गुरुवार, 27 अगस्त 2026

आरक्षण के प्रतिमान-

सैद्धान्तिक व विश्लेषणात्मक ऑडियो स्क्रिप्ट

(साउंड डिज़ाइन: पृष्ठभूमि में एक गंभीर और विचारोत्तेजक (thought-provoking) वाद्य यंत्र की हल्की धुन बजती है, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।)

भाग 1: प्रस्तावना - समानता और मूल्यांकन की आवश्यकता

  • वॉयसओवर (VO): "इस देश में व्यवस्था और न्याय के पैमानों पर एक नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। चाहे बात संवैधानिक प्रावधानों की हो या सामाजिक और धार्मिक संरचनाओं की—यह देखना अनिवार्य है कि क्या सभी मनुष्य समान धरातल पर खड़े हैं? समय आ गया है कि व्यवस्थाओं का मूल्यांकन नए दृष्टिकोण से किया जाए।"

भाग 2: व्यक्तित्व, परिवेश और विशेषाधिकार

  • वॉयसओवर (VO): "हर व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसका दायरा उसके परिवेश और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से तय होता है। लेकिन जो लोग संवैधानिक आरक्षण का पुरजोर विरोध करते हैं, उन्हें अपनी सामाजिक और जातीय उच्चता के पारंपरिक विशेषाधिकारों का भी निष्पक्ष आत्मविश्लेषण करना चाहिए। क्या जन्मजात श्रेष्ठता के वे दावे आज भी प्रासंगिक हैं जो सदियों से समाज में असमानता पैदा करते आए हैं?"

भाग 3: धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं पर सवाल

  • वॉयसओवर (VO): "विचारणीय यह भी है कि सदियों से मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं और सांस्कृतिक केंद्रों पर एकाधिकार और वहां प्राप्त होने वाले दान व चढ़ावे के अधिकार को बिना किसी योग्यता के एक वर्ग विशेष से जोड़ना कहाँ तक न्यायसंगत है? यदि हम योग्यता और समानता की बात करते हैं, तो इसकी शुरुआत हर स्तर पर होनी चाहिए।"

भाग 4: निष्कर्ष - साधना, सत्कर्म और वास्तविक पात्रता

  • वॉयसओवर (VO): "सत्य यह है कि साधना, सत्कर्म, और क्षमता के आधार पर ही व्यक्ति अपने अनुकूल पद और सम्मान का वास्तविक अधिकार प्राप्त करता है। जन्म से कोई भी व्यक्ति किसी पद या श्रेष्ठता का पात्र नहीं होता। योग्यता और श्रम ही मनुष्य की असली पहचान तय करते हैं।"

(साउंड डिज़ाइन: संगीत का प्रभाव गहरा होता है और अंत में एक शांत ठहराव के साथ समाप्त होता है।)

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

कब्बाली-

कव्वाली: "जीवन की नैया और प्रभु का सहारा"

  • मुख्य गायक (लीड सिंगर): उस्ताद / मुख्य फनकार
  • कोरस (साथी गायक): "वा वाह!..." और हर मुखड़े को दोहराने के लिए।
  • ساز (संगीत): ढोलक, हारमोनियम, और तालियों की गूँज।

1. आहिस्ता-आहिस्ता / आमद (Aamad & Alap)

(संगीत की धीमी और गहरी धुन बजती है। मुख्य गायक दर्द भरे स्वर में अलाप लेता है...)

मुख्य गायक:

नैया पुरानी... भँवर बेहिसाब है !

ऐ जिंदगी, ये कायनाती अजाव हैं। ...

डूबने को है कश्ती, मगर क्या मजाल है...

कोई थामने वाला पतवार परमानुभाव है!

2. महफिल की शुरुआत (Introductory Couplet / Sher)

(हारमोनियम पर तेज सुर और तबले की थाप के साथ)

अन्तरा-(​मुख्य गायक:)

हवाओं का रुख बदल रहा है, पर मेरा यकीन नहीं डगमगाया! 

जुल्म जमाने में  हैं कायनात में जुल्मतों का साया !!

ज़रा गौर फरमाइगा इस शेर पर...

तुफानों की ज़िद है जहाँ आंधियां चलें,

हमारा भी ये फैसला है कि कश्तीयों में  दीपक जले !

​आइए, इस दिल की दास्तां को सुरों में पिरोते हैं!

3. स्थाई (Main Refrain)

(पूरी कव्वाली पार्टी मिलकर ऊंचे स्वर में गाती है, ढोलक की तेज थाप के साथ)

कोरस + मुख्य गायक:

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में आरोहि अथाह पानी!

तूफानों का वेग प्रबल है, लहरों की है तेज़ रवानी...

सुन लो इस जीवन की कहानी!

(संगीत का एक छोटा और तेज़ अंतरा — ताली की थाप के साथ)

4. अंतरा 1 (अंधेरा और नादानी)

(गायक थोड़ा संभलकर, दर्द और तड़प के साथ)

मुख्य गायक:

उठ रही काली घटाऐं, तेज चलती ये हवाऐं...

हर तरफ है अब अंधेरा, हम जाएं तो किधर जाएं?

अरे भंवर के बीच में कश्ती है...

खेवटिया है नादानी, और कभी मंजिल नहीं जानी!

(कोरस इसे दोहराता है)

कोरस: गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी...

5. अंतरा 2 (संसार का मायाजाल)

(लय थोड़ी तेज और संवादात्मक होती है — दर्शकों को समझाते हुए)

मुख्य गायक:

ज़रा सोचिए दोस्तों! ये दुनिया क्या है?

संसार की नदिया अजब, इच्छा लहरों का काफ़िला है...

अरे बुलबुलों सी जिंदगी ये, पानी में पानी मिला है!

यहाँ सब छलावा है...

मोह के भँबर लोभ के गोते, मृत्यु पथ की है निशानी!

(पूरी पार्टी जोश के साथ दोहराती है)

कोरस: गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी...

6. कव्वाली का मुख्य मोड़: रंग / पुकार (The Climax / Tarannum)

(यहाँ संगीत बिल्कुल धीमा हो जाता है, सिर्फ हारमोनियम की हल्की गूँज और फुसफुसाहट जैसा स्वर रहता है)

मुख्य गायक:

थक गए हाथ, टूट गए पतवार... अब जाएं तो कहाँ जाएं?

तभी याद आता है वो बंसीवाला!

ज़रा तड़प के साथ सुनिएगा...

दु:ख सुख यहाँ जीवन के किनारे,

नाव पड़ी मेरी है मझधारे!

भक्ति के लेकर पतवारे,

ये भक्त प्रभु तुझको ही पुकारे...

खबर लेलो वंशी वारे!!

(यहाँ ढोलक की एक जोरदार थाप लगती है और माहौल भक्तिमय हो जाता है)

मुख्य गायक (ऊंचे सुर में):

थक जाएं हम कभी न हारें, सदियों से तेरी बाट निहारें!

खिंजा-फिजा सब आनी-जानी...


7. महा-अंतिम समापन (Grand Finale)

(सभी कलाकार पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ मिलकर इस अंतिम पंक्ति को गाते हैं, तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कव्वाली समाप्त होती है)

कोरस + मुख्य गायक (एक स्वर में):

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी!

तूफानों का वेग प्रबल है, लहरों की है तेज़ रवानी...

सुन लो इस जीवन की कहानी!!

सुन लो... इस जीवन की... कहानी!!!

(ढोलक की लंबी रोल और अंतिम तीव्र थाप के साथ अंत)


सोमवार, 24 अगस्त 2026

गीत


​[स्थाई]

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी

​[अंतरा 1] 

उठ रही काली घटाऐं, तेज चलती ये हवाऐं।
हर तरफ है अब अंधेरा, हम जाएं तो किधर जाऐं।
खेवटिया है नादानी, और कभी मंजिल नहीं जानी।
गहरी नदीयाँ नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी।

​[अंतरा 2]

संसार की नदिया अजब,  इच्छा लहरों का काफ़िला है। बुलबुलों सी जिन्दगी ये, पानी में पानी मिला है। 
मोह के भँबर लोभ के गोते मृत्यु पथ की निशानी
गहरी नदीयाँ  नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी

​[अंतरा 3]

दु:ख सुख यहाँ जीवन के किनारे , नाव पड़ी  मेरी है मझधारे । भक्ति के लेकर पतवारे! ये भक्त प्रभु  तुझको ही पुकारे ! खबर लेलो वंशी वारे।।  
थक जाएं हम कभी न हारें। सदियों से तेरी बाट निहारें। खिंजा फिजा सब आनी जानी।

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी


शनिवार, 22 अगस्त 2026

​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)
यह नग़मा यादव योगेश कुमार रोही के दिल की सदा है, उनके ख़यालात की इबारत।"
​मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)

​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!

​(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)

​बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)

​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?
रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?
अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है।
 ​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

​बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)

​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?
मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?
हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!
ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?
समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?
​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)

इस कब्बाली का ध्रुपद शैली में गायन करें
ऑडियो जनरेट करें !


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" 

मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)

अलीगढ़ जिले के आजादपुर गाँव से यादव योगेश कुमार रोहि की एक रुहानी पेशकश !

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!

(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)

बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)

​सुनसान राहों के मुसाफ़िर, ये कैसी तेरी गफ़लत है?

अज्ञान के इस अंधियारे में, लिपटा हुआ तेरा कुल मत है!

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस छाया है?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी सारा जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)

​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?

मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?

हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!

ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?

समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)

​मोम से नाज़ुक ये सब बंधन, क्यों जकड़ रहे तेरा मन हैं?

कभी महकती रंग-बिरंगी तितलियाँ, कभी बिजली और तूफ़ान हैं!

लब पर तलब और दिल में मतलब, तू किसके पीछे दीवाना है?

तेरी हयातों के जिम्मे सब, ये बोझ तुझे ही उठाना है।

यों हँसी-खेल में नहीं समय बिताना है!

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)

​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!

तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!

संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।

इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से​मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से लिए गए राजा ययाति के इन पवित्र श्लोकों पर चिन्तन आवश्यक है। 

न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १४ ॥

  • अनुवाद: विषयों के भोगने से भोग-वासना कभी शांत नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोग-वासनाएँ भी भोगों से और अधिक प्रबल हो जाती हैं।
  • यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥ १५ ॥

    • अनुवाद: जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष (द्वंद्व भाव )  नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है। फिर उसे ऋणात्मक और धनात्मक आवेश प्रभावित नहीं करते ।
    • या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः जीर्यतो या न जीर्यते ।

      तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥ १६ ॥

      • अनुवाद: विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से उसका त्याग कर पाते हैं। मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही बनी रहती है। अतः जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए।
      • मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ १७ ॥

        • अनुवाद: और तो क्या—अपनी माता, बहन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि इंद्रियाँ इतनी आवेशयुकत बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं (विचलित कर देती हैं)।

नारी की छाँई परे, अन्धे होत भुजंग।

यह इस दोहे और आपकी व्याख्या पर आधारित एक गम्भीर और दार्शनिक ऑडियो स्क्रिप्ट है। इसे आप अपनी वीडियो प्रस्तुति के लिए उपयोग कर सकते हैं:


​ऑडियो स्क्रिप्ट
​(संगीत: बैकग्राउंड में एक गम्भीर, मंद और शास्त्रीय भारतीय वाद्ययंत्र (जैसे कि सारंगी या बांसुरी) की धीमी धुन, जो एक गहन दार्शनिक वातावरण बनाए।)
​वॉइसओवर (धीमी और प्रभावशाली आवाज़ में): कबीर के सिद्धान्तों के जानकार यादव योगेश कुमार रोहि कबीर की एक साखी की व्याख्या विज्ञान सम्मत विधि से करते हैं।-
​"गौर से सुनिए इस दोहे को—
नारी की छाँई परे, अन्धे होत भुजंग।
कबिरा जिनकी कौन गति, जो नित नारी संग ?
​कबीर की दृष्टि यहाँ अत्यंत तीक्ष्ण है। वे कहते हैं कि विलासनी स्त्रियों का प्रभाव इतना गहरा है कि उसकी छाया मात्र पड़ने से जो व्यक्ति अन्धा है 'वह भी विषैले सर्प की भाँति होकर हरकतें करने लगता है।  लेकिन, कबीर का कटाक्ष गहरा है—वे प्रश्न पूछते हैं कि उन लोगों की मानसिक  गति क्या होगी, जो हर क्षण केवल स्त्रियों के संग में डूबे रहते हैं?"
​(थोड़ा अंतराल—संगीत की लय थोड़ी और गम्भीर होती है)
​"इसे विज्ञान के एक सिद्धांत से समझिए—दो विपरीत आवेशीय तत्व, यानी धनात्मक और ऋणात्मक तत्व जब परस्पर मिलते हैं, तो उनमें एक स्वाभाविक 'आकर्षण' या प्रतिक्रिया होती है। भौतिकी में इसे विद्युत उत्पादन कहा जा सकता है, किन्तु मानवीय संबंधों के संदर्भ में, जब यह आकर्षण केवल वासना के धरातल पर हो, तो यह अनुक्रिया नहीं, बल्कि एक 'फॉल्ट' की तरह प्रतिक्रिया करता है।

​प्रकृति का यह नियम है कि समान आयु और विपरीत लिंगीयों पर घटित होता है। कबीर की यह चेतावनी उसी 'फॉल्ट' की ओर संकेत है, जहाँ मनुष्य अपना विवेक खोकर उसी अंधकार में विलीन हो जाता है, जिसे वे 'भुजंग' की प्रवृत्ति कहते हैं।"

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से लिए गए राजा ययाति के चिन्तन से सम्बन्धित इन पवित्र श्लोकों पर चिन्तन आवश्यक है। 

न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १४ ॥

  • : विषयों के भोगने से भोग-वासना कभी शांत नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोग-वासनाएँ भी भोगों से और अधिक प्रबल हो जाती हैं।
  • यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥ १५ ॥
  • : जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष (द्वंद्व भाव )  नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है। फिर उसे ऋणात्मक और धनात्मक आवेश प्रभावित नहीं करते 
  • या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः जीर्यतो या न जीर्यते । तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥ १६ ॥
  • : विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से उसका त्याग कर पाते हैं। मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही बनी रहती है। अतः जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए।
  • मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ १७ ॥
  • : और तो क्या—अपनी माता, बहन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि इंद्रियाँ इतनी आवेशयुकत बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं (विचलित कर देती हैं)।​

​(संगीत धीरे-धीरे शांत होता है और समाप्त होता है)
​सुझाव: इस ऑडियो को रिकॉर्ड करते समय शब्दों के बीच ठहराव (Pauses) का विशेष ध्यान रखें, ताकि सुनने वाले को दोहे का अर्थ और आपकी वैज्ञानिक व्याख्या, दोनों पर विचार करने का समय मिले।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

कव्वाली का अंदाज़ और टेक (मुखड़ा)

(संगीत की हल्की धुन और हारमोनियम के सुरों के बीच मुख्य गायक का आह्वान...)

मुखड़ा (बार-बार दोहराया जाने वाला शेर):

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

****

अर्ज़ किया है...

बन्दिश 1 (प्रथम पद पर आधारित)

​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! गफलत की लत जहालत का साया है ?

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

हरे कृष्णा ! 

बन्दिश 2 (द्वितीय पद पर आधारित)

संसार में जीवन का पाना ! 

और मरके कहाँ जाना।।

 हँसना रोना पीना खाना।

 रहस्य ये तूने क्यों न जाना। समय को यों ही व्यर्थ गवाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

बन्दिश 3 (तृतीय पद पर आधारित)

मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा  मन ! 

ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !

लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

बन्दिश 4 (चतुर्थ पद पर आधारित)


हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


******************************


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)

मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!


(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)

बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)


​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है 

बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)

​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?

मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?

हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!

ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?

समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)


मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा मन ! 

ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !

लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

​_____

बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)

​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!

तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!

संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।

इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!


हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)

यह नग़मा यादव योगेश कुमार रोही के दिल की सदा है, उनके ख़यालात की इबारत।"

​मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)


​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!


तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।


दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!


ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!



​(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)


​बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)



​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?


रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?


अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।


डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है 


​बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)


​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?


मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?


हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!


ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?


समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?


​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)



मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा मन ! 


ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !


लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  


डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


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​बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)


​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!


तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!


संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।


इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!


​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)


​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!


तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।


दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!



हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना


डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।



​(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


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