रविवार, 20 सितंबर 2026

आपकी मूल स्क्रिप्ट की लोक-धुन, भक्ति भाव और देहाती संदेशात्मक शैली को ध्यान में रखते हुए, प्रस्तुत हैं दो नए अंतरे:

[अन्तरा - ३]

(भक्ति भाव में बहता हुआ देहाती लोक-स्वर)

मुख्य गायिका:

माया-मोह का चक्र निरन्तर जो चला रहे हैं  इस दुनियाँ को,

कर्म हैं इच्छा ,लोभ मन की परीक्षा। ये लाभ लोभ का कारण  है ये पता नहीं सगुनियाँ को! 

मन के धोखे बड़े अनोखे इस पे विश्वास करो मत भइया।

लोभ के भँबर मोह के गोते । 

सब उमर बीत गई तेरी रोते रोते। 

भव सागर है यह कठिन डगर है। 

गंगा मैली हुई पाप धोते धोते ।

तृष्णा की लहरों पर नइया। पार करे आजादपुर वाली मइया।


आरती माता मइया की !

हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।
आजादपुर है थान तुम्हारों, तुम जग की रखवइया!
हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
अन्तरा~(१)

(भक्ति भाव में बहता हुआ देहाती लोक-स्वर)

मुख्य गायिका:

मोह माया के चक्र निरन्तर, जो चला रहे  इस दुनियाँ को,

कर्म हैं इच्छा , मन की परीक्षा। लाभ लोभ का कारण  है ये पता नहीं सगुनियाँ को! 

मन के धोखे बड़े अनोखे, इस पे विश्वास करो मत भइया।

हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !

जय‌ आजादपुरववाली मइया ।

हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !

सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।

अन्तरा-२

लोभ के भँबर, मोह के गोते । 

उमर बीत गई तेरी रोते रोते। 

भव सागर है  कठिन डगर है। 

गंगा मैली हुई पाप धोते धोते ।

तृष्णा की लहरों पर नइया। पार करे आजादपुर वाली मइया। ये ही खिवैया ये ही करवइया।





चित्र चरित्र बिके नहीं अपना ! बड़ा विचित्र लोभ मोह परखना। वरद हस्त माता तुम रखना!  मन का ना हो कभी भटकना। अपनी कृपा की करना छँइया। बडी पुरातन आजादपुर की मइया! 
हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।
आजादपुर है थान तुम्हारों, किन्तु तुम जग की रखवइया!

*****
अन्तरा-(२)
इस जीवन में जितनी वाधाऐं ! आदमी ने खुद ही बनायी हैं। 
उसके इरादे उसके वादे  और नीयत में खोट समायीं हैं।
ये भाग्य कर्म का लेख नियत है कर्म सही तो सही तबीयत है न कोई बाको मरबइया।
बोलो जय आजादपुर वाली मइया।
बोलो जय आजादपुर वाली मइया।
अन्तरा(३)-
हेरा फेरी या बेईमानी से जो लोग दौलत कमाऐं!    सब लोगों का अनुभव हैं वह व्याजसहित चला जाऐ।  
इन हाथों में पैसा बहुत आया 
और गया भी ! 
पर ईमान से बड़ा कोई 
धन नहीं वह खजाने की चाबी।
जय आजाद पुर वाली मइया। जिसने जो भी मांगा है मिला वही है भइया। 
हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।
आजादपुर है थान तुम्हारों, तुम जग की रखवइया!
 

(माता की आरती)

कव्वाली: "दर-ए-मइया पे झुकता है ज़माना"

स्थाई (टेर)

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !

भाव हृदय में श्रद्धा के हैं, हम नहीं कोई गबइया।

तुम हो सच्ची तुम हो अच्छी, मझधार से तुम्हीं खिबैया। 

भवसागर का ओर-छोर नहीं है मोह के भंवरो में नइया।  

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !

अन्तरा: (१)

जिसने खुद को किया हवाले । मइया उसको फिर तू ही सम्हाले। इस दुनियाँ के ढंग अजब निराले। दुनियाँ में वे ही लोग आले।  जिनके कारनामें हैं काले। ईमान बिके, इंसान बिके,सब  बिकें भैंस और गइया !

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !भाव हृदय में श्रद्धा के हैं हम नहीं कोई गबइया।

अन्तरा (२-) 

काली नदी के तीर अहीरों की एक छोटी बस्ती।गाय भैंस का पालन करते चलाते अपनी गृहस्थी। मइया में आस्था जिनकी ये उनकी लाज रखबइया।    

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !भाव हृदय में श्रद्धा के हैं हम नहीं कोई गबइया।

अन्तरा-(३)-ये जीवन है एक गाड़ी। मन की स्टेरिंग वारी! ड्राइवर बुद्धि का अनाड़ी। ओर ये चौराहे पर ठाड़ी। इन्द्रियों के हैं पइया। अब नहीं कोई चलबइया।

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !भाव हृदय में श्रद्धा के हैं हम नहीं कोई गबइया।

बड़ी रीति दुँनियाँ की उल्टी!  अब ईमान नहीं है कोई । इन्सान आज भगवान बना है। जाकी शर्म लाज गयी  खोई। जो घने कुकर्म करता जीवन में वाको नाय रोहि वचबइया 

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !

भाव हृदय में श्रद्धा के हैं, हम नहीं कोई गबइया।


जयकारा: जोर से बोलो! आजादपुर वाली मइया की जय! 

नोट: इस कव्वाली को हल्के ढोलक और हारमोनियम की धुन पर तानते हुए गाया जाए, तो इसका आनंद और भी बढ़ जाता है।


माता की आरती !

स्वरसाधना- संगीत मण्डली की विशेष प्रस्तुति-
​परिकल्पना एवं निर्देशन: यादव योगेश कुमार रोही
राग: मिश्र मेघ-शिवरंजनी (राजस्थानी एवं पर्वतीय लोक धुनों का सम्मिश्रण)
ताल: द्रुत कहरवा / तीनताल का तीव्र द्रुत रूप
शैली: द्रुपद एवं लोक आरती शैली
​महा आरती: द्रुत ताल एवं द्रुपद शैली
​[प्रस्तावना - युवा कन्याओं का दूरदेशीय सरगमी आलाप]

अन्तराओं पर उत्तर-भारतीय कब्बाली का गायन अंदाज-
(पर्वतीय और राजस्थानी लोक धुनों के मेल से गूंजता हुआ धीमा, सात्विक और कर्णप्रिय सरगमी आलाप)
युवा कन्या स्वर (समूह में):
"नी... सा... रे... ग... प... ध... नि... सा..."
(आलाप का विस्तार: पर्वतीय गढ़वाली गूँज के साथ राजस्थानी मांड की महक लेते हुए द्रुतलय की ओर प्रवेश)
​[ध्रुवपद शैली में महा आरती का मुखड़ा]
​सब स्वर (कोरस - ताल द्रुत कहरवा):

जय मइया आजादपुर वाली,
पहाड़ीपुर से भी आते सबाली ।
काली नदी तट रम्य वसेरा,
पावनभूमि आजादपुर डेरा। भक्तों रहे भीड़ निराली। जय मइया आजादपुर वाली

(इंट्रो म्यूज़िक)

​[अन्तरा 1: द्रुपद एवं राजस्थानी लोक धुन का सम्मिश्रण]
(मृदंग और ढोलक की तीव्र थाप के साथ)
​मुख्य गायक / स्वरसाधना मण्डली:

सूती साड़ी  श्वेत रंग है। मइया का बड़ा सुन्दर ढ़ंग है। अति प्रोढावस्था बड़ी पावन रस्ता।मइया सदा भक्तों के संग है। करती भक्तों की रखवाली।

जय मइया आजादपुर वाली,
पहाड़ीपुर से भी आते सबाली ।
काली नदी तट रम्य वसेरा,
पावनभूमि आजादपुर डेरा। भक्तों रहे भीड़ निराली। जय मइया आजादपुर वाली

अन्तरा- २)

मइया का अद्भुत बड़ा  स्वरूप है।                    एक हाथ में झाडू लगी है!                            दूसरे हाथ में लगा सूप है।

अगर तगर की महक है मोहक!                    और मोगरा की जलती धूप है। भक्तों लिए आरती की थाली।

जय मइया आजादपुर वाली,
पहाड़ीपुर से भी आते सबाली ।
काली नदी तट रम्य वसेरा,
पावनभूमि आजादपुर डेरा। भक्तों रहे भीड़ निराली। जय मइया आजादपुर वाली

३- बड़ा सत्व तेरी बड़ी है महिमा ! दूर दूर तक छायी गरिमा। भक्तों से हो जाएं गलती अगर !  उनको कर देती है तू माक्षमा।

चोर डकैट सरप्पा मवाली, जो जान बूझ कर देते गाली। उनकी दुर्गति और कंगाली। उनपर कहर बुरपाने वाली 

जय मइया आजादपुर वाली, तेरे दर से कोई गया न खाली!

जय मइया आजादपुर वाली,
पहाड़ीपुर से भी आते सबाली ।

(जयकारा गूंजता है: "बोल आजादपुर वाली मइया की जय !")

यह आरती स्क्रिप्ट स्वरसाधना- संगीत मण्डली के कलाकारों द्वारा यादव योगेश कुमार रोही के निर्देशन में मंचन और गायन हेतु पूर्णतः  आजादपुर वाली मइया को समर्पित है।

राजस्थानी शैली में आजादपुर वाली मइया की आरती !

महा-आरती आलेख: श्री आजादपुर वाली मइया

(स्वरसाधना- संगीत मण्डली की विशेष प्रस्तुति — परिकल्पना एवं निर्देशन: यादव योगेश कुमार रोहि)

सांगीतिक पृष्ठभूमि और नवीन राग की परिकल्पना

यह महा-आरती एक नवनिर्मित राग "मरु-पहाड़ी" (राजस्थानी 'मांड' और गढ़वाली 'पहाड़ी' धुन का अपूर्व खमाज-थाट आधारित संगम) में निबद्ध है। जहाँ राजस्थानी लोक संगीत की खड़ताल, मोरचंग और रावणहत्था मरुभूमि की गूँज पैदा करते हैं, वहीं गढ़वाली रणसिंघा, डौंर और थाली पहाड़ की आध्यात्मिक ऊँचाइयों का अहसास कराते हैं। द्रुपद शैली के गांभीर्य को बनाए रखते हुए आरती का मुख्य भाग द्रुत शूलताल (१० मात्रा) और द्रुत कहरवा (राजस्थानी खेमटा चाल) में पिरोया गया है।

दृश्य विधान और नाद-ब्रह्म का उदय

मंच पर अंधकार है। पृष्ठभूमि में काली नदी की कलकल ध्वनि और पीपल के पत्तों की सरसराहट गूँजती है। अचानक गढ़वाली 'रणसिंघा' की एक लंबी, गगनभेदी ध्वनि वातावरण को चीरती है, जिसके ठीक बाद राजस्थानी 'मोरचंग' और 'कमाइचा' का धीमा, रहस्यमयी स्वर जुड़ता है। मंच पर धीमा नीला और श्वेत प्रकाश फैलता है।

युवा कन्याओं का दूरदेशीय सरग़मी आलाप (नेपथ्य से)

पहाड़ी घाटियों से टकराकर आती हुई ध्वनि की भाँति, आठ से दस युवा कन्याओं का समूह दूर से अत्यंत बारीक, सुरीली और गूँजती हुई आवाज़ में सरगम का आलाप लेता है। यह आलाप मींड और गमक से युक्त है, जो श्रोताओं के रोंगटे खड़े कर देता है:

(अत्यंत विलम्बित और गूँजते हुए स्वरों में)

"आ... सा... रे म प... ग म रे सा...

नि̣ धा̣ प̣... म̣ प̣ नि̣ सा...

सां नि धा प, म ग रे सा..."

(कन्याओं की आवाज़ हवा में तैरती हुई विलीन हो जाती है, और तुरंत ही पखावज की जोरदार थाप पड़ती है।)

द्रुपद अंग में नोम-तोम आलाप और महा-आरती का आरंभ

मुख्य गायक (निर्देशक के नेतृत्व में) और सह-गायक अत्यंत भारी और गंभीर स्वर (मन्द्र सप्तक) में ध्रुपद शैली का आलाप लेते हैं— नारे तारे दानी, तुम नोम तनोम...

इसके पश्चात् गढ़वाली ढोल, दमाऊं और राजस्थानी नगाड़े एक साथ द्रुत ताल में बज उठते हैं। शंख और घंटों की गगनभेदी ध्वनि के बीच महा-आरती द्रुत लय में आरंभ होती है।

महा-आरती (द्रुत लय - राग मरु-पहाड़ी)

(समवेत स्वर में उच्च ग्राम - राजस्थानी और पहाड़ी लोक-मिश्रित ध्रुपद पदावली)

जय भवानी, रुद्राणी, कल्याणी!

म्हारी आजादपुर री मावड़ी, पहाड़ीपुर री राणी!

काली नदी रे तीरे मइया, रम्मो रम्य बसेरो।

पीपल री पावन छांव में, लाग्यो थारो डेरो!

जय मइया! जय मइया! जय मइया!

(मुख्य गायक - द्रुत शूलताल की चौगुन लय में)

श्वेत साटिका अंग बिराजे, भाल तेज अति भारी।

सूप हाथ में सजे भवानी, पाप-ताप संहारी!

दूजे कर में झाड़ू सोहे, बुहारे कर्म विकारा।

जाके मन में कपट बसे है, वाको होय निस्तारा!

(सह-गायक और कन्याओं का युगल स्वर - गढ़वाली लोक धुन का पुट)

हो... ओ...

छम-छम बाजे घूँघरू मइया, खड़ताल बाजे साथ।

रोगी-शोगी, दीन-दुखी सब, जोड़े थारे हाथ।

लौटा जल को जो भी चढ़ावे, शुद्ध भाव मन लावे।

सिद्धि नवनिद्धि द्वार तिहारे, बिन मांगे ही पावे!

(संगीत का चरम - झाला और द्रुत कहरवा)

(यहाँ पखावज, गढ़वाली ढोल और राजस्थानी खड़ताल के बीच एक तीव्र जुगलबंदी (तिहाई) होती है। संगीत अपनी सबसे तेज़ गति (द्रुत लय) में पहुँच जाता है। कन्याओं का सरगम (सा नि धा प म ग रे सा) पीछे से बहुत तेज़ गति में चलता रहता है।)

(समवेत स्वर - द्रुत गति में)

अहीर भगत री आरति गावें, बाजै ढोल-मृदंग।

भूत-प्रेत की बाधा छूटै, देख भवानी रंग!

तू ही भर्ता, तू ही कर्ता, दुष्ट दलन हुंकारी।

दूर-देश रा आवैं सवाली, जावैं ना कोई खाली!

जावैं ना कोई खाली मइया! जावैं ना कोई खाली!

समापन (तिहाई और महा-जयकारा)

(गायन और वादन एक साथ तीन बार जोरदार तिहाई लेते हैं)

​कर्म के बंधन काट भवानी... धा धा धिन!

कर्म के बंधन काट भवानी... धा धा धिन!

कर्म के बंधन काट भवानी... धा धा धा, तिक्क धा!

(मंच पर पूर्ण प्रकाश, सभी वाद्य यंत्र एक साथ बजते हुए शांत होते हैं। केवल नेपथ्य से एक गूँजती हुई राजस्थानी अलगोजा और पहाड़ी बांसुरी की मिश्रित तान सुनाई देती है।)

मुख्य गायक (बिना किसी वाद्य के, खुली और बुलंद आवाज़ में):

बोलिए, काली नदी तट वासिनी, श्वेताम्बरी, आजादपुर वाली मइया की...

समस्त समूह और दर्शक:

जय!!!

(मंच पर शंखनाद के साथ पर्दा गिरता है।)

शनिवार, 19 सितंबर 2026

आजाद पुर वाली मइया की जय

उद्घोष करें:
इस सुंदर और दार्शनिक बंदिश के आधार पर, आइए इस भावमयी गीत को और अधिक विस्तृत और काव्यात्मक रूप में पिरोते हैं, जो राग मेघ मल्हार के गंभीर, सात्विक और करुणामयी वातावरण को जीवंत कर दे।
​गीत: आजादपुर वाली मइया की जय"
​राग: मेघ मल्हार
ताल: कहरवा
यह भक्ति गीत स्वरसाधना- संगीत मण्डली के द्वारा यादव योगेश कुमार रोहि के निर्देशन में निर्मित किया गया है ।

(जयकारा: बोल आजादपुर वाली मइया की जय !
स्थाई (मुखड़ा)

​जय मइया आजादपुर वाली,
तू पहाड़ीपुर तक रहने वाली !
काली नदी तट तेरा रम्य वसेरा।
पावन भूमि जहाँ आजादुर डेरा। 
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी। 
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।
​हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती पहाड़ीपुर तक रखवाली!
...
​अंतरा-१ (पर रिदम का चतुर्थ स्वर कोमल करें)
,दु:खियों ने तुमको आकर जब टेरा ! तब तब तुमने सुख दिया घनेरा।
यहाँ भूत प्रेत की वाधा मिटती, रोग मिटे, सब मिटे अंधेरा !
बजे मृदंग ढोल और ताली !
​जय मइया आजादपुर वाली,
तू पहाड़ीपुर तक रहने वाली !
काली नदी तट तेरा रम्य वसेरा।
पावन भूमि जहाँ आजादुर डेरा। 
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी। 
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।

अन्तरा-२
तेरे भक्त अहीरों ने फिर आज आरति तेरी गायी। रोग कष्ट मिट जाते हैं सब जिसने तेरी रस्म निभाई।  
 
मइया तुझको जो शुद्धि से ध्यावे !  वो साधक ही सिद्धि को पावे ...

काली नदी के तट पर विचरण ! तेरी कृपा भक्तों पर क्षण क्षण।
माँ तेरी शक्ति अजब निराली। दूर दूर से आते  सबाली। 
कोई ज्ञानी कोई मानी ,और चले आते अज्ञानी।
​जय मइया आजादपुर वाली,
तू पहाड़ीपुर तक रहने वाली !
​अंतरा-२
श्वेत साटिका पीपल वाटिका। सूप थमा है एक हाथ में तेरे । और दूसरे में हाथ में मइया, झाढू लगी जामें सींक बहुतेरे
मइया के दर आते बहुत हैं। पर पाक साफ कुछ ही आते हैं। 
ईमान, मान और ध्यान सदा, कुछ ही भगत हैं जो अपनाते हैं। 

मइया से अरदास हमारी यह तेरे दास पर है कंगाली।    
​हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती तू पहाड़ीपुर तक रखवाली!

काली नदी तट रम्य वसेरा। पावन भूमि आजादुर डेरा। 
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी। 
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।
​हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती पहाड़ीपुर तक तु करती रखवाली!

...अन्तरा-३
मइया पीपल की छांव बिराजे, संख मृदंग बहु घंटा वाजे। 
​हाथ में सूप लिए जग त्राता ,
तुम हो पाप- ताप की घाता।

जैसे धान से भूसी को  छांटे,
वैसे ही कर्मों के बंधन तू काटे...

जो भी चरणों में तेरे चित्त लाऐ,
वह सारे संकट से  तर जाए !

जिस मूर्ख ने तेरी महिमा न जानी । आँखों के सामने मिटा वो गुमानी । तू दुष्टों की क्रूर संहर्ता। तू ही भर्ता तू ही कर्ता ,,

​समापन (आरतीमयी पुट)
​हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती तू पहाड़ीपुर तक रखवाली!
काली नदी तट तेरा रम्य वसेरा। पावन भूमि जहाँ आजादुर डेरा। 
मइया मेरी तुम युगों पुरानी ! तुम पर चढ़ता लोटों से पानी। 
दूर दूर से आते सबाली ! निराश हो नहीं जाते खाली।
​हे मइया मेरी आजादपुर वाली, करती तू पहाड़ीपुर तक रखवाली!

महा आरती की स्क्रिप्ट  द्रुपद गीत शैली में लिखें जिसमें राजस्थानी लोक संगीत का पुट व पड़ाडी गढ़वाली लोक धुनों को राजस्थानी लोक धुन से सम्बद्ध करते हुए नये राग में आरती गीत की द्रुत ताल पर  ऑडियो जनरेट करें !


मइया आजादपुर वाली !

इस सुंदर और दार्शनिक बंदिश के आधार पर, आइए इस भावमयी गीत को और अधिक विस्तृत और काव्यात्मक रूप में पिरोते हैं, जो राग मेघ मल्हार के गंभीर, सात्विक और करुणामयी वातावरण को जीवंत कर दे।

गीत: आजादपुर वाली मइया की जय"

राग: मेघ मल्हार

ताल: कहरवा

स्थाई (मुखड़ा)

​हे मइया आजादपुर निवासिनी,  पहाड़ीपुर तक तुम प्रकाशिनी!

काली नदी पर रम्य वसेरा।      पावन भूमि आजादुर डेरा। 

मइया मेरी तुम कल्याणिनी!        तुम पर चढ़ता लोटा पानी।...

अंतरा 1 (गंगा प्रसाद यादव और इतिहास का स्मरण)

​युग-युग से तेरी ज्योति निराली,

भक्तों की सदा  करती रखवाली।

 श्रीगंगाप्रसाद ने जब-जब टेरा,       सब भूत प्रेत का मिटा अंधेरा!

भक्त औसान ने आरति गायी।  बहुत समय तक रस्म निभाई।  

 जो तुझको शुद्धि से ध्यावे !         वो साधक सिद्धि को पावे ...

काली नदी के तट पर विचरण !  यही तेरी तपस्या का प्रांगण. 

माँ तेरी शक्ति अजब निराली।      दूर दूर से आते आते सबाली। 

कोई ज्ञानी कोई मानी ,और चले आते कोई अज्ञानी।

अंतरा 2 (वृद्धा अम्मा का वात्सल्य रूप)

श्वेत साटिका पीपल की वाटिका।                सूप थमा है एक हाथ में और दूसरे में लाटिका।

 मइया के दर आते बहुत हैं। पर पाक साफ कुछ ही आते। ईमान मान और ध्यान सदा, कुछ ही भगत जो अपनाते। 

मइया से अरदास हमारी यह दास तेरा है अज्ञानी ।    

हे मइया आजादपुर निवासिनी,  पहाड़ीपुर तक तुम प्रकाशिनी!

काली नदी पर रम्य वसेरा। पावन भूमि आजादपुर डेरा। 

मइया मेरी तुम कल्याणिनी! तुम पर चढ़ता लोटा से पानी।

...

​श्वेत वसना  भोली, ममता जिनकी मिश्री घोली।

मइया पीपल की छांव बिराजे, संख मृदंग बहु घंटा वाजे। 

अंतरा 3 (सूप और शुचिता का दार्शनिक प्रतीक)

​हाथ में सूप लिए जग त्राता ,

तुम हो पाप- ताप की घाता।

जैसे धान से भूसी को  छांटे,

वैसे ही कर्मों के बंधन काटे...

जो भी चरणों में चित्त को लाऐ,

वह सारे संकट से  तर जाए !

जिस मूर्ख ने तेरी महिमा न जानी । आँखों के सामने मिट गया अभिमानी ।  तू दुष्टों की नाशिनी।

समापन (आरतीमयी पुट)

​हे मइया आजादपुर निवासिनी,  पहाड़ीपुर तक तुम प्रकाशिनी!

काली नदी पर रम्य वसेरा।      पावन भूमि आजादुर डेरा। 

मइया मेरी तुम कल्याणिनी!        तुम पर चढ़ता लोटा पानी।...