रविवार, 31 मई 2026

पञ्च -

ग्राम पञ्चायत, गाँव की मन्त्रिपरिषद का काम करती है। जिनके सदस्यों का चुनाव जनता करती है और इस जनता मे सभी पाँचों वर्णों के प्रतिनिधि पञ्च के रूप में उपस्थित  व अनुमोदित होकर अपना निष्पक्ष निर्णय देते हैं।

इस तरह की संकल्पना हमारे समाज में पूर्व काल से ही रही है। जिसकी पुष्टि- सर्वप्रथम ऋग्वेद से होती है जिसमें बताया गया है कि- पञ्चकृष्टी और पञ्चजन शब्द पाँच वर्णों के प्रतिनिधि व पञ्चों के रूपान्तरण थे।

"आ दधिक्राः शवसा पञ्चकृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान।....॥१०॥ ऋग्वेद ४/३८/१०

तथा अन्यत्र भीदेखें

उत यज्ञियास: पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ॥ ऋग्वेद-१०.५३.४।

उपर्युक्त ऋचाओं में पञ्च' पञ्चकृष्टी' और पञ्च जन' जैसे पद पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

ऋग्वेद में पञ्चजन: और पञ्चकृष्टी संज्ञा पद बताते हैं कि समाज में पाँच प्रकार के व्यक्ति थे जिनका समाज में वर्चस्व होता था। ऋग्वेद में उल्लिखित पञ्चजना: शब्द पाँच जातियों के प्रतिनिधियों का ही वाचक है।

श्लोक:

ब्राह्मण क्षत्त्रिय वैश्य शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।तथा स्वतन्त्रा जातिरेका आभीरा च तस्या वर्ण अस्मिन् विश्वे वैष्णवाभिधा।।

(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, एकादश अध्याय, सात्वतीय टीका के अनुसार)

यह श्लोक ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड से लिया गया है, जिसमें चातुर्यवर्ण्य  व्यवस्था के अतिरिक्त पाँवे वैष्णव वर्ण  की महत्ता को भी दर्शाया गया है। श्लोक में कहा गया है कि जैसे समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं, वैसे ही विश्व में वैष्णव नाम का एक स्वतन्त्र और सर्वोच्च वर्ण है।

इस वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत आभीर /आहीर (  यादव अथवा गोप  जाति को एक स्वतन्त्र और विशेष जाति के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो गोप (आभीर) जाति  भगवान स्वराट्-  विष्णु  से उत्पन्न होकर   उनकी सनातन भक्ति में ही  लीन रहती है। वह वर्ण से वैष्णव है

वैष्णव वर्ण और गोप

सनातन धर्म के प्रबुद्ध अध्येताओं और इतिहास के जिज्ञासुओं ! आज हम इतिहास और पुराणों के उन स्वर्णिम पृष्ठों को खोलने जा रहे हैं, जिन्हें रूढ़िवादिता और अज्ञानता के परदों के पीछे छिपाकर बन्द रखा गया।

​यादव, गोप अथवा अहीर संस्कृति के इस अकाट्य इतिहास और शास्त्र-सम्मत तथ्यों को समाज के सामने लाने का श्रेय महान शोधकर्ता यादव योगेश कुमार रोहि (अलीगढ़) वालो को जाता है। 

उनके इस शोध ने यह प्रमाणित किया है कि यादव समाज ब्रह्मा की लौकिक सृष्टि और उनके द्वारा बनाई गई चातुर्वर्ण्य व्यवस्था से पूर्णतः पृथक अथवा अलग है।

इस शोध के शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार, गोपों की उत्पत्ति साक्षात् स्वराट् विष्णु के हृदय-रोमकूपों से हुई है। इसलिए भगवान विष्णु से उत्पन्न होने के कारण इनका वर्ण आदि काल से 'वैष्णव' है।

चूँकि ब्रह्मा स्वयं भगवान  विष्णु के नाभि-कमल से प्रकट हुए हैं, इसलिए विष्णु के हृदय-रोमकूपों से उत्पन्न गोप, आध्यात्मिक और तात्विक दृष्टि से सर्वोच्च हैं।

गर्गसंहिता के विश्वजित् खण्ड (अध्याय- ११) में साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण सुधर्मा सभा में राजा उग्रसेन से कहते हैं:

श्लोक का समवेत स्वर में गायन करें-

ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।‌जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम् ॥७॥

​अर्थ- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं। वे दोनों लोकों को जीतने की सामर्थ्य रखते हैं और दिग्विजय करके संपूर्ण दिशाओं से उपहार लाएंगे।

​इतना ही नहीं, ब्रह्मवैवर्त पुराण (अध्याय ५, श्लोक- ४१) में साक्षात् उल्लेख है:

​कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो मुने:।‌आविर्बभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम: ॥

​अर्थ- गोलोकवासी श्रीकृष्ण के रोमकूपों से जिन गोपों की उत्पत्ति हुई, वे रूप, वेश और गुण में साक्षात् श्रीकृष्ण के ही समान थे।

स्वतन्त्र पञ्चम वर्ण (वैष्णव वर्ण)

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के अनुसार, विराट पुरुष के मुख, बाहु, जंघा और चरणों से क्रमशः चार वर्णों का प्रादुर्भाव हुआ। यह ब्रह्मा की लौकिक वर्ण व्यवस्था थी।

​परन्तु, ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड (अध्याय ११,के  श्लोक संख्या- ४३ में स्पष्ट उद्घोष है:

ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रोजातयोयथा।‌स्वतन्त्राजातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा ॥

​अर्थात्—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे चार वर्ण तो हैं ही, परन्तु इनसे पृथक, इस विश्व में एक पांचवा स्वतन्त्र वर्ण है, जिसे 'वैष्णव वर्ण' कहा जाता है, और गोप उसी दिव्य वैष्णव वर्ण के प्रतिनिधि हैं।

पद्मपुराण के उत्तरखण्ड (अध्याय ६८) में स्वयं महादेव कहते हैं कि समस्त वर्णों में वैष्णव वर्ण ही सर्वश्रेष्ठ है।


प्राचीन काल से भारतीय समाज में पञ्चो की सामाजिक न्याय प्रणाली इन्हीं पाँच वर्णों के प्रतिनिधियों के अवशेष हैं। भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना-

देखा जाए तो प्राचीन भारतीय समाज में पञ्च-पञ्चायत और पञ्चजन जैसे शब्द सामाजिक व्यवस्था में पाँच वर्णों की मान्यता व उनके निर्णयों पर आधारित पञ्च- प्रथा के ही सूचक दिग्दर्शक थे।

जो परम्परागत रूप से आज भी ग्रामीण समाज में पञ्चों द्वारा की गयी पञ्चायतों के रूप में प्रचलित व विद्यमान  हैं। 

जिसे भारत की पञ्चायत राज प्रणाली में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। क्योंकि भारत में पञ्चायत राज प्रणाली, भारतीय समाज में पारम्परिक रूप से ग्राम संस्थाओं पर ही आधारित है।

ग्राम पञ्चायत, गाँव की मन्त्रिपरिषद का काम करती है। जिनके सदस्यों का चुनाव जनता करती है और इस जनता मे सभी पाँचों वर्णों के प्रतिनिधि पञ्च के रूप में उपस्थित  व अनुमोदित होकर अपना निष्पक्ष निर्णय देते हैं।

इस तरह की संकल्पना हमारे समाज में पूर्व काल से ही रही है। जिसकी पुष्टि- सर्वप्रथम ऋग्वेद से होती है जिसमें बताया गया है कि- पञ्चकृष्टी और पञ्चजन शब्द पाँच वर्णों के प्रतिनिधि व पञ्चों के रूपान्तरण थे।

"आ दधिक्राः शवसा पञ्चकृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान।....॥१०॥ ऋग्वेद ४/३८/१०

तथा अन्यत्र भीदेखें

उत यज्ञियास: पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ॥ ऋग्वेद-१०.५३.४।

उपर्युक्त ऋचाओं में पञ्च' पञ्चकृष्टी' और पञ्च जन' जैसे पद पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

ऋग्वेद में पञ्चजन: और पञ्चकृष्टी संज्ञा पद बताते हैं कि समाज में पाँच प्रकार के व्यक्ति थे जिनका समाज में वर्चस्व होता था। ऋग्वेद में उल्लिखित पञ्चजना: शब्द पाँच जातियों के प्रतिनिधियों का ही वाचक है।

श्लोक:

ब्राह्मण क्षत्त्रिय वैश्य शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।तथा स्वतन्त्रा जातिरेका आभीरा च तस्या वर्ण अस्मिन् विश्वे वैष्णवाभिधा।।

(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, एकादश अध्याय, सात्वतीय टीका के अनुसार)

यह श्लोक ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड से लिया गया है, जिसमें चातुर्यवर्ण्य  व्यवस्था के अतिरिक्त पाँवे वैष्णव वर्ण  की महत्ता को भी दर्शाया गया है। श्लोक में कहा गया है कि जैसे समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं, वैसे ही विश्व में वैष्णव नाम का एक स्वतन्त्र और सर्वोच्च वर्ण है।

इस वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत आभीर /आहीर (  यादव अथवा गोप  जाति को एक स्वतन्त्र और विशेष जाति के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो गोप (आभीर) जाति  भगवान स्वराट्-  विष्णु  से उत्पन्न होकर   उनकी सनातन भक्ति में ही  लीन रहती है। वह वर्ण से वैष्णव है

शनिवार, 30 मई 2026

हंस वर्ण-

श्रीमद्भागवत पुराण के नवम स्कंध और ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के वर्ण श्लोकों के बीच का अंतर वास्तव में भारतीय कालचक्र (युग व्यवस्था) की दार्शनिक समझ को स्पष्ट करता है। 

​1. काल-भेद 

  • भागवत पुराण कहता है, सतयुग वह काल है जहाँ पूर्ण धर्म, एकात्मकता और आध्यात्मिक शुद्धता थी। उस समय समाज का विभाजन कार्य या गुण के आधार पर न होकर, आध्यात्मिक चेतना के आधार पर था समाज के सभी मनुष्यों का एक वर्ण हंस था।
  • 'हंस' अर्थ है— मनुष्य वह अवस्था जहाँ वह केवल परमात्मा (हंस) के साक्षात्कार में लीन था। उस समय का समाज एक 'आध्यात्मिक परिवार' जैसा था, जहाँ ऊँच-नीच या कार्य-विभाजन की आवश्यकता ही नहीं थी।
  • परन्तु ऋग्वेद का पुरुष सूक्त​ (युग के संक्रमण/व्यावहारिक काल की दशा को वर्णन करता है वह 'सृष्टि की व्यवस्था' का वर्णन करता है। यह किसी एक विशेष युग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वह सनातन संरचना है जिसके आधार पर 'वर्णाश्रम धर्म' की स्थापना होती है। यह उस व्यवस्था को इंगित करता है जो त्रेतायुग और उसके बाद के समय में समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए अनिवार्य हो गई थी। गीता  यह श्लोक कि " चातुर्वर्णयं मया सृष्टं गुण कर्म विभागस्" इस व्यवस्था का सम्यक प्रतिपादक है।

भागवत पुराण में वर्णित 'सतयुग' और पुरुषसूक्त में प्रतिपादित 'वर्ण व्यवस्था' का तुलनात्मक विश्लेषण एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इन दोनों अवधारणाओं का सूक्ष्म अवलोकन करने पर इनके उद्देश्यों और संरचना में मौलिक भिन्नता स्पष्ट होती है:

​वैचारिक और दार्शनिक आधार

​सतयुग की सामाजिक स्थिति 'निर्गुण' और 'एकीकृत' चेतना पर आधारित है, जहाँ समाज 'हंस' वर्ण की स्थिति में था। यहाँ वर्ण का अर्थ जन्मगत या कार्यात्मक विभाजन न होकर चेतना का उच्चतम स्तर है, जहाँ समस्त प्राणी ब्रह्म में स्थित होने के कारण एक समान थे। इसके विपरीत, पुरुषसूक्त में वर्णित वर्ण व्यवस्था 'सगुण' है, जो समाज को स्पष्ट और कार्यात्मक भागों में विभाजित करती है। जहाँ सतयुग का एकमात्र उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और भगवत् प्राप्ति था, वहीं पुरुषसूक्त की वर्ण व्यवस्था का लक्ष्य सुव्यवस्थित सामाजिक ढाँचा, लोक-कल्याण और अनुशासन की स्थापना करना है।

​कार्यात्मक और प्रेरणागत अंतर

​इन दोनों व्यवस्थाओं में कार्य-विभाजन की प्रकृति भी भिन्न है। सतयुग में कार्य-विभाजन नगण्य था, क्योंकि समस्त जीव ब्रह्म में लीन थे और कर्म स्वतः स्फूर्त थे। यहाँ धर्म अपने पूर्ण और शुद्ध स्वरूप में विद्यमान था, जहाँ किसी बाह्य अनुशासन की आवश्यकता नहीं थी। दूसरी ओर, पुरुषसूक्त में कार्य-विभाजन अत्यंत स्पष्ट और व्यवस्थित है—ज्ञान (मुख), रक्षा (बाहु), पोषण (जंघा) और सेवा (चरण)। यहाँ समाज की प्रेरणा 'स्वतः स्फूर्त धर्म' के स्थान पर 'शास्त्र-सम्मत वर्णाश्रम धर्म' द्वारा निर्देशित होती है।

​निष्कर्षतः, सतयुग की अवधारणा जहाँ पूर्णता और चेतना की एकरूपता को समाहित करती है, वहीं पुरुषसूक्त की वर्ण व्यवस्था सामाजिक स्थिरता और सहअस्तित्व के लिए एक आवश्यक कार्यात्मक ढांचा प्रदान करती है।

3. समीक्षा: विरोधाभास या विकास?

​इसे विरोधाभास के बजाय 'मानवीय चेतना का पतन और सामाजिक संरचना का विकास' समझना चाहिए:

  1. चेतना का स्तर: सतयुग में लोगों की चेतना इतनी ऊँची थी कि उन्हें अनुशासन के लिए किसी बाहरी ढांचे (वर्ण व्यवस्था) की आवश्यकता नहीं थी। वे सहज ही 'हंस' (परम ज्ञानी) थे।
  2. व्यवस्था की आवश्यकता: जैसे-जैसे युग बदलते गए (त्रेता, द्वापर), लोगों की आध्यात्मिक शक्ति और 'सत्य' के प्रति निष्ठा कम होती गई। समाज में अव्यवस्था न फैले, इसके लिए 'पुरुषसूक्त' में वर्णित विराट पुरुष का दृष्टांत दिया गया। यह एक कार्यात्मक विभाजन (Functional Division) है, न कि जन्मजात श्रेष्ठता का। यद्यपि यह सूक्त व सम्बन्धित ऋचा कालान्तर में जोड़ी गयी है।
  3. पुरुषसूक्त का तात्पर्य: पुरुषसूक्त यह सिखाता है कि समाज एक 'विराट पुरुष' का शरीर है। जैसे शरीर के अंगों में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता—मुँह का काम बोलना और पैर का काम चलना है, दोनों के बिना जीवन असंभव है—उसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र एक ही परमात्मा के विभिन्न अंग हैं।

​निष्कर्ष

​श्रीमद्भागवत का श्लोक उस 'आदि स्थिति' की ओर संकेत करता है जहाँ हम सब 'एक' थे, जबकि पुरुषसूक्त उस 'प्रकट सामाजिक व्यवस्था' का आधार है जो हमें त्रेतायुग से कलयुग तक एक व्यवस्थित समाज में रहने की शिक्षा देती है।

​अतः, सतयुग का 'हंस वर्ण' एक अवस्था है, और जबकि पुरुषसूक्त की वर्ण व्यवस्था एक प्रणाली है। जब मानव अपनी उस 'हंस' वाली चेतना को भूल गया, तब उसे व्यवस्थित रखने के लिए वर्ण व्यवस्था रूपी अनुशासन की आवश्यकता पड़ी परन्तु यह वर्ण व्यवस्था कर्म और प्रवृति अथवा स्वभाव के अनुरूप थी। जन्म से कोई महान नहीं होता ? सभी अपने अच्छे कर्मों से महानता को प्राप्त करते हैं।

यहाँ भ्रम का मुख्य कारण 'ज्ञान के आविर्भाव' और 'व्यवहार में आने' के बीच का अन्तर है। लोगों के नाम और उपाधि के अनुरूप उनके कर्म और गुण नहीं हैं। यह कलियुग कि प्रभाव है

इसे समझने के लिए हमें इन तीन बिंदुओं पर ध्यान देना होगा:

​1. वेद शाश्वत हैं (अपौरुषेय)

​जैसा कि आपने सही कहा, वेद सृष्टि के आरम्भ में ही परमात्मा से प्रकट हुए थे। भारतीय दर्शन के अनुसार, वेद न तो त्रेतायुग की वस्तु हैं और न ही किसी युग विशेष की; वे 'नित्य' (Eternal) हैं। सतयुग में भी वेद थे, लेकिन वे 'प्रणव' (ॐ) के रूप में एकीकृत (एकत्र) थे। इसे आप ऐसे समझें जैसे कोई विशाल फाइलबुक एक 'कंप्रेस्ड जिप फाइल' के रूप में हो, जिसे खोलने की आवश्यकता सतयुग में नहीं थी क्योंकि सतयुगी मनुष्यों की बुद्धि इतनी प्रखर थी कि वे 'ॐ' से ही सारा ज्ञान समझ लेते थे।

समय समय पर वेदों में जोड़ने और तोड़ने की प्रक्रिया भी तथाकथित लोगों द्वारा होती रही है। अत: वेदों की प्रमाणिकता संदिग्ध सी हो गयी है । यद्यपि भाषा विश्लेषण के द्वारा तथ्यों या अन्वेषण होना अपेक्षित है।

​2. 'वेदत्रयी' का प्रादुर्भाव (त्रेतायुग का संदर्भ)

​भागवत पुराण के जिस श्लोक (४९) की हम चर्चा कर रहे हैं, वह यह नहीं कहता कि वेद त्रेतायुग में 'बने'। वह कहता है कि त्रेता के प्रारम्भ में पुरूरवा के समय से 'वेदत्रयी' (ऋक्, यजु, साम) का आविर्भाव हुआ

इसका अर्थ यह है:

  • सतयुग: वेद अपने 'सूक्ष्म' और 'एकीकृत' रूप (प्रणव) में थे।
  • त्रेतायुग: जैसे-जैसे काल चक्र आगे बढ़ा, मानवीय चेतना में थोड़ा संकोचन आया। अब वेदों के उस 'एकीकृत' ज्ञान को व्यवहार में लाने के लिए उसका 'विस्तार' या 'विभाजन' आवश्यक हो गया। अतः, त्रेतायुग में वेदों को अलग-अलग शाखाओं (ऋक्, यजु, साम) में वर्गीकृत किया गया ताकि सामान्य जन भी उन्हें समझ सकें।

​वेद सतयुग की उपेक्षा नहीं करते, बल्कि वेद 'सृष्टि के सनातन विधान' हैं।और पुराण (जैसे भागवत) 'समय के साथ ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग' (Application of Knowledge) का इतिहास बताते हैं।

​अतः, वेद में वर्ण व्यवस्था का होना यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था सृष्टि का आधारभूत सत्य है, और पुराण यह बताते हैं कि काल के प्रवाह में कैसे उस सत्य को मानव समाज ने अलग-अलग युगों में अपनी आवश्यकतानुसार 'प्रकट' (Manifest) किया। सतयुग में वह ज्ञान 'चेतना' में था, त्रेतायुग में वह 'अनुष्ठान' और 'सामाजिक व्यवस्था' में ढल गया और द्वापर में केवल दिखावा रह गया और आज कलियुग में सब विपरीत स्थिति में है।

वैदिक समाज को समझने के लिए एक सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है: ऋग्वेद के नवम मण्डल की इस ऋचा को-

कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना ।
नानाधियो वसूयवोऽनु गा इव तस्थिमेन्द्रायेन्दो परि स्रव।

अनुवाद

"मैं कारीगर (या कवि) हूँ, मेरे पिता वैद्य (चिकित्सक) हैं और मेरी माता पत्थर की चक्की पर अन्न पीसने वाली हैं। हम सभी अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन जैसे गाएँ चारे के पीछे जाती हैं, वैसे ही हम सब धन (आजीविका) कमाने के लिए अपने-अपने कर्मों में लगे रहते हैं।


  • कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था: यह मंत्र सिद्ध करता है कि ऋग्वेद काल में वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि पूरी तरह कर्म और व्यवसाय के आधार पर थी
  • एक ही परिवार में अलग-अलग व्यवसाय: इस मंत्र में एक ही परिवार के तीन लोग (पुत्र, पिता और माता) तीन अलग-अलग वर्णों या व्यवसायों से जुड़े हैं। पुत्र शिल्पी है, पिता वैद्य हैं, और माता अन्न पीसने का श्रमसाध्य कार्य करती हैं।
  • समानता का संदेश: अलग-अलग कार्यों में लगे होने के बाद भी वे सभी एक ही छत के नीचे एक प्रेमपूर्ण परिवार की तरह रहते थे। उस काल में किसी भी कार्य को छोटा या बड़ा नहीं माना जाता था।




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  • 00:00 - 00:05: एक वक्ता मंच पर खड़े होकर भीड़ को संबोधित करते हुए कहता है: "हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं। हमें एकजुट होने, एकजुट होना होगा।"
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  • 00:16 - 00:17: भीड़ "जय यदुवंश, जय यदुवंश" का नारा लगाती है।
  • 00:18 - 00:20: वक्ता अपनी बात समाप्त करते हुए कहता है: "हमारी जड़ें ईश्वरीय सत्ता से जुड़ी हैं।"

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इस वीडियो में एक वक्ता एक बड़ी भीड़ को संबोधित कर रहा है। उसके भाषण में एकजुटता, अधिकारों के लिए संघर्ष और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व का संदेश दिया गया है। भीड़ वक्ता के विचारों का समर्थन करते हुए नारे लगाती है। भाषण का लहजा ओजस्वी और प्रेरणादायक है।



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शुक्रवार, 29 मई 2026





           "अध्याय- सप्तम् (७)

गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय।

इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य गोप कुल के प्रमुख सदस्यों के चरित्रों एवं विशेषताओं को बताते हुए यादवों के वंश वृक्ष को बताना है। इसलिए इस अध्याय को तीन (३) भागों में विभाजित किया है -

भाग- (१) महाराज यदु का परिचय
भाग- (२) हैहय वंशी यादवों का परिचय।
भाग- (३) यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज


________

      भाग- (१) महाराज यदु का परिचय-

                         _____
महाराज यदु, यादवों के आदिपुरुष या कहें पूर्वज थे। इस बात को श्रीकृष्ण भी स्वीकार करते हुए श्रीमद्भागवत महापुराण के (११) वें स्कन्ध के अध्याय - (७) के श्लोक- (३१) में कहते हैं कि -

यदुनैवं  महाभागो  ब्रह्मण्येन  सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः।। ३१।


अनुवाद-  हमारे "पूर्वज महाराज यदु" की बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदय में ब्रह्मज्ञानीयों के प्रति भक्ति थी। ३१।

अब ऐसे में जब महाराज "यदु" यादवों के पूर्वज है, तब यदु के बारे में और विस्तार से जानना आवश्यक हो जाता है कि यदु कौन हैं, तथा "यदु" नाम की सार्थकता क्या है ? तथा यदु शब्द की उत्पत्ति कब और कैसे हुई ? इन सभी बातों का समाधान इस अध्याय में किया गया है।


✴️ यदु शब्द की व्युत्पत्ति-

यदु शब्द की उत्पत्ति वैदिक कालीन है। सम्भवतः इसी कारण से लौकिक संस्कृत में यदु शब्द मूलक 'यद्' धातु प्राप्त नहीं होती है।
इसी लिए संस्कृत भाषा के कोशकारों और व्याकरणविदों ने यदु शब्द की व्युत्पत्ति यज्-धातु से निर्धारित की हैं।  जिससे यदु शब्द की व्युत्पत्ति पुल्लिंग रूप में होती है।
जैसे-
संस्कृत भाषा में  'यज् धातु (अर्थात् क्रिया का मूल +  उणादि  प्रत्यय (उ ) को जोड़ने पर- 'पृषोदर प्रकरण' के नियम से "जस्य दत्वं"  अर्थात् "ज वर्ण का "द वर्ण में रूपान्तरण होने से यदु शब्द बनता है।

[ ज्ञात हो- पाणिनीय व्याकरण में  "पृषोदरादीनि  एक पारिभाषिक शब्द है। पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' (६.३.१०८)  इस पाणिनीय सूत्र से यज्- धातु के अन्तिम वर्ण  "जकार को दकार" आदेश हो जाने से ही यदु शब्द बनता है। ]
      

ये तो रही यदु शब्द की व्युत्पत्ति अब हमलोग जानेंगे यदु शब्द के अर्थ को -
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि यदु शब्द की व्युत्पत्ति "यज्" धातु से हुई है, जिसमें यज् धातु के तीन अर्थ लोक- प्रसिद्ध हैं।
[यज् = देवपूजा,सङ्गतिकरण, दानेषु] इसको साधारण भाषा में इस तरह से समझा जा सकता है -
यज् =१- यजन करना।
        २- न्याय (संगतिकरण) के भाव से  युद्ध(संघर्ष) करना भी अर्थ होता है। ।
        ३- दान करना।

विदित हो की यादवों के आदि पुरुष यदु में उपर्युक्त तीनों ही प्रवृत्तियों का मौलिक रूप से समावेश था। जैसे- महाराज यदु -
(१)- हिंसा से रहित नित्य वैष्णव यज्ञ किया करते थे।
(२)- वे सबका यथोचित न्याय किया करते थे।
(३)- और वे दान के क्षेत्र में निर्धन तथा भिक्षुओं को बहुत सी गायें भी दान करते थे। इन तीनों गुणकारी कार्यों से उनकी मेधा (बुद्धि) भी प्रखर हो गयी थी।

तभी तो भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भागवत पुराण के (११)वें स्कन्ध के अध्याय (७) के श्लोक- (३१) में उद्धव जी से कहते हैं कि
                'श्रीभगवानुवाच।
यदुनैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः।३१।
अनुवाद:-

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—उद्धव ! हमारे पूर्वज महाराज यदु की बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदय में ब्राह्मज्ञानीयों के प्रति-भक्ति थी। उन्होंने परमभाग्यवान् दत्तात्रेयजी का अत्यन्त सत्कार करके यह प्रश्न पूछा और बड़े विनम्रभाव से सिर झुकाकर वे उनके सामने खड़े हो गये थे। ३१।महाराज यदु के इन्हीं सब विशेषताओं के कारण ऋग्वेद के दशम मण्डल की सूक्त- ६२ की ऋचा-१०
में ऋषियों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। ऋग्वेद की वह ऋचा नीचे उद्धृत है -
"उत दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च मामहे"
    
अनुवाद:- वे दोनों यदु और तुर्वसु दास- (दाता) कल्याणकारी दृष्टि वाले, स्नान आदि क्रियाओं से युक्त होकर नित्य गायों का पालन पोषण और दान भी करते हैं। हम उनकी स्तुति करते हैं। (ऋ०१०/६२/१०)
                
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा का सम्यग्भाष्य- करने पर यदु के सम्पूर्ण चरित्रों का बोध होता है। सम्यग्भाष्य के लिए नीचे देखें -
१- उत = अत्यर्थेच  अपि च, और भी।
२- स्मद्दिष्टी कल्याणादेशिनौ। वे दोनों कल्याण कारी दृष्टि वाले।
३- गोपरीणसा गोपरीणसौ गोभिः परिवृतौ बहुगवादियुक्तौ । गायों से घिरे हुए अथवा गायें जिनके चारो ओर हैं।

४- दासा = दासतः दानकुरुत: =  दान करने वाले वे दोनों  
    (यदु और तुर्वसु)। (ज्ञात हो- "दासा" बहुवचन शब्द है जो यदु 
  और तुर्वसु के लिए प्रयुक्त है।
५- गोपरीणसा= गवां परीणसा बहुभावो यमो बहुगोमन्तौ =
गायों से घिरे हुए वे दोंनो यदु और तुर्वसु। (इसके साथ ही यहाँ पर यह भी सिद्ध होता है कि यदु गोपालक अर्थात गोप थे।)
अब विचार यह करना है कि यदु को दास क्यों कहा गया? तथा दास शब्द का अर्थ यदु के समय में क्या था ?
तो इसका समाधान इस प्रकार है-

[ उपर्युक्त श्लोक में आया "दासा" शब्द वैदिक शब्द निघण्टु में द्विवचन में दाता का वाचक है। ३।१]

क्योंकि पाणिनीय धातुपाठ में दास् धातु = दान करना अर्थ में है।
दास्= दाने सम्प्रदाने + अच् । दास:= दाता।
अच्' प्रत्यय का 'अ' लगाकर कर्तृबोधक शब्द बनाया जाता हैं।
महामहे का ही (वेैदिक रूप "मामहे") है।
अत: दास शब्द भी वैदिक काल में दाता (दानी) के अर्थ में चरितार्थ था।

किन्तु समय और परिस्थिती के साथ दास शब्द के अर्थ में भी उसी तरह परिवर्तन हुआ जैसे वैदिक काल में घृणा शब्द के अर्थ मै परिवर्तन हुआ। वैदिक असुर शब्द का भी पूर्ववैदिक अर्थ- प्राणवान और प्रज्ञावान है।

क्योंकि वैदिक काल में घृणा शब्द दया भाव का वाचक था किन्तु आज घृणा शब्द का अर्थ नफ़रत हो गया है।  ठीक उसी तरह से वैदिक काल के दास शब्द के अर्थ में भी बड़ी तेजी से परिवर्तन हुआ। ज्ञात हो कि वैदिक काल में दास शब्द का अर्थ - "दाता" था। उस समय दास शब्द एक प्रतिष्ठा और सम्मान का पद था। इसीलिए उस समय ऋषिगण भी दासों की स्तुतियां और प्रशंसा किया करते थे। जैसा कि ऋग्वेद के दशम मण्डल की सूक्त- ६२ की ऋचा-१० में यदु और तुर्वसु को दास (दाता) के रूप में स्तुतियाँ की गईं है। इस बात को ऊपर बताया जा चुका है।

वहीं दास शब्द अपने विकास क्रम में आते-आते पौराणिक काल में "वैष्णव" वाचक के रूप में स्थापित हुआ। इस बात की पुष्टि - पद्मपुराण के भूमि खण्ड अध्यायः(८३) से होती से होती है। जिसमें दास शब्द वैष्णव वाचक के रूप में प्रयुक्त हुआ है। इस प्रसंग में दासत्व प्राप्ति के लिए राजा "ययाति" वैष्णव भगवान विष्णु से वर माँगते हैं कि- हे प्रभु !  मुझे दासत्व प्रदान करो। इसके लिए देखें निम्नलिखित श्लोक-
                   -विष्णूवाच-
"वरं वरय राजेन्द्र यत्ते मनसि वर्तते।
तत्ते ददाम्यसन्देहं मद्भक्तोसि महामते ।।७९।।

अनुवाद:- भगवान विष्णु नें कहा - हे राजाओं के स्वामी ! वर माँगो जो तुम्हारे मन नें स्थित है। वह सब तुमको मैं दुँगा तुम मेरे भक्त हो।।७९।।

                     राजोवाच-
यदि त्वं देवदेवेश तुष्टोसि मधुसूदन ।
दासत्वं देहि सततमात्मनश्च जगत्पते।८०।

 
अनुवाद-
राजा (ययाति) ने कहा ! हे देवों के स्वामी हे जगत के स्वामी ! यदि तुम प्रसन्न हो तो मुझे अपना शाश्वत दासत्व (वैष्णव- भक्ति) दें। ८०।।

                 'विष्णुरुवाच-
एवमस्तु महाभाग मम भक्तो न संशयः ।
लोके मम महाराज स्थातव्यमनया सह ।८१।।

अनुवाद:- विष्णु ने कहा- ऐसा ही हो तू मेरा भक्त हो इसमें सन्देह नहीं। अपनी पत्नी के साथ तुम मेरे लोक में निवास करो। ८१।।

यदि उपर्युक्त श्लोक- ८१ को देखा जाए तो उसमें एक शब्द (दासत्वं) आया है जिसका अर्थ है- दासत्व अर्थात वैष्णव भक्त, यानी उस समय जो वैष्णव (विष्णु) भक्त थे, वे अपने को दास कहलाना ही श्रेयस्कर समझता थे। और जन-समुदाय में उसकी पहचान दास के रूप में ही थी। जैसे - तुलसीदास, सूरदास रैदास  इत्यादि इसके उदाहरण हैं।

किन्तु यहीं दास शब्द मध्यकाल में पुरोहितवाद की चपेट में आकर शूद्र और असुर का पर्याय बन गया। इसी समय के दास शब्दार्थ के आधार पर कुछ अज्ञानी लोग यादवों के पुर्वज यदु को दास अथवा शूद्र कहते हैं। जबकि उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि जब यदु शूद्र थे, तो उनकी स्तुति ऋषियों के द्वारा क्यों की गई ? क्या पुरोहितवादी व्यवस्था में कोई ऋषि कभी शूद्र की स्तुति किया ? जबाब होगा नहीं। अतः मध्यकाल के दास के अर्थ में यदु को शूद्र कहना मूर्खता पूर्ण बातें हैं।
 
और वैसे भी देखा जाए तो गोपों (यादवों) का वर्ण "वैष्णव" है। इस बात को गोप कुल में जन्मे भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ के श्लोक- ९२ में स्वयं अपने को वैष्णव होने की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि-

पशुजन्तुषु गौश्चहं चन्दनं काननेषु च ।
तीर्थपूतश्च पूतेषु निःशङ्केषु च वैष्णवः।। ९२


अनुवाद- मैं पशुओं में गाय हूँ । और वनों में चन्दन हूँ।
पवित्र स्थानों में तीर्थ हूँ। और निशंकों (अभीरों अथवा निर्भीकों ) में वैष्णव हूँ। ९२

अतः वैष्णव वर्ण के गोपों को ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इत्यादि में स्थापित करना सिद्धान्त विहीन होगा, क्योंकि ब्रह्माजी की वर्ण व्यवस्था के  सिद्धान्तानुसार-  ब्राह्मण- ब्रह्माजी के मुँख से, क्षत्रिय- भुजा से, वैश्य - उदर से, और शूद्र - पैर से उत्पन्न होते हैं।

जबकि गोप और गोपियाँ गोलोक में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोमकूपों से उत्पन्न होते हैं। अतः गोप ब्रह्माजी की सृष्टि रचना के भाग नहीं है, और जब ये ब्रह्माजी की सृष्टि रचना के भाग नहीं है, तो इनको ब्रह्माजी के चार वर्णों में शूद्र या और कुछ कहना निराधार होगा।
         
 [इस बात को विस्तार पूर्वक इस पुस्तक के अध्याय- (९ और १०) में बताया गया है कि कैसे गोप ब्रह्माजी के चातुर्वण्य से अलग वैष्णव वर्ण के सदस्य हैं।]

अब वही दास शब्द अपने विकास क्रम को पूरा करते हुए आधुनिक समय में आकर "नौकर" (servant) के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। जिसका कुछ सम्मान जनक शब्द नौकरी (job) है। चाहे वह नौकर (सरकारी हो या प्राइवेट) किन्तु कर्म के अनुसार वह निश्चित रूप से दास ही है। जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र बिना भेदभाव के यह कर्म (job) करते हैं। यह बड़ी अच्छी बात है कि दास शब्द वर्तमान समय में सबके लिए बिना भेदभाव के समभाव को प्राप्त हुआ।
इसलिए अब दास शब्द को लेकर बहुत ज्यादा उतावले होने की जरूरत नहीं है। आप कबीर दास या सूरदास को ही याद कर लो।

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✴️ यदु का जीवन परिचय-

यादवों के पूर्वज यदु का जीवन प्रारम्भ से ही संघर्षमय रहा। यदु के संघर्षों की कहानी उनके घर से ही प्रारम्भ होती है। जिसका वर्णन कुछ इस प्रकार है -
यदु के पिता ययाति की कुल तीन पत्नियाँ देवयानी, शर्मिष्ठा, और अश्रुबिन्दुमती नाम की थीं। उनमें से दो पत्नियों से कुल पाँच यशस्वी पुत्र हुए। जिसमें शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से दो पुत्र - यदु और तुर्वसु तथा दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से तीन पुत्र- द्रुह्य, अनु,और पुरु हुए। ययाति की तीसरी पत्नी अश्रुबिन्दुमती सदैव पुत्रहीन रही। राजा ययाति अपने पाँच पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र यदु को शाप देकर राज्यपद से वञ्चित कर पशुपालक होने का शाप दिया और सबसे छोटे पुत्र पुरु को राजपद दिया। इस बात की पुष्टि - लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्डः( ३ )अध्याय- (७३) के श्लोक (७५-७६) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-

"श्रुत्वा राजा शशापैनं राज्यहीनः सवंशजः।
तेजोहीनः क्षत्रधर्मवर्जितः पशुपालकः।। ७५।

भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम।
इत्युक्त्वा च पुरुं  प्राह  शर्मिष्ठाबालकं  नृपः।७६।

अनुवाद- यह सुनकर राजा ने उसे शाप दे दिया और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगे।७५।।

पुनः राजा ने कहा तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै। यदु ! मेरे राज्य से बाहर चले जाओ। इस प्रकार कहकर राजा (ययाति) ने पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे। ७६।

यहीं से यदु के जीवन का कठिन दौर प्रारम्भ हुआ।
पिता के शाप और राजपद से वञ्चित "यदु" ने अपने पूर्वजों की तरह ही गोपालन से अपना जीविकोपार्जन करना प्रारम्भ किया और कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने बल एवं पौरुष से राजतन्त्र के विकल्प में प्रजातन्त्र की स्थापना की और प्रजातान्त्रिक ढंग से राजा बनकर अपने वंश एवं कुल का विस्तार कर जगत में कीर्तिमान स्थापित किया।
            
ध्यान रहे - राजा ययाति नें यदु को यह शाप दे रखा था कि- तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे। अतः यदु के सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या थी। और समस्या ही आविष्कार की जननी होती है। अतः यदु ने राजतन्त्र के विकल्प में प्रजातन्त्र की खोज किया और प्रजातान्त्रिक तरीके से राजा हुए। इसीलिए यदु को प्रजातन्त्र का जनक माना जाता है।
             
आगे चलकर इसी यदु से समुद्र के समान विशाल यादवंश का उदय हुआ। जिसके सदस्यपतियों को यादव कहा गया। इस सम्बन्ध में यदि देखा जाए तो जिस तरह से ब्रह्मन् शब्द में (अण्) प्रत्यय लगाने से ब्राह्मण शब्द की उत्पत्ति होती है, वैसे ही यदु नें 'अण्' प्रत्यय पश्चात लगाने पर  यादव शब्द की भी उत्पत्ति होती है।

[यदोरपत्यम् " इति यादव- अर्थात् यदु शब्द के अन्त में सन्तान वाचक संस्कृत अण्- प्रत्यय लगाने से यादव शब्द की उत्पत्ति होती है। (यदु + अण् = यादव:) जिसका अर्थ है यदु की सन्तानें अथवा वंशज।]

यदु के संघर्षमय जीवन में हमसफ़र के रूप में यदु की पत्नी यज्ञवती हुई। जो यदु नाम के अनुरूप ही जगत विख्यात थी, जो कभी गोलोक में सुशीला गोपी नाम से प्रसिद्ध थी। वही कालान्तर में यज्ञपुरुष की पत्नी दक्षिणा के रूप में भू-तल पर अवतरित हुई। जिसमें यदु और यज्ञवती का विष्णु और दक्षिणा के अंश से उत्पन्न होने का प्रकरण पौराणिक है। जिसका वर्णन-देवीभागवतपुराण-‎ स्कन्धः नवम के अध्याय (४५) तथा ब्रह्मवैवर्त्त महापुराण के प्रकृतिखण्ड के बयालीसवें अध्याय में  मिलता है।

[ इस प्रकरण का विस्तार पूर्वक वर्णन इस पुस्तक का सहवर्ती ग्रन्थ "श्रीकृष्ण गोपेश्वरस्य पञ्चमवर्ण "में किया गया है। वहाँ से पाठकगण यदु पत्नी यज्ञवती के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।]

आगे चलकर यदु और उनकी पत्नी यज्ञवती से प्रमुख चार धर्मवत्सल पुत्र पैदा हुए। जिनके क्रमशः नाम हैं - सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु। जिसमें सहस्रजित यदु के ज्येष्ठ पुत्र थे।
महाराज यदु के चार पुत्रों का वर्णन अन्य पुराणों तथा  श्रीमद्भागवत पुराण के स्कन्घ- ९ के अध्याय- २३ में भी मिलता है। उसके लिए कुछ श्लोक नीचे प्रस्तुत है -

वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणाम् ।
यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९॥

यत्रावतीर्णो भगवान् परमात्मा नराकृतिः ।
यदोः सहस्रजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः ॥२०॥

चत्वारः सूनवस्तत्र शतजित् प्रथमात्मजः ।
महाहयो रेणुहयो हैहयश्चेति तत्सुताः ॥२१॥

धर्मस्तु हैहयसुतो नेत्रः कुन्तेः पिता ततः ।
सोहञ्जिरभवत् कुन्तेः महिष्मान् भद्रसेनकः॥२२॥

अनुवाद- महाराज यदु का वंश परम पवित्र और मनुष्यों के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। जो मनुष्य इसका श्रवण करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।१९।

इस वंश में स्वयं भगवान परंब्रह्म श्रीकृष्ण ने मनुष्य रूप में अवतार लेते  हैं।। यदु के चार पुत्र थे- सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु। सहस्रजित से शतजित का जन्म हुआ। शतजित के तीन पुत्र थे - महाहय, वेणुहय, और हैहय। ।२०-२१।
 इस प्रकार से यह अध्याय- (७) का भाग-(१) यदु के सम्पूर्ण चरित्रों व पुत्रों इत्यादि की सामान्य जानकारी के साथ समाप्त हुआ।
इसके अगले भाग-(२) में विस्तार से जानकारी दी गई है कि यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्रजित से हैहय वंशी यादवों की उत्पत्ति कब और कैसे हुई। जिसमें  सहस्राजित के वंशज सहस्रबाहु अर्जुन के बारे में विशेष जानकारी दी गई है।

भाग- (२) हैहय वंशी यादवों का परिचय।
                          _

जैसा की इसके पिछले अध्याय में बताया जा चुका है कि
यदु के चार प्रमुख पुत्र - सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु नाम से थे। जिसमें सहस्रजित यदु के पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ थे। उसके आगे- सहस्रजित से शतजित का जन्म हुआ। शतजित के तीन पुत्र- महाहय, वेणुहय और हैहय हुए। जिसमें यदु के प्रपौत्र हैहय से धनक हुए और धनक के कुल चार पुत्र- कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा, और कृतौजा हुए। कृतवीर्य के पुत्र - सहस्रबाहु अर्जुन हुए। सहस्रबाहु अर्जुन का जन्म महाराज हैहय की दसवीं पीढ़ी में माता पद्मिनी के गर्भ से हुआ था। राजा कृतवीर्य की सन्तान होने के कारण इन्हें कार्तवीर्य अर्जुन और भगवान दत्तात्रेय से हजार बाहुबल के वरदान के उपरान्त उन्हें सहस्त्रबाहु अर्जुन कहा गया।  
महाराज कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रावण नक्षत्र में प्रात: काल के मुहूर्त में हुआ था। इसी तिथि को उनकी जयन्ती मनाई जाती है। इसके साथ ही कार्तवीर्य अर्जन सुदर्शन चक्र के अवतार भी थे। इसके बारे में आगे बताया गया है।      
सहस्त्रबाहु अर्जुन अपने समय के सबसे बलशाली,  धर्मवत्सल, कुशल कृषक, प्रजापालक और गोपालक चक्रवर्ती अहीर सम्राट थे। इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण के अध्याय-(४३) के- (१८) से (२८) तक के श्लोकों से होती है। जिसमें कार्तवीर्यार्जुन के महत्व को एक नारद नामक गन्धर्व नें उनके यज्ञ में कुछ इस प्रकार गुणगान किया था -

'तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।
समोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता।।१८।

जज्ञे बाहुसहस्रं वै इच्छत स्तस्य धीमतः।
रथो ध्वजश्च सञ्जज्ञे इत्येवमनुशुश्रुमः।।१९ ।

दशयज्ञसहस्राणि राज्ञा द्वीपेषु वै तदा।
निरर्गला निवृत्तानि श्रूयन्ते तस्य धीमतः।। २०।

सर्वे यज्ञा महाराज्ञस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः।
सर्वेकाञ्चनयूपास्ते सर्वाः काञ्चनवेदिकाः।।२१।

सर्वे देवैः समं प्राप्तै र्विमानस्थैरलङ्कृताः।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः।२।

तस्य यो जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा।
कार्तवीर्य्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः।।२३।

न नूनं कार्तवीर्य्यस्य गतिं यास्यन्ति क्षत्रियाः।
यज्ञैर्दानै स्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च।।२४ ।।

स हि सप्तसु द्वीपेषु, खड्गी चक्री शरासनी।
रथीद्वीपान्यनुचरन् योगी पश्यति तस्करान्।।२५।

पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स नराधिपः।
स सर्वरत्नसम्पूर्ण श्चक्रवर्त्ती बभूव ह।२६ ।।

स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव हि।
स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्ज्जुनोऽभवत्।२७।

योऽसौ बाहु सहस्रेण ज्याघात कठिनत्वचा।
भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनैव भास्करः।। २८।

अनुवाद- १८-२८
भावी क्षत्रिय नरेश निश्चय ही यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्रज्ञान के द्वारा कार्तवीर्यार्जुन की समकक्षता को नहीं प्राप्त होंगे। योगी कार्तवीर्यार्जुन रथ पर आरूढ़ हो हाथ में खङ्ग, चक्र और धनुष धारण करके सातों दीपों में भ्रमण करता हुआ चोरों- डाकुओं पर कड़ी दृष्टि रखता था। राजा कार्तवीर्यार्जुन पचासी हजार वर्षों तक भू-तल पर शासन करके समस्त रत्नों से परिपूर्ण हो चक्रवर्ती सम्राट बना रहा। राजा कार्तवीर्यार्जुन ही अपने योग बल से पशुपालक (गोप) था। वही खेतों का भी रक्षक था और वही समयानुसार मेंघ बनकर वृष्टि भी करता था। प्रत्यञ्चा के आघात से कठोर हुई त्वचाओं वाली अपनी सहस्र भुजाओं से वह उसी प्रकार शोभा पता था, जिस प्रकार सहस्रों किरणों से युक्त शारदीय सूर्य शोभित होता है। १८-२८।
         
ज्ञात हो- अयोध्यापति श्रीराम, लंकापति रावण और महिष्मतिपुरी (आधुनिक नाम मध्यप्रदेश का महेश्वर जो नर्मदा नदी के किनारे स्थित है।) के चक्रवर्ती अहीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन लगभग एक ही समय के राजा थे। और जिस रावण को वश में करने और परास्त करने के लिए श्रीराम ने सम्पूर्ण जीवन दाँव पर लगा दिया था, उस रावण को अभीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन ने मात्र पाँच वाणो में परास्त कर बन्दी बना लिया था।

इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण के अध्याय-(४३) के- (३७ से ३९) तक के श्लोकों से होती है। जिसमें एक नारद नाम का एक गंधर्व कार्तवीर्यार्जुन का गुणगान करते हुए कहा -

एवं बध्वा धनुर्ज्यायामुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः।
लङ्कायां मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्।। ३७।  
                             
निर्जित्य बध्वा चानीय माहिष्मत्यां बबन्ध च।
ततो  गत्वा  पुलस्त्यस्तु अर्जुनं सम्प्रसादयत्।। ३८।   
                        
मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनेह सान्त्वितम्।  तस्य  बाहुसहस्रेण  बभूव ज्यातलस्वनः।।३९।

अनुवाद- ३७-३९
इसी प्रकार अर्जुन ने एक बार लंका में जाकर अपने पाँच बाणों द्वारा सेना सहित रावण को मोहित कर दिया, और उसे बलपूर्वक जीत कर अपने धनुष की प्रत्यञ्चा में बांँध लिया, फिर माहिष्मती पुरी में लाकर उसे बन्दी बना लिया। यह सुनकर महर्षि पुलस्त्य (रावण के पितामह) ने माहिष्मती पुरी में जाकर अर्जुन को अनेकों प्रयास से समझा बुझाकर प्रसन्न किया। तब सहस्रबाहु- अर्जुन ने  महर्षि पुलस्त्य को सान्त्वना देकर उनके पौत्र  राक्षस राज रावण को बन्धन मुक्त कर दिया।३७-३९।               
                 
कार्तवीर्यार्जुन कोई साधारण पुरुष नहीं थे। वे साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के अवतार थे। इस बात की पुष्टि- नारदपुराणम्- पूर्वभाग अध्यायः (७६) के श्लोक-( ४ ) से होती है। जिसमें नारद जी कार्तवीर्यार्जुन के बारे में कहते हैं कि -

यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।
दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।। ४।

अनुवाद- ये (कार्तवीर्यार्जुन) पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया। ४

कार्तवीर्यार्जुन सुदर्शन चक्र का अवतार होने के साथ-साथ दत्तात्रेय का वर पाकर अजेय हो गये थे। उस समय कार्तवीर्यार्जुन और परशुराम से कई बार युद्ध हुआ। जिसमें दिव्य शक्ति सम्पन्न कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का बध भी कर दिया था।
किन्तु यह बात कथाकारों को बर्दाश्त नहीं हुई। परिणामतः  इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन को ही परशुराम द्वारा वध करने की पुराणों में एक नई कथा जोड़ दिया।
      
कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का वध किया कि परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन का वध किया, इसकी सच्चाई तभी उजागर हो सकती है जब दोनों के बीच युद्धों का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए।

क्योंकि कि इसमें बहुत घाल- मेल किया गया है। दोनों के बीच हुए युद्धों का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपतिखण्ड के अध्याय- ४० के कुछ प्रमुख श्लोकों से होती है। जिसको नीचे उद्धत किया जा रहा है -

"पतिते तु सहस्राक्षे कार्तवीर्य्यार्जुनः स्वयम्।।
आजगाम महावीरो द्विलक्षाक्षौहिणीयुतः।।३।।

सुवर्णरथमारुह्य रत्नसारपरिच्छदम् ।।
नानास्त्रं परितः कृत्वा तस्थौ समरमूर्द्धनि।।४।।

समरे तं परशुरामो राजेन्द्रं च ददर्श ह ।।
रत्नालंकारभूषाढ्यै राजेन्द्राणां च कोटिभिः ।।५।।

रत्नातपत्रभूषाढ्यं रत्नालंकारभूषितम् ।।
चन्दनोक्षितसर्वांगं सस्मितं सुमनोहरम् ।। ६ ।।

राजा दृष्ट्वा मुनीन्द्रं तमवरुह्म रथादहो ।।
प्रणम्य रथमारुह्य तस्थौ नृपगणैः सह ।। ७ ।।

ददौ शुभाशिषं तस्मै रामश्च समयोचितम् ।।
प्रोवाच च गतार्थं तं स्वर्गं गच्छेति सानुगः।।८।।

उभयोः सेनयोर्युद्धमभवत्तत्र नारद।
पलायिता रामशिष्या भ्रातरश्च महाबलाः।
क्षतविक्षतसर्वाङ्गाः कार्त्तवीर्य्यप्रपीडिताः।।९।

नृपस्य शरजालेन रामः शस्त्रभृतां वरः ।।
न ददर्श स्वसैन्यं च राजसैन्यं तथैव च ।।१०।

चिक्षेप रामश्चाग्नेयं बभूवाग्निमयं रणे ।।
निर्वापयामास राजा वारुणेनैव लीलया ।।११।।

चिक्षेप रामो गान्धर्वं शैलसर्पसमन्वितम् ।।
वायव्येन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।१२।

चिक्षेप रामो नागास्त्रं दुर्निवार्य्यं भयंकरम् ।।
गारुडेन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।।१३।

माहेश्वरं च भगवांश्चिक्षेप भृगुनन्दनः ।।
निर्वापयामास राजा वैष्णवास्त्रेण लीलया ।।१४ ।।

ब्रह्मास्त्रं चिक्षिपे रामो नृपनाशाय नारद ।।
ब्रह्मास्त्रेण च शान्तं तत्प्राणनिर्वापणं रणे ।। १५ ।।

दत्तदत्तं च यच्छूलमव्यर्थं मन्त्रपूर्वकम् ।।
जग्राह राजा परशुरामनाशाय संयुगे ।। १६ ।।

शूलं ददर्श रामश्च शतसूर्य्यसमप्रभम् ।।
प्रलयाग्रिशिखोद्रिक्तं दि रि नि वाक्य सुरैरपि ।। १७ ।।

पपात शूलं समरे रामस्योपरि नारद ।।
मूर्च्छामवाप स भृगुः पपात च हरिं स्मरन् ।।१८।।

पतिते तु तदा रामे सर्वे देवा भयाकुलाः ।।
आजग्मुः समरं तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।।१९।

शङ्करश्च महाज्ञानी महाज्ञानेन लीलया ।।
ब्राह्मणं जीवयामास तूर्णं नारायणाज्ञया ।। 3.40.२० ।।

भृगुश्च चेतनां प्राप्य ददर्श पुरतः सुरान् ।।
प्रणनाम परं भक्त्या लज्जानम्रात्मकन्धरः।।२१ ।।

राजा दृष्ट्वा सुरेशांश्च भक्तिनम्रात्मकन्धरः ।।
प्रणम्य शिरसा मूर्ध्ना तुष्टाव च सुरेश्वरान् ।।२२।

तत्राजगाम भगवान्दत्तात्रेयो रणस्थलम् ।।
शिष्यरक्षानिमित्तेन कृपालुर्भक्तवत्सलः ।२३।

भृगुः पाशुपतास्त्रं च सोऽग्रहीत्कोपसंयुतः ।।
दत्तदत्तेन दृष्टेन बभूव स्तम्भितो भृगुः ।।२४।।

ददर्श स्तम्भितो रामो राजानं रणमूर्द्धनि ।।
नानापार्षदयुक्तेन कृष्णेनाऽऽरक्षितं रणे ।।२५।।

सुदर्शनं प्रज्वलन्तं भ्रमणं कुर्वता सदा ।।
सस्मितेन स्तुतेनैव ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ।।२६।

गोपालशतयुक्तेन गोपवेषविधारिणा ।।
नवीनजलदाभेन वंशीहस्तेन गायता ।२७।

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वाग्बभूवाशरीरिणी ।।
दत्तेन दत्तं कवचं कृष्णस्य परमात्मनः ।। २८ ।


राज्ञोऽस्ति दक्षिणे बाहौ सद्रत्नगुटिकान्वितम् ।
गृहीतकवचे शम्भौ भिक्षया योगिनां गुरौ ।।२९।

तदा हन्तुं नृपं शक्तो भृगुश्चेति च नारद ।।
श्रुत्वाऽशरीरिणीं वाणीं शङ्करो द्विजरूपधृक्।। ३०।।

भिक्षां कृत्वा तु कवचमानीय च नृपस्य च।।
शम्भुना भृगवे दत्तं कृष्णस्य कवचं च यत् ।। ३१।।

रामस्ततो राजसैन्यं ब्रह्मास्त्रेण जघान ह ।।
नृपं पाशुपतेनैव लीलया श्रीहरिं स्मरन् ।।७२ ।

अनुवाद- ३ से ७२ तक
• सहस्राक्ष के गिर जाने पर महाबली कार्तवीर्यार्जुन दो लाख अक्षौहिणी सेना के साथ स्वयं युद्ध करने के लिए आया।

•वह रत्ननिर्मित खोल से आच्छादित स्वर्णमय रथपर सवार हो अपने चारों ओर नाना प्रकार के अस्त्रों को सुसज्जित करके रण के मुहाने पर डटकर खड़ा हो गया।

• इसके बाद वहाँ दोनों सेनाओं में युद्ध होने लगा तब परशुराम के शिष्य तथा उसके महाबली भाई कार्तवीर्य से पीड़ित होकर भाग खड़े हुए।

•उस समय उनके सारे अंग घायल हो गए थे। राजा के बाणसमूह से अच्छादित होने के कारण शास्त्रधारियों में श्रेष्ठ परशुराम को अपनी तथा राजा की सेना भी नहीं दिख रही थी।

• फिर तो परस्पर घोर दिव्यास्त्रों का प्रयोग होने लगा। अन्त में राजा (कार्तवीर्य) ने दत्तात्रेय के दिए हुए अमोघ शूल को यथाविधि मन्त्रों का पाठ करके परशुराम पर छोड़ दिया।

• उस सैकड़ों सूर्य के समान प्रभावशाली एवं प्रलयाग्नि की शिखा के सदृश शूल के लगते ही परशुराम धराशायी हो गये।

• तदनन्तर भगवान शिव ने वहाँ जाकर परशुराम को पुनर्जीवनदान दिया (पुनः जीवित किया)।

• इसी समय वहाँ युद्ध स्थल में भक्तवत्सल कृपालु भगवान दत्तात्रेय अपने शिष्य (कार्तवीर्य) की रक्षा करने के लिए आ पहुँचे। फिर परशुराम ने क्रुद्ध होकर पाशुपतास्त्र हाथ में लिया, परन्तु दत्तात्रेय की दृष्टि पड़ने से वह (परशुराम) पाशुपत अस्त्र सहित रणभूमि में स्तम्भित (जड़वत्) हो गये।

• तब रणके मुहाने पर स्तम्भित हुए परशुराम ने देखा कि जिनके शरीर की कान्ति नूतन जलधार के सदृश्य है, जो हाथ में वँशी लिए बजा रहे हैं, सैकड़ो गोप जिनके साथ हैं, जो मुस्कुराते हुए राजा कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा के लिए अपने प्रज्वलित सुदर्शन चक्र को निरन्तर घुमा रहे हैं।

•और अनेकों पार्षदों से गिरे हुए हैं, एवं ब्रह्मा, विष्णु, और महेश्वर जिनका स्तवन कर रहे हैं, वे गोपवेषधारी श्रीकृष्ण युद्ध क्षेत्र में राजा (कार्तवीर्य) की रक्षा कर रहे हैं।

• इसी समय वहाँ इस प्रकार आकाशवाणी हुई- दत्तात्रेय के द्वारा दिया हुआ परमात्मा श्रीकृष्ण का कवच उत्तम रत्न की गुटका के साथ राजा की दाहिनी भुजा पर बँधा हुआ है, अतः योगियो के गुरु शंकर भिक्षारूप से जब उस कवच को माँग लेंगे, तभी परशुराम राजा कार्तवीर्यार्जुन का वध करने में समर्थ हो सकेंगे।

• नारद ! उस आकाशवाणी को सुनकर शंकर  एक ब्राह्मण का रूप धारण करके गए और राजा से याचना करके उसका कवच माँग लाये। फिर शम्भू ने श्रीकृष्ण का वह कवच परशुराम को दे दिया।

• तत्पश्चात परशुराम ने श्रीहरि का स्मरण करते हुए ब्रह्मास्त्र द्वारा राजा की सेना का सफाया कर दिया और फिर लीलापूर्वक पशुपतास्त्र का प्रयोग करके राजा कार्तवीर्यार्जुन की जीवन लीला समाप्त कर दी।
   
                  (युद्ध विश्लेषण)

यदि उपर्युक्त श्लोक संख्या- (२५ से २८) पर विचार किया जाए तो रणभूमि में कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा परमेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं अपने सैकड़ो गोपों एवं पार्षदों के साथ कर रहे होते हैं। तो उस स्थिति में ब्रह्माण्ड का न दैत्य, न देवता, न किन्नर, न गन्धर्व, और ना ही कोई मनुष्य कार्तवीर्यार्जुन का बाल बाँका कर सकता था। परशुराम की बात करना तो बहुत दूर है।

• दूसरी बात यह कि- श्लोक संख्या - (१८ से २०) में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि- युद्ध में कार्तवीर्यार्जुन के भयंकर शूल के आघात से परशुराम मारे जाते हैं। किन्तु शिव जी द्वारा उन्हें पुनः जीवित कर दिया जाता है।
यहाँ सोचने वाली बात है कि कोई मरने के बाद पुनः जीवित होता है क्या ? जवाब होगा नहीं। तो फिर परशुराम  जीवित कैसे हो गये ? यह बात भी हजम नहीं होती।

• तीसरी बात यह कि- श्लोक संख्या (२८ से २९) में लिखा गया है कि- परमात्मा श्रीकृष्ण का कवच जो कार्तवीर्यार्जुन की दाहिनी भुजा पर बँधा हुआ था उसी से कार्तवीर्यार्जुन की रणभूमि में रक्षा हो रही होती है, और उसे शिवजी ब्राह्मण वेष में आकर भिक्षा के रूप में माँगते हैं और राजा कार्तवीर्यार्जुन उस कवच को सहर्ष दे देते हैं।

यहाँ पर विचारणीय बात यह है कि- क्या राजा को उस समय इतना ज्ञान नहीं था कि युद्धभूमि में अचानक एक ब्रह्मण भिखारी भिक्षा में धन दौलत न माँगकर रक्षा कवच क्यों माँग रहा है ? और सोचने वाली बात यह है की जिस कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कर रहे हों उस समय कोई भिखारी उसके प्राणों के समान कवच माँगे और अन्तर्यामी भगवान मूकदर्शक बने रहे। यह सम्भव नहीं लगता ? और ना ही
यह बात किसी भी तरह से हजम हो सकती है।      
अतः इन तमाम तर्कों के आधार पर सिद्ध होता है कि निश्चय ही कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का वध कर दिया था। किन्तु यह बात कथाकारों को गले से नींचे नहीं उतरी। परिणाम यह हुआ कि कथाकारों नें एक नई कहानी जोड़कर इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन का वध परशुराम से करा दिया।

• चौथी बात यह कि- अगर कार्तवीर्यार्जुन का वध हुआ होता तो शास्त्रों में उनकी पूजा का विधान कभी नहीं होता। क्योंकि युद्ध में मारे गये व्यक्ति की पूजा नहीं होती है।  जबकि कार्तवीर्यार्जुन का विधिवत पूजा करने का शास्त्रों में विधान किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि सहस्रबाहु अर्जुन का बध नहीं हुआ था।
पूराणों में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने के विधान की पुष्टि- श्रीबृहन्नारदीयपुराण पूर्वभागे बृहदुपाख्यान तृतीयपाद कार्तवीर्यमाहात्म्यमन्त्रदीपकथनं नामक - (७६) वें अध्याय से होती है। परन्तु परशुराम कि पूजा का विधान किसी पुराण में नहीं है।
नारद पूराण में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने का विधान
नारद और सनत्कुमार संवाद के रूप में जाना जाता है। जिसमें नारद के पूछे जाने पर सनत्कुमार जी कहते हैं-

                  "नारद उवाच।
"कार्तवीर्यतप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि।
जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः।। १।

तत्कथं राजवर्योऽसौ लोकेसेव्यत्वमागतः।
समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतन्मे नुद संशयम्।। २।

अनुवाद:-
• देवर्षि नारद कहते हैं ! पृथ्वी पर कार्तवीर्य आदि राजा अपने कर्मानुगत होकर उत्पन्न होते और विलीन हो जाते हैं।
• तब उन्हीं सभी राजाओं को लाँघकर कार्तवीर्य किस प्रकार सन्सार में पूज्य हो गये यही मेरा संशय है। १-२।

             "सनत्कुमार उवाच"
श्रृणु  नारद !  वक्ष्यामि सन्देहविनिवृत्तये।
यथा सेव्यत्वमापन्नः कार्तवीर्यार्जुनो भुवि।।३

अनुवाद:- सनत्कुमार ने कहा ! हे नारद ! मैं आपके संशय की निवृति हेतु वह तथ्य कहता हूँ। जिस प्रकार से कार्तवीर्य अर्जुन पृथ्वी पर पूजनीय (सेव्यमान) कहे गये हैं सुनो ! । ३।

यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।
दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।। ४।

तस्य  क्षितीश्वरेंद्रस्य स्मरणादेव  नारद।
शत्रूञ्जयति संग्रामे नष्टं प्राप्नोति सत्वरम्।। ५।

तेनास्य मन्त्रपूजादि सर्वतन्त्रेषु  गोपितम्।
तुभ्यं प्रकाबशयिष्येऽहं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।। ६।

अनुवाद:- ४ से ६

• ये सहस्रबाहु अर्जुन पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया।
हे नारद ! कार्तवीर्य अर्जुन के स्मरण मात्र से ही पृथ्वी पर विजय लाभ की प्राप्ति होती है। शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त होती है। तथा शत्रु का नाश भी शीघ्र ही हो जाता है।

• कार्तवीर्य अर्जुन का मन्त्र सभी तन्त्रों में गुप्त है। मैं सनत्कुमार आपके लिए इसे आज प्रकाशित करता हूँ। जो सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। ४ से ६।

वह्नितारयुता रौद्री लक्ष्मीरग्नींदुशान्तियुक्।वेधाधरेन्दुशांत्याढ्यो निद्रयाशाग्नि बिन्दुयुक्।। ७।

पाशो मायांकुशं पद्मावर्मास्त्रे कार्तवीपदम्।
रेफोवा द्यासनोऽनन्तो वह्निजौ कर्णसंस्थितौ।। ८।


मेषः सदीर्घः पवनो मनुरुक्तो हृदंतिमः।
ऊनर्विशतिवर्णोऽयं तारादिर्नखवर्णकः।।९।

दत्तात्रेयो मुनिश्चास्यच्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम्।
कार्तवीर्यार्जुनो देवो  बीजशक्तिर्ध्रुवश्च हृत्।। १०।

शेषाढ्यबीजयुग्मेन   हृदयं   विन्यसेदधः।
शान्तियुक्तचतुर्थेन कामाद्येन शिरोंऽगकम्। ११।

इन्द्वाढ्यं  वामकर्णाद्यमाययोर्वीशयुक्तया।शिखामंकुशपद्माभ्यां सवाग्भ्यां वर्म विन्यसेत्।।१२।

वर्मास्त्राभ्यामस्त्रमुक्तं शेषार्णैर्व्यापकं पुनः।
हृदये  जठरे  नाभौ  जठरे  गुह्यदेशतः।। १३।

दक्षपादे वामपादे सक्थ्नि जानुनि जङ्घयोः। विन्यसेद्बीजदशकं  प्रणवद्वयमध्यगम् ।।१४ ।।

ताराद्यानथ   शेषार्णान्मस्तके   च   ललाटके।
भ्रुवोः श्रुत्योस्तथैवाक्ष्णोर्नसि वक्त्रे गलेंऽसके ।।१५ ।।

सर्वमन्त्रेण सर्वांगे कृत्वा व्यापकमादृतः।
सर्वेष्टसिद्धये ध्यायेत्कार्तवीर्यं जनेश्वरम् ।। १६।।

उद्यद्रर्कसहस्राभं  सर्वभूपतिवन्दितम् ।
दोर्भिः पञ्चाशता दक्षैर्बाणान्वामैर्धनूंषि च।।१७ ।।

दधतं स्वर्णमालाढ्यं  रक्तवस्त्रसमावृतम्।
चक्रावतारं श्रीविष्णोर्ध्यायेदर्जुनभूपतिम् ।१८।

अनुवाद- ७ से १८
इनकी कान्ति (आभा) हजारों उदित सूर्यों के समान है। सन्सार के सभी राजा इनकी वन्दना अर्चना करते हैं। सहस्रबाहु के (500) दक्षिणी हाथों में वाण और (500) उत्तरी (वाम) हाथों में धनुष हैं। ये स्वर्ण मालाधारी तथा रक्वस्त्र (लाल वस्त्र) से समावृत (लिपटे हुए) हैं। ऐसे श्रीविष्णु के चक्रावतार राजा सुदर्शन का ध्यान करें।

• इनका वह मन्त्र उन्नीस अक्षरों का है‌ यह मूल में श तक वर्णित है। इसका मन्त्रोद्धार विद्वान जन करें अत: इसका अनुवाद करना भी त्रुटिपूर्ण होगा इस मन्त्र के ऋषि दत्तात्रेय हैं। छन्द अनुष्टुप् और देवाता हैं कार्तवीर्य अर्जुन " बीज है ध्रुव- तथा शक्ति है हृत् - शेषाढ्य बीज द्वय से हृदय न्यास करें।  शन्तियुक्त- चतुर्थ मन्त्रक्षर से शिरोन्यास इन्द्राढ्यम् से वाम कर्णन्यास अंकुश तथा पद्म से शिखान्यास वाणी से कवचन्यास करें हुँ फट् से अस्त्रन्यास करें। तथा शेष अक्षरों से पुन: व्यापक न्यास करना चाहिए इसके बाद सर्व सिद्धि हेतु जनेश्वर (लोगों के ईश्वर) कार्तवीर्य का चिन्तन करें।७-१८।

अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि कार्तवीर्यार्जुन का वध एक कपोल-कल्पना मात्र है।
जिसे बाद में जोड़कर एक नई कहानी उसी तरह से गढ़ दी गई जैसे भगवान श्रीकृष्ण को एक बहेलिया से मारे जाने की रची गई है।
अगर परशुराम द्वारा कार्तवीर्यार्जुन के वध की धटना सत्य होती तो पुराणों में कार्तवीर्यार्जुन के पूजा का विधान नहीं किया जाता और नाही कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को उनकी जयन्ती मनाई जाती।
       
उपर्युक्त दर्शायी गयी ब्रह्मवैवर्तपुराण की पौराणिक घटना के समान तथ्य अन्य पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है। जैसे-
लक्ष्मीनारायणसंहिता - खण्ड प्रथम (कृतयुगसन्तानः) अध्यायः (४५८ ) में परशुराम और सहस्रबाहू युद्ध का वर्णन इस प्रकार किया गया है। वहाँ से भी इसकी जानकारी ली जा सकती है।

इस प्रकार से अध्याय- (७) का भाग- (२) यदु के ज्येष्ठ पुत्र से उत्पन्न हैहय वंशी अहीर चक्रवर्ती सम्राट कार्तवीर्यार्जुन की महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ समाप्त हुआ। अब इस अध्याय के अगले भाग-(३) में महाराज यदु के पुत्र क्रोष्टा की पीढ़ी में आगे चलकर महान अन्धक और वृष्णि यादवों की उत्पत्ति कैसे हुई ? और उसमें आगे चलकर वृष्णि कुल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का अवतरण कैसे हुआ ?इत्यादि इत्यादि घटनां को बताया गया है।।


भाग- (३)
यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज
                               ___


इस अध्याय के भाग- (३) का मुख्य उद्देश्य यादव वंश की चारित्रिक वंशावली का व्याख्यान करते हुए गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लौकिक चरित्र को भी स्पष्ट करना है। तो उसके लिए यदु के पुत्र क्रोष्टा को ही लेकर चलेंगे जहांँ क्रोष्टा की ही पीढ़ी में आगे चलकर अन्धक और वृष्णि नामक दो महान विभूतियों का उदय हुआ। जिसमें वृष्णि के वंशजों में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ तथा अन्धक के वंशजों में गोपेश्वर श्रीकृष्ण की ननिहाल (माता का कुल हुआ)।
इसके पिछले भाग में यदु के प्रथम व ज्येष्ठ पुत्र हैहय वंशी यादवों के बारे में बताया जा चुका है। उसी क्रम में यदु के दूसरे पुत्र- क्रोष्टा के पुत्र वृजिनीवान हुए। इसी वृजिनीवान की पीढ़ी में में आगे चलकर ज्यमाघ हुए  जिनकी पत्नी शैव्या से विदर्भ हुए। फिर विदर्भ की पत्नी भोज्या से तीन पुत्र- कुश, क्रथ और रोमपाद हुए। जिसमें रोमपाद के दो पुत्र- बभ्रु और कृति हुए। इनमें से कृति के  पुत्र- चेदि हुए जिनसे यादवों की शाखा में चेदि वंश का उदय हुआ। फिर इसी चेदि की पीढ़ी में दमघोष हुए। जिनका विवाह श्रीकृष्ण की वपस्वसा (बुआ) श्रुतिश्रवा से हुआ था। फिर इसी श्रुतिश्रवा और दमघोष से शिशुपाल का जन्म हुआ, जो भगवान श्रीकृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी  था।
  
              
अब हम लोग विदर्भ के दूसरे पुत्र- क्रथ को लेकर आगे बढ़ेंगे। तो विदर्भ के दूसरे पुत्र- क्रथ के कुन्ति हुए। फिर कुन्ति के वृष्णि (प्रथम) हुए। फिर वृष्णि के निवृत्ति, निवृत्ति के दशार्ह हुए। दशार्ह के व्योम, व्योम के जीमूत, जीमूत के पुत्र विकृति हुए। विकृति के भीमरथ, भीमरथ के नवरथ, नवरथ के दशरथ, दशरथ के शकुनि, शकुनि के करम्भ, करम्भि के पुत्र देवरात हुए।
देवरात के मधु, मधु के कुरुवश, कुरुवश के अनु, अनु के पुरूहोत्र, पुरूहोत्र के आयु (सात्वत) हुए। इस सात्वत के कुल सात पुत्र - भजि, दिव्य, वृष्णि (द्वितीय), अन्धक, और महाभोज हुए।
देखा जाए तो यादव वंश में कुल चार वृष्णि थे। जिनको इस तरह से भी समझा जा सकता है -

(१)- प्रथम वृष्णि- हैहय वंशी यादवों के सहस्रबाहु के पुत्र जयध्वज के वंशज मधु के ज्येष्ठ पुत्र थे।
(२)- द्वितीय वृष्णि- विदर्भ के पौत्र कुन्ति के एक पुत्र का नाम भी वृष्णि था। यह सात्वत से पूर्व के यादव वृष्णि हैं।
३- तृतीय वृष्णि- सात्वत के कनिष्ठ (सबसे छोटे) पुत्र का नाम वृष्णि था। यह वृष्णि अन्धक के ही भाई थे।
(विदित हो सातवीं पीढ़ी पर गोत्र बदल जाता है।)
४- चतुर्थ वृष्णि- सात्वत पुत्र वृष्णि के पौत्र (नाती) थे । अनमित्र के तीसरे पुत्र का नाम भी वृष्णि ही था यही अन्तिम वृष्णि सात्वत शाखा में थे।


इन चारो वृष्णियों में से हम प्रमुख रूप से सात्वत पुत्र वृष्णि (तृतीय) को ही लेकर आगे चलेंगे जो क्रोष्टा की पीढ़ी में सात्वत पुत्र वृष्णि (द्वितीय) हैं।
इनके पूर्व सहस्रबाहु के पुत्र जयध्वज के वंशजों में मधु यादव राजा हुए। सौ पुत्रों में वृष्णि नाम से भी एक राजा हुए। तभी यादव माधव और वार्ष्णेय यादवों का विशेषण  हुआ और उन्हीं के नाम और मधु के गुणों तथा यदु के कारण यादव वंश के सदस्यपतियों को यादव, माधव और वार्ष्णेय नाम से जाना गया। इसकी पुष्टि- भागवत पुराण - (9/23/30) से होती है जिसमें लिखा गया है कि -

"माधवा वृष्णयो राजन् यादवाश्चेति संज्ञिताः।
यदुपुत्रस्य च क्रोष्टोः पुत्रो वृजिनवांस्ततः॥


अनुवाद- परीक्षित् ! इन्हीं मधु, वृष्णि और यदु के कारण यह वंश माधव, वार्ष्णेय और यादव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।३०।  
 
पुनः सात्वत के सात पुत्रों में वृष्णि (द्वितीय) के दो पुत्र- सुमित्र और युद्धाजित हुए। जिसमें युद्धाजित के शिनि और अनमित्र दो पुत्र हुए। फिर अनमित्र के तीन पुत्र- निघ्न, शिनि (द्वितीय), और वृष्णि (तृतीय) हुए। इस तृतीय वृष्णि के भी दो पुत्र- श्वफलक और चित्ररथ हुए।
जिसमें श्वफलक की पत्नी गान्दिनी से अक्रूर जी का जन्म हुआ जो यादवों की सुरक्षा को लेकर सदैव तत्पर रहते थे। उसी क्रम में श्वफलक के भाई चित्ररथ के भी दो पुत्र - पथ और विदुरथ हुए। फिर इस विदुरथ के शूर, हुए। शूर के भजमान (द्वितीय), भजमान (द्वितीय) के शिनि (तृतीय), शिनि (तृतीय) के स्वयमभोज, स्वयमभोज के हृदीक, हृदीक के देवमीढ हुए।
चित्ररथ नाम से शूरसेन और कहीं शूरसेन के पिता देवमीढ को भी वर्णित किया गया है।
(ii) शूरसेन के पिता देवमीढ़ का दूसरा नाम भी  चित्ररथ " था। (महाभारत अनुशासन पर्व, अध्याय 147, श्लोक 29)
           
देवमीढ की तीन पत्नियाँ- अश्मिका, सतप्रभा और गुणवती थीं। 
जिसमें देवमीढ की पत्नी अश्मिका से शूरसेन का जन्म हुआ। इस शूरसेन की पत्नी का नाम मारिषा था, जिससे कुल दस पुत्र हुए। उन्हीं दस पुत्रों में धर्मवत्सल वसुदेव जी भी थे। जिसमें वसुदेव जी की बहुत सी पत्नियाँ थीं किन्तु मुख्य रूप से दो ही पत्नियाँ- देवकी और रोहिणी प्रसिद्ध थीं। जिसमें वसुदेव और देवकी से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। तथा वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम जी का जन्म हुआ।

इस प्रकार से हम लोग भक्तिभाव के साथ गोपेश्वर श्रीकृष्ण के यहांँ पहुंँच गए।

किन्तु बिना नन्दबाबा के यहांँ पहुंँचे श्रीकृष्ण की बात अधूरी ही रहेगी। तो नन्दबाबा के यहांँ पहुंँचने के लिए हमें पुनः देवमीढ की दूसरी पत्नी गुणवती तक जाना होगा। किन्तु इसके पहले देवमीढ की दूसरी पत्नी सतप्रभा को भी जान लें कि- देवमीढ की पत्नी सतप्रभा से एक कन्या- सतवती हुई।
     
अब हम पुनः देवमीढ की पत्नी गुणवती की तरफ रूख करते हैं जहाँ नन्दबाबा मिलेंगे। तो देवमीढ की तीसरी पत्नी गुणवती से- अर्जन्य, पर्जन्य और राजन्य नामक तीन पुत्र हुए। इन पुत्रों में से हम पर्जन्य को ही लेकर आगे बढ़ेंगे।

तो पर्जन्य की पत्नी  का नाम वरियसी था। इसी वरियसी और पर्जन्य से कुल पाँच पुत्र- उपनन्द, अभिनन्द, नन्द (नन्दबाबा), सुनन्द, और नन्दन हुए।
पर्जन्य के कुल पाँच पुत्रों में नन्दबाबा अधिक लोकप्रिय थे। पारिवारिक दृष्टिकोण से नन्दबाबा और वासुदेव जी आपस के भाई ही थे, क्योंकि ये दोनों देवमीढ के परिवार से ही सम्बन्धित थे। नन्दबाबा की पत्नी का नाम यशोदा था। जिससे विन्ध्यवासिनी (योगमाया) अथवा एकानंशा नाम की एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ। इसकी पुष्टि- श्रीमार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य अध्याय- ११ के श्लोक- ४१-४२ से होती है। जिसमें योगमाया स्वयं अपने जन्म के बारे में कहती हैं कि -

वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥४१॥

नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ४२॥

अनुवाद- ४१-४२
• वैवस्वत मन्वन्तर में अठाईसवां द्वापर युग आने पर शुम्भ और निशुम्भ जैसे दूसरे महासुर उत्पन्न होंगे ।
• तब नन्दगोप के घर में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हो विन्ध्याचल निवासिनी के रूप में उन दोनों का नाश करुँगी।
✴️ ज्ञात हो- योगमाया को जन्म लेते ही वसुदेव जी अपने नवजात शिशु श्रीकृष्ण को योगमाया के स्थान पर रखकर योगमाया को लेकर कंस के बन्दीगृह में पुनः पहुँच गए। और जब कंस को यह पता चला कि देवकी को आठवीं सन्तान पैदा हो चुकी है तो वह बन्दीगृह में पहुँच कर योगमाया को ही देवकी का आठवाँ पुत्र समझकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा, किन्तु योगमाया उसके हाथ से छूटकर कंस को यह कहते हुए आकाश मार्ग से विन्ध्याचल पर्वत पर चली गईं कि- तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है। वही योगमाया विन्ध्याचल पर्वत पर आज भी यादवों की प्रथम कुल देवी के रूप विराजमान है।
       
इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण भक्त गोपाचार्य हंस श्रीमाता प्रसाद जी कहना है कि- "कुलदेवी या कुल देवता उसी को कहा जाता है जो कुल की रक्षा करते हैं।

योगमाया विन्ध्यवासिनी को श्रीकृष्ण सहित समस्त यादवों की रक्षा करने वाली कुल देवी और श्रीकृष्ण को कुल देवता होने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- ४ के श्लोक- ४६, ४७ और ४८ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसंघसुपूजिता ।
पुत्रवत् पाल्यमाना सा वसुदेवाज्ञया तदा।४६ ।

विद्धि चैनामथोत्पन्नामंशाद् देवीं प्रजापतेः ।
एकानंशां योगकन्यां रक्षार्थं केशवस्य तु ।४७ ।

तां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः ।
देववद् दिव्यवपुषा कृष्णः संरक्षितो यया ।४८।

अनुवाद- ४६ से ४८
• वहाँ (विन्ध्याचल पर्वतपर) वृष्णी वंशी यादवों के समुदाय से भली-भाँति पूजित हो वह कन्या बढ़ने लगी। वसुदेव की आज्ञा से उसका पुत्रवत पालन होने लगा।
• इस देवी (विन्ध्यवासिनी) को प्रजा पालक भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुई समझो। वह एक होती हुई अनंंशा (अंश रहित) अर्थात अविभक्त थी, इसीलिए एकानंशा कहलाती थी। योग बल से कन्या रूप में प्रकट हुई वह देवी भगवान श्री कृष्ण की रक्षा के लिए आविर्भूत हुई थी।
• यदुकुल में उत्पन्न सभी लोग उस देवी को आराध्य देव के समान पूजन करते थे, क्योंकि उसने अपनी दिव्यदेह से श्रीकृष्ण की भी रक्षा की थी।
तभी से समस्त यादव समाज विन्ध्यवासिनी योगमाया को प्रथम कुल देवी तथा गोपेश्वर श्रीकृष्ण को कुल देवता मानकर परम्परागत रूप से पूजते हैं।
✴️ ज्ञात हो- नन्दबाबा को योगमाया विन्ध्यवासिनी के अतिरिक्त एक भी पुत्र नहीं हुआ। इसलिए उनका वंश आगे तक नहीं चल सका। इस लिए किसी को नन्दवंशी यादव कहना उचित नहीं है।
        
इस प्रकार से अब तक हम लोग क्रोष्टा के पीढ़ी की कठिन डगर को पार करते हुए वसुदेव जी तथा उनके भाई नन्दबाबा के यहाँ से होते हुए श्रीकृष्ण, बलराम और योगमाया विन्ध्यवासिनी के यहाँ पहुँच गये।
        
अब हमलोग यदुवंश शिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण की ननिहाल को जानेंगे कि- क्रोष्टा की किस पीढ़ी में श्रीकृष्ण का ननिहाल था।

तो इस बात को पहले ही बताया जा चुका है कि - सात्वत के कुल सात पुत्र - भजि, दिव्य, वृष्णि (द्वितीय), अन्धक, और महाभोज हुए।
जिसमें हमलोग सात्वत के पुत्र वृष्णि (द्वितीय) के कुल में उत्पन्न श्रीकृष्ण को जाना। अब हमलोग सात्वत के पुत्र- अन्धक के कुल को जानेंगे जहाँ भगवान श्रीकृष्ण का ननिहाल मिलेगा।

सात्वत पुत्र अन्धक के कुल चार पुत्र- कुकुर, भजमान, सुचि और कम्बलबर्हिष हुए। जिसमें अन्धक के ज्येष्ठ पुत्र वह्नि थे। इस वह्नि के विलोमा, विलोमा के कपोतरोमा, कपोतरोमा के अनु और अनु के अन्धक (द्वितीय) हुए। इस अन्धक (द्वितीय) के दुन्दुभि हुए और दुन्दुभि के अरिहोत्र, अरिहोत्र के पुनर्वसु हुए।
      
 फिर पुनर्वसु के एक पुत्र आहुक तथा एक पुत्री आहुकी नाम की थी। जिसमें पुनर्वसु के पुत्र आहुक की पत्नी का नाम शैव्या था। इसी पुनर्वसु और शैव्या से दो पुत्र - देवक और उग्रसेन हुए। जिसमें पुनर्वसु के पुत्र देवक की सात कन्याएं - पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी थीं। देवी तुल्य इन सातो पुत्रियों का विवाह वृष्णिवंशी वासुदेव जी से हुआ था।
इन्हीं सातों में से देवकी के उदरगर्भ से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।

इस तरह से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ननिहाल मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र देवक के यहाँ थी। और इसी देवक के सगे भाई उग्रसेन थे, जो मधुपुरा( मथुरा के प्रजापालक राजा थे। उनकी की पत्नी का नाम पद्मावती था। इसी पद्मावती और उग्रसेन से महत्वाकांक्षी कंस का जन्म हुआ। कंस अपने पिता अग्रसेन को बन्दी बनाकर स्वयं मथुरा का राजा बना और प्रजा पर नाना प्रकार का अत्याचार करने लगा। कंस बल और पराक्रम में अजेय था। वह अपने समय में बड़े-बड़े दैत्य को पराजित कर अधिक शक्ति सम्पन्न होकर समस्त देवों को भी जीत लिया था।
उस समय भूतल पर उसके जैसा बलवान राजा कोई नहीं था। किन्तु जब कंस के पापों का घड़ा भर गया, तब किशोर श्रीकृष्ण उसके ही दरबार में उसका वध करके पुनः अग्रसेन को मथुरा का राजा बनाकर स्वयं मथुरा की रक्षा करते हुए पृथ्वी के भार को दूर किया।
     
             
इस प्रकार से यह अध्याय- अध्याय-(७) का भाग- (तीन) यादव वंश के अन्तर्गत क्रोष्टा कुल के भगवान श्रीकृष्ण सहित प्रमुख सदस्यपतियों तथा उनके वंश क्रम की जानकारी के साथ समाप्त हुआ।
          
अब इसके अगले अध्याय-(८) के भाग- (१)-  में यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने का खण्डन तथा भाग- (२) में श्रीकृष्ण का गोलोक गमन इत्यादि के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है।

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कल के लिए

इन दोनों विद्वानों को आश्रम के वातावरण में 'यदुवंश संहिता' और 'श्रीकृष्णसाराङ्गणी' लिखते हुए
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बुधवार, 27 मई 2026

​आध्यात्मिक चेतना के उद्घोषक और स्वानुभूत सत्य के संवाहक यादव योगेश कुमार रोहि जी के अंतस से प्रस्फुटित विचार-

ओ३म

​आध्यात्मिक चेतना के उद्घोषक और स्वानुभूत सत्य के संवाहक यादव योगेश कुमार रोहि जी के अंतस से प्रस्फुटित विचार केवल शब्द नहीं, अपितु आत्मा के धरातल पर कसी गई कसौटियां हैं। साधना, कर्म और जीवन के अंतर्द्वंद्व को स्पष्ट करती उनकी यह विचार-शृंखला मानव मात्र के कल्याण के लिए एक अनुपम उपदेश है:

​१. वैचारिक मंथन और ज्ञान की उत्पत्ति

"मन एक समुद्र है, जिसमें विचारों की लहरें निरंतर उद्वेलित होती रहती हैं। जब इन विचारों का आपस में आघात-प्रत्याघात (मंथन) होता है, तब ज्ञान के दिव्य बुलबुले उत्पन्न होते हैं; और इन बुलबुलों के भीतर 'सिद्धांत' की प्राणवायु (ऑक्सीजन) समाहित होती है।"


उपदेशपरक आलोक:

जैसे क्षीरसागर के मंथन से अमृत की प्राप्ति हुई थी, वैसे ही मानव का मन भी एक असीम समंदर है। सांसारिक द्वंद्वों, सुख-दुख और अनुभवों का जब इस मन में घर्षण होता है, तभी विवेक जागृत होता है। बिना वैचारिक मंथन के सच्चा ज्ञान संभव नहीं है। जब आपके विचार सिद्धांतों की कसौटी पर खरे उतरते हैं, तो वही ज्ञान जीवन को संजीवनी (ऑक्सीजन) प्रदान करता है। इसलिए, अपने भीतर चलने वाले विचारों के झंझावातों से डरें नहीं, बल्कि उन्हें मथकर सत्य के सिद्धांत को आत्मसात करें।

​२. साधना, संयम और बाह्य स्वरूप का मर्म

​साधना के पथ पर अग्रसर योगी के केश (बाल) केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि एक निरंतर स्मरण कराने वाला आध्यात्मिक प्रतीक हैं। इस मर्म को कुंडलिया छंद के माध्यम से समझें:


उपदेशपरक आलोक:

संसार बाह्य वेशभूषा को देखकर पूजता है, किंतु वास्तविक सिद्धावस्था तब घटित होती है जब अंतःकरण शुद्ध हो। बढ़े हुए बाल साधक को तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के संतुलन और नियंत्रण की याद दिलाते हैं। सच्ची साधना वह है जो मनुष्य को भौतिक भोगों और शारीरिक-मानसिक रोगों से मुक्त कर दे। यह संसार एक मायाजाल है जो पग-पग पर साधक को फांसने का यत्न करेगा, परंतु सिर के ये बढ़े हुए केश इस बात का साक्षात् प्रतीक हैं कि जैसे उलझे बालों को सुलझाया जाता है, वैसे ही संसार के तमाम जालों और विकारों को सुलझाते हुए निरंतर परमात्मा के पथ पर बढ़ते जाना है।

​३. जन्म बनाम कर्म की महत्ता

"व्यक्ति का कर्म ही उसके उच्च और निम्न स्तर के मानक को सुनिश्चित करता है, न कि उसका जन्म। अभावों और विकटताओं में जन्म लेने वाले भी महान बन जाते हैं और सम्पन्नता तथा भोग-विलास में जीवन यापन करने वाले भी पतित और चरित्रहीन हो जाते हैं।"


उपदेशपरक आलोक:

सनातन सत्य साक्षी है कि आत्मा की कोई जाति या कुल नहीं होता। श्रेष्ठता की पहचान कुल की ऊंची दीवारों से नहीं, बल्कि कर्मों की पवित्रता से होती है। जो जीव अभावों, दुखों और कठिनाइयों की अग्नि में तपता है, वह कुंदन बनकर चमकता है और लोक-कल्याण करता है। इसके विपरीत, यदि जीवन में केवल भोग-विलास और वासना ही शेष रह जाए, तो ऊंचे महलों में रहने वाले भी चारित्रिक पतन के गर्त में गिर जाते हैं। अतः जन्म के अहंकार को त्यागकर अपने सत्कर्मों को सुदृढ़ करें, क्योंकि विधाता के दरबार में केवल कर्मों का लेखा-जोखा ही मान्य होता है।

​४. संसार की असारता और छद्म भद्रलोक

"शराफत की दुहाई देने वाले अधिकतर दोषी निकले।

परिवार का जिनको हम समझ रहे वे पड़ोसी निकले।।"


उपदेशपरक आलोक:

यह संसार मोह और भटकाव का केंद्र है। यहाँ दिखाई देने वाला हर मुखौटा सत्य नहीं होता। आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले राही को यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि जो संसार बाहर से सदाचार और शराफत का ढोंग रचता है, भीतर से वही सबसे अधिक कलुषित और दोषी हो सकता है। जिन्हें हम अपना आत्मीय, अपना 'परिवार' मानकर बैठ जाते हैं, समय आने पर ज्ञात होता है कि वे आत्मिक स्तर पर पूरी तरह पराये (पड़ोसी) थे। इस जगत में केवल एक ही परम तत्व आपका अपना है—और वह है परमात्मा तथा आपका आत्म-विवेक। इसलिए सांसारिक संबंधों के मोह में फंसने के बजाय, अपनी आत्मा की पहचान (दर्द की पहचान) करें।

निष्कर्ष संदेश:

योगेश कुमार रोहि जी के ये स्वानुभूत विचार हमें सचेत करते हैं कि जीवन का वास्तविक ध्येय संसार के दिखावे में खोना नहीं, बल्कि विषमताओं के बीच भी अपने चरित्र को अडिग रखना, विकारों के जाल को सुलझाना और मानसिक मंथन से प्राप्त ज्ञानामृत से अपनी आत्मा को तृप्त करना है।