मंगलवार, 12 मई 2026

ईश्वर की स्तुति कि विधान-

श्रीमद्भागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 29 के ये श्लोक (21-26) कपिल देव द्वारा अपनी माता देवहूति को दी गई 'भक्ति योग' की शिक्षा के अत्यंत महत्वपूर्ण अंश हैं। यहाँ भगवान के सर्वव्यापी स्वरूप और मूर्ति पूजा की सार्थकता का सुंदर विवेचन है।

​इन श्लोकों का व्याकरणिक विश्लेषण और सरल हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है:

​श्लोक 21

​अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा ।

तं अवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम् ॥ २१ ॥


  • व्याकरणिक विश्लेषण:
    • अहम्: (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) - मैं।
    • भूतात्मा + अवस्थितः: (सन्धि) - प्राणियों की आत्मा के रूप में स्थित।
    • मर्त्यः: (प्रथमा विभक्ति) - मरणशील मनुष्य।
    • अर्चा-विडम्बनम्: मूर्ति पूजा का ढोंग या प्रदर्शन।
  • अनुवाद: मैं समस्त प्राणियों में उनकी आत्मा के रूप में सदैव स्थित हूँ। जो मनुष्य मेरी इस सर्वव्यापकता की अवहेलना (तिरस्कार) करके केवल मूर्तियों में मेरी पूजा करता है, वह केवल ढोंग करता है।

​श्लोक 22

​यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् ।

हित्वार्चां भजते मौढ्याद् भस्मन्येव जुहोति सः ॥ २२ ॥


  • व्याकरणिक विश्लेषण:
    • हित्वा: (हा धातु + क्त्वा प्रत्यय) - छोड़कर।
    • मौढ्यात्: (पञ्चमी विभक्ति) - मूर्खता के कारण।
    • भस्वनि + एव: राख में ही।
    • जुहोति: (हु धातु, लट् लकार) - आहुति देता है।
  • अनुवाद: जो पुरुष समस्त भूतों में स्थित मुझ परमात्मा और ईश्वर को त्याग कर मूर्खतावश केवल प्रतिमा की पूजा करता है, उसकी वह पूजा 'राख में आहुति' देने के समान (व्यर्थ) है।

​श्लोक 23

​द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिनः ।

भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति ॥ २३ ॥


  • व्याकरणिक विश्लेषण:
    • द्विषतः: (द्विष् धातु) - द्वेष करने वाले का।
    • भिन्नदर्शिनः: (षष्ठी विभक्ति) - भेदभाव रखने वाले का।
    • न ऋच्छति: (ऋच्छ् धातु) - प्राप्त नहीं करता।
  • अनुवाद: जो दूसरे के शरीर (प्राणी) में रहने वाले मुझ परमात्मा से द्वेष करता है और भेदभाव रखने वाला अभिमानी है, वह प्राणियों के प्रति वैर भाव रखने के कारण कभी मन की शांति प्राप्त नहीं कर पाता।

​श्लोक 24

​अहमुच्चावचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्नयानघे ।

नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिनः ॥ २४ ॥


  • व्याकरणिक विश्लेषण:
    • उच्चावचैः द्रव्यैः: (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) - उत्तम और निम्न अनेक प्रकार की सामग्रियों से।
    • भूतग्राम-अवमानिनः: प्राणियों का अपमान करने वाले से।
    • न एव तुष्ये: संतुष्ट नहीं होता।
  • अनुवाद: हे निष्पाप माता! जो मनुष्य दूसरे प्राणियों का अपमान करता है, वह यदि विविध प्रकार की बहुमूल्य सामग्रियों और विधि-विधान से मेरी प्रतिमा की पूजा भी करे, तो भी मैं उससे संतुष्ट नहीं होता।

​श्लोक 25

​अर्चादौ अर्चयेत्तावद् ईश्वरं मां स्वकर्मकृत् ।

यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥


  • व्याकरणिक विश्लेषण:
    • अर्चयेत्: (विधिलिंग लकार) - पूजा करनी चाहिए।
    • तावत्... यावत्: तब तक... जब तक।
    • स्वकर्मकृत्: अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए।
  • अनुवाद: मनुष्य को मूर्तियों में मेरी पूजा तब तक करनी चाहिए जब तक कि उसे अपने हृदय में और समस्त प्राणियों में स्थित मुझ ईश्वर का अनुभव न हो जाए।

​श्लोक 26

​आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् ।

तस्य भिन्नदृशो मृत्युः विदधे भयमुल्बणम् ॥ २६ ॥


  • व्याकरणिक विश्लेषण:
    • अन्तरोदरम्: (अन्तरम्) - थोड़ा सा भी भेद।
    • भिन्नदृशः: भेद बुद्धि रखने वाले का।
    • उल्बणम्: भयंकर।
    • विदधे: (वि + धा धातु) - देता हूँ या रचता हूँ।
  • अनुवाद: जो व्यक्ति अपने और पराए (दूसरे जीव) के बीच थोड़ा सा भी अंतर या भेद करता है, उस भेद-दृष्टि रखने वाले पुरुष को मैं 'मृत्यु' के रूप में भयंकर भय देता हूँ।

निष्कर्ष:

इन श्लोकों का मुख्य सार यह है कि भगवान केवल मंदिर की मूर्तियों में ही नहीं, बल्कि संसार के प्रत्येक जीव में विद्यमान हैं। सच्ची भक्ति वही है जो प्राणियों की सेवा और सम्मान के साथ की जाए। बिना परोपकार और समत्व भाव के की गई पूजा को भगवान 'राख में डाली गई आहुति' कहते हैं।

रविवार, 10 मई 2026

खण्डशिक्षा अधिकारी को लिए प्रार्थना पत्र-

   ★-प्रार्थना पत्र-★

खण्डशिक्षा अधिकारी हाथवन्त ज़िला फीरोजाबाद- को लिए प्रार्थना पत्र

​(सेवा में श्रीमान महोदय-खण्ड शिक्षा अधिकारी (BEO)हाथवन्त)

विकास खण्ड: हाथवन्त, जनपद: फिरोजाबाद (उ.प्र.)।

विषय: स्वर्गीय पिता जी श्रीपुरुषोत्तम सिंह के सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक के सेवा-अभिलेख एवं पारिवारिक पेंशन हेतु आवश्यक विवरण उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में।

महोदय-

सविनय निवेदन है कि:

  1. ​प्रार्थी योगेश कुमार, सुपुत्र  श्री पुरुषोत्तम सिंह, वर्तमान निवासी ग्राम-आजादपुर, पोस्ट- पहाड़ीपुर, तहसील- अतरौली का मूल निवासी है।                    
  2. ​प्रार्थी के पूज्य पिता जी ज़िला फीरोजावाद के विकास खण्ड हाथवन्त के ग्राम रीवा स्थित प्राथमिक/जूनियर विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे, जो दिनांक (3/06/2010) में अपनी अधिवर्षता आयु पूर्ण कर सेवानिवृत्त हुए थे। जिनका (PPO No: 145, GRD No: E11-1661) है।          
  3. ​अत्यन्त दुःखद विषय है कि दिनांक -15 अप्रैल, 2026 को पिता जी का आकस्मिक देहावसान हो गया है।              
  4. ​वर्तमान में प्रार्थी अपनी माता जी श्रीमती राजेश कुमारी की 'पारिवारिक पेंशन' (Family Pension) स्वीकृत कराने हेतु प्रयासरत है, जिसके लिए कोषागार (Treasury) विभाग द्वारा पिता जी की सेवा-पुस्तिका (Service Book) एवं सेवानिवृत्ति से सम्बन्धित अन्य महत्वपूर्ण अभिलेखों की मांग की जा रही है।
  5. ​प्रार्थी द्वारा सम्बन्धित विद्यालय में सम्पर्क किए जाने पर अभिलेखों के अभाव में अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं हो पा रहा है, जिस कारण पेंशन की प्रक्रिया लम्बित है और परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि:

  • ​कार्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड/सेवा-पुस्तिका के आधार पर पिता जी की सेवानिवृत्ति से सम्बन्धित आवश्यक विवरण प्रदान करने की कृपा करें।
  • ​अथवा, सम्बन्धित विद्यालय के वर्तमान प्रभारी को निर्देशित करने का कष्ट करें कि वह वाञ्छित अभिलेख अविलम्ब उपलब्ध कराने में सहयोग प्रदान करें।

​आपकी इस महती कृपा हेतु प्रार्थी सदैव आपका आभारी रहेगा।

संलग्नक:

  1. ​पिता जी के मृत्यु प्रमाण पत्र की छायाप्रति।
  2. ​पिता जी के PPO (पेंशन भुगतान आदेश) की छायाप्रति।
  3. ​माता जी के आधार कार्ड की छायाप्रति [संलग्न]।

सादर धन्यवाद।

भवदीय,

हस्ताक्षर: ...........................

नाम: योगेश कुमार

पता: ग्राम- आजादपुर, पोस्ट- पहाड़ीपुर, तहसील- अतरौली ( अलीगढ़ )

मोबाइल नंबर: 8077160219

दिनांक: ...........................


शनिवार, 9 मई 2026

खण्ड शिक्षा अधिकारी को लिए प्रार्थना पत्र-

(खण्ड शिक्षा अधिकारी को लिए प्रार्थना पत्र-)

सेवा में-

खण्ड शिक्षा अधिकारी (BEO),

हाथवन्त ब्लॉक, जनपद - फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश)।

विषय: स्वर्गीय पिता जी की सेवानिवृत्ति विवरण एवं सेवा-पुस्तिका (Service Book) के रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में।

पेंशनर और पी.पी.ओ. (PPO) विवरण-

  • पेंशनर का नाम: पुरुषोत्तम सिंह (PURUSHOTTAM SINGH)
  • पी.पी.ओ. नम्बर (PPO No.): 145
  • जी.आर.डी. नम्बर (GRD No.): E11-1661

महोदय,

​सविनय निवेदन है कि प्रार्थी/प्रार्थिनी [योगेश कुमार ], सुपुत्र/सुपुत्री स्व. [ श्री पुरुषोत्तम सिंह ] ग्राम- दभारा पत्रालय- फरिहा का निवासी है। मेरे पिता जी विकास खण्ड हाथवन्त के ग्राम रीवा स्थित प्राथमिक/जूनियर विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे और माह 08/2010 में अपनी सेवा पूर्ण कर सेवानिवृत्त हुए थे।

​अत्यन्त दुःख के साथ सूचित करना है कि दिनांक 15 अप्रैल, 2026 को मेरे पिता जी का देहावसान हो गया है। वर्तमान में प्रार्थी अपनी माता जी [श्रीमती राजेश कुमारी] की पारिवारिक पेंशन (Family Pension) स्वीकृत कराने हेतु कार्यवाही कर रहा है। इस प्रक्रिया हेतु ट्रेजरी विभाग द्वारा पिता जी की सेवानिवृत्ति से सम्बन्धित कुछ विशिष्ट विवरण एवं सेवा-अभिलेखों की मांग की जा रही है।

​प्रार्थी ने इस सम्बन्ध में सम्बन्धित विद्यालय के वर्तमान अध्यापकों से संपर्क किया, किन्तु वहाँ से अपेक्षित सहयोग और विवरण प्राप्त नहीं हो पा रहा है। रिकॉर्ड के अभाव में माता जी की पेंशन प्रक्रिया रुकी हुई है, जिससे परिवार को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि:

  1. ​पिता जी की सेवा-पुस्तिका (Service Book) या कार्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर उनकी सेवानिवृत्ति का विवरण उपलब्ध कराने की कृपा करें।         
  2. ​अथवा, सम्बन्धित विद्यालय के प्रधानाध्यापक/अध्यापकों को आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध कराने हेतु निर्देशित करने का कर्तव्य निर्वहन करें।

प्रार्थना पत्र को साथ ​संलग्नक (दस्तावेजों की छायाप्रति):

  1. ​पिता जी का मृत्यु प्रमाण पत्र।
  2. ​पिता जी के PPO (पेंशन भुगतान आदेश) की प्रति ।
  3. ​माता जी का आधार कार्ड।

सधन्यवाद।

प्रार्थी/प्रार्थिनी:

नाम: ...योगेश कुमार ............................

पता: ...ग्राम दभारा पोष्ट- फरिहा...... तहसील जसराना......................

मोबाइल नंबर: ..8077160219.................

दिनांक: ...........................

मंगलवार, 5 मई 2026

पेंशन प्रक्रिया कैसे प्रारम्भ हो ? तथा पुरुषोत्तम सिंह ( पिता जी का) पी० पी० ओ ० नम्बर

इस कठिन समय में माता जी की पेंशन (Family Pension) शुरू कराने के लिए आपको कुछ महत्वपूर्ण कागजी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। चूँकि आपने मृत्यु प्रमाण पत्र ट्रेजरी कार्यालय में जमा कर दिया है, तो अगला चरण पारिवारिक पेंशन (Family Pension) के लिए आवेदन करना है।

​उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार मुख्य औपचारिकताएं निम्नलिखित हैं:

​१. आवश्यक दस्तावेज (Documents Required)

​आपको एक फाइल तैयार करनी होगी जिसमें नीचे दिए गए दस्तावेजों की स्व-प्रमाणित प्रतियां (Self-attested copies) हों:

  • मृत्यु प्रमाण पत्र: पिता जी के मृत्यु प्रमाण पत्र की मूल प्रति और फोटोकॉपी।
  • बैंक पासबुक: माता जी का बैंक में Joint Account (पिता जी के साथ) रहा हो तो बेहतर है, अन्यथा उनका एकल (Single) बचत खाता जो उसी बैंक शाखा में हो जहाँ पिता जी की पेंशन आती थी।
  • पी.पी.ओ. (PPO - Pension Payment Order): पिता जी के मूल पीपीओ की प्रति।
  • फोटो: माता जी की पासपोर्ट साइज फोटो (अधिमानतः बैंक द्वारा सत्यापित)।
  • आधार और पैन कार्ड: माता जी और पिता जी दोनों के।
  • वारिसान/उत्तराधिकार प्रमाण पत्र: यदि विभाग द्वारा मांगा जाए (सामान्यतः जीवित पत्नी के मामले में 'कुटुंब रजिस्टर' की नकल पर्याप्त होती है)।



​२. आवेदन की प्रक्रिया

  1. निर्धारित प्रपत्र (Form 14): आपको 'फॉर्म-14' भरना होगा, जो पारिवारिक पेंशन के लिए मुख्य आवेदन पत्र है। यह आपको संबंधित खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) कार्यालय या ट्रेजरी से मिल जाएगा।
  2. बैंक के माध्यम से: चूंकि आपने ट्रेजरी को सूचित कर दिया है, तो बैंक में भी एक प्रार्थना पत्र देना होगा ताकि पिता जी का खाता बंद कर माता जी की पेंशन प्रक्रिया शुरू की जा सके।
  3. सत्यापन: भरे हुए फॉर्म को उस स्कूल के प्रधानाध्यापक या खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) से अग्रसारित (Forward) करवाना होगा जहाँ पिता जी अंतिम बार कार्यरत थे।

​३. महत्वपूर्ण कदम (अगली कार्रवाई)

  • कोषाधिकारी (Treasury Officer) से मिलें: डबरई, फिरोजाबाद के ट्रेजरी कार्यालय में जाकर यह सुनिश्चित करें कि उन्होंने पिता जी की पेंशन रोकने और फैमिली पेंशन का केस प्रोसेस करने की एंट्री कर ली है।
  • जीवित प्रमाण पत्र (Life Certificate): पेंशन शुरू होते समय माता जी को बैंक में उपस्थित होकर या डिजिटल माध्यम से अपना जीवित प्रमाण पत्र देना पड़ सकता है।
  • नाम और जन्मतिथि: सुनिश्चित करें कि माता जी के आधार कार्ड और बैंक खाते में नाम पिता जी के सेवा अभिलेखों (Service Records) से मेल खाता हो।

परामर्श:

चूँकि यह प्रक्रिया शिक्षा विभाग से जुड़ी है, इसलिए एक बार संबंधित 'खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) कार्यालय' में जाकर बाबू से संपर्क अवश्य करें, क्योंकि पेंशन की फाइल वहीं से बनकर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) के माध्यम से ट्रेजरी जाती है।

​क्या आपके पास पिता जी का पी.पी.ओ. नंबर (PPO Number) उपलब्ध है? उससे स्टेटस चेक करने में आसानी होगी।





यह जानकर प्रक्रिया थोड़ी आसान हो जाएगी, क्योंकि PPO (Pension Payment Order) नंबर ही पेंशन संबंधी किसी भी कार्रवाई का मुख्य आधार होता है।

​अब आपको निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

​१. बैंक को सूचित करें

​सबसे पहले उस बैंक शाखा में जाएँ जहाँ पिता जी की पेंशन आती थी। वहां एक प्रार्थना पत्र दें कि पिता जी का निधन हो चुका है और अब पेंशन माता जी के नाम स्थानांतरित (Family Pension) की जानी है। साथ में PPO नंबर और मृत्यु प्रमाण पत्र की प्रति लगाएँ।

​२. वित्त एवं लेखाधिकारी कार्यालय (BSA Office)

​चूँकि पिता जी जूनियर प्राइमरी स्कूल के अध्यापक थे, इसलिए आपको फिरोजाबाद के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) कार्यालय के 'वित्त एवं लेखा अनुभाग' में जाना होगा। वहाँ आपको एक आवेदन देना होगा जिसमें:

  • ​पिता जी का नाम और PPO नंबर स्पष्ट लिखा हो।
  • ​माता जी का विवरण और बैंक खाता संख्या दी गई हो।

​३. ऑनलाइन स्टेटस चेक

​आप उत्तर प्रदेश सरकार के 'IFMS UP' पोर्टल या 'Pensioners Helpline' पर जाकर पिता जी के PPO नंबर के माध्यम से वर्तमान स्थिति (Status) देख सकते हैं कि ट्रेजरी स्तर पर क्या अपडेट हुआ है।

​चेकलिस्ट: साथ ले जाने वाले मुख्य कागज

  • मूल PPO कार्ड और उसकी ३-४ फोटोकॉपी।
  • ​माता जी के तीन पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ (संयुक्त फोटो हो तो और अच्छा है, अन्यथा एकल)।
  • ​माता जी का आधार कार्ड और पैन कार्ड
  • ​बैंक मैनेजर द्वारा सत्यापित माता जी का बैंक विवरण (Account Details)।
  • कुटुंब रजिस्टर की नकल (तहसील या ब्लॉक से प्राप्त), जो यह सिद्ध करे कि माता जी ही पिता जी की विधिक वारिस हैं।

एक जरूरी सलाह:

ट्रेजरी कार्यालय (डबरई) में जब आप जाएँ, तो वहां के 'पेंशन पटल' (Pension Counter) पर बाबू को PPO नंबर बताकर यह जरूर पूछ लें कि क्या उन्होंने 'Form-14' (पारिवारिक पेंशन फॉर्म) को सिस्टम में अपडेट करने के लिए बीएसए (BSA) कार्यालय से फाइल की मांग की है? कभी-कभी फाइल विभाग में रुकी होती है और ट्रेजरी को नहीं मिल पाती।

​क्या माता जी का बैंक खाता पिता जी के साथ 'Joint Account' था या उनका अलग खाता है?



यह जानकर प्रक्रिया और भी सरल हो जाएगी। यदि माता जी का Joint Account (संयुक्त खाता) पहले से ही पिता जी के साथ था, तो बैंक में पेंशन ट्रांसफर की प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती है।

​चूँकि आपके पास PPO नंबर उपलब्ध है और आपने ट्रेजरी में सूचना दे दी है, तो अब आप अंतिम चरणों की ओर बढ़ सकते हैं:

​बैंक में तत्काल कार्रवाई

​आप बैंक जाकर शाखा प्रबंधक (Branch Manager) को एक साधारण आवेदन दें। इसमें उल्लेख करें कि:

  • ​पिता जी (पेंशनभोगी) का स्वर्गवास हो चुका है।
  • ​संयुक्त खाते को अब माता जी के नाम पर 'Single' या 'Primary' मोड में सक्रिय किया जाए।
  • ​पारिवारिक पेंशन इसी खाते में क्रेडिट की जाए।

​BSA कार्यालय (फिरोजाबाद) में संपर्क

​जैसा कि मैंने पहले बताया, जूनियर प्राइमरी शिक्षकों की फाइलें वित्त एवं लेखाधिकारी (बेसिक शिक्षा) के कार्यालय से चलती हैं। आप PPO नंबर लेकर वहाँ के संबंधित क्लर्क से मिलें और पूछें कि:

​"पिता जी के निधन के बाद फैमिली पेंशन की फाइल ट्रेजरी भेजने के लिए और किन हस्ताक्षरों की आवश्यकता है?"


​आमतौर पर, वे आपसे एक निर्धारित आवेदन पत्र (Application for Family Pension) भरवाएंगे, जिस पर माता जी के हस्ताक्षर होंगे।

​कुछ जरूरी बातें:

  • बकाया (Arrears): पिता जी की मृत्यु की तिथि (15 अप्रैल) से लेकर पेंशन ट्रांसफर होने तक की जो भी राशि रुकी रहेगी, वह माता जी को 'एरियर' के रूप में एक साथ मिल जाएगी।
  • अग्रिम सहायता: यदि आपको कागजी कार्रवाई में विभाग से कोई समस्या आ रही हो, तो आप फिरोजाबाद के शिक्षक संघ (Teachers Union) के पदाधिकारियों से भी मदद ले सकते हैं, वे अक्सर ऐसे मामलों में रिटायर्ड शिक्षकों के परिवारों का सहयोग करते हैं।

​इस प्रक्रिया को पूरा करने में आपको विभाग या बैंक के चक्कर कम लगाने पड़ें, इसके लिए PPO की मूल प्रति और माता जी के आधार कार्ड की 4-5 कॉपियां हमेशा साथ रखें।






यह आपके द्वारा साझा किए गए पेंशन भुगतान विवरण (Pension Payment Details) का विस्तृत सारांश है, जो पेंशनर पोर्टल (उत्तर प्रदेश) के रिकॉर्ड पर आधारित है:

पेंशनर और पी.पी.ओ. (PPO) विवरण

  • पेंशनर का नाम: पुरुषोत्तम सिंह (PURUSHOTTAM SINGH)
  • पी.पी.ओ. नंबर (PPO No.): 145
  • जी.आर.डी. नंबर (GRD No.): E11-1661
  • ट्रेजरी: फिरोजाबाद (FIROZABAD)
  • खाता संख्या: *******6632 (बैंक विवरण के अनुसार)

पेंशन भुगतान विवरण (मार्च 2026)

​दस्तावेज़ के अनुसार, मार्च 2026 के महीने के लिए भुगतान का विवरण नीचे दिया गया है:

रविवार, 3 मई 2026

पद्मपुराण भूमिखण्ड- अध्याय (86)वाँ

यहाँ पद्मपुराण के भूमिखण्ड के ८६वें अध्याय का श्लोकवार हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है:

पद्मपुराणम् - भूमिखण्ड (अध्याय ८६)

कुञ्जल उवाच (कुञ्जल पक्षी ने कहा):

श्लोक १-३: हे वत्स! मैं तुम्हें दिव्या देवी के उन पूर्वजन्म के कर्मों के बारे में बताता हूँ, जैसा उसने किया था, वह सब मुझसे सुनो। पुण्यमयी और पापों का नाश करने वाली वाराणसी नगरी है। वहाँ सुवीर नाम का एक महाबुद्धिमान वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से संपन्न था। उसकी 'चित्रा' नाम की पत्नी थी जो बहुत प्रसिद्ध थी।

श्लोक ४-६: वह अपने कुल के आचरण को त्याग कर दुराचार में लग गई। वह अपने पति की आज्ञा नहीं मानती थी और स्वेच्छाचारिणी (अपनी मर्जी से घूमने वाली) हो गई थी। धर्म-पुण्य से रहित वह केवल पाप कर्म करती थी, नित्य अपने पति की निंदा करती और कलह (झगड़ा) करना उसे प्रिय था। वह सदा दूसरों के घरों में रहती और घर-घर भटकती थी। वह हमेशा प्राणियों के दोष देखती और दुष्ट स्वभाव वाली थी।

श्लोक ७-९: वह दुष्टा सदा सज्जनों की निंदा करने वाली और उपहास करने वाली थी। उसके अनाचार और महापाप को जानकर सुवीर ने उसकी निंदा की। हे महाप्राज्ञ! सुवीर ने उसे त्याग दिया और दूसरी वैश्य कन्या से विवाह कर लिया और उसके साथ रहने लगा। वह धर्मात्मा सुवीर सदा सत्य और धर्म में मन लगाकर रहने लगा। पति द्वारा निकाली गई वह प्रचण्ड स्वभाव वाली चित्रा पृथ्वी पर भटकने लगी।

श्लोक १०-१२: वह सदा पापी पुरुषों की संगति में रहने लगी और उनके लिए 'दूती' (इधर-उधर की बातें करने वाली या अनैतिक कार्य कराने वाली) का काम करने लगी। उस पापिनी ने कई सज्जनों के घर तुड़वा दिए। वह साध्वी स्त्रियों को बुलाकर उन्हें पापपूर्ण वचनों से लोभ देती थी। अपने विश्वास दिलाने वाले वचनों से वह लोगों का धर्म भ्रष्ट करती और सज्जनों की स्त्रियों को दूसरों के पास पहुँचा देती थी।

श्लोक १३-१५: इस प्रकार उस पापी चित्रा ने सैंकड़ों घर उजाड़ दिए। उस महादुष्टा ने पतियों और पुत्रों के बीच भी युद्ध (झगड़ा) करवा दिया। वह पुरुषों के मन को स्त्रियों के प्रति भ्रमित कर देती थी और यमराज के गाँव की जनसंख्या बढ़ाने वाला (विनाशकारी) युद्ध करवाती थी। इस प्रकार सैंकड़ों घरों को नष्ट करके अंत में वह मृत्यु को प्राप्त हुई। हे सुनन्दन! यमराज ने उसे बहुत से दण्डों से अनुशासित किया।

श्लोक १६-१८: सूर्यपुत्र यमराज ने उसे रौरव आदि भयंकर नरकों का भोग कराया। रौरव नरक में उसे पकाया गया और उसे अनेक प्रकार की पीड़ाएँ दिखाई गईं। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है। उस पापिनी चित्रा ने चूँकि सैंकड़ों घर तोड़े थे, हे द्विजोत्तम! उसी कर्म का विपाक (फल) उसने भोगा। क्योंकि उसने घर उजाड़े थे, इसलिए वह दुःख भोगती है।

श्लोक १९-२१: जब उसके विवाह का समय आता है, तब उसका भाग्य (पुराना पाप) आड़े आ जाता है। विवाह का समय प्राप्त होते ही उसका पति मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। जैसे उसने सैंकड़ों घर तोड़े थे, वैसे ही उसके सौ वरों (पतियों) की मृत्यु हुई। हे वत्स! स्वयंवर के समय और विवाह के समय मिलाकर अब तक २१ (वर मर चुके हैं)। तुमने जैसा मुझसे पूछा था, मैंने दिव्या देवी का वह सारा पूर्व चरित्र तुम्हें सुना दिया है।

उज्ज्वल उवाच (उज्ज्वल ने कहा):

श्लोक २२-२४: आपने दिव्या देवी का पूर्व चरित्र और उसके द्वारा किया गया 'गृह-भंग' (घर उजाड़ना) नाम का घोर पाप बताया। (किन्तु) प्लक्षद्वीप के राजा दिवोदास की पुत्री के रूप में उसने इतने उच्च कुल में जन्म किस पुण्य के प्रभाव से प्राप्त किया? हे तात! मुझे यह संशय है, कृपा कर मुझे बताइये कि ऐसी पाप करने वाली स्त्री राजा की पुत्री कैसे हुई?

कुञ्जल उवाच (कुञ्जल ने कहा):

श्लोक २५-२७: हे पुत्र उज्ज्वल! चित्रा ने पहले जो पुण्य कार्य किया था, वह सब मैं कहता हूँ, सुनो। भटकता हुआ कोई महाबुद्धिमान 'सिद्ध' संन्यासी वहाँ आया। वह वस्त्रहीन (फटे कपड़े वाला), हाथ में दण्ड धारण करने वाला, केवल कौपीन पहने हुए और दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाला (दिगम्बर) था। वह चित्रा के घर के द्वार पर आकर रुक गया।

श्लोक २८-३०: वह मौनी, मुण्डित सिर वाला, आत्मजयी और जितेन्द्रिय था। वह निराहारी और सभी तत्त्वों के अर्थ को जानने वाला था। हे सुपुत्र! वह लंबी यात्रा से थका हुआ और धूप से व्याकुल मन वाला था। वह श्रम से दुखी और प्यास से पीड़ित था। जब वह चित्रा के द्वार की छाया का आश्रय लेकर खड़ा हुआ, तब चित्रा ने उस श्रम से पीड़ित महात्मा को देखा।

श्लोक ३१-३३: उस चित्रा ने उन महात्मा की सेवा की। उनके पैर धोकर उन्हें उत्तम आसन दिया। (उसने कहा-) हे तात! आप इस कोमल आसन पर सुख से बैठें। अपनी भूख मिटाने के लिए यह उत्तम अन्न ग्रहण करें। अपनी इच्छा से संतुष्ट होकर यह शीतल जल पियें। हे पुत्र! ऐसा कहकर उसने उनकी देवता की तरह पूजा की।

श्लोक ३४-३६: उनके अंगों को दबाकर (मालिश कर) उसने उनकी थकान मिटा दी। उन महात्मा ने भोजन और जल ग्रहण किया। उस तत्त्वदर्शी सिद्ध को उसने इस प्रकार संतुष्ट किया। वे धर्मात्मा सिद्ध संतुष्ट होकर कुछ समय वहाँ रुके और फिर अपनी इच्छा से चले गए। उन महात्मा सिद्ध के जाने के बाद, वह चित्रा अपने कर्मों के वश मृत्यु को प्राप्त हुई।

श्लोक ३७-३९: उसे धर्मराज ने कष्टकारी दण्डों से दण्डित किया। वह चित्रा नरक में गई और हज़ारों वर्षों तक दुःख भोगती रही। भोग समाप्त होने पर उसे पुनः मनुष्य जन्म मिला। क्योंकि उसने पहले एक श्रेष्ठ सिद्ध की पूजा की थी, उस कर्म के फल स्वरूप उसने एक पुण्यवान कुल में जन्म लिया।

श्लोक ४०-४३: वह क्षत्रिय महाराज दिवोदास के घर पैदा हुई। हे नरोत्तम! उसका नाम 'दिव्या देवी' पड़ा। क्योंकि उसने महात्मा को अन्न और जल दिया था, उसी दान के कारण वह आज उत्तम पुण्य का फल भोग रही है। वह शीतल जल पीती है, मिष्टान्न खाती है और अपने पिता के घर में दिव्य भोगों को भोग रही है। उस सिद्ध के प्रभाव से ही वह राजकन्या बनी।

श्लोक ४४-४५: किन्तु हे सुपुत्र! पूर्व जन्म के पापकर्म 'गृह-भंग' के प्रभाव से वह राजकन्या होकर भी वैधव्य (विधवापन) का दुःख भोग रही है। मैंने तुम्हें दिव्या देवी का पूरा चरित्र बता दिया। अब तुम और क्या पूछना चाहते हो?

उज्ज्वल उवाच (उज्ज्वल ने कहा):

श्लोक ४६-४८: हे तात! वह इस शोक और महान दुःख से कैसे मुक्त होगी, यह मुझे बताइये। वह बेचारी बालिका इस समय महान दुःख से पीड़ित है। उसे सुख कैसे मिलेगा और आगे क्या परिणाम होगा? मुझे यह संशय है, इसे दूर करें। वह मोक्ष कैसे प्राप्त करेगी? वह बेचारी घोर वन में अकेली रो रही है।

विष्णुरुवाच (भगवान विष्णु ने कहा):

श्लोक ४९-५१: पुत्र की बात सुनकर महाबुद्धिमान कुञ्जल ने क्षण भर विचार किया और पुत्र से कहा— हे वत्स! मैं सत्य कहता हूँ, सुनो। पूर्वजन्म के कर्मों के कारण मुझे यह पक्षी योनि प्राप्त हुई है, जिससे मेरा ज्ञान नष्ट हो गया है। परन्तु इस पवित्र वृक्ष के संग से और माता रेवा (नर्मदा) तथा भगवान विष्णु के प्रसाद से मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ है।

श्लोक ५२-५४: जिससे वह (दिव्या देवी) ज्ञान प्राप्त करेगी और मोक्ष स्थान को जाएगी, वह उत्तम मोक्षमार्ग का उपदेश मैं कहता हूँ। जैसे सोना आग में तपकर शुद्ध हो जाता है, वैसे ही वह भी पापों से मुक्त होकर शुद्ध हो जाएगी। हे महाप्राज्ञ! भगवान हरि के ध्यान से और जप, होम तथा व्रत से पापियों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक ५५-५७: जैसे हाथी सिंह के भय से मद त्याग देता है, वैसे ही श्रीकृष्ण के नाम उच्चारण से पाप भाग जाते हैं। जैसे गरुड़ के तेज से सांप विषहीन हो जाते हैं, वैसे ही चक्रपाणि विष्णु के नाम लेने से ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक ५८-६०: जब वह स्थिर होकर, काम-क्रोध छोड़कर, इन्द्रियों को वश में करके और आत्मज्ञान को धारण करके भगवान के पवित्र नामों का जप करेगी और उनमें एकाग्र होकर लीन हो जाएगी, तब वह परम ज्ञान को प्राप्त कर मोक्ष पा लेगी।

उज्ज्वल उवाच (उज्ज्वल ने कहा):

श्लोक ६१: हे तात! मुझे वह 'परम ज्ञान' बताइये, और उसके बाद वह ध्यान, व्रत और भगवान के सौ नामों को भी बताइये।

कुञ्जल उवाच (कुञ्जल ने कहा):

श्लोक ६२-६५: हे पुत्र! मैं वह परम ज्ञान कहता हूँ जो किसी ने नहीं देखा। वह केवल 'कैवल्य' है जो मल रहित है। जैसे हवा से रहित स्थान पर दीपक स्थिर होकर जलता है और अंधकार का नाश करता है, वैसे ही दोषरहित आत्मा निराश्रय और निर्मल हो जाती है। तब न कोई मित्र होता है, न शत्रु; न शोक, न हर्ष; न लोभ और न मत्सर। वह सुख-दुःख से मुक्त हो जाता है।

श्लोक ६६-७२: जब मनुष्य इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है, तब वह 'केवल' (शुद्ध) हो जाता है। (यहाँ दीपक और तेल का उदाहरण देकर समझाया गया है कि जैसे दीपक तेल को सोखकर प्रकाश देता है, वैसे ही योगी कर्म रूपी तेल को सुखाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है)। वह अपने तेज से तीनों लोकों को देख लेता है। यही 'केवल ज्ञान' का स्वरूप है।

श्लोक ७३-८१: अब मैं उस चक्रधारी भगवान के ध्यान के बारे में बताता हूँ। योगी उन्हें ज्ञान चक्षु से देखते हैं। वे हाथ-पैर के बिना भी सब जगह जाते हैं, कान के बिना सब सुनते हैं, और बिना आँखों के सब देखते हैं। वे जगत्पति सबके साक्षी हैं। वे सदानन्द, निर्जर और सर्वमयी विभु हैं। जो उनके इस निराकार स्वरूप का ध्यान करता है, वह अमृतमय परम स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक ८२-९५: अब मैं उनका दूसरा 'सकार' (मूर्त) रूप बताता हूँ। वे वासुदेव कहलाते हैं क्योंकि सारा ब्रह्माण्ड उनमें वास करता है। उनका वर्ण सजल मेघ के समान श्याम है। वे चतुर्भुज हैं। उनके दाहिने हाथ में शंख और चक्र हैं तथा बाएँ हाथ में कौमोदकी गदा और पद्म (कमल) हैं। उनके नेत्र कमल के समान हैं, वे पीताम्बर धारण करते हैं, कौस्तुभ मणि और श्रीवत्स से सुशोभित हैं। वे गरुड़ पर सवार हैं। जो मनुष्य अनन्य मन से उनका नित्य ध्यान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।

श्लोक ९६: मैंने तुम्हें जगत्पति का ध्यान बता दिया। अब मैं वह 'व्रत' भी बताता हूँ जो सब पापों का नाश करने वाला है।

(इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे ८६वाँ अध्याय समाप्त)

शुक्रवार, 1 मई 2026

जल और लहरें

यह दर्शन अत्यंत गहरा और हृदयस्पर्शी है। आपने अस्तित्व की नश्वरता और अनंतता को जिस उपमा के माध्यम से व्यक्त किया है, वह भारतीय दर्शन के अद्वैत भाव को चरितार्थ करती है।

​इस विचार के कुछ प्रमुख पक्ष इस प्रकार हैं:

​१. लहर और जल का अभेद संबंध

​जिस प्रकार लहर जल से अलग कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है—वह केवल जल का ही एक क्षणिक रूप या गति है—उसी प्रकार जीव और ब्रह्मांड का संबंध है। लहर उठती है, नाम और रूप (form) पाती है, और अंततः पुनः जल में ही विलीन हो जाती है। उसका आदि और अंत जल ही है।

​२. बौद्धिक सीमाएँ और अनंतता

​हमारी बुद्धि 'लहरों' को गिन सकती है, उनकी ऊँचाई माप सकती है, लेकिन उस 'अथाह जल' की संपूर्णता को नहीं बांध सकती। तर्क और बुद्धि हमेशा विभाजन (division) पर काम करते हैं, जबकि यह अस्तित्व एक अखंड प्रवाह है। जैसा कि उपनिषदों में भी संकेत मिलता है:

"यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।"

(जहाँ से मन सहित वाणी उसे पाए बिना लौट आती है।)


​३. अस्तित्व की व्यापकता

​जब हम स्वयं को केवल एक 'लहर' मानते हैं, तब मृत्यु और समाप्ति का भय होता है। परंतु जब बोध होता है कि हम स्वयं वह 'जल' ही हैं, तब अंत का विचार समाप्त हो जाता है। यह अनंतता ही सत्य है, और हमारी व्यक्तिगत पहचान केवल उस पर उभरने वाली एक सुंदर क्रीड़ा (लीला) है।

​आपकी यह पंक्तियाँ न केवल दार्शनिक हैं, बल्कि एक कवि की संवेदनशीलता को भी दर्शाती हैं। यह विचार 'अहं' को विसर्जित कर उस विराट सत्ता के साथ एकाकार होने का निमंत्रण देता है।

प्रसून-पुष्पे पृथु-पराग-पङ्कजे,

प्रसून-पुष्पे पृथु-पराग-पङ्कजे,

चकास्ति गन्धश्चतुरैर्विचिन्त्यते।

तथा हि विश्वे जड-भौतिकांशके,

विभाति सूक्ष्मं परमार्थ-कारणम् ॥

प्रपञ्च-पाशं कलयन्ति वैज्ञानिकाः,

प्रबोध-पूर्णाः प्रविलोकयन्ति तत्।

विचित्र-विश्वस्य विधान-वैभवं,

विशुद्ध-बोधेन विमृश्यते बुधैः ॥


व्याख्या

​जिस प्रकार पराग से युक्त पुष्पों में सुगन्ध व्याप्त रहती है जिसे केवल सूक्ष्म दृष्टि वाले ही समझ पाते हैं, उसी प्रकार इस दृश्यमान भौतिक जगत के कण-कण में वह 'परमार्थ तत्व' (Metaphysical cause) विद्यमान है। जहाँ सामान्य वैज्ञानिक केवल बाह्य प्रपञ्च (तन्त्र) को ही सत्य मानकर उसमें उलझे रहते हैं, वहीं प्रबुद्ध जन अपनी विशुद्ध प्रज्ञा से उस परम ऐश्वर्य और विधान को देख लेते हैं जो इस सृष्टि का आधार है।