मंगलवार, 24 मार्च 2026

ऋग्वेद में कृष्ण और अर्जुन को धर्म रूपों का संस्थापक कहा गया है।


(ऋग्वेद १०/२१/३) 
त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव ।
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥३॥
  • पदों का व्याकरण सम्मत अर्थ-
  • त्वे (Tve): 'त्वयि' का वैदिक रूप। सप्तमी विभक्ति, एकवचन (तुझमें/तेरे आश्रय में)।
  • धर्माणः (Dharmāṇaḥ): प्रथमा विभक्ति, बहुवचन। धारण करने वाले गुण या उपासक।
  • आसते (Āsate): 'आस्' धातु (बैठना/विराजना), लट् लकार, आत्मनेपद। (विराजते हैं)।
  • जुहूभिः (Juhūbhiḥ): तृतीया विभक्ति, बहुवचन। 'जुहू' (हवन पात्र/चमच) के द्वारा।
  • सिञ्चतीः-इव (Siñcatīḥ-iva): सींचती हुई धाराओं के समान। 'सिच्' धातु + शतृ प्रत्यय (स्त्रीलिंग)।
  • कृष्णा रूपाणि-अर्जुना (Kṛṣṇā rūpāṇi-arjunā): कृष्ण  और अर्जुन आदि अनेक रूपों में। यहाँ द्वन्द्व और विशेषण का प्रयोग है।
  • वि वो मदे (Vi vo made): 'वः' (तुम्हारे लिए) और ' मदे=स्तुति में। 'वि' उपसर्ग विशिष्टता को दर्शाता है।
  • विश्वा अधि श्रियो धिषे (Viśvā adhi śriyo dhiṣe): तुम समस्त (विश्वा)के (श्रियो) कल्याणों (धिषे) धारण करते हो
  • विवक्षसे (Vivakṣase): 'वच्' धातु का  सन्नत रूप मध्यम पुरुष एक वचन आत्मनेपदीय -कहते हो।

अनुवाद-(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। आपकी स्तुति में विश्व कल्याण को अधिग्रहण( धारण) करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि रूपों में अनेक बार तुम ही सब धर्मों को कहने की इच्छा प्रकट करते हो। ऋग्वेद- १०/२१/३
____________________

व्याकरण विश्लेषण (Grammar Breakdown):
  • यथा जुहूभिः घृतम् अग्नौ सिच्यते:
    • यथा/तथा: 'जिस प्रकार/उस प्रकार' के लिए अव्यय।
    • जुहूभिः: 'जुहू' (हवन-पात्र) शब्द का तृतीया विभक्ति, बहुवचन। (करण कारक)
    • सिच्यते: 'सिच्' धातु (सींचना/छिड़कना), लट् लकार, कर्मवाच्य (Passive voice)।
  • सर्वे धर्माः त्वय्येव स्थिताः:
    • त्वय्येव: त्वयि + एव (यण् संधि)। 'आप में ही'।
    • स्थिताः: 'स्था' धातु + क्त प्रत्यय (स्थित होना)।
  • तव स्तुत्या विश्वकल्याणं गृह्यते:
    • स्तुत्या: 'स्तुति' शब्द का तृतीया विभक्ति, एकवचन।
    • गृह्यते: 'ग्रह्' धातु (ग्रहण करना/अधिग्रहण), लट् लकार, कर्मवाच्य।
  • कृष्णार्जुनरूपेण त्वमेव... वक्तुमिच्छसि:
    • कृष्णार्जुनरूपेण: कृष्ण और अर्जुन के रूप के द्वारा (तृतीय विभक्ति)।
    • बहुवारं: अनेक बार।
    • वक्तुमिच्छसि:/ विवक्षसे= वक्तुम् (वच् + तुमुन् प्रत्यय - बोलने के लिए) + इच्छसि (चाहते हो)।

ऋग्वेद १०/२१/३) 
"त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव।
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥"
अनुवाद:
"(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता  है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। और आप सभी धर्मों को धारण करते हो। आपकी स्तुति में सम्पूर्ण विश्व कल्याण को अधिग्रहण करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि अनेक रूपों में अनेक बार तुम ही धर्मों को कहते हो। 
  •  प्रस्तुत ऋचा पर योगेश रोहि का भाष्य-
संस्कृत श्लोक-
यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
धर्मान् सनातनंश्चापि नमोऽस्तु परमात्मने॥

व्याकरण सहित हिन्दी अनुवाद:
  1. यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
    • अनुवाद: जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) के द्वारा घी अग्नि में (अर्पित होकर) स्थित होता है, उसी प्रकार सभी धर्म आप में भी स्थित होता हैं।
    • व्याकरण:
      • यथा/तथा: अव्यय (जैसे/वैसे)।
      • जुह्वि: 'जुहू' शब्द (तृतीया विभक्ति, बहुवचन के अर्थ में यहाँ प्रयुक्त) - हवन का पात्र।
      • वह्नौ: 'वह्नि' (अग्नि) शब्द, सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
      • स्थिताः 'स्था' धातु + 'क्त' प्रत्यय (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन)।
  2. त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
    • अनुवाद: आप ही समस्त धर्मों को धारण करते हैं और (आपकी स्तुति से) सम्पूर्ण विश्व कल्याण (स्वस्ति) प्राप्त करता है।
    • व्याकरण:
      • धारयसि: 'धृ' धातु (णिजन्त), लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
      • विन्दति: 'विद्' धातु (लाभ प्राप्त करना), लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
      • स्वस्ति: कल्याण/मंगल।
  3. कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
    • अनुवाद: हे प्रभु! कृष्ण और अर्जुन जैसे अनेक रूपों में आप ही बार-बार धर्म का उपदेश देते हैं।
    • व्याकरण:
      • स्वरूपेण: तृतीया विभक्ति, एकवचन (रूप के द्वारा)।
      • बहुधा: अव्यय (अनेक प्रकार से/अनेक बार)।
      • वदसि: 'वद्' धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।

विशेष: यह पंक्तियाँ कृष्ण को 'धर्म-गोप्ता' (धर्म का रक्षक) और 'साक्षात् धर्म' के रूप में प्रतिपादित करती हैं। जिस प्रकार अग्नि आहुति को स्वीकार करती है, उसी प्रकार परमात्मा सभी धर्मों का आधार (आश्रय) हैं।


सोमवार, 23 मार्च 2026

यह लेख श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्यों पर एक अत्यन्त विस्तृत और शोधपरक प्रस्तुति है

यह लेख श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्यों पर एक अत्यन्त विस्तृत और शोधपरक प्रस्तुति है। इसमें सायण भाष्य (पारम्परिक) और गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि (भाषावैज्ञानिक एवं  संस्कृत व्याकरणज्ञ ) के दृष्टिकोणों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है।

​नीचे इस लेख का व्यवस्थित और सम्पादित रूप प्रस्तुत है:

​श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्य: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

​प्रस्तावना

​ऋग्वेद के आठवें मण्डल (8/96/13-15) में इन्द्र और 'कृष्ण' के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता है। सायण आदि भाष्यकारों ने यहाँ कृष्ण को 'असुर' या 'अदेव' मानकर उनकी व्याख्या की है। इसके विपरीत, आधुनिक भाषाविद् गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि के अनुसार, ये ऋचाएँ ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रूप से गोपेश्वर श्रीकृष्ण की ही वैदिक उपस्थिति को सिद्ध करती हैं।

​1. 'असुर' शब्द का वैदिक बनाम पौराणिक अर्थ

​भाष्यकारों ने 'कृष्ण' को असुर घोषित करने के लिए जिस 'असुर' शब्द का प्रयोग किया, उसका मूल वैदिक अर्थ समझना आवश्यक है:

  • वैदिक अर्थ: 'असु' (प्राण/प्रज्ञा) + 'र' (दाता)। अर्थात् प्राणदाता या महाशक्तिशाली।
  • साक्ष्य: ऋग्वेद में लगभग 105 बार 'असुर' शब्द आया है। 90 बार यह वरुण, अग्नि, इन्द्र और रुद्र (शिव) जैसे देवताओं के लिए प्रयुक्त हुआ है।
  • उदाहरण: * वरुण हेतु: "महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा" (ऋग्वेद 10.10.11) - यहाँ वरुण को महान असुर (दिव्य शक्ति) कहा गया है।
    • अग्नि हेतु: "त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो" (ऋग्वेद 2.1.6) - यहाँ अग्नि को ही रुद्र और असुर कहा गया है।
  • निष्कर्ष: वैदिक काल में 'असुर' शब्द नकारात्मक नहीं था। सायण ने 'अदेव' (जो प्रचलित देवों की सत्ता न माने) शब्द का अनर्थ करके कृष्ण को पौराणिक असुरों की श्रेणी में रख दिया।

    ​2. ऋग्वेद की प्रमुख ऋचाओं का नवीन भाष्य (8/96/13-15)

    ​ऋचा 13: यमुना तट पर कृष्ण की उपस्थिति

    अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः...


भावार्थ: श्रीकृष्ण दस हजार गोपों के साथ यमुना (अंशुमती) के तट पर स्थित थे। इन्द्र ने अपनी पत्नी शची के साथ आकर जल के बीच स्थित उन तेजस्वी कृष्ण को पहचाना और उन्हें सम्मान स्वरूप उपहार/धन अर्पित किया।

​ऋचा 14: शक्ति परीक्षण का आह्वान

द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः...


योगेश रोहि का भाष्य: इन्द्र कहते हैं—"मैंने यमुना के निर्जन प्रदेश में एक शक्तिशाली वृषभ (साँड़) को देखा है। मैं देखना चाहता हूँ कि क्या कृष्ण इस वृषभ से युद्ध कर अपनी शक्ति सिद्ध कर सकते हैं।" यह प्रसंग कृष्ण के पराक्रम के परीक्षण का प्रतीक है।

​ऋचा 15: गोपों का रक्षण और इन्द्र का अनुशासन

अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः...


भावार्थ: कृष्ण ने यमुना की गोद में अपने देदीप्यमान शरीर को धारण किया। वे 'विश' (गोपालक समुदाय) के रक्षक थे। इन्द्र ने बृहस्पति (ज्ञान) की सहायता से इन 'अदेवी' (इन्द्र की पूजा न करने वाले) गोपों पर शासन करना चाहा, जो बाद में गोवर्धन लीला के रूप में पौराणिक ग्रंथों में प्रसिद्ध हुआ।

​3. 'विश' और 'गोप' शब्दों की व्याख्या

​वेदों में श्रीकृष्ण को 'विष्णुर्गोपा' कहा गया है।

  • विश: इसका अर्थ है प्रजा या वह समुदाय जो कृषि और गोपालन करता है (वैश्यवृत्ति)।
  • गोपा: ऋग्वेद (1.22.18) के अनुसार, "विष्णु ही गोपा (गोपालक) हैं जो कभी विचलित नहीं होते।"

​4. पुरातात्विक और अन्य वेदों के प्रमाण

  1. मोहनजोदाड़ो (1929): पुरातत्ववेत्ता 'अरनेस्त मैके' को एक टैबलेट मिला जिसमें दो वृक्षों (यमलार्जुन) के बीच एक बालक (कृष्ण) का चित्र है। यह सिद्ध करता है कि कृष्ण की सत्ता वैदिक और सिंधु सभ्यता दोनों में थी।
  2. अथर्ववेद (8/6/5): यहाँ कृष्ण द्वारा 'केशी' नामक दैत्य के वध का स्पष्ट उल्लेख है।​"यः कृष्णः केश्यसुर..." (अथर्ववेद 8.6.5)
  3. "यः कृष्णः केश्यसुर..." (अथर्ववेद 8.6.5)


    1. यजुर्वेद (32/5): यहाँ 'षोडशी' (सोलह कलाओं वाले) प्रजापति के अवतरण की भविष्यवाणी है, जो श्रीकृष्ण के पूर्ण अवतारत्व को दर्शाती है।


सायण का पद- मत

   योगेश      कुमार रोहि का मत

द्रप्स-

गतिशील असुर तत्व

जल-बिन्दु (Drops) 

अंशुमती-

एक अज्ञात नदी

यमुना नदी (सूर्यपुत्री/किरणों वाली)

कृष्ण-

काला असुर

गोपेश्वर श्रीकृष्ण (आकर्षक/कृषक)

दश सहस्र-

असुर सेना

दस हजार गोपगण

    ​निष्कर्ष

    ​सायण भाष्य में 'असुर' और 'अदेव' शब्दों के पौराणिक अर्थ ग्रहण करने के कारण श्रीकृष्ण की छवि धूमिल हुई। किंतु व्याकरण और भाषाविज्ञान के आधार पर यह स्पष्ट है कि:

    • ​कृष्ण असुर (दैत्य) नहीं, बल्कि असुर (महाप्राण/शक्तिशाली) थे।
    • ​वेदों के 'गोपा' और 'विष्णु' का मानवीय स्वरूप ही श्रीकृष्ण है।
    • ​उनकी उपस्थिति सिन्धु सभ्यता से लेकर चारों वेदों तक व्याप्त है।

जो कर्म किए हैं तूने -

जो कर्म किए हैं तूने (गीत)

​(मुखड़ा)

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा

दुख-सुख की लहरों में, डूब जाना पड़ेगा

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा

​(अंतरा 1)

खुशियाँ कहीं गमी है, गफलत में आदमी है

पड़ावों को मंजिल समझे, उसकी यही बहमी है

खुद खो गया जो आखिर, उसकी रजा है क्या फिर

कुछ पल के हैं ये मेले, सूनी-सूनी जमी है

तन्हाइयों के पथ पर, चलते जाना पड़ेगा

कोई साथ नहीं है तेरे, गम छुपाना पड़ेगा

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा

​(अंतरा 2)

कुछ पल के हैं ये मेले, हर पल के हैं झमेले

जो भी साथ-साथ खेले, वो भी रह गए अकेले

कुछ पल के हैं ये मेले, हर पल के हैं झमेले

अपने गमों को इंसान, खुद आप-आप झेले

तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा

​(अंतरा 3)

सुनसान तेरी राहें, साथी है तेरी आहें

धुआं-धुआं है जीवन, क्या खोजती निगाहें

सांसों की लय में ढाले, ले धड़कनों की तालें

आहों के आलापों में, गमे जिंदगी तू गा ले

लंबे सफर में तुझको, गीत गाना पड़ेगा

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा

दुख-सुख की लहरों में तुझको, डूब जाना पड़ेगा

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा

​क्या आप इस गीत के गहरे अर्थ या इसके पीछे के संदेश के बारे में और जानना चाहेंगे?

श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्य -

    (1) श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्य -

                  "प्रस्तावना-

सायण आदि भाष्यकारों के अनुसार-
ऋग्वेद के मण्डल अष्टम (8) के सूक्त (96) की ऋचा संख्याएँ क्रमशः ( 13 -14 -और 15 )  में कृष्ण से इन्द्र के युद्ध होने का वर्णन मिलता है। जिससे कृष्ण की वैदिक कालीन उपस्थिति( सत्ता) सिद्ध होती है। जो ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अतीव महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन भाष्यकारों ने युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थ का पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ करके कृष्ण को असुर या अदेव रूपों में दर्शाया है।

यद्यपि ऋग्वेद की मूल ऋचा में  कृष्ण को कहीं भी असुर नहीं कहा गया है परन्तु उन्हें अदेव पद से अवश्य सम्बोधित किया गया है। 
जिसे आधार मान कर वेदों में सायण आदि भाष्यकर्ताओं ने उसी "अदेव" को असुर अथवा दैत्यों के परवर्ती व पौराणिक अर्थ में देव जाति के विपरीत एक असीरिया के जनसमुदाय विशेष से सम्बन्धित कर अर्थ ग्रहण किया है।

असीरिया के मूल निवासी असुर ही थे। जो दजला और फरात नदीयों के दुआव में स्थित असीरिया देश में रहते थे जो आजकल ईरान और ईराक का मिश्रित भूभाग है। परन्तु कृष्ण असीरियन अथवा असुर कभी नहीं थे।
****

अब हम बात करते हैं सायण आदि भाष्यकारों की जिन्होंने कृष्ण को असुर बना दिया है।
भाष्यकारों ने ऐसा क्यों किया ? क्या वे ऋग्वेद में वर्णित असुर शब्द के अर्थ से परिचित नहीं थे अथवा उन्होंने जानबूझकर असुर शब्द का अर्थ पौराणिक अर्थ में स्वीकार किया ?  इन्हीं सब प्रश्नों का समाधान यहाँ पर हम विश्लेषणात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं।

सबसे पहले हम ऋग्वेद की उन तीनों ऋचाओं को देखें, जिसमें कृष्ण और इन्द्र का युद्ध दर्शाया गया है।
"
अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥
सायण भाष्य मूल सस्कृत रूप-
-अत्रेतिहासमाचक्षते किल। कृष्णो नामासुरो दशसहस्रसंख्यैरसुरैः परिवृतः सन्नंशुमतीनामधेयाया नद्यास्तीरेऽतिष्ठत् । तत्र तं कृष्णमुदकमध्ये स्थितमिन्द्रो बृहस्पतिना सहागच्छत्। आगत्य तं कृष्णं तस्यानुचरांश्च बृहस्पतिसहायो जघानेति। 

केचिदन्यथा वदन्ति । तेषां कथा हेतुः । द्रप्स इत्युदककणोऽभिधीयते स तु सोमो ‘द्रप्सश्चस्कन्द '(ऋ. सं. १०/ १७/११ ) इत्यादिषु सोमपरत्वेनोक्तत्वात्। एतत्पदमाश्रित्याहुः- ‘अपक्रय तु देवेभ्यः सोमो वृत्रभयार्दितः॥ नदीमंशुमतीं नामाभ्यतिष्ठत् कुरून प्रति। तं बृहस्पतिनैकेन सोऽभ्ययाद्वृत्रहा सह॥ योत्स्यमानः सुसंहृष्टैर्मरुद्भिर्विविधायुधैः। दृष्ट्वा तानायतः सोमः स्वबलेन व्यवस्थितः॥ मन्वानो वृत्रमायान्तं जिघांसुमरिसेनया । व्यवस्थितं धनुष्मन्तं तमुवाच बृहस्पतिः॥ मरुत्पतिरयं सोम प्रेहि देवान् पुनर्विभो। सोऽब्रवीन्नेति तं शक्रः स्वर्ग एव बलाद्बली। इयाय देवानादाय तं पपुर्विधिवत्सुराः॥ जघ्नुः पीत्वा च दैत्यानां समरे नवतीर्नव। तदव द्रप्स इत्यस्मिन् तृचे सर्वं निगद्यते' (बृहद्दे. ६. १०९-११५ ) । एतदनार्षत्वेनानादरणीयं भवति । एषोऽर्थः क्रमेणर्क्षु वक्ष्यते । तथा चास्या ऋचोऽयमर्थः । “द्रप्सः । द्रुतं सरति गच्छतीति द्रप्सः । पृषोदरादिः । द्रुतं गच्छन् "दशभिः “सहसैः दशसहस्रसंख्यैरसुरैः “इयानः “कृष्णः एतन्नामकोऽसुरः "अंशुमतीं नाम नदीम् “अव “अतिष्ठत् अवतिष्ठते । ततः “शच्या कर्मणा प्रज्ञानेन वा “धमन्तम् उदकस्यान्तरुच्छ्वसन्तं यद्वा जगद्भीतिकरं शब्दं कुर्वन्तं “तं कृष्णमसुरम् “इन्द्रः मरुद्भिः सह “आवत् प्राप्नोत् । पश्चात्तं कृष्णमसुरं तस्यानुचरांश्च हतवानिति वदति । “नृमणाः नृषु मनो यस्य सः । यद्वा । कर्मनेतृष्वृत्विक्ष्वेकविधं मनो यस्य स तथोक्तः । तादृशः सन् “स्नेहितीः । स्नेहतिर्वधकर्मसु पठितः । सर्वस्य हिंसित्रीस्तस्य सेनाः “अप “अधत्त । अपधानं हननम् । अवधीदित्यर्थः । ‘ अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' (सा. सं. १. १.४.४.१) इति छन्दोगाः पठन्ति । तस्यानुचरान् हत्वा तं द्रुतं गच्छन्तमसुरमपाधत्त । हतवान् ॥

"सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद- 
अनुवाद:
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास (कथा) कही जाती है। कृष्ण नाम का एक असुर दस हजार असुरों के साथ अंशुमती नाम की नदी के तट पर खड़ा था। वहाँ जल के बीच स्थित उस कृष्णासुर के पास इन्द्रदेव बृहस्पति जी के साथ आए। आकर बृहस्पति की सहायता से इन्द्रदेव ने उस कृष्ण और उसके अनुचरों (साथियों) का वध कर दिया। 

कुछ लोग इसे दूसरी तरह से कहते हैं। उनके अनुसार कथा का आधार यह है: 'द्रप्स' शब्द का अर्थ "जल की बूँद" है, लेकिन 'द्रप्सश्चस्कन्द' (ऋग्वेद १०.१७.११) आदि मन्त्रों में इसका प्रयोग सोम के लिए हुआ है। इस पद का सहारा लेकर वे कुछ विद्वान कहते हैं—कि "वृत्र के भय से पीड़ित सोम सभी देवताओं को छोड़कर कुरुक्षेत्र की ओर अञ्शुमती नदी में जाकर छिप गया। वृत्रहन्ता इन्द्र अकेले बृहस्पति के साथ वहाँ पहुँचे। युद्ध के लिए तैयार और विविध शस्त्रों से सुसज्जित मरुद्गणों को देखकर, सोम ने अपनी सेना के साथ मोर्चा संभाल लिया। उस (सोम को) धनुष ताने खड़ा देख, बृहस्पति ने उसे शत्रु की सेना समझकर मारने की इच्छा से कहा— 'हे समर्थ सोम ! यह मरुतों के स्वामी इन्द्र हैं, तुम पुनः देवताओं के पास चलो।' सोम ने मना कर दिया, तब बलवान इन्द्र उसे बलपूर्वक स्वर्ग ले आए। देवताओं ने विधिपूर्वक उसका पान किया और उसे पीकर युद्ध में  निन्यानवे (९९) असुरों को मार गिराया। यह सब 'द्रप्स' से शुरू होने वाली तीन ऋचाओं में कहा गया है।" (बृहद्देवता ६.१०९-११५)।
किन्तु, यह मत (बृहद्देवता वाला) ऋषियों के मूल अभिप्राय के अनुकूल न होने के कारण स्वीकार करने योग्य नहीं है। 
इसका वास्तविक अर्थ ऋचाओं के क्रम के अनुसार आगे बताया जाएगा।
इस ऋचा (मन्त्र) का अर्थ इस प्रकार है: 'द्रप्सः' का अर्थ है शीघ्र जाने वाला। वह 'दशभिः सहसैः' अर्थात् दस हजार असुरों के साथ 'इयानः' (जाता हुआ) 'कृष्णः' नाम का असुर 'अंशुमतीम्' नाम की नदी के पास 'अव अतिष्ठत्' (ठहरा हुआ था)। तब 'शच्या' अर्थात् अपनी शक्ति या बुद्धि से, 'धमन्तम्' (जल के भीतर श्वास लेते हुए या संसार को डराने वाला शब्द करते हुए) उस कृष्ण असुर को इन्द्र ने मरुतों के साथ 'आवत्' (प्राप्त किया/खोज निकाला)। इसके बाद उन्होंने उस कृष्ण और उसके साथियों का वध कर दिया।

'नृमणाः' (मनुष्यों या ऋत्विजों के प्रति हितकारी मन वाले इन्द्र ने) 'स्नेहितीः' अर्थात् हिंसा करने वाली उसकी (कृष्ण असुर की) सेनाओं को 'अप अधत्त' (नष्ट कर दिया या मार डाला)। छन्दोग (सामवेदी) इसे 'अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' पढ़ते हैं। तात्पर्य यह है कि उसके साथियों को मारकर, इन्द्र ने उस तेजी से भागते हुए असुर का वध कर दिया।
**************************************


"द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥

सायण भाष्य का संस्कृत रूप-
तुरीयपादो मारुतः । मरुतः प्रति यद्वाक्यमिन्द्र उवाच तदत्र कीर्त्यते । हे मरुतः “द्रप्सं द्रुतगामिनं कृष्णमहम् “अपश्यम् अदर्शम् । कुत्र वर्तमानम् । “विषुणे विष्वगञ्चने सर्वतो विस्तृते देशे । यद्वा । विषुणो विषमः । विषमे परैरदृश्ये गुहारूपे देशे। “चरन्तं परितो गच्छन्तम् । किञ्च “अंशुमत्याः एतन्नामिकायाः “नद्यः नद्याः “उपह्वरे अत्यन्तं गूढे स्थाने “नभो “न नभसि यथादित्यो दीप्यते तद्वत्तत्र दीप्यमानम् “अवतस्थिवांसम् उदकस्यान्तरवस्थितं “कृष्णम् एतन्नामकमसुरमपश्यम् । तस्मिन् दृष्टे सति हे “वृषणः कामानामुदकानां वा सेक्तारो मरुतः “वः युष्मान् युद्धार्थम् “इष्यामि अहमिच्छामि । ततो यूयं तमिमं कृष्णम् "आजौ । अजन्ति गच्छन्त्यत्र योद्धार आयुधानि प्रक्षेपयन्तीति वाजिः संग्रामः । तस्मिन् "युध्यत संहरत । वाक्यभेदादनिघातः । केचित् इष्यामि वो मरुतः इति पठन्ति । तत्र हे मरुतः वो युष्मानिच्छामीत्यर्थो भवति  ।
(सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद- )

"ऋचा का चतुर्थ पाद (तुरीयपाद) 'मारुतः' है। इन्द्र ने मरुतों के प्रति जो वाक्य कहा, उसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। हे मरुतों ! मैंने 'द्रप्सं' अर्थात् तीव्र गति वाले 'कृष्णम्' (कृष्ण नामक असुर) को 'अपश्यम्' (देखा)। वह कहाँ स्थित था ? 'विषुणे' अर्थात् चारों ओर फैले हुए विस्तृत प्रदेश में। अथवा, 'विषुण' का अर्थ विषम भी है; अर्थात् शत्रुओं के लिए अदृश्य, गुफा रूपी दुर्गम स्थान में। वह वहाँ 'चरन्तं' (विचरण करते हुए को )। इसके अलावा, 'अंशुमत्याः' इस नाम वाली 'नद्यः' (नदी) के 'उपह्वरे' अर्थात् अत्यन्त गोपनीय स्थान पर, 'नभो न' (आकाश में सूर्य के समान) चमकते हुए और जल के भीतर 'अवतस्थिवांसम्' (स्थित) उस 'कृष्ण' नामक असुर को मैंने देखा। उसके दिखने पर, हे 'वृषणः' (कामनाओं या जल की वर्षा करने वाले मरुतों), मैं 'वः' (तुम्हें) युद्ध के लिए 'इष्यामि' (चाहता हूँ/प्रेरित करता हूँ)। अतः तुम सब उस कृष्ण को 'आजौ' (युद्ध क्षेत्र में, जहाँ योद्धा और अस्त्र चलते हैं) 'युध्यत' (उससे युद्ध करो)। यहाँ वाक्य भेद होने के कारण (इष्यामि में) निघात स्वर नहीं हुआ है। कुछ लोग 'इष्यामि वो मरुतः' ऐसा पाठ पढ़ते हैं, जिसका अर्थ है—हे मरुतों, मैं तुम्हारी इच्छा करता हूँ।"


"अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥

सायण भाष्य का संस्कृत रूप-
अध अथ “द्रप्स सः द्रुतगामी कृष्णः “अंशुमत्याः नद्याः “उपस्थे समीपे “तित्विषाणः दीप्यमानः सन् “तन्वम् आत्मीयं शरीरम् “अधारयत् । परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा सहायेन “अदेवीः अद्योतमानाः । कृष्णरूपा इत्यर्थः । यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः आगच्छन्तीः “विशः= असुरसेनाः "अभि "ससहे जघान । तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ।

(सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद- )
फिर वह द्रुतगामी कृष्ण (असुर) 'अंशुमती' नदी के किनारे दीप्तिमान होकर अपने शरीर को धारण किए हुए था (अर्थात् शत्रुओं द्वारा अपराजित होकर खड़ा था। अथवा, बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पुष्ट कर रहा था)। वहाँ इन्द्र ने जाकर बृहस्पति नामक देव की सहायता से, उन प्रकाशहीन (अंधकारमय या पापयुक्त होने के कारण स्तुति के अयोग्य) और अपनी ओर बढ़ती हुई कृष्ण असुर की सेनाओं को पराजित किया (अर्थात् उनका संहार किया, यह अर्थ प्रसंग से समझा जाता है)।"

उपरिलिखित  ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर ही आधारित है ।

सायण भाष्य के अनुयायी 
इन ऋचाओं में प्रयुक्त हुए निम्नलिखित शब्दों के  दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थ इस प्रकार करते हैं-

1. द्रप्स-
साधारण अर्थ में इसका अर्थ 'बूँद' या 'कण' होता है, लेकिन यहाँ यह 'गतिशील तत्व' के लिए सायण ने इसका अर्थ किया है। दार्शनिक रूप से यह उस भटकती हुई शक्ति का प्रतीक है जो अभी स्थिर नहीं हुई है। कुछ विद्वान इसे 'सोम' की बूँद( Drops) मानते हैं, तो कुछ इसे 'अन्धकार का पुञ्ज' अथवा कृष्ण के विशेषण रूप में ग्रहण करते हैं। 

2. अंशुमती-
'अंशु' का अर्थ है किरण। अंशुमती का अर्थ हुआ 'किरणों वाली' या 'प्रकाशमयी' होता है। भौतिक स्तर पर: यह कुरुक्षेत्र के पास की यमुना का विशेषण  है। आध्यात्मिक स्तर पर: यह 'बुद्धि' या 'चेतना' का प्रतीक है। जब ज्ञान की किरणें (अंशु) मन में बहती हैं, तो वह अंशुमती है। 

3. कृष्ण-
ऋग्वेद के इस सूक्त में 'कृष्ण' किसी व्यक्ति के बजाय 'अन्धकार' का प्रतीक है। यह वह अवरोध है जो प्रकाश को रोकता है। दस हजार (दशभिः सहस्रैः) सेनाऐं हमारी अनगिनत वृत्तियों या बुराइयों को दर्शाती हैं जो चेतना के तट पर घेरा डाले रहती हैं। 

4. इन्द्र और बृहस्पति का योग -
 सायण आदि भाष्य कर्ताओं के अनुसार इन्द्र 'संकल्प शक्ति' हैं और बृहस्पति 'ज्ञान/वाणी'। ऋचा संख्या (१५) स्पष्ट करती है कि केवल बल से काम नहीं चलता, जब संकल्प को ज्ञान (बृहस्पति) का साथ मिलता है, तभी भीतर के 'अदेव' (अन्धकारमयी) तत्वों पर विजय मिलती है।
______

5-विश-वेदों में सायण ने विश विशेषण पद का अर्थ "विशो अदेवीर्" के रूप में देवों को न मानने वाले की प्रजा से किया है।   सायण उन्होंने "विश" पद को केवल प्रजा मात्र मान लिया है। और विशो अदेवीर् पद का भाष्य असुरों की प्रजा अथवा असुर-सेना से किया है।

________
इतिहासकारों,भाष्यकारों और शोधकर्ताओं ने ऋग्वेद की इन ऋचाओं (8/96/13-14-15) को अलग-अलग दृष्टिकोण (एंगल) से देखा है। इस कारण मुख्य रूप से दो बड़े ऐतिहासिक मत उभरकर सामने आते हैं-

1- जनजातीय संघर्ष का मत 

डी.डी. कौशाम्बी और कई अन्य इतिहासकारों का मानना है कि ऋग्वेद के 'कृष्ण' एक आर्य-पूर्व (Non-Aryan) जनजातीय नायक या नेता थे। उनके अनुसार 'अंशुमती' सम्भवतः यमुना नदी का ही प्राचीन नाम है।

कृष्ण की शक्ति-  उपर्युक्त ऋचा  में 'दशभिः सहस्रैः' (दस हजार के द्वारा ) पद का उल्लेख यह संकेत देता है कि कृष्ण एक शक्तिशाली स्थानीय राजा या कबीले के प्रधान थे।

ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचाऐं इन्द्र (जो ऋग्वेद में किलों को तोड़ने वाले 'पुरन्दर' कहे गए हैं) और स्थानीय कृष्ण कबीले के बीच हुए वास्तविक ऐतिहासिक युद्ध की स्थिति को दर्शाती हैं।

2- पौराणिक विकास का मत-

कुछ शोधकर्ता इसे 'पौराणिक कृष्ण' के चरित्र निर्माण का प्रारम्भिक सोपान मानते हैं। किन्तु आश्चर्य और दिलचस्प बात यह है कि ऋग्वेद में इन्द्र 'कृष्ण' को हरा रहे हैं, जबकि पुराणों (जैसे गोवर्धन लीला) आदि के प्रकरण में श्रीकृष्ण इन्द्र के अहंकार को चूर कर रहे हैं। कृष्ण और इन्द्र के चरित्र तथा पौरुष को लेकर यहाँ दो विरोधाभासी बातें ही प्रकाशित हो रही हैं।
_____________________

इन ऋचाओं के प्रति इतिहासकारों, भाष्यकारों और शोधकर्ताओं के बीच अर्थ विन्यास को लेकर जो मत-मतान्तर पूर्वाग्रह से युक्त हैं  वह सब सायण भाष्य से ही प्रेरित है।इस पर कुछ इतिहासकारों का तो  मानना यह भी हैं कि समय के साथ समाज की धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। जिसके परिणामस्वरूप जो 'कृष्ण' ऋग्वेद में एक असुर या अदेव के रूप में चित्रित थे, वे ही बाद में भागवत धर्म के उदय के साथ सर्वोच्च देवता (भगवान श्रीकृष्ण) के रूप में स्थापित हुए।

3- भाषाविद् और निरुक्तकारों का विचार-वेदों के भाष्यकार सायणाचार्य ने स्पष्ट किया है कि वैदिक 'कृष्ण' एक असुर का नाम है। उनके अनुसार, 'कृष्ण' शब्द का अर्थ 'काले रंग वाला' है, जो किसी व्यक्ति विशेष के बजाय अन्धकार के समूह या काले मेघों की ओर इशारा करता है इन्द्र पद प्रकाश का वाचक है।
कुल मिलाकर यदि भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो ऋग्वेद के कृष्ण गोपेश्वर श्रीकृष्ण नहीं बल्कि कोई काले शरीर का असुर है। और ऐसे में भाष्यकार सायणाचार्य  श्रीकृष्ण का वर्णन वेदों में नहीं मानते हैं।
____________________________________
"गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि का भाष्य जो सायण भाष्य के विपरीत है।-
अब वेदों की इन ऋचाओं में प्रयुक्त पदों का भाष्य व व्याकरण सम्मत अर्थ 
भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ व संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है-
*********************************
सायण भाष्य के विपरीत भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ , संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी का मनना है कि "वैदिक ऋचाओं में जिस कृष्ण का उल्लेख हुआ है, वह गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही हुआ है। हाँ ये बात अलग है कि भाष्यकार सायणाचार्य ने श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त अदेव पद को असुर के अर्थ में भाष्य कर उसे पौराणिक व परवर्ती दैत्य अर्थ में ग्रहण  किया है। जोकि अप्रासंगिक व कालवाधित है

जिसे व्याकरणीय दृष्टि से भी पूर्णतया स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।" क्योंकि इन ऋचाओं में आये कुछ प्रमुख शब्दों को देखा जाए तो उनके व्याकरणीय अर्थ निम्नलिखित हैं-
सर्व प्रथम हम असुर शब्द को ही अपने विश्लेषण का विषय बनाए- 

तो असुर शब्द ऋग्वेद में ही अधिकतर वरुण, अग्नि, सूर्य, शिव (रूद्र) और इन्द्र का भी विशेषण व वाचक है।

ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग लगभग (105 )बार हुआ है। इनमें से अधिकांश स्थानों पर (लगभग 90 बार) इसका प्रयोग 'प्राणशक्ति से सम्पन्न और प्रज्ञावान् ' के अर्थ में किया गया है। 
मुख्य रूप से यह शब्द इन्द्र, वरुण, अग्नि और रूद्र ( शिव) जैसे देवों के विशेषण के रूप में उनकी दिव्य शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाने के लिए उपयोग हुआ है। ऋग्वेद के उत्तरार्द्ध (विशेषकर दसवें मण्डल) में ही यह शब्द धीरे-धीरे नकारात्मक अर्थों (राक्षस या देव-विरोधी) शक्तियों  में प्रयुक्त होने लगा था। 

स्वयं सायण ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त संख्या (10) की ऋचा संख्या (2) में असुर शब्द का अर्थ वरुण देव  के अर्थ में करते हैं।
जैसे-
"न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥

यह पंक्ति ऋग्वेद के (10)वें मण्डल के (10)वें सूक्त (यम-यमी संवाद) की दूसरी ऋचा है। 
पूरा मंत्र और अर्थ:

न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति । महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् हिन्दी अनुवाद व्याकरण सहित करें


+2
यह मंत्र ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 10वें सूक्त (यम-यमी संवाद) का 11वां मंत्र है
। इसमें यमी (बहन) यम (भाई) से शारीरिक संबंध बनाने का आग्रह करती है, जिस पर यम उन्हें अनैतिकता और पाप से सचेत करते हैं। 
ऋग्वेद 10.10.11
न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥
1. हिंदी अनुवाद
यम यमी से कहते हैं:
"हे यमी! जो साथ में पैदा हुए (सहोदर) होने के बावजूद भी विषमरूप (विपरीत चरित्र वाले) हो जाते हैं, वैसा सख्य (मैत्री या शारीरिक संबंध) सखा (भाई) नहीं चाहता है। महान असुर (द्युलोक के स्वामी, परमेश्वर) के पुत्र और वीर, जो द्युलोक (स्वर्ग/आकाश) को धारण करने वाले हैं, वे हर जगह (हमारा पाप) देख रहे हैं।"
अर्थ: यम समझाते हैं कि सहोदर भाई-बहन का शारीरिक संबंध पापपूर्ण है और आकाश में रहने वाले दिव्य पुरुष (देवता) इसे देख रहे हैं, इसलिए हमें मर्यादा में रहना चाहिए।
2. पदच्छेद (Word Breakdown)
न / ते / सखा / सख्यं / वष्टि / एतत् / सलक्ष्मा / यत् / विषुरूपा / भवाति ।
महः / पुत्रासः / असुरस्य / वीराः / दिवः / धर्तारः / उर्विया / परि / ख्यन् ॥
3. व्याकरणिक विश्लेषण
न (अव्यय): निषेधवाचक (नहीं)।
ते (सर्वनाम): 'युष्मद्' शब्द का षष्ठी विभक्ति, एकवचन (तुम्हारे/तुम्हें)।
सखा (संज्ञा): प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
सख्यं (संज्ञा): द्वितीया विभक्ति, एकवचन (मित्रता/संबंध)।
वष्टि (क्रिया): 'विष्' धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन (चाहता है)।
एतत् (सर्वनाम): नपुंसकलिं, द्वितीया, एकवचन (यह)।
सलक्ष्मा (विशेषण): समान रूप वाले (सहोदर)।
विषुरूपा (विशेषण): भिन्न-भिन्न रूप वाले।
भवाति (क्रिया): 'भू' धातु, लेट् लकार (वेदों में प्रयुक्त) (होते हैं/हो जाएं)।
महः (विशेषण): महत (महान)।
पुत्रासः (संज्ञा): प्रथमा विभक्ति, बहुवचन ('अ' का 'आस' वैदिक रूप) (पुत्रगण)।
असुरस्य (संज्ञा): षष्ठी विभक्ति, एकवचन (असुर/शक्तिशाली का - यहाँ दिव्य ईश्वर के लिए)।
वीराः (संज्ञा): प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (वीर/पराक्रमी)।
दिवः (संज्ञा): पञ्चमी/षष्ठी विभक्ति, एकवचन (द्युलोक/आकाश का)।
धर्तारः (संज्ञा): धतृ शब्द, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (धारण करने वाले)।
उर्विया (अव्यय): व्यापक रूप से/हर ओर।
परि ख्यन् (क्रिया): परि + ख्या (देखना), लङ् लकार, बहुवचन (वे देखते हैं - रक्षक देवता)। 
4. मंत्र का भावार्थ
यह मंत्र यम-यमी संवाद का महत्वपूर्ण भाग है, जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की मर्यादा को दर्शाता है। यमी का तर्क है कि वे साथ पैदा हुए हैं, इसलिए सखा (प्रेमी) बन सकते हैं। यम इस तर्क को खारिज करते हैं और कहते हैं कि सहोदर होने के कारण ही हमें ऐसा नहीं करना चाहिए (समान शरीर से जन्मे)। वे 'असुरस्य वीराः' (परमेश्वर के वीर पुत्र) का हवाला देकर नैतिक जिम्मेदारी की याद दिलाते हैं कि जो दिव्य पुरुष (धर्तार) हैं, वे सब देख रहे हैं और पाप से हमें बचना चाहिए।


यम का उत्तर: यम कहते हैं कि "तेरा यह सखा (भाई) इस प्रकार के सम्बन्ध (सख्यं) की इच्छा नहीं रखता, क्योंकि तू एक ही लक्षण वाली (जुड़वां बहन) है और तेरा रूप (समान उत्पत्ति के कारण) मुझ जैसा ही है"।
नैतिक पक्ष: यम आगे कहते हैं कि "असुर (शक्तिशाली वरुण देव) के पुत्र, स्वर्ग को धारण करने वाले वीर हैं जो सब कुछ देख रहे हैं।" वे मर्यादा और धर्म का पालन करने के लिए यमी के प्रस्ताव को  अस्वीकार कर देते हैं। 

ऋग्वेदः - मण्डल १० सूक्त १० ऋचा २- का
सायण भाष्य के असुर मूलक अंश- महः= महतः( महान) “असुरस्य= प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः( प्राणवान प्रज्ञावान वरुण प्रजापति के “पुत्रासः =पुत्रभूताः “वीराः पुत्रगण।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा में 
प्राण और प्रज्ञा (तीव्र बुद्धि) से सम्पन्न वरुण देव को ही असुर कहा गया है। जो नैतिकता और धर्म के अधिष्ठाता हैं। 
इसके अतिरिक्त
ऋग्वेद में अग्नि देव को कई स्थानों पर 'असुर' शब्द से सम्बोधित किया गया है।

जिसका अर्थ यहाँ शक्तिशाली, प्राणदाता या प्रज्ञा शक्ति से युक्त होता है, न कि दैत्य अथवा राक्षस। 
अग्नि के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग करने वाली प्रमुख ऋचा अथवा मन्त्र निम्नलिखित हैं:

इसके अतिरिक्त
मूल मंत्र -
प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय।
घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः॥ऋग्वेद-१/१५/१
हिंदी अनुवाद (अर्थ)
"मैं (यजमान) मेधावी (विवेकशील), सर्वज्ञ, स्तुति के योग्य और अनादि (प्राचीन) अग्निदेव के लिए अपनी स्तुति (वाणी) को प्रविष्ट (अर्पित) करता हूँ। वे अग्निदेव घृत (घी) से प्रसन्न होने वाले, प्राणदाता (असुरः - बलवान्), कल्याणकारी, धन के धारण करने वाले और वसु (धन/ऐश्वर्य) के आधार हैं।" 
व्याकरणिक व्याख्या (Grammatical Analysis)
प्र (अवयव): प्रकृष्ट रूप से (विशेष रूप से)।
वेधसे (संज्ञा): 'वेधस्' (मेधावी/विद्वान) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
कवये (विशेषण): 'कवि' (क्रान्तदर्शी/सर्वज्ञ) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
वेद्याय (विशेषण): 'वेद्य' (जानने योग्य/स्तुत्य) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
गिरं (संज्ञा): 'गिर्' (वाणी/स्तुति) शब्द, द्वितीया विभक्ति, एकवचन।
भरे (क्रिया): 'भृ' (धारण करना/अर्पित करना) धातु, उत्तम पुरुष, एकवचन, लट् लकार (आत्मनेपद)।
यशसे (विशेषण): 'यशस्' (यशस्वी/कीर्तिमान) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
पूर्व्याय (विशेषण): 'पूर्व' (प्राचीन/सनातन) शब्द, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
घृतप्रसत्तो (विशेषण/योग): 'घृत' (घी) + 'प्रसत्तः' (प्रसन्न होने वाले/प्रसिद्ध)।
असुरः (संज्ञा): 'असुर' शब्द (वैदिक अर्थ: बलवान/प्राणदाता), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
सुशेवो (विशेषण): 'सुशेव' (अत्यंत कल्याणकारी/सुख देने वाले), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
रायो (संज्ञा): 'राय्' (धन/संपत्ति) शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
धर्ता (संज्ञा): 'धर्तृ' (धारण करने वाले), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
धरुणो (विशेषण): 'धरुण' (आधार/आधारभूत), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
वस्वो (संज्ञा): 'वसु' (धन/ऐश्वर्य), षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
अग्निः (संज्ञा): 'अग्नि' शब्द, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।                    
ऋग्वेद 3/3/4  इसमें भी अग्नि को 'असुर' के रूप में सम्बोधित किया गया है: "पिता यज्ञानाम्-असुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम्।          आ विवेश रोदसी भूरिवर्पसा पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः॥४॥                       

   हिन्दी अनुवाद
"यज्ञों के जनक, विद्वानों के प्राणदाता (असुर), देवताओं के रथ-स्वरूप, स्तोताओं के ज्ञान और कर्म के आधार अग्नि देव ने अपने महान वैभव के साथ आकाश और पृथ्वी में प्रवेश किया है। सबको प्रिय लगने वाले वे ज्ञानी (कवि) अग्नि देव अपने विविध दिव्य धामों (तेजों) के साथ शोभायमान हो रहे हैं।"
व्याकरणिक विश्लेषण
पिता यज्ञानाम्: यहाँ 'पिता' (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) का अर्थ उत्पादक या पोषक है। 'यज्ञानाम्' में षष्ठी विभक्ति, बहुवचन है (यज्ञों के)।
असुरो (असुरः): यह 'असु' (प्राण) शब्द से बना है। वैदिक संस्कृत में 'असुर' का अर्थ 'प्राणशक्ति देने वाला' या 'बलवान' होता है, जो यहाँ अग्नि के लिए प्रयुक्त है।
विपश्चिताम्: (षष्ठी, बहुवचन) - मेधावियों या विद्वानों का।
विमानम्: 'वि + मा' धातु (नापना)। जो यज्ञ को विशेष रूप से मापता या निर्मित करता है (रथ के समान गमनशील)।
वयुनम्: इसका अर्थ 'ज्ञान' या 'नियम' (Order) है।
वाघताम्: (षष्ठी, बहुवचन) - स्तुति करने वाले ऋत्विकों या भक्तों का।
आ विवेश: 'आ' उपसर्ग के साथ 'विश्' धातु (लिट् लकार)। इसका अर्थ है—'सब ओर से प्रवेश किया'।
रोदसी: (द्वितीया, द्विवचन) - आकाश और पृथ्वी (द्यावापृथिवी)।
भूरिवर्पसा: 'भूरि' (बहुत) + 'वर्पस' (रूप/तेज)। अपने विशाल रूप या सामर्थ्य के साथ।
धामभिः: (तृतीय, बहुवचन) - अपने विभिन्न स्थानों, रूपों या तेजपुंजों के द्वारा।
कविः: (प्रथमा, एकवचन) - क्रान्तदर्शी या त्रिकालज्ञ (अग्नि का विशेषण)। 

"असुर" का पुराना और सही अर्थ "दैत्य" नहीं है। वैदिक कोश में लिखा है कि असुराति ददाति इति असुर अर्थात् जो असु (प्राण) दे, वह असुर (प्राणदाता) है।
            
संस्कृत के प्रख्यात कोशकार वी. एस. आप्टे व मे नि सर विलियम ने भी "असु" का अर्थ "प्राण"  प्रज्ञा ( मेधा शक्ति) किया है। 
 दरअसल हिंदी और संस्कृत का "असुर" शब्द इसी "असु" (प्राण) शब्द से निर्मित हुआ है।"असुर का निर्माण "असु + र" से हुआ है जबकि अज्ञानियों ने इसे "अ+सुर" से निर्मित माना है। जो कि एक भ्रान्ति है।
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे (ऋग्वेद 2.1.6)
ऋग्वेद 2/1/6  इस ऋचा में भी अग्नि को असुर कहा गया है 
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे ।
त्वं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना ॥६॥
पदच्छेद (Padachheda)
त्वम् | अग्ने | रुद्रः | असुरः | महः | दिवः | त्वम् | शर्धः | मारुतम् | पृक्षः | ईशिषे ।
त्वम् | वातैः | अरुणैः | यासि | शंगयः | त्वम् | पूषा | विधतः | पासि | नु | त्मना ॥
हिन्दी अनुवाद (Translation)
हे अग्ने! (हे अग्निदेव!) त्वम् (आप) महो दिवः (महान् प्रकाशमान द्युलोक के) रुद्रः (दुष्टों को रुलाने वाले/दुःखनाशक) असुरः (प्राणदाता/शक्तिशाली) असि (हैं)। त्वम् (आप) मारुतं शर्धः (मरुतगणों के बल) पृक्षः (और अन्न) ईशिषे (के स्वामी हैं/ईश्वर हैं)। 
त्वम् (आप) शंगयः (सुखपूर्वक जाने वाले/सुख के दाता) अरुणैः वातैः (लाल रंग के वायुओं-वेगवान अश्वों के साथ) यासि (गमन करते हैं/विद्यमान हैं)। त्वम् (आप) पूषा (पुष्टि करने वाले/पोषणकर्ता) [असि] नु (निश्चित रूप से) विधतः (यज्ञ-अनुष्ठान करने वाले यजमानों की) त्मना (स्वयं) पाससि (रक्षा करते हैं)। 
भावार्थ: हे अग्निदेव! आप महान आकाश के तेजस्वी और रुद्र (भयानक/दुःखनाशक) शक्ति हैं। आप मरुद्गणों (वायुदेवों) की शक्ति और अन्न के स्वामी हैं। आप वायु के समान तीव्र और कल्याणकारी वेग से गमन करते हैं। आप पूषा (पोषण करने वाले) रूप में, यज्ञ करने वाले भक्तों की स्वयं रक्षा करते हैं। 
व्याकरण एवं शब्दार्थ (Grammar and Vocabulary)
त्वम् (Tvam): युष्मद् शब्द, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
अग्ने (Agne): अग्नि शब्द, सम्बोधन, एकवचन (हे अग्नि!)।
रुद्रः (Rudraḥ): रुद्र (दुःखनाशक), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
असुरः (Asuraḥ): प्राणदाता/शक्तिशाली, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
महः (Mahaḥ): महद् (महान्/प्रकाशमान), दिवः (प्रकाशमान आकाश), षष्ठी/पंचमी विभक्ति एकवचन।
शर्धः (Śardhaḥ): बल/समूह, प्रथमा विभक्ति, एकवचन (मारुतं शर्धः - मरुतों का बल)।
पृक्षः (Pṛkṣaḥ): अन्न/बल, षष्ठी विभक्ति (पृक्ष ईशिषे - अन्न/बल के स्वामी)।
ईशिषे (Īśiṣe): ईश् (ऐश्वर्य/स्वामी होना) धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (आप स्वामी हैं)।
वातैः (Vātaiḥ): वात (वायु/वायु देवता), तृतीया विभक्ति, बहुवचन (वायुओं के साथ)।
अरुणैः (Aruṇaiḥ): अरुण (लाल रंग के), तृतीया विभक्ति, बहुवचन (विशेषण: वातैः)।
यासि (Yāsi): या (जाना) धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
शंगयः (Śaṅgayaḥ): सुखपूर्वक गमन करने वाले (शं + गयः), विशेषण।
पूषा (Pūṣā): पोषण करने वाले (पूषन् शब्द), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
विधतः (Vidhataḥ): विध (यज्ञ करना) धातु से बना शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचन (यज्ञ करने वाले का)।
पाससि (Pāsi): पा (रक्षा करना) धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (रक्षा करते हैं)।
त्मना (Tmanā): स्वयम्/आत्मना, तृतीया विभक्ति (स्वयं/

वैदिक साहित्य में "असुर" का अर्थ प्रारम्भ में ' प्राणवान्'  और प्रज्ञावान् ही रहा है, जो बाद के समय में नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त होने लगा है।
इन्द्र के लिए असुर विशेषण पद का प्रयोग भी वैदिक है।- देखें निम्नलिखित ऋचा जो इन्द्र को असुर रूप में दर्शाती है।

तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे ।
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन् ॥ ऋग्वेद ८/९०/६
१. पदच्छेद (Word Breakup)
तम् (उस) उ (ही) त्वा (तुम्हें) नूनम् (अब) असुर (हे बलवान्/प्राणदाता) प्रचेतसं (प्रकृष्ट ज्ञान वाले/प्रबुद्ध) राधः (धन) भागम् (भाग/हिस्सा) इव (की तरह) ईमहे (हम याचना करते हैं/प्राप्त करना चाहते हैं) ।
मही (बड़ी/विशाल) इव (के समान) कृत्तिः (चर्म/कवच/ढाल) शरणा (शरण/रक्षक) ते (तुम्हारी) इन्द्र (हे इन्द्र) प्र (प्रकृष्ट) ते (तुम्हारे) सुम्ना (सुख/कृपा) नः (हमें/हमारे) अश्नवन् (व्याप्त हों/प्राप्त हों) ॥
२. हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
"हे असुर (प्राणदाता/बलवान्), प्रकृष्ट ज्ञान वाले (प्रचेतस्) इन्द्र ! हम 'उसी' तुम्हारी याचना (स्तुति) करते हैं, जैसे धन या भाग्य की याचना की जाती है। हे इन्द्र! तुम्हारी शरण उसी प्रकार महान् और रक्षक (कृत्तिः/ढाल) है, जैसे विशाल चर्म (ढाल) शरीर की रक्षा करती है। तुम्हारे कल्याणकारी सुख (सुम्न) हमें प्राप्त हों।"

सायण भाष्य के अंश " हे असुर बलवन् प्राणवन् हे इन्द्र य उक्तगुणोऽस्ति 

______
वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) में 'असुर' शब्द का प्रयोग शिव के वैदिक स्वरूप रुद्र के लिए  भी कई स्थानों पर हुआ है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ 'राक्षस' न होकर 'अत्यन्त शक्तिशाली', 'प्राणवान' या 'दैवीय गुणों से युक्त' जनसमुदाय से है। 
वेदों में रूद्र के लिए प्रयुक्त असुर शब्द के प्रमुख सन्दर्भ निम्नलिखित हैं:
ऋग्वेद- ऋग्वेद में रुद्र (शिव) को असुर और देव दोनों ही विशेषणों से सम्बोधित किया गया गया है। ऋग्वेद में रुद्र को (6) बार असुर के रूप में महिमामण्डित किया गया है।

 
प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत् ।
युवं दिवो बृहतो दक्षमाभुवं गां न धुर्युप युञ्जाथे अपः ॥ ऋग्वेद १/१५१/४
व्याकरण सहित हिन्दी अनुवाद:
पदच्छेद:
प्र, सा, क्षितिः, असुर, या, महि, प्रिय, ऋतावाना, ऋतम्, आ, घोषथः, बृहत् ।
युवम्, दिवः, बृहतः, दक्षम्, आभुवम्, गाम्, न, धुरि, उप, युञ्जाथे, अपः ॥
पदार्थ (व्याकरणिक अर्थ):
प्र (प्र) : विशेष रूप से (उपसर्ग)
सा (सा - तत्): वह (सर्वनाम)
क्षितिः (क्षितिः): निवास स्थान/भूमि (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
असुर (असुर): हे प्राणवान/बलशाली (सम्बोधन - मित्र और वरुण के लिए)
या (या): जो (सर्वनाम)
महि (महि): महान (विशेषण)
प्रिय (प्रिय): प्यारी/प्रिय (विशेषण)
ऋतावाना (ऋतावाना): सत्य के पालक/सत्यवान (सम्बोधन)
ऋतम् (ऋतम्): सत्य/यज्ञ (द्वितीया विभक्ति)
आ घोषथः (आ+घोषथः): आ (उपसर्ग) + घोषथः (घोष धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन) = विशेष रूप से शब्द करते हो/प्रख्यात करते हो
बृहत् (बृहत्): बहुत/विशाल
युवम् (युवम्): तुम दोनों (युष्मद् शब्द, प्रथमा, द्विवचन)
दिवः (दिवः): द्युलोक से/प्रकाश से (पञ्चमी विभक्ति)
बृहतः (बृहतः): महान/ऊँचे
दक्षम् (दक्षम्): बल/सामर्थ्य (द्वितीया विभक्ति)
आभुवम् (आभुवम्): सम्यक् प्रकार से होने वाला/सम्पन्न
गाम् (गाम्): गाय/पृथ्वी (द्वितीया विभक्ति)
न (न): के समान (उपमावाचक)
धुरि (धुरि): धुरी पर (सप्तमी विभक्ति - भार वहन करने के अर्थ में)
उप युञ्जाथे (उप+युञ्जाथे): उप (उपसर्ग) + युञ्जाथे (युज् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष, द्विवचन) = उपयोग में लाते हो/जोड़ते हो
अपः (अपः): कर्म/कार्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन - 
हिन्दी अनुवाद (भावार्थ)
हे (ऋतावाना) सत्यपालक मित्र और वरुण! (असुर) हे बलशाली देवो! (या) जो (महि) महान (क्षितिः) भूमि/स्थान (प्रिय) आपको प्रिय है, उस (सा) प्रसिद्ध यज्ञ-भूमि को आप (बृहत्) बहुत ज्यादा (आ घोषथः) प्रख्यात/सुशोभित करते हैं।
(युवम्) तुम दोनों (बृहतः दिवः) महान प्रकाशमान आकाश से (आभुवम्) उत्तम (दक्षम्) सामर्थ्य/बल को लाते हो, और (गाम् न) बैल के समान (धुरि) धुरी पर (अपः) कर्मों/यज्ञ को (उप युञ्जाथे) नियुक्त करते हो। 
असुर का वैदिक अर्थ: वेदों के प्रारम्भिक काल में, असुर शब्द का प्रयोग अग्नि, वरुण, सूर्य और रुद्र जैसे देवताओं के लिए किया जाता था, जो 'असु' (प्राण) देने वाले या प्रज्ञा (ज्ञान) के स्वामी होते थे। 
निष्कर्ष:
वेदों में शिव (रुद्र) के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग अत्यन्त दिव्य शक्ति (Mighty/Supreme Power) के सन्दर्भ में हुआ है, न कि नकारात्मक अर्थ में अत: सायण  ने "असुर" शब्द को दो विरोधी अर्थों में प्रस्तुत किया है-


"को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति ।
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥४॥
← ऋग्वेदः - मण्डल (१/१६४/४) उपर्युक्त इस ऋचा में असुर पद प्राणोंवाली आत्मा का वाची है।
____________
प्रसंग के अनुरूप वैदिक ऋचाओं में असुर का अर्थ "प्राण व प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति" के लिए ही अधिक मान्य है। परन्तु दशम मण्डल के कुछ उत्तरकालीन सूक्तो में असुर पद शक्ति के प्राचुर्य व भयंकरता के कारण दैत्यों का वाचक भी बन गया है। परन्तु ऋग्वेद में सायण ने इस अर्थ परिवर्तन क्रम को अनदेखा किया है। जो अनर्थ का कारण बना।


विश- शब्द भी वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त है विशेषत: उपर्युक्त ऋचा में विश कृष्ण पक्ष के जन समुदाय का वाचक है। परन्तु इसका अर्थ तृतीय वर्ण के व्यक्ति वैश्य अथवा कृषि कर्म और गोपालन करने वाले के अर्थ को ध्वनित करता है। गोप ही ये सब कार्य (कृषि और गोपालन) करने वाले हैं।

उपर्युक्त ऋचा में हम कृष्ण, विश, शचि, बृहस्पति आदि पदों के आधार पर कृष्ण के वैदिक और पौराणिक काल की विवेचना अथवा समीक्षा करेंगे हमारी यह प्रतिक्रिया सायण भाष्य के सापेक्ष होगी!

सायण के भाष्य की समीक्षा-
समीक्षात्मक  पद-१- (द्रप्स)- नि:सन्देह सायण ने अपने वैदिक ऋचाओं के भाष्य में "द्रप्स" पद का वैकल्पिक व आनुमानित अर्थ ही ग्रहण किया हैं।
 परन्तु हमारी जानकारी और शोधों के अनुसार "द्रप्स" पद भारोपीय परिवार की भाषाओं में अंग्रेज़ी शब्द (Drops)के समानार्थी है। जिसका अर्थ "जल-बिन्दु" होता है। वैदिक संस्कृत में भी द्रप्स पद जल बन्दु का ही अर्थ प्रकाशक है।
अत: द्रप्स पद का रूढ़ अर्थ ही ग्रहण करना चाहिएसमीक्षात्मक  पद- (अंशुमती)- अंशुमती पर सायण का भाष्य भी अभिधा शब्द शक्ति मूलक है। रूढ़ अर्थ युक्त नहीं है जोकि वैदिक कथाओं के अनुरूप होना चाहिए था।  पुराण वेदों की ही व्याख्याऐं हैं-  पुराणों में अंशुमती पद यमुना नदी का वाचक व उसके लिए ही रूढ़ है। क्योंकि वह सूर्य की पुत्री बतायी जाती है। यमुना नदी को अंशुमति (और मुख्य रूप से सूर्यसुता, कहने के पीछे पौराणिक और धार्मिक कारण हैं, जो यमुना नदी को सूर्य देव से जोड़ते हैं: 

सूर्य देव की पुत्री यमुना - पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमुना सूर्य देव और संज्ञा की पुत्री हैं। अंशु का अर्थ 'किरण' होता है और अंशुमति का अर्थ 'किरणों वाली' या 'सूर्य की पुत्री' के रूप में लिया जाता है, जो सीधे सूर्य देव से उनके सम्बन्ध को दर्शाता है।

समीक्षात्मक पद "कृष्ण--उपर्युक्त ऋचा में आया हुआ कृष्णपद भी लाक्षणिक शब्द शक्ति मूलक है। कृष्ण का धातुज अर्थ "कर्षण- अर्थात(कृषि -कार्य करने वाला अथवा आकर्षण करने वाला" ही है। और कृषि करने वाले कृषक भी जलवायु और उष्णता के प्रभाव से श्याम वर्ण( साँवले रंग ) के ही होते हैं। और पौराणिक पात्र कृष्ण भी श्यामल (साँवले) रंग के थे जो यमुना की तलहटी में प्राय: गायें चराया करते थे ।

समीक्षात्मक पद- इन्द्र और शचि-इन्द्र और शचि भी दोनों पति- पत्नी के रूप में पौराणिक पात्र हैं जो उपर्युक्त ऋचा में प्रयुक्त हुए हैं। इन्द्र एक पौराणिक पात्र है वेदों में भी एक देव विशेष का नाम इन्द्र है जो कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी है। अत: उपर्युक्त ऋचा में इन्द्र का वही अर्थ ग्रहण करना चाहिए जो पौराणिक ग्रन्थों में ग्रहण किया जाता है। और बृहस्पति इन्द्र के गुरु भी पौराणिक पात्र ही हैं।

समीक्षा-वेदों में विश' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्राचीन शब्द है,और जो वैदिक सामाजिक संरचना का आधार स्तम्भ था। इसका अर्थ केवल साधारण जनसमूह ही नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सामाजिक इकाई से था जो वंश परम्परागत रूप से कृषि और गोपलन करती है अत: विश का अर्थ वैश्यवृत्ति( कृषि औक गोपालन) करने वाले गोपों से है।।

यह श्लोक पद्मपुराण (स्वर्गखण्ड -26) का है, जिसमें वैश्य वर्ण के लक्षण, आचरण और कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।

पूर्ण श्लोक:
विशत्याशु पशुभ्यश्च कृष्यादानरुचिः शुचिः ।वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥
अर्थ:
विशत्याशु पशुभ्यश्च: जो पशुपालन (पशुओं की रक्षा और संवर्धन) से शीघ्र ही अपनी आजीविका चलाने वाला हो।

कृष्यादानरुचिः: जिसकी कृषि (खेती) और वाणिज्य (व्यापार-दान) में रुचि हो। शुचिः जो पवित्र (शौच-आचारपरायण) हो।वेदाध्ययनसम्पन्नः: जो वेदों के अध्ययन से संपन्न हो (शिक्षित हो)।
स वैश्य इति संज्ञितः: उसे 'वैश्य' कहा जाता है। 

मुख्य विवरण:
वैश्य के कर्म: इस श्लोक के अनुसार वैश्य के मुख्य कर्म कृषि (खेती), पशुपालन और वाणिज्य (व्यापार) हैं।
गुण: वैश्य का 'शुचि' (पवित्र) होना और वेदों का ज्ञान रखना अनिवार्य बताया गया है।
यद्यपि विश गोपों को ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है।

क्योंकि ये ब्रह्मा की सृष्टि नहीं हैं। तो भी इनके गोपालन और कृषि व्यवसाय परक होने से इन्हें विश कहा जाता रहा है।
वेदों में विश के मुख्य प्राचीन अर्थ निम्नलिखित हैं:

 ऋग्वेद में 'विश' का प्रयोग सामान्य जनसमुदाय के लिए किया गया है, जो एक जन (कबीले) का हिस्सा होते थे।

वैश्य वर्ग  पुरुषसूक्त (ऋग्वेद) के अनुसार, विश से ही वैश्य वर्ण की उत्पत्ति मानी गई है। वेदों में विश का अर्थ कृषि,और पशुपालन  से सम्बंधित जन समुदाय से है  जो  समाज की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ होते थे।

बस्ती या ग्राम (Settlement/Village):  विश' का एक अर्थ उस स्थान या बस्ती से भी है जहाँ लोग रहते थे, जिसे बाद में 'ग्राम' के रूप में जाना गया। यह ग्राम या कबीले का निवास स्थान होता था।

संस्कृत शब्द ग्राम का मूल अर्थ भी ग्रास भूमि( घास के मैदान) से ही है। जहाँ कालान्तर में गोप और उनके पशु स्थाई रूप से रहने लगे। और वह घास का मैदान ग्राम के रूप में रूढ़ हो गया जहाँ कृषक और उनके पशु रहते हैं।

प्रजा राजा या कबीले के नेता (जनस्य गोपा) के सन्दर्भ में, 'विश' का अर्थ उनकी प्रजा या सामान्य नागरिक होता था, जो राजा को कर (बल) देते थे।
वैदिक सामाजिक संरचना: ऋग्वैदिक काल में, समाज में 'जन' (कबीला) के बाद 'विश' सबसे महत्वपूर्ण इकाई थी। ऋग्वेद में 'विशाम्पति' शब्द का प्रयोग प्रजा के रक्षक या राजा के लिए किया गया 

निष्कर्ष: वेदों में विश का अर्थ केवल जन विशेष ही नहीं, बल्कि एक उत्पादक, कृषि-पशुपालक वर्ग से है जो अपनी बस्ती में निवास करता था और कबीलाई व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक योगदान देता था। "विश-यह शब्द गोप जाति का समानार्थी व कृषि और गोपालन की गतिविधियों से सम्बन्धित जन समुदाय का वाचक रहा है।

विश" (Viś) शब्द का अर्थ "गोपालक" या "पशुपालक" मुख्य रूप से ऋग्वेद और अन्य वैदिक साहित्य में पाया जाता है।

वैदिक काल में "विश" शब्द के प्रयोग और संदर्भ के बारे में कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

मूल अर्थ: ऋग्वेद में "विश" का प्रयोग सामान्य जनमानस या प्रजा के लिए किया गया है। उस समय समाज मुख्य रूप से पशुपालक (Pastoral) था, इसलिए विश का संबंध सीधे तौर पर गौ-पालन और कृषि से था।

गोपालक के रूप में: वैदिक संस्कृत में "विश" का एक अर्थ "पशुपालक" या "गोपालक" (Cowherd) भी होता है, क्योंकि उस काल में धन और संपत्ति का मुख्य आधार पशुधन (विशेषकर गायें) ही थे।

सामाजिक संरचना: वैदिक काल में समाज के तीन मुख्य स्तर थे: ब्रह्म (पुरोहित), क्षत्र (योद्धा) और विश (सामान्य जन, जिसमें किसान और गोपालक शामिल थे)। यही "विश" शब्द आगे चलकर "वैश्य" वर्ण का आधार बना, जिनका प्राथमिक कर्तव्य पशुपालन, कृषि और व्यापार था।


ऋग्वेद में कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की विवेचना विस्तृत रूप से हम अपने सम्यक भाष्य के रूप निम्नलिखित रूप से पुन: प्रस्तुत करते हैं।

"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियान: कृष्णो दशभि: सहस्रै: आवत्तमिन्द्रःशच्याधमन्तमपस्नेहितीर्नृमणा अधत्त॥१३॥
ऋग्वेद_८/९६/१३/अथर्ववेद-(20/137/7)

(इयानः)= चलता हुआ (अंशुमतीम्)= विभागवाली [सीमावाली यमुना नदी पर (अव अतिष्ठत्)= ठहरा है। (नृमणाः)= नरों के समान मनवाले (इन्द्रः) =इन्द्र  ने (तम् धमन्तम्)= उस हाँफते अथवा हुंकारते हुए को  (शच्या)= शचि के साथ  (आवत्)= युद्ध किया  और (स्नेहितीः)= स्नेहयुक्त (सिञचन करने वाला /भीगे हुए) (अप अधत्त)= हटा लिया है ॥१३॥

टिप्पणी:-
(धमन्तम्)= उच्छ्वसन्तम्। परिश्रमेण दीर्घं श्वसन्तम्= थकान के द्वारा लम्बी- लम्बी श्वास लेता हुआ। (स्नेहितीः) = सिञ्चन करने वाला।
(नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः= नेत्रों के समान (अप अधत्त) =  उपहार दत्तवान् । 

पद का अन्वय= अव । द्रप्सः । अंशुऽमतीम् । अतिष्ठत् । इयानः । कृष्णः । दशऽभिः । सहस्रैः ।आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नेहितीः । नृऽमनाः । अधत्त ॥१३।

शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण-                १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर  मध्यम पुरुष एकवचन।
२-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में  ।
३- अंशुमतीम् = यमुनाम्  –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
४-अवतिष्ठत् =  अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश लङ्लकार रूप) =स्थित हुए।
५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक  तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है यह सर्व विदित है।
 ६-धमन्तं= अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं  कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को।  (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप  एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है ।
७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
८-नृमणां( धनानां) 
९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने) 

अब देखा जाए तो अथर्ववेद में भी ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा निम्न क्रम में है। जिसमें "अदेवी" पद कृष्ण के लिए ही है। जो कभी देवों की सर्वोपरिता स्वीकार नहीं करता है।

विशेषटिप्पणी-  यद्यपि संस्कृत लौकिक साहित्य में  "अव" धातु के अनेक अर्थ विकसित हुए हैं- जो ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा "अव द्रप्सो..... में आया हआ
अव क्रियापद- प्राप्त करो" के अर्थ में है।
"अव" धातु के लौकिक संस्कृत भाषाओं में अनेक अर्थ विकसित हुए हैं-
अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं ।

१०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम (प्राप्ति) ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान  १८-वृद्धिषु।                

परन्तु हमें प्रकरणअथवा प्रसंग के अनुरूप ही यहाँ अव धातु का अर्थ ग्रहण करना चाहिए । यहाँ अव धातु का अर्थ- "प्राप्त करना" है

प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार(अनद्यतन भूूूतकाल का रूप।
आवत् =प्राप्त किया । 

गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि अपने उपर्युक्त ऋचा संख्या (१३) का  भाष्य का  विस्तार करते हुए कहते हैं-
*******
कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन्  अँशुमतीनामधेयाया नद्या:  यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं  तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये  स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।
"
अनुवाद-
कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप को इन्द्र ने यमुना नदी के जल में स्थित देखा वह इन्द्र अपनी पत्नी शचि के साथ आया हुआ है- और  दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया  और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन भी दिया।१३।

तात्पर्य-- हे कृष्ण आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो ! कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया  और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन दिया।


कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन्  अँशुमतीनामधेयाया नद्या:  यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं  तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये  स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।हिन्दी अनुवाद व्याकरण सहित करें


यहाँ दिए गए संस्कृत गद्यांश का हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण है:
संस्कृत गद्यांश:
कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या: यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।
१. हिंदी अनुवाद
दस हजार गोपों (ग्वालों) से घिरे हुए श्रीकृष्ण यमुना नदी के तट पर स्थित अँशुमती नामक नदी के किनारे ठहरे थे। वहां कृष्ण के नाम से प्रसिद्ध उस गोप (कृष्ण) को नदी के जल के बीच स्थित (बैठा हुआ) इन्द्र ने देखा। इन्द्र ने अपनी पत्नी शची के साथ आकर जल के बीच उस स्नेही (या स्निग्ध/शांत) गोप कृष्ण और उनके अनुचर (साथी) उपगोपों को बहुत सारा धन दिया। 
२. व्याकरण सहित विश्लेषण
वाक्य १: कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या: यमुनाया: तटेऽतिष्ठत्
कृष्णो (कृष्ण:): कर्ता (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)।
दशसहस्रैर्गोपै: (दशसहस्रै: + गोपै:): तृतीया विभक्ति, बहुवचन (करण कारक - गोपियों के द्वारा)।
परिवृत: सन्: परिवृत (घिरे हुए) + सन् (होकर) - यह वर्तमान कालिक कृदंत का प्रयोग है।
अँशुमतीनामधेयाया (अँशुमती + नामधेयाया:): षष्ठी विभक्ति, एकवचन (नदी का विशेषण)।
नद्या: यमुनाया:: षष्ठी विभक्ति, एकवचन (सम्बन्ध कारक)।
तटेऽतिष्ठत् (तटे + अतिष्ठत्): 'तटे' (अधिकरण कारक - तट पर), 'अतिष्ठत्' (स्था धातु, लङ् लकार/भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन - ठहरे थे)।
वाक्य २: तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श
तत्र: अव्यय (वहां)।
कृष्णस्य नाम्न:: षष्ठी विभक्ति (नाम से प्रसिद्ध)।
तम गोपं: द्वितीय विभक्ति, एकवचन (कर्म कारक)।
नद्यार्जलेमध्ये (नद्या: + जले + मध्ये): षष्ठी और अधिकरण कारक का प्रयोग (नदी के जल के बीच में)।
स्थितं: द्वितीया विभक्ति (स्थित/बैठे हुए, गोपं का विशेषण)।
इन्द्रो (इन्द्र:): कर्ता (प्रथमा विभक्ति)।
ददर्श: दृश् धातु, लिट् लकार/परोक्ष भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन (देखा)।
वाक्य ३: स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात् 
स इन्द्र:: तच्छब्द (वह), इन्द्र (प्रथमा, एकवचन)।
स्वपत्न्या शच्या: तृतीया विभक्ति, एकवचन (सहार्थे तृतीया - पत्नी के साथ)।
सार्धं: अव्यय (साथ)।
आगत्य: आ + गम् + ल्यप् प्रत्यय (आकर)।
जले स्निग्धे: अधिकरण कारक (जल में)। 'स्निग्धे' यहाँ स्निग्ध/स्नेहपूर्ण के अर्थ में है।
तम गोपं कृष्णं: द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक)।
तस्यानुचरानुपगोपाञ्च (तस्य + अनुचर + उपगोपान् + च): षष्ठी (उसके) + द्वितीया, बहुवचन (साथी गोपों को) + अव्यय (और)।
अतीवानि धनानि: विशेषण + विशेष्य (बहुत सारा धन - द्वितीया, बहुवचन)।
अदात्: दा (धातु) + लङ् लकार/भूतकाल, प्रथम पुरुष, एकवचन (दिया)।
मुख्य व्याकरण बिंदु:
संधि: तटेऽतिष्ठत् (तटे + अतिष्ठत् - पूर्वरूप संधि), नद्यार्जलेमध्ये (नद्या: + जले - विसर्ग संधि का लोप/परिवर्तन), तस्यानुचरानुपगोपाञ्च (अनुचरान् + उपगोपान् + च - अनुस्वार/चत्व संधि)।
प्रत्यय: आगत्य (आ + गम + ल्यप् - 'आकर' अर्थ में)।
समास: दशसहस्रैर्गोपै: (बहुव्रीहि/तत्पुरुष), अँशुमतीनामधेयाया: (बहुव्रीहि), अनुचरानुपगोपान् (द्वंद्व)।

________________________________

द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥

पद का अन्वय= द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ ।
नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥१४।।

योगेश रोहि का भाष्य-
मया खलु यमुनाजलस्य विविधानि रूपाणि दृष्टानि, तथैव अंशुमत्याः निर्जने प्रदेशे चरन् एकः वृषभऽपि दृष्टः। अहं तं वृषभं युध्यन्तं कृष्णेन सह द्रष्टुम् इच्छामि। अर्थात् सः वृषभः स्थान-अडिग-स्थित-कृष्णेन सह युद्धं करोतु, एतादृशं मया वाञ्छितम्। सः स्थानः यत्र जलम् मेघः च न भवेत् (इन्द्रः कृष्णस्य शक्तिमापनार्थम् एतत् इच्छति)।"

इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा।वह स्थान  जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो  (अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४। संस्कृत भाषा में व्याकरण सहित अनुवाद करें

"इन्द्र की कृष्ण के प्रति शक्ति परीक्षण की इच्छा
 को दर्शाते हुए संस्कृत अनुवाद:
व्याकरणिक विश्लेषण:
मया - (अस्मद् शब्द, तृतीया विभक्ति, एकवचन) - कर्ता के अर्थ में।
यमुनाजलस्य - (षष्ठी तत्पुरुष समास) - यमुना का जल।
विविधानि रूपाणि - (विशेषण-विशेष्य) - विविध रूप (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन)।
अंशुमत्याः - (पंचमी/षष्ठी विभक्ति) - नदी का नाम।
निर्जने प्रदेशे - (विशेषण-विशेष्य, सप्तमी विभक्ति) - निर्जन स्थान पर।
चरन् - (शतृ प्रत्यय) - चरता हुआ।
द्रष्टुम् - (दृश् धातु + तुमुन् प्रत्यय) - देखने के लिए।
युध्यन्तं - (युध् धातु + शतृ प्रत्यय) - युद्ध करते हुए को।
अडिग-स्थित-कृष्णेन - (तृतीया तत्पुरुष) - स्थिर कृष्ण के द्वारा। 
व्याख्या:
इन्द्र अंशुमती नदी के तट पर निर्जन स्थान पर एक उग्र वृषभ को देखकर, कृष्ण की अद्भुत शक्ति को मापने के लिए, उन्हें निहत्थे और एक स्थान पर अडिग रहकर उस साँड से युद्ध करने की चुनौती देने की कामना करते हैं। यह भगवान कृष्ण के पराक्रम को सिद्ध करने का दृश्य है। 


पदों के हिन्दी अनुवाद सहित अर्थ-

विषुण=विभिन्न रूप।
३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्=  चरते हुए साँड  को।
४-आजौ =  संग्रामे = युद्ध में।
५-अ॒व॒ = उपसर्ग
६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्=  स्था--क्वसु  स्थितवति (स्थिर)= अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए है उस स्थिति में।
७-व:=  युष्मभ्यम् ।  युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् = युष्मान् - तुम सबको ।  ॥
८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
१०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
११-आजौ= युद्ध में ।
१२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।।।१४।
हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा।वह स्थान  जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो 
(अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
_______________    

शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
१-द्र॒प्सम्= जल को -कर्मकारक द्वित्तीया विभक्ति।अपश्यम्=अदर्शम्  -दृश् धातु का लङ्लकार  (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप - मैंने देखा ।
__________________
२- वि + सवन(‌सुन) रूप विषुण =(विभिन्न रूप)।   षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ]  सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् ) पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
“सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥

व्याकरणिक निर्देश-
षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•)    'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न  कोई  स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्'  के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।

शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु । परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 

परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।__________________________

अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
______________
योगेश कुमार रोहि का भाष्य-
इस प्रसंग का संस्कृत अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण नीचे दिया गया है:
संस्कृत अनुवाद:
"कृष्णः यमुनायाः (अंशुमत्याः) गर्भे जलस्याधः स्वकीयं देदीप्यमानं शरीरं धारयामास, यः स्वगोपानां विशाम् (वैश्यवृत्तिसम्पन्नानां) सखा आसीत्। परितः चरन्तीभिः गौभिः सह निवसन्तः ते गोपाः इन्द्रेण बृहस्पतेः साहाय्येन शासिताः।"
व्याकरणिक टिप्पणी:
देदीप्यमानं शरीरम्: 'दीप्' धातु में यङ्-प्रत्यय (बार-बार चमकने के अर्थ में) लगाकर 'देदीप्यमान' शब्द बनता है। यह 'शरीरम्' का विशेषण है।
धारयामास: 'धृ' धातु (धारण करना) का लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल) है।
विशाम्: 'विश्' शब्द का षष्ठी बहुवचन, जिसका अर्थ प्रजा या वैश्य वृत्ति वाले लोग होता है।
चरन्तीभिः गौभिः सह: 'सह' के योग में तृतीया विभक्ति (गौभिः) का प्रयोग हुआ है। 'चरन्तीभिः' यहाँ विशेषण है।
शासिताः: 'शास्' धातु (शासन करना) में 'क्त' प्रत्यय लगा है, जो कर्मवाच्य (Passive) भूतकाल को दर्शाता है।


अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती नदी( यमुना) की गोद में धारण किया जो इनके गोपों - विशों (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न) सहचर( साथी) थे ।  चारों ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की  सहायता से शासन में किया ।

पदपाठ-विच्छेदन :-
द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः । अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
शब्दार्थ-
“अध =अथ अधो वा = नीचे ।
“द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: ( Drops)
“अंशुमत्याः=यमुनाया: नद्याः = यमुना नदी के “(उपस्थे=समीपे) पास में अथवा गोद में।
“त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे = त्विष् धातु का अर्थ- चमकना है।
तित्विषाणः= दीप्यमानः= चमकता हुआ।
 सन् =भवन्= होता हुआ।
“तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम् 
“(अधारयत्  = शरीर धारण किया)।
 परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत्‌ =  बल प्राप्ति  के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पोषित( पुष्ट) किया।
“इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन = इन्द्र ने जाकर बृहस्पति के साथ “अदेवीः = देवानाम्  ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः = जो देवताओं को नहीं पूजता वह कृष्ण  ।१५।

यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः = अथवा पाप युक्त “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः= चलती हुईं। “विशः=गोपालका: = कृषि कर्म और गोपालन करने  वाले "अभि "ससहे षह् (सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे =चारो और से सख्ती की अथवा शासन किया ।
 सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति 

विशेष-
पुराणों में भी कृष्ण समस्त देवों के यज्ञों को बन्द करा देते हैं। क्योंकि उन यज्ञों में निरीह पशुओं का वध होता है। जो विशेष रूप से इन्द्र देव को लक्ष्य करके किए जाते हैं।

इसी सन्दर्भ में हम यह भी सुनिश्चित कर दें की कृष्ण को वैदिक ऋचाओं में असुर कहीं नहीं कहा गया है। ऋग्वेद की मूल ऋचा में उपस्थित अदेवी पद का की सायण ने भाष्य "असुर" के समानार्थक किया है। उसी को आधार मान कर वेदों का हिन्दी अनुवाद पढ़ने वाले जन- साधारण ने कृष्ण को असुर मान लिया है।


सारांश=असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है । अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद  न. होकर अदेव पद है ।

परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है ।
इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को अपने 
ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या 96 की कुछ ऋचाओं के भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर  (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा अदेव  कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित है। सायण का सम्पूर्ण भाष्य इस अदेवी पद को लेकर भ्रान्तिजनक है।

परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ "प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों से है। इन्द्र, वरुण और शिव को भी वेदों में असुर कहा गया है।
अतः उपर्युक्त ऋचा के अनुसार स्पष्ट हुआ कि कृष्ण यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं। यह बात वैदिक सत्य है। किन्तु श्रीकृष्ण तो वैदिक काल से भी प्राचीन हैं।
मोहनजोदाड़ो की सभ्यता पूर्ववैदिक है।
 इसकी पुष्टि-‌ मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में ईस्वी सन् (1929) में हुई खोज के अनुसार पुरातत्व वेत्ता  "अरनेस्त मैके" के द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में प्राप्त हुए एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) से इस सत्य की पुष्टि होती है। जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बालक का चित्र बना हुआ था।🖐️

जो पूर्णत: भागवत आदि पुराणों के कृष्ण से सम्बद्ध है। और जो शोधकर्ताओं को पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर ले जाता है। पुराणों का सृजन बुद्ध के परवर्ती काल में हुआ । और कृष्ण की कथाऐं इससे भी पुरानी हैं । वेद बुद्ध से पूर्व भी अस्तित्व में थे और मोहनजोदाड़ो की सभ्यता वेदों से भी पूर्व है।।

अत: कृष्ण बुद्ध से तो प्राचीन हैं ही साथ में वैदिक काल से भी प्राचीन हैं जिनकी उपस्थिति सिन्धु सभ्यता में भी है।

इतना ही नहीं ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के अतिरिक्त चौथे वेद ‌अथर्ववेद में भगवान कृष्ण का वर्णन केशी नामक दैत्य  का वध करने वाला बताकर कृष्ण की वैदिक काल से भी पूर्व पस्थिति दर्ज कर दी है।

अत: वेदों में भी कृष्ण होने की बात सिद्ध होती है।यह अतिशयोक्ति नहीं-
वेदों का लेखन कार्य ईसा पूर्व सप्तम सदी तक होता रहा है।

नीचे स्पष्ट रूप से ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद  शौनक संहिता , और सामवेद आदि  में कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख है।

"यःकृ॒ष्णः के॒श्यसु॑र स्तम्ब॒ज उ॒त तुण्डि॑कः। अ॒राया॑नस्या मु॒ष्काभ्यां॒ भंस॒सोऽप॑ हन्मसि॥"
(अथर्ववेद - काण्ड »8; सूक्त»6; ऋचा»5)
_________
१. ( यः कृष्ण:) = जो कृष्ण,२-(केशी) = केशी नामक  ३- (असुरः) =दैत्य  ४-(स्तम्बजः) जिसके केश गुच्छेदार हैं =  ५-(उत) = और ६- (तुण्डिक:) = कुत्सित मुखवाला है / थूथनवाला है। ७-(अरायान्) = निर्धन पुरुषों को ८-(अस्याः) = इस के ९-(मुष्काभ्याम्) = मुष्को से-अण्डकोषों से  तथा  १०-(भंसस:)भसत् कटिदेशः पृषो० । उपचारात् तत्सम्बन्धिनि पायौ ऋ० १० । १६३ ।  = कटिसन्धिप्रदेश  से  ११- (अपहन्मसि) = दूर करते हैं।

"अनुवाद:- जो कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख उसके अण्डकोशों तथा इसकी कटि (कमर)आदि भागों से निर्धन लोगों दूर करते हैं अर्थात उनकी रक्षा करते हैं-

उपर्युक्त ऋचा में वर्णन है कि कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख और अण्डकोशों तथा कटि प्रदेश (कमर,)आदि के स्पर्श से गरीब अथवा निर्धन लोगों को तथा  स्वयं को भी दूर करते हैं।

भागवत पुराण में दशम स्कन्ध, अध्याय (36), श्लोक (16-26) तथा अध्याय (37), श्लोक (1-9)में वर्णन है कि "कृष्ण-भगवान का अत्यन्त कोमल कर(हाथ) कमल भी उस समय ऐसा हो गया, मानो तपाया हुआ लोहा हो।
उसका स्पर्श होते ही केशी के दाँत टूट-टूटकर गिर गये और जैसे जलोदर रोग उपेक्षा कर देने पर बहुत बढ़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्ण का भुजदण्ड उसके मुँह में बढ़ने लगा। 
अचिन्त्यशक्ति भगवान श्रीकृष्ण का हाथ उसके मुँह में इतना बढ़ गया कि उसकी साँस के भी आने-जाने का मार्ग न रहा। अब तो दम घुटने के कारण वह पैर पीटने लगा।

अथर्ववेद (दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व) में संकलित है जिसमें , केशी,="बालों (केशों)वाले", दैत्य का  कृष्ण के साथ युद्ध होते हुए पहली बार वर्णन किया गया है    

अर्जुन द्वारा भगवत गीता में भी कृष्ण को तीन बार केशी का हत्यारा कहा गया है- केशव (1.30 और 3.1) और केशी-निषूदन (18.1)। पहले अध्याय (1.30) में, कृष्ण को केशी के हत्यारे के रूप में सम्बोधित करते हुए, अर्जुन युद्ध के बारे में अपना संदेह व्यक्त करते हैं।

ऋग्वेद १/१०/३/ तथा यजुर्वेद ८/३४ में केशिन् का वर्णन है ही है ।
"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृष॑णा कक्ष्यप्रा ।
अथा॑ न इन्द्र सोमपा गिरामुप॑श्रुतिं चर ।। 3.।।

पदों का अन्वयार्थ:-
युक्ष्वा हि= संयुक्त ही होओ। केशिना= केशी दैत्य के संहारक अथवा सुन्दर केशों वाले के द्वारा   । हरी = हरि भगवान कृष्ण के द्वारा। वृषणा= वृषणों के द्वारा। कक्ष्यप्रा= काँछ के साथ। अथा= और। इन्द्र=  इन्द्र। सोमपा= सोमपा। नः= हमारी।गिरामुप॑श्रुतिं= सुनी हुई वाणी को । चर = दूत ।
"अनुवाद:- केशी दैत्य का बध  करने वाले हरि के साथा जुड़ जाओ ! जिसने केशी दैत्य के अण्डकोष और काँख पकड़ कर फैंक दिया। हे सोमपान करने वाले इन्द्र ! हमारी सुनी हुई स्तुतिगीत को कृष्ण तक दूत के रूप में पहुचाऐं।३।
_____________
कृष्ण अवतरण की भविष्यवाणी वेद में भी प्राप्त होती है।****

अब पुनः बात करते हैं  यजुर्वेद » अध्याय:-32» ऋचा (5) की जो इस प्रकार है- 
"यस्मा॑ज्जा॒तं न पु॒रा किं च॒नैव य आ॑ब॒भूव॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। प्र॒जाप॑तिः प्र॒जया॑ सꣳररा॒णस्त्रीणि॒ ज्योती॑षि सचते॒ स॒ षो॑ड॒शी ॥५ ॥

पद पाठ-
यस्मा॑त्। जा॒तम्। न। पु॒रा। किम्। च॒न। ए॒व। यः। आ॒ब॒भूवेत्या॑ऽऽ ब॒भूव॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ प्र॒जाऽप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। प्र॒जया॑ स॒ꣳर॒रा॒ण इति॑ सम्ऽररा॒णः। त्रीणि॑। ज्योती॑षि। स॒च॒ते॒। सः। षो॒ड॒शी ॥५ ॥

पदों के अर्थ और अन्वय- को देखा जाए तो कुछ इस प्रकार से होगा "हे मनुष्यो ! (यस्मात्)= जिस से (पुरा) =पहिले (किम्, चन)= कुछ भी (न जातम्)= नहीं उत्पन्न हुआ, (यः)= जो  (आबभूव)=उत्पन्न हुआ जिसमें (विश्वा)= सब (भुवनानि)= लोक  वर्त्तमान हैं, (सः एव)= वही (षोडशी)= सोलह कलावाला (प्रजया)= प्रजा के साथ (सम्, रराणः)= सम्यक् रूप  रमता हुआ (प्रजापतिः) प्रजा का पालक अधिष्ठाता (त्रीणि) तीन (ज्योतीषिं)=ज्योतियों को{ अर्थात देवत्रय- ब्रह्मा विष्णु और महेश इन तीनों को (सचते)= संयुक्त करता है / जोड़ता है ॥५॥

"अनुवाद:-  हे मनुष्यों जिससे पहले कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। जिससे सम्पूर्ण विश्व और सभी लोक उत्पन्न हुए वही ईश्वर( स्वराट्- विष्णु) !  सोलह कलाओं से युक्त प्रजा के साथ आनन्द करता हुआ। प्रजा पालक रूप में  तीन ज्योतियों में जुड़ता है।

 वस्तुत  उपर्युक्त वैदिक ऋचा गोपेश्वर श्रीकृष्ण  के अवतरण की भविष्यवाणी करती है।

पुराणों के अनुसार कृष्ण सोलह कलाओं से भी युक्त थे। इस बात का संकेत हमें  वेदों में भी मिलता है।


यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति ।
इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश ॥२१॥

अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् ।
स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥३१॥
सन्दर्भ-
ऋग्वेदः - मण्डल १/१६४/२१और ३१ 

वेदों में कृष्ण का 'विष्णुर्गोपा' के रूप में वर्णन अत्यंत दिव्य और गूढ़ है, जो उन्हें विष्णु के ही स्वरूप—'गोपालक' के रूप में स्थापित करता है। यह वस्तुत: गोलोक के स्वराट विष्णु का रूप है। जो सर्वोत्तम सत्ता है।

ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रंथों में कृष्ण को एक ऐसे सुन्दर चरवाहे के रूप में वर्णित किया गया है, जो न केवल गउओं का, बल्कि संसार का पालन और रक्षण करता है।
वेदों में कृष्ण का 'विष्णुर्गोपा' रूप में वर्णन इस प्रकार है:
.१- विष्णुर्गोपा (विष्णु ही गोपाल हैं):
ऋग्वेद (1.22.18) में एक गोपा (चरवाहे) का उल्लेख है, जो कभी अपनी स्थिति से नहीं गिरता, जो कभी पास तो कभी दूर होता है और विभिन्न रास्तों पर चलता रहता है। वेदों के इस विवरण को विष्णु के ही 'गोपाल' (श्री कृष्ण) अवतार के रूप में व्याख्यायित किया गया है।
'विष्णुर्गोपा' का अर्थ ही है—वह विष्णु जो 'गोपा' (गायों के रक्षक या गोपालक) हैं। 2
. सर्वोच्च पालक और रक्षक:
वेद में कृष्ण को 'अवतार परम पुरुष' के रूप में भी दर्शाया गया है।

3. वेदों में अप्रत्यक्ष संकेत:
ऋग्वेद (1.116.23) में 'कृष्ण' नाम का उल्लेख है, जहाँ उन्हें देवकीपुत्र (छान्दोग्य उपनिषद 3.17 में) के रूप में बाद में पहचाना गया।
वेदों में कृष्ण को "उषसः पूर्वा" (सूर्योदय से पहले पैदा हुआ) और "पदे गोः" (गायों के स्थान पर) रहने वाला बताया गया है। 
___

त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव ।
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥३॥

(ऋग्वेद १०/२१/३)

सायण-भाष्य 
का हिन्दी अनुवाद करें-
धर्माणः यज्ञस्य धारयितार ऋत्विजः “जुहूभिः संपूर्णाहुतिभिर्होमपात्रैः “त्वे त्वामेव “आसते उपासते सेवन्ते । तत्र दृष्टान्तः । “सिञ्चतीरिव । वृष्टिलक्षणाः पृथिवीं सिञ्चन्त्य आपोऽग्निं यथा स्वपितृत्वेन सेवन्ते तद्वत् । अग्नेरापः' (तै. आ. ८.१ ) इति श्रुतेस्तस्यापां पितृत्वम् । यद्वा । जुहूभिः सिञ्चतीरिव सिच्यमाना आहुतय इव धर्माणस्त्वया धार्यमाणा रश्मयस्त्वे त्वय्यासते निवसन्ति । हे अग्ने त्वं “कृष्णा कृष्णवर्णानि “अर्जुना अर्जुनानि श्वेतवर्णानि ज्वालान्तर्गतरूपाणि च “विश्वाः सर्वाः “श्रियः शोभाः “अधि “धिषे अधिकं यथा भवति तथा धारयसि । किमर्थम् । “वः युष्माकं सर्वेषां देवानां “विमदे विविधसोमपानजन्यमदार्थम् । यत एवमतः “विवक्षसे त्वं महान् भवसि ॥

सायण-भाष्य का हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है:
अनुवाद:
"धर्माण: अर्थात् यज्ञ को धारण करने वाले ऋत्विक, जुहूभि: यानी पूर्ण आहुति देने वाले होम-पात्रों के साथ, त्वे—तुम्हारी ही आसते—उपासना या सेवा करते हैं।
इसमें एक दृष्टान्त (उदाहरण) दिया गया है— सिञ्चतीरिव: जिस प्रकार वर्षा रूपी सींचने वाला जल पृथ्वी को सींचता हुआ अग्नि की अपने पिता के रूप में सेवा करता है, उसी प्रकार (ऋत्विक तुम्हारी सेवा करते हैं)। 'अग्नि से जल उत्पन्न हुआ' (तैत्तिरीय आरण्यक ८.१) इस श्रुति के अनुसार अग्नि जलों का पिता है।
अथवा (दूसरा अर्थ), जिस प्रकार जुहू (पात्रों) से सींची जाने वाली आहुतियाँ होती हैं, उसी प्रकार धर्माण:—तुम्हारे द्वारा धारण की गई किरणें त्वे—तुममें ही आसते—निवास करती हैं।
हे अग्ने! तुम कृष्णा—कृष्ण वर्ण की (काली) और अर्जुना—अर्जुन वर्ण की यानी श्वेत (सफेद) रंग की ज्वालाओं के भीतर रहने वाली विश्वाः श्रियः—समस्त शोभाओं को अधि धिषे—अत्यधिक रूप से धारण करते हो।
किसलिए? वः—तुम सभी देवताओं के विमदे—विविध प्रकार के सोमपान से उत्पन्न होने वाले हर्ष (मद) के लिए। क्योंकि तुम ऐसे हो, इसीलिए विवक्षसे—तुम कहते  हो।"

रविवार, 22 मार्च 2026

पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय (१७) का मूल व हिन्दी अनुवाद-

पद्मपुराणम्/खण्डः १ (सृष्टिखण्डम्)अध्यायः १७

← अध्यायः (१७)पद्मपुराण-

               "भीष्म-उवाच।
तस्मिन्यज्ञे किमाश्चर्यं तदासीद्द्विजसत्तम।
कथं रुद्रःस्थितस्तत्र विष्णुश्चापि सुरोत्तमः।१।

आभीर:पुत्री गायत्र्या किं कृतं तत्र पत्नीत्वे स्थितया तया।
आभीरा: किं सुवृत्तज्ञैर्ज्ञात्वा तैश्च कृतं मुने।२।

एतद्वृत्तं समाचक्ष्व यथावृत्तं यथाकृतम्।
आभीरैर्ब्राह्मणाचापि ममैतत्कौतुकं महत्।३।

       "पुलस्त्य उवाच।
तस्मिन्यज्ञे यदाश्चर्यं वृत्तमासीन्नराधिप।
कथयिष्यामि तत्सर्वं शृणुष्वैकमना नृप।४।

रुद्रस्तु महदाश्चर्यं कृतवान्वै सदो गतः।
निन्द्यरूपधरो देवस्तत्रायाद्द्विजसन्निधौ।५।

विष्णुना न कृतं किञ्चित्प्राधान्ये स यतःस्थितः।
नाशं तु गोपकन्याया ज्ञात्वा गोपकुमारकाः।६।

गोप्यश्च तास्तथा सर्वा आगता ब्रह्मणोन्तिकम्।
दृष्ट्वा तां मेखलाबद्धां यज्ञसीमव्यस्थिताम्।७।

हा पुत्रीति तदा माता पिता हा पुत्रिकेति च।
स्वसेति बान्धवाः सर्वे सख्यः सख्येन हासखि।८।

केन त्वमिह चानीता अलक्तांका तु सुन्दरी।
शाटीं निवृत्तांकृत्वा तु केन युक्ता च कम्बली।९।

केन चेयं जटा पुत्रि रक्तसूत्रावकल्पिता।
एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वोवाच स्वयंहरिः।१०।

इह चास्माभिरानीता पत्न्यर्थं विनियोजिता।
ब्रह्मणालम्बिता बाला प्रलापं माकृथास्त्विह।११।

पुण्या चैषा सुभाग्या च सर्वेषां कुलनन्दिनी।
पुण्या चेन्न भवत्येषा कथमागच्छते सदः।१२।

एवं ज्ञात्वा महाभागन त्वं शोचितुमर्हसि।
कन्यैषा ते महाभागा प्राप्ता देवं विरिंचनम्।१३।

योगिनो योगयुक्ता ये ब्राह्मणा वेदपारगाः।
न लभन्ते प्रार्थयन्तस्तां गतिं दुहिता गता।१४।

  • धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।

मया ज्ञात्वा ततः कन्या दत्ताचैषा विरञ्चये।१५।

अनया-आभीरकन्याया तारितो गच्छ! *दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।

  • अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति।

यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।

करिष्यन्ति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः।
युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यन्ति मया सह।१८।

तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः।
करिष्यन्ति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।१९।

न चास्याभविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्।
श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोःप्रणिपत्य ययुस्तदा।२०।

एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे।
अवतारः कुलेस्माकं कर्तव्यो धर्मसाधनः।२१।

भवतो दर्शनादेव भवामः स्वर्गवासिनः।
शुभदा कन्यका चैषा तारिणी मे कुलैः सह।२२।

एवं भवतु देवेश वरदानं विभो तव।
अनुनीतास्तदा गोपाः स्वयं देवेन विष्णुना।२३।

ब्रह्मणाप्येवमेवं तु वामहस्तेन भाषितम्।
त्रपान्विता दर्शने तु बन्धूनां वरवर्णिनी।२४।

कैरहं तु समाख्याता येनेमं देशमागताः।
दृष्ट्वा तु तांस्ततः प्राह गायत्री आभीरकन्यका।२५।

वामहस्तेन तान्सर्वान्प्राणिपातपुरःसरम्।
अत्र चाहं स्थिता मातर्ब्रह्माणं समुपागता।२६।

भर्ता लब्धो मया देवः सर्वस्याद्योजगत्पतिः।
नाहंशोच्या भवत्यातु न पित्रा न च बान्धवैः।२७।

सखीगणश्च मे यातु भगिन्यो दारकैः सह।
सर्वेषां कुशलं वाच्यं स्थितास्मि सह दैवतैः।२८।

गतेषु तेषु सर्वेषु गायत्री सा सुमध्यमा।
ब्रह्मणा सहिता रेजे यज्ञवाटं गता सती।२९।

याचितो ब्राह्मणैर्ब्रह्मा वरान्नो देहि चेप्सितान्।
यथेप्सितं वरं तेषां तदाब्रह्माप्ययच्छत।३०।

तया देव्या च गायत्र्या दत्तं तच्चानुमोदितम्।
सा तु यज्ञे स्थिता साध्वीदेवतानां समीपगा।३१।

दिव्यंवर्षशतं साग्रं स यज्ञो ववृधे तदा।
यज्ञवाटं कपर्दीतु भिक्षार्थं समुपागतः।३२।

बृहत्कपालं संगृह्य पञ्चमुण्डैरलंकृतः।
ऋत्विग्भिश्च सदस्यैश्च दूरात्तिष्ठन्जुगुप्सितः।३३।

कथं त्वमिह सम्प्राप्तो निन्दितो वेदवादिभिः।
एवं प्रोत्सार्यमाणोपि निन्द्यमानः स तैर्द्विजैः।३४।

उवाच तान्द्विजान्सर्वान्स्मितं कृत्वा महेश्वरः।
अत्र पैतामहे यज्ञे सर्वेषां तोषदायिनि।३५।

कश्चिदुत्सार्य तेनैव ऋतेमां द्विजसत्तमाः।
उक्तः स तैःकपर्दी तु भुक्त्वा चान्नंततो व्रज।३६।

कपर्दिना च ते उक्ता भुक्त्वा यास्यामि भो द्विजाः।
एवमुक्त्वा निषण्णः सकपालं न्यस्य चाग्रतः।३७।

तेषां निरीक्ष्य तत्कर्म चक्रे कौटिल्यमीश्वरः।
मुक्त्वा कपालं भूमौ तु तान्द्विजानवलोकयन्।३८।

उवाच पुष्करं यामि स्नानार्थं द्विजसत्तमाः।
तूर्णं गच्छेति तैरुक्तः स गतः परमेश्वरः।३९।

वियत्स्थितः कौतुकेन मोहयित्वा दिवौकसः।
स्नानार्थं पुष्करं याते कपर्दिनि द्विजातयः।४०।

कथं होमोत्र क्रियते कपाले सदसि स्थिते।
कपालान्तान्यशौचानि पुरा प्राह प्रजापतिः।४१।

विप्रोभ्यधात्सदस्येकः कपालमुत्क्षिपाम्यहं।
उद्धृतं तु सदस्येन प्रक्षिप्तं पाणिना स्वयम्।४२।

तावदन्यत्स्थितं तत्र पुनरेव समुद्धृतम्।
एवं द्वितीयं तृतीयं विंशतिस्त्रिंशदप्यहो।४३।

पञ्चाशच्च शतं चैव सहस्रमयुतं तथा।
एवं नान्तः कपालानां प्राप्यते द्विजसत्तमैः।४४।

नत्वा कपर्दिनं देवं शरणं समुपागताः।
पुष्करारण्यमासाद्य जप्यैश्च वैदिकैर्भृशम्।४५।

तुष्टुवुः सहिताः सर्वे तावत्तुष्टो हरः स्वयम्।
ततः सदर्शनं प्रादाद्द्विजानां भक्तितः शिवः।४६।

उवाच तांस्ततो देवो भक्तिनम्रान्द्विजोत्तमान्।
पुरोडाशस्य निष्पत्तिः कपालं न विना भवेत्।४७।

कुरुध्वं वचनं विप्राः भागः स्विष्टकृतो मम।
एवं कृते कृतं सर्वं मदीयं शासनं भवेत्।४८।

तथेत्यूचुर्द्विजाश्शम्भुं कुर्मो वै तव शासनम्।
कपालपाणिराहेशो भगवन्तं पितामहम्।४९।

वरं वरय भो ब्रह्मन्हृदि यत्ते प्रियं स्थितम्।
सर्वं तव प्रदास्यामि अदेयं नास्ति मे प्रभो।५० 1.17.50।

         "ब्रह्मोवाच।
न ते वरं ग्रहीष्यामि दीक्षितोहं सदःस्थितः।
सर्वकामप्रदश्चाहं यो मां प्रार्थयते त्विह।५१।

एवं वदन्तं वरदं क्रतौ तस्मिन्पितामहम्।
तथेति चोक्त्वा रुद्रः स वरमस्मादयाचत।५२।

ततो मन्वन्तरेतीते पुनरेव प्रभुः स्वयम्।
ब्रह्मोत्तरं कृतं स्थानं स्वयं देवेन शंभुना।५३।

चतुर्ष्वपि हि वेदेषु परिनिष्ठां गतो हि यः।
तस्मिन्काले तदा देवो नगरस्यावलोकने।५४।

सम्भाषणे द्विजानां तु कौतुकेन सदो गतः।
तेनैवोन्मत्तवेषेण हुतशेषे महेश्वरः।५५।

प्रविष्टो ब्रह्मणः सद्म दृष्टो देवैर्द्विजोत्तमैः।
प्रहसन्ति च केप्येनं केचिन्निर्भर्त्सयंति च।५६।

अपरे पान्सुभिः सिञ्चन्त्युन्मत्तं तं तथा द्विजाः।
लोष्टैश्च लगुडैश्चान्ये शुष्मिणो बलगर्विताः।५७।

प्रहरन्ति स्मोपहासं कुर्वाणा हस्तसंविदम्।
ततोन्ये वटवस्तत्र जटास्वागृह्य चान्तिकम्।५८।

पृच्छन्ति व्रतचर्यां तां केनैषा ते निदर्शिता।
अत्र वामास्त्रियः संति तासामर्थे त्वमागतः।५९।

केनैषा दर्शिता चर्या गुरुणा पापदर्शिना।
येनचोन्मत्तवद्वाक्यं वदन्मध्येप्रधावसि।६०।

शिश्नं मे ब्रह्मणो रूपं भगं चापि जनार्दनः।
उप्यमानमिदं बीजं लोकः क्लिश्नातिचान्यथा।६१।

मयायं जनितः पुत्रो जनितोनेन चाप्यहम्।
महादेवकृते सृष्टिः सृष्टा भार्या हिमालये।६२।

उमादत्ता तु रुद्रस्य कस्य सा तनया वद।
मूढा यूयं न जानीथ वदतां भगवांस्तु वः।६३।

ब्रह्मणा न कृता चर्या दर्शिता नैव विष्णुना।
गिरिशेनापि देवेन ब्रह्मवध्या कृतेन तु।६४।

कथंस्विद्गर्हसे देवं वध्योस्माकं त्वमद्य वै।
एवं तैर्हन्यमानस्तु ब्राह्मणैस्तत्र शंकरः।६५।

स्मितं कृत्वाब्रवीत्सर्वान्ब्राह्मणान्नृपसत्तम।
किं मां न वित्थ भो विप्रा उन्मत्तं नष्टचेतनम्।६६।

यूयं कारुणिकाः सर्वे मित्रभावे व्यवस्थिताः।
वदमानमिदं छद्म ब्रह्मरूपधरं हरम्।६७।

मायया तस्य देवस्य मोहितास्ते द्विजोत्तमाः।
कपर्दिनं निजघ्नुस्ते पाणिपादैश्च मुष्टिभिः।६८।

दण्डैश्चापि च कीलैश्च उन्मत्तवेषधारिणम्।
पीड्यमानस्ततस्तैस्तु द्विजैः कोपमथागमत्।६९।

ततो देवेन ते शप्ता यूयं वेदविवर्जिताः।
ऊर्ध्वजटाः क्रतुभ्रष्टाः परदारोपसेविनः।७०।

वेश्यायान्तु रता द्यूते पितृमातृविवर्जिताः।
न पुत्रः पैतृकं वित्तं विद्यां वापि गमिष्यति।७१।

सर्वे च मोहिताः सन्तु सर्वेंद्रियविवर्जिताः।
रौद्रीं भिक्षां समश्नंतु परपिण्डोपजीविनः।७२।

आत्मानं वर्तयन्तश्च निर्ममा धर्मवर्जिताः।
कृपार्पिता तु यैर्विप्रैरुन्मत्ते मयि सांप्रतम्।७३।

तेषां धनं च पुत्राश्च दासीदासमजाविकम्।
कुलोत्पन्नाश्च वै नार्यो मयि तुष्टे भवन्विह।७४।

एवं शापं वरं चैव दत्वान्तर्द्धानमीश्वरः।
गतो द्विजागते देवे मत्वा तं शंकरं प्रभुम्।७५।

अन्विष्यन्तोपि यत्नेन न चापश्यंत ते यदा।
तदा नियमसंपन्नाः पुष्करारण्यमागताः।७६।

स्नात्वा ज्येष्ठसरो विप्रा जेपुस्ते शतरुद्रियम्।
जाप्यावसाने देवस्तानशीररगिराऽब्रवीत्।७७।

अनृतं न मया प्रोक्तं स्वैरेष्वपि कुतःपुनः।
आगते निग्रहे क्षेमं भूयोपि करवाण्यहम्।७८।

शान्ता दांता द्विजा ये तु भक्तिमन्तो मयि स्थिराः।
न तेषां छिद्यते वेदो न धनं नापि सन्ततिः।७९।

अग्निहोत्ररता ये च भक्तिमन्तो जनार्दने।
पूजयन्ति च ब्रह्माणंतेजोराशिं दिवाकरम्।८०।

नाशुभं विद्यते तेषां येषां साम्ये स्थिता मतिः।
एतावदुक्त्वा वचनं तूष्णीं भूतस्तु सोऽभवत्।८१।

लब्ध्वा वरं सप्रसादं देवदेवान्महेश्वरात्।
आजग्मुः सहितास्सर्वे यत्र देवःपितामहः।८२।

विरिञ्चिं संहिताजाप्यैस्तोषयंतोऽग्रतःस्थिताः।
तुष्टस्तानब्रवीद्ब्रह्मा मत्तोपि व्रियतां वरः।८३।

ब्रह्मणस्तेनवाक्येन हृष्टाः सर्वे द्विजोत्तमाः।
को वरो याच्यतां विप्राः परितुष्टे पितामहे।८४।

अग्निहोत्राणि वेदाश्च शास्त्राणि विविधानि च।
सान्तानिकाश्च ये लोका वरदानाद्भवंतु नः।८५।

एवं प्रजल्पतां तत्र विप्राणां कोपमाविशत्।
के यूयं केत्र प्रवरा वयं श्रेष्ठास्तथापरे।८६।

नेतिनेति तथा विप्रा द्विजांस्तांस्तत्र संस्थितान्।
ब्रह्मोवाचाभिसंप्रेक्ष्य ब्राह्मणान्क्रोधपूरितान्।८७।

यस्माद्यूयं त्रिभिर्भागैः सभायां बाह्यतः स्थिताः।
तस्मादामूलिको गुल्मो ह्येको भवतु वोद्विजाः।८८।

उदासीनाः स्थिता ये तु उदासीना भवंतु ते।
सायुधाबद्धनिस्त्रिंशा योद्धुकामा व्यवस्थिताः।८९।

कौशिकीति गणो नाम तृतीयो भवतु द्विजाः।
त्रिधाबद्धमिदं स्थानं सर्वं युष्मद्भविष्यति।९०।

बाह्यतो लोकशब्देन प्रोच्यमानाः प्रजास्त्विह।
अविज्ञेयमिदं स्थानं विष्णुः पालयिता ध्रुवम्।९१।

मया दत्तं चिरस्थायि अभंगं चभविष्यति।
एवमुक्त्वा तदा ब्रह्मा समाप्तिंतामवैक्षत।९२।

ब्राह्मणाः सहितास्ते तु क्रोधामर्षसमन्विताः।
अतिथिं भोजयानाश्च वेदाभ्यासरतास्तु ते।९३।

एतच्च परमं क्षेत्रं पुष्करं ब्रह्मसंज्ञितम्।
तत्रस्था ये द्विजाः शांता वसंति क्षेत्रवासिनः।९४।

न तेषां दुर्लभं किंचिद्ब्रह्मलोके भविष्यति।
कोकामुखे कुरुक्षेत्रे नैमिषे ऋषिसंगमे।९५।

वाराणस्यां प्रभासे च तथा बदरिकाश्रमे।
गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे।९६।

रुद्रकोट्यां विरूपाक्षे मित्रस्यापि तथा वने।
तीर्थेष्वेतेषु सर्वेषु सिद्धिर्या द्वादशाब्दिका।९७।

प्राप्यते मानवैर्लोके षण्मासाद्राजसत्तम।
पुष्करे तु न संदेहो ब्रह्मचर्यमना यदि।९८।

तीर्थानां परमं तीर्थं क्षेत्राणामपि चोत्तमम्।
सदा तु पूजितं पूज्यैर्भक्तियुक्तैः पितामहे।९९।

अतः परं प्रवक्ष्यामिसावित्र्या ब्रह्मणा सह।
वादो यथानुभूतस्तु परिहासकृतो महान्।१००। 1.17.100।

सावित्रीगमने सर्वा-आगता देवयोषितः।
भृगोःख्यात्यां समुत्पन्नाविष्णुपत्नी यशस्विनी।१०१।

आमन्त्रिता सदा लक्ष्मीस्तत्रायाता त्वरान्विता।
मदिराच महाभागा योगनिद्रा विभूतिदा।१०२।

श्रीः कमलालयाभूतिः कीर्तिः श्रद्धा मनस्विनी।
पुष्टितुष्टिप्रदा या तु देव्या एताः समागताः।१०३।

सती या दक्षतनया उमेति पार्वती शुभा।
त्रैलोक्यसुन्दरी देवी स्त्रीणां सौभाग्यदायिनी।१०४।

जया च विजया चैव मधुच्छन्दामरावती।
सुप्रिया जनकान्ता च सावित्र्या मंदिरे शुभे।१०५।

गौर्या सह समायातास्सुवेषा भरणान्विताः।
पुलोमदुहिता चैव शक्राणी च सहाप्सराः।१०६।

स्वाहा चापि स्वधाऽऽयाता धूमोर्णा च वरानना।
यक्षी तु राक्षसी चैव गौरी चैव महाधना।१०७।

मनोजवा वायुपत्नी ऋद्धिश्च धनदप्रिया।
देवकन्यास्तथाऽऽयाता दानव्यो दनुवल्लभाः।१०८।

सप्तर्षीणां महापत्न्य ऋषीणां च वरांगनाः।
एवं भगिन्यो दुहिता विद्याधरीगणास्तथा।१०९।

राक्षस्यः पितृकन्याश्च तथान्या लोकमातरः।
वधूभिः सस्नुषाभिश्च सावित्री गन्तुमिच्छति।११०।

अदित्याद्यास्तथा सर्वा दक्षकन्यास्समागताः।
ताभिः परिवृता साध्वी ब्रह्माणी कमलालया।१११।

काचिन्मोदकमादाय काचिच्छूर्पं वरानना।
फलपूरितमादाय प्रयाता ब्रह्मणोंतिकम्।११२।

आढकीः सह निष्पावा गृहीत्वान्यास्तथापरा।
दाडिमानि विचित्राणि मातुलिंगानि शोभना।११३।

करीराणि तथा चान्या गृहीत्वा कमलानि च।
कौसुंभकं जीरकं च खर्जूरमपरा तथा।११४।

उत्तमान्यपरादाय नालिकेराणि सर्वशः।
द्राक्षयापूरितं काचित्पात्रंश्रृँगाटकंतथा।११५।

कर्पूराणि विचित्राणि जंबूकानि शुभानि च।
अक्षोटामलकान्गृह्य जम्बीराणि तथापरा।११६।

बिल्वानि परिपक्वानि चिपिटानि वरानना।
कार्पासतूलिकाश्चान्या वस्त्रं कौसुम्भकं तथा।११७।

एवमाद्यानि चान्यानि कृत्वा शूर्पे वराननाः।
सावित्र्यासहिताःसर्वाः संप्राप्ताःसहसाशुभाः।११८।

सावित्रीमागतां दृष्ट्वा भीतस्तत्र पुरन्दरः।
अधोमुखः स्थितोब्रह्मा किमेषा मांवदिष्यति।११९।

त्रपान्वितौ विष्णुरुद्रौ सर्वे चान्ये द्विजातयः।
सभासदस्तथा भीतास्तथा चान्ये दिवौकसः।१२०।

पुत्राःपौत्रा भागिनेया मातुला भ्रातरस्तथा।
ऋभवो नाम ये देवा देवानामपि देवताः।१२१।

वैलक्ष्येवस्थिताः सर्वे सावित्री किं वदिष्यति।
ब्रह्मपार्श्वे स्थिता तत्र किंतु वै गोपकन्यका।१२२।

मौनीभूता तु शृण्वाना सर्वेषां वदतां गिरः।
अद्ध्वर्युणा समाहूता नागता वरवर्णिनी।१२३।

शक्रेणान्याहृता-आभीरादत्ता सा विष्णुनास्वयम्।
अनुमोदिताचरुद्रेणपित्राऽदत्तास्वयं तथा।१२४।

कथं सा भविता यज्ञे समाप्तिं वा व्रजेत्कथम्।
एवं चिंतयतां तेषां प्रविष्टा कमलालया।१२५।

वृतो ब्रह्मासदस्यैस्तु ऋत्विग्भिर्दैवतैस्तथा।
हूयंते चाग्नयस्तत्र ब्राह्मणैर्वैदपारगैः।१२६।

पत्नीशालास्थिता गोपी सैणश्रृँगा समेखला।
क्षौमवस्त्रपरीधाना ध्यायंती परमं पदम्।१२७।

पतिव्रता पतिप्राणा प्राधान्ये च निवेशिता।
रूपान्विता विशालाक्षी तेजसा भास्करोपमा।१२८।

द्योतयन्ती सदस्तत्र सूर्यस्येव यथा प्रभा।
ज्वलमानं तथा वह्निं श्रयन्ते ऋत्विजस्तथा।१२९।

पशूनामिह गृह्णानाभागं स्वस्व चरोर्मुदा।
यज्ञभागार्थिनो देवा विलम्बाद्ब्रुवते तदा।१३०।

कालहीनं न कर्तव्यं कृतं न फलदं यतः।
वेदेष्वेवमधीकारो दृष्टःसर्वैर्मनीषिभिः।१३१।

प्रावर्ग्ये क्रियमाणे तु ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
क्षीरद्वयेन संयुक्त शृतेनाध्वर्युणा तथा।१३२।

उपहूतेनागते नचाहूतेषु द्विजन्मसु।
क्रियमाणे तथाभक्ष्ये दृष्ट्वा देवी रुषान्विता।१३३।

उवाच देवी ब्रह्माणं सदोमध्ये तु मौनिनम्।
किमेतद्युज्यते देव कर्तुमेतद्विचेष्टितम्।१३४।

मां परित्यज्य यत्कामात्कृतवानसि किल्बिषम्।
नतुल्यापादरजसा ममैषा या शिरः कृता।१३५।

यद्वदन्ति जनास्सर्वे संगताः सदसि स्थिताः।
आज्ञामीश्वरभूतानां तां कुरुष्व यदीच्छसि।१३६।

भवता रूपलोभेन कृतं लोकविगर्हितम्।
पुत्रेषु नकृतालज्जा पौत्रेषुचन ते प्रभो।१३७।

कामकारकृतं मन्य एतत्कर्मविगर्हितम्।
पितामहोसि देवानामृषीणां प्रपितामहः।१३८।

कथं न ते त्रपा जाता आत्मनःपश्यतस्तनुम्।
लोकमध्येकृतं हास्यमहं चापकृता प्रभो।१३९।

यद्येष ते स्थिरो भावस्तिष्ठ देव नमोस्तुते।
अहंकथंसखीनांतु दर्शयिष्यामि वैमुखम्।१४०।

भर्त्रा मे विधृता पत्नी कथमेतदहं वदे।
          "ब्रह्मोवाच।
ऋत्विग्भिस्त्वरितश्चाहं दीक्षाकालादनंतरम्।१४१।

पत्नीं विना न होमोत्र शीघ्रं पत्नीमिहानय।
शक्रेणैषा समानीता दत्तेयं मम विष्णुना।१४२।

गृहीता च मया सुभ्रु क्षमस्वैतं मया कृतम्।
न चापराधं भूयोन्यं करिष्ये तव सुव्रते।१४३।

पादयोः पतितस्तेहं क्षमस्वेह नमोस्तुते।
        "पुलस्त्य उवाच।
एवमुक्ता तदा क्रुद्धा ब्रह्माणं शप्तुमुद्यता।१४४।

यदि मेस्ति तपस्तप्तं गुरवो यदि तोषिताः।
सर्वब्रह्मसमूहेषु स्थानेषु विविधेषु च।१४५।

नैव ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यंति कदाचन।
ॠते तु कार्तिकीमेकां पूजां सांवत्सरीं तव।१४६।

करिष्यन्ति द्विजाः सर्वे मर्त्या नान्यत्र भूतले।
एतद्ब्रह्माणमुक्त्वाह शतक्रतुमुपस्थितम्।१४७।

भोभोः! शक्र त्वयानीता आभीरी ब्रह्मणोन्तिकम्।
यस्मात्ते क्षुद्रकंकर्मतस्मात्वं लप्स्यसे फलम्।१४८।

यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्र भविष्यसि।
तदा त्वं शत्रुभिर्बद्धो नीतः परमिकां दशाम्।१४९।

अकिञ्चनो नष्टसत्वः शत्रूणां नगरे स्थितः।
पराभवं महत्प्राप्य न चिरादेव मोक्ष्यसे।१५०।1.17.150।

शक्रं शप्त्वा तदा देवी विष्णुं वाक्यमथाब्रवीत्।
भृगुवाक्येन ते जन्म यदा मर्त्ये भविष्यति।१५१।

भार्यावियोगजं दुःखं तदा त्वं तत्र भोक्ष्यसे।
हृतातेशत्रुणा पत्नी परे पारो महोदधेः।१५२।

न च त्वं ज्ञास्यसे नीतां शोकोपहतचेतनः।
भ्रात्रा सह परं कष्टामापदं प्राप्य दुःखितः।१५३।

यदा यदुकुले जातः•★कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं भ्रमिष्यसि।१५४।

तदाह रुद्रं कुपिता यदा दारुवने स्थितः।
तदा त ॠषयः क्रुद्धाःशापं दास्यन्तिवै हर।१५५।

भोभोः !कापालिक क्षुद्र स्त्रीरस्माकं जिहीर्षसि।
तदेतद्दर्पितं तेद्य भूमौ लिङ्गंपतिष्यति।१५६।

विहीनः पौरुषेण त्वं मुनिशापाच्च पीडितः।
गङ्गाद्वारेस्थिता पत्नी सा त्वामाश्वासयिष्यति।१५७।

अग्ने त्वं सर्वभक्षोसि पूर्वं पुत्रेण मे कृतः।
भृगुणा धर्मनित्येन कथं दग्धं दहाम्यहम्।१५८।

जातवेदस्स रुद्रस्त्वां रेतसा प्लावयिष्यति।
अमेध्येषु च तेजिह्वा अधिकं प्रज्वलिष्यति।१५९।

ब्राह्मणानृत्विजः सर्वान्सावित्रीवैशशाप ह।
प्रतिग्रहार्थाग्निहोत्रोवृथाटव्याश्रयास्तथा।१६०।

सदा तीर्थानि क्षेत्राणि लोभादेव भजिष्यथ।
परान्नेषु सदातृप्ता अतृप्तास्स्वगृहेषु च।१६१।

अयाज्ययाजनं कृत्वा कुत्सितस्य प्रतिग्रहम्।
वृथाधनार्जनं कृत्वा व्ययं चैव तथा वृथा।१६२।

प्रेतानां तेन प्रेतत्वं भविष्यति न संशयः।
एवं शक्रं तथा विष्णुं रुद्रं वै पावकं तथा।१६३।

ब्रह्माणं ब्राह्मणांश्चैव सर्वांस्तानाशपद्रुषा।
शापं दत्वा तथातेषां निष्क्रांता सदसस्तथा।१६४।

ज्येष्ठं पुष्करमासाद्य तदासा च व्यवस्थिता।
लक्ष्मींप्राह सतीं तां चशक्रभार्यां वराननाम्।१६५।

युवतीस्तास्तथोवाच नात्र स्थास्यामि सन्सदि।
तत्रचाहं गमिष्यामि यत्रश्रोष्ये न च ध्वनिम्।१६६।

ततस्ताः प्रमदाः सर्वाः प्रयाताः स्वनिकेतनम्।
सावित्री कुपिता तासामपि शापाय चोद्यता।१६७।

यस्मान्मां तु परित्यज्य गतास्ता देवयोषितः।
तासामपि तथा शापंप्रदास्येकुपिता भृशम्।१६८।

नैकत्रवासो लक्ष्म्यास्तु भविष्यतिकदाचन।
क्षुद्रा सा चलचित्ता चमूर्खेषु चवसिष्यति।१६९।

म्लेच्छेषु पार्वतीयेषु कुत्सिते कुत्सिते तथा।
मूर्खेषु चावलिप्तेषु अभिशप्ते दुरात्मनि।१७०।

एवंविधे नरे स्यात्ते वसतिःशापकारिता।
शापं दत्वाततस्तस्या इन्द्राणीमशपत्ततदा।१७१।

ब्रह्महत्या गृहीतेंद्रे पत्यौ तेदुःखभागिनि।
नहुषापहृते राज्ये दृष्ट्वा त्वांयाचयिष्यति।१७२।

अहमिन्द्रः कथं चैषा नोपस्थास्यति बालिशा।
सर्वान्देवान्हनिष्यामि न लप्स्येहं शचीं यदि।१७३।

नष्टा त्वं च तदा त्रस्ता वाक्पतेर्दुःखिता गृहे।
वसिष्यसे दुराचारे मम शापेन गर्विते।१७४।

देवभार्यासु सर्वासु तदा शापमयच्छत।
न चापत्यकृतां प्रीतिमेताः सर्वा लभिष्यथ।१७५।

दह्यमाना दिवारात्रौ वंध्याशब्देन दूषिताः।
गौर्य्यप्येवं तदा शप्ता सावित्र्या वरवर्णिनी।१७६।

रुदमाना तु सा दृष्टा विष्णुना च प्रसादिता।
मा रोदीस्त्वंविशालाक्षि एह्यागच्छ सदाशुभे।१७७।

प्रविश्य च सभां देहि मेखलां क्षौमवाससी।
गृहाण दीक्षां ब्रह्माणिपादौ च प्रणमामि ते।१७८।

एवमुक्ताऽब्रवीदेनं न करोमि वचस्तव।
तत्रचाहं गमिष्यामि यत्रश्रोष्ये न वै ध्वनिम्।१७९।

एतावदुक्त्वा सारुह्य तस्मात्स्थानद्गिरौ स्थिता।
विष्णुस्तदग्रतःस्थित्वाबध्वा च करसम्पुटं।१८०।

तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भक्त्या परमयास्थितः।
       "विष्णुरुवाच।
सर्वगा सर्वभूतेषु द्रष्टव्या सर्वतोद्भुता।१८१।

सदसच्चैव यत्किंचिद्दृश्यं तन्न विना त्वया।
तथापियेषु स्थानेषु द्रष्टव्या सिद्धिमीप्सुभिः।१८२।

स्मर्तव्या भूमिकामैर्वा तत्प्रवक्ष्यामि तेग्रतः।
सावित्री पुष्करेनाम तीर्थानां प्रवरे शुभे।१८३।

वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषे लिंगधारिणी।
प्रयागे ललितादेवी कामुका गन्धमादने।१८४।

मानसे कुमुदा नाम विश्वकाया तथाम्बरे।
गोमन्ते गोमती नाम मन्दरेकामचारिणी।१८५।

मदोत्कटा चैत्ररथे जयन्ती हस्तिनापुरे।
कान्यकुब्जे तथा गौरीरम्भा मलयपर्वते।१८६।

एकाम्रके कीर्तिमती विश्वा विश्वेश्वरी तथा।
कर्णिके पुरुहस्तेति केदारे मार्गदायिका।१८७।

नन्दा हिमवतः पृष्टे गोकर्णे भद्रकालिका।
स्थाण्वीश्वरे भवानी तु बिल्वकेबिल्वपत्रिका।१८८।

श्रीशैले माधवीदेवी भद्राभद्रेश्वरी तथा।
जया वराहशैले तु कमलाकमलालये।१८९।

रुद्रकोट्यां तुरुद्राणी काली कालञ्जरे तथा।
महालिंगे तु कपिला कर्कोटे मंगलेश्वरी।१९०।

शालिग्रामे महादेवी शिवलिंगेजलप्रिया।
मायापुर्यां कुमारीतु सन्तानेललितातथा।१९१।

उत्पलाक्षी सहस्राक्षे हिरण्याक्षे महोत्पला।
गयायां मंगला नाम विमला पुरुषोत्तमे।१९२।

विपाशायाममोघाक्षी पाटला पुण्यवर्द्धने।
नारायणी सुपार्श्वे तु त्रिकूटे भद्रसुंदरी।१९३।

विपुले विपुला नाम कल्याणी मलयाचले।
कोटवी कोटितीर्थे तु सुगंधा माधवीवने।१९४।

कुब्जाम्रके त्रिसन्ध्या तु गंगाद्वारे हरिप्रिया।
शिवकुण्डे शिवानंदा नन्दिनी देविकातटे।१९५।

रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृन्दावने तथा।
देवकी मथुरायां तु पाताले परमेश्वरी।१९६।

चित्रकूटे तथा सीता विंध्ये विंध्यनिवासिनी।
सह्याद्रावेकवीरा तु हरिश्चन्द्रे तु चन्द्रिका।१९७।

रमणा रामतीर्थे तु यमुनायां मृगावती।
करवीरे महालक्ष्मी रुमादेवी विनायके।१९८।

अरोगा वैद्यनाथे तु महाकाले महेश्वरी।
अभया पुष्पतीर्थे तु अमृता विंध्यकन्दरे।१९९।

माण्डव्ये माण्डवी देवी स्वाहा माहेश्वरे पुरे।
वेगले तु प्रचण्डाथ चण्डिकामरकण्टके।२००। 1.17.200।

सोमेश्वरे वरारोहा प्रभासे पुष्करावती।
देवमाता सरस्वत्यांपारापारे तटे स्थिता।२०१।

महालये महापद्मापयोष्ण्यां पिंगलेश्वरी।
सिंहिका कृतशौचे तु कार्तिकेये तु शंकरी।२०२।

उत्पलावर्तके लोला सुभद्रा सिन्धुसंगमे।
उमा सिद्धवने लक्ष्मीरनंगा भरताश्रमे।२०३।

जालन्धरे विश्वमुखी तारा किष्किन्धपर्वते।
देवदारुवने पुष्टिर्मेधा काश्मीरमण्डले।२०४।

भीमा देवी हिमाद्रौ च तुष्टिर्वस्त्रेश्वरे तथा।
कपालमोचने श्रद्धा माता कायावरोहणे।२०५।

शङ्खोद्धारे ध्वनिर्नाम धृतिःपिण्डारके तथा।
काला तु चन्द्रभागायामच्छोदे सिद्धिदायिनी।२०६।

वेणायाममृता देवी वदर्यामूर्वशी तथा।
औषधी चोत्तरकुरौ कुशद्वीपे कुशोदका।२०७।

मन्मथा हेमकूटे तु कुमुदे सत्यवादिनी।
अश्वत्थेवन्दनीया तु निधिर्वै श्रवणालये।२०८।

गायत्री वेदवदने पार्वती शिवसन्निधौ।
देवलोके तथेंद्राणी ब्रह्मास्ये तु सरस्वती।२०९।

सूर्यबिम्बे प्रभानाम मातॄणां वैष्णवी तथा।
अरुन्धती सतीनां तु रामासु च तिलोत्तमा।२१०।

चित्रे ब्रह्मकला नाम शक्तिः सर्वशरीरिणां।
एतद्भक्त्या मया प्रोक्तं नामाष्टशतमुत्तमं।२११।

अष्टोत्तरं च तीर्थानां शतमेतदुदाहृतं।
यो जपेच्छ्रुणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते।२१२।

येषु तीर्थेषु यः कृत्वा स्नानं पश्येन्नरोत्तमः।
सर्वपापविनिर्मुक्तः कल्पं ब्रह्मपुरे वसेत्।२१३।

नामाष्टकशतं यस्तु श्रावयेद्ब्रह्मसन्निधौ।
पौर्णमास्याममायां वा बहुपुत्रो भवेन्नरः।२१४।

गोदाने श्राद्धदाने वा अहन्यहनि वा पुनः।
देवार्चनविधौ शृण्वन्परं ब्रह्माधिगच्छति।२१५।

एवं स्तुवंतं सावित्री विष्णुं प्रोवाच सुव्रता।
सम्यक्स्तुता त्वया पुत्र त्वमजय्योभविष्यसि।२१६।

अवतारे सदारस्त्वं पितृमातृषु वल्लभः।
इह चागत्य यो मां तु स्तवेनानेन संस्तुयात्।२१७।

सर्वपापविनिर्मुक्तः परं स्थानं गमिष्यति।
गच्छयज्ञं विरिञ्चस्य समाप्तिं नय पुत्रक।२१८।

कुरुक्षेत्रे प्रयागे च भविष्ये चान्नदायिनी।
समीपगा स्थिता भर्त्तुःकरिष्ये तव भाषितम्।२१९।

एवमुक्तो गतो विष्णुर्ब्रह्मणः सद उत्तम्।
गतायामथ सावित्र्यां गायत्री वाक्यमब्रवीत्।२२०।

शृण्वन्तु वाक्यमृषयो मदीयं भर्तृसन्निधौ।
यदिदं वच्म्यहं तुष्टा वरदानाय चोद्यता।२२१।

ब्रह्माणं पूजयिष्यंति नरा भक्तिसमन्विताः।
तेषां वस्त्रं धनंधान्यं दाराःसौख्यं धनानि च।२२२।

अविच्छिन्नं तथा सौख्यं गृहे वै पुत्रपौत्रकम्।
भुक्त्वासौ सुचिरं कालमंते मोक्षं गमिष्यति।२२३।

      "पुलस्त्य उवाच।
ब्रह्माणं च प्रतिष्ठाप्य सर्वयत्नैर्विधानतः।
यत्पुण्यफलमाप्नोति तदेकाग्रमनाः शृणु।२२४।

सर्वयज्ञ तपो दान तीर्थ वेदेषु यत्फलम्।
तत्फलं कोटिगुणितं लभेतैतत्प्रतिष्ठया।२२५।

पौर्णमास्युपवासं तु कृत्वा भक्त्या नराधिप।
अनेन विधिना यस्तु विरिञ्चिं पूजयेन्नरः।२२६।

प्रतिपदि महाबाहो स याति ब्रह्मणः पदम्।
विरिञ्चिं वासुदेवं तु ऋत्विग्भिश्च विशेषतः।२२७।

कार्तिके मासि देवस्य रथयात्रा प्रकीर्तिता।
यांकृत्वावामानवाभक्त्यासंयान्तिब्रह्मलोकताम्।२२८।

कार्तिके मासि राजेंद्र पौर्णमास्यां चतुर्मुखम्।
मार्गेण ब्रह्मणा सार्द्धं सावित्र्या च परंतप।२२९।

भ्रामयेन्नगरं सर्वं नानावाद्यसमन्वितः।
स्नपयेद्भ्रमयित्वा तु सलोकं नगरं नृप।२३०।

ब्राह्मणान्भोजयित्वाग्रे शाण्डिलेयं प्रपूज्य च।
आरोपयेद्रथे देवं पुण्यवादित्रनिःस्वनैः।२३१।

रथाग्रे शाण्डिलीपुत्रं पूजयित्वा विधानतः।
ब्राह्मणान्वाचयित्वातु कृत्वा पुण्याहमङ्गलम्।२३२।

देवमारोपयित्वा च रथे कुर्यात्प्रजागरं।
नानाविधैः प्रेक्षणिकैर्ब्रह्मघौषैश्च पुष्कलैः।२३३।

कृत्वा प्रजागरं देवं प्रभाते ब्राह्मणान्नृप।
भोजयित्वा यथाशक्ति भक्ष्यभोज्यैरनेकशः।२३४।

पूजयित्वा जनं धीर मंत्रेण विधिवन्नृप।
आज्येन तु महाबाहो पयसा पायसेन च।२३५।

ब्राह्मणान्वाचयित्वा तु स्वस्त्या तु विधिवन्नृप।
कृत्वा पुण्याहशब्दं च तद्रथं भ्रामयेत्पुरे।२३६।

विप्रैश्चतुर्वेदविद्भिर्भ्रामयेद्ब्रह्मणो रथम्।
बह्वृवृचाथर्वणैर्वीरछन्दोगाध्वर्युभिस्तथा।२३७।

भ्रामयेद्देवदेवस्य सुरश्रेष्ठस्य तं रथं।
प्रदक्षिणं पुरं सर्वं मार्गेण सुसमेन तु।२३८।

न वोढव्यो रथो वीर रूद्रेण हितमिच्छता।
न चारोहेद्रथं प्राज्ञो मुक्त्वैकं भोजकं नृपः।२३९।

ब्रह्मणो दक्षिणे पार्श्वे गायत्रीं स्थापयेन्नृप।
भोजकं वामपार्श्वे तुपुरतःपंङ्कजं न्येसेत्।२४०।

एवं तूर्यनिनादैस्तु शङ्ख शब्दैश्च पुष्कलैः।
भ्रामयित्वा रथं वीर पुरं सर्वं प्रदक्षिणम्।२४१।

स्वस्थाने स्थापयेद्देवं दत्वा नीराजनं बुधः।
यएवं कुरुते यात्रां यो वा भक्त्यापिपश्यति।२४२।

रथं वा कर्षयेद्यस्तु स गच्छेद्ब्रह्मणः पदं।

  • कार्तिके मास्यमावास्यां यश्च दीपप्रदीपनं।२४३।


शालायां ब्रह्मणः कुर्यात्स गच्छेत्परमं पदम्।
गन्धपुष्पैर्नवैर्वस्त्रैरात्मानं पूजयेत्तु यः।२४४।

तस्यां प्रतिपदायां तु स गच्छेद्ब्रह्मणः पदम्।
महापुण्यातिथिरियं *-बलिराज्यप्रवर्तिनी।२४५।

ब्रह्मणः सुप्रिया नित्यं बालेयी परिकीर्तिता।
ब्रह्माणं पूजयेद्योऽस्यामात्मानं च विशेषतः।२४६।

स याति परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः।
चैत्रे मासि महाबाहो पुण्या प्रतिपदां वरा।२४७।

तस्यां यः श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानं कुर्यान्नरोत्तमः।
न तस्य दुरितं किंचिन्नाधयो व्याधयो नृप।२४८।

भवन्ति कुरुशार्दूल तस्मात्स्नानं समाचरेत्।
दिव्यं नीराजनंतद्धि सर्वरोगविनाशनं।२४९।

गोमहिष्यादि यत्किंचित्तत्सर्वं कर्षयेन्नृप।
तेन वस्त्रादिभिः सर्वैस्तोरणंबाह्यतो न्यसेत्।२५०।1.17.250।


ब्राह्मणानां तथा भोज्यं कुर्यात्कुरुकुलोद्वह।
तिस्रो ह्येताः पुरा प्रोक्तास्तिथयः कुरुनन्दन।२५१।

कार्तिकाश्वयुजे मासि चैत्रेमासि तथा नृप।
स्नानं दानं शतगुणं कार्त्तिके या तिथिर्नृप।२५२।

बलिराज्ञस्तु शुभदा पशूनां हितकारिणी।
         "गायत्र्युवाच।
यदुक्तं तु तया वाक्यं सावित्र्या कमलोद्भवं।२५३।

न तु ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यन्ति कदाचन।
मदीयं तु वचःश्रुत्वा ये करिष्यन्ति चार्चनं।२५४।

इह भुक्त्वा तु भोगांस्ते परत्र मोक्षभागिनः।
एतां ज्ञात्वा परां दृष्टिं वरं तुष्टः प्रयच्छति।२५५।

शक्राहं ते वरं दास्ये संग्रामे शत्रुनिग्रहे।
तदा ब्रह्मा मोचयिता गत्वा शत्रुनिकेतनम्।२५६।

स्वपुरं लप्स्यसे नष्टं शत्रुनाशात्परां मुदं।
अकंटकं महद्राज्यं त्रैलोक्ये ते भविष्यति।२५७।

मर्त्यलोके यदा विष्णो अवतारं करिष्यसि।
भ्रात्रा सह परं दुःखं स्वभार्याहरणादिजं।२५८।

हत्वा शत्रुं पुनर्भार्यां लप्स्यसे सुरसन्निधौ।
गृहीत्वातां पुनाराज्यं कृत्वा स्वर्गंगमिष्यसि।२५९।

एकादशसहस्राणि वर्षाणां च पुनर्दिवं।
ख्यातिस्ते विपुला लोके अनुरागं जनैस्सह।२६०।

सान्तानिकानाम तेषां लोका स्थास्यन्ति भाविताः।
त्वया ते तारिता देव रामरूपेण मानवाः।२६१।

गायत्री तु तदा रुद्रंवरदा प्रत्यभाषत।
पतितेपिच ते लिंगे पूजां कुर्वंति ये नराः।२६२।

ते पूताः पुण्यकर्माणः स्वर्गलोकस्य भागिनः।
न तां गतिं चाग्निहोत्रे न क्रतौ हुतपावके।२६३।

यां गतिं मनुजा यांति तव लिंगस्य पूजनात्।
गंगातीरे सदा लिंगं बिल्बपत्रेण ये तव।२६४।

पूजयिष्यंति सुप्राता रुद्रलोकस्य भागिनः।
प्राप्यापि शर्वभक्तत्वमग्ने त्वं भव पावनः।२६५।

त्वयि प्रीते सुराः सर्वे प्रीता वै नात्र संशयः।
त्वन्मुखेन हविर्देवैः प्रीताः प्रीते त्वयिध्रुवम्।२६६।

भुञ्जते नात्र सन्देहो वेदोक्तं वचनं यथा।
गायत्री ब्राह्मणांस्तांश्च सर्वांश्चैवाब्रवीदिदं।२६७।

युष्माकं प्रीणनं कृत्वा सर्वतीर्थेषु मानवाः।
पदं सर्वे गमिष्यंति वैराजाख्यं न संशयः।२६८।

अन्नप्रकारान्विविधान्दत्वा दानान्यनेकशः।
श्राद्धेषु प्रीणनं कृत्वा देवदेवा भवन्ति ते।२६९।

ये च वै ब्राह्मणश्रेष्ठास्तेषामास्ये दिवौकसः।
भुञ्जते च हविः क्षिप्रं कव्यं चैवपितामहाः।२७०।

यूयं हि धारणे शक्तास्त्रैलोक्यस्य न संशयः।
प्राणायामेन चैकेन सर्वे पूता भविष्यथ।२७१।

विशेषात्पुष्करे स्नात्वा मां जप्त्वा वेदमातरं।
प्रतिग्रहकृतान्दोषान्न प्राप्स्यथ द्विजोतमाः।२७२।

पुष्करे चान्नदानेन प्रीताः स्युः सर्वदेवताः।
एकस्मिन्भोजिते विप्रेकोट्याः फलमवाप्स्यते।२७३।

ब्रह्महत्यादिपापानि दुष्कृतानि कृतानि च।
करिष्यंति नरास्सर्वे दत्वा युष्मत्करे धनम्।२७४।

मदीयेन तु जाप्येन पूजनीयस्त्रिभिः कृतैः।
ब्रह्महत्यासमं पापं तत्क्षणादेव नश्यति।२७५।

दशभिर्जन्मभिर्जातं शतेन च पुरा कृतं।
त्रियुगेन सहस्रेण गायत्री हन्ति किल्बिषं।२७६।

एवं ज्ञात्वा सदा पूता जाप्ये तु मम वै कृते।
भविष्यध्वं न संदेहो नात्र कार्या विचारणा।२७७।

प्रणवेन त्रिमात्रेण सार्द्धंजप्त्वा विशेषतः।
पूताः सर्वे न संदेहो जप्त्वामां शिरसा सह।२७८।

अष्टाक्षरा स्थिता चाहं जगद्व्याप्तं मया त्त्विदं।
माताहं सर्ववेदानां पदैः सर्वेरलंकृता।२७९।

जप्त्वा मां भक्तितः सिद्धिं यास्यंति द्विजसत्तमाः।
प्राधान्यं मम जाप्येन सर्वेषां वो भविष्यति।२८०।

गायत्रीसारमात्रोपि वरं विप्रः सुसंयतः।
नायंत्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी।२८१।

यस्माद्विप्रेषु सावित्र्या शापो दत्तःसदस्यथ।
अत्र दत्तं हुतं चापि सर्वमक्षयकारकम्।२८२।

दत्तो वरो मया तेन युष्माकं द्विजसत्तमाः।
अग्निहोत्रपरा विप्रास्त्रिकालं होमदायिनः।२८३।

स्वर्गं ते तु गमिष्यंति सैकविंशतिभिः कुलैः।
एवं शक्रस्य विष्णोश्च रुद्रस्य पावकस्य च।२८४।

ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च गायत्रीवरमुत्तमम्।
तस्मिन्वै पुष्करे दत्त्वा ब्रह्मणःपार्श्वगाऽभवत्।२८५।

चारणैस्तु तदाऽऽख्यातं लक्ष्म्या वै शापकारणम्।
युवतीनाञ्च सर्वासां शापाञ्ज्ञात्वापृथक्पृथक्।२८६।

लक्ष्म्याश्चैव वरं प्रादाद्गायत्री ब्रह्मणः प्रिया।
अकुत्सितान्सदा सर्वान्कुर्वन्ती धनशोभना।२८७।

शोभिष्यसे न संदेहः सर्वेभ्यः प्रीतिदायिनी।
ये त्वया वीक्षिताःपुत्रि सर्वेते पुण्यभोजनाः।२८८।

परित्यक्तास्त्वया ये तु सर्वे ते दुःखभागिनः।
तेषां जातिः कुलं शीलं धर्मश्चैव वरानने।२८९।

सभायां ते च शोभंते दृश्यंते चैव पार्थिवैः।
अर्थित्वं चैव तेषां तु करिष्यंति द्विजोत्तमाः।२९०।

सौजन्यं तेषु कुर्वंति त्वं नो भ्राता पिता गुरुः।
बांधवोपि न संदेहो न जीवेयं त्वया विना।२९१।

त्वयि दृष्टे प्रसन्ना मे दृष्टिर्भवति शोभना।
मनः प्रसीदतेत्यर्थं सत्यं सत्यं वदामि ते।२९२।

एवंविधानि वाक्यानि त्वद्दृष्ट्या ये निरीक्षिताः।
सज्जनास्ते तु श्रोष्यंति जनानां प्रीतिदायकाः।२९३।

इन्द्रत्वं नहुषः प्राप्य दृष्ट्वा त्वां याचयिष्यति।
त्वद्दृष्ट्या तु हतःपापो ह्यगस्त्यवचनाद्ध्रुवम्।२९४।

सर्पत्वं समनुप्राप्य प्रार्थयिष्यति तं तु सः।
दर्पेणाहं विनष्टोस्मि शरणं मे मुने भव।२९५।

वाक्येन तेन तस्यासौ नृपस्य भगवानृषिः।
कृत्वा मनसि कारुण्यमिदं वाक्यं वदिष्यति।२९६।

उत्पत्स्यते कुले राजा त्वदीये कुलनन्दनः।
सर्परूपधरं दृष्ट्वा स ते शापं हि भेत्स्यति।२९७।

तदा त्वं सर्पतां त्यक्त्वा पुनः स्वर्गं गमिष्यसि।
अश्वमेधकृतेन त्वं भर्त्रा सह पुनर्दिवम्।२९८।

प्राप्स्यसे वरदानेन मदीयेन सुलोचने।
      "पुलस्त्य उवाच।
देवपत्न्यस्तदा सर्वास्तुष्टया परिभाषिताः।२९९।

अपत्यैरपि हीनानां नैव दुःखं भविष्यति।
गौरी चैव तु गायत्र्या तदा सापि विबोधिता।३००। 1.17.300।

बृंहिता परितोषेण वरान्दत्त्वा मनस्विनी।
समाप्तिंतस्य यज्ञस्य काञ्क्षन्तीब्रह्मणःप्रिया।३०१।

वरदां तां तथा दृष्ट्वा गायत्रीं वेदमातरम्।
प्रणिपत्य तदा रुद्रः स्तुतिमेतां चकार ह।३०२।

        "रुद्र उवाच।
नमोस्तु ते वेदमातरष्टाक्षरविशोधिते।
गायत्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा।३०३।

सर्वाणि स्तुतिशास्त्राणि गाथाश्च निखिलास्तथा।
अक्षराणि च सर्वाणि लक्षणानि तथैव च।३०४।

भाष्यादि सर्वशास्त्राणि ये चान्ये नियमास्तथा।
अक्षराणि च सर्वाणि त्वं तु देवि नमोस्तुते।३०५।

श्वेता त्वं श्वेतरूपासि शशांकेन समानना।
बिभ्रती विपुलौ बाहू कदलीगर्भकोमलौ।३०६।

एणश्रृँगं करे गृह्य पंकजं च सुनिर्मलम्।
वसाना वसने क्षौमे रक्तेनोत्तरवाससा।३०७।

शशिरश्मिप्रकाशेन हारेणोरसि राजिता।
दिव्यकुंडलपूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां सुविभूषिता।३०८।

चंद्रसापत्न्यभूतेन मुखेन त्वं विराजसे।
मकुटेनातिशुद्धेन केशबंधेन शोभिता।३०९।

भुजंगाभोगसदृशौ भुजौ ते भूषणन्दिवः।
स्तनौ ते रुचिरौ देवि वर्तुलौ समचूचुकौ।३१०।

जघनेनातिशुभ्रेण त्रिवलीभंगदर्पिता।
सुमध्यवर्त्तिनी नाभिर्गंभीरा शुभदर्शिनी।३११।

विस्तीर्णजघना देवी सुश्रोणी च वरानने।
सुजातवृत्तोरुयुगा सुजानु चरणा तथा।३१२।

त्रैलोक्यधारिणी सा त्वं भुवि सत्योपयाचना।
भविष्यसि महाभागे वरदा वरवर्णिनी।३१३।

पुष्करे च कृता यात्रा दृष्ट्वा त्वां संभविष्यति।
ज्येष्ठे मासेपौर्णमास्यामग्र्यांपूजां च लप्स्यसे।३१४।

ये च वा त्वत्प्रभावज्ञाः पूजयिष्यंति मानवाः।
न तेषां दुर्लभं किंचित्पुत्रतो धनतोपि वा।३१५।

कान्तारेषु निमग्नानामटव्यां वा महार्णवे।
दस्युभिर्वानिरुद्धानां त्वं गतिः परमा नृणाम्।३१६।

त्वं सिद्धिःश्रीर्धृतिः कीर्तिर्ह्रीर्विद्या सन्नतिर्मतिः।
संध्या रात्रिःप्रभा निद्रा कालरात्रिस्त्वमेव च।३१७।

अंबा च कमला मातुर्ब्रह्माणी ब्रह्मचारिणी।
जननी सर्वदेवानां गायत्री परमांगना।३१८।

जया च विजया चैव पुष्टिस्त्वं च क्षमा दया।
सावित्र्यवरजा चासि सदा चेष्टा पितामहे।३१९।

बहुरूपा विश्वरूपा सुनेत्रा ब्रह्मचारिणी।
सुरूपा त्वं विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी।३२०।

नगरेषु च पुण्येषु आश्रमेषु वरानने।
वासस्तव महादेवि वनेषूपवनेषु च।३२१।

ब्रह्मस्थानेषु सर्वेषु ब्रह्मणो वामतः स्थिता।
दक्षिणेन तु सावित्री मध्ये ब्रह्मा पितामहः।३२२।

अंतर्वेदी च यज्ञानामृत्विजां चापि दक्षिणा।
सिद्धिस्त्वंहि नृपाणांच वेला सागरजा मता।३२३।

ब्रह्मचारिणि या दीक्षा शोभा च परमा मता।
ज्योतिषांच प्रभा देवीलक्ष्मीर्नारायणे स्थिता।३२४।

क्षमा सिद्धिर्मुनीनां च नक्षत्राणां च रोहिणी।
राजद्वारेषु तीर्थेषु नदीनां संगमेषु च।३२५।

पूर्णिमा पूर्णचंद्रे च बुद्धिर्नीत्यां क्षमा धृतिः।
उमादेवी च नारीणां श्रूयसे वरवर्णिनी।३२६।

इन्द्रस्य चारुदृष्टिस्त्वं सहस्रनयनोपगा।
ॠषीणां धर्मबुद्धिस्त्वं देवानां च परायणा ।३२७।

कर्षकाणां च सीता त्वं भूतानां धरणी तथा।
स्त्रीणामवैधव्यकरी धनधान्यप्रदा सदा।३२८।

व्याधिं मृत्युं भयं चैव पूजिता शमयिष्यसि।
तथा तु कार्तिके मासि पौर्णमास्यांसुपूजिता।३२९।

सर्वकामप्रदा देवी भविष्यसि शुभप्रदे।
यश्चेदं पठते स्तोत्रं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः।३३०।

सर्वार्थसिद्धिं लभते नरो नास्त्यत्र संशयः।
                "गायत्र्युवाच।
भविष्यत्येवमेवं तु यत्त्वया पुत्र भाषितम्।३३१।
विष्णुना सहितः सर्वस्थानेष्वेव भविष्यसि।

इति श्रीपाद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे सावित्री विवादगायत्री वरप्रदानं नाम सप्तदशोऽध्यायः।१७।

अंतिम बार २ वर्ष पहले योगेश कुमार "रोहि" द्वारा संपादित किया गया

  • यह श्लोक पद्म पुराण (सृष्टि खंड) से लिए गए हैं। इसमें भीष्म पितामह और महर्षि पुलस्त्य के बीच पुष्कर यज्ञ और माता गायत्री (जो एक आभीर कन्या थीं) के विवाह के प्रसंग पर चर्चा हो रही है
    यहाँ इसका हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक संदर्भ दिया गया है:
    हिंदी अनुवाद
    भीष्म ने कहा:
    हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ! उस यज्ञ में तब क्या आश्चर्य हुआ था? वहां सुरोत्तम भगवान विष्णु और रुद्र (शिव) किस प्रकार स्थित थे? (1)
    वहां पत्नी के रूप में स्थित उस आभीर पुत्री गायत्री ने क्या किया? और उन सदाचारी आभीरों ने यह जानकर क्या किया? (2)
    हे मुने! आभीरों और ब्राह्मणों के बीच जो भी हुआ, वह सब मुझे विस्तार से बताएं क्योंकि मुझे इसमें बहुत कौतुक (जिज्ञासा) है। (3)
    पुलस्त्य ने कहा:
    हे राजन! उस यज्ञ में जो भी आश्चर्यजनक घटना हुई, वह सब मैं आपको बताता हूँ, आप एकाग्र मन से सुनें। (4)
    उस सभा में रुद्र ने एक महान आश्चर्य किया। वे महादेव ब्राह्मणों के समीप एक निंदनीय (अजीब/भयंकर) रूप धारण करके आए। (5)
    वहां विष्णु मुख्य रूप से स्थित थे, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया। लेकिन जब गोप बालकों को पता चला कि गोप-कन्या (गायत्री) वहां नहीं है (खो गई है), (6)
    तब वे सभी गोप और गोपियाँ ब्रह्मा जी के पास आए। उन्होंने वहां यज्ञ की सीमा में मेखला (मूंज की रस्सी) से बंधी हुई उस कन्या को देखा। (7)
    तब माता चिल्लाई "हा पुत्री!", पिता बोले "हा पुत्रिके!", भाई-बंधुओं ने "हा बहन!" और सखियों ने "हा सखि!" कहकर विलाप किया। (8)
    (वे बोले) "हे सुंदरी! तुझे यहाँ कौन लाया? तेरे पैरों का आलता (महावर) कहाँ गया? किसने तेरी साड़ी हटाकर तुझे यह कम्बली (दीक्षा का वस्त्र) पहना दी? (9)
    पुत्री! तेरे बालों की जटा किसने बनाई और यह लाल धागा (मौली) किसने बांधा?" उनके ऐसे वचनों को सुनकर स्वयं श्रीहरि (विष्णु) ने कहा: (10)
    "हम ही इसे यहाँ लाए हैं और पत्नी के रूप में नियुक्त किया है। ब्रह्मा जी ने स्वयं इस बाला को स्वीकार किया है, अतः तुम प्रलाप (रोना-धोना) मत करो। (11)
    यह कन्या अत्यंत पुण्यात्मा और सौभाग्यवती है, यह आप सभी के कुल को आनंदित करने वाली है। यदि यह पुण्यात्मा न होती, तो इस (यज्ञ) सभा में कैसे आती? (12)
    हे महाभाग! ऐसा जानकर आपको शोक नहीं करना चाहिए। आपकी यह कन्या अब साक्षात ब्रह्मा जी को प्राप्त हो गई है। (13)
    जो योगयुक्त योगी और वेद पारंगत ब्राह्मण तपस्या करके भी जिस गति को नहीं पा पाते, वह गति तुम्हारी पुत्री को मिल गई है। (14)
    आपको धर्मवान, सदाचारी और धर्मवत्सल जानकर ही मैंने (विष्णु ने) यह कन्या ब्रह्मा जी को प्रदान की है। (15)
    इस आभीर कन्या के कारण आप तर गए हैं, अब आप महान दिव्य लोकों को जाएँ। देवकार्यों की सिद्धि के लिए ही इसने आपके कुल में जन्म लिया था।" (16)

    व्याकरण विशेष (संस्कृत व्याकरण)
    1. संधि विच्छेद:
      • विष्णुश्चापि: विष्णुः + च + अपि (विसर्ग और व्यंजन संधि)।
      • ब्रह्मणोन्तिकम्: ब्रह्मणः + अन्तिकम् (उत्व विसर्ग संधि)।
      • कथमागच्छते: कथम् + आगच्छते (संयोग)।
      • पत्न्यर्थम्: पत्नी + अर्थम् (यण् संधि - ई + अ = य)।
    2. कारक और विभक्ति:
      • तस्मिन्यज्ञे: 'तस्मिन्' और 'यज्ञे' दोनों में सप्तमी विभक्ति (एकवचन) है (अधिकरण कारक - 'में' के अर्थ में)।
      • आभीरैः: 'आभीर' शब्द में तृतीय विभक्ति (बहुवचन) है (करण कारक - 'आभीरों के द्वारा')।
      • पुत्र्या: 'पुत्री' शब्द में तृतीय विभक्ति है।
      • कुलनन्दिनी: यह उपपद तत्पुरुष समास है (कुलं नन्दयति इति)।
    3. क्रिया रूप (Dhatu Roop):
      • समाचक्ष्व: 'चक्ष्' धातु, लोट् लकार (आज्ञा/प्रार्थना), मध्यम पुरुष, एकवचन।
      • शृणुस्व: 'श्रु' धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष, एकवचन।
      • लभन्ते: 'लभ्' धातु, लट् लकार (वर्तमान), आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
    4. विशेषण-विशेष्य:
      • निन्द्यरूपधरो देवस्तत्रायाद्: यहाँ 'देवः' (विशेष्य) के लिए 'निन्द्यरूपधरः' विशेषण का प्रयोग हुआ है।
      • दिव्यान्लोकान्: 'लोकान्' (द्वितीय बहुवचन) का विशेषण 'दिव्यान्' है।

यह श्लोक पद्म पुराण (सृष्टि खंड) से लिए गए हैं। इसमें भीष्म पितामह और महर्षि पुलस्त्य के बीच पुष्कर यज्ञ और माता गायत्री (जो एक आभीर कन्या थीं) के विवाह के प्रसंग पर चर्चा हो रही है
यहाँ इसका हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक संदर्भ दिया गया है:
हिंदी अनुवाद
भीष्म ने कहा:
हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ! उस यज्ञ में तब क्या आश्चर्य हुआ था? वहां सुरोत्तम भगवान विष्णु और रुद्र (शिव) किस प्रकार स्थित थे? (1)
वहां पत्नी के रूप में स्थित उस आभीर पुत्री गायत्री ने क्या किया? और उन सदाचारी आभीरों ने यह जानकर क्या किया? (2)
हे मुने! आभीरों और ब्राह्मणों के बीच जो भी हुआ, वह सब मुझे विस्तार से बताएं क्योंकि मुझे इसमें बहुत कौतुक (जिज्ञासा) है। (3)
पुलस्त्य ने कहा:
हे राजन! उस यज्ञ में जो भी आश्चर्यजनक घटना हुई, वह सब मैं आपको बताता हूँ, आप एकाग्र मन से सुनें। (4)
उस सभा में रुद्र ने एक महान आश्चर्य किया। वे महादेव ब्राह्मणों के समीप एक निंदनीय (अजीब/भयंकर) रूप धारण करके आए। (5)
वहां विष्णु मुख्य रूप से स्थित थे, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया। लेकिन जब गोप बालकों को पता चला कि गोप-कन्या (गायत्री) वहां नहीं है (खो गई है), (6)
तब वे सभी गोप और गोपियाँ ब्रह्मा जी के पास आए। उन्होंने वहां यज्ञ की सीमा में मेखला (मूंज की रस्सी) से बंधी हुई उस कन्या को देखा। (7)
तब माता चिल्लाई "हा पुत्री!", पिता बोले "हा पुत्रिके!", भाई-बंधुओं ने "हा बहन!" और सखियों ने "हा सखि!" कहकर विलाप किया। (8)
(वे बोले) "हे सुंदरी! तुझे यहाँ कौन लाया? तेरे पैरों का आलता (महावर) कहाँ गया? किसने तेरी साड़ी हटाकर तुझे यह कम्बली (दीक्षा का वस्त्र) पहना दी? (9)
पुत्री! तेरे बालों की जटा किसने बनाई और यह लाल धागा (मौली) किसने बांधा?" उनके ऐसे वचनों को सुनकर स्वयं श्रीहरि (विष्णु) ने कहा: (10)
"हम ही इसे यहाँ लाए हैं और पत्नी के रूप में नियुक्त किया है। ब्रह्मा जी ने स्वयं इस बाला को स्वीकार किया है, अतः तुम प्रलाप (रोना-धोना) मत करो। (11)
यह कन्या अत्यंत पुण्यात्मा और सौभाग्यवती है, यह आप सभी के कुल को आनंदित करने वाली है। यदि यह पुण्यात्मा न होती, तो इस (यज्ञ) सभा में कैसे आती? (12)
हे महाभाग! ऐसा जानकर आपको शोक नहीं करना चाहिए। आपकी यह कन्या अब साक्षात ब्रह्मा जी को प्राप्त हो गई है। (13)
जो योगयुक्त योगी और वेद पारंगत ब्राह्मण तपस्या करके भी जिस गति को नहीं पा पाते, वह गति तुम्हारी पुत्री को मिल गई है। (14)
आपको धर्मवान, सदाचारी और धर्मवत्सल जानकर ही मैंने (विष्णु ने) यह कन्या ब्रह्मा जी को प्रदान की है। (15)
इस आभीर कन्या के कारण आप तर गए हैं, अब आप महान दिव्य लोकों को जाएँ। देवकार्यों की सिद्धि के लिए ही इसने आपके कुल में जन्म लिया था।" (16)

व्याकरण विशेष (संस्कृत व्याकरण)
  1. संधि विच्छेद:
    • विष्णुश्चापि: विष्णुः + च + अपि (विसर्ग और व्यंजन संधि)।
    • ब्रह्मणोन्तिकम्: ब्रह्मणः + अन्तिकम् (उत्व विसर्ग संधि)।
    • कथमागच्छते: कथम् + आगच्छते (संयोग)।
    • पत्न्यर्थम्: पत्नी + अर्थम् (यण् संधि - ई + अ = य)।
  2. कारक और विभक्ति:
    • तस्मिन्यज्ञे: 'तस्मिन्' और 'यज्ञे' दोनों में सप्तमी विभक्ति (एकवचन) है (अधिकरण कारक - 'में' के अर्थ में)।
    • आभीरैः: 'आभीर' शब्द में तृतीय विभक्ति (बहुवचन) है (करण कारक - 'आभीरों के द्वारा')।
    • पुत्र्या: 'पुत्री' शब्द में तृतीय विभक्ति है।
    • कुलनन्दिनी: यह उपपद तत्पुरुष समास है (कुलं नन्दयति इति)।
  3. क्रिया रूप (Dhatu Roop):
    • समाचक्ष्व: 'चक्ष्' धातु, लोट् लकार (आज्ञा/प्रार्थना), मध्यम पुरुष, एकवचन।
    • शृणुस्व: 'श्रु' धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष, एकवचन।
    • लभन्ते: 'लभ्' धातु, लट् लकार (वर्तमान), आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
  4. विशेषण-विशेष्य:
    • निन्द्यरूपधरो देवस्तत्रायाद्: यहाँ 'देवः' (विशेष्य) के लिए 'निन्द्यरूपधरः' विशेषण का प्रयोग हुआ है।
    • दिव्यान्लोकान्: 'लोकान्' (द्वितीय बहुवचन) का विशेषण 'दिव्यान्' है।



पद्म पुराण (सृष्टि खंड) के उसी प्रसंग का विस्तार हैं, जहाँ भगवान विष्णु आभीर (गोप) परिवार को सांत्वना दे रहे हैं और भविष्य में अपने कृष्णावतार का संकेत दे रहे हैं
यहाँ इसका हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक व्याख्या दी गई है:
हिंदी अनुवाद
(विष्णु ने कहा): मैं (पृथ्वी पर) अवतार धारण करूँगा और वह मेरी लीला होगी। जब नन्द आदि गोप पृथ्वी तल पर अवतार लेंगे, (17)
तब मैं उनके बीच में रहूँगा और आपकी ये सभी कन्याएँ (गोपियाँ) मेरे साथ निवास करेंगी। (18)
तब (उन कन्याओं के साथ रहने में) न कोई दोष होगा, न द्वेष और न ही ईर्ष्या। तब गोप और अन्य मनुष्य किसी प्रकार का भय नहीं करेंगे। (19)
इस (ब्रह्मा जी के साथ विवाह के) कर्म से भी इसे (गायत्री को) कभी कोई दोष नहीं लगेगा। भगवान विष्णु के ये वचन सुनकर वे (गोप) उन्हें प्रणाम कर वहाँ से चले गए। (20)
(गोप बोले): हे देव! आपने हमें जो यह वर दिया है, वैसा ही हो। हमारे कुल में धर्म की सिद्धि के लिए आपका अवतार अवश्य होना चाहिए। (21)
आपके दर्शन मात्र से ही हम स्वर्गवासी (धन्य) हो गए हैं। यह कल्याणकारी कन्या अपने कुल सहित मेरा उद्धार करने वाली है। (22)
हे देवेश! हे विभो! आपका यह वरदान इसी प्रकार सत्य हो। इस प्रकार स्वयं भगवान विष्णु ने उन गोपों को समझाया। (23)
ब्रह्मा जी ने भी अपने बाएं हाथ के संकेत से 'ऐसा ही हो' (एवमेवम्) कहा। अपने बंधु-बांधवों को देखकर वह श्रेष्ठ वर्ण वाली (गायत्री) लज्जित हो गई। (24)
वह सोचने लगी—"इन्हें किसने बताया कि मैं इस स्थान पर आ गई हूँ?" तब उन सबको देखकर आभीर कन्या गायत्री ने कहा: (25)
अपने बाएं हाथ से उन सबको प्रणाम करते हुए (इशारा किया) और कहा— "हे माता! मैं यहाँ ब्रह्मा जी की शरण में आ गई हूँ। (26)
मैंने सम्पूर्ण जगत के स्वामी साक्षात् देव को पति के रूप में प्राप्त किया है। अतः अब न माता को, न पिता को और न ही भाई-बंधुओं को मेरे लिए शोक करना चाहिए। (27)
मेरी सखियाँ, बहनें और बालक अब घर जाएँ। सबको मेरी ओर से कुशलता कहना, मैं यहाँ देवताओं के साथ स्थित हूँ।" (28)
उन सबके चले जाने पर, वह सुंदर कटि वाली सती गायत्री ब्रह्मा जी के साथ यज्ञशाला में सुशोभित हुई। (29)
तब ब्राह्मणों ने ब्रह्मा जी से अपनी इच्छानुसार वर मांगे और ब्रह्मा जी ने उन्हें उनके मनचाहे वर प्रदान किए। (30)
देवी गायत्री ने भी उन वरों का अनुमोदन किया (सहमति दी)। वह साध्वी यज्ञ में देवताओं के समीप स्थित रहीं। (31)
वह यज्ञ पूरे सौ दिव्य वर्षों तक चलता रहा। तभी (उस यज्ञ की दीक्षा के समय) जटाधारी महादेव (कपर्दी) भिक्षा के लिए वहां उपस्थित हुए। (32)

व्याकरण विशेष (संस्कृत व्याकरण)
  1. सन्धि:
    • करिष्येहम्: करिष्ये + अहम् (पूर्वरूप संधि)।
    • कुलेस्माकम्: कुले + अस्माकम् (पूर्वरूप संधि)।
    • त्रपान्विता: त्रपा + अन्विता (दीर्घ संधि)।
    • वरान्न: वरान् + न (अनुनासिक संधि)।
  2. लकार और धातु (Verb Forms):
    • करिष्यन्ति / करिष्ये: 'कृ' धातु, लृट लकार (भविष्य काल)। (विष्णु के भविष्य के अवतार की सूचना)।
    • वसिष्यन्ति: 'वस्' धातु, लृट लकार (रहेंगे/निवास करेंगे)।
    • ययुः: 'या' धातु, लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल) - 'वे चले गए'।
    • ववृधे: 'वृध्' धातु, लिट् लकार (बढ़ा या चला)।
  3. समास:
    • जगत्पतिः: जगतः पतिः (षष्ठी तत्पुरुष) - जगत का स्वामी।
    • वरवर्णिनी: वरः वर्णः अस्याः अस्ति इति (बहुव्रीहि) - श्रेष्ठ रंग/रूप वाली।
    • यज्ञवाटम्: यज्ञस्य वाटम् (षष्ठी तत्पुरुष) - यज्ञशाला।
    • प्राणिपातपुरःसरम्: प्रणिपात पूर्वक (अव्ययीभाव)।
  4. प्रत्यय:
    • श्रुत्वा: 'श्रु' + क्त्वा (सुनकर)।
    • प्रणिपत्य: प्र + निम् + ल्यप् (प्रणाम करके)।
    • याचितः: 'याच्' + क्त (मांगा गया)।
    • ईप्सितान्: 'आप्' धातु का सन्नन्त रूप + क्त प्रत्यय (इच्छित)।
  5. शब्द रूप और विभक्ति:
    • वामहस्तेन: तृतीय विभक्ति (करण कारक - 'बाएं हाथ के द्वारा')।
    • दैवतैः सह: 'सह' के योग में 'दैवत' शब्द में तृतीया विभक्ति हुई है।
    • बन्धूनाम्: षष्ठी विभक्ति, बहुवचन (भाई-बंधुओं का)।
इस प्रसंग में भविष्य के कृष्ण अवतार और गोपियों के आध्यात्मिक रहस्य (कि वे पूर्व जन्म में कौन थीं) का बीज छिपा हुआ है। क्या आप इस कथा के अगले भाग (शिव जी का भिक्षुक रूप में आगमन) के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं?

यह श्लोक पद्म पुराण (सृष्टि खण्ड, अध्याय 17) से लिए गए हैं, जहाँ भगवान शिव (कपर्दी) की लीला और उनके प्रभाव का वर्णन है। यहाँ इनका व्याकरण के साथ सरल हिन्दी अनुवाद दिया गया है:
हिन्दी अनुवाद
श्लोक 33-34: (शिवजी) एक बड़ा कपाल (भिक्षापात्र/खोपड़ी) लिए हुए थे और पाँच मुण्डों (मुण्डमाला) से अलंकृत थे। उन्हें देखकर ऋत्विज और सदस्य दूर ही खड़े हो गए क्योंकि वे (शिवजी) घृणित (अशुद्ध) प्रतीत हो रहे थे। वेदवादियों द्वारा निन्दित किए जाने पर भी और उन ब्राह्मणों द्वारा बार-बार निकाले जाने पर भी, आप (शिव) यहाँ कैसे आए?
श्लोक 35-36: उन सभी ब्राह्मणों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर महेश्वर (शिव) ने मन्द मुस्कान के साथ कहा— "हे ब्राह्मण श्रेष्ठों! ब्रह्माजी के इस यज्ञ में, जो सबको संतोष देने वाला है, क्या कोई यहाँ से बाहर निकाला जा सकता है?" तब उन ब्राह्मणों ने कपर्दी (शिव) से कहा— "अच्छा, तुम यहाँ भोजन करके चले जाओ।"
श्लोक 37-38: शिवजी ने उनसे कहा— "हे ब्राह्मणों! मैं भोजन करके ही जाऊँगा।" ऐसा कहकर वे बैठ गए और अपना कपाल (पात्र) सामने रख दिया। ईश्वर (शिव) ने उनके कर्म को देखते हुए एक कौतुक (लीला) की। वे भूमि पर कपाल छोड़कर उन ब्राह्मणों की ओर देखने लगे।
श्लोक 39-40: शिवजी ने कहा— "हे ब्राह्मण श्रेष्ठों! मैं स्नान के लिए पुष्कर जा रहा हूँ।" ब्राह्मणों ने कहा— "शीघ्र जाओ।" तब परमेश्वर वहाँ से चले गए। वे आकाश में स्थित होकर कौतुकवश देवताओं को मोहित करने लगे। जब शिवजी स्नान के लिए पुष्कर चले गए, तब ब्राह्मणों में चर्चा हुई:
श्लोक 41-42: (ब्राह्मण बोले) "इस सभा में कपाल (खोपड़ी) के रहते होम कैसे किया जा सकता है? ब्रह्माजी ने पहले ही कहा है कि कपाल का स्पर्श अशुद्धता का अंत (चरम अशुद्धता) है।" तब सभा के एक ब्राह्मण ने कहा— "मैं इस कपाल को उठाकर बाहर फेंक देता हूँ।" उस सदस्य ने अपने हाथ से उसे उठाकर स्वयं फेंका।
श्लोक 43-44: जैसे ही वह फेंका गया, वहाँ तुरंत दूसरा कपाल प्रकट हो गया। फिर उसे उठाया गया, तो तीसरा... इस प्रकार बीस, तीस, पचास, सौ, हजार और दस हजार कपाल प्रकट हो गए। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कपालों का कोई अंत नहीं मिला।
श्लोक 45: अंत में हारकर वे ब्राह्मण देवों के देव कपर्दी (शिव) की शरण में गए। वे पुष्कर अरण्य (वन) में पहुँचकर वैदिक जप और स्तुतियों द्वारा भगवान शिव को नमन करने लगे।

व्याकरणिक विशेषण (Grammatical Highlights)
  1. संगृह्य (श्लोक 33): सम् + ग्रह् + ल्यप् प्रत्यय। (इकट्ठा करके या लेकर)।
  2. अलंकृतः (श्लोक 33): अलम् + कृ + क्त प्रत्यय। (सुशोभित)।
  3. सम्प्राप्तो (श्लोक 34): सम् + प्र + आप् + क्त प्रत्यय। (पहुँचे हुए)।
  4. प्रोत्सार्यमाणोपि (श्लोक 34): प्र + उत् + सृ + णिच् + शानच्। (निकाले जाते हुए भी)।
  5. स्मितं कृत्वा (श्लोक 35): 'कृ' धातु + क्त्वा प्रत्यय। (मुस्कुराकर)।
  6. भुक्त्वा (श्लोक 36): 'भुज्' धातु + क्त्वा प्रत्यय। (भोजन करके)।
  7. न्यस्य (श्लोक 37): नि + अस् + ल्यप् प्रत्यय। (रखकर)।
  8. मोहयित्वा (श्लोक 40): 'मुह्' + णिच् + क्त्वा प्रत्यय। (मोहित करके)।
  9. उत्क्षिपाम्यहम् (श्लोक 42): उत् + क्षिप् + लट् लकार (उत्तम पुरुष, एकवचन) + अहम्। (मैं फेंकता हूँ)।
  10. नत्वा (श्लोक 45): 'नम्' धातु + क्त्वा प्रत्यय। (नमस्कार करके)।
पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय 17) के इन श्लोकों में भगवान शिव और ब्राह्मणों के बीच संवाद तथा यज्ञ की महत्ता का वर्णन है। यहाँ इनका प्रवाहपूर्ण हिन्दी अनुवाद और प्रमुख व्याकरणिक विश्लेषण दिया गया है:
हिन्दी अनुवाद
(श्लोक 46-48): उन सभी (ब्राह्मणों) ने मिलकर स्तुति की, तब भगवान हर (शिव) स्वयं प्रसन्न हो गए। शिवजी ने भक्ति के कारण उन द्विजों को दर्शन दिए। तब भक्ति से झुके हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से देव ने कहा— "पुरोडाश (यज्ञ की आहुति) की सिद्धि 'कपाल' (पात्र) के बिना नहीं हो सकती। हे विप्रों! मेरी बात मानो, 'स्विष्टकृत' (यज्ञ का एक विशेष भाग) मेरा अंश है। ऐसा करने पर मेरा शासन (विधान) पूर्ण माना जाएगा।"
(श्लोक 49-50): तब उन ब्राह्मणों ने शम्भु से कहा— "ऐसा ही होगा, हम आपकी आज्ञा का पालन करेंगे।" इसके बाद हाथ में कपाल धारण किए हुए शिव ने भगवान पितामह (ब्रह्माजी) से कहा— "हे ब्रह्मन्! आपके हृदय में जो भी प्रिय इच्छा हो, वह वर मांग लीजिए। हे प्रभु! मैं आपको सब कुछ दे दूंगा, मेरे पास आपके लिए कुछ भी अदेय (न देने योग्य) नहीं है।"
(श्लोक 51-53): ब्रह्माजी ने कहा— "मैं आपसे वर ग्रहण नहीं करूँगा क्योंकि मैं इस समय यज्ञ की दीक्षा लिए हुए सभा में स्थित हूँ। यहाँ जो कोई भी मुझसे प्रार्थना करता है, मैं स्वयं उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण करने वाला हूँ।" जब ब्रह्माजी ने उस यज्ञ में वर देने वाले शिव से ऐसा कहा, तब रुद्र ने 'तथास्तु' कहकर उनसे स्वयं एक वर माँगा। उसके बाद मन्वन्तर बीत जाने पर, प्रभु शम्भु ने स्वयं 'ब्रह्मोत्तर' नामक स्थान की रचना की।
(श्लोक 54-56): जो चारों वेदों में निष्णात (पण्डित) थे, उस समय भगवान शिव उस नगर को देखने के लिए और ब्राह्मणों से वार्तालाप करने के कौतुक (जिज्ञासा) वश सभा में गए। उसी उन्मत्त (पागल/अवधूत) वेष में महेश्वर, जहाँ यज्ञ की आहुति दी जा चुकी थी, उस ब्रह्मा के सदन (यज्ञशाला) में प्रविष्ट हुए। उन्हें देखकर कुछ श्रेष्ठ ब्राह्मण और देवता हँसने लगे और कुछ उनकी निन्दा (भर्त्सना) करने लगे।
(श्लोक 57-60): अन्य ब्राह्मण उस उन्मत्त (शिव) पर धूल फेंकने लगे। कुछ बल के अभिमान में चूर होकर उन पर ढेले और लाठियों से प्रहार करने लगे। कुछ लोग हाथों से संकेत कर उपहास करने लगे। वहाँ उपस्थित अन्य ब्रह्मचारियों ने उनकी जटाएँ पकड़कर पास खींच लिया और पूछा— "तुम्हें यह व्रतचर्या किसने सिखाई है? क्या तुम यहाँ स्त्रियों के लिए आए हो? किस पापी गुरु ने तुम्हें यह आचरण सिखाया है, जिससे तुम पागलों की तरह बातें करते हुए बीच में दौड़ रहे हो?"
(श्लोक 61-65): (शिवजी ने रहस्यमयी वाणी में कहा) "मेरा लिंग ब्रह्मा का रूप है और भग (योनि) जनार्दन (विष्णु) हैं। यह जो बीज बोया जा रहा है, उसके बिना लोक अन्य प्रकार से क्लेश पाता है। मैंने इस पुत्र (सृष्टि/ब्रह्मा) को जन्म दिया है और इसने मुझे। महादेव के निमित्त ही सृष्टि हुई और हिमालय में भार्या (पार्वती) का सृजन हुआ। उमा रुद्र को दी गई, बताओ वह किसकी पुत्री है? तुम मूर्ख नहीं जानते, भगवान स्वयं तुम्हें बताएँगे।" ब्राह्मणों ने कहा— "ऐसी चर्या न ब्रह्मा ने की, न विष्णु ने दिखाई। शिव ने भी ब्रह्महत्या के दोष के कारण ऐसी चर्या की थी (तुम कौन हो?) तुम देव की निन्दा कैसे कर रहे हो? तुम आज हमारे वध के योग्य हो।" इस प्रकार उन ब्राह्मणों द्वारा शंकरजी वहाँ पीटे जाने लगे।

व्याकरणिक विश्लेषण (Sanskrit Grammar Highlights)
  1. सन्धि (Sandhi):
    • तावत्तुष्टो: तावत् + तुष्टः (श्चुत्व/जशत्व सन्धि)।
    • तथेत्यूचुः: तथा + इति + ऊचुः (गुण और यण सन्धि)।
    • दीक्षितोहम्: दीक्षितः + अहम् (विसर्ग का उत्व और पूर्वरूप सन्धि)।
    • ततोन्ये: ततः + अन्ये (विसर्ग सन्धि)।
  2. कारक एवं विभक्ति (Case & Declension):
    • द्विजानाम् / ब्राह्मणानाम्: षष्ठी विभक्ति, बहुवचन (ब्राह्मणों का/के)।
    • कपालपाणिः: 'कपाले पाणिः यस्य सः' (बहुव्रीहि समास) - जिसके हाथ में कपाल है।
    • हृदि: 'हृद्' शब्द, सप्तमी विभक्ति, एकवचन (हृदय में)।
    • तस्मिन् काले: सप्तमी विभक्ति (उस समय में)।
  3. क्रिया रूप (Verb Forms):
    • तुष्टुवुः: 'स्तु' धातु, लिट् लकार (परोक्ष अनद्यतन भूतकाल), प्रथम पुरुष, बहुवचन (उन्होंने स्तुति की)।
    • वरय: 'वृ' धातु, लोट् लकार (आज्ञार्थ), मध्यम पुरुष, एकवचन (मांगो)।
    • प्रहसन्ति: 'प्र + हस्' धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन (हँसते हैं)।
    • कुर्वन्: 'कृ' धातु + शतृ प्रत्यय (करते हुए)।
  4. विशेष शब्द:
    • उन्मत्तवेषेण: तृतीया विभक्ति (पागल के वेष के द्वारा)।
    • अदेयम्: न देयम् (नञ् तत्पुरुष समास) - जो देने योग्य न हो।
पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय १७, श्लोक ६६-७५ के संदर्भ में) भगवान शिव और ब्राह्मणों के आख्यान का हिंदी अनुवाद व्याकरणिक विश्लेषण सहित नीचे दिया गया है। यह प्रसंग उस समय का है जब शिवजी उन्मत्त (पागल) वेष में ब्राह्मणों की परीक्षा ले रहे थे।
पद्म पुराण - सृष्टि खण्ड (श्लोक ६६-७५) - हिंदी अनुवाद
स्मितं कृत्वाब्रवीत्सर्वान्ब्राह्मणान्नृपसत्तम।
किं मां न वित्थ भो विप्रा उन्मत्तं नष्टचेतनम्।६६।
  • अनुवाद: हे नृपसत्तम (राजा पृथु)! (तब उन्मत्त वेषधारी भगवान शिव ने) स्मित (मुस्कान) करके सभी ब्राह्मणों से कहा- हे ब्राह्मणों! क्या तुम मुझे पागल और चेतनाहीन (नष्टचेतनम्) नहीं जानते हो?
  • व्याकरण:
    • स्मितं (स्मित - अ० नपुं०): स्मित (मुस्कान) - द्वितीया विभक्ति।
    • कृत्वा (कृ धातु + क्त्वा प्रत्यय): करके।
    • अब्रवीत् (ब्रू धातु + लङ् लकार + प्रथम पुरुष एकवचन): कहा।
    • वित्थ (विद् धातु + लट् लकार + मध्यम पुरुष बहुवचन): जानते हो।
    • उन्मत्तं (विशेषण): पागल।
यूयं कारुणिकाः सर्वे मित्रभावे व्यवस्थिताः।
वदमानमिदं छद्म ब्रह्मरूपधरं हरम्।६७।
  • अनुवाद: (शिवजी ने कहा) तुम सब कारुणिक (दयालु) हो और मित्रभाव में स्थित हो। (फिर भी) तुम इस छद्म (कपटी) वेषधारी और ब्रह्मरूप (ब्राह्मण रूप) को धारण करने वाले हर (शिव) को (नही पहचान रहे हो)?
  • व्याकरण:
    • कारुणिकाः (विशेष्य 'यूयं' के लिए): दयालु लोग।
    • व्यवस्थिताः (व्य + स्था + क्त प्रत्यय): स्थित हुए।
    • छद्म (नपुं०): कपट/माया।
    • ब्रह्मरूपधरं (ब्रह्मरूपं धरति इति - तत्पुरुष): ब्राह्मण रूप धारी।
मायया तस्य देवस्य मोहितास्ते द्विजोत्तमाः।
कपर्दिनं निजघ्नुस्ते पाणिपादैश्च मुष्टिभिः।६८।
  • अनुवाद: उस देव (शिव) की माया से मोहित होकर वे द्विजोत्तम (ब्राह्मण) भगवान कपर्दी (जटाधारी शिव) को हाथ, पैर और मुक्कों से मारने लगे।
  • व्याकरण:
    • मोहिताः (मोह धातु + क्त प्रत्यय): मोहित (भ्रमित)।
    • निजघ्नुः (नि + हन् धातु + लिट् लकार + प्रथम पुरुष बहुवचन): मारा (हनन किया)।
    • पाणिपादैः (पाणि च पादौ च - द्वन्द्व समास): हाथ और पैरों से (तृतीया बहुवचन)।
दण्डैश्चापि च कीलैश्च उन्मत्तवेषधारिणम्।
पीड्यमानस्ततस्तैस्तु द्विजैः कोपमथागमत्।६९।
  • अनुवाद: उन्होंने (ब्राह्मणों ने) उन्मत्त वेषधारी (शिव) को डंडों और खूंटियों (कीलों) से मारा। उन ब्राह्मणों द्वारा पीड़ित किए जाने पर वे (शिव) कोप (क्रोध) को प्राप्त हुए।
  • व्याकरण:
    • कीलैः (कीला - पुं०): खूंटियों से (तृतीया बहुवचन)।
    • पीड्यमानः (पीड धातु + शानच् प्रत्यय): पीड़ित होते हुए (विशेषण)।
    • कोपम्+आगमत् (कोप + आ + गम् धातु): क्रोध प्राप्त हुए।
ततो देवेन ते शप्ता यूयं वेदविवर्जिताः।
ऊर्ध्वजटाः क्रतुभ्रष्टाः परदारोपसेविनः।७०।
  • अनुवाद: तब उन देव (शिव) ने उन ब्राह्मणों को शाप दिया- तुम सब वेद से विवर्जित (वेदों से दूर/हीन), ऊर्ध्वजटा (पाखंडी), यज्ञ से भ्रष्ट और पराई स्त्रियों की सेवा (उपभोग) करने वाले हो जाओगे।
  • व्याकरण:
    • शप्ता (शप् धातु + क्त प्रत्यय): शाप दिए गए (कर्मवाच्य)।
    • वेदविवर्जिताः (वेदात् विवर्जिताः - तत्पुरुष): वेदों से रहित।
    • क्रतुभ्रष्टाः (क्रतोः भ्रष्टाः - पंचमी तत्पुरुष): यज्ञ से पतित।
वेश्यायान्तु रता द्यूते पितृमातृविवर्जिताः।
न पुत्रः पैतृकं वित्तं विद्यां वापि गमिष्यति।७१।
  • अनुवाद: (शाप दिया) तुम वेश्याओं में रत रहने वाले, जुआरी (द्यूत) और माता-पिता का आदर न करने वाले हो जाओगे। (तुम्हारे कुकर्मों के कारण) तुम्हारा पुत्र न तो पैतृक धन प्राप्त कर पाएगा और न ही विद्या (ज्ञान) प्राप्त कर पाएगा।
  • व्याकरण:
    • पैतृकं (पितुः इदम् + अण् प्रत्यय): पिता से संबंधित।
    • विवर्जिताः (वि + वर्ज् + क्त प्रत्यय): हीन/रहित।
सर्वे च मोहिताः सन्तु सर्वेंद्रियविवर्जिताः।
रौद्रीं भिक्षां समश्नंतु परपिण्डोपजीविनः।७२।
  • अनुवाद: तुम सब मोहित (भ्रमित) हो जाओ और तुम्हारी सभी इंद्रियां शक्तिहीन (विवर्जित) हो जाएं। तुम सब रौद्री (शिव संबंधित) भिक्षा प्राप्त करो और दूसरों के पिंड (भोजन) पर जीवित रहो।
  • व्याकरण:
    • सर्वेंद्रियविवर्जिताः (सर्वाणि च इन्द्रियाणि + विवर्जिताः - कर्मधारय + तत्पुरुष): समस्त इंद्रियों से रहित।
    • समश्नंतु (सम् + अश् धातु + लोट् लकार + प्रथम पुरुष बहुवचन): खाएं/प्राप्त करें।
    • परपिण्डोपजीविनः (परेषां पिण्डं + उपजीविनः): दूसरों के अन्न पर आश्रित।
आत्मानं वर्तयन्तश्च निर्ममा धर्मवर्जिताः।
कृपार्पिता तु यैर्विप्रैरुन्मत्ते मयि सांप्रतम्।७३।
  • अनुवाद: (शाप दिया) तुम सब धर्म से विवर्जित होकर केवल आत्म-पोषण (निर्ममा) में लगे रहोगे। हे ब्राह्मणों! चूँकि तुम सबने मुझ उन्मत्त पर कृपा (अर्थात् दण्ड की कृपा) की है (मुझ पर अत्याचार किया है)... [यह श्लोक अगले श्लोक से जुड़ा है]।
  • व्याकरण:
    • वर्तयन्तः (वृत् धातु + शतृ प्रत्यय): व्यतीत करते हुए (जीवित रहते हुए)।
    • निर्ममाः (निर् + मम - बहुव्रीहि): ममता से रहित (केवल अपने लिए)।
तेषां धनं च पुत्राश्च दासीदासमजाविकम्।
कुलोत्पन्नाश्च वै नार्यो मयि तुष्टे भवन्विह।७४।
  • अनुवाद: ...तो जब मैं (शिव) प्रसन्न होऊंगा (तभी) तुम्हें धन, पुत्र, दास-दासी, बकरी-भेड़ (अजाविक) और कुलोत्पन्न स्त्रियां मिलेंगी।
  • व्याकरण:
    • मजाविकम् (अजाश्च अवयश्च - द्वन्द्व): बकरियां और भेड़ें।
    • तुष्टे (तुष् धातु + क्त प्रत्यय): प्रसन्न होने पर (सप्तमी एकवचन)।
    • भवन्विह (भवन्तु + इह): यहाँ हो जाएं।
एवं शापं वरं चैव दत्वान्तर्द्धानमीश्वरः।
गतो द्विजागते देवे मत्वा तं शंकरं प्रभुम्।७५।
  • अनुवाद: इस प्रकार शाप और वर (शाप के बीच वर) देकर ईश्वर (शिव) अंतर्ध्यान हो गए। द्विजों (ब्राह्मणों) ने जब उन्हें शंकर (शिव) समझा, तब तक वे अंतर्ध्यान हो चुके थे।
  • व्याकरण:
    • दत्त्वा (दा धातु + क्त्वा प्रत्यय): देकर।
    • अंतर्द्धानम् (अंतर् + धानम्): लुप्त हो गए।
    • द्विजागते (द्विजेषु + आगते): ब्राह्मणों के आ जाने पर।
    • शङ्करं (सं करोति इति): कल्याण करने वाले।

नोट: यह श्लोक श्रृंखला पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड (अनुवाद के अनुसार अध्याय १७, या कहीं-कहीं यह कथा विष्णु खण्ड/अन्य खण्डों में भी वर्णित है, लेकिन प्रश्न में निर्दिष्ट अध्याय के अनुसार) से ली गई है, जो भगवान शिव की माया और ब्राह्मणों के गर्व के दमन को दर्शाता है।



पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय 17) के इन श्लोकों में उस समय का वर्णन है जब ब्राह्मणों ने यज्ञ के नष्ट होने पर महादेव की खोज की और अंततः उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
यहाँ इन श्लोकों का व्याकरण सहित हिंदी अनुवाद है:
श्लोक 76-77
अन्विष्यन्तोपि यत्नेन न चापश्यंत ते यदा।
तदा नियमसंपन्नाः पुष्करारण्यमागताः।७६।
स्नात्वा ज्येष्ठसरो विप्रा जेपुस्ते शतरुद्रियम्।
जाप्यावसाने देवस्तानशीररगिराऽब्रवीत्।७७।
  • अनुवाद: जब बहुत प्रयत्नपूर्वक खोजने पर भी उन्होंने (महादेव को) नहीं देखा, तब वे नियमपरायण ब्राह्मण 'पुष्कर अरण्य' में आए। ज्येष्ठ पुष्कर सरोवर में स्नान करके उन विप्रों ने 'शतरुद्रिय' (रुद्र पाठ) का जप किया। जप की समाप्ति पर महादेव ने उनसे 'अशरीरिणी वाणी' (आकाशवाणी) द्वारा कहा।
  • व्याकरण:
    • अन्विष्यन्तः: अनु + इष् (खोजना) + शतृ प्रत्यय (खोजते हुए)।
    • स्नात्वा: स्ना + क्त्वा प्रत्यय (स्नान करके)।
    • जाप्यावसाने: जपस्य अवसाने (षष्ठी तत्पुरुष) - जप के अंत में।
    • अशरीरगिरा: अशरीरिणी + गिरा (बिना शरीर की वाणी/आकाशवाणी द्वारा)।

श्लोक 78
अनृतं न मया प्रोक्तं स्वैरेष्वपि कुतःपुनः।
आगते निग्रहे क्षेमं भूयोपि करवाण्यहम्।७८।
  • अनुवाद: मैंने हंसी-मजाक (स्वैर) में भी कभी झूठ नहीं कहा, तो फिर अन्य समय में कैसे कहूँगा? संकट (निग्रह) आने पर भी मैं पुनः तुम्हारा कल्याण ही करूँगा।
  • व्याकरण:
    • अनृतम्: न ऋतम् (नञ् तत्पुरुष) - झूठ।
    • मया प्रोक्तम्: मेरे द्वारा कहा गया (कर्मवाच्य)।
    • करवाण्यहम्: करवाणि + अहम् (यण् सन्धि) - मैं करूँगा।

श्लोक 79
शान्ता दांता द्विजा ये तु भक्तिमन्तो मयि स्थिराः।
न तेषां छिद्यते वेदो न धनं नापि सन्ततिः।७९।
  • अनुवाद: जो ब्राह्मण शांत, जितेन्द्रिय और मुझमें स्थिर भक्ति रखने वाले हैं, उनका न तो वेदों का ज्ञान नष्ट होता है, न धन और न ही उनकी संतान (वंश) का क्षय होता है।
  • व्याकरण:
    • शान्ता-दान्ता: शम् + क्त और दम् + क्त (शांत और दमित इन्द्रियों वाले)।
    • मयि: 'अस्मद्' शब्द सप्तमी एकवचन (मुझमें)।
    • तेषाम्: 'तद्' शब्द पुल्लिंग षष्ठी बहुवचन (उनका)।

श्लोक 80-81
अग्निहोत्ररता ये च भक्तिमन्तो जनार्दने।
पूजयन्ति च ब्रह्माणंतेजोराशिं दिवाकरम्।८०।
नाशुभं विद्यते तेषां येषां साम्ये स्थिता मतिः।
एतावदुक्त्वा वचनं तूष्णीं भूतस्तु सोऽभवत्।८१।
  • अनुवाद: जो अग्निहोत्र में लगे रहते हैं, भगवान जनार्दन (विष्णु) के भक्त हैं और ब्रह्मा जी तथा तेजोराशि सूर्य देव की पूजा करते हैं, साथ ही जिनकी बुद्धि समभाव में स्थित है, उनका कभी अशुभ नहीं होता। इतना कहकर वे (महादेव) मौन हो गए।
  • व्याकरण:
    • तेजोराशिम्: तेजसाम् राशिः (तेज का ढेर/पुंज)।
    • उक्त्वा: वच् + क्त्वा प्रत्यय (कहकर)।
    • तूष्णीं भूतः: मौन हो जाना।

श्लोक 82
लब्ध्वा वरं सप्रसादं देवदेवान्महेश्वरात्।
आजग्मुः सहितास्सर्वे यत्र देवःपितामहः।८२।
  • अनुवाद: देवाधिदेव महेश्वर से प्रसन्नतापूर्वक वरदान प्राप्त करके, वे सभी ब्राह्मण एक साथ मिलकर वहां आए जहाँ भगवान पितामह (ब्रह्मा जी) विराजमान थे।
  • व्याकरण:
    • लब्ध्वा: लभ् + क्त्वा (प्राप्त करके)।
    • आजग्मुः: आ + गम् (लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) - वे आए।
    • सहितास्सर्वे: संहिताः + सर्वे (विसर्ग सन्धि) - वे सभी साथ मिलकर।

विरिञ्चिं संहिताजाप्यैस्तोषयंतोऽग्रतःस्थिताः। तुष्टस्तानब्रवीद्ब्रह्मा मत्तोपि व्रियतां वरः।८३। ब्रह्मणस्तेनवाक्येन हृष्टाः सर्वे द्विजोत्तमाः। को वरो याच्यतां विप्राः परितुष्टे पितामहे।८४। अग्निहोत्राणि वेदाश्च शास्त्राणि विविधानि च। सान्तानिकाश्च ये लोका वरदानाद्भवंतु नः।८५। एवं प्रजल्पतां तत्र विप्राणां कोपमाविशत्। के यूयं केत्र प्रवरा वयं श्रेष्ठास्तथापरे।८६। नेतिनेति तथा विप्रा द्विजांस्तांस्तत्र संस्थितान्। ब्रह्मोवाचाभिसंप्रेक्ष्य ब्राह्मणान्क्रोधपूरितान्।८७। यस्माद्यूयं त्रिभिर्भागैः सभायां बाह्यतः स्थिताः। तस्मादामूलिको गुल्मो ह्येको भवतु वोद्विजाः।८८। उदासीनाः स्थिता ये तु उदासीना भवंतु ते। सायुधाबद्धनिस्त्रिंशा योद्धुकामा व्यवस्थिताः।८९। हिन्दी अनुवाद सहित व्याकरण सहित करें
यहाँ दिए गए श्लोकों (संभवतः किसी पुराण, जैसे पद्मपुराण या स्कन्दपुराण से) का हिंदी अनुवाद और व्याकरण सहित व्याख्या है। यह प्रसंग ब्रह्माजी द्वारा ब्राह्मणों को वरदान देने और फिर क्रोधित होकर शाप देने से संबंधित है।
श्लोक ८३
विरिञ्चिं संहिताजाप्यैस्तोषयंतोऽग्रतःस्थिताः।
तुष्टस्तानब्रवीद्ब्रह्मा मत्तोपि व्रियतां वरः।८३।
  • अनुवाद: संहिता (मंत्रों/वेदों) के जाप से विरिञ्चि (ब्रह्माजी) को संतुष्ट करते हुए (ब्राह्मण) उनके सामने स्थित थे। संतुष्ट ब्रह्माजी ने उनसे कहा- "मुझसे भी वर माँगो।"
  • व्याकरण:
    • विरिञ्चिम्: ब्रह्माजी (द्वितीया विभक्ति, एकवचन)।
    • संहिताजाप्यैः: संहिता के जाप के द्वारा (तृतीया विभक्ति, बहुवचन)।
    • तोषयन्तः: संतुष्ट करते हुए (शत्रु प्रत्यय - क्रिया चल रही है)।
    • तुष्टः: संतुष्ट (विभक्ति १.१, ब्रह्मा के लिए)।
    • मत्तः अपि: मुझसे भी।
    • व्रियताम्: वर माँगा जाए (कर्मवाच्य - लोट् लकार)।
श्लोक ८४
ब्रह्मणस्तेनवाक्येन हृष्टाः सर्वे द्विजोत्तमाः।
को वरो याच्यतां विप्राः परितुष्टे पितामहे।८४।
  • अनुवाद: ब्रह्माजी के उस वाक्य (वरदान) से सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण (द्विजोत्तम) प्रसन्न हो गए। (और बोले) हे ब्राह्मणों! पितामह (ब्रह्माजी) संतुष्ट हैं, क्या वर माँगा जाए?
  • व्याकरण:
    • ब्रह्मणः वाक्येन: ब्रह्माजी के वाक्य से (तृतीया विभक्ति, करण कारक)।
    • हृष्टाः: प्रसन्न हुए (बहुवचन)।
    • द्विजोत्तमाः: श्रेष्ठ ब्राह्मण (द्विज + उत्तमाः, गुण संधि)।
    • याच्यताम्: माँगना चाहिए (यक् प्रत्यय - कर्मवाच्य)।
श्लोक ८५
अग्निहोत्राणि वेदाश्च शास्त्राणि विविधानि च।
सान्तानिकाश्च ये लोका वरदानाद्भवंतु नः।८५।
  • अनुवाद: (ब्राह्मणों ने कहा) वरदान के फलस्वरूप हमारे पास अग्निहोत्र (हवन), वेद, विविध शास्त्र और सान्तानिक (उत्तम संतान देने वाले) लोक हों।
  • व्याकरण:
    • अग्निहोत्राणि/वेदाः/शास्त्राणि: बहुवचन (बहुत से हवन/वेद/शास्त्र)।
    • सान्तानिकाः लोकाः: संतान संबंधी लोक।
    • भवन्तु: हों (लोट् लकार, बहुवचन)।
    • वरदानात्: वरदान के द्वारा/से (पंचमी विभक्ति - हेतु अर्थ)।
श्लोक ८६
एवं प्रजल्पतां तत्र विप्राणां कोपमाविशत्।
के यूयं केत्र प्रवरा वयं श्रेष्ठास्तथापरे।८६।
  • अनुवाद: वहाँ इस प्रकार आपस में चर्चा (प्रलाप) करते हुए ब्राह्मणों (के दो समूहों) में कोप (क्रोध) व्याप्त हो गया। (एक समूह बोला) "तुम कौन हो? यहाँ श्रेष्ठ कौन है? हम श्रेष्ठ हैं या दूसरे (समूह वाले)?"
  • व्याकरण:
    • प्रजल्पताम्: चर्चा/बातचीत करते हुए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन - शत्रु प्रत्यय)।
    • कोपम् आविशत्: क्रोध आ गया/व्याप्त हो गया।
    • के यूयम्: तुम कौन हो? (बहुवचन - 'यूयम्' मध्यम पुरुष)।
श्लोक ८७
नेतिनेति तथा विप्रा द्विजांस्तांस्तत्र संस्थितान्।
ब्रह्मोवाचाभिसंप्रेक्ष्य ब्राह्मणान्क्रोधपूरितान्।८७।
  • अनुवाद: "नहीं-नहीं" (अर्थात हम श्रेष्ठ हैं, तुम नहीं) ऐसा कहते हुए वहाँ स्थित ब्राह्मणों को देखकर, क्रोध से भरे हुए ब्रह्माजी ने कहा।
  • व्याकरण:
    • नेति नेति: न + इति (दीर्घ संधि)।
    • संस्थितान्: जो स्थित थे (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन - क्त प्रत्यय)।
    • अभिसंप्रेक्ष्य: अच्छी तरह देखकर (अभि+सम्+प्र+ईक्ष् + ल्यप् प्रत्यय)।
    • क्रोधपूरितान्: क्रोध से भरे हुए (द्वितीया विभक्ति)।
श्लोक ८८
यस्माद्यूयं त्रिभिर्भागैः सभायां बाह्यतः स्थिताः।
तस्मादामूलिको गुल्मो ह्येको भवतु वोद्विजाः।८८।
  • अनुवाद: ब्रह्माजी बोले- "चूँकि तुम लोग सभा में तीन भागों (के अंतर पर) बाहर स्थित हो, इसलिए हे द्विजो! तुम सब आमूलिक (जड़ से उत्पन्न होने वाले) गुल्म (झाड़ी/वनस्पति) बन जाओ।"
  • व्याकरण:
    • यस्मात्: चूँकि (हेतु वाचक)।
    • त्रिविर्भागैः: तीन भागों से (तृतीया, बहुवचन)।
    • बाह्यतः: बाहर (तसिल् प्रत्यय - स्थान वाचक)।
    • आमुलिकः: जड़ से (मूल तक) [विशेषण]।
    • गुल्मः: झाड़ी (श्राप का फल)।
    • भवतु: हो जाओ (लोट् लकार - आज्ञा)।
श्लोक ८९
उदासीनाः स्थिता ये तु उदासीना भवंतु ते।
सायुधाबद्धनिस्त्रिंशा योद्धुकामा व्यवस्थिताः।८९।
  • अनुवाद: "और जो उदासीन (निष्पक्ष/तटस्थ) होकर स्थित थे, वे भी उदासीन (स्थिर/निष्प्राण) ही रहें। जो आयुध (हथियार) और तलवार (निस्त्रिंश) के साथ युद्ध की इच्छा (योद्धुकामाः) से खड़े (व्यवस्थिताः) हैं (वे वैसे ही बने रहें)।" [यह श्लोक दो अलग-अलग समूहों को श्राप और स्थिति का वर्णन करता है]।
  • व्याकरण:
    • उदासीनाः: तटस्थ लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन)।
    • सायुधा बद्ध निस्त्रिंशाः: हथियार और बंधी हुई तलवार के साथ (बहुव्रीहि समास)।
    • योद्धुकामाः: युद्ध करने की इच्छा वाले (तुमुन् प्रत्यय युक्त)।
सारांश: इन श्लोकों में ब्रह्माजी के संतुष्ट होने पर ब्राह्मणों द्वारा वर मांगने, फिर आपस में श्रेष्ठता को लेकर विवाद करने और ब्रह्माजी द्वारा क्रोधित होकर उन्हें वनस्पति (गुल्म) या जड़वत हो जाने का श्राप देने का वर्णन है।कौशिकीति गणो नाम तृतीयो भवतु द्विजाः। त्रिधाबद्धमिदं स्थानं सर्वं युष्मद्भविष्यति।९०। बाह्यतो लोकशब्देन प्रोच्यमानाः प्रजास्त्विह। अविज्ञेयमिदं स्थानं विष्णुः पालयिता ध्रुवम्।९१। मया दत्तं चिरस्थायि अभंगं चभविष्यति। एवमुक्त्वा तदा ब्रह्मा समाप्तिंतामवैक्षत।९२। ब्राह्मणाः सहितास्ते तु क्रोधामर्षसमन्विताः। अतिथिं भोजयानाश्च वेदाभ्यासरतास्तु ते।९३। एतच्च परमं क्षेत्रं पुष्करं ब्रह्मसंज्ञितम्। तत्रस्था ये द्विजाः शांता वसंति क्षेत्रवासिनः।९४। न तेषां दुर्लभं किंचिद्ब्रह्मलोके भविष्यति। कोकामुखे कुरुक्षेत्रे नैमिषे ऋषिसंगमे।९५। वाराणस्यां प्रभासे च तथा बदरिकाश्रमे। गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे।९६। रुद्रकोट्यां विरूपाक्षे मित्रस्यापि तथा वने। तीर्थेष्वेतेषु सर्वेषु सिद्धिर्या द्वादशाब्दिका।९७। प्राप्यते मानवैर्लोके षण्मासाद्राजसत्तम। पुष्करे तु न संदेहो ब्रह्मचर्यमना यदि।९८। तीर्थानां परमं तीर्थं क्षेत्राणामपि चोत्तमम्। सदा तु पूजितं पूज्यैर्भक्तियुक्तैः पितामहे।९९। अतः परं प्रवक्ष्यामिसावित्र्या ब्रह्मणा सह। वादो यथानुभूतस्तु परिहासकृतो महान्।१००। 1.17.100। पद्मपुराण सृष्टि खण्ड अध्याय १७ के श्लोकों का हिन्दी अनुवाद व्याकरण सहित करें
पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड, अध्याय १७ (अध्याय २६-२७ के आसपास पुष्कर माहात्म्य का प्रसंग) के इन श्लोकों में भगवान ब्रह्मा द्वारा पुष्कर क्षेत्र की महिमा और द्विजों (ब्राह्मणों) को वरदान देने का वर्णन है।
यहाँ श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और व्याकरण-आधारित व्याख्या दी जा रही है:
श्लोक ९०-९२: ब्रह्मा जी का वरदान
श्लोक ९०:
कौशिकीति गणो नाम तृतीयो भवतु द्विजाः।
त्रिधाबद्धमिदं स्थानं सर्वं युष्मद्भविष्यति।९०।
हिंदी अनुवाद: (ब्रह्मा जी बोले-) हे द्विजों! (ब्राह्मणों) 'कौशिकी' नाम का तीसरा गण हो। यह स्थान तीन प्रकार से (त्रिधा) बद्ध (जुड़ा/पवित्र) है, और यह सब तुम लोगों का ही होगा।
  • व्याकरण/पदच्छेद: कौशिकी-इति (कौशिकी नाम से), गणः नाम, तृतीयः, भवतु (हो - लोट् लकार), द्विजाः (संबोधन), त्रिधा-बद्धम्-इदम् (तीन तरह से बद्ध यह), स्थानं, सर्वं, युष्मत् (तुम सबका), भविष्यति।
श्लोक ९१:
बाह्यतो लोकशब्देन प्रोच्यमानाः प्रजास्त्विह।
अविज्ञेयमिदं स्थानं विष्णुः पालयिता ध्रुवम्।९१।
हिंदी अनुवाद: यहाँ (पुष्कर में) बाहर के लोक-शब्दों (सांसारिक चर्चाओं) से जो प्रजाएं कही जा रही हैं, यह स्थान अविज्ञेय (रहस्यमयी/दुर्गम) है, और भगवान विष्णु निश्चित रूप से इसके पालक (रक्षा करने वाले) होंगे।
  • व्याकरण/पदच्छेद: बाह्यतः, लोक-शब्देन, प्रोच्यमानाः (कहे जाने वाले), प्रजाः, तु, इह, अविज्ञेयम्-इदम्, स्थानं, विष्णुः, पालयिता (पालक), ध्रुवम् (निश्चित ही)।
श्लोक ९२:
मया दत्तं चिरस्थायि अभंगं चभविष्यति।
एवमुक्त्वा तदा ब्रह्मा समाप्तिंतामवैक्षत।९२।
हिंदी अनुवाद: मेरे द्वारा दिया गया यह (वरदान) चिरस्थायी (लंबे समय तक रहने वाला) और अभंग (अटूट/अखंड) होगा। ऐसा कहकर ब्रह्मा जी ने (उस यज्ञ की) समाप्ति देखी।
  • व्याकरण/पदच्छेद: मया, दत्तं (दिया हुआ), चिरस्थायि, अभंगं, च, भविष्यति, एवम्-उक्त्वा (ऐसा कहकर), तदा, ब्रह्मा, समाप्तिम्-अवैक्षत (समाप्ति को देखा - लङ् लकार)।

श्लोक ९३-९५: ब्राह्मणों की स्थिति और पुष्कर की महिमा
श्लोक ९३:
ब्राह्मणाः सहितास्ते तु क्रोधामर्षसमन्विताः।
अतिथिं भोजयानाश्च वेदाभ्यासरतास्तु ते।९३।
हिंदी अनुवाद: वे सब ब्राह्मण, जो क्रोध और ईर्ष्या से युक्त थे, अतिथि भोज कराने वाले (अतिथि सत्कार में तत्पर) और वेदों के अभ्यास में रमे रहने वाले थे।
  • व्याकरण/पदच्छेद: ब्राह्मणाः, सहिताः, ते, तु, क्रोध-अमर्ष-समन्विताः, अतिथिम्, भोजयानाः-च (भोजन कराने वाले), वेद-अभ्यास-रताः-तु, ते।
श्लोक ९४:
एतच्च परमं क्षेत्रं पुष्करं ब्रह्मसंज्ञितम्।
तत्रस्था ये द्विजाः शांता वसंति क्षेत्रवासिनः।९४।
हिंदी अनुवाद: यह पुष्कर परम क्षेत्र है, जिसे ब्रह्मसंज्ञित (ब्रह्मा का क्षेत्र) कहा गया है। वहां शांत भाव से जो द्विज/क्षेत्रवासी रहते हैं।
  • व्याकरण/पदच्छेद: एतत्-च, परमं, क्षेत्रं, पुष्करं, ब्रह्म-संज्ञितम्, तत्र-स्थाः (वहां रहने वाले), ये, द्विजाः, शांताः, वसंति (रहते हैं), क्षेत्र-वासिनः।
श्लोक ९५:
न तेषां दुर्लभं किंचिद्ब्रह्मलोके भविष्यति।
कोकामुखे कुरुक्षेत्रे नैमिषे ऋषिसंगमे।९५।
हिंदी अनुवाद: उनके लिए ब्रह्मलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। कोकामुख, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, ऋषि संगम...
  • व्याकरण/पदच्छेद: न, तेषां, दुर्लभं, किंचित्, ब्रह्मलोके, भविष्यति, कोकामुखे, कुरुक्षेत्रे, नैमिषे, ऋषि-संगमे।

श्लोक ९६-९८: अन्य तीर्थों की तुलना में पुष्कर का फल
श्लोक ९६:
वाराणस्यां प्रभासे च तथा बदरिकाश्रमे।
गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे।९६।
हिंदी अनुवाद: वाराणसी, प्रभास, बद्रिकाश्रम, गंगाद्वार (हरिद्वार), प्रयाग और गंगासागर संगम...
  • व्याकरण/पदच्छेद: वाराणस्यां, प्रभासे, च, तथा, बदरिकाश्रमे, गंगाद्वारे, प्रयागे, च, गंगा-सागर-संगमे।
श्लोक ९७:
रुद्रकोट्यां विरूपाक्षे मित्रस्यापि तथा वने।
तीर्थेष्वेतेषु सर्वेषु सिद्धिर्या द्वादशाब्दिका।९७।
हिंदी अनुवाद: रुद्रकोटि, विरूपाक्ष, तथा मित्र वन में। इन सभी तीर्थों में जो सिद्धि बारह वर्षों (द्वादशाब्दिका) की तपस्या से मिलती है।
  • व्याकरण/पदच्छेद: रुद्रकोट्यां, विरूपाक्षे, मित्रस्य-अपि, तथा, वने, तीर्थेषु-एतेषु, सर्वेषु, सिद्धिः, या, द्वादश-आब्दिका (१२ वर्ष की)।
श्लोक ९८:
प्राप्यते मानवैर्लोके षण्मासाद्राजसत्तम।
पुष्करे तु न संदेहो ब्रह्मचर्यमना यदि।९८।
हिंदी अनुवाद: हे राजन! (श्रेष्ठ राजा) वह सिद्धि यहां पुष्कर में छह महीने (षण्मासात्) के ब्रह्मचर्य पालन से ही मिल जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
  • व्याकरण/पदच्छेद: प्राप्यते (प्राप्त की जाती है), मानवैः-लोके, षण्मासात् (६ महीने से), राजसत्तम (संबोधन), पुष्करे, तु, न, संदेहः, ब्रह्मचर्यम्-अनाः-यदि (ब्रह्मचर्य में स्थित यदि)।

श्लोक ९९-१००: तीर्थ की महिमा और वादे का प्रसंग
श्लोक ९९:
तीर्थानां परमं तीर्थं क्षेत्राणामपि चोत्तमम्।
सदा तु पूजितं पूज्यैर्भक्तियुक्तैः पितामहे।९९।
हिंदी अनुवाद: (पुष्कर) तीर्थों में परम तीर्थ और क्षेत्रों में भी सर्वोत्तम है। पूजनीय पुरुषों द्वारा, भक्ति-युक्त होकर सदा पितामह (ब्रह्मा जी) की पूजा की जाती है।
  • व्याकरण/पदच्छेद: तीर्थानां, परमं, तीर्थं, क्षेत्राणाम्-अपि, च-उत्तमम्, सदा, तु, पूजितं, पूज्यैः, भक्ति-युक्तैः, पितामहे (ब्रह्मा जी)।
श्लोक १००:
अतः परं प्रवक्ष्यामिसावित्र्या ब्रह्मणा सह।
वादो यथानुभूतस्तु परिहासकृतो महान्।१००।
हिंदी अनुवाद: इसके आगे मैं (सूतजी) सावित्री के साथ ब्रह्मा जी के, परिहास (मजाक) में किए गए महान वादे (बहस) का वृत्तांत कहता हूँव्याकरण/पदच्छेद: अतः, परं, प्रवक्ष्यामि (कहूँगा), सावित्र्या, ब्रह्मणा, सह, वादः, यथा-अनुभूतः-तु, परिहास-कृतः, महान्।
(टिप्पणी: यद्यपि आपने १०० श्लोक तक पूछा है, परन्तु दिए गए श्लोकों की संख्या और विषयवस्तु पद्म पुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय १७ (पुष्कर माहात्म्य) से मेल खाती है, जहाँ अंत में परिहास/वाद का प्रसंग आता है।) 


यहाँ पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय 17) के इन श्लोकों का व्याकरणिक टिप्पणियों के साथ सरल हिन्दी अनुवाद दिया गया है। इन श्लोकों में देवी सावित्री के साथ भगवान ब्रह्मा के पास जाने वाली विभिन्न देवियों और उनके द्वारा ली गई पूजन सामग्रियों का वर्णन है।
हिन्दी अनुवाद (श्लोक 101–120)
श्लोक 101-102: सावित्री के चलने पर सभी देवांगनाएँ वहाँ आ गईं। भृगु की पत्नी ख्याति से उत्पन्न हुई यशस्वी विष्णु-पत्नी (महालक्ष्मी), जिन्हें सदैव आमंत्रित किया जाता है, वे लक्ष्मी जी भी वहाँ शीघ्रता से आ गईं। महाभागा मदिरा (वारुणी), ऐश्वर्य देने वाली योगनिद्रा भी आईं।
श्लोक 103-104: श्री, कमलालया, भूति, कीर्ति, श्रद्धा, मनस्विनी तथा पुष्टि और तुष्टि देने वाली देवियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं। राजा दक्ष की पुत्री सती, पार्वती, कल्याणकारी शुभा और तीनों लोकों में सुंदर, स्त्रियों को सौभाग्य देने वाली देवी (गौरी) भी आईं।
श्लोक 105-106: जया, विजया, मधुच्छन्दा, अमरावती, सुप्रिया और जनकान्ता—ये सब सावित्री के शुभ मंदिर में गौरी के साथ सुंदर वेशभूषा और आभूषणों से सुसज्जित होकर आईं। इन्द्र की पत्नी शची (पुलोम की पुत्री) भी अप्सराओं के साथ आईं।
श्लोक 107-109: स्वाहा, स्वधा, सुंदर मुख वाली धूमोर्णा (यमराज की पत्नी), यक्षियां, राक्षसियां और महाधनवती गौरी भी आईं। वायु की पत्नी मनोजवा, कुबेर की प्रिय ऋद्धि, देवकन्याएं, दानवियां और दैत्यपत्नियां भी आईं। सप्तर्षियों की पत्नियां, ऋषियों की श्रेष्ठ स्त्रियां, बहनें, पुत्रियां और विद्याधरियों के समूह भी आए।
श्लोक 110-111: राक्षसियां, पितृ-कन्याएं और अन्य लोकमाताएं भी अपनी बहुओं और पुत्रवधुओं के साथ आईं। सावित्री इन सबके साथ जाना चाहती थीं। अदिति आदि दक्ष की सभी कन्याएं वहाँ एकत्रित हुईं। उन सब श्रेष्ठ स्त्रियों से घिरी हुई ब्रह्माणी (सावित्री) कमल के समान शोभा पा रही थीं।
श्लोक 112-114: कोई सुंदर मुख वाली देवी अपने हाथ में मोदक (लड्डू) लिए थी, तो कोई सूप (छलनी/टोकरी) में फल भरकर ब्रह्मा जी के पास चलीं। कोई अरहर (आढकी) और निष्पाव (सेम/दाल) लेकर चलीं, तो कोई विचित्र अनार, सुंदर बिजौरा नींबू, करील के फल और कमल के फूल लेकर चलीं।
श्लोक 115-117: अन्य देवियां कुसुम्भ (सिंदूर/रंग), जीरा, खजूर और उत्तम नारियल लेकर चलीं। कोई द्राक्षा (अंगूर) से भरा पात्र और सिंघाड़ा लेकर चलीं। कोई सुगंधित कपूर, सुंदर जामुन, अखरोट, आँवला और नींबू लेकर चलीं। कोई सुंदर मुख वाली देवी पके हुए बेल, चिड़वा (पोहा), कपास की रुई और कुसुम्भी (लाल) वस्त्र लेकर चलीं।
श्लोक 118-120: ऐसी ही अनेक सामग्रियां सूपों में भरकर वे कल्याणकारी देवियां सावित्री के साथ अचानक वहाँ (यज्ञशाला में) पहुँचीं। सावित्री को आता देखकर इन्द्र डर गए। ब्रह्मा जी ने अपना मुख नीचे झुका लिया कि 'यह मुझसे क्या कहेगी?' विष्णु और रुद्र (शिव) भी लज्जित हो गए और अन्य सभी ब्राह्मण, सभासद तथा देवता भी डर गए।

व्याकरणिक टिप्पणियाँ (Grammatical Insights)
  1. समास (Compounds):
    • विष्णुपत्नी: विष्णोः पत्नी (षष्ठी तत्पुरुष) - विष्णु की पत्नी।
    • दक्षतनया: दक्षस्य तनया (षष्ठी तत्पुरुष) - दक्ष की पुत्री।
    • त्रैलोक्यसुन्दरी: त्रयाणां लोकानां समाहारः त्रैलोक्यम्, तस्मिन् सुन्दरी (द्विगु और तत्पुरुष)।
    • त्वरान्विता: त्वरया अन्विता (तृतीया तत्पुरुष) - शीघ्रता से युक्त।
  2. प्रत्यय (Suffixes):
    • आगता / समायाता: आ + गम् / सम् + आ + या + 'क्त' प्रत्यय (भूतकाल, स्त्रीलिंग)।
    • गृहीत्वा: ग्रह् + 'क्त्वा' प्रत्यय - ग्रहण करके / लेकर।
    • परिवृता: परि + वृ + 'क्त' (स्त्रीलिंग) - घिरी हुई।
    • आमन्त्रिता: आ + मन्त्र + 'क्त' - जिसे बुलाया गया हो।
  3. सन्धि (Sandhi):
    • स्वधाऽऽयाता: स्वधा + आयाता (दीर्घ सन्धि)।
    • ब्रह्मणोंतिकम्: ब्रह्मणः + अन्तिकम् (विसर्ग सन्धि / उत्व संधि)।
    • अदित्याद्यास्तथा: अदिति + आद्याः + तथा (यण सन्धि और विसर्ग का सत्व)।
  4. कारक और विभक्ति:
    • सावित्र्यासहिताः: 'सह' के योग में 'सावित्री' शब्द में तृतीया विभक्ति (सावित्र्या) हुई है।
    • ब्रह्मणोंतिकम्: 'अन्तिक' (पास) के योग में षष्ठी विभक्ति (ब्रह्मणः) का प्रयोग।

पद्म पुराण (सृष्टि खण्ड) के 17वें अध्याय के ये श्लोक उस समय के हैं जब ब्रह्मा जी के यज्ञ में सावित्री जी के विलंब से आने पर ब्रह्मा जी ने 'गायत्री' (गोपकन्या) से विवाह कर उन्हें अपने पास बैठा लिया था। सावित्री जी के आने पर उनके क्रोध और संवाद का वर्णन यहाँ है।
हिन्दी अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण:
श्लोक 121-122:
वहाँ पुत्र, पौत्र, भांजे, मामा और भाई उपस्थित थे। 'ऋभु' नामक वे देव भी थे जो देवताओं के भी देवता माने जाते हैं। वे सभी व्याकुल (विस्मय में) होकर खड़े थे कि अब सावित्री क्या कहेंगी? क्योंकि ब्रह्मा जी के पास वहाँ एक 'गोपकन्या' बैठी थी।
  • व्याकरण: 'वैलक्ष्ये' (विस्मय/व्याकुलता में), 'वदिष्यति' (वद् धातु, लृट् लकार - भविष्य काल)।
श्लोक 123-125:
वह (गायत्री) मौन होकर सबकी बातें सुन रही थी। अध्वर्यु (यज्ञ कराने वाले पुरोहित) द्वारा बुलाए जाने पर भी वह सुन्दरी (सावित्री) नहीं आई थी। तब इंद्र द्वारा लाई गई उस आभीर कन्या (गायत्री) को स्वयं विष्णु ने स्वीकार किया, रुद्र ने अनुमोदन किया और स्वयं ब्रह्मा (पिता) ने ग्रहण किया। वे (देवगण) सोच रहे थे कि अब यज्ञ कैसे पूरा होगा? इसी चिंता के बीच कमलालया (सावित्री) ने प्रवेश किया।
  • व्याकरण: 'मौनीभूता' (मौन होकर), 'वरवर्णिनी' (श्रेष्ठ वर्ण वाली स्त्री - सावित्री के लिए), 'अन्याहृता' (इन्द्र द्वारा लाई गई)।
श्लोक 126-128:
वहाँ ब्रह्मा जी सदस्यों, ऋत्विजों और देवताओं से घिरे थे। वेदपारंगत ब्राह्मण अग्नियों में आहुति दे रहे थे। वह गोपी (गायत्री) पत्नीशाला में बैठी थी, जिसने मृगशृंग धारण किया था, मेखला और रेशमी वस्त्र पहने थे और वह परम पद का ध्यान कर रही थी। वह पतिव्रता, पतिपरायण और यज्ञ में प्रधानता से बैठी थी। वह विशाल नेत्रों वाली सुन्दरी सूर्य के समान तेजस्वी थी।
  • व्याकरण: 'वेदपारगैः' (वेदों के ज्ञाता, तृतीया बहुवचन), 'क्षौमवस्त्र' (रेशमी वस्त्र), 'भास्करोपमा' (सूर्य के समान - उपमा अलंकार)।
श्लोक 129-131:
जैसे सूर्य की प्रभा सभा को प्रकाशित करती है, वैसे ही वह वहाँ चमक रही थी। ऋत्विज प्रज्वलित अग्नि की सेवा कर रहे थे। देवता अपने-अपने भाग (चरु) को प्रसन्नता से ग्रहण कर रहे थे। तब विलंब होने के कारण देवताओं ने कहा—"कार्य समय पर ही करना चाहिए, क्योंकि असमय किया गया कर्म फल नहीं देता। मनीषियों ने वेदों में ऐसा ही अधिकार देखा है।"
  • व्याकरण: 'द्योतयन्ती' (चमकती हुई - शतृ प्रत्यय, स्त्रीलिंग), 'फलदं' (फल देने वाला)।
श्लोक 132-135:
जब ब्राह्मणों द्वारा 'प्रावर्ग्य' कर्म किया जा रहा था और अध्वर्यु द्वारा पकाए गए दो प्रकार के दूध तैयार थे, तब देवी (सावित्री) ने सभा के बीच में मौन बैठे ब्रह्मा जी को क्रोधपूर्वक देखा और कहा— "हे देव! क्या आपके द्वारा किया गया यह व्यवहार उचित है? आपने कामासक्त होकर मेरा परित्याग करके यह पाप किया है। यह कन्या जिसे आपने सिर पर (प्रधान स्थान) बैठाया है, वह मेरे चरणों की धूल के समान भी नहीं है।"
  • व्याकरण: 'रुषान्विता' (क्रोध से युक्त), 'परित्यज्य' (परि + त्यज् + ल्यप् - त्याग कर), 'किल्बिषम्' (पाप/अपराध)।
श्लोक 136-138:
"सभा में बैठे ये सभी लोग जो कह रहे हैं, यदि आप चाहें तो समस्त प्राणियों के स्वामी होने के नाते वही आज्ञा दें। आपने रूप के लोभ में आकर यह लोक-निन्दित कार्य किया है। हे प्रभु! आपको न पुत्रों की लज्जा आई और न पौत्रों की। मैं मानती हूँ कि आपने स्वेच्छा (काम के वश) से यह निन्दनीय कर्म किया है। आप देवताओं के पितामह और ऋषियों के प्रपितामह हैं।"
  • व्याकरण: 'विगर्हितम्' (निन्दित), 'पितामह' (दादा), 'प्रपितामह' (परदादा)।
श्लोक 139-140:
"स्वयं को देखते हुए भी आपको लज्जा क्यों नहीं आई? लोक के बीच में मेरा अपमान हुआ है और आपकी हँसी हुई है। हे देव! यदि आपका यही भाव स्थिर है, तो आपको मेरा नमस्कार है। अब मैं अपनी सखियों को अपना मुख कैसे दिखाऊँगी?"
  • व्याकरण: 'त्रपा' (लज्जा), 'हास्यम्' (मजाक), 'दर्शयिष्यामि' (दृश् धातु, णिच् प्रत्यय लृट लकार उत्तमपुरुष एक वचन।


पद्म पुराण (Padma Purana) के सृष्टिखण्ड (Srishti Khanda), अध्याय १७ के श्लोक २४१-२५० में मुख्य रूप से कार्तिक अमावस्या, प्रतिपदा, ब्रह्म पूजा, नीराजन (आरती), रथ यात्रा और चैत्र मास में स्नान के पुण्य का वर्णन है। यह अंश 'बलिराज्य' (दीपावली से संबंधित) और विष्णु/ब्रह्मा पूजा की महिमा बताता है।
नीचे इन श्लोकों का हिन्दी अनुवाद व्याकरण सहित दिया गया है:
श्लोक २४१-२४२ (रथयात्रा और पूजा विधि)
एवं तूर्यनिनादैस्तु शङ्ख शब्दैश्च पुष्कलैः।
भ्रामयित्वा रथं वीर पुरं सर्वं प्रदक्षिणम्।२४१।
स्वस्थाने स्थापयेद्देवं दत्वा नीराजनं बुधः।
यएवं कुरुते यात्रां यो वा भक्त्यापिपश्यति।२४२।
  • अनुवाद: हे वीर (हे राजन्), इस प्रकार (एवं) वाद्ययंत्रों (तूर्य) के निनाद (नाद/आवाज़) और शंखों के पुष्कल (प्रचुर/ज़ोरदार) शब्दों के साथ, रथ को संपूर्ण पुर (नगर) में प्रदक्षिणा कराकर (घुमाकर), बुद्धिमान (बुधः) व्यक्ति देवता (भगवान्) को नीराजन (आरती) देकर अपने स्थान (स्वस्थान/मंदिर) में स्थापित करे। जो इस प्रकार यात्रा (रथयात्रा) करता है अथवा जो भक्तिपूर्वक इसे देखता है,।
  • व्याकरण:
    • तूर्यनिनादैः/शङ्खशब्दैः: तृतीया विभक्ति बहुवचन (साधन/साथ के अर्थ में)।
    • भ्रामयित्वा: भ्मि (घूमना) धातु + णिच् (प्रेरणार्थक) + क्त्वा प्रत्यय (घुमाकर)।
    • प्रदक्षिणम्: प्रदक्षिण (अव्ययीभाव समास - प्रकृष्टं दक्षिणं)।
    • स्थापयेत्: स्था धातु + णिच् (स्थापन कराना) + लिङ् लकार (विधि/आज्ञा)।
    • दत्वा: दा + क्त्वा (देकर)।
    • नीराजनं: नीराजन (आरती/प्रकाश) - द्वितीया विभक्ति।
श्लोक २४३-२४४ (कार्तिक पूजा और दीपदान)
रथं वा कर्षयेद्यस्तु स गच्छेद्ब्रह्मणः पदं।
कार्तिके मास्यमावास्यां यश्च दीपप्रदीपनं।२४३।
शालायां ब्रह्मणः कुर्यात्स गच्छेत्परमं पदम्।
गन्धपुष्पैर्नवैर्वस्त्रैरात्मानं पूजयेत्तु यः।२४४।
  • अनुवाद: जो रथ को (भक्तिपूर्वक) खींचता (कर्षण/खिंचाई) है, वह ब्रह्म (विष्णु) के पद (बैकुण्ठ) को प्राप्त होता है। जो कार्तिक मास की अमावस्या को (शालायाम् - घर में/मंदिर में) ब्रह्म (विष्णु) के लिए दीप का प्रदीपन (दीपक जलाना) करता है, वह परम पद को प्राप्त करता है। और जो गंध, पुष्प, नए वस्त्रों से (कार्तिक प्रतिपदा को) अपनी पूजा (स्वयं की पूजा/आत्म-पूजा) करता है।
  • व्याकरण:
    • कर्षयेत्: कृष् (खींचना) + लिङ् लकार (चाहिए/करते हैं)।
    • दीपप्रदीपनं: तत्पुरुष समास (दीपस्य प्रदीपनं)।
    • कार्तिके मासि: सप्तमी विभक्ति (समय सूचक - कार्तिक मास में)।
    • शालायाम्: सप्तमी विभक्ति (स्थान सूचक)।
श्लोक २४५-२४७ (बलिराज्य और ब्रह्म/विष्णु पूजा)
तस्यां प्रतिपदायां तु स गच्छेद्ब्रह्मणः पदम्।
*महापुण्यातिथिरियं -बलिराज्यप्रवर्तिनी।२४५।
ब्रह्मणः सुप्रिया नित्यं बालेयी परिकीर्तिता।
ब्रह्माणं पूजयेद्योऽस्यामात्मानं च विशेषतः।२४६।
स याति परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः।
चैत्रे मासि महाबाहो पुण्या प्रतिपदां वरा।२४७।
  • अनुवाद: वह कार्तिक की प्रतिपदा (तस्यां प्रतिपदायां) को ब्रह्म पद प्राप्त करता है। यह (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) महापुण्य तिथि है, जो 'बलिराज्य' को प्रवर्तिनी (प्रवर्तित करने वाली/आरंभ करने वाली) है। यह नित्य (सदैव) ब्रह्मा की सुप्रिया (अति प्रिय) और 'बालेयी' (बलि से संबंधित) कही गई है। जो इस (तिथि) में ब्रह्मा (विष्णु) की पूजा और विशेष रूप से अपनी (आत्मा की) पूजा करता है, वह अमित तेजस्वी विष्णु के परम स्थान को जाता है। हे महाबाहो! चैत्र मास में (आने वाली) प्रतिपदा भी पुण्यकारी और वरा (श्रेष्ठ) है।
  • व्याकरण:
    • बलिराज्यप्रवर्तिनी: बहुव्रीहि/तत्पुरुष (बलिस्य राज्यं प्रवर्तिनी - जो बलि के राज्य को लाती है)।
    • परिकीर्तिता: परि (उपसर्ग) + कीर्त (कहना) + क्त प्रत्यय (स्त्रीलिंग) - (कही गई है)।
    • अस्याम्: सप्तमी (इस तिथि में - 'बलिराज्य' वाली प्रतिपदा)।
    • याति: या (जाना) धातु + लट् लकार।
श्लोक २४८-२५० (चैत्र प्रतिपदा स्नान और नीराजन)
तस्यां यः श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानं कुर्यान्नरोत्तमः।
न तस्य दुरितं किंचिन्नाधयो व्याधयो नृप।२४८।
भवन्ति कुरुशार्दूल तस्मात्स्नानं समाचरेत्।
दिव्यं नीराजनंतद्धि सर्वरोगविनाशनं।२४९।
गोमहिष्यादि यत्किंचित्तत्सर्वं कर्षयेन्नृप।
तेन वस्त्रादिभिः सर्वैस्तोरणंबाह्यतो न्यसेत्।२५०।
  • अनुवाद: उस (चैत्र प्रतिपदा) तिथि में जो नरोत्तम (श्रेष्ठ पुरुष) श्वपच (चांडाल/अस्पृश्य) को छूकर स्नान करता है, हे नृप (राजा), उसके कोई दुरित (पाप), आधि (मानसिक पीड़ा) और व्याधि (शारीरिक रोग) नहीं (न) होते हैं। हे कुरुशार्दूल! इसलिए स्नान अवश्य करना चाहिए। वह दिव्य नीराजन (आरती/प्रकाश) सर्व रोग विनाशक है। हे नृप! गौ, महिषी (भैंस) आदि जो कुछ (पशु) हैं, उन सबको (उस दिन) कर्षयेत् (बाहर निकालना/सजाना) चाहिए, और उन वस्त्रादि (गहनों/कपड़ों) से बाहर (घर के) तोरण (द्वार) स्थापित करना चाहिए।
  • व्याकरण:
    • श्वपचं: श्व (कुत्ता) + पच् (पकाने वाला) - (चांडाल)।
    • दुरितं: (पाप/बुरा कर्म)।
    • आधयो/व्याधयो: प्रथम पुरुष बहुवचन (मानसिक/शारीरिक कष्ट)।
    • समाचरेत्: सम् (उपसर्ग) + आ + चर् + लिङ् (ठीक से आचरण करना/स्नान करना)।
    • नीराजनं: (आरती)।
    • बाह्यतः: (बाहर/द्वार पर)।
सार: यह श्लोक कार्तिक अमावस्या-प्रतिपदा (दिवाली) के दौरान रथयात्रा, लक्ष्मी-विष्णु पूजा, बलिराज्य उत्सव, और चैत्र प्रतिपदा को विशेष स्नान के द्वारा पाप-मुक्त होने तथा स्वास्थ्य लाभ का वर्णन करते हैं।

पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय 17, श्लोक 251-265) में कार्तिक माह की तिथियों, श्राद्ध कर्म, राजा बलि की कथा, गायत्री द्वारा दिए गए वरदान और भगवान राम (विष्णु अवतार) के राज्य अभिषेक से संबंधित प्रसंग वर्णित हैं।
यहाँ इन श्लोकों का हिन्दी अनुवाद व्याकरणिक टिप्पणी के साथ दिया गया है:
श्लोक अनुवाद (251-265)
251. ब्राह्मणानां तथा भोज्यं कुर्यात्कुरुकुलोद्वह। तिस्रो ह्येताः पुरा प्रोक्तास्तिथयः कुरुनन्दन।।
  • अनुवाद: हे कुरुकुलश्रेष्ठ (कुरुनन्दन)! तब ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। प्राचीन काल में ये तीन तिथियां (श्राद्ध आदि के लिए) कही गई हैं।
  • व्याकरण: कुरुकुलोद्वह - कुरु कुलस्य उद्वाहः (तत्पुरुष) या कुरु कुले उद्वहति इति (उपपद तत्पुरुष) - हे कुरुवंश को धारण करने वाले। प्रोक्ताः - प्र + वच् + क्त (स्त्रीलिंग बहुवचन) - कही गईं।
252. कार्तिकाश्वयुजे मासि चैत्रेमासि तथा नृप। स्नानं दानं शतगुणं कार्त्तिके या तिथिर्नृप।।
  • अनुवाद: कार्तिक, आश्विन (अश्वयुज) और चैत्र के महीनों में स्नान-दान का फल सौ गुना (शतगुण) हो जाता है। हे नृप (राजा)! विशेषकर कार्तिक माह में जो तिथि आती है (उसमें विशेष फल होता है)।
  • व्याकरण: कार्तिकाश्वयुजे - कार्तिकस्य आश्वयुजस्य च (द्वंद्व) - कार्तिक और आश्विन। शतगुणं - शतं गुणाः यस्मिन् तत् (बहुव्रीहि) - सौ गुना।
253. बलिराज्ञस्तु शुभदा पशूनां हितकारिणी। "गायत्र्युवाच। यदुक्तं तु तया वाक्यं सावित्र्या कमलोद्भवं।।
  • अनुवाद: (कार्तिक की वह तिथि) राजा बलि के लिए शुभदायी और पशुओं का हित करने वाली है। गायत्री बोलीं- सावित्री के द्वारा जो वाक्य (कथन) कमलाद्भव (ब्रह्माजी) के प्रति कहा गया...
  • व्याकरण: बलिराज्ञः - बलि राज्ञः (षष्ठी) - राजा बलि के। कमलोद्भवं - कमले उद्भवः यस्य सः (बहुव्रीहि) - कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा)।
254. न तु ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यन्ति कदाचन। मदीयं तु वचःश्रुत्वा ये करिष्यन्ति चार्चनं।।
  • अनुवाद: (सावित्री ने कहा था) वे ब्राह्मण कभी (आपकी) पूजा नहीं करेंगे। लेकिन जो मेरे वचनों को सुनकर (आपकी) अर्चना (पूजा) करेंगे...
  • व्याकरण: करिष्यन्ति - कृ धातु, लृट्लकार (भविष्यकाल), प्रथम पुरुष बहुवचन। मदीयं - मदीय - मेरा।
255. इह भुक्त्वा तु भोगांस्ते परत्र मोक्षभागिनः। एतां ज्ञात्वा परां दृष्टिं वरं तुष्टः प्रयच्छति।।
  • अनुवाद: वे (पूजा करने वाले) यहाँ (पृथ्वी पर) भोगों को भोगकर, परलोक में मोक्ष के भागी होंगे। इस प्रकार की (गायत्री की) श्रेष्ठ दृष्टि (बात) को जानकर (वह रुद्र/ब्रह्मा) प्रसन्न होकर वर देते हैं।
  • व्याकरण: भुक्त्वा - भुज् + क्त्वा (तुमुन/क्त्वा प्रत्यय) - खाकर/भोगकर। मोक्षभागिनः - मोक्षस्य भागिनः (षष्ठी तत्पुरुष) - मोक्ष के भागी।
256. शक्राहं ते वरं दास्ये संग्रामे शत्रुनिग्रहे। तदा ब्रह्मा मोचयिता गत्वा शत्रुनिकेतनम्।।
  • अनुवाद: (वर में कहा गया) हे शक्र (इन्द्र)! मैं तुम्हें शत्रु के विनाश (संग्राम में) वर दूंगा। तब ब्रह्माजी शत्रु के घर (निकेतन) जाकर (तुम्हें) मुक्त करने वाले होंगे।
  • व्याकरण: शत्रुनिग्रहे - शत्रोः निग्रहः (षष्ठी तत्पुरुष) - शत्रु का दमन/विनाश। मोचयिता - मुच् + तृच् प्रत्यय (कर्ता) - छुड़ाने वाले।
257. स्वपुरं लप्स्यसे नष्टं शत्रुनाशात्परां मुदं। अकंटकं महद्राज्यं त्रैलोक्ये ते भविष्यति।।
  • अनुवाद: तुम नष्ट हुए अपने नगर (स्वपुर) को पुनः प्राप्त करोगे। शत्रु के नाश से (तुम्हें) बहुत खुशी (परं मुदं) होगी। त्रिलोक में तुम्हारा अकंटक (शत्रुहीन) महान राज्य होगा।
  • व्याकरण: लप्स्यसे - लभ् धातु, लृट्लकार, मध्यम पुरुष एकवचन - प्राप्त करोगे। अकंटकं - न कंटकं यस्मिन् (नञ् तत्पुरुष/बहुव्रीहि) - बाधा रहित।
258. मर्त्यलोके यदा विष्णो अवतारं करिष्यसि। भ्रात्रा सह परं दुःखं स्वभार्याहरणादिजं।।
  • अनुवाद: जब (तुम) मर्त्यलोक (पृथ्वी) पर विष्णु के अवतार (राम) के रूप में आओगे, तब भाई (लक्ष्मण) के साथ अपनी पत्नी (सीता) के हरण से उत्पन्न (हरणादिजं) बहुत दुःख (पाओगे)।
  • व्याकरण: स्वभार्याहरणादिजं - स्वभार्यायाः हरणम् आदि यस्य (बहुव्रीहि) - पत्नी हरण आदि से उत्पन्न।
259. हत्वा शत्रुं पुनर्भार्यां लप्स्यसे सुरसन्निधौ। गृहीत्वातां पुनाराज्यं कृत्वा स्वर्गंगमिष्यसि।।
  • अनुवाद: शत्रु को मारकर देवताओं की उपस्थिति (सुरसन्निधौ) में पुनः पत्नी को प्राप्त करोगे। उन्हें (सीता को) ग्रहण करके, राज्य पुनः प्राप्त कर (अश्वमेध आदि) करके स्वर्ग जाओगे।
  • व्याकरण: हत्वा - हन् + क्त्वा - मारकर। लप्स्यसे - प्राप्त करोगे। गृहीत्वा - ग्रह + क्त्वा - ग्रहण करके।
260. एकादशसहस्राणि वर्षाणां च पुनर्दिवं। ख्यातिस्ते विपुला लोके अनुरागं जनैस्सह।।
  • अनुवाद: (तुम) ग्यारह हजार (11,000) वर्षों तक (राज्य करोगे) और फिर स्वर्ग जाओगे। लोक में तुम्हारी बहुत बड़ी ख्याति होगी और लोगों के साथ (तुम्हारा) बहुत प्रेम/अनुराग होगा।
  • व्याकरण: एकादशसहस्राणि - दस और एक ग्यारह हजार (बहुवचन)। विपुला - महान/बहुत।
261. सान्तानिकानाम तेषां लोका स्थास्यन्ति भाविताः। त्वया ते तारिता देव रामरूपेण मानवाः।।
  • अनुवाद: वे सान्तानिक (संतान/भक्त) लोग उस (भगवान के) लोक में निवास करेंगे। हे देव! रामरूप में तुम्हारे द्वारा वे मानव (भक्त) तार दिए गए।
  • व्याकरण: तारिता - तृ + णिच् + क्त - पार लगाए गए। भाविताः - भावित/पवित्र।
262. गायत्री तु तदा रुद्रंवरदा प्रत्यभाषत। पतितेपिच ते लिंगे पूजां कुर्वंति ये नराः।।
  • अनुवाद: तब वर देने वाली गायत्री ने रुद्र (शिव) से कहा- हे रुद्र! पतित (अशुभ स्थान पर) पड़े हुए भी, आपके लिंग (शिवलिंग) की जो मनुष्य पूजा करते हैं...
  • व्याकरण: प्रत्यभाषत - प्रति + आ + भाष् (लङ्लकार/आत्मनेपद) - कहा। पतितेपि - पतित + अपि - गिरे हुए होने पर भी।
263. ते पूताः पुण्यकर्माणः स्वर्गलोकस्य भागिनः। न तां गतिं चाग्निहोत्रे न क्रतौ हुतपावके।।
  • अनुवाद: वे पुण्यकर्म करने वाले मनुष्य पवित्र (पूताः) होकर स्वर्गलोक के भागी होते हैं। अग्निहोत्र में या यज्ञ (क्रतौ) में अग्नि में आहुति देने से...
  • व्याकरण: पूताः - पवित्र। पुण्यकर्माणः - पुण्यं कर्म येषां ते (बहुव्रीहि) - पवित्र कर्म वाले।
264. यां गतिं मनुजा यांति तव लिंगस्य पूजनात्। गंगातीरे सदा लिंगं बिल्बपत्रेण ये तव।।
  • अनुवाद: जो गति मनुष्य (पतित शिवलिंग की पूजा से पाते हैं), वह (गति) अग्निहोत्र से नहीं मिलती। गंगा के किनारे जो सदा आपके लिंग (शिवलिंग) की बिल्वपत्र से पूजा करते हैं...
  • व्याकरण: पूजनात् - पंचमी विभक्ति (हेतु/कारण) - पूजा के कारण। बिल्बपत्रेण - बिल्व पत्र के द्वारा।
265. पूजयिष्यंति सुप्राता रुद्रलोकस्य भागिनः। प्राप्यापि शर्वभक्तत्वमग्ने त्वं भव पावनः।।
  • अनुवाद: (वे) उत्तम तरीके से (सुप्राता) पूजा करके रुद्रलोक के भागी होते हैं। हे अग्नि! शर्व (शिव) के भक्त होकर तुम स्वयं पावन हो जाओ। [1.3.7-1.3.8]
  • व्याकरण: पूजयिष्यन्ति - लृट्लकार - पूजा करेंगे। पावनः - पवित्र करने वाला।
भावार्थ
इन श्लोकों में विशेष रूप से कार्तिक मास में पूजा के महत्व, भगवान राम के अवतार, उनके द्वारा शत्रुओं के विनाश (रावण वध/राम राज्य), और गायत्री द्वारा शिवजी को प्रसन्न करके पतित शिवलिंग की पूजा से भी फल मिलने का वरदान (शिव महिमा) वर्णित है। अंत में, रुद्रलोक (शिवलोक) की प्राप्ति का विधान बताया गया है।

पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय 17) के इन श्लोकों में देवी गायत्री ब्राह्मणों की महिमा और उनके माध्यम से देवताओं की तृप्ति का वर्णन कर रही हैं।
यहाँ इनका हिन्दी अनुवाद और व्याकरण सहित विवरण है:
श्लोक २६६-२६७
  • अनुवाद: (गायत्री माता अग्नि/विद्वान से कहती हैं) तुम्हारे प्रसन्न होने पर सभी देवता निश्चित रूप से प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। तुम्हारे मुख से हविष्य (आहुति) ग्रहण करके देवता तृप्त होते हैं। जैसा कि वेदों का वचन है, वे निस्संदेह भोजन करते हैं। गायत्री ने यह बात उन सभी ब्राह्मणों से कही।
  • व्याकरण:
    • त्वयि प्रीते: सप्तमी विभक्ति (सति सप्तमी), अर्थ—'तुम्हारे प्रसन्न होने पर'।
    • त्वन्मुखेन: 'त्वत् + मुखेन' (तृतीया विभक्ति), अर्थ—'तुम्हारे मुख के द्वारा'।
    • भुञ्जते: 'भुज्' धातु, आत्मनेपद, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
श्लोक २६८-२६९
  • अनुवाद: तुम सबको (ब्राह्मणों को) प्रसन्न करके मनुष्य सभी तीर्थों का फल प्राप्त करते हैं और निस्संदेह 'वैराज' नामक पद (लोक) को प्राप्त करते हैं। श्राद्धों में विभिन्न प्रकार के अन्न और अनेक दान देकर तुम्हें तृप्त करने वाले मनुष्य स्वयं देवताओं के समान (दिव्य) हो जाते हैं।
  • व्याकरण:
    • कृत्वा: 'कृ' धातु + 'क्त्वा' प्रत्यय, अर्थ—'करके'।
    • गमिष्यंति: 'गम्' धातु, लृट् लकार (भविष्य काल), प्रथम पुरुष, बहुवचन।
    • दत्वा: 'दा' धातु + 'क्त्वा' प्रत्यय, अर्थ—'देकर'।
श्लोक २७०-२७१
  • अनुवाद: जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनके मुख में देवता हविष्य (देवताओं का अन्न) और पितृगण कव्य (पितरों का अन्न) शीघ्रता से ग्रहण करते हैं। तुम सब (ब्राह्मण) तीनों लोकों को धारण करने में समर्थ हो और केवल एक प्राणायाम मात्र से तुम सब पवित्र हो जाओगे।
  • व्याकरण:
    • दिवौकसः: प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (देवताओं के लिए प्रयुक्त)।
    • धारणे: 'धृ' धातु + 'ल्युट्' प्रत्यय, सप्तमी विभक्ति।
    • शक्तास्त्रैलोक्यस्य: 'शक्ताः + त्रैलोक्यस्य' (विसर्ग संधि)।
श्लोक २७२-२७३
  • अनुवाद: हे द्विजोत्तमों! विशेष रूप से पुष्कर तीर्थ में स्नान करके और मुझ 'वेदमाता' का जप करके तुम दान लेने (प्रतिग्रह) से उत्पन्न दोषों को प्राप्त नहीं होगे। पुष्कर में अन्न दान करने से सभी देवता प्रसन्न होते हैं और वहाँ एक ब्राह्मण को भोजन कराने से एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल मिलता है।
  • व्याकरण:
    • जप्त्वा: 'जप्' धातु + 'क्त्वा' प्रत्यय।
    • अवाप्स्यते: 'अप्' धातु, कर्मवाच्य, लृट् लकार।
    • एकस्मिन्भोजिते: विशेषण-विशेष्य भाव, सप्तमी विभक्ति।
श्लोक २७४-२७५
  • अनुवाद: मनुष्य तुम्हारे हाथों में धन (दान) देकर ब्रह्महत्या जैसे पापों और अन्य किए गए दुष्कर्मों से मुक्त हो जाएंगे। मेरे (गायत्री) मंत्र के तीन बार जप के साथ तुम्हारी पूजा करने से ब्रह्महत्या के समान पाप भी तत्क्षण नष्ट हो जाता है।
  • व्याकरण:
    • मदीयेन: 'मद्' शब्द से निर्मित विशेषण, तृतीया विभक्ति।
    • नश्यति: 'नश्' धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
    • युष्मत्करे: 'युष्मद् + करे' (षष्ठी तत्पुरुष), 'तुम्हारे हाथ में'।
पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय 17) के इन श्लोकों में भगवती गायत्री की महिमा और उनके जप के फल का वर्णन है। यहाँ इनका सरल हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक व्याख्या दी गई है:
हिंदी अनुवाद
श्लोक 276: गायत्री मंत्र का जप दस जन्मों के, सौ जन्मों के और पिछले तीन युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर) के साथ-साथ सहस्रों जन्मों में किए गए पापों (किल्बिष) को नष्ट कर देता है।
श्लोक 277: (देवी कहती हैं—) ऐसा जानकर और मेरे द्वारा बताए गए इस जप को करने से तुम सदा पवित्र हो जाओगे, इसमें कोई संदेह नहीं है; इस विषय में कोई अन्य विचार (शंका) करने की आवश्यकता नहीं है।
श्लोक 278: विशेष रूप से 'ॐ' (तीन मात्राओं वाले प्रणव) के साथ और 'शिर' (गायत्री शिरस) के साथ मेरा जप करने पर सभी निश्चित रूप से पवित्र हो जाते हैं।
श्लोक 279: मैं आठ अक्षरों (गायत्री के प्रत्येक पद में 8 अक्षर) वाली हूँ और इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हूँ। मैं समस्त वेदों की माता हूँ और सभी पदों (छंदों/व्याकरणिक चरणों) से अलंकृत हूँ।
श्लोक 280: हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! भक्तिपूर्वक मेरा जप करने से तुम सिद्धि प्राप्त करोगे। मेरे जप के प्रभाव से ही तुम सभी को (संसार में) प्रधानता या श्रेष्ठता प्राप्त होगी।

व्याकरणिक व्याख्या (प्रमुख अंश)
  1. किल्बिषं (Kilbiṣam): कर्म कारक, द्वितीय विभक्ति, एकवचन। अर्थ: पाप को।
  2. हन्ति (Hanti): 'हन्' धातु (मारना/नष्ट करना), लट् लकार (वर्तमान काल), प्रथम पुरुष, एकवचन।
  3. ज्ञात्वा (Jñātvā): 'ज्ञा' धातु + 'क्त्वा' प्रत्यय। अर्थ: जानकर।
  4. भविष्यध्वं (Bhaviṣyadhvam): 'भू' धातु, लृट् लकार (भविष्य काल), आत्मनेपद, मध्यम पुरुष, बहुवचन। अर्थ: तुम सब हो जाओगे।
  5. सार्द्धंजप्त्वा (Sārddhañjaptvā): 'सार्द्धम्' (साथ) + 'जप्त्वा' (जप करके)। यहाँ संधि और प्रत्यय का प्रयोग है।
  6. द्विजसत्तमाः (Dvijasattamāḥ): द्विज + सत्तम (श्रेष्ठतम)। संबोधन बहुवचन। अर्थ: हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों!
  7. अष्टाक्षरा (Aṣṭākṣarā): बहुव्रीहि समास। आठ अक्षर हैं जिसके (गायत्री के तीन पदों में 8-8 अक्षर होते हैं)।


पद्म पुराण (सृष्टि खण्ड) के अध्याय १७ (पुष्कर माहात्म्य) के श्लोक संख्या २८१-२९० गायत्री देवी द्वारा लक्ष्मी जी को वरदान देने और उनके प्रभाव का वर्णन करते हैं। यहाँ श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और व्याकरण दिया गया है:
श्लोक २८१-२८२ (गायत्री का विप्र-प्रशंसा और शापमुक्त होना)
श्लोक:
गायत्रीसारमात्रोपि वरं विप्रः सुसंयतः।
नायंत्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी।२८१।
यस्माद्विप्रेषु सावित्र्या शापो दत्तःसदस्यथ।
अत्र दत्तं हुतं चापि सर्वमक्षयकारकम्।२८२।
हिन्दी अनुवाद:
[गायत्री देवी कहती हैं] जो विप्र (ब्राह्मण) केवल गायत्री के सार को जानने वाला हो, वह सुसंयमी (इंद्रियनिग्रही) है, तो वह श्रेष्ठ है। इसके विपरीत, जो चतुर्वेदी (चारों वेदों का ज्ञाता) होकर भी यदि इंद्रियों पर नियंत्रित नहीं है, और सब कुछ खाने वाला तथा सभी वस्तुओं को बेचने वाला (सर्वाशी-सर्वविक्रयी) है, तो वह श्रेष्ठ नहीं है। यद्यपि सावित्री (गायत्री) ने विप्रेषु (ब्राह्मणों को) शाप दिया था, लेकिन इस पुष्कर तीर्थ में यहाँ दिया गया दान और हवन (हुतं) सब कुछ अक्षय (अविनाशी) फल देने वाला होता है।
व्याकरण:
  • गायत्रीसारमात्रोपि: गायत्री + सार + मात्रः + अपि (दीर्घ संधि)।
  • सुसंयतः: सु + संयतः (अच्छी तरह नियंत्रित)।
  • सर्वाशी: सर्वम् अश्नातीति (सर्व+अश+णिनि - कर्म उपपद तत्पुरुष)।
  • सर्वविक्रयी: सर्वं विक्रिणातीति (सर्व+वि+क्री+णिनि - तत्पुरुष)।
  • अक्षयकारकम्: अक्षय कारकम् (अ-क्षय+कारकम्)।

श्लोक २८३-२८५ (वरदान और गायत्री का पुष्कर में निवास)
श्लोक:
दत्तो वरो मया तेन युष्माकं द्विजसत्तमाः।
अग्निहोत्रपरा विप्रास्त्रिकालं होमदायिनः।२८३।
स्वर्गं ते तु गमिष्यंति सैकविंशतिभिः कुलैः।
एवं शक्रस्य विष्णोश्च रुद्रस्य पावकस्य च।२८४।
ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च गायत्रीवरमुत्तमम्।
तस्मिन्वै पुष्करे दत्त्वा ब्रह्मणःपार्श्वगाऽभवत्।२८५।
हिन्दी अनुवाद:
[गायत्री कहती हैं] हे द्विजसत्तमों (श्रेष्ठ ब्राह्मणों)! मैंने उन्हें (पुष्कर में रहने वालों को) वर दिया है। जो ब्राह्मण अग्निहोत्र में तत्पर रहते हैं और तीनों कालों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में होम (यज्ञ) करते हैं, वे अपने २१ कुलों (पीढ़ियों) के साथ स्वर्ग को जाते हैं। इस प्रकार इंद्र (शक्र), विष्णु, रुद्र, अग्नि (पावक), ब्रह्मा और ब्राह्मणों (के कल्याण) के लिए गायत्री ने उत्तम वर देकर, ब्रह्मा के पार्श्व में निवास किया।
व्याकरण:
  • द्विजसत्तमाः: द्विजानां सत्तमाः (षष्ठी तत्पुरुष - ब्राह्मणों में श्रेष्ठ)।
  • अग्निहोत्रपरा: अग्निहोत्रे पराः (सप्तमी तत्पुरुष)।
  • त्रिकालं: त्रयाणां कालानां समाहारः (द्विगु समास)।
  • होमदायिनः: होमं ददतीति (कर्म उपपद तत्पुरुष)।
  • पार्श्वगा: पार्श्वं गच्छतीति (गम् धातु + क - उपपद तत्पुरुष)।

श्लोक २८६-२८८ (लक्ष्मी जी को वरदान)
श्लोक:
चारणैस्तु तदाऽऽख्यातं लक्ष्म्या वै शापकारणम्।
युवतीनाञ्च सर्वासां शापाञ्ज्ञात्वापृथक्पृथक्।२८६।
लक्ष्म्याश्चैव वरं प्रादाद्गायत्री ब्रह्मणः प्रिया।
अकुत्सितान्सदा सर्वान्कुर्वन्ती धनशोभना।२८७।
शोभिष्यसे न संदेहः सर्वेभ्यः प्रीतिदायिनी।
ये त्वया वीक्षिताःपुत्रि सर्वेते पुण्यभोजनाः।२८८।
हिन्दी अनुवाद:
तब चारणों ने लक्ष्मी के शाप का कारण बताया। युवतियों के अलग-अलग शाप को जानकर, ब्रह्मा की प्रिया गायत्री ने लक्ष्मी को वरदान दिया। अकुत्सित (निंदारहित) और सदैव धन से शोभित रहने वाली लक्ष्मी ने, सबकी प्रीति (प्रेम) बढ़ाने वाली होकर, कहा- "हे पुत्री! तुम (गायत्री) जहाँ भी रहोगी, वहां शोभित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। जिन पर तुम्हारी दृष्टि पड़ जाएगी, वे सभी पुण्य के भोक्ता (पुण्यभोजन) होंगे"।
व्याकरण:
  • शापकारणम्: शापस्य कारणम् (षष्ठी तत्पुरुष)।
  • पृथक्पृथक्: वीप्सा (द्विरुक्ति - अलग अलग)।
  • धनशोभना: धनेन शोभना (तृतीया तत्पुरुष)।
  • प्रीतिदायिनी: प्रीतिं ददातीति (प्रीति+दा+णिनि - उपपद तत्पुरुष)।
  • पुण्यभोजनाः: पुण्यं भुंजते इति (भुज धातु - पुण्य भोक्ता)।

श्लोक २८९-२९० (लक्ष्मी के प्रभाव की महिमा)
श्लोक:
परित्यक्तास्त्वया ये तु सर्वे ते दुःखभागिनः।
तेषां जातिः कुलं शीलं धर्मश्चैव वरानने।२८९।
सभायां ते च शोभंते दृश्यंते चैव पार्थिवैः।
अर्थित्वं चैव तेषां तु करिष्यंति द्विजोत्तमाः।२९०।
हिन्दी अनुवाद:
[गायत्री कहती हैं] हे वरांगने! (सुंदर मुख वाली लक्ष्मी) तुम्हारे द्वारा परित्यक्त (छोड़े गए) जितने भी लोग हैं, वे सभी दुःखी (दुःखभागी) होंगे। तुम्हारी कृपा से ही (उनके) जाति, कुल, शील और धर्म की रक्षा होती है। वे ही सभा में शोभित होते हैं और राजाओं (पार्थिवैः) द्वारा देखे जाते हैं। हे द्विजोत्तम! जिन पर तुम प्रसन्न होती हो, वे ही लक्ष्मीपति होते हैं (अर्थित्वं/अर्थपति - धनवान बनते हैं)।
व्याकरण:
  • दुःखभागिनः: दुःखं भजते इति (भज् धातु - दुःख पाने वाले)।
  • वरानने: वरं आननं यस्याः सा (बहुव्रीहि समास - हे सुंदर मुख वाली)।
  • द्विजोत्तमाः: द्विजानां उत्तमाः (षष्ठी तत्पुरुष)।
  • अर्थित्वं: अर्थ (धन) युक्त होने का भाव (अर्थ+इत्+त्व)।
(नोट: इन श्लोकों का मुख्य उद्देश्य गायत्री और लक्ष्मी के अंतर्संबंधों तथा पुष्कर तीर्थ की महिमा को स्पष्ट करना है।)


पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड के 17वें अध्याय के ये श्लोक मुख्य रूप से नहुषअगस्त्य मुनि और इंद्र-पत्नी शची (इन्द्राणी) के प्रसंग से जुड़े हैं। यहाँ इनका हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण दिया गया है:
हिंदी अनुवाद
श्लोक 291-292:
(देवता या इन्द्राणी कह रही हैं): "वे (सज्जन) आप पर सौजन्य (दया/स्नेह) दिखाते हैं। आप हमारे भाई, पिता, गुरु और निश्चित रूप से बांधव (मित्र) भी हैं। आपके बिना मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी। आपको देखने मात्र से मेरी दृष्टि प्रसन्न और शोभन (सुन्दर) हो जाती है और मन अत्यंत प्रसन्न हो जाता है, यह मैं आपसे सत्य-सत्य कहती हूँ।"
श्लोक 293-294:
"इस प्रकार के वचनों को आपकी दृष्टि से देखे गए वे सज्जन सुनेंगे, जो लोगों को प्रीति (आनंद) देने वाले हैं। इन्द्रपद प्राप्त करके नहुष आपको देखकर याचना (प्रार्थना) करेगा। आपकी दृष्टि से उसके पाप नष्ट हो जाएंगे, किंतु अगस्त्य मुनि के वचनों से वह निश्चित ही (पतन को प्राप्त होगा)।"
श्लोक 295-296:
"सर्प भाव (अजगर) को प्राप्त होकर वह उनसे प्रार्थना करेगा कि 'मैं अपने अहंकार (दर्प) के कारण नष्ट हो गया हूँ, हे मुने! आप मेरी शरण बनें।' उस राजा के उन वचनों को सुनकर वे भगवान ऋषि (अगस्त्य) मन में करुणा करके यह वाक्य कहेंगे—"
श्लोक 297-298:
"तुम्हारे ही कुल में 'कुलनन्दन' (युधिष्ठिर) नाम का राजा उत्पन्न होगा। वह तुम्हें सर्प रूप में देखकर तुम्हारे इस शाप को काट देगा। तब तुम सर्प योनि को छोड़कर पुनः स्वर्ग जाओगे। हे सुलोचने (शची)! मेरे वरदान से तुम अश्वमेध यज्ञ करने वाले अपने पति (इन्द्र) के साथ पुनः स्वर्ग प्राप्त करोगी।"
श्लोक 299-300:
"पुलस्त्य ऋषि बोले—तब उन सभी देव-पत्नियों ने संतुष्ट होकर बातें कीं। जो संतानहीन (स्त्रियां) थीं, उन्हें भी अब (भविष्य में) दुःख नहीं होगा। उस समय माँ गौरी को भी गायत्री ने इसी प्रकार समझाया।"

व्याकरणिक विश्लेषण (प्रमुख पद)
  1. सौजन्यं (Saujanyam): 'सुजन' शब्द से 'ष्यञ्' प्रत्यय लगकर बना है। इसका अर्थ है सज्जनता या सुहृदयता। (द्वितीया विभक्ति, एकवचन)।
  2. न जीवेयं (Na Jiveyam): 'जीव्' धातु, विधिलिङ् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन। (अर्थ: मैं जीवित नहीं रहूँगी/रहना चाहिए)।
  3. त्वयि दृष्टे (Tvayi Drishte): यहाँ सति सप्तमी का प्रयोग है। "आपके देखे जाने पर" या "आपको देखने पर"।
  4. प्रसीदतेत्यर्थं (Prasidatetyartham): प्रसीदति + इति + अर्थम्। (सत्य ही मन प्रसन्न होता है)।
  5. उत्पत्स्यते (Utpatsyate): 'उद् + पद्' धातु, लृट् लकार (भविष्य काल), आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, एकवचन। (अर्थ: उत्पन्न होगा)।
  6. भेत्स्यति (Bhetsyati): 'भिद्' धातु (तोड़ना/काटना), लृट् लकार, परस्मैपद। (अर्थ: भेदन करेगा या नष्ट करेगा)।
  7. समनुप्राप्य (Samanuprapya): सम् + अनु + प्र + आप् + ल्यप् प्रत्यय। (अर्थ: भली-भांति प्राप्त करके)।
  8. सुलोचने (Sulochane): संबोधन पद। 'सु' (सुन्दर) + 'लोचन' (नेत्र)। हे सुंदर नेत्रों वाली!
विशेष टिप्पणी: इन श्लोकों में भविष्य की उस घटना का संकेत है जब राजा नहुष अहंकारवश अगस्त्य मुनि को पालकी ढोने पर 'सर्प-सर्प' (जल्दी चलो) कहते हैं और मुनि उन्हें 'सर्प' (अजगर) होने का शाप दे देते हैं, जिसका उद्धार बाद में युधिष्ठिर करते हैं।


पद्म पुराण के सृष्टिखण्ड (Srishti Khanda) के अध्याय १७ (पुष्कर माहात्म्य के अंतर्गत) में जब गायत्री (ब्रह्मप्रिया) ब्रह्माजी के यज्ञ को पूर्ण करने के लिए वरदान देती हैं, तब रुद्र (शिव) उनकी स्तुति करते हैं। ये श्लोक (३०१-३१०) गायत्री के रूप और महिमा का वर्णन करते हैं।
यहाँ श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और संक्षिप्त व्याकरण दिया जा रहा है:
संस्कृत: बृंहिता परितोषेण वरान्दत्त्वा मनस्विनी। समाप्तिंतस्य यज्ञस्य काञ्क्षन्तीब्रह्मणःप्रिया।
हिंदी अनुवाद: (गायत्री) संतोष से वृद्धि को प्राप्त (प्रसन्न), वरदान देकर, मनस्विनी (माननीय/पवित्र), ब्रह्माजी की प्रिया (पत्नी गायत्री), उस यज्ञ की समाप्ति (पूर्णता) की कामना कर रही थीं।
व्याकरण:
  • बृंहिता: (स्त्रीलिंग, प्रथमा, एकवचन) - वृद्धि को प्राप्त/पुष्ट।
  • परितोषेण: (तृतीया, एकवचन) - संतोष से।
  • वरान्दत्त्वा: वरान् + दत्त्वा (वरदान देकर) - 'दा' धातु + क्त्वा प्रत्यय।
  • मनस्विनी: (स्त्रीलिंग, प्रथमा, एकवचन) - उच्च मन वाली।
  • काञ्क्षन्ती: (स्त्रीलिंग, प्रथमा, एकवचन) - 'काङ्क्ष' धातु + शतृ प्रत्यय (कामना करती हुई)।
श्लोक ३०२
संस्कृत: वरदां तां तथा दृष्ट्वा गायत्रीं वेदमातरम्। प्रणिपत्य तदा रुद्रः स्तुतिमेतां चकार ह।
हिंदी अनुवाद: वरदान देने वाली उन वेदमाता गायत्री को उस प्रकार देखकर, तब रुद्र (शिव) ने प्रणिपात (नमस्कार) करके यह स्तुति की।
व्याकरण:
  • वरदां: (द्वितीया, एकवचन) - वर देने वाली।
  • प्रणिपत्य: प्र + नि + पत + ल्यप् प्रत्यय - नमस्कार करके।
  • रुद्रः: (प्रथमा, एकवचन) - शिव।
  • चकार ह: 'कृ' धातु + लिट् लकार (परस्मैपद) - किया (ऐतिहासिक संदर्भ)।
श्लोक ३०३ (रुद्र उवाच)
संस्कृत: नमोस्तु ते वेदमातरष्टाक्षरविशोधिते। गायत्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा।
हिंदी अनुवाद: (रुद्र ने कहा) हे वेदमाता! आपको नमस्कार है। अष्टाक्षर (गायत्री मंत्र के ८ अक्षर) से विशोधित (पवित्र) होने वाली! हे गायत्री! आप दुर्गतरणी (दुखों से पार उतारने वाली) और सप्तविधा (सात प्रकार की) वाणी हैं।
व्याकरण:
  • नमोस्तु: नमः + अस्तु (नमस्कार हो)।
  • वेदमातर: (सम्बोधन) - हे वेदों की माता।
  • अष्टाक्षरविशोधिते: (सम्बोधन) - अष्ट (८) + अक्षर + विशोधित (शुद्ध)।
  • दुर्गतरणी: (सम्बोधन) - कठिन संसार से तारने वाली।
श्लोक ३०४-३०५
संस्कृत: सर्वाणि स्तुतिशास्त्राणि गाथाश्च निखिलास्तथा। अक्षराणि च सर्वाणि लक्षणानि तथैव च। भाष्यादि सर्वशास्त्राणि ये चान्ये नियमास्तथा। अक्षराणि च सर्वाणि त्वं तु देवि नमोस्तुते।
हिंदी अनुवाद: हे देवी! सभी स्तुति-शास्त्र, संपूर्ण गाथाएं, सभी अक्षर, लक्षण, भाष्य आदि समस्त शास्त्र और अन्य जो भी नियम (वेद/शास्त्र) हैं, वह सब आप ही हैं। आपको नमस्कार है।
व्याकरण:
  • निखिलास्तथा: निखिलान् + तथा (सभी प्रकार से)।
  • अक्षराणि: (बहुवचन) - वर्णमाला।
  • नमोस्तुते: नमः + अस्तु + ते (आपको नमस्कार हो)।
श्लोक ३०६ (गायत्री स्वरूप वर्णन)
संस्कृत: श्वेता त्वं श्वेतरूपासि शशांकेन समानना। बिभ्रती विपुलौ बाहू कदलीगर्भकोमलौ।
हिंदी अनुवाद: (रुद्र बोले) आप श्वेत (सफेद) रंग की हैं, श्वेतरूपा (पवित्र/शुभ्र) हैं, चंद्रमा के समान आनन (मुख) वाली हैं। आप कदलीगर्भ (केले के खंभे) के समान कोमल और विपुल (सुन्दर/स्थूल) भुजाओं को धारण करती हैं।
व्याकरण:
  • शशांकेन समानना: शशाङ्केन (चंद्रमा से) + समान (बराबर) + आनना (मुख वाली) - बहुव्रीहि समास।
  • बिभ्रती: 'भृ' धातु + शतृ प्रत्यय (स्त्रीलिंग) - धारण करती हुई।
  • कदलीगर्भकोमलौ: कदली (केला) + गर्भ (मध्य) + कोमलौ (अत्यंत कोमल)।
श्लोक ३०७
संस्कृत: एणश्रृँगं करे गृह्य पंकजं च सुनिर्मलम्। वसाना वसने क्षौमे रक्तेनोत्तरवाससा।
हिंदी अनुवाद: (आप) हाथ में एणश्रृंग (मृगशीर्ष) और सुनिर्मल (अत्यंत स्वच्छ) कमल धारण करती हैं। क्षौम (रेशमी) वस्त्र पहने हुए हैं और उत्तरवास (ओढ़नी) रक्त (लाल) रंग का है।
व्याकरण:
  • गृह्य: 'ग्रह' धातु + ल्यप् प्रत्यय - लेकर।
  • वसाना: 'वस' धातु + शानच् प्रत्यय (स्त्रीलिंग) - वस्त्र पहने हुए।
  • क्षौमे: (द्वितीया, द्विवचन) - रेशमी वस्त्र।
  • रक्तेनोत्तरवाससा: रक्तेन (लाल रंग के) + उत्तरवाससा (ओढ़नी से)।
श्लोक ३०८
संस्कृत: शशिरश्मिप्रकाशेन हारेणोरसि राजिता। दिव्यकुंडलपूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां सुविभूषिता।
हिंदी अनुवाद: चंद्रमा की किरणों के समान प्रकाशित (उज्ज्वल) हार से आपके वक्षस्थल (हृदय) सुशोभित हैं। दिव्य कुण्डलों से युक्त कानों से आप विभूषित हैं।
व्याकरण:
  • शशिरश्मिप्रकाशेन: शशी (चंद्र) + रश्मि (किरण) + प्रकाश (चमक) - तृतीया।
  • राजिता: सुशोभित।
  • दिव्यकुंडलपूर्णाभ्यां: दिव्य कुण्डलों से युक्त (कर्णाभ्यां - कानों के साथ)।
श्लोक ३०९
संस्कृत: चंद्रसापत्न्यभूतेन मुखेन त्वं विराजसे। मकुटेनातिशुद्धेन केशबंधेन शोभिता।
हिंदी अनुवाद: चंद्रमा के साथ सौत जैसा व्यवहार (उससे भी अधिक सुंदर) करने वाले मुख से आप विराजमान हैं। अत्यंत शुद्ध (स्वच्छ/दिव्य) मुकुट और केशबंध (केशों की रचना) से शोभित हैं।
व्याकरण:
  • चंद्रसापत्न्यभूतेन: चंद्रमा की सौत (उससे अधिक सुंदरता) के भाव वाले।
  • विराजसे: 'विराज' धातु + लट् लकार (आत्मनेपद) - विराजमान हैं।
श्लोक ३१०
संस्कृत: भुजंगाभोगसदृशौ भुजौ ते भूषणन्दिवः। स्तनौ ते रुचिरौ देवि वर्तुलौ समचूचुकौ।
हिंदी अनुवाद: हे देवी! आपकी भुजाएं भुजंगाभोग (सर्प के शरीर) के समान कोमल और सुंदर हैं, जो स्वर्ग के आभूषण के समान हैं। आपके स्तन रुचिर (सुंदर), वर्तुल (गोल) और सम-चूचुक (समान चूँच वाले) हैं।
व्याकरण:
  • भुजंगाभोगसदृशौ: भुजंग (सांप) + आभोग (शरीर का विस्तार) + सदृशौ (समान)।
  • भुजौ: भुजाएं।
  • रुचिरौ/वर्तुलौ: सुन्दर / गोल।
(नोट: यह अनुवाद पद्म पुराण के सृष्टिखण्ड के प्रामाणिक संस्करणों के आधार पर किया गया है।) 


पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड के 17वें अध्याय के ये श्लोक मुख्य रूप से देवी गायत्री और सावित्री की स्तुति और उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं। यहाँ इन श्लोकों का व्याकरणिक संदर्भ के साथ सरल हिंदी अनुवाद दिया गया है:
श्लोक 311-313: शारीरिक सौंदर्य और महिमा
  • अनुवाद: वे देवी अत्यंत शुभ्र (सफेद/निर्मल) जघन भाग वाली और पेट पर पड़ने वाली तीन रेखाओं (त्रिवली) से सुशोभित हैं। उनकी नाभि गहरी और शुभ दर्शन देने वाली है। हे सुंदर मुख वाली! आपके जघन चौड़े, नितम्ब सुंदर और दोनों जांघें सुडौल एवं गोल हैं। आपके घुटने और चरण भी अत्यंत सुंदर हैं। हे महाभागे! आप तीनों लोकों को धारण करने वाली, पृथ्वी पर सत्य याचना (प्रार्थना) को पूर्ण करने वाली और वर देने वाली हैं।
श्लोक 314-316: पूजा का फल और रक्षण
  • अनुवाद: पुष्कर तीर्थ में जो आपकी यात्रा (दर्शन) करेगा, वह सफल होगा। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को आपको सबसे पहले पूजा प्राप्त होगी। जो मनुष्य आपके प्रभाव को जानकर आपकी पूजा करेंगे, उन्हें पुत्र या धन किसी भी वस्तु की कमी नहीं रहेगी। जो लोग जंगलों में, बीहड़ रास्तों में या महासागर में फंसे हों, अथवा डाकुओं द्वारा रोक लिए गए हों, उनके लिए आप ही परम गति (रक्षक) हैं।
श्लोक 317-320: देवी के विविध रूप और नाम
  • अनुवाद: आप ही सिद्धि, श्री (लक्ष्मी), धृति (धैर्य), कीर्ति, ह्री (लज्जा), विद्या, सन्नति (विनम्रता) और मति (बुद्धि) हैं। आप ही संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा और कालरात्रि हैं। आप माता अंबा, कमला, ब्रह्माणी और ब्रह्मचारिणी हैं। आप समस्त देवताओं की जननी और परम सुंदरी गायत्री हैं। आप ही जया, विजया, पुष्टि, क्षमा और दया हैं। आप ब्रह्मा जी (पितामह) के पास रहने वाली सावित्री की छोटी बहन और उनकी प्रिय हैं। आप बहुरूपा, विश्वरूपा, सुंदर नेत्रों वाली और भक्तों की रक्षा करने वाली हैं।
श्लोक 321-325: निवास स्थान और व्याप्ति
  • अनुवाद: हे महादेवि! आपका निवास पुण्य नगरों, आश्रमों, वनों और उपवनों में है। समस्त ब्रह्मस्थानों (यज्ञ स्थलों) में आप ब्रह्मा जी के बाईं ओर स्थित रहती हैं; दाईं ओर सावित्री और मध्य में स्वयं पितामह ब्रह्मा विराजते हैं। आप यज्ञों की वेदी और ऋत्विजों की दक्षिणा हैं। आप राजाओं की सिद्धि और समुद्र की वेला (किनारा) मानी गई हैं। ब्रह्मचारियों की दीक्षा, परम शोभा और नक्षत्रों में रोहिणी आप ही हैं। राजद्वारों, तीर्थों और नदियों के संगमों पर आपका वास है।

व्याकरणिक विशेषताएँ (विशेष शब्दार्थ):
  1. त्रिवलीभंगदर्पिता: (त्रि + वली + भंग + दर्पिता) - पेट की तीन सिलवटों के सौंदर्य से युक्त। यहाँ 'बहुव्रीहि' समास का आभास है।
  2. वरवर्णिनी: श्रेष्ठ वर्ण (रंग) वाली स्त्री। यह देवी के लिए संबोधन है।
  3. लप्स्यसे: 'लभ्' धातु (प्राप्त करना), लृट् लकार (भविष्य काल), आत्मनेपद, मध्यम पुरुष, एकवचन। अर्थ: "तुम प्राप्त करोगी"।
  4. त्वं गतिः परमा नृणाम्: यहाँ 'नृणाम्' में षष्ठी विभक्ति बहुवचन है (मनुष्यों की)। 'गतिः' प्रथमा विभक्ति है।
  5. ब्रह्मणो वामतः स्थिता: 'वामतः' में 'तस्' प्रत्यय है जो दिशा (बाईं ओर) को दर्शाता है। 'ब्रह्मणः' में षष्ठी विभक्ति है।
निष्कर्ष: इस अंश में गायत्री को केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि एक साकार 'शक्ति' और 'ब्रह्मा की शक्ति' के रूप में स्थापित किया गया है जो संसार के हर कण और सौभाग्य में व्याप्त हैं।


यह श्लोक पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड (अध्याय 17) से हैं, जहाँ माता गायत्री और ब्रह्मा जी (या देवताओं) के बीच संवाद हो रहा है। इसमें देवी की महिमा और उनके विभिन्न रूपों का वर्णन है।
यहाँ इसका हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण दिया गया है:
हिंदी अनुवाद
श्लोक 325-327:
"नक्षत्रों में आप रोहिणी हैं। राजद्वार, तीर्थों, नदियों के संगम और मुनियों में आप क्षमा-सिद्धि हैं। पूर्णिमा की रात्रि में आप पूर्ण चंद्रमा हैं। नीति में बुद्धि, क्षमा और धृति (धैर्य) आप ही हैं। हे वरवर्णिनी! स्त्रियों में आप उमादेवी (पार्वती) के रूप में सुनी जाती हैं। आप इन्द्र की सुंदर दृष्टि और उनकी सहस्र आँखों की शक्ति हैं। ऋषियों की धर्म-बुद्धि और देवताओं की परम गति (परायण) आप ही हैं।"
श्लोक 328-329:
"किसानों के लिए आप सीता (हल की रेखा/भूमि की शक्ति) हैं और समस्त प्राणियों के लिए धरणी (पृथ्वी) हैं। आप स्त्रियों के सौभाग्य की रक्षा करने वाली और सदैव धन-धान्य देने वाली हैं। जो आपकी पूजा करता है, उसके रोग, मृत्यु और भय को आप शांत कर देती हैं। विशेषकर कार्तिक मास की पूर्णिमा को जो आपकी भली-भांति पूजा करता है—"
श्लोक 330-331:
"—हे शुभप्रदे! आप उसकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली होती हैं। जो मनुष्य इस स्तोत्र को पढ़ता है या बार-बार सुनता है, वह सर्वार्थसिद्धि (सभी मनोरथों की प्राप्ति) प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
गायत्री माता ने कहा: हे पुत्र! तुमने जो कुछ कहा है, वह वैसा ही होगा। तुम भगवान विष्णु के साथ सभी स्थानों पर पूजे जाओगे।"

व्याकरणिक विश्लेषण (प्रमुख पद)
  1. च नक्षत्राणां च रोहिणी:
    • नक्षत्राणां: 'नक्षत्र' शब्द, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन (नक्षत्रों में/का)।
    • रोहिणी: प्रथमा विभक्ति, एकवचन (स्त्रीलिंग)।
  2. नदीनां संगमेषु:
    • नदीनां: 'नदी' शब्द, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन (नदियों के)।
    • संगमेषु: 'संगम' शब्द, सप्तमी विभक्ति, बहुवचन (संगमों में)।
  3. श्रूयसे (श्रूयसे वरवर्णिनी):
    • श्रूयसे: 'श्रु' धातु, लट् लकार (वर्तमान काल), आत्मनेपद, मध्यम पुरुष, एकवचन। अर्थ: "सुनी जाती हो"।
  4. कर्षकाणां च सीता:
    • कर्षकाणां: 'कर्षक' (किसान), षष्ठी विभक्ति, बहुवचन।
    • सीता: यहाँ हल से बनी रेखा या उपजाऊ शक्ति के अर्थ में प्रयुक्त है।
  5. शमयिष्यसि:
    • शमयिष्यसि: 'शम्' धातु (णिजन्त रूप), लृट् लकार (भविष्य काल), परस्मैपद, मध्यम पुरुष, एकवचन। अर्थ: "शांत कर दोगी" या "नाश कर दोगी"।
  6. पठते / शृणुयात्:
    • पठते: 'पठ्' धातु, लट् लकार, आत्मनेपद (आर्ष प्रयोग), प्रथम पुरुष, एकवचन।
    • शृणुयात्: 'श्रु' धातु, विधिलिङ् लकार (चाहिए/संभावना), प्रथम पुरुष, एकवचन।
  7. नास्त्यत्र (न + अस्ति + अत्र):
    • यहाँ दीर्घ संधि (न + अस्ति = नास्ति) और यण संधि (नास्ति + अत्र = नास्त्यत्र) हुई है। अर्थ: "यहाँ नहीं है"।
विशेष: यह अध्याय 'सावित्री-गायत्री विवाद' और अंत में गायत्री माता द्वारा दिए गए वरदान से संबंधित है, जो भक्त को आध्यात्मिक और भौतिक दोनों लाभ सुनिश्चित करता है।


*****
पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय 17 (सावित्री विवाद-गायत्री वरप्रदानम्) के अंतिम श्लोकों (325-332) का हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है। इन श्लोकों में गायत्री देवी ने सावित्री के श्राप के उत्तर में स्वयं के वरदान और महिमा का वर्णन किया है:

श्लोक 325-326 (गायत्री उवाच):
हे सावित्री! मुनियों में मैं 'क्षमा' हूँ और नक्षत्रों में 'रोहिणी' हूँ। राजद्वारों (राजाओं के महल), पवित्र तीर्थों और नदियों के संगमों पर मैं ही निवास करती हूँ। पूर्णिमा के दिन पूर्णचंद्र में मैं ही विद्यमान रहती हूँ। नीति के ज्ञान में बुद्धि, सहनशीलता और धैर्य भी मैं ही हूँ। हे वरवर्णिनी (सुंदर वर्ण वाली)! मैं ही नारियों में उमादेवी (पार्वती) के रूप में भी सुनी जाती हूँ।
श्लोक 327-328:
इन्द्र की सुंदर दृष्टि मैं ही हूँ, और सहस्त्रनयन (इन्द्र) के नेत्रों में भी मैं ही निवास करती हूँ। ऋषियों की धर्मबुद्धि और देवताओं की परायण शक्ति (आश्रय) भी मैं ही हूँ। कृषकों (किसानों) के लिए मैं ही सीता (हल की रेखा/लक्ष्मी) हूँ और भूतों (जीवों) के लिए धरती (धरणी) हूँ। मैं ही सदा स्त्रियों को वैधव्य (पति की मृत्यु) से बचाकर सौभाग्य प्रदान करती हूँ और धन-धान्य की दात्री हूँ।
श्लोक 329-330:
पूजित होने पर (विधिपूर्वक पूजे जाने पर), मैं व्याधि (रोग), मृत्यु और भय को शांत कर देती हूँ। कार्तिक मास की पूर्णिमा को जो मुझे विधिपूर्वक पूजता है, हे शुभप्रदे! मैं उसे सब कुछ प्रदान करती हूँ। जो भी मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है या इसे बार-बार सुनता है, वह सभी अर्थों (पुरुषार्थों) की सिद्धि प्राप्त करता है—इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 331-332 (गायत्री उवाच):
पुत्र (ब्रह्माजी)! तुमने जो कहा है, वह वैसा ही (सत्य) होगा। विष्णु के साथ मिलकर तुम सभी स्थानों (तीर्थों) में व्याप्त रहोगे।
इति श्रीपाद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे सावित्री विवादगायत्री वरप्रदानं नाम सप्तदशोऽध्यायः।१७।
(अर्थ: इस प्रकार श्रीपाद्मपुराण के प्रथम सृष्टि खण्ड में सावित्री विवाद-गायत्री वरप्रदान नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ)।