राजपूतों की उत्पत्ति और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: एक विश्लेषण
परिचय
भारतीय इतिहास में राजपूतों की उत्पत्ति, उनके वंश और विभिन्न जातियों के साथ उनके संबंधों को लेकर समय-समय पर अनेक पौराणिक ग्रंथों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों से चर्चा होती रही है। प्रस्तुत आलेख में ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण और विभिन्न इतिहासकारों के मतों के आधार पर राजपूतों की उत्पत्ति से जुड़े विभिन्न पहलुओं का संकलन किया गया है।
1. पौराणिक ग्रंथों में उत्पत्ति के संदर्भ
विभिन्न धार्मिक एवं पौराणिक ग्रंथों में राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग आख्यान मिलते हैं:
- ब्रह्मवैवर्त पुराण (ब्रह्मखण्ड, अध्याय १०, श्लोक १११):
- क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह।
- राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।११०।
- ब्रह्मवैवर्तपुराण (ब्रह्मखण्डः)अध्यायः(१०) का श्लोकसंख्या-( ११० )इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे जातिसम्बन्धनिर्णयो नाम दशमोऽध्यायः ।१०।
- इस ग्रंथ के अनुसार क्षत्रिय पुरुष से करण (चारण) कन्या में 'राजपुत्र' की उत्पत्ति बताई गई है, तथा राजपुतानी में करण पुरुष से 'आगरी' (नमक बनाने वाले या बंजारे से संबंधित समूह) की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है।
- स्कन्द पुराण (सह्याद्रि खण्ड, अध्याय २६): इस खंड में वर्णन है कि क्षत्रिय पुरुष द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न संतान को राजपूत कहा गया है, जो युद्ध-कला में कुशल, शस्त्र विद्या के जानकार और शूद्र धर्म से जुड़े माने गए हैं।
- पराशर स्मृति: स्मृति ग्रंथों में वैश्य पुरुष और अम्बष्ठ कन्या से राजपुत्र की उत्पत्ति का संदर्भ भी दिया गया है, जिसे लेकर समाज में विभिन्न मत प्रचलित रहे हैं।
2. ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण
- मोहम्मद कासिम फ़िरिश्ता का मत: सोलहवीं सदी के फारसी इतिहासकार फ़िरिश्ता ने अपने ग्रंथ 'तारीख़-ए-फ़िरिश्ता' में लिखा है कि राजाओं द्वारा अपनी वैध पत्नियों के अतिरिक्त अन्य माध्यमों या दासियों से उत्पन्न संतानों को सिंहासन का पूर्ण वैध उत्तराधिकारी नहीं माना जाता था, किंतु वे राजाओं के पुत्र या 'राजपूत' कहलाए।
- आधुनिक समाजशास्त्रीय विश्लेषण: विद्वानों और समाजशास्त्रियों के अनुसार, कालान्तर में 'राजपूत' कोई एक एकल जाति न रहकर विभिन्न जनसांख्यिकीय समूहों और समुदायों का एक संघ या समूह बन गया। इसमें चारण, भाट, और विभिन्न क्षेत्रीय व कामकाजी जन-जातियाँ समय के साथ समाहित होती चली गईं।
3. विभिन्न जातियों एवं उपनामों का उद्भव
इतिहास और समाज के विकास क्रम में कई जातियों ने अपनी वंशावली और नामकरण को लेकर विभिन्न परंपराओं का उल्लेख किया है:
- चारण और भाट: ये ऐतिहासिक रूप से राजवंशों की वंशावलियाँ लिखने और उनका यशगान करने वाले समुदाय के रूप में जाने जाते रहे हैं, जिनकी कुलदेवी करणी माता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
- बंजारा समुदाय: ऐतिहासिक रूप से खानाबदोश और व्यापार से जुड़े इस समूह के कई उपसमूह समय के साथ कृषि और अन्य व्यवसायों से जुड़े।
- अन्य उपनाम और राजवंश: जादौन, जाडेजा, और सैनी जैसे समुदायों के उद्भव और उनके ऐतिहासिक नामों (जैसे शूरसेन या सैन्य सेवाओं से जुड़ाव) को लेकर भी विभिन्न इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के बीच अलग-अलग मत और समीक्षाएँ मौजूद हैं।
निष्कर्ष
राजपूतों की उत्पत्ति से संबंधित जहाँ एक ओर पौराणिक ग्रंथों में वर्ण-संकरता और विभिन्न कन्याओं से संतानों के जन्म के आख्यान मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण इसे विभिन्न जातियों, समूहों और योद्धाओं के एक बड़े समागम व संघ के रूप में देखता है। वंशावलियों और इतिहास के इन विभिन्न पन्नों का अध्ययन हमें भारतीय समाज की जटिल और बहुपरत सामाजिक संरचना को समझने में सहायता करता है।
राजपुत्र के क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या के गर्भ में उत्पन्न होने का वर्णन (शब्दकल्पद्रुम) में भी आया है-
"करणकन्यायां क्षत्त्रियाज्जातश्च इति पुराणम् ॥" अर्थात:- क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या में उतपन्न संतान...
यूरोपीय विश्लेषक मोनियर विलियमस् ने भी लिखा है कि-
A rajpoot,the son of a vaisya by an ambashtha or the son of Kshatriya by a karan...
~A Sanskrit English Dictionary:Monier-Williams, page no. 873
शब्दकल्पद्रुम व वाचस्पत्य में भी एक अन्य स्थान पर भी राजपुत्र शब्द जातिसूचक शब्द के रूप में आया है; जो कि इस प्रकार है:-
३- वर्णसङ्करभेदे राजपुत्र “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां
राजपुत्रस्य सम्भवः” इति पराशरःसंहिता ।
अर्थात:- वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उतपन्न होता है।
राजपूत शब्द हमें स्कंद पुराण के सह्याद्री खण्ड में भी देखने को मिलता है जो कि इस प्रकार एक वर्णसंकर जाति के अर्थ में है-
"शय्या विभूषा सुरतं भोगाष्टकमुदाहृतम्। शूद्रायां क्षत्रियादुग्रः क्रूरकर्मा प्रजायते।।४७।।
"शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्रामकुशलो भवेत्।तया वृत्त्या स जीवेद्यो शूद्रधर्मा प्रजायते।।४८।।
राजपूत इति ख्यातो युद्धकर्मविशारदः।वैश्य धर्मेण शूद्रायां ज्ञात वैतालिकाभिध:।४९ ।
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उपर्युक्त सन्दर्भ:-(स्कन्दपुराण- आदिरहस्य सह्याद्रि-खण्ड- व्यास देव व सनत्कुमार का संकर जाति विषयक संवाद नामक २६ वाँ अध्याय-श्लोक संख्या- ४७,४८,४९ पर राजपूतों की उत्पत्ति वर्णसंकर के रूप में है ।
( भावार्थ:-क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;
और शस्त्र- वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है) कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है।
लेकिन अमरकोष में राजपूत और क्षत्रिय शब्द को परस्पर पर्यायवाची नही बतलाया है; स्वयं देखें-
"मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो क्षत्रियो बाहुजो विराट्।(राजा राट् पार्थिवक्ष्मा भृन्नृपभूपमहीक्षित:।।
-अमरकोष
अर्थात:मूर्धाभिषिक्त,राजन्य,बाहुज,क्षत्रिय,विराट्,राजा,राट्,पार्थिव,क्ष्माभृत्,नृप,भूप,और महिक्षित ये क्षत्रिय शब्द के पर्याय है।
इसमें 'राजपूत' शब्द या तदर्थक कोई अन्य शब्द नहीं आया है।
पुराणों के निम्न श्लोक को पढ़ें-
"सद्यः क्षत्रियबीजेन राजपुत्रस्य योषिति। बभूव तीवरश्चैव पतितो जारदोषतः।।
-ब्रह्मवैवर्तपुराण / (ब्रह्मखण्डः)/अध्यायः १०/श्लोकः (९९)
भावार्थ:-क्षत्रिय के बीज से राजपुत्र की स्त्री में तीवर उत्पन्न हुआ।वह भी व्याभिचार दोष के कारण पतित कहलाया।
यदि क्षत्रिय और राजपूत परस्पर पर्यायवाची शब्द होते तो क्षत्रिय पुरुष और राजपूत स्त्री की संतान राजपूत या क्षत्रिय ही होती न कि तीवर या धीवर ! इसके अतिरिक्त शब्दकल्पद्रुम में राजपुत्र को वर्णसंकर जाति लिखा है ।
जबकि क्षत्रिय वर्णसंकर नही...
Manohar Laxman varadpande(1987). History of Indian theatre: classical theatre. Abhinav Publication. Page number 290
"The word kshatriya is not synonyms with Rajput."
अर्थात- क्षत्रिय शब्द राजपूत का पर्यायवाची नहीं है। मराठी इतिहासकार कालकारंजन ने अपनी पुस्तक (प्राचीन- भारताचा इतिहास) के हर्षोत्तर उत्तर भारत नामक विषय के प्रष्ठ संख्या (३३८ में राजपूत और वैदिक क्षत्रिय भिन्न भिन्न बतलाये हैं।
वैदिक क्षत्रियों द्वारा पशुपालन करने का उल्लेख धर्म ग्रंथों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है जबकि राजपूत जाति पशुपालन को अत्यंत घृणित दृष्टि से देखती है और पशुपालन के प्रति संकुचित मानसिकता रखती है...
महाभारत में जरासंध पुत्र सहदेव द्वारा गाय भैंस भेड़ बकरी को युधिष्ठिर को भेंट करने का उल्लेख मिलता है;युधिष्ठिर जो कि एक क्षत्रिय थे पशु पालन करते होंगे तभी कोई भेंट में पशु देगा-
★सहदेव-उवाच★
इमे रत्नानिभूरिणी गोजाविमहिषादयः।।
हस्तिनोऽश्वाश्च गोविन्द वासांसि विविधानिच।
दीयतां धर्मराजाय यथा वा मन्यतेभवान्
~महाभारत सभापर्व(जरासंध वध पर्व)अध्याय: २४श्लोक: ४१-सहदेव ने कहा- प्रभो! ये गाय, भैंस, भेड़-बकरे आदि पशु, बहुत से रत्न, हथी-घोड़े और नाना प्रकार के वस्त्र आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। गोविन्द! ये सब वस्तुएँ धर्मराज युधिष्ठिर को दीजिये अथवा आपकी जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझ सवा के लिये आदेश दीजिये। इसके अतिरिक्त कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता ७/१/४/९ में क्षत्रिय को भेड़ पालने के लिए कहा गया है।
कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत एक संघ है
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है-
Brajadulal Chattopadhyay 1994; page number 60- प्रारंभिक मध्ययुगीन साहित्य बताता है कि इस नवगठित राजपूत में कई जातियों के लोग शामिल थे। भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने इस ऐतिहासिक तथ्य का पूर्णतः पता लगा लिया है कि जिस काल में इस जाति का भारत के राजनैतिक क्षेत्र में पदार्पण हुआ था, उस काल में यह एक नवागन्तुक जाति समझती जाती थी। बंगाल के अद्वितीय विद्वान स्वर्गीय श्री रमेशचंद्र दत्त महोदय अपने (Civilization in Ancient India) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ के भाग-२ , प्रष्ठ १६४ में लिखते है-
आठवीं शताब्दी के पूर्व राजपूत जाति हिंदू आर्य नहीं समझी जाती थी। देश के साहित्य तथा विदेशी पर्यटकों के भृमण वृत्तान्तों में उनके नाम का उल्लेख हम लोगों को नहीं मिलता और न उनकी किसी पूर्व संस्कृति के चिन्ह देखने में आते हैं।
डॉक्टर एच० एच० विल्सन् ने यह निर्णय किया है कि ये(राजपूत)उन शक आदि विदेशियों के वंशधर है जो विक्रमादित्य से पहले,सदियों तक भारत में झुंड के झुंड आये थे।
विदेशी जातियां शीघ्र ही हिंदू बन गयी।वे जातियाँ अथवा कुटुम्ब जो शासक पद को प्राप्त करने में सफल हुए हिंदुओं की राज्यशासन पद्धति में क्षत्रिय बनकर तुरन्त प्रवेश कर गए।इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर के परिहार तथा अनेक अन्य राजपूत जातियों का विकास उन बर्बर विदेशियों से हुआ है, जिनकी बाढ़ पाँचवीं तथा छठी शताब्दीयों में भारत में आई थी।
इतिहास-विशारद स्मिथ साहब अपने Early History of India including Alexander's Compaigns, second edition,page no. 303 and 304 में लिखते हैं-
आगे दक्षिण की ओर से बहुत सी आदिम अनार्य जातियों ने भी हिन्दू बनकर यही सामाजिक उन्नति प्राप्त कर ली,जिसके प्रभाव से सूर्य और चंद्र के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाली वंशावलियों से सुसज्जित होकर गोड़, भर,खरवार आदि क्रमशः चन्देल, राठौर,गहरवार तथा अन्य राजपूत जातियाँ बनकर निकल पड़े।
इसके अतिरिक्त स्मिथ साहब अपने The Oxford student's history of India, Eighth Edition, page number 91 and 92 में लिखते हैं- उदाहरण के लिए अवध की प्रसिद्ध राजपूत जाति जैसों को लीजिये।ये भरों के समीपी सम्बन्धी अथवा अन्य इन्हीं की संतान हैं।आजकल इन भरों की प्रतिनिधि, अति ही नीची श्रेणी की एक बहुसंख्यक जाति है।
जस्टिस कैम्पबेल साहब ने लिखा है कि प्राचीन-काल की रीति-रिवाजों (आर्यों की) को मानने वाले जाट, नवीन हिन्दू-धर्म के रिवाजों को मानने पर राजपूत हैं।
जाटों से राजपूत बने हैं न कि राजपूतों से जाट। जबकि स्व० प्रसिद्ध इतिहासकार शूरवीर पँवार ने अपने एक शोध आलेख में गुर्जरों को राजपूतों का पूर्वज माना है।
मुहम्मद कासिम फरिश्ता ने भी राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में फ़ारसी में अपनी पुस्तक
"तारीक ऐ फरिश्ता" में अपना मत प्रस्तुत किया है इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया -
Lt Colonel John Briggs ने जो मद्रास आर्मी में थे, किताब के पहले वॉल्यूम ( Volume - 1 ) के Introductory Chapter On The Hindoos में पेज नंबर 15 पर लिखा है-
The origion of Rajpoots is thus related The rajas not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves who although not legitimate successors to the throne ,were Rajpoots or the children of the rajas "अर्थात:- राजा अपनी पत्नियों से संतुष्ट नहीं थे, उनकी महिला दासियो द्वारा अक्सर बच्चे होते थे, जो सिंहासन के लिए वैध उत्तराधिकारी नहीं थे, लेकिन इनको राजपूत या राजा के बच्चे या राज पुत्र कहा जाता था । प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद जी ने अपनी पुस्तक- "A Short History Of Muslim Rule In India" के पेज नंबर 19 पर बताया है की राजपुताना में किसको बोला जाता है राजपूत-
The word Rajput in comman paralance,in certain states of Rajputana is used to denote the illegitimate sons of a Ksatriya chief or a jagirdar.-अर्थात:-राजपुताना के कुछ राज्यों में आम बोल चाल में राजपूत शब्द का प्रयोग एक क्षत्रिय मुखिया या जागीरदार के नाजायज बेटों को सम्बोधित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। विद्याधर महाजन जी ने अपनी पुस्तक "Ancient India" जो की 1960 से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाई जा रही है , के पेज 479 पर लिखा है:-The word Rajput is used in certain parts of Rajasthan to denote the illegitimate sons of a Kshatriya Chief ar Jagirdar. अर्थात:- राजपूत शब्द राजस्थान के कुछ हिस्सों में एक क्षत्रिय प्रमुख या जागीरदार के नाजायज बेटों को निरूपित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
History of Rise of Mohammadan power in India, volume 1, chapter 8
The Rajas, not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves, who, although not legitimate successors to the throne,were styled rajpoots, or the children of the rajas.
The muslim Invaders took full advantage of this realy bad and immoral practice popular among indian kings, to find a good alley among hindoos and to also satisfy their own lust and appointed those son of kings as their Governors.
During mugal period this community became so powerful that they started abusing their own people motherland.
History of Rajsthan book "He was son of king but not from the queen."
राजस्थान का इतिहास भाग-1:-गोला का अर्थ दास अथवा गुलाम होता है।
भीषण दुर्भिक्षों के कारण राजस्थान में गुलामों की उत्पत्ति हुई थी। इन अकालों के दिनों में हजारों की संख्या में मनुष्य बाजारों में दास बनाकर बेचे जाते थे। पहाड़ों पर रहने वाली पिंडारी और दूसरी जंगली जातियों के अत्याचार बहुत दिनों तक चलते रहे और उन्हीं जातियों के लोगों के द्वारा बाजारों में दासों की बिक्री होती थी, वे लोग असहाय राजपूतों को पकड़कर अपने यहाँ ले जाते थे और उसके बाद बाजारों में उनको बेच आते थे। इस प्रकार जो निर्धन और असहाय राजपूत खरीदे और बेचे जाते थे, उनकी संख्या राजस्थान में बहुत अधिक हो गयी थी और उन लोगों की जो संतान पैदा होती थी, वह गोला के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन गुलाम राजपूतों को गोला और उनकी स्त्रियों तथा लड़कियों को गोली कहा जाता था। इन गोला लोगों में राजपूत, मुसलमान और अनेक दूसरी जातियों के लोग पाये जाते हैं।