शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

मनुस्मृति और महाभारत के अनुसार, ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री से उत्पन्न संतान का वर्ण मुख्य रूप से 'समान' (अर्थात् पिता के समान आदरणीय द्विज) माना गया है, परंतु तकनीकी रूप से इस विशेष अनुलोम संतान को 'मूर्धावसिक्त' (या मूर्धाभिषिक्त) कहा गया है।
शास्त्रों में अनुलोम विवाह (उच्च वर्ण का पुरुष और ठीक उसके नीचे के वर्ण की स्त्री) से उत्पन्न संतान को माता-पिता के 'समान' (सदृश) माना गया है, न कि उसे पूरी तरह पतित या शूद्र।
दोनों मुख्य ग्रंथों के श्लोक प्रमाण निम्नलिखित हैं:

1. मनुस्मृति का श्लोक प्रमाण
मनुस्मृति के अध्याय 10, श्लोक 6 में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि अपने से ठीक नीचे वाले वर्ण की स्त्री से उत्पन्न संतान पिता के 'समान' योग्यता वाली होती है, हालाँकि माता के वर्ण के कारण उसमें आंशिक भिन्नता (मातृदोष) मानी जाती है:
सवर्णाभ्यस्तथा स्त्रीषु जायन्ते यास्त्वनन्तराः ।
तान् सादृश्यात् स्वान् प्राहुर्मातृदोषविगर्हितान् ॥ ६ ॥
(मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 6) [1]
हिंदी अनुवाद:
अपने समान वर्ण की स्त्रियों से तथा अपने से ठीक नीचे वाले वर्ण की स्त्रियों (जैसे ब्राह्मण के लिए क्षत्रिया) से जो संतानें उत्पन्न होती हैं, वे पिता के सादृश्य (समान/सदृश) ही कही जाती हैं। परंतु, माता का वर्ण एक पायदान नीचे होने के कारण उन्हें 'मातृदोष' से युक्त (यानी मूल ब्राह्मण से आंशिक कमतर) माना जाता है।
वर्ण की संज्ञा:
शास्त्रों और मनुस्मृति के टीकाकारों (जैसे मेधातिथि और कुल्लूक भट्ट) तथा याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, इस संतान को 'मूर्धावसिक्त' कहा जाता है, जिसे क्षत्रिय राजाओं के राज्याभिषेक और सैन्य-संचालन जैसे उच्च अधिकार प्राप्त होते हैं। [1]

2. महाभारत का श्लोक प्रमाण
महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 47) में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को वर्णसंकर और अनुलोम विवाह की संतानों का नियम समझाते हैं। वहाँ स्पष्ट रूप से ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया स्त्री में उत्पन्न संतान को 'ब्राह्मण' या पिता के समान ही द्विज माना गया है:
ब्राह्मणस्य तु या भार्या स्यातां वर्णद्वये स्थिते ।
ब्राह्मणी चैव राजन्या च तयोः पुत्राः समाः स्मृताः ॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 47, श्लोक 11)
(नोट: कई प्रतियों में यह अध्याय 47 का श्लोक 4 या 5 भी मिलता है।)
हिंदी अनुवाद:
ब्राह्मण पुरुष की जो दो उच्च वर्णों में स्थित पत्नियाँ होती हैं—ब्राह्मणी और राजन्या (क्षत्रिया)—उन दोनों से उत्पन्न हुए पुत्र पिता के 'समान' (समान अधिकार और वर्ण वाले) ही कहे गए हैं। [1]
महाभारत में आगे भीष्म पितामह कहते हैं कि ऐसी संतान का उपनयन (जनेऊ) संस्कार और द्विज वाले सभी धर्म-कर्म विधिपूर्वक होते हैं।

निष्कर्ष
दोनों महाग्रंथों के अनुसार:
  1. स्थिति: संतान का स्तर पिता के लगभग समान (द्विज) होता है।
  2. संज्ञा: उसे तकनीकी रूप से 'मूर्धावसिक्त' कहा जाता है।
  3. अधिकार: उसे वेदाध्ययन और क्षत्रिय के समान शासन/युद्ध कला दोनों के मिश्रित अधिकार प्राप्त होते हैं। [1]
यदि आप मनुस्मृति के अनुसार अन्य अनुलोम संतानों (जैसे ब्राह्मण और वैश्य स्त्री से उत्पन्न 'अम्बष्ठ') या इसके विपरीत प्रतिलोम विवाह (जैसे क्षत्रिय पुरुष और ब्राह्मणी स्त्री से उत्पन्न 'सूत') के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया बताएं। [1, 2]

ऑडियो निर्देश: सिंथ (Synth) और ट्रम्पेट (Trumpet) के धीमे, गंभीर और ऐतिहासिक स्वर के साथ शुरुआत। पृष्ठभूमि में किसी भी प्रकार के ताल वाद्य (मृदंग, ढोलक या तबला) का पूर्णतः अभाव है। वाचक (Narrator) की आवाज़ स्पष्ट, विश्लेषणात्मक और मध्य वाचन लय (Medium Tempo) में है।]

​वाचक: भारतीय इतिहास और पुराणों में परशुराम और सहस्रबाहु अर्जुन का संघर्ष एक युगांतकारी घटना मानी जाती है। सामान्यतः प्रचलित धारणा परशुराम को अजेय और विष्णु का अवतार मानती है। किन्तु, लक्ष्मीनारायण संहिता, ब्रह्मवैवर्त पुराण और नारद पुराण के सूक्ष्म विश्लेषण से एक सर्वथा भिन्न सत्य उभरता है। यह शोध प्रमाणित करता है कि महिष्मती नरेश सहस्रबाहु अर्जुन केवल युद्ध में ही प्रबल नहीं थे, बल्कि वे एक लोक-कल्याणकारी सम्राट और साक्षात 'सुदर्शन चक्र' के अवतार थे।

​[BGM: ट्रम्पेट का एक मध्यम आरोह (Crescendo), जो ध्यान आकर्षित करता है। सिंथ का स्वर विचारोत्तेजक हो जाता है।]

​वाचक: आइए, इस ऐतिहासिक युद्ध का निष्पक्ष विश्लेषण करें। लक्ष्मीनारायण संहिता और ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खण्ड के अनुसार, युद्ध के मैदान में परशुराम, सहस्रबाहु के समक्ष पराजित हुए थे। ब्रह्मवैवर्त पुराण का श्लोक स्पष्ट करता है— "मूर्छामवाप रामः सः पपात श्रीहरिं स्मरन्"। गुरु दत्तात्रेय द्वारा प्रदत्त अमोघ शूल से आहत होकर परशुराम मूर्छित होकर गिर पड़े थे। यह प्राकृतिक युद्ध में परशुराम के अंत का संकेत है।

​वाचक: जब परशुराम ने होश में आकर पाशुपतास्त्र उठाया, तब दत्तात्रेय के प्रभाव से उन्हें स्तम्भित कर दिया गया। स्वयं परमात्मा श्रीकृष्ण अपने गोपों और पार्षदों के साथ सहस्रबाहु की रक्षा कर रहे थे। सहस्रबाहु की दाहिनी भुजा पर श्रीकृष्ण का रक्षा-कवच बंधा था। विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि परशुराम विष्णु के अवतार थे, तो भगवान दत्तात्रेय और स्वयं श्रीकृष्ण सहस्रबाहु की रक्षा क्यों कर रहे थे? अंततः, परशुराम की विजय अस्त्रों से नहीं, बल्कि शिव द्वारा 'ब्राह्मण' का रूप धरकर छलपूर्वक उस 'कृष्ण कवच' को भिक्षा में मांगने से हुई।

​[BGM: सिंथ की ध्वनि थोड़ी गहरी और सम्मानजनक हो जाती है।]

​वाचक: अब सहस्रबाहु अर्जुन के दिव्य स्वरूप को समझें। मत्स्य पुराण के अध्याय तिरालीस के अनुसार, जिस रावण को वश में करने के लिए श्रीराम ने सम्पूर्ण जीवन दांव पर लगा दिया, उस लंकापति रावण को अहीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन ने मात्र पाँच बाणों में परास्त कर अपनी प्रत्यंचा से बांध लिया था। रावण को दस वर्ष तक कारागार में रखा गया और महर्षि पुलस्त्य के निवेदन पर ही मुक्त किया गया।

​वाचक: नारद पुराण का छिहत्तरवाँ अध्याय स्पष्ट घोषित करता है— "यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।" अर्थात्, कार्तवीर्यार्जुन कोई साधारण पुरुष नहीं, बल्कि पृथ्वी पर भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के अवतार थे। शास्त्रों में उनकी पूजा का बाकायदा विधान है, जबकि युद्ध में मारे गए व्यक्ति की पूजा नहीं होती। यह सिद्ध करता है कि सहस्रबाहु का वध नहीं हुआ था।

​[BGM: ट्रम्पेट का एक तीखा और प्रश्नात्मक स्वर। सिंथ में तनाव (Tension) का आभास।]

​वाचक: अब नैतिकता के उस संकट की बात करते हैं जो परशुराम के 'अवतारत्व' पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। अवतार की परिभाषा है—'धर्म की स्थापना'। लेकिन महाभारत के शांतिपर्व के अध्याय अड़तालीस में परशुराम द्वारा निर्दोष और गर्भस्थ शिशुओं की हत्या का जो निर्मम वर्णन है, वह विचलित करने वाला है। क्या एक अवतार से ऐसी नृशंसता की अपेक्षा की जा सकती है?

​वाचक: इसके अतिरिक्त, कालिका पुराण और महाभारत का वनपर्व एक ऐसे कृत्य को सामने लाता है जिसे समाज कभी स्वीकार नहीं कर पाया—मातृहत्या। परशुराम ने पिता की आज्ञा पर अपनी माता रेणुका का सिर काट दिया। क्या पिता की आज्ञा मानवता और मातृत्व की हत्या को उचित ठहरा सकती है? इससे कहीं अधिक श्रेष्ठ तो यदु का चरित्र है, जिन्होंने पिता के कहने पर भी अपनी माताओं का वध करने से इनकार कर दिया था।

​[BGM: सिंथ का स्वर अब विश्लेषणात्मक और तार्किक (Logical) दिशा में मुड़ता है।]

​वाचक: वर्णाश्रम की विसंगति भी देखिए। अनुशासन पर्व और मनुस्मृति के अनुसार, यदि विधवा क्षत्राणियां ब्राह्मणों के पास ऋतुदान के लिए आईं, तो ब्राह्मण और क्षत्राणी के संयोग से उत्पन्न संतान क्षत्रिय कैसे कहलाई? मान्य नियमों के अनुसार वे ब्राह्मण ही मानी जानी चाहिए। यह भारी तार्किक विफलता दर्शाती है कि यह कथा किसी विशेष सामाजिक एजेंडे के तहत बाद में गढ़ी गई (प्रक्षेप की गई) है।

​[BGM: सिंथ और ट्रम्पेट दोनों मिलकर एक भव्य और निष्कर्ष-सूचक धुन बनाते हैं, लेकिन लय (Tempo) समान रहती है।]

​वाचक: परशुराम के चरित्र पर उठने वाले ये प्रश्न हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। वास्तविकता में, महाराज सहस्रबाहु अर्जुन एक धर्मपरायण, सुदर्शन चक्र के अवतार और अजेय योद्धा थे। परशुराम को 'देवता' के सांचे से बाहर निकालकर प्राचीन काल के सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षों के एक 'ऐतिहासिक और क्रोधी योद्धा' के रूप में देखना, शायद सत्य के अधिक निकट होगा। यह इतिहास का वह पुनर्पाठ है, जिसे जानना हर शोधार्थी के लिए आवश्यक है।

​[ऑडियो प्रभाव (SFX): ट्रम्पेट का एक अंतिम, गूंजता हुआ स्वर और सिंथ की ध्वनि धीरे-धीरे (Fade out) शांत हो जाती है।]

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

परशुराम

प्रस्तुत आख्यान और विभिन्न पुराणों के संदर्भों के आधार पर परशुराम-सहस्रबाहु युद्ध का जो विश्लेषण आपने प्रस्तुत किया है, वह ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह लेख स्थापित पौराणिक मान्यताओं के समानांतर एक तर्कसंगत और वैकल्पिक विमर्श खड़ा करता है।

​आपके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों का सम्पादन, व्याख्या और समीक्षा निम्नलिखित बिंदुओं में की जा सकती है:

​1. वैचारिक और ऐतिहासिक समीक्षा

​लेख का मुख्य तर्क यह है कि परशुराम और सहस्रबाहु के युद्ध में सहस्रबाहु (कार्तवीर्य अर्जुन) का पक्ष कहीं अधिक सुदृढ़ था। आपके शोध के अनुसार:

  • ​युद्ध का वास्तविक परिणाम: लक्ष्मीनारायण संहिता और ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्लोक (1.458.86 और 3.40.18) स्पष्ट करते हैं कि युद्ध के दौरान परशुराम, सहस्रबाहु के प्रहार से मूर्छित होकर गिर पड़े थे।
परशुराम की विजय  न होकर उनका बोध हुआ क्योंकि स्वयं भगवान कृष्ण जिसके संरक्षक हैं और  स्वयं सुदर्शन चक्र का साक्षात अवतार है।  शिव द्वारा 'ब्राह्मण' रूप धरकर सहस्रबाहु से उसका 'कृष्ण कवच' भिक्षा में मांग लेना (श्लोक 29-31) एक क्षेपक है।

विष्णु बनाम विष्णु: यदि परशुराम विष्णु के अवतार थे, तो भगवान दत्तात्रेय (जो स्वयं विष्णु के अंश हैं) ने सहस्रबाहु की सहायता क्यों की? और स्वयं भगवान कृष्ण अपने सुदर्शन चक्र के साथ सहस्रबाहु की रक्षा क्यों कर रहे थे? यह प्रश्न परशुराम के 'अवतारत्व' पर एक गंभीर शोधपरक प्रश्न खड़ा करता है।


नि:सन्देह ये कथानक जातीय वर्चस्व' के कारण और 'पुराणों में प्रक्षेप (बाद में जोड़ना)' के सिद्धांतों पर बल दिया गया है:
परशुराम की पराजय और मृत्यु को छिपाने के लिए बाद के कथाकारों ने 'शिव द्वारा पुनर्जीवित' करने का प्रसंग जोड़ा।

नैतिकता का प्रश्न: गर्भस्थ शिशुओं और स्त्रियों की हत्या (महाभारत शान्तिपर्व 48.62-63) जैसे कृत्यों को विष्णु के अवतार के लक्षणों के विपरीत माना गया है। यह परशुराम के चरित्र को एक 'प्रतिशोधी ' के रूप में अधिक और 'धर्म-संस्थापक अवतार'  विष्णु के रूप में कम दिखाता है।

मातृ-हन्ता का कलंक: कालिका पुराण और महाभारत के प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि परशुराम ने पिता की आज्ञा पर अपनी माता का वध किया, जिसे समाज और नैतिकता की दृष्टि से विवादास्पद माना गया है।

सहस्रबाहु अर्जुन का दिव्य स्वरूप

​नारद पुराण और मत्स्य पुराण (अध्याय 43) के आधार पर सहस्रबाहु का जो चित्रण किया गया है, वह उन्हें एक आदर्श सम्राट सिद्ध करता है:

  • ​सुदर्शन चक्र का अवतार: नारद पुराण (76.4) स्पष्ट कहता है कि सहस्रबाहु 'सुदर्शन चक्र' के अवतार थे।
  • ​रावण का दमन: जिस रावण को राम ने कठिन युद्ध के बाद हराया, उसे सहस्रबाहु ने खेल-खेल में बंदी बनाकर दशवर्ष तक अपने कारागार रखा था।
  • ​जन-कल्याणकारी शासन: उनके शासन में चोरी का भय नहीं था (योगी पश्यति तस्करान्) और उन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन किया।

धार्मिक कट्टरता के स्थान पर शास्त्रों के तुलनात्मक अध्ययन को प्राथमिकता देता है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि इतिहास विजेता द्वारा लिखा जाता है, और परशुराम की बाद की कहानियों में उन्हें महान बनाने के लिए सहस्रबाहु के दैवीय रक्षण (कृष्ण कवच) को हटाने की युक्ति अपनाई गई।

भारतीय इतिहास और पुराणों में परशुराम और सहस्रबाहु अर्जुन का संघर्ष एक युगांतकारी घटना मानी जाती है। सामान्यतः प्रचलित धारणा परशुराम को अजेय और विष्णु का अवतार मानती है, किंतु लक्ष्मीनारायण संहिता, ब्रह्मवैवर्त पुराण (गणपति खण्ड) और नारद पुराण के सूक्ष्म विश्लेषण से एक भिन्न सत्य उभरता है। यह शोध प्रमाणित करता है कि सहस्रबाहु न केवल युद्ध में प्रबल थे, बल्कि उनका व्यक्तित्व एक लोक-कल्याणकारी सम्राट और 'सुदर्शन चक्र' के अवतार के रूप में कहीं अधिक श्रेष्ठ था।

शास्त्रीय साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि युद्ध के मैदान में परशुराम, सहस्रबाहु के समक्ष पराजित हुए थे।

  • ​शूल प्रहार और मूर्छा: लक्ष्मीनारायण संहिता (1.458.86) और ब्रह्मवैवर्त पुराण (3.40.18) स्पष्ट करते हैं कि गुरु दत्तात्रेय द्वारा प्रदत्त अमोघ शूल से आहत होकर परशुराम मूर्छित होकर गिर पड़े थे।​"मूर्छामवाप रामः सः पपात श्रीहरिं स्मरन्" (86)

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि प्राकृतिक युद्ध में परशुराम का अंत हो चुका था।
  • ​स्तम्भन: जब परशुराम ने होश में आकर पाशुपतास्त्र उठाया, तब दत्तात्रेय के प्रभाव से उन्हें जड़ (स्तम्भित) कर दिया गया, जिससे उनकी गति रुक गई।
  • ​कृष्ण कवच की सुरक्षा: आकाशवाणी (श्लोक 90-91) के अनुसार, सहस्रबाहु के पास भगवान कृष्ण का 'कवच' था और स्वयं सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा कर रहा था।
  • ​दत्तात्रेय का पक्ष: यदि परशुराम धर्म-संस्थापक अवतार होते, तो विष्णु के ही अंशावतार दत्तात्रेय उनके विरुद्ध सहस्रबाहु को अस्त्र-शस्त्र क्यों प्रदान करते?

    परशुराम के चरित्र पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं, जो उन्हें एक 'अवतार' की श्रेणी से हटाकर एक 'क्रोधित योद्धा' की श्रेणी में रखते हैं:

    • ​शिशु एवं स्त्री वध: महाभारत (शान्तिपर्व 48.62) के अनुसार, परशुराम ने गर्भस्थ शिशुओं का वध किया। एक अवतार से ऐसी नृशंसता की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
    • ​मातृ-वध: कालिका पुराण (अध्याय 83) और महाभारत (वनपर्व 117) में परशुराम द्वारा अपनी माता रेणुका का सिर काटने का प्रसंग उनके व्यक्तित्व के कठोर और विवेकहीन पक्ष को दर्शाता है।
    • ​वर्णाश्रम की विसंगति: अनुशासन पर्व के 'वर्णसंकर' अध्याय के आधार पर यह प्रश्न खड़ा होता है कि यदि ब्राह्मणों द्वारा क्षत्राणियों में संतान उत्पन्न हुई, तो वे क्षत्रिय कैसे कहलाए? यह पौराणिक प्रक्षेपों की तार्किक विफलता को दर्शाता है।

    सहस्रबाहु अर्जुन: एक आदर्श शासक

    ​मत्स्य और नारद पुराण के आधार पर सहस्रबाहु का स्वरूप निखर कर आता है:

    • ​अजेय सम्राट: उन्होंने रावण जैसे दुर्दांत शत्रु को मात्र पांच बाणों में बंदी बना लिया, जिसे राम को हराने में वर्षों लगे।
    • ​योगेश्वर रूप: वे केवल राजा नहीं, अपितु 'योगी' थे। नारद पुराण (76.4) उन्हें "सुदर्शनचक्रस्यावतारः" (सुदर्शन चक्र का अवतार) घोषित करता है।
    • ​पूजनीय व्यक्तित्व: शास्त्र उनके स्मरण मात्र से 'नष्ट धन की प्राप्ति' और 'शत्रु विजय' का विधान करते हैं (नारद पुराण 76.5)।

    उपर्युक्त प्रमाणों के आलोक में यह कहना तर्कसंगत है कि परशुराम का 'अवतारत्व' और उनकी 'विजय' बाद के काल में पुरोहित वर्ग द्वारा निर्मित एक मिथक प्रतीत होती है। वास्तविकता में, महाराज सहस्रबाहु अर्जुन एक धर्मपरायण, सुदर्शन चक्र के अवतार और अजेय योद्धा थे, जिन्हें केवल दैवीय छल (कवच याचना) के माध्यम से ही रोका जा सका।

    ​परशुराम द्वारा क्षत्रियों का 21 बार विनाश और निर्दोषों की हत्या का वृत्तांत उनके अवतार होने पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जबकि सहस्रबाहु की पूजा का विधान उन्हें देवताओं की श्रेणी में स्थापित करता है।

    ​सम्पादकीय टिप्पणी: यह आलेख परम्परागत इतिहास के समानांतर एक साहसी और शोधपरक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो भविष्य के इतिहासकारों के लिए तुलनात्मक अध्ययन का नया द्वार खोलता है।



अयोध्यापति श्रीराम, लंकापति रावण और महिष्मतिपुरी (आधुनिक नाम मध्यप्रदेश का महेश्वर जो नर्मदा नदी के किनारे स्थित है।) के चक्रवर्ती अहीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन लगभग एक ही समय के राजा थे। और जिस रावण को वश में करने और परास्त करने के लिए श्रीराम ने सम्पूर्ण जीवन दाँव पर लगा दिया था, उस रावण को अभीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन ने मात्र पाँच वाणो में परास्त कर बन्दी बना लिया था।

इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण के अध्याय-(४३) के- (३७ से ३९) तक के श्लोकों से होती है। जिसमें एक नारद नाम का एक गंधर्व कार्तवीर्यार्जुन का गुणगान करते हुए कहा -

एवं बध्वा धनुर्ज्यायामुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः।
लङ्कायां मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्।। ३७।  
                             
निर्जित्य बध्वा चानीय माहिष्मत्यां बबन्ध च।
ततो  गत्वा  पुलस्त्यस्तु अर्जुनं सम्प्रसादयत्।। ३८।   
                        
मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनेह सान्त्वितम्।  तस्य  बाहुसहस्रेण  बभूव ज्यातलस्वनः।।३९।

अनुवाद- ३७-३९
इसी प्रकार अर्जुन ने एक बार लंका में जाकर अपने पाँच बाणों द्वारा सेना सहित रावण को मोहित कर दिया, और उसे बलपूर्वक जीत कर अपने धनुष की प्रत्यञ्चा में बांँध लिया, फिर माहिष्मती पुरी में लाकर उसे बन्दी बना लिया। यह सुनकर महर्षि पुलस्त्य (रावण के पितामह) ने माहिष्मती पुरी में जाकर अर्जुन को अनेकों प्रयास से समझा बुझाकर प्रसन्न किया। तब सहस्रबाहु- अर्जुन ने  महर्षि पुलस्त्य को सान्त्वना देकर उनके पौत्र  राक्षस राज रावण को बन्धन मुक्त कर दिया।३७-३९।   


 
कार्तवीर्यार्जुन कोई साधारण पुरुष नहीं थे। वे साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के अवतार थे। इस बात की पुष्टि- नारदपुराणम्- पूर्वभाग अध्यायः (७६) के श्लोक-( ४ ) से होती है। जिसमें नारद जी कार्तवीर्यार्जुन के बारे में कहते हैं कि -

यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।
दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।। ४।

अनुवाद- ये (कार्तवीर्यार्जुन) पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया। ४

कार्तवीर्यार्जुन सुदर्शन चक्र का अवतार होने के साथ-साथ दत्तात्रेय का वर पाकर अजेय हो गये थे। उस समय कार्तवीर्यार्जुन और परशुराम से कई बार युद्ध हुआ। जिसमें दिव्य शक्ति सम्पन्न कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का बध भी कर दिया था।
किन्तु यह बात कथाकारों को बर्दाश्त नहीं हुई। परिणामतः  इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन को ही परशुराम द्वारा वध करने की पुराणों में एक नई कथा जोड़ दिया।
      
कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का वध किया कि परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन का वध किया, इसकी सच्चाई तभी उजागर हो सकती है जब दोनों के बीच युद्धों का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए।

क्योंकि कि इसमें बहुत घाल- मेल किया गया है। दोनों के बीच हुए युद्धों का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपतिखण्ड के अध्याय- ४० के कुछ प्रमुख श्लोकों से होती है। जिसको नीचे उद्धत किया जा रहा है -


युद्ध विश्लेषण)

यदि उपर्युक्त श्लोक संख्या- (२५ से २८) पर विचार किया जाए तो रणभूमि में कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा परमेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं अपने सैकड़ो गोपों एवं पार्षदों के साथ कर रहे होते हैं। तो उस स्थिति में ब्रह्माण्ड का न दैत्य, न देवता, न किन्नर, न गन्धर्व, और ना ही कोई मनुष्य कार्तवीर्यार्जुन का बाल बाँका कर सकता था। परशुराम की बात करना तो बहुत दूर है।

• दूसरी बात यह कि- श्लोक संख्या - (१८ से २०) में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि- युद्ध में कार्तवीर्यार्जुन के भयंकर शूल के आघात से परशुराम मारे जाते हैं। किन्तु शिव जी द्वारा उन्हें पुनः जीवित कर दिया जाता है।
यहाँ सोचने वाली बात है कि कोई मरने के बाद पुनः जीवित होता है क्या ? जवाब होगा नहीं। तो फिर परशुराम  जीवित कैसे हो गये ? यह बात भी हजम नहीं होती।

• तीसरी बात यह कि- श्लोक संख्या (२८ से २९) में लिखा गया है कि- परमात्मा श्रीकृष्ण का कवच जो कार्तवीर्यार्जुन की दाहिनी भुजा पर बँधा हुआ था उसी से कार्तवीर्यार्जुन की रणभूमि में रक्षा हो रही होती है, और उसे शिवजी ब्राह्मण वेष में आकर भिक्षा के रूप में माँगते हैं और राजा कार्तवीर्यार्जुन उस कवच को सहर्ष दे देते हैं।

यहाँ पर विचारणीय बात यह है कि- क्या राजा को उस समय इतना ज्ञान नहीं था कि युद्धभूमि में अचानक एक ब्रह्मण भिखारी भिक्षा में धन दौलत न माँगकर रक्षा कवच क्यों माँग रहा है ? और सोचने वाली बात यह है की जिस कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कर रहे हों उस समय कोई भिखारी उसके प्राणों के समान कवच माँगे और अन्तर्यामी भगवान मूकदर्शक बने रहे। यह सम्भव नहीं लगता ? और ना ही
यह बात किसी भी तरह से हजम हो सकती है।      
अतः इन तमाम तर्कों के आधार पर सिद्ध होता है कि निश्चय ही कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का वध कर दिया था। किन्तु यह बात कथाकारों को गले से नींचे नहीं उतरी। परिणाम यह हुआ कि कथाकारों नें एक नई कहानी जोड़कर इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन का वध परशुराम से करा दिया।

• चौथी बात यह कि- अगर कार्तवीर्यार्जुन का वध हुआ होता तो शास्त्रों में उनकी पूजा का विधान कभी नहीं होता। क्योंकि युद्ध में मारे गये व्यक्ति की पूजा नहीं होती है।  जबकि कार्तवीर्यार्जुन का विधिवत पूजा करने का शास्त्रों में विधान किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि सहस्रबाहु अर्जुन का बध नहीं हुआ था।
पूराणों में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने के विधान की पुष्टि- श्रीबृहन्नारदीयपुराण पूर्वभागे बृहदुपाख्यान तृतीयपाद कार्तवीर्यमाहात्म्यमन्त्रदीपकथनं नामक - (७६) वें अध्याय से होती है। परन्तु परशुराम कि पूजा का विधान किसी पुराण में नहीं है।
नारद पूराण में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने का विधान
नारद और सनत्कुमार संवाद के रूप में जाना जाता है। जिसमें नारद के पूछे जाने पर सनत्कुमार जी कहते हैं।

भाग 3: नैतिकता का संकट - अवतार या प्रतिशोधी?

​नैरेटर: अवतार की परिभाषा है—'धर्म की स्थापना' । लेकिन महाभारत के शांतिपर्व के अध्याय -अड़तालीस के श्लोक बासठ- त्रेसठ में परशुराम के कृत्यों का वर्णन विचलित करने वाला है। निर्दोष गर्भस्थ शिशुओं और स्त्रियों की  निर्मम हत्या क्या किसी दैवीय अवतार के लक्षण हो सकते हैं ? कदापि नहीं

​विश्लेषण: यदि अवतार का उद्देश्य धर्म की रक्षा है, तो यह 'अधर्म' की श्रेणी में आने वाले कृत्य क्यों किए गए ? यहाँ परशुराम एक 'धर्म-संस्थापक' के बजाय एक 'अत्यधिक क्रोधी  और प्रतिशोधी'  के रूप में उभरते हैं। क्या हम परशुराम को एक अवतार के रूप में पूजते हैं, या हमने उनके आक्रोश को ही धर्म का नाम दे दिया है?

​भाग 4: मातृहंता का कलंक और वर्णाश्रम की विसंगति

​नैरेटर: कालिका पुराण और महाभारत का वनपर्व अध्याय एक सौ सत्रह- एक ऐसे कृत्य को सामने लाता है जिसे समाज कभी स्वीकार नहीं कर पाया—मातृ-वध। पिता की आज्ञा का पालन करना क्या इतना बड़ा हो सकता है कि वह मानवता और मातृत्व की हत्या को उचित ठहरा सके ? 

परशुराम से श्रेष्ठ तो यदु का चरित्र है जो अपने पिता के कहने पर भी माताओं का वध नहीं करते हैं ।

​नैरेटर: इसके अतिरिक्त 'वर्णसंकर' की स्थिति देखिए। अनुशासनात्मक ग्रंथों और मनुस्मृति के नियमों का पालन करें, तो ब्राह्मण-क्षत्रिय संयोग से उत्पन्न संतान की जाति पर भारी विसंगति उत्पन्न होती है। यदि विधवा क्षत्राणीयाँ परशुराम द्वारा क्षत्रियों का वध करने पर ब्राह्मणों के पास ऋतुदान के लिए आयीं तो उनसे उत्पन्न संतान ब्राह्मण ही मानी जाएगी- क्योंकि ब्राह्मणी और क्षत्राणी ब्राह्मण कि मान्य पत्नियों में से हैं जिनकी सन्तान पिता के वर्ण व जाति की होती है।

वर्ण व्यवस्था के नियम इतने कठोर थे, तो परशुराम की कथा में यह 'घालमेल' क्यों ब्राह्मणों से क्षत्रिय उत्पन्न कैसे हुए ? क्या यह तार्किक विफलता यह नहीं दर्शाती कि यह कथा किसी विशेष सामाजिक एजेंडे के तहत गढ़ी गई थी ?

​निष्कर्ष

​नैरेटर: परशुराम के चरित्र पर उठने वाले ये प्रश्न हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। क्या यह केवल एक पौराणिक कथा है ? या यह प्राचीन काल के उन सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षों का एक दस्तावेज है, जिसे 'अवतारवाद' का आवरण ओढ़ा दिया गया ?

​नैरेटर: निष्कर्ष यह नहीं कि परशुराम को नकारा जाए, बल्कि यह कि उनके चरित्र का पुनर्पाठ (Re-reading) किया जाए। उन्हें 'देवता' के सांचे से बाहर निकालकर एक 'ऐतिहासिक योद्धा' के रूप में देखना, शायद सत्य के अधिक निकट होगा।

​(संगीत तीव्र होता है और धीरे-धीरे शांत हो जाता है)

सिंथ व ट्रम्पेट वाद्य के स्वर के साथ स्पीचशैली में  मध्य वाचन लय में बिना ताल मृदंग के ऑडियो जनरेट करें




            



भर द्वाभ्यां जायते इति भारद्वाजः

भर द्वाभ्यां जायते इति भारद्वाजः' — सनातन परंपरा और संस्कृत व्याकरण के अनुसार भरद्वाज शब्द की उत्पत्ति का यह सबसे प्रसिद्ध और गहरा आधार है।
इस पंक्ति का सरल शब्दों में अर्थ है: "जो दो पिताओं से उत्पन्न हुआ हो वह भरद्वाज है।"
ऋषि भरद्वाज की उत्पत्ति और इस पंक्ति के पीछे पौराणिक कथा इस प्रकार है:
पौराणिक संदर्भ और उत्पत्ति की कथा
महान ऋषि भारद्वाज की उत्पत्ति की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण और महाभारत में मिलती है। इसके अनुसार:
  • माता-पिता: भारद्वाज के जैविक पिता देवगुरु बृहस्पति थे और माता ममता (बृहस्पति के बड़े भाई उत्थ्य की पत्नी) थीं। 
  • नामकरण का कारण: जब इस बालक का जन्म हुआ, तब ममता और बृहस्पति दोनों ही लोक-लाज के डर से इस बालक को अपनाने कतरा रहे थे। उस समय आकाशवाणी हुई या एक श्लोक कहा गया:
    "मूढ़े भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते।"
    अर्थात् (ममता से कहा गया) "हे मूर्ख स्त्री! इस बालक का भरण-पोषण करो" और (बृहस्पति से कहा गया) "हे बृहस्पति! तुम इसका पालन करो।" चूंकि दोनों एक-दूसरे पर बालक को सौंप रहे थे और दो लोगों (दो) द्वारा भरण-पोषण (भर) की बात कही गई, इसलिए बालक का नाम 'भर-द्वाज' पड़ा।

अन्तर्वत्‍न्यां भ्रातृपत्‍न्यां मैथुनाय बृहस्पतिः ।प्रवृत्तो वारितो गर्भं शप्त्वा वीर्यमुपासृजत् ॥ ३६ ॥

​हिन्दी अनुवाद: (भरद्वाज के जन्म की कथा इस प्रकार है—) एक बार  बृहस्पति अपनी गर्भवती भाभी (अपने भाई उतथ्य की पत्नी ममता) को देखकर सेक्सभाव ( कामभावना) से पीडित हो गये और उन्होने अपने बड़े भाई उतथ्य की पत्नी ममता साथ सहवास करने के लिए उसके साथ बलात्कार कर दिया। जब बृहस्पति के बड़े भाई की पत्नी ममता के  गर्भस्थ शिशु (दीर्घतमा) ने बृहस्पति को ऐसा करने से रोका, तो बृहस्पति ने क्रोधित होकर उस गर्भस्थ को अंधा होने का शाप दे दिया और अपना वीर्य बलपूर्वक वहीं ममता के गर्भ में स्खलित कर दिया।

​तं त्यक्तुकामां ममतां भर्तुत्यागविशंकिताम् ।नामनिर्वाचनं तस्य श्लोकमेनं सुरा जगुः ॥ ३७॥

​हिन्दी अनुवाद: बृहस्पति के उस वीर्य से एक बालक उत्पन्न हुआ। अपने पति (उतथ्य) द्वारा त्यागे जाने के भय से ममता उस नवजात शिशु को वहीं छोड़ देना चाहती थी। उस समय शिशु के नामकरण का कारण स्पष्ट करते हुए देवताओं ने यह श्लोक कहा।

​मूढे भर द्वाजं इमं भर द्वाजं बृहस्पते । यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥

​हिन्दी अनुवाद: (देवताओं ने कहा—) "अरी मूढ़े! तू इस द्वाज (दो पिताओं—उतथ्य और बृहस्पति—से उत्पन्न पुत्र) का भरण-पोषण कर (भर)।" (इस पर ममता ने उत्तर दिया—) "बृहस्पति ही!  इस द्वाज का भरण-पोषण करे (भर)।" यह कहकर जब दोनों बृहस्पति -और ममता उस बालक को वहीं छोड़कर चले गए, तब से उस बालक का नाम 'भरद्वाज' (भर + द्वाज) पड़ गया।

​चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा वितथमात्मजम् ।व्यसृजन् मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥

​हिन्दी अनुवाद: देवताओं के इस प्रकार समझाने पर भी ममता ने उस बालक को व्यर्थ (अवैध) समझकर वहीं छोड़ दिया। तब मरुद्गणों ने उस अनाथ बालक का पालन-पोषण किया और जब राजा भरत का वंश विफल (संतानहीन) होने लगा, तो मरुद्गणों ने यह बालक उन्हें सौंप दिया। भरत के विफल वंश में दिए जाने के कारण भरद्वाज का एक नाम 'वितथ' भी हुआ।

​इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यांसंहितायां नवमस्कन्धे विंशोऽध्यायः ।२०।


द्रौपदी के पैरों और हाथों के शुभ लक्षण-

द्रौपदी के शारीरिक लक्षणों, उनकी हथेलियों और पैरों के तलवों पर कमल और शंख (पद्म और शंख) के दिव्य प्रतीकों का विस्तृत वर्णन महाभारत के विराट पर्व के अंतर्गत ९वें अध्याय में मिलता है। 
जब द्रौपदी अज्ञातवास के दौरान राजा विराट की पत्नी महारानी सुदेष्णा के पास दासी (सैरन्ध्री) बनने के लिए जाती हैं, तब महारानी सुदेष्णा उनके अलौकिक सौंदर्य और इन राजसी व दिव्य शुभ-लक्षणों को देखकर चकित रह जाती हैं।
इस प्रसंग का श्लोक और उसका संदर्भ इस प्रकार है:
महाभारत संदर्भ
  • पर्व: विराट पर्व (चौथा पर्व)
  • उप-पर्व: पाण्डवप्रवेश पर्व
  • अध्याय: ९ (कुछ संस्करणों में अध्याय १५ या १६ के रूप में भी गणना मिलती है, क्योंकि विभिन्न प्रकाशनों में अध्यायों का विभाजन थोड़ा भिन्न है)।
मुख्य श्लोक व अर्थ
महाभारत में सुदेष्णा द्रौपदी के पैरों और हाथों के शुभ लक्षणों को देखकर कहती हैं:
अंगुष्ठावेव कुरुते पादौ च सुप्रतिष्ठितौ।
यस्याः पद्मौ च शंखौ च हस्तपादतले तथा ॥
(अर्थ: तुम्हारे पैर भूमि पर पूरी तरह सीधे और सुप्रतिष्ठित टिकते हैं, और तुम्हारी दोनों हथेलियों तथा दोनों पैरों के तलवों में कमल (पद्म) और शंख जैसे दिव्य व शुभ राजसी चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।) 
इसके अतिरिक्त, आदि पर्व के अध्याय १६९ में भी द्रौपदी के जन्म के समय उनके दिव्य स्वरूप और नीले कमल जैसी सुगंध का वर्णन है, जो उनके साधारण स्त्री न होने और साक्षात् देवी का अंश होने की पुष्टि करता है। 

बुधवार, 23 सितंबर 2026

कब्बाली

यह लोक फ्यूजन यादव योगेश कुमार रोहि के द्वारा लिखित व उन्हीं के निर्देशन में 'स्वर साधना संगीत संस्था' द्वारा प्रस्तुत है।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

​(इस रचना को कव्वाली और लोकगीत के फ्यूजन के रूप में, तालियों की थाप, ढोलक की तेज़ लय और कोरस के साथ गाने की कल्पना करें)

​(आलाप - धीमी और गंभीर आवाज़ में)

मुख्य गायक 1:

(मुखड़ा)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​(कोरस - तालियों की थाप के साथ शुरुआत)

अरे जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं!

बड़ी विलक्षण ये माया!

​(मुखड़ा - तेज़ लय में)

मुख्य गायक १:

किसान की क्या शान ! धरती उसकी पहचान। खाद बीज मिलते नहीं ,मिले तो मूल्य आसमान ! धूप में तपता रहा! बरसात में भीगता रहा! सर्दी में कोहरे की ठिठुरन। कष्ट सहता है सघन। जो कभी नहीं सो पाया!

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया... 

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​मुख्य गायक 1:

कृष्ण और संकर्षण इस किसान के हैं  पूर्वज !

इसके पशुओं से फीस बनी पैसे को जिसने जन्म दिया। उस किसान का ध्यान नहीं जिसने पैदा अनाज किया‌। दिन रात परिश्रम करता है। विश्राम पेड़ की छाया । 

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया... 

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​(मक़्ता / क्लाइमैक्स - बहुत तेज़ और जोश में)

दोनों गायक एक साथ:

बाहर से है चकाचौंध, भीतर से रोहि घोर अंधेरा है।,

ये विकास नहीं है दोखा है, देश आज तंगी ने घेरा है।  बैमानी रिश्वत खोरी है । भोले भालों की कदर नहीं। लुच्चों की सीना जोरी है। नैतिक मर्यादा भी टूट रही बची कुची जो थोरी है। पुण्य गंवा कर भी तूने जो अकूत धन कमाया! यहीं धरी रह जाएगी तेरी सारी दौलत माया।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया... 

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 


(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, यहाँ फरेबों का है साया।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

जयकारा: जोर से - बोल आजादपुर वाली मइया की जय !

​(संगीत की तेज़ थाप और ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अंत)

कब्बाली देश की हालत!

यह लोक फ्यूजन यादव योगेश कुमार रोहि के द्वारा लिखित व उन्हीं के निर्देशन में 'स्वर साधना संगीत संस्था' द्वारा प्रस्तुत है।

​(इस रचना को कव्वाली और लोकगीत के फ्यूजन के रूप में, तालियों की थाप, ढोलक की तेज़ लय और कोरस के साथ गाने की कल्पना करें)

​(आलाप - धीमी और गंभीर आवाज़ में)

मुख्य गायक 1:

(मुखड़ा)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​(कोरस - तालियों की थाप के साथ शुरुआत)

अरे जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं!

बड़ी विलक्षण ये माया!

​(मुखड़ा - तेज़ लय में)

मुख्य गायक 2:

झूठ का बाज़ार देखो, हर तरफ है सज रहा,       गाँव सीधा किसान इसे ही सच समझ रहा।

मिलावटों के दौर से, हर आदमी गुजरने लगा। और मंहगायी के बाजार से खून सब जरने लगा। 

मेहनत की महीनों की कमाई, पल भर में ही निबट रही, जिन्दगी अब अभावों में गरीबों की कट रही।

ईमानदारी चली गयी, बेईमानी अभी तक डट रही। भखों की ये भीड़ हैं जो रोटियाँ झपट रही।हड़डीयों के कंकाल हैं और खाल से लिपटी काया

​मुख्य गायक 1:

विज्ञापनों शोर सुनकर, आदमी घर से निकलकर, बड़ी खरीददारी कर रहा! पर उसको क्या पता, कौन गद्दारी कर रहा!

​(कोरस)

अरे उसको क्या पता, कौन गद्दारी कर रहा!

​(अंतरा 1 - मिलावट का ज़हर)

मुख्य गायक 1:

मिलावटें इस कदर हैं, आज अपने देश में,

अपराधी भी घूम रहे, संन्यासीयों के वेष में!

बेसन में मक्के का आटा, कहीं देसी घी में चर्बी है, मिठास  खोजता आदमी अब तो चीनी भी कर्बी है।

​मुख्य गायक 2:

सीमेंट के कट्टों में देखो, पावर हाउस की राख है,

पेट्रोल में केरोसिन, अब आदमी की क्या साख है।

पीली ईंट घिसी हल्दी में, धनिया में गधे की लीद है,

काली मिर्च में बीज पपीता, नहीं शुद्धता की उम्मीद है ! आदमी को मोशन हो गया ! जब रिफाइड उसने खाया।  

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​

​(अंतरा 2 - अर्थव्यवस्था और विज्ञापन का झूठ)

मुख्य गायक 2:

विज्ञापनों पर जोर देखो, लाउड स्पीकर बज रहा ,भोला गरीब लुट रहा,नहीं वह कुछ समझ रहा!

सत्तासीन नेता कहें, अब जीडीपी में उछाल है,

उद्योगों की क्वालिटी, बिल्कुल ही बेमिसाल है।

​मुख्य गायक 1:

विज्ञापन का झूठ देखो, चमक-दमक में तुल गया,

खाने-पीने की चीज़ों में, जाने क्या-क्या घुल गया!

मिलावटी बाज़ार अब तो हर कौने वे  खुल गया,

 फिर इन्सान कमजोर है माल उसने बहुत खाया

​(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​(अंतरा 3 - शादियों का बाज़ार)

मुख्य गायक 2:

पहले थी रस्में-कसमें, अब तो मंडपों में व्यापार है, शादीयाँ शोदे हैं अब तो यहाँ आशनाई  प्यार है

​मुख्य गायक 1:

बोली लगती है दूल्हों की, जहाँ रुपयों का अंबार है,

जिसकी जितनी मोटी गड्डी, मोटा उसका सत्कार है!

​(कोरस)

जिसकी जितनी मोटी गड्डी, मोटा उसका सत्कार है! बही बड़ा आदमी है अब जिसने हराम का खाया।


​मुख्य गायक 2:

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​(कोरस)


​(अंतरा 4 - बिकाऊ न्याय व्यवस्था)

मुख्य गायक 1:

इंसाफ की देवी की आँखों पे, नोटों की पट्टी बाँधी  है। बिना खर्चा पानी के कोई काम नहीं, हर विभाग में आँधी है।

​मुख्य गायक 2:

मुजरिम तो सरेआम घूमे, पहन के चोला साधू का,

कानून भी अब गुलाम हो गया, पैसे वाले जादू का!

​(कोरस)

अरे पैसे वाले जादू का, पैसे वाले जादू का !

​मुख्य गायक 1:


​(अंतरा 5 - शिक्षा का पतन)

मुख्य गायक 2:

विद्या के मंदिर में भी अब, विद्या का सम्मान नहीं,

डिग्रियां बिकती हैं  लाखों में, लेकिन बंदों में ज्ञान नहीं !

​मुख्य गायक 1:

गुरु-शिष्य की वो मर्यादा, अब धूमिल सी ज्योति है। विद्या की अरथी को ढोते ,संज्ञा विद्यार्थी होती है।

तालीम नहीं कोई इल्म नहीं डिग्रीयों की खरीददारी है। अयोग्यों का उन पदों पे होना शिक्षा से गद्दारी है। ये  नैतिक मूल्यों का सफाया ।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

​

​(मक़्ता / क्लाइमैक्स - बहुत तेज़ और जोश में)

दोनों गायक एक साथ:

बाहर से है चकाचौंध, भीतर से सब खोखला है,

ये विकास नहीं है यारों, ये तो बस  घपला है!

पैसे का पहिया चल रहा, इंसानियत को कुचल कर। रोहि कोई एक चल रहा है इस भीड़ में सम्हलकर। जो सच को जान पाया।

(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, यहाँ फरेबों का है साया।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

जयकारा:

बोल आजादपुर वाली मइया। की जय!

​(संगीत की तेज़ थाप और ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अंत)