भाग-(३) यादवों का वंश।
जाति और वंश में बस इतना ही अन्तर है कि जाति एक सामूहिक नाम है और वंश उस जाति समूह का व्यक्तिगत नाम है। वास्तव में देखा जाए तो वंश- दो प्रकार के होते हैं।
(१) प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश।
(२) टोटम या आध्यात्मिक वंश
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(१) प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश-:
जब किसी जाति के अन्तर्गत किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर सर्वप्रथम पहचान स्थापित होती है तो उस व्यक्ति के नाम पर उस जाति का एक वंश स्थापित होता है। इस तरह के वंश को प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश कहा जाता है।
इस तरह के वंश के लिए कोई आवश्यक नहीं है कि वह विशेष व्यक्ति जिसके नाम पर वंश बना है, वह राजा ही हो। क्योंकि ऐसे बहुत से वंश हैं जो किसी ऋषि-मुनि के नाम से ही बनें हैं। जैसे ब्राह्मण जाति में जो वंश बनें हैं वे सभी किसी न किसी ऋषि मुनि के नाम से ही हैं।
इस तरह के वंश में उस जाति का( Blud rilative) ब्लड रिलेशन होता है।
जैसे यादवों का वंश "यदुवंश" सर्वप्रथम महाराज यदु से स्थापित हुआ जिसमें यादवों का ब्लड रिलेशन है। इसके बारे में आगे विस्तार से बताया गया है।
(२) टोटम या आध्यात्मिक वंश -:
टोटम किसी समूह के लोगों का प्रतीक होता है, जैसे कि परिवार, कबीला, वंश या जनजाति. यह एक पवित्र वस्तु, आत्मिक प्राणी या प्रतीक हो सकता है.
गणचिह्नवाद या टोटम प्रथा (totemism) किसी समाज के उस विश्वास को कहतें हैं जिसमें मनुष्यों का किसी जानवर, वृक्ष, पौधे या अन्य आत्मा से सम्बन्ध माना जाए। 'टोटम' शब्द ओजिब्वे (Ojibwe) नामक मूल अमेरिकी आदिवासी क़बीले की भाषा के 'ओतोतेमन' (ototeman) से लिया गया है, जिसका मतलब 'अपना भाई/बहन रिश्तेदार' है। इसका मूल शब्द 'ओते' (ote) है जिसका अर्थ एक ही माँ के जन्में भाई-बहन हैं जिनमें ख़ून का रिश्ता है और जो एक-दूसरे से विवाह नहीं कर सकते। अक्सर टोटम वाले जानवर या वृक्ष का उसे मानने वाले क़बीले के साथ विशेष सम्बन्ध माना जाता है और उसे मारना या हानि पहुँचाना वर्जित होता है,
जब किसी जाति के लोग सामूहिक रूप से किसी प्राकृतिक वस्तु जैसे तारे, ग्रह या उपग्रह को आध्यात्मिक प्रतीक या चिन्ह के रूप स्वीकार करते हुए उसको अपना ईष्ट देव मानकर उसी के नाम पर अपना एक वंश स्थापित करते हैं तो इस तरह के वंश को टोटम या आध्यात्मिक वंश कहा जाता है। इस तरह के वंश में उस जाति का किसी भी तरह से ब्लड रिलेशन नहीं होता है। जैसे चंद्रवंश और सूर्यवंश।
हो सकता है कि जो लोग अपने को सूर्यवंशी मानते हों उनका सूर्य से ब्लड रिलेशन होता होगा किन्तु जितने चन्द्रवंशी हैं उनका चन्द्रमा से ब्लड रिलेशन नहीं है।
क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि तारे और ग्रहों से पुत्र इत्यादि पैदा करके किसी जाति की जन्मगत वंशावली बताकर उनमें ब्लड रिलेशन स्थापित करना महामूर्खता होगी क्योंकि चन्द्रमा कोई मानव नहीं है कि उससे पुत्र या पुत्री उत्पन्न होंगी। वह एक आकाशीय पिण्ड है इसलिए चन्द्रमा से पुत्र इत्यादि उत्पन्न करना अवैज्ञानिक एवं कोरी कल्पना ही है। जिसे वर्तमान समय में किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसा वंश अर्थात् आकाशीय पिण्डों वाला वंश केवल आस्था, टोटम और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही स्वीकार्य किये जा सकतें हैं। इसी आस्था और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यादवों का प्रथम वंश "चन्द्रवंश" हुआ है। किन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि यादव चन्द्रमा से उत्पन्न हुए हैं। जबकि इस सम्बन्ध में वास्तविकता यह है कि सभी यादव चन्द्रमा से नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुए हैं। इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता विश्वजित्खण्ड के अध्यायः (२) के श्लोक संख्या- ७ से है जिसमें भगवान श्री कृष्ण उग्रसेन से कहते हैं-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। ७।
अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि समस्त यादवों की उत्पत्ति चन्द्रमा से नहीं बल्कि श्रीकृष्ण से हुई है।
और जिस तरह से यादवों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण से हुई, उसी तरह से प्रारम्भिक काल में चन्द्रमा की भी उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश से उत्पन्न विराट विष्णु से हुई। इसकी पुष्टि ऋग्वेद के १०/९०/१३ की ऋचा से होती है जिसमें लिखा गया है कि -
चन्द्रमा मनसो जातश्वक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्रणाद्वायुरजायत।।१३।
अर्थात् - परमात्मा-रूपी पुरुष के मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, उसके चक्षु से सूर्य, श्रोत्र से वायु और प्राण तथा मुख से अग्नि, उत्पन्न हुई।
✳️ ज्ञात हो पूर्व काल से ही चन्द्रमा और यादवों की उत्पत्ति विशेष के कारण यादवों और चन्द्रमा में घनिष्ठ सम्बन्ध रहा। जिसके परिणाम स्वरूप यादवों ने भूतल पर चन्द्रमा को अपना प्रथम ईष्ट देव मानकर चन्द्रमा के नाम पर अपना आध्यात्मिक एवं प्राथमिक वंश "चन्द्रवंश" को स्थापित किया।
और हर द्वापर युग में भूतल पर इसी चन्द्रवंश में भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ करता है। इसकी पुष्टि- विष्णु पुराण के पञ्चंम अंश के अध्याय-२३ के श्लोक सं- २४ में कहते हैं कि-
कस्त्वमित्याह सोऽप्याह जातोऽहं शशिनः कुले।
वसुदेवस्य तनयो यदोर्वंशसमुद्भवः।।२४।
अनुवाद - मैं चन्द्रवंश के अंतर्गत यदुकुल में वसुदेव जी के पुत्र रूप से उत्पन्न हुआ हूँ।
और आगे चलकर इसी चन्द्रवंश में महाराज यदु के नाम पर यदुवंश का उदय हुआ जिसके समस्त सदस्यपत्तियों को यादव कहा जाता है। इसकी पुष्टि-
विष्णु पुराण के चौथे अंश के अध्याय- ग्यारह के श्लोक २८ से ३० से होती है, जिसमें लिखा गया है कि -
यतो वृष्णिसंज्ञामेतद् गोत्रमवाप।। २८।।
मधुसंज्ञाहेतुश्च मधुरभवत्।। २९।।
यादवाश्च यदुनामोपलक्षणादिति।। ३०।।
अनुवाद - २८-३०
मधु के कारण इसकी संज्ञा मधु हुई और यदु के नामानुसार इस वंश के लोग यादव कहलाए।
• जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण को चन्द्रवंश में अवतरित होने की पुष्टि होती है उसी तरह से उनको यादव वंश में भी अवतरित होने की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- २२ के पूर्वाद्ध से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को अहीर जाति के यादव वंश के गोकुल में जन्म लेने की पुष्टि- हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ से होती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों (आभीरों) में अवतार ग्रहण किया है।
(यादव वंश को विस्तार पूर्वक इस पुस्तक के अध्याय (७) में बताया गया है। जहाँ आपको यादवों के आदि पुरुष महाराज यदु का जीवन परिचय एवं यादव वंशावली की क्रमिक जानकारी मिलेगी।)
अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि आभीर जाति के विकास क्रम में चन्द्रवंश के अन्तर्गत यदुवंश का उदय हुआ। यदुवंश में भगवान श्रीकृष्ण को अवतरित होने से ही उन्हें यादव कहा गया जो उनकी वंश मूलक पहचान है। तथा उनको आभीर जाति में जन्म लेने से उन्हें आभीर कहा गया जो उनके जाति रूपी पहचान है। इसी क्रम में उन्हें गोपालन करने से उन्हें गोपाल और ग्वाला कहा गया जो उनकी वृत्ति अर्थात् व्यवसाय मूलक पहचान है। इसी तरह से उनकी कुल मूलक पहचान के लिए वार्ष्णेय कहा गया। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण सहित आभीरो को चाहे अहीर कहें, गोप- कहें , गोपाल कहें, ग्वाला कहें, या यादव कहें ,सब एक ही बात है।
अब हमलोग इसी क्रम में यादवों के कुल के बारे में जानेंगे। जो इस अध्याय के भाग (४) में वर्णित है।
भाग- (४) कुल
ज्ञात हो कि- कुल और गोत्र में बहुत अन्तर नहीं होता है। क्योंकि कुल और गोत्र दोनों ही रक्त सम्बन्ध के ही प्रतीक हैं। दोनों में केवल अंग और अंगी जैसा अन्तर है किन्तु दोनों का मूल आधार रक्त सम्बन्ध ही है। जिसमें गोत्र परिवारों एवं परिवारों का एक सामूहिक रूप है, जिसमें उनका एक जनन अर्थात् (Genetic) गोत्र होता है, जो सदैव निर्देशित करता है कि सात पीढ़ी तक एक ही कुल या परिवार में विवाह वर्जित है।
वास्तव में देखा जाए तो गोत्र नाम की आवश्यकता विवाह इत्यादि के समय होती है। बाकी अपनी पहचान इत्यादि के समय गोत्र और कुल का नाम एक ही सन्दर्भ में प्रयुक्त होता। इस भिन्नता को समझने की आवश्यकता है तभी भगवान श्रीकृष्ण सहित यादवों के जन्म और उनके कुल, गोत्र, वर्ण, और वंश व जाति की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो पाएगा। जैसे-
पौराणिक ग्रन्थों में कहीं-कहीं यादवों के वंश "यदुवंश" को ही "कुल" तथा कहीं-कहीं यादवों के वर्ण "वैष्णव" को कुल और कहीं पर यादवों के कुल "गोप कुल" को मुख्य कुल मानकर भगवान श्रीकृष्ण को भूतल पर जन्म लेने को बताया गया है। किन्तु सभी तरह से कही गई बातें एक ही है, इसको अच्छी तरह से समझनें की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित (तीन) उदाहरण प्रस्तुत है।
(१)- श्रीकृष्ण का जन्म यदु वंश में -
(क)- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) में सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदु के वंशज (वृष्णि) कुल में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर गोप रूप में लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करते रहोगे।१६१।
(ख)- गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक संख्या (४५) व (४६) में श्रीकृष्ण का जन्म यादवों के कुल वृष्णि में होने की पुष्टि होती है।
राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५।
भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।
अनुवाद - ४५-४६
• राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यदुओं ( यादवों) के वृष्णि नामक कुल में श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए है। अर्थात् यदु के एक सौ एक कुल हैं जिसमें वृष्णि कुल में कृष्ण का जन्म हुआ है ।४५।
• पृथ्वी का भार उतारने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४६।
(उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को यदुवंश के कुल में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं उन सभी को दोहराना उचित नही है।)
विशेष:- एक जाति में अनेक वंश और एक वंश में अनेक कुल ऱ एक कुल या गोत्र में अनेक परिवार होते हैं। यद्यपि कुल के लिए कभी कभी गोत्र शब्द एक विवाह में वर -वधु के रक्त विभेदक की भूमिका में महत्वपूर्ण होता है।
(२)- श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में -
(क)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है। जिसमें ब्रह्माजी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि-
अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
(ख)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -(४) के श्लोक संख्या- (२२) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है।
(३)- श्रीकृष्ण का जन्म गोप कुल या आभीर जाति में -
यादवत्राणकर्त्रे च शक्रादाभीररक्षिणे ।।
गुरुमातृद्विजानां च पुत्रदात्रे नमोनमः ।।१६।।
जरासंधनिरोधार्त नृपाणां मोक्षकारिणे ।।
नृगस्योद्धारिणे साक्षात्सुदाम्नोदैन्यहारिणे ।। १७।।
हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में श्रीकृष्ण का जन्म गोप जाति या आभीर जाति में होने को बताया गया है। जिसकी पुष्टि स्वयं श्रीकृष्ण ने ही किये हैं।
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
(हरिवंश पुराण उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को गोपजन्म विशेषण पद से गोपजाति में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही और भी बहुत से उदाहरण हैं।)
अतः भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से सम्बन्धित उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है किसी भी जाति में एक वंश होता है और वंश में अनेकों कुल और गोत्र होते हैं एक कुल में अनेक परिवार होते हैं।।
महाभारत काल में यादवों के कुलों की संख्या एक सौ से भी अधिक थी। उन सभी का एक ही मुख्य महाकुल था जिसका नाम था "वैष्णव महाकुल" इसी वैष्णव महाकुल में यादवों के अनेकों कुल- अन्धक, वृष्णि, कुकुर, भोज इत्यादि थे।
जिनको कुल या खानदान के नाम से जाना भी जाता था। इसकी पुष्टि- वायुपुराण के उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-(३४) के श्लोक- २५५ और २५६ से होती है।
कुलानि दश चैकञ्च यादवानां महात्मनाम्।
सर्व्वमककुलं यद्वद्वर्त्तते वैष्णवे कुले।२५५।
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।
अनुवाद:- २५५-२५६
• यादवों के एक सौ एक वैष्णव महाकुल हैं। उन सभी में स्वराट् विष्णु (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं।२५५।
• अर्थात् उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।
इसी तरह से मत्स्यपुराण के अध्यायः (४७) के श्लोक (२८)और (२९) में यादवों के मुख्य वैष्णव महाकुल में सौ से अधिक उपकुल होने को बताया गया है-
कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम् ।
सर्वमेतत्कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले।२८।
विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः।२९।
अनुवाद - २८-२९
• इन महाभाग यादवों के एक सौ एक कुल थे। जो सब-के सब श्रीकृष्ण से सम्बन्धित वैष्णव महाकुल के अन्दर ही विद्यमान थे।।२८।
• भगवान श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) उनके नेता और स्वामी थे। तथा वे सभी यादव श्रीकृष्ण की आज्ञा के अधीन रहते थे "ऐसा कहा जाता है।।२९।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि यादवों का एक मुख्य अथवा महाकुल है जिसका नाम है "वैष्णव महाकुल है।" इसी वैष्णव महाकुल में अनेकों उपकुल हैं जो वैष्णव नाम से ही जानें जातें हैं, क्योंकि उन सभी में प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित रहते हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं। इस बात की प्रमाणिकता के लिए नीचे वर्णित वायुपुराण उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-३४ के श्लोक- २५६ को देख सकते हैं-
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।
अनुवाद:- उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।
अब हमलोग इसके अगले भाग- (५) में यादवों के प्रमुख गोत्रों के बारे में जानेंगे कि यादवों में कितने प्रकार के गोत्र होते हैं।
भाग- (5) यादवों का गोत्र-
इस भाग का मुख्य उदेश्य किसी जाति के अन्तर्गत गोत्रों का निर्धारिण कब और कैसे होता है इस तथ्य की जानकारी देना है। इसी क्रम में यादवों के प्रमुख गोत्रों के बारे में भी जानकारी देना है कि यादवों में कितने गोत्र और उपगोत्र हैं ?
तो इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि किसी भी जाति में व्यक्ति का गोत्र मुख्यतः तीन प्रकार या कहें तीन तरह से स्थापित होता है-
(१)- जनन या (Genetic) गोत्र।
(२)- स्थानीय गोत्र।
(३)- गुरु गोत्र।
उपर्युक्त तीनों प्रकार के गोत्रों के बारे नीचे क्रमबद्ध रूप से बताया गया है।
(१)- जनन या (Genetic) गोत्र।
जनन गोत्र को मूल गोत्र भी कहा जाता है। शास्त्रों में जनन गोत्र को ही पिण्ड गोत्र कहा गया है। यह गोत्र अपने नाम की सार्थकता को सिद्ध करते हुए यह पहचान कराता है कि किसी व्यक्ति का जन्मगत आधार क्या है और उसकी प्रारम्भिक उत्पत्ति किससे हुई है। अर्थात उसके प्रथम जनक कौन हैं।
जनन गोत्र में किसी जाति के समस्त व्यक्तियों का रक्त सम्बन्ध होता है जिनके प्रत्येक सदस्यों की (D.N.A.) संरचना लगभग एक समान होती है।
डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (संक्षिप्त रूप में DNA) वह अणु है जो किसी जीव के विकास और प्रवृत्तिमूलक तथ्यो के लिए आनुवंशिक जानकारी कराता है।
ये मनुष्यों के वंशमूलक गुणों का संवाहक है। गोत्र भी वंश मूलक अवयव ही हैं।
गोपों (यादवों) का जनन गोत्र "कार्ष्ण" है।
जो कृष्ण पद में सन्तान वाचक अण् प्रत्यय लगाने पर कृष्ण से "कार्ष्ण" पद बना है। (कृष्णस्येदम् + अण् = कार्ष्ण) जिसका अर्थ है श्रीकृष्ण की सन्तान अर्थात् जो श्रीकृष्ण से उत्पन्न हुआ हो।
और इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि यादवों (गोपों) का जन्म गोपेश्वर श्रीकृष्ण के क्लोन (Clone) से हुआ है, इसलिए समस्त यादवों का जनन गोत्र कार्ष्ण है। इसके बारे में आगे विस्तार बताया गया है कि कैसे यादवों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण से होने की वज़ह से उनका जनन गोत्र "कार्ष्ण" है।
कृष्ण का गोलोक में विराजमान गोपेश्वर ररूप से ही गोपों की उत्पत्ति हुई है।
किन्तु जनन गोत्र की बात तब तक अधूरी रहेगी जब तक भारतीय संस्कृति और शास्त्रों के आधार पर इसकी जानकारी न हो जाए।
भारतीय संस्कृति व पौराणिक ग्रन्थों में मुख्यतः तीन प्रकार के जनन गोत्रों की जानकारी मिलती है -
(१) गोत्र
(२) प्रवर गोत्र
(३) पिण्ड गोत्र
ये तीनों ही प्रकार के गोत्र सन्निकट रक्त सम्बन्धों की श्रृंखला है। इन तीनों के बारे जानना आवश्यक है।
(१)- "गोत्र" शब्द से तात्पर्य विवाह इत्यादि के अवसरों पर अपने किसी आदि पुरुष के नाम पर अपना परिचय देना या उसके नाम का आह्वान करना है।
गोत्र के बारे में भरत मुनि का कहना हैं कि - "गोत्रम्- गवते शब्दयति पूर्व्वपुरुषान् यतिति"।
अर्थात्- जिसके द्वारा अपने "कुल" के पूर्व पुरुष का आह्वान किया जाए वह गोत्र है।
ध्यान रहे अमरकोश के अनुसार गोत्र कुल का भी पर्याय है।
(२)- प्रवर गोत्र
प्रवर का मतलब प्रधान, सर्वश्रेष्ठ या पूज्य होता है। इसी आधार पर "प्रवर" गोत्र की स्थिति बनी है। इस प्रकार के गोत्र श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों के नाम पर ही आधारित होते हैं। जो अधिकांशतः ब्राह्मणों के ही गोत्र हैं।
भारतीय विवाहों में प्रवर गोत्र का भी ध्यान रखा जाता है, अर्थात् समान प्रवर वालों में विवाह वर्जित है। देखिए गौतम, नारद तथा आपस्तम्ब के वचन-
" समानैक: प्रवरो येषां तैः सह न विवाहः" (1.23.12)
A line of ancestors.पूर्वजों की एक पंक्ति प्रवर है।
प्रारम्भ में 'प्रवर' का अर्थ याज्ञिक कार्य से सम्बद्ध अग्नि का आवाहन करने वाले ऋषियों से ही था। वरणीय/ प्रार्थनीय/ आवाहनीय श्रेष्ठ ऋषि 'प्रवर' कहलाते थे। ये ऋषि उद्गाता भी कहे जाते थे। याज्ञिक अनुष्ठान में पुरोहित अपने सर्वश्रेष्ठ पूर्वज ऋषि का नाम-स्मरण करते थे, जो उनके समुदाय या समाज के प्रतीक थे। कालान्तर में ये ऋषि अपने वंशजों की सामाजिक, सांस्कारिक तथा आध्यात्मिक व्यवस्था से जुड़ते चले गए। ये ही ऋषि आगे चलकर प्रवर-प्रवर्तक हुए और उनके नामों पर अनेकों प्रवर गोत्र बने जो सभी ब्राह्मणों के लिए ही हैं।
(३)- पिण्ड गोत्र।
दरअसल देखा जाए तो जनन गोत्र और पिण्ड गोत्र का रक्त सम्बन्धी उत्पति सिद्धान्त एक ही है। बस इन दोनों में थोड़ा बहुत अन्तर है उसे जानना आवश्यक है। इसके लिए नीचे देखें -
(क)- जनन गोत्र-
जनन गोत्र उस प्रारम्भिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ से किसी जाति विशेष लोगों की प्रारम्भिक उत्पत्ति हुई है। जैसे- गोपों की प्रारम्भिक उत्पत्ति पूर्व काल में गोलोक में श्रीकृष्ण से हुई है। इस लिए गोपों का जनन गोत्र श्रीकृष्ण के नामानुसार कार्ष्ण है। यह गोपों का मूल व प्रारम्भिक गोत्र है।
इसके बारे में आगे विस्तार से बताया गया है।
(ख)- जनन गोत्र की ही तरह पिण्ड गोत्र भी हैं। किन्तु पिण्ड गोत्र "जनन" गोत्र के बाद की उत्पत्ति को दर्शाता है। पिण्ड गोत्र को पितृ- गोत्र भी कहा जाता है, जो किसी जाति विशेष के पूर्वजों के नाम से होता है जिसके कारण अनेक पिण्ड गोत्रों की उत्पत्ति होती है। इसी पितृ गोत्र को ध्यान में रखकर सगोत्र विवाह वर्जित होते है।
किन्तु माता की पाँचवीं तथा पिता की सातवीं पीढ़ियों के बाद सपिण्डता का दोष नहीं रहता है। वर्तमान समय में यादवों में उनके पूर्वजों के नाम पर बहुत से पिण्ड-गोत्र हैं जिनका यहाँ पर वर्णन करना सम्भव नहीं है।
इसी तरह से कुछ लोग अपनी प्रारम्भिक उत्पत्ति या जन्म को किसी ऋषि-मुनि से मानते हुए उनके नाम पर जनन गोत्र का निर्धारण करते हुए अक्सर कहा करते हैं कि मैं इस ऋषि या उस ऋषि का सन्तान हूँ।
इसी तरह से जो लोग अपने को ब्रह्मा की सन्तान मानते हैं। उन सभी का जनन गोत्र कहें या मूल गोत्र- "ब्राह्मी गोत्र" है। जैसे- ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न कुछ ब्राह्मण इत्यादि का गोत्र।
अब आप लोगों यहाँ पर यह सोच रहे होंगे कि कुछ ही ब्राह्मण क्यों ? सभी ब्राह्मण क्यों नहीं ? क्या सभी ब्राह्मण ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न नहीं हैं ? तो इसका जवाब है नहीं। क्योंकि सभी ब्राह्मण ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न नहीं हुए हैं।
वास्तविकता यह है कि- प्रारम्भ में ब्रह्माजी के मुख से केवल ब्राह्मण पुरुष वर्ग ही उत्पन्न हुआ था न की ब्राह्मणी स्त्रियाँ। क्योंकि किसी भी पौराणिक ग्रन्थों में यह नहीं लिखा गया है कि ब्रह्माजी के मुख से ब्राह्मणों के साथ-साथ ब्राह्मणी स्त्रियाँ भी उत्पन्न हुईं थीं।
यहीं कारण है कि कुछ पौराणिक ग्रन्थों में ब्राह्मणों के जन्म विस्तार को अन्य तरह से बताया गया है। किन्तु यहाँ पर ब्राह्मणों की उत्पत्ति या उनका गोत्र बताना हमारा उद्देश्य नहीं है। फिर भी यदि कोई इन बातों को जानना ही चाहता है तो वह स्कन्दपुराण खण्ड- (३) के अध्याय- (३९ ) के प्रसंगों को पढ़कर इस विषय की जानकारी ले सकता है कि कुछ ब्राह्मणों का जनन का विस्तार कैसे हुआ है।
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि जनन गोत्र व्यक्ति के जन्मगत आधार को दर्शाते हुए यह पहचान कराता है की व्यक्ति की प्रारम्भिक उत्पत्ति जिससे हुई है, उसी के नामानुसार उस व्यक्ति का जनन गोत्र निर्धारित होता है।
✴️ यादवों का जनन गोत्र- "कार्ष्ण"
जनन गोत्र सिद्धान्त के अनुसार यादवों का जनन गोत्र कार्ष्ण है। क्योंकि कृष्ण पद में सन्तान वाचक "अण्" प्रत्यय लगाने पर "कार्ष्ण" पद बना है। (कृष्णस्येदम् + अण् = कार्ष्ण) जिसका अर्थ है श्रीकृष्ण की सन्तान अर्थात् जो श्रीकृष्ण से उत्पन्न हुआ हो।
इस हिसाब से देखा जाए तो आभीर जाति के अन्तर्गत समस्त गोप-गोपियों अर्थात् यादवों का जन्म प्रारम्भिक काल में गोलोक में ही गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से हुआ है। तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि- गोपों में श्रीकृष्ण का तथा गोपियों में श्रीराधा का रक्त अवश्य ही विद्यमान होगा। और रक्त सम्बन्ध ही किसी जाति या जनन गोत्र का मूल आधार है कि उसमें प्रारम्भिक रक्त किसका है।
इस हिसाब से भी देखा जाए तो समस्त गोपों में श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कुछ कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागरखण्ड के अध्याय- (१९३) के श्लोक -(१४) में मिलता है। जिसमें आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती हैं कि -
"तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
अनुवाद - हे विष्णो (कृष्ण)! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे।१४
देखा जाए तो उपर्युक्त श्लोक में देवी गायत्री बड़े ही स्पष्ट रूप से गोपों (आभीरों) को श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्धी (blood relative) होने को कहतीं हैं। और जहाँ तक गोप और गोपियों का जन्म श्रीकृष्ण और श्रीराधा से होने की बात है तो इसकी पुष्टि के लिए निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत हैं-
(१)- ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय-(४८) के श्लोक (४३) से है जिसमें शिव जी पार्वती से कहते हैं कि-
"बभूव गोपीसंघश्च राधाया लोमकूपतः।श्रीकृष्णलोमकूपेभ्यो बभूवुः सर्वबल्लवाः।।४३।
अनुवाद -• श्रीराधा के रोमकूपों (कोशिकाओं) से गोपियों का समुदाय प्रकट हुआ है, तथा श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से सम्पूर्ण गोपों का प्रादुर्भाव हुआ है।
(ध्यान रहे रोमकूपों को ही आज विज्ञान की भाषा में कोशिका कहा जाता है)
विशेष:-कोशिका" (Koshika) या "सेल" (Cell) सजीवों के शरीर की सबसे छोटी रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है. यह जीवन की मूलभूत संरचना है जो सभी जीवों को बनाती है. कोशिका के बारे में:
रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई:
कोशिकाएं शरीर की संरचना का निर्माण करती हैं और सभी जैविक क्रियाओं को भी संचालित करती हैं.
कोशिका सिद्धान्त:
कोशिका सिद्धान्त के अनुसार, सभी जीव एक या एक से अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं, और सभी कोशिकाएं पहले से मौजूद कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं.
कोशिकाएं छोटी लेकिन जटिल:
कोशिकाएं बहुत छोटी होती हैं, लेकिन इनकी संरचना और कार्य बहुत जटिल होते हैं.
विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं:
शरीर में विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं होती हैं, जैसे कि रक्त कोशिकाएं, मांसपेशी कोशिकाएं, तंत्रिका कोशिकाएं, आदि.
अंगक:
कोशिकाओं के अंदर अंगक होते हैं, जो विशिष्ट कार्य करते हैं, जैसे कि ऊर्जा का उत्पादन, पदार्थों का पाचन, और पदार्थों का संश्लेषण.
कोशिका विभाजन:
कोशिकाएं विभाजित होकर नई कोशिकाएं बनाती हैं, जिससे शरीर का विकास और मरम्मत होती है.
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(२)- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(५) के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) , जिसमें लिखा गया है कि -
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२।
अनुवाद- ४०-४२
• उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• फिर तो श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप- गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष-रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
(३)- ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय -(३६ के श्लोक- ६२) से है जिसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में राधा जी से कहते हैं-
"गोपाङ्गनास्तव कला अत एव मम प्रियाः।
मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः। ६२।
अनुवाद- हे राधे ! समस्त गोपियाँ तुम्हारी कलाऐं हैं। और सभी गोलोक वासी गोप मेरे रोमकूपों से उत्पन्न मेरी ही कलाऐं तथा अंश हैं।६२।
(४) - गर्गसंहिता विश्वजित्खण्ड के अध्याय- (२) के श्लोक संख्या- (७) से है जिसमें भगवान श्री कृष्ण उग्रसेन से कहते हैं-
"ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। ७।
अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि गोप और गोपियों (यादवों) का जन्म गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से ही हुआ है। तो जाहिर सी बात है कि गोपों अर्थात् यादवों का जनन (Genetic) गोत्र सिद्धान्त के अनुसार इनका गोत्र भी श्रीकृष्ण के नामानुसार "कार्ष्ण" ही हुआ। यह वैज्ञानिक और ध्रुव सत्य है।
✳️ किन्तु आश्चर्य है कि अधिकांश यादव लोग अपने जनन गोत्र "कार्ष्ण" के स्थान पर एक ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम पर अपना जनन गोत्र स्थापित कर अपने मूल जनन गोत्र को ही भूल गए।
यादवों का जनन गोत्र "कार्ष्ण" है या अत्रि ? इसकी विस्तृत जानकारी इस पुस्तक के अध्याय (१०) में दी गई है। तथा संक्षेप में यहाँ भी (गुरुगोत्र) वाले प्रसंग में दी गई है।
अब हमलोग स्थानीय गोत्रों के बारे में भी जानेंगे।
कर्मतोऽन्यानि गोत्राणि समुत्पन्नानि पार्थिव।
नामधेयानि तपसा तानि च ग्रहणं सताम्।।१८।
अनुवाद:
अन्य गोत्र कर्म के अनुसार पीछे उत्पन्न हुए हैं।
वे गोत्र और उनके नाम उन गोत्र-प्रवर्तक महर्षियों की तपस्या से ही साधू-समाज में सुविख्यात एवं सम्मानित हुए हैं।१८।
जनक उवाच ।
विशेषधर्मान्वर्णानां प्रब्रूहि भगवन्मम ।
तथा सामान्यधर्मांश्च सर्वत्र कुशलो ह्यसि॥ १९॥
जनक ने पूछा - वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे ! ब्राह्मण आदि विशेष-विशेष वर्णों का जो वर्ण है, वह कैसे उत्पन्न होता है ? यह मैं जानना चाहता हूँ।१९।
यदेतज्जायतेऽपत्यं स एवायमिति श्रुतिः ।
कथं ब्राह्मणतो जातो विशेषग्रहणं गतः ॥ २ ॥
आप इस विषय को बतायें । श्रुति कहती है कि जिससे यह सन्तान उत्पन्न होती हैं, तद्रूप ही समझी जाती है अर्थात संतति के रूप में उसका जन्मदाता पिता ही नूतन जन्म धारण करता है। ऐसी दशा में प्रारम्भ में ब्रह्माजी से उत्पन्न हुए ब्राह्मणों से ही सबका जन्म हुआ है।२।
तब उनकी क्षत्रिय आदि विशेष संज्ञा कैसे हो गयी?
तब पराशरजी ने कहा- महाराज ! यह ठीक है कि
"पराशर उवाच।
एवमेतन्महाराज येन जातः स एव सः।
तपसस्त्वपकर्षेण जातिग्रहणतां गतः।।३।
सुक्षेत्राच्च सुबीजाच्च पुण्यो भवति संभवः।
अतोऽन्यतरतो हीनादवरो नाम जायते।।४।
अनुवाद:- ३-४
जिससे जो जन्म लेता है, उसी का वह स्वरूप होता है तथापि तपस्या की न्यूनता और अधिकता के कारण लोग निकृष्ट जाति और उत्कृष्ट जाति को प्राप्त हो गये हैं । उत्तम क्षेत्र (खेत) और उत्तम बीज से जो जन्म होता है, वह पवित्र ही होता है। यदि क्षेत्र और बीज में से एक भी निम्नकोटि ( घटिया) का हो तो उससे निम्न सन्तान की ही उत्पत्ति होती है ।
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजी जब मानव-जगत की सृष्टि करने लगे, उस समय उनके मुख, भुजा, ऊरू और पैर -इन अंगों से मनुष्यों का प्रादुर्भाव हुआ था ।
तात ! जो मुख से उत्पन्न हुए, वे ब्राह्मण कहलाये। दोनों भुजाओं से उत्पन्न होने वाले मनुष्यों को क्षत्रिय माना गया। राजन ! जो ऊरूओं (जाँघों) से उत्पन्न हुए, वे धनवान (वैश्य) कहे गये; जिनकी उत्पत्ति चरणों से हुई, वे सेवक या शूद्र कहलाये । पुरूषप्रवर ! इस प्रकार ब्रह्माजी के चार अंगों से चार वर्णों की ही उत्पत्ति हुई।
इनसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे मनुष्य हैं, वे इन्हीं चार वर्णों के सम्मिश्रण से उत्पन्न होने के कारण वर्णसंकर कहलाते हैं। सो इस पर जनक ने पुनः पूछा - मुनिश्रेष्ठ ! जब सबको एकमात्र ब्रह्माजी ने ही जन्म दिया है, तब मनुष्यों के भिन्न-भिन्न गोत्र कैसे हुए ? इस जगत में मनुष्यों के बहुत-से गोत्र सुने जाते हैं ।
ॠषि-मुनि जहाँ-तहाँ जन्म ग्रहण करके अर्थात जो शुद्ध योनि में और दूसरे जो विपरीत योनि में उत्पन्न हुए हैं, वे सब ब्राह्मणत्व को कैसे प्राप्त हुए ? पराशर जी ने कहा - राजन ! तपस्या से जिनके अन्त:करण शुद्ध हो गये हैं, उन महात्मा पुरूषों के द्वारा जिस सन्तान की उत्पत्ति होती है, अथवा वे स्वेच्छा से जहाँ-कहीं भी जन्म ग्रहण करते हैं, वह क्षेत्र की दृष्टि से निकृष्ट होने पर भी उसे उत्कृष्ट ही मानना चाहिये । नरेश्वर ! मुनियों ने जहाँ-तहाँ कितने ही पुत्र उत्पन्न करके उन सबको अपने ही तपोबल से ॠषि बना दिया ।
उपर्युक्त संवादों से सिद्ध होता है कि - प्रारम्भिक काल में गोत्रों का निर्धारण व्यक्ति के तपोबल एवं उसके कर्मों के आधार पर निश्चित हुआ करता था। अर्थात् निम्न योनि का व्यक्ति भी अपने तपोबल एवं कर्मों के आधार पर उच्च योनि को प्राप्त कर सकता था। उसी तरह से उच्च योनि का व्यक्ति निम्न कर्म करने पर निम्न योनि को प्राप्त होता था। किन्तु इस सिद्धान्त का प्रचलन धीरे-धीरे कम होता गया और अन्ततोगत्वा ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में गोत्र एवं वर्ण का निर्धारण कर्म के आधार पर न होकर जन्म के आधार पर होने लगा। जिसके परिणाम स्वरूप सामाजिक भेदभाव एवं अस्पृश्यता का उदय हुआ। क्योंकि पूर्व काल में जिन चार ऋषियों- अंगिरा, कश्यप, वसिष्ठ और भृगु से जो चार मूल गोत्र प्रकट हुए थे उनके अतिरिक्त ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में पुरोहितों ने अपनी आवश्यकतानुसार अन्य ऋषियों को भी गोत्रकारिणों में शामिल किया जो किसी न किसी रूप में आगे-पीछे ब्रह्मा जी से ही उत्पन्न हुए थे। उन सभी को सम्मिलित कर पुरोहितों नें गोत्र निर्धारण का एक नया नियम बनाया जो मुख्यतः तीन सिद्धान्तों पर आधारित हैं।
(१)- पहला यह कि - वे ऋषि-मुनि जिनसे सन्तानें उत्पन्न हुई, और उसने उत्पन्न सभी सन्तानें उस ऋषि के नाम से अपने गोत्र को स्वीकार करती हैं।
ऐसे गोत्र को जन्म के आधार पर जनन गोत्र कहा जाता है। इस तरह के गोत्र ब्राह्मणों में देखने को मिलता है। जो अक्सर कहा करते हैं कि मैं इस ऋषि या उस ऋषि की सन्तान हूँ।
ब्राह्मणों के अतिरिक्त कुछ और लोग भी हैं जो अपने को किसी न किसी ऋषि का ही सन्तान मानते हुए उनके नाम से अपना गोत्र निर्धारित करते हैं। आजकल गोत्र धारण करने की होड़ मची हुई है। क्योंकि ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में बहुतों को अपने गोत्रों का पता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में पुरोहितों द्वारा अलग से सार्वजनिक गोत्र बनाया गया है उसे नींचे देखें।
(२)- दूसरा यह कि - ऐसा मानव समूह जिन्हें अपने उत्पाद अर्थात उनकी उत्पत्ति किससे हुई है इस बात का पता नहीं। ऐसे लोगों के लिए सामूहिक (Common) गोत्र बनाया गया है जिसका नाम है "कश्यप गोत्र"। यह गोत्र विस्तार की दृष्टि से भूतल पर सबसे बड़ा गोत्र माना जाता है। क्योंकि इसमें- पशु पक्षियों सहित अधिकांश मानव समूह जो ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर है या जिन्हें अपने गोत्र का पता नहीं है उन सभी को इसमें शामिल किया गया है।
(३)- तीसरा यह कि- ऐसे लोग जो ब्रह्मा पर्यन्त किन्हीं ऋषि-मुनियों की सन्तान न होकर सीधे परमेश्वर श्रीकृष्ण की सन्तान या (Product) हैं। वे ही लोग इसमें आते हैं।
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ऐसे लोगों का गोत्र भी दो प्रकार के होते हैं-
(१)- पहला यह कि- उनका मुख्य गोत्र तो आनुवंशिक- (Genetic) होता है जो परम्परागत रूप से रक्त सम्बन्धों का संकेत करता है। इसी को जनन गोत्र कहा जाता है।
(२)- दूसरा उनका एक गोत्र वैकल्पिक (उपगोत्र) होता है जो किसी ऋषि मुनि के नाम से होता है। जिसका मुख्य उद्देश्य दीक्षा, शिक्षा ,पूजा पाठ, यज्ञ, विवाह इत्यादि पौरोहित्य कर्म कराने तक ही सीमित होता है। इस वैकल्पिक गोत्र से उनका किसी तरह का रक्त सम्बन्ध नहीं होता है जिसे गुरु गोत्र कहा जाता है। जैसे यादवों का गुरु गोत्र अत्रि है। किन्तु इसका मतलब यह नहीं हुआ कि ऋषि अत्रि से यादवों का रक्त सम्बन्ध( ब्लड रिलेशन) हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि- यादवों की दीक्षा, शिक्षा ,पूजा पाठ, यज्ञ, विवाह इत्यादि पौरोहित्य कर्म कराता है उस गुरु से गुरुगोत्र का निर्धारण होता है।।
इसलिए ब्राह्मी वर्णव्यवस्था में जो गोत्र बनाए गए हैं वे इन गोपों पर प्रभावी नहीं होते। क्योंकि यादवों के लिए ये गोत्र वैकल्पिक हैं। उनका मुख्य गोत्र तो "कार्ष्ण" गोत्र" है।
क्योंकि उत्पत्ति की दृष्टिकोण से इन गोपों की उत्पत्ति गोलोक में श्रीकृष्ण अर्थात् स्वराट विष्णु से हुई है न की ब्रह्माजी या किसी ऋषि-मुनि से हुई है।
इस सम्बन्ध में बतादें कि- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में दो ही शक्तियों द्वारा सृष्टि रचना होती है। प्रथम सृष्टि रचना परमेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा गोलोक में हुई, जिसमें में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गोप-गोपियाँ प्रमुख देव और देवीयों की उत्पत्ति हुई।
इसलिए श्रीकृष्ण (स्वराट् विष्णु) को प्राथमिक सृष्टि कर्ता कहा जाता है। तथा दूसरी सृष्टि रचना प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्माजी द्वारा होती है इसलिए ब्रह्माजी को द्वितियक सृष्टि कर्ता कहा जाता है।
किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि- अधिकांश पौराणिक ग्रन्थों में यादवों के मुख्य गोत्र "कार्ष्ण" गोत्र" को न बताकर उनके वैकल्पिक गोत्र- अत्रि गोत्र को बताया गया और इसका प्रचार-प्रसार भी पुरोहितों द्वारा खूब किया गया।
जिसका परिणाम यह हुआ कि- पूरा यादव समाज अपने मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण गोत्र" सहित अपने अस्तित्व को भी भूल गया कि- ऋषि अत्रि के जन्म से बहुत पहले ही गोप और गोपियों अर्थात् अहीरों की उत्पत्ति गोलोक में गोपेश्वर श्रीकृष्ण के रोमकूपों से हो चुकी थी। तो फिर गोपों के बाद जन्मे ऋषि अत्रि कैसे यादवों (गोपों) के गोत्र प्रवर्तक होकर यादवों में कैसे कूद पड़े ? यह एक विचारणीय विषय है।
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इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण भक्त गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कहना है कि -
"गोप श्रीकृष्ण से उत्पन्न हैं न कि ऋषि अत्रि से। इसलिए रक्त सम्बन्ध एवं उत्पत्ति विशेष के कारण यादवों (गोपों) का मुख्य गोत्र "कार्ष्ण" ही मान्य व स्वीकार्य है।"
गोपों के गोत्र एवं रक्त सम्बन्धों के विषय में गोपाचार्य हंस श्रीमाता प्रसाद जी का कथन है कि - "अत्रि गोत्र" के बारे में इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यादवों के लिए "अत्रि गोत्र" एक वैकल्पिक गोत्र है जिसका मुख्य उद्देश्य पूजा पाठ, विवाह ,यज्ञ इत्यादि सम्पन्न कराने तक ही सीमित है। क्योंकि इस वैकल्पिक गोत्र से गोपों का कोई रक्त सम्बन्ध नहीं है"।
गोपों के इस वैकल्पिक गुरु गोत्र "अत्रि" की परम्परा का प्रारम्भ सर्वप्रथम भू-तल पर ब्रह्माजी के पुष्कर में अहीर कन्या देवी गायत्री के विवाह के उपरान्त ही हुआ।
जिसमें अहीर कन्या देवी गायत्री का विवाह ब्रह्मा से अत्रि ने ही यज्ञ में मन्त्रोच्चारण से सम्पन्न कराया था। क्योंकि उस यज्ञ के प्रमुख "अध्वर्यु" होता (यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करनें वाला पुरोहित) अत्रि ही थे। उसी समय से ऋषि अत्रि गोपों के प्रथम ब्राह्मण पुरोहित हुए। और गोपों के प्रत्येक धार्मिक कार्यों की सम्पन्नता का संकल्प लिया तथा गोपों ने भी ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम से एक वैकल्पिक गोत्र "अत्रि" बनाया जिसका मुख्य उद्देश्य पूजा पाठ एवं विवाह इत्यादि को सम्पन्न कराना ही था।