फाल्गुन माह में ही उत्तर भारत में यादवों के एक और शक्ति संपन्न गुप्त राजवंश का अभ्युदय हुआ जिसने भारतवर्ष में पुनः वैदिक सनातन संस्कृति की स्थापना की। नेपाल के प्राचीन गोपाल यादव राजवंश की शाखा माने जाने वाले गुप्त साम्राज्य के सिरमौर सम्राट समुद्रगुप्त के प्रतापी धर्मनिष्ठ पुत्र चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने शकों आदि मल्लेच्छो का अंत कर "शकारी" पदवी धारण कर इंद्रप्रस्थ दिल्ली में लौह कीर्ती स्तंभ की स्थापना एवं शक संवत प्रारंभ किया।
ये वही सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हैं जिन्होंने अपनी सत्ता का केंद्र उज्जैन नगरी को बनाया।
नरेंद्रसिंह, परम भागवत, विक्रमादित्य जैसी उपाधि धारण करने वाले चंद्रगुप्त द्वितीय को अनेकों प्रमाणित स्रोतों में चंद्रवंशी एवं यादव तक कहा गया जिसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।
📜 1️⃣ कलयुग मे संभावित घटनाओं का भविष्य पुराण में निरुपण करने वाले महर्षि वेदव्यास ने लिखा:
सूर्यवंश और चन्द्रवंश का वर्णन तथा इला का वृत्तान्त
ऋषियों ने पूछा-तत्त्वज्ञ सूतजी ! अब आप हम लोगों से सम्पूर्ण सूर्यवंश तथा चन्द्रवंश का क्रमशः यथार्थ रूप से वर्णन कीजिये ॥ 1 ॥
सूतजी कहते हैं-ऋषियो। पूर्वकाल में महर्षि कश्यप से अदिति को विवस्वान् (सूर्य) पुत्ररूप में उत्पन्न हुए थे। उनकी संज्ञा, राज्ञी तथा प्रभा नाम की तीन पत्रियाँ थीं। इनमें रेवत की कन्या राज्ञी ने रैवत नामक पुत्र को तथा प्रभा ने प्रभात नामक पुत्र को उत्पन्न किया। संज्ञा त्वाष्ट्र (विश्वकर्मा) की पुत्री थी। उसने वैवस्वत मनु और यम नामक दो पुत्र एवं यमुना नामकी एक कन्याको उत्पन्न किया। इनमें यम और यमुना जुड़वे पैदा हुए थे। कुछ समय के पश्चात् जब सुन्दरी त्वाष्ट्री (संज्ञा) विवस्वान्के तेजोमय रूपको सहन न कर सकी, तब उसने अपने शरीरसे अपने ही रूपके समान एक अनिन्द्यसुन्दरी नारीको उत्पन्न किया। वह 'छाया' नामसे प्रसिद्ध हुई। उस छायाको अपने सामने खड़ी देखकर संज्ञाने उससे कहा-'वरानने छाये! तुम हमारे पतिदेवकी सेवा करना, साथ ही मेरी संतानोंका माताके समान स्नेहसे पालन-पोषण करना।" तब बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'- कहकर वह सुव्रता पतिकी सेवाभावनासे विवस्वान्देवके निकट गयी। इधर विवस्वान्देव भी 'यह संज्ञा ही है'- ऐसा समझकर छायाके साथ आदरपूर्वक पूर्ववत् व्यवहार करते रहे। यथासमय उन्होंने उसके गर्भसे मनु के समान रूपवाले एक पुत्रको उत्पन्न किया। ये वैवस्वत मनु के सवर्ण (रूप-रंगवाला) होनेके कारण 'सावर्णि' नाम से प्रसिद्ध हुए। तदुपरान्त सूर्य ने "यह संज्ञा ही है- ऐसा मानकर छाया के गर्भसे क्रमशः एक शनि नामका पुत्र और तपती एवं विष्टि नामको दो कन्याओंको भी उत्पन्न किया। छाया अपने पुत्र मनुके प्रति अन्य संतानोंसे अधिक स्नेह रखती थी। उसके इस व्यवहारको संज्ञा नन्दन मनु तो सहन कर लेते थे, परंतु यम (एक दिन सहन न होनेके कारण) क्रुद्ध हो उठे और अपने दाहिने पैरको उठाकर छायाको मारनेकी धमकी देने लगे। तब छायाने यमको शाप देते हुए कहा- 'तुम्हारे इस एक पैरको कीड़े काट खायेंगे और इससे पीब एवंरुधिर टपकता रहेगा।' इस शापको सुनकर अमर्षसे भरे ह यम पिताके पास जाकर निवेदन करते हुए बोले- 'देव क्रुद्ध हुई माताने मुझे अकारण ही शाप दे दिया है। विभो ! बालचापल्यके | कारण मैंने एक बार अपना दाहिना पैर कुछ ऊपर उठा दिया था, (इस तुच्छ अपराधपर) भाई मनुके मना करनेपर भी उसने मुझे ऐसा शाप दे दिया है। चूँकि इसने हमपर शापद्वारा प्रहार किया है इसलिये यह हम लोगोंकी माता नहीं प्रतीत होती (अपितु बनावटी माता है)।' यह सुनकर विवस्वान्देवने | पुनः यमसे कहा 'महाबुद्धे! मैं क्या करूँ? अपनी मूर्खता के कारण किसको दुःख नहीं भोगना पड़ता अथवा (जन्मान्तरीय शुभाशुभ कर्मपरम्परका फलभोग अनिवार्य है। यह नियम तो शिवजीपर भी लागू है, फिर अन्य प्राणियोंके लिये तो कहना ही क्या है। इसलिये बेटा! मैं तुम्हें यह एक मुर्गा (या मोर) दे रहा हूँ, जो पैरमें पड़े हुए कीड़ोंको खा जायगा और उससे निकलते हुए मजा (पीच) एवं खूनको भी दूर कर देगा' ॥2- 17 ॥
पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महायशस्वी यमके मनमें विराग उत्पन्न हो गया। वे गोकर्णतीर्थमें जाकर फल, पत्ता और वायुक्का आहार करते हुए कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये। इस प्रकार वे बीस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना करते रहे। कुछ समयके पश्चात् त्रिशूलधारी महादेव उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर प्रकट हुए। तब यमने उनसे वररूपमें लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और जगत्के धर्म-अधर्मका निर्णायक पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। महादेवजीने उन्हें सभी वरदान दे दिये। निष्याप शौनक इस प्रकार यमको शूलपाणि भगवान् शंकरसे लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और धर्माधर्मके निर्णायक पदकी प्राप्ति हुई है। इधर विवस्वान् संज्ञाकी उस कर्मचेष्टको जानकर त्वष्टा (विश्वकर्मा) के निकट गये और क्रुद्ध होकर उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाये। द्विजवरो ! तब त्वष्टाने सान्त्वनापूर्वक विवस्वानसे कहा- 'भगवन्! अन्धकारका विनाश करनेवाले आपके प्रचण्ड तेजको न सहन करनेके कारण संज्ञा घोड़ीका रूप धारण करके यहाँ मेरे समीप अवश्य आयी थी, परंतु दिवाकर! मैंने उसे यह कहते हुए (घरमें घुसनेसे) मना कर दिया- 'चूँकि तू | अपने पतिदेवको जानकारीके बिना छिपकर यहाँ मेरे पास आयी है, इसलिये मेरे भवनमें प्रवेश नहीं कर सकती।' इस प्रकार मेरे निषेध करनेपर आपके और मेरे- दोनों स्थान निराश होकर वह अनिन्दिता संज्ञा मरुदेशको चली गयी और यहाँ उसी घोड़ी-रूपसे हो भूतलपर स्थित है।इसलिये 'दिवाकर! यदि मैं आपका अनुग्रह-भाजन हूँ तो आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये (और मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये)। प्रभो! मैं आपके इस असह्य तेजको (खरादनेवाले) यन्त्रपर चढ़ाकर कुछ कम कर दूंगा। इस प्रकार आपके रूपको लोगोंके लिये आनन्ददायक बना दूँगा।' सूर्यद्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लिये जानेपर त्वष्टाने सूर्यको अपने (खराद) यन्त्रपर बैठाकर उनके कुछ तेजको छाँटकर अलग कर दिया। उस छाँटे हुए तेजसे उन्होंने विष्णुके सुदर्शनचक्रका भगवान् रुद्रके त्रिशूलका और दैत्यों एवं दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्रके वज्रका निर्माण किया। इस प्रकार त्वष्टाने पैरोंके अतिरिक्त सूर्यके सहस्र किरणोंवाले रूपको अनुपम सौन्दर्यशाली बना दिया। उस समय वे सूर्यके पैरोंके तेजको देखने में समर्थ न हो सके (इसलिये वह तेज ज्यों-का त्यों बना ही रह गया)। अतः अर्चा-विग्रहों में भी कोई सूर्यके चरणोंका निर्माण नहीं करता) कराता। यदि कोई वैसा करता है तो उसे (मरनेपर) अत्यन्त निन्दित पापिष्ठ गति प्राप्त होती है तथा इस लोकमें वह दुःख भोगता हुआ कुष्ठरोगी हो जाता है। इसलिये धर्मात्मा मनुष्यको चित्रों | एवं मन्दिरोंमें कहीं भी बुद्धिमान् देवदेवेश्वर सूर्यके पैरोंको नहीं (बनाना) बनवाना चाहिये ॥18-33।।
त्वष्टा द्वारा संज्ञाका पता बतला दिये जानेपर वे देवेश्वर भगवान् सूर्य भूलोकमें जा पहुँचे। वहाँ उनके द्वारा संज्ञासे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई यह एकदम तथ्य बात है। संज्ञाकी नासिकाके अग्रभागसे उत्पन्न होनेके कारण वे दोनों नासत्य और दस्र नामसे भी विख्यात हुए। कुछ दिनोंके पश्चात् अश्वरूपधारी सूर्यदेवको पहचानकर त्वाष्ट्री (संज्ञा) परम सन्तुष्ट हुई और हर्षपूर्ण चित्तसे पतिके साथ विमानपर बैठकर स्वर्गलोक (आकाश) को चली गयी छायी संतानोंमें) तपोधन साथ मनु आज भी सुमेरुगिरिपर विराजमान हैं शनिने अपनी तपस्याके प्रभावसे ग्रहोंकी समता प्राप्त की। बहुत दिनोंके बाद यमुना और पीये दोनों कन्याएँ नदीरूपमें | परिणत हो गयीं। उसी प्रकार भयंकर रूपवाली तीसरी कन्या विष्टि (भद्रा) काल (करण) रूपमें अवस्थित हुई। वैवस्वत मनुके दस महाबली पुत्र उत्पन्न हुए थे उनमें | इल ज्येष्ठ थे, जो पुत्रेष्टि यज्ञके फलस्वरूप पैदा हुए थे।शेष नौ पुत्रोंके नाम हैं- इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, नरिष्यन्त, करूप, शर्याति, पृषध और नाभाग। ये सब के-सब महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं दिव्य पुरुष थे। वृद्धावस्था आनेपर परम धर्मात्मा महाराज मनु अपने ज्येष्ठ पुत्र इलको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं तपस्या करनेके लिये महेन्द्रपर्वतके वनमें चले गये। तदनन्तर नये भूपाल इल दिग्विजय करनेकी इच्छासे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगे। वे भूपालोंको पराजित करते हुए सभी द्वीपोंमें घूम रहे थे। इसी बीच प्रतापी इस घोड़ा दौड़ाते हुए शिवजीके उपवनके निकट जा पहुँचे। यह महान् उपवन कल्पद्रुम और लताओंसे भरा हुआ 'शरवण' नामसे प्रसिद्ध था। उस उपवनमें चन्द्रार्धको ललाटमें धारण करनेवाले देवेश्वर शम्भु उमाके साथ कीडा करते हैं। उन्होंने इस शरवणके विषयमें पहले ही उमाके साथ यह समय (शर्त) निर्धारित कर दिया था कि 'तुम्हारे इस दस योजन विस्तारवाले वनमें जो कोई भी पुरुषवाचक जीव प्रवेश करेगा, वह स्त्रीत्वको प्राप्त हो जायगा।' राजा इलको पहलेसे इस 'समय' (शर्त) के विषयमें जानकारी नहीं थी, अतः वे स्वच्छन्दगतिसे शरवणमें प्रविष्ट हुए। प्रवेश करते ही वे स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये। उसी समय वह घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें परिवर्तित हो गया। इलके शरीरसे सारा पुरुषत्व नष्ट हो गया। इस प्रकार स्त्री-रूप हो जानेपर राजाको परम विस्मय हुआ ॥ 34-47 ll
वह नारी इला नामसे प्रख्यात हुई। उसका रूप बड़ा सुन्दर था। उसके नेत्र कमलदलके समान बड़े बड़े थे उसके मुखको कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश थी। उसका शरीर हलका था। उसके नेत्र चकित से दीख रहे थे। उसके बाहुमूल उन्नत और भुजाएँ लम्बी थीं तथा बाल नीले एवं घुंघराले थे। उसके शरीरके रोएँ सूक्ष्म और दाँत अत्यन्त मनोहर थे। वह मृदु और गम्भीर स्वरसे बोलनेवाली थी। उसके शरीरका रंग श्याम-गौरमिश्रित था। वह हंस और हस्तीकी-सी चालसे चल रही थी। उसकी दोनों भौंहें धनुषके आकारके सदृश थीं। वह छोटे एवं ताँबेके समान लाल नखाडुरोंसे विभूषित थी। इस प्रकार वह सुन्दरी 'नारी' उस वनमें भ्रमण करती हुई सोचने लगी कि इस घोर वनमें कौन मेरा पिता अथवा भाई है तथा कौन मेरी माता है। मैं किस पतिके हाथमें समर्पित की गयी हूँ अर्थात् कौन मेरा पति है। इस भूतलपर मुझे कितने दिनोंतक रहना पड़ेगा!' इस प्रकार वह चिन्तन कर ही रही थी कि इसी बीच सोम-पुत्र बुधने उसे देख लिया और वे उसे प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करने लगे।उस समय बुधने एक विशिष्ट वेष-भूषावाले दण्डीका रूप धारण कर लिया। उनके हाथोंमें कमण्डलु और पुस्तक शोभा पा रहे थे। उन्होंने बाँसके डंडेमें अनेकों पवित्र वस्तुओंको बाँध रखा था। वे ब्रह्मचारी वेषमें लम्बी-मोटी शिखा धारण किये हुए थे। समिधा, पुष्प, कुश और जल लिये हुए वटुकोंके साथ वे वेदका पाठ कर रहे थे। वे अपनेको ऐसा प्रकट कर रहे थे मानो उस वनमें किसी वस्तुकी खोज कर रहे हों। इस प्रकार उस वनके बहिर्भागमें वृक्षसमूहोंके झुरमुटमें बैठकर वे उस इलाको बुलाने लगे। इलाके निकट आनेपर वे अकस्मात् चकपकाये हुएकी भाँति उलाहना देते हुए उससे बोले— 'सुन्दरि ! अग्रिहोत्र आदि सेवा-शुश्रूषाका परित्याग करके तुम मेरे घरसे कहाँ चली आयी हो ?' यह सुनकर इलाने कहा— 'तपोधन! मैं अपनेको, आपको, पतिको और कुलको इन सभीको भूल गयी हूँ, अतः निष्पाप ! आप अपने और मेरे कुलका परिचय दीजिये।' इलाके इस प्रकार पूछनेपर बुधने उस सुन्दरीसे कहा 'वरवर्णिनि तुम इला हो और मैं बहुत-सी विद्याओंका ज्ञाता बुध नामसे प्रसिद्ध मैं तेजस्वी कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और मेरे पिता ब्राह्मणोंके अधिपति हैं।' बुधके इस कथनपर विश्वास करके इला बुधके उस भवनमें प्रविष्ट हुई, जिसमें रत्नोंके खम्भे लगे थे तथा जिसका निर्माण दिव्य मायाके द्वारा हुआ था। उस भवनमें पहुँचकर इला अपनेको कृतार्थ मानने लगी। (वह कहने लगी) 'कैसा सुन्दर चरित्र है। कैसा अद्भुत रूप है! कितना प्रचुर धन है! कैसा ऊँचा कुल है तथा मेरा और मेरे पतिदेवका कैसा अनुपम सौन्दर्य है!' तदनन्तर वह इला बुधके साथ बहुत समयतक उस सम्पूर्ण भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न घरमें उसी प्रकार सुखसे रहने लगी, जैसे इन्द्रभवनमें हो ॥ 48- 66 ll
सूतजी कहते हैं-ऋपियो (बहुत दिनोंतक राज इसके राजधानी न लौटनेपर सशङ्कित होकर) उनके छोटे भाई मनु-पुत्र इक्ष्वाकु आदि राजा इल (सुद्युम्र) का अन्वेषणः करते हुए उसी शरवणके निकट जा पहुँचे। वहाँ उन सभीने मार्गके अग्रभागमें खड़ी हुई एक अनुपम घोड़ीको देखा, जिसका शरीर रत्ननिर्मित जीनकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा | था। तत्पश्चात् जीनको पहचानकर वे सभी बन्धु आश्चर्यचकित हो गये (और परस्पर कहने लगे) 'अरे! यह तो हमारे भाई महात्मा राजा इलका चन्द्रप्रभ नामक घोड़ा है! किस कारण यह सुन्दर घोड़ीके रूपमें परिणत हो गया!' तब वे सभी लौटकर अपने कुल पुरोहित महर्षि वसिष्ठके पास जाकर पूछने लगे 'योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ऐसी आश्चर्यजनक घटना क्यों घटित हुई? इसका रहस्य हमें बतलाइये। तब महर्षि वसिष्ठ ध्यानदृष्टिद्वारा सारा वृत्तान्त | जानकर इक्ष्वाकु आदिसे बोले— 'राजपुत्रो ! पूर्वकालमें शम्भु पत्नी उमाने इस शरवणके विषयमें ऐसा समय (शर्त) निर्धारित कर रखा है कि 'जो पुरुष इस शरवणमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री रूपमें परिवर्तित हो जायगा।' इसी कारण राजा इलके साथ-ही-साथ यह घोड़ा भी स्त्रीत्वको प्राप्त हो गया है। अब जिस प्रकार राजा इल कुबेरकी भाँति पुनः पुरुषत्वको प्राप्त कर सकें, तुमलोगोंको पिनाकधारी शंकरकी आराधना करके वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।' महर्षि वसिष्ठकी आज्ञा पाकर वे सभी मनु-पुत्र वहाँ गये, जहाँ | देवाधिदेव महेश्वर विराजमान थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न स्तोत्रोंद्वारा पार्वती और परमेश्वरका स्तवन किया। (उस स्तवनसे प्रसन्न होकर) पार्वती और परमेश्वरने कहा- 'राजकुमारो यद्यपि मेरे इस नियम (शर्त) का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, तथापि इस समय उसके निवारणके लिये मैं एक उपाय बतला रहा हूँ। यदि इक्ष्वाकुद्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञका जो कुछ फल हो, वह सारा का सारा हम दोनोंको समर्पित कर दिया जाय तो राजा इल निःसंदेह किम्पुरुष (किन्नर) हो जायेंगे।' यह सुनकर 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'- यों कहकर वैवस्वत मनुके वे सभी पुत्र राजधानीको लौट आये। घर आकर इक्ष्वाकुने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया और उसका पुण्य फल पार्वती परमेश्वरको अर्पित कर |दिया, जिसके परिणामस्वरूप इल किम्पुरुष हो गये।वहाँ थे वीरवर एक मास पुरुषरूपमें रहकर पुनः एक मास स्त्री हो जाते थे। बुधके भवनमें स्त्रीरूपसे रहते समय इलने गर्भ धारण कर लिया था। उस गर्भसे अनेक गुणोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रको उत्पन्नकर बुध भूलोकसे पुन: स्वर्गलोकको चले गये॥ 113॥ तभीसे इलके नामपर उस वर्षका नाम इलावृत पड़ गया। इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंशके आदिमें सर्वप्रथम मनु-नन्दन इल ही राजा हुए थे। तपोधन ऋषियो! जैसे इलकी पुरुषावस्थामें उत्पन्न हुए राजा पुरूरवा चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, वैसे ही महाराज इक्ष्वाकु सूर्य वंशके विस्तारक कहे गये हैं। किम्पुरुषयोनिमें रहते समय इल | सुधुन नामसे कहे जाते थे उन के पुनः उत्कल, गय और पराक्रमी हरिताश्व नामक तीन अपराजेय पुत्र उत्पन्न हुए थे। इलने (अपने इन चारों पुत्रोंमेंसे) उत्कलको उत्कल (उड़िसा), गयको गयाप्रदेश और हरिताश्वको कुरुप्रदेशकी सीमावर्तिनी पूर्व दिशाका प्रदेश (राज्य) समर्पित किया। तत्पश्चात् अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरुरवाका प्रतिष्ठानपुरमें अभिषेक करके वे स्वयं दिव्य फलाहारका उपभोग करनेके लिये इलावृतवर्षमें चले गये। (सुद्युम्नके बाद) मनुके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु मध्यदेशके अधिकारी हुए। (मनुके अन्य पुत्रोंमें) नरिष्यन्तके शुच नामक महाबली पुत्र हुआ। नाभागके अम्बरीष और धृष्टके भृष्टकेतु, चित्रनाथ और रण नामक तीन पराक्रमी पुत्र हुए। शर्यातिके आनर्त नामक एक पुत्र तथा सुकन्या नाम्री एक पुत्री हुई आनर्तके रोचमान नामका एक प्रतापी पुत्र हुआ। आनर्तद्वारा शासित देशका नाम आनर्त (गुजरात) पड़ा और कुशस्थली (द्वारका) नगरी उसकी राजधानी हुई। रोचमानका पुत्र रेव हुआ, जो रेवत और ककुयी नामसे भी पुकारा जाता था। वह रोचमानके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ था। उसके रेवती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई, जो बलरामजीकी भार्यारूपसे विख्यात है। करूषके बहुत-से पुत्र थे, जो भूतलपर कारूप नामसे विख्यात हुए। पृषत्र गौकी हत्या कर देनेके कारण गुरुके शापसे शूद्र • हो गया ॥14- 24 ॥श्रेष्ठ ऋषियो । अब मैं इक्ष्वाकु वंशका वर्णन करने रहा हूँ आपलोग ध्यानपूर्वक सुनिये। देवराज विकुक्षि इक्ष्वाकुके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। वे इक्ष्वाकुके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ थे। उन (विकुक्षि) के पंद्रह पुत्र थे, जो सुमेरुगिरिकी उत्तर दिशामें श्रेष्ठ राजा हुए। विकुक्षिके एक सौ चौदह पुत्र और हुए थे, जो सुमेरुगिरिकी दक्षिण दिशाके शासक कहे गये हैं। विकुक्षिका ज्येष्ठ पुत्र ककुत्स्थ नामसे विख्यात था। उसका पुत्र सुयोधन हुआ। सुयोधनका पुत्र पृथु पृथुका पुत्र विश्वग, विश्वगका पुत्र इन्दु और इन्दुका पुत्र युवनाश्व | हुआ। युवनाश्वका पुत्र श्रावस्त हुआ, जिसे वत्सक भी | कहा जाता था। द्विजवरो! उसीने गौडदेशमें श्रावस्ती नामकी नगरी बसायी थी। श्रावस्तसे बृहदश्व और उससे कुबलाश्वका जन्म हुआ, जो पूर्वकालमें धुन्धुद्वारा मारे जानेके कारण धुन्धुमार नामसे विख्यात था। धुन्धुमारके दृढाश्व, दण्ड और कपिलाश्व नामक तीन पुत्र हुए थे, जिनमें प्रतापी कपिलाश्च धौन्धुमारि नामसे भी प्रसिद्ध था दृढावका पुत्र प्रमोद और उसका पुत्र हर्यश्व हुआ हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ तथा उससे संहताश्वका जन्म हुआ संहताश्वके अकृताश्च और रणाश्व नामक दो पुत्र हुए। उनमें रणाश्वका पुत्र युवनाश्व हुआ तथा उससे मान्धाताकी उत्पत्ति हुई। मान्धाताके पुरुकुत्स, राजा धर्मसेन और शत्रुओंको पराजित करनेवाले सुप्रसिद्ध प्रतापी मुचुकुन्द-ये तीन पुत्र हुए। इनमें पुरुकुत्सका पुत्र नर्मदापति वसुद हुआ। उसका पुत्र सम्भूति हुआ और सम्भूतिसे त्रिधन्वाका जन्म हुआ। त्रिधन्वासे उत्पन्न हुआ पुत्र त्रय्यारुण नामसे प्रसिद्ध हुआ। उससे सत्यव्रत और सत्यव्रतसे सत्यरथका जन्म हुआ। सत्यरथसे हरिश्चन्द्र, | हरिश्चन्द्रसे रोहित, रोहितसे वृक और वृकसे बाहुकी उत्पत्ति हुई। बाहुके पुत्र राजा सगर हुए, जो परम धर्मात्मा थे। उन सगरके प्रभा और भानुमती नामवाली दो पत्त्रियाँ थीं। उन दोनोंने पूर्वकालमें पुत्रकी कामनासे और्वानिकी आराधना की थी। उनकी आराधनासे संतुष्ट होकर उन्हें यथेष्ट उत्तम वर प्रदान करते हुए और्वने कहा- 'तुम दोनोंमेंसे एकको साठ हजार पुत्र होंगे और दूसरीको केवल एक वंशप्रवर्तक पुत्र होगा। (तुम दोनोंमें जिसकी जैसी इच्छा हो, वह वैसा वरदान ग्रहण करे।) ' तब प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको स्वीकार किया और भानुमतीने एक ही पुत्र माँगा। कुछ दिनोंके | पश्चात् भानुमतीने असमञ्जसको पैदा किया तथा यदुवंशको कन्या प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया, जो अश्वमेध यज्ञके अश्वको खोजमें जिस समय पृथ्वीको खोद रहे थे, उसी समय उन्हें विष्णु (भगवदवतार कपिल) ने जलाकर भस्म कर दिया ।। 25-42 ॥असमञ्जसका पुत्र अंशुमान् नामसे विख्यात हुआ। उसके पुत्र दिलीप और दिलीपसे भगीरथ हुए, जो तपस्या करके भागीरथी गङ्गाको स्वर्गसे भूतलपर ले आये। भगीरथके पुत्र नाभाग नामसे प्रसिद्ध हुए। नाभाग के पुत्र अम्बरीष और उनसे सिन्धुद्वीपका जन्म हुआ। सिन्धुद्वीपका पुत्र अयुतायु हुआ तथा उससे ऋतुपर्णकी उत्पत्ति हुई। ऋतुपर्णका पुत्र कल्माषपाद और उससे सर्वकर्मा पैदा हुआ। उसका पुत्र अनरण्य और अनरण्यका पुत्र निघ्न हुआ। निघ्नके अनमित्र और राजा रघु नामके दो पुत्र हुए, जिनमें अनमित्र वनमें चला गया, जो कृतयुगमें राजा होगा। रघुसे दिलीप तथा दिलीपसे अज हुए। अजसे दीर्घबाहु और उससे राजा अजपाल हुए। अजपालसे दशरथ पैदा हुए, जिनके चार पुत्र थे। वे सब के सब नारायणके अंशसे प्रादुर्भूत हुए थे। उनमें श्रीराम सबसे ज्येष्ठ थे, जो रावणका अन्त करनेवाले तथा रघुवंशके प्रवर्धक थे। भृगुवंशप्रवर महर्षि वाल्मीकिने श्रीरामके चरित्रका (रामायणरूपमें विस्तारपूर्वक) वर्णन किया है। श्रीरामके कुश और लव नामक दो पुत्र हुए, जो इक्ष्वाकु कुलके विस्तारक थे। कुशसे अतिथि और उससे निषधका जन्म हुआ। निषधका पुत्र नल हुआ और उससे नमकी उत्पत्ति हुई। नभसे पुण्डरीकका तथा उससे क्षेमधन्वाका जन्म हुआ। क्षेमधन्वाका पुत्र प्रतापी वीरवर देवानीक हुआ। उसका पुत्र अहीनगु तथा उससे सहस्राश्वका जन्म हुआ। सहस्राश्वसे चन्द्रावलोक और उससे तारापीडकी उत्पत्ति हुई। तारापीडसे चन्द्रागिरि और उससे भानुचन्द्र पैदा हुआ। भानुचन्द्रका पुत्र श्रुतायु हुआ, जो महाभारत युद्धमें मारा गया था। महर्षि कश्यपद्वारा उत्पन्न हुए इस वंशमें नल नामसे दो राजा विख्यात हुए हैं, उनमें एक वीरसेनका पुत्र तथा दूसरा राजा निषधका पुत्र था इस प्रकार वैवस्वतवंशीय महाराज इक्ष्वाकुके वंशमें उत्पन्न होनेवाले ये सभी राजा अतिशय दानशील | थे। मैंने इनका मुख्यरूपसे वर्णन कर दिया ।। 43-57॥
अध्यायः समाप्त-
📚: श्रीमद्भागवतपुराण/स्कन्धः ९/अध्यायः (१)
मरीचिः मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कहे यु ।
दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवस्वान् अभवत् सुतः ॥ १० ॥
राजा परीक्षितने पूछा-भगवन्! आपने सब मन्वन्तरों और उनमें अनन्त शक्तिशाली भगवान्के द्वारा किये हुए ऐश्वर्यपूर्ण चरित्रोंका वर्णन किया और मैने उनका श्रवण भी किया ॥ 1 ॥ आपने कहा कि पिछले कल्पके अन्तमें द्रविड़ देशके स्वामी राजर्षि सत्यव्रतने भगवान्की सेवासे ज्ञान प्राप्त किया और वही इस कल्पमें वैवस्वत मनु हुए। आपने उनके इक्ष्वाकु आदि नरपति पुत्रोंका भी वर्णन किया ।। 2-3 ॥ ब्रह्मन् ! अब आप कृपा करके उनके वंश और वंशमें होनेवालोका अलग-अलग चरित्र वर्णन कीजिये। महाभाग ! हमारे हृदयमें सर्वदा ही कथा सुननेकी उत्सुकता बनी रहती है ॥ 4 ॥ वैवस्वत मनुके वंशमें जो हो चुके हों, इस समय विद्यमान हों और आगे होनेवाले हो— उन सब पवित्रकीर्ति पुरुषोंके पराक्रमका वर्णन कीजिये ।। 5 ।।
सूतजी कहते हैं- शौनकादि ऋषियो ! ब्रह्मवादी ऋषियोंको सभामें राजा परीक्षित्ने जब यह प्रश्न किया, तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवान् श्रीशुकदेवजीने कहा ॥ 6 ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! तुम मनुवंशका वर्णन संक्षेपसे सुनो। विस्तारसे तो सैकड़ों वर्ष भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 7 ॥। जो परम पुरुष परमात्मा छोटे-बड़े सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, प्रलयके समय केवल वही थे; यह विश्व तथा और कुछ भी नहीं था ॥ 8 ॥ महाराज! उनकी नाभिसे एक सुवर्णमय कमलकोष प्रकट हुआ। उसीमें चतुर्मुख ब्रह्माजीका आविर्भाव हुआ ।। 9 ।। ब्रह्माजीके मनसे मरीचि और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपत्नी दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ ॥ 10 ॥ विवस्वान्की संज्ञा नामक पत्नीसे श्राद्धदेव मनुका जन्म हुआ। परीक्षित्! परम मनस्वी राजा श्राद्धदेवने अपनी पत्नी श्रद्धाके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न किये। उनके नाम थे— इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूष, नरिष्यन्त, पृषभ, नभग और कवि ।। 11-12 ।।
वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठने उन्हें सन्तान प्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुणका यज्ञ कराया था ॥ 13 ॥ यज्ञके आरम्भ में केवल दूध पीकर रहनेवाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो 14 तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कारका उच्चारण | करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी ।। 15 । जब होताने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञके फलस्वरूप पुत्रके स्थानपर इला नामकी कन्या हुई। उसे देखकर श्राद्धदेव मनुका मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजीसे कहा- | 16 || 'भगवन्! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया ? अरे, यह तो बड़े दुःखकी बात है। वैदिक कर्मका ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये 17 ॥ आप लोगोंका मन्त्रज्ञान तो पूर्ण है ही इसके अतिरिक्त आपलोग जितेन्द्रिय भी है तथा तपस्याके कारण निष्पाप हो चुके है देवताओगे असत्यकी प्राप्तिके समान आपके संकल्पका यह उलटा | फल कैसे हुआ ?' ।। 18 ।।परीक्षित् | हमारे वृद्धमपितामह भगवान् वस्ने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होताने विपरीत संकल्प किया है। इसलिये उन्होंने चैवस्वत मनुसे कहा- ॥ 19 ॥ 'राजन् ! तुम्हारे होताके विपरीत संकल्पसे ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तपके प्रभावसे मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा' ॥ 20 ॥
परीक्षित्! परम यशस्वी भगवान् वसिष्ठने ऐसा निश्चय करके उस इला नामकी कन्याको ही पुरुष बना देनेके लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायणको स्तुति की ॥ 21 ॥ सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभावसे वह कन्या ही सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी ॥ 22 ॥
महाराज! एक बार राजा सुद्युन शिकार खेलनेके लिये सिन्धुदेशके घोड़ेपर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंके साथ वनमें गये ॥ 23 ॥ वीर सुद्युम्न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत वाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये ।। 24 । अन्तमें सुधुम्र मेरुपर्वतकी तलहटीके एक वनमें चले गये। उस वनमें भगवान् शङ्कर पार्वतीके साथ विहार करते रहते हैं ।। 25 । उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्नने देखा कि मैं स्त्री हो गया हूँ और घोड़ा घोड़ी हो गया है ।। 26 ॥ परीक्षित् । साथ ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनेको स्त्रीरूपमें देखा। वे सब एक-दूसरेका मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया ।। 27 ।।
राजा परीक्षितने पूछा- भगवन्! उस भूखण्ड में ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया ? किसने उसे ऐसा बना दिया था ? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ।। 28 ।।श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक दिन भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये ॥ 29 ॥ उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं। ऋषियोंको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं। झटपट उन्होंने भगवान् शङ्करकी गोदसे उठकर वस्त्र धारण कर लिया ॥ 30 ॥
ऋषियोंने भी देखा कि भगवान् गौरी-शङ्कर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँसे लौटकर वे भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये ॥ 31 ॥ उसी समय भगवान् शङ्करने अपनी प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन्न करनेके लिये कहा कि 'मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थानमें प्रवेश करेगा, वहीं स्त्री हो जायेगा' ॥ 32 ॥ परीक्षित्! तभीसे पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते। अब सुन स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे ॥ 33 ॥
उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे आश्रमके पास ही बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है। उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाय 34 ॥ उस सुन्दरी स्त्रीने भी चन्द्रकुमार बुधको पति बनाना चाहा। इसपर बुधने उसके गर्भसे पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्न किया ।। 35 ।। इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युन स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया ।। 36 ।।
सुधुनकी यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपा अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुसुको पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शङ्करकी आराधना की ।। 37 ।। भगवान् शङ्कर वसिष्ठजीपर प्रसन्न हुए। परीक्षित् । उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये अपनी वाणीको सत्य रखते हुए ही यह बात कही- ll 38 ll'वसिष्ठ ! तुम्हारा यह यजमान एक महीनेतक पुरुष रहेगा और एक महीनेतक स्त्री। इस व्यवस्थासे सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वीका पालन करे' ॥ 39 ॥ इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्थापूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे । परंतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी ॥ 40 ॥ उनके तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल । परीक्षित्! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए ॥ 41 ॥
बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरीके अधिपति सुद्युम्नने अपने पुत्र पुरूरवाको राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करनेके लिये वनकी यात्रा की ॥ 42 ॥
📚: भागवत पुराण स्कन्ध (९) अध्याय १४
चंद्रवंशवर्णनं, बुधस्य जन्म, तस्मान्मनुपुत्र्यामिलायां जातस्य पुरूरवस उपाख्यानं च -
श्रीशुक उवाच ।
अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः ।
यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥ १ ॥
सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात् ।
जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः ॥ २ ॥
तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥ ३ ॥
सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम् ।
पत्नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात् ॥ ४ ॥
यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात् ।
नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः ॥ ५ ॥
शुक्रो बृहस्पतेर्द्वेषाद् अग्रहीत् सासुरोडुपम् ।
हरो गुरुसुतं स्नेहात् सर्वभूतगणावृतः ॥ ६ ॥
सर्वदेवगणोपेतो महेन्द्रो गुरुमन्वयात् ।
सुरासुरविनाशोऽभूत् समरस्तारकामयः ॥ ७ ॥
निवेदितोऽथाङ्गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत् ।
तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छद् अन्तर्वत्नीमवैत् पतिः ॥ ८ ॥
त्रय्या स विद्यया राज्ञा पुत्रत्वे कल्पितस्त्रिवृत् ॥ ४६ ॥
तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तं अधोक्षजम् ।
उर्वशीलोकमन्विच्छन् सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ४७ ॥
एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाङ्मयः ।
देवो नारायणो नान्य एकोऽग्निर्वर्ण एव च ॥ ४८ ॥
पुरूरवस एवासीत् त्वयी त्रेतामुखे नृप ।
अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वमेयिवान् ॥ ४९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
चन्द्रवंशका वर्णन
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ। इस वंश में पुरूरवा आदि बड़े-बड़े पवित्रकीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता है ॥ 1 ॥
सहस्त्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि से कमल की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए। वे अपने गुणों कारण ब्रह्माजी के समान ही थे॥ 2 ॥
उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया ॥ 3 ॥
उन्होंने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया ॥ 4 ॥
देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानवमें घोर संग्राम छिड़ गया ॥ 5 ॥
शुक्राचार्यजी ने बृहस्पतिजी के द्वेष से असुरो के साथ चन्द्रमाका पक्ष ले लिया और महादेवजी ने स्नेहवश समस्त भूतगणों के साथ अपने विद्यागुरु अङ्गिराजी के पुत्र बृहस्पति का पक्ष लिया || 6 ||
देवराज इन्द्र ने भी सम देवताओं के साथ अपने गुरु बृहस्पतिजी का ही पक्ष लिया। इस प्रकार तारा के निमित्त से देवता और असुरों का संहार करने वाला घोर संग्राम हुआ ।। 7 ।।
तदनन्तर अङ्गिरा ऋषिने ब्रह्माजी के पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्माजीने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पतिजी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पतिजीको यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- ॥ 8 ॥
दुष्टे ! मेरे क्षेत्रमें यह तो किसी दूसरेका गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तानकी कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही ।। 9 ।।
अपने पतिकी बात सुनकर तथ अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोनेके समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भसे अलग कर दिया। उस बालकको देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय ॥ 10 ॥
अब वे एक दूसरेसे इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।' ऋषियों और देवताओंने तारासे पूछा कि 'यह किसका लड़का है।परन्तु ताराने लज्जावश कोई उत्तर न दिया ॥ 11 ॥
बालकने अपनी माताको झूठी लजासे क्रोधित होकर कहा-'दुष्टे तू बतलाती क्यों नहीं ? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र से शीघ्र बतला दे ॥ 12 ॥
उसी समय ब्रह्माजीने ताराको एकान्तमें बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब ताराने धीरेसे कहा कि 'चन्द्रमाका।' इसलिये चन्द्रमाने उस बालकको ले लिया ॥ 13 ॥
परीक्षित् ! ब्रह्माजीने उस बालकका नाम रखा 'बुध', क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमाको बहुत आनन्द हुआ ll 14 ll
परीक्षित् ! बुध के द्वारा इला के गर्भ से पुरूरवा का जन्म हुआ। इसका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। एक दिन इन्द्रकी सभा में देवर्षि नारदजी पुरूरवाके रूप, गुण, उदारता, शील स्वभाव, धन-सम्पत्ति और पराक्रमका गान कर रहे थे। उन्हें सुनकर उर्वशी के हृदय में काम-भाव का उदय हो आया और उससे पीड़ित होकर वह देवाङ्गना पुरूरवाके पास चली आयी ।। 15-16 ॥
यद्यपि उर्वशीको मित्रावरुणके शापसे ही मृत्युलोकमें आना पड़ा था, फिर भी पुरुषशिरोमणि पुरूरवा मूर्तिमान् कामदेवके समान सुन्दर हैं—यह सुनकर सुर-सुन्दरी उर्वशीने धैर्य धारण किया और वह उनके पास चली आयी ॥ 17 ॥
देवाङ्गना उर्वशीको देखकर राजा पुरूरवाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने बड़ी मीठी वाणीसे कहा ।। 18 ।।
राजा पुरूरवाने कहा - सुन्दरी ! तुम्हारा स्वागत है। बैठो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ ? तुम मेरे साथ विहार करो और हम दोनोंका यह विहार अनन्त कालतक चलता रहे ॥ 19 ॥
उर्वशी ने कहा- 'राजन् ! आप सौन्दर्य के मूर्तिमान् स्वरूप है भला ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आप में आसक्त न हो जाय ? क्योंकि आपके समीप आकर मेरा मन रमण की इच्छा से अपना धैर्य खो बैठा है ॥ 20 ॥
राजन् ! जो पुरुष रूप गुण आदिके कारण प्रशंसनीय होता है, वही स्त्रियों को अभीष्ट होता है। अतः मैं आपके साथ अवश्य विहार करूँगी। परन्तु मेरे प्रेमी महाराज मेरी एक शर्त है मैं आपको धरोहरके रूपमें भेड़के दो बच्चे सौंपती हूँ आप इनकी रक्षा करना ॥ 21 ॥
वीरशिरोमणे । मैं केवल घी खाऊँगी और मैथुन के अतिरिक्त और किसी भी समय आपको वस्त्रहीन न देख सकूंगी।' परम मनस्वी पुरुरवाने ठीक है—ऐसा कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली ।।22 ।।
और फिर उर्वशीसे कहा- तुम्हारा यह सौन्दर्य अद्भुत है। तुम्हारा भाव अलौकिक है। यह तो साम | मनुष्यसृष्टिको मोहित करनेवाला है। और देवि । कृपा करके तुम स्वयं यहाँ आयी हो। फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो सेवन न करेगा ? ॥ 23 ॥
तुम्हारा परीक्षित् | तब उर्वशी कामशास्त्रोक्त पद्धतिसे पुरुषश्रेष्ठ पुरूरवाके साथ विहार करने लगी। वे भी देवताओंकी विहार स्थली चैत्ररथ, नन्दनवन आदि उपवनोंमें उसके साथ स्वच्छन्द विहार करने लगे ॥ 24 ॥
देवी उर्वशीके शरीरसे कमलकेसरकी-सी सुगन्ध निकला करती थी। उसके साथ राजा पुरूरवाने बहुत वर्षतक आनन्द विहार किया। वे उसके मुखकी सुरभिसे अपनी सुध-बुध खो बैठते थे॥ 25 ॥
इधर जब इन्द्रने उर्वशीको नहीं देखा, तब उन्होंने गन्धर्वोको उसे लानेके लिये भेजा और कहा- 'उर्वशीके बिना मुझे यह स्वर्ग फीका जान पड़ता है' ॥ 26 ॥
वे गन्धर्व आधी रातके समय घोर अन्धकारमें वहाँ गये और उर्वशीके दोनों भेड़ोंको, जिन्हें उसने राजाके पास धरोहर रखा था, चुराकर चलते बने || 27 ||
उर्वशीने जब गन्धर्वोंक द्वारा ले जाये जाते हुए अपने पुत्रके समान प्यारे भेड़ोंकी 'बें-बें' सुनी, तब वह कह उठी कि 'अरे, इस कायरको अपना स्वामी बनाकर मैं तो मारी गयी। यह नपुंसक अपनेको बड़ा वीर मानता है। यह मेरे भेड़ों को भी न बचा सका ।। 28 ।
इसीपर विश्वास करनेके कारण लुटेरे मेरे बच्चोंको लूटकर लिये जा रहे हैं। मैं तो मर गयी। देखो तो सही, यह दिनमें तो मर्द बनता है और रातमें स्त्रियोंकी तरह डरकर सोया रहता है' ॥ 29 ॥
परीक्षित् ! जैसे कोई हाथीको अंकुशसे बेध डाले, वैसे ही उर्वशीने अपने वचन-बाणोंसे राजाको बींध दिया। राजा पुरूरवाको बड़ा क्रोध आया और हाथमें तलवार लेकर वस्त्रहीन अवस्थामें ही वे उस | ओर दौड़ पड़े ॥ 30 ॥
गन्धवनेि उनके झपटते ही भेड़ोंको तो वहीं छोड़ दिया और स्वयं बिजलीकी तरह चमकने लगे। जब | राजा पुरूरवा भेड़ोंको लेकर लौटे, तब उर्वशीने उस प्रकाशमें उन्हें वस्त्रहीन अवस्थामें देख लिया। (बस, वह उसी समय उन्हें छोड़कर चली गयी ॥ 31 ॥
परीक्षित् राजा पुरूरवाने जब अपने शयनागारमें अपनी | प्रियतमा उर्वशीको नहीं देखा तो वे अनमने हो गये। उनका | चित्त उर्वशीमें ही बसा हुआ था। वे उसके लिये शोकसे विह्वल । हो गये और उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीमें इधर-उधर भटकनेलगे ॥ 32 ॥
एक दिन कुरुक्षेत्रमें सरस्वती नदीके तटपर उन्होंने उर्वशी और उसकी पाँच प्रसन्नमुखी सखियोंको | देखा और बड़ी मीठी वाणीसे कहा- ॥ 33 ॥
'प्रिये ! तनिक ठहर जाओ। एक बार मेरी बात मान लो । निष्ठुरे ! अब आज तो मुझे सुखी किये बिना मत जाओ। क्षणभर ठहरो; आओ हम दोनों कुछ बातें तो कर लें ॥ 34 ॥
देवि! अब इस शरीरपर तुम्हारा कृपा प्रसाद नहीं रहा, इसीसे तुमने इसे दूर फेंक दिया है। अतः मेरा यह सुन्दर शरीर अभी ढेर हुआ जाता है और तुम्हारे देखते-देखते इसे भेड़िये और गीध रखा जायेंगे ॥ 35 ॥
उर्वशीने कहा- राजन् ! तुम पुरुष हो । इस प्रकार मत मरो देखो, सचमुच ये भेड़िये तुम्हें खा न जाये ! स्त्रियोंकी किसीके साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियाँका हृदय और भेड़ियोंका हृदय बिलकुल एक जैसा होता है ॥ 36 ॥
स्त्रियाँ निर्दय होती हैं। क्रूरता तो उनमें स्वाभाविक ही रहती है। तनिक सी बातमें चिढ़ जाती है और अपने सुखके लिये बड़े-बड़े साहसके काम कर बैठती हैं, थोड़े-से स्वार्थके लिये विश्वास दिलाकर अपने पति और भाईतकको मार डालती हैं ॥ 37 ॥
इनके हृदयमें सौहार्द तो है ही नहीं भोले-भाले लोगोंको झूठ-मूठका विश्वास दिलाकर फाँस लेती हैं और नये-नये पुरुषकी चाटसे कुलटा और स्वच्छन्दचारिणी बन जाती हैं ॥ 38 ॥
तो फिर तुम धीरज धरो। तुम राजराजेश्वर हो । घबराओ मत। प्रति एक वर्षके बाद एक रात तुम मेरे साथ रहोगे। तब तुम्हारे और भी सन्तानें होंगी ॥ 39 ॥
राजा पुरूरवाने देखा कि उर्वशी गर्भवती है, इसलिये वे अपनी राजधानीमें लौट आये एक वर्षके बाद फिर वहाँ गये। तबतक उर्वशी एक वीर पुत्रकी माता हो चुकी थी ॥ 40 ॥
उर्वशी के मिलनेसे पुरूरवा को बड़ा सुख मिला और वे एक रात उसीके साथ रहे। प्रातः काल जब वे विदा होने लगे, तब विरहके दुःखसे वे अत्यन्त दीन हो गये। उर्वशीने उनसे कहा- ॥ 41 ॥
तुम इन गन्धर्व की स्तुति करो, ये चाहें तो तुम्हें मुझे दे सकते हैं। तब राजा पुरूरवा ने गन्धर्वो की स्तुति की। परीक्षित् ! राजा पुरूरवा की स्तुति से प्रसन्न होकर गन्धर्व ने उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्निस्थापन करनेका पात्र) दी। राजाने समझा यही उर्वशी है, इसलिये उसको हृदयसे लगाकर वे एक वनसे दूसरे वन में घूमते रहे ॥ 42 ॥
जब उन्हें होश हुआ, तब वे स्थाली को वन में छोड़कर अपने महल में लौट आये एवं रात के समय उर्वशी का ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब त्रेतायुग का प्रारम्भ हुआ, तब उनके हृदयमें तीनों वेद प्रकट हुए ॥ 43 ॥
फिर वे उस स्थानपर गये, जहाँ उन्होंने वह अग्निस्थाली छोड़ी थी। अब उस स्थानपर शमीवृक्षके गर्भ में एक पीपल का वृक्ष उग आया था, उसे देखकर उन्होंने उससे दो अरणियाँ (मन्थनकाष्ठ) बनायीं। फिर उन्होंने उर्वशी लोक की कामनासे नीचेकी अरणिको उर्वशी, ऊपरकी अरणिको पुरूरवा और बीचके काष्ठको पुत्ररूप से चिन्तन करते हुए अग्नि प्रज्वलित करने वाले मन्त्रोंसे मन्थन किया ।। 44-45 ॥
उनके मन्थनसे 'जातवेदा' नामका अग्नि प्रकट हुआ। राजा पुरूरवा ने अग्निदेवता को त्रयीविद्या के द्वारा आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि – इन तीन भागों में विभक्त करके पुत्ररूप से स्वीकार कर लिया ॥ 46 ॥
फिर उर्वशीलोक की इच्छा से पुरूरवा ने उन तीनों अग्नियोंद्वारा सर्वदेवस्वरूप इन्द्रियातीत यज्ञपति भगवान् श्रीहरिका यजन किया ॥ 47 ॥
परीक्षित्! त्रेताके पूर्व सत्ययुगमें एकमात्र प्रणव (ॐ कार) ही वेद था। सारे वेद-शास्त्र उसीके अन्तर्भूत थे। थे देवता थे एकमात्र नारायण; और कोई न था। अग्नि भी तीन नहीं, केवल एक था और वर्ण भी केवल एक 'हंस' ही था ॥ 48 ॥
परीक्षित् ! त्रेताके प्रारम्भमें पुरूरवासे ही वेदत्रयी और अग्नित्रयीका आविर्भाव हुआ। राजा पुरूरवाने अग्निको सन्तानरूपसे स्वीकार करके गन्धर्वलोक की प्राप्ति की ।। 49 ।।
( हरिवंश पुराण हरिवंश पर्व में इला की उत्पत्ति कथा-)
📚: वैवस्वत मनोः वंशजानां वर्णनं एवं पुरूरवसोः उत्पत्तिः
4-6. हे भरत वंशज , अपने इन नौ पुत्रों के जन्म से पहले, मुनि ने इस यज्ञ में मित्र और वरुण के अंशों को आहुति दी। जब यह आहुति दी गई, तो देवताओं, गंधर्वों , मनुष्यों और तपस्वियों को अत्यंत प्रसन्नता हुई और वे कहने लगे, "हे भगवान! उनकी तपस्या कितनी अद्भुत है ! हे भगवान! शास्त्रों का उनका ज्ञान कितना अद्भुत है!"
7. परम्परा यह है कि उस बलिदान में इला का जन्म हुआ, जो दिव्य वस्त्रों से सजी, दिव्य आभूषणों से सुशोभित और दिव्य कवच से सुसज्जित थी।
8. मनु ने हाथ में दंड लिए उससे कहा: "हे सुंदरी, मेरे पीछे आओ।" उसने संतान की इच्छा रखने वाले उस कुलपति को निम्नलिखित नैतिक उत्तर दिया।
9. इला ने कहा:—"हे श्रेष्ठ वक्ता, मैं मित्र और वरुण की शक्ति से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मैं उनके पास जाऊँगी। मेरी नैतिकता को नष्ट मत करो।"
10-11. मनु से यह कहकर इला मित्र और वरुण के पास गई और उस सुंदर स्त्री ने हाथ जोड़कर उनसे कहा, "मैं आपकी ही ऊर्जा से उत्पन्न हुई हूँ; मनु ने मुझे अपने पीछे आने को कहा है। मुझे बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए।"
12. मुझसे सुनो कि मित्र और वरुण ने पवित्र और शुद्ध इला से क्या कहा, जिसने उनसे इस प्रकार बात की थी।
13. हे सुंदर कमर वाली स्त्री, हम तुम्हारे सद्गुण, विनम्रता, आत्मसंयम और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न हुए हैं।
14-15. इसलिए हे महान देवी, आप हमारी पुत्री के रूप में प्रसिद्ध होंगी, हे सुंदरी, आप मनु की पुत्री होंगी, उनके वंश को आगे बढ़ाएंगी, तीनों लोकों में सुद्युम्न नाम से प्रसिद्ध होंगी । आप धर्मपरायण होंगी, जगत की प्रिय होंगी और मनु के वंश को बढ़ाएंगी।
16. यह सुनकर जब वह अपने पिता (मनु) के पास लौटने ही वाली थी, तभी रास्ते में बुध ने उसे वैवाहिक उद्देश्यों के लिए आमंत्रित किया।
17. फिर सोम के पुत्र बुध ने उससे पुरुरवा को जन्म दिया । उस पुत्र को जन्म देने के बाद इला प्रद्युम्न बन गई ।******
30. हे भरत वंशज, इस प्रकार एक हजार शक्तिशाली क्षत्रियों का जन्म हुआ। नभागरिष्ट के पुत्र, यद्यपि जन्म से क्षत्रिय थे, वैश्य का दर्जा प्राप्त कर लिया ।
31-32. प्राँशु का एक पुत्र था जिसका नाम शार्याति था। नरिष्यन्त का पुत्र शक्तिशाली दंड था। शार्याति के जुड़वां पुत्र और पुत्री थे। पुत्र का नाम अनर्त्त था और पुत्री सुकन्या च्यवन की पत्नी बनीं । अनर्त्त के उत्तराधिकारी अत्यंत तेजस्वी रेवत थे ।
32. उनका नगर कुसस्थली अनारत्त प्रांत में था। रेवा के पुत्र रैवत कुकुद्मी नाम से जाने जाते थे और वे धर्मपरायण थे।
लक्ष्मण की बात सुनकर , वाक्पटु और शक्तिशाली राघव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया:
“हे श्रेष्ठ लक्ष्मण, आपने वृत्र के वध और अश्वमेध यज्ञ के फल के विषय में जो कुछ कहा है, वह पूर्णतः सत्य है, हे सज्जन। ऐसा कहा जाता है कि पूर्व में प्रजापति के पुत्र कर्दम , जो अत्यंत गुणी और धन्य थे उनके पुत्र इला थे, जो बाहलिका प्रांत पर शासन करते थे । हे पुरुषों के सिंह, उस अत्यंत तेजस्वी सम्राट ने समस्त पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया और अपनी प्रजा पर अपने पुत्रों के समान शासन किया।”
चैत्र माह के शुभ माह में , वह दीर्घ भुजाओं वाला योद्धा अपने सेवकों, पैदल सेना और घुड़सवार सेना के साथ उस मनमोहक वन में शिकार करने गया, और उस उदार राजकुमार ने उस वन में सैकड़ों-हजारों जंगली जानवरों का वध किया, फिर भी उसकी तृप्ति नहीं हुई। जब वह कार्तिकेय के जन्मस्थान पर पहुँचा, तब तक अनगिनत प्रकार के जानवर मर चुके थे। वहाँ देवताओं में श्रेष्ठ, अजेय हारा , पर्वतों के राजा की पुत्री के साथ क्रीड़ा कर रहे थे, और उमा के स्वामी, जिनका प्रतीक बैल है, ने स्त्री का रूप धारण करके जलप्रपातों के बीच देवी का मनोरंजन करने का प्रयास किया। वन में जहाँ भी नर प्राणी या वृक्ष थे, वहाँ सब कुछ स्त्री रूप धारण कर लिया। कर्दम के पुत्र राजा इला ने अनगिनत जानवरों का वध करते हुए उस स्थान में प्रवेश किया और देखा कि वे सभी मादा थे। इसके बाद उन्हें यह भी पता चला कि वे भी स्त्री में परिवर्तित हो गए हैं, साथ ही उनके अनुयायी भी। इस घटना से वे बहुत दुखी हुए। उसने अपने आप को एक रूपांतरित होते देखा और उसे उमा के पति का काम समझकर वह भयभीत हो गया।
तब उस सम्राट ने अपने सेवकों, सेना और रथों सहित शक्तिशाली नीले गले वाले देवता कपर्दिन की शरण ली , और कृपा की देवी महेश्वर ने हंसते हुए प्रजापति के पुत्र से कहा:—
“उठो, उठो, हे राजसी ऋषि , हे कर्दम के वीर पुत्र, पुरुषत्व के अलावा जो चाहो मांगो!”
इस उत्तर से राजा शिव अत्यंत निराश हुए । स्त्री रूप धारण किए हुए शिव ने देवताओं के सर्वोपरि से कोई अन्य वरदान स्वीकार न करने की इच्छा व्यक्त की और अपनी गहरी पीड़ा में, पर्वतों के राजा की पुत्री उमा के चरणों में गिरकर, उन्होंने पूर्णममन से उनसे विनती करते हुए कहा:
“हे समस्त लोकों में अपनी कृपा बरसाने वाली, हे सुंदर देवी, जिनकी दृष्टि कभी व्यर्थ नहीं जाती, मुझ पर अपनी दया दृष्टि डालिए!”
राजर्षि के हृदय में चल रही बातों को जानकर , हारा के समक्ष खड़ी उस देवी ने, रुद्र की पत्नी ने , यह उत्तर दिया:
“उस देवी द्वारा दिए गए उस अद्भुत और अद्वितीय वरदान को सुनकर राजा प्रसन्नता से भर उठा और बोला:—
“हे देवी, जिनकी सुंदरता पृथ्वी पर अद्वितीय है, यदि मैंने आपकी कृपा प्राप्त कर ली है, तो मुझे एक महीने के लिए स्त्री का रूप धारण करने दें और दूसरे महीने में पुरुष का रूप धारण करने दें!”
“तब उस सौम्य चेहरे वाली देवी ने उसकी इच्छा को समझते हुए सौहार्दपूर्वक उत्तर दिया:—
“ऐसा ही होगा, हे राजा, और जब तुम पुरुष बन जाओगे, तो तुम्हें याद नहीं रहेगा कि तुम कभी स्त्री थे, और अगले महीने, स्त्री बनकर, तुम भूल जाओगे कि तुम कभी पुरुष थे!”
“इस प्रकार, कर्दम से जन्मा वह राजा, एक महीने तक पुरुष रहने के बाद अगले ही महीने इला नाम से स्त्री बन गया, जो तीनों लोकों में सबसे सुंदर स्त्री थी।”
अत्रि चन्द्रमा "बुध" और इला 'के प्रक्षिप्त -कथानक हैं-
(अत्रि की उत्पत्ति का पौराणिक सन्दर्भ-)
★नारायण उवाच★
अत्रिश्च ब्रह्मणः पुत्रस्तस्य पुत्रो निशाकरः।
स च कृत्वा राजसूयं द्विजराजो बभूव ह ।४।
अनुवाद– ब्रह्मा के अत्रि हुए और अत्रि के निशाकर जिन्होंने राजसूय यज्ञ करके द्विजराज
की उपाधि पायी।४।
गुरुपत्न्यां च तारायां तस्याभूच्च बुधः सुतः।
बुधपुत्रस्तु चैत्रश्च तत्पुत्रः सुरथः स्मृतः ।५।
अनुवाद– गुरु पत्नी तारा में जिन्होंने बुध नाम का पुत्र उत्पन्न किया और बुध का पुत्र चैत्र हुआ और चैत्र का पुत्र सुरथ हुआ।५।
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उपर्युक्त श्लोक ब्रह्म वैवर्तपुराण महापुराण से हैं जिसमें बुध का पुत्र चैत्र बताया गया है और चैत्र का पुत्र सुर है । यहाँ बुध से पुरूरवा की उत्पत्ति का वर्णन नहीं है।
सन्दर्भ-
ब्रह्म वैवर्तपुराण महापुराण द्वितीय प्रकृतिखण्ड नारदनारायणसंवाद दुर्गोपाख्याने ताराचन्द्रयोर्दोषनिवारणं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।।५८।।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में के उपर्युक्त श्लोकों में बुध की सन्तान चैत्र नाम का पुत्र बताया गया है।
विशेष:-पुरूरवा का कोई वर्णन नहीं है।अत: पुरूरवा गोप है और गोपों की सृष्टि स्वराट विष्णु से ही गोलोक में हुई है।
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और अधिकतर पुराणों में वर्णन है। कि
अत्रि और अनुसुया से चन्द्रमा की उत्पत्ति नहीं हुई इसका शास्त्रीय खण्डन हम निम्नलिखित तथ्यों पर करते हैं।-
वैदिक ऋचाओं में अत्रि अग्नि का नामान्तरण है। और आध्यात्मिक रूप से अत्रि की उत्पत्ति निम्न प्रकार - से आत्मा की चतुरीय अवस्था के रूप में हुई है। अर्थात जो प्रकृति के तीनों गुणों से परे है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया है कि अत्रि वह साधक बालक है जो सम तत्व को प्राप्त प्रकृति के तीनों गुणों से परे है। देखें निम्न श्लोक-
त्रिगुणात्मक प्रकृति का वाचक "त्रि" और विष्णु का "अ" है इन दोनों में समान भक्ति रखने वाले बालक को अत्रि कहा जाता है।15।
ब्रह्मवैवर्तपुराण(ब्रह्मखणड)
अध्याय ( 22)
(अत्रि-)
टिप्पणी : जब तक हम मनोमय कोश तक सीमित रहते हैं, तब तक हमारी चेतना के तीन रूप होते हैं – भावनामय, क्रियामय और ज्ञानमय। मनोमय से ऊपर उठने पर, विज्ञानमय कोश में पहुँचने पर चेतना सिमट कर एकाकार हो जाती है। वही अ+त्रि= अत्रि है। अत्रि को सबका अत्ता (खाने वाला) भी कहा जाता है और उसकी निष्पत्ति अद् धातु से की जाती है
ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के ऋषि अत्रि व उनके पुत्र हैं। अत्रि ऋषि की प्रकृति को समझने के लिए वैदिक व पौराणिक साहित्य में विभिन्न प्रयास किए गए हैं।
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महाभारत अनुशासन पर्व ९३./८२ में अत्रि अपने नाम की निरुक्ति करते हुए कहते हैं कि जो अत्रि है, वही अत्रि है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे तुरीया अवस्था को अत्रि कह सकते हैं।
तब यह तीन से परे की अवस्था अत्रि कहलाएगी। पुराणों में अरात्रि की इस अवस्था की व्याख्या अत्रि-पत्नी अनसूया के रूप में की गई है। अनसूया अर्थात् अन्-असूर्या। अत्रि को तुरीयावस्था से सम्बन्धित करने की कल्पना की पुष्टि ऋग्वेद ५.४०.६ की ऋचा से होती है जहाँ अत्रि तुरीय ब्रह्म द्वारा राहु/स्वर्भानु से विद्ध सूर्य को प्राप्त करते हैं।
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वेदों में अत्रि को अग्नि के रूप में वर्णन किया गया है-
जो ईरानी धर्म ग्रन्थ अवेस्ता ए जैंद में अतर" नाम से है।
देखें वेदों की निम्नलिखित ऋचाऐं-
यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः।
अक्षेत्रविद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः॥५॥
स्वर्भानोरध यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन् ।
अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात्स्वर्भानोरप माया अघुक्षत् ॥८॥
यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः ।
अत्रयस्तमन्वविन्दन्नह्यन्ये अशक्नुवन् ॥९॥
(ऋग्वेद 5/4/5-6-8-9)
अनुवाद:-जब असुर स्वर्भानु के द्वारा सूर्यदेव तुम्हारे ऊपर अन्धकार फैला दिया, तब सारे लोक ऐसे दिखाई देने लगे, जैसे कोई अपने बहुत से स्वरूपों को न जानते हुए भी मोहग्रस्त हो गया हो।५।
सायण-
इन चार प्रारम्भिक ऋचाओं में अत्रि के कर्म की प्रशंसा कि गयी है।
हे सूर्य ! तुमको असुर स्वर्भानु ने अन्धकार के द्वारा आच्छादित कर दिया ( ढ़क दिया) तब सभी लोक इस प्रकार दिखाई देने लगे जैसे सभी लोग अपने स्वरूपों को न जानते हुए मूढ़ता को प्राप्त हो गये हों।५।
जब असुर स्वर्भानु के पुत्र सूर्य ने तुम्हारे ऊपर अंधकार फैला दिया, तब सारे लोक ऐसे दिखाई देने लगे, जैसे कोई अपना बहुवचन स्वरूप न जानते हुए भी मोहग्रस्त हो गया हो।'५।
विशेष:-
स्वर्भानु: राहु का एक नाम है , जो आरोही प्रवृत्ति का है, जो ग्रहण का कारण बनता है; वह कश्यप का पुत्र था, जो दानवों या असुरों की माता दनु से उत्पन्न हुआ था; एक अन्य सम्बन्धपरक रूप से उसे हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से उत्पन्न विप्रचिति का पुत्र माना जाता है।५।
जब हे इन्द्र , आप सूर्य के नीचे फैले स्वर्भानु की माया को दूर कर रहे थे , तब अत्रि ने अपनी चौथी पवित्र प्रार्थना द्वारा अन्धकार में छिपे सूर्य को खोज लिया, जिससे इन्द्र के कार्यों में बाधा उत्पन्न हो रही थी।६।
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अनुवाद:- तब यज्ञ का एक ऋत्विक जो चार वेदों का जाननेवाला और पूरे कर्म का निरीक्षण करनेवाला होता उसके रूप में ( अत्रि ) ने मणियों को जोड़कर, देवताओं की स्तुति करके, उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके, आकाश में सूर्य का नेत्र स्थापित किया; उन्होंने स्वर्भानु के मोह को नष्ट कर दिया ।८।
अनुवाद:-सूर्य को, जिसे असुर स्वर्भानु ने अन्धकार से ढक दिया था, बाद में अत्रि के पुत्रों ने पुनः प्राप्त कर लिया; अन्य कोई भी उसे मुक्त कराने में समर्थ नहीं हो सका।९।
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अत्रि ऋषि की एक निरुक्ति शतपथ ब्राह्मण १.४.५.१३ में की गई है जिसका निहितार्थ विचारणीय है। यहाँ प्रजापति द्वारा मन और वाक् के बीच मन को श्रेष्ठ घोषित करने पर वाक् के गर्भ का पतन हो जाता है जो अत्रि बनता है।
चूँकि वाक् मुख से निकलती है, अतः अत्रि को मुख से सम्बन्धित माना गया है जो सर्व प्रकार के अन्न का भक्षण करता है।
जैमिनीय ब्राह्मण २.२१९ में अत्रि व अन्य ऋषियों की प्रकृति की व्याख्या के प्रयास में कहा गया है कि अत्रि की कामना है कि उनकी प्रजा भूयिष्ठ हो। गोपथ ब्राह्मण १.२.१७ इत्यादि में उल्लेख है कि राहु द्वारा ग्रस्त सूर्य की रक्षा केवल अत्रि ही कर पाए, जिसके बदले में उन्होंने अपनी प्रजा को दक्षिणा प्राप्ति का अधिकार दिलाया।
अतः यज्ञ में सर्वप्रथम आत्रेय को हिरण्य दिया जाता है।
जैमिनीय ब्राह्मण २.२८१ के अनुसार पहले चार(अन्नमय, प्राणमय, मनोमय व विज्ञानमय कोश?) मिथुन हैं। यह बृहद् और रथन्तर (बहिर्मुखी व अन्तर्मुखी चेतना?) के दिव्य मिथुन हैं। पाँचवें हिरण्यय कोश का मिथुन नहीं होता। अत्रि की कामना है कि यह चार कोश में वीर्य बन जाएं। वही वीर्य है जो आत्मा के वीर्य के अनुदिश वीर्य है।
ऋग्वेद ५.४० में अत्रि द्वारा राहु/स्वर्भानु से विद्ध( आच्छादित) सूर्य की रक्षा करने का उल्लेख है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इस आख्यान का सार्वत्रिक उल्लेख है( जैमिनीय ब्राह्मण १.८०, शतपथ ब्राह्मण ४.३.४.२१, ताण्ड्य ब्राह्मण ६.६.८ व १४.११.१५ इत्यादि)। इस आख्यान में अत्रि द्वारा सूर्य से तम( अन्धकार) का अपाहन (निवारण) करने पर प्रथम बार कृष्णा अवि , दूसरी बार धूम्रा अवि और तीसरी बार फल्गु अवि की उत्पत्ति हुई। ताण्ड्य ब्राह्मण १४.११.१५ के अनुसार यज्ञ में जिन दिनों को छन्दोम कहा जाता है, वही तम का रूप हैं। यहां जिस अवि का उल्लेख है, उसकी व्याख्या उपनिषदों में अविमुक्त/वाराणसी के रूप में की गई है। जाबालोपनिषद २ व ५ तथा रामोत्तरतापिन्युपनिषद ३.१ में उल्लेख है कि अत्रि ने याज्ञवल्क्य से अनन्त, अव्यक्त, परिपूर्णानन्द आत्मा को जानने का उपाय पूछा। याज्ञवल्क्य ने उन्हें उत्तर के रूप में अविमुक्त क्षेत्र की महिमा के रूप में असि और वरणा नदियों के बीच भ्रूमध्य में स्थिति वाराणसी की महिमा बताई।
ऋग्वेद १.११६.८ इत्यादि में असुरों द्वारा ऋबीस? में बद्ध अत्रि की अश्विनौ द्वारा रक्षा करने का उल्लेख है। ऋग्वेद १.११२.७, १.११८.७ तथा १.१८०.४ इत्यादि के उल्लेख के अनुसार अत्रि जिस घर्म से परितप्त हो रहे थे, अश्विनौ ने उस घर्म को ओमान, मधुमान् बना दिया, अथवा उसे शीतल बना दिया(घर्म का एक रूप मनुष्य के अन्दर सर्वदा सुनाई देने वाली घॄं प्रकार की ध्वनि है। यह ओम का रूप बन जाए, यही अभीष्ट है।
ऋग्वेद की ५.७.८ इत्यादि कईं ऋचाओं में अग्नि से अत्रिवत् होकर आने की कामना की गई है। जैसे अत्रि सब कुछ भक्षण कर जाते हैं, वैसे ही अग्नि भी सब कुछ भक्षण कर जाती है।
ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता में अत्रि शब्द अतर के रूप में -अग्नि का वाचक है ।
जो वैदिक ऋचाओं में उद्धृत अत्रि अंगि है और वशिष्ठ का सहवर्ती है।।
वशिष्ठ को ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता में "वहिश्त" तथा अंगिरा को 'अंग्र' और यम को यिम कहा गय है।
ब्रह्माण्ड पुराण में अत्रि की वंशावली ब्राह्मणों की वंशावली के रूप में वर्णित है।
परन्तु अनुसूया नामक उनकी पत्नी का पता ही है
अनुसूया के माता पिता प्रजापति कर्दम और देवहूति थे। जबकि अत्रि की दश पत्नीयाँ घृताक्षी अप्सरा और भद्राश्व गन्धर्व की कन्याऐं हैं। जैसा निम्नलिखित श्लोकों में उनका वर्णन है। अत्रि की मद्रा नाम की पत्नी से सोम उत्पन्न हुआ है। जो अत्रि की एक पत्नी अनुसूया से भिन्न है।
अध्याय- (8) अत्रि का वंश- ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद-
अत्रि का वंश- ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद-
उन प्रभाकर अत्रि ने मद्रा नामक पत्नी से प्रसिद्ध पुत्र सोम (चन्द्रमा) को जन्म दिया। जब सूर्य पर स्वर्भानु ( राहु ) का प्रहार हुआ, जब वह सूर्य स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर रहा था।77।
और जब यह संसार अंधकार से घिर गया, तब उन्हीं (अर्थात् अत्रि) के द्वारा ही प्रकाश (प्रभा) उत्पन्न हुआ। डूबते हुए सूरज को भी कहा गया “तुम्हारा कल्याण हो।78।
ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य न पपात दिवो महीम् ।
अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः॥ २/८/७९॥
"अनुवाद:-
उस ब्राह्मण ऋषि के कथन के कारण, वह (सूर्य) स्वर्ग से पृथ्वी पर नहीं गिरा। जिनके द्वारा गोत्रों में श्रेष्ठ गोत्र अत्रि का प्रारम्भ हुआ।79।
यज्ञेष्वनिधनं चैव सुरैर्यस्य प्रवर्तितम् ।
स तासु जनयामास पुत्रानात्मसमानकान् ॥ २/८/८० ॥
"अनुवाद:-
उन्होंने ही यज्ञ के दौरान सुरों की मृत्यु का निवारण किया । उन्होंने उन प्रभाकर अत्रि ने (दस अप्सराओं) से अपने समान अनेक पुत्र उत्पन्न किए।८०।
उनमें दो बहुत प्रसिद्ध थे। वे ब्रह्मज्ञान में बहुत रुचि रखते थे और महान आध्यात्मिक शक्ति वाले थे। दत्त को सबसे बड़ा माना जाता है, दुर्वासा उनके छोटे भाई थे। ८२।
यवीयसी सुता तेषामबला ब्रह्मवादिनी ।
अत्राप्युदाहरन्तीमं श्लोकं पौराणिकाः पुरा ॥ २/८/८३॥
"अनुवाद:-
सबसे छोटी एक पुत्री थी जिसने ब्रह्मज्ञान की व्याख्या की थी। इस सन्दर्भ में पुराणों के जानकार लोग इस श्लोक का हवाला देते हैं।८३।
विशेष:-दुर्वासा और दत्तात्रेय अत्रि की बड़ी पत्नी भद्रा से उत्पन्न. हुए थे ।जबकि सोम अत्रि की मद्रा नामक पत्नी से हुए थे यहाँ अनुसूया की किसी सन्तान का वर्णन नहीं है। ....
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शिव के एक हजार नामों में अत्रि भी
उनका एक नाम है और चन्द्रमा उनके शिखर पर सुशोभित होने से चन्द्रमा
को अत्रि से उत्पन्न करने की कल्पना की गयी।
परन्तु चन्द्रमा विराट् पुरुष विष्णु के मन से उत्पन्न हुआ है अत: चन्द्रमा भी वैष्णव है। सभी गोप जो विष्णु के शरीर के रोमकूपों से उत्पन्न हैं। वह तो वैष्णव हैं ही ।
उपर्युक्त श्लोकों में कहीं भी अत्रि की पत्नी अनसूया का कहींं वर्णन नहीं है।
अनुसूय कर्दम और देवहूति की पुत्री है।
ब्रह्माण्ड पुराण में अत्रि की पत्नी के रूप में अनुसूया का कोई वर्णन नहीं है।
अत: ये कथाऐं अनुसूया वाली बाद में जोड़ी गयी।
नीचे पुरुष सूक्त से दो ऋचाऐं उद्धृत हैं। जो चन्द्रमा की उत्पत्ति का निर्देशन करती हैं।
आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुखोंवाले और अपने तेजसे संसार को संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।
बुध की चन्द्रमा से उत्पत्ति भी पूर्णत: कुछ पुराणों में काल्पनिक थ्योरी पर आधारित है जो बाद में जोड़ी गयी है।
जिसे उन्ही के थ्योरी के रूप में उद्धृत करते हैं।
पुराणों में एक काल्पनिक कहानी बनाकर जोड़ी गयी ---"चन्द्रमा के गुरु थे देवगुरु बृहस्पति। बृहस्पति की पत्नी तारा चन्द्रमा की सुन्दरता पर मोहित होकर उनसे प्रेम करने लगी।
तदोपरान्त वह चन्द्रमा के संग सहवास भी कर गई एवं बृहस्पति को छोड़ ही दिया।
बृहस्पति के वापस बुलाने पर उसने वापस आने से मना कर दिया, जिससे बृहस्पति क्रोधित हो उठे तब बृहस्पति एवं उनके शिष्य चन्द्र के बीच युद्ध आरम्भ हो गया।
इस युद्ध में असुर गुरु शुक्राचार्य चंद्रमा की ओर हो गये और अन्य देवता बृहस्पति के साथ हो लिये। अब युद्ध बड़े स्तर पर होने लगा।
क्योंकि यह युद्ध तारा की कामना से हुआ था, अतः यह तारकाम्यम कहलाया।
इस वृहत स्तरीय युद्ध से सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा को भय हुआ कि ये कहीं पूरी सृष्टि को ही नष्ट न हो जाए, तो वे बीच बचाव कर इस युद्ध को रुकवाने का प्रयोजन करने लगे।
उन्होंने तारा को समझा-बुझा कर चन्द्र से वापस लिया और बृहस्पति को सौंपा।
इस बीच तारा के एक सुन्दर पुत्र जन्मा जो बुध कहलाया।
चन्द्र और बृहस्पति दोनों ही इसे अपना बताने लगे और स्वयं को इसका पिता बताने लगे यद्यपि तारा चुप ही रही।
माता की चुप्पी से अशांत व क्रोधित होकर स्वयं बुध ने माता से सत्य बताने को कहा। तब तारा ने बुध का पिता चन्द्रमा को बताया।
समीक्षा- उपर्युक्त पौराणिक मत पूर्णत: असंगत व काल्पनिक है।
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"दूसरा पौराणिक मत-
दूसरे मत से तारा बृहस्पति की पत्नी थी। चंद्र उनके सौंदर्य से मोहित होकर विवाह प्रस्ताव दिया तो तारा ने उसे ठुकरा दिया। इससे चंद्र क्रोधित हो परे और बलपूर्वक उनका बलात्कार किया। इस बलात्कार के कारण तारा गर्भवती हुई और बुध का जन्म हुआ।
समीक्षा- दूसरा मत भी पूर्णत: काल्पनिक है। क्योंकि सत्य सदैव एक रूप होता है । उसमें कोई विकल्प नहीं होता परन्तु असत्य अनेक विकल्पों वाला बहुरूपिया होता है।
निष्कर्ष- चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जो बुध ग्रह से बहुत छोटा है।
इस चन्द्रमा का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 1.2% है और इसका व्यास 3,474 किमी (2,159 मील) है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग एक-चौथाई है
बुध का व्यास चन्द्रमा के व्यास से लगभग 40% अधिक है। बुध का व्यास 4,879 किलोमीटर है, जबकि चंद्रमा का व्यास 3,475 किलोमीटर है.
अर्थात 1,404 किलोमीटर व्यास बुध का ज्यादा होने से भी वह बुध चन्द्रमा से बड़ा है।
अत: चन्द्रमा से बुध की उत्पत्ति भी सम्भव नहीं है। क्योंकि छोटी वस्तु जिसका घनत्व और भार कम है उससे अधिक घनत्व और भार की वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती है।
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"अब इला की काल्पनिक सिद्धान्त हीन थ्योरी भी सुने
जो उसे सैद्धान्तिक रूप से इला को बुध की पत्नी नहीं बनाती हैं क्योंकि गर्भवास की पूर्ण अवधि नौ महीने होती है । और नौ महीनों तक इला का स्त्री बने रहना सम्भव नहीं- क्यों कि उन्हें एक महीना स्त्री और एक महीना पुरुष होना पड़ता है। *********************
इस प्रकार उनका न तो स्त्रीत्व ही सुरक्षित है और न पुरुषत्व ही ।
पुराणों के इसी आख्यान को हम निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत करते हैं जो मनगड़न्त है।
-श्रीमद्भागवत महापुराण (भागवत पुराण) से
वैवस्वत मनु के पुत्र राजा सुद्युन की कथा
अध्याय एक – राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना (9.1)
1 राजा परीक्षित ने कहा: हे प्रभु श्रील शुकदेव गोस्वामी, आप विभिन्न मनुओं से सारे कालों का विस्तार से वर्णन कर चुके हैं और उनमें असीम शक्तिमान पूर्ण भगवान के अद्भुत कार्यकलापों का भी वर्णन कर चुके हैं। मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने आपसे ये सारी बातें सुनीं।
2-3 द्रविड़ देश के साधु सदृश राजा सत्यव्रत को भगवतकृपा से गत कल्प के अन्त में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ और वह अगले मन्वन्तर में विवस्वान का पुत्र वैवस्वत मनु बना। मुझे इसका ज्ञान आपसे प्राप्त हुआ है। मैंने यह भी जाना कि इक्ष्वाकु इत्यादि राजा उसके पुत्र थे, जैसा कि आप पहले बतला चुके हैं।
4 हे परम भाग्यशाली श्रील शुकदेव गोस्वामी, हे महान ब्राह्मण, कृपा करके हमको उन सारे राजाओं के वंशों तथा गुणों का पृथक-पृथक वर्णन कीजिये, क्योंकि हम आपसे ऐसे विषयों को सुनने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।
5 कृपा करके हमें वैवस्वत मनु के वंश में उत्पन्न उन समस्त विख्यात राजाओं के पराक्रम के विषय में बतलायें जो पहले हो चुके हैं, जो भविष्य में होंगे तथा जो इस समय विद्यमान हैं।
6 सूत गोस्वामी ने कहा: जब वैदिक ज्ञान के पण्डितों की सभा में सर्वश्रेष्ठ धर्मज्ञ श्रील शुकदेव गोस्वामी से महाराज परीक्षित ने इस प्रकार से प्रार्थना की, तो वे इस प्रकार बोले।
7 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजा, अब तुम मुझसे मनु के वंश के विषय में विस्तार से सुनो। मैं यथासम्भव तुम्हें बतलाऊँगा, यद्यपि सौ वर्षों में भी उसके विषय में पूरी तरह नहीं बतलाया जा सकता।
8 जीवन की उच्च तथा निम्न अवस्थाओं में पाये जाने वाले जीवों के परमात्मा दिव्य परम पुरुष कल्प के अन्त में विद्यमान थे, जब न तो यह ब्रह्माण्ड था, न अन्य कुछ था। तब केवल वे ही विद्यमान थे।
9 हे राजा परीक्षित, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की नाभि से एक सुनहला कमल उत्पन्न हुआ, जिस पर चार मुखों वाले ब्रह्माजी ने जन्म लिया।
10 ब्रह्माजी के मन से मरीचि ने जन्म लिया। दक्ष महाराज की कन्या और मरीचि के संयोग से कश्यप प्रकट हुए। कश्यप द्वारा अदिति के गर्भ से विवस्वान ने जन्म लिया।
11-12 हे भारतवंश के श्रेष्ठ राजा, संज्ञा के गर्भ से विवस्वान को श्राद्धदेव मनु प्राप्त हुए। श्राद्धदेव मनु ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था। उन्हें अपनी पत्नी श्रद्धा के गर्भ से दस पुत्र प्राप्त हुए। इन पुत्रों के नाम थे – इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करुषक, पृषध्र, नभग तथा कवि।
13 आरम्भ में मनु को एक भी पुत्र नहीं था। अतएव आध्यात्मिक ज्ञान में अत्यन्त शक्ति सम्पन्न महर्षि वसिष्ठ ने (उसको पुत्र प्राप्ति के लिए) मित्र तथा वरुण देवताओं को प्रसन्न करने के लिए एक यज्ञ सम्पन्न किया।
14 उस यज्ञ के दौरान मनु की पत्नी श्रद्धा, जो केवल दूध पीकर जीवित रहने का व्रत कर रही थी, यज्ञ करने वाले पुरोहित के निकट गई, उन्हें प्रणाम किया और उनसे एक पुत्री की याचना की।
15 प्रधान पुरोहित द्वारा यह कहे जाने पर "अब आहुति डालो" आहुति डालने वाले (होता) ने आहुति डालने के लिए घी लिया। तब उसे मनु की पत्नी की याचना स्मरण हो आई और उसने वषट् शब्दोच्चार करते हुए यज्ञ सम्पन्न किया।
16 मनु ने वह यज्ञ पुत्र प्राप्ति के लिए प्रारम्भ किया था, किन्तु मनु की पत्नी के अनुरोध पर पुरोहित के विपथ होने से इला नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। इस पुत्री को देखकर मनु अधिक प्रसन्न नहीं हुए। अतएव वे अपने गुरु वसिष्ठ से इस प्रकार बोले।
17 हे प्रभु, आप लोग वैदिक मन्त्रों के उच्चारण में पटु हैं। तो फिर वाँछित फल से विपरीत फल क्यों निकला? यही मेरे लिए शोक का विषय है। वैदिक मन्त्रों का ऐसा उल्टा प्रभाव नहीं होना चाहिए था।
18 आप सभी संयमित, मन से संतुलित तथा परम सत्य से परिचित हो। आप सबने अपनी तपस्याओं के द्वारा सारे भौतिक कल्मषों से अपने आप को पूरी तरह स्वच्छ कर लिया है। आप सबके वचन देवताओं के वचनों की तरह कभी मिथ्या नहीं होते। तो फिर यह कैसे सम्भव हुआ कि आप सबका संकल्प विफल हो गया?
19 मनु के इन वचनों को सुनकर अत्यन्त शक्तिसम्पन्न प्रपितामह वसिष्ठ पुरोहित की त्रुटि को समझ गए। अतः वे सूर्यपुत्र से इस प्रकार बोले।
20 तुम्हारे पुरोहित द्वारा मूल उद्देश्य में विचलन के कारण लक्ष्य में यह त्रुटि हुई है। फिर भी मैं अपने पराक्रम से तुम्हें एक अच्छा पुत्र प्रदान करूँगा।
21 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजा परीक्षित, अत्यन्त सुविख्यात एवं शक्तिसम्पन्न वसिष्ठ ने यह निर्णय लेने के बाद, परम पुरुष भगवान विष्णु से इला को पुरुष में परिणत करने के लिए प्रार्थना की।
22 परम नियन्ता परमेश्वर ने वसिष्ठ से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वरदान दिया। इस तरह इला सुद्युम्न नामक एक सुन्दर पुरुष में परिणत हो गई।
23-24 हे राजा परीक्षित, एक बार वीर सुद्युम्न अपने कुछ मंत्रियों और साथियों के साथ, सिंधुप्रदेश से लाये गये घोड़े पर सवार होकर शिकार करने जंगल में गया। वह कवच पहने था और धनुष-बाण से सुसज्जित था। वह अत्यन्त सुन्दर था। वह पशुओं का पीछा करते हुए तथा उनको मारते हुए जंगल के उत्तरी भाग में पहुँच गया।
25 वहाँ उत्तर में मेरु पर्वत की तलहटी में सुकुमार नामक एक वन है जहाँ शिवजी सदैव उमा के साथ आनन्द-विहार करते हैं। सुद्युम्न उस वन में प्रविष्ट हुआ।
26 हे राजा परीक्षित, ज्योंही अपने शत्रुओं को दमन करने में निपुण सुद्युम्न उस जंगल में प्रविष्ट हुआ, त्योंही उसने देखा कि वह एक स्त्री में और उसका घोड़ा एक घोड़ी में परिणत हो गये हैं।
27 जब उसके साथियों ने भी अपने स्वरूपों एवं अपने लिंग को विपरीत लिंग में परिणत हुआ देखा, तो वे सभी अत्यन्त खिन्न हो गये और एक दूसरे की ओर देखते रह गये।
28 महाराज परीक्षित ने कहा: हे सर्वश्रेष्ठ शक्तिसम्पन्न ब्राह्मण, यह स्थान इतना शक्तिशाली क्यों था और किसने इसे इतना शक्तिशाली बनाया था? कृपा करके इस प्रश्न का उत्तर दीजिये, क्योंकि मैं इसके विषय में जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।
29 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: एक बार आध्यात्मिक अनुष्ठानों का दृढ़ता से पालन करने वाले महान साधु पुरुष उस जंगल में शिवजी का दर्शन करने आए। उनके तेज से समस्त दिशाओं का सारा अंधकार दूर हो गया।
30-31 जब देवी अम्बिका ने इन महान साधु पुरुषों को देखा, तो वे अत्यधिक लज्जित हुईं। साधु पुरुषों ने देखा कि गौरीशंकर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिए वे वहाँ से लौट गए और नर-नारायण आश्रम की ओर चल पड़े।
32 तत्पश्चात अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए शिवजी ने कहा, “कोई भी पुरुष इस स्थान में प्रवेश करते ही तुरन्त स्त्री बन जाएगा।”
33 उस समय से कोई भी पुरुष ने उस जंगल में प्रवेश नहीं किया था। किन्तु अब राजा सुद्युम्न स्त्री रूप में परिणत होकर अपने साथियों समेत एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमने लगा।
34 सुद्युम्न सर्वोत्तम सुन्दर स्त्री रूप में परिणत कर दिया गया था और वह अन्य स्त्रियों से घिरी हुई थी। चन्द्रमा के पुत्र बुध को इस सुन्दरी को अपने आश्रम के निकट विचरण करते देखकर उसके साथ भोग करने की चाहत हुई।
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35 उस सुन्दर स्त्री ने भी चन्द्रमा के राजकुमार बुध को अपना पति बनाना चाहा। इस तरह बुध ने उसके गर्भ से पुरूरवा नामक एक पुत्र प्राप्त किया।
36 मैंने विश्वस्त सूत्रों से सुना है कि मनु-पुत्र सुद्युम्न ने इस प्रकार स्त्रीत्व प्राप्त करके अपने कुलगुरु वसिष्ठ का स्मरण किया।
37 सुद्युम्न की इस शोचनीय स्थिति को देखकर वसिष्ठ अत्यधिक दुखी हुए। उन्होंने सुद्युम्न को उसका पुरुषत्व वापस दिलाने की इच्छा से फिर से शिवजी की पूजा प्रारम्भ कर दी।
38-39 हे राजा परीक्षित, शिवजी वसिष्ठ पर प्रसन्न हुए। अतएव शिवजी ने उन्हें संतुष्ट करने तथा पार्वती को दिये गये अपने वचन को रखने के उद्देश्य से उस सन्त पुरुष से कहा, “
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आपका शिष्य सुद्युम्न एक मास तक नर रहेगा और दूसरे मास नारी होगा। इस तरह वह इच्छानुसार जगत पर शासन कर सकेगा।
40- इस प्रकार गुरु की कृपा पाकर शिवजी के वचनों के अनुसार सुद्युम्न को प्रत्येक दूसरे मास में उसका इच्छित पुरुषत्व फिर से प्राप्त हो जाता था और इस तरह उसने राज्य पर शासन चलाया, यद्यपि नागरिक इससे संतुष्ट नहीं थे।
तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुः धर्मवत्सलाः ॥ ४१॥
41 हे राजन, सुद्युम्न के तीन अत्यन्त पवित्र पुत्र हुए जिनके नाम थे उत्कल, गय तथा विमल, जो दक्षिणा-पथ के राजा बने।
वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड (87)वें सर्ग- में इल नामक राजा का वर्णन है जो कर्दम ऋषि की सन्तान है।कि अन्य पुराणों में इला इक्ष्वाकु मनु की पुत्री है। जो एक मास पुरुषत्व और एक मास स्त्रीत्व को प्राप्त होती है।
अत: एक रूप इन होने से ये कथाऐं प्रक्षिप्त ही हैं।
श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापतेः । पुत्रो बाह्लीश्वरः श्रीमानिलो नाम महाशयाः ।। ७.८७.३ ।।
एवं स राजा पुरुषो मासं भूत्वाथ कार्दमिः । त्रैलोक्यसुन्दरी नारी मासमेकमिलाऽभवत् ।। ७.८७.२९ ।।
भागवत पुराण के नवम स्कन्ध के प्रथम अध्याय में वर्णन है कि
( पुरूरवा का गोप रूप में वर्णन-)
ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥४२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे प्रथमोध्याऽयः ॥१॥
तत्पश्चात, समय आने पर जब जगत का राजा सुद्युम्न( इल) काफी वृद्ध हो गया, तो उसने अपना गो-समुदाय अपने पुत्र पुरूरवा को सौंपकर और स्वयं जंगल में प्रस्थान किया।४२।
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परावरेषां भूतानां आत्मा यः पुरुषः परः।
स एवासीद् इदं विश्वं कल्पान्ते अन्यत् न किञ्चन ॥८॥
8 जीवन की उच्च तथा निम्न अवस्थाओं में पाये जाने वाले जीवों के परमात्मा दिव्य परम पुरुष कल्प के अन्त में विद्यमान थे, जब न तो यह ब्रह्माण्ड था, न अन्य कुछ था। तब केवल वे ही विद्यमान थे।
9 हे राजा परीक्षित, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की नाभि से एक सुनहला कमल उत्पन्न हुआ, जिस पर चार मुखों वाले ब्रह्माजी ने जन्म लिया।
ब्रह्माजी के मनसे मरीचि और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपत्नी दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ॥ 10।
इला शब्द के वैदिक अर्थ हैं।
इला - पृथ्वी । बुद्धिमती स्त्री । गाय। वाणी- (काव्यत्व शक्ति)। आदि-