सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

यादव वंश के प्रक्षेप-

अहीर (यादव) जाति का क्षत्रिय वर्ण एक ऐतिहासिक एवं पौराणिक विश्लेषण-

 प्रस्तावना
भारतीय समाज की जाति व्यवस्था प्राचीन काल से ही जटिल और बहुस्तरीय रही है। पुराणों, महाकाव्यों और इतिहासकारों के ग्रंथों में विभिन्न जातियों की उत्पत्ति को विभिन्न तरीकों से वर्णित किया गया है, जो कभी-कभी परस्पर विरोधी भी प्रतीत होते हैं। यह लेख मुख्य रूप से अहीर (यादव) जाति पर केंद्रित है, जो प्राचीन काल से ही कृषि, पशुपालन और शासन से जुड़ी रही है। हम देखेंगे कि कैसे पुराणकारों और यथास्थितिवादियों ने शक्तिशाली जातियों को वर्णसंकर या निम्न घोषित करने की कोशिश की, लेकिन शास्त्रीय प्रमाणों से अहीरों का क्षत्रिय वर्ण स्पष्ट होता है। यह विश्लेषण "गोप-आभीर (अहीर)-यादव" नामक पुस्तक से है, जिसमें सभी श्लोकों को मूल रूप में शामिल है। अंत में, यादव वंश की शेजरा (वंशावली) भी प्रस्तुत की गई है, जो पुराणों पर आधारित है।

यह लेख तथ्यों पर आधारित है, जिसमें पुराणों से हम विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के उदाहरणों से शुरू करते हैं और अहीरों के क्षत्रिय होने के प्रमाण पर समाप्त करेंगे।

 1. राजपूत जाति की उत्पत्ति- वर्णसंकर या विदेशी?
मध्यकाल में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध राजपूत जाति को पुराणों में वर्णसंकर घोषित किया गया। ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसे क्षत्रिय पुरुष और करण स्त्री की संतान बताया गया है।

श्लोक-
 क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रों बभूव ह।  
 राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः ॥१११०॥

अर्थ- क्षत्रिय पुरुष तथा करण कन्या के संयोग से राजपूत जाति का उद्भव होता है।

करण स्त्री कौन है? ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखंड, अध्याय 10 में स्पष्ट है कि शूद्र और वैश्य के मिश्रण से करण की उत्पत्ति होती है।

श्लोक-
 इत्येवमाद्या विप्रेन्द्र सच्छूद्राः परिकीर्तिताः।  
 शूद्राविशोस्तु करणोऽम्बष्ठो वैश्याद्दिवजन्मनोः ॥१८॥

आधुनिक अंग्रेज इतिहासकारों ने भी राजपूतों को विदेशी बताया। जेम्स टॉड ने "एनाल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान" में राजपूतों को सीथियन की संतान कहा। इसी प्रकार, स्मिथ ने उन्हें शक और हूण की संतान घोषित किया, जबकि अग्निकुल (चौहान, परमार, चालुक्य) को शक-हूण से जोड़ा और राष्ट्रकूट, चंदेल को गोंड, भर आदि से।

यह दर्शाता है कि शक्तिशाली जातियों को कमतर दिखाने की प्रवृत्ति रही है।

 2. क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति विविध मत-
क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति तीन प्रमुख तरीकों से बताई गई है, जो कभी-कभी विरोधाभासी लगती हैं।

क) ऋग्वेद से-
 बाहू इति। राजन्यः। कृतः ॥१२॥  
 (ऋग्वेद १०/९०/१२)

अर्थ- क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं से हुई।

ख) इक्ष्वाकु वंश से-
भगवान राम इक्ष्वाकु वंशी क्षत्रिय थे। इक्ष्वाकु की उत्पत्ति मनु के नाक छींकने से बताई गई।

श्लोक-
 क्षुवतस्तु मनोः पूर्वमिक्ष्वाकुरभिनिः सृतः ॥८॥  
 (ब्रह्मांड पुराण, मध्यम भाग, अध्याय ६३)

अर्थ- प्राचीन काल में मनु द्वारा नाक से छींकने पर इक्ष्वाकु निकले।

ग) महाभारत से-
परशुराम द्वारा क्षत्रियों के विनाश के बाद, क्षत्रिय स्त्रियों ने ब्राह्मणों से संतान उत्पन्न की।

श्लोक-
 त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा।  
 जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेंद्रे पर्वतोत्तमे ॥४॥  
 तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति।  
 ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥५॥  
 तेभ्यश्च लेभिरे गर्भ क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।  
 ततः सुषुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान ॥७॥  
 कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये।  
 एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ॥८॥  
 जातं वृद्ध च धर्मेण सुदीघेर्णायुषान्वितम्।  
 चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्बाह्यणोत्तराः ॥९॥  
 (महाभारत, आदिपर्व, प्रथम खंड, अध्याय ६४)

अर्थ- क्षत्रिय स्त्रियों ने ब्राह्मणों से गर्भ धारण किया, जिससे क्षत्रिय संतान हुई।

यह मत अमान्य है क्योंकि: (१) क्षत्रिय प्राचीन काल से अस्तित्व में हैं; (२) ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री से संतान ब्राह्मण होती है।

श्लोक-
 भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते।  
 आनुपूर्व्याद् द्वयोर्कीनौ मातृजात्यौ प्रसूयतः ॥४॥  
 (अनुशासनपर्व, अध्याय ४८)

 3. ब्राह्मण जाति की उत्पत्ति
ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ माना गया, जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से बताई गई।

श्लोक-
 ब्राह्मणः। अस्य। मुखम्। आसीत्।

उपाध्याय, दीक्षित आदि दस ब्राह्मण कश्यप के पुत्र कण्वमुनि और आर्यावती से हुए।

श्लोक-
 दशपुत्रास्तयोर्जाता आर्यबुद्धिकरा हि ते।  
 उपाध्यायो दीक्षितश्च पाठकः शुक्लमिश्रकौ ॥७॥  
 अग्निहोत्री द्विवेदी च त्रिवेदी पांड एव च।  
 चतुर्वेदीति कथिता यथा नाम तथा गुणाः ॥८॥  
 (भविष्य पुराण, भाग २, प्रतिसर्ग पर्व, अध्याय २१)

मनु से सभी वर्ण उत्पन्न हुए।

श्लोक-
 ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः।  
 ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ॥१४॥  
 (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ७५)

अर्थ- उन्हीं मनु से ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए। तभी से ब्राह्मण कुल क्षत्रिय से सम्बद्ध हुआ।

 4. अन्य जातियों की उत्पत्ति- वर्णसंकर उदाहरण
बहादुर, जाट आदि को वर्णसंकर कहा गया।

श्लोक-
 म्लेच्छेश्चभुक्त्यत्यस्ताबभूर्यु वर्णसङ्कराः।  
 न वै आदी न वै म्लेच्छाजट्टा जात्या न नेहनाः ॥११२७॥  
 (भविष्य पुराण, अध्याय २, प्रतिसर्ग पर्व)

 5. नंदिनी गाय से जातियों की उत्पत्ति- एक चमत्कारिक कथा
कई जातियों (हूण, पारसी, पहलव, शक, द्रविड़, सिंहल, पौंड्र आदि) की उत्पत्ति नंदिनी गाय के मूत्र, गोबर आदि से बताई गई, जो मनगढ़ंत लगती है।

श्लोक-
 आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ।  
 अंगारवर्ष मुञ्चंती मुहुर्वालधितो महत् ॥३५॥  
 असृजत् पहलवान पुच्छात् प्रस्रवाद् द्रविड़ाव्छकान्।  
 योनिदेशाच्च यवनान शकृतः शबरान बहून ॥३६॥  
 मूत्रतश्चासृजत कांश्चिच्छ्वरांश्चैव पार्श्वतः  
 पौण्ड्रान किरातान यवनान सिंहलान बबार्रान खसान ॥३७॥  
 चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान्।  
 ससर्ज फेनतः सा गौम्लेंच्छान बहुविधानपि ॥३८॥  
 (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १७३)

अर्थ- नंदिनी गाय ने पूंछ से पहलव, थनों से द्रविड़-शक, योनिदेश से यवन, गोबर से शबर, मूत्र से शबर, पार्श्व से पौंड्र आदि, और फेन से चीन-हूण आदि उत्पन्न किए।

यह जबरदस्ती की कथा है, जब उत्पत्ति का ज्ञान न हो।

 6. विरोधाभासी उत्पत्ति- शक जाति का उदाहरण
महाभारत में शक नंदिनी के थन से, लेकिन शिव पुराण में सूर्यवंशी नरिष्यंत से।

श्लोक-
 नरिष्यन्ताच्छका पुत्रा नमगस्य सुतोऽभवत् ॥२२॥  
 (शिव पुराण, उमाकोटि संहिता, अध्याय ३६, पेज १२९७)

अर्थ- नरिष्यंत से शकों का जन्म।

यह हास्यास्पद विरोध है।

 निष्कर्ष- अहीर (यादव) का क्षत्रिय वर्ण
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि जब कोई जाति सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देती है, तो उसे निम्न घोषित किया जाता है-जैसे बुद्ध, मौर्य, कायस्थ, क्षत्रिय, राजपूत, वैश्य आदि। अहीर जाति ने भागवत धर्म और राजनीतिक शक्ति से चुनौती दी, इसलिए उसे शूद्र, महाशूद्र, अत्यज, वर्णसंकर, विदेशी कहा गया। लेकिन शास्त्र कहते हैं-

श्लोक-
 यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ॥३४॥  
 (मत्स्य पुराण, अध्याय ३४/३०; महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ८५; हरिवंश पुराण, हरिवंश पर्व, ३३/५५)

अर्थ- यदु से यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए। अर्थात यादव/अहीर का वर्ण क्षत्रिय है।

पृथ्वीराज रासो में ३६ क्षत्रिय वंशों में अहीर शामिल हैं।

श्लोक-
 रवि ससि जादव वंश, ककुस्थ परमार सदावर।  
 चाहुवान चालुकय, छंद सिलार अभियर। (आभीर)  
 दोयमत मकवान, गरूअ गोहिल गोहिलपुत।  
 चापोत्कट परिवार, राव राठौर रोसजुत।  
 देवरा टांक सैन्धव अनिग, योतिक प्रतिहार दधिषट।  
 कारट्ट‌पाल कोटपाल हुल, हरितट गौर कमाष मट।  
 धन्यपालक निकुंभ वर, राजपाल कविनीस।  
 कालछुरक्कै आदि दे, बरने वंस छत्तीस।

नंदगोप की पुत्री योगमाया को क्षत्रिया कहा गया।

श्लोक-
 निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा  
 विद्याना ब्रहाविद्या त्वमोंकारोऽथ वषट् तथा ॥२३॥  
 (हरिवंश पुराण, विष्णु पर्व, अध्याय ३)

नंदगोप स्वयं क्षत्रिय
````````````````````
श्लोक-
 एवमिति सार्द्धम। एवं नंदःगोपः क्षत्रा व्रजरक्षाधिकृतेन गोकुले आघोषयत् सर्वत्र घोषितवान् ॥१३॥  
 (अन्वितार्थ प्रकाशिका, अध्याय ३९, दशम स्कंध, पूर्व भाग, पेज १२६०)

कृष्ण कहते हैं-

श्लोक
 क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्या प्रकृतिस्थिताः।  
 यदुवंशे समुत्पन्न क्षात्रं वृत्त मनुष्ठित ॥१०॥  
 (हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व, ८०/१०)

कृष्ण को गोप (अहीर) जाति में जन्मा कहा

श्लोक-
 गोपजातिप्रतिच्छन्नौ देवा गोपालरूपिणः।  
 ईडिरे कृष्णरामौ च नटा इव नटं नृप ॥११॥  
 (भागवत पुराण, १०/१८/११)

इस प्रकार, अहीर का वर्ण क्षत्रिय है। हमें साजिश समझकर अपनी पहचान माननी चाहिए।

 यादव वंश की शेजरा (वंशावली)
पुराणों (मत्स्य, हरिवंश आदि) के आधार पर यादव वंश की संक्षिप्त शेजरा निम्न है-

- ब्रह्मा - अत्रि - सोम (चंद्र)-पुरुरवा - आयु - नहुष - ययाति  
 ययाति के पुत्र यदु (यादव वंश के आदि पुरुष)  
 यदु - सहस्रजित् - शतजित् - हैहय (हैहय वंश)  
 यदु की अन्य शाखाएं- क्रोष्टु - वृजिनवान - स्वाहि - रुशेकु - चित्ररथ - शशबिंदु  
 शशबिंदु - पृथुश्रवा - अंतरा - सुयज्ञ - उशना - शिनेयु - मरुत्त  
 ... (कई पीढ़ियां)  अंधक (अंधक वंश) और वृष्णि (वृष्णि वंश)  
- वृष्णि - युधाजित - अनामित्र - शिनि - सत्यक - युयुधान  
 मुख्य शाखा- यदु  ... - वसुदेव - श्रीकृष्ण और बलराम (यादव कुल के प्रमुख)  
 कृष्ण के वंशज- प्रद्युम्न - अनिरुद्ध - वज्र (मथुरा के यादव राजा)  

यह शेजरा चंद्रवंशी क्षत्रिय परंपरा को दर्शाती है, जिसमें यादवों की राजकीय भूमिका स्पष्ट है। विस्तृत शेजरा के लिए हरिवंश पुराण का अध्ययन करें।


शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

नया सत्र-

२१ -फरवरी - शनिवार को खिटकारी मियाँ मिस्त्री व उनके वेलदार का काम चला-
२२ -फरवरी - रविवार को खिटकारी मियाँ मिस्त्री व उनके वेलदार का काम चला-

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

आवश्यकता कामना और वासना के भेद -

१-आवश्यकता जीवन की मौलिक अनिवार्यता है जिसके अभाव में जीवन का अस्तित्व ही सम्भव नहीं- भोजन वस्त्र और आवास जीवन की मौलिक आवश्यकता हैं।

२-इससे आगे कामनाओं का अस्तित्व मनोवेगों पर आधारित है मनुष्य प्रत्येक कर्म ही कामनाओं की प्रेरणा पर आधारित है। और जीवन का अवलम्बन कर्म है। कामनाओं सञ्चय काम ( sex) के रूप में मन में समाहित है।

३-और अब बात करते हैं वासनाओं की वासना हमारे चित्त में सञ्चित वह संस्कार हैं। जो हमारे मन में पूर्वजन्म से प्रवृत्तियों के रूप में बसे हुए हैं।
जहाँ कामनाओ मन में होती हैं वहीं वासनाऐं चित में बसी हुई होती हैं।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

भागवत पुराण में कलियुग का वर्णन-

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित् । समय बड़ा बलवान् है; ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जायगा, त्यों-त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरणशक्तिका लोप होता जायगा ॥ 1 ॥ कलियुगमें जिसके पास धन होगा, उसीको लोग कुलीन, सदाचारी और सी मानेंगे। जिसके हाथमें शक्ति होगी वही धर्म और न्यायको व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा ॥ 2 ॥ विवाह सम्बन्धके लिये कुल शील-योग्यता आदिकी परख-निरख नहीं रहेगी, युवक-युवतीकी पारस्परिक रुचिसे ही सम्बन्ध हो जायगा। व्यवहारकी निपुणता सच्चाई और ईमानदारीमें नहीं रहेगी जो जितना छल-कपट कर सकेगा, वह उतना ही व्यवहारकुशल माना जायगा। स्त्री और पुरुषको श्रेष्ठताका आधार उनका शील-संयम न होकर केवल रतिकौशल ही रहेगा। ब्राह्मणकी पहचान उसके गुण-स्वभावसे नहीं यज्ञोपवीतसे हुआ करेगी ॥ 3 ॥ वस्त्र, दण्ड-कमण्डलु आदिसे ही ब्रह्मचारी, संन्यासी आदि आश्रमियोंकी पहचान होगी और एक-दूसरेका चिह्न स्वीकार कर लेना ही एकसे दूसरे आश्रम में प्रवेशका स्वरूप होगा। जो घूस देने या घन सर्च करनेमें असमर्थ होगा, उसे अदालतोंसे ठीक-ठीक न्याय न मिल सकेगा। जो बोलचालमें जितना चालाक होगा, उसे उतना ही बड़ा पण्डित माना जायगा ॥ 4 असाधुताकी— दोषी होनेकी एक ही पहचान रहेगी गरीब होना। जो जितना अधिक दम्भ पाखण्ड कर सकेगा, उसे उतना ही बड़ा साधु समझा जायगा। विवाहके लिये एक-दूसरेकी स्वीकृति ही पर्याप्त होगी, शास्त्रीय विधि विधानकी-संस्कार आदिकी कोई आवश्यकता न समझी जायगी। बाल आदि सैंवारकर कपड़े-लत्तेसे लैस हो जाना ही स्नान समझा जायगा ॥ 5 ॥लोग दूरके तालाबको तीर्थ मानेंगे और निकटके तीर्थ गङ्गा-गोमती, माता-पिता आदिकी उपेक्षा करेंगे। सिरपर बड़े-बड़े बाल-काकुल रखाना ही शारीरिक सौन्दर्यका चिह्न समझा जायगा और जीवनका सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा अपना पेट भर लेना। जो जितनी ढिठाईसे बात कर सकेगा, उसे उतना ही सच्चा समझा जायगा ॥ 6 ॥ योग्यता चतुराईका सबसे बड़ा लक्षण यह होगा कि मनुष्य अपने कुटुम्बका पालन कर ले। धर्मका सेवन यशके लिये किया जायगा। इस प्रकार जब सारी पृथ्वीपर दुष्टोंका बोलबाला हो जायगा, तब राजा होनेका कोई नियम न रहेगा; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रोंमें जो बली होगा, वही राजा बन बैठेगा। उस समयके नीच राजा अत्यन्त निर्दय एवं क्रूर होंगे; लोभी तो इतने होंगे कि उनमें और लुटेरोंमें कोई अन्तर न किया जा सकेगा। वे प्रजाकी पूँजी एवं पत्नियोतकको छीन लेंगे। उनसे डरकर प्रजा पहाड़ों और जंगलोंमें भाग जायगी। उस समय प्रजा तरह-तरहके शाक, कन्द-मूल, मांस, मधु, फल-फूल और बीज गुठली आदि खा-खाकर अपना पेट भरेगी ॥ 7 -9 ॥ कभी वर्षा न होगी- सूखा पड़ जायगा; तो कभी कर पर कर लगाये जायँगे। कभी कड़ाके की सर्दी पड़ेगी तो कभी पाला पड़ेगा, कभी आँधी चलेगी, कभी गरमी पड़ेगी तो कभी बाढ़ आ जायगी। इन उत्पातोंसे तथा आपसके सङ्घर्षसे प्रजा अत्यन्त पीड़ित होगी, नष्ट हो जायगी ॥ 10 ॥ लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे दुःखी रहेंगे रोगोंसे तो उन्हें | छुटकारा ही न मिलेगा कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु केवल बीस या तीस वर्षकी होगी ॥ 11 ॥

परीक्षित्! कलिकालके दोष से प्राणियोंके शरीर छोटे-छोटे, क्षीण और रोगग्रस्त होने लगेगे। वर्ण और आश्रमोंका धर्म बतलानेवाला वेद-मार्ग नष्टप्राय हो जायगा ॥ 12 ॥ धर्ममें पाखण्डकी प्रधानता हो जायगी। राजे-महाराजे डाकू लुटेरोंके समान हो जायेंगे। मनुष्य चोरी, | झूठ तथा निरपराध हिंसा आदि नाना प्रकारके कुकर्मोसे जीविका चलाने लगेंगे ॥ 13 ॥ चारों वर्णोंकि लोग शूद्रोके समान हो जायेंगे। गौऐं बकरियोंकी तरह छोटी-छोटी और | कम दूध देनेवाली हो जायेगी। वानप्रस्थी और संन्यासी आदि विरक्त आश्रमवाले भी घर-गृहस्थी जुटाकर गृहस्थोंका सा व्यापार करने लगेंगे। जिनसे वैवाहिक सम्बन्ध है, उन्होंको अपना सम्बन्धी माना जायगा 14 ॥धान, जौ, गेहूं आदि धान्योंके पौधे छोटे-छोटे होने लगेंगे। वृक्षोंमें अधिकांश शमीके समान छोटे और कँटीले वृक्ष ही रह जायेंगे। बादलोंमें बिजली तो बहुत चमकेगी, परन्तु वर्षा कम होगी। गृहस्थोंके घर अतिथि सत्कार या वेदध्वनिसे रहित होनेके कारण अथवा जनसंख्या घट जानेके कारण सूने-सूने हो जायँगे ॥ 15 ॥ परीक्षित् ! अधिक क्या कहें- कलियुगका अन्त होते-होते मनुष्योंका स्वभाव गधों जैसा दुःसह बन जायगा, लोग प्रायः गृहस्थीका भार ढोनेवाले और विषयी हो जायँगे। ऐसी स्थितिमें धर्मकी रक्षा करनेके लिये सत्त्वगुण स्वीकार करके स्वयं भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे ॥ 16 ॥

प्रिय परीक्षित् सर्वव्यापक भगवान् विष्णु सर्वशक्तिमान है। वे सर्वस्वरूप होनेपर भी चराचर जगत्के सच्चे शिक्षक - सद्गुरु हैं। वे साधु-सज्जन पुरुषोंके धर्मकी रक्षाके लिये, उनके कर्मका बन्धन काटकर उन्हें जन्म-म - मृत्युके चक्रसे छुड़ानेके लिये अवतार ग्रहण करते हैं ॥ 17 ॥ उन दिनों शम्भल - ग्राममें विष्णुयश नामके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे। उनका हृदय बड़ा उदार एवं भगवद्भक्तिसे पूर्ण होगा। उन्होंके घर कल्किभगवान् अवतार ग्रहण करेंगे 18 श्रीभगवान् ही अष्टसिद्धियोंके और समस्त सगुणों के एकमान आश्रय हैं। समस्त चराचर जगत्के वे ही रक्षक और स्वामी हैं। वे देवदत्त नामक शीघ्रगामी घोड़ेपर सवार होकर दुष्टोंको तलवारके घाट उतारकर ठीक करेंगे ॥ 19 ॥ उनके रोम-रोम अतुलनीय की किरण छिटकती होंगी। वे अपने शीघ्रगामी मोड़ेसे पृथ्वीपर सर्वत्र विचरण करेंगे और राजाके वेषमें छिपकर रहनेवाले कोटि-कोटि डाकुओंका संहार करेंगे 20 ॥

प्रिय परीक्षित् जब सब डाकुओंका संहार हो चुकेगा, तब नगरकी और देशकी सारी प्रजाका हृदय पवित्रतासे भर जायगा; क्योंकि भगवान् कल्किके शरीरमें लगे हुए अङ्गरागका स्पर्श पाकर अत्यन्त पवित्र हुई वायु उनका स्पर्श करेगी और इस प्रकार वे भगवान्के श्रीविग्रहकी दिव्य गन्ध प्राप्त कर सकेंगे ।। 21 । उनके पवित्र हृदयों में सत्वमूर्ति भगवान् वासुदेव विराजमान होंगे और फिर उनको सन्तान पहलेकी भाँति हृष्ट-पुष्ट और बलवान् होने लगेगी ॥ 22 ॥ प्रजाके नयन-मनोहारी हरि ही धर्मके रक्षक और स्वामी हैं। वे ही भगवान् जब कल्किके रूपमें अवतार ग्रहण करेंगे, उसी समय सत्ययुगका प्रारम्भ हो जायगा और प्रजाकी सन्तानपरम्परा स्वयं ही सत्त्वगुणसे युक्त हो जायगी ॥ 23 ॥ जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक ही समय एक ही साथ पुष्य नक्षत्रके प्रथम पलमें प्रवेश करते हैं, एक राशिपर आते हैं, उसी समय सत्ययुगका प्रारम्भ होता है ॥ 24 ॥ परीक्षित् ! चन्द्रवंश और सूर्यवंशमें जितने राजा हो गये हैं या होंगे, उन सबका मैंने संक्षेपसे वर्णन कर दिया ।। 25 ।। तुम्हारे जन्मसे लेकर राजा नन्दके अभिषेकतक एक हजार एक सौ पंद्रह वर्षका समय लगेगा ॥ 26 ॥ जिस समय आकाशमें सप्तर्षियोंका उदय होता है, उस समय पहले उनमें से दो ही तारे दिखायी पड़ते हैं। उनके बीचमें दक्षिणोत्तर रेखापर समभागमें अश्विनी आदि नक्षत्रोंमेंसे एक नक्षत्र दिखायी पड़ता है ॥ 27 ॥ उस नक्षत्रके साथ सप्तर्षिगण मनुष्योंकी गणनासे सौ वर्षतक रहते हैं। वे तुम्हारे जन्मके समय और इस समय भी मघा नक्षत्रपर स्थित हैं ॥ 28 ॥

स्वयं सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् भगवान् ही शुद्ध सत्त्वमय विग्रहके साथ श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट हुए थे। वे जिस समय अपनी लीला संवरण करके परमधामको पधार गये, उसी समय कलियुगने संसारमें प्रवेश किया। उसीके कारण मनुष्योंकी मति-गति पापकी ओर दुलक गयी ॥ 29 ॥ जबतक लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलोंसे पृथ्वीका स्पर्श करते रहे, तबतक कलियुग पृथ्वीपर अपना पैर न जमा सका ॥ 30 ॥ परीक्षित्! जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्रपर विचरण करते रहते हैं, उसी समय कलियुगका प्रारम्भ होता है। कलियुगकी आयु देवताओंकी वर्षगणनासे बारह सौ वर्षोंकी अर्थात् मनुष्योंकी गणनाके अनुसार चार लाख बत्तीस वर्षकी है ॥ 31 ॥ | जिस समय सप्तर्षि मघासे चलकर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें जा चुके होंगे, उस समय राजा नन्दका राज्य रहेगा। तभी से कलियुगकी वृद्धि शुरू होगी ॥ 32 ॥ पुरातत्त्ववेत्ता ऐतिहासिक विद्वानोंका कहना है कि जिस दिन भगवान् श्रीकृष्णने अपने परम धामको प्रयाण किया, उसी दिन, उसी | समय कलियुगका प्रारम्भ हो गया 33 ॥ परीक्षित् ! जब | देवताओंकी वर्षगणनाके अनुसार एक हजार वर्ष बीत चुकेंगे, तब कलियुगके अन्तिम दिनोंमें फिरसे कल्किभगवान्‌की कृपासे मनुष्योंके मनमें सात्त्विकताका सञ्चार होगा, लोग अपने वास्तविक स्वरूपको जान सकेंगे और तभी से सत्ययुगका प्रारम्भ भी होगा ।। 34 ।।परीक्षित्! मैंने तो तुमसे केवल मनुवंशका, सो भी संक्षेपसे वर्णन किया है। जैसे मनुवंशकी गणना होती है, वैसे ही प्रत्येक युगमें ब्राह्मण, वैश्य और शूद्रोंकी भी वंशपरम्परा समझनी चाहिये ॥ 35 ॥ राजन्! जिन पुरुषों और महात्माओंका वर्णन मैंने तुमसे किया है, अब केवल नामसे ही उनकी पहचान होती है। अब वे नहीं हैं, केवल उनकी कथा रह गयी है। अब उनकी कीर्ति ही पृथ्वीपर जहाँ-तहाँ सुननेको मिलती है ॥ 36 ॥ भीष्मपितामहके पिता राजा शन्तनुके भाई देवापि और इक्ष्वाकुवंशी मरु इस समय कलाप - ग्राममें स्थित हैं । वे बहुत बड़े योगबलसे युक्त हैं ॥ 37 ॥ कलियुगके अन्तमें कल्किभगवान्‌की आज्ञासे वे फिर यहाँ आयेंगे और पहलेकी भाँति ही वर्णाश्रमधर्मका विस्तार करेंगे ॥ 38 ॥ सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग — ये ही चार युग हैं; ये पूर्वोक्त क्रमके अनुसार अपने-अपने समयमें पृथ्वीके प्राणियोंपर अपना प्रभाव दिखाते रहते हैं ॥ 39 ॥ परीक्षित्! मैंने तुमसे जिन राजाओंका वर्णन किया है, वे सब और उनके अतिरिक्त दूसरे राजा भी इस पृथ्वीको 'मेरी-मेरी' करते रहे, परन्तु अन्तमें मरकर धूलमें मिल गये ॥ 40 ॥ इस शरीरको भले ही कोई राजा कह ले; परन्तु अन्तमें यह कीड़ा, विष्ठा अथवा राखके रूपमें ही परिणत होगा, राख ही होकर रहेगा। इसी शरीरके या इसके सम्बन्धियोंके लिये जो किसी भी प्राणीको सताता है, वह न तो अपना स्वार्थ जानता है और न तो परमार्थ । क्योंकि प्राणियोंको सताना तो नरकका द्वार है ॥ 41 ॥ वे लोग यही सोचा करते हैं कि मेरे दादा परदादा इस अखण्ड भूमण्डलका शासन करते थे; अब यह मेरे अधीन किस प्रकार रहे और मेरे बाद मेरे बेटे-पोते, मेरे वंशज किस प्रकार इसका उपभोग करें ॥ 42 ॥ वे मूर्ख इस आग, पानी और मिट्टीके शरीरको अपना आपा मान बैठते हैं और बड़े अभिमानके साथ डींग हाँकते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है। अन्तमें वे शरीर और पृथ्वी दोनोंको छोड़कर स्वयं ही अदृश्य हो जाते हैं ॥ 43 ॥ प्रिय परीक्षित्! जो-जो नरपति बड़े | उत्साह और बल-पौरुषसे इस पृथ्वीके उपभोगमें लगे रहे, उन सबको कालने अपने विकराल गालमें धर दबाया। अब केवल इतिहासमें उनकी कहानी ही शेष रह गयी है 44 ॥

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था की स्थापना

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन श्री आत्मानन्द जी महाराज ने अपने दो सहयोगियों (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) को लेकर किया। उसी समय उन्होंने (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) दोनों को एक ही साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य हंस पद अभिषिक्त किया और अपने स्वयं गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इन तीनों को गोपाचार्य हंस पदनाम नाम से जाना जाता है। ज्ञात हो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा पदनाम कहीं नहीं है। यह आत्मानन्द जी महाराज के अन्तर्मन की उपज है, जो अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता नाम है। गोपाचार्य नाम के बारे में उन्होंने स्वयं कहा है कि- गोपाचार्य नाम इसलिए इकलौता नाम है, क्योंकि यह पदनाम सिर्फ गोपों यानी यादवों के आचार्य या गुरु से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी भी व्यास पीठ, संकराचार्य या अखाड़े इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यादव कथावाचकों के अतिरिक्त और किसी का नहीं है।


संस्था के उद्देश्य एवं उसके द्वारा सृजित प्रमुख पद

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) का मुख्य उद्देश्य विद्वान गोपाचार्यों द्वारा वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारत के प्रत्येक ग्राम सभा स्तर पर राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण करना है। संस्था अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए निम्नलिखित पद सृजित किया है -

(1)- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-

राष्ट्रीय स्तर पर संस्था का एक अध्यक्ष और उसके विकल्प में एक उपाध्यक्ष पद होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्था के निर्देशन में कार्य करेगा और श्रीकृष्ण कथा की व्यवस्था व संचालन में सहयोग करेगा। इसी तरह से भारत के प्रत्येक राज्यों के लिए एक राज्य- अध्यक्ष और क्रमशः जिला- अध्यक्ष होंगे। जो राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्देशन में काम करेंगे। 
वर्तमान में इस संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही जी हैं।


(2)- मंत्री- 

 संस्था का एक मंत्री पद होगा जिसका मुख्य कार्य निम्नलिखित होगा-

(क) सहमति के आधार पर संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय-समय पर आवश्यक नियम बनाना और स्वीकृति प्रदान करना।

(ख) समयं समयं पर संस्था के पदाधिकारियों की बैठकों का आयोजन करना तथा उनके कार्यों की समीक्षा करके राष्ट्रीय अध्यक्ष (संस्था प्रमुख) को सूचित करना।

(ग) संस्था के पदाधिकारिओं और सदस्यों की प्रत्येक गतिविधियों पर पैनी नजर रखना मंत्री पद का मुख्य कार्य होगा। यदि कोई पदाधिकारी या सदस्य संस्था के नियमों के विपरीत कार्य करता है या कोई ऐसा षड्यंत्र रचता है जिससे संस्था की गरिमा प्रभावित हो सकती है, तो मंत्री को यह सर्वाधिकार होगा कि ऐसे सदस्य को राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति से उसकी सदस्यता और उसके पद से बिना देरी किए तत्काल प्रभाव से हटा सकता है। वर्तमान में इस संस्था के मंत्री- श्री श्रवण कुमार यादव जी हैं।


(3)- कोषाध्यक्ष-  

संस्था का एक धनकोष होगा जो भारत के किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में संस्था के नाम से एक खाता के रूप में होगा। जिसकी निगरानी यादव (गोप) समाज का एक पदेन कोषाध्यक्ष करेगा। संस्था के बैंक खाते से धन तभी निकला जा सकेगा जब कोषाध्यक्ष सहित संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मंत्री और कोई एक गोपाचार्य हंस, इन तीनों का एक साथ हस्ताक्षर होगा। 

संस्था के धन की आय-व्यय की आडिट वर्ष में एक बार संस्था की "निगरानी समिति" द्वारा की जाएगी जिसमें संस्था के पांच पदेन सदस्य- राष्ट्रीय अध्यक्ष, एक गोपाचार्य हंस, एक गोपाचार्य, कोषाध्यक्ष, और मंत्री होंगे। वर्तमान में इस संस्था के कोषाध्यक्ष- श्री पंकज सिंह यादव हैं।



(4)- संस्था के पदेन कथावाचक-

 वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करने के लिए संस्था अनिवार्य रूप से यादव समाज से (दो) तरह के कथावाचकों का चयन करेगी जो पूरी तरह से संस्था के नियमों से प्रतिबद्ध होंगे।

(क)- पहले प्रकार के कथावाचकों में गोपाचार्य हंस होंगे जो श्रीकृष्ण कथा के समय दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता रखते हो अर्थात् परम् सत्य की वास्तविकता का बोध कराने की क्षमता रखते हों। गोपाचार्य हंस संस्था के नियमानुसार सफेद वस्त्र व सफेद पगड़ी या साफा को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों और उनके परम् स्वरुप तथा उनकी लीलाओं इत्यादि का वर्णन करेंगे।  अभी वर्तमान में केवल तीन गोपाचार्य हंस- श्री आत्मानन्द जी, श्री योगेश कुमार रोही और श्री माता प्रसाद जी हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ सकती है।




(ख)- 

 दूसरे प्रकार के कथावाचक "गोपाचार्य" होंगे जो ज्ञान, अनुभव और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों को जानने से थोड़ी बहुत पीछे रह गए हैं किन्तु संस्था के प्रति अत्यधिक समर्पित हैं, वे सभी गोपाचार्य होंगे और गोपाचार्य हंस की अनुपस्थिति में संस्था के नियमानुसार हल्के पीले रंग वस्त्र व पगड़ी को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण की कथा कहेंगे। 

भविष्य में तीन गोपाचार्य हंसों के द्वारा इनके ज्ञान और अनुभव की परीक्षा लेकर इनको भी गोपाचार्य हंस पद पर अभिषिक्त किया जा सकेगा। वर्तमान में 15 से अधिक गोपाचार्य हैं।


(5)- संस्था के सदस्य-

संस्था के अनंत सदस्य होंगे जो हर वर्ग से होंगे। इनकी कोई निश्चित सीमा नहीं होगी। जो भी श्रीकृष्ण भक्त स्वेच्छा से संस्था सदस्यता लेना चाहते हैं वे कम से कम 1000₹ की सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ले सकते है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अधिक सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ग्रहण करना चाहता है तो उसके लिए संस्था आभार प्रकट करेगी। प्रत्येक सदस्यता ग्रहण करने वाले सदस्यों को सदस्यता प्रमाण पत्र के साथ एक अच्छा सा पहचान पत्र भी मिलेगा जो मौके पर गले मे धारण करने योग्य होगा।

 कोई भी व्यक्ति संस्था की सदस्यता ग्रहण कर सकता है किन्तु संस्था को यह आशंका हो जाए कि वह व्यक्ति संस्था के प्रति उतना समर्पित नहीं है जितना चाहिए। तो ऐसे व्यक्ति को किसी (दो) सोशल मीडिया (ह्वाट्सएप और फेसबुक) पर प्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा करनी होगी कि- 
"मैं......आज दिनांक....को परमेश्वर श्रीकृष्ण को शाक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित होकर काम करूँगा तथा संस्था के प्रत्येक नियमों का अक्षरशः पालन करूँगा"। 
उसके उपरांत संस्था उसकी सदस्यता स्वीकार करेगी और भविष्य में आवश्कतानुसार उसे किसी पद पर भी अभिषिक्त कर सकेगी।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

पण्डित और राँड़ का मेल -

ब्राह्मणों के लिए पण्डित शब्द का सम्बोधन उसी प्रकार रूढ़ हो गया जैसे किसी विधवा के लिए राड़़ शब्द का सम्बोधन रूढ़ हुआ। परन्तु प्रत्येक ब्राह्मण पण्डित नहीं होता और प्रत्येक विधवा ( राँड़) रण्डिका (रड़िया) नहीं होती है। दर असल राँड़ का मूल रूप (तत्सम) रण्डिका है और  रण्डिका रण्डी ( वेश्या) का पर्याय है।

पण्डित शब्द के अर्थ में गीता के सन्दर्भ विचारणीय हैं।

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।5.18।।
 
पण्डित जन  विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी आत्मा रूप मे समानता  को देखनेवाले होते हैं

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
श्रीमद भगवदगीता – (4.19 )

अर्थ: जिसके सम्पूर्ण कर्म बिना इच्छा और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं ॥

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 11वां श्लोक है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: "ज्ञानी (पंडित) लोग न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं और न ही मृतों के लिए, क्योंकि आत्मा अजर-अमर है।" यह ज्ञान, जीवन और मृत्यु की अनित्यता को समझते हुए मोह और शोक से ऊपर उठने की शिक्षा देता है।
श्लोक और अर्थ:
  • मूल श्लोक: अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
  • अर्थ: हे अर्जुन! तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं (भीष्म, द्रोण आदि), और ज्ञान की बातें भी कर रहे हो। जो बुद्धिमान (पंडित) हैं, वे गतासून् (जिनके प्राण चले गए हैं - मृत) और अगतासून् (जिनके प्राण नहीं गए हैं - जीवित) के लिए शोक नहीं करते।
प्रमुख बिंदु:
  • आत्मा अमर है: पण्डित उसे कहते हैं जो शरीरी (आत्मा) की अमरता और शरीर की नश्वरता को जानता है।
  • अनावश्यक शोक: जीवन और मृत्यु प्रकृति के नियम हैं, अतः इनके लिए विलाप करना मूर्खता है।
  • ज्ञान की बात: पंडित ज्ञानी की बातें तो करते हैं लेकिन वे इन भावनाओं से ऊपर उठे होते हैं। 



इस प्रकार सारे ब्राह्मण पण्डित नहीं होते-

इसी क्रम में राँड़ के  संस्तृत सन्दर्भ-
रण्डा = वेश्या । राँड् इति भाषा ॥  यथा ।  तिष्ठते रण्डा विकर्म्मस्थेभ्यः स्वहृदयं व्यनक्तीत्यर्थः । इति संक्षिप्तसारे तिङन्तपादः ॥

संस्था के नियम-

अध्याय(11)- प्रमुख यादव सामाजिक 
कार्यकर्ता।


इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित भारत के प्रमुख यादव सामाजिक कार्यकर्ता एवं समाज सेवकों के बारे में जानकारी देना है

(1)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज (2)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव (3)- गोपाचार्य श्रीयोगेश कुमार रोहि 
(4)- राव विजेन्द्र सिंह यादव (5)- जाहल बेन अहीर 
(6)- रमा भाई अहीर (7) शैलेन्द्र सिंह यादव (इटावा)
(8)- मनोज कुमार यादव (बिहार) (9)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया (10)- राजित सिंह यादव।




(2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज-


गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का जन्म- 25 जुलाई सन् 1972 को उत्तर प्रदेश के (गाजीपुर जिला) में एक किसान परिवार में हुआ है। इनके पिता स्वर्गीय श्री रामाधार सिंह यादव हनुमान सिंह इन्टर कालेज देवकली में संस्कृत के प्रवक्ता पद पर रहे हैं। इनकी माता स्वर्गीय श्रीमती कौशल्या देवी हैं।
इनके माता-पिता दोनों ही श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। जिनका प्रभाव आत्मानन्द जी महाराज पर भी पडा़ और ये भी श्रीकृष्ण भक्त हो गये। ये श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और साधना में सदैव लीन होकर पौराणिक एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करके परमेश्वर श्रीकृष्ण के समस्त गूढ़ रहस्यों और सम्पूर्ण आध्यात्मिक चरित्रों को गहराई से जानने का प्रयास करते और परमेश्वर श्रीकृष्ण के स्वरूप को अपने अन्तर्मन में देखते और अनुभव करते। इसके बाद इन्होंने यह संकल्प लिया कि परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके उपदेशों को जन-जन तक पहुँचाना है। इसके लिए उन्होंने अबतक निम्नलिखित कार्य किया।


उपलब्धियाँ-

(क)-  गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज ने श्रीकृष्ण के उपदेशों और उसके वंश विस्तार को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 10 जनवरी 2019 को यूट्यूब पर "यादव सम्मान" नाम से  एक चैनल बनाकर परमेश्वर श्रीकृष्ण के उपदेशों, उसके गूढ़ रहस्यों और उनके द्वारा सृष्टि सृजन तथा उनके वंश विस्तार को विडियो के माध्यम से बताना प्रारम्भ किया। इनके चैनल के विडियो को अबतक (आज इस किताब को लिखने तक - 07-02-2026) भारत सहित अन्य देशों के कुल- 4 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यो को गहराई से जाना और समझा। इनके चैनल से सबसे ज्यादा लाभ यह हुआ कि यादव समाज के बहुत से लोग एक दूसरे जुड़े सके, जिससे आपसी विचारों का आदान-प्रदान होना और आसान हो गया।
इस सम्बन्ध में लेखक- गोपाचार्य हंस श्रीमाता प्रसाद जी का कहना है कि "आत्मानन्द जी महाराज द्वारा यादवों के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को जगाने के लिए जो प्रयास किया गया है वह अद्वितीय है"।


(ख)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य "श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था" की स्थापना से सम्बन्धित है, जिसका मुख्य उद्देश्य गोपाचार्यों द्वारा श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना है। 
उन्होंने इस महत्वपूर्ण संस्था की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन अपने दो सहयोगियों (माताप्रसाद और योगेश कुमार रोहि) को लेकर की। उसी समय उन्होंने (माता प्रसाद और योगेश कुमार रोहि) दोनों को एक साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य पद पर अभिषिक्त किया और आप स्वयं संस्था के शीर्ष - गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इनको गोपाचार्य हंस के नाम जाना जाने लगा।

इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि गोपाचार्य पदनाम एक यूनिक (Unique) अर्थात् इकलौता नाम है,  "जिसके समान कोई दूसरा पद न हो"। अर्थात् यह पदनाम सिर्फ गोपों यानि यादवों के आचार्य (गुरू) से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी व्यास पीठ या शंकराचार्य इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) है। 
दूसरी बात यह कि- श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर गोपाचार्यों द्वारा श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना है।


(ग)- इनका तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" और "यदुवंशसंहिता" जैसे दो महत्वपूर्ण ग्रन्थों को लिखवाने का है। इनके ही मार्गदर्शन में "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" और "यदुवंश संहिता" नाम की महत्वपूर्ण ग्रन्थों का लेखन कार्य विद्वान लेखकों- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोहि और  गोपाचार्य श्री माताप्रसाद  द्वारा बड़े ही मनोयोग से किया गया है, जो श्रीकृष्ण पर लिखी गई अबतक की सर्वश्रेष्ठ कृति हैं।
अब यहाँ पर कुछ लोगों को यह संशय अवश्य हुआ होगा कि "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" पुस्तक में परमेश्वर श्रीकृष्ण के बारे में ऐसा क्या लिखा गया है वह अबतक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक हो गई। तो इस सम्बन्ध में ज्यादा तो नहीं किन्तु उसकी विषय सूची को अवश्य बताना चाहेंगे जिससे आप स्वयं निर्णय कर सकते हैं कि यह श्रीकृष्ण पर लिखी गई "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" अबतक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक क्यों है।


"श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" की विषय सूची- 

अध्याय-

(१)- पूजा-अर्चना के विधि- विधान एवं गलत कथाओं  को सुनने व कहने के दुष्परिणामों का वर्णन।

[क] - परमेश्वर की सार्थकता व पहचान।
[ख] - तैंतीस (३३) कोटि देवता में किसकी पूजा करें ?
[ग] - श्रीकृष्ण पूजा के लाभ। [घ] - शिव पूजा के लाभ
[ङ] - विष्णु पूजा के लाभ। [च] - श्रीराम पूजा के लाभ।
[छ] - देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ।
[ज] - श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता हैं ?
[झ] - गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणामों का वर्णन
[ञ] - सच्चे गुरू की पहचान।

(२)- श्रीकृष्ण का स्वरूप एवं उनके गोलोक का वर्णन।

(३)- श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या परमशक्ति नही है।

(४)- गोलोक में गोप-गोपियों सहित नारायण, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं की उत्पत्ति तथा सृष्टि का विस्तार।

(५)- भगवान श्रीकृष्ण का सदैव गोप होना तथा गोपकुल में उनका अवतरण।

(६)- गोप-कुल के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों का परिचय।

भाग- (१) गोपेश्वर श्रीकृष्ण का परिचय।
भाग- (२) श्रीराधा का परिचय। 
भाग- (३) पुरुरवा और उर्वशी का परिचय।
भाग- (४) आयुष, नहुष, और ययाति का परिचय।

(७)- गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय।

भाग- (१) महाराज यदु का परिचय।
भाग- (२) हैहय वंशी यादवों का परिचय।
भाग- (३) यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज।

(८)- यादवों का मौसल युद्ध तथा श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।

भाग- (१)- यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता  एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने की बातों का खण्डन

भाग- (२)- श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।

(९)- यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्र।

भाग- (१) जातियों की मौलिकता (Originality)  एवं आभीर जाति की उत्पत्ति।

भाग- (२) भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।

[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति। [ख]- ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति। 

[ग] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अन्तर-
[१]- जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२]- यज्ञमूलक एवं भक्तिमूलक अन्तर।
[३]- भेदभाव एवं समतामूलक अन्तर-      

भाग- (३) यादवों का वंश। 
भाग- (४) यादवों का कुल।
भाग- (५) यादवों का गोत्र।

(१०)- यादवों का वास्तविक गोत्र कार्ष्ण है या अत्रि ?

(११)- वैष्णव वर्ण के सदस्यों के प्रमुख कार्य एवं दायित्व।

भाग- [१] गोपों का ब्राह्मणत्व (धर्मज्ञ) कर्म-

(क)- सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर हैं।
(ख)- अहीर कन्या वेदमाता गायत्री का परिचय 
(ग)- यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी                       स्वाहा और स्वधा का परिचय।
(घ)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय।

भाग- [२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म।
भाग- [३] गोपों का वैश्य कर्म।
भाग- [४] गोपों का शूद्र कर्म।

(१२)- वैष्णव वर्ण" के गोपों की पौराणिक ग्रन्थों में प्रशंसा एवं सांस्कृतिक विरासत-

भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।

भाग [२]- भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।

(क)- हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य। (ख)- गोपों की देन "पञ्चम वर्ण"। (ग)- किसान और कृषि शब्द कृष्ण सहित गोपों की देन है। (घ)- आर्य व ग्राम संस्कृति के जनक गोप हैं। (ङ)- आभीर छन्द और आभीर राग।

अतः "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" की विषय सूची को देखने से ही समझ में आता है कि यह पुलाँ अद्भुत, एवं अद्वितीय है।श्रीकृष्ण साराङ्गिणी को मंगवाने के लिए - मोबाइल नंबर- 919452533334 तथा 918077160219 पर कोई भी सम्पर्क कर सकता है। ये दोनों मोबाइल नंबर उन दो विद्वान लेखकों के हैं जिन्होंने दोनों किताबों को लिखा है।



(3)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव 

..........✍️

(4)- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोही-

............✍️






(10)- राजित सिंह यादव 


चौधरी राजित सिंह यादव का जन्म 15 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के बरहज क्षेत्र स्थित नरसिंह डांड गाँव में हुआ था। जहाँ आज भी उनकी स्मृति में 'राष्ट्रीय यादव दिवस' का बड़ा आयोजन किया जाता है।
स्व. चौधरी राजित सिंह यादव एक प्रभावशाली सामाजिक सुधारक और विचारक थे, जिन्हें मुख्य रूप से यादव समुदाय को एक नई पहचान देने के लिए जाना जाता है। 

उनकी ख्याति तब हुई जब उन्होंने 1897 के आसपास अहीर समुदाय को 'यादव' उपनाम अपनाने के लिए गाँव, शहर, और कस्बों पैदल चलकर प्रेरित किया। उनके प्रयासों के फलस्वरूप 1910 के बाद देश भर में 'यादव' उपनाम का चलन तेजी से बढ़ा। इसके पहले यादव समाज अपनी मूल पहचान को भूल गया था। इसका मुख्य कारण था, भारत का लम्बे समय से गुलाम होना तथा अचानक कुछ चाटुकार जातियों का राजाओं की चाटुकारिता करके अचानक आगे हो जाना। उन चाटुकारों के आगे यादव लोग अत्यन्त पीछे हो गये, क्योंकि यादवों का जन्मगत स्वभाव होता है कि- यादव अपने मान और स्वाभिमान के लिए कभी झुक नहीं सकते। जिसका परिणाम यह हुआ कि यादव समाज अत्यन्त पिछड़ गया और धीरे धीरे अपनी मूल पहचान को भी खोता गया।

किन्तु चौधरी राजित सिंह यादव अपने भूले बिसरे यादवों को पुनः उनकी मूल पहचान को वापस लाने के लिए स्वयं कमर कसी और भारत के प्रत्येक प्रान्तों के लगभग प्रत्येक गाँवों, शहरों और कस्बों में पैदल चलकर यादवों को जगाने का कार्य किया। यादव समाज उनके इस कृत्य का सदैव ऋणी रहेगा। किन्तु दुर्भाग्य है कि जिसने यादवों को जगाया आज यादव समाज उसे ही भूल गया।
 

प्रमुख उपलब्धियाँ

चौधरी राजित सिंह यादव अखिल भारतीय यादव महासभा के प्रारंभिक विचारकों और संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए निरन्तर कार्य किया।

 उन्होंने 'यादव' नाम से एक पत्रिका भी निकाली थी। उनकी वैचारिक स्पष्टता इतनी प्रभावी थी कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर जैसे बड़े नेता भी उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।

उन्होंने यादवों की ऐतिहासिक और क्षत्रिय उत्पत्ति को रेखांकित करने वाले साहित्य के लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 



गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था की स्थापना

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन श्री आत्मानन्द जी महाराज ने अपने दो सहयोगियों (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) को लेकर किया। उसी समय उन्होंने (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) दोनों को एक ही साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य हंस पद अभिषिक्त किया और अपने स्वयं गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इन तीनों को गोपाचार्य हंस पदनाम नाम से जाना जाता है। ज्ञात हो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा पदनाम कहीं नहीं है। यह आत्मानन्द जी महाराज के अन्तर्मन की उपज है, जो अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता नाम है। गोपाचार्य नाम के बारे में उन्होंने स्वयं कहा है कि- गोपाचार्य नाम इसलिए इकलौता नाम है, क्योंकि यह पदनाम सिर्फ गोपों यानी यादवों के आचार्य या गुरु से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी भी व्यास पीठ, संकराचार्य या अखाड़े इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यादव कथावाचकों के अतिरिक्त और किसी का नहीं है।


संस्था के उद्देश्य एवं उसके द्वारा सृजित प्रमुख पद

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) का मुख्य उद्देश्य विद्वान गोपाचार्यों द्वारा वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारत के प्रत्येक ग्राम सभा स्तर पर राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण करना है। संस्था अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए निम्नलिखित पद सृजित किया है -

(1)- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-

राष्ट्रीय स्तर पर संस्था का एक अध्यक्ष और उसके विकल्प में एक उपाध्यक्ष पद होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्था के निर्देशन में कार्य करेगा और श्रीकृष्ण कथा की व्यवस्था व संचालन में सहयोग करेगा। इसी तरह से भारत के प्रत्येक राज्यों के लिए एक राज्य- अध्यक्ष और क्रमशः जिला- अध्यक्ष होंगे। जो राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्देशन में काम करेंगे। 
वर्तमान में इस संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही जी हैं।


(2)- मंत्री- 

 संस्था का एक मंत्री पद होगा जिसका मुख्य कार्य निम्नलिखित होगा-

(क) सहमति के आधार पर संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय-समय पर आवश्यक नियम बनाना और स्वीकृति प्रदान करना।

(ख) समयं समयं पर संस्था के पदाधिकारियों की बैठकों का आयोजन करना तथा उनके कार्यों की समीक्षा करके राष्ट्रीय अध्यक्ष (संस्था प्रमुख) को सूचित करना।

(ग) संस्था के पदाधिकारिओं और सदस्यों की प्रत्येक गतिविधियों पर पैनी नजर रखना मंत्री पद का मुख्य कार्य होगा। यदि कोई पदाधिकारी या सदस्य संस्था के नियमों के विपरीत कार्य करता है या कोई ऐसा षड्यंत्र रचता है जिससे संस्था की गरिमा प्रभावित हो सकती है, तो मंत्री को यह सर्वाधिकार होगा कि ऐसे सदस्य को राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति से उसकी सदस्यता और उसके पद से बिना देरी किए तत्काल प्रभाव से हटा सकता है। वर्तमान में इस संस्था के मंत्री- श्री श्रवण कुमार यादव जी हैं।


(3)- कोषाध्यक्ष-  

संस्था का एक धनकोष होगा जो भारत के किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में संस्था के नाम से एक खाता के रूप में होगा। जिसकी निगरानी यादव (गोप) समाज का एक पदेन कोषाध्यक्ष करेगा। संस्था के बैंक खाते से धन तभी निकला जा सकेगा जब कोषाध्यक्ष सहित संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मंत्री और कोई एक गोपाचार्य हंस, इन तीनों का एक साथ हस्ताक्षर होगा। 

संस्था के धन की आय-व्यय की आडिट वर्ष में एक बार संस्था की "निगरानी समिति" द्वारा की जाएगी जिसमें संस्था के पांच पदेन सदस्य- राष्ट्रीय अध्यक्ष, एक गोपाचार्य हंस, एक गोपाचार्य, कोषाध्यक्ष, और मंत्री होंगे। वर्तमान में इस संस्था के कोषाध्यक्ष- श्री पंकज सिंह यादव हैं।



(4)- संस्था के पदेन कथावाचक-

 वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करने के लिए संस्था अनिवार्य रूप से यादव समाज से (दो) तरह के कथावाचकों का चयन करेगी जो पूरी तरह से संस्था के नियमों से प्रतिबद्ध होंगे।

(क)- पहले प्रकार के कथावाचकों में गोपाचार्य हंस होंगे जो श्रीकृष्ण कथा के समय दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता रखते हो अर्थात् परम् सत्य की वास्तविकता का बोध कराने की क्षमता रखते हों। गोपाचार्य हंस संस्था के नियमानुसार सफेद वस्त्र व सफेद पगड़ी या साफा को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों और उनके परम् स्वरुप तथा उनकी लीलाओं इत्यादि का वर्णन करेंगे।  अभी वर्तमान में केवल तीन गोपाचार्य हंस- श्री आत्मानन्द जी, श्री योगेश कुमार रोही और श्री माता प्रसाद जी हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ सकती है।




(ख)- 

 दूसरे प्रकार के कथावाचक "गोपाचार्य" होंगे जो ज्ञान, अनुभव और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों को जानने से थोड़ी बहुत पीछे रह गए हैं किन्तु संस्था के प्रति अत्यधिक समर्पित हैं, वे सभी गोपाचार्य होंगे और गोपाचार्य हंस की अनुपस्थिति में संस्था के नियमानुसार हल्के पीले रंग वस्त्र व पगड़ी को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण की कथा कहेंगे। 

भविष्य में तीन गोपाचार्य हंसों के द्वारा इनके ज्ञान और अनुभव की परीक्षा लेकर इनको भी गोपाचार्य हंस पद पर अभिषिक्त किया जा सकेगा। वर्तमान में 15 से अधिक गोपाचार्य हैं।


(5)- संस्था के सदस्य-

संस्था के अनंत सदस्य होंगे जो हर वर्ग से होंगे। इनकी कोई निश्चित सीमा नहीं होगी। जो भी श्रीकृष्ण भक्त स्वेच्छा से संस्था सदस्यता लेना चाहते हैं वे कम से कम 1000₹ की सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ले सकते है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अधिक सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ग्रहण करना चाहता है तो उसके लिए संस्था आभार प्रकट करेगी। प्रत्येक सदस्यता ग्रहण करने वाले सदस्यों को सदस्यता प्रमाण पत्र के साथ एक अच्छा सा पहचान पत्र भी मिलेगा जो मौके पर गले मे धारण करने योग्य होगा।

 कोई भी व्यक्ति संस्था की सदस्यता ग्रहण कर सकता है किन्तु संस्था को यह आशंका हो जाए कि वह व्यक्ति संस्था के प्रति उतना समर्पित नहीं है जितना चाहिए। तो ऐसे व्यक्ति को किसी (दो) सोशल मीडिया (ह्वाट्सएप और फेसबुक) पर प्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा करनी होगी कि- 
"मैं......आज दिनांक....को परमेश्वर श्रीकृष्ण को शाक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित होकर काम करूँगा तथा संस्था के प्रत्येक नियमों का अक्षरशः पालन करूँगा"। 
उसके उपरांत संस्था उसकी सदस्यता स्वीकार करेगी और भविष्य में आवश्कतानुसार उसे किसी पद पर भी अभिषिक्त कर सकेगी।