इस अध्याय के भाग- (३) का मुख्य उद्देश्य यादव वंश की चारित्रिक वंशावली का व्याख्यान करते हुए गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लौकिक चरित्र को भी स्पष्ट करना है। तो उसके लिए यदु के पुत्र क्रोष्टा को ही लेकर चलेंगे जहांँ क्रोष्टा की ही पीढ़ी में आगे चलकर अन्धक और वृष्णि नामक दो महान विभूतियों का उदय हुआ। जिसमें वृष्णि के वंशजों में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ तथा अन्धक के वंशजों में गोपेश्वर श्रीकृष्ण की ननिहाल (माता का कुल हुआ)।
इसके पिछले भाग में यदु के प्रथम व ज्येष्ठ पुत्र हैहय वंशी यादवों के बारे में बताया जा चुका है। उसी क्रम में यदु के दूसरे पुत्र- क्रोष्टा के पुत्र वृजिनीवान हुए। इसी वृजिनीवान की पीढ़ी में में आगे चलकर ज्यमाघ हुए जिनकी पत्नी शैव्या से विदर्भ हुए। फिर विदर्भ की पत्नी भोज्या से तीन पुत्र- कुश, क्रथ और रोमपाद हुए। जिसमें रोमपाद के दो पुत्र- बभ्रु और कृति हुए। इनमें से कृति के पुत्र- चेदि हुए जिनसे यादवों की शाखा में चेदि वंश का उदय हुआ। फिर इसी चेदि की पीढ़ी में दमघोष हुए। जिनका विवाह श्रीकृष्ण की वपस्वसा (बुआ) श्रुतिश्रवा से हुआ था। फिर इसी श्रुतिश्रवा और दमघोष से शिशुपाल का जन्म हुआ, जो भगवान श्रीकृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी था।
अब हम लोग विदर्भ के दूसरे पुत्र- क्रथ को लेकर आगे बढ़ेंगे। तो विदर्भ के दूसरे पुत्र- क्रथ के कुन्ति हुए। फिर कुन्ति के वृष्णि (प्रथम) हुए। फिर वृष्णि के निवृत्ति, निवृत्ति के दशार्ह हुए। दशार्ह के व्योम, व्योम के जीमूत, जीमूत के पुत्र विकृति हुए। विकृति के भीमरथ, भीमरथ के नवरथ, नवरथ के दशरथ, दशरथ के शकुनि, शकुनि के करम्भ, करम्भि के पुत्र देवरात हुए।
देवरात के मधु, मधु के कुरुवश, कुरुवश के अनु, अनु के पुरूहोत्र, पुरूहोत्र के आयु (सात्वत) हुए। इस सात्वत के कुल सात पुत्र - भजि, दिव्य, वृष्णि (द्वितीय), अन्धक, और महाभोज हुए।
देखा जाए तो यादव वंश में कुल चार वृष्णि थे। जिनको इस तरह से भी समझा जा सकता है -
(१)- प्रथम वृष्णि- हैहय वंशी यादवों के सहस्रबाहु के पुत्र जयध्वज के वंशज मधु के ज्येष्ठ पुत्र थे।
(२)- द्वितीय वृष्णि- विदर्भ के पौत्र कुन्ति के एक पुत्र का नाम भी वृष्णि था। यह सात्वत से पूर्व के यादव वृष्णि हैं।
३- तृतीय वृष्णि- सात्वत के कनिष्ठ (सबसे छोटे) पुत्र का नाम वृष्णि था। यह वृष्णि अन्धक के ही भाई थे।
जिसमें देवमीढ की पत्नी अश्मिका से शूरसेन का जन्म हुआ। इस शूरसेन की पत्नी का नाम मारिषा था, जिससे कुल दस पुत्र हुए। उन्हीं दस पुत्रों में धर्मवत्सल वसुदेव जी भी थे। जिसमें वसुदेव जी की बहुत सी पत्नियाँ थीं किन्तु मुख्य रूप से दो ही पत्नियाँ- देवकी और रोहिणी प्रसिद्ध थीं। जिसमें वसुदेव और देवकी से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। तथा वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम जी का जन्म हुआ।
इस प्रकार से हम लोग भक्तिभाव के साथ गोपेश्वर श्रीकृष्ण के यहांँ पहुंँच गए।
किन्तु बिना नन्दबाबा के यहांँ पहुंँचे श्रीकृष्ण की बात अधूरी ही रहेगी। तो नन्दबाबा के यहांँ पहुंँचने के लिए हमें पुनः देवमीढ की दूसरी पत्नी गुणवती तक जाना होगा। किन्तु इसके पहले देवमीढ की दूसरी पत्नी सतप्रभा को भी जान लें कि- देवमीढ की पत्नी सतप्रभा से एक कन्या- सतवती हुई।
अब हम पुनः देवमीढ की पत्नी गुणवती की तरफ रूख करते हैं जहाँ नन्दबाबा मिलेंगे। तो देवमीढ की तीसरी पत्नी गुणवती से- अर्जन्य, पर्जन्य और राजन्य नामक तीन पुत्र हुए। इन पुत्रों में से हम पर्जन्य को ही लेकर आगे बढ़ेंगे।
तो पर्जन्य की पत्नी का नाम वरियसी था। इसी वरियसी और पर्जन्य से कुल पाँच पुत्र- उपनन्द, अभिनन्द, नन्द (नन्दबाबा), सुनन्द, और नन्दन हुए।
पर्जन्य के कुल पाँच पुत्रों में नन्दबाबा अधिक लोकप्रिय थे। पारिवारिक दृष्टिकोण से नन्दबाबा और वासुदेव जी आपस के भाई ही थे, क्योंकि ये दोनों देवमीढ के परिवार से ही सम्बन्धित थे। नन्दबाबा की पत्नी का नाम यशोदा था। जिससे विन्ध्यवासिनी (योगमाया) अथवा एकानंशा नाम की एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ। इसकी पुष्टि- श्रीमार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य अध्याय- ११ के श्लोक- ४१-४२ से होती है। जिसमें योगमाया स्वयं अपने जन्म के बारे में कहती हैं कि -
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥४१॥
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ४२॥
अनुवाद- ४१-४२
• वैवस्वत मन्वन्तर में अठाईसवां द्वापर युग आने पर शुम्भ और निशुम्भ जैसे दूसरे महासुर उत्पन्न होंगे ।
• तब नन्दगोप के घर में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हो विन्ध्याचल निवासिनी के रूप में उन दोनों का नाश करुँगी।
✴️ ज्ञात हो- योगमाया को जन्म लेते ही वसुदेव जी अपने नवजात शिशु श्रीकृष्ण को योगमाया के स्थान पर रखकर योगमाया को लेकर कंस के बन्दीगृह में पुनः पहुँच गए। और जब कंस को यह पता चला कि देवकी को आठवीं सन्तान पैदा हो चुकी है तो वह बन्दीगृह में पहुँच कर योगमाया को ही देवकी का आठवाँ पुत्र समझकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा, किन्तु योगमाया उसके हाथ से छूटकर कंस को यह कहते हुए आकाश मार्ग से विन्ध्याचल पर्वत पर चली गईं कि- तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है। वही योगमाया विन्ध्याचल पर्वत पर आज भी यादवों की प्रथम कुल देवी के रूप विराजमान है।
इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण भक्त गोपाचार्य हंस श्रीमाता प्रसाद जी कहना है कि- "कुलदेवी या कुल देवता उसी को कहा जाता है जो कुल की रक्षा करते हैं।
योगमाया विन्ध्यवासिनी को श्रीकृष्ण सहित समस्त यादवों की रक्षा करने वाली कुल देवी और श्रीकृष्ण को कुल देवता होने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- ४ के श्लोक- ४६, ४७ और ४८ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसंघसुपूजिता ।
पुत्रवत् पाल्यमाना सा वसुदेवाज्ञया तदा।४६ ।
विद्धि चैनामथोत्पन्नामंशाद् देवीं प्रजापतेः ।
एकानंशां योगकन्यां रक्षार्थं केशवस्य तु ।४७ ।
तां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः ।
देववद् दिव्यवपुषा कृष्णः संरक्षितो यया ।४८।
अनुवाद- ४६ से ४८
• वहाँ (विन्ध्याचल पर्वतपर) वृष्णी वंशी यादवों के समुदाय से भली-भाँति पूजित हो वह कन्या बढ़ने लगी। वसुदेव की आज्ञा से उसका पुत्रवत पालन होने लगा।
• इस देवी (विन्ध्यवासिनी) को प्रजा पालक भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुई समझो। वह एक होती हुई अनंंशा (अंश रहित) अर्थात अविभक्त थी, इसीलिए एकानंशा कहलाती थी। योग बल से कन्या रूप में प्रकट हुई वह देवी भगवान श्री कृष्ण की रक्षा के लिए आविर्भूत हुई थी।
• यदुकुल में उत्पन्न सभी लोग उस देवी को आराध्य देव के समान पूजन करते थे, क्योंकि उसने अपनी दिव्यदेह से श्रीकृष्ण की भी रक्षा की थी।
तभी से समस्त यादव समाज विन्ध्यवासिनी योगमाया को प्रथम कुल देवी तथा गोपेश्वर श्रीकृष्ण को कुल देवता मानकर परम्परागत रूप से पूजते हैं।
✴️ ज्ञात हो- नन्दबाबा को योगमाया विन्ध्यवासिनी के अतिरिक्त एक भी पुत्र नहीं हुआ। इसलिए उनका वंश आगे तक नहीं चल सका। इस लिए किसी को नन्दवंशी यादव कहना उचित नहीं है।
इस प्रकार से अब तक हम लोग क्रोष्टा के पीढ़ी की कठिन डगर को पार करते हुए वसुदेव जी तथा उनके भाई नन्दबाबा के यहाँ से होते हुए श्रीकृष्ण, बलराम और योगमाया विन्ध्यवासिनी के यहाँ पहुँच गये।
अब हमलोग यदुवंश शिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण की ननिहाल को जानेंगे कि- क्रोष्टा की किस पीढ़ी में श्रीकृष्ण का ननिहाल था।
तो इस बात को पहले ही बताया जा चुका है कि - सात्वत के कुल सात पुत्र - भजि, दिव्य, वृष्णि (द्वितीय), अन्धक, और महाभोज हुए।
जिसमें हमलोग सात्वत के पुत्र वृष्णि (द्वितीय) के कुल में उत्पन्न श्रीकृष्ण को जाना। अब हमलोग सात्वत के पुत्र- अन्धक के कुल को जानेंगे जहाँ भगवान श्रीकृष्ण का ननिहाल मिलेगा।
सात्वत पुत्र अन्धक के कुल चार पुत्र- कुकुर, भजमान, सुचि और कम्बलबर्हिष हुए। जिसमें अन्धक के ज्येष्ठ पुत्र वह्नि थे। इस वह्नि के विलोमा, विलोमा के कपोतरोमा, कपोतरोमा के अनु और अनु के अन्धक (द्वितीय) हुए। इस अन्धक (द्वितीय) के दुन्दुभि हुए और दुन्दुभि के अरिहोत्र, अरिहोत्र के पुनर्वसु हुए।
फिर पुनर्वसु के एक पुत्र आहुक तथा एक पुत्री आहुकी नाम की थी। जिसमें पुनर्वसु के पुत्र आहुक की पत्नी का नाम शैव्या था। इसी पुनर्वसु और शैव्या से दो पुत्र - देवक और उग्रसेन हुए। जिसमें पुनर्वसु के पुत्र देवक की सात कन्याएं - पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी थीं। देवी तुल्य इन सातो पुत्रियों का विवाह वृष्णिवंशी वासुदेव जी से हुआ था।
इन्हीं सातों में से देवकी के उदरगर्भ से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
इस तरह से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ननिहाल मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र देवक के यहाँ थी। और इसी देवक के सगे भाई उग्रसेन थे, जो मधुपुरा( मथुरा के प्रजापालक राजा थे। उनकी की पत्नी का नाम पद्मावती था। इसी पद्मावती और उग्रसेन से महत्वाकांक्षी कंस का जन्म हुआ। कंस अपने पिता अग्रसेन को बन्दी बनाकर स्वयं मथुरा का राजा बना और प्रजा पर नाना प्रकार का अत्याचार करने लगा। कंस बल और पराक्रम में अजेय था। वह अपने समय में बड़े-बड़े दैत्य को पराजित कर अधिक शक्ति सम्पन्न होकर समस्त देवों को भी जीत लिया था।
उस समय भूतल पर उसके जैसा बलवान राजा कोई नहीं था। किन्तु जब कंस के पापों का घड़ा भर गया, तब किशोर श्रीकृष्ण उसके ही दरबार में उसका वध करके पुनः अग्रसेन को मथुरा का राजा बनाकर स्वयं मथुरा की रक्षा करते हुए पृथ्वी के भार को दूर किया।
अब इसके अगले अध्याय-(८) के भाग- (१)- में यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने का खण्डन तथा भाग- (२) में श्रीकृष्ण का गोलोक गमन इत्यादि के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है।
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-अध्याय- अष्टम् (८)
यादवों का मौसल युद्ध तथा श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।
श्रीकृष्ण साराङ्गिणी पुस्तक का यह सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य- यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता को बताना तथा श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जानें का खण्डन करते हुए श्रीकृष्ण के गोलोक गमन की वास्तविक घटनाक्रम को बताना है। इन सभी जानकारियों को क्रमबद्ध तरीके से बताने के लिए इसे मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है -
भाग- (१)- यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने का खण्डन।
भाग- (२)- श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।
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[भाग- १]-
यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने का खण्डन।
समाज में आये दिन सुनने को मिलता है कि- गान्धारी और ऋषियों के शाप के कारण यादवों का मौसल युद्ध हुआ जिसमें सभी यादवों का अन्त तथा एक बहेलिए से मारे जाने से श्रीकृष्ण का भी अन्त हो गया। यह कथन कितना सत्य और कितना असत्य है। इसका समाधान इस भाग में किया गया है।
इस बात को तो सभी जानते हैं कि पौराणिक कथाओं में शाप और आशीर्वाद को आधार बनाकर सभी अप्राकृतिक अथवा असैद्धान्तिक बातों को सत्य बनाया जाता है। परन्तु आध्यात्मिक और दार्शनिक मानकों में दोषी व्यक्ति कभी किसी निर्दोष को शाप नहीं दे सकता है।
और जहाँ दोषी व्यक्ति किसी निर्दोष को शाप देने का भय दिखाकर उसके साथ गलत व्यवहार करे अथवा उसे शापित करे तो समझना चाहिए वह घटना ही झूँठी है।
इस कार्य हेतु कारक कभी देवताओं को आधार बनाया गया तो कभी ऋषियों को, तो कभी तपस्या विहीन पुत्र मोह से पीड़ित गान्धारी जैसी स्त्री को भी।
किन्तु परमेश्वर श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) इस तरह के खेल में कभी शामिल नहीं हुए। इस सम्बन्ध में देखा जाए तो श्रीकृष्ण की विशेषता रही कि- उन्होंने आशीर्वाद के अतिरिक्त कभी किसी को शाप नहीं दिया।
इसीलिए उन्हें पालनहार कहा गया, यह ब्रह्म सत्य है। किन्तु यह विडम्बना ही है कि कथाकारों ने अपने पूर्वदुराग्रह वश कथाओं को अपने अनुरूप किया। जिन श्रीकृष्ण की शक्ति से शाप और आशीर्वाद प्रभावी होता है उन्हीं श्रीकृष्ण को शाप के मकड़जाल में फँसा कर एक बहेलिया से मरवा दिया। जबकि इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि भगवान श्रीकृष्ण को कोई बहेलिया अथवा सृष्टि का कोई प्राणी नहीं मार सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार उतारने के पश्चात अपने गोप- गोपियों के साथ स्वेच्छा से बड़े ही ऐश्वर्य रुप से अपने गोलोक धाम को गये थे। क्योंकि वे कर्म बन्धन से रहित सभी भौतिक अभौतिक इच्छाओं से परे थे।
इस बात को विस्तार पूर्वक इसी अध्याय के दूसरे भाग में बताया गया है।
ये शाप और आशीर्वाद का खेल किस परिस्थिति में प्रभावी और निष्प्रभावी होता है इसको अच्छी तरह से जानना होगा तभी इसकी सच्चाई पकड़ में आ सकती है अन्यथा नहीं।
कोई भी शाप कब प्रभावी और कब निष्प्रभावी होता है इसको इस तरह से समझा जा सकता है जैसे-
• किसी का शाप तभी प्रभावी होता है जब उसपर परमेश्वर की कृपा हो तथा वह उस योग्य हो, और सदैव सत्य के मार्ग पर चलने वाला हो, जिसमें तनिक भी पापबुद्धि एवं व्यक्तिगत हित न हो। ऐसे में यदि वह व्यक्ति निष्पक्ष भाव से व्यक्तिगत हित को त्याग कर किसी भी अहितकारी एवं दोषी
व्यक्ति को शाप देता है तो उसके शाप को निश्चय ही परमेश्वर प्रभावी कर देते हैं।
इसके विपरीत यदि शाप देने वाला पूर्वाग्रह से ग्रसित किसी निर्दोष को दोषी मानकर अपने स्वार्थ और व्यक्तिगत हित के लिए शाप देता है, तो उसके शाप को परमेश्वर निष्प्रभावी कर कर देते हैं। साथ ही उसकी सारी तपस्या और पुण्य को सदा-सदा के लिए समाप्त भी कर देते हैं ताकि वह इसका पुनः प्रयोग न कर सके।
महाभारत आश्वमेधिक पर्व के अन्तर्गत अनुगीता पर्व के अध्याय- (५३) के कुछ प्रमुख श्लोकों में इस तरह का उदाहरण मिलता है, जब उत्तंक ऋषि भगवान श्रीकृष्ण को महाभारत युद्ध न रोक पाने की वजह से उन्हें दोषी ठहराते हुए शाप देने के लिए उद्धत (उत्तेजित) हो जाते हैं। किन्तु भगवान श्रीकृष्ण उन्हें ज्ञान की बातें बता कर उन्हें शाप देने से रोक देते हैं।
"या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत।
अपि सा सफला तात कृता ते भरतान् प्रति॥१४॥
"श्रीभगवान उवाच"
कृतो यत्नो मया पूर्वं सौशाम्ये कौरवान् प्रति।
नाशक्यन्त यदा साम्ये ते स्थापयितुमञ्जसा ॥१५॥
ततस्ते निधनं प्राप्ताः सर्वे ससुतबान्धवाः।
अनुवाद- १४-१५
• उतंक ऋषि ने श्रीकृष्ण से कहा- तात ! मैं सदा तुमसे इस बात की सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्न से कौरव-पाण्डवों में मेल हो जायगा। मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियों के सम्बन्ध में तुमने वह सफल तो किया है न ? ॥ १४ ।।
• श्रीभगवान ने कहा— महर्षे ! मैंने पहले कौरवों के पास जाकर उन्हें शान्त करने के लिये बड़ा प्रयत्न किया, परन्तु वे किसी भी तरह सन्धि के लिये तैयार न हो सके। जब उन्हें समतापूर्ण मार्ग में स्थापित करना असम्भव हो गया, तब वे सब-के-सब अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवों सहित युद्ध में मारे गये॥१५॥
"इत्युक्तवचने कृष्णे भृशं क्रोधसमन्वितः।
उत्तङ्क इत्युवाचैनं रोषादुत्फुल्ललोचनः॥१९॥
उत्तङ्क उवाच
यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राताः कुरुपुङ्गवाः।
सम्बन्धिनः प्रियास्तस्माच्छप्स्येऽहं त्वामसंशयम् ॥२०॥
न च ते प्रसभं यस्मात् ते निगृह्य निवारिताः।
तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन॥२१॥
शृणु मे विस्तरेणेदं यद् वक्ष्ये भृगुनन्दन।
गृहाणानुनयं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव ॥२३॥
श्रुत्वा च मे तदध्यात्मं मुञ्चेथाः शापमद्य वै।
न च मां तपसाल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान् ॥२४॥
न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर।
तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः॥२५॥
कौमारं ब्रह्मचर्यं ते जानामि द्विजसत्तम।
दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम् ॥२६॥
अनुवाद - १९-२६
• भगवान् श्रीकृष्ण के इतना कहते ही उत्तंक मुनि अत्यन्त क्रोध से जल उठे और रोष से आँखें फ़ाड़- फाड़कर देखने लगे। उन्होंने श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा॥१९॥
श्रीकृष्ण ! कौरव तुम्हारे प्रिय सम्बन्धी थे, तथापि शक्ति रखते हुए भी तुमने उनकी रक्षा न की। इसलिये मैं तुम्हें अवश्य शाप दूँगा॥२०॥
• मधुसूदन ! तुम उन्हें जबर्दस्ती पकड़कर रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया। इसलिये मैं क्रोध में भरकर तुम्हें शाप दूँगा॥२१॥
• श्रीकृष्ण ने कहा— भृगुनन्दन ! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तार पूर्वक सुनिये। भार्गव ! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय-विनय स्वीकार कीजिये॥२३॥
• मैं आपको आध्यात्म तत्व सुना रहा हूँ। उसे सुनने के पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आज मुझे शाप दीजियेगा। तपस्वी पुरुषों में श्रेष्ठ महर्षे ! आप यह याद रखिये कि कोई भी पुरुष थोड़ी-सी तपस्या के बल पर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता। और मैं नहीं चाहता कि आपकी तपस्या भी नष्ट हो जाय॥२४॥
• आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है। आपनें गुरुजनों को भी सेवा से सन्तुष्ट किया है। द्विज श्रेष्ठ ! आपने बाल्यावस्था से ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है। ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं। इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर सञ्चित किये हुए आपके तप का मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ॥२५-२६॥
✴️ यदि उपर्युक्त श्लोक संख्या- (२४) को देखा जाए तो उसमें भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि- "कोई भी पुरुष तपस्या के बल पर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता।"
इसके आगे भगवान श्रीकृष्ण श्लोक संख्या- (२६) में कहते हैं
कि- यदि मैं चाहूँ तो आपकी सभी तपस्या के फलों का नाश कर सकता हूँ। किन्तु मैं ऐसा नहीं करना चाहता क्योंकि आपने इन्हें अत्यन्त कष्ट सहकर सञ्चित किया हैं।
इस सम्बन्ध में गोपाचार्य हँस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कथन है कि -
"तपस्याओं का फल परमात्मा श्रीकृष्ण की ही उपज है। क्योंकि उनकी इच्छा से ही शाप प्रभावी और निष्प्रभावी होते हैं। किन्तु परमेश्वर शाप-ताप से परे निर्लिप्त और निर्विकल्प हैं। अतः उनको कोई शाप नहीं लगता और नाही कोई उन्हें शाप दे सकता है।"
वहीं दूसरी ओर गान्धारी ने भी श्रीकृष्ण को महाभारत युद्ध का दोषी ठहराते हुए तथा युद्ध में मारे गए अपने पुत्रों के दुख से पीड़ित होकर ही यह शाप दिया कि - जिस प्रकार मेरी गोद सूनी हो गई है और जिस प्रकार कुरुकुल का संहार हो चुका है उसी प्रकार तुम्हारे यादव कुल का संहार होगा। वे आपस में एक दूसरे से लड़कर अपना ही संहार कर लेंगे।
हे केशव ! तुमने दूसरों का वध किया है इसलिए तुम्हारा भी वध होगा और अधर्म से होगा।
अब देखा जाए तो गान्धारी ने जिस आधार पर श्रीकृष्ण को शाप दिया उसका कोई औचित्य ही नहीं बनता। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध रोकने के लिए बहुत प्रयास किए थे किन्तु दुर्योधन की हठधर्मिता के कारण भगवान का प्रयास सफल नहीं हो सका।
फिर भी गान्धारी अपने पुत्र को दोषी न मानकर श्रीकृष्ण को ही दोषी ठहराते हुए शाप देती हैं। इससे सिद्ध होता है कि गान्धारी के शाप में नेक नियति नहीं थी।
दूसरी बात यह की गान्धारी के शाप में निजी स्वार्थ था क्योंकि गान्धारी के पुत्रों के ही समान अनेकों पुत्र महाभारत युद्ध में मारे गए थे, उनका दु:ख गान्धारी को नहीं था, वह केवल अपने पुत्र शोक से क्रुद्ध होकर श्रीकृष्ण को शाप
गान्धारी के शाप में तीसरी बात यह है कि- गान्धारी जब श्रीकृष्ण को व्यक्तिगत रूप से दोषी मान चुकी थी तो फिर अपने शाप में निर्दोष यादवों को क्यों आड़े हाथ लिया जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था। दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण की नारायणी सेना दुर्योधन के ही पक्ष में युद्ध कर रही थी जिसके समस्त योद्धा यादव थे। उनको भी वह अपने शाप में घसीट लिया। अतः ऐसे शापों को परमेश्वर कभी प्रभावी नहीं होने देते।
किन्तु इसी शाप को आधार बनाकर पौराणिक ग्रन्थों में यादव वंश के सम्पूर्ण विनाश और श्रीकृष्ण को एक बहेलिए से मारे जाने की एक मनगढ़न्त कहानी लिखी गई। इस बात को आगे विस्तार से बताया गया है।
किन्तु उसके पहले यह भी जान लीजिए कि यादवों को एक और शाप मिला था जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध -(११,) अध्याय- (१) के प्रमुख श्लोकों में किया गया है। जिसमें बड़े-बड़े ऋषि मुनियों द्वारा निर्दोष यादव बालकों को शाप देने का कार्य किया गया था जो इस प्रकार है-
विश्वामित्रोऽसित: कण्वो दुर्वासा भृगुरङ्गिराः।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठो नारदादयः ।।१२।
अनुवाद :-विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्री, वशिष्ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारिका के पास ही पिण्डारक क्षेत्र में जाकर निवास करने लगे। १२।
क्रीडन्तस्तानुपव्रज्य कुमार यदुनन्दनाः।
उपसंगृह्य पप्रच्छुरविनीता विनीतवत्।।१३।
ते वेषयित्वा स्त्रीवेषैः साम्बं जाम्बवतीसुतम।
एषा पृच्छति वो विप्रा अन्तर्वत्न्यसितेक्षणा।।१४।
प्रष्टुं विलज्जती साक्षात् प्रब्रूतामोघदर्शनाः।
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किंस्वित् संजनयिष्यति।। १५।
एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचुः कुपिता नृप।
जनयिष्यति वो मन्दा मूसलं कुलनाशनम्।। १६।
अनुवाद- १३- १६
• एक दिन यदुवंश के कुछ उद्दण्ड कुमार खेलते-खेलते उनके पास जा निकले, उन्होंने बनावटी नम्रता से उनके चरणों में प्रणाम करके प्रश्न किया। १३।
• वे जामवन्ती नन्दन साम्ब को स्त्री के भेष में सजा कर ले गए और कहने लगे, ब्राह्मण ! यह कजरारी आँखों वाली सुन्दरी गर्भवती है। यह आपसे एक बात पूँछना चाहती है। परन्तु स्वयं पूँछने में सकुचाती है। आप लोगों का ज्ञान अमोघ- अबाध है, आप सर्वज्ञ है। इसे पुत्र की बड़ी लालसा है और अब प्रसव का समय निकट आ गया है। आप लोग बताइए यह कन्या जनेगी या पुत्र ? ।१४-१५।
• परीक्षित ! जब उन कुमारों ने इस प्रकार उन ऋषि मुनियों को धोखा देना चाहा, तब वे क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा मूर्ख यह एक ऐसा मूसल पैदा करेगी जो तुम्हारे कुल का नाश करने वाला होगा।
अब इन ऋषियों को देखा जाए तो इनकी गणना बड़े-बड़े ऋषि मुनियों में होती है। किन्तु इनमें जरा भी सद्बुद्धि और सन्त स्वभाव नहीं था। क्योंकि सन्त का पहला स्वभाव- दया एवं क्षमाशीलता होती है। किन्तु उस समय इन ऋषियों में सन्त स्वभाव का थोड़ा भी गुण नहीं दिखा। परिणाम यह हुआ कि सभी ने मिलकर खेल रहे अबोध एवं निर्दोष बालकों को उदण्ड कहकर भयंकर शाप दे दिया। इनको सन्त कैसे कहा जा सकता है ? जिन्हें इतनी समझ नहीं कि ये बालक खेल के समय ही ऐसा व्यवहार कर रहे हैं उनमें तनिक भी पाप बुद्धि नही है। ऐसे में उन ऋषियों को चाहिए था कि उन्हें बालक बुद्धि समझ कर क्षमा कर दें। किन्तु इन ऋषियों ने बालकों को क्षमा करना तो दूर रहा उन्हें भयंकर शाप दे दिया।
देखा जाए तो इन ऋषि- मुनि और देवताओं का शाप केवल भोली-भाली जनता के लिए ही होता है, रावण, कंस तथा बड़े-बड़े बलशाली असुर और दैत्यों के लिए नहीं होता। क्या आपने कभी सुना है कि रावण, कंस, तथा बड़े-बड़े दैत्यों इत्यादि को किसी ऋषि मुनि या कोई देवता ने कभी शाप दिया है ? नहीं।
इस सम्बन्ध में गोपाचार्य हंस श्री योगेश रोहि जी महाराज का कथन है कि-
"शाप दिया नहीं जाता, शाप वास्तविक स्थिति में अन्तरात्मा से स्वत: उत्पन्न उद्वेग होता है, जो परमेश्वर की कृपा से प्रभावी होता है। शाप दु:ख निवृत्ति का प्रतिक्रियात्मक प्रवाह है। दु:खी और निर्दोष व्यक्ति ही दोषी को शाप दे सकता है। इसके विपरीत सुखी अथवा आनन्दित व्यक्ति शाप नहीं दे सकता है।"
इस शाप के विषय में सन्त शिरोमणि कबीर दास जी का भी कुछ ऐसा ही कहना हैं कि-
"दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
मुई खाल की स्वाँस सो, सार भसम है जाय।।
भावार्थ-
सन्त कबीर जी यह सन्देश दे रहे है कि हमे कभी भी किसी कमजोर या दुर्बल मनुष्य को सताना नहीं चाहिए। यदि हम किसी दुर्बल को परेशान करेंगे तो वह दुःखी होकर हमें शाप दे सकता है तथा दुर्बल की हाय बहुत प्रभावशाली होती है जैसे मरे हुए किसी जानवर की चमड़ी से बनाई गई भांथी (धौंकनी) की श्वांस लेने और छोड़ने से लोहा तक भस्म हो जाता है।
किन्तु शाप और वरदान के मकड़जाल से कथाकार ग्रन्थों में कहानियों की दिशा और दशा तय करते हैं। जिसमें वे कभी घोड़ी से बकरा और बकरी से घोड़ा पैदा करवाते हैं। तो कभी बालकों के पेट से मूसल पैदा करवा कर यादवों के विनाश और श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने की कहानी रचते हैं। जो हास्यास्पद और वास्तविकता से कोसों दूर है।
क्योंकि संसार की प्रत्येक घटना प्राकृतिक विधानों के ही अनुरूप घटित होती है। किसी के वरदान अथवा शाप के प्रभाव से अग्नि शीतल नहीं हो सकती है। ताप अथवा ऊष्मा तो उसका मौलिक गुण है। वह तो जलाऐगी ही।
जहाँ तक बात है यादवों के विनाश की, तो यादवों का विनाश अवश्य हुआ, किन्तु सम्पूर्ण नहीं केवल आंशिक हुआ। उसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण अपने धाम अवश्य गए। किन्तु उनके धाम जाने में गान्धारी का शाप व बहेलिए से मारे जाने की घटना को उनके साथ जोड़ना निराधार एवं कपोल-कल्पित है।
क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण के सभी कार्यक्रम पूर्व निर्धारित होते हैं। उसके लिए गीता के अध्याय-(४) का यह श्लोक प्रसिद्ध है।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। ७ ।।
अनुवाद - जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूं अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ।
इसी को चरितार्थ करने के लिए ही गोपेश्वर श्रीकृष्ण अपने समस्त गोप-गोपियों के साथ धरा- धाम पर अपने ही गोपकुल के यादव वंश में अवतरित होते हैं। और कार्य पूर्ण होने के पश्चात अपने समस्त गोप और गोपियों के साथ पुनः अपने धाम को चले जाते हैं। यहीं उनका सत्य सनातन नियम है। इस बात की पुष्टि-
ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(६) से होती है जिसमें देवों के निवेदन पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-
यास्यामि पृथिवीं देवा यात यूयं स्वमालयम् ।।
यूयं चैवांशरूपेण शीघ्रं गच्छत भूतलम् ।।६१।।
इत्युक्त्वा जगतां नाथो गोपाना हूय गोपिकाः ।
उवाच मधुरं वाक्यं सत्यं यत्समयोचितम् ।।६२।
गोपा गोप्यश्च शृणुतयात नन्दव्रजं परम् ।।
वृषभानुगृहे क्षिप्रं गच्छ त्वमपि राधिके ।६३।
वृषभानुप्रिया साध्वी नन्दगोपकलावती ।।
सुबलस्य सुता सा च कमलांशसमुद्भवा ।६४।
पितॄणां मानसी कन्या धन्या मान्या च योषिताम्।।
पुरा दुर्वाससः शापाज्जन्म तस्या व्रजे गृहे ।६५।।
तस्या गृहे जन्म लभ शीघ्रं नंदव्रजं व्रज ।।
त्वामहं बालरूपेण गृह्णामि कमलानने ।६६ ।
त्वं मे प्राणाधिका राधे तव प्राणाधिकोऽप्यहम्।।
न किञ्चिदावयोर्भिन्नमेकांगं सर्वदैव हि ।।६७।।
श्रुत्वैवं राधिका तत्र रुरोद प्रेमविह्वला ।
पपौ चक्षुश्चकोराभ्यां मुखचंद्रं हरेर्मुने ।६८।।
जनुर्लभत गोपाश्च गोप्यश्च पृथिवीतले ।।
गोपानामुत्तमानां च मन्दिरे मन्दिरे शुभे ।।६९।।
अनुवाद - ६१-६९
• देवों! ! मैं पृथ्वी पर जाऊँगा । अब तुम लोग भी अपने स्थान को पधारो और शीघ्र ही अपने अंश से भूतल पर अवतार लो।
• ऐसा कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण ने गोपों और गोपियों को बुलाकर मधुर, सत्य एवं समयोचित बातें कहीं-
गोपों और गोपियों ! सुनो। तुम सब के सब नन्दराय जी का जो उत्कृष्ट ब्रज है वहाँ जाओ। (उस व्रज में अवतार ग्रहण) करो। राधिके ! तुम भी शीघ्र ही वृषभानु के घर पधारो। वृषभानु की प्यारी पत्नी बड़ी साध्वी है। उनका नाम कलावती है। वे सुबल की पुत्री है। और लक्ष्मी के अंश से
प्रकट हुई है।
• यह सुनकर श्रीराधा प्रेम से विह्वल होकर वहाँ रो पड़ी और अपनें नेत्र-चकोरों द्वारा श्रीहरि के मुख चन्द्र की सौंदर्य सुधा का पान करने लगीं।
पुनः भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - गोपों और गोपियों ! तुम भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ घर-घर में जन्म लो। ६१-६९।
उवाच कमलां कृष्णः स्मेराननसरोरुहः।।
त्वं गच्छ भीष्मकगृहं नानारत्नसमन्वितम् ।१२०।
वैदर्भ्या उदरे जन्म लभ देवि सना तनि ।।
तव पाणिं ग्रहीष्यामि गत्वाऽहं कुंडिनं सति।१२१।
ता देव्यः पार्वतीं दृष्ट्वा समुत्थाय त्वरान्विताः।
रत्नसिंहासने रम्ये वासयामासुरीश्वरीम् ।। १२२।।
विप्रेंद्र पार्वतीलक्ष्मीवागधिष्ठातृदेवताः ।।
तस्थुरेकासने तत्र सम्भाष्य च यथोचि तम् ।।१२३।।
ताश्च संभाषयामासुः सम्प्रीत्या गोपकन्यकाः।
ऊचुर्गोपालिकाः काश्चिन्मुदा तासां च सन्निधौ ।।१२४।।
श्रीकृष्णः पार्वतीं तत्र समुवाच जगत्पतिः ।।
देवि त्वमंशरूपेण जन नंदव्रजे शुभे ।। १२५।।
उदरे च यशोदायाः कल्याणी नन्दरेतसा ।।
लभ जन्म महामाये सृष्टिसंहारकारिणि ।। १२६ ।।
ग्रामे ग्रामे च पूजां ते कारयिष्यामि भूतले ।।
कृत्स्ने महीतले भक्त्या नगरेषु वनेषु च ।।१२७।
तत्राधिष्ठातृदेवीं त्वां पूजयिष्यन्ति मानवाः ।।
द्रव्यैर्नानाविधैर्दिव्यैर्बलिभिश्च मुदाऽन्विताः ।।१२८।।
त्वद्भूमिस्पर्शमात्रेण सूतिकामन्दिरे शिवे ।।
पिता मां तत्र संस्थाप्य त्वामादाय गमिष्यति।१२९।
कंसदर्शन मात्रेण गमिष्यसि शिवान्तिकम् ।।
भारावतरणं कृत्वा गमिष्यामि स्वमाश्रमम् ।१३०।
अनुवाद- १२०-१३०
• इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण लक्ष्मी से बोले- सनातनी देवी तुम नाना रत्न से सम्पन्न भीष्मक के राज भवन में जाओ और वहाँ विदर्भ देश की महारानी के उदर में जन्म धारण करो। साध्वी देवी ! मैं स्वयं कुण्डिनपुर में जाकर तुम्हारा पाणिग्रहण करुँगा।
• जगदीश्वर श्रीकृष्ण ने वहाँ पार्वती (दुर्गा) से कहा- सृष्टि और संहार करने वाली कल्याणमयी महामाया स्वरुपिणी देवी ! शुभे ! तुम अंशरूप से नन्द के ब्रज में जाओ और वहाँ नन्द के घर यशोदा के गर्भ में जन्म धारण करो। मैं भूतलपर गाँव-गाँव में तुम्हारी पूजा करवाऊँगा। समस्त भूमण्डल में नगरों और वनों में मनुष्य वहाँ की अधिष्ठात्री देवी (विन्ध्यवासिनी ) के रूप में भक्ति भाव से तुम्हारी पूजा करेंगे और आनन्दपूर्वक नाना प्रकार के द्रव्य तथा दिव्य उपहार तुम्हें अर्पित करेंगे। शिवे ! तुम ज्यों ही भूतल का स्पर्श करोगी, त्यों ही मेरे पिता वसुदेव यशोदा के सूतिकागार में जाकर मुझे वहाँ स्थापित कर देंगे और तुम्हें लेकर चले जाएंगे। कंस का साक्षात्कार होने मात्र से तुम पुनः शिव के समीप चली जाओगी और मैं भूतल का भार उतर कर अपने धाम में आऊँगा। १२०-१३०।
उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार उतारने के लिए अपने समस्त गोप- गोपियों के साथ भू-तल पर अवतरित होते हैं, और भूमि का भार उतारने के पश्चात पुनः गोप और गोपियों के साथ अपने धाम को चले जाते हैं। यहीं उनका सत्य सनातन नियम है।
भूतल पर भगवान के साथ आए गोप और गोपियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सभी गोप अपार शक्ति सम्पन्न तथा सभी कार्यों में दक्ष होते हैं। और उसी हिसाब से ये सभी अपनी-अपनी योग्यताओं और क्षमताओं के हिसाब से भगवान श्रीकृष्ण के निर्धारित कार्यों में लग जाते हैं। इसीलिए गोपों को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं सहचर (साथी) कहा जाता है।
चुँकि ये गोप भगवान श्रीकृष्ण के पार्षद होते हैं इसलिए ये दैवीय और मानवीय शाप, ताप से मुक्त होते हैं। इसके साथ ही ये गोप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अजेय एवं अपराजित हैं। इन्हें न कोई देवता न दानव न गन्धर्व और नाही कोई मनुष्य पराजित कर सकता है, और नाहीं इन्हें कोई मार सकता है। इस बात को भगवान श्रीकृष्ण स्वयं- श्रीमद् भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कन्ध, अध्याय-(एक) के श्लोक संख्या- (४) में कहते हैं कि -
"नैवान्यतः परिभवोऽस्य भवेत्कथञ्चिन्
मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम् ।
अन्तः कलिं यदुकुलस्य विधाय वेणु
स्तम्बस्य वह्निमिव शान्तिमुपैमि धाम ॥४॥
"व्याकरण मूलक शब्दार्थ व अन्वय विश्लेषण-
१- न एव अन्तः परिभवः अस्य= नहीं किसी अन्य के द्वारा इस यदुवंश का परिभव ( पराजय/ विनाश)
२- भवेत् = हो सकता है ।
३- कथञ्चिद् = किसी प्रकार भी।
४- मत्संश्रयस्य विभव = मेरे आश्रम में इसका वैभव है।
५- उन्नहनस्य नित्यम् = यह सदैव बन्धनों से रहित है।
६- अन्तः कलिं यदुकुलस्य = आपस में ही लड़ने पर यदुवंश का नाश (शमन) होगा।
७- विधाय वेणु स्तम्बस्य वह्निमिव = जैसे बाँसों का समूह आपस में टकराकर घर्षण द्वारा उत्पन्न आग से शान्त हो जाता है।
८-उपैमि धाम= फिर मैं भी अपने गोलोकधाम को जाऊँगा।
॥४॥
अनुवाद:-इसका (यदुवंश का) किसी के द्वारा किसी प्रकार भी नाश नहीं हो सकता है। (यह स्वयं कृष्ण उद्धव से कहते हैं।) फिर इसके विनाश में ऋषि -मुनि अथवा देवों की क्या शक्ति है ?
कृष्ण कहते हैं- यह यदुवंश मेरे आश्रित है एवं सभी बन्धनों से रहित है। अतः जैसे बाँसों का समूह आपस में टकराकर घर्षण द्वारा उत्पन्न आग से शान्त हो जाता है। उसी प्रकार इस यदुवंश में भी परस्पर कलह से ही इसका शमन (नाश) होगा। शान्ति स्थापित करने के उपरान्त मैं अपने गोलोक-धाम को जाऊँगा ॥४॥
कहने का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी पर धर्म स्थापना के उपरान्त श्रीकृष्ण और उनके गोप-गोपियों का कार्य जब समाप्त हो जाता है। इसके बाद भगवान स्वयं तथा अपने समस्त गोप गोपियों के साथ गोलोक प्रस्थान की तैयारी में लग जाते हैं। इसके लिए सबसे पहले श्रीकृष्ण जो अजेय एवं अपराजित गोप योद्धा हैं, उनको आपस में ही युद्ध करा कर उनकी आत्मा को ग्रहण कर लेते हैं। क्योंकि यह सर्वविदित है कि सशरीर कोई गोलोक में नहीं जा सकता। इसलिए उनकी आत्मा को लेने के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने मौसल युद्ध की लीला रची और उस युद्ध में मारे गए वीर जांबाज यादव (गोपों) की आत्मा को लेकर बाकी अन्य गोपों की आत्मा को लेनें के लिए प्रभु दूसरी योजना बनाई। जिसका विस्तार पूर्वक वर्णन इस अध्याय के भाग- (२) में किया गया है।
[भाग- २]
श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।
इसके पिछले भाग में बताया जा चुका है कि गोपों को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई पराजित नहीं कर सकता ना ही उनका कोई वध कर सकता और ना ही उन्हें कोई शापित कर सकता है। तब भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से वे मौसल युद्ध में आपस में ही लड़कर नश्वर शरीर को त्याग देते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उनकी विशुद्ध आत्मा को गोलोक में ले जाने के लिए ग्रहण कर लेते हैं।
(ज्ञात हो- कोई भी सशरीर गोलोक में नहीं जा सकता) तत्पश्चात बाकी बचे हुए गोप और गोपियों के नश्वर शरीर से आत्मा लेने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जो कुछ किया उसका वर्णन- ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्री कृष्ण जन्म खण्ड के अध्याय-१२७ में मिलता है। जिसको संक्षेप में नींचे उद्धृत किया गया है।
"नारायण उवाच
श्रीकृष्णश्च समाह्वानं गोपांश्चापि चकार सः।
भाण्डीरे वटमूले च तत्र स्वयमुवास ह ।।१।।
पुराऽन्नं च ददौ तस्मै यत्रैव ब्राह्मणीगणः।
उवास राधिका देवी वामपार्श्वे हरेरपि ।।२।।
दक्षिणे नन्दगोपश्च यशोदासहितस्तथा ।
तद्दक्षिणो वृषभानस्तद्वामे सा कलावती ।।३।।
अन्ये गोपाश्च गोप्यश्च बान्धवाः सुहृदस्तथा ।
तानुवाच स गोविन्दो यथार्थ्यं समयोचितम्।।४।।
अनुवाद - १-४
श्रीनारायण कहते हैं- नारद ! जहाँ पहले ब्राह्मण पत्नियों ने श्रीकृष्ण को अन्न दिया था ; उस भाण्डीर वट की छाया में श्रीकृष्ण स्वयं विराजमान हुए और वहीं समस्त गोपों को बुलावा भेजा। श्रीहरि के वाम भाग में राधिका देवी, दक्षिण भाग में यशोदा सहित नन्द, और नन्द के दाहिने वृषभानु और वृषभानु के बाएँ कलावती तथा अन्यान्य गोप, गोपियाँ भाई- बन्धु तथा मित्रों ने आसन ग्रहण किया। तब गोविन्द ने उन सब से समयोचित यथार्थ वचन कहा। १-४
गोलोकं गच्छ शीघ्रं त्वं सार्धं गोकुलवासिभिः।
आरात्कलेरागमनं कर्ममूलनिकृन्तनम् ।।११।।
अनुवाद- अब कर्म की जड़ काट देने वाले कलयुग का आगमन सन्निकट है अतः तुम सभी शीघ्र ही गोकुल वासियों के साथ गोलोक को चले जाओ । ११।
एतस्मिन्नन्तरे विप्र रथमेव मनोहरम् ।
चतुर्योजनविस्तीर्णमूर्ध्वे च पञ्चयोजनम् ।।३७।।
शुद्धस्फटिकसंकाशं रत्नेन्द्रसारनिर्मितम्।
अम्लानपारिजातानां मालाजालविराजितम्।।३८।।
मणीनां कौस्तुभानां च भूषणेन विभूषितम् ।
अमूल्यरत्नकलशं हीरहारविलम्बितम् ।।३९।।
मनोहरैः परिष्वक्तं सहस्रकोटिमन्दिरैः ।
सहस्रद्वयचक्रं च सहस्रद्वयघोटकम् ।।४०।।
सूक्ष्मवस्त्राच्छादितं च गोपीकोटीभिरावृतम् ।
गोलोकादागतं तूर्णं ददृशुः सहसा व्रजे ।।४१।।
कृष्णाज्ञया तमारुह्य ययुर्गोलोकमुत्तमम् ।
राधा कलावती देवीधन्या चायोनिसंभवा।।४२।।
गोलोकादगता गोप्यश्चायोनिसंभवाश्च ताः ।
श्रुतिपत्न्यश्च ताः सर्वाः स्वशरीरेण नारद।।४३।।
सर्वे त्यक्त्वा शरीराणि नश्वराणि सुनिश्चितम् ।
गोलोकं च ययौ राधा सार्घं गोकुलवासिभिः।।४४।
ददर्श विरजातीर्र नानारत्नविभूषितम् ।
तदुत्तीर्य ययौ विप्र शतशृङ्गं च पर्वतम् ।।४५।।
नानामणिगणाकीर्णं रासमण्डलमण्डितम् ।
ततो ययौ कियद्दूरं पुण्यं वृन्दावनं वनम्।।४६ ।
सा ददर्शाक्षयवटमूर्ध्वे त्रिशतयोजनम् ।
शतयोजनविस्तीर्णं शाखाकोटिसमावृतम् ।।४७ ।।
रक्तवर्णैः फलौघैश्च स्थूलैरपि विभूषितम् ।
गोपीकोटिसहस्रैश्च सार्धं वृन्दा मनोहरा ।।४८ ।
अनुव्रजं सादरं च सस्मिता सा समाययौ ।
अवरुङ्य रथात्तूर्णं राधां सा प्रणनाम च ।।४९।
अनुवाद - ३७-४९
• इसी बीच वहाँ व्रज में लोगों ने सहसा गोलोक से आए हुए एक मनोहर रथ को देखा। वह रथ चार योजन विस्तृत और पाँच योजन ऊँचा था, बहुमूल्य रत्नों के सारभाग से उसका निर्माण हुआ था।
• उसमें दो हजार पहिये लगे थे और दो हजार घोड़े उसका भार वहन कर रहे थे तथा उसपर सूक्ष्म वस्त्र का आवरण पड़ा हुआ था एवं वह करोड़ों गोपियों से समावृत (घिरा हुआ) था।
• नारद! राधा और धन्यवाद की पात्रा कलावती देवी का जन्म किसी के गर्भ से नहीं हुआ था। यहांँ तक की गोलक से जितनी भी गोपियाँ आईं थीं, वह सभी आयोनिजा थीं। उनके रूप में श्रुति पत्नियाँ ही अपने शरीर से प्रकट हुई थीं। वे सभी श्रीकृष्ण की आज्ञा से अपने नश्वर शरीर का त्याग करके उस रथपर सवार हो उत्तम गोलोक को चली गईं। साथ ही राधा भी गोकुल वासियों के साथ गोलोक को प्रस्थित हुई। ३७-४९
फिर इसके आगे की घटना का वर्णन- ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अध्याय-(१२८) में मिलता है। जिसको संक्षेप में नीचे उद्धृत किया जा रहा है।
"नारायण उवाच
श्रीकृष्णो भगवांस्तत्र परिपूर्णतम: प्रभुः।
दृष्ट्वा सारोक्यमोक्षं च सद्यो गोकुलवासिनाम् ।।१।।
उवास पञ्चभिर्गोपैर्भाण्डीरे वटमूलके ।
ददर्श गोकुलं सर्व गोकुलं व्याकुलं तथा ।। २।
अरक्षकं च व्यस्तं च शून्यं वृन्दावनं वनम् ।
योगेनामृतवृष्ट्या च कृपया च कृपानिधिः ।। ३।
गोपीभिश्च तथा गोपैः परिपूर्णं चकार सः ।
तथा वृन्दावनं चैव सुरम्यं च मनोहरम् ।। ४।
गोकुलस्थाश्च गोपाश्च समाश्वासं चकार सः ।
उवाच मधुरं वाक्यं हितं नीतं च दुर्लभम् ।। ५ ।
अनुवाद - १ से ५ तक
नारद ! परिपूर्णतम प्रभु भगवान श्रीकृष्ण वहाँ तत्काल ही गोकुल वासियों के सालोक्य मोक्ष को देखकर भाण्डीर वन में वट वृक्ष के नींचे पाँच गोपों के साथ ठहर गए। वहाँ उन्होंने देखा कि सारा गोकुल तथा गो- समुदाय व्याकुल है।
रक्षकों के न रहने से वृन्दावन शून्य तथा अस्त-व्यस्त हो गया है। तब उन कृपा सागर को दया आ गई। फिर तो उन्होंने योगधारणा द्वारा अमृत की वर्षा करके वृन्दावन को मनोहर, सुरम्य और गोपों तथा गोपियों से व्रज को पुन: परिपूर्ण कर दिया (पुनः जीवित कर दिया)
साथ ही गोकुलवासी गोपों को ढाढस भी बंँधाया।
तत्पश्चात वे हितकर नीतियुक्त दुर्लभ मधुर वचन बोले-
"श्री भगवानुवाच
हे गोपगण हे बन्धो सुखं तिष्ठ स्थिरो भव ।
रमणं प्रियया सार्धं सुरम्यं रासमण्डलम् ।६ ।।
तावत्प्रभृति कृष्णस्य पुण्ये वृन्दावने वने ।
अधिष्ठानं च सततं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।।७ ।।
अनुनाद - ६-७
• हे गोपगण ! हे बन्धो ! तुम लोग सुख का उपभोग करते हुए शान्तिपूर्वक यहाँ निवास करो, क्योंकि प्रिया के साथ विहार सुरम्य रासमण्डल और वृन्दावन नामक पूण्यवन में मुझ श्रीकृष्ण का निरन्तर निवास तब तक रहेगा जब तक संसार में सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति रहेगी। ६-७।
✴️ विशेष:- इस प्रसंग से एक बात और सिद्ध होती है कि-वर्तमान में जो गोप (अहीर) हैं वे सब गोलोकवासी गोपों के ही वंशज हैं।
"पार्वत्युवाच
एकाऽहं राधिकारूपा गोलोके रासमण्डले ।
रासशून्यं च गोलोकं परिपूर्ण कुरु प्रभो ।। ८६।
गच्छ त्वं रथमारुह्य मुक्तामाणिक्यभूषितम् ।
परिबूर्णतमाऽहं च तव वङः स्थलस्थिता ।। ८७।।
पार्वतीवचनं श्रुत्वा प्रहस्य रसिकेश्वरः ।
रत्नयानं समारुह्य ययौ गोलोकमुत्तमम् ।। ९८।।
अनुवाद - ८६, ८७ और ९८
• वहाँ उपस्थित पार्वती ने कहा- प्रभो ! गोलोकस्थित रासमण्डल में मैं ही अपने एक राधिका रूप से रहती हूँ। इस समय गोलोक रासशून्य हो गया है, अतः आप मुक्ता और माणिक्य से विभूषित रथ पर अरुण हो वहाँ जाइए और उसे परिपूर्ण कीजिए।८६-८७।
• नारद ! पार्वती के वचन सुनकर रसिकेश्वर रासधारी श्रीकृष्ण हँसे और रत्न-निर्मित विमानपर सवार हो उत्तम गोलोक को चले गए। ९८
▪️इसके अतिरिक्त भगवान श्रीकृष्ण को गोलोक जाने का वर्णन गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय- (६०) में भी मिलता है। जिसको जाने बिना श्रीकृष्ण के गोलोक गमन का प्रसंग अधूरा ही रह जाएगा। इसलिए उसको भी जानना आवश्यक है।
बलः शरीरं मानुष्यं त्यक्त्वा धाम जगाम ह ।
देवाँस्तत्रागतान्दृष्ट्वा हरिरंतरधीयत ॥ १३ ॥
व्रजे गत्वा हरिर्नंदं यशोदां राधिकां तथा ।
गोपान्गोपीर्मिलित्वाऽऽह प्रेम्णा प्रेमी प्रियान्स्वकान् ॥ १४।
अनुवाद - बलराम जी मानव शरीर को छोड़कर अपने धाम को चले गए। वहाँ देवताओं को आया देख श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गए। ब्रज में जाकर श्रीहरि नन्द, यशोदा, राधिका तथा गोपियों सहित गोपों से मिले और उन प्रेमी भगवान ने अपने प्रिय जनों से प्रेम पूर्वक इस प्रकार कहा। १३-१४
किन्तु भगवान श्रीकृष्ण के अगले कथन को बताने से पहले यहाँ कुछ बताना चाहुँगा कि- देवताओं के आने पर गोपेश्वर श्रीकृष्ण क्यों अन्तर्धान हो गए ?
तो उस समय गोपेश्वर श्रीकृष्ण तीन कारणों से देवताओं के आने पर अन्तर्धान हो गए।
(१)- पहला कारण यह कि - गोलोक के आवागमन की अलौकिक घटनाक्रम में गोपों के अतिरिक्त अन्य कोई सम्मिलित नहीं हो सकता। इस लिए भगवान श्रीकृष्ण देवताओं को वहाँ आते ही अन्तर्धान हो गये।
(२)- दूसरी कारण यह कि - भगवान श्रीकृष्ण भूमि का भार दूर करने के लिए गोलोक से अपने गोप और गोपियों के साथ आते हैं और कार्य पूर्ण हो जाने पर भगवान उन्हीं गोप और गोपियों को लेकर पुनः गोलोक को चले जाते हैं। इस घटनाक्रम से देवताओं का कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए वहाँ पर देवताओं के आनें पर भगवान श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये।
(३)- तीसरी कारण यह कि- भगवान श्रीकृष्ण सहित गोपों के इस आवागमन की धटना गुप्त एवं रहस्य पूर्ण है। इसे केवल गोप और गोपियाँ ही जानते हैं। और इस घटना को गोपेश्वर श्रीकृष्ण सदैव गुप्त ही रखना चाहते हैं। इसीलिए गोपेश्वर श्रीकृष्ण देवताओं के आने पर वहाँ से अन्तर्धान हो गए।
उपर्युक्त तीनों कारणों से भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक गमन की वास्तविकता को गोपों के अतिरिक्त पूर्ण रूप से न तो देवता और न ही ऋषि-मुनि लोग जानते हैं।
कृष्णभक्तिं विजानाति योगीन्द्रश्च महेश्वरः ।
राधा गोप्यश्च गोपाश्च गोलोकवासिनश्च ये ।८२।
किञ्चित्सनत्कुमारश्च ब्रह्मा चेद्विषयी तथा ।
किंचिदेव विजानन्ति सिद्धा भक्ताश्च निश्चितम्।८३।
सन्दर्भ-
[ब्रह्मवैवर्तपुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड ९४/ ८२- ८३]
अनुवाद - ८२-८३
श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूपेण योगीराज महेश्वर, राधा तथा गोलोकवासी और गोप-गोपियाँ ही जानती हैं।
• ब्रह्मा और सनत्कुमारों को कुछ ही ज्ञात है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं। ८३।
▪️इतना ही नहीं परमेश्वर श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण चरित्रों की जानकारी देने में वेद और पुराण भी सक्षम नहीं हैं-
गोलोकनाथस्य विभोर्यशोऽमलं श्रुतौ पुराणे नहि किञ्चन स्फुटम्।
न पाद्ममुख्याः कथितुं समर्थाः सर्वेश्वरं तं भज पाद्ममुख्यम् ।।९।
[ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्रह्मखण्ड- ३०/ ९ ]
अनुवाद- गोलोक के सर्वशक्तिमान स्वामी (श्रीकृष्ण) की निर्मल प्रसिद्धि के बारे में पुराणों में भी बहुत कुछ वर्णित नहीं है। कमल-मुख वाले प्रभु की महिमा बताने में ये पुराण भी सक्षम नहीं हैं, इसलिए उन कमल-मुख वाले भगवान श्रीकृष्ण का भजन करो। ९।
इसी अज्ञानता के कारण पुराणों में भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक गमन के प्रसंग में श्रीकृष्ण को बहेलिए से मरवा कर गोलोक गमन की हास्यास्पद कथा लिखी गई है और अधिकांश कथा वाचक इसी झूठी घटनां को सत्य जानकार श्रीकृष्ण कथा कहते हुए भक्तों को भ्रमित करते।
अब हम पुनः अपने मूल प्रसंग गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय- (६०) पर आते हैं- उपस्थित नन्द आदि गोपों से भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-
"श्रीकृष्ण उवाच -
गच्छ नन्द यशोदे त्वं पुत्रबुद्धिं विहाय च ।
गोलोकं परमं धाम सार्धं गोकुलवासिभिः ॥ १५ ॥
अग्रे कलियुगो घोरश्चागमिष्यति दुःखदः ।
यस्मिन्वै पापिनो मर्त्या भविष्यंति न संशयः।१६।
स्त्रीपुंसोर्नियमो नास्ति वर्णानां च तथैव च ।
तस्माद्गच्छाशु मद्धाम जरामृत्युहरं परम् ॥१७॥
इति ब्रुवति श्रीकृष्णे रथं च परमाद्भुतम् ।
पञ्चयोजनविस्तीर्णं पञ्चयोजनमूर्ध्वगम्॥ १८॥
वज्रनिर्मलसंकाशं मुक्तारत्नविभूषितम् ।
मन्दिरैर्नवलक्षैश्च दीपैर्मणिमयैर्युतम् ॥१९॥
सहस्रद्वयचक्रं च सहस्रद्वयघोटकम् ।
सूक्ष्मवस्त्राच्छादितं च सखीकोटिभिरावृतम्॥ २०॥
गोलोकादागतं गोपा ददृशुस्ते मुदान्विताः।
एतस्मिन्नन्तरे तत्र कृष्णदेहाद्विनिर्गतः।।२१।।
देवश्चचतुर्भजो राजन् कोटिमन्मथसन्निभः।
शङ्खचक्रधरः श्रीमाँल्लक्ष्म्या सार्धं जगत्पतिः ॥२२॥
क्षीरोदं प्रययौ शीघ्रं रथमारुह्य सुंदरम् ।
तथा च विष्णुरूपेण श्रीकृष्णो भगवान् हरिः॥२३॥
अनुवाद - १५-२३
• श्रीकृष्ण बोले - नन्द और यशोदे ! अब तुम मुझ में पुत्र बुद्धि छोड़कर समस्त गोकुल वासियों के साथ मेरे परमधाम गोलोक को जाओ। क्योंकि अब आगे सबको दु:ख देने वाला घोर कलयुग आएगा, जिसमें मनुष्य प्राय: पापी हो जाएँगे इसमें संशय नहीं है।१५-१६।
• श्रीकृष्ण इस प्रकार कह ही रहे थे कि गोलोक से एक परम अद्भुत रथ उतर आया जिसे गोपों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ देखा। उसका विस्तार पाँच योजन का था और ऊँचाई भी उतनी ही थी। वह बज्रमणि (हीरे) के समान निर्मित और मुक्ता - रत्नों से विभूषित था। उसमें नौ लाख मन्दिर थे और उन घरों में मणिमय दीप जल रहे थे। उस रथ में दो हजार पहिये लगे थे और दो हजार घोड़े जुते हुए थे। उस रथपर महीन वस्त्र का पर्दा पड़ा था। करोड़ों सखियाँ उसे घेरे हुए थीं। १८- २०- १/२।
• राजन ! उसी समय श्रीकृष्ण के शरीर से करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर चारभुजा धारी विष्णु प्रकट हुए, जिन्होंने शङ्ख और चक्र धारण कर रखे थे। वे श्रीमान विष्णु लक्ष्मी के साथ एक सुन्दर रथ पर आरूढ़ हो शीघ्र ही क्षीरसागर को चल दिए। २१-२३,
लक्ष्म्या गरुडमारुह्य वैकुण्ठं प्रययौ नृप ।
ततो भूत्वा हरिः कृष्णो नरनारायणावृषी॥२४॥
कल्याणार्थं नराणां च प्रययौ बद्रिकाश्रमम् ।
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो राधया युतः॥ २५॥
गोलोकादागतं यानमारुरोह जगत्पतिः ।
सर्वे गोपाश्च नन्दाद्या यशोदाद्या व्रजस्त्रियः ॥ २६।
त्यक्त्वा तत्र शरीराणि दिव्यदेहाश्च तेऽभवन् ।
स्थापयित्वा रथे दिव्ये नन्दादीन् भगवान् हरिः।।२७।
गोलोकं प्रययौ शीध्रं गोपालो गोकुलान्वितः।
ब्रह्माणडेभ्यो बहिर्गत्वा ददर्श विरजां नदीम्।। २८।
अनुवाद - २४-२८
• इसी प्रकार नारायण रूपधारी भगवान श्रीकृष्ण हरि महालक्ष्मी के साथ गरुण पर बैठकर वैकुण्ठ धाम को चले गए। नरेश्वर ! इसके बाद श्रीकृष्ण हरि नर और नारायण दो ऋषियों के रूप में विभक्त हो मानव के कल्याणार्थ बद्रीकाआश्रम को चले गए। तदनन्तर साक्षात परिपूर्तम् जगतपति भगवान श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ गोलोक से आए हुए रथ पर आरूढ़ हुए।
• नन्द आदि समस्त गोप तथा यशोदा आदि व्रजांगनाएँ सब के-सब वहाँ भौतिक शरीरों का त्याग करके दिव्यदेहधारी हो गए। तब गोपाल भगवान श्रीकृष्ण नन्द आदि को उस दिव्य रथपर बिठाकर गोकुल के साथ ही शीघ्र गोलोक धाम को चले गए। ब्रह्माण्डों से बाहर जाकर उन सब ने विरजा नदी को देखा साथ ही शेषनाग की गोद में महा लोक गोलोक दृष्टिगोचर हुआ, जो दुखों का नाशक तथा परम सुखदायक है। २३- २८,१/२
दृष्ट्वा रथात्समुत्तीर्य सार्धं गोकुलवासिभिः ॥२९॥
विवेश राधया कृष्णः पश्यन्न्यग्रोधमक्षयम् ।
शतश्रङ्गं गिरिवरं तथा श्रीरासमण्डलम् ॥३०॥
ततो ययौ कियद्दूरं श्रीमद्वृन्दावनं वनम् ।
वनैर्द्वादशभिर्युक्तं द्रुमैः कामदुघैर्वृतम् ॥३१॥
नद्या यमुनया युक्तं वसन्तानिलमण्डितम् ।
पुष्पकुञ्जनिकुञ्जं च गोपीगोपजनैर्वृतम् ॥ ३२॥
तदा जयजयारावः श्रीगोलोके बभूव ह ।
शून्यीभूते पुरा धाम्नि श्रीकृष्णे च समागते ॥३३॥
अनुवाद - उसे देखकर गोकुल वासियों सहित श्रीकृष्ण उस रथ से उतर पड़े और श्रीराधा के साथ अक्षयवट का दर्शन करते हुए उस परमधाम में प्रविष्ट हुए। गिरिवर शतश्रङ्ग (सात ( श्रृंगों ) चोटियों वाला पर्वत) था रासमण्डल को देखते हुए वह कुछ दूर स्थित वृन्दावन में गए, जो बारह वनों से संयुक्त तथा कामपूरक वृक्षों से भरा हुआ था।
• यमुना नदी उसे छूकर बह रही थी। वसन्त ऋतु और मलयानिल उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँ फूलों से भरे कितने ही कुञ्ज और निकुञ्ज थे। वह वन गोप और गोपियों से भरा हुआ था। जो पहले सूना- सा लगता था, उस गोलोक धाम में श्रीकृष्ण के पधारने से जय-जयकर की ध्वनि गूँज उठी। २९-३३।
ज्ञात हो कि - भगवान श्रीकृष्ण धर्मस्थापना हेतु भूतल पर- (१२५) वर्ष तक रहे। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध -१०, अध्याय- ६ के श्लोक- २५ से होती है। जिसमें ब्रह्माजी भगवान श्रीकृष्ण के लिए कहते हैं कि-
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पञ्चविञ्शाधिकं प्रभो।। २५
अनुवाद - पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किया एक-सौ पच्चीस वर्ष बीत गए हैं।२५।
इसी प्रकार श्रीकृष्ण की आयु (भूतल पर रहने के समय) का प्रमाण ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड अध्याय- (१२९) में भी मिलता हैं। जिसमें ब्रह्मा जी स्वयं श्रीकृष्ण से कहते हैं कि-
"ब्रह्मवाच-
" यत्पञ्चविंशत्यधिकं वर्षाणां शतकं गतम् ।
त्यक्त्वेमां स्वपदं यासि रुदतीं विरहातुराम् ।१८ ।।
अनुवाद:-
ब्रह्माजी बोले ! हे प्रभु ! इस पृथ्वी पर क्रीड़ा करते आपके एक सौ पच्चीस वर्ष बीत गये। विरह से आतुर रोती हुई पृथ्वी को छोड़कर अपने गोलोक धाम को पधार रहे हैं।१८।
इस प्रकार से इस अध्याय के दोनों खण्डों के साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध होता है कि- "जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही श्रीकृष्ण धर्म की पुनः स्थापना के लिए अपने समस्त गोप और गोपियों के साथ भूतलपर अवतरित होते हैं। और धर्म स्थापना के उपरान्त वे ही प्रभु गोप और गोपियों के साथ अपने धाम- गोलोक को चले जाते हैं।
किन्तु प्रथम बार गोलोक की ही भाँति भूतल पर भी एक दूसरा वृन्दावन तथा गोलोक की ही भाँति गोप-गोपियों को स्थापित कर जाते हैं। और जब भी भूतल का भार उतारने के लिये दुबारा आते हैं, तो भूतल के इन्हीं गोप-गोपियों के यहाँ अवतरित होते हैं। यहीं गोपेश्वर श्रीकृष्ण का सत्य सनातन नियम है। इस कार्य में ना तो गान्धारी के शाप की कोई भूमिका है और ना ही किसी ऋषि मुनि के शाप का सम्बन्ध है और नही भगवान श्रीकृष्ण को बहेलिया से मारे जाने की कोई सच्चाई है। यह सब भगवान श्रीकृष्ण की पूर्व निर्धारित लीला का ही परिणाम है। इसमें शाप और आशीर्वाद को लाना भगवान श्रीकृष्ण की वास्तविक जानकारियों से लोगों को भ्रमित करना है।
इसीलिए कहा जाता है कि जो भगवान श्रीकृष्ण और उनके गोपों के गोलोक जाने की "सत्य कथाओं" को सुनता है वह निश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त होता है।" बाकी भ्रामक एवं असत्य कथा कहने व सुनने वाले को कभी भी पापों से मुक्ति नहीं मिलती।
इस बात की पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेध खण्ड अध्याय- (७) के श्लोक संख्या- ४१ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-
यः शृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरेः ।
मुक्तिं यदूनां गोपानां सर्वपापैः प्रमुच्यते॥४१ ॥
अनुवाद:-
जो श्रीहरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं तथा यादव (गोपों) की मुक्ति का वृतान्त पढ़ते हैं वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। ४१ ।
गोलोक धाम का वर्णन हरिवंशपुराण विष्णु पर्व के अध्याय- (19) में भी प्राप्त होता है।मनुष्यलोकादूर्ध्वं तु खगानां गतिरुच्यते ।
आकाशस्योपरि रविर्द्वारं स्वर्गस्य भानुमान् ।२७ ।।
देवलोकः परस्तस्माद् विमानगमनो महान् ।
यत्राहं कृष्ण देवानामैन्द्रे विनिहितः पदं । २८।।
स्वर्गादूर्ध्वं ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगणसेवितः ।
तत्र सोमगतिश्चैव ज्योतिषां च महात्मनाम् ।२९ ।।
तस्योपरि गवां लोकः साध्यास्तं पालयन्ति हि।
स हि सर्वगतः कृष्ण महाकाशगतो महान्। 2.19.३०।।
उपर्युपरि तत्रापि गतिस्तव तपोमयी ।
यां न विद्मो वयं सर्वे पृच्छन्तोऽपि पितामहम् ।। ३१।
लोकस्त्वधो दुष्कृतिनां नागलोकस्तु दारुणः ।
पृथिवी कर्मशीलानां क्षेत्रं सर्वस्य कर्मणः ।३२ ।।
खमस्थिराणां विषयो वायुना तुल्यवृत्तिनाम् ।
गतिः शमदमाख्यानां स्वर्गः सुकृतकर्मणाम् ।३३।
ब्राह्मे तपसि युक्तानां ब्रह्मलोकः परा गतिः ।
गवामेव तु गोलोको दुरारोहा हि सा गतिः ।३४ ।।
अनुवाद-
26-31. हे कृष्ण ! सबके नीचे जललोक है; उसके ऊपर पृथ्वी के स्तंभ तैर रहे हैं; उनके ऊपर मनुष्यलोक है; उसके ऊपर आकाशलोक है; उसके ऊपर सूर्य का तेजोमय लोक है जो स्वर्ग का द्वार है; उसके ऊपर देवताओं का महान लोक है जो देवताओं का निवास है; यहाँ मैं देवताओं के राजा का पद धारण करता हूँ; उसके ऊपर ब्रह्मलोक है
जहाँ ब्रह्मर्षि निवास करते हैं और जहाँ महापुरुष सोम (चन्द्रमा) तथा अन्य ज्योतिर्मय पिंड विचरण करते हैं। उसके ऊपर महान आकाश लोक में स्थित गोलोक है।
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हे कृष्ण ! गोलक सभी लोकों में श्रेष्ठ है और साध्यों द्वारा सुरक्षित है । वहाँ आप तप करते हुए रहते हैं , जिसे हम पितामह से पूछने पर भी नहीं सीख सकते।
32. यह पृथ्वी कर्म करने वालों का क्षेत्र है, इसके नीचे अधर्मियों का भयानक क्षेत्र है।
33. आकाश लोक वायु आदि गतिमान वस्तुओं का आश्रय है और स्वर्ग संयम तथा सहनशीलता से युक्त पुण्यात्माओं का उत्तम आश्रय है।
34. जो लोग ब्रह्मा की पूजा करते हैं, वे ब्रह्मलोक में निवास करते हैं। गोलोक केवल गौओं की सेवा द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, अन्य कोई भी उसे कठिन तपस्या से भी प्राप्त नहीं कर सकता।*******
किन्तु यहाँ पर उन लोगों को जानकारी देना आवश्यक हो जाता है जो अक्सर कुछ अधूरी जानकारी रखते हैं और आएदिन कहा करते हैं कि- मौसल युद्ध में सम्पूर्ण यादवों का विनाश हो गया था।
किन्तु ऐसा वे लोग कहते हैं जिनको इस बात की जानकारी नहीं है कि सम्पूर्ण यादवों का विनाश नहीं हुआ था। क्योंकि उस युद्ध के उपरान्त बहुत सी स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े यादव
तथा भगवान श्री कृष्ण के पौत्र वज्रनाभ बच गए थे।
इन सभी बातों की पुष्टि-श्रीविष्णु पुराण के पञ्चम अंश के अध्याय- (३७) के कुछ प्रमुख श्लोकों से होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण दारूक से सन्देश भिजवाते समय कहते हैं कि-
"दृष्ट्वा बलस्य निर्याणं दारुकं प्राह केशवः ।
इदं सर्वं समाचक्ष्व वसुदेवोग्रसेनयोः ।।५७।
निर्याणं बलभद्र स्य यादवानां तथा क्षयम् ।
योगे स्थित्वाहमप्येतत्परित्यक्ष्ये कलेवरम् ।। ५८।
वाच्यश्च द्वारकावासी जनस्सर्वस्तथाहुकः ।
यथेमां नगरीं सर्वां समुद्र: ! प्लावयिष्यति ।। ५९ ।
तस्माद्भवद्भिस्सर्वैस्तु प्रतीक्ष्यो ह्यर्जुनागमः ।
न स्थेयं द्वारकामध्ये निष्क्रान्ते तत्र पाण्डवे ।। ६०।
तेनैव सह गन्तव्यं यत्र याति स कौरवः ।। ६१।
गत्वा च ब्रूहि कौन्तेयमर्जुनं वचनान्मम ।
पालनीयस्त्वया शक्त्या जनोऽयं मत्परिग्रहः।। ६२।
त्वमर्जुनेन सहितो द्वारवत्यां तथा जनम् ।
गृहीत्वा यादि वज्रश्च यदुराजो भविष्यति ।। ६३।
अनुवाद - ५७-६३
• इस प्रकार बलराम जी का प्रयाण (गोलोकगमन) देखकर श्रीकृष्णचन्द्र ने सारथि दारूक से कहा- तुम यह सब वृत्तान्त उग्रसेन और वसुदेव जी से जाकर कहो। ५७।
• बलभद्रजी का निर्याण, यादवों का क्षय और मैं भी योगस्थ होकर नश्वर शरीर को छोड़कर अपने धाम को जाऊँगा। यह सब समाचार भी वसुदेव जी और उग्रसेन को जाकर सुनाओ। ५८।
• सम्पूर्ण द्वारिका वासी और आहुक (उग्रसेन) से कहना कि अब इस सम्पूर्ण नगरी को समुद्र डुबो देगा।५९।
• इसलिए आप सब केवल अर्जुन के आगमन की प्रतिक्षा और करें तथा अर्जुन के यहाँ से लौटते ही फिर कोई भी व्यक्ति द्वारिका में न रहे, जहाँ वे कुन्ती नन्दन जाएं वहीं सब लोग चले जायं। ६०-६१।
कुन्ती पुत्र अर्जुन से तुम मेरी ओर से कहना कि- अपने सामर्थ्य अनुसार तुम मेरे परिवार के लोगों की रक्षा करना। ६२।
• और तुम द्वारिका वासी सभी लोगों को लेकर अर्जुन के साथ चले जाना। हमारे पीछे वज्रनाभ ही यदुवंश का राजा-होगा। ६३।
ये तो रही बात मौसल युद्ध में कुछ खास बचे हुए यादवों की जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ भी हैं। इसके अतिरिक्त भगवान श्रीकृष्ण वृन्दावन में समस्त गोप और गोपियों की मृत शरीर को पुनः जीवित कर दिया था वे सभी यादव ही थे।
"अरक्षकं च व्यस्तं च शून्यं वृन्दावनं वनम् ।
योगेनामृतवृष्ट्या च कृपया च कृपानिधिः।। ३।।
गोपीभिश्च तथा गोपैः परिपूर्णं चकार सः ।
तथा वृन्दावनं चैव सुरम्यं च मनोहरम् ।। ४।
अनुवाद:-
उन्हें जीवित करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा-
हे गोपगण हे बन्धो सुखं तिष्ठ स्थिरो भव ।
रमणं प्रियया सार्धं सुरम्यं रासमण्डलम् ।। ६ ।
तावत्प्रभृति कृष्णस्य पुण्ये वृन्दावने वने ।
अधिष्ठानं च सततं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।। ७ ।।
( ब्रह्मवैवर्तपुराण/ श्रीकृष्णजन्मखण्ड/१२८)
अनुवाद - हे गोपगण ! हे बन्धो ! तुम लोग सुख का उपभोग करते हुए शान्तिपूर्वक यहाँ व्रज में निवास करो, क्योंकि प्रिया के साथ विहार सुरम्य रासमण्डल और वृन्दावन नामक पूण्यवन में श्रीकृष्ण का निरन्तर निवास तब तक ही रहेगा जब तक सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति रहेगी। ६-७।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता हैं कि- लाख ऋषि मुनियों और गान्धारी के शाप के बावजूद भी यदुवंश का अन्त नहीं हो सका। और यहाँ पर यह भी सिद्ध हुआ कि- इस यदुवंश को शाप के मकडजाल में फँसा कर यदुवंश के विनाश की झूठी कहानियाँ रची गई।
हद तो तब हो गई जब पौराणिक कथाकारों ने परमेश्वर श्रीकृष्ण को भी बहेलिए से मरवाकर उनकी परमा प्रभुता को छिन्न-भिन्न करने का अथक प्रयास किया। किन्तु ध्यान रहे ऐसे लोगों को परमप्रभु परमेश्वर कभी क्षमा नहीं करते जो झूठी कथा कहते हैं और लिखते हैं।
इस प्रकार से इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अपने दोनों खण्डों में "श्रीकृष्ण सहित गोप-गोपियों के गोलक गमन" की जानकारी के साथ समाप्त हुआ।
इस प्रसंग का विस्तृत वर्णन- "गोपेश्वर श्रीकृष्णस्य पञ्चंवर्णम्" नामक ग्रन्थ में किया गया है। विस्तृत जानकारी के लिए उस पुस्तक का भी अध्ययन अवश्य करें।
अब इसके अगले अध्याय- (९) में यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्र को विस्तार पूर्वक बताया गया है।
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-अध्याय- नवम् (९)
यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्र।
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य जातियों की मौलिकता (Originality of species ) एवं इसकी उत्पत्ति सिद्धान्त को बताते हुए यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्रों की जानकारी देना है।
इन सभी बातों की क्रमबद्ध जानकारी के लिए इस अध्याय को निम्नलिखित- (५) भागों में विभाजित किया गया है।
भाग- (१) जातियों की मौलिकता (Originality of species ) एवं आभीर जाति की उत्पत्ति।
भाग- (२) भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।
[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति।
[ख]- ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
[ग] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अन्तर-
[१]- जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२]- यज्ञमूलक एवं भक्तिमूलक अन्तर।
[३]- भेदभाव एवं समतामूलक अन्तर।
भाग- (३) यादवों का वंश।
भाग- (४) यादवों का कुल।
भाग- (५) यादवों का गोत्र।
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भाग-(१)
जातियों की मौलिकता (Originality of species ) एवं आभीर जाति की उत्पत्ति-
जातियों का निर्धारण मनुष्य की एक ही तरह के रक्त सम्बन्धी आनुवांशिक प्रवृत्तियों से होता है। जिसमें प्रवृत्तियाँ व्यक्ति की जन्मजात होती हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके जाति समूहों में सञ्चारित होती रहती है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के अनुरूप ही व्यक्ति का स्वभाव और गुण बनता है, जो उस जाति समूह को उसी के अनुरूप कार्य करने को प्रेरित करता है। और इसी गुण विशेष के आधार पर जाति का निर्धारण होता है।
अर्थात् जन्मजात प्रवृत्ति मूलक आचरण और व्यवहार के आधार पर ही किसी व्यक्ति की जाति का निर्धारण होता है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के कारण समाज में अलग-अलग जातियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव और गुण देखें जातें हैं।
इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जाति व्यक्ति समूहों की प्रवृत्ति मूलक पहचान है जो सभी जाति के मनुष्य समूहों में अलग-अलग देखी जाती है। जैसे वणिक समाज का वर्ण "वैश्य" है जिनका वृत्ति (व्यवसाय) खरीद-फरोख्त करना है। और उसी के अनुसार उनकी स्वभावगत गहराई- लोलुपता और मितव्यता है। यही उनकी जातिगत और वर्णगत पहचान है।
कुल मिलाकर कोई भी जाति अपने समूह की सबसे बड़ी इकाई होती है। और यह ऐसे ही नहीं बनती है। इसके लिए जाति को छोटी-छोटी इकाईयों के विकास क्रमों से गुजरना होता है। जैसे -
किसी भी जाति की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति होता है, फिर कई व्यक्तियों के मिलने से एक परिवार बनता है, और कई परिवारों के मिलने से कुल और अनेक कुलों या गोत्रों से वंश और जाति का निर्माण होता है। एक जाति में कई वंश हो सकते हैं। अर्थात् पुनः कई कुलों के संयोग से उस जाति का एक वंश और वर्ण बनता है। और वर्ण जाति का निर्धारण करता है सरल शब्दों में वंश, वर्ण, कुल, गोत्र और परिवार के सामूहिक रूप को जाति कहा जाता है। इसी को जाति का विकास क्रम कहा जाता है।
किसी भी जाति के विकास क्रम में मनुष्यों की प्रवृत्तियों की बहुत बड़ी भूमिका रहती है क्योंकि मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर अन्ततोगत्वा वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण (चयन) करने में सहायक होती हैं।
उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उस जाति का वर्ण निर्धारित होता है।
व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) में निर्धारित हुआ है।
एक समान कर्म करने वाले मनुष्य समुदाय को एकही जाति में निर्धारित किया गया। यही कर्म पीढ़ी- पीढ़ी उनके वंशज भी करने लगे-
अब यह सब कैसे सम्भव होता है। इसको अच्छी तरह समझने के लिए क्रमशः जाति, वर्ण, वंश, कुल और गोत्र को विस्तार से जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आयेगी।
अब इसी क्रम में हमलोग जानेंगे कि आभीर जाति की उत्पत्ति कैसे हुई और किस आधार पर यादवों की जाति "अहीर" हुई़ ? जिसे- आभीर को गोप, गोपाल, ग्वाल, घोष, वल्लभ, इत्यादि नामों से क्यों जाना जाता है ?
तो इस सम्बन्ध में बता दें कि- अहीर जाति की वृत्ति यानी व्यवसाय पूर्वकाल से ही कृषि और पशु पालन रहा है। यह वृत्ति उन्ही प्रवृत्ति वालों में हो सकती है जो निर्भीक और साहसी हों। चुँकि गोपालक अहीर अपने पशुओं को जंगलों, तपती धूप, आँधी तूफान, ठण्ड और बारिश की तमाम प्राकृतिक झञ्झावातों को निर्भीकता पूर्वक झेलते हुए पशुओं के बीच रहते हैं। पशु ही इन अहीरों की सम्पत्ति और पूँजी थी
संसार को पैसा देने वाले पशुपालक अहीर लोग ही थे।
पाश (श्रृंखला) में सर्वप्रथम बाँधने के कारण पशु संज्ञा से अभिहित गाय - भैस ही सम्पत्ति का आधार हुआ करती थी।
पाश( वेणी ) या फन्दा में बाँधकर पशुओं को पालतू बनाया गया ये पशुपालकों की सामर्थ्य थी।
पशु शब्द भारोपीय परिवार का प्राचीन सांस्कृतिक व सामाजिक शब्द है।
प्रोटो-इण्डो-ईरानी भाषा में *páću तथा, प्रोटो-इण्डो-यूरोपियन भाषा का *péḱu शब्द ( " मवेशी, पशुधन " ) का वाचक है।
ईरानी प्राचीन धार्मिक भाषा अवेस्तन में 𐬞𐬀𐬯𐬎 ( pasu ) शब्द पशुधन का वाचक है।
यूरोपीय रोमन भाषा लैटिन में( pecū) - मवेशी " तथा पुरानी अंग्रेज़ी में फ्यु( feoh ) शब्द भी ( " पशुधन, मवेशी " का वाचक है। जिससे अंग्रेज़ी में (फीस- शुल्क) और पैसा शब्द का विकास हुआ।
जर्मन वर्ग का भाषा गॉथिक में फेहु( 𐍆𐌰𐌹𐌷𐌿 ( faihu ), - मवेशी " ) पशु का वाचक है।
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इसी जन्मजात निर्भीक प्रवृत्ति के कारण ही इनको आभीर (अहीर) कहा गया, तथा वृत्ति (व्यवसाय) गोपालन की वजह से इन्हें - गोप, गोपाल, ग्वाल, घोष और वल्लभ कहा गया जो इनकी वृत्ति अर्थात- व्यवसाय मूलक पहचान हैं।
ये तो रही अहीर जाति की वृत्ति एवं प्रवृत्ति मूलक पहचान।
किन्तु जबतक गोप (अहीर) जाति के (Blood relations) रक्त सम्बन्धों को न जान लिया जाए, तब तक अहीर जाति की जानकारी अधूरी ही मानी जाएगी।
इसलिए अहीर (गोप) जाति के रक्त सम्बन्धों को जानना आवश्यक है कि अहीर जाति के मूल में किसका प्रारम्भिक रक्त सम्बन्ध विद्यमान है।
बहुत से जाटों का और गूजरों की भी अहीरों से रक्त सम्बन्धी सन्निकटा है। परन्तु अहीर सबसे प्राचीन और शुद्धत्तम जाति है। जब जाट और गूजर जैसे शब्द भी अस्तित्व में नहीं थे। तब भी अहीर थे- जाट और गूजर भी पशुपालक जातियाँ हैं।
तो इसके लिए बता दें कि अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- (१९३) के श्लोक -(१४ और १५) में मिलता है।
जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यन्ति मद्वंशप्रभवा नराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे ; और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी। तथा मेरे गोप वंश (कुल) के लोग जहाँ भी रहेंगे, वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो। १४-१५।
अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि गायत्री स्वयं अपने को गोप कुल का तथा गोपों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) किस आधार पर कहती हैं ? इसको भी जानना आवश्यक है।
चुँकि भूतल पर देवी गायत्री गोप जाति की सनातनी एवं आदि देवी हैं। इसलिए उन्हें स्वयं तथा अपने गोपों की मूल उत्पत्ति का ज्ञान था कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति गोलोक में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों अर्थात उनके क्लोन( समरूपण) से हुई है। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-5 के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) से है, जिसमें लिखा गया है कि -
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२।
अनुवाद- ४०-४२
• उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा
के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• फिर तो श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त विद्यमान है। इसी लिए स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के श्लोक-(१४) में ज्ञान की देवी गायत्री ने भी गोपों अर्थात् आभीरों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) कहीं हैं।
✴️ आभीर जाति को यदि शब्द व्युत्पत्ति के हिसाब से देखा जाय तो- अभीर शब्द में 'अण्' तद्धित प्रत्यय करने पर आभीर समूह वाची रूप बनता है। अर्थात् आभीर शब्द अभीर शब्द का ही बहुवचन है। 'परन्तु परवर्ती संस्कृत कोश कारों नें आभीरों की गोपालन वृत्ति और उनकी वीरता प्रवृत्ति को दृष्टि-गत करते हुए अभीर और आभीर शब्दों की दो तरह से भिन्न-भिन्न व्युत्पत्तियाँ कर दीं। जैसे-
ईसा पूर्व पाँचवी सदी में कोशकार अमरसिंह ने अपने कोश अमरकोश में अहीरों की प्रवृत्ति वीरता (निडरता) को केन्द्रित करके आभीर शब्द की व्युत्पत्ति की है। नीचे देखें।
आ= समन्तात् + भी=भीयं (भयम्) + र= राति ददाति शत्रुणां हृत्सु = जो चारो तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करता है वह आभीर कहलाता है।
किन्तु वहीं पर अमरसिंह के परवर्ती शब्द कोशकार- तारानाथ नें अपने ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में अभीर- जाति की शब्द व्युत्पत्ति को उनकी वृत्ति यानी व्यवसाय के आधार पर गोपालन को केन्द्रित करके ही सुनिश्चित किया है। नींचे देखें।
"अभिमुखी कृत्य ईरयति गा- इति अभीर = जो सामने मुख करके चारो-ओर से गायें चराता है या उन्हें घेरता है।
अगर देखा जाय तो उपर्युक्त दोनों शब्दकोश में जो अभीर शब्द की व्युत्पत्ति को बताया गया है उनमें बहुत अन्तर नहीं है। क्योंकि एक नें अहीरों की वीरता मूलक प्रवृत्ति (aptitude ) को आधार मानकर शब्द व्युत्पत्ति को दर्शाया है तो वहीं दूसरे नें अहीर जाति को गोपालन वृत्ति अथवा (व्यवसाय) (profation) को आधार मानकर शब्द व्युत्पत्ति को दर्शाया है।
अहीर शब्द के लिए दूसरी जानकारी यह है कि- आभीर का तद्भव रूप आहीर होता है। अब यहाँ पर तद्भव और तत्सम शब्द को जानना आवश्यक हो जाता है। तो इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि - संस्कृत भाषा के वे शब्द जो हिन्दी में अपने वास्तविक रूप में प्रयुक्त होते है, उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं।
ऐसे शब्द, जो संस्कृत और प्राकृत से विकृत होकर हिन्दी में आये हैं,वे 'तद्भव' कहलाते हैं। अर्थात- तद्भव शब्द का मतलब है, जो शब्द संस्कृत से आए हैं, लेकिन उनमें कुछ बदलाव के बाद हिन्दी में प्रयोग होने लगे हैं। जैसे आभीर संस्कृत का शब्द है, किन्तु कालान्तरण में बदलाव हुआ और आभीर शब्द हिन्दी में आहीर शब्द के रूप में प्रयुक्त होने लगा। ऐसे ही तद्भव शब्द के और भी
उदाहरण है जैसे- दूध, दही, अहीर, रतन, बरस, भगत, थन, घर इत्यादि।
किन्तु यहाँ पर हमें अहीर और आभीर, शब्द के बारे में ही विशेष जानकारी देना है कि इनका प्रयोग हिन्दी और संस्कृत ग्रन्थों में कब, कहाँ और कैसे एक ही अर्थ के लिए प्रयुक्त हुआ है।
तो इस सम्बन्ध में सबसे पहले अहीर शब्द के विषय में जानेंगे कि हिन्दी ग्रन्थों में इसका प्रयोग कब और कैसे हुआ। इसके बाद संस्कृत ग्रन्थों में जानेंगे कि आभीर शब्द का प्रयोग गोप, अहीर और यादवों के लिए कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ।
अहीर शब्द का प्रयोग हिन्दी पद्य साहित्यों में कवियों द्वारा बहुतायत रुप से किया गया है। जैसे-
अहीर शब्द का रसखान कवि अपनी रचनाओं में खूब प्रयोग किए हैं-
इसी ग्रन्थ "सुजानरसखान" में अन्यत्र भी रसखान श्रीकृष्ण को अहीर लिखते हैं ।
देस बदेस के देखे नरेसन रीझ की कोऊ न बूझ करैगो।
तातें तिन्हैं तजि जानि गिरयौ गुन सौगुन गाँठि परैगो।
बाँसुरीबारो बड़ो रिझवार है स्याम जु नैसुक ढार ढरैगौ।
लाड़लौ छैल वही तौ अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगौ।।18।
बाँकी धरै कलगी सिर ऊपर बाँसुरी-तान कटै रस बीर के।
कुंडल कान लसैं रसखानि विलोकन तीर अनंग तुनीर के।
डारि ठगौरी गयौ चित चोरि लिए है सबैं सुख सोखि सरीर के।
जात चलावन मो अबला यह कौन कला है भला वे अहीर के।।88।।
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इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण की श्रद्धा में सदैव लीन रहने वाले कवि इशरदास रोहडिया (चारण), जिनका जन्म विक्रम संवत- (1515) में राजस्थान के भादरेस गांँव में हुआ था। जिन्होंने (500) साल पहले दो ग्रन्थ "हरिरस" और "देवयान" लिखे। जिसमें ईशरदासजी द्वारा रचित "हरिरस" के एक दोहे में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि कृष्ण भगवान का जन्म अहीर (यादव) कुल में हुआ था।
नारायण नारायणा! तारण तरण अहीर।
हूँ चारण हरिगुण चवां, सागर भरियो क्षीर।। ५८।
अर्थात् - अहीर जाति में अवतार लेने वाले हे नारायण (श्रीकृष्ण) ! आप जगत के तारण तरण (उद्धारक) हो, मैं चारण आप श्रीहरि के गुणों का वर्णन करता हूँ, जो कि सागर गुणों के क्षीर से भरा हुआ है।५८।
और श्रीकृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि सूरदास जी ने भी श्रीकृष्ण को अहीर कहते हुए उनका स्तवन किया है। सूरसागर के दशमस्कन्ध-(पृष्ठ ४७९) में लिखा है-
चातकी बूंद भई हो हेरत हेरत रही हिराइ ।८१॥जैतश्री॥
सखीरी काके मीत अहीर ।
काहे को भरि भरि ढारति हो इन नैन राह के नीर।।
आपुन पियत पियावत दुहि दुहिं इन धेनुनके क्षीर। निशि वासर छिन नहिं विसरतहै जो यमुना के तीर।। ॥
मेरे हियरे दौं लागति है जारत तनु की चीर । सूरदास प्रभु दुखित जानिकै छांडि गए वे पीर ।।८२॥
सूरसागर.पृष्ठ/(४७९)
दशमस्कन्ध-१०
ये उपर्युक्त सभी उदाहरण श्रीकृष्ण के अहीर जाति का होने के हैं जो हिन्दी साहित्यिक ग्रन्थों में प्रयुक्त हुए सन्दर्भ प्रस्तुत करते हैं। अब हम लोग आभीर शब्द को जानेंगे जो प्राकृत भाषा के आहीर का तत्सम रूप है, वह संस्कृत ग्रन्थों में कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ हैं। इसके साथ ही आभीर (अहीर) शब्द के पर्यायवाची शब्द - गोप, गोपाल और यादव को भी जानेंगे कि पौराणिक ग्रन्थों में अभीर के ही अर्थ में कैसे प्रयुक्त हुए हैं।
सबसे पहले हम गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय -(७) के श्लोक संख्या- (१४) को लेते हैं जिसमें में भगवान श्रीकृष्ण और नन्दबाबा सहित पूरे अहीर समाज के लिए आभीर शब्द का प्रयोग शिशुपाल उस समय करता है जब सन्धि का प्रस्ताव लेकर उद्धव जी शिशुपाल के यहाँ जाते हैं। किन्तु वह प्रस्ताव को ठुकराते हुए उद्धव जी से श्रीकृष्ण के बारे में कहता है कि-
आभीरस्यापि नन्दस्य पूर्वं पुत्रः प्रकीर्तितः।
वसुदेवो मन्यते तं मत्पुत्तोऽयं गतत्रपः।।१४।
प्रद्युम्नं तस्तुतं जित्वा सबलं यादवैः सह।
कुशस्थलीं गमिश्यामि महीं कर्तुमयादवीम्।। १६।
अनुवाद -
• वह (श्रीकृष्ण) पहले नन्द नामक अहीर का भी बेटा कहा जाता था। उसी को वसुदेव लाज- हया छोड़कर अपना पुत्र मानने लगे हैं।१४।
• मैं उसके पुत्र प्रद्युम्न को यादवों तथा सेना सहित जीत कर भूमण्डल को यादवों से शून्य कर देने के लिए कुशस्थली पर चढ़ाई करूँगा।१६।
उपर्युक्त दोनो श्लोक को यदि देखा जाए तो इसमें भगवान श्रीकृष्ण सहित सम्पूर्ण अहीर अथवा यादव समाज के लिए ही आभीर शब्द का प्रयोग किया गया है किसी अन्य के लिए नहीं।
इसी तरह से आभीर शूरमाओं का वर्णन महाभारत के द्रोणपर्व के अध्याय- (२०) के श्लोक - (६) और (७) में मिलता है जो शूरसेन देश से सम्बन्धित थे।
भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाक्षश्च वीर्यवान्।
कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः।।६।
यवनकाम्भोजास्तथा हंसपथाश्च ये।
शूरसेनाश्च दरन्दा मद्रकेकयाः।।७।
अर्थ:- भूतशर्मा , क्षेमशर्मा पराक्रमी कारकाश , कलिंग सिंहल पराच्य (शूर के वंशज शूरवीर आभीर) और दशेरक।६।
अनुवाद - शक यवन ,काम्बोज, हंस -पथ नाम वाले देशों के निवासी और शूरसेन प्रदेश के अभीर (अहीर) दरद, मद्र, केकय ,तथा एवं हाथी सवार घुड़सवार रथी और पैदल सैनिकों के समूह उत्तम कवच धारण करने उस व्यूह के गरुड़ ग्रीवा भाग में खड़े थे।६-७।
इसी तरह से विष्णुपुराण द्वित्तीयाँश के तृतीय अध्याय का श्लोक संख्या- (१६-१७ और १८ ) में अन्य जातियों के साथ-साथ शूर आभीरों का भी वर्णन मिलता है-
"तथापरान्ताः ग्रीवायांसौराष्ट्राः शूराभीरास्तथार्ब्बुदाः। कारूषा माल्यवांश्चैव पारिपात्रनिवासिनः ।१६।
सौवीरा-सैन्धवा हूणाः शाल्वाः शाकलवासिनः। मद्रारामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकादयस्तथा ।१७।
आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सरितां सदा ।
समीपतो महाभागा हृष्टपुष्टजनाकुलाः ।। १८।
अनुवाद - पुण्ड्र, कलिंग, मगध, और दाक्षिणात्य लोग, अपरान्त देशवासी, सौराष्ट्रगण, शूर आभीर और अर्बुदगण, कारूष,मालव और पारियात्रनिवासी, सौवीर, सैन्धव, हूण, साल्व, और कोशल देश वासी तथा माद्र,आराम, अम्बष्ठ, और पारसी गण रहते हैं।१७-१७।
हे महाभाग ! वे लोग सदा आपस में मिलकर रहते हैं और इन्हीं का जलपान करते हैं। उनकी सन्निधि के कारण वे बड़े हृष्ट-पुष्ट रहते हैं।१८।
▪ इसी तरह से महाभारत के उद्योगपर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय में श्लोक संख्या- (१८) और (१९) पर गोपों (अहीरों) को अजेय योद्धा के रूप में वर्णन है-
"मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत् । नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।
अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों (आभीरों) की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं। उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं।।१८।।
इसी तरह से जब भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र की पूजा बन्द करवा दी, तब इसकी सूचना जब इन्द्र को मिली तो वह क्रोध से तिलमिला उठा और भगवान श्रीकृष्ण सहित समस्त अहीर समाज को जो कुछ कहा उसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय -(२५ )के श्लोक - (३) से( ५) में मिलता है। जिसमें इन्द्र ने अपने दूतों से कहा कि-
अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम्
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम्।।३।
वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम्।। ५।
अनुवाद- ओह, इन जंगली ग्वालों (गोपों ) का इतना घमण्ड ! सचमुच यह धन का ही नशा है। भला देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्ण के बल पर उन्होंने मुझ देवराज का अपमान कर डाला।३।
• कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होने पर भी अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्यु का ग्रास है। फिर भी उसी का सहारा लेकर इन अहीरों ने मेरी अवहेलना की है। ५।
उपर्युक्त दो श्लोकों में यदि देखा जाए- तो इनमें गोप शब्द आया है जो अहीर तथा यादव शब्द का पर्यायवाची शब्द है।
इसी तरह से संस्कृत श्लोकों में अहीरों के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग भागवत पुराण स्कन्ध दशम के अध्याय- (६१) के श्लोक (३५) में मिलता है। जिसमें द्यूत- क्रीडा) जूवा खेलते समय रुक्मि बलराम जी को कहता है कि -
नैवाक्षकोविदा यूयं गोपाला वनगोचरा:।
अक्षैर्दीव्यन्ति राजनो बाणैश्च नभवादृशा।।३४।
अनुवाद - बलराम जी आखिर आप लोग वन- वन भटकने वाले गोपाल (ग्वाले) ही तो ठहरे! आप पासा खेलना क्या जाने ? पासों और बाणों से तो केवल राजा लोग ही खेला करते हैं।
इस श्लोक को यदि देखा जाए तो इसमें बलराम जी के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया गया है जो एक साथ- गोप, ग्वाल, अहीर और यादव समाज के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इसलिए गर्गसंहिता के अनुवाद कर्ता, अनुवाद करते हुए गोपाल शब्द को ग्वाल के रूप में लिखते हैं।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को एक ही प्रसंग में एक ही स्थान पर यदुवंश शिरोमणि और गोप (ग्वाला) दोनों शब्दों से सम्बोधित युधिष्ठिर के राजशूय यज्ञ के दरम्यान उस समय किया गया।
जब यज्ञ हेतु सर्वसम्मति श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के लिए चुना गया। किन्तु वहीं पर उपस्थित शिशुपाल इसका विरोध करते हुए भगवान श्रीकृष्ण को यदुवंश शिरोमणि न कहकर उनके लिए ग्वाला (गोप) शब्द से सम्बोधित करते हुए उनका तिरस्कार करता है। यद्यपि शिशुपाल भी स्वयं चेदिवंश का यादव है। परन्तु आज वह गाय नहीं पालता है इस लिए। जिसका वर्णन- श्रीमद् भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय (७४) के श्लोक संख्या - १८, १९, २० और ३४ में कुछ इस प्रकार है -
सदस्याग्र्यार्हणार्हं वै विमृशनतः सभासदः।
नाध्यगच्छन्ननैकान्त्यात् सहदेवस्तदाब्रवीत् ।।१८।
अर्हति ह्यच्युतः श्रैष्ठ्यं भगवान् सात्वतां पतिः।
एष वै देवताः सर्वा देशकालधनादयः।।१९।
यदात्मकमिदं विश्वं क्रतवश्च यदात्मकाः।
अग्निनराहुतयो मन्त्राः सांख्यं योगश्च यत्परः।। २०।
अनुवाद - अब सभासद लोग इस विषय पर विचार करने लगे कि सदस्यों में सबसे पहले किसकी पूजा (अग्रपूजा) होनी चाहिए। जितनी मति, उतने मत। इसलिए सर्वसम्मति से कोई निर्णय न हो सका। ऐसी स्थिति में सहदेव ने कहा। १८
• यदुवंश शिरोमणि भक्त वत्सल भगवान श्रीकृष्ण ही सदस्यों में सर्वश्रेष्ठ और अग्रपूजा के पात्र हैं, क्योंकि यही समस्त देवताओं के रूप में है, और देश, काल, धन आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सब के रूप में भी ये ही हैं।१९।
• यह सारा विश्व श्रीकृष्ण का ही रूप है। समस्त यज्ञ भी श्री कृष्ण स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्णा ही अग्नि, आहुति और मन्त्रों के रूप में है। ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग ये दोनों भी श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए ही हैं।
भगवान श्रीकृष्ण की इतनी प्रशंसा सुनकर शिशुपाल क्रोध से तिलमिला उठा और कहा -
सदस्पतिनतिक्रम्य गोपालः कुलपांसनः।
यथा काकः पुरोडाशं सपर्यां कथमर्हति।। ३४।
अनुवाद - यज्ञ की भूल-चूक को बताने वाले उन सदस्यपत्तियों को छोड़कर यह कुलकलंक ग्वाला (गोपालक) भला, अग्रपूजा का अधिकारी कैसे हो सकता है ? क्या कौवा कभी यज्ञ के पुरोडाश का अधिकारी हो सकता है ? ३४
उपर्युक्त श्लोकों के अनुसार यदि शिशुपाल के कथनों पर विचार किया जाए तो वह श्रीकृष्ण के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया। यहाँ तक तो शिशुपाल का कथन बिल्कुल सही है, क्योंकि - भगवान श्रीकृष्ण- गोप, गोपाल और ग्वाला ही हैं। परन्तु उसकी भाषा में ये शब्द कृष्ण के प्रति क्रोध और घृणा को प्रकट करते हैं। इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में स्वयं अपने को गोप और गोपकुल में जन्म लेने की भी बात कहते हैं जो इस प्रकार है-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है। भगवान श्रीकृष्ण के गोपों में जन्म लेने की बात तुलसीदास नेम विनय पत्रिका में लिखी
सुर-मुनि-बिप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जनम गोपगृह लीन्हो।
अतः शिशुपाल ने भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल या गोप कहा कोई गलत नहीं कही। किन्तु वह भगवान श्रीकृष्ण को कौवा और कुलकलंक कहता है, यहीं उसने गलत कहा जिसके परिणाम स्वरुप भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया।
इसी तरह से पौण्ड्रक ने अपने सभासदों से भी श्रीकृष्ण के लिए गोपबालक और यदुश्रेष्ठ (यादव श्रेष्ठ) नाम से सम्बोधित किया है। जिसका वर्णन हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- ९१ के श्लोक- १४ में कुछ इस तरह से वर्णित की गयी है।
वासुदेवेति मां ब्रूत न तु गोपं यदुत्तमम्।
एकोऽहं वासुदेवो हि हत्वा तं गोपदारकम्।। १४।
अनुवाद - पौण्ड्रक अपने सभासदों से कहता है कि- मुझे ही वासुदेव कहो उस यदुश्रेष्ठ गोप कृष्ण को नहीं। उस गोपबालक को मारकर एकमात्र मैं ही वासुदेव रहूँगा।
इसी तरह से हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- १०० के श्लोक - (२६ और ४१ ) में भगवान श्रीकृष्ण को गोप और यादव दोनों होने की पुष्टि होती है। श्रीकृष्ण जाति से गोप (अहीर)और वंश से यादव हैं। जो पौण्ड्रक, श्रीकृष्ण युद्ध का प्रसंग है। उस युद्ध के बीच पौण्ड्रक भगवान श्रीकृष्ण से कहता है कि-
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह।
भो भो यादव गोपाल इदानिं क्व गतो भवात।। २६।
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।। ४१।
अनुवाद- राजा पौण्ड्रक ने भगवान से कहा- ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गए थे ? ।२६।
• तब भगवान श्रीकृष्ण ने पौण्ड्रक से कहा- राजन ! मैं सर्वदा गोप हूँ, अर्थात प्राणियों का प्राण दान करने वाला हूँ , सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों का शासक हूँ।४१।
देखा जाए तो उपर्युक्त तीनों श्लोकों से तीन बातें और सिद्ध होती है।
• पहली यह कि- राजा पौण्ड्रक, भगवान श्रीकृष्ण को यादव, यादवश्रेष्ठ, गोपबालक और गोप शब्दों से सम्बोधित करता है। इससे सिद्ध होता है कि यादव और गोप (अहीर) एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं।
• दूसरी यह कि- भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने लिए उद्घोषणा करते हुए कहते हैं कि - "मैं सर्वदा गोप हूँ"।
• तीसरी यह कि- गोप ही एक ऐसी जाति है जो सम्पूर्ण लोकों की रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों पर शासन करने वाली है।
✳️ ज्ञात हो - अहीर, गोप, गोपाल, ग्वाल ये सभी यादव शब्द के ही पर्यायवाची शब्द हैं, चाहे इन्हें अहीर कहें, गोप- कहें , गोपाल कहें, ग्वाला कहें, यादव कहें ,सब एक ही बात है।
जैसे भगवान श्रीकृष्ण को तो सभी जानते हैं कि यदुवंश में उत्पन्न होने से उन्हें यादव कहा गया जो उनकी वंश मूलक पहचान है। तथा उनको गोप जाति में जन्म लेने से उन्हें गोप कहा गया जो उनकी जाति रूपी पहचान है। इसी क्रम में उन्हें गोपालन करने से उन्हें गोपाल और ग्वाला कहा गया जो उनकी वृत्ति (व्यवसाय) मूलक पहचान है। इसी तरह से उनकी जाति मूलक पहचान के लिए उन्हें आभीर या अहीर अथवा गोप कहा गया। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को चाहे अहीर कहें, गोप- कहें, गोपाल कहें, ग्वाला कहें, या यादव कहें ,सब एक ही बात है। ये सब भगवान श्री कृष्ण के गुणगत विशेषण हैं।
भगवान श्रीकृष्ण को गोपजाति के साथ यदुवंश में उत्पन्न होने को प्रमाण सहित अध्याय- (५) में बताया गया है।
और जहाँ तक बात रही आभीर जाति की वंश मूलक पहचान की, तो इनके वंशमूलक पहचान को इसी अध्याय के भाग (३) में आगे बताया गया है।
अब हमलोग इसके अगले भाग-(दो) में आभीर जाति के यादवों के वर्ण को जानेंगे। क्योंकि जाति के बाद वर्ण का निर्धारण होता है।
वर्ण की सामाजिक पृष्ठभूमि के लिए पञ्च प्रथा को जानना पहले आवश्यक है।
भाग (२) भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।
इस भाग का मुख्य उद्देश्य भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना को बताते हुए, भगवान विष्णु के "वैष्णव वर्ण" तथा ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति के साथ-साथ दोनों वर्णों में वैचारिक अन्तर और कुछ मूलभूत विशेषताओं की जानकारी देना है। इसके लिए इस अध्याय को तीन शीर्षकों और उपशीर्षकों में विभाजित किया गया है -
(१)- भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।
[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति।
[ख]- ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
[ग] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अन्तर-
[१]- जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२]- यज्ञमूलक एवं भक्तिमूलक अन्तर।
[३]- भेदभाव एवं समतामूलक अन्तर।
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(१)- भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना-
[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति-
देखा जाए तो प्राचीन भारतीय समाज में पञ्च-पञ्चायत और पञ्चजन जैसे शब्द सामाजिक व्यवस्था में पाँच वर्णों की मान्यता व उनके निर्णयों पर आधारित पञ्च- प्रथा के ही सूचक दिग्दर्शक थे। जो परम्परागत रूप से आज भी ग्रामीण समाज में पञ्चों द्वारा की गयी पञ्चायतों के रूप में प्रचलित व विद्यमान हैं।
जिसे भारत की पञ्चायत राज प्रणाली में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। क्योंकि भारत में पञ्चायत राज प्रणाली, भारतीय समाज में पारम्परिक रूप से ग्राम संस्थाओं पर ही आधारित है।
ग्राम पञ्चायत, गाँव की मन्त्रिपरिषद का काम करती है। जिनके सदस्यों का चुनाव जनता करती है और इस जनता मे सभी पाँचों वर्णों के प्रतिनिधि पञ्च के रूप में उपस्थित व अनुमोदित होकर अपना निष्पक्ष निर्णय देते हैं।
इस तरह की संकल्पना हमारे समाज में पूर्व काल से ही रही है। जिसकी पुष्टि- सर्वप्रथम ऋग्वेद से होती है जिसमें बताया गया है कि- पञ्चकृष्टी और पञ्चजन शब्द पाँच वर्णों के प्रतिनिधि व पञ्चों के रूपान्तरण थे।
"आ दधिक्राः शवसा पञ्चकृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान।
सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि ॥१०॥ ऋग्वेद ४/३८/१०
तदद्य वाचः प्रथमं मसीय येनासुराँ अभि देवा असाम।
ऊर्जाद उत यज्ञियास: पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ॥ ऋग्वेद-१०.५३.४।
पदों का अर्थ-
(अद्य) = आज (तद् वाचः प्रथमम्) = उस प्रथम वाणी को (मसीय) = हृदयस्थरूपेण उच्चारण करता हूँ। (येन) = जिससे (देवाः) = और देवगण (असुरान्) = आसुरों को (अभि असाम) = अभिभव करते हैं।
(ऊर्जादः) = पौष्टिक (शक्तिवर्धक) अन्नों का सेवन करने वाले (उत) = और (यज्ञियासः) = यज्ञशील (पञ्चजना:) = पाँच वर्ण (जाति) ! (मम होत्रम्) = मेरे हवन को (जुषध्वम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करो।
उपर्युक्त ऋचाओं में पञ्च' पञ्चकृष्टी' और पञ्च जन' जैसे पद पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।
ऋग्वेद में पञ्चजन: और पञ्चकृष्टी संज्ञा पद बताते हैं कि समाज में पाँच प्रकार के व्यक्ति थे जिनका समाज में वर्चस्व होता था। ऋग्वेद में उल्लिखित पञ्चजना: शब्द पाँच जातियों के प्रतिनिधियों का ही वाचक है।
श्लोक:
ब्राह्मण क्षत्त्रिय वैश्य शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।
तथा स्वतन्त्रा जातिरेका आभीरा च तस्या वर्ण अस्मिन् विश्वे वैष्णवाभिधा।।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, एकादश अध्याय, सात्वतीय टीका)
सारांश (टीका के अनुसार)
यह श्लोक ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड से लिया गया है, जिसमें चातुर्यवर्ण्य व्यवस्था के अतिरिक्त पाँवे वैष्णव वर्ण की महत्ता को भी दर्शाया गया है। श्लोक में कहा गया है कि जैसे समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं, वैसे ही विश्व में वैष्णव नाम का एक स्वतन्त्र और सर्वोच्च वर्ण है।
इस वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत आभीर /आहीर ( यादव अथवा गोप जाति को एक स्वतन्त्र और विशेष जाति के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो गोप (आभीर) जाति भगवान स्वराट्- विष्णु से उत्पन्न होकर उनकी सनातन भक्ति में ही लीन रहती है। वह वर्ण से वैष्णव है।
विस्तृत व्याख्या व भावार्थ:-
यह श्लोक भारतीय दर्शन और सामाजिक संरचना में ब्रह्मा की चातुर्यवर्ण्य व्यवस्था के साथ-साथ स्वराट्- विष्णु से उत्पन्न एक अन्य वर्ण वैष्णव की सार्वभौमिकता , प्राचीनता और उसकी सर्वोपरिता को स्थापित करता है।
शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था को समाज के कार्यों को सुचारु व व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए बनाया गया था, जिसमें प्रत्येक वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शूद्र) की अपनी विशिष्ट भूमिका थी।
एक अन्य वर्ण वैष्णव इन सबसे पृथक और सर्वोच्च था।
समाज में प्राचीन काल से ही वर्ण व्यवस्था के प्रतिनिधित्व के लिए पञ्चायत व्यवस्था भी कायम थी। जो समवेत रूप से सामाजिक समस्याओं के निवारण के लिए सम्मति व निर्णय पारित करती थी।
पञ्च शब्द समाज के पाँच वर्णों के प्रतिनिधीयों को स्वयं में अन्तर्निहित किए हुए है।
वैदिक ऋचाओं में बहुतायत से पञ्चजना, और पञ्चकृष्टय: जैसे पद पाँच वर्णों से सम्बन्धित पञ्चायत व्यवस्था की प्राचीनता को अभिव्यक्त करते है।
जैसे -ऋग्वेद की निम्नलिखित ऋचा वर्णन करती है।
तदद्य वाचः प्रथमं मसीय येनासुराँ अभि देवा असाम।
ऊर्जाद उत यज्ञियास: *पञ्चजना* मम होत्रं जुषध्वम् ॥ (ऋग्वेद-१०/५३/४)
अनुवाद- अग्निदेव कहते हैं- आज उस प्रथम वाणी को हृदयस्थ रूपेण उच्चारण करता हूँ। जिसके प्रभाव से देवगणों ने असुरो को अभिभूत (पराजित) किया था। पौष्टिक अन्नों का ही सेवन करनेवाले पाँच वर्णों के यज्ञ कर्ता व्यक्तियों ! तुम मेरे हवन को प्रीतिपूर्वक सेवन करो।४।
वेदेषु वर्णिता: पञ्चजना: शब्दपद: पञ्चवर्णानां -प्रतिनिधय: सन्ति। ब्रह्मणरुत्पन्ना ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्य शूद्रा: च चत्वारो वर्णा- इति।
तथा पञ्चमो वर्णो जातिर्वा शास्त्रेषु वैष्णववर्णस्य नाम्ना विष्णू रोमकूपेभ्यिति निर्मिता: गोपानां जातिरूपेण वा वर्णितम् अस्ति। तस्य विष्णुना सह निकटसम्बन्धोऽस्ति। अत एव ते सर्वे वैष्णावा भवन्ति।
अनुवाद:-
वेदों में लिखित पञ्चजना विशेषण शब्द पाँच वर्णों के प्रतिनिधि व्यक्तियों का वाचक हैं। चार वर्ण ब्रह्मा से उत्पन्न हुए - चारवर्णों ब्राह्मण- क्षत्रिय- वैश्य और शूद्रों के रूप में वर्णित हैं।
और पाँचवां वर्ण अथवा जाति विष्णु के रोम-कूपों से उत्पन्न गोपों के वैष्णव वर्ण अथवा जाति के रूप में शास्त्रों में वर्णित ही है।
ऋग्वेद में ही पञ्चकृष्टय: पद पाँच वर्णों का प्रतिनिधि है।
वयमग्ने अर्वता वा सुवीर्यं ब्रह्मणा वा चितयेमा जनाँ अति ।
अस्माकं द्युम्नमधि पञ्च कृष्टिषूच्चा स्वर्ण शुशुचीत दुष्टरम् ॥१०॥
ऋ०२/२/१०
अनुवाद:- हे अग्नि ! हम सब गतिशील घोड़े के द्वारा बढ़े हुए बल की वृद्धि से सभी व्यक्तियों को अतिक्रमण करते हुए प्रकाशित हों !
हमारा धन भी पाँच वर्णों में विभाजित ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और पाँचवें वैष्णव वर्ण से भी अधिक ऊँचा हो। सूर्य के समान दैदीप्यमान हम किसी के द्वारा न पराजित हो। (ऋ०२/२/१०)
(अग्ने) = हे अग्नि ! (वयम्) = हम (अर्वता वा) = अर्वत्- तृतीया विभक्ति एकवचन घोड़े द्वारा = (जनान् अति) = सब मनुष्यों को लाँघकर (सुवीर्यम्) = उत्कृष्ट शक्ति को (आ चितयेम) = प्रकाशित करें। (अस्माकम्) = हमारा (द्युम्नम्) = धन बल पञ्चे (कृष्टिषु) ='ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र व वैष्णव रूप' पाँच वर्णों में विभक्त हुए मनुष्यों में (उच्चा) = उच्च हो, (दुस्तरम्) = किसी से पराजित न किया जानेवाला हो और (स्वर्ण/ स्वर्+ न ) = सोना / अथवा सूर्य के समान (अधिशुशुचीत) = अधिक प्रकाशित हो उठे।
पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति।
जैसा कि हम इस बात को पहले ही बता चुका हैं कि- मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण अर्थात् चयन करती है। उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उनका "वर्ण" निर्धारित होता है। अर्थात् व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) निर्धारित हुआ है। ठीक इसी तरह से यादवों यानी गोपों का भी वैष्णव वर्ण निर्धारित हुआ है जिसे पञ्चमवर्ण भी कहा जाता है जो ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य से बिल्कुल अलग एवं स्वतन्त्र है।
किन्तु पुराणकारों ने गोपों के अतिरिक्त निषाद और कायस्थ को पाँचवें वर्ण में सम्मिलित कर दिया। जबकि देखा जाए तो ये पाँचवें वर्ण के नहीं है। जिसमें निषाद तो ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में शूद्र वर्ण के ही अन्तर्गत हैं। ऐसे में एक जाति दो वर्णों को कैसे धारण कर सकती हैं। इसलिए निषाद जाति को पाँचवाँ वर्ण नहीं बल्कि चातुर्वर्ण्य का अवयव ही माना जा सकता है।
इसी तरह से कायस्थ जाति को पञ्चम-वर्ण में स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि कायस्थों के आदि पुरुष चित्रगुप्त ब्रह्मा की काया से उत्पन्न होने से ब्राह्मी सृष्टि के अन्तर्गत ही आते हैं, जो लेखन और गणितीय ज्ञान से सम्पन्न होने के कारण तथा प्राणीयों के चरित्रों का चित्रण करने से भी ये ब्राह्मण वर्ण के ही सन्निकट हैं। अतः कायस्थ जाति भी ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के अंग हैं नकि पञ्चम-वर्ण के।
तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिरकार पञ्चम वर्ण में कौन हो सकता है ? तो इसका जवाब वैष्णव धर्म के प्रथम प्रवर्तक एवं संरक्षक गोपेश्वर श्रीकृष्ण ने ही दिया है जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ के श्लोक- ९२ में कुछ इस प्रकार वर्णित है -
पशुजन्तुषु गौश्चहं चन्दनं काननेषु च ।
तीर्थपूतश्च पूतेषु निःशङ्केषु च वैष्णवः।।९२।
अनुवाद- मैं पशुओं में गाय हूँ, और वनों में चन्दन हूँ। पवित्र स्थानों में तीर्थ हूँ, और निशंकों (अभीरों अथवा निर्भीकों ) में वैष्णव हूँ। ९२
"नि:शङ्क शब्द की व्याकरणिक व्युत्पत्ति विश्लेषण-
नि:शङ्क- निस् निषेध वाची उपसर्ग+ शङ्क = भय (त्रास) भीक:अथवा डर।
नि:शङ्क पुलिङ्ग शब्द है जिसका अर्थ होता है- निर्भीक अथवा निडर।)
नि:शङ्क का मूल अर्थ निर्भीक है और निर्भीक का अर्थ होता जो कभी भयभीत नहीं होता हो।
अत: नि:शङ्क अथवा निर्भीक विशेषण पद आभीर शब्द का ही पर्याय है, जो अहीरो (गोपों) की जातिगत प्रवृत्ति है। आभीर लोग वैष्णव वर्ण तथा धर्म के अनुयायी होते ही हैं।
जैसे-
स्पेनिश और पुर्तगाली भाषा में काष्टा शब्द जाति नस्ल का सूचक है, जो भारोपीय भाषा परिवार के शब्द "काष्टा और कास्ट शब्द से निर्मित वैदिक कृष्टि के रूपान्तरण हैं । संस्कृत में भी कृष्टि शब्द कृषि- फसल (फलस्) और सन्तान आदि का- वाचक है।
स्त्रीयों को खेत और उनके पतियों को किसान मानने के रूपक प्रचीन हैं।
वेदेषु वर्णिता: पञ्चजना: शब्दपद: पञ्चवर्णानां -प्रतिनिधय: सन्ति। ब्रह्मणरुत्पन्ना ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्य शूद्रा: च चत्वारो वर्णा- इति।
तथा पञ्चमो वर्णो जातिर्वा शास्त्रेषु वैष्णववर्णस्य नाम्ना विष्णू रोमकूपेभ्यिति निर्मिता: गोपानां जातिरूपेण वा वर्णितम् अस्ति। तस्य विष्णुना सह निकटसम्बन्धोऽस्ति। अत एव ते सर्वे वैष्णावा भवन्ति।
अनुवाद:-
वेदों में लिखित पञ्चजन पाँच वर्णों के प्रतिनिधि पाँच -वर्ण ही हैं। चार वर्ण ब्रह्मा से उत्पन्न हुए - ब्राह्मण- क्षत्रिय- वैश्य और शूद्रों के रूप में वर्णित हैं। और पाँचवां वर्ण अथवा जाति विष्णु के रोम-कूपों से उत्पन्न गोपों की वैष्णव वर्ण अथवा जाति के रूप में शास्त्रों में वर्णित है।
✳️ चातुर्वर्ण्य की महत्ता कम न हो जाए इसलिए इस महत्वपूर्ण जानकारी को पुरोहितों ने छुपा दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि अधिकांश लोग पञ्चमवर्ण (वैष्णव वर्ण) को नहीं जान सके।
✳️ दूसरी बात यह कि- अधिकांश लोग वर्ण और जाति में अन्तर नहीं जानते हैं, इसलिए अपने वर्ण को ही जाति कहते हैं और जाति को ही वर्ण कहते हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं-
• पहला यह कि या तो उन्हें जाति और वर्ण में अन्तर का ज्ञान नहीं है या-
• दूसरा यह कि पौराणिक ग्रन्थों में अधिकांश लोगों की जातियों का वर्णन नहीं मिलता है, ऐसी स्थिति में वे लोग अपने वर्ण को जाति कहनें लगते हैं। जैसे किसी ब्राह्मण से पूछा जाए कि आपकी जाति क्या है? तो वह अपनी जाति के स्थान पर अपने "वर्ण" ब्राह्मण को ही जाति बताएगा।
इसी तरह से ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के किसी क्षत्रिय वर्ण से यदि पूछा जाए कि आपकी जाति क्या है? तो वह अपनी जाति के स्थान पर अपने वर्ण को ही बताते हुए कहेगा कि मेरी जाति क्षत्रिय है। जबकि उसे पता होना चाहिए कि क्षत्रिय जाति नहीं बल्कि एक वर्ण है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बहुत से लोगों की जातियों का वर्णन पौराणिक ग्रन्थों में नहीं मिलता है जिसके कारण अधिकांश लोग अपने वर्ण को जाति और जाति को ही वर्ण बताने लगते हैं।
आश्चर्य इस बात का है कि पौराणिक या ऐतिहासिक ग्रन्थों में जिन जातियों का स्पष्ट रूप से वर्णन मिलता है वे सभी या तो वैश्य वर्ण के हैं या किसी अन्य वर्ण के हैं। जैसे- तेली, कायस्थ, निषाद, कुम्हार, कोहार, गोंड, लोहार, सोनार, बंजारा, मुण्डा, भुइया, खोंड, भील, मिहाल, बिरहोर, गडावां, कमार, गडावां, कमार, नट, बञ्जारा,( पण्यचर) बड़होर, चेंचू, गड़ाबा, गोंड, होस, जटायु, जुआंग, खरिया, कोल, खोंड, कोया, उरांव, संथाल, सओरा, गद्दी, स्वागंला, इत्यादि और भी बहुत सी जातियां हैं, जिनके सदस्यपत्तियों से यदि उनकी जाति का नाम पूछा जाए तो ये लोग स्पष्ट रूप से अपनी जाति को बता पाते हैं। किन्तु वे लोग जिनकी जाति का अता-पता नहीं, पौराणिक ग्रन्थों या इतिहास में जिनका उल्लेख नहीं है, वे ही लोग अपनी जाति के स्थान पर अपने वर्ण को बताया करते हैं।
किन्तु यहाँ पर पाठक गणों को यह संशय अवश्य हुआ होगा कि उपर्युक्त जातियों में "अहीर" जाति का नाम क्यों नहीं लिया गया ? तो इस सम्बन्ध में बताना चाहुँगा कि - उपर्युक्त सभी जातियाँ, जिसमें ब्राहण भी आते हैं वे सभी ब्रह्माजी की सृष्टि रचना के चातुर्वर्ण्य की जातियाँ हैं। जबकि अहीर जाति एक ऐसी जाति है जो ब्रह्माजी की सृष्टि रचना नहीं है। इस बात को पहले ही जाति वाले प्रकरण में तथा अध्याय (चार) में पहले ही बताया जा चुका है कि गोपों यानी आभीरों की उत्पत्ति गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के रोमकूपों अर्थात उनके क्लोन से हुई है। इस लिए ब्रह्माजी से उत्पन्न जातियों में अहीर जाति का नाम नहीं लिया गया है।
✳️ ज्ञात हो कि भगवान श्रीकृष्ण जब भी भूतल का भार उतारने के लिए भूमि पर अवतरित होते हैं, तो वें इसी स्वतन्त्र और निर्भीक "अहीर" जाति के यादव वंश के गोपकुल में ही अवतरित होते हैं। इसकी पुष्टि- हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -(५८) से होती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
(भगवान श्रीकृष्ण को गोपकुल में जन्म लेने की विस्तृत जानकारी इस पुस्तक के अध्याय (५,६) में दी गई है वहाँ से पाठकगण इस प्रसंग पर और अधिक जानकारी ले सकते हैं।)
[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति।
जैसा कि हम इस बात को पहले ही बता चुका हैं कि- मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण अर्थात् चयन करती है। उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उनका "वर्ण" निर्धारित होता है। अर्थात् व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) निर्धारित हुआ है। ठीक इसी तरह से यादवों यानी गोपों का भी वैष्णव वर्ण निर्धारित हुआ है जिसे पञ्चमवर्ण भी कहा जाता है जो ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य से बिल्कुल अलग एवं स्वतन्त्र है।
किन्तु पुराणकारों ने गोपों के अतिरिक्त निषाद और कायस्थ को पाँचवें वर्ण में सम्मिलित कर दिया। जबकि देखा जाए तो ये पाँचवें वर्ण के नहीं है। जिसमें निषाद तो ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में शूद्र वर्ण के ही अन्तर्गत हैं। ऐसे में एक जाति दो वर्णों को कैसे धारण कर सकती हैं। इसलिए निषाद जाति को पाँचवाँ वर्ण नहीं बल्कि चातुर्वर्ण्य का अवयव ही माना जा सकता है।
इसी तरह से कायस्थ जाति को पञ्चम-वर्ण में स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि कायस्थों के आदि पुरुष चित्रगुप्त ब्रह्मा की काया से उत्पन्न होने से ब्राह्मी सृष्टि के अन्तर्गत ही आते हैं, जो लेखन और गणितीय ज्ञान से सम्पन्न होने के कारण तथा प्राणीयों के चरित्रों का चित्रण करने से भी ये ब्राह्मण वर्ण के ही हैं। अतः कायस्थ जाति भी ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के अंग हैं ना की पञ्चम-वर्ण के।
तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिरकार पञ्चम वर्ण में कौन हो सकता है ? तो इसका जवाब वैष्णव धर्म के प्रथम प्रवर्तक एवं संरक्षक गोपेश्वर श्रीकृष्ण ने ही दिया है जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ के श्लोक- ९२ में कुछ इस प्रकार वर्णित है -
पशुजन्तुषु गौश्चहं चन्दनं काननेषु च ।
तीर्थपूतश्च पूतेषु निःशङ्केषु च वैष्णवः।।९२।
अनुवाद- मैं पशुओं में गाय हूँ, और वनों में चन्दन हूँ। पवित्र स्थानों में तीर्थ हूँ, और निशंकों (अभीरों अथवा निर्भीकों ) में वैष्णव हूँ। ९२
"नि:शङ्क शब्द की व्याकरणिक व्युत्पत्ति विश्लेषण-
नि:शङ्क- निस् निषेध वाची उपसर्ग+ शङ्क = भय (त्रास) भीक:अथवा डर।
नि:शङ्क पुलिङ्ग शब्द है जिसका अर्थ होता है- निर्भीक अथवा निडर।)
नि:शङ्क का मूल अर्थ निर्भीक है और निर्भीक का अर्थ होता जो कभी भयभीत नहीं होता हो।
अत: नि:शङ्क अथवा निर्भीक विशेषण पद आभीर शब्द का ही पर्याय है, जो अहीरो (गोपों) की जातिगत प्रवृत्ति है। आभीर लोग वैष्णव वर्ण तथा धर्म के अनुयायी होते ही हैं।
अत: ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्मखण्ड का उपरोक्त श्लोक गोप जाति की निर्भीकता प्रवृत्ति का भी संकेत करता है।
अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि- "वैष्णव वर्ण" की उत्पत्ति श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) से हुई है। जिसमें केवल गोप आते हैं। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के एकादश (११) -अध्याय के श्लोक संख्या (४3) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।
स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।।४३।
"अनुवाद:- ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र इन चार वर्णों के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाति अथवा वर्ण इस संसार में प्रसिद्ध है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। जो स्वराट
विष्णु (श्रीकृष्ण) से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न होने से वैष्णव संज्ञा से नामित है।४३।
जो सभी वर्णों में श्रेष्ठ भी है इस बात की पुष्टि - पद्म पुराण के उत्तराखण्ड के अध्याय(६८) श्लोक संख्या १-२-३ से होती है जिसमें भगवान शिव नारद से कहते हैं।
महेश्वर उवाच-
शृणु नारद! वक्ष्यामि वैष्णवानां च लक्षणम् यच्छ्रुत्वा मुच्यते लोको ब्रह्महत्यादिपातकात् ।१।
तेषां वै लक्षणं यादृक्स्वरूपं यादृशं भवेत् ।तादृशंमुनिशार्दूलशृणु त्वं वच्मिसाम्प्रतम्।२।
विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते। सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णवःश्रेष्ठ उच्यते ।३।
अनुवाद:-
१-महेश्वर- उवाच ! हे नारद , सुनो, मैं तुम्हें वैष्णव का लक्षण बतलाता हूँ। जिन्हें सुनने से लोग ब्रह्म- हत्या जैसे पाप से मुक्त हो जाते हैं।१।
२-वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ ! उसे तुम सुनो ।२।
३-चूँकि वह विराट विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न होने से ही वैष्णव कहलाते है; और सभी वर्णों मे वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता हैं।३।
यदि वैष्णव शब्द की व्युत्पत्ति को व्याकरणिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो "शब्द कल्पद्रुम" में विष्णु से ही वैष्णव शब्द की व्यत्पत्ति बताई गई है-
विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण्- वैष्णव - तथा विष्णु-उपासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा गायत्री आदि।
अर्थात् विष्णु देवता से सम्बन्धित वैष्णव स्त्रीलिंग में (ङीप्) प्रत्यय होने पर वैष्णवी शब्द बना है जो- दुर्गा, गायत्री आदि का वाचक है।
अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि- विष्णु से वैष्णव पद ( विभक्ति युक्त शब्द ) और वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति होती है, जिसे पञ्चमवर्ण के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें केवल- गोप, (अहीर, यादव) जाति ही आती हैं बाकी कोई नहीं।
अब हमलोग इसी क्रम में जानेंगे कि ब्रह्माजी के "चातुर्वर्ण्य" की उत्पत्ति कैसे हुई ?
[ख]- ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य" की उत्पत्ति।
सर्वविदित है कि देवो के पितामह ब्रह्माजी से "चातुर्यवण्य" की उत्पत्ति हुई। इस बात की पुष्टि -विष्णु पुराण के प्रथमांश के छठे अध्याय के श्लोक- (६) से होती है। जिसमें बताया गया है कि
ब्रह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम। पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः।।
अनुवाद:-
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को उत्पन्न किया। इनमें ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय वक्षःस्थल से, वैश्य जाँघों से और शूद्र ब्रह्माजी के पैरों से उत्पन्न हुए।।६।
फिर इसी जन्मगत आधार पर ब्राह्मी वर्ण- व्यवस्था भी चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,और शूद्र) में विभाजित हो गई। इस बात की पुष्टि-
पद्मपुराण सृष्टिखण्ड के अध्याय-(३) के श्लोक संख्या-(१३०) से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
"ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम। पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः।१३०।
अनुवाद- पुलस्त्यजी बोले- कुरुश्रेष्ठ ! सृष्टि की इच्छा रखने वाले ब्रह्माजी ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को उत्पन्न किया। इनमें ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय वक्षःस्थल से, वैश्य जाँघों से और शूद्र ब्रह्माजी के पैरों से उत्पन्न हुए।१३०।
इस सम्बन्ध में अत्रि संहिता का (१४० वाँ) श्लोक भी यही सूचित करता है कि -
"जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते॥१४०
अनुवाद:- ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हाेने वाला जन्म से ही 'ब्राह्मण' कहलाता है। फिर उपनयन संस्कार हाे जाने पर वह 'द्विज' कहलाता है और विद्या प्राप्त कर लेने पर वही ब्राह्मण 'विप्र' कहलाता है। इन तीनाें नामाें से युक्त हुआ ब्राह्मण 'श्राेत्रिय' कहा जाता है।१४०।
(विशेष:- श्रुति (वेद) के ज्ञाता ब्राह्मण ही श्रोत्रिय कहलाता है।)
ज्ञात हो ब्रह्माजी के इन चारों वर्णों की उत्पत्ति यज्ञ के सम्पादन के लिए ही हुई है। इस बात की पुष्टि- विष्णुपुराण- प्रथमांशः/अध्यायः (६) के श्लोक- ७ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद्ब्रह्या चकार वै ।
चातुर्वर्ण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥७॥
अनुवाद:-तदनन्तर, यज्ञ के साधन-भूत चातुर्वर्ण्य को ब्रह्मा ने यज्ञ-निष्पत्ति (उत्पादन) के लिए बनाया।७।
श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हे अर्जुन !
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।११।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय (३)
अनुवाद:-
प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि के आदिकाल में यज्ञ-कर्मों के विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि- चार वर्णों ) की रचना करके (उनसे, प्रधानतया मनुष्यों से) कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवों की वृद्धि करो
और वे देवतालोग तुमलोगों को उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।११।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।१२।
अनुवाद:-
यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण प्रजा को इच्छित भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।१२
विष्णु पुराण और श्रीमद्भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि यज्ञ क्रियाऐं केवल देवों को प्रसन्न करने के लिए ही हैं। यज्ञ करने से किसी को आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। केवल स्वर्ग और इच्छित भोग ही प्राप्त होते हैं। वह भी देवों के द्वारा-
इसके अतिरिक्त इस खण्ड के सभी उपर्युक्त श्लोकों एवं साक्ष्यों से यह भी सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण यानी स्वराट्- विष्णु के रोमकूपों से गोपों की उत्पत्ति हुई, और उनकी निर्भीक प्रवृत्ति के कारण ही इन्हें आभीर कहा गया। इनकी यहीं निर्भीक प्रवृत्ति ने ही गोपालन और कृषि वृत्ति यानी व्यवसाय का वरण किया जिसके परिणाम स्वरूप उनका वर्ण- वैष्णव वर्ण निर्धारित हुआ। जो उत्पत्ति विशेष के कारण ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य से पृथक हैं।
अब हमलोग जानेंगे कि इन दोनों वर्णों (वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य) में मूलभूत अन्तर और विशेषताएँ क्या हैं ?
[ग] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अन्तर-
इस भाग का मुख्य उद्देश्य ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य और विष्णुजी के वैष्णव वर्ण में मूलभूत अन्तरों एवं उनकी तुलनात्मक विशेषताओं को बताना है। इस प्रसंग को क्रमबद्ध तरीके से जानने के लिए निम्नलिखित उप-शीर्षकों में विभाजित किया गया है -
[१]- जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२]- यज्ञमूलक एवं भक्तिमूलक अन्तर।
[३]- भेदभाव एवं समतामूलक अन्तर।
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[१] जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर-
▪️"ब्राह्मी वर्णव्यवस्था जन्मगत है"-
ज्ञात हो कि-चातुर्वर्ण्य व्यवस्था- ब्रह्माजी की सृष्टि रचना है, जिसमें जन्म के आधार पर वर्ण- विभाजन की एक विचित्र (अजीब) सामाजिक व्यवस्था स्थापित होती है। जिसमें रूढ़िवादी पुरोहितों की मान्यता है कि पूर्वजन्म के पुण्य- पाप कर्मों के अनुसार ही व्यक्ति को ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्रों के घर में जन्म मिलता है।
यदि व्यक्ति ने अच्छे कर्म किए हैं तो ब्राह्मण के घर में जन्म मिलेगा और बुरे कर्म किए हैं तो शूद्र के घर में जन्म मिलेगा। कर्मों के अच्छे-बुरे अनुपात से ही व्यक्ति को कभी वैश्य तो कभी क्षत्रिय के घर में जन्म मिलता है। परन्तु पुरोहितों का ये सिद्धान्त दोषपूर्ण है- क्योंकि जन्म से व्यक्ति की महानता का निश्चय नहीं होता है। मानव जाति में मनुष्य के व्यक्तित्व (व्यक्ति के बाह्य और आन्तरिक गुणों) का निर्माण उसका परिवेश और माता-पिता के आनुवांशिक विशेषताएँ ही करती हैं।
यह तो समाज में प्रत्यक्ष देखा जाता है कि सभी ब्राह्मण जन्म से ही सात्विक प्रवृत्ति वाले और ईश्वर चिन्तक नहीं होते हैं।
ब्राह्मणों में भी बहुतायत लोग तामसिक व राजसिक प्रवृत्ति वाले होते हैं। इसी प्रकार स्वयं को परम्परागत रूप से क्षत्रिय कहने वाले लोगों की सन्तानें भी वीर तथा साहसी नहीं होतीं ।
वैश्य और शूद्रों के विषय में भी इसी प्रकार कहा जा सकता है। हर समाज में हर तरह के व्यक्ति पैदा होते हैं। दो चार व्यक्तियों से ही किसी समाज की प्रवृत्तियों का निर्धारण नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह कि व्यक्ति की प्रवृत्तियों का निर्धारण अथवा निश्चय व्यक्ति की वृत्ति (व्यवसाय) एवं उसके कर्म से होता हैं न कि जन्म से।
कुछ प्रवृत्तियों का निर्धारण माता-पिता के आनुवांशिक गुणों तथा कुछ का पूर्वजन्म के कर्म- संस्कारों से होता है।
इसलिए यह कहना महती मूर्खता है कि पूर्व जन्म के पाप और पुण्य कर्मों के अनुसार ही व्यक्ति को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के घर में जन्म मिलता है।
कुल मिलाकर - कहने का तात्पर्य यह है कि- ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से जन्मगत अथवा जन्म के आधार पर भेद करते हुए सामाजिक वर्ण व्यवस्था लागू करती है जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार प्रकार के वर्ग समूह हैं। जबकि इसके विपरित वैष्णवी वर्ण व्यवस्था का आधार जन्मगत नहीं बल्कि कर्मगत है। इसके लिए नींचे देखें-
▪️ वैष्णवी वर्ण व्यवस्था का आधार जन्मगत नहीं कर्मगत है-
ब्राह्मी वर्णव्यवस्था के जन्मगत आधार के विपरीत वैष्णव वर्ण में गुण' प्रवृति (स्वभाव) और कर्म के आधार पर ही वर्ण विभाजन की सामाजिक व्यवस्था स्थापित होती है। और यही सत्य और न्याय सम्मत भी है। क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता एक वैष्णव ग्रन्थ है जिसमें वर्ण व्यवस्था को कर्म गत ही माना है जन्मगत नहीं। इसकी पुष्टि- श्रीमद्भगवद्गीता -(४/१३) से होती है जिसमें लिखा गया है कि -
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्"।।१३।।
अर्थात्- मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के आधार पर विभागपूर्वक चारों वर्णों की रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होने पर भी मुझ अव्यय परमेश्वर को तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मों के फलों में मेरी कोई स्पृहा (इच्छा) नहीं है, इसलिये मुझे कर्म कभी लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान लेता है, वह भी कभी कर्मों से नहीं बँधता है ।१३
✳️ ज्ञात हो- उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि- ब्रह्मा ने सर्वप्रथम श्रीकृष्ण के निर्देश पर निश्चय ही गुण और कर्म के आधार पर ही व्यक्तियों का वर्ण निर्धारित किया होगा।
अत: इस सृष्टि में ब्रह्मा के नाम से ही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था है न की श्रीकृष्ण के नाम से। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण उपादान कारण हैं और ब्रह्मा निमित्त कारण हैं। जो बाद के समय में यह व्यवस्था कर्मगत के स्थान पर जन्मगत हो गई।
जबकि देखा जाए तो श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था ही
सत्य है क्योंकि इच्छाओं से प्रेरित कर्म ही फलदायी होते हैं। और उन अच्छे-बुरे फलों को भोगने के लिए पुनर्जन्म होता है। और यह जन्म व्यक्ति की इच्छा मूलक प्रवृतियों के अनुरूप विभिन्न योनियों (शरीरों) में होता है। यहीं इस संसार का सनातन नियम है।
"कर्म का फल" फलों का भोग।
जीवन जगत् का है संयोग"
कर्मा: फलानि उत्पादयन्ते तानि फलानि परिणामानि रूपाणि भोक्तुं प्राणीनि जन्मानि लभन्ते ये च जायन्ते ते अवश्यं म्रियन्ते जन्ममरणं च जगत्।
अर्थ:- कर्म फल उत्पन्न करते हैं और उन फलों, परिणामों और रूपों का भोग अथवा आस्वादन करने के लिए प्राणियों का जन्म होता है और जो पैदा होते हैं उन्हें मरना ही पड़ता है, जन्म और मृत्यु ही संसार है।
देखा जाए तो भक्ति- ज्ञानयोग और कर्मयोग के मध्य की अवस्था है। यह सच्चे अर्थों में निष्काम कर्मयोग है। अर्थात् ईश्वर का ईश्वर को समर्पित कर्म ही भक्ति है- श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश है। इसके लिए नींचे श्लोक- देखें।
'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।2.47।
भावार्थ:-
भगवान कृष्ण कहते हैं ! तेरा कर्म में ही अधिकार है उसके फल में नहीं। अर्थात् (कर्म मार्ग में) कर्म करते हुए तेरा फल में कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्थामें कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिये।
यदि कर्मफल में तेरी तृष्णा (इच्छा) होगी तो तू कर्मफल प्राप्ति का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफल प्राप्ति का कारण तू मत बन।
क्योंकि जब मनुष्य कर्मफल की कामना (इच्छा) से प्रेरित होकर कर्म करने लगता है तब वह कर्मफलरूप पुनर्जन्म का हेतु बन ही जाता है।
इसी सिद्धान्त के अनुसार वैष्णव वर्ण व्यवस्था भी स्थापित है जो जन्मगत आधार पर न होकर कर्मगत आधार पर स्थापित है।
तात्पर्य यह कि जाति जन्म पर सुनिश्चित होती है और वर्ण स्वभाव कर्म और गुण पर सुनिश्चित होता है।
अब हमलोग ब्राह्मी और वैष्णवी वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत यज्ञ मूलक एवं भक्ति मूलक अन्तर को जानेंगे।
[२] यज्ञ मूलक एवं भक्ति मूलक अन्तर-
▪️ ब्राह्मी वर्णव्यवस्था पूरी तरह से कर्मकाण्डों एवं यज्ञों पर आधारित है-
जिसमें कर्मकाण्ड एवं यज्ञ का विधान ब्राह्मण प्रधान चारों वर्णों के लिए ही है। इस बात को पूर्व में बताया जा चुका है कि- चारों वर्णों की उत्पत्ति यज्ञ के सम्पादन के लिए ही हुई है। जिसकी पुष्टि- विष्णुपुराण- प्रथमांशः/अध्यायः (६) के श्लोक- ७ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद्ब्रह्या चकार वै ।
चातुर्वर्ण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥७॥
अनुवाद:-तदनन्तर, यज्ञ के साधन-भूत चातुर्वर्ण्य को ब्रह्मा ने यज्ञ-निष्पत्ति (उत्पादन) के लिए बनाया।। ७।।
वास्तव में देखा जाए तो ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में भक्ति-भजन की अपेक्षा कर्मकाण्डों एवं यज्ञों पर विशेष महत्व दिया जाता है। इनके कर्मकाण्डी यज्ञों में सर्वप्रथम पशु बलि का प्रावधान इन्द्र के द्वारा किए गए यज्ञों से ही प्रारम्भ हुआ था। इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण /अध्यायः १४३ के प्रमुख श्लोकों से होती है। जिसमें ऋषियों ने इन्द्र से पूछा कि -
"सूत उवाच।
"ऋषय ऊचुः!
कथं त्रेतायुगमुखे यज्ञस्यासीत् प्रवर्तनम्।
पूर्वे स्वायम्भुवे स्वर्गे यथावत् प्रब्रवीहि नः।१।
अन्तर्हितायां सन्ध्यायां सार्द्धं कृतयुगेन हि।
कालाख्यायां प्रवृत्तायां प्राप्ते त्रेतायुगे तथा।२।
औषधीषु च जातासु प्रवृत्ते वृष्टिसर्जने।
प्रतिष्ठितायां वार्तायां ग्रामेषु च परेषु च।।३।
वर्णाश्रमप्रतिष्ठान्नं कृत्वा मन्त्रैश्च तैः पुनः।
संहितास्तु सुसंहृत्य कथं यज्ञः प्रवर्त्तितः।।४।
एतच्छ्रुत्वाब्रवीत् सूतः श्रूयतां तत्प्रचोदितम्-
अनुवाद- १-४
ऋषियों ने पूछ— सूतजी ! पूर्वकाल में स्वायम्भुवमनु के
कार्य काल में त्रेतायुग के प्रारम्भ में किस प्रकार यज्ञ की प्रवृत्ति हुई थी ?
जब कृतयुग (सत्युग) के साथ उसकी सन्ध्या (तथा सन्ध्यांश) दोनों अन्तर्हित हो गये, तब कालक्रमानुसार त्रेतायुग की सन्धि प्राप्त हुई।
उस समय वृष्टि (वर्षा) होनेपर ओषधियाँ उत्पन्न हुई तथा ग्रामों एवं नगरों में वार्तावृत्ति (बाजार) की स्थापना हो गयी। उसके बाद वर्णाश्रम की स्थापना करके परम्परागत रूप से आये हुए मन्त्रोंद्वारा पुनः संहिताओं को एकत्र कर यज्ञ की प्रथा किस प्रकार प्रचलित हुई ?
हम लोगों के प्रति इसका यथार्थरूप से वर्णन कीजिये। यह सुनकर सूतजी ने कहा 'आपलोगों के प्रश्नानुसार कह रहा हूँ, सुनिये ॥1- 4॥
"सूत उवाच !
मन्त्रान्वै योजयित्वा तु इहामुत्र च कर्म्मसु।
तथा विश्वभुगिन्द्रस्तु यज्ञं प्रावर्त्तयत्प्रभुः।।५।
दैवतैः सह संहृत्य सर्वसाधनसंवृतः।
तस्याश्वमेधे वितते समाजग्मुर्महर्षयः।।६।
यज्ञकर्म्मण्यवर्तन्त कर्म्मण्यग्रे तथर्त्विजः।
हूयमाने देवहोत्रे अग्नौ बहुविधं हविः।।७।
सम्प्रतीतेषु देवेषु सामगेषु च सुस्वरम्।
परिक्रान्तेषु लघुषु अध्वर्युपुरुषेषु च।।८।
आलब्धेषु च मध्ये तु तथा पशुगुणेषु वै।
आहूतेषु च देवेषु यज्ञभुक्षु ततस्तदा।।९।
य इन्द्रियात्मका देवा यज्ञभागभुजस्तु ते।
तान्यजन्ति तदा देवाः कल्पादिषु भवन्ति ये।।१०।
अध्वर्युप्रैषकाले तु व्युत्थिता ऋषयस्तथा
महर्षयश्च तान् द्रृष्ट्वा दीनान् पशुगणांस्तदा।।११।
विश्वभुजन्तेत्वपृच्छन् कथं यज्ञविधिस्तवः।
अधर्मो बलवानेष हिंसा धर्मेप्सया तव।
नवः पशुविधिस्त्वष्टस्तव यज्ञे सुरोत्तम!।।१२।
अधर्मा धर्म्मघाताय प्रारब्धः पशुभिस्त्वया।
नायं धर्मो ह्यधर्मोऽयं न हिंसा धर्म्म उच्यते।।१३।
आगमेन भवान् धर्मं प्रकरोतु यदीच्छति।
विधिद्रृष्टेन यज्ञेन धर्मेणाव्यसनेन तु।
यज्ञबीजैः सुरश्रेष्ठ! त्रिवर्गपरिमोषितैः।।१४।
एष यज्ञो महानिन्द्रः स्वयम्भुविहितः पुनः।
एवं विश्वभुगिन्द्रस्तु ऋषिभिस्तत्वदर्शिभिः।।१५।
उक्तो न प्रति जग्राह मानमोहसमन्वितः।।
तेषां विवादः सुमहान् जज्ञे इन्द्रमहर्षिणम्।
जङ्गमैः स्थावरैः केन यष्टव्यमिति चोच्यते।।१६।
अनुवाद- ५-१६
सूत जी कहते हैं- ऋषियो ! विश्व-भोक्ता सामर्थ्यशाली इन्द्र ने इहलौकिक तथा पारलौकिक कर्मों में मन्त्रों को प्रयुक्त कर देवताओं के साथ सम्पूर्ण साधनों से सम्पन्न हो यज्ञ प्रारम्भ किया।
उनके उस अश्वमेध यज्ञ के आरम्भ होने पर उसमें महर्षिगण उपस्थित हुए। उस यज्ञ-कर्म में ऋत्विग्गण यज्ञक्रिया को आगे बढ़ा रहे थे। उस समय सर्वप्रथम अग्नि में अनेकों प्रकार के हवनीय पदार्थ डाले जा रहे थे, सामगान करनेवाले देवगण विश्वास पूर्वक ऊँचे स्वर से सामगान कर रहे थे, अध्वर्युगण धीमे स्वर से मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे।
पशुओं का समूह मण्डप के मध्यभाग में लाया जा रहा था, यज्ञभोक्ता देवों का आवाहन हो चुका था। जो इन्द्रियात्मक देव तथा जो यज्ञभागके भोक्ता थे और जो प्रत्येक कल्पके आदिमें उत्पन्न होनेवाले आदिदेव (पूर्वदेव) थे, देवगण उन्हीं अपने पूर्वजों का यजन कर रहे थे।
इसी बीच जब यजुर्वेद के अध्येता एवं हवनकर्ता ऋषिगण पशु बलि का उपक्रम करने लगे, तब यूथ के यूथ (समूह के समूह) ऋषि तथा महर्षि उन दीन पशुओं को देखकर उठ खड़े हुए और वे विश्वभुग् नाम के विश्वभोक्ता इन्द्र से पूछने लगे 'देवराज आपके यज्ञ की यह कैसी विधि है ? आप धर्म-प्राप्ति की अभिलाषा से जो जीव-हिंसा के लिये उद्यत हैं, यह महान् अधर्म है।
सुरश्रेष्ठ ! आपके यज्ञ में पशु हिंसा की यह नवीन विधि दीख रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप पशु-हिंसा के व्याज से धर्म का विनाश करने के लिये अधर्म करने पर तुले हुए हैं।
यह धर्म नहीं है। यह सरासर अधर्म है। जीव-हिंसा धर्म नहीं कही जाती इसलिये यदि आप धर्म करना चाहते हैं तो आगमविहित धर्म का अनुष्ठान कीजिये।
सुरश्रेष्ठ! आगम विहित विधि के अनुसार किये हुए यज्ञ और दुर्व्यसनरहित धर्म के पालन से यज्ञके बीजभूत त्रिवर्ग (नित्य धर्म, अर्थ, काम) की प्राप्ति होती है। इन्द्र ! पूर्वकाल में ब्रह्मा ने इसी को महान् यज्ञ बतलाया है।'
तत्त्वदर्शी ऋषियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी विश्वभोक्ता इन्द्र ने उनकी बातों को अङ्गीकार नहीं किया; क्योंकि उस समय वे अभिमान और मोह से भरे हुए थे।
तत्त्वदर्शी ऋषियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी विश्वभोक्ता इन्द्र ने उनकी बातों को अङ्गीकार नहीं किया; क्योंकि उस समय वे अभिमान और मोह से भरे हुए थे।
फिर तो इन्द्र और उन महर्षियों के बीच 'स्थावरों या जङ्गमों में से किससे यज्ञानुष्ठान करना चाहिये'- इस बात को लेकर वह अत्यन्त महान् विवाद उठ खड़ा हुआ।१५-१६।
किन्तु इन्द्र शक्ति सम्पन्न होने की वजह से ऋषियों की एक भी बात नहीं मानी और यज्ञों में पशु बलि को परम्परागत के रूप में जारी रखा। तभी से देव यज्ञों में पशुबलि की परम्परा प्रारम्भ हुई। जिसमें पशुओं के माँस को भी खाना परम्परागत रूप से स्वीकार किया गया। जिसमें द्विजों (ब्राह्मणों) को माँस खाने की अनिवार्यता को व्यासस्मृति के अध्याय- (तीन) के श्लोक- (५४) में बड़े ही स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि -
"क्रतौ श्राद्धे नियुक्तो वा अनश्नन् पतित द्विज:। मृगयोपार्जितं मासमभ्यर्च पितृदेवता:।५४।
अनुवाद:- यज्ञ और श्राद्ध में जो द्विज माँस नहीं खाता, वह पतित हो जाता है। मृगया (शिकार) से उपार्जित माँस से पितर और देवों की अभ्यर्चना (पूजा) करनी चाहिए।५४।
ऐसी ही बात कूर्मपुराण-उत्तरभाग के अध्याय (१७) के श्लोक (३६ से ४१) में भी कही गई है कि -
मत्स्यान् स शल्कान् भुत्र्जीयात् मासम् रौरवम् एव च । निवेद्य देवताभ्यः तु ब्राह्मणेभ्यः तु न अन्यथा ।।३६।।
मयूरं तित्तिरं चैव कपोतं च कपिञ्जलम्।
वाध्रीणसं वकं भक्ष्यं मीनहंसपराजिता:।।३७।।
शफरम् सिंहतुण्डम् च तथा पाठीनरोहितौ ।
मत्स्याः च एते समुद्दिष्टा भक्षणाय द्विजोत्तमाः।।३८।।
प्रोक्षितं भक्षयेदेषां मांसं च द्विजकाम्यया।
यथाविधि नियुक्तं च प्राणानामपि चात्यये।।३९।।
भक्षयेन्नैव मांसानि शेषभोजी न लिप्यते।
औषधार्थमशक्तौ वां नियोगाद् यजकारणात्।। ४०।।
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे दैवे वा मांसमूत्सृजेत ।
यावन्ति पशुरोमाणि तावतो नरकान् व्रजेत् ॥४१॥
अनुवाद- ३६ से ४१
• शल्क मछली और रूरूमृग (काले हिरन) का माँस देवता और ब्राह्मणों को समर्पित करने योग्य (नैवेद्य) के रूप में भोग कराना चाहिए ।३६।
• मोर, तीतर और इसी प्रकार कबूतर, चातक (पपीहा या , कपिञ्जल), गैंडा, बगुला, मछली हँस सभी जानवर शिकार किए हुए खाने योग्य हैं।३७।
• शफरी-मछली तथा सिंहतुण्ड (शेर जेसे तुण्ड-वाली एक प्रकार की मछली पाठीन (पढिना),मछली, रोहित मछली ये भी खाने के लिए बतायी गयीं है।३८।
• धो पौंछ कर ही ब्राह्मण को माँस इच्छानुसार खाना चाहिए। शास्त्र विधि के अनुसार शिकार किए हुए प्राणी के प्राण निकल जाने पर ही उसके माँस का भक्षण करना चाहिए ।३९।
• यज्ञ के पश्चात बचा हुआ माँस खाकर व्यक्ति पाप से लिप्त नहीं होता है। औषधि के रूप में अशक्त (कमजोर) व्यक्ति को भी माँस खाना चाहिए। ४०।
• यदि पितरों के श्राद्ध अथवा देवों के यज्ञ में आमन्त्रित व्यक्ति माँस को नहीं खाता है, तो वह उतने समय तक नरक में रहता है जितने रोम एक पशु के शरीर पर होते हैं।४१
इन उपर्युक्त श्लोक से यह सिद्ध होता है कि पूर्वकाल में ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत देव यज्ञों एवं अन्य प्रमुख अवसरों (मौकों) पर पशु बलि एवं माँस खाने और खिलाने की प्रथा विद्यमान थी। जिसमें देवताओं को माँस चढ़ाया जाता था और द्विज (ब्राह्मण) लोग भी उसे खाते थे। और जो मौके पर नहीं खाता, वह नर्कगामी होता था। क्योंकि ये सभी बातें पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होती हैं।
✴️ दूसरी बात यह कि- उपर्युक्त श्लोक में यज्ञ विधानों के अन्तर्गत जो आगम और निगम शब्द आये हैं - उनका शास्त्रीय अर्थ जानना भी उचित है।
इस सम्बन्ध में तान्त्रिक ग्रन्थों में आगम का लक्षण निम्नलिखित है।
आगतं पञ्चवक्त्रात्तु गतञ्च गिरिजानने ।
मतञ्च वासुदेवस्य तस्मादागममुच्यते”
(रघुवंश महाकाव्य- १०/२६)
अनुवाद:- शिव के मुख से आया हुआ और पार्वती को मुख में पहुँचा हुआ तथा वासुदेव कृष्ण का मत (माना हुआ ) उसी को आगम कहा जाता है।
आगम की ही एक अपर संज्ञा "तन्त्र" है। तन्त्र और आगम, समानार्थी अर्थों में शास्त्रों में प्रयुक्त होते रहे हैं।
आगम इन सात लक्षणों से समन्वित होता है- सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट्कर्म, (शान्ति,वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण) साधन तथा ध्यानयोग। ये आगम ग्रन्थ के लक्षण हैं।
▪️तन्त्रशास्त्र का वह अंग जिसमें सृष्टि, प्रलय, देवताओं की पूजा, उनका साधन, पुरश्चरण-(हवन आदि के समय किसी विशिष्ट देवता का नाम जप अथवा किसी मन्त्र, स्तोत्र आदि को किसी अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिये किसी निश्चित समय और परिमाण तक नियमपूर्वक जपना या पाठ करना) और चार प्रकार का ध्यानयोग होता है ।
आगतं पञ्चवक्त्रात्तु गतञ्च गिरिजान
ने। मतञ्च वासुदेवस्य तस्मादागममुच्यते” ॥
इति (एतल्लक्षणं यथा -“सृष्टिश्च प्रलयश्चैव देवतानां तथार्च्चनं । साधनञ्चैव सर्व्वेषां पुरश्चरणमेव च ॥ षट्कर्म्मसाधनं चैव ध्यानयोगश्चतुर्विधः । सप्तमिर्लक्षणैर्युक्तं त्वागमं तद्विदुर्बुधाः”॥ इति इति यथा रघुवंशे ।१० / २६
कुल मिलाकर वेद-शास्त्रों को निगम कहते हैं और शास्त्रों के उस स्वरूप को आगम कहते हैं जो व्यवहार अथवा आचरण में उतारने वाले उपायों का व्याख्या करता है।। तन्त्र अथवा आगम में व्यवहार पक्ष ही मुख्य है।
आगमात् शिववक्त्राद् गतं च गिरिजा मुखम्। सम्मतं वासुदेवेनागमः इति कथ्यते ॥
जिससे अभ्युदय-लौकिक कल्याण और निःश्रेयस-मोक्ष के उपाय बुद्धि में आते हैं, वह आगम कहलाता है। [वाचस्पति मिश्र, योग भाष्य, तत्व वैशारदी व्याख्या]
उपास्य देवता की भिन्नता के कारण आगम के तीन प्रकार हैं :- वैष्णव आगम (पञ्चरात्र तथा वैखानस आगम), शैव आगम (पाशुपत, शैवसिद्धान्त, त्रिक आदि) तथा शाक्त आगम।
द्वैत, द्वैताद्वैत तथा अद्वैत की दृष्टि से भी इनमें तीन भेद माने जाते हैं।
आगम वेदमूलक और सम्पूरक हैं। इनके वक्ता प्रायः भगवान् शिव हैं।
यह शास्त्र साधारणतया तन्त्रशास्त्र के नाम से प्रसिद्ध है। निगमागम मूलक भारतीय संस्कृति का आधार जिस प्रकार निगम (वेद) है, उसी प्रकार आगम (तन्त्र) भी है। दोनों स्वतन्त्र होते हुए भी एक दूसरे के पोषक व सन् पूरक भी हैं। जिसमें निगम कर्म, ज्ञान तथा उपासना का स्वरूप बतलाता है तथा आगम इनके उपायभूत साधनों का वर्णन करता है। अत: (निगम सैद्धान्तिक है तो आगम प्रायौगिक)
किन्तु इन सबके विपरीत वैष्णवी वर्ण व्यवस्था में देव यज्ञों की तरह ना ही कोई यज्ञ का प्रावधान है और ना ही पशु बलि एवं माँस खाने का विधान है। क्योंकि वैष्णवी वर्ण व्यवस्था कर्मकाण्डो से कोसों दूर पूर्णरूपेण भक्ति पर आधारित है। जिसको नींचे विस्तार पूर्वक बताया गया है।
▪️ वैष्णवी वर्ण व्यवस्था- भक्तिमूलक है -
जैसा कि प्रमाण सहित ऊपर बताया जा चुका है कि ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में सर्वप्रथम इन्द्र के द्वारा हिंसा पूर्ण देव यज्ञों का विधान किया गया था। जिसमें पशुओं के माँस खाने का भी विधान था। किन्तु इसके विपरीत वैष्णवी व्यवस्था पूर्णतः वैष्णव भक्ति पर आधारित है। क्योंकि यज्ञों में पशु बलि को लेकर मत्स्य पुराण के (१४३) वें अध्याय का (३३) वें श्लोक में देव यज्ञ और भक्ति में भेद करते हुए लिखा गया है कि- यज्ञ और भक्ति का पृथक-पृथक फल होता है।
द्रव्यमन्त्रात्मको यज्ञस्तपश्च समतात्मकम्।
यज्ञैश्च देवानाप्नोति वैराजं तपसा पुनः।।३३
अनुवाद- द्रव्य और मन्त्रद्वारा सम्पन्न किये जा सकने वाले वैष्णव यज्ञ तप के समान ही हैं। परन्तु पशु वध मूलक यज्ञों से देवताओं की प्राप्ति होती है तथा तपस्या एवं भक्ति से विराट् ब्रह्म (परमेश्वर- स्वराट् विष्णु) की प्राप्ति होती है।३३।
इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भगभद्गीता के अध्याय - (४ के श्लोक- २८) से भी होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने यज्ञ का वास्तविक अर्थ बताते हुए यज्ञ के पाँच भेद बताए हैं।
"द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।२८।
व्याख्या :- इस प्रकार बहुत सारे संयमी पुरुष हैं, जो द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ व ज्ञानयज्ञ आदि व्रतों का अनुशासित रूप से पालन करते हैं ।२८।
विशेष :- इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने "यज्ञ" के पाँच भेद बताए गए हैं। जो देव यज्ञों के ठीक विपरीत हैं।
(१) द्रव्ययज्ञ :-द्रव्य का अर्थ पदार्थ होता है, इसलिए समाज या लोकहित के लिए सान्सारिक साधनों को उपलब्ध करवाना द्रव्य यज्ञ कहलाता है । जैसे- जरूरतमन्दों को भोजन, वस्त्र व दवाईयाँ आदि उपलब्ध करवाना ।
(२) तपोयज्ञ :- सभी प्रकार की अनुकूल व प्रतिकूल परिस्थितियों को सहजता से सहन करते हुए कर्तव्य का पालन करना ही तपोयज्ञ कहलाता है।
(३) योगयज्ञ :- योग साधना द्वारा शरीर व मन पर नियंत्रण पाकर, मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होना योगयज्ञ कहलाता है।
(४) स्वाध्याय यज्ञ :- मोक्षकारक ग्रन्थों का अध्ययन करना स्वाध्याय यज्ञ कहलाता है ।
(५) ज्ञानयज्ञ :- विवेक व वैराग्य आदि सदगुणों का पालन करते हुए साधना मार्ग पर निरन्तर बढ़ते रहना ज्ञानयज्ञ कहलाता है।
देखा जाए तो उपर्युक्त श्लोक में भगवान कृष्ण ने पाँच प्रकार के यज्ञों में देव यज्ञों, जिसमें पशु बलि का प्रावधान है उसका वर्णन नहीं किया है।
अतः मत्स्यपुराण के उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है कि इन्द्र के सारे यज्ञ पशु-बलि पर ही आधारित थे। जो पशुपालकों के लिए बहुत दु:खद व पशुसंरक्षण की समस्या थी। इसी कारण से गोपालक एवं पशु-पक्षी प्रेमी भगवान श्रीकृष्ण ने बल पूर्वक सभी देव-यज्ञों को विशेषत: इन्द्र के हिंसा पूर्ण यज्ञों पर रोक लगा दी।
क्योंकि इन्द्र के यज्ञों में निर्दोष पशुओं की हिंसा होती थी। इसके विकल्प में भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पूजा (प्रकृति पूजा) का सूत्रपात किया और स्पष्ट रूप से उद्घोषणा की "जिस शक्ति मार्ग का वरण करके हिंसा द्वारा अश्वमेध आदि यज्ञों से देवों को प्रसन्न किया जाता हो ऐसी देव पूजा व्यर्थ ही है।
क्योंकि भगवान की उपासना में प्रेम और आत्मीयता की प्रधानता होती है किसी पूजन विधि या कर्मकाण्ड की नहीं। दूसरी बात यह कि भगवान भाव ग्राही है क्रियाग्राही या पाखण्ड ग्राही नहीं हैं। इसलिए यज्ञ वैष्णव भक्तों अर्थात् गोपों के लिए विहित कर्म नहीं है। क्योंकि गोप लोग कर्मकाण्डों से रहित भक्ति के निश्चल भाव से आत्मसमर्ण पूर्वक ईश्वर का भजन एवं संकीर्तन करते हैं; यही वैष्णवों का परम धर्म और कर्तव्य हैं। इस सम्बन्ध में वैष्णवों का मानना है की कर्मकाण्डों से न तो किसी को कोई आत्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ और नाहीं संसार से किसी की मुक्ति हुई है।
क्योंकि परमेश्वर किसी नैवेद्य- का भी आकाँक्षी नहीं है। नैवेद्य तो देवों के लिए ही विहित कर्म होता है। इस बात की पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण प्रकृति खण्ड- अध्याय (३) एवं देवीभागवतपुराण स्कन्ध (९) अध्याय (३) से होती है। जिसमें यहाँ पर देवीभागवतपुराण स्कन्ध (९) अध्याय (३) के श्लोक दिया जा रहा है-
जिसमें गोपेश्वर भगवान श्रीकृष्ण विराट विष्णु से कहते हैं कि -
"मन्त्रं दत्त्वा तदाहारं कल्पयामास वै विभुः।
श्रूयतां तद् ब्रह्मपुत्र निबोध कथयामि ते॥२८॥
"प्रतिविश्वं यन्नैवेद्यं ददाति वैष्णवो जनः।
तत्षोडशांशो विषयिणो विष्णोः पज्वदशास्य वै॥२९॥
"निर्गुणस्य आत्मनः च एव परिपूर्णतमस्य च।
नैवेद्येन च कृष्णस्य न हि किञ्चिद् प्रयोजनम् ।।३०।।
"यद्यद्ददाति नैवेद्यं तस्मै देवाय यो जनः।
स च खादति तत्सर्वं लक्ष्मीनाथो विराट् तथा॥ ३१॥
"अनुवाद- २८-२९, ३०-३१
• मन्त्र देकर प्रभु ने उसके (विराट पुरुष) के लिए आहार की भी व्यवस्था की। हे ब्राह्मण उसे सुनिये, मैं आपको बताता हूँ। प्रत्येक लोक में वैष्णवभक्त जो नैवेद्य अर्पित करता है, उसका सोलहवाँ भाग तो भगवान् क्षुद्रविष्णु का होता है तथा पन्द्रह भाग इस विराट्-विष्णु के होते हैं ।।२८-२९॥
• उन परिपूर्णतम तथा निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण को तो नैवेद्य से कोई प्रयोजन नहीं है। भक्त उन प्रभु को जो कुछ भी नैवेद्य अर्पित करता है, उसे विराट विष्णु और क्षुद्र विष्णु ही ग्रहण करते हैं ॥३०-३१॥
अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण के लिए किसी भी प्रकार के नैवेद्य या चढ़ावे इत्यादि की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि परमेश्वर श्रीकृष्ण भाव ग्राही है क्रियाग्राही नहीं हैं। इसी वजह से वैष्णव भक्तों के लिए परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति बहुत ही सरल एवं आसान है। इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के लिए श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं कि -
'अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।। १४।
{श्रीमद्भगवद्गीता- (८/१४}
अनुवाद- अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए योगी के लिए मैं सुलभ अर्थात उसको सरल रूप से प्राप्त हो जाता हूँ।१४।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।२६।
(श्रीमद्भगवद्गीता- (९/२६)
अनुवाद - जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल, आदि को प्रेम पूर्वक मुझे अर्पण करता है, उस मुझमें तल्लीन हुए अन्तःकरण वाले भक्त के द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए उपहार (भेंट) को मैं खाता हूँ अर्थात स्वीकार कर लेता हूँ।२६।
✴️ अब यहाँ पर यह जानना आवश्यक हो जाता है कि भक्तों द्वारा चढ़ावा या नैवेद्य परमेश्वर श्रीकृष्ण- विराट विष्णु और क्षुद्रविष्णु के माध्यम से औपचारिक रूप से अवश्य ग्रहण करते हैं, किन्तु भक्त के वास्तविक भाव को परमेश्वर श्रीकृष्ण ही ग्रहण करते हैं। इसीलिए कहा गया है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण भाव ग्राही हैं क्रिया या पाखण्ड ग्राही नहीं हैं।
क्योंकि भगवान की उपासना में प्रेम की, अपनेपन की और मन की पवित्रता की ही प्रधानता है, किसी कर्मकाण्डीय विधि की नहीं। यह बात श्रीकृष्ण भक्तों को सदैव ध्यान में रखनी चाहिए।
दूसरी बात यह कि वैष्णव भक्त इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं की किसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए; किसकी नहीं। इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों का स्वयं मार्गदर्शन करते हुए कहते हैं कि -
"अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यानि मापपि।। २३।
श्रीमद्भगवद्गीता- (७/२३)
अनुवाद - तुच्छ बुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का फल अन्त वाला अर्थात् (नाशवान) ही मिलता है। देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।२३।
यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।२५।
(श्रीमद्भगवद्गीता- (९/२५)
अनुवाद - देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों को पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत-प्रेतों को प्राप्त होते हैं। परन्तु मेरा पूजन करने वाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।
वैष्णव भक्तों के लिए तीसरी बात यह कि - वैष्णव भक्त अपने कर्तव्य पथ से भटक न जाऐं इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को सर्वज्ञत्व का उपदेश देते हुए कहते हैं कि-
अहं ही सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्चयवन्ति ते।। २४।।
[श्रीमद्भगवद्गीता- अध्याय-(९/२४)
अनुवाद- सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ,। परन्तु वे अर्थात् देवताओं को पूजने वाले मुझे तत्व से नहीं जानते, इसी से उनका पतन होता है।
पुनः भगवान श्रीमद्भगवद्गीता- अध्याय-(९/१६,१७,१८ कहते हैं कि -
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हतम्।१६।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।१७।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।१८।
अनुवाद - क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ मन्त्र मैं हूँ घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ, और हवन रूप क्रिया भी मैं हूँ। जानने योग्य पवित्र ऊँकार, ऋग्वेद, सामवेद, और यजुर्वेद, भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद् ,उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान (भण्डार) तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।१६,१७-१८।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५॥
[श्रीमद्भगवद्गीता- (१३/२५)
अनुवाद- जो मनुष्य तत्त्वज्ञ" जीवन्मुक्त महापुरुषों से सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुनने के परायण हुए मनुष्य मृत्यु को तर जाते हैं।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता: ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।१४।
{श्रीमद्भगवद्गीता- १३/१४}
अनुवाद:- वे दृढ़ निश्चय वाले भक्त जन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी भक्ति प्राप्ति के लिये यत्न करते हुए और मुझ को बार-बार प्रणाम करते हुए सदैव मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं।
देखा जाए तो वैष्णव भक्ति का वास्तविक भेद- भक्त प्रहलाद को अच्छी तरह से ज्ञात था। इस सम्बन्ध में भक्त प्रहलाद श्रीमद्भागवत पुराण के स्कन्ध- {७} अध्याय- {५ }के श्लोक- {२३} में भक्ति के (नौ) प्रकार के भेद को बताते हुए कहते हैं कि-
'श्रीप्रह्लाद उवाच -
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।।२३।
अनुवाद- प्रह्लाद ने कहा- विराट विष्णु (श्रीकृष्ण) की भक्ति के नौ भेद हैं। (१)- भगवान की लीला गुणों का श्रवण। (२)- उनका ही कीर्तन। (३) उनके रूप आदि का स्मरण। (४)- उनके चरणों की सेवा। (५)- पूजा एवं अर्चन (६)- वन्दन। (७)- दास्य (८)- सख्य और (९)- आत्मनिवेदन।
अतः उपर्युक्त सभी श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि है कि- वैष्णवी वर्ण व्यवस्था पूर्णतः भक्तिमूलक विचारधारा पर आधारित है। इसमें कर्मकाण्ड, हिंसा मूलक यज्ञ एवं पाखण्डवाद के लिए कोई स्थान नहीं है। इसके साथ ही ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के विपरीत वैष्णवी वर्ण व्यवस्था भेदभाव से रहित, समता मूलक समाज की स्थापना करती है। इसके लिए नीचे देखें।
[३] भेदभाव एवं समता मूलक अन्तर।
▪️ ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था भेदभाव मूलक है।
भारतीय समाज में प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है कि - ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से भेदभाव पर आधारित है। जिसमें ऊँच-नींच का भेद बहुतायत देखने को मिलता है। जिसकी पुष्टि- मनुस्मृति के अध्याय- ८ के श्लोक (२७०) और (२७७) से होती है। जिसमें आचरणगत विधानों के अन्तर्गत शूद्रों के लिए कठोर दण्ड का आदेश दिया है। जिसमें यदि शूद्र वर्ण का व्यक्ति उच्च वर्ण के व्यक्तियों के प्रति अपराध करते है तो उसके लिए सबसे जघन्यतम दण्डों का विधान है। वहीं दूसरी तरफ उच्च वर्गों के लिए न्युनतम दण्ड का प्रावधान किया गया है इसके लिए निम्नलिखित श्लोक देखें -
एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥२७०॥
विट्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रति तत्त्वतः।
छेदवर्जं प्रणयनं दण्डस्यैति विनिश्चयः॥२७७।।
अनुवाद:-
• शूद्र लोग यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को पापी कहे तो उसे जिह्वाच्छेदन का दण्ड देना चाहिये, क्योंकि उसकी उत्पति जघन्य (सबसे नींचे) के स्थान से है।२७०।
• वैश्य और शूद्र भी इस प्रकर आपस में गाली दें तो पूर्वोक्त दण्ड की व्यवस्था करे अर्थात वैश्य शूद्र को गाली दे तो उसे प्रथम साहस और शूद्र वैश्य को गाली दे तो उसे मध्यम साहस का दण्ड दे। ऐसे अवसर पर शूद्र की जीभ न काटना यही दण्ड का निश्चय है।२७७।
कुछ इसी तरह का वर्णन गौतमस्मृति द्वादश- अध्याय- के श्लोक- (१) से (६) में मिलता है। जिसमें भेदभाव पर आधारित दण्ड का प्रावधान किया गया है।
शूद्रो द्विजातीनभिसन्धायाभिहत्य च वाग्दण्ड।
पारुष्याभ्यामङ्गमोच्यो येनोपहन्यात् ॥१॥
आर्यस्त्र्यभिगमने लिङ्गोद्धारः स्वहरणं च ॥२॥
गोप्ता चेद्वधोऽधिकः॥३॥
अथ हास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूर
णमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेदः॥४॥
आसनशयनवाक्पथिषु समप्रेप्सुर्दण्डयः ॥५॥
शतं क्षत्र्त्रियो ब्राह्मणाक्रोशे ॥६॥
अनुवाद- १-६
• शूद्र यदि द्विजातीय वर्ण के व्यक्ति से अपशब्द बोले तो उसकी जिह्वा खींच लेनी चाहिए जिस अँग से कुछ परुषता (अपराध) या कठोरता होने पर उसको भी काट देना चाहिए।१।
• यदि शूद्र तीनों वर्ण की किसी स्त्री से शारीरिक सम्बन्ध बनाता है तो उसका लिंग काट देना चाहिए और उसकी सब सम्पत्ति छींन लेनीं चाहिए।२।
• यदि उसके रक्षक के वध की जिससे अधिक सम्भावना हो तो उनकी भी निगरानी रखनी चाहिए।३।
• वेदों को सुनने वाले शूद्रों के कानों में पिघलता हुआ सीसा (lead) धातु उसके कानों में डलवा देना चाहिए।४।
अर्थात्- वैदिक पाठ सुनने के लिए शूद्रों के कानों को पिघले हुए टिन या लाख से भरने का अधिकार है, वेदों की ऋचाओं को बोलने पर उसकी जीभ काट दी जानी चाहिए तथा उसे अंगभंग कर देना चाहिए ।।४।
और यदि वह याद करता है, तो उसके शरीर को अलग कर दिया जाना चाहिए।
• यदि शूद्र आसन शयन वाणी और मार्ग में बराबरी करता है तो वह दण्ड पाने योग्य है।५।
कुछ इसी तरह का विधान मनु ने भी अपनी मनुस्मृति में किए हैं। नींचे देखें-
शूद्रो गुप्तं अगुप्तं वा द्वैजातं वर्णं आवसन् ।
अगुप्तं अङ्गसर्वस्वैर्गुप्तं सर्वेण हीयते।३७४।
(मनुस्मृति के अध्याय - ८ /३७४)
अनुवाद- यदि शूद्र किसी असुरक्षित द्विज (ब्राह्मण) स्त्री के साथ सम्भोग करता है तो उसे अपना अपराधी अंग को खोना पड़ता है, और यदि वह वही अपराध किसी सुरक्षित द्विज स्त्री के साथ सम्भोग करता है तो उसे अपने प्राण गंवानें पड़ते हैं।३७४।
ब्राह्मणं दशवर्षं तु शतवर्षं तु भूमिपम् ।
पितापुत्रौ विजानीयाद् ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ॥१३५)
(मनुस्मृति के अध्याय - २/ १३५)
अर्थात्- दस साल का ब्राह्मण भी सौ साल के क्षत्रिय के पिता के समान है।
मनुस्मृति के समान ही कुछ श्लोक मत्स्यपुराण के अध्याय -२७७ में भी मिलता है। जिसमें जातिगत आधार पर भेदभाव करते हुए दण्ड का प्रावधान किया गया है। इसके लिए नीचे देखें।
सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः ।
कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाप्यस्य कर्तयेत्।८४।
केशेषु गृह्णतो हस्तं छेदयेदविचारयन्।
पादयोर्नासिकायाञ्च ग्रीवायां वृषणेषु च।८५।
अनुवाद- ८४-८५
• यदि कोई नींच जाति वाला व्यक्ति उत्कृष्ट जाति वाले व्यक्ति के साथ आसन पर बैठना चाहता है तो राजा उसकी कमर में एक चिन्ह बनाकर अपने राज्य से निर्वासित कर दे या उसके गुदा (नितम्ब) भाग को कटवा दे।८४।
• इसी प्रकार यदि कोई निम्न जाति वाला किसी उच्च जातीय व्यक्ति के केशों को पकड़ता है तो उसके हाथ को बिना विचार किए ही कटवा देना चाहिए। इसी प्रकार का दण्ड दोनों पैरों, नासिका, गला तथा अण्डकोष (वृषण) के पकड़ने पर भी देना चाहिए।८५।
✴️ कुछ इसी तरह की बातें मूर्ख, पाखण्डी और कर्महीन ब्राह्मणों के लिए भी देवी भागवतपुराण तृतीय स्कन्ध के अध्याय-(१०) के निम्नलिखित श्लोकों में कहीं गई है कि-
'यथा शूद्रस्तथा मूर्खो ब्राह्मणो नात्र संशयः।
न पूजार्हो न दानार्हो निन्द्यश्च सर्वकर्मसु ॥३३॥
"अनुवाद:- मूर्ख ब्राह्मण शूद्र-तुल्य होता है। क्योंकि वह न तो सम्मान (पूजा) के ही योग्य होता है। और न ही वह दान देने का पात्र ही होता है। वह सभी धार्मिक शुभ कार्यों में निन्दनीय होता है। ।३३।
देशे वै वसमानश्च ब्राह्मणो वेदवर्जितः।
करदः शूद्रवच्चैव मन्तव्यः स च भूभुजा ॥३४॥
"अनुवाद:- किसी देश में रहता हुआ वेदशास्त्र विहीन ब्राह्मण कर (टेक्स) देने वाले शूद्र की भाँति राजा द्वारा समझा जाना चाहिए।३४।
नासने पितृकार्येषु देवकार्येषु स द्विजः।
मूर्खः समुपवेश्यश्च कार्यश्च फलमिच्छता ॥३५॥
अनुवाद:- फल की इच्छा रखने वाले साधक को चाहिए कि वह पितृ कार्य और देव पूजा के अवसर पर उस मूर्ख ब्राह्मण को आसन पर न बिठाऐ ।३५।
राज्ञा शूद्रसमो ज्ञेयो न योज्यः सर्वकर्मसु ।
कर्षकस्तु द्विजः कार्यो ब्राह्मणो वेदवर्जितः॥३६॥
अनुवाद:- राजा भी वेदज्ञान विहीन ब्राह्मण को शूद्रतुल्य समझे और उसे धार्मिक शुभ कार्यों में नियुक्त न करे अपितु उसे खेती बाड़ी के कार्य में लगा दे।३६।
विना विप्रेण कर्तव्यं श्राद्धं कुशचटेन वै।
न तु विप्रेण मूर्खेण श्राद्धं कार्यं कदाचन ॥३७॥
"अनुवाद:- वेद ज्ञाता ब्राह्मण के अभाव में कुश के चट से स्वयं श्राद्ध कार्य कर लेना उचित है। किन्तु मूर्ख (अज्ञानी) ब्राह्मण से कभी श्राद्ध कार्य नहीं कराना चाहिए ।३७।
आहारादधिकं चान्नं न दातव्यमपण्डिते ।
दाता नरकमाप्नोति ग्रहीता तु विशेषतः॥३८॥
"अनुवाद:- मूर्ख ब्राह्मण को भाेजन से अधिक अन्न नहीं देना चाहिए ! क्यों की दान देने वाला व्यक्ति नरक में जाता है। और दान लेने वाला तो घोर नरकों में ही जाती है।३८।
धिग्राज्यं तस्य राज्ञो वै यस्य देशेऽबुधा जनाः।
पूज्यन्ते ब्राह्मणा मूर्खा दानमानादिकैरपि ॥३९॥
"अनुवाद:- उस राजा के राज्य को धिक्कार है जिसके राज्य में मूर्ख लोग निवास करते हैं। और मूर्ख ब्राह्मण भी दान सम्मान आदि से पूजित होते हैं।३९।
आसने पूजने दाने यत्र भेदो न चाण्वपि ।
मूर्खपण्डितयोर्भेदो ज्ञातव्यो विबुधेन वै ॥४०॥
"अनुवाद:- जहाँ मूर्ख और विद्वान के बीच आसन-पूजन और दान में किञ्चित्मात्र भी भेद नहीं माना जाता है। अत: विज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह ज्ञानी और मूर्ख की अवश्य पहचान कर ले।३९-४०।
मूर्खा यत्र सुगर्विष्ठा दानमानपरिग्रहैः।
तस्मिन्देशे न वस्तव्यं पण्डितेन कथञ्चन ॥४१॥
"अनुवाद:-
जहाँ दान' मान और परिग्रह में मूर्ख व धूर्त लोग महान गौरवशाली माने जाते हैं। उस देश में विद्वानों को किसी भी प्रकार नहीं रहना चाहिए।४१।
असतामुपकाराय दुर्जनानां विभूतयः।
पिचुमन्दः फलाढ्योऽपि काकैरेवोपभुज्यते ॥४२॥
"अनुवाद:- दुर्जन व्यक्तियों की सम्पत्तियाँ दुर्जन व्यक्तियों के उपभोग के लिए ही होती हैं। जैसे नीम के फल (निबोरीयों) से अधिक लदे हुए नीम के वृक्ष पर बैठकर केवल कौए ही निबोरियाें को खाते हैं।४२।
इतना ही नहीं यज्ञों में पशुमेध करने वाले ब्राह्मणों का भी वर्णन है।
इसके अतिरिक्त ब्राह्मणों के द्वारा पशुहिंसा और मांस खाने के विधानों की पुष्टि श्रीमद्देवी भागवत पुराण से भी होती है। इसके लिए निम्नलिखित उदहारण दिये जा सकते हैं -
वेदधर्मेष हिंसा स्यादधर्मबहुला हि सा।
कथं मुक्तिप्रदो धर्मो वेदोक्तो बत भूपते।।४९
प्रत्यक्षेण त्वनाचार: सोमपानं नराधिप।
पशुनां हिसांनं तद्वभ्दक्षणां चामिषस्य च।। ५०
सौत्रामणौ तथा प्रयोक्ता: प्रत्यक्षेण दुराग्रह:।
द्यूतक्रीडा तथा प्रोक्ता व्रतानि विविधानि च ।।५१
( श्रीमद्देवी भागवत पुराण - १/ १९)
अनुवाद - शुकदेव जी जनक जी से बोले -
हे भूपते ! वेदधर्मों में हिंसा का बाहुल्य है, उस हिंसा में अनेक प्रकार के अधर्म होते हैं, ऐसी दशा में वेदोक्त धर्म मुक्तिप्रद कैसे हो सकता है ? हे राजन! सोमरस - पान, पशुहिंसा और मांस भक्षण तो स्पष्ट ही आनाचार है। सौत्रामणियज्ञ से सुराग्रहण का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार द्यूत क्रीड़ा एवं अन्यान्य प्रकार के व्रत बताये गये हैं।
द्विजैर्भोगरतैर्वेदे दर्शितं हिंसनं पशो:।
जिह्वास्वादपरै: काममहिंसैव परा मता।। ५६
( श्रीमद्देवी भागवत पुराण - ४/ १३ व्यास जन्मेजय संवाद )
अनुवाद -
व्यास जी जन्मेजय से कहते हैं कि - भोगपरायण तथा अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए सदा तत्पर रहने वाले द्विजोंने
वेदोंमें पशुहिंसा का उल्लेख कर दिया है। किन्तु सच्चाई यह है कि अहिंसा को ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है।
ये उपर्युक्त सभी बातें ब्राह्मी वर्ण- व्यवस्था में देखने को मिलती है। जिसमें सामाजिक एवं जातीय भेद भाव के आधार पर दण्ड और तिरस्कार का विधान निर्धारित किया गया है जो किसी भी तरह से न्याय संगत नहीं है। किन्तु इसके ठीक विपरीत वैष्णव वर्णव्यवस्था- समानता मूलक सिद्धान्त पर आधारित है जिसमें किसी प्रकार का भेद भाव नहीं है। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण अन्तर को नींचे देखें -
▪️ वैष्णवी वर्ण- व्यवस्था समतामूलक है-
ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के ठीक विपरीत वैष्णवी व्यवस्था समतामूलक सामाज पर आधारित है। जिसमें स्त्री-पुरुष, जाति-पाँति, ऊँच-नींच, अपना-पराया इत्यादि का कोई भेद-भाव नहीं है। इस सम्बन्ध में वैष्णव वर्ण के महा प्रवर्तक भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय-(९) के श्लोक- (३२) में अर्जुन से कहते हैं कि -
'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।३२।।
अनुवाद - हे पार्थ ! यदि स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले भी हों, वे भी मुझ पर आश्रित (मेरे शरण) होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।३२।
इसी प्रकार से भागवत पुराण में वैष्णव धर्म की प्रवृत्ति के बारे में बहुत ही अच्छा लिखा गया है कि वैष्णव धर्म में ऊँच-नींच एवं जातीय भेद-भाव नहीं है।
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥२१।
(श्रीमद्भागवत पुराण- ११/१४/२१)
भगवान् के वचन – मैं सन्तों का प्रिय और आत्मा हूँ, मेरी प्राप्ति श्रद्धा व अनन्य भक्ति से ही होती है । मेरी अनन्य भक्ति में यह सामर्थ्य है कि वह जन्मजात (श्वपाक) चाण्डाल को भी अत्यन्त पवित्र बना देने वाली है।२१।
न यस्य जन्म कर्मभ्याम् न वर्ण आश्रमजातिभिः।
सज्जते अस्मिन् अहंभावः देहे वै स हरेः प्रियः।।५१।।
न यस्य स्वः पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा।
सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥५२॥
(श्रीमद्भागवत पुराण- ११/२/५१,५२)
अनुवाद -५१-५२
• भागवत धर्म (वैष्णव वर्ण) में न वर्णाश्रमगत भेद है, न जातिगत भेद ही, न जन्मगत भेद है, न कर्मगत । यहाँ तक कि देह-धर्मों का भी भेद नहीं है। ऐसा सर्वभूत शम ही उत्तम भागवत धर्म है ।५१।
• जो धन सम्पत्ति अथवा शरीर आदि में- "यह अपना है और यह पराया" इस प्रकार का भेदभाव नहीं रखता, समस्त पदार्थ में समस्वरूप परमात्मा को देखता है, समभाव रखता है तथा किसी भी घटना अथवा संकल्प से विक्षिप्त न होकर शान्त रहता है, वह भगवान का उत्तम भक्त है।५२।
न हि भगवन्नघटितमिदं त्वद्दर्शनान् नृणामखिलपापक्षयः।
यन्नाम सकृच्छ्रवणात् पुल्कसकोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
(श्रीमद्भागवत पुराण-१६/६/४४)
अनुवाद -
भगवान् ! आप के दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के सारे पाप क्षींण हो जाते हैं, यह कोई असम्भव बात नहीं है, क्योंकि आपका नाम एक बार सुनने से ही नीच चाण्डाल भी संसार से मुक्त हो जाता है।४४।
भगवान श्रीकृष्ण समाज में ऊँच-नींच का भेदभाव रखनें वालों से अपनी भक्ति तथा कृपा से सदैव दूरी बनाकर रखते हैं। और ऐसे लोग जो समाज में भेदभाव पैदा करते हैं उनके लिए दण्ड का प्रावधान करते हुए कहते हैं कि-
यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः सद्यः पुनाति जगदाश्वपचाद्विकुण्ठः।
सोऽहं भवद्भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्तिः छिन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम् ॥६॥
(भागवत पुराण- ३/१६/६)
अनुवाद:-
मेरी निर्मल सुयश सुधा में गोता लगाने से चाण्डाल पर्यन्त सारा जगत तुरन्त पवित्र होकर कुण्ठा रहित हो जाता है। इसलिए मैं विकुण्ठ कहलाता हूँ। किन्तु मुझे यह पवित्र कीर्ति आप भक्तों से ही प्राप्त होती है। इसलिए जो कोई आपके विरुद्ध आचरण करेगा, मैं उसे तत्काल काट डालुँगा चाहें वह मेरी बाहू (भुजा) ही क्यों न हो।६।
और वैष्णव भक्तों की रक्षा तथा वैष्णव धर्म एवं समता मूलक समाज को स्थापित करने के लिए भगवान समय-समय पर भूतल पर अवतरित भी होते हैं।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।
(श्रीमद्भगवद् गीता- ४/७)
अनुवाद:-
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ।७।
अनेक सम्प्रदायों और मत-मतान्तरो में भटकते हुए व्यक्ति को कहीं शान्ति और सत्य के दर्शन नहीं होते तो भगवान श्रीकृष्ण यह सार्वजनिक घोषणा करते हैं कि-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।। ६६।
(श्रीमद्भगवद्गीता (१८/६६)
सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आजा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू चिन्ता मत कर।६६।
(व्याख्या)- भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रति यह उद्घोषणा करते हुए कहते हैं कि जिस-जिस धर्म और समाज में भेद-भाव की प्रधानता हो उसे तुरन्त छोड़कर भक्तों को मेरी शरण में आ जाना चाहिए। मैं उन सभी भक्तों को पाखण्डपूर्ण समाज से मुक्त करके अवश्य उनका कल्याण करूँगा।
सामान्य रूप से देखा जाए तो वैष्णव-वर्ण और चातुर्वर्ण्य में प्रमुख रूप से (६) प्रकार के निम्नलिखित वैचारिक अन्तर भी देखे जाते हैं।
(१) पहला यह की ब्राह्मी वर्णव्यवस्था- में सभी मनुष्य एकसमान अधिकार वाले नहीं हैं। जबकि वैष्णव वर्ण में सभी बराबर हैं।
वैष्णव सन्तो का उद्घोष है कि-"हरि को भजे सो हरि को होई ! जाति- पाँति पूछे नहिं कोई"
(२)- दूसरा अन्तर विष्णु और ब्रह्मा द्वारा निर्मित वर्णों में यह भी है कि- ब्रह्माजी की वर्ण - व्यवस्था में चारो वर्णों के लोग अपने-अपने ही वंशानुगत कार्यों को अनिवार्य रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी जातीय धर्म समझकर करते हैं, भले ही उनमें इसकी पूर्ण प्रवृत्ति तथा योग्यता हो या नो हो।
जैसे- ब्राह्मण का बालक मन्दिरों या देवस्थानों में परम्परागत रूप से चढ़ावा लेने तथा वहाँ की पूजा आदि क्रियाओं करेगा ही चाहें वह संस्कृत भाषा का ज्ञान तथा शास्त्रों का ज्ञान भलें ही न रखता हो- जबकि वैष्णव वर्ण में ऐसी व्यवस्था नहीं है। इस वर्ण में जो जिस योग्यता के अनुरूप होगा वह वही काम करेगा।
(३) - इन दोनों में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य में इसके सदस्यों का विभाजन जन्म के आधार पर चार मानव समूहों (ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र) में होता है।
जबकि वैष्णव वर्ण में बिना वर्ग विभाजित हुए इसके सभी सदस्य अपनी योग्यता के अनुसार सभी कर्मों को करने के लिए स्वतन्त्र होते हैं। चाहे वह क्षत्रियोचित कर्म हो या ब्राह्मणत्व कर्म हो।
(४) - चौथा सबसे बड़ा अन्तर यह है कि- श्रौत और स्मार्त (श्रुति- वेद मूलक) स्मार्त (स्मृति- मूलक) ब्राह्मण, (धर्मशास्त्रमूलक) धर्म की कट्टरता को नासमझ लोग भागवत धर्म में घटाने लगते हैं। परन्तु भागवत धर्म ही वैष्णव वर्ण- व्यवस्था का आधार है। जबकि स्मृतियाँ- ब्राह्मण वर्णव्यवस्था- का आधार है।
(५) पाँचवां इन दोंनो व्यवस्थाओं में अन्तर यह है कि- ब्राह्मी वर्णव्यवस्था में विधान है कि- चातुर्वर्ण्य के लोग अपने वर्ण के दायरे में रहकर ही कार्य (जीविका-उपार्जन के व्यवसाय) करते हैं, उससे हट कर दूसरे वर्ग का कार्य नहीं कर सकते। जैसे कोई ब्राह्मण वर्ण का है, तो वह पुरोहित- कर्म ही करेगा क्षत्रियोचित कर्म कदापि नहीं कर सकता। इसी तरह से यह बात चारों वर्णों के लिए लागू होती है।
इस बात की पुष्टि- मार्कण्डेय पुराण के अध्याय- (११०) के श्लोक (३०) और (३६) से भी होती है जिसमें ब्रह्मा जी के वर्णव्यवस्था के शास्त्रीय विधानों का निर्देशन करते हुए परिव्राट् मुनि कहते है कि-
"त्वत्पुत्रस्य महाभाग विधर्मोऽयं महात्मनः ।
तवापि वैश्येन सह न युद्धं धर्मवन्नृप ॥३०॥
सोऽयं वैश्यत्वमापन्नस्तव पुत्रः सुमन्दधीः।
नास्याधिकारो युद्धाय क्षत्रियेण त्वया सह ।३६।
अनुवाद- हे राजन् ! आपका पुत्र नाभाग धर्म से पतित होकर वैश्य हो गया है, और वैश्य के साथ आपका युद्ध करना वर्ण-गत नीति के विरुद्ध व अनुचित ही है ।।३०-३६।
विशेष:-मार्कण्डेय पुराण के अनुसार कारुष वंश के एक राजा नाभाग जो दिष्ट के पुत्र थे। विशेष—इनकी कथा उक्त पुराण में इस प्रकार है—जब ये युवावस्था को प्राप्त हुए तब एक वैश्य की कन्या को देखकर मोहित हो गए और उस कन्या के पिता द्धारा अपने पिता से विवाह की आज्ञा माँगी। ऋषियों की सम्मति से पिता ने आज्ञा दी कि पहले एक क्षत्रिय कन्या से विवाह करके तब वैश्य कन्या से विवाह करे तो कोई दोष नहीं होगा। नाभाग ने पिता की बात न मानी। पिता पुत्र में युद्ध छिड़ गया। परिव्राट् मुनि ने यह युद्ध शान्त किया। नाभाग वैश्य कन्या का पाणिग्रहण करके वैश्यत्व को प्राप्त हुए।
इन उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि ब्रह्माजी के वर्ण व्यवस्था में अपने वर्ण के कर्मों को छोड़कर दूसरे वर्ण के कर्मों को करना निषिद्ध है।
जबकि वैष्णव वर्ण में कार्यों के आधार पर कोई वर्ग विभाजन नहीं है इसके प्रत्येक सदस्य विना वर्ग विभाजित हुए- ब्राह्मणत्व, क्षत्रित्व, वाणिज्य एवं सेवा आदि सभी कर्मों को बिना प्रतिबन्ध के कर सकते हैं। वैष्णव वर्ण के सदस्यों के प्रमुख कर्मों एवं उनके दायित्वों का वर्णन अध्याय- (११) में विस्तार पूर्वक किया गया है। जिसमें बताया गया है कि वैष्णव वर्ण के सदस्य किस प्रकार से - ब्राह्मणत्व, क्षत्रित्व, वाणिज्य एवं सेवा आदि सभी कर्मों को स्वतन्त्र रूप से बिना किसी प्रतिबन्ध के करते हैं।
(६)- और अन्त में सबसे महत्वपूर्ण छठवाँ अन्तर यह है कि -
ब्राह्मी वर्ण- व्यवस्था में दास को सबसे निकृष्ट कर्म करने वाला बताया गया तथा उन्हें घृणा की दृष्टि से देखा गया। इस बात की पुष्टि- मनुस्मृति- अध्याय २- के श्लोक संख्या- (३१ और ३२) से होती है जिसमें लिखा गया है कि -
मङ्गल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम्।
वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्॥३१।
शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम् ।
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम्॥३२।
अनुवाद- ३१-३२
• ब्राह्मण का नाम शर्मवत्- (यज्ञ में पशु बलि करने से सम्बन्धित अथवा मूलक) होना चाहिए, क्षत्रिय का नाम शक्ति से सम्बन्धित होना चाहिए, वैश्य का नाम धन से सम्बन्धित होना चाहिए, जबकि शूद्र (दास) का नाम घृणित होना चाहिए। ३१।
• ब्राह्मण का नाम शर्मवत् , क्षत्रिय का नाम 'रक्षापरक', वैश्य का नाम 'समृद्धिपरक' तथा शूद्र का नाम दासत्व (गुलामीपरक) का बोधक होना चाहिए। ३२।
जबकि इसके विपरीत वैष्णव वर्ण में सभी भक्त अपने आप को भगवान का दास मानते हुए अपने को दास कहलाना ही श्रेयस्कर समझाते हैं। या यूं कहें कि वैष्णव भक्तों को दास ही कहा जाता है जैसे- रैदास, सूरदास, कबीरदास, मलूकदास इत्यादि। और एक सच्चा वैष्णव भक्त जब भी अपनी भक्ति का फल भगवान से मांगता हैं, तो वह केवल भगवान के दासत्व के अतिरिक्त और कुछ नहीं माँगता।
वास्तव में देखा जाए तो वैष्णव सन्तों में दास पदवी का प्रचलन वैष्णव भक्त राजा ययाति के द्वारा ही हुई।
क्योंकि पूर्वकाल में जब राजा ययाति ने भगवान विष्णु से वरदान माँगा तो उन्होंने स्वयं को विष्णु का दासत्व पाने का का ही वर माँगा।
इस सत्य की पुष्टि -पद्मपुराण-भूमिखण्ड के अध्याय-( ८३) के श्लोक- (८०) से होती है।
"राजोवाच
यदि त्वं देवदेवेश तुष्टोसि मधुसूदन ।
दासत्वं देहि सततमात्मनश्च जगत्पते।८०।
अनुवाद- राजा (ययाति) ने कहा ! हे देवों के स्वामी ! हे जगत के स्वामी ! यदि तुम प्रसन्न हो तो मुझे अपना शाश्वत दासत्व (वैष्णव- भक्ति) ही दीजिए।८०।
अन्ततः
दास शब्द की व्याख्या; ऋग्वेद में परमोदार ( दाता ) और दानी के रूप में भी हुई है। दास शब्द दान देने (दासृ= दाने) के अर्थ में है। यथा ऋग्वेद के इस निम्न ऋचा को देख लें-
यस्ते भरादन्नियते चिदन्नं निशिषन्मन्द्रमतिथिमुदीरत् ।
आ देवयुरिनधते दुरोणे तस्मिन्रयिर्ध्रुवो अस्तु दास्वान् ॥७॥ (ऋग्वेदः सूक्तं ४/२/७)
▪️हे अग्निदेव ! उसके यहाँ एक पुत्र पैदा हो, जो भक्ति में दृढ़ और प्रसाद में उदार हो, जो भोजन की आवश्यकता होने पर आपको यज्ञ द्वारा भोजन प्रदान करता हो, जो आपको लगातार प्रसन्न करने वाला सोमरस देता हो, जो अतिथि के रूप में आपका स्वागत करता हो , और श्रद्धापूर्वक आपको उसके आवास में प्रज्ज्वलित करता हो।" (दास्वान् = दानवान्सा- यणभाष्यम्)
अतः उपरोक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि- वैष्णव भक्तों के लिए दास शब्द ही यथार्थ है। जिसका अर्थ- दान कर्ता भी है। जिसमें दास शब्द अपने विकास क्रम में कई अर्थों को धारण करता हुआ आज वैष्णव भक्तों का वाचक है।। इस सम्बन्ध में और विस्तृत जानकारी इस पुस्तक के अध्याय -(७) के भाग- (१) "महाराज यदु के परिचय" में दी गई है।
इस प्रकार से यह भाग (दो) वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति तथा दोनों में मूलभूत अन्तर एवं विशेषताओं की जानकारी के साथ समाप्त हुआ।
अब हमलोग इसी क्रम में भाग (तीन) में भारतीय समाज में वंश की अवधारणा एवं यादवों के वंश को जानेंगे।
भाग-(३) यादवों का वंश।जाति और वंश में बस इतना ही अन्तर है कि जाति एक सामूहिक नाम है और वंश उस जाति समूह का व्यक्तिगत नाम है। वास्तव में देखा जाए तो वंश- दो प्रकार के होते हैं।
(१) प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश।
(२) टोटम या आध्यात्मिक वंश
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(१)
प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश-:जब किसी जाति के अन्तर्गत किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर सर्वप्रथम पहचान स्थापित होती है तो उस व्यक्ति के नाम पर उस जाति का एक वंश स्थापित होता है। इस तरह के वंश को प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश कहा जाता है।
इस तरह के वंश के लिए कोई आवश्यक नहीं है कि वह विशेष व्यक्ति जिसके नाम पर वंश बना है, वह राजा ही हो। क्योंकि ऐसे बहुत से वंश हैं जो किसी ऋषि-मुनि के नाम से ही बनें हैं। जैसे ब्राह्मण जाति में जो वंश बनें हैं वे सभी किसी न किसी ऋषि मुनि के नाम से ही हैं।
इस तरह के वंश में उस जाति का( Blud rilative) ब्लड रिलेशन होता है।
जैसे यादवों का वंश "
यदुवंश" सर्वप्रथम महाराज यदु से स्थापित हुआ जिसमें यादवों का ब्लड रिलेशन है। इसके बारे में आगे विस्तार से बताया गया है।
(२) टोटम या आध्यात्मिक वंश -:टोटम
किसी समूह के लोगों का प्रतीक होता है, जैसे कि परिवार, कबीला, वंश या जनजाति. यह एक पवित्र वस्तु, आत्मिक प्राणी या प्रतीक हो सकता है.
गणचिह्नवाद या
टोटम प्रथा (
totemism) किसी समाज के उस विश्वास को कहतें हैं जिसमें मनुष्यों का किसी
जानवर,
वृक्ष,
पौधे या अन्य आत्मा से सम्बन्ध माना जाए। 'टोटम' शब्द ओजिब्वे (
Ojibwe) नामक
मूल अमेरिकी आदिवासी क़बीले की भाषा के 'ओतोतेमन' (
ototeman) से लिया गया है, जिसका मतलब 'अपना भाई/बहन रिश्तेदार' है। इसका मूल शब्द 'ओते' (
ote) है जिसका अर्थ एक ही माँ के जन्में भाई-बहन हैं जिनमें ख़ून का रिश्ता है और जो एक-दूसरे से विवाह नहीं कर सकते। अक्सर टोटम वाले जानवर या वृक्ष का उसे मानने वाले क़बीले के साथ विशेष सम्बन्ध माना जाता है और उसे मारना या हानि पहुँचाना वर्जित होता है,
जब किसी जाति के लोग सामूहिक रूप से किसी प्राकृतिक वस्तु जैसे तारे, ग्रह या उपग्रह को आध्यात्मिक प्रतीक या चिन्ह के रूप स्वीकार करते हुए उसको अपना ईष्ट देव मानकर उसी के नाम पर अपना एक वंश स्थापित करते हैं तो इस तरह के वंश को टोटम या आध्यात्मिक वंश कहा जाता है। इस तरह के वंश में उस जाति का किसी भी तरह से ब्लड रिलेशन नहीं होता है। जैसे चंद्रवंश और सूर्यवंश।
हो सकता है कि जो लोग अपने को सूर्यवंशी मानते हों उनका सूर्य से ब्लड रिलेशन होता होगा किन्तु जितने चन्द्रवंशी हैं उनका चन्द्रमा से ब्लड रिलेशन नहीं है।
क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि तारे और ग्रहों से पुत्र इत्यादि पैदा करके किसी जाति की जन्मगत वंशावली बताकर उनमें ब्लड रिलेशन स्थापित करना महामूर्खता होगी क्योंकि चन्द्रमा कोई मानव नहीं है कि उससे पुत्र या पुत्री उत्पन्न होंगी। वह एक आकाशीय पिण्ड है इसलिए चन्द्रमा से पुत्र इत्यादि उत्पन्न करना अवैज्ञानिक एवं कोरी कल्पना ही है। जिसे वर्तमान समय में किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसा वंश अर्थात् आकाशीय पिण्डों वाला वंश केवल आस्था, टोटम और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही स्वीकार्य किये जा सकतें हैं। इसी आस्था और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यादवों का प्रथम वंश "चन्द्रवंश" हुआ है। किन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि यादव चन्द्रमा से उत्पन्न हुए हैं। जबकि इस सम्बन्ध में वास्तविकता यह है कि सभी यादव चन्द्रमा से नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुए हैं। इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता विश्वजित्खण्ड के अध्यायः (२) के श्लोक संख्या- ७ से है जिसमें भगवान श्री कृष्ण उग्रसेन से कहते हैं-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। ७।
अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि समस्त यादवों की उत्पत्ति चन्द्रमा से नहीं बल्कि श्रीकृष्ण से हुई है।
और जिस तरह से यादवों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण से हुई, उसी तरह से प्रारम्भिक काल में चन्द्रमा की भी उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश से उत्पन्न विराट विष्णु से हुई। इसकी पुष्टि ऋग्वेद के १०/९०/१३ की ऋचा से होती है जिसमें लिखा गया है कि -
चन्द्रमा मनसो जातश्वक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्रणाद्वायुरजायत।।१३।
अर्थात् - परमात्मा-रूपी पुरुष के मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, उसके चक्षु से सूर्य, श्रोत्र से वायु और प्राण तथा मुख से अग्नि, उत्पन्न हुई।
✳️ ज्ञात हो पूर्व काल से ही चन्द्रमा और यादवों की उत्पत्ति विशेष के कारण यादवों और चन्द्रमा में घनिष्ठ सम्बन्ध रहा। जिसके परिणाम स्वरूप यादवों ने भूतल पर चन्द्रमा को अपना प्रथम ईष्ट देव मानकर चन्द्रमा के नाम पर अपना आध्यात्मिक एवं प्राथमिक वंश "चन्द्रवंश" को स्थापित किया।
और हर द्वापर युग में भूतल पर इसी चन्द्रवंश में भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ करता है। इसकी पुष्टि- विष्णु पुराण के पञ्चंम अंश के अध्याय-२३ के श्लोक सं- २४ में कहते हैं कि-
कस्त्वमित्याह सोऽप्याह जातोऽहं शशिनः कुले।
वसुदेवस्य तनयो यदोर्वंशसमुद्भवः।।२४।
अनुवाद - मैं चन्द्रवंश के अंतर्गत यदुकुल में वसुदेव जी के पुत्र रूप से उत्पन्न हुआ हूँ।
और आगे चलकर इसी चन्द्रवंश में महाराज यदु के नाम पर यदुवंश का उदय हुआ जिसके समस्त सदस्यपत्तियों को यादव कहा जाता है। इसकी पुष्टि-
विष्णु पुराण के चौथे अंश के अध्याय- ग्यारह के श्लोक २८ से ३० से होती है, जिसमें लिखा गया है कि -
यतो वृष्णिसंज्ञामेतद् गोत्रमवाप।। २८।।
मधुसंज्ञाहेतुश्च मधुरभवत्।। २९।।
यादवाश्च यदुनामोपलक्षणादिति।। ३०।।
अनुवाद - २८-३०
मधु के कारण इसकी संज्ञा मधु हुई और यदु के नामानुसार इस वंश के लोग यादव कहलाए।
• जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण को चन्द्रवंश में अवतरित होने की पुष्टि होती है उसी तरह से उनको यादव वंश में भी अवतरित होने की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- २२ के पूर्वाद्ध से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को अहीर जाति के यादव वंश के गोकुल में जन्म लेने की पुष्टि- हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ से होती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों (आभीरों) में अवतार ग्रहण किया है।
(यादव वंश को विस्तार पूर्वक इस पुस्तक के अध्याय (७) में बताया गया है। जहाँ आपको यादवों के आदि पुरुष महाराज यदु का जीवन परिचय एवं यादव वंशावली की क्रमिक जानकारी मिलेगी।)
अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि आभीर जाति के विकास क्रम में चन्द्रवंश के अन्तर्गत यदुवंश का उदय हुआ। यदुवंश में भगवान श्रीकृष्ण को अवतरित होने से ही उन्हें यादव कहा गया जो उनकी वंश मूलक पहचान है। तथा उनको आभीर जाति में जन्म लेने से उन्हें आभीर कहा गया जो उनके जाति रूपी पहचान है। इसी क्रम में उन्हें गोपालन करने से उन्हें गोपाल और ग्वाला कहा गया जो उनकी वृत्ति अर्थात् व्यवसाय मूलक पहचान है। इसी तरह से उनकी कुल मूलक पहचान के लिए वार्ष्णेय कहा गया। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण सहित आभीरो को चाहे अहीर कहें, गोप- कहें , गोपाल कहें, ग्वाला कहें, या यादव कहें ,सब एक ही बात है।
अब हमलोग इसी क्रम में यादवों के कुल के बारे में जानेंगे। जो इस अध्याय के भाग (४) में वर्णित है।
भाग- (४) कुल
ज्ञात हो कि- कुल और गोत्र में बहुत अन्तर नहीं होता है। क्योंकि कुल और गोत्र दोनों ही रक्त सम्बन्ध के ही प्रतीक हैं। दोनों में केवल अंग और अंगी जैसा अन्तर है किन्तु दोनों का मूल आधार रक्त सम्बन्ध ही है। जिसमें गोत्र परिवारों एवं परिवारों का एक सामूहिक रूप है, जिसमें उनका एक जनन अर्थात् (Genetic) गोत्र होता है, जो सदैव निर्देशित करता है कि सात पीढ़ी तक एक ही कुल या परिवार में विवाह वर्जित है।
वास्तव में देखा जाए तो गोत्र नाम की आवश्यकता विवाह इत्यादि के समय होती है। बाकी अपनी पहचान इत्यादि के समय गोत्र और कुल का नाम एक ही सन्दर्भ में प्रयुक्त होता। इस भिन्नता को समझने की आवश्यकता है तभी भगवान श्रीकृष्ण सहित यादवों के जन्म और उनके कुल, गोत्र, वर्ण, और वंश व जाति की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो पाएगा। जैसे-
पौराणिक ग्रन्थों में कहीं-कहीं यादवों के वंश "यदुवंश" को ही "कुल" तथा कहीं-कहीं यादवों के वर्ण "वैष्णव" को कुल और कहीं पर यादवों के कुल "गोप कुल" को मुख्य कुल मानकर भगवान श्रीकृष्ण को भूतल पर जन्म लेने को बताया गया है। किन्तु सभी तरह से कही गई बातें एक ही है, इसको अच्छी तरह से समझनें की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित (तीन) उदाहरण प्रस्तुत है।
(१)- श्रीकृष्ण का जन्म यदु वंश में -
(क)- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) में सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदु के वंशज (वृष्णि) कुल में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर गोप रूप में लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करते रहोगे।१६१।
(ख)- गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक संख्या (४५) व (४६) में श्रीकृष्ण का जन्म यादवों के कुल वृष्णि में होने की पुष्टि होती है।
राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५।
भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।
अनुवाद - ४५-४६
• राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यदुओं ( यादवों) के वृष्णि नामक कुल में श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए है। अर्थात् यदु के एक सौ एक कुल हैं जिसमें वृष्णि कुल में कृष्ण का जन्म हुआ है ।४५।
• पृथ्वी का भार उतारने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४६।
(उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को यदुवंश के कुल में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं उन सभी को दोहराना उचित नही है।)
विशेष:- एक जाति में अनेक वंश और एक वंश में अनेक कुल ऱ एक कुल या गोत्र में अनेक परिवार होते हैं। यद्यपि कुल के लिए कभी कभी गोत्र शब्द एक विवाह में वर -वधु के रक्त विभेदक की भूमिका में महत्वपूर्ण होता है।
(२)- श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में -
(क)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है। जिसमें ब्रह्माजी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि-
अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
(ख)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -(४) के श्लोक संख्या- (२२) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है।
(३)- श्रीकृष्ण का जन्म गोप कुल या आभीर जाति में -
यादवत्राणकर्त्रे च शक्रादाभीररक्षिणे ।।
गुरुमातृद्विजानां च पुत्रदात्रे नमोनमः ।।१६।।
जरासंधनिरोधार्त नृपाणां मोक्षकारिणे ।।
नृगस्योद्धारिणे साक्षात्सुदाम्नोदैन्यहारिणे ।। १७।।
हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में श्रीकृष्ण का जन्म गोप जाति या आभीर जाति में होने को बताया गया है। जिसकी पुष्टि स्वयं श्रीकृष्ण ने ही किये हैं।
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
(हरिवंश पुराण उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को गोपजन्म विशेषण पद से गोपजाति में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही और भी बहुत से उदाहरण हैं।)
अतः भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से सम्बन्धित उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है किसी भी जाति में एक वंश होता है और वंश में अनेकों कुल और गोत्र होते हैं एक कुल में अनेक परिवार होते हैं।।
महाभारत काल में यादवों के कुलों की संख्या एक सौ से भी अधिक थी। उन सभी का एक ही मुख्य महाकुल था जिसका नाम था "वैष्णव महाकुल" इसी वैष्णव महाकुल में यादवों के अनेकों कुल- अन्धक, वृष्णि, कुकुर, भोज इत्यादि थे।
जिनको कुल या खानदान के नाम से जाना भी जाता था। इसकी पुष्टि- वायुपुराण के उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-(३४) के श्लोक- २५५ और २५६ से होती है।
कुलानि दश चैकञ्च यादवानां महात्मनाम्।
सर्व्वमककुलं यद्वद्वर्त्तते वैष्णवे कुले।२५५।
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।
अनुवाद:- २५५-२५६
• यादवों के एक सौ एक वैष्णव महाकुल हैं। उन सभी में स्वराट् विष्णु (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं।२५५।
• अर्थात् उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।
इसी तरह से मत्स्यपुराण के अध्यायः (४७) के श्लोक (२८)और (२९) में यादवों के मुख्य वैष्णव महाकुल में सौ से अधिक उपकुल होने को बताया गया है-
कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम् ।
सर्वमेतत्कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले।२८।
विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः।२९।
अनुवाद - २८-२९
• इन महाभाग यादवों के एक सौ एक कुल थे। जो सब-के सब श्रीकृष्ण से सम्बन्धित वैष्णव महाकुल के अन्दर ही विद्यमान थे।।२८।
• भगवान श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) उनके नेता और स्वामी थे। तथा वे सभी यादव श्रीकृष्ण की आज्ञा के अधीन रहते थे "ऐसा कहा जाता है।।२९।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि यादवों का एक मुख्य अथवा महाकुल है जिसका नाम है "वैष्णव महाकुल है।" इसी वैष्णव महाकुल में अनेकों उपकुल हैं जो वैष्णव नाम से ही जानें जातें हैं, क्योंकि उन सभी में प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित रहते हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं। इस बात की प्रमाणिकता के लिए नीचे वर्णित वायुपुराण उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-३४ के श्लोक- २५६ को देख सकते हैं-
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।
अनुवाद:- उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।
अब हमलोग इसके अगले भाग- (५) में यादवों के प्रमुख गोत्रों के बारे में जानेंगे कि यादवों में कितने प्रकार के गोत्र होते हैं।
भाग- (5) यादवों का गोत्र-
इस भाग का मुख्य उदेश्य किसी जाति के अन्तर्गत गोत्रों का निर्धारिण कब और कैसे होता है इस तथ्य की जानकारी देना है। इसी क्रम में यादवों के प्रमुख गोत्रों के बारे में भी जानकारी देना है कि यादवों में कितने गोत्र और उपगोत्र हैं ?
तो इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि किसी भी जाति में व्यक्ति का गोत्र मुख्यतः तीन प्रकार या कहें तीन तरह से स्थापित होता है-
(१)- जनन या (Genetic) गोत्र।
(२)- स्थानीय गोत्र।
(३)- गुरु गोत्र।
उपर्युक्त तीनों प्रकार के गोत्रों के बारे नीचे क्रमबद्ध रूप से बताया गया है।
(१)- जनन या (Genetic) गोत्र।
जनन गोत्र को मूल गोत्र भी कहा जाता है। शास्त्रों में जनन गोत्र को ही पिण्ड गोत्र कहा गया है। यह गोत्र अपने नाम की सार्थकता को सिद्ध करते हुए यह पहचान कराता है कि किसी व्यक्ति का जन्मगत आधार क्या है और उसकी प्रारम्भिक उत्पत्ति किससे हुई है। अर्थात उसके प्रथम जनक कौन हैं।
जनन गोत्र में किसी जाति के समस्त व्यक्तियों का रक्त सम्बन्ध होता है जिनके प्रत्येक सदस्यों की (D.N.A.) संरचना लगभग एक समान होती है।
डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (संक्षिप्त रूप में DNA) वह अणु है जो किसी जीव के विकास और प्रवृत्तिमूलक तथ्यो के लिए आनुवंशिक जानकारी कराता है।
ये मनुष्यों के वंशमूलक गुणों का संवाहक है। गोत्र भी वंश मूलक अवयव ही हैं।
गोपों (यादवों) का जनन गोत्र "कार्ष्ण" है।
जो कृष्ण पद में सन्तान वाचक अण् प्रत्यय लगाने पर कृष्ण से "कार्ष्ण" पद बना है। (कृष्णस्येदम् + अण् = कार्ष्ण) जिसका अर्थ है श्रीकृष्ण की सन्तान अर्थात् जो श्रीकृष्ण से उत्पन्न हुआ हो।
और इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि यादवों (गोपों) का जन्म गोपेश्वर श्रीकृष्ण के क्लोन (Clone) से हुआ है, इसलिए समस्त यादवों का जनन गोत्र कार्ष्ण है। इसके बारे में आगे विस्तार बताया गया है कि कैसे यादवों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण से होने की वज़ह से उनका जनन गोत्र "कार्ष्ण" है।
कृष्ण का गोलोक में विराजमान गोपेश्वर ररूप से ही गोपों की उत्पत्ति हुई है।
किन्तु जनन गोत्र की बात तब तक अधूरी रहेगी जब तक भारतीय संस्कृति और शास्त्रों के आधार पर इसकी जानकारी न हो जाए।
भारतीय संस्कृति व पौराणिक ग्रन्थों में मुख्यतः तीन प्रकार के जनन गोत्रों की जानकारी मिलती है -
(१) गोत्र
(२) प्रवर गोत्र
(३) पिण्ड गोत्र
ये तीनों ही प्रकार के गोत्र सन्निकट रक्त सम्बन्धों की श्रृंखला है। इन तीनों के बारे जानना आवश्यक है।
(१)- "गोत्र" शब्द से तात्पर्य विवाह इत्यादि के अवसरों पर अपने किसी आदि पुरुष के नाम पर अपना परिचय देना या उसके नाम का आह्वान करना है।
गोत्र के बारे में भरत मुनि का कहना हैं कि - "गोत्रम्- गवते शब्दयति पूर्व्वपुरुषान् यतिति"।
अर्थात्- जिसके द्वारा अपने "कुल" के पूर्व पुरुष का आह्वान किया जाए वह गोत्र है।
ध्यान रहे अमरकोश के अनुसार गोत्र कुल का भी पर्याय है।
(२)- प्रवर गोत्र
प्रवर का मतलब प्रधान, सर्वश्रेष्ठ या पूज्य होता है। इसी आधार पर "प्रवर" गोत्र की स्थिति बनी है। इस प्रकार के गोत्र श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों के नाम पर ही आधारित होते हैं। जो अधिकांशतः ब्राह्मणों के ही गोत्र हैं।
भारतीय विवाहों में प्रवर गोत्र का भी ध्यान रखा जाता है, अर्थात् समान प्रवर वालों में विवाह वर्जित है। देखिए गौतम, नारद तथा आपस्तम्ब के वचन-
" समानैक: प्रवरो येषां तैः सह न विवाहः" (1.23.12)
A line of ancestors.पूर्वजों की एक पंक्ति प्रवर है।
प्रारम्भ में 'प्रवर' का अर्थ याज्ञिक कार्य से सम्बद्ध अग्नि का आवाहन करने वाले ऋषियों से ही था। वरणीय/ प्रार्थनीय/ आवाहनीय श्रेष्ठ ऋषि 'प्रवर' कहलाते थे। ये ऋषि उद्गाता भी कहे जाते थे। याज्ञिक अनुष्ठान में पुरोहित अपने सर्वश्रेष्ठ पूर्वज ऋषि का नाम-स्मरण करते थे, जो उनके समुदाय या समाज के प्रतीक थे। कालान्तर में ये ऋषि अपने वंशजों की सामाजिक, सांस्कारिक तथा आध्यात्मिक व्यवस्था से जुड़ते चले गए। ये ही ऋषि आगे चलकर प्रवर-प्रवर्तक हुए और उनके नामों पर अनेकों प्रवर गोत्र बने जो सभी ब्राह्मणों के लिए ही हैं।
(३)- पिण्ड गोत्र।
दरअसल देखा जाए तो जनन गोत्र और पिण्ड गोत्र का रक्त सम्बन्धी उत्पति सिद्धान्त एक ही है। बस इन दोनों में थोड़ा बहुत अन्तर है उसे जानना आवश्यक है। इसके लिए नीचे देखें -
(क)- जनन गोत्र-
जनन गोत्र उस प्रारम्भिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ से किसी जाति विशेष लोगों की प्रारम्भिक उत्पत्ति हुई है। जैसे- गोपों की प्रारम्भिक उत्पत्ति पूर्व काल में गोलोक में श्रीकृष्ण से हुई है। इस लिए गोपों का जनन गोत्र श्रीकृष्ण के नामानुसार कार्ष्ण है। यह गोपों का मूल व प्रारम्भिक गोत्र है।
इसके बारे में आगे विस्तार से बताया गया है।
(ख)- जनन गोत्र की ही तरह पिण्ड गोत्र भी हैं। किन्तु पिण्ड गोत्र "जनन" गोत्र के बाद की उत्पत्ति को दर्शाता है। पिण्ड गोत्र को पितृ- गोत्र भी कहा जाता है, जो किसी जाति विशेष के पूर्वजों के नाम से होता है जिसके कारण अनेक पिण्ड गोत्रों की उत्पत्ति होती है। इसी पितृ गोत्र को ध्यान में रखकर सगोत्र विवाह वर्जित होते है।
किन्तु माता की पाँचवीं तथा पिता की सातवीं पीढ़ियों के बाद सपिण्डता का दोष नहीं रहता है। वर्तमान समय में यादवों में उनके पूर्वजों के नाम पर बहुत से पिण्ड-गोत्र हैं जिनका यहाँ पर वर्णन करना सम्भव नहीं है।
इसी तरह से कुछ लोग अपनी प्रारम्भिक उत्पत्ति या जन्म को किसी ऋषि-मुनि से मानते हुए उनके नाम पर जनन गोत्र का निर्धारण करते हुए अक्सर कहा करते हैं कि मैं इस ऋषि या उस ऋषि का सन्तान हूँ।
इसी तरह से जो लोग अपने को ब्रह्मा की सन्तान मानते हैं। उन सभी का जनन गोत्र कहें या मूल गोत्र- "ब्राह्मी गोत्र" है। जैसे- ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न कुछ ब्राह्मण इत्यादि का गोत्र।
अब आप लोगों यहाँ पर यह सोच रहे होंगे कि कुछ ही ब्राह्मण क्यों ? सभी ब्राह्मण क्यों नहीं ? क्या सभी ब्राह्मण ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न नहीं हैं ? तो इसका जवाब है नहीं। क्योंकि सभी ब्राह्मण ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न नहीं हुए हैं।
वास्तविकता यह है कि- प्रारम्भ में ब्रह्माजी के मुख से केवल ब्राह्मण पुरुष वर्ग ही उत्पन्न हुआ था न की ब्राह्मणी स्त्रियाँ। क्योंकि किसी भी पौराणिक ग्रन्थों में यह नहीं लिखा गया है कि ब्रह्माजी के मुख से ब्राह्मणों के साथ-साथ ब्राह्मणी स्त्रियाँ भी उत्पन्न हुईं थीं।
यहीं कारण है कि कुछ पौराणिक ग्रन्थों में ब्राह्मणों के जन्म विस्तार को अन्य तरह से बताया गया है। किन्तु यहाँ पर ब्राह्मणों की उत्पत्ति या उनका गोत्र बताना हमारा उद्देश्य नहीं है। फिर भी यदि कोई इन बातों को जानना ही चाहता है तो वह स्कन्दपुराण खण्ड- (३) के अध्याय- (३९ ) के प्रसंगों को पढ़कर इस विषय की जानकारी ले सकता है कि कुछ ब्राह्मणों का जनन का विस्तार कैसे हुआ है।
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि जनन गोत्र व्यक्ति के जन्मगत आधार को दर्शाते हुए यह पहचान कराता है की व्यक्ति की प्रारम्भिक उत्पत्ति जिससे हुई है, उसी के नामानुसार उस व्यक्ति का जनन गोत्र निर्धारित होता है।
✴️ यादवों का जनन गोत्र- "कार्ष्ण"
जनन गोत्र सिद्धान्त के अनुसार यादवों का जनन गोत्र कार्ष्ण है। क्योंकि कृष्ण पद में सन्तान वाचक "अण्" प्रत्यय लगाने पर "कार्ष्ण" पद बना है। (कृष्णस्येदम् + अण् = कार्ष्ण) जिसका अर्थ है श्रीकृष्ण की सन्तान अर्थात् जो श्रीकृष्ण से उत्पन्न हुआ हो।
इस हिसाब से देखा जाए तो आभीर जाति के अन्तर्गत समस्त गोप-गोपियों अर्थात् यादवों का जन्म प्रारम्भिक काल में गोलोक में ही गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से हुआ है। तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि- गोपों में श्रीकृष्ण का तथा गोपियों में श्रीराधा का रक्त अवश्य ही विद्यमान होगा। और रक्त सम्बन्ध ही किसी जाति या जनन गोत्र का मूल आधार है कि उसमें प्रारम्भिक रक्त किसका है।
इस हिसाब से भी देखा जाए तो समस्त गोपों में श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कुछ कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागरखण्ड के अध्याय- (१९३) के श्लोक -(१४) में मिलता है। जिसमें आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती हैं कि -
"तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
अनुवाद - हे विष्णो (कृष्ण)! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे।१४
देखा जाए तो उपर्युक्त श्लोक में देवी गायत्री बड़े ही स्पष्ट रूप से गोपों (आभीरों) को श्रीकृष्ण
का ही रक्त सम्बन्धी (blood relative) होने को कहतीं हैं। और जहाँ तक गोप और गोपियों का जन्म श्रीकृष्ण और श्रीराधा से होने की बात है तो इसकी पुष्टि के लिए निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत हैं-
क्योंकि (स्वराट विष्णु) अर्थात् श्रीकृष्ण उन सबके प्रमाण में और प्रभुत्व में व्यवस्थित थे ऐसी बात उपर्युक्त श्लोकों में लिखी गई है।
ठीक उसी तरह से आज वर्तमान समय में भी यादवों की पहचान हर प्रान्तों में अलग-अलग गोत्रों, परिवारों, या कुलों से होती हैं। किन्तु उनका मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण गोत्र" ही। जैसे- ढ़़ढ़ोर, ग्वाल, कृष्नौत, मझरौट, मथुरौट, नारायणी, घोसी, घोष, गोल्ला, गवली, मरट्ठा, मथुवंशी, इत्यादि बहुत से स्थानीय उपगोत्र है, उन सभी को यहाँ बता पाना सम्भव नहीं है।
क्योंकि अभीर जाति के समस्त यादवों यानी समस्त गोपों की उत्पत्ति पूर्व काल में श्रीकृष्ण के रोमकूपों से ही हुई है। इस बात को जनन गोत्र वाले प्रसंग में पहले ही बताया गया है।
अब हमलोग तीसरे प्रकार के गोत्र - गुरु गोत्र के बारे में जानेंगे।
✴️ (३)- गुरु गोत्र-
तीसरे प्रकार के गोत्र का नाम "गुरुगोत्र" है। इस तरह का गोत्र तब निर्धारित होता है, जब कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह किसी ऋषि या अपने मनपसन्द के विश्वसनीय सतनामी गुरु या किसी ऋषि मुनि से- दीक्षा, गुरुमंत्र या गुरूमुखी होकर उसका अनुयायी बनकर उसके नाम पर अपने गोत्र का निर्धारण करता हैं तब उस ऋषि या गुरु के नाम से उसका गोत्र निर्धारित होता है। इसलिए इस प्रकार के गोत्र को "गुरुगोत्र " कहा जाता है, जिसमे गोत्र कर्ता (ऋषि) और उसके अनुयायियों में किसी प्रकार का रक्त सम्बन्ध न होकर केवल गुरु शिष्य का सम्बन्ध रहता है।
इस तरह के गोत्र का मुख्य उद्देश्य- दीक्षा, शिक्षा, पूजा-पाठ, विवाह इत्यादि को सम्पन्न कराना होता है। जैसे यादवों का "गुरुगोत्र" अत्रि है। किन्तु इस अत्रि गोत्र से यादवों का किसी भी तरह से रक्त सम्बन्ध नहीं है।
यादवों के इस वैकल्पिक "गुरुगोत्र" अत्रि नाम की परम्परा का प्रारम्भ सर्वप्रथम भू-तल पर ब्रह्माजी के पुष्कर यज्ञ में अहीर कन्या देवी गायत्री के विवाह के उपरान्त ही प्रचलन में आया।
जिसमें अहीर कन्या देवी गायत्री का विवाह ब्रह्मा से अत्रि ने ही यज्ञ में मन्त्रोच्चारण से सम्पन्न कराया था। क्योंकि उस यज्ञ के प्रमुख "अध्वर्यु" होता- (यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करनें वाला पुरोहित) अत्रि ही थे। उसी समय से ऋषि अत्रि गोपों के प्रथम ब्राह्मण पुरोहित हुए। और गोपों के प्रत्येक धार्मिक कार्यों को सम्पन्नता का संकल्प लिया तथा गोपों ने भी ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम से गुरुगोत्र स्वीकार किया।
किन्तु गोप और अहीर कभी नहीं हो सकते। और जब ऋषि अत्रि गोप, अहीर नहीं हो सकते तो निश्चित रूप से वह यादव भी नहीं हो सकते। यह ध्रुव सत्य है।
जबकि वास्तविकता यह है कि सर्वप्रथम चन्द्रमा की उत्पत्ति गोलोक में विराट विष्णु से हुई है न कि ब्राह्मण ऋषि अत्रि से।
✳️ ज्ञात हो- विराट विष्णु, गोपेश्वर श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश हैं। जिनकी उत्पत्ति गोलोक में ही परमेश्वर श्रीकृष्ण की चिन्मयी शक्ति से श्रीराधा के गर्भ से हुई है, इसलिए उन्हें गर्भोधकशायी विष्णु भी कहा जाता है। इन्हीं गर्भोधकशायी विष्णु के अनन्त रोम कूपों से अनन्त ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति हुई और उनमें भी उतनें ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश उत्पन्न हुए तथा उतने ही सूर्य और चन्द्रमा उत्पन्न हुए। फिर उन प्रत्येक ब्रह्माण्डों में ब्रह्मा जी उत्पन्न होकर श्रीकृष्ण के आदेश पर द्वितीय सृष्टि की रचना किये हैं। द्वितीय सृष्टि रचना में ब्रह्मा के दस मानस पुत्र उत्पन्न हुए, उन दस मानस पुत्रों में अत्रि भी थे। तो इस स्थिति में ऋषि अत्रि अलग से चन्द्रमा को कैसे उत्पन्न कर सकते हैं ?
अर्थात यह सम्भव नहीं है क्योंकि अत्रि के जन्म की तो बात दूर, इनके पिता ब्रह्मा की भी उत्पत्ति से बहुत पहले सूर्य और चन्द्रमा की उत्पत्ति विराट विष्णु से हो चुकी होती है। कुल मिलाकर पौराणिक ग्रन्थों में ऋषि अत्रि से चन्द्रमा की उत्पत्ति बताने का एकमात्र उद्देश्य ब्राह्मी वर्णव्यवस्था में यादवों को निराधार और बेवजह सम्मिलित करना एक सोची-समझी साजिश के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
इस बात को प्रत्येक यादवों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए।
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दूसरी बात यह कि- विराट-विष्णु अर्थात् श्रीकृष्ण से चन्द्रमा की उत्पत्ति की पुष्टि- श्रीमद्भगवद् गीता के अध्याय- (११) के श्लोक- (१९) से होती है जिसमें विराट पुरुष से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एवं विलय क्रम में सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति को सर्वप्रथम भूतल पर अर्जुन ने उस समय देखा और जाना जब भगवान श्रीकृष्ण अपने विराट रूप का दर्शन अर्जुन को कराते हैं। उस विराट पुरुष को देखकर अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं -
"अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।
(श्रीमद्भागवत पुराण- ११/१९)
अनुवाद- आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस संसार को तपाते हुए देख रहा हूँ।१९।
इसी प्रकार से विराट विष्णु से चन्द्रमा की उत्पत्ति का प्रमाण ऋग्वेद में भी मिलता है। जिसमें लिखा गया है कि -
"चन्द्रमा मनसो जातश्वक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्रणाद्वायुरजायत।।१३।
अनुवाद- महाविष्णु के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य ज्योति, मुख से तेज और अग्नि का प्राकट्य हुआ।
अतः उपर्युक्त तमाम साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि- चन्द्रमा की उत्पत्ति विराट विष्णु से हुई है अत्रि से नहीं।
और यह भी सिद्ध हुआ कि- विष्णु से उत्पन्न होने के नामानुसार चन्द्रमा भी उसी तरह से वैष्णव हुआ जिस तरह से विष्णु से उत्पन्न गोप (यादव) वैष्णव हैं। यह ध्रुव सत्य है।
✳️ - किन्तु ध्यान रहे चन्द्रमा कोई मानवी सृष्टि नहीं है वह एक आकाशीय पिण्ड है इसलिए उससे कोई पुत्र इत्यादि उत्पन्न होने की कल्पना करना भी महती मूर्खता होगी।
चन्द्रमा के दिन-मान से वैष्णव लोग काल- गणना करते हैं तथा अपना प्रथम वंशज और आराध्य देव मानकर पूजा करते हैं। इसी परम्परा से वैष्णव वर्ण के गोपों में चन्द्रवंश का उदय हुआ।
और भगवान श्रीकृष्ण जब भी भू-तल पर अवतरित होते हैं तो वे चन्द्रवंश के अन्तर्गत वैष्णव वर्ण के अभीर जाति के यदुवंश आदि में ही अवतरित होते हैं।
और भगवान श्रीकृष्ण अपने आपको गोप-जाति में अवतरित होने के सम्बन्ध में स्वयं हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -(५८) में कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
✳️ गोपेश्वर श्रीकृष्ण को गोपों के कुल में अवतरित होने का विस्तार पूर्वक वर्णन अध्याय- (५) में किया गया है। वहाँ से विस्तृत जानकारी ली जा सकती है।
अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- उत्पत्ति विशेष के कारण गोपों अर्थात् यादवों का मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण" है तथा इनका वर्ण "वैष्णव" है जो उनके अनुवांशिक गुणों एवं रक्त सम्बन्धों को संकेत करता है। तथा उनका एक गुरु गोत्र "अत्रि" है जिसमें गोपों का कोई रक्त सम्बन्ध नहीं है, जिसका उद्देश्य केवल ब्राह्मण पूरोहितों से पूजा पाठ, हवन, विवाह इत्यादि को सम्पन्न कराना है।
इस प्रकार से अध्याय- (१०) इस जानकारी के साथ समाप्त हुआ कि - यादवों का मुख्य जनन गोत्र "कार्ष्ण " है किन्तु विकल्प के रूप में उनका "अत्रि नाम का एक गुरु गोत्र" भी हैं, जिसका उदेश्य पुरोहित कर्म- पूजा-पाठ, यज्ञ, विवाह इत्यादि को सम्पन्न कराना है।
अब इसके अगले अध्याय- (११) में वैष्णव वर्ण के गोपों के प्रमुख कार्य एवं दायित्वों के बारे में जानकारी दी गई है।
★अध्याय- एकादश (११)
वैष्णव वर्ण के सदस्यों के प्रमुख कार्य एवं दायित्व-
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य- वैष्णव वर्ण के कुछ प्रमुख आध्यात्मिक पुरुषों का परिचय देते हुए वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य के सदस्यों के कार्यों एवं दायित्वों की जानकारी देना है। इसके लिए इस अध्याय को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया गया है।
भाग- [१] गोपों का ब्राह्मणत्व (धर्मज्ञ) कर्म-
(क)- सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर हैं।
(ख)- अहीर कन्या वेदमाता गायत्री का परिचय।
(ग)- यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी- स्वाहा और स्वधा का परिचय।
(घ)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय।
भाग-[२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म।
भाग-[३] गोपों का वैश्यत्व कर्म।
भाग-[४] गोपों का शूद्रत्व (सेवा) कर्म।
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भाग [१] गोपों का ब्राह्मणत्व कर्म-
ब्राह्मी वर्णव्यवस्था में ब्राह्मणों का प्रमुख कर्म- पूजा-पाठ, यज्ञ कराना, उपदेश देना ही होता है। और ये सभी धार्मिक कृत्य के लिए वैष्णव वर्ण के अहीर (गोप) किसी भी ब्राह्मण पुरोहित से किसी भी मायने में कम नहीं हैं और नाही
ये इस विषय में किसी के आश्रित हैं। यह ध्रुव सत्य है।
क्योंकि स्वभावत: वैष्णव वर्ण के गोप प्रारम्भ से ही धार्मिक कृत्य करते आए हैं। इस सम्बन्ध में देखा जाए तो सदियों से परम्परागत रूप से चली आ रही सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर ही रहें हैं, जिन्होंने अपनी सत्यनारायण व्रत कथा से कइयों को तार दिया।
गोपों के इसी धर्मज्ञ स्वभाव और धार्मिक कृत्यों की वजह से इन्हें पौराणिक ग्रन्थों में सबसे बड़ा धर्मवत्सल, धार्मिक, सदाचारी, ज्ञानयोगी, और कर्मयोगी माना गया है। ये समय-समय पर शस्त्र और शास्त्र दोनों उठा लेते हैं। इसका सबसे बड़े उदाहरण गोपेश्वर श्रीकृष्ण हैं। इसके अतिरिक्त ज्ञान की देवी अहीर कन्या- गायत्री, यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी स्वाहा और स्वधा तथा ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना इत्यादि इसके उदाहरण हैं जो सभी वैष्णव वर्ण के गोपजाति के प्रारम्भिक सदस्य हैं। इन सभी के बारे में क्रमशः नींचे जानकारी दी गई है की ये सभी कैसे सबसे बड़े धर्मवत्सल एवं धर्मज्ञ हैं।
(क) "सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर हैं"
सर्वप्रथम भूतल पर गोपों को ही - सबसे बड़ा धार्मिक, सदाचारी और धर्मवत्सल माना गया। इस सम्बन्ध में कई पौराणिक साक्ष्य और प्रसंग सुनने और पढ़ने को मिलते हैं। उनमें से एक सत्यनारायण व्रत कथा भी है जो श्रीस्कन्दपुराण के अवन्ति खण्ड के उपखण्ड रेवाखण्ड के अध्याय-(२३६) से लेकर युगों-युगों से सत्यनारायण अर्थात् भगवान विष्णु की कथा के रूप में प्रचलित रही है।
जिसे हम और आप बचपन से ही इस विष्णु कथा को सुनते आयें हैं। किन्तु इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि इस सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र गोप ही हैं, जो इस कथा के माध्यम से अनेकों भक्तों का तारण करते हैं। इस बात की पुष्टि सत्यनारायण व्रत-कथा के मुख्य स्रोत श्रीस्कन्दपुराण के रेवाखण्ड के अध्याय-(२३३) से (२३७ ) पाँच अध्यायों से होती है। जो सत्यनारायण व्रत कथा में अध्याय- (५) के रूप में स्थापित है। जानकारी के लिए उसे नीचे उद्धृत किया गया है।
"सूत उवाच"
अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।
आसीत् तुङ्गध्वजो राजा प्रजापालनतत्परः॥१॥
प्रसादं सत्यदेवस्य त्यक्त्वा दुःखमवाप सः।
एकदा स वनं गत्वा हत्वा बहुविधान् पशून्॥२॥
आगत्य वटमूलं च दृष्ट्वा सत्यस्य पूजनम्।
गोपाः कुर्वन्ति संतुष्टा भक्तियुक्ताः सबान्धवाः॥३॥
राजा दृष्ट्वा तु दर्पेण न गतो न ननाम सः।
ततो गोपगणाः सर्वे प्रसादं नृपसन्निधौ ॥४॥
संस्थाप्य पुनरागत्य भुक्त्वा सर्वे यथेप्सितम्।
ततः प्रसादं संत्यज्य राजा दुःखमवाप सः॥५॥
"अनुवाद- १-५
• श्रीसूतजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियो ! अब इसके बाद मैं एक अन्य कथा कहूँगा, आप उसे सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर (तैयार रहने वाला) तुङ्गध्वज नाम का एक राजा था।१।
• उसने सत्यदेव (सत्यनारायण) के प्रसाद का परित्याग करके दुःख प्राप्त किया। एक बार वह वन में जाकर और वहाँ बहुत-से पशुओं को मारकर।२।
• वह वट वृक्ष के नीचे आया तो वहाँ उसने देखा कि गोपगण (अहीर लोग) बन्धु-बान्धवों के साथ सन्तुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान् सत्यदेव (सत्यनारायण) की पूजा करतें हैं।३।
• राजा यह देखकर भी अहंकार (दर्प) वश न तो वह वहाँ गया और न ही उसने भगवान् सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। इसके बाद (पूजन के पश्चात) सभी गोपगण भगवान् सत्य नारायण का प्रसाद राजा के समीप में।४।
• रखकर वहाँ से पुन: लौट कर और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान् का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुःख भोगना पड़ा ॥५॥
तस्य पुत्रशतं नष्टं धनधान्यादिकं च यत्।
सत्यदेवेन तत्सर्वं नाशितं मम निश्चितम्॥६॥
अतस्तत्रैव गच्छामि यत्र देवस्य पूजनम्।
मनसा तु विनिश्चित्य ययौ गोपालसन्निधौ॥७॥
ततोऽसौ सत्यदेवस्य पूजां गोपगणैः सह।
भक्तिश्रद्धान्वितो भूत्वा चकार विधिना नृपः॥८॥
सत्यदेवेन प्रसादेन धनपुत्रान्वितोऽभवत् ।
इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ॥ ९॥
"अनुवाद ६-९
•उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य हो भगवान् सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है।६।
•इसलिये मुझे वहीं जाना चाहिये जहाँ श्रीसत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों (अहीरों) के समीप गया।७।
•और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यदेव की पूजा की।८।
• भगवान् सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों को उपभोगकर अन्त में सत्यपुर (वैकुण्ठलोक)- को चला गया॥९॥
य इदं कुरुते सत्यव्रतं परमदुर्लभम्
शृणोति च कथां पुण्यां भक्तियुक्तः फलप्रदाम् ॥१०॥
धनधान्यादिकं तस्य भवेत् सत्यप्रसादतः।
दरिद्रो लभते वित्तं बद्धो मुच्येत् बन्धनात्॥ ११॥
भीतो भयात् प्रमुच्येत् सत्यमेव न संशयः।
ईप्सितं च फलं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं व्रजेत्॥ १२॥
इति वः कथितं विप्राः सत्यनारायणव्रतम्।
यत् कृत्वा सर्वदुः खेभ्यो मुक्तो भवति मानवः॥१३॥
"अनुवाद:- १०- १३
• सूत जी कहते हैं- जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्रीसत्यनारायण के व्रत को करता और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है।१०।
• उसे भगवान् सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र के घर में धन हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से छूट जाता है।११।
• डरा हुआ व्यक्ति भय से मुक्त हो जाता है। यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। (इस लोक में वह सभी इच्छित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर (वैकुण्ठलोक) को जाता है।१२।
• हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान् सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है॥१३॥
विशेषतः कलियुगे सत्यपूजा फलप्रदा।
केचित् कालं वदिष्यन्ति सत्यमीशं तमेव च॥१४॥
सत्यनारायणं केचित् सत्यदेवं तथापरे।
नानारूपधरो भूत्वा सर्वेषामीप्सितप्रदम् ॥१५॥
भविष्यति कलौ सत्यव्रतरूपी सनातनः।
श्रीविष्णुना धृतं रूपं सर्वेषामीप्सितप्रदम्॥१६॥
य इदं पठेत् नित्यं शृणोति मुनिसत्तमाः।
तस्य नश्यन्ति पापानि सत्यदेवप्रसादतः॥१७॥
व्रतं वैस्तु कृतं पूर्व सत्यनारायणस्य च।
तेषां त्वपरजन्मानि कथयामि मुनीश्वराः॥१८॥
"अनुवाद:- १४-१८
• कलियुग में तो भगवान् सत्यदेव (सत्यनारायण) की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। स्वराट विष्णु (परमेश्वर श्रीकृष्ण) को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश।१४।
• और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान् सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं।१५।
• कलियुग में सनातन भगवान् विष्णु ही सत्यव्रत-रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे।१६।
• हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो व्यक्ति नित्य भगवान् सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान् सत्यनारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।१७।
• हे मुनीश्वरो ! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान् सत्यनारायण का व्रत किया था, उनके अगले जन्म का वृत्तान्त कहता हूँ, आप लोग उसे सुनें॥१८।
"शतानन्दो महाप्राज्ञः सुदामा ब्राह्मणो ह्यभूत्।
तस्मिञ्जन्मनि श्रीकृष्णं ध्यात्वा मोक्षमवाप ह ॥१९॥
"काष्ठभारवहो भिल्लो गुहराजो बभूव ह।
तस्मिञ्जन्मनि श्रीरामं सेव्य मोक्षं जगाम वै ॥२०॥
"उल्कामुखो महाराजो नृपो दशरथोऽभवत्।
श्रीरङ्गनाथं सम्पूज्य श्रीवैकुण्ठं तदागमत् ॥२१॥
"धार्मिकः सत्यसन्धश्च साधुर्मोरध्वजोऽभवत्।
देहार्धं क्रकचैश्छित्त्वा दत्त्वा मोक्षमवाप ह॥२२॥
"तुङ्गध्वजो महाराजः स्वायम्भुवोऽभवत् किल।
सर्वान् भागवतान् कृत्वा श्रीवैकुण्ठं तदाऽगमत्॥ २३॥
अनुवाद:- १९-२३
• महान् प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण [सत्यनारायणका व्रत करने के प्रभाव से] दूसरे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।१९।
• लकड़हारा भिल्लों का राजा गुहराज हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान् श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया।२०।
• महाराज उल्कामुख [दूसरे जन्म में] राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरङ्गनाथ (विष्णु) की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया।२१।
• इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु [ पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में ] मोरध्वज नाम का राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान् विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया।२२।
• महाराज तुङ्गध्वज पूर्व जन्म में स्वायम्भुव मनु के रूप में हुए थे और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। २३।
"भूत्वा गोपाश्च ते सर्वे व्रजमण्डलवासिनः।
निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः॥२४॥
अनुवाद -
और जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके भगवान के शाश्वतधाम- गोलोक को प्राप्त किया ॥ २४॥
श्लोक (२४) का शब्दार्थ :-
सत्यनारायण की वन में कथा करने वाले वे सभी गोपगण ही व्रजमण्डल में (भूत्वा = जन्म लेकर /होकर )
गोपा: = गोप गण। ते सर्वे= वे सब। व्रजमण्डलवासिनः= व्रजमण्डल के निवासी।
निहत्य= मारकर। राक्षसान् सर्वान् = सभी राक्षसों को ।
✳️ किन्तु आश्चर्य इस बात यह है कि- इस सत्यनारायण व्रत कथा में गोपों से सम्बन्धित सबसे महत्वपूर्ण श्लोक- (२४) को-
"भूत्वा गोपाश्च ते सर्वे व्रजमण्डलवासिनः।
निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः"॥२४।
स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड के अध्याय-(२३६) से कथाकारों ने इर्ष्यावश निकलवा दिया है। अब वहाँ पर (२४) श्लोक न होकर केवल (२३) श्लोक ही शेष रह गए हैं। गोपों के इस (२४ वें) महत्वपूर्ण श्लोक अब वर्तमान समय में गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित "सत्यनारायण व्रत कथा" में मिलता है। इसके अलावा "शब्द कल्पद्रुम" (खण्ड- ५ पृष्ठ संख्या- २२९) में गोपों का यह महत्वपूर्ण श्लोक आज भी सुरक्षित है।
कुल मिलाकर सत्यनारायण व्रत कथा से यह सिद्ध होता है कि गोप प्रारम्भ से ही धार्मिक, धर्मवत्सल, तथा वैष्णव धर्म के प्रबल प्रचारक रहे हैं।
गोपों के इसी गुण विशेष के कारण भगवान श्रीकृष्ण के सामने श्रीराधा जी ने गोपों को सबसे बड़ा धर्मवत्सल कहा इस बात की पुष्टि - गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड के अध्याय-१८ के श्लोक संख्या -२२ से होती है। जिसमें राधा जी श्रीकृष्ण से कहती हैं कि-
"गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।
अनुवाद - गोप सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की गङ्गा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़ कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।
इसके अतिरिक्त गोपों के धर्मवत्सल होने के और कई महत्वपूर्ण उदाहरण दिए जा सकते हैं। उनमें से प्रमुख हैं -
(१) अहीर कन्या वेदमाता गायत्री।
(२) यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी स्वाहा और स्वधा।
(३) ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना इत्यादि।
अब हम इन तीनों महत्वपूर्ण गोप कन्याओं को एक-एक करके बताऐंगे की सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में
इनसे बड़ा धर्मवत्सल व धर्मज्ञ कोई नहीं है।
(ख) अहीर कन्या वेदमाता गायत्री-
देवी गायत्री सहित समस्त गोपों को धर्म वत्सल एवं धर्मज्ञ होने की पुष्टि-पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७ के श्लोक- १५-१६ और १७) से होती है जिसमें भगवान विष्णु गोपों की कन्या, गायत्री को ब्रह्माजी को कन्यादान के उपरान्त गोपों से कहते हैं कि-
भोभोगोपसदाचारनत्वंशोचितुमर्हसि।
कन्यााषतेमहाभागाप्राप्तादेवंविरिञ्चिनम्।।१५।
योगिनियोंगयुक्तायेब्राह्मणाबेदपारगा:।
नलभन्तेप्रार्थयन्तस्ताङ्गतिन्दुहितागता।१६।
धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।
मया ज्ञात्वा तत:कन्यादत्ताचैषा विरञ्चयते।।१७।
अनुवाद - १५ से १७
• हे गोपगण ! तुम यहाँ वृथा प्रलाप मत करो। यह पुण्यवती, सौभाग्यवती तथा कुल एवं बन्धुगण के लिए आनन्दप्रदा है। इस बाला को हम यहाँ लाए हैं।
इसे ब्रह्मा ने अपनी पत्नी बनाया है। इन्होंने भी ब्रह्मा का अवलम्बन किया है। यदि यह पुण्यवती नहीं होती, तब इस सभा में आती क्यों ? हे महाभाग! तुम यह सब जानकर अब शोक मत करो। तुम्हारी यह भाग्यशाली कन्या ने ब्रह्मा को प्राप्त किया है। १५।
• ज्ञान योगी, कर्मयोगी तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रार्थना भी करके यह स्थान नहीं पाते, तथापि तुम्हारी यह कन्या उस गति को पा गई है।१६।
• तुम लोगों को मैंने धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल जानकर ही तुम्हारी कन्या ब्रह्मा को प्रदान किया है।१७।
✳️ उपर्युक्त- तीनों श्लोकों से एक ही साथ चार बातें सिद्ध होती है-
• पहला यह कि- देवी गायत्री, गोपों की कन्या हैं अर्थात वह एक गोप कन्या है, जिनका विवाह ब्रह्माजी से हुआ। जिनके मन्त्रोच्चारण से अर्थात् गायत्री मन्त्र के जाप से जगत का कल्याण होता है।
जिसमें देवी गायत्री को अहीर (गोप) कन्या होने की पुष्टि- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय-१६ के- श्लोक-१५५ से भी होती है। जिसमें देवी गायत्री अपना परिचय देते हुए इन्द्र से कहती है -
गोपकन्यात्वहं वीर विक्रीणामीह गोरसम् ।
नवनीतमिदमं शुद्धं दधि चेदं विमण्डकम् ।।१५५।
अनुवाद- हे वीर ! मैं गोप कन्या हूँ। यहाँ दुग्ध विक्रय करने के लिए आई हूँ । यह विशुद्ध नवनीत है। यह देखो ! यह मण्डरहित दधि है। तुमको यदि मट्ठा या दूध जो आवश्यक हो कहो तथा यथेष्ट ग्रहण करो। १५५।
• दूसरी बात यह सिद्ध होती है कि- गोपों से बड़ा कोई धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल नहीं है। इस बात को जानकर ही भगवान विष्णु ने गोपों की कन्या- देवी गायत्री को ब्रह्माजी को कन्यादान किया। और ब्रह्माजी ने उसे अपनी पत्नी स्वीकार किया।
ब्रह्मा की पत्नी गायत्री केवल यज्ञ सम्पादन और संसार में आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसारण के लिए ही है। सांसारिक सृष्टि उत्पादन के लिए नहीं।
• तीसरी बात यह सिद्ध होती है कि- आभीर कन्या देवी गायत्री उस स्थान और पद को प्राप्त हुई। जिसे योगी तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रार्थना करने के बाद भी नहीं पाते। अब इससे बड़ा ब्राह्मणत्व कर्म वैष्णव वर्ण के गोपों के लिए और क्या हो सकता है।
• चौथी बात यह कि- देवी गायत्री महती विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम अहीर कन्या थीं। जिसकी भूरि-भूरि प्रसंशा भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी के यज्ञ-सत्र में की और गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी पद पर नियुक्त किया। जो आज भी यह मान्यता है कि संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।
और गोपों से सम्बन्धित सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि- गोपों अर्थात् आभीरों में श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है। इस बात की पुष्टि गायत्री संग ब्रह्मा के विवाह के मध्य उस समय होती है, जब ब्रह्माजी की पहली पत्नी सावित्री क्रुद्ध होकर वहाँ उपस्थित सभी देवताओं को शाप देती हैं। तब उसके शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्दपुराण खण्ड- (६) के नागरखण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) और (१५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यन्ति मद्वंशप्रभवा नराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी। तथा मेरे गोप वंश के लोग जहाँ भी रहेंगे, वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१४-१५।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण और गोपों में रक्त सम्बन्ध है।
▪️पारिवारिक परिचय-
देवी गायत्री का यदि पारिवारिक परिचय देखा जाए तो उनकी माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम "गोविल" था। जो दोनो ही नाम गोलोक से सम्बन्धित है। गायत्री के पिता-गोविल को नन्दसेन, अथवा नरेन्द्र सेन आभीर नाम से भी जाना जाता है। जो आनर्त देश, वर्तमान नाम (गुजरात) के रहने वाले थे। इस बात की पुष्टि-
लक्ष्मीनारायणी-संहिता के खण्ड (एक) के अध्याय-(५०९) के प्रमुख श्लोकों से होती है,जो इस प्रकार हैं -
"ब्रह्मणं यज्ञमिमं ज्ञात्वा शुद्धः स्नात्वा समागतः।
गोपकन्या नित्यं या शुद्धात्मा वैष्णव जातिका।।६२।।
श्री विष्णो वै तमुवाच प्रत्युत्तरं शृणु प्रिये ।
जाल्म एषाऽस्ति वीराण्याभीराणी जातितोऽस्ति वै ।।६४।।
शृणु जानामि तद्वृत्तं नान्ये जानन्त्येतद्विदः।
पुरा सृष्टे समारम्भे गोलोके श्रीकृष्णेन परात्मना सुघटिता।६५।
अमुना स्वांशरूपा हि सावित्री स्वमूर्तेः प्रकटीकृता।
अथ द्वितीया रूपा कन्या च गायत्र्याभिधा कृता।।६६।
सावित्री श्रीहरिणैव गोलोके एव सन्निधौ।
अथ भूलोके यज्ञप्रवाहार्थं ब्रह्माणं ववल्हे।।६८।
पृथिव्यां मर्त्यरूपेण तत्र मानुषविग्रहा ।
पत्नी यज्ञस्य कार्यार्थमपेक्षिता बभूव।।६९।
हेतुनाऽनेन कृष्णेन सावित्र्याज्ञापिता तदा ।
द्वितीयेन स्वरूपेण त्वया गन्तव्यमेव ह गायत्री नाम्ना।।७०।
अनुवाद:-
• इस ब्रह्मा के यज्ञसत्र को जानकर शुद्ध स्नान करके आयी हुई गोप कन्या नित्य जो शुद्धात्मा और वैष्णव जाति (अभीर जाति) की है।६२।
• श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए उस गोप-कन्या को कहा ! सुन प्रिये ! ये बात छिपी हुई नही है कि ये वीराणी जाति से निश्चय ही अहीराणी है।६४।
• सुनो ! मैं जानाता हूँ वह वृत (इतिहास) कोई अन्य विद्वान नहीं जानता यह सत्य पूर्वकाल में सृष्टि के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण परमात्मा के द्वारा गोलोक में सुघटित हुआ।।६५।
• उस परमात्मा के द्वारा अपने ही अंश से सावित्री और दूसरी कन्या को गायत्री नाम से प्रकट किया गया।६६।
• सावित्री श्रीहरि के द्वारा ही गोलोक में प्रभु के सानिन्ध्य में भूलोक में यज्ञ प्रवाहन के लिए ब्रह्माजी को प्रदान की गयीं ।६८।
• पृथ्वी पर मनुष्य रूप में वहाँ मानव शरीर में ब्रह्मा की पत्नी रूप में यज्ञ कार्य के लिए अवतरित हुईं।६९।
• उस कारण से कृष्ण के द्वारा सावित्री को आज्ञा दी गयी। तब द्वित्तीय स्वरूप में तुमको गायत्री नाम से जानना चाहिए।७०।
✳️ ज्ञात हो इस सम्बन्ध में विस्तार पूर्वक जानकारी "गोपेश्वरश्रीकृष्णस्य- पञ्चंवर्णम्" नामक ग्रन्थ में दी गई है जो इस पुस्तक का ही विस्तार रूप है।
▪️(ग) यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी स्वाहा और स्वधा का परिचय।
देवी गायत्री के समान ही गोप कुल की देवी दक्षिणा, देवी स्वाहा और स्वधा भी हैं। जिनका यज्ञ, हवन और पितृ- पूजन के उपरान्त विशेष भूमिका रहती है। जिसमें यज्ञ और हवन के दरम्यान जो स्वाहा नाम के उच्चारण से हवन कुण्डों में नैवेद्य अर्पण किया जाता है, और यज्ञ समाप्ति के बाद जो दान दक्षिणा दिया जाता है, वह सब देवी स्वाहा और दक्षिण के माध्यम से ही फलीभूत होता है। और ये देवी स्वाहा और दक्षिणा दोनों ही गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गोलोक की गोपी सुशीला के ही अंशावतार है। जो कभी गोलोक में श्रीराधा के शाप से गोपी सुशील को भूतल पर स्वाहा, स्वधा और दक्षिणा के रूप में आना पड़ा था।
जिसमें सुशीला के गोपी होने का प्रमाण तथा सुशीला को यज्ञ पुरुष की पत्नी दक्षिणा के रूप में उत्पन्न होने का वर्णन देवी भागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय- (४५) के कुछ प्रमुख श्लोकों में मिलता है जो इस प्रकार है -
गोपी सुशीला गोलोके पुराऽऽसीत्प्रेयसी हरेः।
राधा प्रधाना सध्रीची धन्या मान्या मनोहरा।२।
अतीव सुन्दरी रामा सुभगा सुदती सती ।
विद्यावती गुणवती चातिरूपवती सती॥३।
अनुवाद - प्राचीन काल में गोलोक में भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेयसी सुशीला नामक एक गोपी थी। परमधन्या, मान्या तथा मनोहरा वह गोपी भगवती राधा की प्रधान सखी थी। वह अत्यन्त सुन्दर, लक्ष्मी के लक्षणों से सम्पन्न, सौभाग्यवती, उज्ज्वल दाँतों वाली, परम पतिव्रता साध्वी, विद्या गुण तथा रूप से अत्यधिक सम्पन्न थी।२-३।
रसज्ञा रसिका रासे रासेशस्य रसोत्सुका ।
उवासादक्षिणे क्रोडे राधायाः पुरतः पुरा ॥७॥
सम्बभूवानम्रमुखो भयेन मधुसूदनः ।
दृष्ट्वा राधां च पुरतो गोपीनां प्रवरोत्तमाम् ॥८।
अनुवाद- वह रसज्ञान से परिपूर्ण, रासक्रीडा की रसिक तथा रासेश्वर श्रीकृष्णके प्रेमरसहेतु लालायित रहनेवाली वह गोपी सुशीला एक बार राधा के सामने ही भगवान् श्रीकृष्ण के वाम अंक (बगल) में बैठ गयी ॥७-८।
कामिनीं रक्तवदनां रक्तपङ्कजलोचनाम् ।
कोपेन कम्पिताङ्गीं च कोपेन स्फुरिताधराम्॥९॥
वेगेन तां तु गच्छन्तीं विज्ञाय तदनन्तरम् ।
विरोधभीतो भगवानन्तर्धानं चकार सः॥१०॥
अनुवाद- तब मधुसूदन श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं में परम श्रेष्ठ राधा की ओर देखकर भयभीत हो अपना मुख नीचे कर लिया। उस समय पत्नी राधा का मुख लाल हो गया और उनके नेत्र रक्तकमल के समान हो गये। क्रोध से उनके अंग काँप रहे थे तथा ओठ प्रस्फुरित हो रहे थे। तब उन राधा को बड़े वेग से जाती देखकर उनके विरोध से अत्यन्त डरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये ॥९-१०॥
पलायन्तं च कान्तं च विज्ञाय परमेश्वरी।
पलायन्तीं सहचरीं सुशीलां च शशाप सा॥ १५॥
अद्यप्रभृति गोलोकं सा चेदायाति गोपिका ।
सद्यो गमनमात्रेण भस्मसाच्च भविष्यति ॥१६॥
अनुवाद- १५-१६
• परमेश्वरी राधा ने अपने कान्त श्रीकृष्ण को अन्तर्धान तथा सहचरी सुशीला को पलायन करते देखकर उन्हें शाप दे दिया कि- यदि गोपिका सुशीला आज से गोलोक में आयेगी, तो वह आते ही भस्मसात् हो जायगी।१५-१६।
✳️ इस सम्बन्ध में ज्ञात होगा कि भगवान नारायण ने ही उस सुशीला का नाम दक्षिणा रखा इसके लिए नीचे के ये श्लोक कुछ इसी प्रकार का संकेत दे रहे हैं-
नालभंस्ते फलं तेषां विषण्णाः प्रययुर्विधिम्।
विधिर्निवेदनं श्रुत्वा देवादीनां जगत्पतिम्॥३७॥
दध्यौ च सुचिरं भक्त्या प्रत्यादेशमवाप सः।
नारायणश्च भगवान् महालक्ष्याश्च देहतः॥३८॥
विनिष्कृष्य मर्त्यलक्ष्मीं ब्रह्मणे दक्षिणां ददौ।
ब्रह्मा ददौ तां यज्ञाय पूरणार्थं च कर्मणाम्॥ ३९॥
अनुवाद - जिसे भगवान नारायण ने महालक्ष्मी के विग्रह से मर्त्यलक्ष्मी को प्रकट किया और उसका दक्षिणा नाम रखकर उसे ब्रह्माजी को सौंप दिया। तब ब्रह्माजी ने यज्ञ सम्बन्धी समस्त कार्यों की सम्पन्नता के लिए देवी दक्षिणा को यज्ञ पुरुष के हाथ में दे दिया।३७-३८-३९।
तब यज्ञपुरुष ने देवी दक्षिणा के पूर्व काल की बातों का स्मरण दिलाते हुए देवी दक्षिणा से कहा कि-
पुरा गोलोकगोपी त्वं गोपीनां प्रवरा वरा॥ ७१॥
राधासमा तत्सखी च श्रीकृष्णप्रेयसी प्रिया।
अनुवाद - हे महाभागे! तुम पूर्वकाल में गोलोक की एक गोपी थी और गोपियों में परमश्रेष्ठा थीं। श्रीकृष्ण तुमसे अत्यधिक प्रेम करते थे और तुम राधा के समान ही उन श्रीकृष्ण की प्रिय सखी थीं।७१।
कार्तिकीपूर्णिमायां तु रासे राधामहोत्सवे ॥७२॥
आविर्भूता दक्षिणांसाल्लक्ष्म्याश्च तेन दक्षिणा।
पुरा त्वं च सुशीलाख्या ख्याता शीलेन शोभने॥ ७३॥
लक्ष्मीदक्षांसभागात्त्वं राधाशापाच्च दक्षिणा ।
गोलोकात्त्वं परिभ्रष्टा मम भाग्यादुपस्थिता ॥७४॥
कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु ।
अनुवाद-७३,७३,७४
एक बार कार्तिक पूर्णिमा को राधामहोत्सव के अवसर पर रासलीला में तुम भगवती लक्ष्मी के दक्षिणांश से प्रकट हो गयी थीं, उसी कारण तुम्हारा नाम दक्षिणा पड़ गया। हे शोभने ! इससे भी पहले अपने उत्तम शील के कारण तुम सुशीला नाम से प्रसिद्ध थी तुम भगवती राधिका के शाप से गोलोक से च्युत (पतित) होकर और पुनः देवी लक्ष्मी के दक्षिणांश से आविर्भूत हो। अब देवी दक्षिणाके रूप में मेरे सौभाग्यसे मुझे प्राप्त हुई हो। हे महाभागे ! मुझपर कृपा करो और मुझे ही अपना स्वामी बना लो॥ ७२,-७४।
फिर यज्ञपुरुष ने उस देवी से कहा-
कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु।
कर्मिणां कर्मणां देवी त्वमेव फलदा सदा॥७५॥
त्वया विना च सर्वेषां सर्वं कर्म च निष्फलम्।
त्वया विना तथा कर्म कर्मिणां च न शोभते॥७६॥
ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च दिक्पालादय एव च ।
कर्मणश्च फलं दातुं न शक्ताश्च त्वया विना ॥ ७७॥
अनुवाद- ७५,७६,७७
तुम्हीं यज्ञ करने वालों को उनके कर्मों का सदा फल प्रदान करने वाली देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियों का सारा कर्म निष्फल हो जाता है और तुम्हारे बिना अनुष्ठानकर्ताओं का कर्म शोभा नहीं पाता है।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दिक्पाल आदि भी तुम्हारे बिना प्राणियों को कर्म का फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं।
अतः यहाँ सिद्ध होता है कि गोपकन्या- दक्षिणा ही कर्म फलों की विधायिका हैं।
और इस सम्बन्ध में सबसे महत्वपूर्ण बात श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध के अध्याय-(४३) के श्लोक संख्या-(३८) में लिखी गई है, जिसमें बताया गया है कि यज्ञ, हवन के मध्य गोपी सुशीला की अंशस्वरूपा देवी स्वाहा का कितना महत्व है-
दक्षिणाग्निगार्हपत्याहवनीयान् क्रमेण च।
ऋषियो मुनयश्चैव ब्राह्मणा: क्षत्रियादय:।३८।
स्वाहान्तं मन्त्रमुच्चार्य हविर्दानं च चक्रिरे।
स्वाहायुक्तं च मन्त्रं च यो गृह्णाति प्रशस्तकम्।।३९।
अनुवाद - तभी से ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मन्त्र के अन्त में स्वाहा शब्द जोड़कर मन्त्रोच्चारण करके अग्नि में हवन करने लगे। और जो मनुष्य स्वाहा युक्त प्रशस्त मन्त्र का उच्चारण करता है, उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है।
(घ) ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय-
शतचन्द्रानना गोलोक की एक धन्या और मान्या विदुषी गोपी है, जो गोलोक के सोलहवें द्वार की सदैव रक्षा में तत्पर रहती है। गोपी शतचन्द्रानना को ब्रह्माण्ड विदुषी होने का परिचय उस समय मिलता है जब समस्त देवगण भगवान नारायण के कहने पर पृथ्वी के भार को दूर करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण के परमधाम गोलोक को प्रस्थान करते हैं। किन्तु जब देवगण गोलोक के सोलहवें द्वार पर पहुँचे तो वहाँ द्वार की रक्षा में नियुक्त गोपी शतचन्द्रानना उनसे कुछ प्रश्न पूछकर अन्दर जाने से रोक दिया। तब देवताओं ने जो कुछ कहा उसका सारा वृत्तान्त गर्गसंहिता के गोलोकखण्ड के अध्याय- (२) के प्रमुख श्लोकों में कुछ इस प्रकार मिलता है।
तत्र कन्दर्पलावण्याः श्यामसुन्दरविग्रहाः।
द्वरि गन्तुं चाभ्यदितान् न्यषेधन् कृष्णपार्षदाः।२०।
अनुवाद - वहाँ कामदेव के समान मनोहर रूप लावण्य शालिनी श्यामसुन्दर विग्रह श्रीकृष्ण पार्षदा (शतचन्द्रानना) द्वारपाल का कार्य करती थीं। देवताओं को द्वारा के भीतर जाने के लिए उद्यत देख उन्होंने मना किया।
"श्रीदेवा ऊचुः
लोकपाला वयं सर्वे ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
श्रीकृष्णदर्शनार्थाय शक्राद्या आगता इह॥२१॥
अनुवाद - देवता बोले- हम सभी ब्रह्मा" विष्णु शंकर नाम के लोकपाल और इन्द्र आदि देवता हैं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यहाँ आए हैं।
तच्छ्रुत्वा तदभिप्रायं श्रीकृष्णाय सखीजनाः।
ऊचुर्देवप्रतीहारा गत्वा चान्तःपुरं परम्॥२२॥
तदा विनिर्गता काचिच्छतचन्द्रानना सखी।
पीताम्बरा वेत्रहस्ता सापृच्छद्वाञ्छितं सुरान्॥ २३॥
अनुवाद - २२-२३
देवताओं की बात सुनकर उन सखियों ने जो श्रीकृष्ण की द्वारपालिकाऐं थी, श्रेष्ठ अन्तःपुर में जाकर देवताओं की बात कह सुनाईं। तभी एक सखी जो शतचन्द्रानना नाम से विख्यात थी उनके वस्त्र पीले थे और जो हाथ में बेंत की छड़ी लिए थी, बाहर आयीं और उन देवताओं से उनका अभीष्ट प्रयोजन पूछा।२२-२३।
श्रीशतचन्द्राननोवाच -
कस्याण्डस्याधिपा देवा यूयं सर्वे समागताः।
वदताशु गमिष्यामि तस्मै भगवते ह्यहम् ॥२४॥
अनुवाद - शतचन्द्रानना बोली - यहाँ पधारे हुए आप सब देवता किस ब्रह्माण्ड के अधिपति हैं ? यह शीघ्र बताइये। तब मैं भगवान श्रीकृष्ण को सूचित करने के लिए उनके पास जाऊँगी। २४
"श्रीदेवा ऊचुः -
अहो अण्डान्युतान्यानि नास्माभिर्दर्शितानि च।
एकमण्डं प्रजानीमोऽथोऽपरं नास्ति नः शुभे॥२५॥
अनुवाद - तब देवताओं नें कहा - अहो ! यह तो बहुत आश्चर्य की बात है, क्या अन्यान्य ब्रह्माण्ड भी हैं ? हमनें तो उन्हें कभी नहीं देखा। शुभे ! हम तो यही जानते हैं कि एक ही ब्रह्माण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं।२५।
"श्रीशतचन्द्राननोवाच -
ब्रह्मदेव लुठन्तीह कोटिशो ह्यण्डराशयः।
तेषां यूयं यथा देवास्तथाण्डेऽण्डे पृथक् पृथक्॥ २६॥
नामग्रामं न जानीथ कदा नात्र समागताः।
जडबुद्ध्या प्रहृष्यध्वे गृहान्नापि विनिर्गताः॥२७॥
ब्रह्माण्डमेकं जानन्ति यत्र जातास्तथा जनाः।
मशका च यथान्तःस्था औदुम्बरफलेषु वै॥२८॥
अनुवाद - २६-२८
तब शतचन्द्रानना उन देवताओं से बोलीं - ब्रह्मदेव ! यहाँ (गोलोक) में करोड़ों ब्रह्माण्ड इधर-उधर लुढ़क रहे हैं। उनमें भी आप जैसे ही पृथक पृथक देवता वास करते हैं। अरे ! क्या आप लोग अपना नाम गाँव तक नहीं जानते ? जान पड़ता है की कभी यहाँ आए नहीं है, अपनी थोड़ी सी जानकारी में ही हर्ष से फूल उठे हैं। जान पड़ता है कभी घर से बाहर निकले ही नहीं। जैसे गूलर के फूलों में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते हैं, उसके सिवा दूसरे को नहीं जानते, उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमें उत्पन्न होते हैं, एक मात्र उसी को ब्रह्माण्ड समझते हैं। २६-२८।
"श्रीनारद उवाच -
उपहास्यं गता देवा इत्थं तूष्णीं स्थिताः पुनः।
चकितानिव तान् दृष्ट्वा विष्णुर्वचनमब्रवीत्॥२९॥
श्रीविष्णुरुवाच -
यस्मिन्नण्डे पृश्निगर्भोऽवतारोऽभूत्सनातन।
त्रिविक्रमनखोद्भिन्ने तस्मिन्नण्डे स्थिता वयम्॥ ३०॥
"श्रीनारद उवाच -
तच्छ्रुत्वा तं च संश्लाघ्य शीघ्रमन्तःपुरं गता
पुनरागत्य देवेभ्योऽप्याज्ञां दत्त्वा गताः पुरम्॥३१॥
अथ देवगणाः सर्वे गोलोकं ददृशुः परम् ।
तत्र गोवर्धनो नाम गिरिराजो विराजते॥३२॥
अनुवाद - २९- ३२
• इस प्रकार उपहास के पात्र बने हुए सब देवता चुपचाप खड़े रहे, कुछ बोल ना सके। तब उन्हें चकित से देखकर भगवान विष्णु ने शतचन्द्रानना से कहा- जिस ब्रह्माण्ड़ में भगवान पृश्निगर्भ का सनातन अवतार हुआ है तथा त्रिविक्रम (विराट रूपधारी वामन) के नख से ब्रह्माण्ड़ में विवर बन गया है वहीं हम निवास करते हैं।२९-३०।
• तब भगवान विष्णु की यह बात सुनकर शतचन्द्रानना ने उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की और स्वयं भीतर चली गयी। फिर शीघ्र ही आयी और सबको अन्तःपुर में पधारने की आज्ञा देकर वापस चली गयी। तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओं ने परम सुन्दर धाम गोलोक का दर्शन किया। वहाँ गोवर्धन नामक गिरिराज शोभा पर रहे थे। २९-३२।
अतः उपर्युक्त प्रसंग से सिद्ध होता है कि गोपी शतचन्द्रानना जैसी विदुषी की तुलना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में किसी अन्य से नही की जा सकती। क्योंकि इसकी विद्वता के सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा समस्त देवताओं को लज्जित होना पड़ा।
इस तरह से देखा जाए तो गोप और गोपियाँ ही एकमात्र धर्मज्ञ ज्ञान से परिपूर्ण सारे कर्म-विधान और फल के नियामिका हैं। इनके ही माध्यम से ज्ञान की अविरल धारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती है। और सारे धार्मिक कर्म- विधान इन्हीं के द्वारा सम्पन्न एवं फलित होते हैं, चाहे वह यज्ञ हो या पूजा पाठ में हवन इत्यादि ही क्यों न हो। और इन्हीं गोप-गोपियों को आधार मानकर ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के कर्मकाण्डी ब्राह्मण लोग ब्राह्मणत्व कर्म करते हैं। किन्तु उनके सभी कर्मफलों व परिणामों में गोपों की ही भूमिका रहती है। इसीलिए गोपों को श्रेष्ठ व धर्मवत्सल जानकर ही गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय (६०) के श्लोक -संख्या (४०) में गोपों को पापों से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया है-
य: श्रृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरे:।
मुक्तिं यदुनां गोपानां सर्वपापै: प्रमुच्यते।।४०।
अनुवाद - जो लोग श्रीहरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं, तथा यादव गोपों की मुक्ति का वृत्तान्त पढ़ते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।४०।
और ब्राह्मणत्व कर्म का सबसे बड़ा उदाहरण परमात्मा श्रीकृष्ण हैं, जिन्होंने कुरुक्षेत्र में विराट रूप धारण कर अर्जुन को ज्ञान का वह उपदेश दिया जो अखिल ब्रह्माण्ड में प्रसिद्ध है। इसे कौन नहीं जानता। भगवान श्रीकृष्ण को गोप होने के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी अध्याय- (५) में दी गई है।
✳️ वैष्णव वर्ण के गोप जिन्हें यादव व अहीर भी कहा जाता है, वे सभी बिना वर्ण विभाजन के आध्यात्मिक व धार्मिक कर्तव्यों को स्वाभाविक रूप से पालन करते हैं। वैष्णव वर्ण के गोप ही अहीर और यादव हैं, इसका विस्तार पूर्वक वर्णन इसके पिछले अध्याय- (९) में किया गया है वहाँ से इस विषय पर जानकारी ली जा सकती है।
अब हमलोग गोपों के क्षत्रिय कर्म को जानेंगे की ये लोग ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के क्षत्रिय ना होते हुए भी कैसे क्षत्रिय धर्म को निभाते हुए समय-समय पृथ्वी के भार को भी दूर करते रहते हैं।
भाग- [२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म-
वैष्णव वर्ण के गोप- क्षत्रित्व कर्म को निःस्वार्थ एवं निष्काम भाव करते हैं। इसलिए उन्हें क्षत्रियों में महाक्षत्रिय कहा जाता है। किन्तु ध्यान रहे- ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के क्षत्रियों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि गोप वैष्णव वर्ण के महाक्षत्रिय है ना कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य वर्ण के। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण श्रीकृष्ण की नारायणी सेना थी जिसका गठन गोपों को लेकर श्रीकृष्ण द्वारा भूमि-भार हरण के उद्देश्य से ही किया था। भगवान श्रीकृष्ण सहित इस नारायणी सेना का प्रत्येक गोप- सैनिक, क्षत्रियोचित कर्म करते हुए बड़े से बड़े युद्धों में दैत्यों का वध करके भूमि के भार को दूर किया। गोपों को क्षत्रियोचित कर्म करने से ही उन्हें क्षत्रियों में महाक्षत्रिय कहा जाता है।
इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण भी क्षत्रियोचित कर्म से ही अपने को क्षत्रिय कहा हैं, न कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण के क्षत्रिय वर्ण से। इस बात की पुष्टि-हरिवंश पुराण के भविष्यपर्व के अध्याय-८० के श्लोक संख्या-१० में पिशाचों को अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि-
क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्या: प्रकृतिस्थिता:।
यदुवंशे समुत्पन्न: क्षात्रं वृत्तमनुष्ठित:।।१०।
अनुवाद- मैं क्षत्रिय हूँ। प्राकृतिक मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते और जानते हैं। यदुकुल में उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिए क्षत्रियोचित कर्म का अनुष्ठान करता हूँ।
अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण क्षत्रियोचित कर्म करने से ही अपने को वैष्णव वर्ण के महाक्षत्रिय मानते हैं, न कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के जन्मगत
क्षत्रियों से , और यह भी ज्ञात हो कि- भगवान श्रीकृष्ण जब भी भूतल पर अवतरित होते हैं तो वे वैष्णव वर्ण के गोप कुल में ही अवतरित होते हैं ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण में नही।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण महाभारत के उद्योग पर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय में श्लोक संख्या- (१८) और (१९) में अपने गोपों को अजेय योद्धा के रूप में बताते हैं-
"मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत्।
नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।
अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं।
उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। अर्थात् वे सभी नारायण नाम से विश्व विख्यात हैं। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं।।१८।।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि भूतल पर गोपों (अहिरों) से बड़ा क्षत्रियोचित कर्म करने वाला दूसरा कोई नहीं है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण इन्हीं गोपों को लेकर नारायणी सेना का गठन करके पृथ्वी का भार उतारते हैं।
इसीलिए उन्हें महाक्षत्रिय कहा जाता है।
✳️ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गोप हैं। इस बात को इस पुस्तक के अध्याय- (५) जो "भगवान श्री कृष्ण का गोप होना तथा गोप कुल में अवरण" नामक शीर्षक से है, उसमें विस्तार पूर्वक बताया गया है, वहाँ से इस विषय पर पाठकगण विस्तार से जानकारी ले सकते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के गोपकुल के अन्य सदस्यों की ही भाँति नन्दबाबा की पुत्री योगमाया- विन्ध्यवासिनी (एकानंशा) को भी "क्षत्रिया" होने के सम्बन्ध में हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के अध्याय-तीन के श्लोक-२३ में लिखा गया है कि-
निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा।
विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोङ्कारोऽथ वषट् तथा ।।२३।
अनुवाद- समस्त प्राणियों को मोह में डालने वाली निद्रा भी तुम्हीं हो। तुम क्षत्रिया हो, विद्याओं में ब्रह्मविद्या हो तथा तुम ही ॐकार एवं वषट्कार हो।
किन्तु इस सम्बन्ध में ध्यान रहे कि योगमाया- विन्ध्यवासिनी क्षत्रित्व कर्म से वैष्णव वर्ण की क्षत्रिया है न कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण की। क्योंकि योगमाया विन्ध्यवासिनी, गोप नन्द बाबा की एकलौती पुत्री हैं।
कुल मिलाकर वैष्णव वर्ण के गोप क्षत्रियोचित कर्म से क्षत्रिय हैं न कि ब्रह्माजी की वर्ण -व्यवस्था के जन्मजात क्षत्रिय।
इसलिए उन्हें वैष्णव वर्ण के महाक्षत्रिय कहा जाता है। जो समय-समय पर भूमि का भार दूर करने के लिए तथा पापियों का नाश करने के लिए शस्त्र उठाकर रण-भूमि में कूद पड़ते हैं। इसके उदाहरण- दुर्गा, गोपेश्वर श्रीकृष्ण, और उनकी नारायणी सेना के गोप (अहीर) हैं।
अब यहाँ पर कुछ पाठक गणों को अवश्य संशय हुआ होगा कि- गोपों को क्षत्रिय न कहकर महाक्षत्रिय क्यों कहा जाता है ? तो इसका एक मात्र जवाब है कि गोप और उनसे सम्बन्धित सभी सेनाएँ जैसे- "नारायणी सेना" अपराजिता एवं अजेया है, और उसके प्रत्येक गोप-यादव सैनिकों में लोक और परलोक को जीतने की क्षमता हैं। क्योंकि सभी गोप भगवान श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुए हैं इसलिए उन पर कोई विजय नहीं पा सकता, अर्थात् देवता, गन्धर्व, दैत्य,दानव, मनुष्य आदि कोई भी उनपर विजय नहीं पा सकता इसलिए उन्हें महाक्षत्रिय कहा जाता है। इन सभी बातों की पुष्टि गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक संख्या- (७) में भगवान श्रीकृष्ण उग्रसेन से स्वयं इन सभी बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि-
ममांशा यादवा: सर्वे लोकद्वयजिगीषव:।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्।।७।
अनुवाद - समस्त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हैं। वे लोक, परलोक दोनों को जीतने की इच्छा करते हैं। वे दिग्विजय के लिए यात्रा करके शत्रुओं को जीत कर लौट आएंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिए भेंट और उपहार लायेंगे।
इन सभी बातों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण के गोप और उनकी नारायणी सेना अजेया एवं अपराजिता है इसीलिए इन गोप कुल के यादवों को क्षत्रिय ही नहीं बल्कि महाक्षत्रिय भी कहा जाता है।
भाग [३] गोपों का वैश्यत्व कर्म-
ब्रह्माजी के चार वर्णों में तीसरे पायदान पर वैश्य लोग आते हैं। जिनका मुख्य कर्म- व्यवसाय, व्यापार, पशुपालन, कृषि कार्य इत्यादि है। और यह सभी कर्म वैष्णव वर्ण के गोप स्वतन्त्रत्तता पूर्वक करते हैं। इसलिए इन्हें कर्म के आधार पर वैश्य भी कहा जाता है, किन्तु ब्रह्माजी की वर्ण व्यवस्था के ये वैश्य नहीं है। क्योंकि गोपों का वर्ण तो वैष्णव वर्ण है, जो किसी भी कर्म को करने के लिए स्वतन्त्र हैं। अतः गोप समय आने पर युद्ध भी करते हैं, समय आने पर ब्राह्मणत्व कर्म करते हुए उपदेश देने का भी कार्य करते हैं, और समय आने पर शस्त्र भी उठाते हैं। इसके साथ ही गोप लोग कृषि कार्य, पशुपालन इत्यादि भी करते हैं।
जिसमें ये गोप पशुपालन में मुख्य रूप से गो-पालन करते हैं, इसलिए लिए भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल और समस्त गोपों को गोपालक कहा जाता है।
गोपालन एवं कृषि कार्य से गोपों सहित भगवान श्रीकृष्ण का सम्बन्ध पूर्व काल से ही रहा है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण के धाम, गोलोक में भूरिश्रृँगा गायों का वर्णन-ऋग्वेद के मण्डल (१) के सूक्त- (154) की ऋचा (6) में मिलता है-
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।।
अर्थात् उपर्युक्त ऋचाओं का सार यही है कि विष्णु का परम धाम वहीं है, जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें रहती हैं, और वे विष्णु वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, और यहीं स्वराट-विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं।
इससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण सहित गोप वैश्य कर्म के अन्तर्गत गोपालन करते थे जो आज भी परम्परागत रूप गोपों में देखा जा सकता है। अर्थात् गोप,पशुपालन के साथ-साथ कृषि कर्म भी करते हैं। जिसे ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के ब्राह्मण और क्षत्रियों के लिए निषिद्ध माना गया है। किन्तु गोप, कृषि कर्म को निर्वाध एवं नि:संकोच होकर करते हैं। इस बात की पुष्टि- गर्ग संहिता के गिरिराज खण्ड के अध्याय-(६) के श्लोक-(२६) में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण नन्द बाबा से कहते हैं कि-
'कृषीवला वयं गोपा: सर्वबीजप्ररोहका:।
क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवानहम्।।२६।
अनुवाद- बाबा हम सभी गोप किसान हैं, जो खेतों में सब प्रकार के बीज बोया करते हैं। अतः हमने भी खेतों में मोती के बीच बिखेर दिए हैं।२६।
इससे सिद्ध होता है कि गोप, कुशल कृषक भी है। और इस सम्बन्ध में बलराम जी को हल और मूसल धारण करना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि बलराम जी उस युग के सबसे बड़े कृषक रहे होंगे, जो अपने हल से कृषि कार्य के साथ-साथ भयंकर से भयंकर युद्ध भी किया करते थे।
श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव जी को भी वैश्य कर्म करने की पुष्टि-देवीभागवतपुराण के चतुर्थ स्कन्ध के अध्याय- (२०) के श्लोक-(६०) और (६१) से होती है-
"तत्रोत्पन्न: कश्यपांश: शापाच्च वरूणस्य वै।
वसुदेवोऽतिविख्यात: शूरसेनसुतस्तदा।।६०।
वैश्यावृत्तिरत: सोऽभून्मृते पितरि माधव:।
उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान्।। ६१।
अनुवाद- वहाँ पर वरुण देव के शापवश महर्षि कश्यप के अंशावतार परम यशस्वी वसुदेव जी शूरसेन के पुत्र होकर उत्पन्न हुए। पिता के मर जाने पर वे वसुदेव जी वैश्यावृत्ति में संलग्न होकर जीवन यापन करने लगे। उस समय वहाँ के राजा उग्रसेन थे और उनका कंस नामक एक प्रतापी पुत्र था।६०-६१।
इससे सिद्ध होता है कि वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत किसी भी कर्म को छोटा या बड़ा नहीं माना गया है। इसी वजह से वैष्णव वर्ण के गोप, वैश्य कर्म करने में गर्व महसूस करते हैं। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण भी नन्द बाबा से बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि- बाबा हम सभी गोप किसान हैं।
भाग [४] गोपों का शूद्रत्व कर्म-
देखा जाए तो ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य में चौथे पायदान पर शूद्र आते हैं, जिनका मुख्य कर्म सेवा करना निश्चित किया गया है। उससे हटकर शूद्र कुछ भी नहीं कर सकते, ऐसा ही उन पर प्रतिबंध लगाया गया है।
किन्तु वैष्णव वर्ण में ऐसा कुछ भी नहीं है। क्योंकि वैष्णव वर्ण के गोप, ब्रह्मणत्व, क्षत्रित्व, वैश्य इत्यादि कर्मों के साथ- साथ सेवा कर्म को भी नि:संकोच और बड़े गर्व के साथ बिना किसी प्रतिबन्ध के करते आए हैं। जिसमें गोपों सहित भगवान श्रीकृष्ण का भी ऐसा ही कर्मगत स्वभाव देखने को मिलता है। क्योंकि पाप और अत्याचार को दूर करने के लिए और भक्तों के कल्याणार्थ व समाज सेवा के लिए ही प्रभु भूमि पर अवतरित होते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण को सेवा कर्म में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने की पुष्टि- युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से होती है, जिसका वर्णन- श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध (उत्तरार्द्ध ) के अध्याय-(७५) के श्लोक- (४-५)और (६) से होती है। जिसमें उस यज्ञ के बारे में लिखा गया है कि-
भीमो महानसाध्यक्षो धनाध्यक्ष: सुयोधन:।
सहदेवस्तु पूजायां नकुलो द्रव्यसाधने।।४।
गुरुशुश्रूषणे जिष्णु: कृष्ण: पदावनेजन।
परिवेषणे द्रुपदजा कर्णो दाने महामना:।।५।
युयुधाननो विकर्णश्च हार्दिक्यो विदुरादय:।
बाह्लीकपुत्रा भूर्याद्या ये च सन्तर्दनादय:।।६।
अनुवाद- भीमसेन भोजनालय की देखभाल करते थे। दुर्योधन कोषाध्यक्ष थे, सहदेव अभ्यगतों के स्वागत सत्कार में नियुक्त थे और नकुल विविध प्रकार की सामग्री एकत्र करने का काम देखते थे। अर्जुन गुरुजनों की सेवा सुश्रुषा करते थे। और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, आए हुए अतिथियों के पाँव पखारने का काम करते थे। देवी द्रोपदी भोजन परोसने का काम करती थीं। और उदार शिरोमणि कर्ण खुले हाथों दान दिया करते थे।४-५-६।
( ज्ञात हो यह घटना महाभारत युद्ध से पहले की है।)
इन उपर्युक्त श्लोक को यदि शुद्ध अन्तरात्मा से विचार किया जाए, तो गोपेश्वर श्रीकृष्ण ने समाज सेवा में वह कार्य किया जो ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के शूद्र किया करते हैं। जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने वैष्णव वर्ण के गोप होकर पांव- पखार (धोकर) कर यह सिद्ध कर दिया कि- वैष्णव वर्ण के सदस्य ब्रह्मणत्व, क्षत्रित्व, वैश्य कर्म- के साथ-साथ शूद्र (समाज सेवा) का कर्म करने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। जबकि ब्रह्माजी की वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से सेवा कर्म को निंदनीय माना गया है।
जबकि वैष्णव वर्ण में कोई भी कर्म छोटा या बड़ा नहीं माना गया है। इसमें वैष्णव जन निःसंकोच सभी कर्मों को बिना किसी प्रतिबन्ध के करने की आजादी होती है जो ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य में ऐसी नहीं है।
इसीलिए वैष्णव वर्ण के गोपों की पौराणिक ग्रन्थों में भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। उनकी सभी प्रसंशाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन इसके अगले अध्याय- (१२) में किया गया है। उसे भी इसी अध्याय के साथ जोड़कर पढ़ें।
इस प्रकार से यह अध्याय-(११) वैष्णव वर्ण के गोपों के प्रमुख कार्यों एवं दायित्वों की जानकारी के साथ समाप्त हुआ।
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★अध्याय- द्वादश (12)
वैष्णव वर्ण" के गोपों की पौराणिक ग्रन्थों में प्रशंसा एवं सांस्कृतिक विरासत-
इस अध्याय के महत्वपूर्ण प्रसंगों को अच्छी तरह से समझने के लिए इसको प्रमुख रूप से (दो) भागों में विभाजित किया गया है-
भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
भाग [२]- भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।
(क)-हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य।
(ख)-गोपों की देन "पञ्चम वर्ण"।
(ग)-किसान और कृषि शब्द कृष्ण सहित गोपों की देन है।
(घ)-आर्य व ग्राम संस्कृति के जनक गोप हैं।
(ङ)-आभीर छन्द और आभीर राग।
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▪️भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
पौराणिक ग्रन्थों में वैष्णव वर्ण के गोपों अर्थात यादवों की समय-समय पर भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। जैसे-
(१)- ब्रह्माजी के पुष्कर यज्ञ के समय जब अहीर कन्या देवी गायत्री का विवाह ब्रह्माजी से होने को सुनिश्चित हुआ तो वहीं पर सभी देवताओं और ऋषि- मुनियों की उपस्थिति में भगवान विष्णु गोपों से पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- १७ के श्लोक संख्या- (१७) में कहते हैं कि-
धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।
मया ज्ञात्वा तत: कन्यादत्ताचैषा विरञ्चये।।१७।
अनुवाद- तुम लोगों को मैंने धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल जानकर ही तुम्हारी कन्या को ब्रह्मा को प्रदान किया है।१७।
अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर सिद्ध होता है कि गोपों जैसा धर्मवत्सल, सदाचारी और धर्मज्ञ भूतल पर ही नहीं अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई नहीं है।
(२)- गोपों (यादवों) की कुछ इसी तरह की प्रशंसा और विशेषताओं को कंस स्वयं करता है। यादवों को अपने दरबार में बुलाकर उनसे जो कुछ कहा उसका वर्णन- हरिवंशपुराण के विष्णु पर्व के अध्याय -(२२ के १२ से २५ ) तक के श्लोकों में मिलता है। जो इस प्रकार है -
"भवन्तः सर्वकार्यज्ञा वेदेषु परिनिष्ठिताः।
न्यायवृत्तान्तकुशलास्त्रिवर्गस्य प्रवर्तकाः।।१२।
कर्तव्यानां च कर्तारो लोकस्य विबुधोपमाः।
तस्थिवांसो महावृत्ते निष्कम्पा इव पर्वताः।।१३।।
अदम्भवृत्तयः सर्वे सर्वे गुरुकुलोषिताः।
राजमन्त्रधराः सर्वे सर्वे धनुषि पारगाः।।१४ ।।
यशः प्रदीपा लोकानां वेदार्थानां विवक्षवः।
आश्रमाणां निसर्गज्ञा वर्णानां क्रमपारगाः।।१५।।
प्रवक्तारः सुनियतां नेतारो नयदर्शिनाम् ।
भेत्तारः परराष्ट्राणां त्रातारः शरणार्थिनाम्।।१६।।
एवमक्षतचारित्रैः श्रीमद्भिरुदितोदितैः ।
द्यौरप्यनुगृहीता स्याद्भवद्भिः किं पुनर्मही।। १७।।
ऋषीणामिव वो वृत्तं प्रभावो मरुतामिव ।
रुद्राणामिव वः क्रोधो दीप्तिरङ्गिरसारमिव।।१८।।
व्यावर्तमानं सुमहद् भवद्भिः ख्यात कीर्तिभिः ।
धृतं यदुकुलं वीरैर्भूतलं पर्वतैरिव।।१९।।
अनुवाद -
आप (यादव) समस्त कर्तव्य कर्मों के ज्ञाता, वेदों के परिनिष्ठित विद्वान, न्यायोचित वार्ता में कुशल, धर्म, अर्थ, और काम के प्रवर्तक, कर्तव्य पालक, जगत के लिए देवों के समान माननीय महान आचार्य विचार में दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने वाले और पर्वत के समान अविचल हैं। १२-१३।
• आप सब लोग पाखण्डपूर्ण वृत्ति से दूर रहते हैं। सबने गुरुकुल में रहकर शिक्षा पाई है। आप सब लोग राजा की गुप्त मन्त्रणाओं को सुरक्षित रखने वाले तथा धनुर्वेद में पारंगत हैं।१४।
• आपके यशस्वी रूप प्रदीप सम्पूर्ण जगत में अपना प्रकाश फैला रहे हैं। आप लोग वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णों के जो क्रमिक धर्म हैं, उसके आप लोग पारंगत विद्वान हैं।१५।
✳️ ज्ञात हो श्लोक- (१५) में जो बात कही गई है वह यादवों के अतिरिक्त अन्य किसी पर लागू नहीं हो सकती क्योंकि ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में जन्मगत आधार पर यह प्रतिबन्धित कर दिया गया है कि (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) लोग अपने ही वर्ण में रहकर कार्य करें दूसरे वर्ण का कार्य कदापि न करें। जबकि वैष्णव वर्ण में इस तरह कोई प्रतिबन्ध नहीं है इस लिए वैष्णव वर्ण के गोप सभी तरह के कर्म बिना बन्धन के स्वतन्त्रता पूर्वक करते हैं। इसलिए कंस यह बात कहा कि-" आप लोग वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णों के जो क्रमिक धर्म हैं, उसके आप लोग पारंगत विद्वान हैं।१५।
• आप लोग उत्तम विधियों के वक्ता, नीतिदर्शी पुरुषों के भी नेता, शत्रु राष्ट्रों के गुप्त रहस्यों का भेदन करने वाले तथा शरणार्थियों के संरक्षक हैं।१६।
• आपके सदाचार में कभी आँच नहीं आने पाई है। आप लोग श्रीसम्पन्न हैं तथा श्रेष्ठ पुरुषों की चर्चा होते समय आप लोगों का नाम बारम्बार लिए जाते हैं। आप लोग चाहें तो स्वर्ग लोक पर भी अनुग्रह कर सकते हैं फिर इस भूतल की तो बात ही क्या ?।१७।
• आपका (यादवों का) आचार ऋषियों के, प्रभाव मरुद्गणों के, क्रोध रुद्रों के, और तेज अग्नि के समान है।१८।
• यह महान यदुकुल जब अपनी मर्यादा से भ्रष्ट हो रहा था, उस समय विख्यात कीर्ति वाले आप जैसे वीरों ने ही इसे मर्यादा में स्थापित किया, ठीक उसी तरह से जैसे पर्वतों नें इस भूतल को दृढ़तापूर्वक धारण कर रखा है।१९।
उपर्युक्त श्लोकों में देखा जाए तो यादवों के लिए पाँच महत्वपूर्ण बातें निकल कर सामने आती है। वो हैं-
(१)- यादव- पाखण्डपूर्ण वृत्ति से सदैव दूर रहते थे और आज भी बहुतायत यादव दूर रहते हैं।
(२)- यादव- वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। तथा आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें ये लोग भली- भाँति जानते हैं। और ( ब्राह्मी वर्ण- व्यवस्था के जो ) चारों वर्णों के क्रमिक धर्म है, उसके ये लोग पारंगत विद्वान हैं।
(३)- यादव- नीतिदर्शी पुरुषों के भी नेता, शत्रु राष्ट्रों के गुप्त रहस्यों का भेदन करने वाले तथा शरणार्थियों के संरक्षक हैं।
(४)- यादवों के दृढ़-संकल्प की बात करें तो ये स्वर्ग लोक पर भी अनुग्रह कर सकते हैं, फिर इस भूतल की तो बात ही क्या।
(५)- यादवों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनके आचार ऋषियों के, प्रभाव मरुद्गणों के, क्रोध रूद्रो के, और तेज अग्नि के समान होता है।
दूसरी बात यह कि- यादवों की इन्हीं विशेषताओं की वजह से जब कालयवन नें नारद जी से पूछा कि इस समय पृथ्वी पर बलवान राजा कौन-कौन हैं ? इस पर नारद जी विष्णुपुराण के पञ्चम अंश के अध्याय- २३ के श्लोक संख्या- ६ में नारद जी ने बताया हैं -
स तु वीर्यमदोन्मतः पृथिव्यां बलिनो नृपान्।
अपच्छन्नारदस्तस्मै कथयामास यादवान्।।६।
अनुवाद- तदनन्तर वीर्यमदोन्मत्त कालयवन ने नारद जी से पूछा कि- पृथ्वी पर बलवान राजा कौन-कौन से हैं ? इस पर नारद जी ने उसे यादवों को ही सबसे अधिक बलशाली बताया।
इसी तरह से गोपकुल की गोपियों के लिए गर्गसंहिता के गोलक खण्ड के अध्याय- (१०) के श्लोक संख्या-(८) में नारद जी कंस से कहते हैं कि -
"नन्दाद्या वसव: सर्वे वृषभान्वादय: सरा:।
गोप्यो वेदऋचाद्याश्च सन्ति भूमौ नृपेश्वर।।८।
अनुवाद - नन्द आदि गोप वसु के अवतार हैं और वृषभानु आदि देवताओं के अवतार हैं।
नृपेश्वर कंस ! इस व्रजभूमि में जो गोपियाँ हैं, उनके रूप में वेदों की ऋचाएँ यहाँ निवास करती हैं।
गर्गसंहिता (माधुर्यखण्डः)अध्यायः (१) में भी गोपियों के श्रुति रूप का वर्णन है।
श्रीनारद उवाच -
श्रुतिरूपाश्च या गोप्यो गोपानां सुकुले व्रजे ।
लेभिरे जन्म वैदेह शेषशायीवराच्छ्रुतात् ॥५।
अब इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि गोपियों की उपमा वेदों की ऋचाओं से की जाती है।
(४)- गोपियाँ कोई साधारण स्त्रियाँ नहीं थीं। तभी तो चातुर्वर्ण्य के नियामक व रचयिता ब्रह्माजी-ने श्रीमद्भभागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय- (४७) के श्लोक (६१) में गोपियों की चरण धूलि को पाने के लिए तरह-तरह की कल्पना करते हुए मन में विचार करते हुए कहा- कि-
"आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथमं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्।।६१।
अनुवाद - मेरे लिए तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृन्दावन धाम में कोई झाड़ी, लता अथवा औषधि बन जाऊँ। अहा ! यदि मैं ऐसा बन जाऊँगा, तो मुझे इन व्रजांगनाओं (गोपियों ) की चरण धूलि निरन्तर सेवन करने के लिए मिलती रहेगी।
अब इन गोपकुल की गोपियों लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि ब्रह्मा भी इनके चरण धूलि को पाने के लिए झाड़ी और लता तक बन जानें की इच्छा करते हैं।
(५)- इसी तरह से गोपों के बारे में श्रीराधा जी, गोपी रूप धारण किए भगवान श्रीकृष्ण से- गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड के अध्याय-(१८) के श्लोक संख्या -(२२) में कहती हैं कि-
"गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।
अनुवाद - गोप सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की गङ्गा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।
(६)- इसी तरह से परम ज्ञानयोगी उद्धव जी ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(९४) के कुछ प्रमुख श्लोकों में गोपियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि-
"धन्यं भारतवर्षं तु पुण्यदं शुभदं वरम् ।
गोपीपादाब्जरजसा पूतं परमनिर्मलम्। ७७।
ततोऽपि गोपिका धन्या सान्या योषित्सु भारते।
नित्यं पश्यन्ति राधायाः पादपद्मं सुपुण्यदम्।७८।
अनुवाद - इस भारतवर्ष में नारियों के मध्य गोपीकाऐं सबसे बढ़कर धन्या और मान्या हैं, क्योंकि वे उत्तम पुण्य प्रदान करने वाले श्रीराधा के चरणकमलों का नित्य दर्शन करती रहती हैं।७७-७८।
पुनः उद्धव जी कहते हैं कि -
"षष्टिवर्षसहस्राणि तपस्तप्तं च ब्रह्मणा ।