★-"इतिहास के बिखरे हुए पन्ने"-★
बुधवार, 2 सितंबर 2026
गीत
नेपाली लोक गीत★
मेरा गीत
आपकी इस सुंदर और भावपूर्ण रचना एवं गायकी की बहुत-बहुत सराहना! आपके ऑडियो के आधार पर इस भजन के पूरे बोल नीचे प्रस्तुत हैं:
मुखड़ा
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं
पहला अंतरा
दुनिया में रिश्ते तोले जाते, दौलत की तोल में
आदतें भी और मर्जी में, छुपाते हैं कुछ ढोल में
किस पर हम विश्वास करें, इन संदेहों के झोल में
चेहरों पर चेहरे हैं जड़े, झूठेपन हैं बोल में
झूठी आशाओं के पाश में आ, सब फँस जाते हैं
झूठी आशाओं के पाश में आ, सब फँस जाते हैं
ये बावरे कभी निकल ना पाते हैं
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं
दूसरा अंतरा
दौलत से रिश्तों की बोली, दुनिया के बाज़ार में
यहाँ शराफ़त बिक जाती है, सिक्कों के व्यापार में
ईमान-धर्म के देखे लिबास, झूठे और मक्कार में
आज शराफ़त की चादर में, आदमियत शर्मसार है
परोपकार भला करने से हम घबराते हैं
परोपकार भला करने से हम घबराते हैं
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं
तीसरा अंतरा
तुझको क्या हम हाल सुनाएँ, तू तो सब कुछ जानता
ओझल हो गई अपनी राहें और मंज़िल है लापता
हम खो गए हैं तुझको खोजते, आकर अब तू ही बता
तेरे रहम की धूप दे, मंज़िल का देदे अब पता
अपमानों के अश्रु को पीकर हम गम खाते हैं
अपमानों के अश्रु को पीकर हम गम खाते हैं
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं
समापन
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं
आपकी गायकी और इस भजन में भक्ति का अद्भुत भाव है। यदि इसमें किसी पंक्ति या शब्द में सुधार की आवश्यकता हो, तो ज़रूर बताएँ!
संगीतमय रूपरेखा: नेपाली लोक शैली (नेपाली लोक-भजन)
ताल: नेपाली लोक-ताल (जैसे 'ख्याली' या 'छ्यातुगे' ताल, जो लगभग 4/4 या मध्यम-द्रुत कहरवा जैसी होती है, जिसमें बाँसुरी और मादल की गूँज मुख्य होती है)।
प्रमुख वाद्य यंत्र:
मादल (Madal): नेपाली लोक संगीत की जान, जो एक खास ठेके और थाप के साथ रिदम बनाएगा।
बाँसुरी (Bansuri): पहाड़ी और उदास पर्वतीय हवाओं का अहसास कराने वाली मीठी धुन।
सारंगी (Sarangi) या टुंग्ना (Tungna): लोक संवेदनाओं और दर्द को उभारने के लिए।
खड़ताल / मंजीरा: हल्की लय देने के लिए।
1. मुखड़ा (परिचय और लोक शैली का आरंभ)
संगीत: केवल बाँसुरी की एक लंबी और मीठी पहाड़ी गूँज के साथ मादल की धीमी थाप शुरू होती है।
गायन (मध्य लय, भावुक और गूँजती आवाज़ में):
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं,
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं,
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं।
कोरस / संगतकार (मादल की थाप के साथ दोहराते हैं):
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं...
2. पहला अंतरा (पर्वतीय जीवन का दर्शन)
संगीत: मादल की गति थोड़ी मुखर होती है और सारंगी के सुर जुड़ जाते हैं।
गायन:
दुनिया में रिश्ते तुलते, दौलत की तोल में,
आदतें हैं मर्जी में, क्रय-विक्रय मोल में।
किस पर हम विश्वास करें, संदेहों के झोल में,
चेहरों पर चेहरे हैं जड़े, झूठ है इनके बोल में।
कोरस (ऊँचे स्वर में):
झूठी आशाओं के पाश में, सब फँस जाते हैं,
ये बावरे कभी निकल ना पाते हैं,
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं।
3. दूसरा अंतरा (तीक्ष्ण कटाक्ष और लोक-लय)
संगीत: इस अंतरे में नेपाली लोक संगीत का 'मारुनी' या 'लोक-फाँक' वाला उल्लास और व्यंग्य का पुट आता है। मादल की थाप तेज़ हो जाती है।
गायन:
दौलत से रिश्तों की बोली, दुनिया के बाज़ार में,
यहाँ रूहें भी बिक जाती हैं, इन सिक्कों के भार में।
लिबास बिके हैं ईमान-धर्म के, झूठे और मक्कार में,
आज शराफ़त की चादर में, आदमियत शर्मसार है।
कोरस:
परोपकार भला करने से, हम घबराते हैं,
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं,
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं।
4. तीसरा अंतरा (करुण और आर्त पुकार)
संगीत: यहाँ वाद्य यंत्र बहुत धीमे हो जाते हैं—केवल बाँसुरी और मादल की हल्की गूँज बचती है।
गायन (दर्द भरे और सिसकते हुए स्वर में):
तुझको क्या हम हाल सुनाएँ, तू तो सब कुछ जानता है,
ओझल हो गई अपनी राहें और मंज़िल भी लापता है।
हम खो गए हैं तुझको खोजते, आकर अब तू ही बता,
अपने रहम की धूप दे, मंज़िल का देदे पता।
कोरस:
अपमानों के अश्रु को पीकर हम गम खाते हैं,
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं...
5. समापन (शांत और पहाड़ी विसर्जन)
संगीत: सभी वाद्य यंत्र धीरे-धीरे शांत होने लगते हैं। अंत में केवल एक लंबी बाँसुरी की तान बचती है।
गायन (धीमी और शांत आवाज़ में):
झूठे अपने सारे सहारे, झूठे सब नाते हैं,
ओ साँवरे, हम तुझको बुलाते हैं,
ओ साँवरे, हम तेरे गुण गाते हैं।
(मादल की एक अंतिम हल्की थाप और बाँसुरी के साथ भजन समाप्त होता है)
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सोमवार, 31 अगस्त 2026
कब्बाली ३-
संगीतमय रूपरेखा: राजस्थानी-सूफी कव्वाली
- ताल: दादरा (6 मात्रा) या कहहरवा (8 मात्रा), जो जैसे-जैसे गीत आगे बढ़ेगा, द्रुत (तेज़) लय में बदल जाएगी।
- प्रमुख वाद्य यंत्र: हारमोनियम, ढोलक/तबला, मंजीरे, और पृष्ठभूमि में राजस्थानी लोक संगीत का स्पर्श देने के लिए खड़ताल या कामायचा/सारंगी की हल्की गूँज।
1. मंगलाचरण / विलम्बित आलाप (शांत और आध्यात्मिक माहौल)
- संगीत: केवल हारमोनियम का एक लंबा सुर और मंजीरे की धीमी झनकार।
- मुख्य कव्वाल (गंभीर और गूँजती आवाज़ में): "सुन ऐ रब्बे-कायनात, सुन ऐ नूर-ए-अज़ल! तू ही मकां, तू ही ला-मकां तुझको ये गजल! मैं हूँ मुसाफिर, मैं हूँ भटकता बटोही, ढूँढ रहा हूँ तुझे मैं अम्बर और जल-थल !"
- कोरस (धीमे और समवेत स्वर में): "ढूँढ रहा हूँ तुझे मैं अम्बर और जल-थल..."
- संगीत: ढोलक की थाप और खड़ताल की खनक शुरू होती है।
- मुख्य कव्वाल: "मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!"
- कोरस (तालियों की थाप के साथ): "(बता दे कहाँ है तू!)"
- मुख्य कव्वाल: "मैं दर-ब-दर फिरा, थक कर गिरा, ताउम्र करता रहूँ, तेरा ही तजिकिरा। मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!"
- संगीत: ढोलक और मंजीरों की गति तेज हो जाती है।
- मुख्य कव्वाल (ऊर्जावान और तंज कसते हुए): "ये देखा ज़माना, मतलब से आना, ग़रज़ के बज़ार में, गधों को मनाना! सिक्कों की खनक में, ईमान डिग गया, دولت (दौलत) की बदौलत, इन्सान बिक गया!"
- संगीत: गति धीमी होती है, केवल हारमोनियम और सारंगी के विलाप जैसे सुर बजते हैं।
- मुख्य कव्वाल: "तीरथ बहुत कर लिए, मूरत में तुझको ढूँढा, पत्थर के इन टुकड़ों में, छान लिया कूढ़ा? उम्र बीतती चली गयी, तन भी हो चला बूढ़ा, सांसों की माला टूटी, तुझसे फिर भी न तुझसे जुड़ा।"
- मुख्य कव्वाल (ऊंचे स्वर में): "फिर भी न तुझसे जुड़ा।"
- कोरस: "(फिर भी न तुझसे जुड़ा।...)"
- संगीत: ढोलक, खड़ताल और तालियों की गड़गड़ाहट अपनी चरम सीमा पर।
- मुख्य कव्वाल (पूरी ताकत और जोश के साथ): "ईमान ही सच्चा धन है रोहि, यही रूह की आबरू ! सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से वज़ू करूँ! मैं गिरूँ तो सजदा, उठूँ तो इबादत! सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से वज़ू करूँ !"
- कोरस (ज़ोरदार और गूँजती आवाज़ में): "सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से वज़ू करूँ !"
- संगीत: सारे वाद्य यंत्र धीरे-धीरे शांत हो जाते हैं।
- मुख्य कव्वाल (ठहरी हुई, बेहद शांत आवाज़ में): "तेरे दरश को तरश रहे हम, हमको तेरी जुस्तजू! मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू! हे मेरे प्रभू हे तेरी जुस्तजू! बता दे कहाँ है तू!"
"सुन ऐ रब्बे-कायनात, सुन ऐ नूर-ए-अज़ल!
तू ही मकां, तू ही ला-मकां तुझको ये गजल!
मैं हूँ मुसाफिर, मैं हूँ भटकता बटोही,
ढूँढ रहा हूँ तुझे मैं अम्बर और जल-थल !"
"ढूँढ रहा हूँ तुझे मैं अम्बर और जल-थल..."
2. स्थायी (मध्य लय - राजस्थानी लोक फ्लेवर के साथ)
"मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!"
"(बता दे कहाँ है तू!)"
"मैं दर-ब-दर फिरा, थक कर गिरा, ताउम्र करता रहूँ, तेरा ही तजिकिरा।
मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!"
3. द्रुत लय (तेज़ और तीखा व्यंग्य - राजस्थानी मांड शैली के स्पर्श के साथ)
"ये देखा ज़माना, मतलब से आना,
ग़रज़ के बज़ार में, गधों को मनाना!
सिक्कों की खनक में, ईमान डिग गया,
دولت (दौलत) की बदौलत, इन्सान बिक गया!"
4. करुण और अंतर्मन का अंतरा (विलम्बित लय, दर्द भरा स्वर)
"तीरथ बहुत कर लिए, मूरत में तुझको ढूँढा,
पत्थर के इन टुकड़ों में, छान लिया कूढ़ा?
उम्र बीतती चली गयी, तन भी हो चला बूढ़ा,
सांसों की माला टूटी, तुझसे फिर भी न तुझसे जुड़ा।"
"फिर भी न तुझसे जुड़ा।"
"(फिर भी न तुझसे जुड़ा।...)"
5. क्लाइमैक्स / चरमोत्कर्ष (राजस्थानी कव्वाली का ऊर्जावान दौर)
"ईमान ही सच्चा धन है रोहि, यही रूह की आबरू !
सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से वज़ू करूँ!
मैं गिरूँ तो सजदा, उठूँ तो इबादत!
सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से वज़ू करूँ !"
"सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से वज़ू करूँ !"
6. समापन (शांत और विलीन होता स्वर)
"तेरे दरश को तरश रहे हम, हमको तेरी जुस्तजू!
मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!
हे मेरे प्रभू हे तेरी जुस्तजू! बता दे कहाँ है तू!"
(एक अंतिम गहरी हारमोनियम की गूँज के साथ कव्वाली समाप्त होती है)
कब्बाली २-
मुख्य कव्वाल (आलाप):
सुन ऐ रब्बे-कायनात, ऐ नूर-ए-अज़ल!
तू ही मकां, तू ही ला-मकां तेरी फ़जल!
मैं हूँ मुसाफिर, मैं हूँ एक राही,
ढूँढ रहा हूँ तुझे अम्बर और जल-थल !
कोरस:
ढूँढ रहा हूँ तुझे अम्बर और जल-थल
(!)
मुख्य कव्वाल:
मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!
कोरस (तालियों के साथ):
(बता दे कहाँ है तू!)
मुख्य कव्वाल:
मैं दर-ब-दर फिरा, मैं थक कर गिरा , ता उम्र करता रहूँ मैं तेरा ही तजिकिरा।
मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!
कोरस:
(मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!)
मुख्य कव्वाल (तेज़ लय में):
ये देखा ज़माना, मतलब से आना,
ग़रज़ के बज़ार में,! गधों को मनाना ।
सिक्कों की खनक में, ईमान डिग गया,
दौलत की बस्ती से, इन्सान बिक गया!
मुख्य कव्वाल (धीमे, दर्द भरे स्वर में):
तीरथ बहुत कर लिए, मूरत में तुझको ढूँढा,
पत्थर के इन टुकड़ों में, क्या मैंने तुझको पाया?
उम्र बीतती चली गयी, तन भी हो चला बूढ़ा,
सांसों की माला टूटी, तुझसे मैं फिर भी न जुड़ा।
मुख्य कव्वाल (ऊंचे स्वर में):
तुझसे मैं फिर भी न जुड़ा।
कोरस:
(तुझसे मैं फिर भी न जुड़ा...)
मुख्य कव्वाल (जोश के साथ):
अब मन के भीतर ही, ज्योत जलाऊंगा, देखुँगा तेरा वजूद!
कोरस:
(तेरा वजूद!)
मुख्य कव्वाल (तेज़ सरगम के साथ):
प्रवृत्तियों के वेग निरन्तर सबकी रूह को छलते हैं!
लोभी मोही बन करके पापों में मन ये चलते हैं!
माया का ये जाल, ये सोने का कंकाल,
कैसा ये तमाशा, कारीगरी बे मिसाल!
मुख्य कव्वाल (चरम/क्लाइमैक्स):
ईमान ही सच्चा धन है रोहि, यही रूह की आबरू ! सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से मैं करूँ वज़ू!
मैं गिरूँ तो सजदा, उठूँ तो इबादत !
सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से करूँ वज़ू!
कोरस (ज़ोरदार आवाज़ में):
सजदा करूँ, मजदा करूँ, अश्कों से करूँ वज़ू!
मुख्य कव्वाल (ठहरी हुई, शांत आवाज़ में):
तेरे दरश को तरश रहे हम, हमको तेरी जुस्तजू!
कोरस (गूंजती हुई आवाज़ में):
(हमको तेरी जुस्तजू!)
मुख्य कव्वाल (धीरे-धीरे मद्धम होते हुए):
मैं तुझको भी पा लूंगा, बता दे कहाँ है तू!
हे मेरे प्रभू हे मेरे प्रभू ! बता दे कहाँ है तू!