शुक्रवार, 22 मई 2026

'श्रीकृष्णस्वरूपसुबोधनी'

      ★-श्रीकृष्ण-स्वरूपसुबोधनी -★

 -अहीर जाति की उत्पत्ति का प्राचीनतम इतिहास-


पुस्तक "श्रीकृष्ण स्वरूपसुबोधनी
"को लिखने का मुख्य उद्देश्य भक्त और भक्ति की यथार्थता तथा परम्प्रभुपरमेश्वर श्रीकृष्ण के द्वारा सृष्टि रचना और उसके विस्तार को बताते हुए सर्वव्यापी श्रीकृष्ण के गुणातीत व निर्विकल्प स्वरूपों और उनके लौकिक व पारलौकिक यथार्थ जीवन के गूँढ़ रहस्यों का बोध कराना है। इसके साथ ही भूतल पर उनकी अद्भुत रहस्य पूर्ण उन लीलाओं का वर्णन करना भी है;  जिनसे जन- सामान्य पूर्णत: अनभिज्ञ है। जिसमें परमेश्वर श्रीकृष्ण तथा उनके गोपों का गोलोक से भूतल पर आगमन और प्रस्थान कब और किस प्रकार हुआ उस  वास्तविक घटना क्रम का वर्णन, भूतल पर गोपेश्वर श्रीकृष्ण सहित गोपों की जाति - वंश, वर्ण एवं कुल विषयक जिज्ञासाओं कि निवृत्ति तथा  उनकी  वास्तविक तथ्यपरक जानकारी देना  है।
इसका सम्पूरक उद्देश्य श्रीकृष्ण जीवन के लौकिक व पारलौकिक चरित्र विषयक वार्तालाप के उपरान्त उत्पन्न हुए कुछ प्रश्नों तथा कुछ भ्रान्ति मूलक मिथकीय टिप्पणियों का शास्त्रीय विधि से उत्तर देकर सम्यक समाधान करना भी है। इस हेतु यह पुस्तक अपने बह्वायामी उद्देश्यों की आपूर्ति व प्राप्ति में एक सफल प्रयास है।

यह "श्रीकृष्ण- स्वरूपसुबोधनी
"पुस्तक वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण का शास्त्रीय कलेवर (शरीर) ही है। अत: इस भाव को मन में रखकर भक्त-गण इसे भगवान् श्रीकृष्ण के पूजा-स्थल पर रखकर उनकी उपस्थिति का आभास भी कर सकते हैं। क्योंकि इस पुस्तक में श्रीकृष्ण के जीवन के अद्भुत पहलुओं का सचित्र वर्णन किया गया है, जो प्राय: एक साथ अन्यत्र मिलना दुर्लभ हैं। यह पुस्तक अपने द्वादश (बारह) अध्यायों में श्रीकृष्ण के अतीव सार-गर्भित चरित्रों के साथ अपने नाम को सार्थक करती हुई उन परमेश्वर श्रीकृष्ण के ही चरणों में समर्पित है।

इस पुस्तक के लेखन कार्य से लेकर श्रीकृष्ण जीवन के सारगर्भित चरित्रों के चित्रों का शब्दाङ्कन करने तक प्रेरणा श्रोत बनकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की महती कृपा ही कारिका रही है। 


     लेखक -गोपाचार्य हंस- योगेश कुमार रोहि-
       
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            ✴️ श्रीकृष्ण स्तुतिः✴️     

श्लोकवार विश्लेषण एवं अनुवाद

१. वन्दे वृन्दावन-वन्दनीयं सर्व-लोकैरभिनन्दनीयम्।

कर्म-फलस्य नियमं सङ्कल्प-कर्मेच्छा-विधेयम्॥

  • व्याकरण: 'वृन्दावन-वन्दनीयम्' (वृन्दावन द्वारा वन्दनीय - तृतीया तत्पुरुष), 'सर्व-लोकैः + अभिनन्दनीयम्' (सवर्ण दीर्घ और विसर्ग संधि)।
  • अनुवाद: मैं वृन्दावन में वन्दनीय और सभी लोकों द्वारा अभिनन्दित (प्रशंसित) भगवान की वन्दना करता हूँ। वे कर्म-फल के नियम के ज्ञाता और सङ्कल्प व कर्मेच्छा को पूर्ण करने वाले (विधेय) हैं।

२. भक्त-भाव-सुरञ्जनं राग-रङ्ग-सुसञ्जनम्।

बोध-शोध-मनोऽञ्जनं नमामि दुष्ट-भञ्जनम्॥

  • व्याकरण: 'भक्त-भाव-सुरञ्जनम्' (भक्तों के भाव से प्रसन्न होने वाले)। 'मनोऽञ्जनम्' (मनः + अञ्जनम् - विसर्ग संधि)।
  • अनुवाद: जो भक्तों के भाव से प्रसन्न होते हैं, जो प्रेम और आनन्द (राग-रङ्ग) को उत्पन्न करने वाले हैं, जो ज्ञान और शुद्धि से मन को अञ्जन की तरह पवित्र करने वाले हैं, उन दुष्टों का विनाश करने वाले प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।

३. मयूर-पत्र-मस्तकं मुरली-मञ्जु-हस्तकम्।

ज्ञान-रश्मि-प्रभाकरं गुणातीतं गुणाकरम्॥

  • व्याकरण: 'मञ्जु-हस्तकम्' (सुन्दर हाथों वाले), 'गुणाकरम्' (गुणों की खान - षष्ठी तत्पुरुष)।
  • अनुवाद: जिनके मस्तक पर मयूर का पंख है और हाथों में सुन्दर मुरली शोभित है, जो ज्ञान की किरणों के सूर्य हैं, जो गुणों से परे हैं फिर भी सभी गुणों के सागर हैं।

४. नमामि त्वामहं सख्यं हरिशोक-महाकष्टकम्।

भव-बन्ध-विमोचनं सर्व-भक्त-जन-रोचनम्॥

  • व्याकरण: 'भव-बन्ध-विमोचनम्' (संसार के बंधनों से मुक्त करने वाले)।
  • अनुवाद: मैं सख्य-भाव से आपकी वन्दना करता हूँ, आप हरि (भक्त) के दुखों और कष्टों को हरने वाले हैं। आप भव-सागर के बंधनों को काटने वाले और सभी भक्तों को प्रिय लगने वाले हैं।

५. कृष्ण श्याम घन-मेघं लभेमहि जीवन-धनम्।

रोमभ्यो गोपा-सर्जकं सकल-सिद्धी-प्रदायकम्॥

  • व्याकरण: 'जीवन-धनम्' (जीवन ही जिनका धन है - कर्मधारय)।
  • अनुवाद: श्याम वर्ण वाले मेघ के समान श्री कृष्ण, आप ही हमारे जीवन के धन हैं। आप अपने रोमों से गोप-समूह को सृजित करने वाले और सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं।

६. कृपा-सिन्धुं गुरु-धर्मकं नमामि प्रभुम् उरुकर्मकम्।

इन्द्र-यज्ञ-निवारणं पशु-हिंसा-विरोधकारणम्॥

  • व्याकरण: 'कृपा-सिन्धुम्' (दया का समुद्र)। 'उरुकर्मकम्' (विशाल कार्यों वाले)।
  • अनुवाद: दया के सागर, गुरुओं के धर्म को स्थापित करने वाले, विशाल कार्यों वाले प्रभु को मैं नमन करता हूँ। आपने ही इन्द्र के यज्ञ का निवारण किया और पशु-हिंसा के विरोध का कारण बने।

७. स्नातकं प्रभु-सुगोरजं सदा विराजसे व्रजे।

दधानं ग्रीवया मालकं नमामि आभीर-बालकम्॥

  • व्याकरण: 'सुगोरजम्' (गोप-रज या गौओं की धूल से युक्त)। 'आभीर-बालकम्' (ग्वाल-बालक)।
  • अनुवाद: जो गौओं की धूल से सुशोभित हैं, आप सदा ब्रज में विराजमान रहते हैं। गले में माला धारण करने वाले, उन ग्वाल-बालक रूपी प्रभु को मैं नमन करता हूँ।

८. कृषि-कर्मसु प्रवीणतं चापीड-केकि-वर्णकम्।

कृषाणु-शाण-हल-धरणं वन्दे कृष्ण-सङ्कर्षणम्॥

  • व्याकरण: 'कृषि-कर्मसु' (सप्तमी बहुवचन - कृषि कार्य में)।
  • अनुवाद: कृषि कार्य में निपुण, मयूर पंख के आभूषण से सुसज्जित, हल को धारण करने वाले (बलराम-कृष्ण तत्त्व) श्री कृष्ण-सङ्कर्षण की मैं वन्दना करता हूँ।

९. गोप-गोपी-अधिनायकं वैष्णव-धर्म-विधायकम्।

व्रज-रज-तव प्रभु-भूषणं नमामि कोटि-पूषणम्॥

  • व्याकरण: 'अधिनायकम्' (स्वामी/अधिपति)। 'विधायकम्' (स्थापित करने वाले)।
  • अनुवाद: आप गोप-गोपियों के स्वामी और वैष्णव धर्म के विधाता हैं। ब्रज की धूल आपका आभूषण है, ऐसे करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी प्रभु को मैं नमन करता हूँ।

१०. निष्काम-कर्म-निर्णायकं सुतान-वेणु-लव-गायकम्।

दीन-बन्धोः त्वं सहायकं नमामि यादव-विनायकम्॥

  • व्याकरण: 'निष्काम-कर्म' (बिना फल की इच्छा के कर्म)। 'दीन-बन्धोः' (दीनों के बंधु - षष्ठी विभक्ति)।
  • अनुवाद: जो निष्काम कर्म का निर्णय देने वाले हैं, मुरली के स्वरों को गाने वाले हैं, दीनों के सहायक हैं, उन यादवों के नायक को मैं नमन करता हूँ।

११. किशोर-वय-सुव्यञ्जितं राग-रङ्ग-सुशोभितम्।

नमामि प्रभु-सद्व्रतं पीत्वा गीतामृतं च ज्ञानम्॥

  • व्याकरण: 'सुव्यञ्जितम्' (अच्छी तरह प्रकट/सुशोभित)।
  • अनुवाद: किशोर अवस्था में सुशोभित, प्रेम और आनन्द में सदा रहने वाले, उत्तम व्रतधारी प्रभु को नमन करता हूँ, जिनका गीता रूपी अमृत ज्ञान हम पीते हैं।

१२. वन्य-मालं कण्ठे धारिणं नमामि व्रज-विहारिणम्।

वैजयन्ती-लालित्य-हारिणं लीला-विलोल-विस्तारिणम्॥

  • व्याकरण: 'वन्य-मालम्' (वन के फूलों की माला)। 'व्रज-विहारिणम्' (ब्रज में विहार करने वाले)।
  • अनुवाद: गले में वनमाला धारण करने वाले और ब्रज में विहार करने वाले प्रभु को नमन है। वैजयन्ती माला की सुंदरता को हरने वाले और अपनी लीलाओं को सर्वत्र विस्तार देने वाले प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।

संक्षिप्त व्याकरणिक टिप्पणी:

  • ​अधिकांश श्लोक 'द्वितीय विभक्ति' (कर्म कारक) में हैं, जो 'नमामि' (मैं नमस्कार करता हूँ) क्रिया से जुड़े हैं।
  • समास: संस्कृत की सुंदरता इसके सामासिक पदों (जैसे 'ज्ञान-रश्मि-प्रभाकरम्') में है, जो एक शब्द में विशाल अर्थ समेट लेते हैं।


उपर्युक्त स्तुति परक छन्दों का भाष्य          

१. कर्म-नियामक:

वृन्दावन-जनैर्वन्द्यो, लोकैरभिनन्दितः। सृष्ट्यादौ स स्वसंकल्पात्, कर्म-बन्धं व्यधत्त सः॥

२. सुदर्शनधारी:

भक्त-भाव-समायुक्तं, राग-रंग-समन्वितम्।सुदर्शन-धरं कृष्णं, नमाम्यज्ञान-नाशकम्॥

३. ज्ञान-प्रभाकर:

मयूर-पिच्छ-मुकुटो, मुरली-शोभित-करः। ज्ञानानां प्रभाकरस्त्वं, गुणातीतोऽसि केशव!॥

४. दुःख-हर्ता:

गिरिधरि ! नमस्तुभ्यं, सन्ततं दु:ख-हारिणे। द्वन्द्व-पाश-विमुक्त्यै च, गोविन्दं त्वां नमाम्यहम्॥

५. गोलोक-स्रष्टा:

मेघ-श्यामोऽसि देवेश, जीवन-धन-रूपकः।रोमकूपैः सुगोपानां, स्रष्टा त्वं सिद्ध-नायकः॥

६. धर्म-गुरु:

कृपा-सिन्धो धर्म-गुरो, गोविन्दं त्वां नमाम्यहम्।इन्द्र-यज्ञ-विनाशाय, पशु-हिंसा-निवारकम्॥

७. व्रज-विहारी:

व्रज-रज-स्नायी च, वन-माला-विभूषितः।अभीर-बालक-रूपोऽसि, त्वां वन्दे व्रज-वासिनम्॥

८. गोप-गोपी-जनाध्यक्ष, वैष्णव-धर्म-पालकः।भक्त-पोषण-कर्तारं, कृष्णं नौमि पुनः पुनः॥

९. निष्काम-कर्म:

निष्काम-कर्म-दाता त्वं, वंशी-वादन-तत्परः। दीन-बन्धो यदुश्रेष्ठ, नमाम्यहं त्वां सत्वरम्॥

१०.  गोपेश्वर:

गोलोके किशोर-रूपो, रास-लीला-विशारदः।गीतामृत-प्रदातारं, गोपेश्वरं भजाम्यहम्॥

११. केशव:

वन-माला-धरं देवं, व्रज-लीला-विशारदम्।वैजयन्ती-धरं कृष्णं, नमामि केशवं प्रभुम्

श्रीकृष्ण स्तुति - हिन्दी अनुवाद

१. प्रस्तावना

वृन्दावन के निवासियों द्वारा वन्दनीय और संसार के लोगों द्वारा अभिनन्दित, जिन्होंने सृष्टि के आदि में अपने संकल्प से कर्म-बन्धन की रचना की, मैं उन प्रभु को नमन करता हूँ।

२. सुदर्शनधारी

भक्तों के भाव से युक्त और प्रेम के रंगों में रंगे हुए, अज्ञान का नाश करने वाले, सुदर्शन चक्र धारण करने वाले श्रीकृष्ण को मैं नमन करता हूँ।

३. ज्ञान-प्रभाकर

जिनके मस्तक पर मयूर पंख का मुकुट है और जिनके हाथों में मुरली सुशोभित है, हे केशव! आप समस्त ज्ञान के प्रकाश-पुञ्ज हैं और गुणों से परे (गुणातीत) हैं।

४. दुःख-हर्ता

हे गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले ! आप सदा दु:खों को हरने वाले हैं, आपको नमस्कार है। संसार के द्वन्द्वों (सुख-दुःख के बन्धन) से मुक्ति के लिए मैं आप गोविन्द को नमन करता हूँ।

५. गोलोक-स्रष्टा

हे मेघ के समान श्याम वर्ण वाले देव! आप जीवन की निधि के समान हैं। आप सम्पूर्ण गोलोक और भक्तों के सृष्टा तथा सिद्धों के नायक हैं।

६. धर्म-गुरु

हे कृपा के सागर, हे धर्म के गुरु गोविन्द ! आपको मेरा नमन है। आप इन्द्र के यज्ञ का विनाश करने वाले और पशु-हिंसा को रोकने वाले (धर्म की स्थापना करने वाले) हैं।

७. व्रज-विहारी

जो व्रज की धूल में स्नान करते हैं, वनमाला से विभूषित हैं और अहीर बालक (ग्वाले) के रूप में शोभायमान हैं, उन व्रजवासी प्रभु की मैं वन्दना करता हूँ।

८. रक्षक

गोप-गोपियों के स्वामी, वैष्णव धर्म के पालक और भक्तों का पोषण करने वाले उन श्रीकृष्ण को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।

९. निष्काम-कर्म

हे वंशी बजाने में तत्पर, निष्काम कर्म का मार्ग दिखाने वाले, दीन-दु:खियों के बन्धु और यदुवंश में श्रेष्ठ प्रभु ! मैं आपको शीघ्रता से नमन करता हूँ।

१०. गोपेश्वर

गोलोक में किशोर रूप में विराजमान, रास-लीला में निपुण और गीता रूपी अमृत प्रदान करने वाले उन 'गोपेश्वर' प्रभु का मैं भजन करता हूँ।

११. केशव

वनमाला धारण करने वाले, व्रज की लीलाओं में निपुण और वैजयन्ती माला से सुशोभित उन केशव प्रभु को मैं नमन करता हूँ।

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               ( श्रीकृष्ण- वन्दना )

अग्रं पृष्ठञ्च सर्वतोमुखं सच्चिदानन्दं सर्वतोखं।
नमोऽस्तु य: विनष्यति दारिद्रवं दुर्दीर्घदु:खं।।१।।


अनुवाद:- आगे-पीछे और सब ओर विराजमान सत- चिद् और आनन्द स्वरूप वाले सर्वत्र गमन शील प्रभु को नमस्कार है। जो भय, ताप, और दीर्घ दु:खों को नष्ट करता है।१।

जडजङ्गम चेतन स्थावरम् आद्यन्ताश्च न्यूनञ्च पुरुम्।
अमूनि सर्वाणि तवेव ह त्वमेव सहर्षेण स्वीकुरु।।२।।


अनुवाद :- हे परमेश्वर श्रीकृष्ण ! जड़-चेतन, चल-अचल, आदि-अन्त, कम और अधिक, सब कुछ तुम्हारा ही है। उसे  सहर्ष स्वीकार करो।२।

ज्ञानपुञ्जं  प्रवासिकुञ्जम्।
 मुरलीमधुरं तत्र कदम्ब द्रुम।
गीतां पुनीतां सुवक्तारम् ।।
अहं वन्दे कृष्णं जगद्गुरुम्।।३।।

अनुवाद :- ज्ञान के समुच्चय तथा कुञ्जों में रहने वाले, और कदम्ब-वृक्ष के तले मधुर मुरली बजाने वाले, कुरुक्षेत्र में पवित्र गीता का वाचन करने वाले जगद्गुरु भगवान्- श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।।३।

सर्वेचराचरेषु व्याप्नोसि ते सत्ता निर्गुणसगुणयोरुभयोर्रूपयोर्।।
जानान्ति रहस्यं केशवस्य भक्ता: अन्वेषयति तु कर्मकाण्डेषु घोर:।।४।


अनुवाद :- हे केशव ! आप की सत्ता समस्त चराचर (जड़-चेतन) संसार के सभी प्राणियों में निर्गुण और सगुण दोनों रूप में व्याप्त हैं। आपके इस रहस्य को भक्त भली-भाँति जानते हैं। किन्तु बकवादी और मूढ़मति व्यक्ति आपको कर्मकाण्डों में खोजते हैं।४।

जले तरङ्गैव नवनीता पुनीता प्रसूयते दुग्धैव च।
इदं जगद् हिमवद् वाष्परूपाय प्रभवे नुम:।।५।

अनुवाद- जल में तरङ्गों के समान दुग्ध में नवनीत (मक्खन) के समान और वाष्प से हिम के समान जिस परमेश्वर से यह संसार उत्पन्न हुआ है हम उसे नमस्कार करते हैं।५।

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✴️ परमेश्वर श्रीकृष्ण की वन्दना व ध्यान कैसे करें ?✴️
How to worship and meditate of Lord  Krishna.?
 
परमेश्वर की भक्ति में वन्दना और ध्यान एक ही उद्देश्य के  दो सम्पादक साधन हैं। जिसमें वन्दना भक्ति की प्रथम सीढ़ी या कहें वह पाठशाला है जहाँ भक्त विविध क्रियाओं से परमेश्वर को साकार मानकर अपना तन, मन, धन, सब-कुछ अर्पित करता है। इन क्रियाओं से भक्त के अन्दर समर्पण और प्रेम का भाव जागृत होता है, और यही भाव जब पराकाष्ठा को पहुँच जाता है तब भक्त परमेश्वर को अपने ध्यान में लेने का प्रयास करता है। यह भगवत्- प्राप्ति का दूसरा व अन्तिम साधन है, जो साधना में परिवर्तित हो जाता है। जिसमें भक्त गोपाचार्य गुरुओं की सहायता से परमेश्वर श्रीकृष्ण को ध्यान में लेने का अभ्यास करते हुए अन्ततोगत्वा श्रीकृष्ण को प्राप्त कर ही लेते हैं।

क्योंकि ध्यान ही परमेश्वर श्रीकृष्ण को पाने का अन्तिम विकल्प है। पूजा-पाठ, वन्दना, स्तुतियाँ इत्यादि ध्यान के प्रारम्भिक व सहयोगी साधन हैं। इससे निश्चय ही परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना का उदय होता है। इसलिए प्रारम्भिक स्तर पर ये सब करना भी चाहिए।
किन्तु ध्यान रहे ये सब करते समय किसी तरह का आडम्बर या भौकाल नहीं होना चाहिये। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण- भाव के ग्राही हैं क्रिया ग्राही नहीं। अर्थात् आप क्या कर रहें हैं ? कैसे कर रहें हैं ? उससे उनका कोई लेना देना नहीं है।
केवल भावनाओं की शुद्धता अनिवार्य हैं।

सत्य तो यह है कि- भक्त के द्वारा निःस्वार्थ भाव से- येन -केन प्रकारेण कुछ भी चढ़ाया गया पदार्थ वे सहर्ष स्वीकार कर ही लेते हैं किन्तु बिना भाव व प्रेम के चढ़ाया गया कुछ भी नहीं स्वीकार करते।
इसीलिए कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की भक्ति अत्यन्त सहज स्वाभाविक व आडम्बरों से रहित  है। इस बात को गोपेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- (९) के श्लोक -(२६) में स्वयं कहा है कि -
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।२६।।


अर्थात् - जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल, इत्यादि को प्रेम पूर्वक मुझे अर्पण करता है, उस मुझ में तल्लीन हुए अन्तःकरण वाले भक्त के द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए उपहार (भेंट) को मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार कर ही लेता हूँ।२६।

कुल मिलाकर परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति को पाने की  प्रथम अनिवार्यता हृदय की भावनाओं और मन के विचारों की पवित्रता ही है। इसके लिए निस्वार्थ व शुद्ध मन से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान करके निम्नलिखित तीन मन्त्रों का बार-बार उच्चारण करना चाहिए।


               🔆 श्रीकृष्ण मन्त्र 🔆

(१)- प्राप्तवानस्मि भवतोऽऽश्रयम् ।
 परित्यज्य कामानानि सर्वाणि।
मह्यम दत्वा चरणेषु स्थानम् ।।
 अनुग्रहाण मयि हे चक्रपाणि।।

(२)- सर्वज्ञं सर्वरूपं  सर्वकार्य-कारणम्।
      शरणं प्रपद्ये हरे ! तापत्रयं  हारणम् ।।

(३)- यदुपुङ्गवं केशवं, गोलोके  विराजितम्।।
       विधायकं नायकं शरणं प्रपद्ये मार्जितम्।

अनुवाद:- १,२,३
(१)- हे चक्रधारी ! मैंने सभी सांसारिक कामानाओं को त्याग कर आपकी शरण ली है; मुझे अपने चरणो में स्थान देकर अनुग्रहीत करें।

(२)- सबकुछ जानने वाले, सभी रूपों में व्याप्त, सम्पूर्ण कार्य और कारण में विद्यमान, तीन तापों का हरण करने वाले सर्वरूपमयी हरि नाम वाले भगवान श्रीकृष्ण की मैं शरण में जाता हूँ।

(३)- गोलोक में विराजमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सञ्चालन और विधान करने वाले, भक्तों का मार्गदर्शन करने वाले। यादव श्रेष्ठ विशुद्धत्तम भगवान श्रीकृष्ण की हम शरण लेते हैं।

✴️  यदि कोई भक्त संस्कृत श्लोक नहीं पढ़ सकता है; तो वह मन्त्रों के हिन्दी अनुवाद को ही भक्तिभाव से पढ़कर श्रीकृष्ण का ध्यान कर सकता है। ऐसा करने से उस पर कोई दोषारोपित नहीं होगा।
किन्तु ध्यान रहे उपर्युक्त तीनों मन्त्रों या उसके अनुवादों को किसी ऐसे पुरोहित से न पढ़वायें जो परमेश्वर के ध्यान और ज्ञान से रहित हो क्योंकि अज्ञानी पुरोहित या कथावाचक शास्त्रों के अर्थ का अनर्थ करता है। देवीभागवत पुराण में यह उद्घोषणा स्पष्ट है।

विना विप्रेण कर्तव्यं श्राद्धं कुशचटेन वै।
न तु विप्रेण मूर्खेण श्राद्धं कार्यं कदाचन ॥३७॥

"अनुवाद:- वेद ज्ञाता ब्राह्मण के अभाव में कुश के चट से स्वयं श्राद्ध कार्य कर लेना उचित है। किन्तु मूर्ख (अज्ञानी) ब्राह्मण से कभी श्राद्ध या कोई धार्मिक कार्य नहीं कराना चाहिए ।३७।

देवी भागवतपुराण तृतीय स्कन्ध के अध्याय-(१०) के निम्नलिखित श्लोकों में कही गई है कि-

कोई धार्मिक कार्य  उनसे करवायें  परन्तु कृष्ण के  इन मन्त्रों को केवल कृष्ण भक्त गोप ही सिद्ध कर सकते हैं ।बाकी कोई नहीं।
[इसके बारे में विस्तृत जानकारी अध्याय- (१) के भाग-(२) में दी गई है ; जानकारी प्राप्त कर पाठकगण वहाँ से अपने संशय का निवारण कर सकते हैं।]
ऐसा करने से एक दिन श्रीकृष्ण के प्रति सम्पूर्ण समर्पण का भाव जागृत होगा। उसी दिन से वह श्रीकृष्ण का सच्चा ज्ञानी भक्त हो जाएगा। तब उसके लिए चढ़ावा इत्यादि का कोई प्रयोजन ही नहीं रहेगा।

वह दिन-रात मस्त मगन होकर परमेश्वर श्रीकृष्ण का सुमिरन यों ही करता रहेगा। क्योंकि अब तो उसे परमेश्वर श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया है कि -

ईश्वर: पादौ विना गच्छति, कर्णौ विना श्रृणोति, हस्ताभ्यां न कृत्वा अपि, सः विविधं कार्याणि करोति।

अर्थात् '"कार्यं अत्र किमपि कारणं विना क्रियते।
"वह परमेश्वर बिना पैरों के चलता है, बिना कान के सुनता है, हाथ न होते हुए भी विभिन्न तरह के कार्य करता है अर्थात यहाँ बिना किसी कारण के ही कार्य होता है।
यही परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति की वास्तविकता और भक्त की वास्तविक स्थिति है।

                  जय श्रीकृष्ण

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​    ॥ विषय-सूची ॥

अध्याय १: पूजा-अर्चना के विधि-विधान एवं विकृत कथाओं के दुष्प्रभाव

  • [क] परमेश्वर की सार्थकता व पहचान।
  • [ख] तैंतीस (३३) कोटि देवता में किसकी पूजा करें?
  • [ग] श्रीकृष्ण पूजा के लाभ।
  • [घ] शिव पूजा के लाभ।
  • [ङ] विष्णु पूजा के लाभ।
  • [च] श्रीराम पूजा के लाभ।
  • [छ] देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ।
  • [ज] श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता है?
  • [झ] गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणामों का वर्णन।
  • [ञ] सच्चे गुरु की पहचान।

अध्याय २: श्रीकृष्ण का स्वरूप एवं उनके गोलोक का वर्णन

अध्याय ३: श्रीकृष्ण की अद्वितीय परमशक्ति के रूप में प्रतिष्ठा

अध्याय ४: गोलोक में नारायण, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं की उत्पत्ति एवं सृष्टि का विस्तार

अध्याय ५: भगवान श्रीकृष्ण का नित्य गोपत्व एवं गोपकुल में अवतरण

अध्याय ६: गोप-कुल के महान पौराणिक व्यक्तित्व

  • भाग १: गोपेश्वर श्रीकृष्ण का परिचय।
  • भाग २: श्रीराधा का परिचय।
  • भाग ३: पुरुरवा और उर्वशी का परिचय।
  • भाग ४: आयुष, नहुष और ययाति का परिचय।

अध्याय ७: यादव वंश का उदय एवं प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय

  • भाग १: महाराज यदु का परिचय।
  • भाग २: हैहय वंशी यादवों का परिचय।
  • भाग ३: यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज।

अध्याय ८: यादवों का मौसल युद्ध तथा श्रीकृष्ण का गोलोक गमन

  • भाग १: यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं बहेलिए द्वारा श्रीकृष्ण के वध का खण्डन।
  • भाग २: श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।

अध्याय ९: यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्र

  • भाग १: जातियों की मौलिकता (Originality) एवं आभीर जाति की उत्पत्ति।
  • भाग २: भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।
    • ​[क] पञ्चवर्ण की उत्पत्ति।
    • ​[ख] ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
    • ​[ग] वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अंतर (जन्मगत-कर्मगत, यज्ञमूलक-भक्तिमूलक, भेदभाव-समतामूलक)।
  • भाग ३: यादवों का वंश।
  • भाग ४: यादवों का कुल।
  • भाग ५: यादवों का गोत्र।

अध्याय १०: यादवों का वास्तविक गोत्र: कार्ष्ण अथवा अत्रि?

अध्याय ११: वैष्णव वर्ण के सदस्यों के प्रमुख कार्य एवं दायित्व

  • भाग १: गोपों का ब्राह्मणत्व (धर्मज्ञ) कर्म।
    • ​(क) सत्यनारायण व्रत कथा में अहीर पात्रों की भूमिका।
    • ​(ख) अहीर कन्या वेदमाता गायत्री का परिचय।
    • ​(ग) गोपी स्वाहा और स्वधा का परिचय।
    • ​(घ) ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय।
  • भाग २: गोपों का क्षत्रित्व कर्म।
  • भाग ३: गोपों का वैश्य कर्म।
  • भाग ४: गोपों का शूद्र कर्म।

अध्याय १२: पौराणिक ग्रन्थों में वैष्णव वर्ण के गोपों की प्रशंसा एवं सांस्कृतिक विरासत

  • भाग १: गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
  • भाग २: भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।
    • ​(क) हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य।
    • ​(ख) गोपों की देन "पञ्चम वर्ण"।
    • ​(ग) 'किसान' और 'कृषि' शब्द: कृष्ण एवं गोपों की देन।
    • ​(घ) आर्य एवं ग्राम संस्कृति के जनक: गोप।
    • ​(ङ) आभीर छन्द और आभीर राग।

परिशिष्ट

  • परिशिष्ट १: अत्रि की उत्पत्ति और उनका परिचय।
  • परिशिष्ट २: हरिवंश पुराण तथा देवीभागवत पुराण में वसुदेव का गोप जाति में कश्यप के अंश से जन्म लेने का प्रसंग।
  • परिशिष्ट ३: नारद पुराण में गोपों की पूजा का विधान।
  • परिशिष्ट ४: नन्द परिवार का विस्तार: सात्वत वंश के चतुर्थ वृष्णि से नन्द तक।
  • परिशिष्ट ५: पद्मपुराण (सृष्टि खण्ड) से गायत्री का परिचय।



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यादव-वंश: पुरूरवा-उर्वशी आख्यान एवं गोपालन संस्कृति का शास्त्रीय विश्लेषण

​१. प्रस्तावना

​भारतीय वाङ्मय में 'गोप' शब्द मात्र एक जातिवाचक संज्ञा नहीं, अपितु एक शाश्वत जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक पहचान है। वेदों एवं पुराणों के अनुसार, गोपालन संस्कृति गोलोक से अवतरित एक दैवीय व्यवस्था है। गर्गसंहिता में स्पष्ट उल्लेख है कि पृथ्वी पर गोपों का आगमन राधा-कृष्ण की इच्छा से हुआ है। यह लेख वैदिक ऋचाओं एवं पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर प्रथम गोप-सम्राट पुरूरवा तथा उर्वशी के ऐतिहासिक सम्बन्धों का विश्लेषण करता है।

​२. राजा पुरूरवा: प्रथम गोप-सम्राट

​ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त ९५) में राजा पुरूरवा का वर्णन एक 'गोपालक' सम्राट के रूप में मिलता है।

  • व्युत्पत्ति: ऋग्वेद की ऋचाओं में पुरूरवा को 'गोष' (गो + षण् = गायों का पालक/दाता) सम्बोधित किया गया है। पाणिनि-सूत्रों के अनुसार 'गोष' शब्द का अर्थ गो-सेवक ही है।
  • ऐतिहासिकता: श्रीमद्भागवत और महाभारत के अनुसार, प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग) के अधिपति पुरूरवा का सम्पूर्ण जीवन यज्ञ एवं गो-संरक्षण को समर्पित था। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने अपने पुत्रों को गौएँ सौंपकर वनप्रस्थ धारण किया था।

​३. उर्वशी: सौन्दर्य एवं काव्य की अधिष्ठात्री

​उर्वशी का स्वरूप केवल अप्सरा तक सीमित नहीं है, वह भारतीय काव्य-शास्त्र की मूल प्रेरणा है।

  • अर्थ: 'उरसि वशति' (जो हृदय में वास करती है) अथवा 'उरुन् अश्नुते वशीकरोति' (अपने अद्भुत सौन्दर्य से महान पुरुषों को वश में करने वाली)।
  • ऐतिहासिक सन्दर्भ: पुराणों में उर्वशी का सम्बन्ध आभीर (गोप) कन्या के रूप में वर्णित है, जो उन्हें पुरूरवा की सामाजिक और सांस्कृतिक सहधर्मिणी के रूप में स्थापित करता है। वह ललित कलाओं, संगीत एवं सौन्दर्य की अधिष्ठात्री है।

​४. वंशावली एवं विस्तार

​पुरूरवा और उर्वशी के मिलन से सात तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ, जिनसे यादव वंश की धारा प्रवाहित हुई। लिंगपुराण एवं महाभारत के अनुसार उनके पुत्र इस प्रकार हैं:

  • आयु, धीमान, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु एवं वनायु। आयु के वंश में ही नहुष हुए, जिनके पुत्र ययाति एवं ययाति के पुत्र 'यदु' से यादव वंश की मुख्य शाखा का विस्तार हुआ।

​५. दार्शनिक समन्वय: ज्ञान, वाणी और गोपालन

​पौराणिक रूपक के अनुसार:

  • बुध: बुद्धि और विवेक के अधिष्ठाता।
  • इला (वाणी/पृथ्वी): अन्न और वाक्-शक्ति की अधिष्ठात्री।
  • पुरूरवा: एक 'कवि' और 'गोपालक', जो बुद्धि (बुध) और वाणी (इला) के मिलन से उत्पन्न हुआ। यह समन्वय सिद्ध करता है कि शक्ति (उर्वशी), बुद्धि (बुध) और गोपालन (पुरूरवा) का संगम ही श्रेष्ठ मानव संस्कृति का आधार है।

​६. नहुष एवं वैष्णव परम्परा

​पुरूरवा के ज्येष्ठ पुत्र 'आयु' का वंश आगे चलकर वैष्णव परम्परा का पोषक बना। पद्मपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार, दत्तात्रेय के वरदान से नहुष के रूप में विष्णु का अंशावतार हुआ। नहुष का च्यवन मुनि के प्रसंग में गौ-दान का उल्लेख उनके परम गो-सेवक होने को प्रमाणित करता है। भीष्म पितामह ने अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर को यह उपदेश दिया था कि गोपालन करने वाले मनुष्य ही परम गति (गोलोक) को प्राप्त करते हैं।

​निष्कर्ष

​उपर्युक्त प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि:

१. गोप संस्कृति का आदि स्रोत गोलोक है।

२. पुरूरवा वैदिक ऋचाओं में 'गोष' (गोपालक) कहे गए हैं, जो उन्हें प्रथम गोप-सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

३. आभीर-यादव वंश की उत्पत्ति ऐतिहासिक एवं पौराणिक दृष्टि से पुरूरवा और उर्वशी के माध्यम से हुई है, जो इस जाति को वेदों के युग से ही अत्यन्त गौरवशाली सिद्ध करती है।


पुरूरवा और उर्वशी: ऐतिहासिक एवं पौराणिक अनुशीलन

​यादवों की गोप जाति की उत्पत्ति गोप-सम्राट पुरूरवा और आभीर-कन्या उर्वशी से भूलोक पर दृष्टिगोचर होती है। परन्तु आनर्त देश (गुजरात) में जन्मी आभीर-कन्या गायत्री तथा इनके पूर्वज गोप-जन सत्ययुग के प्रारम्भ से ही दृश्यमान हैं।और गोपों की उत्पत्ति से ब्रह्मा भी अनभिज्ञ थे। क्योंकि जब उन्होने पुष्कर क्षेत्र में अपना प्रारम्भिक यज्ञ सत्र किया था तब उन्होंने अपनी सम्पूर्ण वर्णों की प्रजा को आमन्त्रित किया था परन्तु उनमें गोप जन नहीं थे ।

​पृथ्वी पर यादवों के ज्ञात आदि-पूर्वज पुरूरवा गोप और गोप-जातीय कन्या उर्वशी का वैदिक तथा पौराणिक विवरण और परिचय—

​सर्वप्रथम ऋग्वेद के मण्डल १०, सूक्त ९० की ऋचा संख्या १३-१४ में पुरूरवा के आदि-स्रोत चन्द्रमा (सोम) की उत्पत्ति विराट पुरुष (विराट विष्णु) से कही गई है।

​ऋग्वेद के दशम मण्डल के ९५वें सूक्त की सम्पूर्ण १८ ऋचाएं 'पुरूरवा और उर्वशी' के संवाद रूप में हैं, जिसमें पुरूरवा के विशेषण 'गोष' (घोष-गोप) तथा 'गोपीथ' हैं। अतः पुरूरवा एक गो-पालक सम्राट ही है।

​"इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः। 

अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः ॥३॥" (ऋग्वेद १०/९५/३)

गोष = गां सनोति (सेवयति), सन् (षण् धातु = संभक्तौ/भक्ति/दाने च) + विच् प्रत्यय। अर्थात—जो गाय की सेवा करता है, वह 'गोष' है। लौकिक भाषा में यही 'घोष' रूप में यादवों की गोपालन-वृत्ति को सूचित करने लगा।

​पुरूरवा, बुध ग्रह और पृथ्वी (इला) से सम्बन्धित होने के कारण इनकी सन्तान माने गए हैं। यदि आध्यात्मिक अथवा काव्यात्मक रूप से देखा जाए, तो 'इला' वाणी अथवा बुद्धिमती स्त्री और 'बुध' बुद्धिमान पुरुष का वाचक है। पुरूरवा एक शब्द और उसकी अर्थवत्ता के विशेषज्ञ कवि का वाचक है, और उर्वशी उसकी काव्य-शक्ति है। वही उर्वशी जिसे पुराणों में ललित कलाओं की विशेषज्ञ अप्सराओं की स्वामिनी बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूति 'उर्वशी' को बताया है।

​पुरूरवा यदि कवि है, तो उसके काव्य की प्रेरणा उर्वशी है। उर्वशी के लिए समभाषी शब्द 'उरणवशी' भी मिलता है। जो उनकी भेड़ बकरी आदि पालने की प्रवृत्ति को अभिव्यक्त करता है।

ऋग्वेद में इला का स्वरूप:

ऋग्वेद में इला को अन्न और पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। उन्हें ज्ञान और वाणी की देवी सरस्वती के साथ भी जोड़ा गया है। ऋग्वेद (३/१२३/४) में 'इला की भूमि' को सरस्वती नदी के तट पर स्थित बताया गया है।

गोलोक से उत्पत्ति:

"यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि।तथा गोपीगणा गोपा गोलोके राधिकेच्छया॥" (गर्गसंहिता)

​इस संसार में सभी गोप गोलोक से ही आते हैं। इला गोलोक में राधा जी की अंश-रूपा गोपी है और बुध ज्ञान व वाक्-शक्ति के प्रतिनिधि हैं। इन दोनों से पुरूरवा का प्रादुर्भाव एक आदि-कवि के रूप में हुआ।

पुरूरवा-उर्वशी आख्यानम् -

गोलोकादागता लोके, गोपा गोप्यश्च सर्वशः।राधायाः कामनारूपा, सृष्टिरेषा विधीयते॥१॥

इला गोलोकसञ्जाता, राधाया अंशरूपिणी।बुधो ज्ञानस्य वाक्तेश्च, प्रतिनिधिर्निगद्यते॥२॥

ज्ञानवाक्-सङ्गमादेतौ, सम्भूतौ च पुरूरवाः।आदिकविः स वै भूपः,गोपानां च शिरोमणिः॥३॥

उर्वशी हृदयाक्रान्ता, काव्यशक्तिः प्रकाशिनी।प्रेम्णः स्रोतस्तयोः प्रीत्या, सृष्टिरेषा प्रवर्धते॥४॥

​भावार्थ (संस्कृत छन्द का):

​१. इस लोक में सभी गोप और गोपियाँ गोलोक से ही आए हैं, यह सब श्रीराधा की इच्छा और कामना का ही स्वरूप है।

२. 'इला' गोलोक से उत्पन्न श्रीराधा की ही अंश-रूपा हैं, और 'बुध' ज्ञान व वाणी (वाक्-शक्ति) के प्रतिनिधि कहे गए हैं।

३. ज्ञान और वाक्-शक्ति के इसी संगम से पुरूरवा का प्रादुर्भाव हुआ। वे आदि-कवि और गोपों के शिरोमणि सम्राट हैं।

४. उर्वशी उनके हृदय में निवास करने वाली साक्षात काव्य-शक्ति हैं। उन दोनों के प्रेम से ही यह प्रेममयी सृष्टि प्रवर्धित होती है।

पुरूरवा का गोपालक रूप:

"ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः।    पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम्॥" (श्रीमद्भागवत महापुराण, नवम स्कन्ध, १/४२)

​पुरूरवा के गोष (घोष) अथवा गोपालक होने का सन्दर्भ वैदिक है। पुरूरवा ही गायत्री का नित्य गान करने वाले थे, इसीलिए उनकी 'पुरूरवा' संज्ञा सार्थक हुई। उनके पुत्र आयुष, आयुष के पुत्र नहुष और नहुष के पुत्र ययाति थे, जो गायत्री माता के नित्य उपासक थे। इसीलिए रुद्रयामल तंत्र तथा देवी भागवत पुराण के गायत्री सहस्रनाम में गायत्री माता को 'ययातिपूजनप्रिया' कहा गया है।

उर्वशी का अर्थ:

'उरसे वष्टि इति उर्वशी'—जो हृदय में कामना अथवा प्रेम उत्पन्न करती है, वह उर्वशी है। पौराणिक साक्ष्यों (मत्स्य पुराण, लक्ष्मी-नारायण संहिता) के अनुसार, उर्वशी का जन्म एक आभीर परिवार में हुआ था।

पुरूरवा के पुत्र:

महाभारत (आदि पर्व ७५) एवं हरिवंश पुराण (अध्याय २७) के अनुसार पुरूरवा के छह पुत्र उर्वशी से उत्पन्न हुए: धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु। लिंगपुराण में इन्हें सात (आयु, मायु, अमायु, विश्वायु, श्रुतायु, शतायु और दिव्य) बताया गया है।

नहुष और वैष्णव धर्म:

पुरूरवा के ज्येष्ठ पुत्र 'आयुष' थे। आयुष के पुत्र नहुष हुए, जिन्हें विष्णु का अंशावतार माना गया है। नहुष का विवाह पार्वती-पुत्री 'अशोक सुन्दरी' (विरजा) से हुआ था। नहुष के छह पुत्र थे—यति, ययाति, संयाति, अयाति, वियाति और कृति।

​महाभारत के अनुशासन पर्व (दानधर्म पर्व) में राजा नहुष का गौओं के महत्त्व को स्थापित करने और उनके दान का विस्तृत वर्णन है। नहुष और ययाति गोपालन की संस्कृति के संरक्षक थे। इस प्रकार, वैदिक काल से लेकर पौराणिक युग तक पुरूरवा का वंश 'गोप' संस्कृति और 'गोपालन' की परम्परा का वाहक रहा है।

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                "अध्याय- प्रथम (१)

पूजा-अर्चना के विधि- विधान एवं गलत कथाओं को  सुनने व कहने के दुष्परिणामों का वर्णन।


इस अध्याय के सम्पूर्ण प्रसंगों को क्रमबद्ध पद्धति से जानने व समझने के लिए निम्नलिखित- (दस) प्रमुख शीर्षकों में विभाजित किया गया है -

[क] - परमेश्वर की सार्थकता व पहचान।
[ख] - तैंतीस (३३) कोटि देवता में किसकी पूजा करें ?
[ग] - श्रीकृष्ण पूजा के लाभ।            
[घ] - शिव पूजा के लाभ।    
[ङ] - विष्णु पूजा के लाभ।
[च] - श्रीराम पूजा के लाभ।
[छ] - देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ।
[ज] - श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता हैं ?
[झ] - गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणामों का वर्णन।
[ञ] - सच्चे गुरु की पहचान।

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  ✴️ परमेश्वर की सार्थकता व पहचान ✴️      
                           
आध्यात्मिक जीवन में कुछ पाने की अपेक्षा उसी से करनी चाहिए जो सक्षम और सामर्थ्यवान हो। अब ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जगत में कौन ऐसा सामर्थ्यवान है जिससे सबकुछ प्राप्त हो सकता ? तो इसका सम्यक उत्तर है सर्वशक्तिमान परिपूर्णतम परंब्रह्म, क्योंकि इनके अतिरिक्त और किसी से कुछ पानें की अपेक्षा करना व्यर्थ है। तब पुनः प्रश्न उठता है कि परिपूर्णतम "परंब्रह्म" कौन है ?
                   
तो इस प्रश्न का सही जबाब पाना असम्भव तो नहीं किन्तु कठिन अवश्य है। क्योंकि शास्त्रों से लेकर जितने भी धर्मगुरु या धर्म प्रवर्तक हुए सभी ने अपने-अपने दृष्टिकोण से उस परमात्मा परिपूर्णतम "परंब्रह्म" की विशेषताऐं और परिभाषाऐं निर्धारित की हैं। जैसे -
१- कोई उसे नूर कहता है तो कोई उसे हुजूर कहता है।
२- कोई उसे निर्गुण मानता है, तो कोई उसे सगुण मानता है।
३- कोई उसे निराकार मानता है, तो कोई उसे साकार मानता है।
४- कोई उसे साकार और निराकार दोनों ही  में मानता है।
५- तो कोई उसे निर्गुण और सगुण दोनों ही मानता है।

इन उपर्युक्त बातों पर यदि विचार किया जाय तो ये सभी बातें परमेश्वर को एक निश्चित दायरे (वृत्त) में परिबद्ध करके कही गईं हैं कि- परमेश्वर निर्गुण हैं, सगुण है या दोनों है। किन्तु परमेश्वर तो सीमाओं से परे अनन्त गुणों वाले हैं। जिनका कोई आदि (प्रारम्भ) है न अन्त है। वे स्थूल से भी स्थूलतम और सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम है। उनके लिए सगुण, निर्गुण, निराकार, साकार, निर्विकल्प सविकल्प, निर्लिप्त, लिप्त, प्रारम्भ, अन्त, अनन्त, शून्य, सर्वज्ञ, और सर्वव्यापी इत्यादि जितने भी विशेषण पद हैं  वे सभी अपूर्णार्थी व बहुत ही कम है। शास्त्रों का अनुशीलन (गहन अध्ययन) करने के पश्चात निष्कर्षत: भगवान श्रीकृष्ण में ये परिपूर्णताऐं परिलक्षित होती हैं।
            
तब प्रश्न उठता है जब परमेश्वर श्रीकृष्ण ही सब-कुछ हैं तो इस माया नगरी में जहाँ अनेकों छद्म- वेषधारी अपनी कथाओं के माध्यम से तैंतीस (३३) करोड़ देवी-देवों को पूजने को कहते हों, और स्वयं को भी अपने भक्तों से पुजवाते हों। तो ऐसी विकट-आडम्बरपूर्ण एवं भ्रान्त स्थिति में अनन्त गुणों वाले परमात्मा को कैसे पहचाना जाय कि यही परमप्रभु परमेश्वर श्रीकृष्ण हैं ?
             
✳️ तो इन सभी प्रश्नों का समाधान इसी ग्रन्थ के अध्याय-(दो) और (तीन) में विस्तार पूर्वक किया गया है। जिसमें बताया गया है कि- परम-प्रभु परमेश्वर श्रीकृष्ण ही हैं। उनके अतिरिक्त और कोई परमेश्वर नहीं है। वहाँ से इस सम्बन्ध में विस्तार पूर्वक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
               
फिर भी यहाँ पर उससे सम्बन्धित कुछ जानकारी अवश्य दी गई है कि- वास्तव में श्रीकृष्ण ही परम प्रभु परमेश्वर हैं। उनको किसी एक गुण से नहीं जाना जा सकता। फिर भी यदि गुणों के आधार पर देखा जाए तो उनके अनन्त गुण हैं; और उसमें भी देखा जाए तो वे साकार, निराकार, निर्गुण, सगुण इत्यादि सबकुछ हैं।
                      
जहाँ तक उनको साकार और निराकार होने का प्रश्न है, तो वे ही परमेश्वर प्रलय काल में निराकार रूप में रहते हैं किन्तु जब वे सृष्टि का सृजन करतें हैं तो साकार रूप में हो जाते हैं। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय-(४) के श्लोक संख्या- (७) में होती है- जब परमेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि -

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। ७।

अनुवाद:- जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ। अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ।७।
                
इसी तरह से परमेश्वर के सगुण और निर्गुण इत्यादि होने के सम्बन्ध में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- (१०) के श्लोक संख्या- (१२) में भी लिखा गया है। जिसमें अर्जुन श्रीकृष्ण के प्रति कहते हैं कि-

परंब्रह्म  परंधाम  पवित्रंपरमं भवान्।
पुरूषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभूम्।।१२।
            

अनुवाद - परम ब्रह्म, परमधाम, और महान पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष,आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापक है।१२।
               
व्याख्या- निर्गुण निराकार के लिए- परंब्रह्म, सगुण निराकार के लिए- परंधाम, और सगुण साकार के लिए- "पवित्रं परमं भवान्", इत्यादि पद-रूपों में तत्वज्ञानी लोग परमेश्वर श्रीकृष्ण को जानते हैं।              
परम प्रभु श्री कृष्ण का और विस्तृत रूप श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- (९) के श्लोक - (१६-१७) और (१८) में मिलता है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को अपने विषय में बताते हुए कहते हैं कि-

"अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।१६।

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।१७।

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्। १८।

         
अनुवाद - क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ, और हवन रूप क्रिया भी मैं ही हूँ। जानने योग्य पवित्र ॐकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान (भण्डार) तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। (१६-१७-१८)

इसी तरह से श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- (१०) के श्लोक संख्या- (४२) में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि-
अथवा बहुनैतेन  किं ज्ञातेन  तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।४२।


अनुवाद- अथवा हे अर्जुन ! तुम्हें इस प्रकार बहुत-सी बातें जानने की क्या आवश्यकता है ? मैं अपने किसी एक अंश से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ।
             
इस प्रकार से देखा जाए तो भगवान श्रीकृष्ण ही सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। बाकी- तैंतीस (33) कोटि देवी-देव सभी उनसे उत्पन्न उन्हीं की अंश-भूत शक्तियाँ, कला और कलांश हैं। इन सभी बातों की पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड अध्याय -(१०) के श्लोक संख्या- (१७-१८)और (१९) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-

"द्विभुजं मुरलीहस्तं किशोरं गोपवेषकम्।
परमात्मानमीशं च भक्तानुग्रहविग्रहम् ।१७।

स्वेच्छामयं परं ब्रह्म परिपूर्णतमं विभुम् ।
ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैश्च स्तुतं मुनिगणैर्युतम्।१८।

निर्लिप्तं साक्षिरूपं च निर्गुणं प्रकृतेः परम्।
ईषद्धास्यं प्रसन्नास्यं भक्तानुग्रहकारकम् ।१९।

                                    
अनुवाद- १७-१८-१९
• द्विभुजधारी, किशोरवय, गोपवेषधारी, और जिनके हाथ में मुरली है, वे श्रीकृष्ण ही परमात्मा हैं। जो भक्तों पर कृपा करने के लिए ही  शरीर धारण करते हैं।१७।
• परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण परिपूर्णतम व सर्वव्यापी हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जिनकी स्तुति मुनिगणों के साथ करते हैं।१८।
• वह परमेश्वर निर्लिप्त केवल साक्षी रूप में निर्गुण और प्रकृति के तीनों गुणों से परे है। जिसके मुख मण्डल पर हमेशा हास्य (हंसी) और प्रसन्नता रहती है जो भक्तों पर अनुग्रह करने वाला है।१९।                
▪️कुछ इसी तरह की बातें ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२१) के श्लोक- (४३) में भी लिखी गईं हैं जिसमें योगेश्वर श्रीकृष्ण को ही परमेश्वर कहा गया है।

निर्लिप्तं साक्षिरूपं च निर्गुणं प्रकृतेः परम्।
ध्यायेत्सर्वेश्वरं तं च परमात्मानमीश्वरम्।४३।         

अनुवाद - • वह परमेश्वर सांसारिक विकारों से परे निर्लिप्त तथा केवल साक्षी रूप दृष्टा हैं। भगवान कृष्ण ही परम सत्ता और साक्षी रूप हैं। भगवान श्रीकृष्ण मूलत: निर्गुण तथा प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं। वे ही सर्वेश्वर एवं सर्व ऐश्वर्यशाली हैं। उनका ही ध्यान करना चाहिए। ।४३।
                  
▪️कुछ इसी तरह की बातें ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय - (३०) के श्लोक संख्या- (६ ) से (८) में भगवान श्रीकृष्ण को परंप्रभु परमेश्वर के रूप में बतायी गयी हैं। जिसमें मुनि नारायण, नारद को बताते हैं कि- ब्रह्मा, विष्णु, महेश, विराट-विष्णु इत्यादि श्री कृष्ण के अंश, कलांश और कला विशेष हैं। देखें निम्नलिखित श्लोक-

"चक्षुर्निमेषपतितो जगतां विधाता तत्कर्म वत्स कथितुं भुवि कः समर्थः।
त्वं चापि नारद मुने परमादरेण सञ्चिन्तनं कुरु हरेश्चरणारविन्दम् ।६।


यूयं वयं तस्य कलाकलांशाः कलाकलांशा मनवो मुनीन्द्राः।
कलाविशेषा भवपारमुख्या महान्विराड् यस्य कलाविशेषः।७।


सहस्रशीर्षा शिरसः प्रदेशे बिभर्त्ति सिद्धार्थसमं च विश्वम्।
कूर्मे च शेषो मशको गजे यथा कूर्मश्च कृष्णस्य कलाकलांशः।८।

                
अनुवाद - जिनके नेत्रों के पलक गिरते ही जगत स्रष्टा ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, उनके कर्म का वर्णन करने में भू-तल पर कौन समर्थ है ? तुम भी श्रीहरि (श्रीकृष्ण) के चरणार्विन्द का अत्यन्त आदर पूर्वक चिन्तन करो।६।

• नारायण मुनि ने कहा - हे नारद ! हम और तुम उन भगवान (श्रीकृष्ण) की कला के अंश मात्र ही हैं। महादेव और ब्रह्माजी भी कलाविशेष हैं और विराट- विष्णु और छुद्र विष्णु भी उनकी विशिष्ट कलामात्र हैं।७।

• सहस्र शिरों वाले शेषनाग सम्पूर्ण विश्व को अपने मस्तक पर सरसों के एक दाने के समान धारण करते हैं। वो भी भगवान कूर्म (कछुआ) के पृष्ठ (पीठ) भाग में ऐसे जान पड़ते हैं, मानो हाथी के ऊपर मच्छर बैठा हो। वे भगवान कूर्म भी श्रीकृष्ण की कला के कलांश मात्र हैं।८।
                   
कुछ इसी तरह की बातें ब्रह्मवैवर्तपुराण- के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अध्याय- (६६) के श्लोक - (५६) में भी लिखी गई हैं। जो श्रीकृष्ण और राधा संवाद के रूप में है। जिसमें श्रीकृष्ण राधा जी से अपने विषय में कहते हैं कि-

"अंशस्त्वं तत्र महती स्वांशेन तस्य कामिनी।
अहं क्षुद्रविराट् सृष्टौ विश्वं यन्नाभिपद्मतः।५६।

                     
अनुवाद -उस विराट-विष्णु के रोम-कूपों में स्थित प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश (शिव) आदि देवगण, मेरे अंश और कला से ही विद्यमान हैं।५६।
                      
अतः उपर्युक्त सभी श्लोकों से स्पष्ट होता है कि- परिपूर्णतम परंब्रह्म श्रीकृष्ण ही हैं। बाकी तैंतीस (३३) करोड़ देवी-देव उनसे उत्पन्न उन्हीं की अंशभूत शक्तियाँ हैं। उसमें भी जो तीन प्रमुख देव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं, वो भी श्रीकृष्ण से उत्पन्न उन्हीं के कला और कलांश हैं।

[ख] -तैंतीस कोटि देवों में किसकी पूजा करें ?  

तब पुनः प्रश्न उठता है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण जो परिपूर्णतम परंब्रह्म हैं तथा सर्व सामर्थ्यवान हैं। तो उनको छोड़कर मनुष्य (३३) करोड़ देव- देवीयों की पूजा क्यों करता है ? तो इसका उत्तर है "अज्ञानता"। क्योंकि मनुष्य इस माया नगरी में पाखण्डवाद के भ्रमजाल में फँसकर यह भेद नहीं कर पाता कि परमेश्वर श्रीकृष्ण की पूजा करें या उनसे उत्पन्न तैंतीस (३३) करोड़ देवी-देवों की।
इसके साथ ही वह यह भी नहीं जान पाता है कि- किस देवी-अथवा देव की पूजा करने से कौन सा लाभ और पद प्राप्त होता है। और जो मनुष्य इस रहस्य को जान लिया समझो वह परमेश्वर को भी पहचान कर सहज ही मोक्ष को प्राप्त कर लिया। इसलिए परमेश्वर श्रीकृष्ण का ही ध्यान व पूजा अर्चना करनी चाहिए। इस बात को प्रमुख देवों ने भी स्वीकार किया। जैसे -

शिवजी पार्वती को श्रीकृष्ण की ही आराधना करने को कहते हैं। जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय-(४८) के श्लोक संख्या- (४८) और (४९) में मिलता है। जो शिव-पार्वती संवाद के रूप में है। जिसमें शिव जी पार्वती से कहते हैं कि -

"आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्वं मिथ्यैव पार्वति ।
भज सत्यं परं ब्रह्म राधेशं त्रिगुणात्परम्।४८।

परं प्रधानं परमं परमात्मानमीश्वरम्।
सर्वाद्यं सर्वपूज्यं व निरीहं प्रकृतेः परम्।४९।

अनुवाद-

• हे पार्वती ! ब्रह्मा से लेकर तृण अथवा कीट पर्यन्त सम्पूर्ण जगत मिथ्या ही है।४८।
• केवल त्रिगुणातीत परं-ब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं। अत: हे पार्वती तुम उन्हीं की आराधना करो।४९।

इस प्रकार  यहाँ उपर्युक्त श्लोकों पर यदि विचार किया जाए तो शिव जी स्वयं पार्वती को श्रीकृष्ण की आराधना करने को कहते हैं। क्या इससे भी बड़ी और कोई देव वाणी ब्रह्माण्ड में हो सकती है जो भगवान श्रीकृष्ण को परिपूर्णतम होने को प्रतिपादित करे ? तो एक ही उत्तर होगा नहीं।
         
इसी तरह की बात ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२१) के श्लोक संख्या- (४३) में भी लिखी गई है। जिसमें बताया गया है कि श्रीकृष्ण का ही ध्यान व पूजा अर्चना करनी चाहिए।

निर्लिप्तं साक्षिरूपं च निर्गुणं प्रकृतेः परम् ।
ध्यायेत्सर्वेश्वरं तं च परमात्मानमीश्वरम्।।४३।
            

अनुवाद - • वह परमेश्वर सांसारिक विकारों से परे, निर्लिप्त तथा केवल साक्षी रूप दृष्टा हैं। भगवान कृष्ण ही परम सत्ता के साक्षी रूप हैं। भगवान श्रीकृष्ण मूलत: निर्गुण तथा प्रकृति के तीनों गुणों से परे हैं। वे ही सर्वेश्वर एवं सर्व ऐश्वर्यशाली हैं। उनका ही ध्यान करना चाहिए। ४३।

परन्तु प्रश्न यह है कि क्यों श्रीकृष्ण का ही ध्यान व आराधना करनी चाहिए ? क्या तैंतीस (३३) करोड़ देवी-देवों और उसमें भी शिव, विष्णु इत्यादि प्रमुख देवों के ध्यान व आराधना से कोई लाभ नहीं ? तो इसका भी सम्यक उत्तर है कि - लाभ अवश्य है, किन्तु वह लाभ सीमित व क्षणिक ही है। कहने का तात्पर्य यह है कि देवों को

पूजने वाले देवों को प्राप्त होंगे तथा भूतों को पूजनें वाले भूतों और प्रेतों को पूजने वाले प्रेतों को ही प्राप्त होंगे और जो परमेश्वर को पूजेगा वह निश्चय ही परंब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण को ही प्राप्त होगा। इस बात को गोपेश्वर श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवद्गीता के अध्याय- (७) के श्लोकसंख्या -(२३) में स्वयं कहा हैं कि -

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यानि मापपि।। २३।


अनुवाद - तुच्छ बुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवों की आराधना का फल भी अन्त वाला (नाशवान) ही मिलता है। देवों का पूजन करने वाले देवों को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।२३।

ऐसी ही बात श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- (९) के श्लोक संख्या- (२५) में भी लिखी गई है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि -

"यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।२५।।


अनुवाद - देवों का पूजन करने वाले देवों को प्राप्त होते हैं। पितरों को पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत-प्रेतों को प्राप्त होते हैं। परन्तु मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।२५।
      
पुनः भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के लिए श्रीमद्भागवद्गीता के अध्याय नवम (९) के श्लोक-संख्या -(३४) में कहते हैं कि -

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।। ३४।।


अनुवाद - हे अर्जुन ! तुम मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (मुझको समर्पित) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।३४।

और इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- (१८) के श्लोक संख्या (६५) और (६६) में भी कहा है कि-

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे। ६५।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः। ६६।

• तू मेरा भक्त होजा, मुझ में मनवाला होजा, तू मेरा पूजन करने वाला होजा, और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त हो जाएगा। यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।६५।

• सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आजा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।६६।
     
और सबसे उचित बात है कि- परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति बहुत ही सरल व आसान है। इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- ९ के श्लोक -२६ में कहते हैं कि -

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।२६।


अनुवाद - जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल, आदि को प्रेम पूर्वक मुझे अर्पण करता है, उस मुझमें तल्लीन हुए अन्तःकरण वाले भक्त के द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए उपहार (भेंट) को मैं खाता हूँ।२६।

व्याख्या - देवों की पूजा- अर्चना में तो अनेक नियमों का पालन करना पड़ता है, परन्तु भगवान (श्रीकृष्ण) की उपासना में कोई नियम नहीं है। भगवान की उपासना में प्रेम (भक्ति) की, और अपनेपन की प्रधानता है, किसी विधि की नहीं। क्योंकि भगवान भावग्राही है क्रियाग्राही नहीं।

अन्ततोगत्वा श्रीमद्भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोकों से यही निष्कर्ष निकलता है कि- परमेश्वर श्रीकृष्ण की ही भक्ति, आराधना व ध्यान करने से मनुष्य का कल्याण सम्भव है। इधर-उधर भटकने से नहीं।
तब ऐसे में यह जानना और आवश्यक हो जाता है कि भक्तों के लिए पूजा व आराधना का फल- परमेश्वर श्रीकृष्ण सहित अन्य देवताओं का कितना होता है ? तो इसका विस्तार पूर्वक वर्णन- श्रीमद्देवीभागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय -(३०) में मिलता है। जिसमें परमेश्वर श्रीकृष्ण सहित छोटे-बड़े सभी देव-देवीयों की पूजा अर्चना के लाभ व फलों को बड़े ही सारगर्भित ढंग से बताया गया है।
         
जिसमें सबसे पहले हम लोग श्रीकृष्ण पूजा के लाभों को जानेंगे उसके बाद अन्य देवों से मिलने वाले लाभों को भी जानेंगे।

[ ग ]- श्रीकृष्ण की पूजा के लाभ- 
श्रीकृष्ण भक्तों को उनकी पूजा से जो-जो लाभ व पद प्राप्त होता है उसका वर्णन श्रीमद्देवी भागवत पुराण के अध्याय- (३०) के श्लोक -( ६९ से ७०) और ( ८५ से ८९) में मिलता है। जिसमें श्रीकृष्ण भक्तों के विषय में बताया गया है कि -

"करोति भारते यो हि कृष्णजन्माष्टमीव्रतम् ।
शतजन्मकृतं पापं मुच्यते नात्र संशयः॥६९।

वैकुण्ठे मोदते सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश।
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य कृष्णे भक्तिंलभेद्‌ ध्रुवम्॥७०।


अनुवाद - भारतवर्ष में जो मनुष्य श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह अपने सौ जन्मों में किये गये पापों से छूट जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। और जब तक चौदहों इन्द्रों की स्थिति बनी रहती है, तब-तब वह वैकुण्ठ लोक में आनन्द का भोग करता है। इसके बाद वह पुनः उत्तम योनि में जन्म लेकर निश्चित रूप से भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करता है।६९-७०।

यहाँ पर श्रीकृष्ण भक्तों से सम्बन्धित उपर्युक्त श्लोकों पर यदि विचार किया जाए तो श्रीकृष्ण भक्त श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत के उपरान्त पापों से मुक्त होकर दीर्घकाल के लिए वैकुण्ठधाम को तो प्राप्त कर लेतें हैं। किन्तु वह मोक्ष को प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि वे दीर्घकाल के पश्चात पुनः मृत्युलोक में जन्म लेते हैं।
अर्थात् वह अभी भी आवागमन से मुक्त नहीं हो सकतें है। तब प्रश्न उठता है कि श्रीकृष्ण भक्त आवागमन से मुक्त होकर मोक्ष को कैसे प्राप्त करेगा ? तो इसका उत्तर इसके अगले श्लोक- (८५ से ८९) में दिया गया है, जिसमें बताया गया है कि श्रीकृष्ण भक्तों को कैसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।

'कार्तिकीपूर्णिमायां च कृत्वा तु रासमण्डलम् ।
गोपानां शतकं कृत्वा गोपीनां शतकं तथा॥८५।

शिलायां प्रतिमायां च श्रीकृष्णं राधया सह।
भारते पूजयेद्‍भक्त्या चोपचाराणि षोडश॥ ८६।

गोलोके वसते सोऽपि यावद्वै ब्रह्मणो वयः।
भारतं पुनरागत्य कृष्णे भक्तिं लभेद्‌दृढाम्॥८७।

क्रमेण सुदृढांभक्तिं लब्ध्वा मन्त्रं हरेरहो।*
देहं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः॥ ८८।

ततः कृष्णस्य सारूप्यं पार्षदप्रवरो भवेत् ।*
पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत्॥८९।


अनुवाद - जो भारतवर्ष में कार्तिक पूर्णिमा को सैकड़ों गोपों तथा गोपियों को साथ लेकर रासमण्डल - सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिलापर या प्रतिमा में सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों से भक्तिपूर्वक राधा सहित श्रीकृष्ण की पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजी के स्थिति पर्यन्त गोलोक में निवास करता है। पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। भगवान् श्रीहरि की क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह त्याग के अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहाँ श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है। तब पुनः वहाँ से उसका पतन नहीं होता, वह जरा (बुढ़ापा) तथा मृत्यु से सर्वथा रहित हो जाता है।८५-८९।
              
यहाँ पर श्रीकृष्ण भक्तों से सम्बन्धित उपर्युक्त श्लोकों पर यदि विचार किया जाए तो श्रीकृष्ण भक्तों के लिए मोक्ष हेतु सबसे उत्तम साधन- "कार्तिक पूर्णिमा को सैकड़ों गोपों तथा गोपियों को साथ लेकर रासमण्डल - सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिलापर या प्रतिमा में सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों से भक्तिपूर्वक राधा सहित श्रीकृष्ण की पूजा करना ही है। यदि श्रीकृष्ण भक्त ऐसा करते हैं तो निश्चित रूप से वे भक्त, श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त होंगे इसमें सन्देह नहीं है।

✳️- ज्ञात हो मान्यता है कि श्रीकृष्ण भक्तों द्वारा जहाँ भी रास का आयोजन किया जाता है वहाँ भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा किसी न किसी रूप में अवश्य ही उपस्थित रहते हैं। इसलिए रास को मोक्षप्राप्ति का सबसे आसान और उत्तम साधन माना गया हैं। इसके बारे में विस्तृत जानकारी इस पुस्तक के अध्याय- (११) के भाग- दो में दी गई है।
          
किन्तु देवी-देवों को पूजने वाले कभी नहीं मोक्ष को प्राप्त होते। क्यों नहीं होते ? तो इसको अच्छी तरह से समझने के लिए कुछ प्रमुख देवी-देवों के पूजन विधि और उसके लाभ को जानना होगा जैसे -     
  
[घ] -शिव पूजा के लाभ-            
शिव भक्तों को जो-जो लाभ व पद प्राप्त होता है उन सभी का वर्णन श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अध्याय- (३०) के श्लोक -( ७१ से ७५ ) में मिलता है। जिसमें बताया गया है कि -

इहैव भारते वर्षे शिवरात्रिं करोति यः।
मोदते शिवलोके स सप्तमन्वन्तरावधि ॥७१।

शिवाय शिवरात्रौ च बिल्वपत्रं ददाति यः।
पत्रमानयुगं तत्र मोदते शिवमन्दिरे ॥७२।

पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य शिवभक्तिं लभेद्‌ध्रुवम् ।
विद्यावान्पुत्रवाञ्छ्रीमान् प्रजावान्भूमिमान्भवेत् ॥७३।

चैत्रमासेऽथवा माघे शङ्‌करं योऽर्चयेद्‌व्रती ।
करोति नर्तनं भक्त्या वेत्रपाणिर्दिवानिशम् ॥ ७४।

मासं वाप्यर्धमासं वा दश सप्त दिनानि च ।
दिनमानयुगं सोऽपि शिवलोके महीयते ॥७५।

शिवं यः पूजयेन्नित्यं कृत्वा लिङ्‌गं च पार्थिवम्।
यावज्जीवनपर्यन्तं स याति शिवमन्दिरम् ॥११०।

मृदो रेणुप्रमाणाब्दं शिवलोके महीयते ।
ततः पुनरिहागत्य राजेन्द्रो भारते भवेत्॥१११।
              

अनुवाद - ७१-७५ और ११०- १११ तक
• इस भारतवर्ष में जो मनुष्य शिवरात्रि का व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरों के काल तक शिवलोक में आनन्द से रहता है।७१।
• जो मनुष्य शिवरात्रि के दिन भगवान् शंकर को बिल्वपत्र (बेलपत्थर) अर्पण करता है, वह बिल्वपत्रों की जितनी संख्या है उतने वर्षों तक उस शिवलोक में आनन्द भोगता है। पुनः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करके वह निश्चय ही शिवभक्ति प्राप्त करता है, और विद्या, पुत्र, श्री, प्रजा तथा भूमि- इन सबसे सदा सम्पन्न रहता है।७२-७३।

• जो व्रती चैत्र अथवा माघ में पूरे मासभर, आधे मास, दस दिन अथवा सात दिन तक भगवान् शंकर की पूजा करता है और हाथ में बेंत लेकर भक्तिपूर्वक उनके सम्मुख नर्तन करता है, वह उपासना के दिनों की संख्या के बराबर युगों तक शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ७४-७५।

• जो मनुष्य प्रतिदिन पार्थिव (मिट्टी) का लिंग बनाकर शिव की पूजा करता है और जीवन पर्यन्त इस नियमका पालन करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है और वह पार्थिव लिंग में विद्यमान रजकणों की संख्या के बराबर वर्षों तक शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है। वहाँ से पुनः भारतवर्ष में जन्म लेकर वह महान् राजा होता है। ११०- १११।
        
उपर्युक्त श्लोकों पर यदि विचार किया जाय तो शिव भक्त निश्चित रूप से शिवलोक को प्राप्त होता हैं। किन्तु वह उस लोक तक नहीं पहुँच पाता जो शिवलोक से पचास करोड़ योजन ऊपर है। जिसका नाम है "गोलोक" जो नित्य एवं चिरस्थाई है। वहाँ जाने के बाद मनुष्य आवागमन से मुक्त अर्थात् मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। किन्तु शिव भक्त शिवलोक तक ही रह जातें हैं और पुनः मृत्यु लोक में आकर जन्म लेते हैं- (कौन सा लोक कहाँ स्थापित हैं इसकी विस्तृत जानकारी अध्याय- (दो) में दी गई है)।

[ङ]-विष्णु पूजा के लाभ-
 
श्रीमद्देवीभागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय-(३०) के श्लोक- (१०५) और (१०६) में बताया गया है कि विष्णु की आराधना व पूजा करने वाले भक्तों को कौनसा स्थान व पद प्राप्त होता है ?

विद्वान्सुचिरजीवी च श्रीमानतुलविक्रमः।
यो वक्ति वा ददात्येव हरेर्नामानि भारते॥१०५।

युगं नाम प्रमाणं च विष्णुलोके महीयते ।
ततः पुनरिहागत्य स सुखी धनवान्भवेत् ॥१०६।
               

अनुवाद- भारतवर्ष में जो मनुष्य भगवान श्रीहरि (क्षुद्र विष्णु) के नाम का स्वयं कीर्तन करता है अथवा इसके लिए दूसरों को प्रेरणा देता है वह जपे गए नामों की संख्या के बराबर युगों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है, और वहाँ से पुनः इस लोक (मृत्युलोक) में आकर वह सुखी तथा धनवान होता है।१०५-१०६।
              
विष्णु भक्तों से समन्धित उपर्युक्त श्लोकों पर विचार किया जाए तो विष्णु भक्त भी निश्चित रूप से विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं और वे विष्णु के जपे गए नामों की संख्या के बराबर युगों तक विष्णुलोक में निवास भी करते हैं। इसके बाद जब उसके जपे हुए नाम की संख्या पूरी हो जाती है तब उन्हें पुनः मृत्यु लोक में आना पड़ता है। अर्थात वह विष्णु लोक को प्राप्त होने के बाद भी मोक्ष को प्राप्त नहीं हो सकते हैं।

✳️-"यहाँ पर कुछ लोगों को संशय हो सकता है कि विष्णु और श्रीकृष्ण एक ही हैं। किन्तु ऐसी बात नहीं है। देखा जाए तो गुण विशेष के आधार पर विष्णु के तीन रुप हैं या कहें तीन प्रकार के विष्णु हैं-

(१)- स्वराट विष्णु (परिपूर्णतम् विष्णु)- जो गोलोक में श्रीकृष्ण नाम से अपने परिपूर्णतम् अंशों के साथ विराजमान हैं। उन्हें ही परिपूर्णतम् परंब्रह्म या स्वराट विष्णु कहा गया है।
परमेश्वर श्रीकृष्ण को स्वराट अर्थात् परिपूर्णतम् परंब्रह्म होने की पुष्टि- भागवत पुराण- (७/१५/५३-५४) से होती है।

ॐकारं बिन्दौ नादे तं तं तु प्राणे महत्यमुम्।। ५३ (उत्तरार्द्ध)
अग्निः सूर्यो दिवा प्राह्णः शुक्लो राकोत्तरं स्वराट्।
विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयात् ।।५४।


अनुवाद- वह निवृत्तिनिष्ठ ज्ञानी क्रमशः अग्नि, सूर्य, दिन, सायङ्काल, शुक्लपक्ष, पूर्णमासी और उत्तरायणके अभिमानी देवताओंके पास जाकर गोलोक में स्वराट्-विष्णु अर्थात् परमेश्वर श्रीकृष्ण के लोकमें पहुँचता है और वहाँ के भोग समाप्त होने पर वह स्थूलोपाधिक 'विश्व' अपनी स्थूल उपाधिको सूक्ष्ममें लीन करके सूक्ष्मो पाधिक 'तेजस' हो जाता है। फिर सूक्ष्म उपाधि को कारण में लय करके कारणोपाधिक 'प्राज्ञ' रूपसे स्थित होता है; फिर सबके साक्षीरूप से सर्वत्र अनुगत होने के कारण साक्षी के ही स्वरूप में कारणोपाधि का लय कर के 'तुरीय' रूप से स्थित होता है। इस प्रकार दृश्यों का लय हो जाने पर वह शुद्ध आत्मा रह जाता है। यही मोक्षपद है॥ ५४।

इसी तरह से परमेश्वर श्रीकृष्ण को स्वराट अर्थात् परिपूर्णतम् परंब्रह्म होने की पुष्टि- श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध का प्रथम अध्याय (मंगलाचरण) के प्रथम श्लोक से भी होती है।

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ते यत्सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।।१।


अनुवाद:- स्वराट् जिससे इस जगत् की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं- क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थों में अनुगत (समाया हुआ है) और असत् पदार्थों से पृथक् है। वह जड नहीं, चेतन है; परतन्त्र नहीं, स्वतन्त्र (परिपूर्णत्तम) है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं, प्रत्युत उन्हें भी अपने संकल्प से ही जिसने  वेदज्ञान का दान किया है; जिसके सम्बन्ध में

बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियों में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत्-स्वप्र सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होने पर भी अधिष्ठान सत्ता से सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयं की ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्य से पूर्णतः मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परंब्रह्म का हम ध्यान करते हैं ॥१॥  

(सम्पूर्ण सृष्टि का सञ्चालन सैद्धान्तिक है और यह सिद्धान्त कर्म-फल पर आधारित है। और कर्म का अस्तित्व भी अहं, संकल्प और इच्छाओं की दृढ़ता पर अवलम्बित है । अहं से संकल्प और संकल्प से इच्छाओं का उदय ( प्रवृत्तिगत होकर चेतना के स्रोत चित्त के धरातल पर ही हुआ है। इस लिए चित्त ही जीवन का निर्माता तत्व है।)

विषयों की आसक्ति का मूल कारण प्रवृत्तियाँ हैं। आसक्ति ( लगाव ) इच्छाओं का सक्रिय रूपान्तरण है।
अर्थात प्रवृत्तियों की तुष्टिमूलक प्रेरणाओं से ही मनुष्य की इच्छाऐं उत्पन्न होती हैं। मनुष्य इन्हीं इच्छाओं की तुष्टि और पुष्टि के लिए जीवन पर्यन्त सभी अच्छे- बुरे  कर्म करता रहता है उसके शरीर की सार्थकता ही कर्म के लिए हैं। कर्म करने में ही शरीर का अस्तित्व है। जिस दिन हम कर्म करना छोड़ देंगे उसी दिन से शरीर की क्षमता क्षीण होती चली जाएगी- इन कर्मों के सम्पादन में इच्छाओं की सहायकता  होने से ही मनुष्य से अनेक अच्छे-बुरे कर्म होते हैं जिनका फल भोगने के लिए ही उसे पुन: संसार में जन्म लेना पड़ता है।

उपर्युक्त श्लोक में स्वराट् शब्द का व्युत्पत्ति मूलक अर्थ भी विवेचनीय है।–
"स्वरेषु अटति इति स्वराट्- जो स्वरों में अर्थात् ॐकार में स्थित होता है। वही परंब्रह्म का वाचक स्वराट है।
अथवा जो स्वयं को ही प्राप्त है। वह परमेश्वर का वाचक स्वराट् है। अथवा एक अन्य व्युत्पत्ति के अनुसार-" स्वमेव राजयति इति स्वराज्-स्वराट्।


(२)- विराट विष्णु (परिपूर्ण विष्णु)- इन्हें गर्भोदकशायी विष्णु भी कहा जाता है क्योंकि ये परमेश्वर श्रीकृष्ण की चिन्मयी शक्ति से श्रीराधा के गर्भ से श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश से उत्पन्न हुए हैं। ये स्थूल से भी स्थूलतम् हैं। इसीलिए इन्हें विराट पुरुष या विराट विष्णु कहा गया। इनकी विशाल शरीर के अनन्त रोमकूपों में उतने ही ब्रह्माण्ड स्थिति हैं। फिर भी ये गर्भोदकशायी विष्णु अनन्त अंश वाले परमेश्वर श्रीकृष्ण यानी स्वराट विष्णु के सोलहवें अंश के बराबर हैं।

✴️ विराट विष्णु और छुद्र विराट् विष्णु में प्रमुख अन्तरों के विषय में गोपेश्वर श्रीकृष्ण ने श्रीराधा जी को ब्रह्मवैवर्त-पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(६६) के श्लोक संख्या (५५ और ५६) में कुछ इस तरह से बताया हैं-

भेदः कदाऽपि न भवेन्निश्चितं च तथाऽऽवयोः।
अहं महान्विराट् सृष्टौ विश्वानि यस्य लोमसु। ५५।

अंशस्त्वं तत्र महती स्वांशेन तस्य कामिनी।
अहं क्षुद्रविराट् सृष्टौ विश्वं यन्नाभिपद्मतः।५६।


अर्थात्- वह महाविराट् ही मेरा (सोलहवां) अँश है और तुम (राधा) अपने (सोलहवें अंश) से "महतीलक्ष्मी" के रूप में उसकी पत्नी (कामिनी) भी हो। जो समिष्टि (समूह) में है वही व्यष्टि (इकाई) में भी है। बाद की सृष्टि में मैं ही वह क्षुद्र विराट् विष्णु भी हूँ जिसकी नाभि कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है।५५।
क्षुद्र विराट् विष्णु के रोमकूपों में मेरा आंशिक (एकांश) से निवास है। तुम्हीं अपने एकांश से वहाँ अर्थात् क्षीरसागर में (लक्ष्मी) रूप से उसकी पत्नी हो।५६।।

(३)- क्षुद्र विष्णु (पूर्ण विष्णु)- गर्भोदकशायी विष्णु यानी विराट विष्णु के अनन्त रोमकूपों में जितने ब्रह्माण्ड स्थिति हैं उनमें उतने ही क्षुद्र विष्णु यानी पूर्ण विष्णु- परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक-एक अंश को धारण किए हुए रहते हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी संख्या अनन्त है।

✴️ ज्ञात हो- तीन प्रकार के विष्णु के भेद और उसी क्रम में उनकी तीन पत्नियाँ- परमा लक्ष्मी (राधा), महतीलक्ष्मी तथा लक्ष्मी के बारे में अधिकांश लोगों को पता नहीं हैं। यही कारण है कि सौरमण्डल के अधिकांश पृथ्वीवासी विशेषकर ऐसे अज्ञानी कथावाचक श्रीकृष्ण यानी स्वराट विष्णु को  क्षुद्र विष्णु से उत्पन्न बताकर ज्ञान की उल्टी धारा प्रवाहित करते हैं।

उपर्युक्त तीनों प्रकार के विष्णुओं की तुलनात्मक स्थिति तथा कौन देवता कब, कैसे और कितने अंशों से उत्पन्न हुआ है, इत्यादि विषयों की विस्तृत जानकारी इस पुस्तक के अध्याय-
(३ और ४) में दी गई है। वहाँ से पाठक गण अपने समस्त संशयों को दूर कर सकते हैं।

[च]-श्रीराम पूजा के लाभ- 
"श्रीराम" भक्तों के बारे में भी श्रीमद्देवीभागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय -(३०) के श्लोक- (७६) और (७७) में बताया गया है कि श्रीराम की आराधना व पूजा करने वाले भक्तों को कौन सा पद और स्थान प्राप्त होता है ?

श्रीरामनवमीं यो हि करोति भारते पुमान्।
सप्तमन्वन्तरं यावन्मोदते विष्णुमन्दिरे॥७६॥

पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य रामभक्तिं लभेद्‌ध्रुवम् ।
जितेन्द्रियाणां प्रवरो महांश्च धनवान्भवेत्॥७७॥


अनुवाद - जो मनुष्य भारतवर्ष में श्रीराम नवमी का व्रत सम्पन्न करता है, वह विष्णु के धाम में सात मन्वन्तर तक आनन्द करता है। पुनः उत्तम योनि में जन्म पाकर वह निश्चय ही राम की भक्ति प्राप्त करता है और जितेन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ तथा महान् धनी होता है।७६-७७।

अब यहाँ पर श्रीराम भक्तों पर विचार किया जाए तो श्रीराम भक्त भी निश्चित रूप से विष्णु लोक अर्थात क्षुद्र विष्णु के लोक को प्राप्त होता है। किन्तु वह पुनः मृत्युलोक में उत्तम योनि में जन्म लेता है और महाधनी होता है। श्रीराम भक्तों के विषय में ऐसा ही श्लोक में लिखा गया है। किन्तु यहाँ पर यदि विचार किया जाए तो रामभक्त विष्णु लोक पहुँच कर भी आवागमन से मुक्त नहीं हो पाता अर्थात वह मोक्ष को प्राप्त नहीं होता। क्योंकि मोक्ष की प्राप्ति तभी हो सकती है जब मनुष्य परम धाम गोलोक को प्राप्त होता है जहाँ परिपूर्णतम परंब्रह्म श्रीकृष्ण यानी स्वराट विष्णु रहते हैं। जो सभी लोकों से ऊपर है। वहाँ जाने के बाद मनुष्य को पुनः संसार कर्म गत रूप से जन्म नहीं लेना पड़ता अर्थात वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।   
 
✳️ ज्ञात हो उपर्युक्त श्रीराम भक्तों के श्लोकों से सिद्ध होता है कि श्रीराम और क्षुद्र विष्णु अर्थात पूर्णविष्णु में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसी आनुपातिक उपक्रम  से रामभक्त विष्णु लोक तक ही जाता है। जैसे अन्य देवताओं के भक्त उनके ही लोक तक जातें हैं। जैसे शिव भक्त- शिव लोक को, तथा श्रीकृष्ण भक्त गोलोक को प्राप्त होते हैं। यहीं श्रीकृष्ण और अन्य देवों की भक्ति में अन्तर है इसको जानना चाहिए।
इसी अन्तर को ध्यान में रखकर भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद् गीता के अध्याय- (९) के श्लोक संख्या- (२५) में अर्जुन को अपने और देवताओं की भक्ति में भेद को बताते हुए कहते हैं कि -

"यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।। २५।।


अनुवाद - देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों को पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत-प्रेतों को प्राप्त होते हैं। परन्तु मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।२५।

और इस बात को अधिकांश लोग नहीं जानते हैं कि परमेश्वर श्रीकृष्ण कौन से विष्णु हैं। और इसी अज्ञानता वश वे कहा करते हैं कि श्रीकृष्ण ही विष्णु हैं और विष्णु ही कृष्ण हैं। इसी अज्ञानता वश कभी-कभी श्रीकृष्ण को क्षुद्र विष्णु से उत्पन्न करा देते हैं।
इस तरह के समस्त संशयों का सम्पूर्ण समाधान इस पुस्तक के अध्याय- (२)- (३) और (४) का अध्ययन करने से हो जाएगा।

अब हमलोग इसी क्रम में कुछ देवियों की पूजा- अर्चना से होने वाले लाभों को जानेंगे-

[छ] - देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ-

"देवी सावित्री और सरस्वती" जो दोनों ही ब्रह्माजी की पत्नियाँ मानीं जाती हैं। जिनकी उत्पत्ति गोलोक में पूर्व काल में श्रीराधा जी से ही हुई है। जिनका मुख्य स्थान ब्रह्मलोक है। उनके भक्तों के विषय में भी श्रीमद्देवीभागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय -(३०) के श्लोक- (९७ से ९९) में बताया गया है कि- देवी सावित्री और सरस्वती की आराधना व पूजा करने वाले भक्तों को कौन सा पद और स्थान प्राप्त होता है ?

"भारतं पुनरागत्य चारोगी श्रीयुतो भवेत् ।
ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां सावित्रीं यो हि पूजयेत्॥९६।

महीयते ब्रह्मलोके सप्तमन्वन्तरावधि ।
पुनर्महीं समागत्य श्रीमानतुलविक्रमः ॥९७।

चिरजीवी भवेत्सोऽपि ज्ञानवान्सम्पदा युतः ।
माघस्य शुक्लपञ्चम्यां पूजयेद्यः सरस्वतीम् ॥९८।

संयतो भक्तितो दत्त्वा चोपचाराणि षोडश ।
महीयते मणिद्वीपे यावद्ब्रह्म दिवानिशम् ॥९९।
                

अनुवाद - ९६-९९ • जो मनुष्य ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवती सावित्री का पूजन करता है, वह सात मन्वन्तरों की अवधि तक ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। पुनः पृथ्वी पर लौटकर वह श्रीमान अतुल पराक्रमी, चिरञ्जीवि, ज्ञानवान तथा सम्पदा सम्पन्न हो जाता है। ९६-९७।

• जो मनुष्य माघ महीने के शुक्लपक्ष की पञ्चमी तिथि को भक्तिपूर्वक सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों को अर्पण कर सरस्वती की पूजा करता है, वह ब्रह्मा के आयुपर्यन्त मणिद्वीप में दिन-रात प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और पुनः जन्म ग्रहण कर महान् कवि तथा पण्डित होता है।९८-९९।
           
उपर्युक्त श्लोकों पर यदि विचार किया जाए तो ब्रह्माजी की दोनों पत्नियों के भक्त- ब्रह्माजी के लोक अर्थात् ब्रह्मलोक को अवश्य प्राप्त होते हैं जो शिवलोक और वैकुण्ठलोक से बहुत नीचे है। किन्तु इन दोनों देवियों के भक्त मृत्युलोक में पुनः जन्म ग्रहण करते हैं। इस प्रकार से इन देवियों के भक्त भी मोक्ष को प्राप्त नहीं होते। ऐसा ही उपर्युक्त श्लोकों में लिखा गया है।

अतः पूजा अर्चना के उपर्युक्त सभी श्लोकों से यही निष्कर्ष निकलता है कि- देव- देवताओं को पूजने का परिणाम अल्प ही होता है और उनके भक्त उन्हीं को प्राप्त होते हैं और अल्प समय तक उन्हीं के लोक में रहकर पुनः अपने लोक (भूलोक) में वापस आ जाते हैं। अर्थात वे मोक्ष को प्राप्त नहीं होते।

किन्तु परमेश्वर श्रीकृष्ण को पूजने वाला श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति को प्राप्त कर गोलोकवासी हो जाता है। तब वह श्रीकृष्ण के ही रूप व स्वरूप में विलीन हो जाता है, और वह आवागमन से मुक्त हो जाता है। इसी को मोक्ष कहा जाता है। 

[ज]श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता हैं ?

तब ऐसे में पुनः प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है कि जब देवी-देवों को पूजने का परिणाम अल्प ही है, तो मनुष्य परिपूर्णतम परंब्रह्म श्रीकृष्ण के अतिररिक्त (३३) तैतीस करोड़ देवी-देवताओं को क्यों पूजते हैं ? तो इसका जबाब है- अज्ञानता। इसके साथ ही कुछ कथावाचकों का परंब्रह्म श्रीकृष्ण के बारे में अल्प ज्ञान का होना ही है। यह बात बिल्कुल सत्य है।
क्योंकि श्रीकृष्ण ही परिपूर्णतम परंब्रह्म हैं, इस गूढ़ रहस्य का सम्पूर्ण ज्ञान केवल चार लोगों को ही है- पहला पञ्चमुखी शिव, दूसरा- श्रीराधा और तीसरा-  गोलोकवासी और  चौथे गोप- गोपियाँ।
बाकी तैंतीस (३३) करोड़ देवी-देवों सहित बड़े-बड़े तपस्वियों को श्रीकृष्ण से सम्बन्धित अल्प ज्ञान ही है। इस बात की पुष्टि ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय- (९४ के श्लोक- ८२) और (८३) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-

कृष्णभक्तिं विजानाति योगीन्द्रश्च महेश्वरः ।
राधा गोप्यश्च गोपाश्च गोलोकवासिनश्च ये ।।८२।


किञ्चित्सनत्कुमारश्च ब्रह्मा चेद्विषयी तथा ।
किञ्चिदेव विजानन्ति सिद्धा भक्ताश्च निश्चितम्।८३।।         

                                  
अनुवाद - ८२-८३
• श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूपेण योगीराज महेश्वर, राधा, गोलोकवासी और गोप-गोपियाँ ही जानतीं हैं।

✴️ प्रस्तुत श्लोक में 'च' अव्यय पद का प्रयोग और अथवा (and) के अर्थ में पदों के समाहार के लिए हुआ है। इस लिए (च) का अर्थ- "और" होता है। गोपी-गोप और गोलोकवासी " ही कृष्ण की भक्ति तत्व को जानते हैं।

अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि गोपी और गोप के अतिरिक्त गोलोक वासी कौन हैं ?
तो इसका समुचित उत्तर होगा कि गोलोक वासी से तात्पर्य उन तपस्वियों से है जो अपने तपोबल से गोलोक में पहुँचते हैं। किन्तु गोप और गोपियाँ - श्रीकृष्ण और श्रीराधा से उत्पन्न होने के कारण पहले से ही गोलोक वासी हैं। और भगवान श्रीकृष्ण इन्हीं गोप और गोपियों के साथ सदैव गोप भेष में रहते भी हैं और इन्हीं गोपियों को लेकर भगवान श्रीकृष्ण भूतल पर आते-जाते हैं।

• ब्रह्मा और सनत्कुमारों को कुछ ही ज्ञात है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं।८३।  
              
इतना ही नहीं परमेश्वर श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण चरित्रों की जानकारी देने में पुराण भी सक्षम नहीं हैं। इस बात की पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय - (३०) के श्लोक - (९) से होती है। जिसमें नारायण मुनि नारद जी से कहते हैं कि -

गोलोकनाथस्य विभोर्यशोऽमलं श्रुतौ पुराणे नहि किञ्चन स्फुटम्।
न पाद्ममुख्याः कथितुं समर्थाः सर्वेश्वरं तं भज पाद्ममुख्यम् ।९।

अनुवाद:- गोलोक के सर्वशक्तिमान स्वामी (श्रीकृष्ण) की निर्मल प्रसिद्धि के बारे में पुराणों में भी बहुत कुछ वर्णित नहीं है। अर्थात् कमल-मुखवाले प्रभु की महिमा बताने में ये पुराण भी सक्षम नहीं हैं, इसलिए उन कमलमुख वाले भगवान श्रीकृष्ण का भजन करो।९।
             
तब ऐसे में पुनः प्रश्न उठता है कि जब श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण गुणों एवं रहस्यों को बड़े-बड़े ऋषि मुनि नहीं जान सके , पुराणों में अल्प वर्णन है, तथा ब्रह्मा और सनत्कुमार भी परमात्मा श्रीकृष्ण को अल्प ही जानते है। तो श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण चरित्रों को कौन बता सकता है ? या कहें कि श्रीकृष्ण कथा कहने का वास्तविक अधिकारी कौन हो सकता है ?
                     
तो इसका समुचित समाधान है- जो सदैव श्रीकृष्ण के सान्निध्य (पास) में रहता हो, जो श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण गूढ़ रहस्यों को जानता हो, वही इस समस्या का पूर्णतया समाधान कर सकता है। इस प्रकार ऊपर के श्लोकों में स्पष्ट रूप से बताया जा चुका है कि श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण गूढ़ रहस्यों को केवल चार लोग- (१)- शिव जी (२)- श्रीराधा (३)-गोलोकवासी और (४)गोप- गोपियाँ ही जानते हैं।
           
अब इन सब में देखा जाए तो प्रथम क्रम पर भगवान शिवजी आते हैं, जो श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण चरित्रों एवं गूढ़ रहस्यों को सम्यक रूप से जानते हैं। तो क्या शिवजी भू-तल पर आकर सार्वजनिक रूप से श्रीकृष्ण कथा कहेंगे ? इसका जबाब होगा नहीं। क्योंकि उनको भूतल पर श्रीकृष्ण कथा कहते हुए कभी नहीं देखा गया और ना ही शास्त्रों में ऐसा लिखा हुआ मिलता है कि- शिव ने भक्तों को कृष्ण कथा सुनायी है। फिर भी भगवान शिव, परमात्मा श्रीकृष्ण और श्रीराधा के सम्पूर्ण चरित्रों को केवल पार्वती जी को बताते हैं। वह भी श्रीकृष्ण की अनुमति मिलने पर। इस बात की पुष्टि - ब्रह्मवैवर्तपुराण के अध्याय - (४८) के निम्नलिखित प्रमुख श्लोकों में मिलती है। जो पार्वती -शिव संवाद के रूप में जाना जाता है। जिसमें पार्वती जी शिवजी से कहतीं हैं कि -

तदुत्पतिं च तद्ध्यानं नाम्नो माहात्म्यमुत्तमम्।
पूजाविधानं चरितं स्तोत्रं कवचमुत्तमम्।१४।

आराधनविधानं च पूजापद्धतिमीप्सिताम्।
साम्प्रतं ब्रूहि भगवन्मां भक्तां भक्तवत्सल।१५।

कथं न कथितं पूर्वमागमाख्यानकालतः।
पार्वतीवचनं श्रुत्वा नम्रवक्त्रो बभूव सः।१६।

पञ्चवक्त्रश्च भगवाञ्छुष्ककण्ठोष्ठतालुकः ।
स्वसत्यभङ्गभीतश्च मौनीभूय विचिन्तयन् ।१७।

सस्मार कृष्णं ध्यानेनाभीष्टदेवं कृपानिधिम् ।
तदनुज्ञां च सम्प्राप्य स्वार्द्धाङ्गां तामुवाच सः।१८।

निषिद्धोऽहं भगवता कृष्णेन परमात्मना।
आगमारम्भसमये राधाख्यानप्रसंगतः।१९।

मदर्द्धांगस्वरूपा त्वं न मद्भिन्ना स्वरूपतः।
अतोऽनुज्ञां ददौ कृष्णो मह्यं वक्तुं महेश्वरि। २०।

मदिष्टदेवकान्ताया राधायाश्चरितं सति ।
अतीव गोपनीयं च सुखदं कृष्णभक्तिदम्।२१।

जानामि तदहं दुर्गे सर्वं पूर्वापरं वरम् ।
यज्जानामि रहस्यं च न तद्ब्रह्मा फणीश्वरः ।२२।

              
अनुवाद - आप श्रीराधा के प्रादुर्भाव, ध्यान, उत्तम नाम- महात्म्य, उत्तम पूजा - विधान, चरित्र, स्तोत्र, उत्तम कवच, आराधना विधि तथा अभीष्ट पूजा -पद्धति का इस समय वर्णन कीजिए। भक्तवत्सल ! मैं आपकी भक्ता (भक्तिनी) हूँ अतः मुझे यह सब बातें अवश्य बताऐं। साथ ही इस बात पर भी प्रकाश डालिए कि आपने आगमाख्यान से पहले ही इस प्रसंग का वर्णन क्यों नहीं किया था ? (१४-१५-१६)

• पार्वती का उपर्युक्त वचन सुनकर भगवान पञ्चमुख शिव ने अपना मस्तक नीचा कर लिया। अपना सत्य भङ्ग होने के भय से वे मौन हो गए और चिन्ता में पड़ गए।१७।

•  तब उस समय उन्होंने अपने इष्टदेव करुणा निधान भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान द्वारा स्मरण किया और उनकी आज्ञा पाकर वे अपनी अर्धांगस्वरूपा पार्वती से इस प्रकार बोले- देवी ! आगमाख्यान का आरम्भ करते समय मुझे परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण ने राधाख्यान के प्रसंग से रोक दिया था।१८-१९।

• परन्तु माहेश्वरी ! तुम तो मेरा आधा अंग हो, अतः स्वरूपतः मुझसे भिन्न नहीं हो। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने इस समय मुझे यह प्रसंग तुम्हें सुनाने की आज्ञा दे दी है।२०-२१।

• अतः इस गोपनीय विषय को भी तुमसे कहता हूँ। दुर्गे ! यह परम अद्भुत रहस्य है मैं इसका कुछ वर्णन करता हूँ सुनो।२२।

✳️ पार्वती को भगवान शिव ने राधाख्यान में क्या बताया उसका विस्तार पूर्वक वर्णन इस पुस्तक के अध्याय- (दो) में किया गया है। वहाँ से राधाख्यान की कुछ सामान्य जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं।
               
अतः इस उपर्युक्त प्रसंग से तो यही सिद्ध होता है कि-गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा के सम्पूर्ण चरित्रों को बताने के लिए शिव को भी श्रीकृष्ण से अनुमति लेनी पड़ी थी। तो ऐसे में भगवान शिव भूतल पर सार्वजनिक रूप से श्रीकृष्ण कथा कैसे कह सकते हैं ?

अब रही बात श्रीराधा जी की। क्योंकि श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण रहस्यों एवं चरित्रों को श्रीराधा भी जानती हैं। तो क्या श्रीराधा जी इस भूतल पर आकर श्रीकृष्ण कथा कहेंगी ? ऐसा सम्भव नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्ण और श्रीराधा में कोई भेद नहीं है। सांसारिक प्रक्रिया के मूल द्वन्द्वात्मक रूप से परे होने पर दोनों मूलत: एक ही परंब्रह्म रूप हैं। तो ऐसे में वह अपनी ही कथा स्वयं कैसे कहेंगी। दूसरी बात यह कि आज तक ऐसा कभी नहीं देखा गया कि कोई अपनी कथा स्वयं कहता हो। अर्थात् भूतल पर श्रीकृष्ण कथा कहते हुए श्रीराधा को कभी नहीं देखा गया।

अब रही बात तीसरे क्रम पर गोलोक वासियों की।  तो आज तक कभी ऐसा नहीं सुना गया कि गोपों के अतिरिक्त और कोई गोलोक वासी भी कभी भूतल पर आकर श्रीकृष्ण कथा कहता हो। और यह सम्भव भी नहीं है क्योंकि गोलोक वासी श्रीकृष्ण के गोलोक में अपने तपोबल और ज्ञानबल से ही पहुँचते हैं। और वे श्रीकृष्ण के मर्म को जानते भी हैं। किन्तु वे भूतल पर श्रीकृष्ण के साथ कभी नहीं आते है। केवल गोप और गोपियाँ ही श्रीकृष्ण के लीलासहचर बनकर भूतल पर आते हैं। इसके विषय में आगे यथास्थान बताया गया है।
          
अब रही बात चतुर्थ क्रम पर गोप और गोपियों की -
 क्योंकि गोप और गोपियाँ भी श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण चरित्र एवं गूढ़ रहस्यों को भली-भाँति जानते हैं। क्योंकि इनकी उत्पत्ति श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोमकूपों से ही हुई हैं। ऐसे में भला ये गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण चरित्रों को कैसे नहीं जान सकते ? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीकृष्ण की लीला का सहचर बनकर ये गोप और गोपियाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उसी तरह से विद्यमान हैं, जैसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव विद्यमान हैं। और भगवान श्रीकृष्ण इन्हीं गोप और गोपियों को लेकर अपनी लीलाऐं किया करते हैं।

(गोप और गोपियों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा से कैसे और कब हुई ? इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी इस पुस्तक के अध्याय (४) में दी गई है वहाँ से इसकी जानकारी प्राप्त की सकती हैं।
             
अतः उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर सिद्ध होता है कि - "श्रीकृष्ण कथा" को केवल गोप और गोपियाँ ही भावपूर्ण विधि से कह सकते हैं, जो मानवीय रूप में भूतल पर बहुतायत संख्या में विद्यमान हैं। अतः सम्यक तर्कों से सिद्ध होता है कि- "श्रीकृष्ण कथा कहने के लिए केवल गोप [आभीर] विद्वान ही पात्र हो सकते हैं।

क्योंकि उनके मन- मस्तिष्क में जन्म जन्मान्तर से श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण चरित्र एवं गुणों का ज्ञान सुषुप्तावस्था में विद्यमान है। बस आवश्यकता है- उन्हें श्रीकृष्ण का ध्यान व योग से उस सुषुप्त ज्ञान को अपने अन्त:करण में प्रकाशित करने की। और जिस क्षण वह ज्ञान, गोप और गोपियों में प्रकाशित होगा, उसी क्षण वह श्रीकृष्ण कथा कहने के लिए पात्र हो जाएँगे। चाहे वह गोप हो या गोपी। इनके अतिरिक्त भू-तल पर सम्पूर्ण श्रीकृष्ण कथा कोई नहीं कह सकता भले ही वह कितना ही बड़ा कथावाचक क्यों न हो जाए।

क्योंकि इस बात को ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अध्याय- (९४) के श्लोक-(८२)और (८३) में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि -

"कृष्णभक्तिं विजानाति योगीन्द्रश्च महेश्वरः।
राधा गोप्यश्च गोपाश्च गोलोकवासिनश्च ये।८२।

किञ्चित्सनत्कुमारश्च ब्रह्मा चेद्विषयी तथा।
किञ्चिदेव विजानन्ति सिद्धा भक्ताश्च निश्चितम् ।८३।
                        

अनुवाद - ८२-८३
• श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूपेण योगीराज महेश्वर, राधा, गोलोकवासी और गोप-गोपियाँ ही जानतीं हैं। ब्रह्मा और सनत्कुमारों को कृष्ण भक्ति का कुछ ही ज्ञान है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं।८२-८३। 

✳️ किन्तु प्रश्न यह है कि गोलोक के ये गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा की इतनी सारी विशेषताओं को लिए हुए भूतल पर कैसे आये ? क्या वास्तव में गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समरूप हैं ? क्या गोलोकवासी गोप ही भूतल के गोप,आभीर और यादव हैं ? गोपों के अतिरिक्त अन्य कोई सम्पूर्ण श्रीकृष्ण कथा क्यों नहीं कह पाता ? ऐसे ही बहुत सारे प्रश्न और विचार मन में अवश्य उठ रहे होंगे। अतः इन सभी का समाधान किए बिना यह प्रसंग अधूरा रहेगा।

तो इस सम्बन्ध में सबसे पहले गोप और गोपियों की उत्पत्ति और उनके वास्तविक स्वरूप एवं स्थिति इत्यादि के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी इस पुस्तक के अध्याय- (४) में दी गई है, किन्तु उसे संक्षेप में यहाँ भी बताना आवश्यक है।

गोपों की उत्पत्ति या जन्म के बारे में स्पष्ट रूप से वर्णन- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(५) के श्लोक संख्या-( ४० और ४२) में वर्णन मिलता है, जिसमें लिखा गया है कि -

तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः।
आविर्बभूव  रूपेण वेशेनैव  च  तत्समः।४०।

कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः।४२।

अनुवाद - ४० से ४२
• फिर तो उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।

• उसी क्षण श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।

✳️ ज्ञात हो यह बात गोलोक की है, जहाँ सर्वप्रथम गोप और गोपियों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोमकूपों अर्थात् उनकी सूक्ष्मतम इकाई कोशिकाओं से क्लोन विधि ( समरूपण विधि ) से हुई। इसलिए सभी गोप श्रीकृष्ण के समरूप तथा सभी गोपियों श्रीराधा के समरूपिणी उत्पन्न हुईं।

इस बात को आज विज्ञान भी स्वीकारता है कि-समरूपण अर्थात क्लोनिंग विधि से उत्पन्न जीव उसी के समान रूप वाला होता है, जिससे उसकी क्लोनिंग की गई होती है। इसके साथ ही उसके गुण, ज्ञान और व्यवहार भी उसी के अनुरूप होते हैं।
यह ध्रुव सत्य है कि कालान्तरण में जलवायु और तापमान के न्यूनाधिक अनुपातीय प्रभाव से स्थान परिवर्तन होने से गोप गोपियों की अर्वाचीन सन्तानें बाह्य शारीरिक रूप से परस्पर भिन्न हो गयी हैं परन्तु उनकी प्रवृत्तियाँ अब भी समान व प्राचीनतर हैं।

किन्तु सवाल यह है कि- गोलोक के ये गोप और गोपियाँ भूतल पर कैसे और क्यों आये?

तो इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से जब भी भू-तल पर भूमि भार हरण के लिए अवतरित होते हैं, तो वे अपने समस्त गोप-गोपियों के साथ ही गोपकुल में गोपों के यहाँ ही अवतरित होते हैं।

इसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(६) से होती है जिसमें देवों के निवेदन पर गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने समस्त गोप-गोपियों को बुलाकर कहते हैं-

जनुर्लभत गोपाश्च गोप्यश्च पृथिवीतले।।
गोपानामुत्तमानां च मन्दिरे मन्दिरे शुभे।६९।।

अनुवाद - भगवान श्रीकृष्ण ने कहा -गोप और गोपियों ! तुम सब भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ घर-घर में जन्म लो ।

तब श्रीकृष्ण का आदेश पाकर सभी गोप-गोपियाँ भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ-शुभ घरों में अवतरित हुए। इसकी पुष्टि- उस समय होती है, जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भू-तल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्री कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(११ ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहते हैं कि -

"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।
गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्‌भवाः।२१।

"राधारोमोद्‌भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।


अनुवाद-नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं जो गोकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक के गोपालगण (आभीर) जो साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियाँ जो श्रीराधा के रोमकूप से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ (भूतल के ) व्रज में उतर आईं हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं हैं।२१-२२।

इसी तरह से समस्त गोलोकवासी गोप जो कभी श्रीकृष्ण के अंश से गोलोक में उत्पन्न हुए थे उन सभी को भू-तल पर गोपकुल के यादव वंश में भगवान श्रीकृष्ण के ही अंश रूप में अवतरित या जन्म लेने की पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजित्खण्ड के अध्याय (२) के श्लोक- ७ से होती है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण यादवों के विश्वजीत युद्ध होने से पहले उग्रसेन से कहते हैं-

ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥

अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अँश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्‍छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्‍पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।७।

अतः उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट हुआ कि समस्त गोलोकवासी गोप जो कभी गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से या कहें उनके अँश से उत्पन्न हुए थे, वे सभी भूतल पर गोपजाति के यादव वंश में श्रीकृष्ण के ही अँश से यदुवंश के एक सौ एक कुलों में प्रकट हुए हैं। ऐसी बात भगवान श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में स्वयं कही हैं कि "समस्त यादव मेरे ही अँश से प्रकट हुए हैं"।

इतने प्रमाणों के बाद अब कोई यह नहीं कहेगा कि गोलोकवासी" गोप-गोपियाँ- भूतल की गोप-गोपियाँ नहीं हैं।

किन्तु एक बात अभी भी कुछ लोग कह सकते हैं कि- क्या प्रमाण है कि भूतल के गोप-गोपियों को श्रीकृष्ण भक्ति का पूर्णरूपेण ज्ञान है और वे ही लोग श्रीकृष्ण कथा कहने के पात्र हैं?

तो इसका सीधा उत्तर है कि जो गोप-गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा के अँश से या कहें उनके रोम कूपों अर्थात् उनके क्लोन से उत्पन्न हुए हों और उनका सहचर बनकर सदैव सन्निकट रहते हों, तथा उनके ही साथ भूतल पर आते-जाते हों और उनके प्रत्येक कार्यों में एक साथ मिलकर हाथ बँटाते हों, तो ये गोप-गोपियाँ श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण गुणों और रहस्यों को नहीं जानेंगे, तो क्या ब्रह्माजी के मानस पुत्र, देव और देवियाँ या ब्रह्मा जी के- मुख, हाथ, पेट और पैर से उत्पन्न चातुर्वर्ण्य के लोग जानेंगे ?
निश्चित रूप से इसका जवाब होगा- नहीं। क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि जितना एक पुत्र अपनी माता-पिता के जितने गुणों को लेकर जन्म धारण करता है, और उनके अनुरूप ही व्यवहार करते हुए अपने माता-पिता के गुण, ज्ञान और व्यवहार के बारे में जानता है, शायद ही दूसरा कोई  जानता होगा। इसी को विज्ञान की भाषा में आनुवांशिक गुण कहा जाता है जो माता-पिता से स्वाभाविक और पैतृक रूप से  प्राप्त होते हैं।

शायद इन्हीं सब कारणों से ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय- (९४) के श्लोक-( ८२) और (८३) में लिखा गया है कि-

कृष्णभक्तिं विजानाति योगीन्द्रश्च महेश्वरः।
राधा गोप्यश्च गोपाश्च गोलोकवासिनश्च ये।८२।।

किञ्चित्सनत्कुमारश्च ब्रह्मा चेद्विषयी तथा।
किञ्चिदेव विजानन्ति सिद्धा भक्ताश्च निश्चितम्।८३।।        

                                  
अनुवाद - ८२-८३
• श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूपेण योगीराज महेश्वर, राधा तथा गोलोकवासी और गोप- गोपियाँ ही जानती हैं।
• ब्रह्मा और सनत्कुमारों को कुछ ही ज्ञात है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं।८३।  

ज्ञात हो उपर्युक्त श्लोक -(८२) में गोपों के बारे में जो बात लिखी गई है कि- श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूपेण गोप और गोपियाँ ही जानती हैं। वह बिल्कुल वैज्ञानिक आधार पर ही लिखी गई है क्योंकि सभी गोप-गोपियाँ श्रीकृष्ण की कोशिकाओं (रोमकूपों) अर्थात् उनके क्लोन यानी समरूपण से उत्पन्न हुए हैं। जिसको ऊपर बताया जा चुका है।

श्रीकृष्ण और श्रीराधा के द्वारा समरूपण विधि से उत्पन्न होने से ही सभी गोप-गोपियाँ रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समान हुए थे। परन्तु आज उनमें अनेक संक्रमणों से विकृतियाँ हुईं हैं। फिर भी  वे गोप अल्प मनस्-साधनाओं के द्वारा श्रीकृष्ण कथा की पात्रता प्राप्त कर सकते हैं।

इस बात को ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(५) के श्लोक संख्या- ४० और ४२ के आधार पर ऊपर बताया गया है। इसी गुण विशेष के कारण ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय- (९४ के श्लोक- ८२ में यह बात लिखी गई है कि-"श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूपेण गोप और गोपियाँ ही जानतीं हैं। जो वैज्ञानिक आधार पर ध्रुव सत्य है।

गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण के पूर्ण मर्म को इस लिए भी जानती हैं क्योंकि गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय-(५९) में गोपेश्वर श्रीकृष्ण के एक हजार (१०००) नामों को बताया गया है। उसमें श्लोक- (५४, ५८ और ७२) में तीन (३) ऐसे नाम को बताया गया हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि श्रीकृष्ण गोप और गोपिकाओं को व्यक्तिगत रूप से रहस्यमयी ज्ञान दिया करते थे, जो दूसरों के लिए अति दुर्लभ एवं असम्भव है। इसीलिए श्रीकृष्ण को *"गोपिकाज्ञानदेशी"  *"रह गोपिकाज्ञानदो,"- "ज्ञानदो यादवानां," तथा "गोपमुख्यं," नाम से भी जाना जाता है। इसके लिए निम्नलिखित श्लोक देखें -

गुरोः पुत्रदो ब्रह्मविद्ब्रह्मपाठी 
महाशङ्‌खहा दण्डधृक्पूज्य एव ।
व्रजे ह्युद्धवप्रेषितो गोपमोही
यशोदाघृणी गोपिकाज्ञानदेशी *॥५४॥

✴️ गोपिकाज्ञानदेशी- अर्थात्= गोपिकाओं को ज्ञान देने वाला।

स्तुतो देवकीरोहिणीभ्यां सुरेन्द्रो
     रहो गोपिकाज्ञानदो * मानदश्च ।
 तथा संस्तुतः पट्टराज्ञीभिराराद्-
     धनी लक्ष्मणाप्राणनाथः सदा हि ॥८८॥

✴️ रह गोपिकाज्ञानदो- अर्थात्=  गोपिकाओं को रहस्यमयी ज्ञान देने वाले।

नृगं मुक्तिदो ज्ञानदो यादवानां *
     रथस्थो व्रजप्रेमपो गोपमुख्यः* ।
 महासुन्दरीक्रीडितः पुष्पमाली
     कलिन्दाङ्‌गजाभेदनः सीरपाणिः ॥ ७२ ॥

✴️ ज्ञानदो यादवानां - अर्थात्= यादवों को ज्ञान व मुक्ति  देने वाले।
✴️ गोपमुख्यः - अर्थात्= गोप शिरोमणि।

इसी ध्रुव सत्य के कारण श्रीकृष्ण कथा के वास्तविक अधिकारी केवल गोप और गोपियाँ हैं बाकी कोई नहीं।

किन्तु इसका मतलब यह नहीं हुआ कि श्रीकृष्ण कथा के लिए सभी गोप-गोपियाँ पात्र हैं। इसका मतलब यह हुआ कि श्रीकृष्ण कथा कहने के केवल वहीं गोप और गोपियाँ पात्र हो सकतीं हैं, जिन्होंने भक्ति, तप और योग साधना से भगवान श्रीकृष्ण के जनेटिक गुणों को अपने अन्दर जागृत कर श्रीकृष्ण का तत्व ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जो उनके अन्दर पहले से ही आनुवाँशिक रूप से विद्यमान है। क्योंकि सभी गोप श्रीकृष्ण के क्लोन से उत्पन्न हुए हैं इस लिए उनके अन्दर श्रीकृष्ण का तत्व गुण पहले से ही आनुवंशिक रूप में सुषुप्तावस्था में विद्यमान रहता है, बस उसे जगाने की जरूरत है।
✳️ किन्तु ध्यान रहे- धूर्त, अज्ञानी, पाखण्डी और छद्मवेषधारी, श्रीकृष्ण गुणों से रहित "गोप-गोपियाँ" कभी भी श्रीकृष्ण कथा के अधिकारी नहीं हो सकते हैं। अर्थात
श्रीकृष्ण कथा कहने का वास्तविक अधिकारी केवल श्रीकृष्ण तत्व-ज्ञानी गोप और गोपियाँ ही हो सकतें हैं, अज्ञानी गोप नहीं।
            
तब पुनः प्रश्न उठता है कि क्या श्रीकृष्ण तत्व ज्ञानी गोपों के अतिरिक्त और कोई श्रीकृष्ण कथा नहीं कह सकता ? तो इसका जवाब है अवश्य कह सकता हैं किन्तु वह श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण चरित्रों का वर्णन नहीं कर पाएगा क्योंकि वह जब भी श्रीकृष्ण कथा कहेगा तो वह अल्प ज्ञान से ही कथा कहते हुए कभी भगवान श्रीकृष्ण को बहेलिया से मारें जाने की बात कहेगा, तो कभी गान्धारी और ऋषियों द्वारा श्रीकृष्ण को शापित होने की बात बताएगा। इसके अतिरिक्त वह यह भी बताएगा कि- श्रीकृष्ण की उत्पत्ति क्षुद्र विष्णु से हुई है। या वह यह कहेगा कि श्रीकृष्ण ही विष्णु हैं और विष्णु ही श्रीकृष्ण हैं। क्योंकि उसे विष्णु और श्रीकृष्ण में भेद का ज्ञान ही नहीं है किस विष्णु को श्रीकृष्ण कहा जाता है। इसके अतिरिक्त वह परंप्रभु श्रीकृष्ण के अतिरिक्त तरह-तरह के देव-देवियों को पूजने की बात कहेगा। क्योंकि हमने आजतक जिस किसी कथावाचक की कथा सुनी हैं, सभी ने उपर्युक्त बातों को ही बताया है। इससे अधिक वे कुछ नहीं बता पाये।
उनकी कथाओं में हमने कभी भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप के बारे में नहीं सुना। जिसे हमने इस पुस्तक के अध्याय- २-३ और ४ में विस्तार पूर्वक बताया है। ऐसे में जो कथावाचक अपनी कथाओं में आधी-अधूरी और अल्प ज्ञान से आवेशित होकर श्रीकृष्ण कथा कहते हैं। उनका अन्ततोगत्वा क्या परिणाम होता है ? इसके लिए अगला प्रसंग देखें।


[झ] - गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणामों का वर्णन-

शास्त्रों में यह विधान पारित किया गया है कि गलत कथा या आधी अधूरी कथा कहने वाले नरक के भागी होते हैं। इस बात की पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड उत्तरार्द्ध- के अध्याय -(८५) के कुछ प्रमुख श्लोकों में मिलता है जो नन्द बाबा और श्रीकृष्ण संवाद के रूप में वर्णित है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण नन्द बाबा के पूछे जाने पर, गलत कर्म करने वाले एवं धूर्त कथावाचकों के विषय में कहते हैं कि-
                                    
'कविः प्रहर्ता विदुषां माण्डूकः सप्तजन्मसु।
असत्कविर्ग्रामविप्रो नकुलः सप्तजन्मसु।१९२।  
                                         
कुष्ठी भवेच्च जन्मैकं कृकलासस्त्रिजन्मसु।
जन्मैकं वरलश्चैव ततो वृक्षपिपीलिका।१९३।                                            
ततः शूद्रश्च वैश्यश्च क्षत्रियो ब्राह्मणस्तथा।
कन्याविक्रयकारी च चतुर्वर्णो हि मानवः।१९४।  
               
सद्यः प्रयाति तामिस्रं यावच्चन्द्रदिवाकरौ।
ततौ भवति व्याधश्च मांसविक्रयकारकः।१९५।      
ततो व्याधि(धो)र्भवेत्पश्चाद्यो यथा पूर्वजन्मनि।
मन्नामविक्रयी विप्रो न हि मुक्तो भवेद् ध्रुवम्।१९६।
                    
मृत्युलोके च मन्नामस्मृतिमात्रं न विद्यतेः ।
पश्चाद्भवेत्स गो योनौ जन्मैकं ज्ञानदुर्बलः।१९७।                           
ततश्चागस्ततो मेषो महिषःसप्तजन्मसु।
महाचक्री च कुटिलो धर्महीनस्तु मानवः।१९८।
                   

अनुवाद- (१९२-१९८)
• विद्वानों के कवित्व (विद्वत्ता) पर प्रहार करने वाला सात जन्मों तक मेंढक होता है। और जो झूठे ही अपने को विद्वान कहकर गाँवों की पुरोहितायी और शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करता है; वह सात जन्मों तक नेवला होता है। १९२।
• और वह एक जन्म में कोढ़ी और तीन जन्मों तक गिरगिट होता है, फिर एक जन्म में बर्रे (ततैया) होने के बाद वह वृक्ष की चींटी (माटा / दींमक) होता है।१९३।
•  उसके बाद क्रमश: शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण बनता है, और इन चारो वर्णों मे कन्या बेचने वाला तथा मेरे नाम (श्रीकृष्ण) को बेचने वाला ब्राह्मण (विप्र) भी कभी मुक्ति को प्राप्त नहीं करता- यह ध्रुव सत्य है।१९४।
•  तथा मेरे नाम (श्रीकृष्ण) को बेचने वाला (मेरे नाम पर धन्धा चलाने वाला) कथावाचक (पुरोहित) शीघ्र ही तामिस्र नरक में जाता है और तब-तक रहता है जब तक सूर्य तथा चन्द्रमा रहते है। उसके बाद मांस बेचने वाला बहेलिया बनता है।१९३।
• फिर उसे पूर्व जन्म के कर्म- संस्कारों के कारण बीमारी घेरती है। और मेरे नाम को बेचने वाले (मेरे नाम पर धन्धा चलाने वाले) पुरोहितों (कथावाचकों ) की मुक्ति नहीं होती- यह ध्रुव सत्य है।१९६।
• मृत्युलोक में जिसके ध्यान में मेरा नाम (श्रीकृष्ण) आता ही नहीं; वह अज्ञानी एक जन्म में गाय का बछड़ा बनकर जन्म लेता है।१९७।
• इसके बाद बकरा, फिर मेढ़ा और सात जन्मों तक भैंसा होता है। इस प्रकार बहुत से चक्कर लगाते (महाचक्री) हुए वह जो षड्यन्त्र रचने में बहुत प्रवीण हो, कुटिल धर्म से हीन मानव बनता है।१९८।

अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जो अपने आप ही विद्वान समझकर स्वार्थ व धनार्जन के लिए अल्पज्ञान से भगवान श्रीकृष्ण की ग़लत व झूठी कथा कहता है, वह अन्ततोगत्वा नरकगामी होता है। ऐसी बात शास्त्रों में लिखी गयी है।


[ञ]-सच्चे गुरु की पहचान-  

इसीलिए किसी ऐसे गुरु को चुनना चाहिए जो तत्व ज्ञानी हो, श्रीकृष्ण के प्रति भक्तिभाव उत्पन्न करने वाला हो, गुरुमन्त्र नहीं बल्कि कृष्णमन्त्र देने वाला हो। जो शिष्यों से स्वयं को न पुजवाकर परमेश्वर को पूजने की बात कहता हो, यदि ऐसा गुरु मिल जाए तो उसे गुरु मानकर ज्ञान अवश्य लेना चाहिए। सच्चे गुरु, भाई, बन्धु , माता-पिता की कुछ ऐसी ही विशेषताऐं देवीभागवतपुराण-स्कन्धः (९) अध्याय (४८)- के अध्याय -(४६) में बताईं गई है। जो इस प्रकार है-

यो बन्धुश्चेत्स च पिता हरिवर्त्मप्रदर्शकः।
सा गर्भधारिणी या च गर्भावासविमोचनी॥६५।

दयारूपा च भगिनी यमभीतिविमोचनी।
विष्णुमन्त्रप्रदाता च स गुरुर्विष्णुभक्तिदः॥६६।

गुरुश्च ज्ञानदो यो हि यज्ज्ञानं कृष्णभावनम्।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं ततो विश्वं चराचरम्॥६७।

आविर्भूतं तिरोभूतं किं वा ज्ञानं तदन्यतः।
वेदजं यज्ञजं यद्यत्तत्सारं हरिसेवनम्॥६८।

तत्त्वानां सारभूतं च हरेरन्यद्विडम्बनम्।
दत्तं ज्ञानं मया तुभ्यं स स्वामी ज्ञानदो हि यः॥६९।

ज्ञानात्प्रमुच्यते बन्धात्स रिपुर्यो हि बन्धदः।
विष्णुभक्तियुतं ज्ञानं नो ददाति च यो गुरुः॥७०।

स रिपुः शिष्यघाती च यतो बन्धान्न मोचयेत् ।
जननीं गर्भजक्लेशाद्यमयातनया तथा॥७१।

न मोचयेद्यः स कथं गुरुस्तातो हि बान्धवः।
परमानन्दरूपं च कृष्णमार्गमनश्वरम्॥७२।

            
अनुवाद- ६५-७२
भगवत्प्राप्ति का मार्ग दिखाने वाला बन्धु ही सच्चा पिता है। जो आवागमन (गर्भवास) से मुक्त कर देनेवाली है, वही सच्ची माता है। वही बहन दयास्वरूपिणी है, जो यम के त्रास (भय) से छुटकारा दिला दे।  गुरु वही है, जो  श्रीकृष्ण का मन्त्र प्रदान करनेवाला तथा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति उत्पन्न करने वाला हो।६५-६६।

• ज्ञानदाता गुरु वही है, जो भगवान् श्रीकृष्ण का चिन्तन कराने वाला ज्ञान प्रदान करे; क्योंकि तृण से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त चराचर सम्पूर्ण विश्व आविर्भूत (उत्पन्न) होकर पुनः विनष्ट होने वाला है, तो फिर अन्य वस्तु से ज्ञान कैसे हो सकता है ? वेद अथवा यज्ञ से जो भी सारतत्त्व निकलता है, वह भगवान् श्रीहरि की सेवा ही है।६७-६८।
• यही हरिसेवा समस्त तत्त्वों का सारस्वरूप है, भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा के अतिरिक्त अन्य सब कुछ विडम्बना है। मेरे द्वारा जो ज्ञान तुमको  दिया गया है। ज्ञानदाता स्वामी वही है जो ज्ञान के द्वारा बन्धन से मुक्त कर देता है वही बन्धु है। और जो बन्धन में डालता है, वह शत्रु है। जो भगवान् विष्णु (स्वराट विष्णु) अर्थात् मेरे में भक्ति उत्पन्न करनेवाला ज्ञान नही देता वह गुरु भी शत्रु ही है।६९-७०।
• वह गुरु शत्रु और शिष्यघाती ही है जो बन्धन से मुक्त नहीं करता है। जो जननी के गर्भजनित कष्ट तथा यम-यातना से मुक्त न कर सके; उसे गुरु, तात तथा बान्धव कैसे कहा जाय ? जो बन्धन से मुक्त नहीं करे, और जो भगवान् श्रीकृष्ण के परमानन्दस्वरूप सनातन मार्ग का निरन्तर दर्शन नहीं कराता हो।७१-७२।
            
उपर्युक्त  श्लोकों में जो गुरु की विशेषताऐं बताईं गई हैं- (वह गुरु शिष्यघाती है जो अपने ज्ञान से शिष्यों को मोह-माया के बन्धन से मुक्त नहीं करता तथा परमानन्द स्वरूप सनातन मार्ग का निरन्तर दर्शन नहीं कराता।) वह बिल्कुल सत्य है। उसी के हिसाब से मनुष्य को गुरु का चयन करना चाहिए। पाखण्डी और छद्मवेषधारी गुरुओं को तुरन्त त्याग देना चाहिए। इसी में भलाई है नहीं तो फिर जग हँसाई है।

और यादव लोग तो वैसे भी पाखण्ड से सदैव दूर रहते हैं। इस बात की पुष्टि हरिवंशपुराण के विष्णु पर्व के अध्याय- (२२) के श्लोक (१४) से उस समय होती है जब कंस अपने समस्त यादवों को राज दरबार में बुलाकर कुछ  इस प्रकार कहता है-

अदम्भवृत्तयः सर्वे सर्वे गुरुकुलोषिताः ।
राजमन्त्रधराः सर्वे सर्वे धनुषि पारगाः।।१४ ।।

अनुवाद- आप (यादव) सब लोग पाखण्डपूर्ण वृत्ति से दूर रहते हैं। सबने गुरुकुल में रहकर शिक्षा पाई है। आप सब लोग राजा की गुप्त मन्त्रों को सुरक्षित रखने वाले तथा धनुर्वेद में पारंगत है।१४।

अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण कथा कहने का पात्र केवल ज्ञानी गोप और गोपियाँ ही है। इनके अतिरिक्त और किसी के द्वारा श्रीकृष्ण कथा कहने का तात्पर्य श्रीकृष्ण की अधूरी जानकारी देना है। यही कारण है कि गोपों के अतिरिक्त वर्तमान समय में जितने भी कथावाचक हैं, श्रीकृष्ण कथा कहते समय श्रीकृष्ण के साथ गोप और गोलोक की चर्चा नहीं कर पाते हैं। इसलिए उनके द्वारा की गई श्रीकृष्ण कथा अधूरी मानी जाती है। और इस सम्बन्ध में ऊपर बताया गया है कि कैसे आधी अधूरी श्रीकृष्ण कथा कहने वाले नरकगामी होते हैं।

इस प्रकार से परम-प्रभु परमेश्वर कौन हैं ? पूजा-अर्चना के वास्तविक विधि-विधान क्या है ? वास्तव में किसकी पूजा करनी चाहिए किसकी नहीं ? कथावाचकों द्वारा गलत कथा कहने के दुष्परिणाम तथा सही गुरु का चयन कैसे किया जाए ? इन सभी की जानकारीयों के साथ यह अध्याय समाप्त हुआ।

                 ★​ सारांश: ★

 अध्याय-प्रथम - पूजा-अर्चना का विधि-विधान एवं श्रीकृष्ण की सर्वोपरिता

​यह अध्याय मुख्य रूप से इस प्रतिपादन पर केन्द्रित है कि भगवान श्रीकृष्ण ही एकमात्र परिपूर्णतम परंब्रह्म (स्वराट विष्णु) हैं और अन्य सभी देवता (ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि) उनकी अंशभूत शक्तियाँ या कला-कलांश हैं।

१. परमेश्वर की पहचान और श्रीकृष्ण की सर्वोपरिता

  • निष्कर्ष: परमेश्वर को निर्गुण, सगुण, साकार या निराकार जैसे सीमित विशेषणों में नहीं बाँधा जा सकता। शास्त्रानुसार भगवान श्रीकृष्ण ही वह परम सत्ता हैं जो प्रलयकाल में निराकार और सृष्टिकाल में साकार रूप धारण करते हैं।
  • आधार: गीता और ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्लोकों के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि सृष्टि के समस्त सञ्चालक (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) श्रीकृष्ण की लीलाओं के अंश मात्र हैं।

२. पूजा का उद्देश्य और फल

  • देव-पूजा बनाम श्रीकृष्ण-भक्ति: अध्याय स्पष्ट करता है कि अन्य देवताओं (शिव, विष्णु, देवी आदि) की पूजा का फल सीमित, क्षणिक और नाशवान (पुनर्जन्म देने वाला) होता है। देव-पूजक देवलोक जाते हैं, लेकिन आवागमन से मुक्त नहीं होते।
  • मोक्ष का मार्ग: मोक्ष केवल श्रीकृष्ण की भक्ति से ही सम्भव है, क्योंकि उनके धाम (गोलोक) में जाने के बाद भक्त आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।

३. कथावाचन का अधिकार और दुष्परिणाम

  • पात्रता: श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों को पूर्णतः जानने वाले केवल शिव, राधा, गोलोकवासी और गोप-गोपियाँ हैं। अतः, श्रीकृष्ण कथा कहने के वास्तविक अधिकारी केवल वे 'गोप' (आभीर/यादव) हैं जिन्होंने योग और तप से अपने अन्तःकरण में श्रीकृष्ण-तत्व को जागृत किया है।
  • पाखण्ड का निषेध: स्वार्थवश श्रीकृष्ण की आधी-अधूरी या गलत कथा कहने वाले कथावाचकों को शास्त्रों में "नरकगामी" बताया गया है।

४. सच्चे गुरु की कसौटी

  • गुरु का लक्षण: सच्चा गुरु वह है जो कृष्ण-मन्त्र दे, शिष्य को माया के बन्धन से मुक्त करे और उसे श्रीकृष्ण के सनातन मार्ग का निरन्तर दर्शन कराए।
  • त्याग: जो गुरु मोह-माया में उलझाकर रखे या स्वयं को पूजवाए, वह शिष्य का शत्रु और घातक है।

समीक्षात्मक टिप्पणी

  1. सैद्धान्तिक दृष्टिकोण: यह पाठ 'भक्ति-मार्गी' और 'श्रीमद्भागवत्/ब्रह्मवैवर्तपुराण' पर आधारित है। इसका मूल स्वर "एकेश्वरवाद" (Monotheism) है, जहाँ श्रीकृष्ण को केन्द्र में रखकर अन्य देवताओं को उनके अधीन प्रतिपादित किया गया है।
  2. विश्लेषणात्मक शैली: लेखक ने विभिन्न पुराणों (ब्रह्मवैवर्त, देवीभागवत, गर्गसंहिता) और गीता के श्लोकों का चयन कर अपने तर्क को पुष्ट करने का प्रयास किया है। वैज्ञानिक शब्दावली (जैसे- क्लोनिंग विधि, आनुवंशिक गुण) का उपयोग प्राचीन धार्मिक अवधारणाओं को आधुनिक संदर्भ में समझाने के लिए किया गया है।
  3. चेतावनी का स्वर: अध्याय में कथावाचकों और गुरुओं के चयन को लेकर कड़े निर्देश दिए गए हैं। यह समाज में व्याप्त धार्मिक आडंबरों और व्यावसायिक कथा-वाचन के प्रति एक तीव्र आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
  4. निष्कर्ष: अध्याय का केंद्रीय संदेश यह है कि "ईश्वर एक है और वह श्रीकृष्ण हैं"। अन्य समस्त पूजा-पद्धतियाँ केवल सोपान (सीढ़ियाँ) मात्र हैं, जबकि लक्ष्य केवल श्रीकृष्ण का सान्निध्य और गोलोक की प्राप्ति है।

​यह अध्याय भक्त और जिज्ञासु के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश के रूप में लिखा गया है, जो उन्हें धार्मिक भ्रमजाल से बचाकर 'श्रीकृष्ण-तत्व' की ओर ले जाने का प्रयास करता है।

अब इसके अगले अध्याय- (दो) में जानकारी दी गई है कि- "श्रीकृष्ण का स्वरूप और उनका गोलोक धाम कैसा है और कहाँ स्थापित है"?।