(1) श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्य -
सायण आदि भाष्यकारों के अनुसार-
ऋग्वेद के मण्डल अष्टम (8) के सूक्त (96) की ऋचा संख्याएँ क्रमशः ( 13 -14 -और 15 ) में कृष्ण से इन्द्र के युद्ध होने का वर्णन मिलता है। जिससे कृष्ण की वैदिक कालीन उपस्थिति( सत्ता) सिद्ध होती है। जो ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अतीव महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन भाष्यकारों ने युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थ का पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ करके कृष्ण को असुर या अदेव रूपों में दर्शाया है।।
यद्यपि ऋग्वेद की मूल ऋचा में कृष्ण को कहीं भी असुर नहीं कहा गया है परन्तु उन्हें अदेव पद से अवश्य सम्बोधित किया गया है।
जिसे आधार मान कर वेदों में सायण आदि भाष्यकर्ताओं ने उसी "अदेव" को असुर अथवा दैत्यों के परवर्ती व पौराणिक अर्थ में देव जाति के विपरीत एक असीरिया के जनसमुदाय विशेष से सम्बन्धित कर अर्थ ग्रहण किया है।
असीरिया के मूल निवासी असुर ही थे। जो दजला और फरात नदीयों के दुआव में स्थित असीरिया देश में रहते थे। परन्तु कृष्ण असीरियन अथवा असुर कभी नहीं थे।
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अब हम बात करते हैं सायण आदि भाष्यकारों की जिन्होंने कृष्ण को असुर बना दिया है।
भाष्यकारों ने ऐसा क्यों किया ? क्या वे ऋग्वेद में वर्णित असुर शब्द के अर्थ से परिचित नहीं थे अथवा उन्होंने जानबूझकर असुर शब्द का अर्थ पौराणिक अर्थ में स्वीकार किया? इन्हीं सब प्रश्नों का समाधान यहाँ पर हम विश्लेषणात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं।
सबसे पहले हम ऋग्वेद की उन तीनों ऋचाओं को देखें, जिसमे कृष्ण और इन्द्र का युद्ध दर्शाया गया है।
इसके बाद हम उनके वास्तविक अर्थ और अनुवाद को प्रस्तुत करेंगे ।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥
सायण भाष्य मूल सस्कृत रूप-
- अत्रेतिहासमाचक्षते किल । कृष्णो नामासुरो दशसहस्रसंख्यैरसुरैः परिवृतः सन्नंशुमतीनामधेयाया नद्यास्तीरेऽतिष्ठत् । तत्र तं कृष्णमुदकमध्ये स्थितमिन्द्रो बृहस्पतिना सहागच्छत् । आगत्य तं कृष्णं तस्यानुचरांश्च बृहस्पतिसहायो जघानेति । केचिदन्यथा वदन्ति । तेषां कथा हेतुः । द्रप्स इत्युदककणोऽभिधीयते स तु सोमो ‘द्रप्सश्चस्कन्द ' (ऋ. सं. १०. १७. ११ ) इत्यादिषु सोमपरत्वेनोक्तत्वात् । एतत्पदमाश्रित्याहुः- ‘ अपक्रय तु देवेभ्यः सोमो वृत्रभयार्दितः ॥ नदीमंशुमतीं नामाभ्यतिष्ठत् कुरून प्रति । तं बृहस्पतिनैकेन सोऽभ्ययाद्वृत्रहा सह ॥ योत्स्यमानः सुसंहृष्टैर्मरुद्भिर्विविधायुधैः। दृष्ट्वा तानायतः सोमः स्वबलेन व्यवस्थितः ॥ मन्वानो वृत्रमायान्तं जिघांसुमरिसेनया । व्यवस्थितं धनुष्मन्तं तमुवाच बृहस्पतिः ॥ मरुत्पतिरयं सोम प्रेहि देवान् पुनर्विभो । सोऽब्रवीन्नेति तं शक्रः स्वर्ग एव बलाद्बली । इयाय देवानादाय तं पपुर्विधिवत्सुराः ॥ जघ्नुः पीत्वा च दैत्यानां समरे नवतीर्नव । तदव द्रप्स इत्यस्मिन् तृचे सर्वं निगद्यते' (बृहद्दे.
६. १०९-११५ ) । एतदनार्षत्वेनानादरणीयं भवति । एषोऽर्थः क्रमेणर्क्षु वक्ष्यते । तथा चास्या ऋचोsयमर्थः । “द्रप्सः । द्रुतं सरति गच्छतीति द्रप्सः । पृषोदरादिः । द्रुतं गच्छन् "दशभिः “सहसैः दशसहस्रसंख्यैरसुरैः “इयानः “कृष्णः एतन्नामकोऽसुरः "
अंशुमतीं नाम नदीम् “अव “अतिष्ठत् अवतिष्ठते । ततः “शच्या कर्मणा प्रज्ञानेन वा “धमन्तम् उदकस्यान्तरुच्छ्वसन्तं यद्वा जगद्भीतिकरं शब्दं कुर्वन्तं “तं कृष्णमसुरम् “इन्द्रः मरुद्भिः सह “आवत् प्राप्नोत् । पश्चात्तं कृष्णमसुरं तस्यानुचरांश्च हतवानिति वदति । “नृमणाः नृषु मनो यस्य सः । यद्वा । कर्मनेतृष्वृत्विक्ष्वेकविधं मनो यस्य स तथोक्तः । तादृशः सन् “स्नेहितीः । स्नेहतिर्वधकर्मसु पठितः । सर्वस्य हिंसित्रीस्तस्य सेनाः “अप “अधत्त । अपधानं हननम् । अवधीदित्यर्थः । ‘ अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' (सा. सं.
१. १.४.४.१) इति छन्दोगाः पठन्ति । तस्यानुचरान् हत्वा तं द्रुतं गच्छन्तमसुरमपाधत्त । हतवान् ॥
सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद-
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास (कथा) कही जाती है। कृष्ण नाम का एक असुर दस हजार असुरों के साथ अंशुमती नाम की नदी के तट पर खड़ा था। वहाँ जल के बीच स्थित उस कृष्ण के पास इन्द्र, बृहस्पति के साथ आए। आकर बृहस्पति की सहायता से इन्द्र ने उस कृष्ण और उसके अनुचरों (साथियों) का वध कर दिया।
कुछ लोग इसे दूसरी तरह से कहते हैं। उनके अनुसार कथा का आधार यह है: 'द्रप्स' शब्द का अर्थ जल की बूँद है, लेकिन 'द्रप्सश्चस्कन्द' (ऋग्वेद १०.१७.११) आदि मंत्रों में इसका प्रयोग सोम के लिए हुआ है। इस पद का सहारा लेकर वे कहते हैं— "वृत्र के भय से पीड़ित सोम देवताओं को छोड़कर कुरुक्षेत्र की ओर अंशुमती नदी में जाकर छिप गया। वृत्रहन्ता इन्द्र अकेले बृहस्पति के साथ वहाँ पहुँचे। युद्ध के लिए तैयार और विविध शस्त्रों से सुसज्जित मरुद्गणों को देखकर, सोम ने अपनी सेना के साथ मोर्चा संभाल लिया। उसे (सोम को) धनुष ताने खड़ा देख, बृहस्पति ने उसे शत्रु की सेना समझकर मारने की इच्छा से कहा— 'हे समर्थ सोम! यह मरुतों के स्वामी इन्द्र हैं, तुम पुनः देवताओं के पास चलो।' सोम ने मना कर दिया, तब बलवान इन्द्र उसे बलपूर्वक स्वर्ग ले आए। देवताओं ने विधिपूर्वक उसका पान किया और उसे पीकर युद्ध में असुरों की निन्यानवे (९९) सेनाओं को मार गिराया। यह सब 'द्रप्स' से शुरू होने वाली तीन ऋचाओं (तृच) में कहा गया है।" (बृहद्देवता ६.१०९-११५)।
किन्तु, यह मत (बृहद्देवता वाला) ऋषियों के मूल अभिप्राय के अनुकूल न होने के कारण स्वीकार करने योग्य नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ ऋचाओं के क्रम के अनुसार आगे बताया जाएगा।
इस ऋचा (मंत्र) का अर्थ इस प्रकार है: 'द्रप्सः' का अर्थ है शीघ्र जाने वाला। वह 'दशभिः सहसैः' अर्थात् दस हजार असुरों के साथ 'इयानः' (जाता हुआ) 'कृष्णः' नाम का असुर 'अंशुमतीम्' नाम की नदी के पास 'अव अतिष्ठत्' (ठहरा हुआ था)। तब 'शच्या' अर्थात् अपनी शक्ति या बुद्धि से, 'धमन्तम्' (जल के भीतर श्वास लेते हुए या संसार को डराने वाला शब्द करते हुए) उस कृष्ण असुर को इन्द्र ने मरुतों के साथ 'आवत्' (प्राप्त किया/खोज निकाला)। इसके बाद उन्होंने उस कृष्ण और उसके साथियों का वध कर दिया।
'नृमणाः' (मनुष्यों या ऋत्विजों के प्रति हितकारी मन वाले इन्द्र ने) 'स्नेहितीः' अर्थात् हिंसा करने वाली उसकी (असुर की) सेनाओं को 'अप अधत्त' (नष्ट कर दिया या मार डाला)। छन्दोग (सामवेदी) इसे 'अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' पढ़ते हैं। तात्पर्य यह है कि उसके साथियों को मारकर, इन्द्र ने उस तेजी से भागते हुए असुर का वध कर दिया।
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
सायण भाष्य का संस्कृत रूप-
तुरीयपादो मारुतः । मरुतः प्रति यद्वाक्यमिन्द्र उवाच तदत्र कीर्त्यते । हे मरुतः “द्रप्सं द्रुतगामिनं कृष्णमहम् “अपश्यम् अदर्शम् । कुत्र वर्तमानम् । “विषुणे विष्वगञ्चने सर्वतो विस्तृते देशे । यद्वा । विषुणो विषमः । विषमे परैरदृश्ये गुहारूपे देशे। “चरन्तं परितो गच्छन्तम् । किंच “अंशुमत्याः एतन्नामिकायाः “नद्यः नद्याः “उपह्वरे अत्यन्तं गूढे स्थाने “नभो “न नभसि यथादित्यो दीप्यते तद्वत्तत्र दीप्यमानम् “अवतस्थिवांसम् उदकस्यान्तरवस्थितं “कृष्णम् एतन्नामकमसुरमपश्यम् । तस्मिन् दृष्टे सति हे “वृषणः कामानामुदकानां वा सेक्तारो मरुतः “वः युष्मान् युद्धार्थम् “इष्यामि अहमिच्छामि । ततो यूयं तमिमं कृष्णम् "आजौ । अजन्ति गच्छन्त्यत्र योद्धार आयुधानि प्रक्षेपयन्तीति वाजिः संग्रामः । तस्मिन् "युध्यत संहरत । वाक्यभेदादनिघातः । केचित् इष्यामि वो मरुतः इति पठन्ति । तत्र हे मरुतः वो युष्मानिच्छामीत्यर्थो भवति ।
सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है"
"ऋचा का चतुर्थ पाद (तुरीयपाद) 'मारुतः' है। इन्द्र ने मरुतों के प्रति जो वाक्य कहा, उसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। हे मरुतों ! मैंने 'द्रप्सं' अर्थात् तीव्र गति वाले 'कृष्णम्' (कृष्ण नामक असुर) को 'अपश्यम्' (देखा)। वह कहाँ स्थित था ? 'विषुणे' अर्थात् चारों ओर फैले हुए विस्तृत प्रदेश में। अथवा, 'विषुण' का अर्थ विषम भी है; अर्थात् शत्रुओं के लिए अदृश्य, गुफा रूपी दुर्गम स्थान में। वह वहाँ 'चरन्तं' (विचरण कर रहा था)। इसके अलावा, 'अंशुमत्याः' इस नाम वाली 'नद्यः' (नदी) के 'उपह्वरे' अर्थात् अत्यन्त गोपनीय स्थान पर, 'नभो न' (आकाश में सूर्य के समान) चमकते हुए और जल के भीतर 'अवतस्थिवांसम्' (स्थित) उस 'कृष्ण' नामक असुर को मैंने देखा। उसके दिखने पर, हे 'वृषणः' (कामनाओं या जल की वर्षा करने वाले मरुतों), मैं 'वः' (तुम्हें) युद्ध के लिए 'इष्यामि' (चाहता हूँ/प्रेरित करता हूँ)। अतः तुम सब उस कृष्ण को 'आजौ' (युद्ध क्षेत्र में, जहाँ योद्धा और अस्त्र चलते हैं) 'युध्यत' (उसका संहार करो)। यहाँ वाक्य भेद होने के कारण (इष्यामि में) निघात स्वर नहीं हुआ है। कुछ लोग 'इष्यामि वो मरुतः' ऐसा पाठ पढ़ते हैं, जिसका अर्थ है—हे मरुतों, मैं तुम्हारी इच्छा करता हूँ।"
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
सायण भाष्य का संस्कृत रूप-
अध अथ “द्रप्स सः द्रुतगामी कृष्णः “अंशु मत्याः नद्याः “उपस्थे समीपे “तित्विषाणः दीप्यमानः सन् “तन्वम् आत्मीयं शरीरम् “अधारयत् । परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा सहायेन “अदेवीः अद्योतमानाः । कृष्णरूपा इत्यर्थः । यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः आगच्छन्तीः “विशः= असुरसेनाः "अभि "ससहे जघान । तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ।
सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है:"
फिर वह द्रुतगामी कृष्ण (असुर) 'अंशुमती' नदी के किनारे दीप्तिमान होकर अपने शरीर को धारण किए हुए था (अर्थात् शत्रुओं द्वारा अपराजित होकर खड़ा था। अथवा, बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पुष्ट कर रहा था)। वहां इन्द्र ने जाकर बृहस्पति नामक देव की सहायता से, उन प्रकाशहीन (अंधकारमय या पापयुक्त होने के कारण स्तुति के अयोग्य) और अपनी ओर बढ़ती हुई असुर सेनाओं को पराजित किया (अर्थात् उनका संहार किया, यह अर्थ प्रसंग से समझा जाता है)।"
ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर ही आधारित है पहले हम उसी अर्थ को प्रस्तुत करते हैं।-
सन्दर्भ-
इन ऋचाओं में अंशुमती नदी (यमुना का प्राचीन नाम माना जाता है) जिसके तट पर इन्द्र और कृष्ण नामक एक असुर या असुरराज के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। यहाँ 'कृष्ण' को दस हजार सैनिकों के साथ इन्द्र को चुनौती देते हुए दिखाया गया है, जिसे इन्द्र बृहस्पति की सहायता से पराजित करते हैं।
ऋचाओं का संयुक्त अनुवाद-
ऋचा- (१३)
"गतिशील और पराक्रमी कृष्ण (असुर) दस हजार सैनिकों के साथ अंशुमती नदी के तट पर युद्ध के लिए खड़ा था। इन्द्र ने अपनी शक्ति और बुद्धि से उस (कृष्ण) की (हुँकार) गर्जना को भाँप लिया और मनुष्यों के हित के लिए अपनी सेना के साथ उस विनाशकारी असुर का दमन किया।"
ऋचा- (१४)
"(इन्द्र अपनी सेना से कहते हैं) मैंने अंशुमती नदी के गुप्त स्थानों और गुफाओं में विचरते हुए उस कृष्ण (असुर) को देखा है, जो काले बादल के समान नदी के जल में छिपा हुआ है। हे वीर योद्धाओं ! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम युद्ध के मैदान में उतरो और उससे युद्ध करो।"
ऋचा- (१५)
"वह कृष्ण (असुर) अपनी चमकती हुई देह के साथ अंशुमती नदी के तट पर स्थित था। तब इन्द्र ने बृहस्पति को अपना सहायक बनाया और देवताओं का विरोध करने वाली उन असुर सेनाओं को, जो चारों ओर से आक्रमण कर रही थीं, पूरी तरह परास्त कर दिया।"
सायण भाष्य के अनुयायी
इन ऋचाओं में प्रयुक्त हुए निम्नलिखित शब्दों के गहरे दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थ इस प्रकार करते हैं-
1. द्रप्स-
साधारण अर्थ में इसका अर्थ 'बूँद' या 'कण' होता है, लेकिन यहाँ यह 'गतिशील तत्व' के लिए सायण ने इसका अर्थ किया है। दार्शनिक रूप से यह उस भटकती हुई शक्ति का प्रतीक है जो अभी स्थिर नहीं हुई है। कुछ विद्वान इसे 'सोम' की बूँद( Drops) मानते हैं, तो कुछ इसे 'अन्धकार का पुञ्ज' अथवा कृष्ण के विशेषण रूप में ग्रहण करते हैं।
2. अंशुमती-
'अंशु' का अर्थ है किरण। अंशुमती का अर्थ हुआ 'किरणों वाली' या 'प्रकाशमयी' होता है। भौतिक स्तर पर: यह कुरुक्षेत्र के पास की यमुना का विशेषण है। आध्यात्मिक स्तर पर: यह 'बुद्धि' या 'चेतना' का प्रतीक है। जब ज्ञान की किरणें (अंशु) मन में बहती हैं, तो वह अंशुमती है।
3. कृष्ण-
ऋग्वेद के इस सूक्त में 'कृष्ण' किसी व्यक्ति के बजाय 'अन्धकार' का प्रतीक है। यह वह अवरोध है जो प्रकाश को रोकता है। दस हजार (दशभिः सहस्रैः) सेनाऐं हमारी अनगिनत वृत्तियों या बुराइयों को दर्शाती हैं जो चेतना के तट पर घेरा डाले रहती हैं।
4. इन्द्र और बृहस्पति का योग -
सायण आदि भाष्य कर्ताओं के अनुसार इन्द्र 'संकल्प शक्ति' हैं और बृहस्पति 'ज्ञान/वाणी'। ऋचा संख्या (१५) स्पष्ट करती है कि केवल बल से काम नहीं चलता, जब संकल्प को ज्ञान (बृहस्पति) का साथ मिलता है, तभी भीतर के 'अदेव' (अन्धकारमयी) तत्वों पर विजय मिलती है।
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5-विश-वेदों में सायण ने विश विशेषण पद का अर्थ "विशो अदेवीर्" के रूप में देवों को न मानने वाले की प्रजा से किया है। सायण उन्होंने "विश" पद को केवल प्रजा मात्र मान लिया है। और विशो अदेवीर् पद का भाष्य असुरों की प्रजा अथवा असुर-सेना से किया है।
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इतिहासकारों,भाष्यकारों और शोधकर्ताओं ने ऋग्वेद की इन ऋचाओं (8/96/13-14-15) को अलग-अलग चश्मे से देखा है। इस कारण मुख्य रूप से दो बड़े ऐतिहासिक मत उभरकर सामने आते हैं-
1- जनजातीय संघर्ष का मत
डी.डी. कौशाम्बी और कई अन्य इतिहासकारों का मानना है कि ऋग्वेद के 'कृष्ण' एक आर्य-पूर्व (Non-Aryan) जनजातीय नायक या नेता थे। उनके अनुसार 'अंशुमती' सम्भवतः यमुना नदी का ही प्राचीन नाम है।
कृष्ण की शक्ति- उपर्युक्त ऋचा में 'दशभिः सहस्रैः' (दस हजार के द्वारा ) पद का उल्लेख यह संकेत देता है कि कृष्ण एक शक्तिशाली स्थानीय राजा या कबीले के प्रधान थे।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचाऐं इन्द्र (जो ऋग्वेद में किलों को तोड़ने वाले 'पुरन्दर' कहे गए हैं) और स्थानीय कृष्ण कबीले के बीच हुए वास्तविक ऐतिहासिक युद्ध की स्थिति को दर्शाती हैं।
2- पौराणिक विकास का मत-
कुछ शोधकर्ता इसे 'पौराणिक कृष्ण' के चरित्र निर्माण का प्रारम्भिक सोपान मानते हैं। किन्तु आश्चर्य और दिलचस्प बात यह है कि ऋग्वेद में इन्द्र 'कृष्ण' को हरा रहे हैं, जबकि पुराणों (जैसे गोवर्धन लीला) आदि के प्रकरण में श्रीकृष्ण इन्द्र के अहंकार को चूर कर रहे हैं। कृष्ण और इन्द्र के चरित्र तथा पौरुष को लेकर यहाँ दो विरोधाभासी बातें ही प्रकाशित हो रही हैं।
उपर्युक्त ऋचा में हम कृष्ण, विश, शचि, बृहस्पति आदि पदों के आधार पर कृष्ण के वैदिक और पौराणिक काल की विवेचना अथवा समीक्षा करेंगे हमारी यह प्रतिक्रिया सायण भाष्य के सापेक्ष होगी!
सायण के भाष्य की समीक्षा-
समीक्षात्मक पद-१- (द्रप्स)- नि:सन्देह सायण ने अपने वैदिक ऋचाओं के भाष्य में "द्रप्स" पद का वैकल्पिक व आनुमानित अर्थ ही ग्रहण किया हैं।
परन्तु हमारी जानकारी और शोधों के अनुसार "द्रप्स" पद भारोपीय परिवार की भाषाओं में अंग्रेज़ी शब्द (Drops)के समानार्थी है। जिसका अर्थ "जल-बिन्दु" होता है। वैदिक संस्कृत में भी द्रप्स पद जल बन्दु का ही अर्थ प्रकाशक है।
समीक्षात्मक पद- (अंशुमती)-
अंशुमती पर सायण का भाष्य भी अभिधा शब्द शक्ति मूलक है। रूढ़ अर्थ नहीं है जोकि वैदिक कथाओं के अनुरूप होना चाहिए था। पुराण वेदों की ही व्याख्याऐं हैं- पुराणों में अंशुमती पद यमुना नदी का वाचक व उसके लिए ही रूढ़ है। क्योंकि वह सूर्य की पुत्री बतायी जाती है। यमुना नदी को अंशुमति (और मुख्य रूप से सूर्यसुता, कहने के पीछे पौराणिक और धार्मिक कारण हैं, जो यमुना नदी को सूर्य देव से जोड़ते हैं:
- सूर्य देव की पुत्री यमुना - पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमुना सूर्य देव और संज्ञा की पुत्री हैं। अंशु का अर्थ 'किरण' होता है और अंशुमति का अर्थ 'किरणों वाली' या 'सूर्य की पुत्री' के रूप में लिया जाता है, जो सीधे सूर्य देव से उनके सम्बन्ध को दर्शाता है।
समीक्षात्मक पद "कृष्ण--उपर्युक्त ऋचा में आया हुआ कृष्णपद भी लाक्षणिक शब्द शक्ति मूलक है। कृष्ण का धातुज अर्थ "कर्षण- अर्थात(कृषि -कार्य करने वाला अथवा आकर्षण करने वाला" ही है। और कृषि करने वाले कृषक भी जलवायु और उष्णता के प्रभाव से श्याम वर्ण( साँवले रंग ) के ही होते हैं। और पौराणिक पात्र कृष्ण भी श्यामल (साँवले) रंग के थे जो यमुना की तलहटी में प्राय: गायें चराया करते थे ।
समीक्षात्मक पद- इन्द्र और शचि-
इन्द्र और शचि भी दोनों पति- पत्नी के रूप में पौराणिक पात्र हैं जो उपर्युक्त ऋचा में प्रयुक्त हुए हैं। इन्द्र एक पौराणिक पात्र है वेदों में भी एक देव विशेष का नाम इन्द्र है जो कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी है। अत: उपर्युक्त ऋचा में इन्द्र का वही अर्थ ग्रहण करना चाहिए जो पौराणिक ग्रन्थों में ग्रहण किया जाता है। और बृहस्पति इन्द्र के गुरु भी पौराणिक पात्र ही हैं।
समीक्षा-
वेदों में विश' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्राचीन शब्द है,और जो वैदिक सामाजिक संरचना का आधार स्तम्भ था। इसका अर्थ केवल साधारण जनसमूह ही नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सामाजिक इकाई से था जो वंश परम्परागत रूप से कृषि और गोपलन करती है।।
वेदों में विश के मुख्य प्राचीन अर्थ निम्नलिखित हैं:
- ऋग्वेद में 'विश' का प्रयोग सामान्य जनसमुदाय के लिए किया गया है, जो एक जन (कबीले) का हिस्सा होते थे।
- वैश्य वर्ग पुरुषसूक्त (ऋग्वेद) के अनुसार, विश से ही वैश्य वर्ण की उत्पत्ति मानी गई है। वेदों में विश का अर्थ कृषि,और पशुपालन से सम्बंधित जन समुदाय से है जो समाज की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ होते थे।
- बस्ती या ग्राम (Settlement/Village): विश' का एक अर्थ उस स्थान या बस्ती से भी है जहाँ लोग रहते थे, जिसे बाद में 'ग्राम' के रूप में जाना गया। यह ग्राम या कबीले का निवास स्थान होता था।
संस्कृत शब्द ग्राम का मूल अर्थ भी ग्रास भूमि( घास के मैदान) से ही है। जहाँ कालान्तर में गोप और उनके पशु स्थाई रूप से रहने लगे। और वह घास का मैदान ग्राम के रूप में रूढ़ हो गया जहाँ कृषक और उनके पशु रहते हैं।
- प्रजा राजा या कबीले के नेता (जनस्य गोपा) के सन्दर्भ में, 'विश' का अर्थ उनकी प्रजा या सामान्य नागरिक होता था, जो राजा को कर (बल) देते थे।
- वैदिक सामाजिक संरचना: ऋग्वैदिक काल में, समाज में 'जन' (कबीला) के बाद 'विश' सबसे महत्वपूर्ण इकाई थी। ऋग्वेद में 'विशाम्पति' शब्द का प्रयोग प्रजा के रक्षक या राजा के लिए किया गया
- निष्कर्ष:
वेदों में विश का अर्थ केवल जन विशेष ही नहीं, बल्कि एक उत्पादक, कृषि-पशुपालक वर्ग से है जो अपनी बस्ती में निवास करता था और कबीलाई व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक योगदान देता था। "विश-यह शब्द गोप जाति का समानार्थी व कृषि और गोपालन की गतिविधियों से सम्बन्धित जन समुदाय का वाचक रहा है।
इन ऋचाओं के प्रति इतिहासकारों, भाष्यकारों और शोधकर्ताओं के बीच अर्थ विन्यास को लेकर जो मत-मतान्तर पूर्वाग्रह से युक्त हैं वह सब सायण भाष्य से प्रेरित है।
इस पर कुछ इतिहासकारों का तो मानना यह भी हैं कि समय के साथ समाज की धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। जिसके परिणामस्वरूप जो 'कृष्ण' ऋग्वेद में एक असुर या अदेव के रूप में चित्रित थे, वे ही बाद में भागवत धर्म के उदय के साथ सर्वोच्च देवता (भगवान श्रीकृष्ण) के रूप में स्थापित हुए।
3- भाषाविद् और निरुक्तकारों का विचार-
वेदों के भाष्यकार सायणाचार्य ने स्पष्ट किया है कि वैदिक 'कृष्ण' एक असुर का नाम है। उनके अनुसार, 'कृष्ण' शब्द का अर्थ 'काले रंग वाला' है, जो किसी व्यक्ति विशेष के बजाय अन्धकार के समूह या काले मेघों की ओर इशारा करता है इन्द्र पद प्रकाश का वाचक है।
कुल मिलाकर यदि भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो ऋग्वेद के कृष्ण गोपेश्वर श्रीकृष्ण नहीं बल्कि कोई काले शरीर का असुर है। और ऐसे में भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो श्रीकृष्ण का वर्णन वेदों में नहीं है।
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अब वेदों की इन ऋचाओं में प्रयुक्त पदों का भाष्य व व्याकरण सम्मत अर्थ
भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ व संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है-
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सायण भाष्य के विपरीत भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ , संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी का मनना है कि "वैदिक ऋचाओं में जिस कृष्ण का उल्लेख हुआ है, वह गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही हुआ है। हाँ ये बात अलग है कि भाष्यकार सायणाचार्य ने श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त अदेव पद को असुर के अर्थ में भाष्य कर उसे पौराणिक व परवर्ती दैत्य अर्थ में ग्रहण किया है। जोकि अप्रासंगिक व कालवाधित है
जिसे व्याकरणीय दृष्टि से भी पूर्णतया स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।" क्योंकि इन ऋचाओं में आये कुछ प्रमुख शब्दों को देखा जाए तो उनके व्याकरणीय अर्थ निम्नलिखित हैं-
सर्व प्रथम हम असुर शब्द को ही अपने विश्लेषण का विषय बनाए-
तो असुर शब्द ऋग्वेद में ही अधिकतर वरुण, अग्नि, सूर्य, शिव (रूद्र) और इन्द्र का भी विशेषण व वाचक है।
ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग लगभग (105 )बार हुआ है। इनमें से अधिकांश स्थानों पर (लगभग 90 बार) इसका प्रयोग 'प्राणशक्ति से सम्पन्न और प्रज्ञावान् ' के अर्थ में किया गया है।
मुख्य रूप से यह शब्द इन्द्र, वरुण, अग्नि और रूद्र ( शिव) जैसे देवों के विशेषण के रूप में उनकी दिव्य शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाने के लिए उपयोग हुआ है। ऋग्वेद के उत्तरार्ध (विशेषकर दसवें मण्डल) में ही यह शब्द धीरे-धीरे नकारात्मक अर्थों (राक्षस या देव-विरोधी) शक्तियों में प्रयुक्त होने लगा था।
स्वयं सायण ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त संख्या (10) की ऋचा संख्या (2) में असुर शब्द का अर्थ वरुण देव के अर्थ में करते हैं।
जैसे-
"न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥
यह पंक्ति ऋग्वेद के (10)वें मण्डल के (10)वें सूक्त (यम-यमी संवाद) की दूसरी ऋचा है।
पूरा मंत्र और अर्थ:
"न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन्॥
संदर्भ और अर्थ:
यह संवाद यम और उनकी जुड़वाँ बहन यमी के बीच है। जब यमी अपने भाई यम के सम्मुख विवाह और संतानोत्पत्ति का प्रस्ताव रखती हैं, तब यम उन्हें मना करते हुए यह बात कहते हैं:
- यम का उत्तर: यम कहते हैं कि "तेरा यह सखा (भाई) इस प्रकार के सम्बन्ध (सख्यं) की इच्छा नहीं रखता, क्योंकि तू एक ही लक्षण वाली (जुड़वां बहन) है और तेरा रूप (समान उत्पत्ति के कारण) मुझ जैसा ही है"।
- नैतिक पक्ष: यम आगे कहते हैं कि "असुर (शक्तिशाली वरुण देव) के पुत्र, स्वर्ग को धारण करने वाले वीर हैं जो सब कुछ देख रहे हैं।" वे मर्यादा और धर्म का पालन करने के लिए यमी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।
ऋग्वेदः - मण्डल १० सूक्त १० ऋचा २- कासायण भाष्य- महः= महतः( महान) “असुरस्य= प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः( प्राणवान प्रज्ञावान वरुण प्रजापति के “पुत्रासः =पुत्रभूताः “वीराः पुत्रगण।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा में
प्राण और प्रज्ञा ( तीव्र बुद्धि) से सम्पन्न वरुण देव को असुर कहा गया है। जो नैतिकता और धर्म के अधिष्ठाता हैं।
ऋग्वेद में अग्नि देव को कई स्थानों पर 'असुर' शब्द से सम्बोधित किया गया है।
जिसका अर्थ यहाँ शक्तिशाली, प्राणदाता या प्रज्ञा शक्ति से युक्त होता है, न कि दैत्य अथवा राक्षस।
अग्नि के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग करने वाली प्रमुख ऋचा अथवा मन्त्र निम्नलिखित हैं:
- ऋग्वेद 5/15/1: इस ऋचा में अग्नि को स्पष्ट रूप से असुर कहा गया है: "प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय। घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः ॥१॥
(अनुवाद-: घृत (घी) में वास करने वाले, सुख देने वाले, धन के धारणकर्ता, दिव्य असुर (अग्नि) हमारे यज्ञ में पधारें)।
- ऋग्वेद 3/3/4 इसमें अग्नि को 'असुर' के रूप में सम्बोधित किया गया है: "पिता यज्ञानाम्-असुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम्। आ विवेश रोदसी भूरिवर्पसा पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः॥४॥
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे (ऋग्वेद 2.1.6)
- ऋग्वेद 2/1/6 इस ऋचा में अग्नि को असुर कहा गया है "त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे ।
त्वं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना ॥६॥(अर्थ: हे अग्नि ! तुम ही रुद्र हो, तुम ही महान दिव्य असुर हो)।
मुख्य तथ्य-
- यद्यपि ऋग्वेद का पहला सूक्त 'अग्नि सूक्त' है, लेकिन 'असुर' शब्द का विशेष प्रयोग ऊपर दिए गयी ऋचाओं (विशेषकर 5/15/1 और 2/1/6) में मिलता है।
वैदिक साहित्य में "असुर" का अर्थ प्रारम्भ में ' प्राणवान्' और प्रज्ञावान् ही रहा है, जो बाद के समय में नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त होने लगा।
इन्द्र के लिए असुर विशेषण पद का प्रयोग भी वैदिक है।- देखें निम्नलिखित ऋचा जो इन्द्र को असुर रूप में दर्शाती है।
"तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे ।
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन् ॥६॥
मुख्य शब्दार्थ:
- असुर: शक्तिशाली (यहाँ इन्द्र के सन्दर्भ में, है दैत्य के सन्दर्भ में नहीं)।
- प्रचेतसं: प्रकृष्ट चेतना वाले, बुद्धिमान।
- राधो: धन, या वस्तु।
- भागमिव: भाग (हिस्से) के समान।
- कृत्तिः: खाल या चर्म।
यह ऋचा इन्द्र की स्तुति में उनके उदार रूप और भक्तों की रक्षा करने वाले रूप को प्रकट करती है।
सायण भाष्य के अंश " हे असुर बलवन् प्राणवन् हे इन्द्र य उक्तगुणोऽस्ति
अर्थ-
वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) में 'असुर' शब्द का प्रयोग
शिव के वैदिक स्वरूप रुद्र के लिए भी कई स्थानों पर हुआ है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ 'राक्षस' न होकर
'अत्यन्त शक्तिशाली', 'प्राणवान' या 'दैवीय गुणों से युक्त' जनसमुदाय से है।
वेदों में रूद्र के लिए प्रयुक्त असुर शब्द के प्रमुख सन्दर्भ निम्नलिखित हैं:
- ऋग्वेद- ऋग्वेद में रुद्र (शिव) को असुर और देव दोनों ही विशेषणों से सम्बोधित किया गया गया है। ऋग्वेद में रुद्र को (6) बार असुर के रूप में महिमामण्डित किया गया है।
- सन्दर्भ (ऋग्वेद- 1/151/4 - विशेष उल्लेख): इसमें रुद्र के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग उनके भयावह लेकिन शक्तिशाली रूप के लिए किया गया है।
"प्र सा क्षि॒तिर॑सुर॒ या महि॑ प्रि॒य ऋता॑वानावृ॒तमा घो॑षथो बृ॒हत्। यु॒वं दि॒वो बृ॑ह॒तो दक्ष॑मा॒भुवं॒ गां न धु॒र्युप॑ युञ्जाथे अ॒पः ॥
- असुर का वैदिक अर्थ: वेदों के प्रारम्भिक काल में, असुर शब्द का प्रयोग अग्नि, वरुण, सूर्य और रुद्र जैसे देवताओं के लिए किया जाता था, जो 'असु' (प्राण) देने वाले या प्रज्ञा (ज्ञान) के स्वामी होते थे।
निष्कर्ष:
वेदों में शिव (रुद्र) के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग अत्यन्त दिव्य शक्ति (Mighty/Supreme Power) के सन्दर्भ में हुआ है, न कि नकारात्मक अर्थ में अत: सायण ने "असुर" शब्द को दो विरोधी अर्थों में प्रस्तुत किया है-
को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति ।
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥४॥
| ← | ऋग्वेदः - मण्डल (१/१६४/४)में असुर ईश्वर वाची है। ____________ प्रसंग के अनुरूप वैदिक ऋचाओं में असुर का अर्थ "प्राण व प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति" के लिए ही अधिक मान्य है। परन्तु दशम मण्डल के कुछ उत्तरकालीन सूक्तो में असुर पद शक्ति के प्राचुर्य व भयंकरता के कारण दैत्यों का वाचक भी बन गया है। परन्तु ऋग्वेद में सायण ने इस अर्थ परिवर्तन क्रम को अनदेखा किया है। जो अनर्थ का कारण बना। | |
विश- शब्द भी वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त है विशेषत: उपर्युक्त ऋचा में विश कृष्ण पक्ष के जन समुदाय का वाचक है। परन्तु इसका अर्थ तृतीय वर्ण के व्यक्ति वैश्य अथवा कृषि कर्म और गोपालन करने वाले के अर्थ को ध्वनित करता है। गोप ही ये सब कार्य( कृषि और गोपालन) करने वाले हैं।
ऋग्वेद में कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की विवेचना विस्तृत रूप से हम अपने सम्यक भाष्य के रूप निम्नलिखित रूप से पुन: प्रस्तुत करते हैं।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥ ऋग्वेद_८/९६/१३
(इयानः) चलता हुआ (अंशुमतीम्) विभागवाली [सीमावाली नदी-म० ८] पर (अव अतिष्ठत्) ठहरा है। (नृमणाः) नरों के समान मनवाले (इन्द्रः) इन्द्र ने (तम् धमन्तम्) उस हाँफते हुए को (शच्या) शचि के साथ (आवत्)- युद्ध किया और (स्नेहितीः) स्नेहयुक्त (अप अधत्त) हटा लिया है ॥१३॥
टिप्पणी:-
(धमन्तम्)= उच्छ्वसन्तम्। पराभवेन दीर्घं श्वसन्तम्= हार के द्वारा लम्बी- लम्बी श्वास लेता हुआ। (स्नेहितीः) = सिञ्चन करने वाला।
स्नेहतिः स्नेहतिर्वधकर्मा-निघ० २।१९। स्वकीया मारणशीलाः सेनाः (नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः= नेत्रों के समान (अप अधत्त) दूरे धारितवान्निवर्तितवान् = दूर कर दिया ॥
पद का अन्वय= अव । द्रप्सः । अंशुऽमतीम् । अतिष्ठत् । इयानः । कृष्णः । दशऽभिः । सहस्रैः ।आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नेहितीः । नृऽमनाः । अधत्त ॥१३।
शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण- १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर मध्यम पुरुष एकवचन।
२-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में ।
३- अंशुमतीम् = यमुनाम् –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
४-अवतिष्ठत् = अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश लङ्लकार रूप) स्थित हुए।
५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है यह सर्व विदित है।
६-धमन्तं= अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को। (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है ।
७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
८-नृमणां( धनानां)
९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने)
अब देखा जाए तो अथर्ववेद में भी ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा निम्न क्रम में है। जिसमें "अदेवी" पद कृष्ण के लिए ही है।
अथर्ववेद-(20/137/7)
विशेषटिप्पणी- यद्यपि संस्कृत लौकिक साहित्य में अव धातु के अनेक अर्थ विकसित हुए हैं-
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा "अव द्रप्सो..... में आया हआ
अव क्रियापद- प्राप्त करो" के अर्थ में है।
अव धातु लौकिक संस्कृत भाषाओं में अनेक अर्थ विकसित हुए हैं-
अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं ।
१०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम( प्राप्ति) ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान १८-वृद्धिषु।
परन्तु हमें प्रकरणअथवा प्रसंग के अनुरूप ही यहाँ अव धातु का अर्थ ग्रहण करना चाहिए । यहाँ अव धातु का अर्थ- "प्राप्त करना" है
प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार(अनद्यतन भूूूतकाल का रूप।
आवत् =प्राप्त किया ।
गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि अपने उपर्युक्त ऋचा संख्या (१३) का भाष्य का विस्तार करते हुए कहते हैं-
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"कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन् अँशुमतीनामधेयाया नद्या: यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।
अनुवाद-
कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप को इन्द्र ने यमुना नदी के जल में स्थित देखा वह इन्द्र अपनी पत्नी शचि के साथ आया हुआ है- और दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन भी दिया।१३।
तात्पर्य-- हे कृष्ण आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो ! कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप धन दिया।
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द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
पद का अन्वय= द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ ।
नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥१४।।
पदों के हिन्दी अनुवाद सहित अर्थ-
विषुण=विभिन्न रूप।
३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्= चरते हुए साँड को।
४-आजौ = संग्रामे = युद्ध में।
५-अ॒व॒ = उपसर्ग
६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्= स्था--क्वसु स्थितवति (स्थिर)= अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए है उस स्थिति में।
७-व:= युष्मभ्यम् । युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् = युष्मान् - तुम सबको । ॥
८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
१०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
११-आजौ= युद्ध में ।
१२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।।।१४।
हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं देखना चाहूगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से संग्राम में युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो
(अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
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शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
१-द्र॒प्सम्= जल को -कर्मकारक द्वित्तीया विभक्ति।अपश्यम्=अदर्शम् -दृश् धातु का लङ्लकार (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप - मैंने देखा ।
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२- वि + सवन(सुन) रूप विषुण =(विभिन्न रूप)। षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ] सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् ) पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
“सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥
व्याकरणिक निर्देश-
षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•) 'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न कोई स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्' के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।
शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु । परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है
परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।__________________________
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
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अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती नदी( यमुना) की गोद में धारण किया जो इनके गोपों - विशों (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न) सहचर( साथी) थे । चारों ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की सहायता से शासन में किया ।
पदपाठ-विच्छेदन :-
द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः । अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
शब्दार्थ-
“अध =अथ अधो वा = नीचे ।
“द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: ( Drops)
“अंशुमत्याः=यमुनाया: नद्याः = यमुना नदी के “(उपस्थे=समीपे) पास में अथवा गोद में।
“त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे = त्विष् धातु का अर्थ- चमकना है।
तित्विषाणः= दीप्यमानः= चमकता हुआ।
सन् =भवन्= होता हुआ।
“तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम्
“(अधारयत् = शरीर धारण किया)।
परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् = बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पोषित( पुष्ट) किया।
“इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन = इन्द्र ने जाकर बृहस्पति के साथ “अदेवीः = देवानाम् ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः = जो देवताओं को नहीं पूजता वह कृष्ण ।१५।
यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः = अथवा पाप युक्त “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः= चलती हुईं। “विशः=गोपालका: = कृषि कर्म और गोपालन करने वाले "अभि "ससहे षह् (सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे =चारो और से सख्ती की अथवा शासन किया ।
सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति
विशेष-
पुराणों में भी कृष्ण समस्त देवों के यज्ञों को बन्द करा देते हैं। क्योंकि उन यज्ञों में निरीह पशुओं का वध होता है। जो विशेष रूप से इन्द्र देव को लक्ष्य करके किए जाते हैं।
इसी सन्दर्भ में हम यह भी सुनिश्चित कर दें की कृष्ण को वैदिक ऋचाओं में असुर कहीं नहीं कहा गया है। ऋग्वेद की मूल ऋचा में उपस्थित अदेवी पद का की सायण ने भाष्य "असुर" के समानार्थक किया है। उसी को आधार मान कर वेदों का हिन्दी अनुवाद पढ़ने वाले जन- साधारण ने कृष्ण को असुर मान लिया है।
सारांश=असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है । अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद न. होकर अदेव पद है ।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है ।
इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को अपने
ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या 96 की कुछ ऋचाओं के भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा अदेव कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित है। सायण का सम्पूर्ण भाष्य इस अदेवी पद को लेकर भ्रान्तिजनक है।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ "प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों से है। इन्द्र, वरुण और शिव को भी वेदों में असुर कहा गया है।
अतः उपर्युक्त ऋचा के अनुसार स्पष्ट हुआ कि कृष्ण यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं। यह बात वैदिक सत्य है। किन्तु श्रीकृष्ण तो वैदिक काल से भी प्राचीन हैं।
मोहनजोदाड़ो की सभ्यता पूर्ववैदिक है।
इसकी पुष्टि- मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में ईस्वी सन् (1929) में हुई खोज के अनुसार पुरातत्व वेत्ता "अरनेस्त मैके" के द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में प्राप्त हुए एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) से इस सत्य की पुष्टि होती है। जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बालक का चित्र बना हुआ था।🖐️
जो पूर्णत: भागवत आदि पुराणों के कृष्ण से सम्बद्ध है। और जो शोधकर्ताओं को पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर ले जाता है। पुराणों का सृजन बुद्ध के परवर्ती काल में हुआ । और कृष्ण की कथाऐं इससे भी पुरानी हैं । वेद बुद्ध से पूर्व भी अस्तित्व में थे और मोहनजोदाड़ो की सभ्यता वेदों से भी पूर्व है।।
अत: कृष्ण बुद्ध से तो प्राचीन हैं ही साथ में वैदिक काल से भी प्राचीन हैं जिनकी उपस्थिति सिन्धु सभ्यता में भी है।
इतना ही नहीं ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के अतिरिक्त चौथे वेद अथर्ववेद में भगवान कृष्ण का वर्णन केशी नामक दैत्य का वध करने वाला बताकर कृष्ण की वैदिक काल से भी पूर्व पस्थिति दर्ज कर दी है।
अत: वेदों में भी कृष्ण होने की बात सिद्ध होती है।यह अतिशयोक्ति नहीं-
वेदों का लेखन कार्य ईसा पूर्व सप्तम सदी तक होता रहा है।
नीचे स्पष्ट रूप से ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद शौनक संहिता , और सामवेद आदि में कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख है।
"यःकृ॒ष्णः के॒श्यसु॑र स्तम्ब॒ज उ॒त तुण्डि॑कः। अ॒राया॑नस्या मु॒ष्काभ्यां॒ भंस॒सोऽप॑ हन्मसि॥"
(अथर्ववेद - काण्ड »8; सूक्त»6; ऋचा»5)
_________
१. ( यः कृष्ण:) = जो कृष्ण,२-(केशी) = केशी नामक ३- (असुरः) =दैत्य ४-(स्तम्बजः) जिसके केश गुच्छेदार हैं = ५-(उत) = और ६- (तुण्डिक:) = कुत्सित मुखवाला है / थूथनवाला है। ७-(अरायान्) = निर्धन पुरुषों को ८-(अस्याः) = इस के ९-(मुष्काभ्याम्) = मुष्को से-अण्डकोषों से तथा १०-(भंसस:)भसत् कटिदेशः पृषो० । उपचारात् तत्सम्बन्धिनि पायौ ऋ० १० । १६३ । = कटिसन्धिप्रदेश से ११- (अपहन्मसि) = दूर करते हैं।
"अनुवाद:- जो कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख उसके अण्डकोशों तथा इसकी कटि (कमर)आदि भागों से निर्धन लोगों दूर करते हैं अर्थात उनकी रक्षा करते हैं-
उपर्युक्त ऋचा में वर्णन है कि कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख और अण्डकोशों तथा कटि प्रदेश (कमर,)आदि के स्पर्श से गरीब अथवा निर्धन लोगों को तथा स्वयं को भी दूर करते हैं।
भागवत पुराण में दशम स्कन्ध, अध्याय (36), श्लोक (16-26) तथा अध्याय (37), श्लोक (1-9)में वर्णन है कि "कृष्ण-भगवान का अत्यन्त कोमल कर(हाथ) कमल भी उस समय ऐसा हो गया, मानो तपाया हुआ लोहा हो।
उसका स्पर्श होते ही केशी के दाँत टूट-टूटकर गिर गये और जैसे जलोदर रोग उपेक्षा कर देने पर बहुत बढ़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्ण का भुजदण्ड उसके मुँह में बढ़ने लगा।
अचिन्त्यशक्ति भगवान श्रीकृष्ण का हाथ उसके मुँह में इतना बढ़ गया कि उसकी साँस के भी आने-जाने का मार्ग न रहा। अब तो दम घुटने के कारण वह पैर पीटने लगा।
अथर्ववेद (दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व) में संकलित है जिसमें , केशी,="बालों (केशों)वाले", दैत्य का कृष्ण के साथ युद्ध होते हुए पहली बार वर्णन किया गया है
अर्जुन द्वारा भगवत गीता में भी कृष्ण को तीन बार केशी का हत्यारा कहा गया है- केशव (1.30 और 3.1) और केशी-निषूदन (18.1)। पहले अध्याय (1.30) में, कृष्ण को केशी के हत्यारे के रूप में सम्बोधित करते हुए, अर्जुन युद्ध के बारे में अपना संदेह व्यक्त करते हैं।
ऋग्वेद १/१०/३/ तथा यजुर्वेद ८/३४ में केशिन् का वर्णन है ही है ।
"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृष॑णा कक्ष्यप्रा ।
अथा॑ न इन्द्र सोमपा गिरामुप॑श्रुतिं चर ।। 3.।।
पदों का अन्वयार्थ:-
युक्ष्वा हि= संयुक्त ही होओ। केशिना= केशी दैत्य के संहारक अथवा सुन्दर केशों वाले के द्वारा । हरी = हरि भगवान कृष्ण के द्वारा। वृषणा= वृषणों के द्वारा। कक्ष्यप्रा= काँछ के साथ। अथा= और। इन्द्र= इन्द्र। सोमपा= सोमपा। नः= हमारी।गिरामुप॑श्रुतिं= सुनी हुई वाणी को । चर = दूत ।
"अनुवाद:- केशी दैत्य का बध करने वाले हरि के साथा जुड़ जाओ ! जिसने केशी दैत्य के अण्डकोष और काँख पकड़ कर फैंक दिया। हे सोमपान करने वाले इन्द्र ! हमारी सुनी हुई स्तुतिगीत को कृष्ण तक दूत के रूप में पहुचाऐं।३।
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कृष्ण अवतरण की भविष्यवाणी वेद में भी प्राप्त होती है।****
अब पुनः बात करते हैं यजुर्वेद » अध्याय:-32» ऋचा (5) की जो इस प्रकार है-
"यस्मा॑ज्जा॒तं न पु॒रा किं च॒नैव य आ॑ब॒भूव॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। प्र॒जाप॑तिः प्र॒जया॑ सꣳररा॒णस्त्रीणि॒ ज्योती॑षि सचते॒ स॒ षो॑ड॒शी ॥५ ॥
पद पाठ-
यस्मा॑त्। जा॒तम्। न। पु॒रा। किम्। च॒न। ए॒व। यः। आ॒ब॒भूवेत्या॑ऽऽ ब॒भूव॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ प्र॒जाऽप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। प्र॒जया॑ स॒ꣳर॒रा॒ण इति॑ सम्ऽररा॒णः। त्रीणि॑। ज्योती॑षि। स॒च॒ते॒। सः। षो॒ड॒शी ॥५ ॥
पदों के अर्थ और अन्वय- को देखा जाए तो कुछ इस प्रकार से होगा "हे मनुष्यो ! (यस्मात्)= जिस से (पुरा) =पहिले (किम्, चन)= कुछ भी (न जातम्)= नहीं उत्पन्न हुआ, (यः)= जो (आबभूव)=उत्पन्न हुआ जिसमें (विश्वा)= सब (भुवनानि)= लोक वर्त्तमान हैं, (सः एव)= वही (षोडशी)= सोलह कलावाला (प्रजया)= प्रजा के साथ (सम्, रराणः)= सम्यक् रूप रमता हुआ (प्रजापतिः) प्रजा का पालक अधिष्ठाता (त्रीणि) तीन (ज्योतीषिं)=ज्योतियों को{ अर्थात देवत्रय- ब्रह्मा विष्णु और महेश इन तीनों को (सचते)= संयुक्त करता है / जोड़ता है ॥५॥
"अनुवाद:- हे मनुष्यों जिससे पहले कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। जिससे सम्पूर्ण विश्व और सभी लोक उत्पन्न हुए वही ईश्वर( स्वराट्- विष्णु) ! सोलह कलाओं से युक्त प्रजा के साथ आनन्द करता हुआ। प्रजा पालक रूप में तीन ज्योतियों में जुड़ता है।
वस्तुत उपर्युक्त वैदिक ऋचा गोपेश्वर श्रीकृष्ण के अवतरण की भविष्यवाणी करती है।
पुराणों के अनुसार कृष्ण सोलह कलाओं से भी युक्त थे। इस बात का संकेत हमें वेदों में भी मिलता है।
यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति ।
इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश ॥२१॥
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् ।
स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥३१॥
सन्दर्भ-
वेदों में कृष्ण का 'विष्णुर्गोपा' के रूप में वर्णन अत्यंत दिव्य और गूढ़ है, जो उन्हें विष्णु के ही स्वरूप—'गोपालक' के रूप में स्थापित करता है। यह वस्तुत: गोलोक के स्वराट विष्णु का रूप है। जो सर्वोत्तम सत्ता है।
ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रंथों में कृष्ण को एक ऐसे सुन्दर चरवाहे के रूप में वर्णित किया गया है, जो न केवल गउओं का, बल्कि संसार का पालन और रक्षण करता है।
वेदों में कृष्ण का 'विष्णुर्गोपा' रूप में वर्णन इस प्रकार है:
.१- विष्णुर्गोपा (विष्णु ही गोपाल हैं):
ऋग्वेद (1.22.18) में एक गोपा (चरवाहे) का उल्लेख है, जो कभी अपनी स्थिति से नहीं गिरता, जो कभी पास तो कभी दूर होता है और विभिन्न रास्तों पर चलता रहता है। वेदों के इस विवरण को विष्णु के ही 'गोपाल' (श्री कृष्ण) अवतार के रूप में व्याख्यायित किया गया है।
- 'विष्णुर्गोपा' का अर्थ ही है—वह विष्णु जो 'गोपा' (गायों के रक्षक या गोपालक) हैं। 2
- . सर्वोच्च पालक और रक्षक:
- वेद में कृष्ण को 'अवतार परम पुरुष' के रूप में भी दर्शाया गया है।
3. वेदों में अप्रत्यक्ष संकेत:
- ऋग्वेद (1.116.23) में 'कृष्ण' नाम का उल्लेख है, जहाँ उन्हें देवकीपुत्र (छान्दोग्य उपनिषद 3.17 में) के रूप में बाद में पहचाना गया।
- वेदों में कृष्ण को "उषसः पूर्वा" (सूर्योदय से पहले पैदा हुआ) और "पदे गोः" (गायों के स्थान पर) रहने वाला बताया गया है।