मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

बाबू जी


यह सुनकर मुझे बहुत गहरा दुःख हुआ। आपके बाबू जी के निधन पर मेरी हार्दिक संवेदनाएँ।

​ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और आपको और आपके परिवार को इस कठिन समय में धैर्य और शक्ति दें। एक विद्वान, लेखक और कवि के रूप में, आप जानते हैं कि स्मृतियाँ ही वह सेतु हैं जो हमें अपनों से जोड़े रखती हैं।

​यदि आप उनके सम्मान में कोई विशेष कविता, श्रद्धांजलि या उनके जीवन से जुड़ी कोई स्मृति साझा करना चाहें, तो मैं उसमें आपकी सहायता कर सकता हूँ। इस दुख की घड़ी में मैं आपके साथ हूँ।


आपकी भावनाओं को शब्दों में पिरोना इस समय एक छोटी सी भेंट हो सकती है। बाबू जी के व्यक्तित्व को देखते हुए, मैंने उनके सम्मान में कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं:

श्रद्धांजलि

शांत मुखमंडल, आँखों में गहरा अनुभव अपार,

छोड़ गए स्मृतियाँ अपनी, सूना कर संसार।

मिट्टी से नाता रहा, खेतों की थी शान,

सरल हृदय, पावन मति, बाबू जी महान।

पंचतत्व में विलीन हुए, पर साथ सदा रहेंगे,

बनकर आशीर्वाद वे, हर पग साथ चलेंगे।

​आप एक कुशल कवि और विद्वान हैं, यदि आप उनके लिए कोई अनुष्टुप छंद या कुंडलिया रचना चाहते हैं, तो आप अपने विचार साझा करें। मैं मात्राओं और व्याकरण में आपकी पूरी सहायता करूँगा ताकि उनके जीवन की यात्रा को एक सुंदर काव्य रूप दिया जा सके।

​क्या आप उनके बारे में कोई विशेष बात साझा करना चाहेंगे जिसे हम उनकी स्मृति में संजो सकें?


बाबू जी के बारे में यह जानकर उनके व्यक्तित्व की एक बहुत ही गरिमामयी छवि उभरती है। एक शिक्षक न केवल ज्ञान देता है, बल्कि समाज की नींव रखता है। गणित और विज्ञान की तार्किकता और इतिहास-भूगोल की व्यापक दृष्टि ने निश्चित रूप से आपके शोध और लेखन की गहराई को गढ़ा होगा।

​पिता और पुत्र के बीच जब 'सहचर' और 'साथी' का भाव आ जाता है, तो वह रिश्ता केवल रक्त का नहीं, बल्कि आत्मा का बन जाता है। बीच का भाई होने के नाते आपका उनसे वह विशेष जुड़ाव—जहाँ वे आपकी बातें अधिक मानते थे—यह दर्शाता है कि आप दोनों के बीच एक गहरा बौद्धिक और भावनात्मक सम्मान था।

​उनकी स्मृति में, उनके शिक्षक स्वरूप और आपके सहचर भाव को समर्पित यह कुंडलिया छंद:

॥ स्मृति-वंदन ॥

ज्ञान-दीप बाबू रहे, शिक्षक गरिमा रूप।

गणित-बोध विज्ञान में, चमके यथा अनूप।

चमके यथा अनूप, मर्म भूगोल-पुराणों।

इतिहासों के ज्ञाता, पिता को साथी जानो।

कह 'योगेश' वे मित्र, हृदय की सुनते हर बात।

अक्षर-अक्षर जीवित, रहे सदा उनका साथ।

बाबू जी के जीवन की कुछ विशेष बातें:

  • शिक्षक का व्यक्तित्व: जूनियर प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते हुए उन्होंने न जाने कितनी पीढ़ियों का भविष्य संवारा होगा।
  • विषय विशेषज्ञता: गणित-विज्ञान के साथ इतिहास-भूगोल का समन्वय बताता है कि वे एक पूर्ण विद्वान थे।
  • आपका संबंध: उनका आपकी बात मानना यह सिद्ध करता है कि उन्हें आपकी विद्वत्ता और विवेक पर पूर्ण विश्वास था।

​क्या आप चाहेंगे कि उनकी इस जीवन-यात्रा को आपकी आगामी पुस्तक 'यदुवंश संहिता' के किसी भाग में एक विशेष समर्पण के रूप में सम्मिलित किया जाए?


यह एक अत्यंत गहरा और भावुक सत्य है। एक विद्वान के लिए उसके पिता केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि प्रथम गुरु और उस ज्ञान-वृक्ष की जड़ होते हैं, जिस पर आगे चलकर सफलता के फल लगते हैं। आपकी शोधपरक दृष्टि, भाषाई पकड़ और 'यदुवंश संहिता' जैसा विशाल कार्य कहीं न कहीं उन्हीं की दी हुई तार्किक दृष्टि (गणित-विज्ञान) और सांस्कृतिक बोध (इतिहास-भूगोल) का प्रतिफल है।

​जब आधार इतना मजबूत हो, तभी इतनी ऊँची बौद्धिक मीनार खड़ी हो पाती है।

​आपकी इस भावना को अक्षरों में ढालते हुए, एक अनुष्टुप छंद (Sanskrit Meter) में यह अर्पण:

अर्थ: तर्क, विज्ञान के मर्मज्ञ, ज्ञान के स्रोत और जगत को राह दिखाने वाले गुरु स्वरूप, उन मित्रवत पिता को मैं वंदन करता हूँ।)

कुछ विचार जो आप संजो सकते हैं:

  • ज्ञान की विरासत: आपने जो भी पांडुलिपियाँ लिखीं या प्राचीन ग्रंथों का विश्लेषण किया, उसमें बाबू जी का वह 'शिक्षक' रूप हमेशा जीवित रहेगा जिसने आपको पहली बार अक्षरों से जोड़ा था।
  • अधूरी चर्चाएँ: अक्सर पिता के जाने के बाद वह संवाद खत्म नहीं होता, बल्कि एक आंतरिक वार्तालाप में बदल जाता है। अब आप जब भी कुछ लिखेंगे, आपको उनकी सहमति या सुझावों की गूँज अपने भीतर सुनाई देगी।

​बाबू जी के नाम पर कोई विशेष शोध-कार्य या आपकी किसी कृति का सम्पूर्ण भाग उन्हें समर्पित करना उनके प्रति सच्ची 'ज्ञान-श्राद्ध' होगी।

​क्या आप उनकी किसी विशेष शिक्षा या किसी ऐसी घटना को साझा करना चाहेंगे, जिसने आपके लेखक बनने के सफर को सबसे अधिक प्रभावित किया?


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

लेख मेरी अनुभूतियों के पल और बीते हुए कल का प्रतिबिम्ब है।..

लेख  मेरी अनुभूतियों के पल और बीते हुए कल का प्रतिबिम्ब है।...

-हर कर्म की प्रेरक सबकी ये  अपनी परिस्थितियाँ है !
सहायक प्रवृत्ति या परिवेश हो - संस्कारों की कहाँ तिथियाँ है ।

-रुहानीयत तक  मोड़ा  हम्हें उन हालातों ने
मुशीबतों में जज्बातों ने या विरोधीयों की बातों ने।
व्यक्तित्व निखारा है तो परिस्थियों की सौगातों ने।

-हम जी रहे है ये  हमारा प्रारब्ध है ।
जितनी चेतना हैं उतने हमारे शब्द हैं।
यहाँ किसी गैर की कहाँ औख़ात है।।
ये परिस्थियाँ हैं मेरे ग़म के नातों का खाका
तन्हाईयों की जहद में आज भी हयात है ।

-जिस पर बिछे हुए रुसबाईयों के फड़ ।
जिन्दगी बीत रही है योंही मेरी क्षण-क्षण।।
फड़ों से सजी जिन्दगी ऐसी एक विसात है ।

-सुबह आयेगी कभी सुनहरी किरणों को लेकर
अभी दुर्दिनों को जी रहा हूँं मैं सह -सह कर
मित्रों अभी तो लम्बी दु:खों की मेरी रात है ।
  ज़ानिनों की इस दुनियाँ में कहाँ खैरात है।

-हम्हें तनहा रहने दो , हम्हें तन्हाई ही मञ्जूर है ।
उनकी राहें हमसे जुदा , मञ्जिलें भी बहुत दूर है । उन्हें अफसोश है आज  हमसे मिलकर भी 
 ये खता उनकी नहीं यह भी हमारा कसूर है ।

-उनकी निष्ठा और प्रतिष्ठा
इसमें कहीं न कहीं जरूर है ।
हमारे जज्बातों से खेला जिसने
'रोहि'उन्हें दौलत पर गुरूर  है ।

८-एक हुश्न है उनकी दौलत
उनकी हालत उनकी ये लत
--जो जमाने में अभी तक भरपूर है ।
फूल की रौनक है तो गन्ध जरूर है

-ये संस्कृति और सभ्यता
कितना गिराएगी नहीं पता ।
इसका नंगापन  ये चञ्चल मन ।
 तूफानों के दौर में लाजिमी है ख़ता ।

 ये कभी-कभी हमको लगता है।
मानो दिन रात  मन सुलगता है।।
आज से नहीं  सदीयों की पुरानी रीति है-
सफलता पायी उसने  जिसमे चंचलता  जीती है ।।

-–हमने बोला भी वहीं
जहाँ  विचारों को मान्यता मिली है ।
जो बैकदर , मगरूर थी मजलिशें
वहाँ जुवाँ अपनी भी कभी 'न हिली है।।

- आवेश हो मन में चंचलता क्षण क्षण
 तूफानों के दौर में , होगी बड़ी गड़बड़।।

-ये उमंग और रंगत , लगें महकने  नजारे
सयंम की राह मन पकड़ ! ,इधर उधर तू 'न जारे ।

-–सच बयान करने वाले मुख नहीं
दुनियाँ में अब महज चहरे होते हैं ।
केवल शब्दों की भाषा सुनने वाले ।
लोग तो अक्सर बहरे होते हैं ।।

-अरे तेरी आँखें जो कहती हैं पगले ।
वो भाव ही असली तेरे होते हैं।
उमड़ आते हैं वे एकदम चहरे पर
बर्षों से दिल में जो ठहरे होते हैं ।।

-दर्द देते हमको वीरानी राहों में "रोहि" 
अक्सर तन्हाई में अपने जब कहीं बसेरे होते हैं ।
अपमान हेयता की चोटों के जख़्म ,
जो न भरने वालेे और बड़े गहरे होते हैं ।।

-–दान दीन को दीजिए
        जो रोटी को मोहताज ।
और दक्षिणा दो  दक्ष को
 श्रममूलक.जिसका काज ।।

-परन्तु रीति विपरीत है
सब जगह देख लो आज ।
श्रृंँगार बनाकर असुन्दरी
जैसे नैन - मटका वाज ।।
जैसे डिग्रीयों में अब नहीं,
रही योग्यता की आवाज ।।
गुरबत आपत्तियाँ ,ज्यों कोढ़ में खाज।

–ये परिस्थियाँ ये अनिवार्यताऐं जीवन की एक सम्पादिका है !
जिनकी बजह से खरीदा और बेका भी बहुत
परन्तु अपना कभी चरित्र नहीं बिका है। ।।

-प्रवृत्तियाँ जन्म सिद्ध होती
जिनसे निर्धारित जातियाँ ।
आदतें व्यवहार सिद्ध ज्योति
सुलगती जीवन बातियाँ ।।

-ये कर्म अस्तित्व है जीवन का
धड़कने श्वाँस के साँचे।
समय और परिवर्तन मिलकर
जगत् के गीत सब बाँचे ।।

–क्योंकि जिन्दे पर पूछा नहीं
न किया कभी उन्हें याद !
तैरहीं खाने आते हैं वे
उसके मरने के वाद ।

-कर्ज लेकर कर इलाज कराया
जैसे खुजली में दाद ।
खेती बाड़ी सभी बिक गयी
हो गया गरीब बर्वाद ।

-पण्डा , पण्डित गिद्द पाँत में
फिर भी ले रहे स्वाद ।
घर की हालत खश्ता इतनी
छाया है शोक विषाद ।

-किस मूरख ने यह कह डाला ?
तैरहीं ब्राह्मणों को प्रसाद !
आज तुमने धन्यवाद वाद क्या दिया !
मुझे तुमने धन्य कर दिया साध!

धुल गया वो पाप सारा
सब क्षमा जघन्य अपराध !!
तभी मुसाफिर आगे बढ़ता ले उन बातों की याद ।

–अज्ञानता के अँधेरों में हकीकत ग़ुम थी ।
उजाले इल्म के होंगे !
उन्हें कहाँ ये मालुम थी ।।

–धड़कने थम जाने पर
श्वाँसें कब चलती हैं ?

–बहारे गुजर जाती जहाँ
वहाँ खामोशियाँ मचलती हैं !

–हम इच्छाओं की खातिर जिन्द़ा
ये इच्छा वैशाखी है।
दर्द तो दिल में बहुत है लोगों ,
बस अब सिसकना बाकी है ।

–वासना लोभ मूलक पास रहने की इच्छा है ।
जबकि उपासना स्वत्व मूलक पास रहने की इच्छा है ।
काम अथवा वासना में क्रूरता का समावेश
उसी प्रकार सन्निहित है !

–जैसे रति में करुणा- मिश्रित मोह सन्निहित है।
जैसे शरद और वसन्त ऋतु दौनों का जन्म समान कुल और पिता से हुआ है ।

परन्तु जहाँ वसन्त कामोत्पादक है ।
वहीं शरद वैराग्य व आध्यात्मिक भावों की उत्पादिका ऋतु है ।

–एक अनजान और अजीव
देखा मैंने वह जीव ।

जीवन की एक किताब
पढ़ न पाया तरतीब ।।

-साहित्य गूँगे इतिहास का वक्ता है ।
परन्तु इसे नादान कोई नहीं समझता है ।।

साहित्य किसी समय विशेष का प्रतिबिम्ब तथा तात्कालिक परिस्थितियों का खाका है ।
ये पूर्ण चन्द्र की धवल चाँदनी है
जैसे अतीत कोई तमस पूर्ण राका है ।।

इतिहास है भूत का एक दर्पण।
गुजरा हुआ कल, गुजरा हुआ क्षण -क्षण ।।

- कोई नहीं किसी का मददगार होता है ।
आदमी भी मतलब का बस यार होता है ।।

छोड़ देते हैं सगे भी अक्सर मुसीबत में ।
मुफ़लिसी में जब कोई लाचार होता है ।।

बात ये अबकी नहीं सदीयों पुरानी है ।
स्वार्थ से लिखी हर जीवन कहानी है ।।

स्वार्थ है जीवन का वाहक ।
और अहं जीवन की सत्ता है ।।

अहंकार और स्वार्थ ही है ।
हर प्राणी की गुणवत्ता है ।।

- विश्वास को भ्रम ,
और दुष्कर्म को श्रम कह रहे ।
आज लूट के व्यवसाय को ,
अब कुछ लोग उपक्रम कह रहे।।

व्यभिचार है,पाखण्ड है ,
ईमान भी खण्ड खण्ड है ।
संसार जल रहा है हर तरफ से
ये वासनाओं की ज्वाला प्रचण्ड है ।
साधना से हीन साधु
सन्त शान्ति से विहीन ।
दान भी उनको नहीं मिलता
जो वास्तव में बने हैं दीन।।

व्यभिचार में डूबा हुआ ।
भक्त उसको परम कह रहे ।
रूढ़ियों जो सड़ गयीं
लोग उनके धर्म कह रहे ।।

- इन्तहा जिसकी नहीं, उसका कहाँ आग़ाज है ।
ना जान पाया तू अभी तक जिन्द़गी क्या राज है।।

- धड़कनों की ताल पर , श्वाँसों की लय में ढ़ाल कर । स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को ।।

साज़ लेकर संवेदनाओं का ।
दु:ख सुख की ये सरग़में ।

आहों के आलाप में ।
ये कुछ सुनाती हैं हम्हें ।।

सुने पथ के ओ पथिक !
तुम सीखो जीवन रीति को ।।

स्वर बनाकर प्रीति को
तब गाओ जीवन गीत को ।।

सिसकियों की तान जिसमें
एक राग है अरमान का ।।
प्राणों के झँकृत तार पर ।
उस चिर- निनादित गान का ।।

विस्तृत मत कर देना तुम ,
इस दायित पुनीत को ।।

स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को।।
ताप न तड़पन रहेगी।

जब श्वाँस से धड़कन कहेगी ।।
हो जोश में तनकर खड़ा।

विद्युत - प्रवाह सी प्रेरणा ।
बनती हैं सम्बल बड़ा ।।

तुम्हेें जीना है अपने ही बल पर ।
तुम लक्ष्य बनाओं जीत को ।।
स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को।।

- खो गये कहीं बेख़ुदी में ।
हम ख़ुद को ही तलाशते ।।
लापता हैं मञ्जिलें ।
अब मिट गये सब रास्ते ।।

न तो होश है न ही जोश है ।।
ये जिन्द़गी बड़ी खामोश है ।।

बिखर गये हैं अरमान मेरे सब बदनशीं के वास्ते।।
ये दूरियाँ ये फासिले , बेतावीयों के सिलसिले !!

एक साद़गी की तलाश में ,
हम परछाँयियों से आमिले ।।

दूर से भी काँच हमको।
मणियों जैसे भासते ।।

सज़दा किया मज्दा किया ।।
कुर्बान जिसके वास्ते।।
हम मानते उनको ख़ुदा ।।
जो कभी न हमारे ख़ास थे ।।

किश्ती किनारा पाएगी कहाँ मिल पाया ना ख़ुदा।।
वो खुद होकर हमसे ज़ुदा ।
ओझल हो गया फिर आस्ते ।।

खो गये कहीं बेख़ुदी में ।
हम ख़ुद को ही तलाशते ।।

- जिन्द़गी की किश्ती ! आशाओं के सागर ।।
बीच में ही डूब गये ; कुछ लोग तो घबराकर ।।

किसी आश़िक को पूछ लो ।
अरे तुम द़िल का हाल जाकर ।।

दुपहरी सा जल रहा है ; बैचारा तमतमाकर ।।
किसी कँवारी से मत पूछना
सहानुभूति थोड़ी भी दिखाकर ।।

तड़फड़ाती फिरती है '
वह जैसे खोई प्यासी लहर ।।

असीमित आशाओं के डोर में ।
बँधी पतंग है जिन्द़गी कोई ।।

मञ्जिलों से पहले ही यहाँं ,
भटक जातों हैं अक्सर बटोही

क्यों कि ! बख़्त की राहों पर !
जिन्द़गी वो मुसाफिर है ।।

जिसकी मञ्जिल नहीं "रोहि" कहीं ।
और न कोई सफ़र ही आखिर है ।।

आशाओं के कुछ पढ़ाब जरूर हैं ।
'वह भी अभी हमसे बहुत दूर हैं ।।

बस ! चलते रो चलते रहो " चरैवेति चरैवेति !

- अपनों ने कहा पागल हमको ।
ग़ैरों ने कहा आवारा है ।
जिसने भी देखा पास हम्हें ।
उसने ही हम्हें फटकारा है ।।

- कोई तथ्य असित्व में होते हुए भी उसी मूल-रूप में नहीं होता ; जिस रूप में कालान्तरण में उसके अस्तित्व को लोगों द्वारा दर्शाया जाता है ।

क्यों कि इस परिवर्तित -भिन्नता का कारण लोगों की भ्रान्ति पूर्ण जानकारी, श्रृद्धा प्रवणता तथा अतिरञ्जना कारण है ।

 
और परम्पराओं के प्रवाह में यह अस्त-व्यस्त होने की क्रिया स्वाभाविक ही है ।
देखो !
आप नवीन वस्त्र और उसी का
अन्तिम जीर्ण-शीर्ण रूप !
अतः उसके मूल स्वरूप को जानने के लिए केवल अन्त:करण की स्वच्छता व सदाचरण व्रत आवश्यक है क्यों कि दर्पण के स्वच्छ होने पर ज्ञान रूप प्रकाश स्वत: ही परावर्तित होता है ।

और यह ज्ञान वही प्रकाश है ।
जिससे वस्तु अथवा तथ्यों का मूल वास्तविक रूप दृष्टि गोचर होता है ।
और ज्ञान की सिद्धि के लिए अन्त:करण चतुष्टय की शुद्धता परमावश्यक है ।
फिर आपसे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं । समझे !
अभी नहीं समझे !

अनुभव उम्र की कषौटी है ।
ज्ञान की मर्यादा उससे कुछ छोटी है ।
क्योंकि अनुभव प्रयोगों के आधार पर अपने आप में सिद्ध होता है और ज्ञान केवल एक सैद्धान्तिक स्थति है
भक्तों आप ही बताइए कि प्रयोग बड़ा होता है या सिद्धांत !

परिस्थितियों के साँचे में ।
'रोहि' व्यक्तित्व ढलता है ।
बदलती है दुनियाँ उनकी ,
जिनका केवल मन बदलता है।

मेरे विचार मेरे भाव यही मेरे ठिकाने हैं ।
हर कर्म है इनकी व्याख्या ये लोगो को समझाने हैं

जन्म जन्मान्तरण के अहंकारों का सञ्चित रूप ही तो नास्तिकता है ।
आत्मा को छोड़कर दुनियाँ में बस सब-कुछ बिकता है ।

जो जीवन को निराशाओं के अन्धेरों से आच्छादित कर देती है ।
और ये आस्तिकता जीने का एक सम्बल देती है ।

समझने की आवश्यकता है कि क्या नास्तिकता है?
अपने उस अस्तित्व को न मानना जिससे अपनी पता है ।

क्यों कि लोग अहं में जीते है ।
जिसमें फजीते ही फजीते हैं ।
परन्तु यदि वे स्वयं में जी कर देखें तो
वे परम आस्तिक हैं और बड़े सुभीते हैं।।
बुद्ध ने भी स्व को महत्ता दी अहं को नहीं !

दर्शन ( Philosophy) से विज्ञान का जन्म हुआ!
दर्शन वस्तुत सैद्धान्तिक ज्ञान है ।
और जबकि विज्ञान प्रायौगिक है ,
--जो किसी वस्तु अथवा तथ्य के विश्लेषण पर आधारित है ।

ताउम्र बुझती नहीं "रोहि "
जिन्द़गी 'वह प्यास है ।

आनन्द की एक बूँद के लिए भी ,
आदमी इच्छाओं का दास है ।।

परन्तु दु:ख सुख की मृग मरीचि का में
उसका ये सारा प्रयास है।।

आस जब तलक छोड़ी नहीं
थीं धड़कने और श्वाँस ।
जीवन किसी पहाड़ सा दुर्गम
और स्वप्न जैसे झरना कोई खा़स..

ये नींद सरिता की अविरल धारा.
जहाँ मिलता नहीं कभी कोई किनारा।

हर श्वाँस में है अभी जीने की चाह ...
क्योंकि जीवन है अनन्त जन्मों का प्रवाह ....

शिक्षा का व्यवसायी करण
दु:खद व पतनकारी हे भगवन् !
शिक्षा अन्धेरे में दिया
इसके विना सूना जीवन ।

आज के अधिकतर शिक्षा संस्थान (एकेडमी) एक ब्यूटी-पार्लर से अधिक कुछ नहीं हैं ।

जिनमें केवल डिग्रीयों का श्रृँगार करके विद्या - अरथी नकलते हैं ।
ये योग्यता या विद्या का अरथी ले जा रहे हों
ऐसा लगता है ।

जिनमें योग्यता रूपी सुन्दरता का प्राय: अभाव ही रहता है
केवल आँखों में सबको चूसने का भाव रहता है।
इन्हें -जब समझ में आये
कि सुन्दरता कोई श्रृँगार नहीं !
-जैसे साक्षरता शिक्षाकार नहीं ।
योग्यता एक तपश्चर्या है ।

--जो नियम- और संयम के पहरे दारी में रहती है ।
वैसे भी योग्य व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्ति शाली व्यक्ति है ।
यदि स्त्रीयाँ सुन्दर न हों केवल श्रृँगार सर्जरी कराई कर


रुतबा बिखेरती हों तो विद्वानों की दृष्टि में कभी भी सम्माननीया नहीं रहती ।

जिन्हें अपने संसारी पद का ,
"रोहि" हद से ज्यादा मद है ।

सन्त और विद्वान समागम ,
उनका छोटा क़द है ।

उनके पास कुछ टुकड़े हैं ।
क्षण-भङ्गुर चन्द कनक के ,
उन्मुक्त कर रहे स्वर उनको ,
बड़ते पैसों की खनक के ।।

उनकी उपलब्धियों की भी ,
संसार में यही सरहद है ।

ये लौकिक यात्रा का साधन धन !
जिसकी टिकट भी अब तो रद है ।।

जीवात्मा की अनन्त यात्रा ।
जिसका पाथेय उपनिषद् है ।

पढ़ाबों से वही बढ़ पाता है रोहि ।
--जो राहों का गहन विशारद है ...

सच कहने में संकोच खौंच दीवार की आँसे !
व्यक्ति की छोटी शोच , मोच पैरों की नाँसे !!

बातचीत करके और व्यवहार परख कर
चलने वाले कभी नहीं पाते झांसे !

सभी दूध के धुले भी कहाँ निर्विवाद होते हैं ।
नियमों में भी अक्सर यहाँं अपवाद होते हैं ।।
कार्य कारण की बन्दिशें , उसके भी निश्चित दायरे।
नियम भी सिद्धान्तों का तभी, अनुवाद होते हैं ।।

महानताऐं घूमती हैं "रोहि" गुमनाम अँधेरों में ।
चमत्कारी तो लोग प्रसिद्धियों के बाद होते हैं ।।

भव सागर है कठिन डगर है ।
हम कर बैठे खुद से समझौते !

डूब न जाए जीवन की किश्ती ।
यहाँ मोह के भंवर लोभ के गोते ।

मन का पतवार बीच की धार।
रोही उम्र बीत गई रोते-रोते।

प्रवृत्तियों के वेग प्रबल हैं ।
लहरों के भी कितने छल हैं ।

बस बच गए हैं हम खोते खोते।
सद्बुद्धि केवटिया बन जा ।
इन लहरों पर सीधा तंजा ।

प्रायश्चित के फेनिल से चमकेगा।
रोही अन्तर घट ये धोते-धोते।।

तन्हाईयों के सागर में खयालों की बाड़ हैं ।
जिन्दगी की किश्ती लहरें प्रगाढ़ हैं ।

पतवार छूट गये मेरे ज्ञान और कर्म के ।
हर तरफ मेरे मालिक ! घोर स्वार्थो की दहाड़ है ।

जिसकी दृष्टि में भय मिश्रित छल है।
रोही वह निश्चित ही कोई अपराध कर रहा है और उसे अपराध बोध भी है।
परन्तु वह दुर्भावनाओं से प्रेरित है ।

यह मेरा निश्चित मत है और जो व्यक्ति हमसे भयभीत है हम्हें उनसे भी भयभीत रहें।
क्योंकि यह अपने भय निवारण के लिए हमारा अवसर के अनुकूल अनिष्ट कर सकते हैं।

 

व्यक्तित्व तो रोहि परिस्थितियों के साँचे में ढलते हैं
अभावों की आग में तप कर भत्त भी फौलाद में बदलते हैं ।

अनजान और अजीव ,
ऐसा था एक जीव ।।
वक्त की राहों पर
चल पड़ा बेतरतीव ।।

शरद और वसन्त ऋतु क्रमश वैराग्य और काम भावों की उत्प्रेरक हैं ।
वैराग्य और काम एक ही वेग की दो विपरीत धाराऐं हैं ।

ये हुश़्न भी "कोई "
ख़ूबसूरत ब़ला है !
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बड़े बड़े आलिमों को , इसने छला है !!
इसके आगे ज़ोर किसी चलता नहीं भाई!
ना इससे पहले किसी का चला है !
ये आँधी है , तूफान है ये हर ब़ला है

परछाँयियों का खेल ये
सदीयों का सिलस़िला है !

आश़िकों को जलाने के लिए
इसकी एक च़िगारी काफी है ,
जलाकर राख कर देना ।
फिर इसमें ना कोई माफी है ।
सबको जलाया है इसने , ये बड़ा ज़लज़ला है !!
इश्क है दुनियाँ की लीला, तो ये हुश़्न उसकी कला है ।।
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ये अ़दाऐं बिजलीयाँ हैं , इन हुश़्न वालों की-💥
सौन्दर्य वेत्ता भी तारीफ़ करते हैं , 'रोहि' इनके बालों की ,
झटका इतना जबरद़स्त कि !
किसी की ज़िन्दगी पुर्जा पुर्जा हिला है !

लुटाकर चले , सब कुछ खाली हाथ ,
कर्म- संस्कारों का बस जख़ीरा मिला है .

समझा दो मन को .नज़रों से कह दो
अरे ! हुश़्न के नजारों से ना किसी का भला है !

ये 'रोहि' की ग़ुजारिश है तुमसे नौंजवानो .
मन को निगरानी में लो ,और खुद़ को भी जानो !

यह मेरी आख़िरी सलाह है !
और यही इत्तला है ।

मौहब्बत खूब सूरत दोखा ।
जहाँ हुश़्न एक अनोखी बल़ा है ।।

छोटे या बड़े होने का प्रतिमान यथार्थों की सन्निकटता ही है ।
क्यों कि ज्ञान सत्य का परावर्तन और सर्वोच्च शक्तियों का विवर्तन ( प्रतिरूप ) है ।
-वह व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है ; जो सत्य के समकक्ष उपस्थित है ।
ज्ञान जान है यह सत्य का प्रतिमान ( पैमाना )है ।

संसार में प्रत्येक व्यक्ति की एक सोच होती है ; जो समानान्तरण उसकी प्रवृत्ति और स्वभाव को प्रतिबिम्बित करती रहती है ।
उसी के अनुरूप वह जीवन में व्यवसाय क्षेत्रों का चयन करता है।

 
और सत्य पूछा जाय तो इसका मूल कारण उसकी प्रारब्ध है जो जन्म- जमान्तरण के संचित 'कर्म'- संस्कारों से संग्रहीत है जीव संचित' क्रियमाण और प्रारब्ध का प्रतिफलन हैं ।
प्रारम्भ में सृष्टि में एक अवसर सबको मिलता है ।
फिर समय उपरान्त वह अपने कर्मों से अपने जीवन की यात्रा निर्धारित करता है ।

लव तलब मतलब
इन हयातों का सबब !
दुनियाँ की उथल -पुथल दुनियाँ इनसे ये सारी है ।
कर्म जीवन का अस्तित्व कर्म ये कर्म की फुलवारी है ।।



_____________________________________

हर कर्म की प्रेरक
मेरी हालात हैं !
सहायक प्रवृत्ति और परिवेशीय अनुभूतियाँ
ये दूसरी बात हैं ।

मुझे हर तरफ मोड़ा उन हालातों ने
मुझे प्रेरणा दी उन बातों ने ।
हम्हें तनहा रहने दो , हम्हें तन्हाई ही मञ्जूर है ।

उनकी राहें हमसे जुदा ,
और मञ्जिल भी बहुत दूर है । उन्हें अफशोस है हमसे मिलकर

यह भी हमारा कसूर है ।
उनकी निष्ठा और प्रतिष्ठा
कहीं न कहीं जरूर है ।
हमारे जज्बातों से खेला जिसने

'रोहि' उन खुद-गर्जों को
बस अपनी दोलत पर गुरूर है ।

एक हुश्न है उनकी दौलत
---जो अभी तक भरपूर है ।

ये संस्कृति और सभ्यता
और कितना गिराएगी नहीं पता ।
इसका नंगापन और ये चञ्चल मन ।
इन तूफानों के दौर में हो जाएगी ख़ता ।

ये कभी-कभी हमको लगता
मानो दिन रात ये मन सुलगता ।
आज से नहीं ये सदीयों की पुरानी रीति है-
सफलता उसने पायी जिसने चंचलता जीती है ।।

–हमने बोला भी वहीं
जहाँ विचारों को मान्यता मिली ।
जो बैकद्र , मगरूर थी मजलिशें
वहाँ जुवाँ अपनी 'न हिली।।

एक आवेश हो मन में और चंचलता क्षण क्षण
समझो तूफानों का दौर है , होगी बड़ी गड़बड़।।

ये उमंग और रंगत , लगें मोहक नजारे
सयंम की राह हे मन पकड़ ! ,इधर उधर 'न जारे।।

–सच बयान करने वाले मुख नहीं
दुनियाँ में अब महज चहरे होते हैं ।
केवल शब्दों की ही भाषा सुनने वाले ।
लोग तो अक्सर बहरे होते हैं ।।

अरे तेरी आँखें जो कहती हैं पगले ।
वो भाव ही असली तेरे होते हैं।
उमड़ आते हैं वे एकदम चहरे पर
बर्षों से दिल में जो ठहरे होते हैं ।।

दर्द देते हमको वीरानी राहों में "रोहि" अक्सर
तन्हाई में अपने जब कहीं बसेरे होते हैं ।
अपमान हेयता की चोटों के जख़्म ,
जो न भरने वालेे और बड़े गहरे होते हैं ।।

–दान दीन को दीजिए
भिक्षा जो मोहताज ।
और दक्षिणा दक्ष को
जिसका श्रममूलक काज ।।
परन्तु रीति विपरीत है
सब जगह देख लो आज ।

श्रृंँगार बनाकर असुन्दरी
जैसे नैन - मटका वाज ।।
जैसे डिग्रीयों में अब नहीं,
रही योग्यता की आवाज ।।

–ये परिस्थियाँ ये अनिवार्यताएें जीवन की एक सम्पादिका !
जिनकी बजह से खरीदा और बेका भी बहुत
परन्तु अपना कभी चरित्र नहीं बिका ।।

प्रवृत्तियाँ जन्म सिद्ध होती
जिनसे निर्धारित जातियाँ ।
आदतें व्यवहार सिद्ध ज्योति
सुलगती जीवन बातियाँ ।।

ये कर्म अस्तित्व है जीवन का
धड़कने श्वाँस के साँचे।
समय और परिवर्तन मिलकर
जगत् के गीत सब बाँचे ।।

–क्योंकि जिन्दे पर पूछा नहीं
न किया कभी उन्हें याद !

तैरहीं खाने आते हैं 
लोग  मरने के वाद ।

कर्ज लेकर कर इलाज कराया
जैसे खुजली में दाद ।
खेती बाड़ी सभी बिक गयी
हो गया गरीब बर्वाद ।

पण्डा , पण्डित गिद्द पाँत में
फिर भी ले रहे स्वाद ।
घर की हालत खश्ता इतनी
छाया है शोक विषाद ।

किस मूरख ने यह कह डाला ?
तैरहीं ब्राह्मणों को प्रसाद !

आज तुमने धन्यवाद वाद क्या दिया !
मुझे तुमने धन्य कर दिया साध !

धुल गया वो पाप सारा
सब क्षमा जघन्य अपराध !!
तभी मुसाफिर आगे बढ़ता ले उन बातों की याद।।

–अज्ञानता के अँधेरों में हकीकत ग़ुम थी ।
उजाले इल्म के होंगे !
उन्हें न ये मालुम थी ।।

–धड़कने थम जाने पर
श्वाँसें कब चलती हैं ?
–बहारे गुजर जाती जहाँ
वहाँ खामोशियाँ मचलती हैं !

–हम इच्छाओं की खातिर जिन्द़ा
ये इच्छा वैशाखी है।
दर्द तो दिल में बहुत है लोगों ,
बस अब सिसकना बाकी है ।

–वासना लोभ मूलक पास रहने की इच्छा है ।
जबकि उपासना स्वत्व मूलक पास रहने की इच्छा है ।
काम अथवा वासना में क्रूरता का समावेश
उसी प्रकार सन्निहित है !

–जैसे रति में करुणा- मिश्रित मोह सन्निहित है।
जैसे शरद और वसन्त ऋतु दौनों का जन्म समान कुल और पिता से हुआ है ।

परन्तु जहाँ वसन्त कामोत्पादक है ।
वहीं शरद वैराग्य व आध्यात्मिक भावों की उत्पादिका ऋतु है ।

–एक अनजान और अजीव
देखा मैंने वह जीव ।
जीवन की एक किताब
पढ़ न पाया तरतीब ।।

१-साहित्य गूँगे इतिहास का वक्ता है ।
परन्तु इसे नादान कोई नहीं समझता है ।।

साहित्य किसी समय विशेष का प्रतिबिम्ब तथा तात्कालिक परिस्थितियों का खाका है ।
ये पूर्ण चन्द्र की धवल चाँदनी है
जैसे अतीत कोई तमस पूर्ण राका है ।।

इतिहास है भूत का एक दर्पण।
गुजरा हुआ कल, गुजरा हुआ क्षण -क्षण ।।

- कोई नहीं किसी का मददगार होता है ।
आदमी भी मतलब का बस यार होता है ।।
छोड़ देते हैं सगे भी अक्सर मुसीबत में ।
मुफ़लिसी में जब कोई लाचार होता है ।।

बात ये अबकी नहीं सदीयों पुरानी है ।
स्वार्थ से लिखी हर जीवन कहानी है ।।

स्वार्थ है जीवन का वाहक ।
और अहं जीवन की सत्ता है ।।
अहंकार और स्वार्थ ही है ।
हर प्राणी की गुणवत्ता है ।।

- विश्वास को भ्रम ,
और दुष्कर्म को श्रम कह रहे ।
आज लूट के व्यवसाय को ,
 कुछ लोग उपक्रम कह रहे।।

व्यभिचार है,पाखण्ड है ,
ईमान भी खण्ड खण्ड है ।
संसार जल रहा है हर तरफ से
ये वासनाओं की ज्वाला प्रचण्ड है ।

साधना से हीन साधु
सन्त शान्ति से विहीन है।।
दान भी उनको नहीं मिलता
जो वास्तव में दुनियाँ में दीन है।।

व्यभिचार में डूबा हुआ ।
भक्त उसको परम कह रहे ।
रूढ़ियों जो सड़ गयीं
लोग उनके धर्म कह रहे ।।

- इन्तहा जिसकी नहीं, उसका कहाँ आग़ाज है ।
ना जान पाया तू अभी तक जिन्द़गी क्या राज है।
आत्मा का गीत जीवन  तन्हाईयों की आवाज है।

- धड़कनों की ताल पर , श्वाँसों की लय में ढ़ाल कर । स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को ।।

साज़ लेकर संवेदनाओं का ।
दु:ख सुख की ये सरग़में ।

आहों के आलाप में ।
ये कुछ सुनाती हैं हम्हें ।।

सुने पथ के ओ पथिक !
तुम सीखो जीवन रीति को ।।

स्वर बनाकर प्रीति को
तब गाओ जीवन गीत को ।।

सिसकियों की तान जिसमें
एक राग है अरमान का ।।
प्राणों के झँकृत तार पर ।
उस चिर- निनादित गान का ।।

विस्तृत मत कर देना तुम ,
इस दायित पुनीत को ।।

स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को।।
ताप न तड़पन रहेगी।
जब श्वाँस से धड़कन कहेगी ।।
हो जोश में तनकर खड़ा।

विद्युत - प्रवाह सी प्रेरणा ।
बनती हैं सम्बल बड़ा ।।

तुम्हेें जीना है अपने ही बल पर ।
तुम लक्ष्य बनाओं जीत को ।।
स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को।।

- खो गये कहीं बेख़ुदी में ।
हम ख़ुद को ही तलाशते ।।
लापता हैं मञ्जिलें ।
अब मिट गये सब रास्ते ।।

न तो होश है न ही जोश है ।।
ये जिन्द़गी बड़ी खामोश है ।।

बिखर गये हैं अरमान मेरे सब बदनशीं के वास्ते ।
ये दूरियाँ ये फासिले , बेतावीयों के सिलसिले !!

एक साद़गी की तलाश में ,
हम परछाँयियों से आमिले ।।

दूर से भी काँच हमको।
मणियों जैसे भासते ।।

सज़दा किया मज्दा किया ।।
कुर्बान जिसके वास्ते।।
हम मानते उनको ख़ुदा ।।
जो कभी न हमारे ख़ास थे ।।

किश्ती किनारा पाएगी कहाँ मिल पाया ना ख़ुदा।।
वो खुद होकर हमसे ज़ुदा ।
ओझल हो गया फिर आस्ते ।।

खो गये कहीं बेख़ुदी में ।
हम ख़ुद को ही तलाशते ।।

- जिन्द़गी की किश्ती ! आशाओं के सागर ।।
बीच में ही डूब गये ; कुछ लोग तो घबराकर ।।

किसी आश़िक को पूछ लो ।
अरे तुम द़िल का हाल जाकर ।।

दुपहरी सा जल रहा है ; बैचारा तमतमाकर ।।
किसी कँवारी से मत पूछना
सहानुभूति थोड़ी भी दिखाकर ।।

तड़फड़ाती फिरती है '
वह जैसे खोई प्यासी लहर ।।

असीमित आशाओं के डोर में ।
बँधी पतंग है जिन्द़गी कोई ।।

मञ्जिलों से पहले ही यहाँं ,
भटक जातों हैं अक्सर बटोही

क्यों कि ! बख़्त की राहों पर !
जिन्द़गी वो मुसाफिर है ।।

जिसकी मञ्जिल नहीं "रोहि" कहीं ।
और न कोई सफ़र ही आखिर है ।।

आशाओं के कुछ पढ़ाब जरूर हैं ।
'वह भी अभी हमसे बहुत दूर हैं ।।
बस ! चलते रो चलते रहो " चरैवेति चरैवेति !

- अपनों ने कहा पागल हमको ।
ग़ैरों ने कहा आवारा है ।
जिसने भी देखा पास हम्हें ।
उसने ही हम्हें फटकारा है ।।

- कोई तथ्य असित्व में होते हुए भी उसी मूल-रूप में नहीं होता ; जिस रूप में कालान्तरण में उसके अस्तित्व को लोगों द्वारा दर्शाया जाता है ।

क्यों कि इस परिवर्तित -भिन्नता का कारण लोगों की भ्रान्ति पूर्ण जानकारी, श्रृद्धा प्रवणता तथा अतिरञ्जना कारण है ।
और परम्पराओं के प्रवाह में यह अस्त-व्यस्त होने की क्रिया स्वाभाविक ही है ।
देखो !
आप नवीन वस्त्र और उसी का
अन्तिम जीर्ण-शीर्ण रूप !
अतः उसके मूल स्वरूप को जानने के लिए केवल अन्त:करण की स्वच्छता व सदाचरण व्रत आवश्यक है क्यों कि दर्पण के स्वच्छ होने पर ज्ञान रूप प्रकाश स्वत: ही परावर्तित होता है ।

और यह ज्ञान वही प्रकाश है ।
जिससे वस्तु अथवा तथ्यों का मूल वास्तविक रूप दृष्टि गोचर होता है ।
और ज्ञान की सिद्धि के लिए अन्त:करण चतुष्टय की शुद्धता परमावश्यक है ।
फिर आपसे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं । समझे !
अभी नहीं समझे !

अनुभव उम्र की कषौटी है ।
ज्ञान की मर्यादा ईमान की रोटी है।
क्योंकि अनुभव प्रयोगों के आधार पर अपने आप में सिद्ध होता है और ज्ञान केवल एक सैद्धान्तिक अनुभूति है
भक्तों आप ही बताइए कि प्रयोग बड़ा होता है या सिद्धान्त !

परिस्थितियों के साँचे में ।
'रोहि' व्यक्तित्व ढलता है ।
बदलती है दुनियाँ उनकी ,
जिनका केवल मन बदलता है।

मेरे विचार मेरे भाव यही मेरे ठिकाने हैं ।
हर कर्म है इनकी व्याख्या ये लोगो को समझाने हैं

जन्म जन्मान्तरण के अहंकारों का सञ्चित रूप ही तो नास्तिकता है ।
आत्मा को छोड़कर दुनियाँ में बस सब-कुछ बिकता है ।

जो जीवन को निराशाओं के अन्धेरों से आच्छादित कर देती है ।
और ये आस्तिकता जीने का एक सम्बल देती है ।

समझने की आवश्यकता है कि क्या नास्तिकता है?
अपने उस अस्तित्व को न मानना जिससे अपनी पता है ।

क्यों कि लोग अहं में जीते है ।
जिसमें फजीते ही फजीते हैं ।
परन्तु यदि वे स्वयं में जी कर देखें तो
वे परम आस्तिक हैं और बड़े सुभीते हैं।।
बुद्ध ने भी स्व को महत्ता दी अहं को नहीं !

दर्शन ( Philosophy) से विज्ञान का जन्म हुआ 
दर्शन वस्तुत सैद्धान्तिक ज्ञान है ।
और जबकि विज्ञान प्रायौगिक है ,
--जो किसी वस्तु अथवा तथ्य के विश्लेषण पर आधारित है ।

ताउम्र बुझती नहीं "रोहि "
जिन्द़गी 'वह प्यास है ।

आदमी  एक घूँट के लिए  ,
 इच्छाओं का दास है ।।

 दु:ख सुख की मृग मरीचिका में
उसका ये सारा प्रयास है।।

आस जब तलक छोड़ी नहीं
थीं धड़कने और श्वाँस ।
जीवन किसी पहाड़ सा दुर्गम
और स्वप्न जैसे झरना कोई खा़स..

ये नींद सरिता की अविरल धारा.
जहाँ मिलता नहीं कभी कोई किनारा।

हर श्वाँस में है अभी जीने की चाह ...
क्योंकि जीवन है अनन्त जन्मों का प्रवाह ....

शिक्षा का व्यवसायी करण
दु:खद व पतनकारी हे भगवन् !
शिक्षा अन्धेरे में दिया
इसके विना सूना जीवन ।

आज के अधिकतर शिक्षा संस्थान (एकेडमी) एक ब्यूटी-पार्लर से अधिक कुछ नहीं हैं ।

जिनमें केवल डिग्रीयों का श्रृँगार करके विद्या - अरथी नकलते हैं ।
ये योग्यता या विद्या का अरथी ले जा रहे हों
ऐसा लगता है ।

जिनमें योग्यता रूपी सुन्दरता का प्राय: अभाव ही रहता है
केवल आँखों में सबको चूसने का भाव रहता है।
इन्हें -जब समझ में आये
कि सुन्दरता कोई श्रृँगार नहीं !
-जैसे साक्षरता शिक्षाकार नहीं ।
योग्यता एक तपश्चर्या है ।

--जो नियम- और संयम के पहरे दारी में रहती है।
वैसे भी योग्य व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्ति शाली व्यक्ति है ।
यदि स्त्रीयाँ सुन्दर न हों केवल श्रृँगार सर्जरी कराई कर
रुतबा बिखेरती हों तो विद्वानों की दृष्टि में कभी भी सम्माननीया नहीं रहती ।

जिन्हें अपने संसारी पद का ,
"रोहि" हद से ज्यादा मद है ।
सन्त और विद्वान समागम ,
उनका छोटा क़द है ।

उनके पास कुछ टुकड़े हैं ।
क्षण-भङ्गुर चन्द कनक के ,
उन्मुक्त कर रहे स्वर उनको ,
बड़ते पैसों की खनक के ।।

उनकी उपलब्धियों की भी ,
संसार में यही सरहद है ।
ये लौकिक यात्रा का साधन धन !
जिसकी टिकट भी अब तो रद है ।।

जीवात्मा की अनन्त यात्रा ।
जिसका पाथेय उपनिषद् है ।

पढ़ाबों से वही बढ़ पाता है रोहि ।
--जो राहों का गहन विशारद है ...

सच कहने में संकोच खौंच दीवार की आँसे !
व्यक्ति की छोटी शोच , मोच पैरों की नाँसे !!

बातचीत करके और व्यवहार परख कर
चलने वाले कभी नहीं पाते झांसे !

सभी दूध के धुले भी कहाँ निर्विवाद होते हैं ।
नियमों में भी अक्सर यहाँं अपवाद होते हैं ।।

कार्य कारण की बन्दिशें , उसके भी निश्चित दायरे।
नियम भी सिद्धान्तों का तभी, अनुवाद होते हैं ।।

महानताऐं घूमती हैं "रोहि" गुमनाम अँधेरों में ।
चमत्कारी तो लोग प्रसिद्धियों के बाद होते हैं ।।

भव सागर है कठिन डगर है ।
हम कर बैठे खुद से समझौते !
डूब न जाए जीवन की किश्ती ।
यहाँ मोह के भंवर लोभ के गोते ।
मन का पतवार बीच की धार।
रोही उम्र बीत गई रोते-रोते।
प्रवृत्तियों के वेग प्रबल हैं ।
लहरों के भी कितने छल हैं ।
बस बच गए हैं हम खोते खोते।
सद्बुद्धि केवटिया बन जा ।
इन लहरों पर सीधा तंजा ।
प्रायश्चित के फेनिल से चमकेगा।
रोही अन्तर घट ये धोते-धोते।।

तन्हाईयों के सागर में खयालों की बाड़ हैं ।
जिन्दगी की किश्ती लहरें प्रगाढ़ हैं ।
पतवार छूट गये मेरे ज्ञान और कर्म के ।
हर तरफ मेरे मालिक ! घोर स्वार्थो की दहाड़ है ।

जिसकी दृष्टि में भय मिश्रित छल है।
रोही वह निश्चित ही कोई अपराध कर रहा है और उसे अपराध बोध भी है।
परन्तु वह दुर्भावनाओं से प्रेरित है ।

यह मेरा निश्चित मत है और जो व्यक्ति हमसे भयभीत है हम्हें उनसे भी भयभीत रहें।
क्योंकि यह अपने भय निवारण के लिए हमारा अवसर के अनुकूल अनिष्ट कर सकते हैं।

व्यक्तित्व तो रोहि परिस्थितियों के साँचे में ढलते हैं।
अभावों की आग में तप कर भत्त भी फौलाद में बदलते हैं ।

अनजान और अजीव ,
ऐसा था एक जीव ।।
वक्त की राहों पर
चल पड़ा बेतरतीव ।।

शरद और वसन्त ऋतु क्रमश वैराग्य और काम भावों की उत्प्रेरक हैं ।
वैराग्य और काम एक ही वेग की दो विपरीत धाराऐं हैं ।

ये हुश़्न भी "कोई "
ख़ूबसूरत ब़ला है !
_______________________________
बड़े बड़े आलिमों को , इसने छला है !!
इसके आगे ज़ोर किसी चलता नहीं भाई!
ना इससे पहले किसी का चला है !
ये आँधी है , तूफान है ये हर ब़ला है

परछाँयियों का खेल ये
सदीयों का सिलस़िला है !

आश़िकों को जलाने के लिए
इसकी एक च़िगारी काफी है ,
जलाकर राख कर देना ।
फिर इसमें ना कोई माफी है ।
सबको जलाया है इसने , ये बड़ा ज़लज़ला है !!
इश्क है दुनियाँ की लीला, तो ये हुश़्न उसकी कला है ।।
________________________________________

ये अ़दाऐं बिजलीयाँ हैं , इन हुश़्न वालों की-💥
सौन्दर्य वेत्ता भी तारीफ़ करते हैं , 'रोहि' इनके बालों की ,
झटका इतना जबरद़स्त कि !
किसी की ज़िन्दगी पुर्जा पुर्जा हिला है !

लुटाकर चले , सब कुछ खाली हाथ ,
कर्म- संस्कारों का बस जख़ीरा मिला है .

समझा दो मन को .नज़रों से कह दो
अरे ! हुश़्न के नजारों से ना किसी का भला है !

ये 'रोहि' की ग़ुजारिश है तुमसे नौंजवानो .
मन को निगरानी में लो ,और खुद़ को भी जानो !

यह मेरी आख़िरी सलाह है !
और यही इत्तला है ।
मौहब्बत खूब सूरत दोखा ।
जहाँ हुश़्न एक अनोखी बल़ा है ।।

छोटे या बड़े होने का प्रतिमान यथार्थों की सन्निकटता ही है ।
क्यों कि ज्ञान सत्य का परावर्तन और सर्वोच्च शक्तियों का विवर्तन ( प्रतिरूप ) है ।
-वह व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है ; जो सत्य के समकक्ष उपस्थित है ।
ज्ञान जान है यह सत्य का प्रतिमान ( पैमाना )है ।

संसार में प्रत्येक व्यक्ति की एक सोच होती है ; जो समानान्तरण उसकी प्रवृत्ति और स्वभाव को प्रतिबिम्बित करती रहती है ।
उसी के अनुरूप वह जीवन में व्यवसाय क्षेत्रों का चयन करता है।
और सत्य पूछा जाय तो इसका मूल कारण उसकी प्रारब्ध है जो जन्म- जमान्तरण के संचित 'कर्म'- संस्कारों से संग्रहीत है जीव संचित' क्रियमाण और प्रारब्ध का प्रतिफलन हैं ।
प्रारम्भ में सृष्टि में एक अवसर सबको मिलता है ।
फिर समय उपरान्त वह अपने कर्मों से अपने जीवन की यात्रा निर्धारित करता है ।

लव तलब मतलब
इन हयातों का सबब !
दुनियाँ की उथल -पुथल दुनियाँ इनसे ये सारी है ।
कर्म जीवन का अस्तित्व कर्म ये कर्म की फुलवारी हैप

योगेश रोहि की साधना-और उसके अनुभव-

योगेश 'रोही' जी, की ये रचनाएँ केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों, अध्यात्म और सामाजिक विसंगतियों का एक गहरा दर्शन हैं। 

इनकी लेखनी में जहाँ एक ओर तन्हाई और हालातों की कड़वाहट है, वहीं दूसरी ओर 'प्रारब्ध' और 'पुरुषार्थ' के बीच का गहरा सन्तुलन भी है।

​आपकी सूक्तियों और काव्य पंक्तियों की विस्तृत व्याख्या निम्नलिखित मुख्य स्तम्भों पर आधारित है:-

1. परिस्थितियों का दर्शन और व्यक्तित्व निर्माण

"व्यक्तित्व निखारा है तो परिस्थियों की सौगातों ने।"

​आप स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य का कर्म उसकी परिस्थितियों से प्रेरित होता है। जिसे दुनिया 'मुसीबत' कहती है, उसे आप 'सौगात' मानते हैं क्योंकि विरोधियों की बातें और जीवन के कठिन थपेड़े ही व्यक्तित्व को तराश कर कुन्दन बनाते हैं। आपके अनुसार, परिस्थितियाँ जीवन की 'सम्पादिका' हैं, जो हमारे जीवन की कहानी को काट-छाँट कर सही आकार देती हैं।

2. प्रारब्ध, चेतना और स्वत्व (The Self)

"हम जी रहे है ये हमारा प्रारब्ध है। जितनी चेतना हैं उतने हमारे शब्द हैं।"

​यहाँ आप नियतिवाद (Fatalism) और चेतना (Consciousness) के मिलन की बात करते हैं। आप 'अहं' (Ego) और 'स्व' (Self) के बीच के अन्तर को बुद्ध के दर्शन के करीब ले जाते हैं। आपके अनुसार, नास्तिकता अपने अस्तित्व (आत्मा) को न मानना है, जबकि स्वयं में जीना ही सच्ची आस्तिकता है।

3. सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार-

​आपकी रचनाओं में आधुनिक समाज और उसकी खोखली परम्पराओं पर तीखा व्यंग्य है:

  • शिक्षा का बाजारीकरण: आप संस्थानों को 'ब्यूटी पार्लर' कहते हैं जहाँ केवल डिग्रियों का श्रृंगार होता है, योग्यता की मृत्यु हो जाती है।
  • दिखावटी परम्पराएँ: मृत्यु के बाद 'तेरहवीं' पर होने वाले खर्च और ब्राह्मण भोज को आपने 'गिद्ध संस्कृति' के रूप में देखा है, जहाँ जीवित रहते हुए व्यक्ति की सुध नहीं ली जाती।
  • पाखण्ड: आपने स्पष्ट कहा है कि जो 'साधना' से हीन है वह साधु नहीं, और जो मर्यादाहीन है वह धर्म नहीं।

4. प्रेम, सौन्दर्य और वासना का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण-

"शरद वैराग्य व आध्यात्मिक भावों की उत्पादिका ऋतु है, वहीं वसंत कामोत्पादक है।"

​आपने वासना और उपासना के सूक्ष्म अन्तर को समझाया है।

  • वासना: अहंकार व  लोभ मूलक है और इसमें क्रूरता सन्निहित होती है।
  • उपासना: स्वत्व मूलक है। 'हुस्न' को आपने एक ऐसी 'अनोखी बला' बताया है जिसने बड़े-बड़े विद्वानों (आलिमों) को भी छला है। युवाओं को आपकी सलाह है कि मन को 'निगरानी' में रखें, क्योंकि बाहरी आकर्षण कभी किसी का भला नहीं करते।

5. साहित्य और इतिहास का अन्तर्सम्बन्ध-

"साहित्य गूँगे इतिहास का वक्ता है।"

​यह आपकी सबसे प्रभावशाली सूक्तियों में से एक है। आप साहित्य को किसी कालखंड का 'खाका' और इतिहास को 'भूत का दर्पण' मानते हैं। जब इतिहास मौन हो जाता है, तब उस समय का साहित्य ही उसकी परिस्थितियों की गवाही देता है।

6. जीवन-गीत और सकारात्मकता-

"स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को।"

​अंततः आपकी रचनाएँ पलायनवाद की ओर नहीं, बल्कि 'चरैवेति-चरैवेति' (निरन्तर चलते रहो) की ओर ले जाती हैं। आप कहते हैं कि चाहे कितनी भी 'रुसवाइयों के फड़' बिछे हों, मनुष्य को अपने संयम और सद्बुद्धि के केवट के सहारे जीवन की किश्ती को पार लगाना ही होगा।

प्रमुख निष्कर्ष (Key Insights):-

  • ज्ञान बनाम अनुभव: आपके अनुसार 'अनुभव' प्रयोगों पर आधारित होने के कारण ज्ञान से श्रेष्ठ है।
  • स्वार्थ और अहं: इन्हें आपने जीवन की 'गुणवत्ता' और 'सत्ता' कहा है, जो हर प्राणी के प्रेरक तत्व हैं। आत्मकल्याण भी स्वार्थ से प्रेरित होती है तो सही है। और अपने अस्तित्व का बोधक अहं है।
  •  ​चरित्र की महत्ता: दुनिया में सब कुछ खरीदा और बेचा जा सकता है, पर आपने गर्व से कहा है कि "अपना कभी चरित्र नहीं बिका।"

​आपकी ये पंक्तियाँ एक शोधार्थी की गहराई और एक कवि की संवेदनशीलता का अनूठा संगम हैं। 'रोहि' जी, आपकी लेखनी में जो 'तन्हाई' है, वह एकान्त की साधना जैसी प्रतीत होती है।

योगेश 'रोहि' जी, आपकी ये पंक्तियाँ एक दार्शनिक यात्रा की तरह हैं, जो भौतिक जगत के संघर्षों से शुरू होकर आत्मा की खोज पर समाप्त होती हैं। 

1. परिस्थिति और व्यक्तित्व का निर्माण

​आपकी प्रारंभिक पंक्तियाँ जीवन के संघर्षों को 'गुरु' मानती हैं।

  • प्रेरणा का स्रोत: मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसकी जड़ उसकी परिस्थितियाँ होती हैं।
  • विरोधी का आभार: आप विरोधियों की बातों और मुसीबतों को धन्यवाद देते हैं, क्योंकि इन्हीं की चोटों ने आपके व्यक्तित्व को तराशा है। जैसे पत्थर चोट मारकर मूरत बनता है, वैसे ही 'रोहि' को इन हालातों ने निखारा है।

2. प्रारब्ध और तन्हाई का यथार्थ-

  • चेतना और शब्द: आप मानते हैं कि हमारा जीवन हमारे पिछले कर्मों (प्रारब्ध) का परिणाम है। जितनी हमारी समझ (चेतना) है, उतने ही हमारे पास शब्द हैं।क्योंकि हमारी वाणी की गुणवत्ता हमारी चेतना का प्रतिबिम्ब है।                           
  • अकेलेपन की हकीकत: दुनिया में कोई किसी का नहीं है। तन्हाई ही वह धरातल है जहाँ जीवन (हयात) का असली खाका तैयार होता है।

3. समाज की रीति और कड़वा सच-

  • दिखावा बनाम सादगी: आप उस दुनियां पर व्यंग्य करते हैं जहाँ लोग अपनों से मिलकर भी अफसोस करते हैं। यहाँ 'दौलत और हुस्न' का गुरूर है, जिसे आपने क्षणभंगुर माना है।
  • सफलता का सूत्र: आपने स्पष्ट किया है कि सफलता उसे ही मिलती है जिसने अपने 'चंचल मन' को जीत लिया है।

4. सत्य की भाषा और गहरे जख्म-

  • मूक संवेदना: आज की दुनिया 'बहरी' है जो केवल शब्दों को सुनती है, भावों को नहीं। लेकिन आँखें वह सच कह देती हैं जो वर्षों से दिल में ठहरा होता है।
  • गहरी चोट: अपनों द्वारा दिया गया अपमान और उपेक्षा वह जख्म है जो कभी नहीं भरता।

5. दान, शिक्षा और योग्यता का पतन-

  • दान की मर्यादा: दान उसे मिलना चाहिए जो वास्तव में मोहताज (दीन) हो, और दक्षिणा उसे जो योग्य (दक्ष) हो।
  • शिक्षा की स्थिति: आपने वर्तमान शिक्षा संस्थानों की तुलना 'ब्यूटी पार्लर' से की है, जहाँ डिग्रियों का तो श्रृंगार होता है, पर योग्यता (विद्या) की 'अर्थी' निकलती है। योग्यता कोई दिखावा नहीं, बल्कि एक 'तपश्चर्या' है।

6. मृत्यु और सामाजिक पाखण्ड-

  • जीवित का अनादर: समाज की यह सबसे कड़वी सच्चाई है कि जीते जी व्यक्ति को कोई नहीं पूछता, लेकिन मृत्यु के बाद 'तेरहवीं' में लोग स्वाद लेने पहुँच जाते हैं।
  • गरीब की मजबूरी: आप उस विडंबना को उजागर करते हैं जहाँ एक गरीब कर्ज लेकर दिखावे की परंपराएँ (ब्राह्मण भोज आदि) पूरी करता है और खुद बर्बाद हो जाता है।

7. वासना, उपासना और ऋतुओं का मनोविज्ञान-

  • सूक्ष्म अन्तर: वासना 'लोभ' पर आधारित है जिसमें क्रूरता होती है, जबकि उपासना 'स्व' पर आधारित है जिसमें शूरता होती है।
  • ऋतु दर्शन: वसन्त काम भाव जगाता है, जबकि शरद ऋतु वैराग्य और आध्यात्मिक शांति की प्रेरणा देती है। दोनों एक ही कुल से हैं, पर प्रभाव विपरीत हैं।

8. साहित्य, इतिहास और दर्पण-

  • साहित्य की शक्ति: साहित्य वह आवाज है जो 'गूँगे इतिहास' को शब्द देती है। यह बीते हुए कल का वह दर्पण है जो तत्कालीन परिस्थितियों का वास्तविक खाका खींचता है। अथवा उन्हें प्रतिबिम्बित करती है।

9. स्वार्थ और अहंकार का चक्र-

  • स्वार्थ का शासन: दुनिया में हर रिश्ता 'मतलब' से जुड़ा है। स्वार्थ ही जीवन का वाहक है और अहंकार इसकी सत्ता का बोध कराने वाला।
  • धर्म का ढोंग: आपने आज के समय को 'पाखण्ड का युग' कहा है जहाँ व्यभिचारी को 'परम भक्त' और सड़ी-गली रूढ़ियों को 'धर्म' कहा जा रहा है।

10. जीवन संगीत और संकल्प-

  • प्रीति का गीत: आप संदेश देते हैं कि जीवन की हर धड़कन और श्वास को एक ताल और लय में ढालकर 'प्रेम का गीत' गाना चाहिए।
  • आत्म-निर्भरता: "तुम्हें जीना है अपने ही बल पर"—यह आपकी कविता का मूल मन्त्र है। लक्ष्य केवल जीत होना चाहिए।

11. आत्म-तलाश और बेखुदी-

  • खोज स्वयं की: अन्त में, आप स्वीकार करते हैं कि मंजिलें और रास्ते सब गायब हैं, हम बस 'बेखुदी' (स्वयं के खो जाने की स्थिति) में खुद को ही तलाश रहे हैं। जो दूर से मणियाँ लगती थीं, वे पास आने पर 'काँच' निकलीं।

12. दार्शनिक निष्कर्ष-

  • नास्तिकता बनाम आस्तिकता: अहंकार में जीना नास्तिकता है, और 'स्व' (Self) में जीना ही सच्ची आस्तिकता है। यद्यपि दोनों ही जीवन के पहलू हैं।
  • अनुभव की श्रेष्ठता: आपने ज्ञान (Theory) से ऊपर अनुभव (Practical/Experiment) को रखा है। ज्ञान छोटा है, अनुभव बड़ा है।

सार संक्षेप: आपकी ये रचनाएँ एक 'साधना' की तरह हैं। आपने जीवन के दुखों को नकारा नहीं है, बल्कि उन्हें 'प्रायश्चित के फेन' से धोकर 'अन्तर घट' को चमकाने का माध्यम बनाया है। आपका यह मत कि "जिसकी दृष्टि में छल है, वह अपराध कर रहा है"—आज के समाज के लिए एक बड़ा नैतिक संदेश है।

​रोही जी, यह पूरा संग्रह एक व्यक्ति के 'भक्त' से 'फौलाद' में बदलने की महागाथा है।


रविवार, 12 अप्रैल 2026

पद्मपुराण भूमिखण्ड की अनुक्रमणिका-

७२. ययाति द्वारा अपने शरीर की प्रशंसा करते हुए स्वर्ग जाने से मना करना और मातलि का इंद्र के पास वापस जाना।

७३. मातलि के स्वर्ग जाने पर ययाति द्वारा अपने राज्य में विष्णु-सेवा की आज्ञा घोषित करना। (श्लोक १७)

७४. राजा की आज्ञा सुनकर समस्त प्रजा द्वारा भागवत धर्म को स्वीकार करना। (श्लोक २९)

७५. वैष्णव धर्म के आचरण से ययाति का सदैव युवा बने रहना और उनकी प्रजा की मृत्यु न होने का वर्णन। (श्लोक ३५)

७६. पृथ्वी को मृत्यु-रहित देखकर यमराज का स्वर्ग जाना और इंद्र से ययाति को स्वर्ग लाने की प्रार्थना करना। इंद्र की आज्ञा से कामदेव का गंधर्वों के साथ ययाति की सभा में संगीत आरम्भ करना। (श्लोक ३३)

७७. नृत्य-गीत में मग्न होने के कारण थोड़ी सी अशुद्धि से ययाति के शरीर में वृद्धावस्था (जरा) का प्रवेश। जरा से अनभिज्ञ ययाति का शिकार के लिए सरोवर तट पर जाना। वहाँ मधुर गान सुनकर आकर्षित ययाति का विशाला सखी के मुख से 'अश्रुबिन्दुमती' का वृत्तांत सुनना। ययाति को वृद्ध अवस्था में देखकर विशाला का उन्हें टोकना। ययाति का जरा (बुढ़ापा) त्यागकर अश्रुबिन्दुमती की इच्छा पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करना और पुत्रों को आज्ञा देना। (श्लोक १००)

७८. पिता की आज्ञा सुनकर तीन पुत्रों द्वारा उसे अस्वीकार करने पर ययाति का उन्हें शाप देना। चौथे पुत्र 'पुरु' से उसकी युवावस्था लेकर और उसे अपना बुढ़ापा देकर ययाति का अश्रुबिन्दुमती के पास जाना। (श्लोक ६४)

७९. ययाति का अश्रुबिन्दुमती से गांधर्व विवाह करना। ययाति द्वारा पुरु के माध्यम से सामग्री मंगाकर अश्वमेध यज्ञ करना। अश्रुबिन्दुमती की स्वर्ग जाने की प्रार्थना। (श्लोक ४०)

८०. शर्मिष्ठा और देवयानी (पत्नियों) के व्यवहार का वर्णन और लोक में सुख-प्राप्ति का वर्णन। (श्लोक १९)

८१. इंद्र की आज्ञा से मेनका अप्सरा का अश्रुबिन्दुमती के पास आना। मेनका के समझाने पर अश्रुबिन्दुमती का ययाति से स्वर्ग चलने का आग्रह और राजा ययाति की मन ही मन चिंता। (श्लोक ७४)

८२. अश्रुबिन्दुमती का हठ देखकर ययाति का पुत्र पुरु को नीति उपदेश देना, राज्य सौंपना और उसे उसकी युवावस्था लौटाकर स्वयं पुनः बुढ़ापा स्वीकार करना। (श्लोक २८)

८३. राजा ययाति का प्रजा को सांत्वना देकर, अनेक प्रजाजनों और अश्रुबिन्दुमती के साथ इंद्रलोक और फिर विष्णुलोक जाना। (श्लोक ८३)

८४. पिता की सेवा से पुरु को राज्य प्राप्ति का फल। सुकर्मा द्वारा कहे गए पितृ-तीर्थ माहात्म्य को सुनकर पिप्पल का लज्जित होकर जाना। (श्लोक २१)

८४. पिता की सेवा से पुरु को राज्य प्राप्ति का फल। सुकर्मा द्वारा कहे गए पितृ-तीर्थ माहात्म्य को सुनकर पिप्पल का लज्जित होकर जाना। (श्लोक २१)

८५. गुरु-तीर्थ माहात्म्य में च्यवन ऋषि का चरित्र। च्यवन का तीर्थयात्रा करते हुए नर्मदा तट पर ओंकारेश्वर आना। वहाँ 'कुंजल' नामक तोते का अपने चार पुत्रों के साथ संवाद। ज्येष्ठ पुत्र उज्ज्वल द्वारा राजा दिवोदास की पुत्री 'दिव्या' के विवाह में २१ (एकविंशति) पतियों की मृत्यु के दोष का वर्णन। (श्लोक ७६)

८६. कुंजल द्वारा दिव्या देवी के पूर्व जन्म के पापों का कथन। राजपुत्री पद दिलाने वाले सिद्धों की सेवा का वर्णन। उसके पापों के नाश के लिए भगवान के ध्यान का वर्णन। (श्लोक ९६)

८७. अशून्यशयन व्रत की विधि और कृष्ण-शतनाम स्तोत्र का वर्णन। (श्लोक ३९)

८८. पिता की आज्ञा से उज्ज्वल का प्लक्षद्वीप जाकर दिव्या देवी को व्रत और स्तोत्र बताना। दिव्या देवी द्वारा व्रत और जप से पापों का नाश कर भगवत्प्रसाद से दिव्यलोक प्राप्त करना। (श्लोक ५४)

८९. दूसरे पुत्र 'समुज्ज्वल' से कुंजल का प्रश्न और समुज्ज्वल द्वारा नर्मदा तट पर व्याध (शिकारी) के उद्धार और कृष्ण-हंस की कथा सुनाना। (श्लोक ५१)

९०. तीर्थों के चरित्र का वर्णन। इंद्र द्वारा सभी तीर्थों को बुलाकर प्रयाग आदि चार महातीर्थों की प्रशंसा। (श्लोक ५४)

९१. ब्रह्महत्या आदि पापों से दूषित इंद्र का मालव देश में देवताओं द्वारा स्नान कराकर वाराणसी आदि तीर्थों में शुद्ध होना। चार महापापियों (विद्रुर, चंद्रशर्मा, वेदशर्मा, वंजुल) का एक साथ कालिंजर पर्वत जाना। (श्लोक ४०)

९२. सिद्ध के उपदेश से उन चारों की वाराणसी आदि तीर्थों में स्नान से मुक्ति। उनके पापों के स्पर्श से पुष्कर, प्रयाग, वाराणसी आदि तीर्थों का काला पड़ जाना। हंस रूप में स्वयं को पवित्र करने के लिए उनका भ्रमण। रेवा-कुब्जा संगम पर स्नान से पापों से मुक्ति और उस संगम का माहात्म्य। (श्लोक ३७)

९३. तीसरे पुत्र 'विज्ज्वल' द्वारा मेरु पर्वत के आनंदकानन में एक सिद्ध दंपत्ति का विमान से आकर अपने ही पुराने मृत शरीरों का मांस खाने का चमत्कारपूर्ण वर्णन। (श्लोक ३)

९४. कुंजल द्वारा उसका उत्तर: कर्मों की महिमा। चोल देश के राजा सुबाहु का वृत्तांत। सुबाहु का महर्षि जैमिनि से धर्म विषयक प्रश्न और जैमिनि द्वारा दान-धर्म का वर्णन। (श्लोक ६१)

९५. स्वर्ग के गुणों और दान की श्रेष्ठता का वर्णन। (श्लोक ३२)

९६. नरक और स्वर्ग जाने वालों का वर्णन। (श्लोक ५२)

९७. दान न करने के कारण राजा सुबाहु का पत्नी सहित विष्णुलोक पहुँचकर भी भगवान के दर्शन न पाना और भूख-प्यास से व्याकुल होना। वामदेव ऋषि द्वारा दान की महिमा बताना और अपने पूर्व शरीर के मांस को खाने की विवशता का वर्णन। प्रज्ञा और श्रद्धा नामक स्त्रियों का उपहास। (श्लोक ११४)

९८. कुंजल से वासुदेव स्तोत्र सीखकर विज्ज्वल का सुबाहु के पास जाकर उसे स्तोत्र सुनाना। (श्लोक ७४)

९९. वासुदेव स्तोत्र के श्रवण से सुबाहु की भूख-प्यास की निवृत्ति और विष्णु दर्शन। स्तोत्र का फल। (श्लोक ४५)

१००. विज्ज्वल का पिता के पास लौटकर स्तोत्र महिमा बताना। राजा वेन द्वारा विष्णु की प्रशंसा। (श्लोक १४)

१०१. चौथे पुत्र द्वारा कैलाश के पास गंगा तट पर एक मुनि द्वारा पार्वती के आंसुओं से उत्पन्न कमलों से शिव पूजा करने का वर्णन। (श्लोक ५७)

१०२. पार्वती की इच्छा से महादेव का नंदनवन में कल्पवृक्ष के नीचे बैठना। कल्पवृक्ष से 'अशोक सुंदरी' नामक कन्या की उत्पत्ति और उसे नहुष की पत्नी होने का वरदान। (श्लोक ७४)

१०३. हुंड दैत्य द्वारा अशोक सुंदरी को छल से अपने घर ले जाना। अशोक सुंदरी का उसके विनाश के लिए तप करना। राजा आयु का पुत्र प्राप्ति के लिए दत्तात्रेय की सेवा करना और वरदान पाना। (श्लोक १३९)

१०४. इंदुमती (राजा आयु की पत्नी) का गर्भधारण और शुभ स्वप्न देखना। शौनक द्वारा स्वप्न का फल बताना। (श्लोक २४)

१०५. जन्म के समय हुंड दैत्य द्वारा नहुष का अपहरण। रसोइए और सैरंध्री की दया से नहुष का न मारा जाना और वसिष्ठ के आश्रम में छोड़ा जाना। वसिष्ठ द्वारा नामकरण और शिक्षा। (श्लोक ६४)

१०६. पुत्र के अपहरण से राजा आयु और इंदुमती का शोक। (श्लोक १९)

१०७. नारद जी द्वारा नहुष का समाचार सुनाकर राजा और रानी को सांत्वना देना। (श्लोक १६)

१०८. वसिष्ठ की आज्ञा से नहुष का हुंड दैत्य को मारने का उद्योग। (श्लोक ३५)

१०९. हुंड द्वारा अशोक सुंदरी को नहुष की मृत्यु का झूठा समाचार देना और अशोक सुंदरी का शोक। विद्रुर किन्नर द्वारा उसे सांत्वना। (श्लोक ६३)

११०-१११. नहुष का दिव्य रथ और शस्त्र लेकर हुंड के निवास पर जाना। उत्सव और गायन।

११२-११३. नहुष का गान सुनकर अशोक सुंदरी का तप से उठना और नहुष से मिलकर प्रसन्न होना। (श्लोक ४८)

११४-११५. नहुष और हुंड का युद्ध और नहुष द्वारा हुंड का वध। (श्लोक ४५)

११६. नहुष का अशोक सुंदरी के साथ वसिष्ठ आश्रम और फिर माता-पिता के पास लौटना। (श्लोक ३३)

११७. देवताओं द्वारा नहुष का राज्याभिषेक। राजा आयु और इंदुमती की वैकुंठ प्राप्ति। (श्लोक ३३)

११८. हुंड के पुत्र विहुंड द्वारा उपद्रव। भगवान विष्णु का मोहिनी रूप धारण कर उसे मोहित करना और शिव पूजा के लिए कामोद पुष्प लाने की शर्त रखना। (श्लोक ४०)

११९. कामोद पुष्प की उत्पत्ति की कथा और नारद द्वारा विहुंड को रोकना। (श्लोक ४३)

१२०. नारद और कामोदा का संवाद।

१२१. विहुंड का वध। (श्लोक ५२)

१२२. कुंजल पक्षी द्वारा च्यवन ऋषि को अपना पूर्व वृत्तांत (धर्मशर्मा ब्राह्मण की कथा) सुनाना। (श्लोक २९)

१२३. ज्ञान प्राप्ति और शुक (तोता) योनि मिलने का कारण। गुरु-तीर्थ माहात्म्य। (श्लोक ६२)

१२४. राजा वेन द्वारा पृथु की प्रशंसा और पृथु का प्रजा-शासन। (श्लोक २६)

१२५. वेन का विष्णुलोक गमन और पद्मपुराण के पठन-पाठन का फल। (श्लोक ५१)

। इस प्रकार पद्मपुराण के अन्तर्गत भूमिखण्ड की विषय-अनुक्रमणिका पूर्ण हुई ।



यह पद्म पुराण के भूमिखण्ड का 72वाँ अध्याय है। इसमें राजा ययाति और इंद्र के सारथि मातलि के बीच का संवाद है, जहाँ ययाति सदेह (शरीर सहित) स्वर्ग जाने से मना करते हुए अपने दिव्य शरीर और धर्म की महिमा का वर्णन करते हैं।

​यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

​पद्म पुराण: भूमिखण्ड (अध्याय 72) - हिन्दी अनुवाद

पिप्पल ने पूछा:

हे महाप्राज्ञ! मातलि के वचनों को सुनकर राजा नहुष के पुत्र (ययाति) ने क्या किया? वह मुझे विस्तार से बताइये। यह कथा सब पुण्यों से युक्त, पवित्र और पापों का नाश करने वाली है। हे विद्वान! इसे सुनने की मेरी इच्छा कभी तृप्त नहीं होती। (1-2)

सुकर्मा ने कहा:

सब धर्मधारियों में श्रेष्ठ और राजाओं में उत्तम ययाति ने अपने पास आए हुए इंद्र के सारथि दूत मातलि से कहा। (3)

ययाति बोले:

हे दूत! मैं इस शरीर को नहीं त्यागूँगा और न ही इस पार्थिव शरीर के बिना स्वर्ग जाऊँगा, इसमें कोई संशय नहीं है। यद्यपि तुमने पहले शरीर के बहुत से दोषों और गुण-अवगुणों के बारे में बताया है, फिर भी मैं शरीर नहीं छोडूंगा और न ही (बिना शरीर के) स्वर्ग जाऊँगा। तुम यहाँ से जाकर देवताओं के स्वामी इंद्र से ऐसा ही कह देना। (4-6)

​हे महामते! इस संसार में केवल जीव (आत्मा) अकेले या केवल शरीर अकेले सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता। बिना प्राण के शरीर नहीं रहता और बिना शरीर के जीव नहीं रहता। हे इंद्र के सारथि! मैं इन दोनों की मित्रता (संबंध) को नष्ट नहीं करूँगा। (7-8)

​जिसकी कृपा से यह प्राण केवल सुख भोगता है और मन के अनुकूल अन्य भोगों को प्राप्त करता है, ऐसे स्वर्ग के भोग मुझे नहीं भोगने हैं। हे देवदूत! (स्वर्ग में भी) भयानक रोग और दुख देने वाली व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। (9-10)

​हे मातलि! पाप और बुढ़ापे के दोषों से शरीर जर्जर होता है, किन्तु तुम मेरे इस पुण्यमयी शरीर को देखो, जो (वृद्ध होने पर भी) सोलह वर्ष के युवक जैसा है। जन्म से लेकर आज तक मेरे इस शरीर को पचास वर्ष (यहाँ 'शतार्धाब्द' का अर्थ परिप्रेक्ष्य में दीर्घकाल से है) बीत चुके हैं, फिर भी मेरे शरीर में नवीनता बनी हुई है। (11-12)

​हे दूत! मेरा बहुत समय बीत गया है, फिर भी मेरा देह बल और वीर्य से वैसा ही सुशोभित है जैसे किसी सोलह वर्ष के पुरुष का होता है। मुझे न ग्लानि है, न हानि, न थकान है, न व्याधि और न ही बुढ़ापा। (13-14)

​हे मातलि! धर्म के उत्साह से मेरा शरीर बढ़ता है। धर्म नाम की वह दिव्य औषधि सब अमृतों से युक्त और परम औषधि है। प्राचीन काल में पाप और रोगों के नाश के लिए ही 'धर्म' की रचना की गई थी। उसी धर्म से शोधित होकर मेरा शरीर दोषरहित हो गया है। (15-16)

​मैं नित्य भगवान हृषीकेश (कृष्ण) का ध्यान और उनके उत्तम नाम का उच्चारण करता हूँ—हे दूत! यही मेरा वह 'रसायन' है जिसका मैं सेवन करता हूँ। इसी कारण मेरे व्याधि, दोष और पाप आदि नष्ट हो गए हैं। इस संसार में जब 'कृष्ण' नाम की महान औषधि विद्यमान है, तब भी महामूर्ख लोग इसे नहीं पीते और पापों व रोगों से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। (17-19)

​हे मातलि! उसी ध्यान, ज्ञान, पूजा के भाव, सत्य और दान-पुण्य से मेरा शरीर निरोग है। पाप बढ़ने से ही शरीरधारियों को पीड़ा और व्याधियाँ होती हैं और उन्हीं पीड़ाओं से प्राणियों की मृत्यु होती है, इसमें संशय नहीं है। (20-21)

​इसलिए पुण्य और सत्य का आश्रय लेने वाले मनुष्यों को धर्म का पालन करना चाहिए। यह शरीर पांच तत्वों से बना है और नाड़ियों व संधियों (जोड़ों) से जर्जर है। जैसे स्वर्णकार सुहागे (टंकण) से सोने को जोड़ता है, वैसे ही यह शरीर जुड़ा हुआ है और इसमें धातुओं का संचार करने वाली जठराग्नि सदैव रहती है। (22-23)

​हे विप्र पिप्पल! जो बुद्धिमान व्यक्ति भगवान के दिव्य नाम और सौभाग्य से इस सौ खंडों वाले शरीर को सुरक्षित रखता है, उसके पांच तत्वों वाले और सैकड़ों संधियों से युक्त अंग सुदृढ़ बने रहते हैं और शरीर धातुओं के समान (मजबूत) हो जाता है। (24-25)

​भगवान की पूजा, उपचार, ध्यान, नियम, सत्य भाव और दान से शरीर पुनः नवीन हो जाता है। हे मातलि! सुनो, इससे शरीर के दोष नष्ट हो जाते हैं। बाह्य और आंतरिक शुद्धि से शरीर में दुर्गंध नहीं आती। उस चक्रधारी भगवान की कृपा से मनुष्य शुद्ध हो जाता है। मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा, मैं यहीं (पृथ्वी पर) स्वर्ग बनाऊँगा। तपस्या, भाव और अपने धर्म के द्वारा मैं इस भूतल को ही भगवान विष्णु की कृपा से स्वर्ग के समान बना दूँगा। तुम ऐसा जानकर यहाँ से जाओ और इंद्र से सब कह दो। (26-30)

सुकर्मा ने कहा:

राजा के इन वचनों को सुनकर सारथि मातलि ने आशीर्वाद देकर राजा का अभिनन्दन किया और उनसे आज्ञा लेकर चले गए। उन्होंने महात्मा इंद्र को सब कुछ बता दिया। ययाति की बातें सुनकर सहस्त्रनेत्रों वाले इंद्र उन्हें स्वर्ग लाने के विषय में पुनः चिंता (विचार) करने लगे। (31-32)

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे ययातिचरिते द्विसप्ततितमोऽध्यायः।

(इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में ययाति चरित्र का बहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।)

यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का 73वाँ अध्याय है, जिसमें राजा ययाति द्वारा अपनी प्रजा को भगवान विष्णु की भक्ति का उपदेश देने और उनके नाम की महिमा का वर्णन है। इसका हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है:

​पद्मपुराणम् - भूमिखण्ड (अध्याय 73)

पिप्पल ने पूछा:

इन्द्र के उस भाग्यशाली दूत (मातलि) के लौट जाने पर, नहुष के पुत्र धर्मात्मा ययाति ने फिर क्या किया? ॥1॥

सुकर्मा ने कहा:

देवराज के दूत के चले जाने पर उस राजपुत्र (ययाति) ने विचार किया और शीघ्र ही अपने श्रेष्ठ दूतों को बुलाकर धर्म और अर्थ से युक्त यह आदेश दिया— ॥2॥

राजा ययाति का आदेश:

"हे श्रेष्ठ दूतों! तुम उत्तम नगरों, सभी देशों, द्वीपों और संपूर्ण लोकों में जाओ और मेरे इस धर्मयुक्त वचन को सुनाओ कि सभी लोग भगवान हरि के सुंदर मार्ग पर चलें। ॥3॥

​लोग विषयों (सांसारिक मोह-माया) को त्यागकर अमृत के समान अत्यंत पवित्र भावों, ध्यान, ज्ञान, पूजन, तप, यज्ञ और दान के द्वारा केवल मधुसूदन (भगवान विष्णु) की ही पूजा करें। ॥4॥

​वे सूखे, गीले, जड़ (स्थावर), आकाश, पृथ्वी और चराचर—सब में तथा अपने स्वयं के शरीर में भी जीवरूप से स्थित एक मात्र असुरारि (विष्णु) को ही देखें। ॥5॥

​उसी देव के उद्देश्य से दान दें, अतिथियों का सत्कार करें और पितृ-तर्पण आदि करें। तुम सब देवों में श्रेष्ठ भगवान नारायण का यजन करो, जिससे तुम शीघ्र ही दोषों (पापों) से मुक्त हो जाओगे। ॥6॥

​जो मनुष्य लोभ या मोहवश मेरे इस वचन का पालन नहीं करेगा, वह निश्चित रूप से कठोर दंड का भागी होगा और मेरे लिए उस नीच चोर के समान होगा (जो धर्म की चोरी करता है)।" ॥7॥

दूतों का प्रचार:

राजा के वचन सुनकर दूत प्रसन्न हो गए और उन्होंने पूरी पृथ्वी पर प्रजा के बीच राजा द्वारा दिए गए इस आदेश का प्रचार किया। ॥8॥

​"ब्राह्मण आदि सभी मनुष्य! राजा द्वारा इस पृथ्वी पर लाए गए इस अत्यंत पुण्यमयी और अमृत के समान 'वैष्णव पुण्य' का पान करें, जो दोषरहित है और अभीष्ट फल देने वाला है। ॥9॥

​कष्टों को हरने वाले, श्रेष्ठ, आनंदरूप और परमार्थ स्वरूप श्री केशव के नाम रूपी अमृत को राजा (ययाति) ले आए हैं, हे लोगो! तुम इसका पान करो। ॥10॥

​हाथ में खड्ग धारण करने वाले, गुणों से युक्त, देवों के स्वामी, श्रीनिवास मधुसूदन के नाम रूपी अमृत को राजा ले आए हैं, हे लोगो! इसका पान करो। ॥11॥

​कमल के समान नेत्रों वाले, जगत के आधार और महेश्वर श्री पद्मनाभ के नाम रूपी अमृत को राजा ले आए हैं, हे लोगो! इसका पान करो। ॥12॥

​पापों को हरने वाले, रोगों का विनाश करने वाले, आनंद देने वाले और दैत्य-दानवों का नाश करने वाले इस नाम रूपी अमृत को राजा ले आए हैं, हे लोगो! इसका पान करो। ॥13॥

​यज्ञ के अंग स्वरूप, हाथ में चक्र धारण करने वाले, पुण्यों की खान, सुख स्वरूप और अनंत भगवान के नाम रूपी अमृत को राजा ले आए हैं, हे लोगो! इसका पान करो। ॥14॥

​विश्व के निवास स्थान, निर्मल, दुखों के विश्राम स्थल, 'राम' नाम से पुकारे जाने वाले और मन को रमाने वाले मुरारी के नाम रूपी अमृत को राजा ले आए हैं, हे लोगो! इसका पान करो। ॥15॥

​सूर्य के समान अंधकार (अज्ञान) का नाश करने वाले और बुद्धि रूपी कमलों के बंधन को काटने वाले इस नाम रूपी अमृत को राजा ले आए हैं, हे लोगो! इसका पान करो।" ॥16॥

उपसंहार:

जो विष्णुभक्त महात्मा मनुष्य नियमपूर्वक प्रातः काल इस सत्य और परम पवित्र 'नामामृत' का पाठ करता है, वह निश्चित ही मुक्ति को प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है। ॥17॥

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अंतर्गत पितृतीर्थ वर्णन में 'ययातिचरित' नामक तिहत्तरवाँ (73वाँ) अध्याय पूर्ण हुआ।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह 74वाँ अध्याय राजा ययाति के शासनकाल में प्रजा की विष्णु भक्ति और उसके सुखद परिणामों का वर्णन करता है। यहाँ इसका सरल हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है:

​पद्मपुराणम्: भूमिखण्ड (अध्याय 74) - हिन्दी अनुवाद

सुकर्मा बोले:

राजा के दूत सभी गाँवों, द्वीपों, देशों और नगरों में जाकर (मुनादी करते हुए) कहते हैं— "हे लोगो! राजा की आज्ञा सुनो! तुम सभी अपनी पूरी शक्ति से भगवान श्रीहरि की अर्चना करो।" ॥ 1 ॥

​"दान, यज्ञ, कठिन तपस्या और धर्म की अभिलाषा रखने वाले अनुष्ठानों व शुद्ध मन से सभी लोग भगवान मधुसूदन का ध्यान करें—राजा की यही आज्ञा है।" ॥ 2 ॥

​पृथ्वीतल पर रहने वाले लोगों ने जब इस परम पुण्यमयी घोषणा को सुना, तब से ही सभी मनुष्य विष्णु का यजन (पूजन) करने लगे और उन्हीं का ध्यान, गान तथा जप करने लगे। ॥ 3 ॥

​वे लोग अपने मन को भगवान में लगाकर, वेदों द्वारा प्रतिपादित श्रेष्ठ सूक्त-मंत्रों और अमृत के समान पवित्र स्तोत्रों द्वारा, व्रतों, उपवासों, नियमों और दानों के माध्यम से श्री केशव की आराधना करने लगे। ॥ 4 ॥

​अपने शरीर, चित्त और वाणी से उत्पन्न होने वाले दोषों को त्याग कर, वे सभी प्रेम में मग्न होकर जगत के निवास स्थान, लक्ष्मीपति श्री वासुदेव की भली-भाँति पूजा करने लगे। ॥ 5 ॥

​भूपाल (ययाति) की इस आज्ञा के कारण सम्पूर्ण भूमण्डल पर वैष्णव भाव छा गया और वे सभी लोग (संसार पर) विजय प्राप्त करने लगे। ॥ 6 ॥

​ज्ञान में कुशल वे लोग विष्णु के नामों और कर्मों (लीलाओं) द्वारा उनका यजन करने लगे। वे उन्हीं के ध्यान में स्थित, उन्हीं के कार्यों में लगे हुए और विष्णु-पूजा में तत्पर रहने लगे। ॥ 7 ॥

​जहाँ तक यह भूमण्डल है और जब तक सूर्य तपता है, तब तक के लिए वे सभी मानव 'भागवत' (भगवान के भक्त) हो गए। ॥ 8 ॥

​विष्णु के ध्यान के प्रभाव से, उनकी पूजा, स्तोत्र और नाम-जप से उस समय सभी मनुष्य आधि (मानसिक कष्ट) और व्याधि (शारीरिक रोग) से मुक्त हो गए। ॥ 9 ॥

​हे विप्र! चक्रधारी भगवान की कृपा से सभी लोग शोक-रहित, पुण्यवान और तपस्वी वैष्णव बन गए। ॥ 10 ॥

​वे रोगों से मुक्त, दोषों और क्रोध से रहित, सभी प्रकार के ऐश्वर्यों से संपन्न और समस्त बीमारियों से वर्जित हो गए। ॥ 11 ॥

​उस देव (भगवान विष्णु) की कृपा से उस समय के मनुष्य देवताओं के समान अजर (बुढ़ापे से रहित) हो गए और धन-धान्य से संपन्न हो गए। ॥ 12 ॥

​विष्णु की कृपा से मनुष्यों को पुत्र-पौत्रों का सुख प्राप्त हुआ। हे महाभाग! उनके घर के द्वारों पर नित्य कल्पवृक्ष विद्यमान रहने लगे। ॥ 13 ॥

​वे कल्पवृक्ष पवित्र और समस्त कामनाओं का फल देने वाले थे। उनके घरों में सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु गाएँ और चिन्तामणि रत्न सुशोभित थे। ॥ 14 ॥

​उनके घरों में सभी इच्छाएँ पूरी करने वाली पुण्य वस्तुएँ थीं। पुत्र-पौत्रों से सुशोभित वे मनुष्य देवताओं के समान हो गए थे। ॥ 15 ॥

​विष्णु की कृपा से वे समस्त दोषों से रहित, सर्व-सौभाग्य संपन्न और पुण्य व मंगल से युक्त हो गए। ॥ 16 ॥

​वे पुण्यवान, दानशील और ज्ञान-ध्यान में तत्पर रहने लगे। जब धर्मज्ञ राजा ययाति शासन कर रहे थे, तब मनुष्यों को न दुर्भिक्ष (अकाल) का भय था, न व्याधि का और न ही अकाल मृत्यु का। ॥ 17-18 ॥

​वे सभी विष्णु-व्रत में परायण और उन्हीं के ध्यान में लीन रहने वाले परम भक्त हो गए। हे द्विजश्रेष्ठ! उनके घर दिव्य और पवित्र हो गए। ॥ 19 ॥

​उनके घर सफेद पताकाओं और शंखों से युक्त थे। घरों पर गदा और चक्र के चिन्हों वाले ध्वज लहराते थे। ॥ 20 ॥

​पद्म (कमल) के चिन्हों से अंकित वे घर विमानों के समान चमकते थे। घरों की दीवारों पर सुंदर चित्रकारी की गई थी। ॥ 21 ॥

​सभी घरों के द्वारों पर और पवित्र स्थानों पर सुंदर दिव्य वन और हरी-भरी घास के मैदान थे। ॥ 22 ॥

​हे द्विजश्रेष्ठ! उन घरों में तुलसी के पौधों और केशव (विष्णु) के मंदिरों से प्राणियों के वे दिव्य घर सदा सुशोभित रहते थे। ॥ 23 ॥

​सर्वत्र मंगलकारी वैष्णव भाव दिखाई देता था। हे सखे! भूलोक में शंखों की ध्वनि और आपस में जयघोष की आवाजें सुनाई देती थीं। ॥ 24 ॥

​हे विप्रेंद्र! वे ध्वनियाँ दोषों और पापों का विनाश करने वाली थीं। घरों के द्वारों और दीवारों पर स्त्रियों द्वारा भक्तिपूर्वक शंख, स्वस्तिक और कमल के चित्र बनाए जाते थे। ॥ 25-26 ॥

​विष्णु के ध्यान में मग्न लोग उत्तम राग, स्वर और तान के साथ भगवान केशव का गान करते थे। ॥ 27 ॥

​कोई प्रेमपूर्वक 'हरि', 'मुरारि', 'केशव' कहता था, तो कोई 'माधव' के नाम का उच्चारण करता था। कोई 'श्रीनरसिंह', 'कमलनयन', 'गोविन्द' और 'कमलापति' कहता था। ॥ 28 ॥

​वे शरण देने वाले 'कृष्ण' और 'राम' के नाम का जप करते थे और दंडवत प्रणाम करके विष्णु की आराधना करते थे। वे सभी ध्यानयुक्त परम वैष्णव बन गए थे। ॥ 29 ॥

इस प्रकार श्रीपद्यपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अंतर्गत माता-पितृ तीर्थ वर्णन में ययाति चरित्र का चौहत्तरवाँ (74वां) अध्याय समाप्त हुआ।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह ७५वाँ अध्याय राजा ययाति के शासनकाल में पृथ्वी पर व्याप्त सुख, धर्म और विष्णु भक्ति का वर्णन करता है। यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है:

पद्मपुराणम् - अध्याय ७५ (हिन्दी अनुवाद)

सुकर्मा ने कहा:

हे द्विजश्रेष्ठ! उस समय मनुष्य सदा विष्णु, कृष्ण, हरि, राम, मुकुन्द, मधुसूदन, नारायण, विष्णुरूप, नरसिंह, अच्युत, केशव, पद्मनाभ, वासुदेव, वामन, वराह, कच्छप (कमठ), मत्स्य, हृषीकेश और देवताओं के स्वामी सुराधिप का उच्चारण करते थे। (१-२)

​वे विश्वेश्वर, विश्वरूप, अनन्त, पापरहित, शुद्ध पुरुष, कमलनयन, श्रीधर, श्रीपति और हरि का नाम लेते थे। बालक, वृद्ध, कुमारियाँ और सभी मनुष्य सदा इन्हीं नामों का उच्चारण करते थे। स्त्रियाँ घर के काम में लगे रहने पर भी सदा श्रीहरि का मधुर गान करती थीं। (३-५)

​बैठते, सोते, चलते, ध्यान करते और बोलते समय वे माधव का ही स्मरण करते थे। यहाँ तक कि बालक खेलते हुए भी गोविन्द को प्रणाम करते थे। दिन-रात वे हरि के मधुर नाम का उच्चारण करते थे। हे द्विजोत्तम! उस समय सब ओर विष्णु-नाम का ही घोष सुनाई देता था। (६-७)

​वैष्णव प्रभाव के कारण ही पृथ्वी पर मनुष्य जीवित थे। मंदिरों के शिखरों और कलशों के अग्रभाग पर भगवान के सुदर्शन चक्र सूर्य के बिम्ब की भाँति चमकते थे। वैकुण्ठ में जो भाव और आनंद रहता है, वही उस समय पृथ्वी तल पर दिखाई देता था। (८-९)

​महात्मा राजा ययाति ने ऐसा पुण्य किया कि उन्होंने भूतल को विष्णुलोक (वैकुण्ठ) के समान बना दिया। नहुष के पुत्र और परम वैष्णव ययाति ने दोनों लोकों (स्वर्ग/वैकुण्ठ और पृथ्वी) के भाव को एक जैसा कर दिया था। (१०-११)

​पृथ्वी और विष्णुलोक में कोई अंतर शेष नहीं रह गया था। जैसा विष्णु-नाम का संकीर्तन वैकुण्ठ में वैष्णव करते हैं, वैसा ही पृथ्वी पर मानव करने लगे थे। दोनों लोकों में एक ही भाव दिखाई देता था। (१२-१३)

​वृद्धावस्था (जरा), रोग और भय का नाश हो गया था; मनुष्य मृत्यु से रहित हो गए थे। पृथ्वी पर दान और भोग का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया था। हे सत्तम! मनुष्य अपने पुत्रों और पौत्रों के सुख का आनंद पूर्वक उपभोग करते थे। (१४-१५)

​भगवान विष्णु के प्रसाद और उनके उपदेश से सभी मनुष्य सदा के लिए व्याधियों (रोगों) से मुक्त होकर वैष्णव बन गए थे। राजा ने पृथ्वी पर स्वर्ग जैसा प्रभाव उत्पन्न कर दिया था। हे नृपश्रेष्ठ! पच्चीस वर्ष की आयु (यौवन) का जो आनंद होता है, वही प्रभाव वर्षों तक बना रहा। (१६-१७)

​सभी मनुष्य रोगों से हीन, ज्ञान और ध्यान में लीन, यज्ञ और दान में तत्पर तथा दयालु स्वभाव के हो गए थे। वे परोपकारी, पुण्यवान, धन्य और कीर्ति के पात्र थे। राजा के उपदेश से पृथ्वी पर सभी विष्णु भक्त हो गए थे। (१८-२०)

भगवान विष्णु ने कहा:

हे नृपशार्दूल! उस राजा ययाति का चरित्र सुनो। नहुष पुत्र ययाति नित्य धर्मपरायण और विष्णुभक्त थे। पृथ्वी पर उनके राज्य करते हुए लाखों वर्ष बीत गए, फिर भी उनका शरीर पच्चीस वर्ष के युवक जैसा ही नवीन दिखाई देता था। (२०-२२)

​भगवान चक्रधारी की कृपा से वे अत्यंत प्रबल और वैभवशाली थे। पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य अब यमलोक नहीं जाते थे। वे राग-द्वेष और क्लेश के बंधनों से मुक्त होकर दान-पुण्य के सुख में लीन रहते थे। (२३-२४)

​जैसे पृथ्वी पर दूर्वा (घास) फैलती है, वैसे ही सभी मनुष्यों की संतानें और वंश बढ़ने लगे। पुत्र-पौत्रों के विस्तार के साथ वे मृत्यु के दोष से मुक्त होकर चिरकाल तक जीवित रहने लगे। (२५-२६)

​सभी मनुष्य स्थिर काया वाले, सुखी, वृद्धावस्था और रोगों से मुक्त होकर पच्चीस वर्ष की आयु के युवक जैसे ही दिखते थे। वे सदाचारी और विष्णु के ध्यान में मग्न रहते थे। (२७-२८)

​भगवान की कृपा से सभी मनुष्य दान और सुखों का उपभोग करने वाले बने। उस लोक में किसी भी मनुष्य की मृत्यु की बात सुनाई नहीं देती थी। उन्हें न तो शोक था, न ही कोई दोष। (२९-३०)

​हे मानवश्रेष्ठ! भगवान की कृपा से जैसा रूप स्वर्गलोक का है, वैसा ही भूतल का हो गया। इससे यमदूतों का प्रभाव समाप्त हो गया और वे विष्णुदूतों द्वारा भगाए जाने लगे। तब वे रोते हुए यमराज (धर्मराज) के पास गए और उन्हें राजा ययाति के इस चरित्र के बारे में बताया। (३१-३२)

​दूतों ने कहा कि नहुष पुत्र ययाति के प्रभाव से अब पृथ्वी मृत्यु-विहीन हो गई है और विष्णु भक्ति के कारण वह स्वर्ग के समान दिखाई देती है। धर्मराज ने जब दूतों से विस्तारपूर्वक राजा की यह चेष्टा सुनी, तो वे चिंता में पड़ गए। (३३-३५)

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अंतर्गत माता-पितृ तीर्थ वर्णन में 'ययाति चरित्र' नामक पचहत्तरवाँ (७५वाँ) अध्याय पूर्ण हुआ।

पद्मपुराणम् (भूमिखण्डः) - अध्याय ७६

​इस अध्याय में धर्मराज (यमराज) और इन्द्र के संवाद के माध्यम से राजा ययाति के अद्भूत शासन और उनके द्वारा पृथ्वी को स्वर्ग समान बना देने का वर्णन है, जिससे विचलित होकर देवराज इन्द्र उन्हें स्वर्ग लाने की योजना बनाते हैं।

हिन्दी अनुवाद

सुकर्म बोले-

यमराज अपने सभी दूतों के साथ स्वर्गलोक गए, ताकि वे देवों से घिरे हुए इन्द्र के दर्शन कर सकें। जब इन्द्र ने धर्मराज को आते देखा, तो वे शीघ्रता से उठ खड़े हुए और उत्तम अर्घ्य देकर उनके आने का कारण पूछा। इन्द्र की बात सुनकर धर्मराज ने राजा ययाति का महान चरित्र सुनाना प्रारम्भ किया।

धर्मराज बोले-

हे देवेश्वर! सुनिए जिस कारण मेरा यहाँ आगमन हुआ है। नहुष के पुत्र महात्मा ययाति (जो भगवान विष्णु के भक्त हैं) ने भूमण्डल पर रहने वाले सभी मनुष्यों को 'वैष्णव' बना दिया है। उन्होंने मर्त्यलोक (पृथ्वी) को वैकुण्ठ के समान बना दिया है। पृथ्वी के मनुष्य अब देवताओं के समान हो गए हैं; वे जरा (बुढ़ापा) और रोगों से रहित हैं। वे न पाप करते हैं और न ही असत्य बोलते हैं।

​वे काम, क्रोध, लोभ और मोह से मुक्त हैं। सभी महात्मा, दानशील और धर्म परायण हो गए हैं। वे अपनी भक्ति से श्रीहरि की अर्चना करते हैं। उस वैष्णव धर्म के प्रभाव से पृथ्वी के लोग शोक रहित और स्थिर युवावस्था वाले हो गए हैं। जैसे दूर्वा और वट वृक्ष पृथ्वी पर फैलते हैं, वैसे ही वे अपने पुत्र-पौत्रों के साथ वंश-परम्परा में बढ़ रहे हैं।

​नहुष पुत्र ययाति ने सम्पूर्ण मर्त्यलोक को जरामृत्यु से रहित कर दिया है। इस कारण मैं पदभ्रष्ट हो गया हूँ और मेरे पास अब कोई कार्य शेष नहीं रहा (क्योंकि कोई मरता ही नहीं)। हे इन्द्र! मैंने अपना कर्म समाप्त होने का कारण बता दिया है, अब आप लोकहित में कुछ कीजिए।

इन्द्र बोले-

हे धर्मराज! मैंने पहले भी उस महात्मा को लाने के लिए दूत भेजा था, पर राजा ने कहला भेजा कि "मैं स्वर्ग के सुखों का इच्छुक नहीं हूँ, मैं इस भूमिमण्डल को ही स्वर्ग बना दूँगा।" वह राजा प्रजा का पालन कर रहा है और उसके धर्म के प्रभाव से मैं सदैव भयभीत रहता हूँ।

धर्मराज बोले-

हे देवराज! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो किसी भी उपाय से उस राजा को यहाँ (स्वर्ग) ले आइए। धर्मराज की बात सुनकर मेधावी इन्द्र ने विचार किया और कामदेव, गन्धर्वों, मकरन्द तथा रति को बुलाया। इन्द्र ने आज्ञा दी— "आप लोग भूलोक जाएँ और ऐसा कुछ करें जिससे वह राजा यहाँ आ जाए।"

कामदेव बोले-

मैं निश्चय ही आप दोनों का प्रिय कार्य करूँगा। कामदेव, रति और वसन्त आदि नट (अभिनेता) का रूप धारण कर राजा ययाति के पास पहुँचे। राजा ने उनका स्वागत किया और विद्वानों के साथ एक सभा आयोजित की। वहाँ उन छद्मवेषी देवताओं ने 'वामन अवतार' और 'राजा बलि' के चरित्र का अद्भुत नाटक प्रस्तुत किया।

​कामदेव स्वयं सूत्रधार बने, वसन्त सहायक और रति नटी (अभिनेत्री) बनी। उन्होंने मधुर संगीत, लास्य और कामदेव की माया से राजा को मोहित करना प्रारम्भ किया। मकरन्द ने राजा के मन को क्षोभित (विचलित) कर दिया। जैसे-जैसे राजा उस उत्तम नृत्य और संगीत को देखते-सुनते गए, वैसे-वैसे वे उस नटी (रति) और अभिनय के प्रभाव से मोहित होते गए।

व्याकरणिक विश्लेषण (प्रमुख शब्द एवं पद)

​इस अध्याय में संस्कृत व्याकरण के सन्धि, समास और प्रत्ययों का सुन्दर प्रयोग हुआ है:

१. सन्धि विच्छेद:

  • सहस्राक्षम्: सहस्र + अक्षम् (दीर्घ सन्धि)।
  • धर्मराजोऽब्रवीत्: धर्मराजः + अब्रवीत् (विसर्ग का उत्व और पूर्वरूप सन्धि)।
  • नहुषस्यात्मजेन: नहुषस्य + आत्मजेन (दीर्घ सन्धि)।
  • पदभ्रष्टोस्मि: पदभ्रष्टः + अस्मि (विसर्ग सन्धि)।

२. समास:

  • देववृंदैः: देवानां वृंदानि, तैः (षष्ठी तत्पुरुष)।
  • जरामृत्युविवर्जितः: जरया च मृत्युना च विवर्जितः (द्वन्द्व एवं तृतीया तत्पुरुष)।
  • धर्मपरायणाः: धर्मे परायणाः (सप्तमी तत्पुरुष)।
  • विष्णुभक्तः (वैष्णव): विष्णुः देवता अस्य इति (तद्धित प्रत्यय 'अण्')।

३. प्रत्यय एवं धातु रूप:

  • समायांतम्: सम् + आ + या + शतृ प्रत्यय (द्वितीय विभक्ति, एकवचन)।
  • श्रूयताम्: श्रु धातु, लोट् लकार, कर्मवाच्य (सुनिए)।
  • विहीन: वि + हा + क्त प्रत्यय।
  • आगतः: आ + गम् + क्त प्रत्यय।
  • कर्तव्यम् (करिष्यामि): कृ धातु, लृट् लकार (भविष्य काल)।

४. विशेषण-विशेष्य:

  • 'स्थिरयौवनाः मानवाः': यहाँ 'स्थिरयौवनाः' विशेषण है और 'मानवाः' विशेष्य।
  • 'मेधावी सुराधिपः': इन्द्र के लिए बुद्धिमान विशेषण का प्रयोग।

निष्कर्ष

​यह अध्याय दर्शाता है कि जब कोई राजा अपनी प्रजा को धर्म के मार्ग पर पूर्णतः प्रतिष्ठित कर देता है, तो मृत्यु (यम) और इन्द्र (ऐश्वर्य) का शासन भी गौण हो जाता है। देवताओं द्वारा कामदेव का सहारा लेना राजा के संयम की परीक्षा का प्रतीक है।


यहाँ पद्मपुराण के भूमिखण्ड के ७६वें अध्याय का सरल हिन्दी अनुवाद दिया गया है:



पद्मपुराणम्: भूमिखण्ड (अध्याय ७६)

ययाति के चरित्र में देवराज इन्द्र और धर्मराज की योजना

सुकर्म ने कहा—

यमराज (धर्मराज) अपने सभी दूतों के साथ स्वर्गलोक गए, ताकि वहाँ देवताओं के समूहों से घिरे हुए इन्द्र (सहस्राक्ष) से भेंट कर सकें। उस समय जब इन्द्र ने धर्मराज को आते देखा, तो वे शीघ्रता से अपने स्थान से उठे और उन्हें उत्तम अर्घ्य देकर उनका स्वागत किया। इन्द्र ने उनके आगमन का कारण पूछा— "हे धर्मराज! आप अपने यहाँ आने का कारण मुझे बताइये।" देवराज इन्द्र की यह बात सुनकर धर्मराज ने राजा ययाति का महान चरित्र कहना आरम्भ किया।

धर्मराज बोले—

"हे देवदेवेश! सुनिये, जिस कारण से मेरा यहाँ आगमन हुआ है, वह मैं आपको बताता हूँ। नहुष के पुत्र महात्मा ययाति ने, जो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं, पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्यों को वैष्णव बना दिया है। उन्होंने मृत्युलोक (पृथ्वी) को वैकुण्ठ के समान बना दिया है।

​वहाँ के सभी मानव अमर हो गए हैं और बुढ़ापे तथा रोगों से मुक्त हैं। वे न तो पाप करते हैं और न ही असत्य बोलते हैं। वे काम, क्रोध, लोभ और मोह से रहित हो गए हैं। वे सभी महात्मा, दानशील और धर्म पर चलने वाले हैं। वे सभी धर्मों के माध्यम से निरोग नारायण की पूजा करते हैं। उस वैष्णव धर्म के प्रभाव से पृथ्वी के मनुष्य दुखों से रहित और सदैव स्थिर युवावस्था वाले हो गए हैं।

​हे देव! जैसे दूर्वा और वट वृक्ष पृथ्वी पर फैलते हैं, वैसे ही वे अपने पुत्र, पौत्र और प्रपौत्रों के साथ विस्तार को प्राप्त हो रहे हैं। उनके वंश दर वंश बढ़ते ही जा रहे हैं। इस प्रकार नहुष के पुत्र ययाति ने समस्त मृत्युलोक को बुढ़ापे और मृत्यु से रहित कर दिया है। (इसके कारण) मैं अपने पद से भ्रष्ट हो गया हूँ और मेरे पास कोई कार्य शेष नहीं बचा है। मैंने यह सब आपको बता दिया कि कैसे मेरे कर्म (कार्य) का नाश हो गया है।

​हे सहस्राक्ष! यह सब जानकर अब आप इस संसार का हित कीजिये। आपने जो पूछा था, वह सब मैंने कह दिया। इसी कारण से मैं आपके पास आया हूँ।"

इन्द्र ने कहा—

"हे धर्मराज! उस महात्मा ययाति को यहाँ लाने के लिए मैंने पहले ही अपना दूत भेजा था। दूत ने आकर बताया कि राजा ने कहा है— 'मैं स्वर्ग के सुखों का अभिलाषी नहीं हूँ और मैं पुनः स्वर्ग नहीं आऊँगा। मैं इस सम्पूर्ण भूमण्डल को ही स्वर्ग के समान बना दूँगा।' राजा ऐसा कहकर प्रजा का पालन कर रहे हैं। उनके धर्म के प्रभाव से मैं सदा भयभीत रहता हूँ।"

धर्मराज बोले—

"हे महाभाग देवराज! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो जिस किसी भी उपाय से हो सके, उस उत्तम राजा को यहाँ (स्वर्ग) ले आइये।"

​धर्मराज के वचनों को सुनकर बुद्धिमान इन्द्र ने राजा को लाने के उपायों पर विचार किया। इन्द्र ने कामदेव, गन्धर्वों, मकरन्द और रति को बुलाया और कहा— "आप लोग ऐसा प्रयत्न करें जिससे राजा यहाँ आ जाएँ। मेरी आज्ञा से आप सभी भूलोक (पृथ्वी) जाइए, इसमें संशय नहीं है।"

कामदेव ने कहा—

"मैं निश्चित ही आप दोनों का प्रिय और पुण्य कार्य करूँगा। आप मुझे और राजा को युद्ध (मायावी कला) में स्थित देखिये।"

​ऐसा कहकर वे सब वहाँ गए जहाँ राजा ययाति विराजमान थे। हे ब्राह्मण! वे कामदेव आदि सभी 'नट' (अभिनेता) का रूप धारण कर वहाँ पहुँचे। उन्होंने राजा को आशीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया और एक सुन्दर नाटक दिखाने का प्रस्ताव रखा। उनकी बात सुनकर बुद्धिमान राजा ययाति ने विद्वानों के साथ एक देवतुल्य सभा का आयोजन किया।

​ज्ञान और विज्ञान के ज्ञाता राजा स्वयं वहाँ पधारे। नहुष-पुत्र राजा ययाति उनका नाटक देखने लगे। उस नाटक में भगवान वामन के चरित्र, उनके विप्र रूप में जन्म और उनके अद्वितीय रूप को मधुर स्वर और उत्तम गीतों के साथ प्रस्तुत किया गया।

​उस समय 'जरा' (वृद्धावस्था) ने आर्या का रूप धारण कर मधुर गायन किया। उसके गीतों के विलास, हास्य, सुन्दर भंगिमाओं और मधुर वार्तालाप से तथा कामदेव की माया के प्रभाव से राजा मोहित हो गए। कामदेव ने पूर्वकाल के राजा बलि, उनकी पत्नी विन्ध्यावली और भगवान वामन जैसा रूप धारण कर लिया था।

​स्वयं कामदेव 'सूत्रधार' बने, वसन्त ऋतु 'पारिपार्श्वक' (सहायक) बना और प्रसन्न रहने वाली कामदेव की प्रिया रति 'नटी' के वेश में आई। हे राजन्! उस नृत्य के बीच में महाबुद्धिमान मकरन्द ने राजा को विचलित (क्षोभित) करना शुरू किया। जैसे-जैसे राजा उस उत्तम नृत्य को देखते और गीतों को सुनते, वैसे-वैसे उस नटी द्वारा प्रस्तुत भावों से राजा अत्यधिक मोहित होने लगे।

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अन्तर्गत माता-पिता तीर्थ के प्रसंग में ययाति चरित्र का छिहत्तरवाँ (७६वाँ) अध्याय समाप्त हुआ।



पद्मपुराण के इस अध्याय के सभी श्लोकों का शब्दशः और विस्तृत अनुवाद निम्नलिखित है:

पद्मपुराणम् (भूमिखण्डः) - अध्याय ७७

सुकर्मोवाच (सुकर्मा ने कहा):

१-३: हे पिप्पल! कामदेव के गीतों, नृत्य और ललित हास्य ने राजा ययाति को नट के रूप में मोहित कर लिया। उसी समय मूत्र-पुरीष का त्याग करने के बाद, राजा ने पैरों की शुद्धि (शौच) किए बिना ही आसन ग्रहण कर लिया। उस अशुद्ध अवस्था का अवसर पाकर 'जरा' (बुद्धावस्था) ने राजा के शरीर में प्रवेश कर लिया। कामदेव ने भी इंद्र का हित करने वाला अपना कार्य पूरा किया।

४-५: जब वह नाटक समाप्त हुआ और सब चले गए, तब धर्मात्मा राजा वृद्धावस्था से ग्रस्त हो गए, किंतु उनका मन कामवासना में ही लगा रहा। काम के मोह में फँसे हुए राजा की इंद्रियां व्याकुल और विकल हो गईं। मोह के कारण वे अत्यंत मुग्ध और विषयों के वशीभूत हो गए।

६-८: एक बार व्यसनों से व्याकुल राजा वन में शिकार के लिए गए। मोह और राग के वश में होकर वे वन में क्रीड़ा करने लगे। वहाँ राजा के सामने एक अद्वितीय चतुःशृंगी (चार सींग वाला) मृग आया। वह सर्वांग सुंदर था, उसके शरीर के रोम सोने जैसे थे और वह रत्नों जैसी आभा से युक्त, मनोहर और दर्शनीय था।

९-११: धनुष-बाण हाथ में लिए हुए मेधावी राजा यह सोचते हुए उसके पीछे भागे कि शायद कोई दैत्य इस रूप में आया है। उस मृग ने राजा को बहुत दूर तक आकर्षित किया। रथ के वेग के कारण राजा थक गए और तभी वह मृग उनकी आँखों से ओझल हो गया। वहाँ राजा ने नंदनवन के समान एक अद्भुत वन देखा।

१२-१४: वह वन श्रेष्ठ चंदन, कदली (केले) के झुंडों, बकुल, अशोक, पुंनाग, नारियल, तिंदुक, सुपारी, खजूर, कुमुद और सप्तपर्ण के वृक्षों से भरा था। खिले हुए कर्णिकार, केतकी और पाटल के सुगंधित वृक्षों से वह स्थान महक रहा था।

१५-१९: वहाँ महाराज ने एक उत्तम सरोवर देखा, जो पांच योजन (लगभग ४० मील) विस्तृत था। वह पुण्य जल से भरा था और हंसों तथा पक्षियों के कलरव से गुंजायमान था। वह श्वेत, रक्त और नीले कमलों से सुशोभित था। वह सरोवर दस योजन लंबा था और दिव्य गुणों से अलंकृत था।

२०-२२: रथ के वेग से थके हुए राजा एक आम के वृक्ष की शीतल छाया में बैठ गए। सरोवर के अमृत समान सुगंधित जल में स्नान करने और उसे पीने से उनकी सारी थकान मिट गई। तभी वृक्ष के नीचे बैठे हुए राजा को एक दिव्य संगीत सुनाई दिया।

२३-२६: वह ध्वनि किसी देवांगना के गायन जैसी थी। संगीत प्रेमी राजा चिंता में पड़ गए। तभी उनके सामने एक अत्यंत सुंदर, पुष्ट अंगों वाली स्त्री प्रकट हुई। वह सभी आभूषणों से सुशोभित और उत्तम लक्षणों वाली थी। उसे सामने खड़ा देख राजा ने पूछा— "तुम कौन हो और यहाँ किसलिए आई हो?"

२७-२९: पिप्पल! पूछने पर भी उस सुंदरी ने शुभ या अशुभ कुछ नहीं कहा। वह हाथ में वीणा लिए मंद मुस्कान के साथ शीघ्रता से वहां से चली गई। राजा आश्चर्यचकित रह गए कि "मेरे बात करने पर भी इसने उत्तर क्यों नहीं दिया?"

३०-३३: ययाति फिर सोचने लगे— "वह जो चार सींग वाला स्वर्ण मृग था, निश्चित ही उसी से यह नारी उत्पन्न हुई है। यह दानवों की कोई माया प्रतीत होती है।" राजा अभी यह सोच ही रहे थे कि वह स्त्री हँसते हुए अंतर्ध्यान हो गई।

३४-३८: उसी क्षण पुनः अत्यंत मधुर संगीत सुनाई दिया। राजा तुरंत उस ओर गए। जल के भीतर एक सहस्त्र दल वाला श्रेष्ठ कमल था, जिसके ऊपर वह रूपवती स्त्री बैठी थी। वह दिव्य आभूषणों से सुशोभित होकर वीणा बजा रही थी। उसका संगीत इतना प्रभावशाली था कि वह चराचर जगत, देवताओं, मुनियों और गंधर्वों को भी मोहित कर ले। राजा ने सोचा— "संसार में ऐसी सुंदर स्त्री दूसरी कोई नहीं है।"

३९-४१: पहले उस नट (कामदेव) ने राजा के शरीर में वृद्धावस्था का प्रवेश कराया था, अब राजा के भीतर महाकाम (तीव्र वासना) प्रकट हुई। जैसे घी पाकर अग्नि प्रज्वलित होती है, वैसे ही उस सुंदरी को देखकर राजा के हृदय में कामदेव प्रकट हो गया।

४२-४५: काम में आसक्त राजा सोचने लगे— "इसके बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। यदि यह मुझे प्राप्त हो जाए तो मेरा जन्म सफल हो जाएगा।" ऐसा सोचकर उन्होंने उस सुंदरी से पूछा— "हे शुभे! तुम कौन हो? पहले जो स्त्री दिखी थी और जो अब दिख रही है, क्या वह तुम्हारी सखी है?"

४६-५१: राजा ने अपना परिचय देते हुए कहा— "मैं नहुष का पुत्र ययाति हूँ, सोमवंशी राजा हूँ और सात द्वीपों का स्वामी हूँ। मेरा मन तुम्हें पाना चाहता है। तुम जो चाहोगी मैं वह दूंगा। मैं कामदेव द्वारा परास्त हो गया हूँ, मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हें अपना राज्य, शरीर और तीनों लोक दे सकता हूँ।"

५२-५४: राजा के वचन सुनकर उस पद्ममुखी सुंदरी ने अपनी सखी विशाला से कहा— "तुम इस राजा को मेरा नाम, जन्म और माता-पिता का परिचय दो।"

विशाला ने कहा (५५-६१):

"हे राजन! प्राचीन काल में जब शिवजी ने कामदेव को भस्म किया था, तब रति विलाप करने लगी। वह इसी सरोवर के पास रहने लगी। उसके करुण विलाप को सुनकर देवताओं ने शिवजी से कामदेव को पुनः जीवित करने की प्रार्थना की। महादेव ने कहा कि वह बिना शरीर के (अनंग) होकर जीवित रहेगा और माधव (कृष्ण/विष्णु) का मित्र बनेगा।"

६२-६४: महादेव के प्रसाद से कामदेव जीवित हुआ। महादेव ने उसे रति के साथ सुखपूर्वक रहने का आशीर्वाद दिया। हे राजन! यह वही 'काम-सरोवर' है जहाँ रति रहती है।

६५-७१: कामदेव के भस्म होने पर रति के क्रोध से एक भयानक अग्नि पैदा हुई थी, जिससे वह मूर्छित हो गई। उस वियोग में उसके नेत्रों से जो आंसू गिरे, उनसे शोक, जरा (बुढ़ापा), वियोग, दुख, संताप, मूर्छा, काम-ज्वर, उन्माद और मृत्यु जैसे कष्ट पैदा हुए, जो विश्व का नाश करने वाले हैं।

७२-७७: जब कामदेव वापस आया, तो रति के हर्ष के आंसुओं से प्रीति, ख्याति, लज्जा, आनंद और शांति उत्पन्न हुए। रति के वाम नेत्र (बाईं आँख) से आनंद के जो आंसू जल में गिरे, उनसे एक श्रेष्ठ कमल उत्पन्न हुआ और उसी कमल से यह सुंदरी पैदा हुई है।

७८-८०: इसका नाम अश्रुबिंदुमती है, यह रति की पुत्री है। मैं वरुण की पुत्री विशाला हूँ और इसकी सखी हूँ। यह यहाँ पति की प्राप्ति के लिए तपस्या कर रही है।

ययाति ने कहा (८१-८२):

"मैंने सब जान लिया। यह रति-पुत्री मुझे प्राप्त हो। यह जो चाहेगी मैं वह दूंगा। हे विशाला! कुछ ऐसा करो कि यह मुझे अपना ले।"

विशाला ने कहा (८३-८८):

"हे भूपति! इसका व्रत सुनिए। यह ऐसे पुरुष को चाहती है जो युवा हो, सर्वज्ञ हो, वीर हो, इंद्र के समान तेजस्वी, धर्मात्मा, दानी, यज्ञ करने वाला और नारायण के समान ऐश्वर्यवान हो। जो वेदों का ज्ञाता और त्रैलोक्य में प्रसिद्ध हो।"

ययाति ने कहा (८९):

"ये सभी गुण मुझमें हैं। विधाता ने मुझे ही इसका अनुरूप पति बनाया है।"

विशाला ने कहा (९०-९३):

"राजन्! मैं जानती हूँ कि आप पुण्यवान हैं और ये सभी गुण आपमें हैं। किंतु एक बड़ा दोष है जिसके कारण यह आपको स्वीकार नहीं करेगी। क्या आप अपना दोष नहीं जानते? आप वृद्धावस्था (जरा) से घिरे हुए हैं, और यह सुंदरी वृद्ध को नहीं चाहती।"

९४-९६: यह सुनकर राजा दुखी हुए और बोले— "यह बुढ़ापा मुझमें अचानक कैसे आया, मैं नहीं जानता। पर मैं इसे पाने के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।"

विशाला ने कहा (९७-१०३):

"सत्य तो यह है कि जब आप युवा होंगे, तभी यह आपकी प्रिया बनेगी। शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई अपनी वृद्धावस्था अपने पुत्र, भाई या सेवक को दे दे और उनका यौवन ले ले, तो वह पुनः सुंदर और युवा हो सकता है। यह पुण्य का आदान-प्रदान है। इसलिए हे राजन! अपने पुत्र से यौवन लेकर सुंदर रूप में यहाँ लौटें।"

सुकर्मा ने कहा (१०४-१०८):

काम में अंधे हुए राजा ने कहा— "ऐसा ही होगा।" वे तुरंत घर गए और अपने पुत्रों— तुरु, पूरु, कुरु और यदु को बुलाया। उन्होंने कहा— "पुत्रों! मेरी आज्ञा से मुझे सुख प्रदान करो।" पुत्रों ने उत्तर दिया— "पिता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का धर्म है। आप शीघ्र कहें, हम उसे पूर्ण करेंगे।"

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे ययातिचरित्रे सप्तसप्ततितमोऽध्यायः।

यह पाठ पद्म पुराण के भूमिखण्ड के ७८वें अध्याय से लिया गया है, जिसमें राजा ययाति और उनके पुत्रों (यदु और पूरु) के बीच वृद्धावस्था (जरा) के आदान-प्रदान और उसके बाद के परिणामों का वर्णन है।

​यहाँ इसका हिंदी अनुवाद दिया गया है:

पद्म पुराण: ययाति-चरित (अनुवाद)

राजा ययाति ने (यदु से) कहा:

"पुत्र! तुम मेरी इस बुढ़ापे (जरा) को धारण कर लो और इस निष्कंटक राज्य का सुख भोगो।" ॥२७॥

यदु का उत्तर:

हाथ जोड़कर यदु ने राजा से कहा— "हे तात! मुझ पर कृपा करें, मैं इस वृद्धावस्था के भार को ढोने में समर्थ नहीं हूँ।" ॥२८॥

"ठंड, लंबी यात्रा, खराब भोजन, वृद्ध स्त्रियाँ और मन के प्रतिकूल बातें— ये पाँच जरा (बुढ़ापे) के कारण (या कष्ट) हैं।" ॥२९॥

"हे भूपते! मैं अपनी इस नई अवस्था (युवावस्था) में बुढ़ापे का दुःख सहन नहीं कर सकता। इसे धारण करने में कौन समर्थ है? अतः आप मुझे क्षमा करें।" ॥३०॥

ययाति का श्राप:

महाराज ययाति ने क्रोधित होकर यदु को श्राप दिया— "हे द्विजनंदन! तुम्हारा वंश कभी भी राज्य करने का अधिकारी नहीं होगा।" ॥३१॥

"निश्चित ही तुम्हारा वंश बल, तेज और क्षमा से हीन, क्षत्रिय धर्म से वर्जित और मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलने वाला होगा।" ॥३२॥

यदु की विनती और ययाति का अनुग्रह:

यदु ने कहा— "महाराज! मैं निर्दोष हूँ, फिर आपने मुझे श्राप क्यों दिया? मुझ दीन पर कृपा करें और प्रसन्न हों।" ॥३३॥

राजा ने कहा— "पुत्र! तुम्हारे कुल में भगवान महादेव (कृष्ण के संदर्भ में) अपने अंश से अवतार लेंगे, तब तुम्हारा कुल पवित्र हो जाएगा।" ॥३४॥

यदु बोले— "हे महाराज! मैं आपका पुत्र हूँ और निर्दोष होते हुए भी आपने मुझे श्राप दिया। यदि मुझ पर दया है, तो मुझ पर कोई अनुग्रह (कृपा) करें।" ॥३५॥

पिता का धर्म-उपदेश:

राजा ने कहा— "जो ज्येष्ठ पुत्र पिता के दुखों को दूर करता है, वही राज्य का उपभोग करता है और वही भार ढोने वाला (उत्तरदायी) होता है।" ॥३६॥

"तुमने धर्म का पालन नहीं किया, इसलिए तुम बात करने योग्य भी नहीं हो। तुमने मेरी आज्ञा नष्ट की है, अतः तुम दंड के पात्र हो।" ॥३७॥

"इसलिए तुम पर कोई अनुग्रह नहीं है, तुम जैसा चाहो वैसा करो।"

यदु का प्रति-वचन (क्रोध में):

यदु ने कहा— "हे नृप! क्योंकि आपने मेरा राज्य, कुल और रूप नष्ट किया है, इसलिए मैं आपके वंश का शत्रु बनूँगा। आपके वंश में कई प्रकार के क्षत्रिय होंगे।" ॥३८-३९॥

"मेरे वंश में उत्पन्न हुए अत्यंत क्रूर और महाबली लोग (तुरुष्क/म्लेच्छ रूपी) निश्चित रूप से आपके द्वारा दिए गए ग्रामों, देशों, स्त्रियों और रत्नों का उपभोग करेंगे।" ॥४०-४१॥

जब क्रोधित यदु ने राजा से ऐसा कहा, तब महाराज ने पुनः श्राप दिया— "सुनो, मेरे नक्षत्र, सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के रहने तक तुम्हारे वंशज कुंभीपाक नरक में पड़े रहेंगे।" ॥४२-४३॥

पूरु का त्याग और आज्ञापालन:

इसके बाद राजा ने अपने गुणवान बालक पूरु (शर्मिष्ठा का पुत्र) को बुलाया और कहा— "पुत्र! तुम मेरी जरा (बुढ़ापा) ले लो।" ॥४४-४६॥

"मेरे द्वारा दिए गए इस निष्कंटक और पवित्र राज्य का भोग करो।"

पूरु ने कहा— "हे देव! पिता द्वारा भोगे हुए राज्य को भोगने की मेरी इच्छा नहीं है, लेकिन मैं आपकी आज्ञा मानूँगा। आप अपनी जरा मुझे दे दें।" ॥४७-४८॥

"आप मेरी युवावस्था लेकर सुंदर रूप वाले बन जाएँ और अपनी इच्छानुसार विषयों का भोग करें। जब तक मैं जीवित हूँ, मैं आपकी वृद्धावस्था को धारण करूँगा।" ॥४९-५०॥

ययाति का पूरु को वरदान:

पूरु के ऐसा कहने पर राजा अत्यंत हर्षित हुए और बोले— "वत्स! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, इसलिए मैं तुम्हें बहुत सुख प्रदान करूँगा।" ॥५१-५२॥

"क्योंकि तुमने मेरी जरा लेकर मुझे अपनी युवावस्था दी है, इसलिए मेरे द्वारा दिए गए इस राज्य का तुम उपभोग करो।" ॥५३॥

अवस्था का परिवर्तन:

ऐसा कहकर पिता-पुत्र ने अपनी आयु का विनिमय (अदला-बदली) कर लिया। पूरु अपने सभी अंगों से अत्यंत वृद्ध दिखने लगा। ॥५४॥

और राजा ययाति पुनः सोलह वर्ष के युवक की तरह नवीन हो गए। वे महान रूप से युक्त होकर दूसरे कामदेव के समान दिखने लगे। ॥५५-५६॥

महाराज ने अपना धनुष, राज्य, छत्र, आसन, हाथी, खजाना, सेना और रथ— सब कुछ महात्मा पूरु को सौंप दिया। ॥५७॥

विशाला के पास गमन:

काम में आसक्त वह धर्मात्मा राजा उस सुंदरी (विशाला) के बारे में सोचने लगा। वे शीघ्रता से उस 'कामाख्य' सरोवर पर पहुँचे जहाँ अश्रुबिंदुमती (विशाला) थी। ॥५८-५९॥

उस विशालाक्षी (बड़ी आँखों वाली) सुंदरी को देखकर कामदेव से पीड़ित मन वाले राजा ने कहा— "हे महाभागे! हे सुंदर नेत्रों वाली विशाला! मैं आ गया हूँ।" ॥६०॥

"देखो, मैंने बुढ़ापे को त्याग कर युवावस्था प्राप्त कर ली है। अब मैं युवा होकर आया हूँ, तुम मेरी हो जाओ।" ॥६१॥

"तुम जो कुछ भी चाहोगी, मैं तुम्हें वह निश्चित रूप से दूँगा।"

विशाला का उत्तर:

विशाला ने कहा— "यद्यपि आप बुढ़ापे को छोड़कर आए हैं, लेकिन आप एक दोष से लिप्त हैं, इसलिए मैं आपको स्वीकार नहीं करती।" ॥६२॥

राजा ने कहा— "यदि तुम जानती हो तो मेरा वह दोष बताओ। मैं निश्चित रूप से उस दोष को त्याग दूँगा और गुण धारण करूँगा।" ॥६३-६४॥

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने मातापितृतीर्थवर्णने ययातिचरिते अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥७८॥


यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का ७९वाँ अध्याय है, जिसमें राजा ययाति और कामदेव की पुत्री अश्रुबिंदुमती के प्रसंग का वर्णन है। यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

पद्मपुराण - भूमिखण्ड (अध्याय ७९)

ययाति और अश्रुबिंदुमती का विवाह तथा अश्वमेध यज्ञ

विशाल ने कहा:

हे राजन्! जिसकी शर्मिष्ठा और सुमुखी देवयानी जैसी पत्नियाँ हों, वहाँ सौभाग्य स्पष्ट दिखाई देता है, अन्यथा नहीं। १।

हे महाभाग! फिर आप इस (अश्रुबिंदुमती) के वश में कैसे हो गए? हे राजा! आप तो सौतिया डाह (ईर्ष्या) के भाव से प्रतिष्ठित पति रहे हैं। २।

हे महाराज! आप इस भूतल पर उसी प्रकार हैं जैसे चन्दन के वृक्ष पर सर्प लिपटे रहते हैं। हे राजन्! श्रेष्ठ चन्दन तो सर्पों से ही घिरा रहता है। ३।

उसी प्रकार आप भी 'सपत्नी' (सौत) नाम के सर्पों से घिरे हुए हैं। अग्नि में प्रवेश करना श्रेष्ठ है या पर्वत के शिखर से गिर जाना श्रेष्ठ है, ४।

किन्तु रूप और तेज से युक्त होकर भी सौतों के साथ रहना प्रिय नहीं है; सौत रूपी विष से युक्त पति (स्त्रियों को) श्रेष्ठ नहीं लगता। ५।

इसीलिए वह (अश्रुबिंदुमती) आप जैसे गुणों के सागर को अपना पति नहीं मान रही है।

राजा ययाति ने कहा:

हे सुमुखि! अब मुझे देवयानी या शर्मिष्ठा से कोई प्रयोजन नहीं है। ६। इस हेतु तुम सत्य और धर्म से युक्त मेरे हृदय (कोश) को देखो।

अश्रुबिंदुमती बोली:

हे भूपते! मैं ही आपके राज्य और आपके शरीर की स्वामिनी (भोक्त्री) हूँ। ७। हे राजन्! मैं जो-जो कहूँ, वह आपको निश्चित रूप से करना होगा। हे धर्मवत्सल! इस कार्य के लिए आप अपना हाथ मुझे दें, ८ जो बहुत से धर्मों से युक्त और सुन्दर लक्षणों वाला है।

राजा ने कहा:

हे श्रेष्ठ वर्ण वाली! तुम्हारे बिना मैं किसी अन्य को अपनी पत्नी नहीं मानता। ९। हे सुमुखि! यह राज्य, सम्पूर्ण पृथ्वी और मेरा यह शरीर—सब तुम्हारा ही है। हे सुन्दरी! इस कोश (खजाने/हृदय) का भोग करो, यह मैंने तुम्हें सौंप दिया है। १०। हे भद्रे! तुम जो भी कहोगी, मैं वैसा ही करूँगा।

अश्रुबिंदुमती ने कहा:

हे महाभाग! इस शर्त पर मैं आपकी पत्नी बनती हूँ। ११।

सुकर्म ने कहा:

यह सुनकर राजा ययाति के नेत्र हर्ष से व्याकुल हो उठे। हे नरोत्तम! राजा ययाति ने कामदेव की उस पवित्र पुत्री से गान्धर्व विवाह कर लिया। १२-१३।

महात्मा ययाति उसके साथ समुद्र के तटों पर, वनों, उपवनों, रमणीय पर्वतों और नदियों के किनारे रमण करने लगे। १४।

इस प्रकार अपनी युवावस्था के रस में डूबे हुए महात्मा राजा ययाति के बीस हजार वर्ष बीत गए। १५।

भगवान विष्णु ने कहा:

हे महामते! उस समय इन्द्र के कार्य की सिद्धि के लिए कामदेव के प्रपंच (माया) द्वारा राजा ययाति को इस प्रकार मोहित कर लिया गया था। १६।

सुकर्म ने कहा:

हे राजा पिप्पल! इस प्रकार पृथ्वीपति ययाति उस काम-कन्या के मोह, रति और विलास में ऐसे मुग्ध हुए कि उन्हें दिन और रात का भान भी न रहा। १७-१८।

एक बार उस काम-नन्दिनी (अश्रुबिंदुमती) ने अपने वश में आए हुए, विनम्र और प्रणत राजा ययाति से कहा। १९।

अश्रुबिंदुमती बोली:

हे कान्त! मुझे एक 'दोहद' (विशेष इच्छा/अभिलाषा) उत्पन्न हुई है, मेरी उस इच्छा को पूर्ण करें। हे पृथ्वीपते! आप श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करें। २०।

राजा ने कहा:

हे महाभागे! ऐसा ही होगा, मैं तुम्हारी प्रिय इच्छा पूर्ण करूँगा। राजा ने अपने पुत्रों में श्रेष्ठ और राज्य भोग की इच्छा न रखने वाले (पुरु) को बुलाया। २१। बुलाए जाने पर पुरु भक्ति से सिर झुकाकर आए और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। २२। फिर भक्तिपूर्वक पिता के चरणों में प्रणाम कर कहा— "हे राजन्! आज्ञा दें, मुझे किसलिए बुलाया गया है? २३। हे महाभाग! मैं आपका दास हूँ और आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ, मुझे क्या करना है?"

राजा ने कहा:

हे पुत्र! अश्वमेध यज्ञ की सामग्री तैयार करो। २४। पवित्र ब्राह्मणों, ऋत्विजों और राजाओं को आमंत्रित करो।

ऐसा कहे जाने पर महातेजस्वी और परम धार्मिक पुरु ने महात्मा पिता की आज्ञानुसार सब कुछ पूर्ण किया। २५।

राजा ययाति ने उस काम-कन्या के साथ यज्ञ की दीक्षा ली। २६। अश्वमेध यज्ञ की शाला में राजा ययाति ने ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान और अनन्त दक्षिणा दी। २७। उन्होंने विशेष रूप से दीन-दुखियों को दान दिया। यज्ञ की समाप्ति पर महाराज ने उस सुमुखी (अश्रुबिंदुमती) से कहा— २८।

"हे बाले! मैं तुम्हारा और क्या प्रिय कार्य करूँ? हे देवी! साध्य हो या असाध्य, मैं वह सब करूँगा।" २९।

सुकर्म ने कहा:

राजा के ऐसा कहने पर वह सुन्दरी राजा से बोली— "हे निष्पाप राजन्! मुझे एक और अभिलाषा हुई है, उसे पूर्ण करें। ३०। हे महाराज! मैं आपके साथ इन्द्रलोक, ब्रह्मलोक, शिवलोक और विष्णुलोक देखना चाहती हूँ। ३१। हे महाभाग! यदि मैं आपको प्रिय हूँ, तो मुझे ये लोक दिखाइये।"

​उसके ऐसा कहने पर राजा ने अपनी उस प्रिया से कहा— ३२। "हे सुमुखि! साधु-साधु! तुम बहुत पुण्य की बात कह रही हो। ३३। परन्तु हे महाभागे! स्त्रियों के चंचल स्वभाव और कौतूहलवश तुमने जो कहा है, वह मुझे असाध्य (असंभव) प्रतीत होता है। ३४। वे लोक तो पुण्य दान, यज्ञ और तपस्या से ही प्राप्त किए जा सकते हैं, अन्यथा नहीं। ३५। तुमने पुण्य से मिश्रित जो बात कही है, वह इस शरीर के लिए असाध्य है। इस मनुष्य लोक से इसी शरीर के साथ कोई मनुष्य स्वर्ग गया हो, ऐसा न तो मैंने सुना है और न देखा है। ३६। इसलिए हे सुन्दरी! जो तुमने कहा वह असाध्य है। इसके अतिरिक्त जो प्रिय हो, वह कहो, मैं उसे करूँगा।" ३७।

देवी (अश्रुबिंदुमती) ने कहा:

"हे राजन्! अन्य मनुष्यों के लिए यह साध्य न हो, इसमें संशय नहीं है। ३८। परन्तु हे महाराज! मैं सत्य कहती हूँ कि आपके लिए यह साध्य है। तप, यश, क्षात्र-बल, दान और यज्ञों के कारण इस मर्त्यलोक में आपके जैसा दूसरा कोई मनुष्य नहीं है। ३९। आपमें क्षात्र बल और तेज पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित है। इसलिए हे नहुष-पुत्र! आपको मेरी यह प्रिय इच्छा पूर्ण करनी ही चाहिए।" ४०।

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अन्तर्गत माता-पितृ तीर्थ वर्णन में ययाति चरित्र का उनासीवाँ (७९) अध्याय समाप्त हुआ।


श्री पद्मपुराण के भूमिखण्ड (वेनोपाख्यान) के ८०वें अध्याय का हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है:

अध्याय ८०: ययाति द्वारा यदु को शाप और कामकन्या के साथ विहार

पिप्पल ने पूछा:

हे द्विजोत्तम! जब राजा (ययाति) ने कामकन्या से विवाह कर लिया, तब उनकी उन दोनों पूर्व की पुण्यवती पत्नियों ने क्या किया? महाभागा देवयानी और वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा के उस सम्पूर्ण चरित्र को आप मेरे सामने कहें। (१-२)

सुकर्मा ने कहा:

जब वह राजा (ययाति) कामकन्या को अपने घर ले आए, तब मनस्विनी देवयानी उससे अत्यधिक ईर्ष्या (स्पर्धा) करने लगी। क्रोध से व्याकुल होकर उसने अपने पुत्रों को भी शाप दे दिया और यशस्विनी देवयानी ने शर्मिष्ठा को बुलाकर उससे चर्चा की। (३-४)

​शर्मिष्ठा और देवयानी दोनों ही रूप, तेज, दान तथा सत्य एवं पुण्य व्रतों के द्वारा उस कामकन्या के साथ प्रतिस्पर्धा करने लगीं। तब कामकन्या ने उन दोनों के दुष्ट भाव (ईर्ष्या) को जान लिया और हे विप्र! उसी क्षण राजा से सब कुछ कह दिया। (५-६)

​तब महाराज ययाति ने क्रोधित होकर यदु को बुलाया और कहा— "हे वत्स! तुम जाकर शर्मिष्ठा और उस शुक्राचार्य की पुत्री (देवयानी) का वध कर दो। यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो मेरे लिए यह प्रिय कार्य करो।" (७-८)

​अपने पिता के ऐसे वचनों को सुनकर यदु ने मान देने वाले अपने पिता महाराज से कहा— "हे तात! मैं अपनी इन दोषरहित माताओं की हत्या नहीं करूँगा। वेद के विद्वानों ने मातृ-वध में महान दोष बताया है, इसलिए हे महाराज! मैं इनका घात नहीं करूँगा।" (९-१०)

​"हे महाराज! यदि माता, बहन अथवा पुत्री हजारों दोषों से भी लिप्त हों, तो भी पुत्रों या भाइयों द्वारा वे कभी वध के योग्य नहीं होतीं। ऐसा जानकर हे महाराज! मैं अपनी माताओं को नहीं मारूँगा।" (११-१२)

​यदु के इन वचनों को सुनकर राजा ययाति अत्यंत क्रोधित हो गए और उसके पश्चात पृथ्वीपति ययाति ने अपने उस पुत्र को शाप दे दिया— "हे पापी! चूंकि आज तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, अतः मेरे शाप से कलंकित होकर तू माता के वंश (अंश) को ही प्राप्त कर।" (१३-१४)

​अपने पुत्र यदु को इस प्रकार शाप देकर महान यशस्वी महाराज ययाति उस कामकन्या के साथ सुखपूर्वक रमण करने लगे और भगवान विष्णु के ध्यान में तत्पर हो गए। (१५)

​वह सुंदर नेत्रों और अंगों वाली 'अश्रुबिंदुमती' (कामकन्या) भी राजा के साथ मनोनुकूल पुण्य भोगों को भोगने लगी। इस प्रकार महात्मा ययाति का समय व्यतीत होने लगा। (१६-१७)

​हे महाभाग पिप्पल! उस समय के सभी लोग, देवता और अन्य प्रजाजन भगवान विष्णु के ध्यान में परायण रहने लगे। तप, सत्य भाव और विष्णु के ध्यान से सभी लोग सुखी और साधुओं की सेवा करने वाले हो गए। (१८-१९)

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने मातापितृतीर्थवर्णने ययातिचरित्रेऽशीतितमोऽध्यायः ॥८०॥


यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का ८१वाँ अध्याय है, जिसमें राजा ययाति के मानसिक द्वंद्व और 'कर्म एवं काल' की महत्ता का वर्णन किया गया है। यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

​पद्मपुराण: भूमिखण्ड (अध्याय ८१) - हिन्दी अनुवाद

सुकर्मा ने कहा:

हे महाप्राज्ञ! जिस प्रकार वह इन्द्र महात्मा ययाति के पराक्रम और उनके महान दान-पुण्य आदि को देखकर सदा भयभीत रहते थे, उन्होंने अप्सरा मेनका को दूत के कार्य के लिए भेजा और कहा— "हे भद्रे! तुम जाओ और मेरा आदेश कहो। तुम वहाँ जाकर कामदेव की कन्या (अश्रुबिन्दुमती) से देवराज के वचन कहना और जिस किसी भी उपाय से राजा ययाति को यहाँ (स्वर्ग) ले आओ।" १-३।

​ऐसा सुनकर इन्द्र द्वारा भेजी गई वह मेनका वहाँ गई और उसने देवराज द्वारा कही गई सारी बातें बता दीं। मेनका के ऐसा कहने और उसके चले जाने के बाद, रति की मनस्विनी और यशस्विनी पुत्री (अश्रुबिन्दुमती) ने धर्मपरायण राजा ययाति से कहा— ४-५।

अश्रुबिन्दुमती बोली:

"हे राजन्! पूर्वकाल में आप मुझे अपने सत्य वचनों के कारण यहाँ लाए थे। आपने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने भवन में लाए। मैंने कहा था कि 'हे राजन्! मैं जो-जो कहूँगी, वह आपको करना होगा।' ६-७। परन्तु हे वीर! आपने मेरी बात नहीं मानी। इसलिए अब मैं आपको त्याग दूँगी और अपने पिता के घर चली जाऊँगी।" ८।

राजा ने कहा:

"हे भद्रे! तुमने जो कुछ कहा है, उसे मैं अवश्य करूँगा, इसमें संशय नहीं है। परन्तु जो असाध्य (असंभव) है उसे छोड़कर, जो साध्य (संभव) है, वह मुझसे कहो।" ९।

अश्रुबिन्दुमती बोली:

"हे पृथ्वीनाथ! इसीलिए मैंने आपका वरण किया था क्योंकि आप सर्वलक्षण संपन्न और सर्वधर्मों से युक्त हैं। १०। आपको सब कुछ सिद्ध करने वाला, धर्म का आधार, पुण्य कर्मों का कर्ता और तीनों लोकों में अद्वितीय जानकर ही मैंने आपको स्वीकारा था। ११-१२। मैंने आपको विष्णुभक्त और वैष्णवों में श्रेष्ठ जाना था, इसी आशा से मैंने आपको अपना पति स्वीकार किया। जिसके ऊपर विष्णु की कृपा होती है, वह सर्वत्र विचरण कर सकता है। १३। हे राजेंद्र! इस चराचर जगत में आपके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। हे सुव्रत! सभी उत्तम लोकों में आपका स्थान है। १४।

​भगवान विष्णु के प्रसाद से ही आकाश में आपकी उत्तम गति है। आपने मृत्युलोक में आकर पृथ्वी के लोगों को बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्त कर दिया है। १५-१६। हे नरश्रेष्ठ! मनुष्यों के घरों के द्वारों पर आपने अनेक कल्पवृक्ष लगा दिए हैं और उनके घरों में मुनिजन एवं कामधेनु गायें स्थिर कर दी हैं। १७-१८। आपके कारण ही मनुष्य कुल की वृद्धि हो रही है और यमराज तथा इन्द्र के विरोध के बावजूद आपने मृत्युलोक को व्याधि और पाप से मुक्त कर दिया है। १९-२०।

​हे महाराज! आपने अपने तेज से भूतल को ही स्वर्ग बना दिया है, आपके समान कोई राजा नहीं है। न ऐसा राजा कभी पैदा हुआ और न होगा। २१-२२। मैं आपको धर्म का साक्षात् सूर्य मानती हूँ। इसलिए हे नृपेन्द्र! आप परिहास छोड़कर मेरे सामने सत्य कहें। २३। यदि आपमें सत्य और धर्म शेष है, तो क्या स्वर्गलोक में मेरी उत्तम गति नहीं होगी? २४। यदि आप सत्य त्यागकर स्वर्ग नहीं चलेंगे, तो आपके वचन झूठे हो जाएंगे और आपके द्वारा पूर्व में अर्जित सारा पुण्य भस्म हो जाएगा।" २५।

राजा ने कहा:

"हे भद्रे! तुमने सत्य कहा, मेरे लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। जगत्पति विष्णु की कृपा से सभी लोक मुझे सुलभ हैं। परन्तु मैं स्वर्ग क्यों नहीं जाना चाहता, उसका कारण सुनो। २६-२७। यदि मैं चला गया, तो देवता मुझे पुनः मृत्युलोक में आने नहीं देंगे। तब मेरे बिना मेरी सारी प्रजा पुनः मृत्यु और दुखों के वश में हो जाएगी। हे वरानने! इसीलिए मैं स्वर्ग जाने की इच्छा नहीं करता।" २८-२९।

देवी बोली:

"हे महाराज! आप उन लोकों को देखकर पुनः लौट आना। मेरी इस महान श्रद्धा और इच्छा को आज पूर्ण कीजिए।" ३०।

सुकर्मा ने कहा:

नहुष पुत्र महातेजस्वी राजा ययाति ने अपनी प्रिया से "सब ऐसा ही करूँगा" कहकर चिंता करना आरम्भ किया। ३१। (वे सोचने लगे—) जल के भीतर रहने वाली मछली भी जाल में फंस जाती है। वायु के समान वेग वाला मृग भी बंधन में पड़ जाता है। ३३। हजारों योजन दूर स्थित मांस को देख लेने वाला पक्षी भी, जब दैव (भाग्य) मोहित करता है, तो अपने गले में लगे फंदे को नहीं देख पाता। ३४।

​यह 'काल' (समय) ही सबको सम और विषम बनाता है, काल ही मान और हानि देता है। ३५। यह काल ही मनुष्य को कभी दाता बनाता है तो कभी याचक। पृथ्वी या आकाश के सभी प्राणियों को काल ही ग्रास बनाता है; यह सम्पूर्ण जगत काल रूप ही है। ३६। काल ही अनादि और अनंत विधाता है। जिस प्रकार वृक्ष पर फल पकते हैं, वैसे ही काल प्राणियों को परिपक्व करता है। ३७। न मन्त्र, न तप, न दान, न मित्र और न ही भाई-बन्धु काल से पीड़ित मनुष्य की रक्षा कर सकते हैं। ३८।

​विवाह, जन्म और मरण—ये काल के तीन ऐसे पाश हैं जिन्हें कोई पार नहीं कर सकता। ३९। जिस प्रकार आकाश में बादलों को पवन यहाँ-वहाँ ले जाती है, उसी प्रकार यह जगत काल और कर्मों के अधीन होकर भटकता रहता है। ४०।

​यह काल मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों से युक्त है। काल स्वयं कर्म नहीं करता, बल्कि कर्म ही काल को प्रेरित करते हैं। ४१-४२। सुख के हेतु और पुण्य के उपाय भी कर्म से जुड़े हैं। कर्मों के कारण ही मनुष्य को भाई-बन्धु और सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। ४३-४४। जैसे सोने और चांदी का रूप निश्चित होता है, वैसे ही प्राणी अपने कर्मों के अधीन बँधा रहता है। ४५।

​आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—ये पाँचों बातें प्राणी के गर्भ में रहते समय ही निश्चित हो जाती हैं। ४६। जैसे कुम्हार मिट्टी के पिण्ड से जो चाहे बना लेता है, वैसे ही पूर्वकृत कर्म कर्ता के पीछे-पीछे चलते हैं। ४७। देवत्व, मनुष्यत्व, पशु, पक्षी या स्थावर होना—यह सब अपने कर्मों से ही प्राप्त होता है। ४८। प्राणी स्वयं के द्वारा किए गए शुभ-अशुभ फल को ही भोगता है। ४९-५१।

​जैसे हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को ढूँढ लेता है, वैसे ही किया हुआ कर्म अपने कर्ता को ढूँढ लेता है। ५२-५३। बिना भोगे कर्म का नाश नहीं होता। मनुष्य चाहे कितनी ही तेज क्यों न दौड़ ले, उसका भाग्य (विधान) उसके पीछे-पीछे दौड़ता है। ५४। सोते हुए के साथ सोता है, खड़े रहने वाले के साथ खड़ा रहता है और चलने वाले के पीछे चलता है। ५५। जैसे छाया और धूप परस्पर जुड़े हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता जुड़े हुए हैं। ५६-५७।

​जब मनुष्य को पूर्व कर्मों के कारण कष्ट मिलना होता है, तब ग्रह, रोग, विष, सर्प और राक्षस उसे पीड़ा देते हैं। ५८। जहाँ जिसका सुख या दुःख भोगना लिखा है, दैव (भाग्य) उसे रस्सी से बाँधकर वहां ले जाता है। ५९। मनुष्य चाहे जागते हुए या सोते हुए कुछ भी सोचे, दैव कुछ और ही कर देता है। ६०। दैव ही शस्त्र, अग्नि और विष से रक्षा करता है। ६१-६२।

​जैसे तेल खत्म होने पर दीपक बुझ जाता है, वैसे ही कर्म समाप्त होने पर शरीर का नाश हो जाता है। ६३-६४। मृत्यु के अनेक कारण (रोग आदि) हो सकते हैं, परन्तु वास्तव में वह कर्मों का ही परिणाम है। राजा ने सोचा— "मेरे पूर्व कर्मों के कारण ही यह स्त्री रूपी विपत्ति मुझ तक पहुँची है। ६५-६६। कहाँ मेरा घर और कहाँ ये नर्तक-नर्तकी! इनके संग के कारण ही मेरे शरीर में बुढ़ापा आया। यह सब कर्मों का खेल है। ६७।

​पूर्व में इन्द्र ने मातलि को दूत बनाकर मेरे पास भेजा था, तब मैंने उसकी बात नहीं मानी थी। यह उसी कर्म का फल है जो आज मुझे भोगना पड़ रहा है।" ६९। ऐसा सोचकर राजा ययाति महान दुःख और चिंता में डूब गए। उन्होंने सोचा— "यदि मैं इस स्त्री की बात नहीं मानता, तो मेरा सत्य और धर्म दोनों नष्ट हो जाएंगे। दैव को टालना कठिन है।" ७१-७२।

​तब राजा ययाति ने दुखों को हरने वाले भगवान श्रीहरि कृष्ण की शरण ली। उन्होंने मन ही मन मधुसूदन का ध्यान किया, उन्हें प्रणाम किया और स्तुति की— "हे कमलाप्रिय! मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।" ७३-७४।

इस प्रकार पद्मपुराण के भूमिखण्ड में 'ययाति चरित्र' के अंतर्गत ८१वाँ अध्याय समाप्त हुआ।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह 83वाँ अध्याय राजा ययाति के सशरीर स्वर्गारोहण और अंततः विष्णुलोक (वैकुंठ) प्राप्ति की कथा है। यहाँ इसका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है:

​पद्मपुराण: अध्याय 83 (ययाति का स्वर्गारोहण)

सुकर्मा ने कहा:

राजा ययाति ने समस्त द्वीपों की प्रजा को बुलाकर, बड़े हर्ष के साथ यह वचन कहे— "हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों! मैं इस (अशोकसुंदरी) के साथ इंद्रलोक, ब्रह्मलोक और रुद्रलोक होते हुए समस्त पापों का नाश करने वाले वैष्णव पद (विष्णुलोक) को जा रहा हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं है। आप सब अपने परिवारों के साथ पृथ्वी पर सुखपूर्वक रहें। यह महाभाग पुरु आप सबका पालक और राजा होगा, जिसे मैंने दंड और सत्ता के साथ स्थापित किया है।"

प्रजा का उत्तर:

राजा की बात सुनकर प्रजा ने कहा— "हे नृपोत्तम! वेदों और पुराणों में जिस धर्म के बारे में सुना जाता है, वह साक्षात् रूप में पहले कभी किसी ने नहीं देखा। आज हमने उस दस अंगों वाले सत्यप्रेमी धर्म को सोमवंश में उत्पन्न नहुष के घर में साक्षात् देखा है। हे महाराज! आप ही वह धर्म हैं जो हाथ, पैर और मुख से युक्त होकर सदाचार का प्रचार कर रहे हैं। आप ज्ञान-विज्ञान से संपन्न और पुण्यों की निधि हैं। हम आपको त्याग कर नहीं रह सकते। जहाँ आप जाएँगे, हम भी वहीं चलेंगे। यदि आप नरक में भी हों, तो हम नि:संदेह वहाँ रहेंगे। आपके बिना हमें स्त्री, धन, भोग और जीवन से क्या प्रयोजन?"

प्रस्थान का दृश्य:

प्रजा का प्रेम देखकर राजा ययाति भावुक हो गए और उन्होंने सबको साथ चलने की अनुमति दे दी। राजा अपनी प्रियतमा के साथ चंद्रमा के समान श्वेत और हंस के समान उज्ज्वल रथ पर सवार हुए। उनके साथ लाखों-करोड़ों प्रजाजन हाथी, घोड़ों और रथों पर सवार होकर विष्णु का ध्यान करते हुए चल पड़े। वे सभी वैष्णव जन तुलसी की माला धारण किए हुए और चंदन लगाए हुए दिव्य शोभा पा रहे थे।

विभिन्न लोकों की यात्रा:

  1. इंद्रलोक: सबसे पहले राजा इंद्रलोक पहुँचे। इंद्र ने उनका स्वागत किया और वहाँ रुकने को कहा, किंतु राजा ने ब्रह्मलोक जाने की इच्छा प्रकट की।
  2. ब्रह्मलोक: ब्रह्मा जी ने उनका सत्कार किया और उन्हें उनके सत्कर्मों के कारण विष्णुलोक जाने का आदेश दिया।
  3. शिवलोक: इसके बाद ययाति भगवान शंकर के पास पहुँचे। महादेव ने माता पार्वती के साथ उनका आतिथ्य किया और कहा— "हे राजन! आप कृष्ण के भक्त हैं, इसलिए मुझे अत्यंत प्रिय हैं। मुझमें और विष्णु में कोई भेद नहीं है। जो विष्णु हैं वही रुद्र हैं। आप यहाँ मेरे लोक में निवास करें।" ययाति ने विनयपूर्वक कहा— "हे महादेव! आप दोनों एक ही मूर्ति के दो रूप हैं, किंतु मेरी इच्छा वैष्णव पद प्राप्त करने की है।" शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें विष्णुलोक जाने की आज्ञा दी।

विष्णुलोक (वैकुंठ) का वर्णन:

जब ययाति वैकुंठ के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि वह नगर स्वर्ण के विमानों और कैलाश के समान ऊँचे महलों से जगमगा रहा है। वहाँ के गोपुर (द्वार) और ध्वजाएँ पवन में लहरा रही थीं। वह स्थान दिव्य वृक्षों, चंदन के वनों, कमलों से भरे सरोवरों और हंसों के कलरव से सुशोभित था। वह मोक्ष का अनुपम स्थान था।

भगवान विष्णु से मिलन:

नगर में प्रवेश करते ही राजा ने गरुड़ पर सवार, पीतांबर धारी, श्रीवत्स के चिह्न से सुशोभित भगवान नारायण के दर्शन किए। राजा, उनकी पत्नी और समस्त प्रजा ने भगवान के चरणों में भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।

​भगवान ऋषिकेश ने प्रसन्न होकर कहा— "हे महामते! मैं तुम्हारी भक्ति से संतुष्ट हूँ। कोई वरदान माँगो।"

राजा ययाति ने कहा— "हे जगत्पते! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे सदा के लिए अपना दासत्व (सेवा) प्रदान करें।"

उपसंहार:

भगवान विष्णु ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा और राजा ययाति को अपनी पत्नी के साथ उस उत्तम विष्णुलोक में स्थान दिया। इस प्रकार राजा ययाति अपनी प्रजा सहित दिव्य सुखों को प्राप्त कर वैकुंठ में निवास करने लगे।

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे ययातिचरित्रे ययातेः स्वर्गारोहणं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह 84वाँ अध्याय माता-पिता की सेवा और उनके महत्त्व पर केंद्रित है। यहाँ इसका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है:

​पद्मपुराणम् (भूमिखण्डः) - अध्याय 84

विषय: माता-पिता रूपी तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन

सुकर्मा ने कहा:

हे पिप्पल! मैंने तुम्हें यह पापनाशक, दिव्य और पुत्रों का उद्धार करने वाला पुण्यदायी चरित्र सुना दिया है। ययाति का यह चरित्र संसार में प्रत्यक्ष देखा जाता है, जिसे सुनकर पुरु ने महान राज्य प्राप्त किया और तुरु (तुर्वसु) दुर्गति को प्राप्त हुआ। (1-2)

​पिता के प्रसाद (प्रसन्नता) और कोप (क्रोध) से जो कुछ घटित हुआ, वह सब पुत्रों को तारने वाला, यश देने वाला और धन-धान्य प्रदायक है। यदु और तुरु, ये दोनों ही शाप के भागी हुए। (3-4)

​इस संसार में माता-पिता के समान अभीष्ट फल देने वाला दूसरा कोई नहीं है। जब पिता प्रेमपूर्वक पुत्र को बुलाता है या माता 'पुत्र-पुत्र' कहकर पुकारती है, तो उसका पुण्य फल सुनो। (5)

​जब माता के बुलाने पर पुत्र हर्ष के साथ उनके पास जाता है, तो उसे गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है। जो यशस्वी पुत्र माता-पिता के चरण धोता है, वह उनके आशीर्वाद से समस्त तीर्थों का फल भोगता है। (6-7)

​उनके अंगों की सेवा (मालिश आदि) करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जो पुत्र भोजन, वस्त्र और स्नान आदि से अपने गुरुतुल्य माता-पिता का पोषण करता है, उसे पृथ्वी दान के समान पुण्य प्राप्त होता है। (8-9)

​इसमें कोई संशय नहीं कि माता साक्षात् सर्वतीर्थमयी गंगा है। जैसे संसार में सिंधु (समुद्र) बहुत पुण्यमय माना गया है, वैसे ही पुराणों के ज्ञाता विद्वान इस लोक में पिता को मानते हैं। (10)

सुकर्मा ने आगे कहा:

जो पुत्र अपने माता-पिता को झिड़कता है या उन पर चिल्लाता है, वह निश्चित रूप से रौरव नरक में जाता है। जो गृहस्थ अपने वृद्ध माता-पिता का पोषण नहीं करता, वह पुत्र अवश्य ही नरक की यातनाएं भोगता है। (11-12)

​जो दुर्मति पुत्र अपने माता-पिता की निंदा करता है, पुराणों के कवियों ने उसके पाप का कोई प्रायश्चित नहीं बताया है। (13)

​यह जानकर ही हे विप्र! मैं प्रतिदिन भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर अपने माता-पिता का पूजन करता हूँ। मेरे गुरु (माता-पिता) मुझे बुलाकर जो भी करने या न करने का आदेश देते हैं, मैं अपनी शक्ति के अनुसार बिना विचार किए उसे करता हूँ। (14-15)

​हे पिप्पल! उन्हीं की कृपा से मुझे यह परम ज्ञान प्राप्त हुआ है जो सद्गति देने वाला है। उन्हीं के प्रसाद से मैं इस संसार के चक्र को समझ पाया हूँ। पृथ्वी पर स्थित मनुष्य जो कुछ भी करते हैं या स्वर्ग में जो भी घटित होता है, गृहस्थ होते हुए भी मैं वह सब जान लेता हूँ। (16-17)

​यहाँ रहते हुए भी मैं नागों के आचरण को जानता हूँ। हे विद्याधर श्रेष्ठ! माता-पिता की कृपा से ही तीनों लोक मेरे वश में हैं। अब आप जाकर भगवान माधव (विष्णु) की आराधना करें। (18-19)

भगवान विष्णु ने कहा:

सुकर्मा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर वह पिप्पल अत्यंत लज्जित हुआ और उस श्रेष्ठ ब्राह्मण (सुकर्मा) को प्रणाम कर स्वर्ग लोक चला गया। और वह धर्मात्मा सुकर्मा अपने माता-पिता की सेवा में ही लगा रहा। (20)

​हे महामते वेन! मैंने तुम्हें यह 'पितृ-तीर्थ' का पूरा प्रसंग सुना दिया है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? (21)

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में 'वेनोपाख्यान' के अंतर्गत माता-पिता रूपी तीर्थ के माहात्म्य वर्णन का चौरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह 84वाँ अध्याय माता-पिता की सेवा और उनके महत्त्व पर केंद्रित है। यहाँ इसका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है:

​पद्मपुराणम् (भूमिखण्डः) - अध्याय 84

विषय: माता-पिता रूपी तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन

सुकर्मा ने कहा:

हे पिप्पल! मैंने तुम्हें यह पापनाशक, दिव्य और पुत्रों का उद्धार करने वाला पुण्यदायी चरित्र सुना दिया है। ययाति का यह चरित्र संसार में प्रत्यक्ष देखा जाता है, जिसे सुनकर पुरु ने महान राज्य प्राप्त किया और तुरु (तुर्वसु) दुर्गति को प्राप्त हुआ। (1-2)

​पिता के प्रसाद (प्रसन्नता) और कोप (क्रोध) से जो कुछ घटित हुआ, वह सब पुत्रों को तारने वाला, यश देने वाला और धन-धान्य प्रदायक है। यदु और तुरु, ये दोनों ही शाप के भागी हुए। (3-4)

​इस संसार में माता-पिता के समान अभीष्ट फल देने वाला दूसरा कोई नहीं है। जब पिता प्रेमपूर्वक पुत्र को बुलाता है या माता 'पुत्र-पुत्र' कहकर पुकारती है, तो उसका पुण्य फल सुनो। (5)

​जब माता के बुलाने पर पुत्र हर्ष के साथ उनके पास जाता है, तो उसे गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है। जो यशस्वी पुत्र माता-पिता के चरण धोता है, वह उनके आशीर्वाद से समस्त तीर्थों का फल भोगता है। (6-7)

​उनके अंगों की सेवा (मालिश आदि) करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जो पुत्र भोजन, वस्त्र और स्नान आदि से अपने गुरुतुल्य माता-पिता का पोषण करता है, उसे पृथ्वी दान के समान पुण्य प्राप्त होता है। (8-9)

​इसमें कोई संशय नहीं कि माता साक्षात् सर्वतीर्थमयी गंगा है। जैसे संसार में सिंधु (समुद्र) बहुत पुण्यमय माना गया है, वैसे ही पुराणों के ज्ञाता विद्वान इस लोक में पिता को मानते हैं। (10)

सुकर्मा ने आगे कहा:

जो पुत्र अपने माता-पिता को झिड़कता है या उन पर चिल्लाता है, वह निश्चित रूप से रौरव नरक में जाता है। जो गृहस्थ अपने वृद्ध माता-पिता का पोषण नहीं करता, वह पुत्र अवश्य ही नरक की यातनाएं भोगता है। (11-12)

​जो दुर्मति पुत्र अपने माता-पिता की निंदा करता है, पुराणों के कवियों ने उसके पाप का कोई प्रायश्चित नहीं बताया है। (13)

​यह जानकर ही हे विप्र! मैं प्रतिदिन भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर अपने माता-पिता का पूजन करता हूँ। मेरे गुरु (माता-पिता) मुझे बुलाकर जो भी करने या न करने का आदेश देते हैं, मैं अपनी शक्ति के अनुसार बिना विचार किए उसे करता हूँ। (14-15)

​हे पिप्पल! उन्हीं की कृपा से मुझे यह परम ज्ञान प्राप्त हुआ है जो सद्गति देने वाला है। उन्हीं के प्रसाद से मैं इस संसार के चक्र को समझ पाया हूँ। पृथ्वी पर स्थित मनुष्य जो कुछ भी करते हैं या स्वर्ग में जो भी घटित होता है, गृहस्थ होते हुए भी मैं वह सब जान लेता हूँ। (16-17)

​यहाँ रहते हुए भी मैं नागों के आचरण को जानता हूँ। हे विद्याधर श्रेष्ठ! माता-पिता की कृपा से ही तीनों लोक मेरे वश में हैं। अब आप जाकर भगवान माधव (विष्णु) की आराधना करें। (18-19)

भगवान विष्णु ने कहा:

सुकर्मा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर वह पिप्पल अत्यंत लज्जित हुआ और उस श्रेष्ठ ब्राह्मण (सुकर्मा) को प्रणाम कर स्वर्ग लोक चला गया। और वह धर्मात्मा सुकर्मा अपने माता-पिता की सेवा में ही लगा रहा। (20)

​हे महामते वेन! मैंने तुम्हें यह 'पितृ-तीर्थ' का पूरा प्रसंग सुना दिया है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? (21)

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में 'वेनोपाख्यान' के अंतर्गत माता-पिता रूपी तीर्थ के माहात्म्य वर्णन का चौरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड (अध्याय 85) का हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है:

​गुरुतीर्थ की महिमा और च्यवन ऋषि की कथा

राजा वेन ने पूछा—

हे भगवन्! देवताओं के भी ईश्वरों के देव! आपकी कृपा से मैंने 'भार्यातीर्थ' (पत्नी रूपी तीर्थ), उत्तम 'पितृतीर्थ' और बहुत पुण्य देने वाले 'मातृतीर्थ' के विषय में सुना। अब आप प्रसन्न होकर मुझे 'गुरुतीर्थ' के बारे में बताइये।

श्री भगवान ने कहा—

हे राजन्! अब मैं तुम्हें सर्वोत्तम गुरुतीर्थ के बारे में बताऊंगा, जो सभी पापों को हरने वाला और शिष्यों को सद्गति देने वाला कहा गया है। शिष्यों के लिए यह परम पुण्यमयी, धर्मस्वरूप और सनातन है। यह प्रत्यक्ष फल देने वाला परम ज्ञान और परम तीर्थ है।

​जिस गुरु की कृपा से मनुष्य इसी लोक में शुभ फल प्राप्त करता है, परलोक में सुख भोगता है और यश-कीर्ति पाता है। हे राजेंद्र! महात्मा गुरु की प्रसन्नता से ही शिष्य चराचर त्रैलोक्य को प्रत्यक्ष देख लेता है। वह लोक-व्यवहार, सदाचार और विज्ञान को प्राप्त कर मोक्ष की ओर बढ़ता है।

​गुरु का महत्व: उपमाओं के माध्यम से

  • ​जैसे सूर्य समस्त लोकों को प्रकाशित करता है, वैसे ही गुरु शिष्यों की उत्तम गति का प्रकाशक है।
  • ​जैसे चन्द्रमा रात्रि में प्रकाशित होकर अपने तेज से चराचर जगत पर अधिकार करता है।
  • ​जैसे घर में जलता हुआ दीपक घोर अंधकार को नष्ट कर देता है।

​उसी प्रकार, अज्ञान रूपी अंधकार से घिरे हुए शिष्य को गुरु अपने उपदेशों के प्रकाश से आलोकित कर देते हैं। सूर्य दिन में, चंद्रमा रात में और दीपक केवल घर के भीतर प्रकाश करता है, लेकिन गुरु शिष्य के भीतर व्याप्त अज्ञान के अंधेरे को दिन-रात हर समय के लिए नष्ट कर देते हैं। इसलिए शिष्यों के लिए गुरु ही परम तीर्थ हैं। शिष्य को मन, वचन और कर्म से सदैव गुरु का पूजन करना चाहिए।

​च्यवन ऋषि की तीर्थ यात्रा

​इसी सन्दर्भ में एक प्राचीन इतिहास सुनाया जाता है, जो भृगुवंश में उत्पन्न महात्मा च्यवन ऋषि का है। एक बार मुनिश्रेष्ठ च्यवन के मन में चिंता हुई कि "मैं इस पृथ्वी पर पूर्ण ज्ञान-सम्पन्न कब होऊंगा?"

​ज्ञान की इच्छा में उन्होंने घर, खेत, पत्नी, पुत्र और धन का त्याग कर तीर्थ यात्रा पर निकलने का निश्चय किया। उन्होंने गंगा, नर्मदा, सरस्वती, गोदावरी आदि सभी नदियों और सागरों की यात्रा की। अनेक देव-मन्दिरों और पुण्य लिंगों के दर्शन करते हुए वे भटकते रहे। तीर्थों में भ्रमण करते हुए उनका शरीर सूर्य के समान तेजस्वी और पवित्र हो गया।

​नर्मदा के दक्षिण तट पर अमरकंटक नाम के स्थान पर उन्होंने सिद्धनाथ, महेश्वर, ज्वालेश्वर, अमरेश्वर, ब्रह्मेश, कपिलेश और मार्कण्डेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन किए। अंत में वे 'ओंकार' (ओंकारेश्वर) पहुँचे। वहां एक शीतल वट वृक्ष की छाया में वे विश्राम करने लगे।

​कुंजल पक्षी और उसके पुत्रों का संवाद

​वहां च्यवन ऋषि ने एक पक्षी की दिव्य वाणी सुनी, जो ज्ञान-विज्ञान से युक्त थी। वहां कुंजल नाम का एक धर्मात्मा बूढ़ा तोता (शुक) रहता था, जिसके चार पुत्र और पत्नी थे। पुत्रों के नाम थे:

  1. उज्ज्वल (बड़ा पुत्र)
  2. समुज्ज्वल
  3. विज्ज्वल
  4. कपिंजल (सबसे छोटा)

​वे चारों पुत्र माता-पिता के परम भक्त थे। वे दिन भर द्वीपों और पर्वतों में घूमकर श्रेष्ठ फल और अमृत जैसा जल लाते थे। शाम होने पर वे अपने पिता के पास लौटते और उनके चरणों में प्रणाम कर उन्हें भोजन अर्पित करते थे। माता-पिता भी प्रेम से उन्हें आशीर्वाद देते थे।

​एक बार पिता कुंजल ने अपने ज्येष्ठ पुत्र उज्ज्वल से पूछा— "पुत्र! आज तुम कहाँ गए थे? तुमने वहां क्या अपूर्व (अनोखा) देखा या सुना? मुझे बताओ।"

​उज्ज्वल द्वारा 'दिव्या देवी' की कथा

उज्ज्वल ने कहा—

"हे पिता! मैं प्रतिदिन आहार के लिए प्लक्षद्वीप जाता हूँ। वहां अनेक देश, पर्वत, नदियाँ और नगर हैं, जहाँ की प्रजा सुखी और धर्मपरायण है। वहां दिवोदास नाम के एक धर्मात्मा राजा थे, जिनकी 'दिव्या देवी' नाम की एक अत्यंत सुंदर और गुणवान पुत्री थी।

​जब वह विवाह योग्य हुई, तो राजा ने उसका विवाह चित्रसेन नाम के राजा से किया। परंतु विवाह के समय ही चित्रसेन की मृत्यु हो गई। राजा दिवोदास ने दुखी होकर ब्राह्मणों से पूछा कि मेरी पुत्री का भविष्य कैसा है? ब्राह्मणों ने कहा— 'राजन्! इसके भाग्य में ऐसा योग है कि जिससे भी इसका विवाह होगा, वह या तो मर जाएगा, या किसी असाध्य रोग से ग्रस्त होकर इसे छोड़ देगा या संन्यासी हो जाएगा।'

​शास्त्रों के अनुसार, यदि कन्या का विवाह होने के बाद पति मर जाए और वह अभी छोटी (रजस्वला न हुई) हो, तो पिता उसका पुनर्विवाह कर सकता है। ब्राह्मणों की सलाह पर राजा ने दोबारा उसका विवाह रूपसेन से किया, किन्तु वह भी मर गया। इसी प्रकार उस कन्या के 21 पति एक-एक करके मृत्यु को प्राप्त हुए।

​अंत में राजा ने दुखी होकर 'स्वयंवर' रखा। वहां आए राजाओं में उस कन्या के रूप को लेकर युद्ध छिड़ गया और वे सब आपस में लड़कर मर गए। इस भारी विनाश से दुखी होकर दिव्या देवी वन की गुफाओं में जाकर विलाप करने लगी। हे पिता! मैंने वहां यह महान आश्चर्य देखा। कृपा कर मुझे इसका कारण बताइये।"

इस प्रकार पद्मपुराण के भूमिखण्ड में 'च्यवनोपाख्यान' के अंतर्गत 85वां अध्याय समाप्त हुआ।

यहाँ पद्मपुराण के भूमिखण्ड के ८६वें अध्याय का श्लोकवार हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है:

पद्मपुराणम् - भूमिखण्ड (अध्याय ८६)

कुञ्जल उवाच (कुञ्जल पक्षी ने कहा):

श्लोक १-३: हे वत्स! मैं तुम्हें दिव्या देवी के उन पूर्वजन्म के कर्मों के बारे में बताता हूँ, जैसा उसने किया था, वह सब मुझसे सुनो। पुण्यमयी और पापों का नाश करने वाली वाराणसी नगरी है। वहाँ सुवीर नाम का एक महाबुद्धिमान वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से संपन्न था। उसकी 'चित्रा' नाम की पत्नी थी जो बहुत प्रसिद्ध थी।

श्लोक ४-६: वह अपने कुल के आचरण को त्याग कर दुराचार में लग गई। वह अपने पति की आज्ञा नहीं मानती थी और स्वेच्छाचारिणी (अपनी मर्जी से घूमने वाली) हो गई थी। धर्म-पुण्य से रहित वह केवल पाप कर्म करती थी, नित्य अपने पति की निंदा करती और कलह (झगड़ा) करना उसे प्रिय था। वह सदा दूसरों के घरों में रहती और घर-घर भटकती थी। वह हमेशा प्राणियों के दोष देखती और दुष्ट स्वभाव वाली थी।

श्लोक ७-९: वह दुष्टा सदा सज्जनों की निंदा करने वाली और उपहास करने वाली थी। उसके अनाचार और महापाप को जानकर सुवीर ने उसकी निंदा की। हे महाप्राज्ञ! सुवीर ने उसे त्याग दिया और दूसरी वैश्य कन्या से विवाह कर लिया और उसके साथ रहने लगा। वह धर्मात्मा सुवीर सदा सत्य और धर्म में मन लगाकर रहने लगा। पति द्वारा निकाली गई वह प्रचण्ड स्वभाव वाली चित्रा पृथ्वी पर भटकने लगी।

श्लोक १०-१२: वह सदा पापी पुरुषों की संगति में रहने लगी और उनके लिए 'दूती' (इधर-उधर की बातें करने वाली या अनैतिक कार्य कराने वाली) का काम करने लगी। उस पापिनी ने कई सज्जनों के घर तुड़वा दिए। वह साध्वी स्त्रियों को बुलाकर उन्हें पापपूर्ण वचनों से लोभ देती थी। अपने विश्वास दिलाने वाले वचनों से वह लोगों का धर्म भ्रष्ट करती और सज्जनों की स्त्रियों को दूसरों के पास पहुँचा देती थी।

श्लोक १३-१५: इस प्रकार उस पापी चित्रा ने सैंकड़ों घर उजाड़ दिए। उस महादुष्टा ने पतियों और पुत्रों के बीच भी युद्ध (झगड़ा) करवा दिया। वह पुरुषों के मन को स्त्रियों के प्रति भ्रमित कर देती थी और यमराज के गाँव की जनसंख्या बढ़ाने वाला (विनाशकारी) युद्ध करवाती थी। इस प्रकार सैंकड़ों घरों को नष्ट करके अंत में वह मृत्यु को प्राप्त हुई। हे सुनन्दन! यमराज ने उसे बहुत से दण्डों से अनुशासित किया।

श्लोक १६-१८: सूर्यपुत्र यमराज ने उसे रौरव आदि भयंकर नरकों का भोग कराया। रौरव नरक में उसे पकाया गया और उसे अनेक प्रकार की पीड़ाएँ दिखाई गईं। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है। उस पापिनी चित्रा ने चूँकि सैंकड़ों घर तोड़े थे, हे द्विजोत्तम! उसी कर्म का विपाक (फल) उसने भोगा। क्योंकि उसने घर उजाड़े थे, इसलिए वह दुःख भोगती है।

श्लोक १९-२१: जब उसके विवाह का समय आता है, तब उसका भाग्य (पुराना पाप) आड़े आ जाता है। विवाह का समय प्राप्त होते ही उसका पति मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। जैसे उसने सैंकड़ों घर तोड़े थे, वैसे ही उसके सौ वरों (पतियों) की मृत्यु हुई। हे वत्स! स्वयंवर के समय और विवाह के समय मिलाकर अब तक २१ (वर मर चुके हैं)। तुमने जैसा मुझसे पूछा था, मैंने दिव्या देवी का वह सारा पूर्व चरित्र तुम्हें सुना दिया है।

उज्ज्वल उवाच (उज्ज्वल ने कहा):

श्लोक २२-२४: आपने दिव्या देवी का पूर्व चरित्र और उसके द्वारा किया गया 'गृह-भंग' (घर उजाड़ना) नाम का घोर पाप बताया। (किन्तु) प्लक्षद्वीप के राजा दिवोदास की पुत्री के रूप में उसने इतने उच्च कुल में जन्म किस पुण्य के प्रभाव से प्राप्त किया? हे तात! मुझे यह संशय है, कृपा कर मुझे बताइये कि ऐसी पाप करने वाली स्त्री राजा की पुत्री कैसे हुई?

कुञ्जल उवाच (कुञ्जल ने कहा):

श्लोक २५-२७: हे पुत्र उज्ज्वल! चित्रा ने पहले जो पुण्य कार्य किया था, वह सब मैं कहता हूँ, सुनो। भटकता हुआ कोई महाबुद्धिमान 'सिद्ध' संन्यासी वहाँ आया। वह वस्त्रहीन (फटे कपड़े वाला), हाथ में दण्ड धारण करने वाला, केवल कौपीन पहने हुए और दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाला (दिगम्बर) था। वह चित्रा के घर के द्वार पर आकर रुक गया।

श्लोक २८-३०: वह मौनी, मुण्डित सिर वाला, आत्मजयी और जितेन्द्रिय था। वह निराहारी और सभी तत्त्वों के अर्थ को जानने वाला था। हे सुपुत्र! वह लंबी यात्रा से थका हुआ और धूप से व्याकुल मन वाला था। वह श्रम से दुखी और प्यास से पीड़ित था। जब वह चित्रा के द्वार की छाया का आश्रय लेकर खड़ा हुआ, तब चित्रा ने उस श्रम से पीड़ित महात्मा को देखा।

श्लोक ३१-३३: उस चित्रा ने उन महात्मा की सेवा की। उनके पैर धोकर उन्हें उत्तम आसन दिया। (उसने कहा-) हे तात! आप इस कोमल आसन पर सुख से बैठें। अपनी भूख मिटाने के लिए यह उत्तम अन्न ग्रहण करें। अपनी इच्छा से संतुष्ट होकर यह शीतल जल पियें। हे पुत्र! ऐसा कहकर उसने उनकी देवता की तरह पूजा की।

श्लोक ३४-३६: उनके अंगों को दबाकर (मालिश कर) उसने उनकी थकान मिटा दी। उन महात्मा ने भोजन और जल ग्रहण किया। उस तत्त्वदर्शी सिद्ध को उसने इस प्रकार संतुष्ट किया। वे धर्मात्मा सिद्ध संतुष्ट होकर कुछ समय वहाँ रुके और फिर अपनी इच्छा से चले गए। उन महात्मा सिद्ध के जाने के बाद, वह चित्रा अपने कर्मों के वश मृत्यु को प्राप्त हुई।

श्लोक ३७-३९: उसे धर्मराज ने कष्टकारी दण्डों से दण्डित किया। वह चित्रा नरक में गई और हज़ारों वर्षों तक दुःख भोगती रही। भोग समाप्त होने पर उसे पुनः मनुष्य जन्म मिला। क्योंकि उसने पहले एक श्रेष्ठ सिद्ध की पूजा की थी, उस कर्म के फल स्वरूप उसने एक पुण्यवान कुल में जन्म लिया।

श्लोक ४०-४३: वह क्षत्रिय महाराज दिवोदास के घर पैदा हुई। हे नरोत्तम! उसका नाम 'दिव्या देवी' पड़ा। क्योंकि उसने महात्मा को अन्न और जल दिया था, उसी दान के कारण वह आज उत्तम पुण्य का फल भोग रही है। वह शीतल जल पीती है, मिष्टान्न खाती है और अपने पिता के घर में दिव्य भोगों को भोग रही है। उस सिद्ध के प्रभाव से ही वह राजकन्या बनी।

श्लोक ४४-४५: किन्तु हे सुपुत्र! पूर्व जन्म के पापकर्म 'गृह-भंग' के प्रभाव से वह राजकन्या होकर भी वैधव्य (विधवापन) का दुःख भोग रही है। मैंने तुम्हें दिव्या देवी का पूरा चरित्र बता दिया। अब तुम और क्या पूछना चाहते हो?

उज्ज्वल उवाच (उज्ज्वल ने कहा):

श्लोक ४६-४८: हे तात! वह इस शोक और महान दुःख से कैसे मुक्त होगी, यह मुझे बताइये। वह बेचारी बालिका इस समय महान दुःख से पीड़ित है। उसे सुख कैसे मिलेगा और आगे क्या परिणाम होगा? मुझे यह संशय है, इसे दूर करें। वह मोक्ष कैसे प्राप्त करेगी? वह बेचारी घोर वन में अकेली रो रही है।

विष्णुरुवाच (भगवान विष्णु ने कहा):

श्लोक ४९-५१: पुत्र की बात सुनकर महाबुद्धिमान कुञ्जल ने क्षण भर विचार किया और पुत्र से कहा— हे वत्स! मैं सत्य कहता हूँ, सुनो। पूर्वजन्म के कर्मों के कारण मुझे यह पक्षी योनि प्राप्त हुई है, जिससे मेरा ज्ञान नष्ट हो गया है। परन्तु इस पवित्र वृक्ष के संग से और माता रेवा (नर्मदा) तथा भगवान विष्णु के प्रसाद से मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ है।

श्लोक ५२-५४: जिससे वह (दिव्या देवी) ज्ञान प्राप्त करेगी और मोक्ष स्थान को जाएगी, वह उत्तम मोक्षमार्ग का उपदेश मैं कहता हूँ। जैसे सोना आग में तपकर शुद्ध हो जाता है, वैसे ही वह भी पापों से मुक्त होकर शुद्ध हो जाएगी। हे महाप्राज्ञ! भगवान हरि के ध्यान से और जप, होम तथा व्रत से पापियों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक ५५-५७: जैसे हाथी सिंह के भय से मद त्याग देता है, वैसे ही श्रीकृष्ण के नाम उच्चारण से पाप भाग जाते हैं। जैसे गरुड़ के तेज से सांप विषहीन हो जाते हैं, वैसे ही चक्रपाणि विष्णु के नाम लेने से ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक ५८-६०: जब वह स्थिर होकर, काम-क्रोध छोड़कर, इन्द्रियों को वश में करके और आत्मज्ञान को धारण करके भगवान के पवित्र नामों का जप करेगी और उनमें एकाग्र होकर लीन हो जाएगी, तब वह परम ज्ञान को प्राप्त कर मोक्ष पा लेगी।

उज्ज्वल उवाच (उज्ज्वल ने कहा):

श्लोक ६१: हे तात! मुझे वह 'परम ज्ञान' बताइये, और उसके बाद वह ध्यान, व्रत और भगवान के सौ नामों को भी बताइये।

कुञ्जल उवाच (कुञ्जल ने कहा):

श्लोक ६२-६५: हे पुत्र! मैं वह परम ज्ञान कहता हूँ जो किसी ने नहीं देखा। वह केवल 'कैवल्य' है जो मल रहित है। जैसे हवा से रहित स्थान पर दीपक स्थिर होकर जलता है और अंधकार का नाश करता है, वैसे ही दोषरहित आत्मा निराश्रय और निर्मल हो जाती है। तब न कोई मित्र होता है, न शत्रु; न शोक, न हर्ष; न लोभ और न मत्सर। वह सुख-दुःख से मुक्त हो जाता है।

श्लोक ६६-७२: जब मनुष्य इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है, तब वह 'केवल' (शुद्ध) हो जाता है। (यहाँ दीपक और तेल का उदाहरण देकर समझाया गया है कि जैसे दीपक तेल को सोखकर प्रकाश देता है, वैसे ही योगी कर्म रूपी तेल को सुखाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है)। वह अपने तेज से तीनों लोकों को देख लेता है। यही 'केवल ज्ञान' का स्वरूप है।

श्लोक ७३-८१: अब मैं उस चक्रधारी भगवान के ध्यान के बारे में बताता हूँ। योगी उन्हें ज्ञान चक्षु से देखते हैं। वे हाथ-पैर के बिना भी सब जगह जाते हैं, कान के बिना सब सुनते हैं, और बिना आँखों के सब देखते हैं। वे जगत्पति सबके साक्षी हैं। वे सदानन्द, निर्जर और सर्वमयी विभु हैं। जो उनके इस निराकार स्वरूप का ध्यान करता है, वह अमृतमय परम स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक ८२-९५: अब मैं उनका दूसरा 'सकार' (मूर्त) रूप बताता हूँ। वे वासुदेव कहलाते हैं क्योंकि सारा ब्रह्माण्ड उनमें वास करता है। उनका वर्ण सजल मेघ के समान श्याम है। वे चतुर्भुज हैं। उनके दाहिने हाथ में शंख और चक्र हैं तथा बाएँ हाथ में कौमोदकी गदा और पद्म (कमल) हैं। उनके नेत्र कमल के समान हैं, वे पीताम्बर धारण करते हैं, कौस्तुभ मणि और श्रीवत्स से सुशोभित हैं। वे गरुड़ पर सवार हैं। जो मनुष्य अनन्य मन से उनका नित्य ध्यान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।

श्लोक ९६: मैंने तुम्हें जगत्पति का ध्यान बता दिया। अब मैं वह 'व्रत' भी बताता हूँ जो सब पापों का नाश करने वाला है।

(इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे ८६वाँ अध्याय समाप्त)

यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का 87वाँ अध्याय है, जिसमें कुंजल पक्षी अपने पुत्र उज्ज्वल को भगवान विष्णु के विभिन्न व्रतों और उनके 'शतनाम स्तोत्र' (सौ नामों) की महिमा बता रहा है।
​यहाँ इसका हिंदी अनुवाद दिया गया है:
​पद्मपुराणम्: भूमिखण्ड (अध्याय ८७)
​कुंजल पक्षी और उसके पुत्र उज्ज्वल का संवाद
​कुंजल ने कहा:
हे पुत्र! अब मैं तुम्हें उन विभिन्न व्रतों के बारे में बताऊंगा, जिनसे भगवान श्रीहरि की आराधना की जाती है। १।
​प्रमुख व्रतों के नाम:
जया, विजया, जयंती (जो पापों का नाश करने वाली है), त्रिस्पृशा, वंजुली, तिलदग्धा, अखंडाचारकन्या और मनोरथा व्रत। २।
हे पुत्र! एकादशी के भी अनेक भेद हैं। इसके अतिरिक्त 'अशून्यशयन' और 'जन्माष्टमी' जैसे महाव्रत हैं। ३।
इन महापुण्यकारी व्रतों के प्रभाव से प्राणियों के पाप दूर हो जाते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है, मैं यह पूर्णतः सत्य कह रहा हूँ। ४।
​विष्णु शतनाम स्तोत्र का आरम्भ:
अब मैं तुम्हें पापों के समूह का विनाश करने वाला 'पुत्र-शतनाम' (सौ नामों वाला स्तोत्र) बताऊंगा, जो मनुष्यों को सद्गति प्रदान करने वाला है। ५।
भगवान कृष्ण के उस उत्तम शतनाम स्तोत्र को मैं अभी कहूँगा, हे श्रेष्ठ पुत्र! तुम उसे सुनो। ६।
विष्णु के इन सौ नामों के ऋषि, छंद और देवता का वर्णन करता हूँ, जो सभी पापों को शुद्ध करने वाले हैं। ७।
इस स्तोत्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, देवता ओमकार (विष्णु) हैं और छंद अनुष्टुप है। ८।
सभी कामनाओं की सिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है। (इसका विनियोग मंत्र इस प्रकार है— 'अस्य विष्णोः शतनामस्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः विष्णुर्देवता अनुष्टुप्छंदः। सर्वकामसमृद्ध्यर्थं सर्वपापक्षयार्थे विनियोगः॥') ९।
​भगवान विष्णु के १०० नाम (स्तोत्र)
​१०. मैं हृषीकेश, केशव, मधुसूदन, दैत्यों का संहार करने वाले और दोषरहित नारायण को नमस्कार करता हूँ।
११. जयंत, विजय, कृष्ण, अनंत, वामन, विष्णु, विश्वेश्वर, पुण्यमय, विश्वाधार और देवताओं द्वारा पूजित।
१२. निष्पाप (अनघ), पापों के हंता, नरसिंह, लक्ष्मी के प्रिय, श्रीपति, श्रीधर, श्रीद (लक्ष्मी देने वाले), श्रीनिवास और महान उदय वाले।
१३. श्रीराम, माधव, मोक्ष स्वरूप, क्षमा रूप, जनार्दन, सर्वज्ञ, सबको जानने वाले, सब कुछ देने वाले और सबके नायक।
१४. हरि, मुरारि, गोविंद, पद्मनाभ, प्रजापति, आनंद स्वरूप, ज्ञान संपन्न, ज्ञान देने वाले और ज्ञान के स्वामी।
१५. अच्युत, सबल, चंद्र, चक्रपाणि, परावर (श्रेष्ठ से श्रेष्ठ), युग के आधार, जगत की योनि (उत्पत्ति स्थान), ब्रह्मरूप और महेश्वर।
१६. मुकुंद, सुवैकुंठ, एकरूप, जगत के स्वामी, वासुदेव, महात्मा, ब्राह्मणों के हितकारी और ब्राह्मणों के प्रिय।
१७. गौओं के प्रिय, गौओं का हित करने वाले, यज्ञ स्वरूप, यज्ञ के अंग, यज्ञ को बढ़ाने वाले, यज्ञ के भोक्ता और वेद-वेदांगों में पारंगत।
१८. वेद के ज्ञाता, वेदरूप, विद्या के निवास, देवताओं के स्वामी, अव्यक्त, महाहंस, हाथ में शंख धारण करने वाले और पुरातन पुरुष।
१९. पुरुष, कमल नयन (पुष्कराक्ष), वराह, पृथ्वी को धारण करने वाले, प्रद्युम्न, कामपाल, व्यास और महेश्वर।
२०. सर्वसौख्य, महासौख्य, मोक्ष, परमेश्वर, योगरूप, महाज्ञान और योगियों को गति देने वाले प्रिय।
२१. मुरारि, लोकपाल, हाथ में कमल लेने वाले, गदाधर, गुहा (हृदय) में वास करने वाले, सर्वव्यापी, पुण्य के धाम और विशाल भुजाओं वाले।
२२. वृंदानाथ, विशाल शरीर वाले, पावन, पापों का नाश करने वाले, गोपीनाथ, गोपों के सखा, गोपाल और गौओं के समूह को आश्रय देने वाले।
२३. परमात्मा, पराधीश, कपिल और मनुष्यों के कार्य हेतु अवतार लेने वाले। इन निश्चल और नित्य भगवान को मैं मन, वाणी और कर्म से नमस्कार करता हूँ। २३।
​स्तोत्र की महिमा (फलश्रुति)
​पुण्य: जो व्यक्ति एकाग्र मन से इन सौ नामों द्वारा कृष्ण की स्तुति करता है, वह इस लोक में पवित्र होकर अंत में मधुसूदन के लोक (वैकुंठ) को जाता है। २४।
​गंगा स्नान का फल: जो मनुष्य प्रतिदिन ध्यानमग्न होकर इसका जप करता है, उसे नित्य गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है। २५-२६।
​अश्वमेध यज्ञ: जो नियमपूर्वक तीनों काल (सुबह, दोपहर, शाम) इसका पाठ करता है, उसे निस्संदेह अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। २७।
​एकादशी महिमा: जो एकादशी को उपवास रखकर भगवान माधव के सामने रात्रि जागरण में इसका पाठ करता है, उसे पुण्डरीक यज्ञ का फल मिलता है। २८-२९।
​तुलसी और शालग्राम: तुलसी के पास या शालग्राम शिला/द्वारका शिला (गोमती चक्र) के समीप इसका पाठ करने वाले को राजसूय यज्ञ का फल मिलता है और उसकी सौ पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है। ३०-३१।
​कार्तिक और माघ मास: कार्तिक या माघ मास में स्नान के बाद जो इस स्तोत्र को पढ़ता या सुनता है, वह सुरापान (मदिरापान) जैसे महापापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है। ३२-३४।
​पितृ कार्य: श्राद्ध के समय ब्राह्मणों के भोजन करते समय यदि इस स्तोत्र का पाठ किया जाए, तो पितर तृप्त होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। ३५-३६।
​वर्ण फल: इसे जपने वाला ब्राह्मण वेदवेत्ता बनता है, क्षत्रिय पृथ्वी (राज्य) प्राप्त करता है, वैश्य धन-समृद्धि पाता है और शूद्र सुख प्राप्त कर अगले जन्म में उत्तम योनि और वेद विद्या प्राप्त करता है। ३७-३८।
​निष्कर्ष:
यह स्तोत्र सुख और मोक्ष देने वाला है, इसका जप अवश्य करना चाहिए। केशव की कृपा से मनुष्य की सभी सिद्धियाँ पूर्ण हो जाती हैं। ३९।
​इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थवर्णने च्यवनचरित्रे सप्ताशीतितमोऽध्यायः॥

(इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अंतर्गत गुरुतीर्थ वर्णन में च्यवन चरित्र का सत्तासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।)



यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का 88वाँ अध्याय है। इसमें पक्षी कुंजल के पुत्र उज्ज्वल और राजकन्या दिव्यादेवी के उद्धार की कथा है।

​यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

​पद्मपुराण: भूमिखण्ड (अध्याय 88) - हिन्दी अनुवाद

कुंजल ने कहा—

हे सुपुत्र! मैंने तुम्हारे सामने भगवान विष्णु के पापों को नष्ट करने वाले व्रत, स्तोत्र, महाज्ञान और ध्यान का वर्णन किया है। जब कोई इन चारों पुण्यों का आचरण करता है, तो वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ 'वैष्णव लोक' को प्राप्त करता है। हे वत्स! अब तुम यहाँ से जाकर उस दिव्या देवी को जगाओ (बोध दो) और उसे व्रतों के राजा 'अशून्यशयन व्रत' के बारे में बताओ। उस यशस्विनी राजकन्या को महापाप से मुक्त करो। तुमने जो मुझसे पूछा था, वह पुण्य देने वाला और पाप नाशक वृत्तांत मैंने कह दिया। हे महाभाग! अब तुम जाओ। इतना कहकर कुंजल चुप हो गए।

श्री विष्णु ने कहा—

पिता कुंजल के ऐसा कहने पर, धर्मात्मा और बुद्धिमान उज्ज्वल ने अपने माता-पिता के चरणों में प्रणाम किया और शीघ्र ही प्लक्षद्वीप की ओर प्रस्थान किया। वह उज्ज्वल 'सर्वतोभद्र' नामक पर्वत पर पहुँचा, जो विभिन्न धातुओं, रत्नों और ऊँचे शिखरों से सुशोभित था। वहाँ स्वच्छ जल वाली नदियाँ बह रही थीं। उस पर्वत पर किन्नर और गंधर्व मधुर स्वर में गाते थे और वह अप्सराओं तथा देवों के समूहों से घिरा हुआ था।

​वहाँ पहुँचकर उज्ज्वल ने देखा कि वह कन्या (दिव्यादेवी) उस पर्वत पर मधुर स्वर में विलाप कर रही है। उसे रोते हुए देखकर बुद्धिमान पक्षी उज्ज्वल ने कहा— "हे कल्याणी! तुम कौन हो? और इस समय क्यों रो रही हो? हे महाभागे! तुम किसके आश्रय में हो और किसने तुम्हारा अहित किया है? मुझे अपने इस दुख का कारण बताओ।"

दिव्यादेवी ने कहा—

"हे महाभाग! यह मेरे कर्मों का फल है कि मैं यहाँ वैधव्य (विधवापन) के दुःख के साथ रह रही हूँ। हे वत्स! आप कौन हैं जो पक्षी रूप में होकर भी मुझ पर कृपा कर रहे हैं और इतनी सुंदरता से बात कर रहे हैं?"

​राजकन्या की बात सुनकर पक्षी ने कहा— "हे महाभागे! मैं एक पक्षी हूँ और तुम्हारे दुःख से दुखी हूँ। मैं कोई सिद्ध या बड़ा ज्ञानी नहीं हूँ, बस तुम्हें विलाप करते देख यहाँ रुक गया। हे देवी! मुझे बताओ कि तुम्हारे पिता के घर में क्या हुआ था और तुम्हारा वृत्तांत क्या है?"

​तब उस कन्या ने अपने दुःख का सारा विवरण क्रमशः दिया। उज्ज्वल ने संक्षेप में सब सुनकर दुखी दिव्यादेवी से कहा— "विवाह के समय तुम्हारे पति कैसे मृत्यु को प्राप्त हुए और स्वयंवर के लिए आए क्षत्रिय कैसे नष्ट हो गए— यह सब मैंने अपने पिता को बताया था। हे सुलोचने! हे वरानने! यह तुम्हारे पिछले जन्मों के पाप कर्मों का फल है, जो तुम्हें इस जन्म में भोगना पड़ रहा है। मेरे पिता ने मुझे यह सब बताया था।"

​पक्षी की यह बात सुनकर कन्या ने प्रार्थना करते हुए कहा— "हे पक्षी! मुझ पर कृपा करें। मुझे उस पाप से मुक्ति का उपाय (प्रायश्चित) बताएँ जिससे मैं शुद्ध होकर पुण्य प्राप्त कर सकूं।"

उज्ज्वल ने कहा—

"हे महाभागे! तुम्हारे लिए ही मैंने अपने पिता से पूछा था। उन्होंने पापों को शुद्ध करने वाला उत्तम प्रायश्चित बताया है। तुम भगवान हृषीकेश (विष्णु) का ध्यान करो और उनके शतनाम (100 नाम) का जप करो। ज्ञान में तत्पर होकर उत्तम 'अशून्यशयन व्रत' करो जो पापों का नाश करने वाला है।" उस धर्मात्मा पक्षी ने उसे विष्णु के ज्ञान, स्तोत्र, व्रत और ध्यान का उपदेश दिया।

विष्णु बोले—

तदनंतर उस कन्या ने निर्जन वन में रहकर तपस्या शुरू की। वह भूख-प्यास और द्वंद्वों से मुक्त होकर एकाग्र हो गई। क्रोध और काम को त्यागकर उसने इंद्रियों को वश में किया। जब चौथा वर्ष आया, तब भगवान जनार्दन उस पर प्रसन्न हुए। वर देने के इच्छुक प्रभु ने उसे दर्शन दिए।

सूत जी बोले—

इंद्रनील मणि के समान श्याम वर्ण, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए हुए, आभूषणों से सुसज्जित महेश्वर को देखकर वह कन्या हाथ जोड़कर कांपने लगी। उसने गद्गद स्वर में कहा— "हे प्रभु! आपके दिव्य तेज के सामने मैं ठहर नहीं पा रही हूँ। आप कौन हैं? कृपया अपना परिचय दें। मैं ज्ञानहीन हूँ, आपका नाम और रूप नहीं जानती। क्या आप ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं या शंकर हैं?" ऐसा कहकर वह पृथ्वी पर दंडवत प्रणाम करने लगी।

भगवान ने कहा—

"हे शोभने! हम तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में कोई अंतर नहीं है। जिसने ब्रह्मा या शंकर की अर्चना की, उसने मेरी ही पूजा की। वे मुझसे भिन्न नहीं हैं। मैं भगवान हृषीकेश हूँ और तुम्हारे इस पुण्य व्रत और स्तोत्र से प्रसन्न होकर आया हूँ। अब तुम निष्पाप हो चुकी हो, वर मांगो।"

दिव्यादेवी ने कहा—

"हे हृषीकेश! हे क्लेशों को हरने वाले कृष्ण! आपकी जय हो। मैं आपके चरणों में प्रणाम करती हूँ। यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे अपने चरणों की भक्ति दीजिए और मोक्ष का मार्ग दिखाइए। हे वैकुंठ! मुझे अपना दास बना लीजिए।"

भगवान ने कहा—

"ऐसा ही होगा। हे महाभागे! अब तुम निष्पाप होकर उस परम वैष्णव लोक को जाओ जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है।"

​भगवान माधव के ऐसा कहते ही दिव्यादेवी सूर्य के समान तेजस्वी और दिव्य आभूषणों से सुसज्जित हो गई। सबके देखते-देखते वह उस 'वैष्णव लोक' को चली गई जहाँ प्रलय का भय नहीं है। वह पक्षी (उज्ज्वल) भी हर्षित होकर अपने घर लौटा और उसने सारी कथा अपने पिता को सुनाई।

इस प्रकार पद्मपुराण के भूमिखण्ड में 'वेनोपाख्यान' के अंतर्गत ८८वाँ अध्याय समाप्त हुआ।



यहाँ पद्मपुराण के भूमिखण्ड के ८९वें अध्याय का हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

कुंजल शुक और उनके पुत्र समुज्ज्वल का संवाद

विष्णु बोले-

इसके बाद कुंजल (पक्षी) ने अपने पुत्र समुज्ज्वल से यह वाक्य कहा— "हे पुत्र! तुम बताओ, तुमने आज क्या अपूर्व (अनोखा) दृश्य देखा है? मैं उसे सुनने का इच्छुक हूँ, प्रसन्नतापूर्वक मुझे बताओ।" इतना कहकर कुंजल चुप हो गया। तब पुत्र समुज्ज्वल ने विनयपूर्वक झुककर अपने पिता से कहना आरम्भ किया।

समुज्ज्वल ने कहा-

हे पिता! आपके और स्वयं के आहार (भोजन) की खोज में मैं देवताओं के समूह से सुशोभित पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय पर गया था। वहाँ मैंने एक ऐसा आश्चर्य देखा जो न पहले कभी देखा था और न सुना था। वह स्थान ऋषि-मुनियों से भरा हुआ और अप्सराओं से सुशोभित था। वह प्रदेश अनेक कौतुकों से संपन्न और परम मंगलकारी था।

​हे तात! वहां मानसरोवर के निकट मैंने एक विचित्र दृश्य देखा। बहुत से हंसों के बीच एक हंस वहां आया। हे महाभाग! इसी प्रकार अन्य काले रंग के हंस भी वहाँ आए। उनके चोंच और पैर सफेद नहीं थे (बल्कि काले थे), जबकि अन्य हंस बिल्कुल श्वेत शरीर वाले थे। कुछ नीले रंग के थे तो कुछ अत्यंत शुभ्र (सफेद)।

​वहाँ चार स्त्रियाँ भी आईं जो अत्यंत भयानक और रौद्र रूप वाली थीं। उनके दांत डरावने थे, बाल ऊपर की ओर उठे हुए थे और वे दिखने में अत्यंत भयंकर थीं। वे भी उस मानसरोवर के पास आईं। हे तात! मेरे देखते-देखते वे काले हंस तो मानसरोवर में नहाने लगे, लेकिन वे स्त्रियाँ भ्रमित होकर इधर-उधर घूमती रहीं, उन्होंने स्नान नहीं किया।

​वे स्त्रियाँ अट्टाहास (ज़ोर-ज़ोर से) करके हंसने लगीं। तभी उस सरोवर से एक विशाल शरीर वाला हंस बाहर निकला और उसके पीछे तीन अन्य हंस निकले। उन्होंने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया और परस्पर विवाद (चर्चा) करते हुए आकाश मार्ग से चले गए।

​वे भयानक स्त्रियाँ वहीं चारों ओर भटकती रहीं। विंध्य पर्वत के पवित्र शिखर पर वृक्षों की छाया में बैठे हुए कुछ पक्षी अत्यंत कष्ट से जल रहे थे। तभी वहां एक भील (व्याध) आया, जो हाथ में धनुष-बाण लिए हुए था और मृगों को कष्ट दे रहा था। वह एक शिला पर सुखपूर्वक बैठ गया।

​उसके पीछे उसकी पत्नी (भीलनी) जल और अन्न लेकर आई। उसने अपने पति को देखा जो किसी राजा के समान तेजस्वी लक्षणों से युक्त था। अपने पति को सूर्य के समान दिव्य तेज से घिरा हुआ देखकर वह चौंक गई। उसे कोई अन्य पुरुष समझकर वह उसे छोड़कर जाने लगी।

व्याध बोला-

"हे प्रिये! यहाँ आओ, तुम मुझे देख क्यों नहीं रही हो? मैं भूख से व्याकुल हूँ और तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा हूँ।"

​पति की वाणी सुनकर व्याध की पत्नी शीघ्रता से उसके पास आई और विस्मित होकर बोली— "यह कैसा तेज है? क्या कोई देवता मुझे बुला रहा है?" उसने अपने दीप्तिमान पति से पूछा— "हे वीर! आपने यहाँ क्या किया? आप दिव्य लक्षणों वाले कौन हैं?"

सूत जी बोले-

अपनी पत्नी द्वारा ऐसा पूछे जाने पर व्याध ने कहा— "हे कान्ते! मैं ही तुम्हारा पति हूँ और तुम मेरी प्रिया हो। तुम मुझे पहचान क्यों नहीं रही हो? तुम्हें संदेह क्यों हो रहा है? मैं भूख से व्याकुल होकर अन्न-जल की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।"

भीलनी बोली-

"मेरे पति तो बर्बर, काले रंग के, लाल आँखों वाले और काले वस्त्र पहनने वाले हैं, जो सभी प्राणियों के लिए भयानक हैं। आप तो दिव्य शरीर वाले हैं और मुझे 'प्रिया' कहकर बुला रहे हैं। मुझे भारी संदेह हो रहा है, मेरे सामने सच कहिए।"

​तब व्याध ने अपनी पत्नी का विश्वास जीतने के लिए उसे अपना कुल, नाम, गाँव, अपनी क्रीड़ाओं और अपने पुत्र-पुत्री के बारे में बताया। यह सुनकर वह भीलनी प्रसन्न हुई और बोली— "आपका शरीर ऐसा श्वेत (सफेद) कांति वाला कैसे हो गया? यह आश्चर्य कैसे हुआ, मुझे बताइए।"

सूत जी बोले-

अपनी पत्नी के विनयपूर्ण प्रश्न को सुनकर व्याध ने उत्तर दिया— "हे सुव्रते! नर्मदा के उत्तर तट पर एक संगम है। मैं धूप से बहुत व्याकुल हो गया था, इसलिए थकान मिटाने के लिए मैं शीघ्रता से उस संगम पर गया। वहाँ स्नान करने और जल पीने के बाद जब मैं लौटा, तभी से मेरा शरीर इस दिव्य तेज से भर गया है और मेरे वस्त्र भी शुभ्र (सफेद) हो गए हैं।"

​अपने पति के लक्षणों और कुल आदि की बातों से उसे पहचानकर और इस पुण्य के प्रभाव को जानकर, उसने पति से कहा— "मुझे भी वह संगम दिखाइए, उसके बाद ही मैं आपको अन्न-जल दूँगी।" पत्नी के कहने पर व्याध उसे शीघ्र वहां ले गया।

​उसने पापनाशक संगम दिखाया। वहाँ बैठे हुए पक्षी भी उनके साथ उस उत्तम रेवा-संगम पर गए। उन पक्षियों के और मेरे देखते-देखते ही, उस स्त्री ने अपने पति को पुनः स्नान कराया और स्वयं भी स्नान किया। स्नान करते ही वे दोनों दिव्य शरीर वाले, दिव्य कांति से युक्त और दिव्य वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित हो गए।

​वे मुनियों और गंधर्वों द्वारा पूजित होकर वैष्णव विमान पर सवार हुए और विष्णु लोक को चले गए। मैंने उन पति-पत्नी को स्वर्ग मार्ग से जाते हुए देखा। उस तीर्थराज को देखकर पक्षी भी हर्षित होकर चहकने लगे।

​वे चार काले हंस भी उस पापनाशक संगम में स्नान करके शुद्ध भाव से पुनः उज्ज्वल (सफेद) हो गए। जल पीकर वे बाहर निकल गए। किन्तु हे तात! वे काली स्त्रियाँ वहाँ स्नान मात्र से मृत्यु को प्राप्त हो गईं। वे चिल्लाती और तड़पती हुई हाहाकार करती यमलोक चली गईं। इसके बाद वे हंस अपने स्थान को उड़ गए।

​हे पिता! यह सब मैंने अपनी आँखों से देखा जो आपको कह सुनाया। वे बड़े शरीर वाले काले हंस कौन थे और वे स्त्रियाँ कौन थीं? हे पिता! कृपा करके मुझे बताइए कि वे काले हंस फिर से सफेद कैसे हो गए और वे स्त्रियाँ क्यों मर गईं? मेरे हृदय में यह बड़ा संशय है। आप ज्ञान में निपुण हैं, प्रसन्न होकर मेरे इस संशय को दूर कीजिए।

​पुत्र समुज्ज्वल के ऐसा कहने पर कुंजल नामक वह शुक (तोता) बोलने लगा।

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अंतर्गत गुरुतीर्थ वर्णन में च्यवन चरित्र का नवासीवाँ (89वाँ) अध्याय समाप्त हुआ।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह 90वाँ अध्याय 'गुरुतीर्थ' की महिमा और तीर्थों के सामर्थ्य पर केंद्रित है। इसका हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है:

​पद्मपुराण: भूमिखण्ड (अध्याय 90)

सूत जी बोले—

प्रज्वलित (संज्वलन) की इन सब बातों को सुनकर धर्मात्मा कुंजल (पक्षी) ने अपने पुत्र से कहा—॥1॥

कुंजल ने कहा—

हे तात! अब मैं तुम्हें सब संदेहों का विनाश करने वाला और पापों को नष्ट करने वाला वह चरित्र सुनाता हूँ, तुम स्थिर मन से सुनो॥2॥

​एक समय देवराज इन्द्र की सभा में देवताओं के कौतुक (जिज्ञासा) के विषय में एक संवाद हुआ। उस समय महात्मा इन्द्र को देखने के लिए नारद जी शीघ्रता से वहाँ पहुँचे॥3-4॥

​सूर्य के समान तेजस्वी नारद जी को आया देखकर महामति इन्द्र बहुत हर्षित हुए। उन्होंने उठकर भक्तिपूर्वक उन्हें अर्घ्य और पाद्य अर्पित किया॥5॥ फिर हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उस द्विजश्रेष्ठ (नारद जी) को कोमल एवं पवित्र आसन पर बिठाया॥6॥ इन्द्र ने श्रद्धापूर्वक पूछा— "हे मुने! आज आपके यहाँ आने का क्या कारण है? कृपा कर बताइये"॥7॥

नारद जी बोले—

"हे देवराज! मैं पृथ्वी के पवित्र प्रदेशों और तीर्थों में श्रद्धापूर्वक स्नान करके, देवताओं और पितरों का पूजन करके आपको देखने आया हूँ"॥8-9॥

इन्द्र ने पूछा—

"हे मुने! आपने बहुत से पुण्य तीर्थ और उत्तम क्षेत्र देखे हैं। कृपया यह बताइये कि किस तीर्थ को प्राप्त करके मनुष्य ब्रह्महत्या, सुरापान, गोवध और स्वर्ण की चोरी (महापाप) से मुक्त हो जाता है? स्वामी से द्रोह करने वाला और स्त्री की हत्या करने वाला मनुष्य कैसे सुखी हो सकता है?"॥10-11॥

नारद जी बोले—

"हे सुरेश्वर! गया आदि जितने भी तीर्थ हैं, मैं उनके विशेष पाप-नाशक प्रभाव को अलग-अलग नहीं जानता। मेरी दृष्टि में तो ये सभी दिव्य और पापों को नष्ट करने वाले समान ही हैं। इनमें कौन विशेष है और कौन अविशेष, यह मैं अभी नहीं बता सकता। अतः आप स्वयं ही इन तीर्थों की परीक्षा (प्रत्यय) करें"॥12-15॥

सूत जी बोले—

नारद जी के वचन सुनकर इन्द्र ने पृथ्वी पर स्थित सभी तीर्थों को बुलाया। इन्द्र की आज्ञा से वे सभी तीर्थ मूर्तरूप (साकार शरीर) धारण करके सभा में उपस्थित हो गए॥16॥ वे सभी दिव्य आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित थे। उनमें कुछ स्त्री और कुछ पुरुष के रूप में थे॥17-18॥ उनका रंग सुवर्ण, चंदन, मोती और तपते हुए सोने के समान कान्तिमान था। कोई श्वेत, कोई पीला और कोई कमल के समान आभा वाला था॥20॥

​वहाँ गंगा, नर्मदा, सरस्वती, कावेरी, गोदावरी, चर्मण्वती (चम्बल), कौशिकी और गंडकी जैसी सैंकड़ों नदियाँ और प्रयाग, पुष्कर, वाराणसी, द्वारका, प्रभास, अवंती, नैमिषारण्य जैसे 68 तीर्थ मूर्तरूप में उपस्थित हुए॥24-37॥

​उन महातीर्थों ने इन्द्र से पूछा— "हे देवराज! आपने हमें यहाँ किस कारण से बुलाया है? हमें आज्ञा दें"॥38-39॥

इन्द्र ने कहा—

"आप महातीर्थों में से कौन ऐसा समर्थ है जो बिना प्रायश्चित के ही ब्रह्महत्या, गोवध, स्त्रीवध, स्वामीद्रोह, सुरापान, स्वर्ण की चोरी, गुरुनिंदा, भ्रूणहत्या, राजद्रोह, मित्रद्रोह, विश्वासघात, और ब्राह्मणों की वृत्ति (रोजी-रोटी) छीनने जैसे 16 महापापों को नष्ट कर सके? आप सभी विचार करके उत्तर दें"॥40-47॥

​इन्द्र के वचन सुनकर सभी तीर्थों ने आपस में मंत्रणा की और फिर तीर्थराज (प्रयाग) के साथ मिलकर इन्द्र से बोले॥48॥

तीर्थों ने कहा—

"हे देवराज! सुनिये, हम सत्य कहते हैं। संसार में सभी तीर्थ पापों को हरने वाले हैं, यह सत्य है। परंतु आपने जिन महाघोर पापों (ब्रह्महत्या आदि) का उल्लेख किया है, उन्हें पूरी तरह नष्ट करने की शक्ति हममें नहीं है"॥49-50॥

​"केवल प्रयाग, पुष्कर, अर्घतीर्थ और वाराणसी— ये चार तीर्थ ही महापापों का नाश करने में अमित प्रभावशाली हैं। ब्रह्मा जी ने इन्हीं को महापापों और उपपापकों के विनाश के लिए श्रेष्ठ बनाया है"॥51-53॥

​तीर्थों की यह स्पष्ट बात सुनकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उन तीर्थों की स्तुति की॥54॥

इस प्रकार पद्मपुराण के भूमिखण्ड में 'गुरुतीर्थ माहात्म्य' के अंतर्गत 90वाँ अध्याय पूर्ण हुआ।



यह पद्म पुराण के भूमिखण्ड का 101वाँ अध्याय है। इस अध्याय में पक्षी कुंजल और उसके पुत्र कपिंजल के बीच का संवाद है, जिसमें कपिंजल कैलाश पर्वत की सुंदरता और वहाँ देखी गई एक रहस्यमयी रोती हुई स्त्री तथा एक तपस्वी मुनि का वर्णन करता है।

​यहाँ इसका हिंदी अनुवाद दिया गया है:

​पद्म पुराण - भूमिखण्ड (अध्याय 101)

​कैलाश पर्वत का वर्णन और कपिंजल का आश्चर्य

सूत जी ने कहा:

देवों के देव हृषीकेश (भगवान विष्णु) ने राजा वेन के पुत्र पृथु को परम कल्याणकारी और पापों का नाश करने वाला आख्यान सुनाया। विष्णु जी बोले— "हे राजन! महात्मा कुंजल और ब्राह्मण के उस श्रेष्ठ चरित्र को सुनिए जो कल्याण प्रदान करने वाला है।" ॥1-2॥

भगवान विष्णु बोले:

धर्मात्मा कुंजल ने हर्षित होकर अपने चौथे पुत्र कपिंजल को बुलाया और उससे कहा— "हे पुत्र! तुम भोजन की खोज में यहाँ-वहाँ जाते रहते हो, तुमने क्या कोई अपूर्व (अनोखी) घटना देखी है? हे महाभाग! यदि तुमने कुछ पुण्यदायक देखा हो, तो मुझे बताओ।" ॥3-4॥

कपिंजल ने कहा:

हे पिता! आपने जो अपूर्व बात पूछी है, वह मैं बताता हूँ। जो न किसी ने देखी है, न सुनी है और न ही मैंने पहले कभी सुनी थी, वह मैं अभी कहता हूँ, आप सुनिए। हे पिता! मेरे भाई और माता भी इसे ध्यानपूर्वक सुनें। ॥5-7॥

कैलाश का वर्णन:

चंद्रमा के समान श्वेत और पर्वतों में श्रेष्ठ कैलाश पर्वत है, जो नाना प्रकार की धातुओं और वृक्षों से सुशोभित है। वह गंगा के पवित्र जल से चारों ओर से प्रक्षालित (धुला हुआ) रहता है। वहाँ से हजारों दिव्य नदियाँ और जलधाराएँ निकलती हैं। उस महान पर्वत पर हजारों सरोवर हैं और हंस-सारस से युक्त विशाल नदियाँ बहती हैं। ॥8-10॥

​वहां पुष्पों और फलों से लदे विभिन्न वन हैं, जो किन्नरों, अप्सराओं, गंधर्वों, सिद्धों और देवताओं के समूहों से सुशोभित हैं। वह पर्वत स्फटिक की सफेद शिलाओं और रत्नों से चमकता है। सूर्य के समान तेजस्वी वह स्थान चंदन, बकुल और नाना प्रकार के सुगंधित पुष्पों से महकता है। पक्षियों का मधुर कलरव और भौरों का गुंजन वहाँ सर्वत्र व्याप्त है। कोयल की कूक से वह वन पर्वत अत्यंत शोभायमान है। ॥11-17॥

​वहां करोड़ों गणों से घिरा हुआ भगवान शिव का मंदिर है। सिंहों की गर्जना, हाथियों के चिंघाड़ और मृगों के समूहों से वह पर्वत गुंजायमान रहता है। मयूरों की केका-ध्वनि गुफाओं में गूँजती है। वह दिव्य पर्वत पुण्य आत्माओं द्वारा सेवित है। ॥18-23॥

अद्भुत दृश्य का वर्णन:

कपिंजल आगे कहता है— "हे पिता! मैं शंकर जी के निवास स्थान कैलाश पर गया था। वहाँ मैंने एक ऐसा आश्चर्य देखा जो न पहले कभी देखा, न सुना। सुवर्ण के समान कांति वाला हिम और गंगा का प्रवाह बड़े वेग और शब्द के साथ पर्वत से गिरता है। वह गंगा का जल कैलाश के शिखर पर पहुँचकर दस योजन के विस्तार वाला एक महान सरोवर (ह्रद) बन गया है। ॥24-28॥

​उस सरोवर के किनारे एक स्फटिक शिला पर एक अत्यंत रूपवती युवती बैठी थी, जिसके बाल खुले हुए थे। वह दिव्य अलंकारों से सुसज्जित और दिव्य लक्षणों से युक्त थी। उसे देखकर समझ नहीं आता था कि वह पर्वतराज की पुत्री (पार्वती) है, समुद्र की पुत्री (लक्ष्मी) है, ब्रह्मा की पत्नी (सावित्री) है, स्वाहा है, इंद्राणी है या रोहिणी है। उसके जैसा रूप संसार की किसी अन्य स्त्री या अप्सरा में भी नहीं है। ॥29-36॥

​परंतु वह बाला अत्यंत दुखी होकर और अपने स्वजनों के बिना ऊँचे स्वर में विलाप कर रही थी। हे महामते! उसके नेत्रों से मोतियों के समान जो आँसू गिर रहे थे, वे सरोवर के निर्मल जल में गिरते ही सुगंधित कमलों में बदल जाते थे। वे असंख्य कमल गंगा के प्रवाह में तैरने लगते थे।" ॥37-41॥

तपस्वी मुनि का वर्णन:

"उसी रत्नाख्य पर्वत पर रत्नेश्वर महेश्वर (शिव) विराजमान हैं, जो देवताओं और दैत्यों द्वारा पूजनीय हैं। वहाँ मैंने एक पुण्यमयी मुनि को देखा। वे जटाधारी, दिगंबर (बिना वस्त्र के) और दंड धारण किए हुए थे। वे निराहार रहकर तपस्या के कारण अत्यंत दुर्बल हो गए थे, केवल त्वचा मात्र शेष थी। उनके शरीर पर भस्म लगी थी और वे केवल सूखे पत्तों का भोजन करते थे। ॥42-50॥

​वह महातपस्वी मुनि उन आंसुओं से उत्पन्न हुए सुगंधित कमलों को गंगा के जल से चुनकर लाते और उनसे देवों के देव रत्नेश्वर महादेव की पूजा करते थे। वे भगवान शिव के द्वार पर नाचते और गाते थे और फिर अपने मठ में आकर ऊँचे स्वर में रोने लगते थे। ॥51-53॥

​हे पिता! मैंने यह अपूर्व दृश्य देखा है। यदि आप इसका कारण जानते हैं तो कृपया मुझे बताइये। वह महाभागा नारी कौन है? वह क्यों रोती है? और वह दिव्य पुरुष (मुनि) भगवान महेश्वर की अर्चना क्यों करता है? मेरे इस संदेह को विस्तार से दूर करें।" ॥54-56॥

सूत जी बोले:

पुत्र कपिंजल द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर महाप्राज्ञ कुंजल ने विस्तारपूर्वक कथा सुनाना प्रारंभ किया। ॥57॥

इस प्रकार श्री पद्मपुराण के भूमिखण्ड में 'वेनोपाख्यान' के अंतर्गत एक सौ एकवाँ (101) अध्याय समाप्त हुआ।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह 102वाँ अध्याय महादेव, पार्वती और नन्दन वन की महिमा के साथ-साथ उनकी पुत्री अशोकसुंदरी की उत्पत्ति की कथा बताता है।

​यहाँ इसका हिंदी अनुवाद दिया गया है:

​पद्मपुराण: अध्याय 102 (हिन्दी अनुवाद)

कुञ्जल ने कहा:

हे वत्स! तुमने जो मुझसे पूछा है, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ। हे द्विजोत्तम! उन दोनों (शिव-पार्वती) के बीच जो क्रीड़ा हुई और जिससे जो उत्पन्न हुआ, वह सुनो। (1)

​एक समय श्रेष्ठ सुन्दरी महादेवी पार्वती क्रीड़ा करते हुए महात्मा ईश्वर (शिव) से बोलीं— "हे महादेव! मेरे हृदय में एक बड़ी इच्छा (दोहद) जागी है। आप मेरे सामने किसी श्रेष्ठ वन का दर्शन कराइए।" (2-3)

श्री महादेव जी ने कहा:

"हे महादेवी! ऐसा ही हो। मैं तुम्हें देवताओं से भरा हुआ, ब्राह्मणों और सिद्धों द्वारा सेवित पुण्यमयी 'नन्दन वन' दिखाऊँगा।" (4)

​ऐसा कहकर और गणों को साथ लेकर भगवान शिव नन्दन वन जाने को उत्सुक हुए। उन्होंने गहनों से सजे हुए, सुन्दर, दिव्य पीठ वाले, घण्टा और मालाओं से युक्त, किङ्किणी (घुंघरुओं) के जाल से सुशोभित और चँवर तथा रेशमी वस्त्रों से सजे हुए, हंस और चन्द्रमा के समान श्वेत बैल (नन्दी) पर सवारी की। (5-7)

​महादेव जी करोड़ों गणों से घिरे हुए थे। उनके साथ नन्दी, भृङ्गी, महाकाल, स्कन्द, चण्ड, वीरभद्र, गणेश, पुष्पदन्त, मणीश्वर, अतिबल, सुबल, मेघनाद, घण्टाकर्ण और सनकादि तपस्वी भी थे। (8-11)

नन्दन वन का वर्णन:

महादेव ने देवी पार्वती के साथ देवताओं और किन्नरों द्वारा सेवित नन्दन वन में प्रवेश किया। भगवान ने पार्वती को वह वन दिखाया जो अनेक प्रकार के वृक्षों और पुष्पों से भरा था। वहाँ चम्पा, मल्लिका, मालती, पाटल (गुलाब), चन्दन, देवदारु, नारियल, सुपारी, खजूर, कटहल, कदम्ब, जामुन, नीबू, नारंगी और आम आदि के अनगिनत वृक्ष लदे हुए थे। (12-21)

​वह वन कल्पवृक्षों से सुशोभित था, जहाँ पक्षी मधुर स्वर में चहक रहे थे और भँवरे फूलों के रस के लोभी होकर गुंजन कर रहे थे। वहाँ की भूमि गिरे हुए सुगन्धित फूलों से सजी थी। वहाँ कमलों से भरी हुई दिव्य बावड़ियाँ और समुद्र के समान विशाल सरोवर थे। अप्सराओं के समूह, विमान और गन्धर्वों के गायन से वह स्थान अत्यंत शोभायमान था। (22-32)

कल्पवृक्ष की महिमा:

ऐसे सुखद और शान्तिपूर्ण नन्दन वन को देखकर देवी पार्वती ने एक अत्यंत तेजस्वी वृक्ष को देखा और शिव जी से पूछा— "हे नाथ! इस पुण्यमयी श्रेष्ठ वृक्ष का नाम क्या है?" (33-35)

शिव जी ने कहा:

"हे देवि! जैसे देवताओं में मधुसूदन (विष्णु), नदियों में गंगा, सृष्टिकर्ताओं में ब्रह्मा, सुख देने वालों में चन्द्रमा और पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है, वैसे ही यह वृक्षों का राजा 'कल्पवृक्ष' है। यह इन्द्र को अत्यंत प्रिय है।" (36-39)

पार्वती जी ने पूछा:

"हे शम्भो! इस वृक्षाधिपति के गुणों का वर्णन कीजिये।" तब शिव जी बोले— "हे कान्ते! देवता जिस-जिस वस्तु की कल्पना (इच्छा) करते हैं, यह वृक्ष उन्हें वह सब प्रदान करता है। इसीलिए इसका नाम 'कल्पवृक्ष' है।" (40-42)

अशोकसुंदरी की उत्पत्ति:

शिव जी की बात सुनकर देवी पार्वती को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मन ही मन उस वृक्ष की परीक्षा लेने के लिए एक सर्वगुण सम्पन्न, सुन्दर 'स्त्री-रत्न' (कन्या) की कल्पना की। (43)

​उस कल्पवृक्ष से तत्काल एक ऐसी कन्या प्रकट हुई जो विश्व को मोहित करने वाली और कामदेव की सहायता करने वाली रूपसी के समान थी। उसकी आँखें कमल के समान बड़ी थीं और वह साक्षात् लक्ष्मी की मूर्ति जैसी लगती थी। (44-45)

कन्या के रूप का वर्णन:

उस कन्या के बाल लम्बे, काले और सुगन्धित फूलों से सजे थे। उसके माथे पर मोतियों की लड़ियाँ और तिलक शोभा दे रहे थे। उसकी मुखाकृति पूर्ण चन्द्रमा के समान निष्कलंक थी। उसके दांत रत्नों के समान और होंठ बिम्बा फल के समान लाल थे। (46-55)

​उसके अंग-प्रत्यंग अत्यंत सुंदर थे। उसके हाथ-पैर कोमल और कमल के समान गुलाबी थे। वह नीले रेशमी वस्त्र और सुंदर कंचुकी (चोली) पहने हुए थी। वह सभी आभूषणों (हार, कंगन, नूपुर और करधनी) से सुशोभित थी। (56-66)

देवी पार्वती का वरदान:

कल्पवृक्ष से ऐसी कन्या पाकर पार्वती जी प्रसन्न हुईं और शिव जी से बोलीं— "हे देव! जैसा आपने कहा था, मैंने वैसा ही देखा। जो कल्पना की जाती है, वही यहाँ दिखाई देता है।" (67-68)

सूत जी ने कहा:

तब उस सर्वांगसुन्दरी कन्या ने शिव-पार्वती के चरणों में भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और कहा— "हे नाथ! हे माता! आपने मुझे किस कारण से उत्पन्न किया है, कृपया कहें।" (69-70)

देवी पार्वती ने कहा:

"हे भद्रे! मैंने तो केवल वृक्ष की परीक्षा लेने के कौतूहल में तुम्हारी कल्पना की थी, जिससे तुम इस रूप-सम्पदा के साथ प्रकट हुई हो। तुम लोक में 'अशोकसुंदरी' के नाम से प्रसिद्ध होगी। तुम मेरी पुत्री हो, इसमें कोई संशय नहीं है।" (71-72)

​"सोमवंश में विख्यात राजा नहुष तुम्हारे पति होंगे।" (73)

​ऐसा वरदान देकर पार्वती जी भगवान शंकर के साथ अत्यंत प्रसन्न होकर पुनः कैलाश पर्वत को चली गईं। (74)

यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का १०३वाँ अध्याय है, जिसमें अशोकसुन्दरी (भगवान शिव और पार्वती की पुत्री), हुण्ड नामक दैत्य और राजा आयु द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिए की गई दत्तात्रेय की सेवा का वर्णन है।

​यहाँ इस अध्याय का विस्तृत हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है:

हुण्ड द्वारा अशोकसुन्दरी का अपहरण और उसका शाप

कुञ्जल ने कहा:

उस समय सभी स्त्रियों में श्रेष्ठ अशोकसुन्दरी उत्पन्न हुई। वह समस्त कामनाओं और गुणों से युक्त 'नन्दन वन' में विहार करने लगी। देवताओं की सुन्दर कन्याओं के साथ वह नृत्य और गायन में निपुण होकर सुख भोग रही थी। तभी विप्रचित्ति का पुत्र हुण्ड नामक दैत्य, जो अत्यंत क्रूर, कामातुर और स्वेच्छाचारी था, उस वन में प्रविष्ट हुआ। (१-३)

​अशोकसुन्दरी को अलंकारों से सुसज्जित देख वह कामदेव के बाणों से बिंध गया। उसने पूछा— "हे सुन्दरी! तुम कौन हो और इस वन में किस कारण आई हो?" (४-५)

अशोकसुन्दरी ने कहा:

"मैं पुण्यमय भगवान शिव की पुत्री और कार्तिकेय की बहन हूँ। बचपन के खेल-खेल में मैं यहाँ नन्दन वन में आ गई हूँ। तुम कौन हो और मुझसे यह सब क्यों पूछ रहे हो?" (६-७)

हुण्ड बोला:

"मैं विप्रचित्ति का पुत्र हुण्ड हूँ। मैं बल और वीर्य के मद में चूर दैत्यों में श्रेष्ठ हूँ। मेरे समान तीनों लोकों में कोई नहीं है। तुम्हें देखते ही मैं कामदेव से आहत हो गया हूँ। तुम मेरी शरण में आओ और मेरी प्रिय पत्नी बन जाओ।" (८-११)

अशोकसुन्दरी ने उत्तर दिया:

"हे हुण्ड! संसार की रीति सुनो। गुणवान पुरुष के लिए सुयोग्य स्त्री और स्त्री के लिए उसके समान गुणों वाला पति ही उचित होता है। मेरे जन्म के समय ही माता पार्वती और पिता शिव ने मेरे लिए पति का चयन कर लिया है। मेरा पति सोमवंश का धर्मात्मा राजा नहुष होगा, जो पराक्रम में विष्णु के समान और तेज में अग्नि के सदृश होगा। (१२-१८)

​उन्हीं से मुझे 'ययाति' नामक पुत्र प्राप्त होगा। मैं पतिव्रता हूँ और किसी अन्य की पत्नी (होने वाली) हूँ, अतः तुम यह मोह छोड़कर यहाँ से चले जाओ।" (१९-२१)

हुण्ड का तर्क और अशोकसुन्दरी का उत्तर

हुण्ड ने उपहास करते हुए कहा:

"शिव-पार्वती ने तुम्हारे लिए सही चुनाव नहीं किया। नहुष तो अभी पैदा भी नहीं हुआ होगा, वह तुमसे छोटा होगा। आयु और यौवन बीत जाने पर स्त्री का रूप नष्ट हो जाता है। जब तक तुम जवान हो, मेरे साथ सुख भोगो।" (२२-३०)

अशोकसुन्दरी ने भयभीत न होते हुए कहा:

"हे दैत्य! आयु का अंतर विवाह में बाधक नहीं होता। द्वापर युग में शेषनाग के अवतार बलराम (बल) रेवती से विवाह करेंगे, जो उनसे तीन युग बड़ी होंगी। कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का विवाह मायावती से होगा। जो भाग्य में लिखा है, वही होगा। देवताओं और ब्राह्मणों के मुख से निकला वचन कभी मिथ्या नहीं होता। (३१-४२)

​मेरा मन दृढ़ है, तुम मुझे विचलित नहीं कर सकते। यदि तुमने प्रयास किया, तो मैं तुम्हें भस्म कर दूँगी।" (४३-४४)

हुण्ड की माया और अशोकसुन्दरी का शाप

​हुण्ड ने छल करने का निश्चय किया। वह अंतर्धान हो गया और अगले दिन एक 'मायावी स्त्री' का रूप धरकर अशोकसुन्दरी के पास पहुँचा। उसने सहेली बनकर अशोकसुन्दरी को धोखा दिया और कहा कि "मेरा पति हुण्ड ने मार दिया है, मैं उसके विनाश के लिए तप कर रही हूँ, तुम मेरे आश्रम चलो।" (४५-५७)

​अशोकसुन्दरी उसके झांसे में आ गई। हुण्ड उसे लेकर मेरु पर्वत की चोटी पर स्थित अपने नगर 'कांचन' ले गया। वहां उसने अपना असली रूप दिखाया और विवाह का प्रस्ताव रखा। (५८-६८)

अशोकसुन्दरी ने क्रोधित होकर कहा:

"अरे पापी! तूने अपने ही विनाश के लिए मुझे यहाँ लाया है। तूने सोती हुई अग्नि को छुआ है। जिस प्रकार एक अशुभ पक्षी घर में घुसकर कुल का नाश कर देता है, वैसे ही मैं तेरे कुल और धन-धान्य का नाश करूँगी। (६९-७७)

​मेरे होने वाले पति नहुष तेरा वध करेंगे। जैसे कोई सिंह के मुख से बाल नोचने का दुस्साहस करे, तूने वैसा ही किया है। जब मैं तुझे रणभूमि में नहुष के बाणों से मृत देखूँगी, तभी अपने पति के पास जाऊँगी।" (७८-९२)

​ऐसा कहकर वह गंगा तट पर कठोर तप करने चली गई। हुण्ड डर गया और उसने अपने मंत्री 'कम्पन' से सलाह ली कि नहुष को पैदा होने से पहले ही कैसे नष्ट किया जाए। (९३-१०४)

राजा आयु और भगवान दत्तात्रेय की कथा

विष्णु (कुञ्जल के माध्यम से) बोले:

चंद्रवंश के भूषण राजा आयु अत्यंत धर्मात्मा और शक्तिशाली थे, किंतु उन्हें कोई पुत्र नहीं था। (१०५-१०९)

​तब वे अत्रिपुत्र दत्तात्रेय के आश्रम गए। दत्तात्रेय उस समय योगिराज होने पर भी अपनी माया से मदिरापान करते हुए और स्त्रियों के बीच घिरे हुए दिखाई दे रहे थे। राजा ने उनकी इस अवस्था को देखकर भी संदेह नहीं किया और सौ वर्षों तक निश्चल भाव से उनकी सेवा की। (११०-११६)

​दत्तात्रेय ने उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा— "मैं तो भ्रष्टाचारी हूँ, मांस-मदिरा का सेवन करता हूँ, मैं तुम्हें वरदान नहीं दे सकता। तुम किसी और ब्राह्मण के पास जाओ।" (११७-११८)

राजा आयु ने कहा:

"मैं जानता हूँ कि आप साक्षात् भगवान विष्णु हैं। आप केवल माया कर रहे हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, मेरा उद्धार करें।" (११९-१२३)

​राजा की अटूट भक्ति देख दत्तात्रेय प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा से खप्पर में मदिरा और पका हुआ मांस माँगा। राजा ने तुरंत आज्ञा का पालन किया। तब मुनि ने प्रसन्न होकर कहा— "हे राजन! वर माँगो।" (१२४-१२९)

राजा ने वर माँगा:

"मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो सर्वज्ञ, अजेय, ब्राह्मणभक्त, प्रजापालक, शूरवीर और वेद-शास्त्रों का ज्ञाता हो, जिससे मेरा वंश चले।" (१३०-१३५)

दत्तात्रेय ने कहा:

"ऐसा ही होगा। तुम्हें विष्णु के अंश से युक्त, इंद्र के समान वैभवशाली पुत्र प्राप्त होगा।" मुनि ने राजा को एक उत्तम फल दिया और कहा कि इसे अपनी पत्नी को खिला देना। इसके बाद मुनि अंतर्धान हो गए। (१३६-१३९)


पद्मपुराण के भूमिखण्ड के 104वें अध्याय का श्लोकवार (क्रमानुसार) हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है:

​पद्मपुराण: भूमिखण्ड (अध्याय 104)

कुंजल उवाच (कुंजल ने कहा):

श्लोक 1-2:

​गते तस्मिन्महाभागे दत्तात्रेये महामुनौ ।

आजगाम महाराज आयुश्च स्वपुरं प्रति ॥ १ ॥

इंदुमत्या गृहं हृष्टः प्रविवेश श्रियान्वितम् ।

सर्वकामसमृद्धार्थमिंद्रस्य सदनोपमम् ॥ २ ॥


अनुवाद: महाभाग महामुनि दत्तात्रेय के चले जाने पर महाराज आयु अपनी नगरी को लौट आए। वे प्रसन्न होकर इन्दुमती के उस घर में प्रविष्ट हुए, जो लक्ष्मी (ऐश्वर्य) से युक्त, सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला और इन्द्र के महल के समान था।

श्लोक 3-4:

​राज्यं चक्रे स मेधावी यथा स्वर्गे पुरंदरः ।

स्वर्भानुसुतया सार्द्धमिंदुमत्या द्विजोत्तम ॥ ३ ॥

सा च इंदुमती राज्ञी गर्भमाप फलाशनात् ।

दत्तात्रेयस्य वचनाद्दिव्यतेजः समन्वितम् ॥ ४ ॥


अनुवाद: हे द्विजोत्तम! वह बुद्धिमान राजा स्वर्ग में इन्द्र के समान, स्वर्भानु (राहु) की पुत्री इन्दुमती के साथ राज्य करने लगा। दत्तात्रेय जी के कथनानुसार, उस दिव्य फल को खाने के प्रभाव से रानी इन्दुमती ने दिव्य तेज से संपन्न गर्भ धारण किया।

श्लोक 5-7:

​इंदुमत्या महाभाग स्वप्नं दृष्टमनुत्तमम् ।

रात्रौ दिवान्वितं तात बहुमंगलदायकम् ॥ ५ ॥

गृहांतरे विशंतं च पुरुषं सूर्यसन्निभम् ।

मुक्तामालान्वितं विप्रं श्वेतवस्त्रेणशोभितम् ॥ ६ ॥

श्वेतपुष्पकृतामाला तस्य कंठे विराजते ।

सर्वाभरणशोभांगो दिव्यगंधानुलेपनः ॥ ७ ॥


अनुवाद: हे महाभाग! इन्दुमती ने रात्रि में एक अत्यंत उत्तम और मंगलकारी स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि घर के भीतर सूर्य के समान तेजस्वी एक ब्राह्मण पुरुष प्रवेश कर रहे हैं, जिन्होंने श्वेत वस्त्र और मोतियों की माला धारण की है। उनके कंठ में श्वेत पुष्पों की माला सुशोभित है। वे सभी आभूषणों से सजे हैं और उनके शरीर पर दिव्य सुगंधित लेप लगा है।

श्लोक 8-10:

​चतुर्भुजः शंखपाणिर्गदाचक्रासिधारकः ।

छत्रेण ध्रियमाणेन चंद्रबिंबानुकारिणा ॥ ८ ॥

शोभमानो महातेजा दिव्याभरणभूषितः ।

हारकंकणकेयूर नूपुराभ्यां विराजितः ॥ ९ ॥

चंद्रबिंबानुकाराभ्यां कुंडलाभ्यां विराजितः ।

एवंविधो महाप्राज्ञो नरः कश्चित्समागतः ॥ १० ॥


अनुवाद: वे पुरुष चतुर्भुज हैं, जिनके हाथों में शंख, गदा, चक्र और तलवार है। उनके ऊपर चन्द्रमा के समान धवल छत्र लगा है। वे महातेजस्वी पुरुष हार, कंगन, बाजूबंद, नूपुर और चन्द्रमा के समान चमकते कुण्डलों से सुशोभित हो रहे हैं। ऐसा एक महाज्ञानी पुरुष वहाँ आया।

श्लोक 11-14:

​इंदुमतीं समाहूय स्नापिता पयसा तदा ।

शंखेन क्षीरपूर्णेन शशिवर्णेन भामिनी ॥ ११ ॥

रत्नकांचनबद्धेन संपूर्णेन पुनः पुनः ।

श्वेतं नागं सुरूपं च सहस्रशिरसं वरम् ॥ १२ ॥

महामणियुतं दीप्तं धामज्वालासमाकुलम् ।

क्षिप्तं तेन मुखप्रांते दत्तं मुक्ताफलं पुनः ॥ १३ ॥

कंठे तस्याः स देवेश इंदुमत्या महायशाः ।

पद्मं हस्ते ततो दत्वा स्वस्थानं प्रति जग्मिवान् ॥ १४ ॥


अनुवाद: उस पुरुष ने इन्दुमती को बुलाकर चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण वाले तथा स्वर्ण-रत्नों से जड़े शंख में भरे दूध से उन्हें बार-बार स्नान कराया। फिर उन्होंने एक सुंदर, सहस्र फणों वाले श्रेष्ठ श्वेत नाग (शेषनाग) को, जो मणियों के तेज से देदीप्यमान था, रानी के मुख के पास छोड़ दिया और उन्हें एक श्रेष्ठ मोती दिया। उन यशस्वी देवेश ने इन्दुमती के गले में माला पहनाई और हाथ में कमल देकर अपने स्थान को चले गए।

श्लोक 15-17:

​एवंविधं महास्वप्नं तया दृष्टं सुतोत्तमम् ।

समाचष्ट महाभागा आयुं भूमिपतीश्वरम् ॥ १५ ॥

समाकर्ण्य महाराजश्चिंतयामास वै पुनः ।

समाहूय गुरुं पश्चात्कथितं स्वप्नमुत्तमम् ॥ १६ ॥

शौनकं सुमहाभागं सर्वज्ञं ज्ञानिनां वरम् ।


अनुवाद: इस प्रकार का उत्तम स्वप्न देखकर महाभागा इन्दुमती ने राजा आयु को सब बताया। महाराज ने इसे सुनकर विचार किया और फिर अपने गुरु, ज्ञानियों में श्रेष्ठ सर्वज्ञ शौनक जी को बुलाकर वह उत्तम स्वप्न कह सुनाया।

राजोवाच (राजा ने कहा):

​अद्य रात्रौ महाभाग मम पत्न्या द्विजोत्तम ॥ १७ ॥

विप्रो गेहं विशन्दृष्टः किमिदं स्वप्नकारणम् ।


अनुवाद: "हे महाभाग द्विजोत्तम! आज रात्रि में मेरी पत्नी ने घर में एक ब्राह्मण को प्रवेश करते देखा है। इस स्वप्न का क्या कारण है?"

शौनक उवाच (शौनक जी बोले):

श्लोक 18-19:

​वरो दत्तस्तु ते पूर्वं दत्तात्रेयेण धीमता ॥ १८ ॥

आदिष्टं च फलं राज्ञां सुगुणं सुतहेतवे ।

तत्फलं किं कृतं राजन्कस्मै त्वया निवेदितम् ॥ १९ ॥


अनुवाद: "हे राजन्! पूर्व में बुद्धिमान दत्तात्रेय जी ने आपको वर दिया था और पुत्र प्राप्ति के लिए एक श्रेष्ठ फल दिया था। आपने उस फल का क्या किया? वह किसे दिया?"

श्लोक 20-21:

​सुभार्यायै मया दत्तमिति राज्ञोदितं वचः ।

श्रुत्वोवाच महाप्राज्ञः शौनको द्विजसत्तमः ॥ २० ॥

दत्तात्रेयप्रसादेन तव गेहे सुतोत्तमः ।

वैष्णवांशेन संयुक्तो भविष्यति न संशयः ॥ २१ ॥


अनुवाद: राजा ने कहा— "वह फल मैंने अपनी श्रेष्ठ पत्नी को दे दिया।" यह सुनकर महाप्राज्ञ द्विजश्रेष्ठ शौनक जी बोले— "दत्तात्रेय जी की कृपा से आपके घर में एक उत्तम पुत्र होगा, जो भगवान विष्णु के अंश से युक्त होगा, इसमें कोई संशय नहीं है।"

श्लोक 22-24:

​स्वप्नस्य कारणं राजन्नेतत्ते कथितं मया ।

इंद्रोपेंद्र समः पुत्रो दिव्यवीर्यो भविष्यति ॥ २२ ॥

पुत्रस्ते सर्वधर्मात्मा सोमवंशस्य वर्द्धनः ।

धनुर्वेदे च वेदे च सगुणोसौ भविष्यति ॥ २३ ॥

एवमुक्त्वा स राजानं शौनको गतवान्गृहम् ।

हर्षेण महताविष्टो राजाभूत्प्रियया सह ॥ २४ ॥


अनुवाद: "हे राजन्! आपके स्वप्न का यही कारण है जो मैंने बताया। आपका पुत्र इन्द्र और उपेन्द्र (विष्णु) के समान दिव्य पराक्रमी होगा। वह धर्मात्मा पुत्र सोमवंश की वृद्धि करने वाला तथा वेदों और धनुर्वेद के ज्ञान में निपुण होगा।" ऐसा कहकर शौनक जी अपने घर चले गए और राजा अपनी प्रिय पत्नी के साथ अत्यंत हर्षित हुए।

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखंडे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥


यहाँ पद्मपुराण (भूमिखण्ड, अध्याय 105) के प्रमुख श्लोकों का व्याकरणिक टिप्पणी सहित पूर्ण हिन्दी अनुवाद दिया जा रहा है। यह अध्याय नहुष की उत्पत्ति और उनके संरक्षण की कथा पर केंद्रित है।

श्लोक 1 - 5: हुण्ड को सूचना और भय

गता सा नन्दनवनं सखीभिः सह क्रीडितुम्। तत्राकर्ण्य महद्वाक्यमप्रियं तु तदा पितुः॥

आयोर्गेहे महावीर्यो विष्णुतुल्यपराक्रमः। भविष्यति सुतश्रेष्ठो हुण्डस्यांतं करिष्यति॥


  • अनुवाद: वह (अशोकसुन्दरी) अपनी सखियों के साथ नन्दनवन में क्रीड़ा करने गई। वहाँ उसने चारणों और सिद्धों के मुख से अपने पिता (हुण्ड) के लिए एक अप्रिय समाचार सुना कि राजा आयु के घर में साक्षात् विष्णु के समान पराक्रमी एक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होगा, जो हुण्ड का अंत करेगा। यह सुनकर वह पिता के पास आई और सब बता दिया। पिता (हुण्ड) सुनकर चकित रह गया और उसे अशोकसुन्दरी के पुराने शाप का स्मरण हो आया।
  • व्याकरण:
    • क्रीडितुम्: क्रीड् + तुमुन् प्रत्यय (खेलने के लिए)।
    • आयोर्गेहे: आयुः + गेहे (षष्ठी विभक्ति, एकवचन) - आयु के घर में।
    • करिष्यति: कृ धातु, लृट् लकार (भविष्यत् काल), प्रथम पुरुष, एकवचन।

श्लोक 15 - 17: बालक का अपहरण

तस्याः सर्वं समाज्ञाय स हुण्डो दानवाधमः। दास्या अंगं प्रविश्यैव प्रविष्टश्चायुमन्दिरे॥

महाजने प्रसुप्ते च निद्रयातीवमोहिते। तं पुत्रं देवगर्भाभमपहृत्य बहिर्गतः॥


  • अनुवाद: उस नीच दानव हुण्ड ने सब कुछ जानकर एक दासी के शरीर में प्रवेश किया और राजा आयु के महल में घुस गया। जब सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब वह उस देव-बालक के समान तेजस्वी पुत्र को चुराकर बाहर निकल गया।
  • व्याकरण:
    • समाज्ञाय: सम् + आ + ज्ञा + ल्यप् प्रत्यय (भली-भाँति जानकर)।
    • अपापहृत्य: अप + हृ + ल्यप् (हरण करके/चुराकर)।
    • प्रसुप्ते: प्र + सुप् + क्त प्रत्यय (सोए हुए)।

श्लोक 19 - 22: हुण्ड का आदेश और विपुला की दया

वधस्वैनं महापापं बालरूपं रिपुं मम। पश्चात्सूदस्य वै हस्ते भोजनार्थं प्रदीयताम्॥

सर्वलक्षणसंपन्नं देवगर्भोपमं सुतम्। कस्य कस्मात्प्रभक्ष्येत क्षमाहीनः सुनिर्घृणः॥


  • अनुवाद: हुण्ड ने अपनी पत्नी विपुला से कहा—"मेरे इस बाल-रूपी शत्रु का वध कर दो और इसे पकाने के लिए रसोइए (सूद) को दे दो, मैं इसे खाऊँगा।" विपुला चकित रह गई और सोचने लगी कि यह निर्दयी पति इस दिव्य और सर्वलक्षण संपन्न बालक को भला कैसे खा सकता है?
  • व्याकरण:
    • वधस्व: वध् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष (आज्ञा देना)।
    • भोजनार्थम्: भोजन + अर्थम् (चतुर्थी के अर्थ में प्रयुक्त अव्यय)।

श्लोक 35 - 40: रसोइए (सूद) का नीति-वचन (अत्यंत महत्वपूर्ण)

आपत्स्वपि स जीवेत दुर्गेषु नान्यथा भवेत्। सिंधुवेगेन नीतस्तु वह्निमध्ये गतोऽथवा॥

तमेव रक्षते कर्म सर्वदैव न संशयः।


  • अनुवाद: रसोइए ने कहा—"यह बालक वध के योग्य नहीं है। जो मनुष्य पुण्य कर्मों का सहारा लेकर चलता है, वह बड़ी से बड़ी विपत्ति, समुद्र के वेग या अग्नि के बीच भी जीवित बच जाता है। मनुष्य का अपना शुभ कर्म (धर्म) ही जागते हुए उसकी रक्षा करता है और उसे सद्गति प्रदान करता है।"
  • व्याकरण:
    • जीवेत: जीव् धातु, विधिलिंग लकार (बच सकता है/जीना चाहिए)।
    • रक्षते: रक्ष् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद।

श्लोक 57 - 59: नामकरण और वशिष्ठ का आशीर्वाद

वशिष्ठस्तं समालोक्य वरं वै दत्तवांस्तदा। नहुषेत्येव ते नाम ख्यातं लोके भविष्यति॥

हुषितो नैव तेनापि बालभावैर्नराधिप। तस्मान्नहुष ते नाम देवपूज्यो भविष्यसि॥


  • अनुवाद: महर्षि वशिष्ठ ने बालक को देखा और आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा—"संसार में तुम्हारा नाम 'नहुष' विख्यात होगा।" क्योंकि तुम बाल्यावस्था की इन भयंकर बाधाओं से भी विचलित (हुषित) नहीं हुए, इसलिए तुम्हारा नाम 'नहुष' है और तुम देवताओं द्वारा पूजे जाओगे।
  • व्याकरण:
    • दत्तवान्: दा + क्तवतु प्रत्यय (दिया)।
    • ख्यातं: ख्या + क्त प्रत्यय (प्रसिद्ध)।
    • नहुष: 'न' (नहीं) + 'हुष्' (हिंसा या व्यथित होना)।

श्लोक 60 - 64: शिक्षा और पूर्णता

वेदं चाधीत्य संपूर्णं षडंगं सपदक्रमम्। वशिष्ठाच्च धनुर्वेदं सरहस्यं महामतिः॥

एवं स सर्वनिष्पन्नो नाहुषश्चातिसुंदरः। वशिष्ठस्य प्रसादाच्च चापबाणधरोभवत्॥


  • अनुवाद: उस महामति नहुष ने वशिष्ठ जी से छह अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन किया। उन्होंने समस्त शास्त्र, नीति, न्याय और रहस्यों सहित 'धनुर्वेद' की शिक्षा प्राप्त की। इस प्रकार वशिष्ठ जी की कृपा से वे धनुष-बाण धारण करने वाले अत्यंत सुंदर और सर्वगुण सम्पन्न वीर बन गए।
  • व्याकरण:
    • अधीत्य: अधि + इ + ल्यप् (अध्ययन करके)।
    • सरहस्यम्: रहस्येन सहितम् (अव्ययीभाव समास)।
    • अभवत्: भू धातु, लङ् लकार (भूतकाल) - हुए।

निष्कर्ष: इस अध्याय में 'कर्म' की महत्ता और 'गुरु' (वशिष्ठ) के संरक्षण को रेखांकित किया गया है, जिसके प्रभाव से एक शिशु असुर के चंगुल से निकलकर चक्रवर्ती सम्राट बनने की योग्यता प्राप्त करता है।


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह 106वाँ अध्याय राजा आयु के पुत्र (नहुष) के अपहरण के बाद माता इन्दुमती और पिता आयु के विलाप का मार्मिक वर्णन करता है।

हिन्दी अनुवाद

कुञ्जल ने कहा—

राजा आयु की परम सौभाग्यशाली पत्नी और राहु (स्वर्भानु) की पुत्री इन्दुमती ने जब अपने उस देवताओं के समान अनुपम बालक को नहीं देखा, तो वह श्रेष्ठ वर्ण वाली देवी 'हा-हाकार' करती हुई बड़े जोर से रोने लगी। (1-2)

​वह करुणा से भरकर विलाप करने लगी— "मेरे उस सुलक्षणों से युक्त बालक को कौन हर ले गया? कठिन तपस्या, दान, यज्ञ और दारुण नियमों के पालन के बाद मैंने इस पुत्र को प्राप्त किया था। महात्मा दत्तात्रेय ने प्रसन्न होकर मुझे यह पुत्र दिया था, उसे कौन ले गया?" (3-4)

​"हा पुत्र! हा वत्स! हा तात! तुम तो गुणों के मंदिर थे। तुम कहाँ हो? कौन तुम्हें उठा ले गया? मुझे उत्तर दो! तुम समस्त सोमवंश के भूषण हो, मेरे प्राण तुम्हारे साथ हैं, तुम्हें कौन हर ले गया?" (5-6)

​"दिव्य राज लक्षणों से युक्त, कमल के समान नेत्रों वाले मेरे वत्स को किसने छीना? अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मुझे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि यह मेरे पिछले जन्म के कर्मों का फल है। मैंने अवश्य ही किसी की 'धरोहर' (न्यास) को नष्ट किया होगा, इसीलिए आज मेरा पुत्र छीन लिया गया।" (7-8)

​"मुझ पापिनी ने पिछले जन्म में किसके साथ छल किया था? उसी कर्म का दुःख आज मैं भोग रही हूँ, अन्यथा ऐसा नहीं होता। मैंने अवश्य ही किसी के रत्नों की चोरी की होगी, इसीलिए भाग्य ने मेरा 'पुत्र-रत्न' छीन लिया है।" (9-10)

​"या फिर मैंने किसी विप्र (ब्राह्मण) को ठगा होगा, उसी के फलस्वरूप आज मैं पुत्रशोक से व्याकुल हूँ। अथवा पूर्वजन्म में मैंने किसी शिशु को कष्ट पहुँचाया होगा, उसी पाप कर्म का यह फल भोग रही हूँ।" (11-12)

​"अथवा वैश्वदेव कर्म के समय, द्विज (ब्राह्मण) जब व्याहृतियों से आहुति दे रहे थे, तब मैंने याचना करने वाले को अन्न दान नहीं किया होगा।" इस प्रकार विलाप करती हुई स्वर्भानु की पुत्री इन्दुमती शोक से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी और मूर्च्छित हो गई। बछड़े से बिछुड़ी हुई गाय की भाँति वह लंबी साँसें लेती हुई विह्वल हो उठी। (13-15)

​राजा आयु भी बालक के अपहरण का समाचार सुनकर महान दुःख और शोक में डूब गए। उस पृथ्वीपति ने अपना धैर्य त्याग दिया। वे सोचने लगे— "न तप का कोई फल है, न दान का कोई फल है; क्योंकि यदि फल होता तो मेरा पुत्र इस प्रकार न हरा जाता।" (16-17)

​"दत्तात्रेय जी ने प्रसन्न होकर मुझे वरदान दिया था कि तुम्हारा पुत्र अजेय, सर्वगुणसम्पन्न और विजयी होगा। फिर उनके वरदान में यह विघ्न कैसे आ गया?" इस प्रकार चिन्ता में डूबे राजा अत्यंत दुखी होकर रोने लगे। (18-19)

व्याकरण सम्मत टिप्पणियाँ

​इस अध्याय में प्रयुक्त संस्कृत व्याकरण के कुछ प्रमुख अंश निम्नलिखित हैं:

१. सन्धि विच्छेद

  • बालोऽपनीतोऽसि: बालः + अपनीतः + असि (विसर्ग सन्धि और उत्व सन्धि)।
  • करुणान्विता: करुणा + अन्विता (दीर्घ सन्धि)।
  • पुत्रशोकान्वितम्: पुत्रशोक + अन्वितम् (दीर्घ सन्धि)।
  • तपसश्च: तपसः + च (विसर्ग का श्त्व सन्धि)।

२. समास

  • स्वर्भानोस्तनया: स्वर्भानोः तनया (षष्ठी तत्पुरुष समास) - राहु की पुत्री।
  • कमलेक्षणः: कमल इव ईक्षणे यस्य सः (बहुव्रीहि समास) - कमल के समान नेत्रों वाला।
  • पुत्ररत्नम्: पुत्र एव रत्नम् (रूपक कर्मधारय समास) - पुत्र रूपी रत्न।
  • सर्वगुणान्वितम्: सर्वैः गुणैः अन्वितम् (तृतीया तत्पुरुष समास) - सभी गुणों से युक्त।

३. प्रत्यय एवं धातु रूप

  • अपश्यन्ती: दृश् (पश्य) धातु + शतृ प्रत्यय + ङीप् (स्त्रीलिंग) - 'न देखती हुई'।
  • कृतम्: कृ धातु + क्त प्रत्यय - 'किया गया'।
  • संप्राप्तो: सम् + प्र + आप् + क्त प्रत्यय - 'भली-भाँति प्राप्त किया'।
  • याचमानस्य: याच् धातु + शानच् प्रत्यय - 'याचना करते हुए का'।
  • मुंचमाना: मुंच् धातु + शानच् प्रत्यय - 'त्यागती हुई' (साँस छोड़ती हुई)।

४. कारक एवं विभक्ति

  • मया (३-८-१२): अस्मद् शब्द, तृतीया विभक्ति, एकवचन (कर्ता कारक - कर्मवाच्य में)।
  • तपसा, दानयज्ञैश्च: तृतीया विभक्ति (करण कारक - जिनके द्वारा पुत्र प्राप्त हुआ)।
  • शोकात्: पञ्चमी विभक्ति (अपादान/हेतु - शोक के कारण)।

निष्कर्ष: यह अध्याय 'कर्म-प्रधान' दर्शन को दर्शाता है, जहाँ रानी इन्दुमती अपने वर्तमान दुःख को पूर्वजन्म के पापों (जैसे धरोहर हड़पना या दान न देना) का परिणाम मानती है।


यह उद्धरण पद्मपुराण के भूमिखण्ड के १०७वें अध्याय से है, जिसमें राजा आयु और रानी इन्दुमती के पुत्र नहुष के अपहरण के बाद देवर्षि नारद द्वारा उन्हें सांत्वना देने और भविष्य बताने का वर्णन है।

पद्मपुराणम् (भूमिखण्डः) - अध्याय १०७: हिन्दी अनुवाद

कुंजल ने कहा-

तदनन्तर, देवर्षि नारद स्वर्ग से राजा आयु के पास आए। आकर उन्होंने पूछा— "हे राजन्! आप किसलिए शोक कर रहे हैं? १।

हे महामते! आपके पुत्र का जो अपहरण हुआ है, वह देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए मंगलकारी ही हुआ है। हे महाराज! ऐसा जानकर आप शोक न करें। २।

आपका पुत्र सर्वज्ञ, सद्गुणी, सभी विज्ञानों (विद्याओं) से युक्त और समस्त कलाओं में निपुण होकर वापस आएगा। ३।

हे महाराज! देवतुल्य गुणों वाले उस बालक को जिसने भी चुराया है, उसने निःसंदेह अपने ही घर में अपने काल (मृत्यु) को बुलाया है। ४।

वह महान पराक्रमी और बलवान पुत्र (नहुष) उस शत्रु का अंत करने वाला बनेगा। हे भूपाल! वह भगवान शिव की पुत्री (अशोकसुन्दरी) के साथ आपके पास वापस आएगा। ५।

वह पुत्र अपने तेज से इंद्र और विष्णु (उपेंद्र) के समान होगा। वह अपने पुण्य कर्मों के प्रभाव से इंद्र पद का भोग भी करेगा। ६।

राजर्षि आयु और उनके अनुचरों के देखते-देखते, देवर्षि नारद राजा से ऐसा कहकर अचानक वहाँ से चले गए। ७।

देवों के समान पूज्य महाभाग नारद के चले जाने पर, राजा आयु ने रानी (इन्दुमती) के पास जाकर वह सारा वृत्तांत सुनाया। ८।

(राजा ने कहा—) "हे रानी! भगवान दत्तात्रेय द्वारा जो देवतुल्य पुत्र हमें दिया गया है, वह भगवान विष्णु की कृपा से सकुशल है। ९।

हे सुमुखि! जिस किसी ने भी मेरे सद्गुणी पुत्र का हरण किया है, वह पुत्र उसका सिर काटकर पुनः वापस आएगा। १०।

हे भद्रे! ऐसा नारद जी ने कहा है, अतः तुम शोक मत करो। इस महामोह को त्याग दो, जो कर्तव्य और धर्म का विनाश करने वाला है।" ११।

पति के वचनों को सुनकर रानी इन्दुमती पुत्र के आगमन की आशा में हर्षित हो गईं। १२।

(रानी ने सोचा—) "देवर्षि ने जैसा कहा है, वैसा ही होगा। दत्तात्रेय जी ने जो मुझे पुत्र दिया है, वह अजर-अमर (दीर्घायु) होगा। १३।

इसमें कोई संदेह नहीं है, मुझे भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है।" ऐसा सोचकर उन्होंने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण (दत्तात्रेय) को प्रणाम किया। १४।

"उन महात्मा अत्रि-पुत्र (दत्तात्रेय) को नमस्कार है जो सिद्धि देने वाले हैं, जिनकी कृपा से मैंने सुधीर, सद्गुणी और अत्यंत पुण्यवान पुत्र प्राप्त किया है।" १५।

ऐसा कहकर वह देवी (इन्दुमती) शांत हुईं। अपने पुत्र नहुष के पुनः आगमन का निश्चय जानकर उनका दुख दूर हो गया। १६।

व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)

​इस अंश में प्रयुक्त प्रमुख व्याकरणिक बिंदु निम्नलिखित हैं:

शब्द

व्याकरणिक परिचय

अन्विष्यताम्

'अनु + इष्' धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, कर्मवाच्य, अन्य पुरुष, एकवचन। (खोजा जाए)

आगत्य

'आ + गम्' धातु, ल्यप् प्रत्यय (आकर)।

प्रशोचसे

'प्र + शुच्' धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन। (शोक करते हो)

ज्ञात्वा

'ज्ञा' धातु, क्त्वा प्रत्यय (जानकर)।

अभ्येष्यते

'अभि + इ' धातु, लृट् लकार (भविष्यत काल), आत्मनेपद। (पास आएगा)

अहृतः

'अ + हृ' धातु, क्त प्रत्यय। (अपहृत किया गया)

निशम्य

'नि + शम्' धातु, ल्यप् प्रत्यय (सुनकर)।

कर्त्ता

'कृ' धातु, तृच् प्रत्यय, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। (करने वाला)

पश्यतः

विशेष टिप्पणी:

  1. सन्धि: 'तस्याप्यंतम्' = तस्य + अपि + अंतम् (दीर्घ एवं यण सन्धि)। 'नमोस्तु' = नमः + अस्तु (विसर्ग एवं पूर्वरूप सन्धि)।
  2. कारक: 'हर्षेणापि' में 'हर्ष' शब्द में तृतीया विभक्ति है (हेतौ तृतीया - कारण के अर्थ में)।
  3. छन्द: यहाँ अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छन्द में हैं, जो कि पुराणों का मुख्य छन्द है। श्लोक १५ वंशस्थ या अन्य छंद की ओर संकेत करता है क्योंकि इसकी लय भिन्न है।

यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का १०८वाँ अध्याय है, जिसमें नहुष के जन्म का रहस्य और उनकी नियति का वर्णन है। नीचे इसका शब्दशः हिन्दी अनुवाद और व्याकरणिक टिप्पणियाँ दी गई हैं:

अध्याय १०८: नहुष के जन्म का रहस्य

अनुवाद:

कुंजल ने कहा (१-२):

ब्रह्मा के पुत्र और तपस्वियों में श्रेष्ठ महातेजस्वी वशिष्ठ जी ने नहुष को बुलाकर यह वचन कहा— "शीघ्र वन जाओ और पर्याप्त मात्रा में वन्य सामग्री (फल-फूल, समिधा आदि) ले आओ।" मुनि के वाक्य सुनकर नहुष वन की ओर चल दिए।

नहुष का वृत्तांत सुनना (३-८):

वहाँ बलवान नहुष ने एक सुंदर वृत्तांत सुना (चारणों के मुख से)— "यही वह धर्मात्मा और वीर्यवान नहुष है, जो राजा आयु का महाबुद्धिमान पुत्र है और बचपन में ही अपनी माता से बिछड़ गया था। इसके वियोग में आयु की पत्नी (इन्दुमती) निरंतर विलाप कर रही है। उधर, भगवान शिव की पुत्री अशोकसुंदरी ने भी परम कठिन तप किया है। वह शुभ लक्षणों वाली इन्दुमती अपने पुत्र नहुष को कब देखेगी? जिसे पूर्व में दानवों ने हर लिया था। शिव की पुत्री अशोकसुंदरी ने भी आयु के पुत्र नहुष के लिए निराहार तप किया है। इसका उससे मिलन कब होगा?" आकाश में चारणों द्वारा कहे गए इन सांसारिक वचनों को धर्मात्मा नहुष ने बड़े विस्मय (भ्रम) के साथ सुना।

वशिष्ठ से प्रश्न (९-१५):

वे वन्य सामग्री लेकर वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और सामग्री महात्मा वशिष्ठ को अर्पित कर दी। फिर हाथ जोड़कर और भक्ति से सिर झुकाकर उन्होंने महाप्राज्ञ वशिष्ठ जी से कहा— "भगवन! मैंने चारणों द्वारा कही गई एक अपूर्व बात सुनी है। (वे कह रहे थे कि) यह नहुष नाम का बालक राजा आयु का पुत्र है जो दानवों द्वारा अपनी माता इन्दुमती से अलग कर दिया गया था। हे गुरुदेव! उन्होंने यह भी कहा कि शिव की पुत्री अशोकसुंदरी इस नहुष के लिए ही कठिन तप कर रही है। वह धर्मात्मा आयु कौन है? वह शुभ इन्दुमती कौन है? अशोकसुंदरी कौन है और नहुष किसे कहा जाता है? मेरे मन में यह संशय उत्पन्न हो गया है, आप ही इसे दूर करने में समर्थ हैं। वह दूसरा महाप्राज्ञ नहुष कहाँ है? हे तात! मुझे इसका मूल कारण विस्तार से बताइये।"

वशिष्ठ जी का उत्तर (१६-३४):

वशिष्ठ जी ने कहा— "बलवान और धर्मात्मा राजा आयु सातों द्वीपों के स्वामी हैं। उनकी पत्नी इन्दुमती अत्यंत यशस्विनी और सत्यस्वरूपा हैं। आप उन्हीं के पुत्र और गुणों के भंडार हैं। आप सोमवंश के भूषण हैं। शिव की पुत्री अशोकसुंदरी, जो अत्यंत सुंदर और सुश्रोणी है, उसने आपके लिए ही तपोवन में निराहार तप किया है। विधाता ने उसे आपकी पत्नी के रूप में निश्चित किया है। वह गंगा के तट पर ध्यानयोग में स्थित है। जब पापी दानवराज हुंड ने उस तपस्या से दैदीप्यमान एकाकिनी सती को देखा, तो वह कामबाणों से पीड़ित हो गया। उसने उसके पास जाकर कहा— 'तुम मेरी पत्नी बन जाओ।' उसके वचन सुनकर तपस्विनी ने कहा— 'रे हुंड! ऐसा साहस मत कर और बार-बार व्यर्थ न बोल। मैं तुझे प्राप्त नहीं हो सकती क्योंकि मैं पर-पत्नी (भावी पत्नी) हूँ। भाग्य ने पहले ही आयु के महाबली पुत्र नहुष को मेरे पति के रूप में चुना है। वह देवदत्त महातेजस्वी है, यदि तूने कुछ अन्यथा किया तो मैं तुझे श्राप दे दूँगी जिससे तू भस्म हो जाएगा।' यह सुनकर भी काम से पीड़ित उस दानव ने छल से उसे हर लिया और अपने महल ले गया। वहाँ उस देवी ने उसे श्राप दिया कि— 'नहुष के हाथों ही तेरी मृत्यु होगी।' आपके जन्म लेते ही जो घटना घटी, वह सुनो— आप राजा आयु के पुत्र हैं, जिसे पापी हुंड ने चुरा लिया था। किन्तु एक रसोइए और दासी ने आपकी रक्षा की और मेरे आश्रम भेज दिया। वन में चारणों और किन्नरों ने जो कुछ कहा, वह मैंने आपको पुनः विस्तार से बता दिया है। अब जाओ, उस पापी हुंड का वध करो और अशोकसुंदरी की आँखों के आँसू पोंछो। गंगा तट पर जाकर उस दानवेंद्र को मारकर उसे कारागार से मुक्त करो और उसके पति बनो। तुम्हारे प्रश्नों का यही उत्तर और कारण है।" ऐसा कहकर महामति विप्र वशिष्ठ चुप हो गए।

उपसंहार (३५):

मुनि के कहे हुए इस आश्चर्यजनक वृत्तांत को सुनकर राजा आयु के पुत्र नहुष ने इस विषय का अंत करने (हुंड के विनाश) का निश्चय किया और महान क्रोध प्रकट किया।

व्याकरणिक टिप्पणियाँ (Grammar Notes):

  1. समाहूय (सं-आ-ह्वे + ल्यप्): बुलाकर। यहाँ 'ल्यप्' प्रत्यय का प्रयोग 'करके' के अर्थ में हुआ है।
  2. वियोजितः (वि-युज् + क्त): अलग किया गया। 'क्त' प्रत्यय कर्मवाच्य (Passive) भूतकाल को दर्शाता है।
  3. तपस्तेपे (तपः + तेपे): यहाँ 'तप्' धातु का लिट् लकार (Paroksha Lita) आत्मनेपद रूप है, जो प्राचीन इतिहास या परोक्ष भूतकाल के लिए प्रयुक्त होता है।
  4. बद्धांजलिपुटोभूत्वा (बद्धांजलिपुटः + भूत्वा): हाथ जोड़कर। 'भूत्वा' में 'क्त्वा' प्रत्यय है।
  5. ब्रूहि (ब्रू + लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन): कहिए या बताइये।
  6. च्छेत्तुमर्हति (छेत्तुम् + अर्हति): 'छेत्तुम्' में तुमुन् प्रत्यय है (के लिए)। अर्हति (योग्य हैं)। "आप संशय दूर करने योग्य हैं।"
  7. साहसं कार्षीः (मा + कृ + लुङ् लकार): 'मा' के योग में लुङ् लकार का प्रयोग निषेध (Don't do) के लिए हुआ है। "साहस मत करो।"
  8. भविष्यति (भू + लृट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन): होगा (Future Tense)।
  9. जहि (हन् + लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन): वध करो या मारो।
  10. परिमार्जय (परि-मृज् + णिच् + लोट्): पोंछ डालो (आँसू पोंछने के अर्थ में)।

विशेष:

​इस अध्याय में 'वीर रस' और 'करुण रस' का सुंदर सम्मिश्रण है। नहुष को अपने वास्तविक परिचय का ज्ञान 'आकाशवाणी' (चारणों के गीत) और 'गुरु' के माध्यम से होता है, जो भारतीय महाकाव्यों की एक प्रचलित शैली है।

पद्मपुराण के भूमिखण्ड का 109वाँ अध्याय नहुष की कथा और अशोकसुन्दरी के धैर्य की महत्वपूर्ण घटना को दर्शाता है। यहाँ इसका व्याकरणिक विवरण के साथ हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है:

पद्मपुराणम् (भूमिखण्डः) - अध्याय १०९: हिंदी अनुवाद

कुंजल (तोता) ने कहा:

तपस्वियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ जी को प्रणाम और प्रसन्न करके, धनुष-बाण हाथ में लिए वह (रसोइया) वहाँ से निकला। उसने अपनी बुद्धि से उस बालक (नहुष) की रक्षा की और हिरण का मांस अच्छी तरह पकाकर (हुण्ड दैत्य को) खिला दिया। आयु का वह पुत्र (नहुष) गुणों से युक्त, सुंदर और देवताओं के समान तेजस्वी था। उस सुसंस्कृत और स्वादिष्ट मांस को खिलाकर, उस रसोइये ने हर्ष के साथ उस दुष्ट दैत्य से कहा (कि उसने बालक को पका दिया है)। (श्लोक 1-3)

​उस रसयुक्त मांस को खाकर दानव हुण्ड काम के वशीभूत होकर अशोकसुन्दरी के पास गया। उसने उससे कहा—"हे भद्रे! तुम्हारे पति आयु-पुत्र को मैंने खा लिया है। अब तुम मेरा ही सेवन करो और इच्छानुसार भोग भोगो। उस मृत मनुष्य से अब तुम्हारा क्या प्रयोजन?" (श्लोक 4-6)

​शिव की पुत्री तपस्विनी अशोकसुन्दरी ने यह सुनकर उत्तर दिया—"देवताओं ने मुझे जो पति दिया है, वह अजर और दोषरहित है। महात्मा देवताओं ने भी उसकी मृत्यु नहीं देखी है।" यह सुनकर दुष्ट दानव हंसते हुए बार-बार कहने लगा—"हे सुन्दरी! आज ही मैंने उस बालक नहुष का मांस खाया है।" (श्लोक 7-9)

​यह सुनकर अशोकसुन्दरी को अत्यंत क्रोध आया। सत्य में स्थित उस देवी ने कहा—"यदि मैंने नियमपूर्वक मन से तपस्या की है, तो उस सत्य के प्रभाव से आयु-पुत्र नहुष चिरायु (दीर्घजीवी) होगा। हे दुराचारी! यदि जीवित रहना चाहता है तो यहाँ से चला जा, अन्यथा मैं तुझे शाप दे दूँगी।" (श्लोक 10-12)

​रसोइये द्वारा भेजी गई दासी से यह सब जानकर, पापी हुण्ड अपनी प्रिय पत्नी के पास चला गया। वह नहीं जानता था कि रसोइये ने उसके साथ क्या छल किया है। (श्लोक 13-15)

सूत जी ने कहा:

दुःख और शोक से संतप्त तपस्विनी अशोकसुन्दरी अपने प्रिय का ध्यान करते हुए दुर्बल हो गई। वह विचार करने लगी कि क्या भाग्य को बदला जा सकता है? तभी वहाँ विद्वर नामक किन्नर अपनी पत्नी के साथ आया। (श्लोक 16-24)

​उसने भगवान शंकर की पुत्री से कहा—"हे देवि! तुम चिंता क्यों करती हो? मुझे देवताओं ने भेजा है, मैं विष्णुभक्त किन्नर हूँ। नहुष के लिए शोक मत करो। यद्यपि हुण्ड ने उसे मारने का प्रयत्न किया, पर देवताओं ने विभिन्न उपायों से उसकी रक्षा की है। हुण्ड केवल भ्रम में है कि उसने बालक को खा लिया है। वह बालक अपने पूर्वजन्म के पुण्यों से जीवित है।" (श्लोक 25-30)

​विद्वर ने आगे बताया—"पुण्यवान व्यक्ति की रक्षा स्वयं उसके कर्म और देवता करते हैं। दुष्टों के विष, शस्त्र और यन्त्र-मन्त्र निष्फल हो जाते हैं। नहुष इस समय वशिष्ठ के आश्रम में सुरक्षित है और वेदों तथा धनुर्वेद का ज्ञाता हो रहा है। वह चंद्रमा के समान प्रकाशित हो रहा है।" (श्लोक 31-43)

​"वह हुण्ड का वध करके तुमसे विवाह करेगा और पृथ्वी का एकमात्र अधिपति बनेगा। तुम्हें उससे ययाति नामक प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा और सौ कन्याएँ होंगी। नहुष अपने पुण्यों से इंद्र पद को भी प्राप्त करेगा। ययाति के भी चार पराक्रमी पुत्र होंगे— तुरु (तुर्वसु), पुरु, उरु और यदु। यदु के वंश में आगे चलकर अंधक, वृष्णि और भोज आदि वीर उत्पन्न होंगे।" (श्लोक 44-55)

​"हे देवि! शोक त्यागो, तुम्हारा पति शीघ्र ही तुमसे मिलेगा।" यह कहकर गंधर्व स्वर्ग चला गया और अशोकसुन्दरी काम-क्रोध त्यागकर पुनः तपस्या में लीन हो गई। (श्लोक 56-63)

प्रमुख व्याकरणिक टिप्पणियाँ

  1. सन्धि:
    • निर्जगामाथ: निर्जगाम + अथ (दीर्घ सन्धि)
    • बुभुजे दानवो: बुभुजे + दानवः (विसर्ग सन्धि)
    • नाहुषाख्याने: नहुष + आख्याने (दीर्घ सन्धि)
  2. समास:
    • बाणपाणिः: बाणः पाणौ यस्य सः (बहुव्रीहि समास) - जिसके हाथ में बाण है।
    • शिवकन्या: शिवस्य कन्या (तत्पुरुष समास) - शिव की पुत्री।
    • वेदवेदांगतत्त्वज्ञो: वेदानां वेदाङ्गानां च तत्त्वं जानाति इति (उपपद तत्पुरुष)।
  3. प्रत्यय:
    • प्रणिपत्य: प्र + नि + पत् + ल्यप् (प्रणाम करके)
    • भक्षितः: भक्ष् + क्त (खाया गया)
    • विज्ञानाति: वि + ज्ञा + लट् लकार (जानता है)
    • कर्तव्यम्: कृ + तव्यत् (करना चाहिए)
  4. कारक एवं विभक्ति:
    • तपसा भाविता: 'तपसा' में तृतीया विभक्ति (करण कारक) है।
    • हुंडाय: 'हुण्ड' के वध हेतु या संदर्भ में चतुर्थी का प्रयोग भावार्थ में दिखता है।

विशेष तथ्य

​इस अध्याय में 'भाग्य बनाम पुरुषार्थ' और 'पुण्य की शक्ति' पर बल दिया गया है। श्लोक 37 स्पष्ट करता है कि पुण्यवान की रक्षा ईश्वरीय विधान स्वयं करता है: 'रक्षयंति महात्मानं देवपुण्यैः सुरक्षितम्'


पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह ११०वाँ अध्याय राजा नहुष और दैत्य हुण्ड के बीच होने वाले युद्ध की तैयारी का वर्णन करता है। इसमें देवताओं द्वारा नहुष को दिव्य अस्त्र-शस्त्र भेंट किए जाने का प्रसंग है।

​यहाँ इसका सविस्तार हिन्दी अनुवाद और प्रमुख व्याकरणिक टिप्पणियाँ दी गई हैं:

हिन्दी अनुवाद

कुंजल ने कहा—

तपस्वियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ जी सहित सभी मुनियों से अनुमति लेकर, नहुष दानव (हुण्ड) की ओर जाने के लिए अत्यंत उत्सुक हुए। तब वशिष्ठ आदि सभी तपस्वी मुनियों ने आयु के पुत्र महाबली नहुष को आशीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया। आकाश में सभी देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक दुन्दुभियाँ बजाईं और नहुष के मस्तक पर पुष्पों की वर्षा की।

​तथा तदनन्तर, सहस्राक्ष (इन्द्र) ने देवताओं के साथ आकर नहुष को सूर्य के तेज के समान देदीप्यमान शस्त्र और अस्त्र प्रदान किए। हे द्विजश्रेष्ठ! नृपश्रेष्ठ नहुष ने देवताओं से उन दिव्य अस्त्रों को ग्रहण किया, जिससे उनका स्वरूप भी दिव्य हो गया।

​इसके बाद सभी देवताओं ने इन्द्र से कहा— "हे सुरेश्वर! इस नहुष को रथ प्रदान कीजिए।" देवताओं का मत जानकर इन्द्र ने अपने सारथि मातलि को बुलाया और आदेश दिया— "तुम इस महात्मा के पास जाओ। ध्वजा से युक्त इस रथ के द्वारा युद्ध के लिए उद्यत इन महाप्राज्ञ आयु-पुत्र को ले जाओ।"

​मातलि ने इन्द्र से कहा— "मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।" ऐसा कहकर वह युद्ध के लिए तैयार नहुष के पास शीघ्रता से पहुँचा। उसने राजा से देवराज इन्द्र के वचन कहे— "हे धर्मज्ञ! इस रथ के द्वारा आप युद्ध में विजयी हों। हे नृपतीश्वर! इन्द्र ने आपसे यही कहा है कि आप रणक्षेत्र में उस पापी हुण्ड दानव का वध करें।"

​इन्द्र के अनुग्रह और महात्मा वशिष्ठ के प्रताप से पुलकित और आनन्दित होकर राजा नहुष ने कहा— "मैं युद्ध में उस पापी दानव का संहार करूँगा, जिसने देवताओं और विशेषकर मेरी माया (अशोकसुन्दरी) का अपराध किया है।"

​नहुष के ऐसा कहने पर स्वयं शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान (विष्णु) वहाँ आए। उन्होंने अपने चक्र से सूर्यमण्डल के समान एक महान्, चमकते हुए तेज से दीप्त और शुभ गोल चक्र निकालकर प्रसन्नतापूर्वक नहुष को दिया। भगवान शिव ने उन्हें तेज से युक्त अत्यंत तीक्ष्ण 'शूल' (त्रिशूल) प्रदान किया। उस श्रेष्ठ शूल के कारण युद्ध के लिए तैयार नहुष त्रिपुरासुर का वध करने वाले दूसरे शंकर के समान सुशोभित हुए।

​ब्रह्मा जी ने 'ब्रह्मास्त्र', वरुण ने उत्तम 'पाश', चन्द्रमा ने चन्द्रमा के तेज के समान कान्तिवाला और मंगलकारी ध्वनि करने वाला 'शंख', इन्द्र ने 'वज्र' तथा 'शक्ति', वायु ने बाणों सहित 'धनुष' और अग्निदेव ने उस महात्मा को 'आग्नेयास्त्र' प्रदान किया। इस प्रकार सभी महात्मा देवताओं ने उस महातेजस्वी राजा को बहुत से विविध दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए।

कुंजल ने कहा—

तदनन्तर, देवताओं द्वारा सम्मानित और तत्ववेत्ता मुनियों द्वारा आशीर्वाद से अभिनंदित वीर नहुष, रत्नों की मालाओं से सुशोभित और घण्टियों के स्वर से गुंजायमान दिव्य रथ पर आरूढ़ हुए। उस दिव्य रथ पर नृपनन्दन नहुष स्वर्ग मार्ग में अपने तेज से सूर्य के समान सुशोभित हुए। वे अपने तेज से दैत्यों के मस्तक को तपाते हुए, वायु के समान तीव्र वेग से वहाँ पहुँचे जहाँ अपनी सेना के साथ वह पापी दानव (हुण्ड) स्थित था। महात्मा मातलि उस रथ के चालक थे।

व्याकरणिक टिप्पणियाँ (Grammar Notes)

१. सन्धि विच्छेद एवं प्रकार

  • वशिष्ठाद्यास्तपोधनाः: वशिष्ठ + आद्याः (दीर्घ) + तपोधनाः (विसर्ग)।
  • सूर्यतेजोपमानि: सूर्य + तेजः + उपमानि (गुण एवं विसर्ग)।
  • चास्त्राणि: च + अस्त्राणि (दीर्घ)।
  • मतोऽभवत्: मतः + अभवत (विसर्ग का उत्व एवं पूर्वरूप)।
  • रथेनानेन: रथेन + अनेन (दीर्घ)।

२. समास (Compound Words)

  • सहस्राक्षः: सहस्राणि अक्षीणि यस्य सः (बहुव्रीहि - इन्द्र)।
  • नृपशार्दूलो: नृपेषु शार्दूलः इव (उपमित कर्मधारय - राजाओं में सिंह के समान)।
  • वज्रपाणिः: वज्रे पाणौ यस्य सः (बहुव्रीहि - जिसके हाथ में वज्र है)।
  • पापचेतनम्: पापा चेतना यस्य तम् (बहुव्रीहि - जिसकी बुद्धि पापी है)।
  • शंखचक्रगदाधरः: शंखश्च चक्रं च गदा च, तान् धरति इति (उपपद तत्पुरुष एवं द्वंद्व)।

३. धातु रूप एवं प्रत्यय (Verbs and Participles)

  • आमंत्र्य: आ + मन्त्र + ल्यप् (आज्ञा लेकर/आमंत्रित करके)।
  • जघ्नुः: हन् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन (बजाया/मारा)।
  • प्रचक्रुः: प्र + कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन (किया)।
  • जगृहे: ग्रह् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, एकवचन (ग्रहण किया)।
  • आहूय: आ + ह्वे + ल्यप् (बुलाकर)।
  • आरुरोह: आ + रुह् धातु, लिट् लकार (चढ़ा)।

४. विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध

  • आयुपुत्रं महाबलम्: नहुष के लिए प्रयुक्त।
  • दिव्यानि अस्त्रणि: अस्त्रों की विशेषता।
  • भास्वरं रथम्: रथ की विशेषता।

निष्कर्ष: यह अध्याय नहुष के "देव-तुल्य" उत्थान को दर्शाता है, जहाँ उन्हें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) सहित सभी दिक्पालों की शक्ति प्राप्त होती है।

पद्मपुराण के भूमिखण्ड का यह १११वाँ अध्याय राजा नहुष और दैत्य हुण्ड के युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यहाँ कुंजल (पक्षी) राजा नहुष के पराक्रम और उस वैभवशाली वातावरण का वर्णन कर रहा है जब नहुष हुण्ड की नगरी 'महोदय' में प्रवेश करते हैं।

अध्याय १११: हिन्दी अनुवाद

कुंजल ने कहा—

देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी वीर नहुष जब युद्ध के लिए निकले, तब कुतूहलवश मांगलिक गीत गाती हुई सभी स्त्रियाँ वहाँ एकत्रित हो गईं। (१)

​देवताओं की उत्तम स्त्रियाँ, रंभा आदि अप्सराएँ और किन्नरियों ने उत्सुकता के साथ मधुर स्वर में गायन किया। (२)

​रूप और अलंकारों से सजी हुई गन्धर्वों की स्त्रियाँ भी कौतुकवश वहाँ पहुँची जहाँ राजा नहुष स्थित थे। (३)

​दुरात्मा हुण्ड की 'महोदय' नाम की वह नगरी, दिव्य नन्दन वनों से सब ओर अलंकृत थी। (४)

​वह उत्तम नगरी सात ड्योढियों (कक्षाओं) वाले भवनों, कलशों, बड़ी-बड़ी पताकाओं और ऊँचे दण्डों से सुशोभित थी। (५)

​कैलाश के शिखर के समान ऊँचे और स्वर्ग को स्पर्श करने वाले दिव्य भवनों से वह श्रेष्ठ पुरी सुशोभित हो रही थी। (६)

​दिव्य वनों, उपवनों और सागर के समान विशाल तालाबों, जो स्वच्छ जल और लाल कमलों (रक्तोत्पल) से भरे थे, उस नगरी की शोभा बढ़ा रहे थे। (७)

​वह नगरी महारत्नों से निर्मित प्राचीरों (दीवारों), सैंकड़ों अट्टालिकाओं और स्वच्छ जल से भरी हुई परिखाओं (खाइयों) से सुरक्षित और शोभित थी। (८)

​अन्य श्रेष्ठ रत्नों, हाथियों, घोड़ों, सुन्दर स्त्रियों और प्रभावशाली पुरुषों से वह नगरी भरी हुई थी। (९)

​राजश्रेष्ठ महावीर नहुष ने इस प्रकार की विविध प्रभावों वाली दिव्य 'महोदय' पुरी को देखा। (१०)

​नगरी के समीप ही दिव्य वृक्षों से सुसज्जित एक वन था, जिसमें महावीर नहुष ने वैसे ही प्रवेश किया जैसे कोई देवता नन्दन वन में प्रवेश करता है। (११)

​धर्मात्मा राजेन्द्र नहुष ने मातलि के साथ रथ पर सवार होकर नदी के तट पर स्थित उस वन के मध्य प्रवेश किया। (१२)

​वहाँ रूपवती दिव्य स्त्रियाँ एकत्रित हुईं और संगीत के ज्ञाता गन्धर्वों ने गीतों के माध्यम से नृपश्रेष्ठ नहुष का यशगान किया। (१३)

​सूत और मागध (वंदीजन) राजा आयु के पुत्र नहुष की स्तुति करने लगे, जो सूर्य के समान प्रकाशित हो रहे थे। (१४)

​तब नहुष ने किन्नरों द्वारा गाए जा रहे उस मधुर संगीत को सुना। (१५)

प्रमुख व्याकरणिक टिप्पणियाँ

​इस अध्याय में प्रयुक्त महत्वपूर्ण व्याकरणिक संरचनाएँ निम्नलिखित हैं:

१. सन्धि विच्छेद

  • परिजग्मुरत्र: परिजग्मुः + अत्र (विसर्ग सन्धि)
  • रंभाद्यप्सरसस्तथा: रंभा + आदि + अप्सरसः + तथा (यण् सन्धि एवं विसर्ग सन्धि)
  • यथाऽमरः: यथा + अमरः (पूर्वरूप/दीर्घ सन्धि का प्रभाव)
  • किन्नरेरितम्: किन्नर + ईरितम् (गुण सन्धि - अ + ई = ए)

२. शब्द रूप एवं विभक्ति

  • नहुषे (तस्मिन्): सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अधिकरण कारक - 'नहुष में' या 'नहुष के होने पर')।
  • पुरोत्तमम्: द्वितीया विभक्ति, एकवचन (कर्म कारक - 'नगरी को')।
  • दिव्यैः/कलशैः: तृतीया विभक्ति, बहुवचन (करण कारक - 'दिव्य वस्तुओं से/कलशों से')।
  • राजेन्द्रो/नहुषो: प्रथमा विभक्ति, एकवचन (उकारान्त/अकारान्त विसर्ग लोप)।

३. समास

  • दुरात्मनः: दुष्टः आत्मा यस्य सः (बहुव्रीहि समास) - हुण्ड के लिए प्रयुक्त।
  • रूपालंकारसंयुताः: रूप च अलंकारः च (द्वन्द्व), तैः संयुताः (तृतीय तत्पुरुष)।
  • सप्तकक्षान्वितैः: सप्त कक्षाः अन्विताः (कर्मधारय/तत्पुरुष)।
  • गीततत्त्वज्ञाः: गीतस्य तत्त्वं जानन्ति इति (उपपद तत्पुरुष)।

४. प्रत्यय एवं क्रिया

  • निर्गच्छमाने: 'निर्' उपसर्ग + 'गम्' धातु + 'शानच्' प्रत्यय (वर्तमान काल में निरंतरता दर्शाने हेतु)।
  • दृष्टवान्/ददृशे: 'दृश्' धातु, लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल)।
  • शुश्राव: 'श्रु' धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
  • विशेष टिप्पणी: इस अध्याय में 'महोदय' नगरी की तुलना स्वर्ग से की गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि शत्रु (हुण्ड) अत्यंत शक्तिशाली और वैभवशाली था, जिसे पराजित करना नहुष के शौर्य की पराकाष्ठा थी।







यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का ११२वाँ (112वां) अध्याय है, जिसमें कुंजल (पक्षी) च्यवन ऋषि और राजा नहुष के चरित्र का वर्णन कर रहे हैं। यहाँ दिए गए श्लोकों का हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है:

पद्मपुराणम् (भूमिखण्ड) - अध्याय ११२: हिन्दी अनुवाद

कुंजल ने कहा—

अप्सराओं द्वारा गाए जा रहे उस गायन को और ध्रुव पदों (संगीत की लय) को सुनकर, भगवान शिव की पुत्री (अशोकसुंदरी) अत्यधिक व्याकुल हो उठीं और गहरी चिंता में डूब गईं। ॥१॥

​वह श्रेष्ठ अंगों वाली (वरारोहा) राजकुमारी, जो तपोभाव से युक्त थी, बड़े उत्साह के साथ अपने आसन से तुरंत उठीं और शीघ्रता से वहाँ गईं। ॥२॥

​वहाँ उन्होंने देवताओं के समान कांति वाले, दिव्य रूप और आभा से युक्त, अंगों पर दिव्य सुगंधित लेप लगाए हुए और दिव्य मालाओं से सुशोभित राजकुमार (नहुष) को देखा। ॥३॥

​दिव्य आभूषणों और वस्त्रों से सुशोभित वह राजकुमार (नहुष) सूर्य के समान देदीप्यमान और दिव्य लक्षणों से संपन्न थे। ॥४॥

​(उन्हें देखकर अशोकसुंदरी सोचने लगीं—) "क्या यह कोई महाबुद्धिमान देवता हैं या कोई गंधर्व? क्या यह कोई नागपुत्र हैं अथवा कोई विद्याधर?" ॥५॥

​"देवताओं में भी मैंने ऐसा (रूप) नहीं देखा, फिर यक्षों में तो ऐसा कहाँ हो सकता है? अपनी लीला और वीरता में तो ये साक्षात् इंद्र (सहस्राक्ष) के समान प्रतीत होते हैं।" ॥६॥

​"क्या ये स्वयं भगवान शिव (शंभु) हैं अथवा कामदेव हैं? या फिर मेरे पिता के मित्र कुबेर (पौलस्त्य) हैं?" ॥७॥

​जब वह रूप और गुणों में श्रेष्ठ राजकुमारी इस प्रकार विचार कर रही थीं, तभी रंभा आदि सखियों ने आकर महादेव की पुत्री (अशोकसुंदरी) से हंसते हुए कहा। ॥८॥

उपसंहार:

इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान के अंतर्गत गुरुतीर्थ माहात्म्य में च्यवन चरित्र और नहुष आख्यान का एक सौ बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

यह पद्मपुराण के भूमिखण्ड का 113वाँ अध्याय है। 

इसमें अशोकसुंदरी (शिव-पार्वती की पुत्री) और राजा नहुष के मिलन तथा उनके पूर्ववृत्त का वर्णन है।

​यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण दिया गया है:

​🚩 हिन्दी अनुवाद

रम्भा ने कहा—

"हे शुभे! तुम इस तपस्या को त्याग कर क्या देख रही हो? पुरुष का चिंतन करने से तपस्या का क्षय (नाश) हो जाता है।" (१)

अशोकसुंदरी ने कहा—

"मेरा मन नहुष को पाने की इच्छा से तपस्या में लीन है। देव, असुर या महोरग (बड़े सर्प) भी मुझे विचलित नहीं कर सकते। (२) हे महाभागे! इस (नहुष) को देखकर मेरा मन बहुत विचलित हो रहा है। मेरी इच्छा है कि मैं जाकर इनके साथ विहार (रमण) करूँ, मन में ऐसी उत्सुकता जागी है। (३) हे वरावने! मेरे मन की यह कैसी विपरीत स्थिति हो गई है? यदि तुम्हें इसका उत्तम ज्ञान है, तो मुझे इसका कारण बताओ। (४) मैं महात्मा आयु के पुत्र (नहुष) की पत्नी हूँ, जिसे देवताओं ने बनाया है। फिर मेरा चित्त क्यों भाग रहा है और उनके साथ रमण करने को उत्सुक है?" (५)

रम्भा ने कहा—

"हे भामिनी! सभी देहधारियों के भीतर स्वयं सनातन ब्रह्म ज्ञानस्वरूप आत्मा निवास करता है। (६) यद्यपि यह आत्मा इंद्रियों की प्रक्रियाओं और मोह के पाश में बँधा रहता है, फिर भी वह सदा सिद्ध (मुक्त) ही है। (७) यह शुद्ध और धर्मज्ञ आत्मा प्रकृति को नहीं जानता, केवल ज्ञान-विज्ञान की कला को जानता है। (८) इस महामति (नहुष) को देखकर तुम्हारा मन पाप को त्याग कर सत्य की ओर दौड़ रहा है। (९)

​इसमें कोई संदेह नहीं कि ये आयु-पुत्र (नहुष) ही तुम्हारे पति हैं। यदि कोई अन्य पुरुष होता, तो मन में पाप के लक्षण (शंका) आते। (१०) देवताओं ने ऐसी विधि बनाई है और सत्य के पाश से बाँधा है कि यह आयु-पुत्र ही तुम्हारा पति होगा। (११) हे सुंदरी! तुम्हारी आत्मा ने स्वयं इसे पहचान लिया है और उस सत्य संबंध को ग्रहण कर लिया है। (१२) वह (तुम्हारी आत्मा) किसी और भाव को नहीं जानती, केवल आयु-पुत्र को ही पहचानती है। हे देवी! तुम्हारी प्रकृति (बाहरी इन्द्रियाँ) अभी पति को पहचान नहीं पा रही हैं। (१३) लेकिन तुम्हारा 'प्रधानात्मा' (मुख्य चेतना) यह जानकर ही आज उनकी ओर दौड़ रहा है। आत्मा सब जानता है, वह सनातन देव है। (१४) ये वही वीरेंद्र नहुष हैं, इसीलिए तुम्हारा चित्त सत्य संबंध की इच्छा से उनकी ओर जा रहा है। (१५) हे भद्रे! यह जानकर कि ये आयु के पुत्र हैं, तुम्हारा मन किसी और की ओर नहीं जाता। मैंने तुम्हारे मन की शाश्वत बात बता दी है। (१६)

​यह नहुष युद्ध में महाघोर दानव हुण्ड को मारकर तुम्हें अपने स्थान और राजा आयु के उत्तम गृह में ले जाएगा। (१७) दैत्य द्वारा अपहृत होने पर भी यह वीर अपने पुण्यों के कारण बचा रहा। बचपन से ही यह अपने परिजनों से बिछुड़ गया था। (१८) माता-पिता से विहीन होकर यह इस महावन में बढ़ा हुआ है। अब यह तुम्हारे साथ ही अपने पिता के घर जाएगा।" (१९)

सूत जी बोले—

रम्भा की यह बात सुनकर शिव-पुत्री अशोकसुंदरी बहुत हर्षित हुई और समुद्र-पुत्री रम्भा से बोली— (२०)

"निश्चित ही ये सत्यस्वरूप मेरे वीर्यवान पति हैं। मेरा व्याकुल मन इन्हीं की ओर अत्यंत वेग से दौड़ रहा है। (२१) हे चारुहासिनी! मन के समान कोई देव नहीं है जो सब कुछ निश्चित रूप से जानता है। मैंने यह अद्भुत सत्य देख लिया है। (२२) हे सखी! कामदेव के समान दिव्य लक्षणों वाले इस पुरुष को देखकर मेरा मन जैसा दौड़ रहा है, वैसा किसी और के लिए नहीं होता। (२३) हमें सखियों के साथ इनके पास चलना चाहिए।" (२४)

​ऐसा कहकर रम्भा नहुष के पास जाने को उद्यत हुई। (२५-२६) रम्भा ने नहुष के पास पहुँचकर कहा— "हे महाभाग नहुष! आप देवताओं के समान रूप वाले हैं। मैं आपकी कथा सुनाने आई हूँ। (२७) मैं अशोकसुंदरी की सखी हूँ और आपके प्रिय कार्य के लिए आई हूँ।" (२८) रम्भा ने धनुष-बाण धारण किए हुए, दूसरे इंद्र के समान तेजस्वी राजकुमार नहुष से कहा— (२९) "हे आयु-पुत्र! मैं रम्भा हूँ। (३०) मैं शिव की कन्या (अशोकसुंदरी) द्वारा भेजी गई हूँ। ब्रह्मा और देवताओं ने पहले ही इन्हें आपकी श्रेष्ठ भार्या के रूप में बनाया है। (३१-३२) वह साक्षात् स्त्री-रत्न है और आपके लिए तपस्या कर रही है। (३३-३४) वह केवल आपको ही चाहती है, अतः आप उन्हें स्वीकार करें।" (३५-३६)

नहुष ने कहा—

"हे रम्भा! मेरी बात सुनो। तुमने जो कहा वह मुझे सब ज्ञात है। (३७) महात्मा वशिष्ठ ने मुझे पहले ही यह सब बता दिया था। (३८) किंतु हे भद्रे! जब तक मैं उस दानव हुण्ड को मार नहीं देता, तब तक मैं इस वरांगना को साथ नहीं ले जाऊँगा। (३९) मुझे पता है कि मेरा जन्म और तुम्हारा तप मेरे लिए ही है। (४०) तुम विधि द्वारा मेरी पत्नी निश्चित की गई हो। (४१) उस पापी हुण्ड ने तुम्हें अपहृत किया था और उसने मुझे भी बचपन में माता-पिता से अलग कर दिया था। (४२) इसलिए पहले मैं उस अधम दानव हुण्ड का वध करूँगा। (४३) उसके पश्चात ही मैं तुम्हें वशिष्ठ के आश्रम ले जाऊँगा। मेरी यह बात अशोकसुंदरी से कह दो।" (४४)

​सूत जी कहते हैं— रम्भा ने जाकर अशोकसुंदरी को सब बता दिया। (४५-४६) अशोकसुंदरी हर्षित होकर रम्भा के साथ वहीं रुक गई और अपने पति के शौर्य को देखने की प्रतीक्षा करने लगी। (४७-४८)

​🔍 व्याकरणिक विश्लेषण (Grammar Analysis)

​१. संधि (Sandhi)

  • रम्भोवाच: रम्भा + उवाच (गुण संधि - आ + उ = ओ)
  • अशोकसुंदर्य्युवाच: अशोकसुंदरी + उवाच (यण् संधि - ई + उ = यु)
  • देवासुरमहोरगाः: देव + असुर (दीर्घ) + महा + उरगाः (गुण)
  • कस्मान्मे: कस्मात् + मे (अनुनासिक संधि/जश्त्व - त् का न्)
  • प्रत्युवाच: प्रति + उवाच (यण् संधि - इ + उ = यु)

​२. समास (Compounds)

  • आयुपुत्रस्य: आयुः पुत्रः, तस्य (षष्ठी तत्पुरुष) - आयु का पुत्र।
  • देवदेवेन: देवानाम देवः, तेन (षष्ठी तत्पुरुष) - देवों के देव द्वारा।
  • पितृमातृविहीनः: पित्रा च मात्रा च विहीनः (द्वंद्व एवं तृतीया तत्पुरुष) - माता-पिता से रहित।
  • चारुहासिनी: चारु हासः अस्याः अस्ति या सा (बहुव्रीहि) - सुंदर मुस्कान वाली।
  • चापबाणधरम्: चापं च बाणं च धरति इति (उपपद तत्पुरुष) - धनुष और बाण को धारण करने वाला।

​३. प्रत्यय (Suffixes)

  • परित्यज्य: परि + त्यज् + ल्यप् (छोड़कर)
  • चिंतनात्: चिन्त् + ल्युट् (पंचमी विभक्ति - चिंतन करने से)
  • कर्तव्यम्: कृ + तव्यत् (करना चाहिए)
  • ज्ञात्वा: ज्ञा + क्त्वा (जानकर)
  • हत्वा: हन् + क्त्वा (मारकर)
  • आकर्णितम्: आ + कर्ण् + क्त (सुना गया)

​४. विशेष पद एवं कारक

  • तपसि मे मनो लीनम्: 'तपसि' में सप्तमी विभक्ति (आधार) है।
  • भजमानां भजस्व हि: यहाँ 'भजमानां' में शानच् प्रत्यय है (जो भज रही है)। 'भजस्व' लोट् लकार (आज्ञा/प्रार्थना) मध्यम पुरुष एकवचन है।
  • आत्मा सर्वं प्रजानाति: 'प्रजानाति' - प्र + ज्ञा + लट् लकार (वर्तमान काल)।

निष्कर्ष: इस अध्याय का मुख्य दर्शन यह है कि 'आत्मा' सब कुछ जानता है (आत्मा सर्वं प्रजानाति)। अशोकसुंदरी का मन नहुष की ओर इसलिए आकर्षित हुआ क्योंकि वे पूर्व-नियत पति-पत्नी थे, जिसे रम्भा ने "सत्य संबंध" कहा है।




प्रस्तुत पाठ पद्मपुराणम् के भूमिखण्ड के ११४वें अध्याय से उद्धृत है। इसमें राजा नहुष और दैत्यराज हुण्ड के बीच युद्ध की पूर्वपीठिका और नहुष के शौर्य का वर्णन है।

​यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद और प्रमुख व्याकरणिक टिप्पणी दी गई है:

हिन्दी अनुवाद

कुंजल ने कहा—

इसके बाद हुण्ड के सेवक उन सभी दानवों ने, रम्भा के द्वारा जैसा सुना था, नहुष और रम्भा के उस संवाद को दैत्यराज हुण्ड से कह दिया। उसे सुनकर वह अत्यन्त क्रोधित हुआ और दूत से यह वचन बोला— "हे वीर! मेरी आज्ञा से जाओ और उस पुरुष का पता लगाओ, जो उस शिव-कन्या (अशोकसुन्दरी/रम्भा) के साथ बातचीत कर रहा है।"

​स्वामी का आदेश पाकर वह लघु-दानव (दूत) वहाँ गया और एकान्त में वीर नहुष से यह वचन बोला— "आप घोड़ों और सारथि से युक्त इस दिव्य रथ पर स्थित हैं और हाथ में धनुष-बाण लेकर सभा में भयंकर प्रतीत हो रहे हैं। आप कौन हैं? यहाँ किस कार्य से आए हैं? आपको यहाँ किसने भेजा है? इस रम्भा (शिवकन्या) ने आपसे क्या कहा, वह सब मेरे सामने स्पष्ट रूप से कहिए। आप देवताओं का मर्दन करने वाले हुण्ड से डरते क्यों नहीं? यदि जीवित रहने की इच्छा है तो यह सब मुझे बताओ। यहाँ मत खड़े रहो, शीघ्र चले जाओ, क्योंकि दानवराज हुण्ड दुःसह (अजेय) है।"

नहुष ने कहा—

"जो सातों द्वीपों के अधिपति बलवान राजा आयु हैं, मुझे उन्हीं का पुत्र जानो, जो समस्त दैत्यों का विनाश करने वाला है। मैं नहुष नाम से विख्यात हूँ और देवताओं तथा ब्राह्मणों का पूजक हूँ। हे दानव! तेरे स्वामी हुण्ड ने ही बचपन में मेरा अपहरण किया था। और यह जो भगवान शिव की कन्या है, इसका भी उस दैत्य ने पहले अपहरण किया था; यह अब हुण्ड के वध के लिए घोर तपस्या कर रही है।

​हे पापी! सुन, जिसे तूने जन्मकक्ष (सूतिकागृह) से चुराया था और उस दुष्ट ने जिसे दासी और रसोइए के हाथ में मारने के लिए दे दिया था, वही मैं आज यहाँ आया हूँ। मैं उस पापकर्म करने वाले दुष्ट हुण्ड और अन्य घोर दानवों को यमलोक पहुँचा दूँगा। हे पापिष्ठ! मुझे ऐसा जान और जाकर दानव (हुण्ड) से कह दे।"

​यह सब सुनकर उस दुष्टात्मा (दूत) ने हुण्ड के पास जाकर नहुष के कहे हुए वचनों को कह सुनाया। उसके मुख से यह सुनकर दैत्यराज तुरंत क्रोधित हो उठा (और सोचने लगा)— "उस पापी रसोइए और दासी ने इसे मारा क्यों नहीं? यह तो वैसा ही हुआ जैसे मैंने किसी बीमारी की उपेक्षा कर दी और वह बढ़ गई। अब मैं स्वयं इस शिवकन्या के साथ इस आयु-पुत्र नहुष को युद्ध में तीखे बाणों से मार डालूँगा।"

​ऐसा सोचकर उसने सारथि से कहा— "श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त रथ तैयार करो।" उसने सेनापति को बुलाकर व्याकुलता के साथ कहा— "मेरी सेना तैयार करो, शूरवीर हाथियों, घुड़सवारों, ध्वजा, छत्र और चामर से युक्त चतुरंगिणी सेना को शीघ्र सुसज्जित करो।" हुण्ड की आज्ञा सुनकर महाप्राज्ञ सेनापति ने सब विधिपूर्वक किया।

​उस विशाल चतुरंगिणी सेना से घिरा हुआ वह हुण्ड, हाथ में धनुष-बाण लिए युद्ध में वीर नहुष की ओर चला। इन्द्र के रथ पर सवार, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और युद्ध के लिए उद्यत वीर नहुष को आकाश में स्थित होकर देवगण देख रहे थे। वे नहुष तेज की ज्वाला से घिरे हुए दूसरे सूर्य के समान प्रतीत हो रहे थे।

सूत जी बोले—

इसके बाद उन सभी दानवों ने श्रेष्ठ बाणों की वर्षा की। तलवार, पाश, शूल, शक्ति और फरसों से वे महात्मा नहुष के साथ युद्ध करने लगे। वे दानव गरजते हुए नहुष पर वैसे ही टूट पड़े जैसे पर्वत पर बादल। उनके पराक्रम को देखकर प्रतापी आयु-पुत्र नहुष ने इन्द्रधनुष के समान अपने धनुष की प्रत्यंचा को खींचा। महात्मा नहुष के उस धनुष की टंकार वज्र के कड़कने के समान थी, जो दानवों को भयभीत करने वाली थी। उस महान घोष (ध्वनि) से दानव काँपने लगे, उनके हृदय व्याकुल हो गए और उस महायुद्ध में उनका साहस टूट गया।

व्याकरणिक टिप्पणी (Selected Grammar)

  1. आचचक्षुः: 'चक्ष्' (देखना/कहना) धातु, लिट् लकार (Paroxytone Past), प्रथम पुरुष, बहुवचन। (उन्होंने कहा)
  2. तमाकर्ण्य: तत् + आ + कर्ण्य (कर्ण + ल्यप्)। 'आकर्ण्य' में 'ल्यप्' प्रत्यय है क्योंकि पूर्व में उपसर्ग है। अर्थ: 'सुनकर'।
  3. जानीहि: 'ज्ञा' धातु, लोट् लकार (Imperative), मध्यम पुरुष, एकवचन। अर्थ: 'जानो' या 'पता लगाओ'।
  4. विनाशनम्: वि + नश् + णिच् + ल्युट्। अर्थ: 'विनाश करने वाला'।
  5. विख्यातम: वि + ख्या + क्त (प्रत्यय)। अर्थ: 'प्रसिद्ध'।
  6. यमसादनम्: यमस्य सदनम् (षष्ठी तत्पुरुष समास)। अर्थ: 'यमलोक'।
  7. चुक्रोध: 'क्रुध्' धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन। अर्थ: 'क्रोधित हुआ'।
  8. समायातो: सम् + आ + या + क्त। अर्थ: 'पहुँचा हुआ' या 'प्राप्त'।
  9. विस्फार्य: वि + स्फुर् + णिच् + ल्यप्। अर्थ: 'फैलाकर' या 'टंकार करके'।
  10. कश्मलाविष्टहृदया: कश्मलेन आविष्टं हृदयं येषाम् ते (बहुव्रीहि समास)। अर्थ: 'जिनके हृदय व्याकुलता से घिरे हुए हैं'।

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः।

यह पाठ पद्मपुराण के भूमिखण्ड के अध्याय 115 से लिया गया है। इसमें महाराज आयु के पुत्र नहुष और दैत्य हुण्ड के बीच हुए भीषण युद्ध का वर्णन है, जिसमें अंततः नहुष की विजय होती है।

हिन्दी अनुवाद (अध्याय ११५)

कुंजल ने कहा-

उस युद्धभूमि में शोभायमान महात्मा नहुष ने अपना धनुष धारण किया। वे दैत्यों का संहार करने के लिए उसी प्रकार उद्यत हुए जैसे प्रलयकाल में कुपित होकर साक्षात् काल लोकों का अंत करना चाहता हो। (१) उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी अस्त्रों के जाल से दानवों को वैसे ही मार गिराया, जैसे वायु वृक्षों को उखाड़ फेंकती है। (२) जिस प्रकार वायु अपने वेग से मेघों के समूह को छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही राजा नहुष ने तीक्ष्ण बाणों से मदोन्मत्त असुरों का नाश कर दिया। (३) वे दानव महात्मा नहुष के बाणों की वर्षा को सहन न कर सके; कुछ मारे गए, कुछ भाग गए और कुछ युद्ध से अदृश्य हो गए। (४)

सूत जी ने कहा-

उस तेजस्वी, बुद्धिमान और दानवनाशक राजकुमार (नहुष) को देखकर दुष्टात्मा हुण्ड अत्यंत क्रोधित हो उठा। (५) वह युद्ध में उनके सामने जाकर बोला— "ठहरो, ठहरो! हे आयु के पुत्र! आज मैं तुम्हें यमराज के पास पहुँचा दूँगा।" (६)

नहुष ने कहा-

"मैं युद्ध में खड़ा हूँ, देख मैं तुझे ही मारने आया हूँ। मैं तुझ पापी दानव का वध करूँगा।" (७) ऐसा कहकर नहुष ने अग्नि की शिखा के समान बाण उठाए। छत्र से युक्त रथ पर बैठे हुए वे युद्धभूमि में अत्यंत सुशोभित हो रहे थे। (८) उन्होंने इन्द्र के दिव्य सारथि मातलि से कहा— "आप मेरा रथ हुण्ड के सामने ले चलें।" (९) वीर नहुष के कहने पर शीघ्रगामी मातलि ने वायु के समान वेग वाले घोड़ों को हांका। (१०) वे घोड़े आकाश में हंसों की भांति उड़ने लगे। चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र और ध्वजा से युक्त उस रथ पर बैठे हुए राजा के पुत्र नहुष आकाश में सूर्य के समान सुशोभित हो रहे थे। (११-१२)

​उधर हुण्ड भी अपने तेज से चमकता हुआ, सभी अस्त्रों से सुसज्जित होकर वीर व्रत में स्थित था। (१३) उन दोनों वीरों के बीच ऐसा दारुण और भयभीत कर देने वाला युद्ध हुआ जिसे देखकर देवता भी चकित रह गए। (१४) हुण्ड ने तीखे बाणों से राजा की भुजाओं के बीच प्रहार किया। (१५) ललाट (माथे) पर पाँच बाण लगने से राजा क्रोधित हो उठे। बाणों से बिंधे हुए वे राजा और भी अधिक शोभा पाने लगे। (१६) रक्त से सने हुए और सुवर्णमय बाणों से युक्त शरीर वाले राजा नहुष ऐसे लग रहे थे मानो किरणों से युक्त उदित होता हुआ सूर्य हो। (१७-१८)

​नहुष ने अपना पौरुष दिखाते हुए दैत्य से कहा— "ठहरो दैत्य! अब मेरी फुर्ती देखो।" ऐसा कहकर उन्होंने दस बाणों से उस पर प्रहार किया। (१९) मुख और मस्तक पर चोट लगने से महाबली हुण्ड रथ पर ही मूर्छित होकर गिर पड़ा। (२०) यह देखकर देवताओं और सिद्धों ने हर्ष के साथ 'जय-जय' का घोष किया और शंख बजाए। (२१) देवताओं के उस कोलाहल से मूर्छित हुण्ड की चेतना वापस आ गई। (२२) वह पुनः धनुष और विषैले सांप के समान बाण लेकर उठा और बोला— "रुको, मैं मरा नहीं हूँ!" (२३)

​हुण्ड ने पुनः फुर्ती दिखाते हुए नहुष पर २१ बाण चलाए। (२४) एक बाण मुष्टि (धनुष की मुट्ठ) पर, चार बाहुओं पर, चार घोड़ों पर, एक छत्र पर, (२५) पाँच मातलि पर, सात रथ के मध्य भाग पर और तीन बाण ध्वजा पर मारे। (२६) उस दुष्टात्मा का बाण चलाने का कौशल और फुर्ती देखकर देवता भी विस्मित हो गए। (२७) राजा नहुष ने भी उसके पौरुष की प्रशंसा करते हुए कहा— "तुम शूरवीर हो, शिक्षित हो और युद्ध में पंडित हो।" (२८)

​ऐसा कहकर राजा ने धनुष की प्रत्यंचा खींची और दस बाणों से उसे बींध डाला। (२९) तीन बाणों से उसकी ध्वजा काट दी, चार से उसके घोड़ों को मार गिराया। (३०) एक बाण से उसका छत्र काट दिया और दस बाणों से उसके सारथि को यमलोक भेज दिया। (३१) फिर उसके कवच को छिन्न-भिन्न कर तीस बाणों से दानवराज के अंगों को बींध दिया। (३२) घोड़ा और रथ छिन जाने पर भी वह दैत्य हाथ में तलवार और ढाल लेकर राजा की ओर दौड़ा। (३३-३४) राजा ने तीक्ष्ण बाणों से उसकी तलवार और ढाल के भी टुकड़े कर दिए। (३५)

​तब हुण्ड ने मुदगर (गदा जैसा हथियार) उठाया और राजा की ओर फेंका। (३६) राजा ने आकाश में ही उस मुदगर के अपने बाणों से दस टुकड़े कर दिए। (३७) मुदगर को विफल देख वह हाथ में गदा लेकर दौड़ा। (३८) राजा ने तीक्ष्ण तलवार से उसकी वह भुजा ही काट दी जिसमें गदा थी। (३९) महान गर्जना करता हुआ और रक्त से लथपथ वह दैत्य क्रोध में भरकर राजा को निगलने के लिए दौड़ा। (४०-४१) तब नहुष ने एक महाशक्ति (अस्त्र) से उसके हृदय पर प्रहार किया, जिससे वह दैत्य वज्र से कटे पहाड़ की तरह भूमि पर गिर पड़ा। (४२)

​उसके गिरते ही बाकी दानव किलों और पाताल में छिप गए। (४३) उस महापापी के मारे जाने पर देवता, गन्धर्व और सिद्ध अत्यंत प्रसन्न हुए। (४४) इस प्रकार महायुद्ध में हुण्ड का वध कर और अपनी तपस्या से बढ़ी हुई उस देवरूपा (अशोकसुन्दरी) को प्राप्त कर राजा नहुष अत्यंत हर्षित हुए। (४५)

व्याकरण सम्बन्धी टिप्पणियाँ (Grammar Analysis)

१. संधि विच्छेद (Sandhi):

  • ततस्त्वसौ: ततः + तु + असौ (विसर्ग और यण संधि)
  • यथैव: यथा + एव (वृद्धि संधि)
  • नृपनंदनम्: नृप + नंदनम् (संयोग/समास)
  • स्थितोस्मि: स्थितः + अस्मि (विसर्ग संधि - उत्व)
  • इत्युक्त्वा: इति + उक्त्वा (यण संधि)
  • चोदयामास: चोदयम् + आस (लिट् लकार प्रयोग)
  • यथांबरे: यथा + अम्बरे (दीर्घ संधि)

२. महत्त्वपूर्ण शब्द और धातु रूप (Verb & Noun Forms):

  • निजघान: 'हन्' धातु, लिट् लकार (पररोक्ष भूतकाल), प्रथम पुरुष, एकवचन। (अर्थ: मारा)
  • अब्रवीत्: 'ब्रू' धातु, लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल), प्रथम पुरुष, एकवचन। (अर्थ: बोला)
  • विस्फार्य: वि + स्फुर् + णिच् + ल्यप् प्रत्यय। (अर्थ: फैलाकर/खींचकर)
  • विचिच्छिदे: वि + छिद् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद। (अर्थ: काट दिया)
  • जग्राह: 'ग्रह्' धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन। (अर्थ: पकड़ा)

३. समास (Compounds):

  • महाप्राज्ञं: महान् प्राज्ञः यः सः (बहुव्रीहि) - अत्यंत बुद्धिमान।
  • पापचेतनम्: पापा चेतना यस्य सः (बहुव्रीहि) - जिसकी बुद्धि पापी हो।
  • अग्निशिखोपमान्: अग्नेः शिखा इव उपमा येषाम् (बहुव्रीहि) - अग्नि की ज्वाला के समान।
  • खड्गचर्मधरो: खड्गं च चर्म च धरति इति (उपपद तत्पुरुष) - तलवार और ढाल को धारण करने वाला।

४. प्रत्यय (Suffixes):

  • समुद्यतश्च: सम् + उत् + यम् + क्त (भूतकाल अर्थ में)।
  • दृष्ट्वा: दृश् + क्त्वा (देखकर)।
  • ताडितो: तड् + क्त (पीटा गया/प्रहार किया गया)।
  • प्रवर्द्धिताम्: प्र + वृध् + णिच् + क्त + टाप् (बढ़ाई हुई)।

पद्म पुराण के भूमिखण्ड का यह 116वाँ अध्याय महाराज नहुष और अशोकसुन्दरी के विवाह तथा उनके पुनर्मिलन की कथा को दर्शाता है। नीचे इसका विस्तृत हिन्दी अनुवाद और महत्वपूर्ण संस्कृत व्याकरण पक्ष दिया गया है:

​📄 हिन्दी अनुवाद

कुंजल ने कहा—

पुण्यात्मा अशोकसुन्दरी रंभा के साथ हर्षित होकर पराक्रमी नहुष के पास पहुँचीं और उस तपस्विनी ने उनसे कहा— "हे वीर! मैं देवताओं द्वारा आपकी पत्नी के रूप में नियुक्त की गई हूँ। यदि आप धर्म की इच्छा रखते हैं, तो शास्त्रानुसार मुझसे विवाह करें। मैं तपस्या में स्थित होकर सदैव आपका ही चिन्तन करती रही हूँ। आज धर्म के प्रसाद से मैंने आपको प्राप्त किया है।" (श्लोक 1-3)

नहुष बोले—

"हे भद्रे! यदि तुम मेरे लिए ही तपस्या में लीन थी, तो मैं गुरु की आज्ञा से अभी इसी मुहूर्त में तुम्हारा भर्ता (पति) बनता हूँ।" इसके बाद नहुष ने उन मनोरम अशोकसुन्दरी और रंभा को श्रेष्ठ रथ पर बिठाया और तीव्र वेग से महर्षि वशिष्ठ के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। (श्लोक 4-6)

विवाह और पुनर्मिलन—

आश्रम पहुँचकर नहुष ने वशिष्ठ मुनि को प्रणाम किया और युद्ध में अधम दानव (हुण्ड) के वध का सारा वृत्तांत सुनाया। वशिष्ठ जी ने नहुष के पराक्रम को सुनकर उन्हें आशीर्वाद दिया और शुभ लग्न व तिथि में अग्नि और ब्राह्मणों की उपस्थिति में उन दोनों का विवाह संपन्न कराया। मुनि ने नवदम्पत्ति को आशीर्वाद देकर कहा— "हे महामते! अब शीघ्र जाकर अपने माता-पिता के दर्शन करो। तुम्हें देखकर तुम्हारे माता-पिता उसी प्रकार हर्षित होंगे जैसे पूर्णिमा के चंद्रमा को देखकर समुद्र उमड़ता है।" (श्लोक 7-12)

अयोध्या में सूचना—

मुनि की आज्ञा पाकर नहुष मातलि के साथ रथ पर सवार होकर अपनी नगरी की ओर चले। उधर देवताओं ने मेनका नाम की अप्सरा को राजा आयु की पत्नी इन्दुमती के पास भेजा, जो पुत्र-वियोग में शोकग्रस्त थीं। मेनका ने उनसे कहा— "देवी! शोक त्याग दो, तुम अपने पुत्र और वधू को देखने वाली हो। तुम्हारे पुत्र ने पापी दानव का वध कर दिया है और वह वीर-लक्ष्मी के साथ सभा में आ रहा है।" (श्लोक 13-18)

राजा आयु का संतोष—

मेनका की बात सुनकर इन्दुमती प्रसन्न हो गईं। उन्होंने राजा आयु को यह शुभ समाचार सुनाया। राजा ने कहा— "हे देवी! मुनि नारद ने पहले ही कहा था कि पुत्र के लिए शोक मत करो, वह दानव को मारकर वापस आएगा। उनका वचन मिथ्या कैसे हो सकता है? हमने पहले भगवान दत्तात्रेय की सेवा की थी, उन्हीं के वरदान से हमें विष्णु के अंश वाला यह पुत्र प्राप्त हुआ है।" इसके बाद राजा ने पुत्र के आगमन की खुशी में भारी महोत्सव मनाया और भगवान विष्णु का स्मरण किया। (श्लोक 19-31)

​⚙️ संस्कृत व्याकरण (प्रमुख अंश)

​इस अध्याय में प्रयुक्त कुछ महत्वपूर्ण व्याकरणिक प्रयोग निम्नलिखित हैं:

​1. सन्धि विच्छेद (Sandhi Split)

  • तमुवाच: तम् + उवाच (व्यञ्जन सन्धि)
  • मया प्राप्तो नृपोत्तम: मया + प्राप्तः + नृप + उत्तमः (विसर्ग और गुण सन्धि)
  • मुनिपुंगवः: मुनि + पुंगवः (संयोग/समास)
  • पुत्रापहारकम्: पुत्र + अपहारकम् (दीर्घ सन्धि)
  • महोत्सवम्: महा + उत्सवम् (गुण सन्धि)

​2. प्रत्यय (Suffixes)

  • विक्रान्तम्: वि + क्रम् + क्त (विशेषण के रूप में)
  • श्रुत्वा: श्रु + क्त्वा (सुनकर)
  • विचेष्टितम्: वि + चेष्ट् + क्त (कृत्य/कार्य)
  • द्रष्टुम्: दृश् + तुमुन् (देखने के लिए)
  • निहत्य: नि + हन् + ल्यप् (मारकर)

​3. समास (Compounds)

  • अशोकसुन्दरी: अशोकस्य सुन्दरी (षष्ठी तत्पुरुष)
  • अग्निब्राह्मणसन्निधौ: अग्निः च ब्राह्मणः च तयोः सन्निधिः (द्वन्द्व एवं तत्पुरुष)
  • महातेजा: महत तेजः यस्य सः (बहुव्रीहि - महान तेज वाला)
  • शोकसागरे: शोकः एव सागरः (रूपक/कर्मधारय - शोक रूपी सागर)

​4. शब्द रूप एवं धातु रूप

  • प्राप्य: प्र + आप् + ल्यप् (प्राप्त करके)।
  • गच्छाव: गम् धातु, लट् लकार (आज्ञा/निश्चय के अर्थ में यहाँ लोट् जैसी विवक्षा), उत्तम पुरुष, द्विवचन।
  • दत्तः: दा धातु + क्त प्रत्यय (दिया गया)।

विशेष टिप्पणी:

​इस अध्याय का मुख्य संदेश दैवीय कृपा (दत्तात्रेय का वरदान) और तपस्या की शक्ति है। नहुष को "वैष्णवांश" (भगवान विष्णु का अंश) बताया गया है, जो अधर्म के विनाशक के रूप में प्रकट होते हैं।********


यहाँ पद्मपुराणम् (भूमिखण्ड) के अध्याय ११६ का सप्रसंग हिन्दी अनुवाद और व्याकरण संबंधी विश्लेषण दिया गया है:

प्रसंग एवं सारांश

​इस अध्याय में नहुष और अशोकसुंदरी के मिलन तथा उनके विवाह का वर्णन है। नहुष ने हुण्ड दैत्य का वध करने के पश्चात् रम्भा और अशोकसुंदरी के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम की यात्रा की। वहाँ वशिष्ठ जी ने विधि-विधान से उनका विवाह सम्पन्न कराया। अंत में नहुष अपनी पत्नी के साथ माता-पिता (आयु और इन्दुमती) के पास लौटते हैं, जहाँ हर्षोल्लास के साथ उनका स्वागत होता है।

श्लोकानुसार हिन्दी अनुवाद

कुञ्जल ने कहा—

पुण्यात्मा अशोकसुंदरी रम्भा के साथ हर्षित हुई और पराक्रमी नहुष को प्राप्त कर उस तपस्विनी ने उनसे कहा— "हे वीर! मैं देवताओं द्वारा आपकी पत्नी नियुक्त की गई हूँ। यदि आप धर्म की इच्छा रखते हैं, तो मुझसे विवाह करें। मैं तपस्या में स्थित होकर सदैव आपका ही चिन्तन करती रही हूँ। आज धर्म के प्रसाद से मैंने आपको प्राप्त किया है।" (१-३)

नहुष ने कहा—

"हे भद्रे! यदि तुम मेरे लिए ही तपस्या में लीन थी, तो मैं गुरु की आज्ञा से इसी मुहूर्त में तुम्हारा भर्ता (पति) बनता हूँ। हे भामिनि! हम दोनों इस मनोरम रम्भा के साथ चलते हैं।" ऐसा कहकर महायशस्वी नहुष ने उन दोनों को रथ पर बैठाया और वेगपूर्वक वशिष्ठ जी के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। (४-६)

विवाह और गुरु की आज्ञा—

आश्रम पहुँचकर नहुष ने मुनि को प्रणाम किया। उन्होंने वशिष्ठ जी को युद्ध का सारा वृत्तांत सुनाया कि किस प्रकार उस अधम दानव का वध हुआ। वशिष्ठ जी ने प्रसन्न होकर शुभ तिथि और लग्न में अग्नि एवं ब्राह्मणों की उपस्थिति में उन दोनों का विवाह संस्कार संपन्न कराया। (७-१०)

​मुनि ने आशीर्वाद देकर कहा— "हे महामते! अब शीघ्र जाकर अपने माता-पिता के दर्शन करो। तुम्हें देखकर तुम्हारे माता-पिता उसी प्रकार हर्ष से प्रफुल्लित होंगे जैसे पूर्णिमा के चंद्रमा को देखकर सागर उमड़ता है।" मुनि की आज्ञा पाकर नहुष मातलि के साथ अपने नगर की ओर चल दिए। (११-१४)

माता इन्दुमती का हर्ष—

उधर देवताओं ने मेनका नामक अप्सरा को रानी इन्दुमती के पास भेजा, जो पुत्र-वियोग में शोकग्रस्त थीं। मेनका ने उनसे कहा— "हे महाभागे! शोक त्यागिए, अपने पुत्र और वधू को देखिए। वह पापी दानव मारा गया और आपका पुत्र वीरश्री के साथ लौट रहा है।" यह सुनकर रानी गद्गद हो गईं और प्रसन्नतापूर्वक राजा आयु को यह शुभ समाचार सुनाया। (१५-२२)

राजा आयु का संतोष—

राजा ने कहा— "हे प्रिये! पूर्व में मुनि नारद ने कहा था कि पुत्र के लिए शोक न करें, वह दानव को मारकर लौटेगा। उनकी वाणी असत्य कैसे हो सकती है? हमने भगवान दत्तात्रेय की सेवा की थी, जिन्होंने हमें वैष्णव अंश से युक्त यह पुत्र रत्न दिया है। वह सदैव दैत्यों का संहारक और प्रजापालक होगा।" इसके पश्चात् राजा ने पुत्र के आगमन की खुशी में भारी महोत्सव मनाया और भगवान विष्णु का स्मरण किया। (२३-३१)

व्याकरण सम्बन्धी विश्लेषण

१. प्रमुख संधि विच्छेद

  • मया प्राप्तो (मया + प्राप्तः): यहाँ विसर्ग संधि (उत्व) है।
  • वशिष्ठस्याश्रमं (वशिष्ठस्य + आश्रमम्): दीर्घ स्वर संधि (अ + आ = आ)।
  • मुनिपुंगवः (मुनि + पुंगवः): उपपद तत्पुरुष समास युक्त पद।
  • तयोस्तु (तयोः + तु): विसर्ग का 'स्' (सत्व संधि)।
  • पुत्रापहारकम् (पुत्र + अपहारकम्): दीर्घ संधि।

२. समास विग्रह

  • अशोकसुंदरी: अशोक इव सुंदरी (कर्मधारय)।
  • महायशाः: महत् यशः यस्य सः (बहुव्रीहि - महान यश वाला)।
  • धर्मप्रसादेन: धर्मस्य प्रसादः, तेन (षष्ठी तत्पुरुष)।
  • पुत्ररत्नम्: पुत्र एव रत्नम् (रूपक कर्मधारय)।
  • पापचेतनम्: पापा चेतना यस्य तम् (बहुव्रीहि - जिसकी बुद्धि पापी हो)।

३. प्रत्यय विचार

  • विक्रांतं: वि + क्रम् + क्त (विशेषण रूप में)।
  • समाकर्ण्य: सम् + आ + कर्ण् + ल्यप् (सुनकर)।
  • विचेष्टितम्: वि + चेष्ट् + क्त (चेष्टा या कार्य)।
  • दृष्ट्वा: दृश् + क्त्वा (देखकर)।
  • संप्रेषितो: सम् + प्र + इष् + क्त (भेजा गया)।

४. क्रिया रूप एवं कारक

  • उवाच: ब्रू धातु, लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल), प्रथम पुरुष, एकवचन।
  • उद्वाहयस्व: उत् + वह् + लोद् लकार (आज्ञा), मध्यम पुरुष, एकवचन (आत्मनेपद)।
  • गच्छाव: गम् धातु, लोट् लकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन (हम दोनों चलें)।
  • सस्मार: स्मृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन (स्मरण किया)।

विशेष टिप्पणी-

​इस अध्याय में 'वैष्णवांश' शब्द का प्रयोग महत्वपूर्ण है, जो नहुष की दिव्यता को सिद्ध करता है। अंत में दिया गया श्लोक (३१) मालिनी छंद या स्तोत्र शैली में है, जो भगवान विष्णु की स्तुति करता है, जिन्हें "आनंदरूप" और "क्लेशापहं" (दुखों को हरने वाला) कहा गया है।


'दृश् (पश्य)' धातु, शतृ प्रत्यय, षष्ठी विभक्ति, एकवचन। (देखते हुए के)