पूजा का उल्लेख किया। यह सिद्ध करता है कि उस समय तक कृष्ण की पूजा एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य थी।
हालांकि यह वैष्णव धर्म से अधिक जुड़ा है, लेकिन इसकी प्राचीनता (110 ईसा पूर्व) उस समय श्रीकृष्ण की लोकप्रियता को दर्शाती है जिसका विस्तार जैन साहित्य में भी उसी कालखण्ड में हुआ था।
एलोरा की गुफाओं में श्रीकृष्ण उल्लेख-
दशावतार गुफा (गुफा संख्या 15)
यह गुफा भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को समर्पित है जैसे -
गोवर्धनधारी कृष्ण-
यहाँ श्रीकृष्ण को गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए हुए दिखाया गया है, जो इंद्र के प्रकोप से गोकुलवासियों की रक्षा का प्रतीक है।
अन्य अवतार-
इसी गुफा में विष्णु के शेषशायी (शेषनाग पर लेटे हुए), वराह (सूअर अवतार), नृसिंह (आधा शेर, आधा मनुष्य) और वामन अवतारों की विशाल मूर्तियाँ भी हैं।
कृष्ण के बचपन के दृश्य-
गुफा संख्या 15 में श्रीकृष्ण के बचपन (बाल-लीलाओं) से जुड़े 12 अलग-अलग प्रसंगों का सुन्दर नक्काशीदार चित्रण मिलता है।
जैन शिलालेखों में श्रीकृष्ण (वासुदेव) का उल्लेख-
श्रीकृष्ण का नाम केवल ग्रन्थों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कुछ प्राचीन शिलालेखों में भी उनके अस्तित्व और जैन धर्म से उनके सम्बन्ध के प्रमाण मिलते हैं। जैसे-
हाथीबाड़ा-घोसुंडी शिलालेख (राजस्थान)-
दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के इन शिलालेखों को भारत के सबसे प्राचीन संस्कृत शिलालेखों में गिना जाता है। कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि ये शिलालेख जैन धर्म से संबंधित हो सकते हैं क्योंकि इनमें 'जिना' का उल्लेख मिलता है। इनमें संकर्षण (बलराम) और वासुदेव (कृष्ण) के लिए पूजा गृह (नारायण वाटिका) बनाने का वर्णन है।
मोरा पत्थर शिलालेख (मथुरा)-
यह शिलालेख मथुरा के पास मिला है। यह पहली शताब्दी ईसवी का शिलालेख है जो 'पाँच वृष्णि नायकों' का उल्लेख करता है, जिनमें श्रीकृष्ण (वासुदेव), बलराम (संकर्षण), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और शाम्ब के नाम शामिल हैं। जैन धर्म में इन सभी को शलाका पुरुष या मोक्षगामी महापुरुष माना गया है।
कंकाली टीला (मथुरा)-
मथुरा के इस प्रसिद्ध जैन स्थल से प्राप्त शिलालेखों और मूर्तियों में यदुवंशी नायक कृष्ण और बलराम के चित्र तीर्थंकरों (विशेषकर भगवान नेमिनाथ) के साथ अंकित मिलते हैं, जो उनके ऐतिहासिक समकालीन होने की पुष्टि करते हैं।
(ग) खगोलीय साक्ष्य-
डॉ. एस. कल्याणरमन और अन्य शोधकर्ताओं ने 'प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर' के माध्यम से महाभारत में वर्णित ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति का विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, महाभारत युद्ध की खगोलीय गणना 3137 ईसा पूर्व के आसपास बैठती है, जो कृष्ण के समय की पुष्टि करती है। यह गणना कैसे की गई इसको नीचे बताया गया है।
महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने युद्ध के समय ग्रहों और नक्षत्रों की जो विशिष्ट स्थितियाँ बताई हैं, वे किसी 'फिंगरप्रिंट' की तरह अद्वितीय हैं। सॉफ्टवेयर में मुख्य रूप से इन तीन तथ्यों का उपयोग किया गया है-
(1) अमावस्या और ग्रहण का संयोग-
महाभारत ग्रंथ में उल्लेख है कि युद्ध से ठीक पहले एक ही महीने में दो ग्रहण (सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण) लगे थे और अमावस्या के दिन युद्ध की तैयारी शुरू हुई थी।
(2) ग्रहों की वक्री चाल-
व्यास जी ने मंगल और शनि जैसे ग्रहों के नक्षत्रों के सापेक्ष पीछे की ओर चलने (वक्री होने) का सटीक वर्णन किया है। उदाहरण के लिए, 'मघा' नक्षत्र में मंगल और 'रोहिणी' में शनि की स्थिति।
(3) भीष्म पितामह का देह त्याग-
भीष्म पितामह ने सूर्य के 'उत्तरायण' होने की प्रतीक्षा की थी। सॉफ्टवेयर के माध्यम से उस विशेष दिन (शीतकालीन संक्रांति की गणना की गई जब चन्द्रमा की स्थिति 'अष्टमी' थी।
खगोल वेत्ता- पुष्कर भटनागर और सरोज बाला ने अपने शोधों में इन्ही इनपुट्स को Voyager और Stellarium जैसे सॉफ्टवेयर में डालकर यह निष्कर्ष निकाला कि ये स्थितियाँ 3137 ईसा पूर्व या 3067 ईसा पूर्व (अलग-अलग मतों के अनुसार) में सटीक बैठती हैं।
जिस खगोलीय गणनाओं (Archaeo-astronomy) के आधार पर महाभारत युद्ध का समय निकाला गया है, उसी सिद्धान्तों से पुष्कर भटनागर जैसे विद्वानों ने श्रीकृष्ण की जन्म तिथि को भी निर्धारित किया है। उन्होंने गणना करके बताया है कि- श्रीकृष्ण के जन्म के समय (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र) की थी। उसके अनुसार सबसे स्वीकृत तिथि निम्नलिखित है-
श्रीकृष्ण की जन्म तिथि-
🔆 तारीख: 27 जुलाई, 3112 ईसा पूर्व
🔆 समय: मध्यरात्रि (12:00 AM)
🔆 स्थान: मथुरा (77° 41' E, 27° 28' N)
सॉफ्टवेयर गणना के मुख्य आधार-
सॉफ्टवेयर में महाभारत और पुराणों में वर्णित उस समय की ग्रह स्थितियों को फीड किया गया था वह निम्नलिखित है-
(1) नक्षत्र-
चन्द्रमा 'रोहिणी' नक्षत्र में था।
(2) तिथि-
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' तिथि थी
(3) ग्रहों की स्थिति-
उस समय चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु और शुक्र अपने उच्च के या अनुकूल भावों में थे, जैसा कि प्राचीन ग्रंथों में 'असाधारण महापुरुष' के जन्म के लिए वर्णित है।
यदि श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ, तो उनका देह त्याग (निर्वाण) 3012-3102 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है, जिससे कलियुग के आरम्भ की गणना भी जुड़ी हुई है।
श्रीकृष्ण के जीवन काल की गणना-
पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर यह माना जाता है कि श्रीकृष्ण लगभग 125 वर्ष तक पृथ्वी पर रहे। इस बात की पुष्टि -श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में ब्रह्मा जी श्री कृष्ण से कहते हैं कि-
अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
यदि पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार देखा जाए तो श्रीकृष्ण के देह त्याग और कलियुग के आरम्भ के बीच एक गहरा सम्बन्ध है, जिसे 'जीरो पॉइंट' माना जाता है। इसके लिए नीचे देखें-
निर्वाण और कलियुग का प्रारम्भ-
विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, जिस क्षण श्रीकृष्ण ने अपनी इहलीला समाप्त कर स्वधाम गमन किया, उसी क्षण से पृथ्वी पर कलियुग का प्रभाव शुरू हो गया। अब यह कितना सत्य है इसको भी जानना आवश्यक है।
सटीक समय (3102 ईसा पूर्व)- महान भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ 'आर्यभटीय' में उल्लेख किया है कि जब वे 23 वर्ष के थे, तब कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके थे। इस गणना के आधार पर कलियुग का प्रारम्भ 18 फरवरी, 3102 ईसा पूर्व (मध्यरात्रि) को हुआ माना जाता है। इसकी गणना कुछ इस से प्रकार की गई-
(1) खगोलीय साक्ष्यों के अनुसार, इस विशेष तिथि पर सौरमण्डल के सात प्रमुख ग्रह (सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) एक ही राशि (मेष) और एक ही बिन्दु पर संरेखित थे। ऐसी दुर्लभ घटना हजारों वर्षों में एक बार होती है।
(2) द्वारका का डूबना- महाभारत के 'मौसल पर्व' के अनुसार, कृष्ण के देह त्याग के ठीक 7 दिन बाद विशाल समुद्री लहरों ने द्वारका नगरी को डुबो दिया था। डॉ. एस.आर. राव को समुद्र के नीचे जो अवशेष मिले, वे इस जलप्रलय की पुष्टि करते हैं। इस बात को हम पहले ही बता चुका हूँ।
विशेष- श्रीकृष्ण का भू-लोक से अपने धाम गोलोक को जाना एक सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि भारतीय काल-गणना के अनुसार एक युग परिवर्तन की घटना थी जो आज भी वैज्ञानिक व ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ध्रुव सत्य है।
(घ) साहित्यिक साक्ष्य
(क) जैन ग्रन्थों में श्रीकृष्ण नाम व चरित्र -
जैन ग्रन्थ- हरिवंश पुराण, उत्तरपुराण और पांडवपुराण में श्रीकृष्ण का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहाँ उन्हें एक शलाका पुरुष और अर्ध-चक्रवर्ती के रूप में पहचाना गया है। जैन धर्म में श्रीकृष्ण के नाम और पदवी के बारे में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं-
(१) वासुदेव (नारायण)- जैन आगमों के अनुसार, कृष्ण नौवें (अंतिम) वासुदेव हैं।
(२) शलाका पुरुष- जैन धर्म के 63 विशिष्ट महापुरुषों (शलाका पुरुषों) में कृष्ण का स्थान महत्वपूर्ण है।
(३) अर्ध-चक्रवर्ती- उन्हें 'अर्ध-चक्रवर्ती' कहा गया है क्योंकि उन्होंने आधे भारत (दक्षिण भारत) पर शासन किया था।
प्रमुख जीवन घटनाएँ और जानकारी-
जैन ग्रन्थ हरिवंश पुराण के अनुसार भगवान नेमिनाथ और श्रीकृष्ण सगे चचेरे भाई थे। जैन धर्म में उन्हें अरिष्टनेमि के नाम से भी जाना जाता है और वे 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 22वें तीर्थंकर हैं।
जैन पुराणों में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण ने ही भगवान नेमिनाथ का विवाह जूनागढ़ की राजकुमारी राजुल (राजीमती) से तय कराया था। विवाह के समय जब नेमिनाथ ने वध के लिए एकत्रित किए गए मूक (निर्दोष) पशुओं की चीख सुनी, तो उनका मन द्रवित हो गया और उन्होंने श्रीकृष्ण के सामने ही राजसी वैभव त्याग कर वैराग्य ले लिया।
उपर्युक्त प्रसंग श्रीकृष्ण और भगवान नेमिनाथ के बीच की शक्ति-परीक्षा और नेमिनाथ के वैराग्य से जुड़ा है। जैन ग्रंथों (जैसे हरिवंश पुराण) के अनुसार यह घटना काफी रोचक है। उसको निम्नलिखित घटना क्रम से जान सकते हैं-
(1) बल की परीक्षा (शंख वादन)
श्रीकृष्ण को अपनी शक्ति पर गर्व था, लेकिन उन्हें संदेह था कि उनके चचेरे भाई नेमिनाथ उनसे भी अधिक शक्तिशाली हैं। एक दिन श्रीकृष्ण के शस्त्रागार में रखा 'पञ्चजन्य' शंख (जिसे केवल वासुदेव ही बजा सकते थे) नेमिनाथ ने खेल-खेल में उठा लिया और उसे इतनी जोर से बजाया कि पूरी द्वारिका कांप उठी।
जब श्रीकृष्ण को पता चला कि यह उनके छोटे भाई नेमिनाथ ने किया है, तो उन्होंने उनकी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए उन्हें मल्ल-युद्ध के लिए ललकारा। नेमिनाथ ने मुस्कुराते हुए केवल अपनी एक अंगुली श्रीकृष्ण के सामने रख दी और कहा कि यदि आप मेरी इस एक कनिष्ठा अंगुली को भी झुका देंगे, तो मैं हार मान लूँगा। श्रीकृष्ण ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन वे नेमिनाथ की अंगुली को टस से मस नहीं कर पाए।
(2) वैराग्य की ओर मोड़
श्रीकृष्ण ने सोचा कि यदि नेमिनाथ जैसे शक्तिशाली महापुरुष का विवाह नहीं हुआ, तो वे संसार त्याग कर मुनि बन जाएंगे। इसलिए श्रीकृष्ण ने ही नेमिनाथ का विवाह उग्रसेन की पुत्री राजुल (राजीमती) से तय करवाया।
(3) पशुओं की करुण पुकार
जब नेमिनाथ की बारात महल के द्वार पर पहुँची, तो उन्होंने बाड़े में बन्द हजारों असहाय पशुओं को रोते और चिल्लाते देखा। पूछने पर पता चला कि ये पशु उन्हीं की बारात के भोजन के लिए मारे जाने वाले हैं।
यह सुनकर नेमिनाथ का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने तत्क्षण विवाह का विचार त्याग दिया और अपने आभूषण उतारकर श्रीकृष्ण को सौंप दिए। श्रीकृष्ण के समझाने के बावजूद, नेमिनाथ गिरनार पर्वत (जूनागढ़) पर चले गए और वहाँ तपस्या कर कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया।
जैन ग्रन्थों (जैसे हरिवंश पुराण और नेमिनाथ चरित) के अनुसार, भगवान नेमिनाथ के वैराग्य धारण करने के बाद राजकुमारी राजुल (राजीमती) का जीवन पूरी तरह बदल गया। उनकी कहानी त्याग और समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है, इसको निम्नलिखित सन्दर्भों से समझा जा सकता है-
1- विलाप और दुख
जब राजुल को पता चला कि उनके होने वाले पति (नेमिनाथ) बारात के द्वार से ही लौट गए हैं और दीक्षा लेने गिरनार पर्वत चले गए हैं, तो वे गहरे शोक में डूब गईं। उन्होंने तय किया कि यदि वे नेमिनाथ की पत्नी नहीं बन सकीं, तो वे किसी अन्य पुरुष से विवाह नहीं करेंगी।
2- वैराग्य का मार्ग
राजुल ने संसार के भोग-विलास को त्यागने का निश्चय किया। उन्होंने अपने सुंदर वस्त्र और आभूषण उतार फेंके और अपनी सखियों के समझाने के बावजूद नेमिनाथ के मार्ग पर चलने का फैसला किया।
3- दीक्षा और साधना
वे गिरनार पर्वत पर गईं और भगवान नेमिनाथ के चरणों में दीक्षित होकर आर्यिका (जैन साध्वी) बन गईं। जैन परम्परा के अनुसार, वे भगवान नेमिनाथ के समवशरण (धर्म सभा) में प्रमुख साध्वी (गणिनी) बनीं।
4- मोक्ष की प्राप्ति
कठोर तपस्या और आत्म-साधना के बल पर राजुल ने अपने कर्मों का क्षय किया। अन्त में, उन्होंने भी उसी गिरनार पर्वत से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया, जहाँ से भगवान नेमिनाथ को मोक्ष मिला था।
जैन ग्रन्थों में श्रीकृष्ण की पत्नियों का उल्लेख-
जैन आगम 'अंतकृतदशांग सूत्र' और 'हरिवंश पुराण' में श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियों (पटरानियों) का विस्तार से वर्णन मिलता है। जैन धर्म के अनुसार इन आठों रानियों ने अंत में भगवान नेमिनाथ से दीक्षा ली और मोक्ष प्राप्त किया।
इनके नाम इस प्रकार हैं-
रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, लक्ष्मणा, सुसीमा, गौरी
पद्मावती, और गांधारी।
जैन ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृष्ण की मृत्यु और द्वारिका के विनाश के बाद, इन सभी रानियों का संसार से मोह भंग हो गया। और वे भगवान नेमिनाथ के समवशरण (धर्म सभा) में राजुल (राजीमती) के पास जाकर जैन दीक्षा ग्रहण की और सभी एक साथ साध्वी बन गईं। तद्पोपरान्त इन रानियों ने 'गुणरत्न संवत्सर' नामक बहुत ही कठिन उपवास और तपस्या की और अपनी साधना के बल पर इन सभी ने शत्रुंजय पर्वत (पालीताना, गुजरात) से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
जैन ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के पुत्रों का उल्लेख-
जैन ग्रन्थों (विशेषकर अंतकृतदशांग सूत्र) के अनुसार, श्रीकृष्ण के पुत्रों का वर्णन बहुत ही गौरवशाली है। उन्होंने न केवल युद्ध कौशल दिखाया, बल्कि अन्त में आत्म-कल्याण का मार्ग चुनकर मोक्ष प्राप्त किया।
मुख्य रूप से प्रद्युम्न और शाम्ब का वर्णन इस प्रकार है-
(1) प्रद्युम्न कुमार
ये श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र थे। इस बात की पुष्टि हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों से भी होती है। किन्तु हम यहाँ पर जैन ग्रन्थ (विशेषकर अंतकृतदशांग सूत्र) के अनुसार, ही श्रीकृष्ण के पुत्रों का वर्णन करुंगा।
जैन ग्रन्थ के अनुसार हुआ यह कि प्रद्युम्न कुमार के जन्म के तुरन्त बाद एक देव ने इनका अपहरण कर लिया था, जिसके बाद इनका पालन-पोषण कालसंवर नामक राजा के यहाँ हुआ। बाद में इन्होंने अपनी शक्ति से सबको पराजित किया और द्वारिका लौटे।
श्रीकृष्ण के समझाने और भगवान नेमिनाथ के उपदेशों से प्रभावित होकर प्रद्युम्न ने संसार त्यागने का निर्णय लिया।
इसके बाद उन्होंने शत्रुंजय पर्वत (पालीताना) पर कठोर तपस्या की और वहीं से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। जैन धर्म में उन्हें 'कामदेव' की पदवी भी दी गई है।
(2) शाम्ब कुमार
जैन ग्रन्थ अंतकृतदशांग सूत्र के अनुसार, शाम्ब कुमार श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती के पुत्र थे। (ऐसी बात हिंन्दू पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलती है।)
शाम्ब और प्रद्युम्न की जोड़ी जैन पुराणों में बहुत प्रसिद्ध है। दोनों ने साथ में दीक्षा ली थी। इन्होंने भी मुनि बनकर घोर तप किया। कहा जाता है कि शत्रुंजय पर्वत पर इनके साथ साढ़े आठ करोड़ मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया था।
(3) श्रीकृष्ण के अन्य पुत्र और यादव कुमारों का उल्लेख-
जैन मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण के कई अन्य पुत्रों (जैसे गद, सारण, अनिरुद्ध) ने भी भगवान नेमिनाथ से दीक्षा ली थी।
एक विशेष तथ्य:
जैन पुराणों के अनुसार, जब द्वारिका नगरी में आग लगी थी, तब श्रीकृष्ण ने अपने इन पुत्रों को मुनि धर्म का पालन करते देख संतोष व्यक्त किया था कि कम से कम वे तो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गए।
जैन ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म और स्थान-
जैन ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म शौरीपुर (मथुरा के पास) में राजा वसुदेव और देवकी के सातवें पुत्र के रूप में हुआ था। जैन दर्शन के अनुसार उनका जन्म श्रावण शुक्ला द्वादशी को हुआ था। तथा उनकी मृत्यु कौशांबी वन में जराकुमार (उनके भाई के पुत्र) के बाण लगने से हुई थी। मृत्यु के समय उन्होंने सोलहकारण भावनाओं का चिंतन किया था।
हिन्दू धर्म से भिन्नता-
हिन्दू धर्म में कृष्ण को परिपूर्णतम परमंब्रह्म माना गया है, जबकि जैन धर्म उन्हें एक ऐतिहासिक और शक्तिशाली महायोद्धा (कर्मवीर) के रूप में देखता है जो कर्म के नियमों के अधीन थे।
बौद्ध साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख
जिस तरह से जैन साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख मिलता है उसी तरह से बौद्ध साहित्यों में भी मिलता है, लेकिन उनका चित्रण हिन्दू धर्म के पारम्परिक स्वरूप से काफी भिन्न है।
बौद्ध ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के उल्लेख के होने का मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं।
(1) घट जातक कथाएँ
जातक कथाएँ मूल रूप से लिखित ग्रन्थों के रूप में पन्नों और पत्थरों दोनों रूपों में लिखी गई हैं। प्राचीन काल में जातक कथाओं को आम जनता तक पहुँचाने के लिए उन्हें स्तूपों की रेलिंग और तोरणों (द्वारों) पर उकेरा गया था। इसके प्रमुख उदाहरण भरहुत, सांची और अमरावती के स्तूपों में मिलते हैं, जहाँ इन कहानियों के दृश्यों को पत्थरों पर बहुत ही खूबसूरती से तराशा गया है। अजंता की गुफाओं की दीवारों पर भी इनके चित्र और नक्काशी मौजूद हैं।
[4/20, 7:12 AM] आत्मानन्द जी: पन्नों पर (साहित्यिक ग्रन्थ)-
जातक कथाएँ बौद्ध धर्म के पवित्र साहित्य का एक विशाल हिस्सा हैं। इन्हें मुख्य रूप से पालि भाषा में लिखा गया था और ये 'खुद्दक निकाय' नामक ग्रंथ का हिस्सा हैं। समय के साथ इन्हें ताड़ के पत्तों और बाद में कागज़ के पन्नों पर संकलित किया गया ताकि इन्हें पढ़ा और पढ़ाया जा सके।
संक्षेप में, जहाँ पत्थरों की नक्काशी ने इन्हें अमर बनाया और अनपढ़ लोगों तक पहुँचाया, वहीं लिखित ग्रंथों (पन्नों) ने इनके दार्शनिक और नैतिक संदेशों को सुरक्षित रखा।
श्रीकृष्ण से सम्बन्धित कुछ जातक कथाओं का उल्लेख निम्नलिखित है-
घट जातक सबसे प्रमुख बौद्ध ग्रन्थ है जिसमें कृष्ण की कहानी विस्तार से मिलती है। इसमें कृष्ण (जिन्हें 'कण्ह' कहा गया है) को 'वासुदेव' के रूप में चित्रित किया गया है। इस कथा के अनुसार, वे दस भाइयों (अंधकवेणु पुत्रों) में से एक थे जिन्होंने कंस का वध किया और द्वारका पर शासन किया।
घट जातक कथा में जिसमें श्रीकृष्ण (वासुदेव) और उनके भाइयों की कहानी को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ इस कथा के प्रमुख विस्तार दिए गए हैं।
(1) श्रीकृष्ण का जन्म और परिवार
हिन्दू परम्परा के विपरीत, जहाँ मुख्य रूप से कृष्ण और बलराम की चर्चा होती है, घट जातक में वासुदेव (कृष्ण) 10 भाइयों में सबसे बड़े थे और उनकी एक बड़ी बहन भी थी। इन भाइयों के नाम अंधकवेणु पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके जन्म के समय कंस द्वारा बच्चों को मारने का प्रसंग तो है, लेकिन जातक कथा के अनुसार कोई बच्चा मारा नहीं गया। प्रत्येक पुत्र के जन्म के समय उसे एक दासी (नन्दगोपा) की पुत्री से बदल दिया गया था, जिससे वे सुरक्षित बच सके।
(2) ईश्वर नहीं वल्कि एक योद्धा और विजेता के रूप में श्रीकृष्ण का उल्लेख।
घट जातक कथा में कथा में कृष्ण को एक कोमल 'माखन चोर' के बजाय "विशाल, कठोर और भयंकर" योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है।
वे और उनके भाई कुश्ती के एक मैच में राजा कंस को पराजित करते हैं और फिर पूरे जम्बुद्वीप पर विजय प्राप्त करते हैं।
उन्होंने अपनी राजधानी द्वारवती (द्वारका) बनाई। कथा के अनुसार, यह नगरी जादुई सुरक्षा से घिरी थी जो शत्रुओं के आने पर समुद्र में छिप सकती थी।
3. शोक और घट पण्डित (बुद्ध) का उपदेश
घट जातक कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वासुदेव के पुत्र की मृत्यु के बाद उनके अत्यधिक शोक से जुड़ा है। जिसमें
कृष्ण के छोटे भाई, घट पण्डित (जो स्वयं भगवान बुद्ध का पूर्व जन्म थे), कृष्ण को इस शोक से बाहर निकालने के लिए 'पागलपन' का नाटक करते हैं।
वे चन्द्रमा से खरगोश मांगते हैं। जब कृष्ण उनसे कहते हैं कि यह असम्भव है, तब घट पण्डित उन्हें समझाते हैं कि मरे हुए व्यक्ति को वापस पाना भी उतना ही असम्भव है।
(4) अन्त और पुनर्जन्म का सम्बन्ध
घट जातक कथा में श्रीकृष्ण के वंश का अन्त होने के कारण को जन्म और पुनर्जन्म के आधार पर बताया गया है। जिसमें बताया गया है कि मदिरा के प्रभाव में भाइयों के बीच हुए संघर्ष के कारण श्रीकृष्ण के वंश का विनाश हो जाता है। जिसमें वासुदेव (कृष्ण) की मृत्यु भी 'जरा' नामक शिकारी के तीर से होती है, जो उनके पैर में लगता है।
विशेष- देखा जाए तो जातक कथा के अन्त में बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि उस समय के वासुदेव उनके शिष्य सारिपुत्त थे और घट पण्डित स्वयं बुद्ध थे।
यह कथा मुख्य रूप से अनित्यता और शोक पर नियन्त्रण पाने का सन्देश देने के लिए सुनाई गई है।
महायान बौद्ध धर्म में श्रीकृष्ण और उनके 'नारायण' स्वरूप का उल्लेख-
(1) कारण्डव्यूह सूत्र-
बौद्ध धर्म के महायान शाखा के प्रसिद्ध 'कारण्डव्यूह सूत्र' में एक बहुत ही रोचक वर्णन है। इस ग्रन्थ के अनुसार:
भगवान नारायण (विष्णु/कृष्ण) की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड के संरक्षक बोधिसत्व अवलोकितेश्वर के हृदय से हुई है।
इस ग्रन्थ में कहा गया है कि अवलोकितेश्वर ने संसार के कल्याण के लिए विभिन्न देवताओं का रूप धारण किया, जिनमें नारायण भी एक थे।
यहाँ कृष्ण/नारायण को एक स्वतन्त्र ईश्वर के बजाय बुद्धत्व की राह पर चलने वाले एक शक्तिशाली बोधिसत्व के रूप में देखा गया है।
(2) ललितविस्तार सूत्र
इस ग्रन्थ में बुद्ध के जीवन और उनकी शक्तियों का वर्णन है। यहाँ बुद्ध की महानता को दर्शाने के लिए कृष्ण का संदर्भ मिलता है। जिसमें बुद्ध की शारीरिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रभाव की तुलना करते समय उन्हें "नारायण के समान पराक्रमी" बताया गया है। यह ग्रन्थ कृष्ण को एक ऐसे महापुरुष के रूप में स्वीकार करता है जिनकी शक्ति और तेज सर्वविदित था।
(3) बोधिसत्व के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन
बोधिसत्व के रूप में कई महायान परम्पराओं में कृष्ण को एक 'धर्मपाल' (धर्म का रक्षक) या उच्च श्रेणी का बोधिसत्व माना गया है। कुछ प्राचीन ग्रीको-बौद्ध (Indo-Greek) कलाकृतियों में कृष्ण को बुद्ध के रक्षक के रूप में भी दिखाया गया है।
विद्वानों का मानना है कि महायान बौद्ध धर्म में 'भक्ति' का जो तत्व आया, उस पर कृष्ण भक्ति परम्परा का गहरा प्रभाव था। जिस तरह कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण की बात कही गई, वैसी ही भक्ति महायान में बुद्ध और बोधिसत्वों के प्रति देखी जाती है।
संक्षेप में, महायान साहित्य कृष्ण को नकारता नहीं है, बल्कि उन्हें बुद्ध के ज्ञान और करुणा के एक विशेष प्रकटीकरण के रूप में आत्मसात करता है।
तिब्बती बौद्ध परम्परा में श्रीकृष्ण का उल्लेख
तिब्बती बौद्ध परम्परा में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत ही विशिष्ट और सम्मानजनक है। यहाँ उन्हें केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक सिद्ध पुरुष और धर्मरक्षक के रूप में देखा जाता है। जैसे इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(1) कृष्ण का नाम: 'कण्हपा'
तिब्बती बौद्ध धर्म में 84 महासिद्धों की सूची बहुत महत्वपूर्ण है। इनमें से एक प्रमुख सिद्ध का नाम 'कण्हपा' (कृष्णपाद) है। तिब्बती परम्परा इन्हें कृष्ण का ही एक तान्त्रिक स्वरूप या उनसे प्रेरित महापुरुष मानती है।
(2) चक्रसंवर तन्त्र
तिब्बती तन्त्र साधनाओं में श्रीकृष्ण को 'विष्णु' के अवतार के रूप में पहचाना जाता है। कई तिब्बती ग्रंथों में कृष्ण को 'ऋषि' या 'विद्याधर' (ज्ञान धारण करने वाला) कहा गया है।
उन्हें एक ऐसे शक्तिशाली पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने अपनी योग शक्तियों से असुरों का दमन किया और धर्म की स्थापना की।
(3) रक्षक देवता के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन
तिब्बती बौद्ध विहारों में कई बार 'नारायण' या 'वासुदेव' को एक रक्षक देवता के रूप में चित्रित किया जाता है। माना जाता है कि उन्होंने बुद्ध के सामने धर्म की रक्षा करने की प्रतिज्ञा ली थी।
(4) कर्मफल का उपदेश
तिब्बती विद्वान (जैसे तारानाथ) अपनी इतिहास की पुस्तकों में कृष्ण की कहानी का सन्दर्भ देते हैं। वे कृष्ण और उनके वंश (यादवों) के विनाश की कथा का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि 'कर्म' का फल कितना अचूक होता है—चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है।
(5) कला और थंगका पेंटिंग्स
कुछ विशेष तिब्बती थंगका चित्रों में बुद्ध के चारों ओर उपस्थित देवताओं की मण्डली में नीले रंग के नारायण को भी स्थान दिया जाता है, जो उनकी शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक हैं।
संक्षेप में: तिब्बती परम्परा में कृष्ण एक 'साधक' और 'विजेता' के प्रतीक हैं, जिन्होंने संसार को अधर्म से बचाने में बुद्ध के मार्ग की सहायता की।
कुछ प्राचीन ऐतिहासिक व पौराणिक ग्रन्थों में श्रीकृष्ण का उल्लेख -
(|) मेगस्थनीज की 'इंडिका-
यूनानी राजदूत मेगस्थनीज (300 ईसा पूर्व) ने लिखा है कि 'शौरसेनी' लोग (मथुरा के लोग) 'हेराक्लेस' की पूजा करते थे। इतिहासकारों के अनुसार, यह 'हेराक्लेस' शब्द श्रीकृष्ण (हरि-कृष्ण) के लिए प्रयुक्त हुआ था।
(||) छान्दोग्य उपनिषद-
इसमें 'घोर अंगिरस' के शिष्य के रूप में 'देवकी-पुत्र कृष्ण' का स्पष्ट वर्णन मिलता है, जिसमें श्रीकृष्ण का उल्लेख सबसे प्राचीन माना जाता है। इस ग्रन्थ के अध्याय 3, खणड 17, श्लोक 6 में उनका विवरण इस प्रकार मिलता है-
देवकी-पुत्र: उपनिषद में उन्हें स्पष्ट रूप से 'देवकी का पुत्र' (कृष्णाय देवकीपुत्राय) कहा गया है।
घोर अंगिरस के शिष्य: उन्हें ऋषि घोर अंगिरस के शिष्य के रूप में वर्णित किया गया है।
यज्ञ का उपदेश: ऋषि घोर अंगिरस ने श्रीकृष्ण को जीवन को ही एक 'यज्ञ' के रूप में देखने की विद्या सिखाई थी। इस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद श्रीकृष्ण 'अतृप्त' (जिज्ञासा से मुक्त या पूर्ण ज्ञानी) हो गए थे।
मृत्यु के समय का मन्त्र-
उन्हें यह उपदेश दिया गया था कि मृत्यु के समय मनुष्य को तीन मन्त्रों का आश्रय लेना चाहिए: 'अक्षितमसि' (तुम अविनाशी हो), 'अच्युतमसि' (तुम अटल हो), और 'प्राणसंशितमसि' (तुम प्राणों का सार हो)।
विद्वानों का मत-
कई विद्वान और शोधकर्ता इस कृष्ण को महाभारत और भगवद्गीता के वासुदेव कृष्ण के समान मानते हैं क्योंकि नाम और माता का नाम (देवकी) मेल खाता है। हालांकि, कुछ विद्वान इसे एक ऐतिहासिक सन्दर्भ के रूप में देखते हैं जहाँ कृष्ण को एक दिव्य भगवान के बजाय एक ऋषि या साधक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(1) संगम साहित्य
संगम साहित्य (प्राचीन तमिल साहित्य) में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत महत्वपूर्ण और स्पष्ट है, जहाँ उन्हें 'मायोन' (काला रंग वाला) के रूप में पूजा गया है।
संगम साहित्य यह दर्शाता है कि दक्षिण भारत में कृष्ण की भक्ति अत्यंत प्राचीन है और उन्हें विष्णु के ही एक रूप में स्वीकार किया गया था। तमिल कवियों ने उन्हें एक रक्षक और प्रेमी के रूप में चित्रित किया है, जो बाद में चलकर अलवार संतों की भक्ति परम्परा का आधार बना। संगम साहित्य के विभिन्न ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के सन्दर्भ निम्नलिखित हैं-
(A) परिपाडल-
इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम की स्तुति में कई गीत समर्पित हैं। यहाँ श्रीकृष्ण को 'मायोन' कहा गया है, जो चरागाहों और जंगलों के देवता (मुल्लई क्षेत्र) माने जाते हैं।
(B) अहनानूरु-
इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध में पाण्डवों की सहायता करने और उनके द्वारा कंस के विनाश जैसी घटनाओं के संकेत मिलते हैं।
(C) शिलप्पादिकारम-
यद्यपि यह संगम काल के थोड़ा बाद का महाकाव्य माना जाता है, लेकिन इसमें 'आयचियर कुरवई' नामक नृत्य का वर्णन है, जो वृन्दावन में कृष्ण और गोपियों के रासलीला जैसा ही है। इसमें कृष्ण की बाल लीलाओं, जैसे मक्खन चुराना और गोवर्धन पर्वत उठाने का उल्लेख है।
(D) पुरनानूरु-
इस संग्रह के गीतों में कृष्ण (मायोन) की तुलना राजाओं की शक्ति और गौरव से की गई है।
(E) शिलप्पादिकारम
इस महाकाव्य में कृष्ण के हल्लोन (हलधर बलराम) की प्रशंसा की गई है।
(F) आंडाल की भक्ति
तमिल की प्रसिद्ध वैष्णव कवयित्री आंडाल ने कृष्ण के वियोग में तिरुप्पावै और नाच्चिचार तिरूमोलि जैसे पद लिखे, जिनमें कृष्ण के प्रति उनकी गहन भक्ति और प्रेम व्यक्त किया गया है। वह कृष्ण को अपना पति मानती थीं और उनके साथ रासलीला की कल्पना करती थीं।
इस प्रकार से अध्याय (एक) का भाग (ग)- श्रीकृष्ण के ऐतिहासिक परिचय के साथ समाप्त हुआ। अब अगले अध्याय (दो) में गोप (यादव) की उत्पत्ति के बारे में बताया गया। उसे भी इस के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।
अध्याय(3)-
जातियों की उत्पत्ति या कहें निर्धारण मनुष्य के एक ही तरह के रक्त सम्बन्धी आनुवांशिक प्रवृत्तियों से होता है। जिसमें प्रवृत्तियाँ व्यक्ति की जन्मजात (Genetic) होती हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके जाति समूहों में सञ्चारित होती रहती है।
इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के अनुरूप ही व्यक्ति का स्वभाव और गुण बनता है, जो उस जाति समूह को उसी के अनुरूप कार्य करने को प्रेरित करता है। और इसी गुण विशेष के आधार पर मनुष्य जातियों में एक विशेष जाति का उत्पत्ति होती है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के कारण समाज में अलग-अलग जातियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव और गुण देखें जातें हैं।
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इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जाति व्यक्ति समूहों की प्रवृत्ति मूलक पहचान है जो मनुष्य समूहों में अलग-अलग देखी जाती है। जैसे वणिक समाज का वर्ण "वैश्य" है जिनका वृत्ति (व्यवसाय) खरीद-फरोख्त करना है। और उसी अनुसार उनकी स्वभावगत गहराई- लोलुपता और मितव्यता है। यही उनकी जातिगत और वर्णगत पहचान है।
कोई भी जाति अपने समूह की सबसे बड़ी इकाई होती है। और यह ऐसे ही नहीं बनती है। इसके लिए जाति को छोटी-छोटी इकाईयों के विकास क्रमों से गुजरना होता है। जैसे -
किसी भी जाति की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति होता है, फिर कई व्यक्तियों के मिलने से एक परिवार बनता है, और कई परिवारों के मिलने से अनेक कुलों या गोत्रों का निर्माण होता है। पुनः कई कुलों के संयोग से उस जाति का एक वंश और वर्ण बनता है। अर्थात् वंश, वर्ण, कुल, गोत्र और परिवार के सामूहिक रूप को जाति कहा जाता है। इसी को जाति का विकास क्रम कहा जाता है।
दूसरी बात यह है की किसी भी जाति के विकास क्रम में मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ ही मुख्य कारण होती है। क्योंकि मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर अन्ततोगत्वा वृत्तियों अर्थात व्यवसायों का वरण (चयन) करती हैं। उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उस जाति का वर्ण निर्धारित होता है।
व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) निर्धारित हुआ है। यही ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था का आधार है।
अब यह सब कैसे सम्भव होता है। इसको अच्छी तरह समझने के लिए क्रमशः जाति, वर्ण, वंश, कुल और गोत्र को विस्तार से जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आयेगी। इन सभी बातों को क्रमशः अगले अध्यायों में बताया गया है।
अब इसी क्रम में हमलोग जानेंगे कि अहीर (आभीर) जाति की उत्पत्ति कैसे हुई और किस आधार पर यादवों की जाति "अहीर" हुई। जिसे- आभीर को गोप, गोपाल, (ग्वाल), घोष, वल्लभ, इत्यादि नामों से क्यों जाना जाता है ?
तो इस सम्बन्ध में बता दें कि- अहीर जाति की वृत्ति अर्थात व्यवसाय पूर्वकाल से ही कृषि और पशु पालन रहा है। यह वृत्ति उन्ही प्रवृत्ति वालों में हो सकती है जो निर्भीक और साहसी हों। चूँकि गोपालक अहीर लोग अपने पशुओं को जंगलों में साथ लेकर, तपती धूप, आँधी- तूफान, ठण्ड और बारिश की तमाम प्राकृतिक झञ्झावातों को निर्भीकता पूर्वक झेलते हुए उन पशुओं के बीच रहते हैं। इसी जन्मजात निर्भीक प्रवृत्ति के कारण ही इनको आभीर (अहीर) कहा गया, तथा वृत्ति (व्यवसाय) गोपालन की वजह से इन्हें - गोप, गोपाल, (ग्वाल), घोष और वल्लभ कहा गया जो इनकी वृत्ति अर्थात व्यवसाय मूलक पहचान हैं।
ये तो रही अहीर जाति की वृत्ति एवं प्रवृत्ति मूलक पहचान -अब हम उपर्युक्त सिद्धान्त का
सारांश प्रस्तुत करते हैं -
उपर्युक्त रूप से उल्लिखित कथन संरचनात्मक विकास और विशेष रूप से 'अहीर' (आभीर) जाति के ऐतिहासिक व मनोवैज्ञानिक आधारों की विस्तृत व्याख्या करता है।
हमने जाति को केवल एक सामाजिक पहचान न मानकर उसे आनुवंशिक (Genetic) और प्रवृत्ति-मूलक (Behavioral) आधार पर परिभाषित करने का प्रयास किया है जो पूर्णत: समीचीन व वैज्ञानिक है।
उपर्युक्त कथनों की सम्यक सारग्राही व्याख्या निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से की जा सकती है:
1. व्याख्या: आभीर जाति का दार्शनिक और जैविक आधार
समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के अनुसार जाति का निर्धारण रक्त और जीन (DNA) के माध्यम से होता है। यहाँ मुख्य तर्क यह है कि: DNA (डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) वह अणु है जो पृथ्वी पर लगभग सभी जीवित जीवों के विकास, कार्यप्रणाली और प्रजनन के लिए आवश्यक आनुवंशिक निर्देश (Genetic Instructions) वहन करता है। इसे अक्सर जीवन का "ब्लूप्रिण्ट" या "निर्देश पुस्तिका" कहा जाता है। अर्थात -(डी.एन.ए) गुणसूत्रों का आधार श्रोत है।
- जन्मजात प्रवृत्तियाँ: मनुष्य के गुण और स्वभाव उसके जन्म के साथ ही निर्धारित होते हैं, जो उसे एक विशिष्ट प्रकार के कार्य (वृत्ति) की ओर प्रेरित करते हैं।
- प्रवृत्ति से वृत्ति का जन्म: व्यक्ति की आन्तरिक प्रकृति (Nature) ही तय करती है कि वह समाज में क्या कार्य करेगा। जैसे, व्यापार की ओर झुकाव रखने वाला व्यक्ति 'वैश्य' वर्ण का अंग बनता है। युद्ध लड़ाई आदि की ओर झुकाव रखने वाला क्षत्रिय वर्ण का अंग बनता है।
2. जाति का विकास क्रम-
गद्य में जाति के निर्माण को एक विकासवादी प्रक्रिया (Evolutionary process) के रूप में दर्शाया गया है। इसे एक तालिका के माध्यम से समझा जा सकता है:
क्रम | इकाई | विवरण |
|---|
1 | व्यक्ति- | समाज की सबसे छोटी और मूलभूत इकाई। |
2 | परिवार- | रक्त सम्बन्धों का प्राथमिक समूह। |
3 | कुल/गोत्र- | समान पूर्वजों से जुड़ी शाखाएँ। |
4 | वंश/वर्ण- | एक ही प्रवृत्ति और व्यवसाय वाले परिवारों का समूह। |
5 | जाति- | इन सभी इकाइयों का सामूहिक और अन्तिम स्वरूप। |
3. अहीर (आभीर) जाति का विशेष सन्दर्भ
हमने 'अहीर' जाति की उत्पत्ति को उनके गुणों के आधार पर सिद्ध किया है:
- नामकरण का आधार: 'आभीर' शब्द की व्याख्या 'निर्भीकता' से की गई है। चूँकि पशुपालन के लिए कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों (धूप, बारिश, जंगल) का सामना करना पड़ता है, इसलिए इस निर्भीक प्रवृत्ति वाले समूह को 'आभीर' या 'अहीर' कहा गया।
- वृत्ति मूलक पहचान: गोपालन के कार्य के कारण ही इन्हें गोप, गोपाल, (ग्वाल), घोष और वल्लभ जैसे पर्यायवाची नामों से सम्बोधित किया गया। यह इस बात को पुष्ट करता है कि एक ही जाति के विभिन्न नाम उनके कार्यों (Occupation) के विस्तार से उपजे हैं।
4. सारांश मूलक विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष (Strengths):
- तार्किक तारतम्यता: हमने व्यक्ति से लेकर जाति तक की यात्रा को एक वैज्ञानिक श्रृंखला में पिरोने का प्रयास किया है।
- व्यावहारिक परिभाषा: यह गद्य 'वर्ण' और 'जाति' के बीच के सूक्ष्म अन्तर को स्पष्ट करता है कि कैसे आन्तरिक गुण (प्रवृत्ति) ही बाहरी कर्म (वृत्ति) का आधार बनते हैं।
- सांस्कृतिक गौरव: यह लेख विशेष रूप से अहीर समाज के ऐतिहासिक और साहसिक चरित्र को रेखांकित करता है, जो समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
समीक्षात्मक विश्लेषण-
- जैविक नियतिवाद (Biological Determinism): हमारा यह विचार कि "स्वभाव जन्मजात और हमारे प्रारब्ध का प्रतिरूप होता है और पीढ़ियों तक अपरिवर्तित रहता है", आधुनिक समाजशास्त्र में बहस का विषय है। आज के युग में शिक्षा और परिवेश (Nurture) भी व्यक्ति की प्रवृत्ति और वृत्ति को बदलने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
- सामाजिक गतिशीलता:- यह व्याख्या जाति व्यवस्था को एक स्थिर (Static) ढाँचे के रूप में देखती है, जबकि इतिहास में कई बार समूहों ने अपनी वृत्तियाँ बदली हैं।
निष्कर्ष-
कुल मिलाकर, यह लेख "गुण-कर्म-स्वभाव" के प्राचीन भारतीय सिद्धान्त की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह स्पष्ट करता है कि जातियाँ अचानक पैदा नहीं हुईं, बल्कि वे लम्बी अवधि में विकसित हुए समूहों की पहचान हैं, जिनका आधार उनके आनुवंशिक गुण और उनके द्वारा अपनाए गए कठिन परिश्रम वाले व्यवसाय थे।
अहीर जाति के सन्दर्भ में दी गई व्याख्या उनके 'शौर्य' और 'सेवा' (गोपालन) के समन्वय को प्रभावी ढंग से प्रकट करती है।
अगले अध्यायों की विषय-वस्तु के आधार पर, यहाँ इन कड़ियों की क्रमबद्ध व्याख्या प्रस्तुत है:
१. कुल और गोत्र: सूक्ष्म पहचान का आधार
किसी भी जाति के भीतर 'कुल' और 'गोत्र' वे इकाइयाँ हैं जो आनुवंशिक शुद्धता और वंश-वृक्ष (Family Tree) को संजोकर रखती हैं।
- कुल (Lineage): यह एक ही पूर्वज की सन्तान होने का बोध कराता है। यह पारिवारिक संस्कारों और परम्पराओं का वाहक है।
- गोत्र (Clan): गोत्र का अर्थ है 'वंश की मूल जड़'। ऋषि परम्परा में गोत्र का अर्थ उस ऋषि से होता था जिनसे वह वंश चला। अहीर (यादव) समाज के सन्दर्भ में, गोत्र उनके प्राचीन पूर्वजों से जुड़ा होता है, जो उनके रक्त-सम्बन्धों की सीमाओं को निर्धारित करता है।
२. वंश: ऐतिहासिक गौरव की निरन्तरता-
जब कई कुल एक ही महान पूर्वज या मुखिया की परम्परा को आगे बढ़ाते हैं, तो वह 'वंश' कहलाता है।
- अहीर जाति के सन्दर्भ में 'यदुवंश' सबसे महत्वपूर्ण है। चन्द्रवंश की इस शाखा ने न केवल सामाजिक बल्कि राजनीतिक और आध्यात्मिक (श्रीकृष्ण के माध्यम से) इतिहास को भी प्रभावित किया।
- वंश व्यक्ति को एक ऐतिहासिक पहचान देता है, जो उसे उसके पूर्वजों के शौर्य और कर्तव्यों की याद दिलाता रहता है।
३. वर्ण: प्रवृत्ति और वृत्ति का मेल-
जैसा कि गद्य में उल्लेखित है, 'वर्ण' का चयन व्यक्ति की प्रवृत्ति (Nature) के आधार पर होता है।
- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र: ये चार श्रेणियाँ गुणों के आधार पर बनी थीं।
- अहीर (आभीर) जाति का इतिहास अत्यन्त रोचक है क्योंकि इसमें क्षत्रिय धर्म (निर्भीकता, रक्षा, साहस) और वैश्य कर्म (गोपालन, कृषि, वाणिज्य) का) अद्भुत समन्वय मिलता है। इसी कारण इन्हें 'सद्-क्षत्रिय' या 'गोपालक योद्धा' के रूप में देखा जाता है। परन्तु ये गोप ब्रह्मा की सृष्टि न होने से चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में नहीं आते अपितु इनका वर्ण स्वराट्- विष्णु से उत्पन्न होने कारण वैष्णव वर्ण है।
४. जाति: वृहद् स्वरूप
जब वंश, वर्ण, कुल और गोत्र एक विशिष्ट सामाजिक ढांचे में संगठित हो जाते हैं, तो वह 'जाति' (Community) का रूप ले लेती है। अहीर जाति का निर्माण इसी जटिल और लम्बी प्रक्रिया का परिणाम है।
अहीर (आभीर) शब्द की व्युत्पत्ति एवं महत्ता-
हमने जो 'आभीर' शब्द की व्याख्या की है, वह भाषाई और मनोवैज्ञानिक रूप से अत्यन्त सटीक है:
- निर्भीकता (Fearlessness): "आ-भी-र" (जो भय से रहित हो)। प्रकृति की विषमताओं के बीच रहकर भी विचलित न होना इस जाति की मूल प्रवृत्ति (Genetics) में है।
- नामों की विविधता:
- गोप/गोपाल: गौ रक्षा और गौ संवर्धन का प्रतीक।
- घोष:/ गोष: वह स्थान जहाँ पशु रहते हों, उस बस्ती के स्वामी। वैदिक रूप गोष: जिसका मूल अर्थ है गो सेवक।
- वल्लभ: जो पशुओं और प्रकृति का प्रिय हो।
किन्तु जब तक गोप (अहीर) जाति के (Blood relation) रक्त सम्बन्धों को न जान लिया जाए, तब तक अहीर जाति की (Genetic) जानकारी अधूरी ही मानी जाएगी। इसलिए अहीर (गोप) जाति के रक्त सम्बन्धों को जानना आवश्यक है कि अहीर जाति के मूल में किसका प्रारम्भिक रक्त सम्बन्ध विद्यमान है।
तो इसके लिए बता दें कि अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४ और १५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
"तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यन्ति मद्वंशप्रभवा नराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी। तथा मेरे गोप वंश (कुल) के लोग जहाँ भी रहेंगे, वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो। १४-१५।
अब प्रश्न यह है कि गायत्री स्वयं अपने को गोप कुल का तथा गोपों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) किस आधार पर कहती हैं ? इसको भी जानना आवश्यक है।
चूँकि भूतल पर देवी गायत्री गोप कुल की सनातनी एवं आदि देवी हैं। इसलिए उन्हें स्वयं तथा अपने गोपों की मूल उत्पत्ति का ज्ञान था कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति गोलोक में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों अर्थात उनके क्लोन से हुई है। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(५) के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) से है, जिसमें लिखा गया है कि -
"तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
"कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२।
अनुवाद- ४०-४२
• उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्री राधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• फिर तो श्रीकृष्ण के रोम कूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त विद्यमान है। इसी लिए स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के श्लोक-(१४) में ज्ञान की देवी गायत्री ने भी गोपों अर्थात् आभीरों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) कहीं हैं।
1. पौराणिक एवं शास्त्रीय आधार
हमने अपनी रक्त सम्बन्धित बात की पुष्टि के लिए दो अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सहारा लिया है:
- स्कन्द पुराण (नागर खण्ड): यहाँ गायत्री माता द्वारा भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) को दिए गए वरदान का उल्लेख है। श्लोक तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा... में 'रक्तास्ते' (रक्त सम्बन्धी) शब्द का प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जो गोपों और ईश्वर के बीच के जैविक और आध्यात्मिक सेतु को दर्शाता है।
- ब्रह्मवैवर्त पुराण (ब्रह्मखण्ड): यहाँ सृष्टि के सूक्ष्म सिद्धान्त का वर्णन है। राधा और कृष्ण के 'रोमकूपों' से गोप-गोपियों के प्राकट्य की कथा यह सिद्ध करती है कि यह समाज केवल अनुयायी नहीं, बल्कि ईश्वर का ही अंश (अंश-अंशी सम्बन्ध) है।
2. 'क्लोन' एवं वैज्ञानिक शब्दावली का समावेश
प्राचीन अवधारणाओं को आधुनिक सन्दर्भ देने के लिए हमने "क्लोन" (Clone) शब्द का प्रयोग किया है। यह एक यथार्थवादी व्याख्या है जो यह बताती है कि जिस प्रकार एक कोशिका से पूर्ण जीव का निर्माण होता है, उसी प्रकार ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण के विग्रह से ही गोप समाज का विस्तार हुआ। यह "समान रूप और वेष" की पौराणिक अवधारणा को तार्किक आधार प्रदान करता है।
3. गायत्री का 'आभीर' स्वरूप
गद्य में देवी गायत्री को 'आभीर कन्या' और गोप कुल की 'आदि देवी' के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पुष्कर की कथाओं में गायत्री का सम्बन्ध आभीर कुल से स्पष्ट रूप से वर्णित है। यह तथ्य अहीर जाति की सांस्कृतिक गरिमा को एक उच्च आध्यात्मिक धरातल प्रदान करता है।
4. सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रभाव-
श्लोक संख्या 15 (तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति) का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि अहीर जाति जहाँ भी रही, वहाँ सम्पन्नता (दुग्ध क्रान्ति और कृषि) का संचार हुआ। यह उनके "भाग्य और समृद्धि" के वाहक होने के पौराणिक वरदान को सामाजिक वास्तविकता से जोड़ता है।
निष्कर्ष-
कुल मिलाकर, अहीर जाति के गौरवशाली अतीत और उनकी दिव्य वंशावली को पुनर्स्थापित करने का एक गम्भीर प्रयास है।
पक्ष | विवरण |
|---|
मूल सिद्धान्त- | अहीर जाति का मूल श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध (Blood Relation) है। |
प्रमाणिकता- | स्कन्द पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के विशिष्ट श्लोक। |
दर्शन- | गोलोक की सृष्टि प्रक्रिया के माध्यम से जाति की पवित्रता का वर्णन। |
प्रभाव- | यह लेख अहीर समाज के प्रति 'श्रद्धा' और 'देवत्व' के दृष्टिकोण को बल देता है। |
समीक्षात्मक टिप्पणी: यह पाठ केवल वंशावली का विवरण नहीं है, बल्कि यह अहीर जाति को "ईश्वर के मानवीय विस्तार" के रूप में परिभाषित करता है। जहाँ आधुनिक इतिहास केवल प्रवासन (Migration) की बात करता है, वहीं यह 'तात्विक उत्पत्ति' की बात कर एक नया विमर्श प्रस्तुत करता है।
अब हमलोग आभीर जाति की शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर जानेंगे कि इसकी उत्पत्ति कैसे हुई है।
तो आभीर जाति को यदि शब्द व्युत्पत्ति के हिसाब से देखा जाय तो- अभीर शब्द में 'अण्' तद्धित प्रत्यय करने पर आभीर समूह वाची रूप बनता है। अर्थात् आभीर शब्द अभीर शब्द का ही बहुवचन है। 'परन्तु परवर्ती संस्कृत कोश कारों नें आभीरों की गोपालन वृत्ति और उनकी वीरता प्रवृत्ति को दृष्टि-गत करते हुए अभीर और आभीर शब्दों की दो तरह से भिन्न-भिन्न व्युत्पत्तियाँ कर दीं। जैसे-
ईसा पूर्व पाँचवी सदी में कोशकार अमर सिंह ने अपने कोश अमरकोश में अहीरों की प्रवृत्ति वीरता (निडरता) को केन्द्रित करके आभीर शब्द की व्युत्पत्ति की है। नीचे देखें।
आ= समन्तात् + भी=भीयं (भयम्) + र= राति ददाति शत्रुणां हृत्सु = जो चारो तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करता है वह आभीर कहलाता है।
किन्तु वहीं पर अमर सिंह के परवर्ती शब्द कोशकार- तारानाथ नें अपने ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में अभीर- जाति की शब्द व्युत्पत्ति को उनकी वृत्ति अर्थात व्यवसाय के आधार पर गोपालन को केन्द्रित करके की है। नींचे देखें।
"अभिमुखी कृत्य ईरयति गा- इति अभीर = जो सामने मुख करके चारो-ओर से गायें चराता है या उन्हें घेरता है।
अगर देखा जाय तो उपर्युक्त दोनों शब्दकोश में जो अभीर शब्द की व्युत्पत्ति को बताया गया है उनमें बहुत अन्तर नही है। क्योंकि एक नें अहीरों की वीरता मूलक प्रवृत्ति (aptitude ) को आधार मानकर शब्द व्युत्पत्ति को दर्शाया है तो वहीं दूसरे नें अहीर जाति को गोपालन वृत्ति अथवा (व्यवसाय) (profation) को आधार मानकर शब्द व्युत्पत्ति को दर्शाया है।
आभीर/अहीर शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में बहुत ही सारगर्भित और ऐतिहासिक प्रमाणों पर आधारित विश्लेषण प्रस्तुत किया है। आपके द्वारा उद्धृत अमरकोश और वाचस्पत्यम् के सन्दर्भ इस जाति के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप को स्पष्ट करने में मील का पत्थर हैं।
समीचीन व्याख्या निम्नलिखित बिन्दुओं में की जा सकती है:
1. व्युत्पत्ति विज्ञान (Etymology) और व्याकरणिक आधार-
- अभीर शब्द में अण् प्रत्यय का प्रयोग: व्याकरण के अनुसार 'अभीर' मूल शब्द है, जिसमें 'अण्' प्रत्यय लगने से 'आभीर' बनता है। यह समूहवाचक संज्ञा (Collective Noun) के रूप में प्रयुक्त होता है, जो एक पूरी जाति या समुदाय का बोध कराता है।
- भाषिक विकास: यह दर्शाता है कि भाषा में एक व्यक्ति (अभीर) से पूरे समूह (आभीर) की पहचान कैसे विकसित हुई।
2. 'अमरकोश' की व्याख्या: शौर्य और वीरता का प्रतीक
अमर सिंह कृत 'अमरकोश' (५वीं सदी) की व्याख्या आभीरों के क्षात्र धर्म और युद्ध कौशल को रेखांकित करती है।
व्युत्पत्ति: आ + भी + र
- व्याख्या: यहाँ 'भी' (भय) और 'राति' (देना/उत्पन्न करना) का संयोग है। वह जो शत्रुओं के हृदय में भय व्याप्त कर दे।
- समीक्षा: यह व्युत्पत्ति सिद्ध करती है कि प्राचीन काल में आभीर केवल एक कृषक या चरवाहा समुदाय नहीं थे, बल्कि एक योद्धा जाति के रूप में प्रतिष्ठित थे। इतिहास में आभीर राजाओं और उनके सैन्य बल का उल्लेख इसी 'वीरता' वाली व्युत्पत्ति को पुष्ट करता है।
3. 'वाचस्पत्यम्' की व्याख्या: व्यवसाय और जीवन पद्धति
तारानाथ तर्कवाचस्पत्य द्वारा रचित 'वाचस्पत्यम्' की व्याख्या आभीरों के आर्थिक और सामाजिक आधार (गोपालन) पर केन्द्रित है।
व्युत्पत्ति: "अभिमुखी कृत्य ईरयति गा- इति अभीर"
- व्याख्या: जो गायों को अभिमुख (सामने) करके उन्हें चराता या सञ्चालित करता है।
- समीक्षा: यह व्याख्या 'अहीर' शब्द के उस स्वरूप को दर्शाती है जो कृष्ण संस्कृति और गोवंश संरक्षण से जुड़ा है। 'ईरयति' शब्द यहाँ गतिशीलता और प्रबन्धन (Management) का परिचायक है।