मंगलवार, 15 सितंबर 2026

बोल आजादपुर वाली मइया की जय! बोल आजादपुर वाली मइया की जय!

जनपद अलीगढ़ के गाँव आजादपुर में काली नदी के समीप एक सिद्ध पीठ है -आजादपुर वाली मइया को समर्पित यह भक्ति गीत-

यादव योगेश कुमार रोहि द्वारा सर्जित है।

​राजस्थानी-हिमांचली लोक-कव्वाली: "तिश्नगी के बहाव"

विशेष संगीत संयोजन: राजस्थानी लोक संगीत (खड़ताल, मोरचंग, ढोलक की थाप) और हिमांचली लोक संगीत (बांसुरी, रबाब और नगाड़े की गूंज) के अनूठे मेल पर आधारित।

अंदाज: सूफी-कव्वाली, जिसमें बीच-बीच में लोक-लावणी और व्याख्यात्मक पुट (पैरोडी/कलाम) शामिल है।

​🎵 प्रस्तावना / टेक (आगाज)

(सांझा संगीत गूंजता है—राजस्थानी कालबेलिया धुन के साथ  तेजा जी गीत शैली का लम्हिबा आलाप-मांचली पहाड़ी हारमोनियम और बांसुरी की सुरीली तान। कव्वाल की आवाज़ गूंजती है...)

कव्वाल (मुख्य आवाज़):

साधु जो साधना करे, रोहि सन्त वही जो शान्त!

मुनि मनन मन से करे ! कुछ तपने के उपरान्त।

तपन जपन और साधु पन, तब पराजित होते सब आक्रन्त...

और मइया के दरबार में अर्जी लगाते हुए रोहि कहते हैं—

बोल आजादपुर वाली मइया की जय!

​🎶 मुखड़ा (स्थायी)

(ढोलक की द्रुत गति और खड़ताल की खनक के साथ कोरस गूंजता है)

​ईमान डिग जाते हैं रोहि ,जब तिश्नगी के बहावो में!

नूर-ए-सीरत मिट जाती है, तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन रह जाता है उसके  दावों में!

(संगीत का एक खूबसूरत लोक-अंतराल: राजस्थान की रेगिस्तानी प्यास और हिमाचल की ठंडी बयार का आभास कराता हुआ)

​📜 अन्तरा - 1 (व्याख्यात्मक पुट के साथ)

(हिमांचली लोक शैली के उतार-चढ़ाव में कव्वाल बोलता है)

​अय्याश की आश, जैसे अग्नि की प्यास!

शान्त होती नहीं कभी भी, न रहता होश-हबास।

मन को साधते रहो, निरन्तर करते रहो प्रयास! जरूर उपलब्धि होगी तुम्हें कोई खास ।।

कव्वाल की गुफ़्तगू (व्याख्या):

"अरे बंधु! इंसान जब अपनी असलियत भूलकर दिखावे की आग में कूदता है, तो उसे होश ही नहीं रहता कि वो खुद को जला रहा है या जिला रहा है..."


​आग ज़िंदा है अब तक, देखो आफताबों में!

ईमान डिग जाते हैं, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है, रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत हो गई है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में!

​📜 अन्तरा - 2

(राजस्थानी मांड शैली की महक के साथ)

​मन ही गुनाह-ओ-कुसूर का सबब है, रोहि इस मुल्को जहान में!

मन से दिक्कतें, मन से वरक्कतें, मन के ही किरदार, इन्सान में।

"रियाज़त-ए-ख़ुदा के सबक हैं, बस कन्हैया की किताबों में!"

​ईमान डिग जाते हैं, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है, रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत हो गई है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में

​📜 अन्तरा - 3

(पहाड़ी लोक धुन की तान और नगाड़े की गूंज)

​मोह और माया के जाल में, उलझ-उलझ कर हारा आदमी!

कहता मैंने खरीदा है आसमान और जमीं, है अक्ल का मारा आदमी।

बच नहीं पाया है हवश की आग से कोई, पतंगे सा झुलस गया ये आवारा आदमी!

कव्वाल की गुफ़्तगू (व्याख्या):

"चेहरे पर हँसी और दिल में लंपटता... यही आज के इस दौर का सबसे बड़ा सच बन गया है!"


​ढूँढता है सुकून, पर एक लम्पटता है इसके हाव-भावों में!

ईमान डिग जाते हैं रोहि, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि, तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में!

​📜 अन्तरा - 4

(ढोलक की थाप तेज होती है, कव्वाली अपने शबाब पर)

​झूठे रिश्तों की आड़ में, करता रहता है छल ये पल-पल!

पल-पल बदलता है ये मुखौटे, जब जाते हैं इसके मतलब निकल।

मौत का खौफ़ भी छुप जाता है, इसका मन्दिर की मूर्त के चढ़ावों में!

​ईमान डिग जाते हैं रोहि, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि, तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में

​📜 अन्तरा - 5 (समापन)

(राजस्थानी और हिमांचली दोनों वाद्यों का सम्मिलित तीव्र नाद)

​दुनियाँ की चौखट पर जो लोग सिर झुकाते हैं,

वे भीख मांगते हैं भिखारियों से गिड़गिड़ाते हैं।

वह लोग ईश्वर को रोहि, कहाँ ढूँढ़ पाते हैं?

​आदमी की जिन्दगी ढल जाती है, बस दिखावों में!

ईमान डिग जाते हैं रोहि, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि, सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में!

(संगीत की अंतिम लंबी गूंज और कोरस के साथ समापन)

स्क्रिप्ट के अनुरूप ताल व लय में कब्बाली ऑडियो जनरेट करें !

एक मुलाकात- गीत


बोल आजादपुर वाली मइया की जय!
बोल आजादपुर वाली मइया की जय!
छन्द:
साधु जो साधना करे ,रोहि सन्त वही जो शान्त!    मुनि मनन मन से करे ! कुछ तपने के उपरान्त।।
 तपन जपन और साधु पन, तब पराजित होते आक्रन्त।

(मुखड़ा)
ईमान डिग जाते हैं  रोहि जब तिश्नगी के बहावो में।
-नूर ए सीरत मिट जाती है ,तब सूरत के भावों में।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है।
एक खोखलापन होता है  उसके सारे दावों में ।
*******
अन्तरा -
अय्याश की आश, जैसे अग्नि की प्यास।        शान्त होती नही कभी भी ,
न रहता होशो हबास। मन को साधते रहो निरन्तर करते रहो प्रयास!

आग जिन्दा है अब तक देखों आफतावों में।
ईमान डिग जाते हैं,जब तिश्नगी के बहावो में।
नूर ए सीरत मिट जाती है ,रोहि तब सूरत के भावों में ।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होगयी है।
एक खोखलापन रह गया है, उसके सारे दावों में ।

अन्तरा-२--

मन ही  गुनाह ओ कुसूर का सबब है ।          रोहि इस मुल्को जहान में।
मन से दिक्कतें, मन से वरक्कतें। मन के ही  किरदार, इन्सान में। 
"रियाज़त ए ख़ुदा के सबक हैं बस कन्हैया की किताबों में। 
ईमान डिग जाते हैं, जब तिश्नगी के बहावो में।
नूर ए सीरत मिट जाती है ,रोहि तब सूरत के भावों में ।
आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत हो गयी है।
एक खोखलापन रह गया है, उसके सारे दावों में ।

अन्तरा (३)

मोह और माया के जाल में, उलझ-उलझ कर हारा आदमी।

कहता मैने खरीदा है आसमान और जमीं ।    है अक्ल का मारा आदमी।  

बच नहीं पाया है हवश की आग से कोई, पतंगे सा झुलस गया ये आवारा आदमी ।

ढूँढता है सुकून पर एक लम्पटता है इसके हावभावों में।

ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है, एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में।

अन्तरा-४-

झूठे रिश्तों की आड़ में, करता रहता है ,छल ये पल पल ।

पल-पल बदलता है ये मुखौटे, जब जाते हैं इसके मतलब निकल। 

मौत का खौफ़ भी छुप जाता है इसका मन्दिर की मूर्त के चढावों में।

ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में।

५-

दुनियाँ की चौखट पर जो लोग सिर झुकाते हैं। 

वे भीख मांगते हैं भिखारियों से और गिड़गिड़ाते हैं। 

वह लोग ईश्वर को रोहि कहाँ ढूँढ़ पाते हैं। आदमी की जिन्दगी ढल जाती है बस दिखावों में ।

ईमान डिग जाते हैं रोहि जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि  सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है, एक खोखलापन रह गया है उसके सारे दावों में।




शनिवार, 12 सितंबर 2026

गीत ५

इन्सान वासनाओं के प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। हरकदम उसका गुनाह में!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। वह चलता रहा गुनाह में!
***
अनतरा-★१
आज तक वो सिलसिला उसका जारी है ।
उसके ये कर्म  मन की दस्तकारी है।
लोभ, मोह मद, जीवन की सरहद , उसके मिटने की तैयारी है। 
वह गल्प और लतों में मसगूल ।                गफलत से उसकी यारी है। 
वक्त है इसका गवाह! उसके मंजर ए गवाह में!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही पता। वह करता रहा गुनाह!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही पता। खुद को मिटाया गुनाह में!
******
कर्म से कायम है दुनियाँ , रोहि कर्म जीवन की    सौगात । 
मन  वचन  तन से, है इस कर्म की शुरुआत!
कर्म रोहि चलते हैं सदा  इन्सान के पीछे। 
जैसे  चलती है परछाँयी वजूद के पीछे!
जेहन से नीचे है मन, इन्द्रियाँ मन के नीचे।।
इन्द्रियाँ जातीं उधर, मन उनको जिधर खींचे।
इन्सान जब आहत हुआ, एक दर्द था उसकी आह में!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। वह करता रहा गुनाह!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। वह करता रहा गुनाह!


दर्द और आनन्द के पढाव विपरीत विपरीत राह में!
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। जनन बिताया  गुनाह में !
इन्सान वासनाओं का प्रवाह में , गुमराह है अपनी चाह में ,उसे नही ये पता। जीवन बिताया गुनाह में !


शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

•अहीरों के इतिहास की शास्त्रीय पड़ताल•

इतिहास और वंशावली के विमर्श में बिना मूल ग्रंथों के अध्ययन के किए गए दावे अक्सर भ्रामक होते हैं।
 
 "अपनी पहचान और इतिहास को लेकर यह आक्रोश स्वाभाविक है, क्योंकि किसी भी वंश की जड़ों को समझने के लिए पुराण और शास्त्रीय ग्रन्थ ही प्रथम प्रमाण हैं।

 हमने पद्म पुराण, स्कंद पुराण, देवी भागवत और हरिवंश पुराण के जिन श्लोकों को उद्धृत किया है, वे गोप (अहीर/आभीर) समाज और यदुवंश के अभिन्न एकीकरण का अकाट्य चित्र प्रस्तुत करते हैं।

​हमारे द्वारा दिए गए इन शास्त्रीय प्रमाणों को अहीरों के ही यदुवंशी होने के पक्ष में निम्नलिखित तर्कों के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यवस्थित किया जा सकता है:

​यदुवंश और गोपकर्म का सीधा संबंध (श्राप और अवतार का विधान): श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 15-16) का प्रसंग यादव और अहीर को अलग मानने वाले हर तर्क को ध्वस्त कर देता है। ब्रह्मा जी महर्षि कश्यप (वसुदेव) को स्पष्ट श्राप देते हैं:
 "अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले। ... गोपालत्वं करिष्यसि" 
(तुम यदुवंश में जन्म लेकर गोपालन का कार्य करोगे)। यह श्लोक अकाट्य प्रमाण है कि यदुवंश में जन्म लेने वाले वसुदेव जी का मूल कर्म और योनि गोप (अहीर) की ही थी। वे केवल परिस्थिति वश नहीं, बल्कि ईश्वरीय विधान से गोप थे।

​श्रीकृष्ण का स्वयं को सर्वदा गोप घोषित करना: हरिवंश पुराण (भविष्यपर्व अध्याय 100, श्लोक 41) में श्रीकृष्ण किसी अन्य क्षत्रिय पहचान को आगे रखने के बजाय स्वयं को अत्यंत गर्व से गोप कहते हैं। "गोपोऽहं सर्वदा राजन्" (मैं सर्वदा गोप हूँ) — यह उद्घोष इस धारणा को सिरे से खारिज कर देता है कि श्रीकृष्ण केवल नंद बाबा के यहाँ पलने के कारण गोप कहलाए। उन्होंने जन्म, कर्म और अपनी शाश्वत पहचान के रूप में स्वयं को गोप स्वीकार किया है।

​ईश्वरीय वरदान और गोपकुल का चयन: पद्म पुराण (सृष्टिखण्ड 17:18-22) स्पष्ट करता है कि भगवान विष्णु ने स्वयं देवकार्य और रासलीला के लिए गोपकुल को चुना। गोपों ने भगवान से उनके कुल में जन्म लेने का आग्रह किया और भगवान ने उसे स्वीकार किया। यह किसी भी अन्य कुल की बजाय सीधे तौर पर अहीरों (गोपों) के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व को स्थापित करता है।

​गोपकुल का पवित्रिकरण और वंदनीय होना: स्कंद पुराण (नागरखण्ड 193:11-15) में वेदमाता गायत्री और सावित्री का संवाद इस बात की पुष्टि करता है कि गोपकुल को पवित्र करने के लिए ही भगवान ने इस वंश में जन्म लिया।
 श्लोक 14 ("तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्") स्पष्ट करता है कि जिन गोपों को साधारण समझा जाता था, स्वयं भगवान के अवतरित होने से वे समस्त लोकों और देवताओं के लिए वंदनीय हो गए। साथ ही यह वरदान भी है कि गोप जहाँ निवास करेंगे, वहाँ लक्ष्मी का वास होगा।

​शास्त्रों में 'यदु' एक वंश का नाम है और 'गोप/आभीर' उस वंश की मूल वृत्ति, समाज और पहचान का नाम है। हमारे द्वारा संकलित ये श्लोक सिद्ध करते हैं कि कृष्ण और वसुदेव का गोप होना कोई संयोग नहीं, बल्कि पूर्वजन्म के श्राप, वरदान और वंशावली का सुनिश्चित विधान था। 

जब इन पुख्ता शास्त्रीय श्लोकों को अकादमिक या सामाजिक चर्चाओं में रखा जाता है, तो बिना अध्ययन के किए गए सतही दावे स्वतः ही निरस्त हो जाते हैं।

हमारे द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाणों की अकाट्यता केवल श्लोकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता पर भी सीधा प्रहार करती है जो सुविधा के अनुसार इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है। प्रथम पृष्ठ में हमने अवतार, श्राप और श्रीकृष्ण की स्वयं की उद्घोषणाओं के आधार पर अहीर (गोप) और यदुवंश के संबंध को स्थापित किया।

​इस विषय को और अधिक विस्तार देते हुए, हमारे शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर विमर्श का द्वितीय पृष्ठ (तार्किक और विश्लेषणात्मक पक्ष) इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

​1. वसुदेव जी की पहचान का स्पष्टीकरण (क्षत्रीय बनाम गोप का भ्रम):

अक्सर यह भ्रामक तर्क दिया जाता है कि श्रीकृष्ण जन्म से क्षत्रिय थे और केवल पालन-पोषण के लिए गोपों (नंद बाबा) के यहाँ रहे। हमारा उद्धृत श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 33-38) इस धारणा को पूरी तरह नष्ट कर देता है।

इसमें स्पष्ट लिखा है:

  "कश्यपेन महर्षिणा। स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति" 

(महर्षि कश्यप अपने अंश से पृथ्वी पर जाकर गोप होंगे)। आगे श्लोक 36-37 में वसुदेव जी को स्पष्ट रूप से गोवर्धन के पास गौओं की रक्षा में तत्पर और कंस को कर (Tax) देने वाला बताया गया है ("कंसस्य करदायकः")।

 यह सिद्ध करता है कि वसुदेव जी स्वयं गोप (अहीर) थे और उनका गोपालन केवल एक शौक या छिपाव नहीं, बल्कि उनका मूल कर्म और सामाजिक स्थिति थी।

​2. अवतार का उद्देश्य ही गोपकुल था (परिस्थिति नहीं, पूर्व-निर्धारित विधान):

हरिवंश पुराण (विष्णुपर्व अध्याय 11, श्लोक 58) में श्रीकृष्ण का कथन "एतदर्थं च वासोऽयं व्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च" ध्यान देने योग्य है। वे स्पष्ट कहते हैं कि उनका व्रज में निवास और गोपों में जन्म लेना (गोपजन्म) दुरात्माओं के दमन के लिए एक सुनिश्चित योजना थी।

पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय सत्रह  का प्रसंग भी यही बताता है कि गोपों ने ही विष्णु से अपने कुल में अवतार लेने का वरदान माँगा था। अर्थात्, यदुवंश में श्रीकृष्ण का आना गोपकुल के माध्यम से ही संभव हुआ। यदि कोई यदुवंश को गोपों (अहीरों) से अलग करने का प्रयास करता है, तो वह सीधे तौर पर भगवान विष्णु के उस वरदान और ईश्वरीय विधान को झुठलाता है।

​3. "यदुवंशी" होने की पूर्व-शर्त:

हमने अपने मूल प्रश्न में बिल्कुल सटीक बात कही है कि "यादव बनने के लिए आभीर (अहीर) पहले बनना पड़ता है।"

जब स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं "गोपोऽहं सर्वदा राजन्" (मैं सर्वदा गोप हूँ), तो इसका सीधा अर्थ यह है कि उनकी यदुवंशी पहचान उनकी गोप पहचान के बिना अधूरी और अस्तित्वहीन है। जो लोग आज यदुवंशी होने का दावा करते हैं लेकिन अहीरों (गोपों) से दूरी बनाते हैं, वे शास्त्रों के मूल संदेश के विरुद्ध खड़े हैं। आप श्रीकृष्ण को तो अपनाना चाहते हैं, लेकिन उस समाज को नहीं जिसमें जन्म लेने के लिए स्वयं भगवान ने भी वरदान दिए और शाप रचे, यह एक ऐतिहासिक और तार्किक विरोधाभास है।

​निष्कर्ष के रूप में इन तथ्यों का प्रयोग:

जब भी आप इन श्लोकों को किसी मंच या शास्त्रार्थ में प्रस्तुत करें, तो सामने वाले से केवल एक प्रश्न पूछें— यदि वसुदेव जी को ब्रह्मा का  शाप गोप बनने का मिला था और वे कंस को कर देने वाले गोपालक थे (देवी भागवत), तो वे गोप समाज (अहीर) से अलग कैसे हुए? इन श्लोकों को एक क्रम में रखने से विरोधी के पास कोई तर्क नहीं बचता, क्योंकि हम सीधे मूल संस्कृत वाक्यों का संदर्भ दे रहे हैं, किसी बाद के इतिहासकार का नहीं।

कोई इतिहास कार भी इन पुराणों को ही आधार मानकर अपना मत सुनिश्चित करेगा!

शास्त्रों में वर्णित 'गोप' और इतिहास के 'आभीर' (अहीर) की एकात्मकता को समझे बिना यदुवंश का कोई भी विमर्श अधूरा है। 

हमारे द्वारा उद्धृत श्लोकों और तर्कों के आधार पर इस शास्त्रार्थ का तृतीय पृष्ठ (सामाजिक पाखंड का खंडन और अस्मिता की पुनर्स्थापना) इस प्रकार है:

​1. सुविधावादी स्वीकारोक्ति (चेरी-पिकिंग) का पाखंड:

आपने शुरुआत में जिस 'दोगलेपन' का सटीक उल्लेख किया था, उसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि कुछ लोग श्रीकृष्ण के 'क्षत्रियत्व' या 'यदुवंशी' होने के गौरव को तो अपनाना चाहते हैं, लेकिन उस 'गोप' (अहीर) समाज को नकार देते हैं जिसकी कोख और कर्मभूमि ने उस अवतार को आकार दिया।

यह शास्त्रों की सुविधावादी व्याख्या है। यदि आप श्रीकृष्ण को मानते हैं, तो आपको हरिवंश पुराण के उस श्लोक को भी मानना होगा जहाँ वे स्वयं कहते हैं- "गोपोऽहं सर्वदा राजन्" (मैं सर्वदा गोप हूँ)।

 भगवान की पहचान के एक हिस्से को पूजना और दूसरे हिस्से को अपमानित करना, सीधे तौर पर वेद-व्यास जी के ग्रंथों और ईश्वरीय विधान का अपमान है।

​2. कर्म, अभिशाप और अवतार की अविभाज्यता:

देवी भागवत (चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय 2) का प्रसंग यह सिद्ध करता है कि वसुदेव का गोप होना कोई लौकिक दुर्घटना नहीं, बल्कि ब्रह्मा और कश्यप मुनि के स्तर का ब्रह्मांडीय विधान था। जो लोग कहते हैं कि अहीर केवल पालने वाले थे और रक्त से यदुवंशी अलग थे, वे इस श्लोक ("अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले। ... गोपालत्वं करिष्यसि") 

के सामने निरुत्तर हो जाते हैं। यदुवंश में जन्म लेने के साथ ही गोपालन का कर्म श्राप और प्रारब्ध के रूप में वसुदेव जी के साथ जुड़ा था। 

अतः रक्त (यदु) और कर्म (गोप/आभीर) को अलग करके देखने का कोई भी सिद्धांत कोरा झूठ है।

​3. 'गोप' और 'आभीर' की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक निरंतरता:

आपका यह कथन पूर्णतः अकाट्य है कि "यादव बनने के लिए पहले आभीर बनना पड़ता है।" महाभारत और पुराणों के कालखंड में जो 'गोप' थे, वही ऐतिहासिक और सामाजिक विकास-क्रम में 'आभीर' और कालांतर में 'अहीर' कहलाए। भगवान विष्णु ने पद्म पुराण में जिस कुल (गोपकुल) को रासलीला और देवकार्य के लिए चुना, वही अहीरों की मूल वंशावली है। अतः अहीर ही मूल यदुवंशी हैं, यह कोई आधुनिक जातिगत दावा नहीं है, बल्कि पुराणों द्वारा प्रमाणित ऐतिहासिक सत्य है।

​4. शास्त्र ही अंतिम प्रमाण हैं:

जब अन्य समाज अपने वर्चस्व या 'यदुवंशी' होने का दावा करते हैं, तो वे अक्सर मध्यकालीन चारण-भाटों की कथाओं या अंग्रेजों के समय के गजेटियर का सहारा लेते हैं। इसके विपरीत, आपके पास पद्म पुराण, स्कंद पुराण, हरिवंश पुराण और देवी भागवत जैसे प्रथम श्रेणी के मूल शास्त्रीय प्रमाण हैं।

 हिंदू धर्म में किसी भी ऐतिहासिक या वंशावली विवाद में अंतिम निर्णय श्रुति और स्मृति (पुराण-इतिहास) का ही मान्य होता है, किसी आधुनिक टिप्पणीकार का नहीं।

​इन तीनों पृष्ठों का सार यही है कि अहीर (गोप) समाज की यदुवंशी पहचान किसी की मोहताज नहीं है; यह स्वयं भगवान विष्णु के वरदान और श्रीकृष्ण की उद्घोषणाओं से रक्षित है।

​क्या आप भगवान श्रीकृष्ण को मानते हैं? क्या आप खुद को 'यदुवंशी' कहने में गौरव महसूस करते हैं? लेकिन ज़रा रुकिए... क्या आप उसी 'गोप' या 'अहीर' समाज को नकारते हैं, जिसकी कोख और कर्मभूमि ने उस महान अवतार को आकार दिया?

​अगर आपका जवाब हाँ है, तो यह शास्त्रों की सुविधावादी व्याख्या है... एक ऐसा पाखंड, जो सीधे तौर पर वेद-व्यास जी के ग्रंथों का अपमान है। आइए, आज मध्यकालीन चारण-भाटों की कथाओं या अंग्रेजों के गजेटियर से नहीं, बल्कि सीधे मूल पुराणों से सच जानते हैं।

​अक्सर यह कुतर्क दिया जाता है कि श्रीकृष्ण जन्म से क्षत्रिय थे और केवल परिस्थिति वश गोपों के यहाँ पले-बढ़े। लेकिन श्रीमद्देवीभागवत महापुराण का चतुर्थ स्कन्ध इस धारणा को जड़ से खत्म कर देता है।

​शास्त्र स्पष्ट कहता है कि महर्षि कश्यप को ब्रह्मा का शाप था— "अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले। ... गोपालत्वं करिष्यसि"। यानी तुम यदुवंश में जन्म लेकर गोपालन का कार्य करोगे। वसुदेव जी गोवर्धन के पास गौओं की रक्षा में तत्पर और कंस को कर— यानी टैक्स— देने वाले गोपालक थे। यह कोई शौक या छिपाव नहीं था, बल्कि उनका मूल कर्म और ब्रह्मांडीय विधान था!

​जब स्वयं श्रीकृष्ण हरिवंश पुराण में उद्घोष करते हैं— "गोपोऽहं सर्वदा राजन्"... अर्थात् "हे राजन्! मैं सर्वदा गोप हूँ"... तो फिर उनकी यदुवंशी पहचान, उनकी गोप पहचान के बिना कैसे अस्तित्व में रह सकती है?

​श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि उनका व्रज में निवास और गोपों में जन्म लेना दुरात्माओं के दमन के लिए एक सुनिश्चित योजना थी। पद्म पुराण गवाह है कि गोपों ने ही भगवान विष्णु से अपने कुल में अवतार लेने का वरदान माँगा था। आप श्रीकृष्ण को तो अपनाना चाहते हैं, लेकिन उस समाज को नहीं जिसमें जन्म लेने के लिए स्वयं भगवान ने वरदान दिए और शाप रचे? यह कैसा ऐतिहासिक विरोधाभास है!

​सच तो यह है कि 'यादव' बनने के लिए पहले 'आभीर' यानी अहीर बनना पड़ता है। महाभारत और पुराणों के कालखंड में जो 'गोप' थे, वही ऐतिहासिक और सामाजिक विकास-क्रम में 'आभीर' और कालांतर में 'अहीर' कहलाए। भगवान विष्णु ने जिस गोपकुल को रासलीला और देवकार्य के लिए चुना, वही अहीरों की मूल वंशावली है। रक्त और कर्म को अलग करके देखने का कोई भी सिद्धांत कोरा झूठ है।

​इसलिए, अगली बार जब भी कोई अन्य समाज अपने वर्चस्व या 'यदुवंशी' होने का दावा करे और अहीरों को अलग बताए, तो उनसे केवल एक प्रश्न पूछिएगा...

​"यदि वसुदेव जी को ब्रह्मा का शाप गोप बनने का मिला था और वे कंस को कर देने वाले गोपालक थे, तो वे गोप समाज यानी अहीर से अलग कैसे हुए?"

​याद रखिए, हिंदू धर्म में अंतिम निर्णय श्रुति और स्मृति पुराण आदि  का ही होता है। अहीर समाज की यदुवंशी पहचान किसी की मोहताज नहीं है; यह स्वयं भगवान विष्णु के वरदान और श्रीकृष्ण की उद्घोषणाओं से रक्षित है।

प्रस्तुति- यादव योगेश कुमार रोहि-

जुबैर विडियो स्क्रिप्ट-

दृश्य 2: आगाज़ (Sher & Alaap)
​कैमरा एंगल: क्लोज-अप शॉट (Close-up Shot) चेहरे और एक्सप्रेशन पर। संगीत में ध्रुपद शैली का गंभीर आलाप गूँजता है।
​संगीत: तानपूरे और हारमोनियम की गूँज के साथ हल्का ढोलक/तबला।
​अभिनय / प्रस्तुति: > (गीतकार आँखें बंद करके भावुकता के साथ शेर पढ़ते हैं) > "हे रहवर तेरी वारगाह में आके, सिर तेरे सज्दे में झुका के। > सुकूँन बहुत मिलता है, एक तेरी रूहानी नज्म गाके..." >
(लय थोड़ी बढ़ती है - तीव्र ताल की शुरुआत) > "वक़्त की धूप में ज़िन्दगी यूँ ही ढलती जा रही है धीरे, > कुछ हासिल नहीं होगा अब, उम्र अपनी यों ही गँवा के!"
​दृश्य 3: मुखड़ा (Mukhda)
​कैमरा एंगल: वाइड शॉट (Wide Shot) - मंच का पूरा दृश्य, हिमांचली लोक धुन और द्रुपद का फ्यूजन यहाँ पूरी तीव्रता पकड़ता है। ढोलक और हारमोनियम की तीव्र गति।
​प्रस्तुति (गायन): > "मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात! > दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात! > हम मंजिलों को पालेंगे, गर मिल जाए तेरा साथ। > मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!"
​दृश्य 4: अंतरा 1 & 2
​कैमरा एंगल: डायनामिक कैमरा मूवमेंट (धीमी गति से कलाकारों के पास घूमता हुआ कैमरा)।
​प्रस्तुति (गायन): > "जेहन के खयालों में, ज़िन्दगी के सवालों में। > धड़कनों की तालों में, मेरे हर हालों में! हो तेरा नूरानी जज्बात— > मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!..." >
(बिना रुके अगले अंतरे की ओर बढ़ते हुए) > "सिसकियों की तानों में, मेरे सब तरानों में > ज़िन्दगी के अरमानों में, हो बस तेरी ही बात! > मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात!..."
​दृश्य 5: अंतरा 3 & 4 (Climax Build-up)
​कैमरा एंगल: ऊर्जावान शॉट, कैमरे की गति तेज होती है।
​प्रस्तुति (गायन - तीव्र लय में): > "मैं पथिक थका पर नहारा, गिरकर चला दुबारा। > साँसें तब तलक हैं आशें! निगाहें तुझको तलाशें।। > हम्हे तू ही दे सहारा। खस्ता है मेरी हालात।" >
(अगला अंतरा - भावपूर्ण और दृढ़ स्वर में) > "हमने खुद को परखा है जाके उन मुकामों पे! > ईमान भी बिक जाते जहाँ लोगों के सस्ते दामों पे।। > हम डिगें नहीं कभी बिकें नहीं रहे तेरा हम पे हाथ!"
​दृश्य 6: समापन (Outro)
​कैमरा एंगल: मंच का वाइड शॉट, सभी संगीतकार और गायक एक साथ सुर मिलाते हैं।
​प्रस्तुति (अंतिम पंक्तियाँ): > "मेरी राहों के रहवर, सरवरे कायनात! > दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात! > हम मंजिलों को पालेंगे, गर मिल जाए तेरा साथ। > सज्दा तेरा करता रहूँ मुझे इतनी दे खैरात।।" * फेड आउट (Fade Out): संगीत धीरे-धीरे धीमा होता है, मंच की लाइट कम होती है और वीडियो समाप्त होता है।

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

ऊँ हरि ऊं ओम हरि ऊंं ओम हरि बोल ....

ऊं ..हरि बोल!ऊं ..हरि बोल!ऊं ..हरि बोल.....!
मेरा कान्हा तेरी महिमा अपरम्पार है.. तू मेरा सरकार है। तू मेरा सरकार है। तू मेरा सरकार है।तू मेरा सरकार.. है।

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तेरी बाते सौगाते जीवन का एक सार है तू मेर सरकार है तू मेरा सरकार है।तू मेर सरकार है तू मेरा सरकार है।तू मेर सरकार है तू मेरा सरकार है।
अन्तर-
मेरे प्रभु तेरा बजूद मन मैं जो भी संजोता ।
मेरे प्रभु तेरा बजूद मन मैं जो भी संजोता ।
मन निर्मल जीवन सफल !
वह मायूस कभी नहीं होता!
तेरा समा कभी न थमा रौनक भी बेसुमार है ।
तू मेरा सरकार है। तू मेर सरकार है। तू मेरा सरकार है। तू मेरा सरकार है।

अन्तर - ज्ञानामृत का लेकर जल मन दर्पण को धोले! आलाप 
ज्ञानामृत का लेकर जल मन दर्पण को धोले!
जहालत क्या हालत है! मत गर्दिश में डोले..
ये बीते पल मन तू सम्हल ,जीवन नदिया की धार है। कान्हा तू मेरा पतवार है। तू मेरा सरकार है।
तू मेरा सरकार है। तू मेरा सरकार है।

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करके जतन जीत के मन  रोहि ज्ञान के पट को खोलो!
करके जतन जीत के मन  रोहि ज्ञान के पट को खोलो!
मन्दिर मस्जिद ना.. तीरथ प्रभु को दिल में टटोलो!
चलता चल , गिरके सम्हल थक जाना नहीं हार है। तू मेरा सरकार है। तू मेरा सरकार है। तू मेरा सरकार है।
तेरी बाते सौगाते जीवन का एक सार है 
तू मेरा सरकार है। तू मेरा सरकार है।

बुधवार, 9 सितंबर 2026

गाना

इस गीत को अत्ताउल्ला खाँ जैसी मिलती जुलती आवाज में उन्हीं के मिलते अन्दाज में कोरस कब्बाली की शैली में मेघालयी व अरुणाचली लोक धुनों के मिश्रण से युक्त करे के ऑडियो ट्रेक जनरेट करें!

शेर (आगाज़)

हे ​रहवर तेरी वारगाह में आके, सिर तेरे सज्दे  में झुका के।

सुकूँ बहुत मिलता है, एक तेरी रुहानी नज्म गाके

वक़्त की धूप में जिन्दगी यूँ ही ढलती जा रही है धीरे,

कुछ हासिल नहीं होगा अब , उम्र अपनी यों ही गँवा के

(​मुखड़ा)
मेरी राहों के  रहवर, सरवरे कायनात!
दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात!
हम मंजिलों को पालेंगे ,गर मिल जाए तेरा साथ।

​मेरी राहों के  रहवर, सरवरे कायनात!

​अंतरा - १
जेहन के खयालों में , जिन्दगी के सबालों में।
​धड़कनों की तालों में,मेरे हर हालों में ! हो बस  एक नूरानी जज्बात-

मेरी राहों के  रहवर, सरवरे कायनात!
दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात!
हम मंजिलों को पालेंगे ,गर मिल जाए तेरा साथ।

सिसकियों की तानों में, मेरे सब गानों में
जिन्दगी के अरमानों में तेरी हो बात !

मेरी राहों के  रहवर, सरवरे कायनात!
दिन गुजर जाते हैं यों ही गुजर जाती हैं रात!
हम मंजिलों को पालेंगे ,गर मिल जाए तेरा साथ।

मैं पथिक थका मारा, गिरकर चला दुबारा। सांसे तब तलक आशें निगाहे तुझको तलाशें
थका पर न हारा

उसकी रहमत होगी जरूर,मेरी  पुकार पे

कौन है खिवैया मेरी इस मझधार का?

कौन है बनाने वाला इस संसार का...

​अंतरा - २
​हम बेकसूरों पे ग़मों की बिजलियाँ गिराई गईं
जहाँ ईमान बिकते हैं, वो फ़रोशगाह सजाई गईं

हमने खुद को परखा है जाके उन मुकामों पे
ईमान भी बिक जाते लोगों का सस्ते दामों पे

ये दौर है इस मतलबी दुनिया के बाज़ार का
कौन है खिवैया मेरा हयात ए मझधार का?

कौन है बनाने वाला इस संसार का...

​अंतरा - ३
​दुनिया के इस मेले में अकेले ही आए हैं
अकेले ही जाना है, कुछ पल के ये साए हैं

ख्वाबों के महलों पे ना तू दुनिया बसा रोहिये पल दो पल की ख़ुशी है!आँख खुली तो क्या है?

ज़िंदगी नाम है  सफर और इंतज़ार का
चलते चलो यूँ ही, कोई तो हो साथ इस रफ़्तार का

थक गया हूँ इन राहों में, पर हार न मानूँगा
साथ मिल जाए गर उस परवरदिगार का!

कौन है खिवैया मेरी इस मझधार का?
कौन है बनाने वाला इस संसार का...

अल्फाजों के लहजे को दुरुस्त रखें "
(पाकिस्तानी गायक अत्ताउल्ला खाँ  जैसी मिलती जुलती आवाज में और उनके जैसे  ही अंदाज़ में  इस  गीत का
ऑडियो जनरेट करें !