अहीर (यादव) जाति का क्षत्रिय वर्ण एक ऐतिहासिक एवं पौराणिक विश्लेषण-
प्रस्तावना
भारतीय समाज की जाति व्यवस्था प्राचीन काल से ही जटिल और बहुस्तरीय रही है। पुराणों, महाकाव्यों और इतिहासकारों के ग्रंथों में विभिन्न जातियों की उत्पत्ति को विभिन्न तरीकों से वर्णित किया गया है, जो कभी-कभी परस्पर विरोधी भी प्रतीत होते हैं। यह लेख मुख्य रूप से अहीर (यादव) जाति पर केंद्रित है, जो प्राचीन काल से ही कृषि, पशुपालन और शासन से जुड़ी रही है। हम देखेंगे कि कैसे पुराणकारों और यथास्थितिवादियों ने शक्तिशाली जातियों को वर्णसंकर या निम्न घोषित करने की कोशिश की, लेकिन शास्त्रीय प्रमाणों से अहीरों का क्षत्रिय वर्ण स्पष्ट होता है। यह विश्लेषण "गोप-आभीर (अहीर)-यादव" नामक पुस्तक से है, जिसमें सभी श्लोकों को मूल रूप में शामिल है। अंत में, यादव वंश की शेजरा (वंशावली) भी प्रस्तुत की गई है, जो पुराणों पर आधारित है।
यह लेख तथ्यों पर आधारित है, जिसमें पुराणों से हम विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के उदाहरणों से शुरू करते हैं और अहीरों के क्षत्रिय होने के प्रमाण पर समाप्त करेंगे।
1. राजपूत जाति की उत्पत्ति- वर्णसंकर या विदेशी?
मध्यकाल में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध राजपूत जाति को पुराणों में वर्णसंकर घोषित किया गया। ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसे क्षत्रिय पुरुष और करण स्त्री की संतान बताया गया है।
श्लोक-
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रों बभूव ह।
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः ॥१११०॥
अर्थ- क्षत्रिय पुरुष तथा करण कन्या के संयोग से राजपूत जाति का उद्भव होता है।
करण स्त्री कौन है? ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखंड, अध्याय 10 में स्पष्ट है कि शूद्र और वैश्य के मिश्रण से करण की उत्पत्ति होती है।
श्लोक-
इत्येवमाद्या विप्रेन्द्र सच्छूद्राः परिकीर्तिताः।
शूद्राविशोस्तु करणोऽम्बष्ठो वैश्याद्दिवजन्मनोः ॥१८॥
आधुनिक अंग्रेज इतिहासकारों ने भी राजपूतों को विदेशी बताया। जेम्स टॉड ने "एनाल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान" में राजपूतों को सीथियन की संतान कहा। इसी प्रकार, स्मिथ ने उन्हें शक और हूण की संतान घोषित किया, जबकि अग्निकुल (चौहान, परमार, चालुक्य) को शक-हूण से जोड़ा और राष्ट्रकूट, चंदेल को गोंड, भर आदि से।
यह दर्शाता है कि शक्तिशाली जातियों को कमतर दिखाने की प्रवृत्ति रही है।
2. क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति विविध मत-
क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति तीन प्रमुख तरीकों से बताई गई है, जो कभी-कभी विरोधाभासी लगती हैं।
क) ऋग्वेद से-
बाहू इति। राजन्यः। कृतः ॥१२॥
(ऋग्वेद १०/९०/१२)
अर्थ- क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं से हुई।
ख) इक्ष्वाकु वंश से-
भगवान राम इक्ष्वाकु वंशी क्षत्रिय थे। इक्ष्वाकु की उत्पत्ति मनु के नाक छींकने से बताई गई।
श्लोक-
क्षुवतस्तु मनोः पूर्वमिक्ष्वाकुरभिनिः सृतः ॥८॥
(ब्रह्मांड पुराण, मध्यम भाग, अध्याय ६३)
अर्थ- प्राचीन काल में मनु द्वारा नाक से छींकने पर इक्ष्वाकु निकले।
ग) महाभारत से-
परशुराम द्वारा क्षत्रियों के विनाश के बाद, क्षत्रिय स्त्रियों ने ब्राह्मणों से संतान उत्पन्न की।
श्लोक-
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेंद्रे पर्वतोत्तमे ॥४॥
तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥५॥
तेभ्यश्च लेभिरे गर्भ क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।
ततः सुषुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान ॥७॥
कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये।
एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ॥८॥
जातं वृद्ध च धर्मेण सुदीघेर्णायुषान्वितम्।
चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्बाह्यणोत्तराः ॥९॥
(महाभारत, आदिपर्व, प्रथम खंड, अध्याय ६४)
अर्थ- क्षत्रिय स्त्रियों ने ब्राह्मणों से गर्भ धारण किया, जिससे क्षत्रिय संतान हुई।
यह मत अमान्य है क्योंकि: (१) क्षत्रिय प्राचीन काल से अस्तित्व में हैं; (२) ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री से संतान ब्राह्मण होती है।
श्लोक-
भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते।
आनुपूर्व्याद् द्वयोर्कीनौ मातृजात्यौ प्रसूयतः ॥४॥
(अनुशासनपर्व, अध्याय ४८)
3. ब्राह्मण जाति की उत्पत्ति
ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ माना गया, जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से बताई गई।
श्लोक-
ब्राह्मणः। अस्य। मुखम्। आसीत्।
उपाध्याय, दीक्षित आदि दस ब्राह्मण कश्यप के पुत्र कण्वमुनि और आर्यावती से हुए।
श्लोक-
दशपुत्रास्तयोर्जाता आर्यबुद्धिकरा हि ते।
उपाध्यायो दीक्षितश्च पाठकः शुक्लमिश्रकौ ॥७॥
अग्निहोत्री द्विवेदी च त्रिवेदी पांड एव च।
चतुर्वेदीति कथिता यथा नाम तथा गुणाः ॥८॥
(भविष्य पुराण, भाग २, प्रतिसर्ग पर्व, अध्याय २१)
मनु से सभी वर्ण उत्पन्न हुए।
श्लोक-
ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः।
ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ॥१४॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ७५)
अर्थ- उन्हीं मनु से ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए। तभी से ब्राह्मण कुल क्षत्रिय से सम्बद्ध हुआ।
4. अन्य जातियों की उत्पत्ति- वर्णसंकर उदाहरण
बहादुर, जाट आदि को वर्णसंकर कहा गया।
श्लोक-
म्लेच्छेश्चभुक्त्यत्यस्ताबभूर्यु वर्णसङ्कराः।
न वै आदी न वै म्लेच्छाजट्टा जात्या न नेहनाः ॥११२७॥
(भविष्य पुराण, अध्याय २, प्रतिसर्ग पर्व)
5. नंदिनी गाय से जातियों की उत्पत्ति- एक चमत्कारिक कथा
कई जातियों (हूण, पारसी, पहलव, शक, द्रविड़, सिंहल, पौंड्र आदि) की उत्पत्ति नंदिनी गाय के मूत्र, गोबर आदि से बताई गई, जो मनगढ़ंत लगती है।
श्लोक-
आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ।
अंगारवर्ष मुञ्चंती मुहुर्वालधितो महत् ॥३५॥
असृजत् पहलवान पुच्छात् प्रस्रवाद् द्रविड़ाव्छकान्।
योनिदेशाच्च यवनान शकृतः शबरान बहून ॥३६॥
मूत्रतश्चासृजत कांश्चिच्छ्वरांश्चैव पार्श्वतः
पौण्ड्रान किरातान यवनान सिंहलान बबार्रान खसान ॥३७॥
चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान्।
ससर्ज फेनतः सा गौम्लेंच्छान बहुविधानपि ॥३८॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १७३)
अर्थ- नंदिनी गाय ने पूंछ से पहलव, थनों से द्रविड़-शक, योनिदेश से यवन, गोबर से शबर, मूत्र से शबर, पार्श्व से पौंड्र आदि, और फेन से चीन-हूण आदि उत्पन्न किए।
यह जबरदस्ती की कथा है, जब उत्पत्ति का ज्ञान न हो।
6. विरोधाभासी उत्पत्ति- शक जाति का उदाहरण
महाभारत में शक नंदिनी के थन से, लेकिन शिव पुराण में सूर्यवंशी नरिष्यंत से।
श्लोक-
नरिष्यन्ताच्छका पुत्रा नमगस्य सुतोऽभवत् ॥२२॥
(शिव पुराण, उमाकोटि संहिता, अध्याय ३६, पेज १२९७)
अर्थ- नरिष्यंत से शकों का जन्म।
यह हास्यास्पद विरोध है।
निष्कर्ष- अहीर (यादव) का क्षत्रिय वर्ण
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि जब कोई जाति सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देती है, तो उसे निम्न घोषित किया जाता है-जैसे बुद्ध, मौर्य, कायस्थ, क्षत्रिय, राजपूत, वैश्य आदि। अहीर जाति ने भागवत धर्म और राजनीतिक शक्ति से चुनौती दी, इसलिए उसे शूद्र, महाशूद्र, अत्यज, वर्णसंकर, विदेशी कहा गया। लेकिन शास्त्र कहते हैं-
श्लोक-
यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ॥३४॥
(मत्स्य पुराण, अध्याय ३४/३०; महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ८५; हरिवंश पुराण, हरिवंश पर्व, ३३/५५)
अर्थ- यदु से यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए। अर्थात यादव/अहीर का वर्ण क्षत्रिय है।
पृथ्वीराज रासो में ३६ क्षत्रिय वंशों में अहीर शामिल हैं।
श्लोक-
रवि ससि जादव वंश, ककुस्थ परमार सदावर।
चाहुवान चालुकय, छंद सिलार अभियर। (आभीर)
दोयमत मकवान, गरूअ गोहिल गोहिलपुत।
चापोत्कट परिवार, राव राठौर रोसजुत।
देवरा टांक सैन्धव अनिग, योतिक प्रतिहार दधिषट।
कारट्टपाल कोटपाल हुल, हरितट गौर कमाष मट।
धन्यपालक निकुंभ वर, राजपाल कविनीस।
कालछुरक्कै आदि दे, बरने वंस छत्तीस।
नंदगोप की पुत्री योगमाया को क्षत्रिया कहा गया।
श्लोक-
निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा
विद्याना ब्रहाविद्या त्वमोंकारोऽथ वषट् तथा ॥२३॥
(हरिवंश पुराण, विष्णु पर्व, अध्याय ३)
नंदगोप स्वयं क्षत्रिय
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श्लोक-
एवमिति सार्द्धम। एवं नंदःगोपः क्षत्रा व्रजरक्षाधिकृतेन गोकुले आघोषयत् सर्वत्र घोषितवान् ॥१३॥
(अन्वितार्थ प्रकाशिका, अध्याय ३९, दशम स्कंध, पूर्व भाग, पेज १२६०)
कृष्ण कहते हैं-
श्लोक
क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्या प्रकृतिस्थिताः।
यदुवंशे समुत्पन्न क्षात्रं वृत्त मनुष्ठित ॥१०॥
(हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व, ८०/१०)
कृष्ण को गोप (अहीर) जाति में जन्मा कहा
श्लोक-
गोपजातिप्रतिच्छन्नौ देवा गोपालरूपिणः।
ईडिरे कृष्णरामौ च नटा इव नटं नृप ॥११॥
(भागवत पुराण, १०/१८/११)
इस प्रकार, अहीर का वर्ण क्षत्रिय है। हमें साजिश समझकर अपनी पहचान माननी चाहिए।
यादव वंश की शेजरा (वंशावली)
पुराणों (मत्स्य, हरिवंश आदि) के आधार पर यादव वंश की संक्षिप्त शेजरा निम्न है-
- ब्रह्मा - अत्रि - सोम (चंद्र)-पुरुरवा - आयु - नहुष - ययाति
ययाति के पुत्र यदु (यादव वंश के आदि पुरुष)
यदु - सहस्रजित् - शतजित् - हैहय (हैहय वंश)
यदु की अन्य शाखाएं- क्रोष्टु - वृजिनवान - स्वाहि - रुशेकु - चित्ररथ - शशबिंदु
शशबिंदु - पृथुश्रवा - अंतरा - सुयज्ञ - उशना - शिनेयु - मरुत्त
... (कई पीढ़ियां) अंधक (अंधक वंश) और वृष्णि (वृष्णि वंश)
- वृष्णि - युधाजित - अनामित्र - शिनि - सत्यक - युयुधान
मुख्य शाखा- यदु ... - वसुदेव - श्रीकृष्ण और बलराम (यादव कुल के प्रमुख)
कृष्ण के वंशज- प्रद्युम्न - अनिरुद्ध - वज्र (मथुरा के यादव राजा)
यह शेजरा चंद्रवंशी क्षत्रिय परंपरा को दर्शाती है, जिसमें यादवों की राजकीय भूमिका स्पष्ट है। विस्तृत शेजरा के लिए हरिवंश पुराण का अध्ययन करें।