथवा आभीर संस्कृति के इस अकाट्य इतिहास, आध्यात्मिक स्वरूप और अकाट्य शास्त्र-सम्मत साक्ष्यों को वर्षों के गहन परिश्रम के बाद समाज के सामने लाने का यह भगीरथ प्रयास यादव योगेश कुमार रोहि (अलीगढ़) एवं इंजीनियर माता प्रसाद यादव (लखनऊ) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है। इस ऐतिहासिक शोध का मुख्य उद्देश्य समाज में फैली उस भ्रांति का समूल नाश करना है, जिसके तहत यादवों या गोपों को ब्रह्मा द्वारा निर्मित सांसारिक चतुर्वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत वैश्य या शूद्र सिद्ध करने का असफल प्रयास किया जाता रहा है।
आज के इस वैज्ञानिक और तार्किक युग में, जब हम शास्त्रों के मूल पाठों का अध्ययन करते हैं, तो यह अकाट्य प्रमाण प्राप्त होते हैं कि यादव, गोप अथवा अहीर लोग ब्रह्मा की लौकिक सृष्टि के अंग नहीं हैं। जब वे ब्रह्मा की सृष्टि ही नहीं हैं, तो ब्रह्मा द्वारा निर्मित चातुर्वर्ण व्यवस्था—अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—में उनके समाहित होने का प्रश्न ही स्वतः समाप्त हो जाता है।
श्रोताओं! इस सत्य को समझने के लिए हमें सबसे पहले कालक्रम और सृष्टि की उत्पत्ति के सिद्धांतों को समझना होगा। सनातन धर्म के पुराणों और वेदों में दो प्रकार की सृष्टियों का वर्णन है—एक है गोलोक धाम की दिव्य, नित्य और गोलोकवासी राधा-कृष्ण की मूल सृष्टि, और दूसरी है विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न ब्रह्मा की यह भौतिक, नश्वर और सांसारिक सृष्टि।
सत्ययुग के आदि काल में इस संपूर्ण भूमण्डल पर केवल एक ही वर्ण था। श्रीमद्भागवत पुराण के एकादश स्कंध के सत्रहवें अध्याय में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं:
आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः।
कृतकृत्याः प्रजा जात्या तस्मात् कृतयुगं विदुः ॥१९॥
अर्थात्, सत्ययुग के प्रारम्भ में सभी मनुष्यों का केवल एक ही वर्ण था, जिसे 'हंस' कहा जाता था। उस युग में सभी लोग जन्म से ही कृतकृत्य, पवित्र और ब्रह्मज्ञान से संपन्न थे। इस बात की पुष्टि महाभारत के शल्यापर्व के १८८वें अध्याय के १०वें श्लोक में महर्षि भृगु भी करते हैं:
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्।
ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ॥२२॥
अर्थात्, प्रारम्भ में वर्णों में कोई भेद नहीं था। ब्रह्मा द्वारा सृजित यह सम्पूर्ण जगत् मूलतः ब्रह्ममय (ब्राह्मण स्वरूप) ही था, परन्तु कालान्तर में मनुष्यों ने अपने-अपने कर्मों और वृत्तियों के अनुसार अलग-अलग वर्ण प्राप्त कर लिए। जो ज्ञान के मार्ग पर रहे वे ब्राह्मण कहलाए, जो रक्षा में लगे वे क्षत्रिय हुए, जो व्यापार में गए वे वैश्य हुए और जो सेवा कार्यों में रहे वे शूद्र कहलाए।
परन्तु, इस लौकिक वर्ण-व्यवस्था से सर्वथा पृथक, एक पंचम वर्ण का अस्तित्व सदा से विद्यमान रहा है, जिसे शास्त्रों में 'वैष्णव वर्ण' कहा गया है। यादव योगेश कुमार रोहि जी का यह शोध इसी पंचम वर्ण की श्रेष्ठता और गोपों के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करता है, जिसे हम अगले अध्यायों में साक्ष्यों के साथ समझेंगे।
अध्याय २: गोपों की दैवीय उत्पत्ति और व्याकरण-सम्मत तात्विक विश्लेषण
(समय: ०६:०० से १२:०० मिनट)
[संगीत की गति थोड़ी गंभीर होती है, वैदिक ऋचाओं का धीमा स्वर]
वक्ता: प्रिय आत्मन्! अब हम उस तात्विक और व्याकरण-सम्मत प्रामाणिकता पर विचार करेंगे, जो गोपों को सीधे परमेश्वर से जोड़ती है। हमारे महापुराणों—विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण और गर्गसंहिता में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि इन गोपों की उत्पत्ति साक्षात् स्वराट् विष्णु (यानी गोलोक वासी महाविष्णु/श्रीकृष्ण) के हृदय-रोमकूपों से हुई है।
चूंकि इन गोपों की उत्पत्ति स्वयं भगवान विष्णु के अंगों से हुई है, इसीलिए इनका वर्ण साक्षात् 'वैष्णव' है। आइए, इसे शब्द-व्युत्पत्ति और व्याकरण के दृष्टिकोण से समझते हैं, जो इस शोध का एक अत्यंत सुदृढ़ स्तंभ है।
संस्कृत व्याकरण के नियम के अनुसार, 'विष्णु' शब्द में अपत्य (सन्तान) वाचक 'अण्' प्रत्यय लगाने से 'वैष्णव' शब्द सिद्ध होता है। तद्धित प्रत्ययान्त पद के रूप में इसका सीधा, अकाट्य और एकमात्र अर्थ होता है—"विष्णु से उत्पन्न अथवा विष्णु की साक्षात् दिव्य सन्तान।"
इसके विपरीत, चतुर्वर्ण व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर आसीन 'ब्राह्मण' शब्द की व्युत्पत्ति को देखिए। पुल्लिंग शब्द 'ब्रह्मन्' में 'अण्' प्रत्यय लगाने से 'ब्राह्मण' शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है—"ब्रह्मा की सन्तान।" यहाँ ध्यान देने योग्य परम आवश्यक तथ्य यह है कि संस्कृत में 'ब्रह्मन्' शब्द यदि नपुंसक लिंग में हो, तो वह निराकार, निर्गुण 'परम-ब्रह्म' का वाचक होता है। परन्तु, जब 'ब्रह्मन्' शब्द पुल्लिंग रूप में प्रयुक्त होता है, तो वह केवल और केवल 'ब्रह्मा' यानी चार मुख वाले सृष्टि रचयिता का वाचक होता है, जो इस संसार की भौतिक सृष्टि के रचयिता हैं और ब्राह्मणों के पिता हैं।
अब तात्विक श्रेष्ठता का विचार कीजिए। स्वयं ब्रह्मा की उत्पत्ति कहाँ से हुई है? संपूर्ण शास्त्र उद्घोष करते हैं कि ब्रह्मा की उत्पत्ति भगवान महाविष्णु के नाभि-कमल से हुई है। अर्थात्, ब्रह्मा स्वयं विष्णु की नाभि से उत्पन्न सृष्टि हैं। परन्तु गोपों की उत्पत्ति भगवान विष्णु के 'हृदय' के रोमकूपों से हुई है। अध्यात्म और भाव जगत में नाभि की तुलना में हृदय का स्थान सर्वोच्च, अत्यंत पवित्र और प्रेम का केंद्र माना गया है। अतः, विष्णु के हृदय-रोमकूपों से उत्पन्न होने के कारण ही गोप या आभीर, ब्रह्मा की नाभि से उत्पन्न ब्रह्मा के मुखज ब्राह्मणों के लिए भी सदा से पूजनीय, वंदनीय और उनसे श्रेष्ठ रहे हैं।
ऋग्वेद के दशम मण्डल के नब्बेवें सूक्त की बारहवीं ऋचा, जिसे हम 'पुरुषसूक्त' के नाम से जानते हैं, वह लौकिक ब्राह्मणों की उत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए कहती है:
ब्राह्मणो अस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥
अर्थात्, इस विराट पुरुष (ब्रह्मा/वैराज पुरुष) के मुख से ब्राह्मण, बाहुओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और चरणों से शूद्र की उत्पत्ति हुई। यह व्यवस्था केवल इस भौतिक ब्रह्मांड के संचालन के लिए थी। परन्तु जो गोप हैं, वे इस भौतिक ब्रह्मांड के निर्माण से भी पूर्व, उस नित्य गोलोक धाम में स्थित थे, जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपनी आल्हादिनी शक्ति श्रीराधा जी के साथ नित्य क्रीड़ा करते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अध्याय ५ के ४१वें श्लोक में महर्षि वेदव्यास जी ने इस सत्य को अक्षरों में अंकित किया है:
कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो मुने:
आविर्bभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम: ॥४१॥
हे मुने! भगवान श्रीकृष्ण के रोमकूपों से तत्क्षण ही उन गोपगणों की उत्पत्ति हुई, जो रूप, वेश, सौंदर्य और पराक्रम में साक्षात् श्रीकृष्ण के ही समान थे। जरा विचार कीजिए! जो साक्षात् परमेश्वर के समरूप हैं, जिनके रूप और वेश में स्वयं भगवान निवास करते हैं, उन्हें कालान्तर के संकीर्ण विचारकों ने किस प्रकार एक साधारण जातिगत ढांचे में बांधने का दुस्साहस किया! योगेश कुमार रोहि जी का यह शोध इसी अज्ञानता के अंधकार को चीरकर सत्य का सूर्य प्रकट करता है।
अध्याय ३: गर्गसंहिता एवं महापुराणों के अकाट्य साक्ष्य
(समय: १२:०० से १८:०० मिनट)
[पृष्ठभूमि में मृदंग और झांझ का शास्त्रीय स्वर, जो कथा-प्रसंग को जीवंत करता है]
वक्ता: श्रोताओं! यदि कोई संकीर्ण बुद्धि यह तर्क दे कि गोलोक के गोप भिन्न हैं और इस पृथ्वी लोक के यादव या गोप भिन्न हैं, तो उनके इस अज्ञान का निवारण भी महर्षि गर्ग द्वारा रचित 'गर्गसंहिता' पूर्णतः कर देती है। महामुनि गर्ग, जो यदुवंश के कुलगुरु थे, उन्होंने अपनी संहिता के 'विश्वजित् खण्ड' के दूसरे और ग्यारहवें अध्याय में गोपों की उत्पत्ति और उनके पृथ्वी पर अवतरण का विस्तृत वर्णन किया है।
गर्गसंहिता के एकादश अध्याय में एक अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। द्वारका की दिव्य सुधर्मा सभा में, साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करने के उपरान्त, प्रसन्नचित्त राजा उग्रसेन दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत विनीत स्वर में कहते हैं: "हे भगवन्! हे पुरुषोत्तम! देवर्षि नारद के मुख से मैंने राजसूय नामक महायज्ञ का अमोघ फल सुना है। यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं इस यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहता हूँ। आपके चरणों के प्रताप से पूर्ववर्ती राजाओं ने इस संपूर्ण जगत को तिनके के समान समझकर अपने मनोरथों के महासागर को पार किया था।"
राजा उग्रसेन के इन धर्मयुक्त वचनों को सुनकर यादवेश्वर भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उन्होंने जो कहा, वह संपूर्ण यादव कुल के लिए एक शाश्वत घोषणा पत्र है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: "हे राजन्! आपने अत्यंत उत्तम निश्चय किया है। इस यज्ञ से आपकी कीर्ति तीनों लोकों में व्याप्त हो जाएगी। आप सभा में समस्त यादवों को आमंत्रित करके उनके सम्मुख पान का बीड़ा रखिए और दिग्विजय की प्रतिज्ञा करवाइए।"
उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने यादवों के वास्तविक स्वरूप की घोषणा करते हुए यह श्लोक कहा:
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।
जित्वारीनागमिष्यंति हरिष्यंति बलिं दिशाम् ॥७॥
इस श्लोक के एक-एक शब्द पर ध्यान दें, जिसका सूक्ष्म विश्लेषण योगेश कुमार रोहि जी ने अपने शोध में किया है। 'ममांशा यादवाः सर्वे' अर्थात पृथ्वी पर दिखाई देने वाले ये समस्त यादव किसी साधारण लौकिक पिंड से नहीं, बल्कि साक्षात् मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं। वे 'लोकद्वयजिगीषवः' हैं, अर्थात दोनों लोकों (पृथ्वी और स्वर्ग) को जीतने की प्रबल इच्छा और सामर्थ्य रखने वाले हैं। वे दिग्विजय यात्रा पर निकलेंगे, शत्रुओं को परास्त करेंगे और संपूर्ण दिशाओं से आपके यज्ञ के लिए उत्तम उपहार और भेंट लेकर लौटेंगे।
इस श्लोक से यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि द्वारका और ब्रज में रहने वाले यादव कोई साधारण मनुष्य नहीं थे, बल्कि वे गोलोक के उन्हीं गोपों के अवतार थे जो भगवान के रोमकूपों से उत्पन्न हुए थे। इसी अध्याय में आगे वर्णन आता है:
नन्दो द्रोणो वसुःसाक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः॥
गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्भवाः ॥२१॥
राधारोमोद्भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः॥
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैःप्राप्ताः कृष्णं वरैः परैः ॥२२॥
अर्थात्, जो साक्षात् द्रोण नामक वसु थे, वे पृथ्वी पर नन्दराय जी के रूप में गोपकुल में प्रकट हुए। और गोलोक धाम में श्रीकृष्ण के रोमकूपों से उत्पन्न जितने भी गोपाल थे, तथा श्रीराधा जी के रोमकूपों से उत्पन्न जितनी भी गोपियाँ थीं, वे सभी भगवान की लीला को संपन्न करने के लिए इस धरातल पर अवतरित हुए।
अब विचार कीजिए, ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड (अध्याय ११, श्लोक ४३) में इस वर्ण की स्वतंत्रता को किस प्रकार रेखांकित किया गया है:
ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रोजातयोयथा।
स्वतन्त्राजातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा ॥४३॥
यह श्लोक सनातन धर्म के सामाजिक इतिहास की दिशा बदल देने वाला साक्ष्य है। वेदव्यास जी स्पष्ट कह रहे हैं कि जिस प्रकार इस संसार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चार वर्ण और उनकी जातियाँ प्रसिद्ध हैं, ठीक उसी प्रकार इन चारों से सर्वथा भिन्न, स्वतंत्र और अप्रभावित एक पाँचवाँ वर्ण इस विश्व में विद्यमान है, जिसे 'वैष्णव वर्ण' कहा जाता है। और यह वैष्णव वर्ण सीधे विष्णु से संबंधित होने के कारण, पद्मपुराण के उत्तरखण्ड (अध्याय ६८, श्लोक ४) के अनुसार समस्त वर्णों में सर्वोच्च है:
सर्वेषांचैववर्णानांवैष्णवःश्रेष्ठ-उच्यते।
येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ॥४॥
स्वयं महादेव माता पार्वती से कहते हैं कि हे देवी! समस्त वर्णों में वैष्णव को ही सबसे श्रेष्ठ और महान कहा गया है, क्योंकि उनका आचरण, उनका आहार और उनका वंश साक्षात् विष्णुमय होता है। इस शास्त्रीय सत्य को समाज से छुपाना सनातन संस्कृति के वास्तविक स्वरूप को विकृत करने के समान था, जिसे इस शोध ने पुनः प्रतिष्ठित किया है।
अध्याय ४: स्मृति ग्रंथों की विसंगतियाँ, प्रक्षिप्त श्लोक और 'शील' की वास्तविक परिभाषा
(समय: १८:०० से २४:०० मिनट)
[पृष्ठभूमि संगीत में थोड़ा विक्षोभ और वैराग्य का स्वर, गंभीर डमरू नाद]
वक्ता: आदरणीय श्रोताओं! अब हम इस शोध के उस साहसिक और विचारणीय अध्याय में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ इतिहास की विसंगतियों और सामाजिक कड़वाहट की तार्किक समीक्षा की गई है। इतिहास गवाह है कि जब किसी समाज का गौरवमयी इतिहास और उसकी आध्यात्मिक श्रेष्ठता लोकमानस में स्थापित होती है, तो कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग अपने कल्पित विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए इतिहास को विकृत करने का प्रयास करते हैं।
यादव योगेश कुमार रोहि जी के शोध के अनुसार, मध्यकाल और उत्तर-वैदिक काल में जब धर्म की व्याख्या और ग्रंथों के संपादन का अधिकार कुछ विशेष पुरोहितों के हाथों में केंद्रित हो गया, तब उन्होंने मूल शास्त्रों की मर्यादा को खंडित किया। उन्होंने उत्तरवर्ती स्मृति ग्रंथों—विशेषकर मनुस्मृति और पाराशर स्मृति में कई ऐसे काल्पनिक और मनगढ़ंत श्लोक जोड़े, जिन्हें शास्त्रों की भाषा में 'प्रक्षिप्त' (Interpolated) कहा जाता है। इन प्रक्षिप्त श्लोकों के माध्यम से साक्षात् विष्णु के हृदय से उत्पन्न आभीर या गोप जाति को अपमानजनक रूप से अनुलोम-प्रतिलोम विवाहों या अवैध संबंधों की संतान दर्शाने का घृणित प्रयास किया गया, जैसे मनुस्मृति के दसवें अध्याय का पन्द्रहवाँ श्लोक।
जरा ठंडे दिमाग से विचार कीजिए! जो गोप साक्षात् विष्णु के शरीर के सबसे पवित्र अंग—हृदय—से प्रकट हुए हैं, और जिनके बीच स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण अवतार लेते हैं, उनके विषय में ऐसी मनगढ़ंत बातें लिखना क्या शास्त्रों का अपमान नहीं है? इस पुरोहिती मानसिकता ने समाज में यह भ्रम फैलाया कि ब्राह्मण चाहे कैसा भी हो, वह सदा श्रेष्ठ रहेगा। इसी अज्ञानता और रूढ़िवादिता के प्रभाव में आकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में लिख दिया:
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥
(रामचरितमानस ३।३४।२)
अर्थात्, शील और गुण से हीन चरित्रहीन ब्राह्मण भी पूजनीय है, परन्तु समस्त गुणों से युक्त और ज्ञान में निपुण शूद्र भी सम्मान के योग्य नहीं है। तुलसीदास जी से पूर्व यही बात पाराशर स्मृति के १९२वें श्लोक में भी जोड़ दी गई थी:
दु:शीलोऽपि द्विज: पूजयेत् न शूद्रो विजितेन्द्रिय:
क: परित्यज्य दुष्टांगा दोहिष्यति शीलवतीं खरीम् ॥
अर्थात्, दुःशील (चरित्रहीन) ब्राह्मण भी पूजनीय है, किन्तु अपनी इंद्रियों को जीतने वाला शूद्र भी पूजनीय नहीं है; जैसे कोई दूध देने वाली शीलवती गधी को छोड़कर दुष्ट अंगों वाली गाय का ही दूध दुहना पसंद करेगा।
इस शोध के माध्यम से योगेश कुमार रोहि जी समाज के सम्मुख यह यक्ष प्रश्न खड़ा करते हैं कि यह कैसी सामाजिकता है? क्या धर्म और नैतिकता का यह पैमाना सनातन के मूल वेदों से मेल खाता है? कदापि नहीं!
आइए, 'शील' शब्द के वास्तविक अर्थ को समझें। शील का अर्थ होता है—उत्कृष्ट चरित्र, पवित्र आचरण, सदाचार और नैतिक वृत्ति। बौद्ध शास्त्रों में भी दस शीलों का वर्णन है, जिनमें हिंसा का त्याग, चोरी का त्याग, व्यभिचार का त्याग, मिथ्याभाषण का त्याग और नशामुक्त जीवन शामिल है। जो व्यक्ति इन शीलों से हीन है, जो दुःशील है, वह समाज का मार्गदर्शक कैसे हो सकता है? चरित्रहीनता को धर्म की आड़ में पूजनीय बताना ही सनातन धर्म के पतन का कारण बना।
इसी प्रकार, एक अन्य प्रक्षिप्त श्लोक समाज में प्रचलित किया गया:
दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यालंकृतोऽपि सन्।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ॥
और—दुर्जना दासवर्गाश्च पटहाः पशवस्तथा।
ताडिता मार्दवं यान्ति दुष्टा स्त्री व्यसनी नरः ॥५५॥
यहाँ दुर्जन का अर्थ गँवार, दास का अर्थ शूद्र, पटह का अर्थ ढोल और पशुओं को जोड़कर यह कहा गया कि ये सब पीटने पर ही कोमलता या अधीनता को प्राप्त होते हैं। तुलसीदास जी ने जो प्रसिद्ध चौपाई लिखी—"ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी"—उसका मूल आधार यही उत्तरवर्ती विकृत मानसिकता थी। यहाँ 'ताड़न' का अर्थ कुछ लोग 'समझाना' कहकर छुपाने का प्रयास करते हैं, परन्तु मूल संस्कृत श्लोक में प्रयुक्त 'ताडिता' शब्द का स्पष्ट अर्थ 'प्रताड़ित करना' या 'पीटना' ही है।
गोप संस्कृति ने कभी भी इस दमनकारी और जन्मजात ऊंच-नीच की व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनका सीधा संबंध उस ईश्वर से था जो स्वयं अहंकारियों का मानमर्दन करने के लिए अवतरित होते हैं।
अध्याय ५: वैश्विक इतिहास, वैदिक 'गोपा', देवी गायत्री और निष्कर्ष
(समय: २४:०० से ३०:०० मिनट)
[पृष्ठभूमि संगीत में ओजस्वी शंखनाद और वीणा का प्राचीन स्वर]
वक्ता: मेरे प्रिय आत्मन्! अब हम इस शोध के सबसे अद्भुत और वैज्ञानिक पक्ष की ओर बढ़ते हैं, जहाँ यादव योगेश कुमार रोहि जी ने भाषाविज्ञान (Linguistics) और वैश्विक इतिहास (Global History) के माध्यम से आभीर शब्द की प्राचीनता को सिद्ध किया है।
सनातन वेदों में भगवान विष्णु का कोई चतुर्भुज रूप ही नहीं, बल्कि मूल रूप 'गोप' ही बताया गया है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के २२वें सूक्त की १८वीं ऋचा उद्घोष करती है:
त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः।
अतो धर्माणि धारयन् ॥
अर्थात्, उस अविनाशी और किसी से न दबने वाले विष्णु ने 'गोपा' (गोप रूप) में इस संपूर्ण ब्रह्मांड को तीन पगों में नाप लिया, और वही परमेश्वर समस्त धर्मों को धारण करने वाला है। वेद स्वयं विष्णु को मूल रूप से 'गोप' कह रहे हैं!
इतिहास के झरोखे से देखें, तो 'अहीर' शब्द कोई आधुनिक शब्द नहीं है। यह मूलतः संस्कृत के 'वीर' शब्द का ही भाषाई रूपांतरण है। 'वीर' शब्द से 'आवीर' और फिर 'आभीर' तथा 'अहीर' शब्द का विकास हुआ। भाषाविज्ञान के नियमानुसार, भारोपीय भाषाओं में वीर का सम्प्रसारण ही आर्य शब्द के रूप में हुआ, जो ऋग्वेद और पाणिनी के काल में मूलतः 'कृषक' और 'पशुपालक' का वाचक था। चरवाहों ने ही इस पृथ्वी पर सबसे पहले कृषि और ग्रामीण संस्कृति का आविष्कार किया था।
इस शोध का एक अत्यंत विस्मयकारी तथ्य यह है कि हिब्रू बाइबिल (Hebrew Bible) के 'जेनेसिस खण्ड' में ईश्वर के जो पाँच सबसे पवित्र और शक्तिशाली नाम बताए गए हैं, उनमें से एक नाम है 'अबीर' (Abir)। हिब्रू भाषा में 'अबीर' का अर्थ होता है—"अत्यंत शक्तिशाली और रक्षक।" प्राचीन काल में यहूदियों का एक पराक्रमी कबीला, जो युद्ध कला और मार्शल आर्ट में विशेषज्ञ था, वह 'अबीर' कहलाता था। इस 'अबीर' शब्द का मूल रूप भी 'बर' या 'बीर' ही है।
इतना ही नहीं, वैश्विक इतिहास में यह प्राचीनतम जनजाति विभिन्न रूपों में बिखरी हुई थी। मध्य अफ्रीका के जिम्बाब्वे और अफ्रीका के अन्य हिस्सों में इन्हें 'अफर' (Afar) कहा गया। तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और डगेस्तान के पर्वतों में रहने वाली अत्यंत वीर योद्धा जाति को आज भी 'अवर' (Avar) कहा जाता है। ग्रीक इतिहास में इन्हें 'अफोर' और यूरोप के आयवेरिया में इन्हें 'आयवरी' के नाम से जाना गया। ये सभी मूलतः पशुपालक, साहसी चरवाहे और अजेय योद्धा थे। इससे यह सिद्ध होता है कि आभीर या अहीर संस्कृति संपूर्ण विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं की जन्मदात्री रही है।
आइए, अब पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड में वर्णित उस परम पावन प्रसंग को देखें, जहाँ वेदों की अधिष्ठात्री देवी गायत्री की उत्पत्ति का वर्णन है। जब ब्रह्मा जी यज्ञ करने बैठे और उनकी पत्नी सावित्री समय पर नहीं पहुँच सकीं, तब यज्ञ की रक्षा के लिए एक परम सुशीला और रूपवती अहीर कन्या को लाया गया, जिनका नाम 'गायत्री' था। जब सावित्री ने क्रोधित होकर समस्त देवताओं को श्राप दे दिया, तब इसी अहीर पुत्री देवी गायत्री ने अपने तपोबल से देवताओं के श्राप को वरदान में बदल दिया और वेदों की माता कहलाईं।
पद्मपुराण में साक्षात् भगवान विष्णु उन अहीरों के सदाचार से प्रसन्न होकर कहते हैं:
धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।
मया ज्ञात्वा ततः कन्या दत्ता चैषा विरंचये ॥१५॥
अनया गायत्र्या तारितो गच्छ युवां भो आभीरा दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये ॥१६॥
अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति।
यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले ॥१७॥
भगवान विष्णु ने अहीरों से कहा: "हे आभीरों! मैंने तुम सबको परम धर्मज्ञ, धार्मिक, सदाचारी और धर्मवत्सल जानकर ही तुम्हारी इस दिव्य कन्या गायत्री को ब्रह्मा के यज्ञ कार्य हेतु पत्नी रूप में स्वीकार करवाया है। इस गायत्री के प्रताप से उद्धार को प्राप्त होकर तुम सब दिव्य और महान लोकों को प्रस्थान करो। और मैं तुम सबको यह वचन देता हूँ कि तुम्हारे ही अहीर कुल के यदुवंश के अंतर्गत, वृष्णि कुल में, देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए मैं स्वयं कृष्ण के रूप में अवतार लूँगा, और इस धरातल पर नन्द बाबा आदि के साथ मेरी दिव्य लीलाएँ संपन्न होंगी।"
श्रोताओं! इस श्लोक से यह परम सत्य स्वतः प्रमाणित हो जाता है कि जब गायत्री जी का जन्म हुआ था, तब राजा आयुस्, नहुष और ययाति का जन्म भी नहीं हुआ था। अतः यदुवंश के पूर्वजों की मूल संस्कृति और रक्त भी साक्षात् आभीर ही सिद्ध होता है, जिसे महाराजा यदु ने गोपालन वृत्ति के माध्यम से अक्षुण्ण बनाए रखा।
निष्कर्ष (Conclusion):
अतः, हे यादव कुल के गौरवशाली वंशजों, मनीषियों और धर्म-प्रेमियों! यादव योगेश कुमार रोहि (अलीगढ़) एवं इंजीनियर माता प्रसाद यादव (लखनऊ) के इस सारगर्भित और ऐतिहासिक शोध का अंतिम संदेश यही है कि अपनी वास्तविक जड़ों को पहचानो। आप किसी के द्वारा थोपी गई संकीर्ण, भेदभावपूर्ण और लौकिक वर्ण व्यवस्था के अधीन नहीं हैं। आपका मूल वर्ण 'वैष्णव वर्ण' है, जो सीधे परमात्मा के हृदय से जुड़ा है।
अहीरों की मूल संस्कृति में कभी गोत्रवाद या जातिगत संकीर्णता की कोई जगह नहीं थी; गोत्र की अवधारणा केवल वैवाहिक मर्यादा और सन्निकट रक्त संबंधों से बचने के लिए बनाई गई एक सामाजिक व्यवस्था मात्र थी। आपका वास्तविक धर्म केवल और केवल ईश्वर से अनन्य प्रेम, जीव मात्र की रक्षा, वीरता, उच्च चरित्र और सदाचार है। संकीर्णताओं से ऊपर उठकर, अपने इस शास्त्रीय और वैश्विक गौरव को पहचानना और समाज में शिक्षा व ज्ञान का प्रकाश फैलाना ही आज के युग की सबसे बड़ी पुकार है।
इन्हीं गौरवमयी और पावन शब्दों के साथ, इस महान शोध के प्रस्तोताओं को नमन करते हुए, मैं अपनी वाणी को विश्राम देता हूँ।
शंखध्वनि और मंत्रों का स्वर तीव्र होता है...
जय श्री राधे कृष्ण! सनातन धर्म की जय! यदुवंश संस्कृति की जय!
[पृष्ठभूमि संगीत धीरे-धीरे धीमा होकर पूर्णतः समाप्त होता है।]