पौराणिक एवं ऐतिहासिक परिचय (भाग एक)
[ध्वनि निर्देश (BGM)]
वीणा का धीमा, एकाग्र और गंभीर आलाप। पृष्ठभूमि में संगीत न्यूनतम है। कुछ क्षणों के ठहराव के बाद एक अत्यंत शांत और मर्मस्पर्शी बाँसुरी की धुन उभरती है।
सूत्रधार (गंभीर, धीमे और नैरेटिव स्वर में):
भारतीय पुराणशास्त्र और इतिहास के गर्भ में एक ऐसा बहुआयामी व्यक्तित्व समाहित है, जो परम ऐश्वर्यशाली होते हुए भी माटी से जुड़ा है। वे भागवत धर्म के संस्थापक हैं, स्वराट-विष्णु हैं, और भारतीय जनमानस के सबसे गहरे आत्मीय स्वर हैं। आज हम श्रीकृष्ण के उसी ऐतिहासिक, पौराणिक और भाषाई स्वरूप की एक शोधपूर्ण यात्रा पर चलेंगे।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी की धुन धीमी होकर पृष्ठभूमि में विलीन हो जाती है।
सूत्रधार:
'कृष्ण'—यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक कृषक परम्परा और भाषाई विकास का साक्ष्य है। वैदिक भाषा की धातु 'कृष्' का अर्थ है—हल चलाना या कर्षण करना। कृष्ण एक विशेषण है जो उनकी कृषक पृष्ठभूमि को इंगित करता है। गोपालन और कृषि कार्य में धूप-छाँव की परवाह किए बिना दिन-रात प्रकृति के बीच रहने से त्वचा का रंग श्यामल हो जाता है। मेलेनिन का यही प्रभाव कालान्तर में 'कृष्ण' शब्द को 'काले' या 'गहरे नीले' रंग के अर्थ में रूढ़ कर गया।
महाभारत के शांति पर्व में स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से अपने नाम की निरुक्ति करते हुए कहते हैं...
आवाज़ २ (श्रीकृष्ण का स्वर - धीमा, आत्मिक और गूँजता हुआ):
"कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णायसो महान्।
कृष्णो वर्णश्च मे यस्मात् तस्मात् कृष्णोऽहमर्जुन॥"
अर्थात, हे पार्थ! मैं एक महान काले लोहे के हल का रूप धारण करके इस पृथ्वी को जोतता हूँ, और मेरा वर्ण भी श्याम है, इसी कारण मैं 'कृष्ण' कहलाता हूँ।
सूत्रधार:
कृष्ण के बड़े भाई संकर्षण हैं, जो हल के आविष्कारक और कृषिविद्या के जनक माने जाते हैं। यह दोनों भाई उस परम्परा के संवाहक हैं जहाँ रक्षक ही पालक है। जो संपूर्ण जगत की रक्षा करने में समर्थ है, वह गोपों के घर 'गोप' बनकर आता है।
[ध्वनि निर्देश]
मृदंगम की एक बहुत ही हल्की थाप और वीणा का एक छोटा-सा गमक।
सूत्रधार:
श्रीकृष्ण केवल मथुरा या वृन्दावन तक सीमित नहीं रहे। वे सांस्कृतिक चेतना बनकर पूरे भारत में प्रवाहित हुए। राजस्थान के नाथद्वारा में वे सात वर्षीय बालक 'श्रीनाथजी' के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जहाँ उनका मंदिर 'हवेली' कहलाता है और वे 'ठाकुर जी' के रूप में पूजे जाते हैं। महाराष्ट्र के पंढरपुर में वे ईंट पर खड़े 'विठोबा' या 'पांडुरंग' हैं। वहीं दक्षिण में, केरल के गुरुवायूर में वायु देवता द्वारा स्थापित 'गुरुवायूरप्पन' के बाल रूप में, और अरनमुला में अर्जुन के सारथी 'पार्थसारथी' के रूप में उनकी आराधना होती है।
[ध्वनि निर्देश]
संगीत में एक रहस्यमयी ठहराव। केवल एक गहरा बेस (bass) स्वर गूँजता है।
सूत्रधार (जिज्ञासापूर्ण स्वर में):
परंतु, इस महामानव के जन्म को लेकर एक गहरा रहस्य आज भी पुराणों के पृष्ठों में छिपा है। श्रीकृष्ण का जन्म कब हुआ? आज हम भाद्रपद मास की कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। श्रीमद्भागवत और हरिवंश पुराण उनके जन्म के नक्षत्र (रोहिणी) और प्रहर का तो सूक्ष्म वर्णन करते हैं, किन्तु मास का स्पष्ट उल्लेख नहीं करते।
पद्मपुराण (उत्तरखण्ड) और विश्वामित्र संहिता जैसे प्राचीन ग्रन्थ एक अलग ही सत्य की ओर संकेत करते हैं। इन ग्रन्थों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद में नहीं, अपितु वर्षा ऋतु के श्रावण मास (नभस्) की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। समय चक्र और अक्षांश-देशांतर के ऐतिहासिक परिवर्तनों ने शायद श्रावण की इस तिथि को भाद्रपद की स्मृति में बदल दिया।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी की एक मधुर, रहस्यमयी तान जो दिव्यता का आभास कराती है।
सूत्रधार (गंभीरता और भक्तिभाव के मिश्रण के साथ):
श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी एक और रहस्यमयी गुत्थी है—उनका 'यमज' अर्थात जुड़वाँ रूप का सिद्धांत। कृष्ण यामल तन्त्र और अन्य आगम ग्रन्थों के अनुसार, जिस क्षण मथुरा के कारागार में श्रीवसुदेव और देवकी के सम्मुख शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी 'चतुर्भुज' ऐश्वर्य रूपी नारायण प्रकट हुए, ठीक उसी पल गोकुल में नन्दबाबा और यशोदा के घर विशुद्ध वात्सल्यमय 'द्विभुज' बालरूप में भगवान का प्राकट्य हुआ।
यशोदा ने जुड़वाँ संतानों को जन्म दिया—एक पुत्र 'गोविन्द' और एक कन्या 'अम्बिका' जो योगमाया थीं।
[ध्वनि निर्देश]
वीणा पर एक तेज़ और जादुई आरोह (ascend)।
सूत्रधार:
जब वसुदेव जी अपने चतुर्भुज बालक को लेकर नन्द भवन पहुँचे, तो एक अद्भुत खगोलीय और आध्यात्मिक घटना घटी। वसुदेव द्वारा लाया गया वह ऐश्वर्यशाली वासुदेव स्वरूप, नन्द-यशोदा के उस द्विभुज बालक में उसी प्रकार विलीन हो गया, जैसे घने बादलों में बिजली समा जाती है। गोकुल के उस श्यामल बालक में वैकुण्ठ का ऐश्वर्य और गोलोक का माधुर्य, दोनों एकाकार हो गए।
आवाज़ २ (श्लोक वाचन - शांत स्वर):
"गोकुले वासुदेवोऽसौ गोविन्दे प्रत्यलीयत।
श्यामो नन्दस्य वर्णेन वेदज्ञैरिति गीयते॥"
सूत्रधार:
नन्द-यशोदा का वर्ण श्यामल होने के कारण ही वह गोविन्द साँवला हुआ। श्रीकृष्ण का यह व्यक्तित्व, जो हलधर का अनुज है, जो यशोदा का नंदन है, और जो महाभारत का नीति-नियंता है, एक ही साथ मानव और महामानव की पूर्णता का सबसे विलक्षण साक्ष्य है।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी और वीणा की जुगलबंदी एक शांत, गंभीर और आध्यात्मिक स्वर में उभरती है। संगीत धीरे-धीरे धीमा होता हुआ पूर्ण मौन में विलीन हो जाता है। (Fade out)
ऑडियो डॉक्युमेंट्री स्क्रिप्ट: श्रीकृष्ण का पौराणिक परिचय - अवतार और योगमाया का रहस्य (भाग दो)
[ध्वनि निर्देश (BGM)]
वीणा के तार पर एक गहरा, धीमा और गंभीर गमक (bass note)। पृष्ठभूमि एकदम शांत है। कुछ क्षणों के बाद वीणा के साथ बाँसुरी का एक उदास और करुण स्वर गूँजता है, जो पृथ्वी की व्यथा को दर्शाता है।
सूत्रधार (गंभीर, धीमे और नैरेटिव स्वर में):
श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण और ब्रह्म पुराण के पन्नों में श्रीकृष्ण का अवतरण केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक विराट ब्रह्मांडीय योजना है। जब-जब पृथ्वी पर अहंकार और अत्याचार का भार बढ़ता है, तब-तब वह परमसत्ता किसी न किसी रूप में इस धरा पर उतरती है। आज हम श्रीकृष्ण के उसी अलौकिक अवतरण, 'सित-कृष्ण केश' के रहस्य और उनके दो भिन्न स्वरूपों—'ऐश्वर्य' और 'माधुर्य' की कथा में प्रवेश करेंगे।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी का स्वर धीमा होकर करुणा में बदल जाता है।
सूत्रधार:
ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण की कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में जब उग्रसेन-पुत्र कंस (जो पूर्व जन्म में कालनेमि नामक असुर था) और अन्य दैत्यों का अत्याचार बढ़ा, तो पृथ्वी अत्यंत व्यथित हो गई। भारी भार से दबी हुई पृथ्वी, गाय का रूप धारण कर देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के पास और फिर क्षीरसागर में भगवान नारायण के पास पहुँची। पृथ्वी की पुकार सुनकर परमसत्ता ने अवतार की जो रूपरेखा रची, वह अत्यंत गूढ़ थी।
आवाज़ २ (ऋषि वेदव्यास का स्वर - अत्यंत धीमा, आत्मिक और गूंजता हुआ):
"एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः।
उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महामुने॥"
सूत्रधार:
अर्थात, देवताओं और पृथ्वी द्वारा स्तुति किए जाने पर भगवान परमेश्वर ने अपने दो केश उखाड़े—एक श्वेत (सफेद) और एक कृष्ण (काला)। भगवान ने घोषणा की कि उनका यह श्वेत केश रोहिणी के गर्भ से बलराम के रूप में, और श्याम केश देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेगा। यह 'सित-कृष्ण' केश मात्र एक भौतिक प्रतीक नहीं, बल्कि परब्रह्म के उस अनंत प्रकाश और गहन अंधकार के समागम का प्रतीक है, जो सृष्टि का मूल है।
[ध्वनि निर्देश]
वीणा पर एक तेज़ झंकार, जैसे ब्रह्मांड में कोई बड़ी हलचल हो रही हो।
सूत्रधार:
इस ब्रह्मांडीय योजना को धरातल पर उतारने का कार्य सौंपा गया 'योगमाया' अर्थात् महामाया को। भगवान हरि ने अपनी योगनिद्रा को आदेश दिया कि वह पाताल में स्थित हिरण्यकशिपु के छह पूर्व पुत्रों को एक-एक करके देवकी के गर्भ में स्थापित करे, जिनका वध कंस करेगा। तत्पश्चात, सातवें गर्भ को देवकी के उदर से निकालकर गोकुल में रोहिणी के गर्भ में स्थापित किया जाए। गर्भ से खींचे जाने के कारण ही वह श्वेत वर्ण का बालक संसार में 'संकर्षण' (बलराम) कहलाया।
और आठवें गर्भ में स्वयं परमसत्ता श्रीकृष्ण आने वाले थे।
[ध्वनि निर्देश]
मृदंगम की एक बहुत ही हल्की, रहस्यमयी थाप। संगीत में ठहराव।
सूत्रधार:
परंतु, जब अवतार हुआ, तो एक अद्भुत रहस्यमयी घटना घटी। कंस के कारागार में और गोकुल के नन्द भवन में, दोनों जगह एक साथ प्रसव हुआ। लेकिन दोनों स्थानों पर प्रकट हुए स्वरूपों में एक दार्शनिक भिन्नता थी।
विद्वान और महानुभाव बताते हैं कि वसुदेव और देवकी की भक्ति 'ऐश्वर्य मिश्रित' थी। वे भगवान को भगवान के रूप में पूजते थे। इसीलिए कारागार में परमसत्ता अपने 'चतुर्भुज' शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी रूप में प्रकट हुई। यह उनका 'ऐश्वर्य' रूप था।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी की एक अत्यंत मधुर, लोरी जैसी धुन उभरती है।
सूत्रधार:
इसके विपरीत, नन्दबाबा और माता यशोदा का प्रेम विशुद्ध वात्सल्य था। उसमें भगवान के प्रति कोई ऐश्वर्य-ज्ञान या भय नहीं था। वे तो केवल एक पुत्र चाहते थे। इसीलिए, भगवान उनके प्रेम के वशीभूत होकर गोकुल में द्विभुज (दो भुजाओं वाले) एक साधारण शिशु के रूप में प्रकट हुए। यह गोलोक का 'माधुर्य' रूप था।
जब वसुदेव अपने चतुर्भुज नारायण को लेकर गोकुल पहुँचे, तो योगमाया के प्रभाव से वह ऐश्वर्यशाली वासुदेव रूप, नन्द के उस द्विभुज बालक में उसी प्रकार विलीन हो गया, जैसे घने बादलों में बिजली विलीन हो जाती है। वसुदेव जी वहाँ से यशोदा की कन्या (योगमाया) को लेकर मथुरा लौट आए।
[ध्वनि निर्देश]
वीणा और बाँसुरी की एक सम्मिलित, शांत और आध्यात्मिक धुन।
सूत्रधार:
वृन्दावन और मथुरा का यह रहस्य यह सिद्ध करता है कि परमसत्ता आपके सामने उसी रूप में प्रकट होती है, जिस रूप में आप उसे भजते हैं। वसुदेव को देवत्व मिला, और यशोदा को मातृत्व। श्रीकृष्ण, जो महाकाल हैं, जो सम्पूर्ण जगत के रक्षक हैं, वे गोकुल में महज़ एक 'गोप' बनकर, गायों के खुरों से उड़ती धूल में अपना ब्रह्मांडीय ऐश्वर्य छिपाए हुए, साधारण मनुष्य की तरह जिए। यही उनका पूर्ण अवतार होना है।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी की एक लंबी, शांत तान जो धीरे-धीरे शून्य में विलीन हो जाती है। (Fade out)
ऑडियो डॉक्युमेंट्री स्क्रिप्ट: श्रीकृष्ण का पौराणिक एवं ऐतिहासिक परिचय - गोप-अवतार और राधा तत्त्व (भाग तीन / समापन)
[ध्वनि निर्देश (BGM)]
शंख की एक दूरस्थ और पवित्र ध्वनि। इसके तुरंत बाद वीणा का धीमा, गंभीर और चिंतनशील आलाप शुरू होता है। पृष्ठभूमि में किसी ग्रामीण परिवेश का हल्का आभास—जैसे दूर बजती गायों की घंटियाँ।
सूत्रधार (शांत, धीमे और नैरेटिव स्वर में):
श्रीकृष्ण के अवतरण का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और मानवीय पहलू है—उनका गोप (आभीर) कुल में जन्म लेना। परमसत्ता ने अपने अवतरण के लिए राजमहलों या समाज के तथाकथित उच्च वर्गों को नहीं, बल्कि गायों की सेवा करने वाले, प्रकृति से जुड़े एक साधारण कृषक-गोपालक कुल को ही क्यों चुना?
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी की एक अत्यंत मीठी, लोक-धुन (Folk tune) जैसी तान।
सूत्रधार:
वायु पुराण, स्कन्द पुराण और हरिवंश पुराण इस रहस्य को एक स्वर में उद्घाटित करते हैं। जो प्रभु इस संपूर्ण जगत की रक्षा करने में समर्थ है, वह पृथ्वी पर आकर गोप कुल में 'गोप' बनकर अवतरित होता है।
परंतु, वसुदेव जी का जन्म गोप कुल में क्यों हुआ? देवी भागवत और हरिवंश पुराण में इसका एक पूर्व-जन्म वृत्तांत मिलता है।
आवाज़ २ (ऋषि वेदव्यास का स्वर - धीमा और गूंजता हुआ):
"येनांशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा।
स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति॥"
सूत्रधार:
कथा के अनुसार, महर्षि कश्यप ने एक बार वरुण देव की गायों का हरण कर लिया था। इस पर ब्रह्मा जी और वरुण देव ने उन्हें श्राप दिया कि—"हे कश्यप! तुमने जिस कारण वरुण की गायों का हरण किया है, उसी के प्रभाव से तुम पृथ्वी पर गोप जाति में जन्म लोगे और गोपालन करोगे।"
यही महर्षि कश्यप द्वापर युग में वसुदेव के रूप में अवतरित हुए और इसी गोप वंश में परब्रह्म ने अवतार लिया।
[ध्वनि निर्देश]
मृदंगम की एक हल्की थाप और उसके साथ एक भक्तिपूर्ण धुन का उभार।
सूत्रधार:
भगवान का यह गोप रूप इतना आत्मीय, सहज और विलक्षण था कि सदियों बाद, मर्यादा पुरुषोत्तम राम के परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपनी 'विनय पत्रिका' में श्रीकृष्ण के इस चुनाव के आगे अपना शीश झुकाया।
आवाज़ २ (भक्तिपूर्ण, अवधी गायन शैली में):
"सुर-मुनि-बिप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जनम गोपगृह लीन्हो।"
सूत्रधार:
अर्थात, देवताओं, मुनियों और ब्राह्मणों के श्रेष्ठ माने जाने वाले कुलों को त्यागकर, भगवान ने गोकुल में गोपों के घर जन्म लिया। यह केवल एक लीला नहीं थी, बल्कि श्रम, कृषि और प्रकृति से जुड़े वर्ग को परमसत्ता द्वारा दिया गया सर्वोच्च आध्यात्मिक सम्मान था।
[ध्वनि निर्देश]
वीणा के तारों पर एक तेज़, जादुई और सम्मोहक झंकार। संगीत थोड़ा रहस्यमयी और गहरा हो जाता है।
सूत्रधार (भावपूर्ण स्वर में):
परंतु, इस कृष्ण-तत्त्व की पूर्णता तब तक नहीं होती, जब तक इसमें 'राधा-तत्त्व' का समावेश न हो। स्कन्द पुराण श्रीकृष्ण और राधा के एकाकार स्वरूप की अत्यंत सुंदर और दार्शनिक व्याख्या करता है।
आवाज़ २ (शांत, काव्यात्मक स्वर):
"श्रीकृष्णस्य मनश्चंद्रो राधास्यप्रभयान्वितः।
तद्विहारवनं गोभिर्मण्डयन्रोचते सदा॥"
सूत्रधार:
श्रीकृष्ण का मन यदि एक चंद्रमा है, तो श्रीराधा उस चंद्रमा के मुख की प्रभा—यानी उसकी चाँदनी हैं। उसी चाँदनी से युक्त होकर वे अपनी लीला भूमि वृन्दावन को प्रकाशित करते हैं। श्रीकृष्ण यदि नित्य परिपूर्ण हैं, तो उनकी वह परम शक्ति, उनकी वह आह्लादिनी ऊर्जा स्वयं श्रीराधा हैं। दोनों में कोई भेद नहीं, दोनों एक ही ज्योति के दो स्वरूप हैं।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी और वीणा की एक आनंदमयी, उत्कर्ष (uplifting) और भव्य जुगलबंदी शुरू होती है।
सूत्रधार (समापन स्वर में, ऊर्जा और ठहराव के साथ):
चाहे वे मथुरा के ऐश्वर्यशाली वासुदेव हों, या गोकुल के माखनचोर नन्द-नंदन। चाहे वे वेदों के पारब्रह्म हों, या ग्वालों के सखा। चाहे वे कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान देने वाले योगेश्वर हों, या राधा के प्रेम में बँधे मोहन।
श्रीकृष्ण का यह ऐतिहासिक और पौराणिक परिचय हमें यही सिखाता है कि ईश्वर निर्गुण और सगुण की सीमाओं से परे है। वह प्रेम और वात्सल्य की पुकार सुनकर, हर युग में, हमारे ही बीच, हमारे ही जैसा बनकर आता है।
[ध्वनि निर्देश]
एक लंबी शंख ध्वनि। उसके साथ वीणा का एक अंतिम, गूँजता हुआ प्रहार (Strum)। संगीत धीरे-धीरे शांत होकर पूर्ण मौन में विलीन हो जाता है। (Fade out)
ऑडियो डॉक्युमेंट्री स्क्रिप्ट: श्रीकृष्ण का पौराणिक एवं ऐतिहासिक परिचय
भाग चार: विग्रहों की ऐतिहासिक यात्रा और सांस्कृतिक विस्तार
[ध्वनि निर्देश (BGM)]
राजस्थानी सारंगी की एक अत्यंत करुण और ऐतिहासिक धुन। साथ में नगाड़े की बहुत ही धीमी और गूँजती हुई थाप, जो किसी लंबी यात्रा या प्रवास का आभास कराती है।
सूत्रधार (गंभीर, ऐतिहासिक और कथात्मक स्वर में):
श्रीकृष्ण केवल पुराणों के पन्नों या दार्शनिक बहसों तक सीमित नहीं रहे। वे भारत की धड़कन हैं। इतिहास के उथल-पुथल भरे कालखंडों में, जब आक्रांताओं ने मंदिरों पर प्रहार किए, तब इस देश के भक्तों ने अपने आराध्य को केवल पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि अपने परिवार का सदस्य मानकर उनकी रक्षा की। आज हम श्रीकृष्ण के विग्रहों (मूर्तियों) की उस रोमांचक और ऐतिहासिक यात्रा पर चलेंगे, जिसने भारत की सांस्कृतिक चेतना को एक सूत्र में पिरोया।
[ध्वनि निर्देश]
सारंगी की धुन तेज होती है और फिर एक राजपूती शौर्य को दर्शाने वाले संगीत में बदल जाती है।
सूत्रधार:
राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है—नाथद्वारा। यहाँ भगवान कृष्ण सात वर्ष के गोवर्धनधारी बालक 'श्रीनाथजी' के रूप में विराजते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीनाथजी यहाँ तक कैसे पहुँचे?
पुष्टिमार्ग के इतिहास के अनुसार, यह विग्रह सर्वप्रथम गोवर्धन पर्वत पर प्रकट हुआ था, जहाँ माधवेन्द्र पुरी और बाद में वल्लभाचार्य जी ने इनकी सेवा प्रारंभ की। परंतु जब औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने का क्रूर फरमान जारी किया, तब श्रीनाथजी के पुजारियों ने अपने आराध्य को बचाने के लिए एक लंबी और संकटपूर्ण यात्रा शुरू की।
आवाज़ २ (ऐतिहासिक वर्णन के स्वर में - तेज और स्पष्ट):
"वृन्दावन से निकलकर यह दिव्य रथ आगरा और ग्वालियर होते हुए मारवाड़ पहुँचा। तत्कालीन महाराजा ने श्रीनाथजी को जोधपुर के पास चौपासनी में रुकवाया। इसके बाद सुरक्षा की दृष्टि से बाड़मेर के पाटोदी ठाकुर ने बीड़ा उठाया और छह माह तक श्रीनाथजी पाटोदी में ही विराजे। जब मुगलों को इसकी भनक लगी, तब पुजारियों ने मेवाड़ का रुख किया।"
सूत्रधार:
कोठारिया के ठाकुर और मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर श्रीनाथजी को शरण दी। कहते हैं कि सिहाड़ गाँव में श्रीनाथजी का रथ कीचड़ में फँस गया, जिसे भगवान का संकेत मानकर उसी स्थान पर 17वीं सदी में उनका मंदिर स्थापित किया गया—जो आज 'नाथद्वारा' कहलाता है।
यहाँ श्रीनाथजी का मंदिर 'हवेली' कहलाता है और वे 'ठाकुर जी' कहे जाते हैं। एक दिलचस्प भाषाई तथ्य यह है कि 'हवेली' और 'ठाकुर' (ठक्कुर) शब्दों की उत्पत्ति ईरानी और तुर्की भाषाओं से हुई है, जिनका अर्थ होता है जागीरदार या पगड़ीधारी स्वामी। कालान्तर में ये शब्द भारतीय समाज में ऐसे रचे-बसे कि परब्रह्म श्रीकृष्ण, भक्तों के 'ठाकुर जी' बन गए।
[ध्वनि निर्देश]
सारंगी का स्वर धीमा होकर विलीन होता है। एक बहुत ही शांत और लयबद्ध मराठी अभंग (तुतारी या झांझ-मंजीरे की हल्की ध्वनि) पृष्ठभूमि में उभरता है।
सूत्रधार (स्वर में भक्ति और आश्चर्य):
राजस्थान की मरुभूमि से निकलकर यदि हम दक्षिण की ओर चलें, तो महाराष्ट्र के पंढरपुर में कृष्ण का एक बिल्कुल भिन्न और अद्भुत स्वरूप मिलता है—भगवान विट्ठल या विठोबा।
कमर पर हाथ रखे, एक ईंट पर खड़े साँवले विठोबा का रहस्य उनके नाम में ही छिपा है।
आवाज़ २ (शांत, व्याख्यात्मक स्वर):
"मराठी में ईंट को 'विट' कहते हैं और 'ठल' का अर्थ है खड़े होना। कथा है कि भगवान विष्णु अपने परम भक्त पुंडलिक से मिलने आए, जो उस समय अपने माता-पिता की सेवा में लीन थे। पुंडलिक ने सेवा बीच में न छोड़कर भगवान को खड़े होने के लिए एक ईंट (विट) सरका दी। भगवान उनकी मातृ-पितृ भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि उसी ईंट पर कमर पर हाथ धरे खड़े रहे।"
सूत्रधार:
कुछ भाषाविदों, जैसे डॉ. आर. जी. भंडारकर का मानना है कि संस्कृत शब्द 'विष्णु' का कन्नड़ अपभ्रंश 'बिट्टी' हुआ और उसी से 'विट्ठल' शब्द बना। चाहे कथा पुंडलिक की हो या भाषाई विकास की, विठोबा महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की सांस्कृतिक आत्मा हैं।
[ध्वनि निर्देश]
झांझ-मंजीरे की ध्वनि के साथ दक्षिण भारतीय वाद्ययंत्र 'चेन्डा' (Chenda) की हल्की थाप और कर्नाटक संगीत की झलक।
सूत्रधार:
और सुदूर दक्षिण में... केरल के गुरुवायूर में। यहाँ भगवान विष्णु कृष्ण के बाल रूप में 'गुरुवायूरप्पन' के नाम से पूजे जाते हैं, जिसे 'गुरुवायूर उन्नीकन्नन' (छोटा कृष्ण) भी कहा जाता है।
ऐसी मान्यता है कि द्वारका के जलमग्न होने के बाद, भगवान कृष्ण की एक विशेष 'कृष्ण शिला' से बनी मूर्ति को स्वयं देवगुरु बृहस्पति और वायु देवता ने केरल में लाकर स्थापित किया था। 'गुरु' और 'वायु' द्वारा इस 'उर' (स्थान) पर स्थापना के कारण ही यह 'गुरु-वायु-उर' कहलाया। इसी तरह कर्नाटक के उडुपी में 13वीं सदी में माधवाचार्य द्वारा स्थापित बाल कृष्ण का मठ हो, या तमिलनाडु का पार्थसारथी मंदिर—कृष्ण हर स्थान की स्थानीय संस्कृति में ढल गए हैं।
[ध्वनि निर्देश]
संगीत में एक सार्वभौमिक (Universal), ऑर्केस्ट्रल उभार आता है, जिसमें भारतीय बाँसुरी और पश्चिमी वाद्ययंत्रों का सुंदर मिश्रण है।
सूत्रधार:
विष्णु सहस्रनाम का 57वाँ नाम 'कृष्ण' आज केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। 1960 के दशक से इस्कॉन (ISKCON) जैसे आंदोलनों के माध्यम से यह नाम पश्चिमी दुनिया से लेकर अफ्रीका के जंगलों तक गूँज रहा है।
हल चलाने वाले 'कृषक' से लेकर, महाभारत के 'नीतिकार' तक... गोकुल के 'ग्वाले' से लेकर, नाथद्वारा के 'ठाकुर' और पंढरपुर के 'विठोबा' तक—श्रीकृष्ण का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जब कोई परमसत्ता लोक से जुड़ती है, तो वह किसी एक धर्म या ग्रंथ की नहीं रहती, वह स्वयं जीवन का उत्सव बन जाती है।
[ध्वनि निर्देश]
महाभारत के शंख की एक गूँजती हुई ध्वनि। इसके बाद वीणा का एक मधुर, शांत और ठहराव भरा स्वर जो धीरे-धीरे फेड आउट (Fade out) हो जाता है।
ऑडियो डॉक्युमेंट्री स्क्रिप्ट: श्रीकृष्ण का पौराणिक एवं ऐतिहासिक परिचय
भाग पाँच: सहस्रनाम, पारिवारिक विस्तार और महाप्रयाण (अंतिम भाग)
[ध्वनि निर्देश (BGM)]
शंख की एक लंबी और पवित्र ध्वनि। इसके पश्चात एक अत्यंत शांत, गंभीर और ध्यानमग्न कर देने वाला सितार वादन। पृष्ठभूमि में कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद की शांति का आभास कराती हुई हल्की हवा की ध्वनि।
सूत्रधार (गंभीर, धीमे और नैरेटिव स्वर में):
श्रीकृष्ण का जीवन केवल चमत्कारों और लीलाओं की कथा नहीं है; यह धर्म, दर्शन, राजनीति और मानवीय रिश्तों का एक महाकाव्य है। जब महाभारत का महाविनाशकारी युद्ध समाप्त हुआ, और कुरुक्षेत्र की भूमि पर बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह अपने अंतिम क्षणों की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब युधिष्ठिर ने उनसे पूछा—"इस जगत में सर्वोच्च आश्रय कौन है?"
तब भीष्म ने जो उत्तर दिया, वह 'विष्णु सहस्रनाम' के रूप में महाभारत के अनुशासन पर्व का हृदय बन गया।
आवाज़ २ (भीष्म पितामह का धीमा, वृद्ध लेकिन ओजस्वी स्वर):
"इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मन:।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्॥"
अर्थात, हे युधिष्ठिर! उन महात्मा केशव के, उन परमपुरुष के इन एक हजार दिव्य नामों का मैंने पूर्ण रूप से कीर्तन किया है। जो भी मनुष्य नित्य इन्हें सुनेगा या गाएगा, वह कभी अशुभ को प्राप्त नहीं होगा।
सूत्रधार:
इसी विष्णु सहस्रनाम में 57वें नाम के रूप में 'कृष्ण' का उल्लेख है। वे अच्युत हैं, दामोदर हैं, गोपीनाथ हैं, माधव हैं। जब वे सम्मोहित करते हैं तो 'मोहन' कहलाते हैं, जब गायों की रक्षा करते हैं तो 'गोपाल' और 'गोविन्द' कहलाते हैं, और जब मुरली धारण करते हैं तो 'मुरलीधर' बन जाते हैं।
[ध्वनि निर्देश]
सितार का स्वर धीमा होता है और उसकी जगह एक मधुर, पारिवारिक और उत्सव का आभास कराती हुई बाँसुरी की धुन ले लेती है।
सूत्रधार (सहज और आत्मीय स्वर में):
परमसत्ता होते हुए भी, श्रीकृष्ण ने एक पूर्ण मनुष्य का जीवन जिया और सांसारिक रिश्तों की हर मर्यादा को निभाया। उनका पारिवारिक विस्तार उनके विराट स्वरूप का ही अक्स था।
जन्म देने वाले माता-पिता—वसुदेव और देवकी। पालन करने वाले—नन्द और यशोदा। उनके सौतेले भाई बने शेषनाग के अवतार बलराम, और बहन बनीं सुभद्रा। योगमाया एकानंशा ने भी उनकी पालक-बहन के रूप में जन्म लिया।
उनका अपना संसार भी अत्यंत विशाल था। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती सहित उनकी आठ प्रमुख रानियाँ थीं। नरकासुर के चंगुल से छुड़ाई गई 16,100 कन्याओं को उन्होंने समाज में सम्मान दिलाने के लिए अपनी रानियों का दर्जा दिया। प्रद्युम्न, साम्ब और भानु जैसे अनेक वीर पुत्रों के वे पिता बने। उन्होंने यह सिद्ध किया कि वैराग्य जंगलों में नहीं, बल्कि संसार के बीच रहकर भी जिया जा सकता है।
[ध्वनि निर्देश]
बाँसुरी की धुन में करताल और खोल (बंगाल का पारंपरिक वाद्य) की लय जुड़ जाती है। यह धुन संकीर्तन का आभास कराती है।
सूत्रधार (भक्ति और ऊर्जा से भरे स्वर में):
इसी कृष्ण-प्रेम की पराकाष्ठा 15वीं शताब्दी में बंगाल की धरती पर प्रकट हुई। पश्चिम बंगाल के मायापुर में ईस्वी सन् 1486 में श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी मानते हैं कि महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्ण और राधा के सम्मिलित अवतार थे। मायापुर से उठी 'हरे कृष्ण' संकीर्तन की वह लहर आज विश्व के हर कोने में पहुँच चुकी है।
[ध्वनि निर्देश]
संकीर्तन का संगीत धीमा होकर एकदम शांत हो जाता है। एक बहुत ही करुण, उदास और वैराग्य से भरी वीणा की तान उभरती है।
सूत्रधार (अत्यंत गंभीर, धीमे और वैराग्यपूर्ण स्वर में):
हर अवतार का एक भौतिक अंत होता है। जो माटी से उपजा है, उसे माटी में ही लौटना होता है।
वर्तमान उत्तर प्रदेश के मथुरा-शूरसेन में जन्म लेने वाले उस महामानव का अंतिम समय गुजरात के सौराष्ट्र में, प्रभास क्षेत्र के पास आया। भालका तीर्थ के उस शांत वन में, जब वे एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तब 'जरा' नामक एक बहेलिए का बाण उनके चरण में आ लगा।
उन्होंने उस बहेलिए को भी क्षमा दान दिया और अपने भौतिक शरीर को वहीं त्यागकर अपने निज धाम, गोलोक की ओर प्रस्थान किया।
[ध्वनि निर्देश]
वीणा की एक लंबी, गूँजती हुई और दिव्यता का आभास कराती हुई तान (Ascending scale)।
सूत्रधार (समापन स्वर—गहरा, दार्शनिक और गूँजता हुआ):
श्रीकृष्ण का देहावसान केवल एक युग का अंत था, उनके अस्तित्व का नहीं। वे आज भी किसान के हल में 'कृष्ण' बनकर जोत रहे हैं, गोकुल की गलियों में 'गोविन्द' बनकर गायें चरा रहे हैं, नाथद्वारा में 'श्रीनाथ' बनकर विराजे हैं, और हर उस हृदय में जीवित हैं जो निस्वार्थ कर्म और प्रेम का मार्ग चुनता है।
भारत की चेतना में, श्रीकृष्ण कभी अतीत नहीं होते... वे सदैव वर्तमान हैं।
[ध्वनि निर्देश]
भगवान कृष्ण के पांचजन्य शंख की एक अत्यंत ओजस्वी, लंबी और पवित्र ध्वनि गूँजती है। शंख ध्वनि के साथ ही एक भव्य आर्केस्ट्रल कॉर्ड (Chord) बजता है और फिर धीरे-धीरे पूर्ण मौन छा जाता है। (Fade out to complete silence)
— (श्रृंखला समाप्त) —