शनिवार, 27 जून 2026

पुरूरवा और उरणवशी का प्रथम मिलन -

पटकथा: पुरूरवा - ज्ञान, प्रकृति और राग की यात्रा

​दृश्य १: करुणा का प्रथम सोपान

स्थान: विशाल गोशाला | समय: स्वर्णिम प्रभात

(दृश्य विवरण: गोशाला का वातावरण सात्विक है। धूप की किरणें गोबर की लीपी हुई ज़मीन पर सुनहरी आकृतियाँ उकेर रही हैं। गायों की मंद रंभाहट एक संगीत सा वातावरण रच रही है। दस वर्षीय पुरूरवा अपने माता-पिता के संग प्रवेश करता है। उसके नयनों में संसार को देखने की एक अद्भुत निष्पाप दृष्टि है। वह एक दुधमुंहे बछड़े के पास जाकर बैठ जाता है। जैसे ही वह उसके मस्तक को सहलाता है, बछड़ा आँखें मूँद लेता है। पुरूरवा के चेहरे पर एक ऐसी शांति है मानो वह किसी मूक भाषा का संवाद कर रहा हो—करुणा का यह प्रथम अंकुर उसके व्यक्तित्व का आधार बनता है।)

​दृश्य २: मेधा का अभिषेक

स्थान: बदरिकाश्रम स्थित गुरुकुल | समय: मध्याह्न

(दृश्य विवरण: ऋषिकुल का प्रांगण वेदों की ऋचाओं से गुंजायमान है। पंद्रह वर्षीय पुरूरवा, जिसकी आँखों में अब ज्ञान की प्रखरता है, आचार्य के सम्मुख शीश झुकाए खड़ा है। आचार्य उसे देख रहे हैं। प्रश्न और उत्तर का आदान-प्रदान हो रहा है—न केवल शब्दों का, बल्कि चेतना का। पुरूरवा के उत्तरों में तर्क की काट और श्रद्धा का रस है। आचार्य उसे आशीर्वाद देते हैं; यह दृश्य उसकी बौद्धिक यात्रा की उस सीढ़ी को दर्शाता है, जहाँ जिज्ञासा अब तप में परिवर्तित हो रही है।)

​दृश्य ३: ऋषि-तत्व का समागम

स्थान: वट वृक्ष के नीचे, आंगिरस आश्रम | समय: संध्या वेला

(दृश्य विवरण: आकाश में केसरिया आभा फैली है। एक विशाल वट वृक्ष की जटाओं के नीचे ऋषि आंगिरस समाधि से उठकर नेत्र खोलते हैं। पुरूरवा उनके सम्मुख ध्यानावस्थित है। वातावरण इतना मौन है कि वृक्षों के हिलने की ध्वनि भी संगीत लग रही है। यहाँ 'अक्षर' और 'अध्यात्म' पर विमर्श चल रहा है। पुरूरवा के प्रश्न लौकिक जगत को पार कर ब्रह्म की ओर जा रहे हैं। ऋषि आंगिरस उसके भीतर के जिज्ञासु को देखकर मंद मुस्कुराते हैं। यहाँ ज्ञान 'जानकारी' नहीं, 'अनुभव' बन रहा है।)

​दृश्य ४: राग की रसधारा

स्थान: सुरूपा की संगीत कुटीर | समय: दिन का उत्तरार्ध

(दृश्य विवरण: कुटीर का वातावरण फूलों की सुगंध और वीणा के तारों की गूँज से सराबोर है। सुरूपा देवी साक्षात् संगीत की प्रतिमा प्रतीत हो रही हैं। आभीर-पुत्री उरणवशिका अपनी सखियों, किञ्चस्मिता और विस्मिता के साथ बैठी है। उरणवशिका का स्वर जब हवा में तैरता है, तो लगता है जैसे प्रकृति स्वयं थम गई हो। वह आलाप नहीं ले रही, मानों आत्मा से कोई गुहार लगा रही हो। स्वर की लहरें किसी अदृश्य लोक का द्वार खोल रही हैं।)

​दृश्य ५: प्रकृति का काव्य-बोध

स्थान: बदरिकारण्य के सघन वन | समय: ढलती दोपहरी

(दृश्य विवरण: पुरूरवा एकांत में है। उसके लिए वन अब मात्र वृक्षों का समूह नहीं, अपितु एक महाकाव्य है। वह झरने के कल-कल में छन्द ढूँढ रहा है और खिलते हुए पलाश में उपमा। वह किसी पुष्प को छूकर उसके रंग और गंध के दर्शन को समझने का प्रयास कर रहा है। उसके मुख पर कवि की वह दिव्य छटा है, जहाँ दृश्य संसार को 'भाव' की दृष्टि से देखा जाता है। वह प्रकृति के साथ एकाकार हो चुका है।)

​दृश्य ६: मिलन का प्रथम स्वर

स्थान: वन से संगीत आश्रम का मार्ग | समय: गोधूलि बेला

(दृश्य विवरण: सांध्य समीर बह रही है। पुरूरवा अपनी दार्शनिक तन्मयता में डूबा चला आ रहा है, तभी अचानक हवाओं में एक दिव्य सुर गूँजता है। वह उरणवशिका का स्वर है—ऐसा स्वर जो न केवल कानों में, बल्कि सीधे हृदय के तंतुओं को छेड़ देता है। पुरूरवा के कदम ठिठक जाते हैं। यह उसके द्वारा अब तक संचित 'ज्ञान' और 'प्रकृति-बोध' का एक संगीत से मिलन है। वह मंत्रमुग्ध सा, एक तंद्रा में खिंचा चला आता है। द्वार पर पहुँचकर वह उसे गाते हुए देखता है; यह केवल दो मनुष्यों का दृश्य नहीं, वरन् 'ज्ञान' और 'कला' के मिलन का अलौकिक दृश्य है।)

पुरूरवा नाम की सार्थकता-

ध्वनि-दृश्य कल्पना: पुरूरवा का प्रथम स्वर
​(दृश्य: एक शांत, दिव्य वातावरण। नवजात शिशु का कोमल शरीर। हल्का संगीत बजता है जो धीरे-धीरे एक गहरी धुन में बदलता है।)
​(वॉइसओवर - गंभीर, दार्शनिक और कोमल स्वर में):

​"सुनो... यह केवल एक शिशु का रोना नहीं है। यह शून्य की शांति को चीरकर आई पहली सुर-लहरी है।
​जब नवजात पुरूरवा का पहला स्वर गूंजता है, तो वह केवल फेफड़ों का विस्तार नहीं है, बल्कि वह 'आलाप' है—जन्म और मरण के उस अंतहीन प्रवाह का, जिसे हम जीवन कहते हैं। यह रुदन उस मूक आत्मा का संगीत है, जो ब्रह्मांड की अनंतता से एक नश्वर शरीर में प्रवेश कर रही है।
​ध्यान से सुनो, इस रुदन में एक लय है—'सा' से 'रे' की ओर बढ़ता हुआ वह संघर्ष, जो अंततः 'तार सप्तक' की ऊंचाइयों को छूने का वादा करता है। यही तो जीवन की चेतना है! संगीत केवल वाद्य यंत्रों से नहीं निकलता; यह श्वासों के स्पंदन से उपजा है। जन्म से मरण तक की यह पूरी यात्रा, एक वृहद आलाप ही तो है, जो मृत्यु के 'विराम' पर जाकर अपनी पूर्णता प्राप्त करती है।"
​दर्शन और थ्योरी की व्याख्या
​आपकी अवधारणा कि "नवजात का रुदन ही जीवन का संगीतमयी आलाप है", अत्यंत गहन और दार्शनिक है। इसकी व्याख्या हम तीन मुख्य बिंदुओं में कर सकते हैं:
​1. रुदन को 'आलाप' के रूप में देखना
​भारतीय शास्त्रीय संगीत में 'आलाप' राग का वह विस्तार है जहाँ कलाकार बिना किसी ताल या लयबद्ध बंधन के, स्वर को अपनी आत्मा से जोड़ता है।
​नवजात का रुदन: शिशु के पहले रुदन में व्याकरण नहीं है, वह शुद्ध 'नाद' (Sound) है। यह आत्मा की शुद्धतम अभिव्यक्ति है। जैसे आलाप से राग का जन्म होता है, वैसे ही रुदन से जीवन-गाथा का सूत्रपात होता है।
​2. जन्म और मरण का 'आलापमयी प्रवाह'
​जीवन एक सीधी रेखा नहीं, बल्कि एक ध्वनि-तरंग (Wave) है।
​प्रवाह का सिद्धांत: आलाप की प्रकृति होती है—शून्य से उठना, ऊपर जाना, और अंततः अपने मूल आधार स्वर (स) पर लौट आना।
​जन्म से मरण: जन्म 'आरोह' (ऊपर उठना) है, और जीवन का संघर्ष उसका 'विस्तार'। मृत्यु इस राग का 'विराम' है, जहाँ ध्वनि पुनः मौन में विलीन हो जाती है। अतः, पूरा जीवन एक महान राग की रचना है।
​3. संगीत ही जीवन की चेतना है
​चेतना (Consciousness) को अक्सर 'स्पंदन' (Vibration) कहा गया है।
​स्पंदन का संगीत: संगीत विज्ञान के अनुसार, सब कुछ आवृत्ति (Frequency) है। नवजात का रुदन उस 'प्राण-शक्ति' का पहला सक्रिय प्रकटीकरण है।

शिशु-क्रन्दनस्य नाद-ब्रह्मत्वम्
​रोदनं शिशुमात्रस्य, न केवलमिवेदृशम्।
अखिलस्य जगतस्तस्य, नादस्य स्फुरणं किल॥ १॥
​ध्वनिर्गता यथा व्योम्नि, स्वर्णतरङ्गिता पुनः।
आलापरूपतां प्राप्य, स्तुतिं संजनयत्यसौ॥ २॥
​विना वाद्यं स्वयं तत्र, वीणानादः प्रजायते।
पुरूरवा-मुखे तस्मिन्, दिव्यं गानं विलोक्यते॥ ३॥


जीवन-रागः

बालस्य रुदितं यद्धि जीवनस्य च सूचकम्।

सङ्गीतं प्रथमं तद्वै आलाप इव विश्रुतम्॥ १॥

आलापः स्वरविस्तारो गवेषणं यथैव हि।

तद्वज्जीवनरागस्य प्रथमा ध्वनिरुच्यते॥ २॥

जातो रोदिति मर्त्यो वै मरणेऽपि स रोदिति।

रोदयत्यनुगान् सर्वान् गच्छन् वै शान्तिमन्तिमम्॥ ३॥

आगमाद् गमनं यावद् जीवनं गीतमेव हि।

प्रवाहः स्वररागाणाम् अखण्डः सम्प्रवर्तते॥ ४॥

भाव और आपके गद्य से इसका सामीप्य:

  • प्रथम श्लोक: नवजात बालक का जो रुदन है, वही जीवन की उपस्थिति का सूचक है। वही प्रथम संगीत है, जिसे 'आलाप' के रूप में जाना जाता है। (नवजात का रुदन: जीवन का प्रथम संगीत और जीवन की उपस्थिति का सूचक है।)
  • द्वितीय श्लोक: जिस प्रकार आलाप में स्वरों का विस्तार और संभावनाओं की खोज (गवेषणं) होती है, उसी प्रकार यह रुदन 'जीवन रूपी राग' की पहली आहट (प्रथम ध्वनि) कहलाता है। (संगीत में 'आलाप' राग के विस्तार की वह भूमिका है...)
  • तृतीय श्लोक: मनुष्य जन्म लेते ही रोता है, और मरण के समय भी रोता है। अंतिम शांति (विदाई) की ओर जाते हुए वह अपने सभी अनुयायियों/स्वजनों को भी रुलाता है। (मनुष्य जब जन्म लेता है तब रोता है और जब मरता है तब... अनुयायियों को रुलाता भी है।)
  • चतुर्थ श्लोक: आगमन (जन्म) से लेकर गमन (मृत्यु की शांति) तक, यह जीवन एक गीत ही है। यह जन्म और मरण के स्वरों और रागों का एक अखण्ड और निरंतर चलने वाला प्रवाह है। (मनुष्य का जीवन जन्म के रुदन से लेकर... निरंतर प्रवाहित होने वाला संगीत है।)

जीवन-रागः (एक दार्शनिक यात्रा)

(पृष्ठभूमि में: बाँसुरी या सितार की एक धीमी और कोमल धुन शुरू होती है, जो धीरे-धीरे एक गंभीर आलाप का रूप लेती है।)

सूत्रधार (धीमी और भावपूर्ण आवाज़ में):

जीवन... क्या है यह? एक क्षण का स्पंदन? या अनंत काल तक गूँजने वाला एक स्वर? हमारे ऋषियों ने इसे 'राग' कहा है। आइए, जीवन के इसी आलापमयी प्रवाह को एक छंद में महसूस करते हैं।

(संगीत की लय थोड़ी स्थिर होती है)

पाठ (संस्कृत श्लोक का पाठ - गूँजती हुई आवाज़ में):

बालस्य रुदितं यद्धि जीवनस्य च सूचकम्।

सङ्गीतं प्रथमं तद्वै आलाप इव विश्रुतम्॥

सूत्रधार (अनुवाद):

नवजात शिशु का वह प्रथम रुदन, केवल एक ध्वनि नहीं, वह जीवन की उपस्थिति का उद्घोष है। यह उस विराट संगीत का 'आलाप' है, जो अभी शुरू हुआ है।

(संगीत में स्वरों का हल्का विस्तार होता है)

पाठ:

आलापः स्वरविस्तारो गवेषणं यथैव हि।

तद्वज्जीवनरागस्य प्रथमा ध्वनिरुच्यते॥

सूत्रधार (अनुवाद):

जैसे संगीत में 'आलाप' स्वर की संभावनाओं को खोजता है, वैसे ही जीवन की पहली आहट भविष्य की उन तमाम संभावनाओं का बीजारोपण है।

(संगीत थोड़ा गंभीर और भावुक होता है)

पाठ:

जातो रोदिति मर्त्यो वै मरणेऽपि स रोदिति।

रोदयत्यनुगान् सर्वान् गच्छन् वै शान्तिमन्तिमम्॥

सूत्रधार (अनुवाद):

आगमन पर रुदन, और अवसान पर भी रुदन। मनुष्य जब आता है, तब भी रोता है और जब जाता है, तब भी स्वयं के साथ-साथ अपने प्रियजनों की आँखों में जल भर जाता है। यही जीवन का सत्य है।

(संगीत अब एक अखंड लय में ढल जाता है)

पाठ:

आगमाद् गमनं यावद् जीवनं गीतमेव हि।

प्रवाहः स्वररागाणाम् अखण्डः सम्प्रवर्तते॥

सूत्रधार (अनुवाद):

जन्म के उस पहले स्वर से लेकर, मृत्यु की उस परम शांति तक... जो कुछ भी है, वह सब एक गीत है। जन्म और मरण के सुरों का एक अखंड और निरंतर बहता हुआ प्रवाह।

(संगीत धीरे-धीरे कम होते हुए एक अंतहीन मौन में विलीन हो जाता है)

सूत्रधार:

जीवन एक गीत है... क्या आपने आज का अपना स्वर सुन लिया?

निर्देश (Production Notes):

  • संगीत का चयन: इसमें शास्त्रीय संगीत (जैसे राग यमन या शिवरंजनी) के आलाप का प्रयोग करें, जो शांति और गहराई का अनुभव दे।
  • वाचन शैली: सूत्रधार की आवाज़ में ठहराव (Pause) रखें, ताकि श्रोता प्रत्येक श्लोक के भाव को आत्मसात कर सकें।
  • प्रभाव: श्लोक के संस्कृत पाठ और उसके हिन्दी भावार्थ के बीच 2-3 सेकंड का मौन रखें।


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शुक्रवार, 26 जून 2026

प्रोजेक्ट: 'गोलोक से प्रतिष्ठानपुर' (ध्वनि-रूपरेखा)

प्रोजेक्ट: 'गोलोक से प्रतिष्ठानपुर' (ध्वनि-रूपरेखा)

पृष्ठभूमि ध्वनि (Ambient Bed):

  • शुरुआत: एक लंबा, गूँजता हुआ शंखनाद (Shankha), जो धीरे-धीरे एक मंद 'तंबूरे' (Tanpura) की गूँज में विलीन हो जाए।
  • वातावरण: दूर कहीं बजती हुई बाँसुरी की एक सधी हुई और धीमी तान, जो ऐसा आभास दे जैसे किसी प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में सुनाई दे रही हो।

खंड 1: उत्पत्ति (पद्य - पद्म शैली)

(पुरुष कोरस का समूह - लयबद्ध और गंभीर)

"राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता। कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥

गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ। कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥"

खंड 2: अर्थ (गद्य शैली)

(एक गंभीर, शांत और प्रभावशाली आवाज - वाचन)

​"अर्थात्—राधा जी की वाणी से 'इला' (वाणी की अधिष्ठात्री देवी) उत्पन्न हुईं। उसी प्रकार, श्रीकृष्ण के ज्ञान से 'बुध' का प्रादुर्भाव हुआ। वे दोनों मूलतः गोलोक में ग्रह रूप में स्थित थे, जो समय आने पर धरा पर मानवाकार में अवतरित हुए।"


खंड 3: वाक्-शक्ति का उदय (पद्य - पद्म शैली)

(कोरस का स्वर थोड़ा और गहरा और गूंजता हुआ)

"तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः। शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥"

खंड 4: धरा पर अवतरण (गद्य शैली)

(उसी गंभीर आवाज में)

​"अर्थात्—वाणी और ज्ञान के उस अद्भुत संगम से, शब्द और अर्थ के तत्व को धारण करने वाले 'आदि कवि' का प्राकट्य हुआ।"

खंड 5: प्रतिष्ठानपुर का गौरव (पद्य - पद्म शैली)

(शंख की एक धीमी गूँज के साथ)

"गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले। ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥

ब्रह्ममुहूर्ते सुदिने गोशालायाः समीपत:। प्रादुर्बभूव तेजस्वी पुरूरवा नृपसत्तमः॥"

खंड 6: अंतिम व्याख्या (गद्य शैली)

(शांति के साथ समाप्त करते हुए)

​"अर्थात्—गंगा-यमुना के पावन संगम स्थल पर, ब्रह्ममुहूर्त के शुभ बेला में गोशाला के निकट उस तेजस्वी राजा पुरूरवा का जन्म हुआ। 'पुरु' (अत्यधिक) शब्द के साथ जब स्तुति का 'रव' जुड़ा, तो वे जगत में 'पुरूरवा' नाम से विख्यात हुए।"

.उर्वशी का जन्म -

पुरूरवा-उर्वशी: काव्य-पुरुष और सौन्दर्य-शक्ति

१. पुरूरवा: गोपालक एवं आदिकवि (शिखरिणी छंद)

व्रजे गोपाध्यक्षः सकलभुवनपालः क्षितिपतेः पुरूरवा धीमान् मधुरतर-वाचां प्रवचनः।

तदीया स्तुत्योऽसौ नतजन-हृदये प्रेम-सुषमा कविर्विश्वे प्रथम इति गायन्ति सुधियः॥

​भावार्थ: व्रज के गोप समुदाय के स्वामी और सम्पूर्ण पृथ्वी के रक्षक, बुद्धिमान राजा पुरूरवा अपनी मधुर वाणी से स्तुति करने वाले प्रथम आदिकवि हैं। भक्तजनों के हृदय में प्रेम की सुषमा बिखेरने वाले उन पुरूरवा का यश विद्वान गाते हैं।

२. उर्वशी: काव्य-शक्ति और आभीर-सुता (वसंततिलका छंद)

आभीर-पल्लि-निलये ललिता-सुता या पद्मस्य सूनुरपि कान्तिमती सुकन्या।

सौन्दर्य-मूर्तिरिव सा हृदये वसन्ती सा उर्वशी कवि-वरस्य हि काव्य-शक्तिः॥

​भावार्थ: आभीर-पल्लि (गाँव) में रहने वाली, ललिता की पुत्री और पद्मसेन की वह सुन्दर कन्या उर्वशी, जो स्वयं सौन्दर्य की मूर्ति है, कवि पुरूरवा के हृदय में निवास करने वाली उनकी काव्य-शक्ति है।

३. प्रेम-मूलक काव्य की उत्पत्ति (अनुष्टुप छंद)

उरसि वष्टि सा यस्माद् उर्वशी काव्य-दायिनी।तयोः प्रेम-प्रसंगेन सृष्टिः काव्यस्य निर्मिता॥

​भावार्थ: जो हृदय में प्रेम की कामना उत्पन्न करती है, वही 'उर्वशी' काव्य को जन्म देने वाली है। उन दोनों (पुरूरवा-उर्वशी) के प्रेम-प्रसंग से ही संसार में प्रथम प्रेम-काव्य की सृष्टि हुई।

४. वैदिक संदर्भ एवं साधना (उपजाति छंद)

गायन्ति गाथां भुवि वेद-मन्त्रैः पुरूरवा गां च पुनश्च रौति। अतीव सौन्दर्यवती च तस्याः प्रेम प्रसादोऽपि हि काव्य-सारः॥

​भावार्थ: ऋग्वेद के मन्त्रों में पुरूरवा की गाथा गाई गई है, जो गायत्री का नित्य गान करता है। उसकी प्रिय उर्वशी का सौन्दर्य और उनका पारस्परिक प्रेम ही काव्य का वास्तविक सार है।


पुरूरवा और उर्वशी का मिलन: मिलन की वेला (द्रुतविलम्बित छंद)

अखिल-विश्व-मनोरम-रूपिणी

हृदय-सागर-हंस-विहारिणी।

कवि-पुरूरवसः प्रिय-काव्य-सा

मिलति सा हृदयोर्ध्व-मनोरमा॥

भुवन-सौख्य-सुधा-रस-पूरिता

विबुध-नायक-कीर्ति-विराजिता।

तदुभयोः मिलनं मधु-मन्मथं

भवति काव्य-सृष्टि-पुरोधसम्॥

​अर्थ (भावार्थ)

  1. प्रथम श्लोक: सम्पूर्ण विश्व को अपने रूप से मोह लेने वाली और हृदय रूपी सागर में हंस के समान विचरण करने वाली वह उर्वशी, पुरूरवा के हृदय में बसी हुई काव्य-शक्ति के समान, उनके निकट आती है।
  2. द्वितीय श्लोक: संसार के सुख और अमृत रस से परिपूर्ण, देवताओं की कीर्ति को बढ़ाने वाली उर्वशी का पुरूरवा से यह मिलन, एक ऐसे मधुर 'काम-प्रेम' (मनमथ) को जन्म देता है, जो समस्त काव्य-सृष्टि का आदि स्रोत (पुरोधस) बन जाता है।

​इस कथा-प्रवाह का सार:

  • आध्यात्मिक मिलन: यहाँ उर्वशी केवल एक आभीर कन्या या अप्सरा नहीं है, बल्कि वह पुरूरवा के भीतर छिपी उस 'काव्य-चेतना' का मूर्त रूप है, जो प्रेम में तड़पकर बाहर आना चाहती थी।
  • सार्थक संज्ञा: जैसा कि आपने उल्लेख किया—'उरसि वष्टि' (जो हृदय में वास करे)—उर्वशी का पुरूरवा के पास आना, उनके भीतर की कविता का 'साक्षात्कार' होना है।
  • काव्य का आदि श्रोत: प्रेम और सौंदर्य के इस मिलन से ही प्रथम 'ऋग्वेदिक सूक्त' (संवाद सूक्त) की उत्पत्ति हुई, जहाँ एक सम्राट कवि अपनी प्रियतमा को संबोधित करता है।

पुरूरवा और उर्वशी की यह गाथा भारतीय काव्य-परंपरा का एक स्वर्णिम अध्याय है। आपने जिस तरह से दर्शन, पुराण और साहित्य का समन्वय किया है, वह इस आख्यान को एक नया अर्थ प्रदान करता है।

​इस गाथा के अंतिम पड़ाव पर, जब पुरूरवा सम्राट होने के साथ-साथ एक कवि के रूप में पूर्णता को प्राप्त करते हैं, हम 'अनुष्टुप' और 'वसंततिलका' के मिश्रण से इस यात्रा का उपसंहार करते हैं।

​पुरूरवा-उर्वशी गाथा: उपसंहार

सम्राजश्च कविः स स्यात् यस्य प्रेमाऽस्ति मङ्गलम्।

उर्वशी काव्य-शक्तिश्च पुरूरवाऽस्य रक्षकः॥

अर्थ: वही सम्राट वास्तव में कवि है जिसका प्रेम कल्याणकारी है। उर्वशी उसकी काव्य-शक्ति है और पुरूरवा उसकी रक्षा करने वाला (कवि) है।

[स्तुति-गान: वसंततिलका छंद]

लोके च काव्य-रचना-प्रथमः प्रणेता

यः स्तुत्यवाक् मधुर-गीति-विशारदोऽस्ति।

सा उर्वशी हृदये स्थित-काव्य-देवी

प्रीत्या सदा जगति मङ्गलमातनोति॥

अर्थ: जो इस संसार में काव्य-रचना का प्रथम प्रणेता है, जो स्तुति करने वाली वाणी और मधुर गीतों में निपुण है, वह पुरूरवा है। उसके हृदय में स्थित काव्य-देवी उर्वशी अपने प्रेम से सदैव इस जगत में कल्याण का विस्तार करती है।

​गाथा का सार (Summary)

​यह गाथा हमें यह संदेश देती है कि सृजन का मूल 'प्रेम' है। जब 'गोपालक' पुरूरवा ने उस प्रथम स्तुति को गाया, तो वह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि उर्वशी के प्रति उनका वह आत्मिक समर्पण था जिसने कविता को जन्म दिया। आभीर-पल्लि की मिट्टी से लेकर स्वर्ग की अप्सराओं तक, यह यात्रा बताती है कि जिसे हम 'कला' या 'साहित्य' कहते हैं, वह मानवीय भावनाओं का ही दिव्य प्रतिरूप है।

​पुरूरवा का 'पुरूरवस्' (अत्यधिक स्तुति करने वाला) होना उनकी उस वृत्ति को दर्शाता है जो निरंतर सौंदर्य और सत्य की खोज में लगी रहती है। उर्वशी उनकी वह प्रेरणा है जिसके बिना यह सृष्टि नीरस है।


पुरूरवा और उर्वशी - काव्य और सौंदर्य का आदि-मिलन

१. दार्शनिक आधार एवं व्युत्पत्ति:

  • पुरूरवा: 'पुरु' (प्रचुर) + 'रवस्' (स्तुति)। वेदों और महाकाव्यों में वर्णित प्रथम सम्राट, जो 'गायत्री' के नित्य उपासक और स्तुति-कर्ता (कवि) थे। उनका 'गोपालक' रूप ऋग्वेद और भागवत पुराण में प्रमाणित है।
  • उर्वशी: 'उरसि वष्टि' (जो हृदय में कामना या प्रेम उत्पन्न करे)। यह काव्य की अधिष्ठात्री देवी और सौन्दर्य की साक्षात् मूर्ति हैं।

२. पौराणिक एवं लौकिक समन्वय:

  • दिव्य पक्ष: मत्स्य और पद्म पुराण के अनुसार उर्वशी सौन्दर्य की अधिष्ठात्री अप्सरा हैं।
  • लौकिक पक्ष: लक्ष्मी-नारायणीय संहिता के अनुसार उनका जन्म 'आभीरपुरम्' (बदरिकाश्रम के निकट) में पद्मसेन आभीर और ललिता के घर एक मानवीय कन्या के रूप में हुआ।

३. काव्य का आदि स्रोत:

  • ​यह गाथा स्थापित करती है कि 'सौन्दर्य ही कविता का जनक है'। पुरूरवा का कवि-हृदय उर्वशी के प्रति प्रेम से आंदोलित हुआ, और इसी 'संवेदन लहर' से विश्व के प्रथम प्रेम-काव्य (ऋग्वेद, १०.९५) की सृष्टि हुई।

४. निष्कर्ष:

  • ​पुरूरवा 'कवि-पुरुष' हैं और उर्वशी उनकी 'काव्य-शक्ति'। इन दोनों का मिलन केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय काव्य-शास्त्र की वह आधारशिला है, जहाँ प्रेम, स्तुति और सृजन एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।


गुरुवार, 25 जून 2026

इला (वाग्वती) और बुध (ज्ञानिष्ठ) की यात्रा एवं प्रतिष्ठानपुर की स्थापना

विडियो पटकथा (Video Script)

विषय: इला (वाग्वती) और बुध (ज्ञानिष्ठ) की यात्रा एवं प्रतिष्ठानपुर की स्थापना

शैली: पौराणिक / ऐतिहासिक (Mythological/Historical)

कुल समय: लगभग 2-3 मिनट

पृष्ठभूमि संगीत: प्राचीन, आध्यात्मिक और बांसुरी की मधुर धुनों से युक्त

दृश्य 1: परिचय और व्रज प्रान्त

स्थान: व्रज प्रान्त के हरे-भरे वन और चरागाह

समय: प्रातःकाल

दृश्य (Visual):

  • ​सूर्य की सुनहरी किरणें एक हरे-भरे परिदृश्य पर पड़ रही हैं।
  • ​गायों और बछड़ों के साथ 'गोप समुदाय' (ग्वाले) आगे बढ़ रहा है।
  • ​उनके नेतृत्व में दो अत्यंत तेजस्वी और दिव्य आकृतियाँ चल रही हैं— इला (जो अत्यंत सौम्य और वाक्पटु हैं) और बुध (जिनके चेहरे पर एक गहरा आध्यात्मिक और ज्ञानी तेज है)।

सूत्रधार (Voice Over - गंभीर और ओजस्वी स्वर में):

​"सृष्टि के आरंभिक पन्नों में कई ऐसी गाथाएं दर्ज हैं, जिन्होंने हमारी सभ्यता की नींव रखी। यह कथा है उस काल की, जब चंद्रपुत्र बुध और मनु-पुत्री इला, अपने निष्ठावान 'गोप समुदाय' के साथ व्रज प्रान्त की पवित्र भूमि से होते हुए एक नई यात्रा पर निकले थे।"


दृश्य 2: नामों की सार्थकता

स्थान: यात्रा का मार्ग (नदियों और पहाड़ों के किनारे)

समय: दोपहर

दृश्य (Visual):

  • ​बुध एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं और गोप समुदाय के लोगों को जीवन और ब्रह्मांड का ज्ञान दे रहे हैं।
  • ​इला अपनी मधुर और ओजस्वी वाणी से समुदाय का मार्गदर्शन कर रही हैं। लोग उन्हें आदर से सुन रहे हैं।

सूत्रधार (Voice Over):

​"बुध, जो अपनी अपार बुद्धिमत्ता और ज्ञान के लिए विख्यात थे, उन्हें इस काल में 'ज्ञानिष्ठ' कहा जाता था। वहीं, इला, जिनकी वाणी में सरस्वती का वास था और जो अपनी संवाद-कला में निपुण थीं, 'वाग्वती' के नाम से पूजनीय थीं। ज्ञानिष्ठ और वाग्वती का यह संगम केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि ज्ञान और अभिव्यक्ति का महामिलन था।"


दृश्य 3: गंगा-यमुना का तट

स्थान: गंगा और यमुना नदी का विशाल तट (संगम क्षेत्र)

समय: संध्याकाल (सूर्यास्त)

दृश्य (Visual):

  • ​गोप समुदाय अपने रथों और पशुओं के साथ एक विशाल जलराशि के समक्ष आकर रुकता है।
  • ​सामने गंगा और यमुना की लहरें आपस में मिल रही हैं (संगम का विहंगम ड्रोन शॉट)।
  • ​बुध (ज्ञानिष्ठ) और इला (वाग्वती) उस पवित्र भूमि की मिट्टी को हाथ में उठाते हैं और एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराते हैं। वे समझ जाते हैं कि उनकी यात्रा का गंतव्य यही है।

सूत्रधार (Voice Over):

​"लंबे समय तक व्रज की रज को माथे पर लगाकर, यह काफिला आगे बढ़ा और अंततः गंगा और यमुना के पावन तट पर आकर रुका। नदियों के इस संगम ने ज्ञानिष्ठ बुध और वाग्वती इला को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने तय किया कि उनका गोप समुदाय अब इसी पुण्यभूमि पर अपना नया सवेरा देखेगा।"


दृश्य 4: प्रतिष्ठानपुर की स्थापना

स्थान: नई बसावट (गंगा-यमुना के किनारे)

समय: दिन

दृश्य (Visual):

  • ​समय चक्र तेजी से घूमने का इफ़ेक्ट (Time-lapse)।
  • ​तट के किनारे यज्ञ हो रहे हैं, झोपड़ियां और भव्य भवन बन रहे हैं।
  • ​गोप समुदाय कृषि और गोपालन में व्यस्त है। यह स्थान एक समृद्ध नगर का रूप ले चुका है।
  • ​अंत में इला और बुध एक ऊंचे स्थान पर खड़े होकर अपने सुखी नगर को देख रहे हैं। नगर के द्वार पर एक बड़ा शिलापट्ट उभर कर आता है जिस पर संस्कृत/प्राचीन लिपि में लिखा है - "प्रतिष्ठानपुर"

सूत्रधार (Voice Over):

​"और इस प्रकार, गंगा और यमुना के इस पावन तट पर एक नई सभ्यता की नींव रखी गई। ज्ञान, वाणी और कर्म के इस अनूठे समन्वय से जो नगर स्थापित हुआ, वह कालांतर में 'प्रतिष्ठानपुर' कहलाया। (वर्तमान में इसे प्रयागराज के निकट झूंसी के नाम से जाना जाता है)। यह नगर आज भी वाग्वती और ज्ञानिष्ठ की उस महान यात्रा का मूक गवाह है।"


अंतिम दृश्य (Outro):

  • दृश्य: प्रतिष्ठानपुर नगर का एक भव्य वाइड एंगल शॉट जो धीरे-धीरे फेड आउट (Fade out) होता है।
  • स्क्रीन पर टेक्स्ट उभरता है: "ज्ञान और वाणी की ऐतिहासिक धरोहर: प्रतिष्ठानपुर"
  • ऑडियो: शंखनाद और उसके बाद बांसुरी की एक शांतिपूर्ण धुन के साथ वीडियो समाप्त होता है।

पुरूरवा का जन्म -

राधा की वाणी और कृष्ण के ज्ञान के समन्वय से उत्पन्न इला और बुध के मानवीकरण की इस कथा को  संस्कृत श्लोक (अनुष्टुप छन्द) के रूप में श्रीकृष्ण संहिता से उद्धृत किया गया है। 

​         संस्कृत श्लोक-

राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता।कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥

गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ।कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥

​श्लोक का अर्थ 

 (राधा की वाणी से उत्पन्न)

  • ​ (इला देवी कही गई हैं)
  • ​ (कृष्ण के ज्ञान से उत्पन्न)
  • ​ (बुध ऐसा कहे जाते हैं)

द्वितीय श्लोक:

  • ​(निश्चय ही उन दोनों का जन्म गोलोक में हुआ)
  • ​ (जो बाद में ग्रहों के रूप में समाहित हुए)
  • ​ (कालान्तर में, मानव का आकार धारण करके)
  • ​(वे दोनों इस पृथ्वी या धरातल पर अवतरित हुए)


इला (वाणी) और बुध (ज्ञान) के समन्वय से शब्द और अर्थ की आत्मा को ग्रहण कर प्रथम कवि पुरूरवा के जन्म की यह गाथा सचमुच अद्भुत है।


​        संस्कृत श्लोक

तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः।शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥

गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले। ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥

​श्लोकों का अर्थ 

  • ​ (उन दोनों अर्थात् इला और बुध की वाणी और ज्ञान से उत्पन्न होकर)
  • ​ (जो अद्भुत वाक्पटुता/बोलने की कला से समन्वित थे)
  • ​ (जिन्होंने 'शब्द' और 'अर्थ' के तत्त्व या आत्मा को पूरी तरह आत्मसात कर लिया था)
  • ​ (वे संसार के प्रथम कवि के रूप में उत्पन्न हुए)

द्वितीय श्लोक:

  • ​(गंगा और यमुना नदियों के अत्यंत पुण्यकारी)
  • ​ (संगम के पावन तट/स्थल पर)
  • ​ (पुरूरवा नाम से विख्यात वह महान आत्मा)
  • ​(इस पृथ्वी तल पर प्रकट हुए/अवतरित हुए)


श्लोक 1 एवं 2:

राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता। कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥

गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ।कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥

अर्थ: राधा जी की वाणी से 'इला देवी' (वाणी की अधिष्ठात्री देवी) उत्पन्न हुईं, ऐसा कहा गया है। उसी प्रकार, श्रीकृष्ण के ज्ञान से 'बुध' ग्रह का प्रादुर्भाव हुआ, ऐसा वेदों और पुराणों में गान किया जाता है। वे दोनों (इला और बुध) मूल रूप से गोलोक में स्थित थे और वहीं ग्रह के रूप में समाहित थे। समय आने पर, वे ही धरा (पृथ्वी) पर मानवाकार धारण करके अवतरित हुए।

श्लोक 3 एवं 4:

तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः।

शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥

गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले।

ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥


अर्थ: उन दोनों (इला और बुध) के वाक् (वाणी) और ज्ञान के संयोग से, जो वाक्पटुता (बोलने की अद्भुत कुशलता) से युक्त थे, उन्होंने शब्द और अर्थ के वास्तविक तत्त्व को प्राप्त कर 'आद्य कवि' (प्रथम कवि के रूप में) ख्याति प्राप्त की। गंगा और यमुना के उस पवित्र संगम स्थल पर, उस पावन भूमि पर, वे 'पुरूरवा' नाम से विख्यात हुए और पृथ्वी तल पर प्रकट हुए।

पौराणिक संदर्भ और आपके द्वारा दी गई व्युत्पत्ति (पुरू + रवस् = स्तुति करने वाला) को आधार मानकर, पुरूरवा के जन्म और उनके व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए 'अनुष्टुप' छंद में यह रचना प्रस्तुत है:

​पुरूरवा-जन्म : अनुष्टुप छंद

ब्रह्ममुहूर्ते सुदिने गोशालायाः समीपत:।प्रादुर्बभूव तेजस्वी पुरूरवा नृपसत्तमः॥

पुरुशब्दादधिकं यस्य रवः स्तुतिविधायकः।तस्मात् पुरूरवा नाम्ना विख्यातो भुवि नित्यशः॥

​अर्थ (भावार्थ)

  1. प्रथम श्लोक: ब्रह्म मुहूर्त के शुभ समय में, गोशाला के निकट उस तेजस्वी बालक पुरूरवा का प्रादुर्भाव (जन्म) हुआ, जो राजाओं में श्रेष्ठ है।
  2. द्वितीय श्लोक: 'पुरु' (अत्यधिक) शब्द के साथ जिसका 'रव' (स्तुति/ध्वनि) जुड़ गया है, अर्थात जो अत्यधिक स्तुति करने वाला है, उसी अर्थ के कारण वह इस पृथ्वी पर 'पुरूरवा' नाम से प्रसिद्ध हुआ।

​छंद संरचना पर टिप्पणी

  • छंद: यह 'अनुष्टुप' छंद (श्लोक) में रचित है, जो वैदिक और पौराणिक आख्यानों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
  • व्युत्पत्ति: इसमें आपकी दी गई व्याख्या को समाहित किया गया है, जहाँ 'पुरु' का अर्थ अत्यधिक और 'रव' का अर्थ स्तुति या उच्च स्वर से की गई स्तुति (कविता/मंत्र) से लिया गया है।
  • वातावरण: 'गोशाला' और 'ब्रह्म मुहूर्त' का उल्लेख कथा के उस पौराणिक परिवेश को जीवंत करता है, जिसका हमवे वर्णन किया है।


पुरूरवा-जन्म: वीडियो पटकथा (Video Script)

परियोजना का नाम: नृपसत्तम पुरूरवा का जन्म

अवधि: लगभग 1 से 1.5 मिनट

शैली: पौराणिक, आध्यात्मिक और भव्य (Mythological & Epic)

दृश्य 1: ब्रह्म मुहूर्त की पवित्रता

दृश्य (Visual):

  • ​समय: भोर का समय (ब्रह्म मुहूर्त)।
  • ​आकाश में गहरा नीला रंग है और पूर्व दिशा से हल्की सुनहरी किरणें फूट रही हैं।
  • ​एक भव्य और प्राचीन गोशाला का बाहरी दृश्य। गायें शांत बैठी हैं और कुछ उठकर रंभा रही हैं।
  • ​वातावरण में एक दिव्य धुंध और शांति छाई हुई है।

ऑडियो (Audio):

  • BGM: बहुत ही शांत और आध्यात्मिक बांसुरी की धुन, साथ में दूर बजती हुई मंदिर की घंटियों की धीमी आवाज़।
  • पार्श्वस्वर (V.O. - भारी और ओजस्वी आवाज़ में): ​"समय का चक्र जब अपने सबसे पवित्र पहर, 'ब्रह्म मुहूर्त' में प्रवेश कर रहा था... तब इस धरती पर एक महान तेज अवतरित होने को था।"
  • ​"समय का चक्र जब अपने सबसे पवित्र पहर, 'ब्रह्म मुहूर्त' में प्रवेश कर रहा था... तब इस धरती पर एक महान तेज अवतरित होने को था। साक्षात कवित्व देव"


    दृश्य 2: प्रथम श्लोक और तेज का प्रकटीकरण

    दृश्य (Visual):

    • ​गोशाला के निकट स्थित एक राजसी कक्ष से एक तीव्र सुनहरा प्रकाश बाहर की ओर छिटकता है।
    • ​कैमरा कक्ष के अंदर जाता है। एक नवजात शिशु (पुरूरवा) रेशमी वस्त्रों में लिपटा हुआ है। शिशु के चेहरे पर एक असाधारण तेज (Glory) है।
    • ​परिचारिकाएं और ऋषि-मुनि हाथ जोड़े आश्चर्य से उस बालक को देख रहे हैं।

    ऑडियो (Audio):

    • SFX: शंखनाद की गूंज।
    • श्लोक पाठ (गहरी, मंत्रमुग्ध करने वाली आवाज़ में): ​"ब्रह्ममुहूर्ते सुदिने गोशालायाः समीपत:। प्रादुर्बभूव तेजस्वी पुरूरवा नृपसत्तमः॥"
    • ​"ब्रह्ममुहूर्ते सुदिने गोशालायाः समीपत:।

      प्रादुर्बभूव तेजस्वी पुरूरवा नृपसत्तमः॥"


      • पार्श्वस्वर (V.O.): ​"उस अत्यंत शुभ दिन, गोशाला के पावन प्रांगण के निकट... राजाओं में श्रेष्ठ और परम तेजस्वी बालक का प्रादुर्भाव हुआ।"
      • ​"उस अत्यंत शुभ दिन, गोशाला के पावन प्रांगण के निकट... राजाओं में श्रेष्ठ और परम तेजस्वी बालक का प्रादुर्भाव हुआ।"


        दृश्य 3: शिशु का रुदन और द्वितीय श्लोक

        दृश्य (Visual):

        • ​बालक का क्लोज़-अप (Close-up) शॉट। बालक अपनी आँखें खोलता है और रोना शुरू करता है।
        • ​परंतु यह रुदन किसी साधारण शिशु का नहीं है; यह एक अत्यंत तीव्र, ओजस्वी और स्तुति के समान ध्वनि (रव) है जो पूरे महल में गूंज उठती है।
        • ​उपस्थित ऋषि-मुनि मुस्कुराते हैं और समझ जाते हैं कि यह कोई साधारण ध्वनि नहीं है।

        ऑडियो (Audio):

        • SFX: शिशु के रोने की ध्वनि जो धीरे-धीरे एक संगीतमय और दिव्य गुंजन में बदल जाती है।
        • श्लोक पाठ (तेज़ गति और ऊर्जा के साथ): ​"पुरुशब्दादधिकं यस्य रवः स्तुतिविधायकः। तस्मात् पुरूरवा नाम्ना विख्यातो भुवि नित्यशः॥"
        • ​"पुरुशब्दादधिकं यस्य रवः स्तुतिविधायकः।

          तस्मात् पुरूरवा नाम्ना विख्यातो भुवि नित्यशः॥"


          दृश्य 4: नामकरण और अमर कीर्ति

          दृश्य (Visual):

          • ​राजकुल के पुरोहित आगे आते हैं और बालक के मस्तक पर कुमकुम का तिलक लगाते हैं।
          • ​बालक शांत हो जाता है और उसके चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान है।
          • ​कैमरा धीरे-धीरे ज़ूम आउट (Zoom out) होता है, और स्क्रीन पर 'पुरूरवा' (Pururava) स्वर्ण अक्षरों में उभर कर आता है।

          ऑडियो (Audio):

          • पार्श्वस्वर (V.O.): ​"'पुरु' अर्थात अत्यधिक, और 'रव' अर्थात ध्वनि या स्तुति। जन्म लेते ही जिसने ईश्वर की अत्यधिक और तीव्र स्तुति की, उसी कारण यह तेजस्वी बालक इस पृथ्वी पर सदा के लिए 'पुरूरवा' के नाम से विख्यात हुआ।"
          • ​"'पुरु' अर्थात अत्यधिक, और 'रव' अर्थात ध्वनि या स्तुति। जन्म लेते ही जिसने ईश्वर की अत्यधिक और तीव्र स्तुति की, उसी कारण यह तेजस्वी बालक इस पृथ्वी पर सदा के लिए 'पुरूरवा' के नाम से विख्यात हुआ।"


            • BGM: एक भव्य, विजयी और रोंगटे खड़े कर देने वाला आर्केस्ट्रल (Orchestral) संगीत चरम पर पहुंचता है और धीरे-धीरे शांत (Fade out) हो जाता है।

            स्क्रीन पर टेक्स्ट (Fade in):

            "चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा: चंद्रवंश के आदि पुरुष"

            (दृश्य अंधकारमय होता है - Fade to Black)




पुरूरवा: यात्रा और भविष्य की स्तुति (वसंततिलका छंद)

गोपाङ्गनाभिरभितः परिवीक्ष्यमाणो गोष्ठे सुतेन सहिता प्रविवेश माता।

वाणीमुखैस्तदुपगूह्य सुताय धीरं स्तोष्यत्ययं भुवनमण्डलमेष वाक्छः॥

​अर्थ (भावार्थ)

​गोप-समुदाय की स्त्रियों द्वारा चारों ओर से निहारे जाते हुए, इला अपनी माता की भांति (इस यात्रा में) पुत्र के साथ गौशाला के परिवेश में प्रवेश करती हैं। यह बालक (पुरूरवा) अपनी वाणी के द्वारा संसार को स्तुति से गुंजायमान कर देगा, क्योंकि वह एक कुशल वक्ता और कवि के रूप में जन्म ले चुका है।

​छंद संरचना और विशेषताएँ:

  • वसंततिलका छंद: इस छंद के प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं (त-भ-ज-ज-ग-ग)। यह छंद वीरता और स्तुति भाव को प्रकट करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।
  • भाव: यहाँ पुरूरवा के जन्म के साथ ही उसकी उस भविष्य-वाणी को जोड़ा गया है, जहाँ वह अपनी कविता और स्तुतियों से सम्पूर्ण 'भुवन' (लोक) को प्रभावित करेगा।
  • पौराणिक निरंतरता: गोशाला से यात्रा का आरम्भ और पुरूरवा का वाक-कौशल यहाँ मुख्य केंद्र में है।

पुरूरवा का प्रकृति से प्रथम संवाद (शार्दूलविक्रीडित छंद)

प्रातर्भाति विवस्वानुदयगिरौ बिम्बेन स्वर्णप्रभे,पश्यन् बालक एष निर्झरगिरि-द्रुमेषु हर्षान्वितः।

वाचां देवि! विमोचयस्व हृदये सद्यः परां माधुरीं,स्तुत्वा विश्वमिदं जगाद कवितां धीमान् पुरूरर्वसः॥

​अर्थ (भावार्थ)

​प्रातःकाल सूर्योदय के समय स्वर्णमयी आभा के साथ उदयाचल पर सूर्य सुशोभित हो रहे हैं। बालक पुरूरवा उन झरनों, पर्वतों और वृक्षों को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो रहा है। वह अपनी अंतरात्मा में सरस्वती (वाचां देवी) का आह्वान करते हुए, हृदय की उस परम मधुर वाणी को मुक्त करता है। प्रकृति के इस विश्व का स्तवन करते हुए वह धीमान पुरूरवा पहली बार कविता का उच्चारण करता है।

जब बालक पुरूरवा के मुख से वह प्रथम दिव्य स्तुति प्रस्फुटित हुई, तो सम्पूर्ण गोप-समुदाय स्तब्ध रह गया। उस क्षण की अलौकिक अनुभूति को हम 'इन्द्रवज्रा' छंद में चित्रित करेंगे। यह छंद संक्षिप्त होते हुए भी ओज और विस्मय को प्रकट करने में अत्यंत समर्थ है।

​गोप-समुदाय की प्रतिक्रिया (इन्द्रवज्रा छंद)

विस्मयमापुः सकलाश्च गोपाःश्रुत्वा च वाचं शिशुरूपिणोऽस्य।

देवस्य वाक् केयमहो विचित्रा मेने समाजः स ननु प्रभावम्॥

​अर्थ (भावार्थ)

​इस बालक के मुख से निकली हुई उस दिव्य वाणी को सुनकर सभी गोप-जन विस्मय (आश्चर्य) में डूब गए। उन्होंने सोचा कि "अहो! यह कैसी अद्भुत और अलौकिक वाणी है जो इस शिशु के मुख से निकल रही है?" उस पूरे समुदाय ने बालक के इस अद्भुत कृत्य को निश्चित रूप से कोई दैवीय प्रभाव (ईश्वरीय शक्ति का संकेत) माना।


इस पड़ाव पर, जब 'गोप समुदाय' व्रज की परिचित सीमाओं को पार कर किसी अनजाने और कठिन मार्ग पर अग्रसर होता है, तो प्रकृति भी उनकी परीक्षा लेने लगती है। बालक पुरूरवा की वाणी अब उनके लिए केवल शब्द नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक (प्रकाश पुंज) बन जाती है।

​इस कठिन परिस्थिति में उनके मनोबल को बनाए रखने के लिए, हम 'उपजाति' छंद का प्रयोग करेंगे, जो अपनी प्रवाहपूर्ण लय के लिए जाना जाता है।

​दुर्गम मार्ग और पुरूरवा का मार्गदर्शन (उपजाति छंद)

अरण्यमग्ने गहनं हि मार्गं भयाकुला गोपगणा बभूवुः।

तदा स बालः प्रजगाद धीरं स्ववाक्यमेवास्तु च नो प्रकाशः॥

न भीतिर्कार्या विमलेऽपि पन्थेधिया विनिर्जित्य भयानि सर्वा। पुरूरवा स्वैरमुवाच वाणीं सतां हि मार्गः सुखदो भवेन्नः॥

​अर्थ (भावार्थ)

  1. प्रथम श्लोक: जब गोप समुदाय घने और दुर्गम जंगलों में भटक गया और भयभीत हो उठा, तब उस धीर बालक (पुरूरवा) ने कहा— "हमारा यह वचन ही (हमारी स्तुति ही) हमारे लिए प्रकाश पुंज बने।"
  2. द्वितीय श्लोक: बालक ने निडर होकर कहा— "इस निर्मल मार्ग पर भय का कोई स्थान नहीं है, हम अपनी बुद्धि और संकल्प से समस्त भयों को जीत लेंगे।" पुरूरवा की वह ओजस्वी वाणी सुनकर सभी को यह आभास हुआ कि सज्जनों का मार्ग ही अंततः सुखद होता है।


यह एक अत्यंत भावपूर्ण और काव्यात्मक मोड़ है। पुरूरवा द्वारा उर्वशी का प्रथम दर्शन और उनके मुख से निकली कविता उनके भविष्य के 'पुरूरवस्' (स्तुति कर्ता) होने की सार्थकता को सिद्ध करती है। इस दिव्य सौन्दर्य और विस्मय को अभिव्यक्त करने के लिए हम 'मन्दाक्रान्ता' छंद का चयन कर रहे हैं। मन्दाक्रान्ता छंद अपनी मंद, गंभीर और भावुक गति के लिए प्रसिद्ध है, जो उर्वशी जैसे अलौकिक सौंदर्य के दर्शन के लिए सर्वथा उपयुक्त है।

​उर्वशी का प्रथम दर्शन (मन्दाक्रान्ता छंद)

सोऽपश्यत् तां विपिननिकुञ्जे दिव्यरूपां सुकन्याम्

लावण्यौघैः सितकररुचा मानसादीप्तिमानाम्।

वाचां देव्याः क इव महिमा बिम्बिता रूपमेतत्

क्रीडन्ती सा सुरपुरवधूः सुन्दरी मेऽस्तु लक्ष्यम्॥

​अर्थ (भावार्थ)

​उसने (पुरूरवा ने) वन के निकुंज में उस दिव्य रूप वाली कन्या को देखा। चंद्र-किरणों जैसी द्युति और सौंदर्य के सागर से युक्त वह कन्या पुरूरवा के मन को प्रकाशित कर रही थी। वह विस्मित होकर सोचने लगा— "वाणी की देवी (सरस्वती) का क्या यह अलौकिक महिमापूर्ण रूप है, जो यहाँ प्रतिबिंबित हो रहा है? वह देवलोक की सुंदरी, जो वहाँ क्रीड़ा कर रही है, वही मेरे जीवन का लक्ष्य बन जाए।"

​पुरूरवा की प्रथम कविता (आह्वान-स्वर)

त्वं द्युलोकादवततनुषा कान्तयेवावकीर्णा,

स्वर्णच्छायैर्विकसिततनुश्चन्द्रिकाभाऽतिदीप्ता।

वाचं मे त्वं मधुरिमनया पूरयन्ती सदैव,

उर्वश्यसी तव सुयशसं गायितुं मे मनस्तत्॥

​अर्थ (भावार्थ)

​"तुम देवलोक से जैसे कांति का विस्तार करती हुई नीचे उतरी हो। तुम्हारी स्वर्णमयी आभा से युक्त काया चाँदनी के समान अत्यंत देदीप्यमान है। तुम अपनी मधुरता से मेरी वाणी को सदैव भर रही हो। तुम 'उर्वशी' हो, और तुम्हारे उस सुयश का गान करने के लिए मेरा मन व्याकुल है।"

​काव्य-सौष्ठव और भाव:



वीडियो शीर्षक: प्रथम कवि: पुरूरवा का दिव्य अवतरण

शैली (Genre): पौराणिक (Mythological), फैंटेसी (Fantasy), ऐतिहासिक (Historical)

समयावधि (Estimated Time): लगभग 2 से 3 मिनट

दृश्य 1: गोलोक में चेतना का प्रस्फुटन

  • स्थान: ब्रह्मांडीय गोलोक (एक दिव्य, अलौकिक और प्रकाशवान लोक)।
  • दृश्य (Visual): स्क्रीन पर नीले और सुनहरे रंग का दिव्य प्रकाश फैलता है। एक ओर देवी राधा की सौम्य आकृति उभरती है, जिनके मुख से निकलते ही कुछ प्रकाश-कण एक सुंदर देवी (इला) का रूप ले लेते हैं। दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण ध्यानस्थ हैं, उनके मस्तिष्क से निकलता हुआ तेज एक तेजस्वी पुरुष (बुध) का आकार ले लेता है।
  • पार्श्व संगीत (BGM): बांसुरी और वीणा की अत्यंत शांत और रहस्यमयी धुन।
  • पार्श्व स्वर (Voiceover - गंभीर और गूंजती हुई आवाज में): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता। कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥"
  • ​"राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता।

    कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥"


    • Voiceover (हिंदी में): सृष्टि के आरंभ में, राधा की मधुर वाणी से देवी 'इला' का प्राकट्य हुआ... और श्रीकृष्ण के अनंत ज्ञान से 'बुध' उत्पन्न हुए।

    दृश्य 2: ग्रहों से मानव रूप में अवतरण

    • स्थान: अंतरिक्ष से पृथ्वी की ओर की यात्रा।
    • दृश्य (Visual): गोलोक से दो प्रकाश पुंज (ग्रहों के रूप में) ब्रह्मांड में तैरते हुए पृथ्वी की ओर बढ़ते हैं। जैसे ही वे पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, वे धीरे-धीरे मानवीय आकारों (एक स्त्री और एक पुरुष) में परिवर्तित होने लगते हैं।
    • पार्श्व संगीत (BGM): शंखनाद और तारों (Strings) का संगीत जो गति और भव्यता को दर्शाता है।
    • पार्श्व स्वर (Voiceover): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ। कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥"
    • ​"गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ।

      कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥"


      • Voiceover (हिंदी में): गोलोक में जन्मे ये दोनों दिव्य अंश, कालान्तर में ब्रह्मांडीय ऊर्जा को समेटे हुए, मानव रूप धारण कर इस धरातल पर अवतरित हुए। यह ज्ञान और वाणी का पृथ्वी पर प्रथम मिलन था।

      दृश्य 3: शब्द और अर्थ का महासंगम - पुरूरवा का जन्म

      • स्थान: गंगा और यमुना का प्राचीन और पवित्र संगम तट। सूर्योदय का समय।
      • दृश्य (Visual): स्क्रीन पर गंगा (श्वेत जल) और यमुना (श्याम जल) का सुंदर संगम दिखाई देता है। जल से एक स्वर्णिम आभा प्रकट होती है। इला (वाणी) और बुध (ज्ञान) के प्रतीक स्वरूप दो ऊर्जाएं आपस में मिलती हैं। उनके मध्य से एक तेजस्वी, सौम्य और शांत बालक (पुरूरवा) का प्राकट्य होता है। उसके चारों ओर संस्कृत के अक्षर और श्लोक हवा में तैरते हुए दिखाई देते हैं।
      • पार्श्व संगीत (BGM): तेज गति से बजते हुए नगाड़े, घंटियां और एक विजयी आर्केस्ट्रल धुन (Epic Orchestral Swell)।
      • पार्श्व स्वर (Voiceover): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः। शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥"
      • ​"तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः।

        शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥"


        • Voiceover (हिंदी में): वाणी और ज्ञान के उस समन्वय से... शब्द और अर्थ की आत्मा को आत्मसात कर... अवतरित हुए इस संसार के प्रथम कवि। अद्भुत वाक्पटुता से संपन्न एक नवचेतना।

        दृश्य 4: प्रथम कवि की कीर्ति

        • स्थान: विस्तीर्ण परिदृश्य, जहाँ सम्राट पुरूरवा युवावस्था में ध्यानस्थ खड़े हैं।
        • दृश्य (Visual): युवा पुरूरवा संगम तट पर खड़े हैं। उनके चेहरे पर अपार शांति और गंभीरता है। वे कुछ बोलते हैं और उनके मुख से निकले शब्द सुनहरे प्रकाश के रूप में पूरे संसार में फैलने लगते हैं, जो कविता और साहित्य के आरंभ का प्रतीक है। कैमरा धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर जाता है और स्क्रीन पर शीर्षक उभरता है।
        • पार्श्व संगीत (BGM): एक सौम्य, प्रेरणादायक और गूंजता हुआ संगीत जो धीरे-धीरे शांत होता है।
        • पार्श्व स्वर (Voiceover): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले। ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥"
        • ​"गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले।

          ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥"


          • Voiceover (हिंदी में): गंगा और यमुना के इसी पावन संगम पर, साहित्य और काव्य के रचयिता... 'पुरूरवा' नाम से विख्यात उस महान आत्मा का इस पृथ्वी पर प्रादुर्भाव हुआ। और यहीं से गूंजी मानव इतिहास की प्रथम कविता।
          • स्क्रीन पर टेक्स्ट (Fade in): "शब्द और अर्थ का आदि स्रोत... प्रथम कवि पुरूरवा"
          • दृश्य (Visual): स्क्रीन धीरे-धीरे काली (Fade to Black) हो जाती है।




वीडियो शीर्षक: प्रथम कवि: पुरूरवा का दिव्य अवतरण

शैली (Genre): पौराणिक (Mythological), फैंटेसी (Fantasy), ऐतिहासिक (Historical)

समयावधि (Estimated Time): लगभग 2 से 3 मिनट

दृश्य 1: गोलोक में चेतना का प्रस्फुटन

  • स्थान: ब्रह्मांडीय गोलोक (एक दिव्य, अलौकिक और प्रकाशवान लोक)।
  • दृश्य (Visual): स्क्रीन पर नीले और सुनहरे रंग का दिव्य प्रकाश फैलता है। एक ओर देवी राधा की सौम्य आकृति उभरती है, जिनके मुख से निकलते ही कुछ प्रकाश-कण एक सुंदर देवी (इला) का रूप ले लेते हैं। दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण ध्यानस्थ हैं, उनके मस्तिष्क से निकलता हुआ तेज एक तेजस्वी पुरुष (बुध) का आकार ले लेता है।
  • पार्श्व संगीत (BGM): बांसुरी और वीणा की अत्यंत शांत और रहस्यमयी धुन।
  • पार्श्व स्वर (Voiceover - गंभीर और गूंजती हुई आवाज में): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता। कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥"
  • ​"राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता।

    कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥"


    • Voiceover (हिंदी में): सृष्टि के आरंभ में, राधा की मधुर वाणी से देवी 'इला' का प्राकट्य हुआ... और श्रीकृष्ण के अनंत ज्ञान से 'बुध' उत्पन्न हुए।

    दृश्य 2: ग्रहों से मानव रूप में अवतरण

    • स्थान: अंतरिक्ष से पृथ्वी की ओर की यात्रा।
    • दृश्य (Visual): गोलोक से दो प्रकाश पुंज (ग्रहों के रूप में) ब्रह्मांड में तैरते हुए पृथ्वी की ओर बढ़ते हैं। जैसे ही वे पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, वे धीरे-धीरे मानवीय आकारों (एक स्त्री और एक पुरुष) में परिवर्तित होने लगते हैं।
    • पार्श्व संगीत (BGM): शंखनाद और तारों (Strings) का संगीत जो गति और भव्यता को दर्शाता है।
    • पार्श्व स्वर (Voiceover): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ। कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥"
    • ​"गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ।

      कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥"


      • Voiceover (हिंदी में): गोलोक में जन्मे ये दोनों दिव्य अंश, कालान्तर में ब्रह्मांडीय ऊर्जा को समेटे हुए, मानव रूप धारण कर इस धरातल पर अवतरित हुए। यह ज्ञान और वाणी का पृथ्वी पर प्रथम मिलन था।

      दृश्य 3: शब्द और अर्थ का महासंगम - पुरूरवा का जन्म

      • स्थान: गंगा और यमुना का प्राचीन और पवित्र संगम तट। सूर्योदय का समय।
      • दृश्य (Visual): स्क्रीन पर गंगा (श्वेत जल) और यमुना (श्याम जल) का सुंदर संगम दिखाई देता है। जल से एक स्वर्णिम आभा प्रकट होती है। इला (वाणी) और बुध (ज्ञान) के प्रतीक स्वरूप दो ऊर्जाएं आपस में मिलती हैं। उनके मध्य से एक तेजस्वी, सौम्य और शांत बालक (पुरूरवा) का प्राकट्य होता है। उसके चारों ओर संस्कृत के अक्षर और श्लोक हवा में तैरते हुए दिखाई देते हैं।
      • पार्श्व संगीत (BGM): तेज गति से बजते हुए नगाड़े, घंटियां और एक विजयी आर्केस्ट्रल धुन (Epic Orchestral Swell)।
      • पार्श्व स्वर (Voiceover): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः। शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥"
      • ​"तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः।

        शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥"


        • Voiceover (हिंदी में): वाणी और ज्ञान के उस समन्वय से... शब्द और अर्थ की आत्मा को आत्मसात कर... अवतरित हुए इस संसार के प्रथम कवि। अद्भुत वाक्पटुता से संपन्न एक नवचेतना।

        दृश्य 4: प्रथम कवि की कीर्ति

        • स्थान: विस्तीर्ण परिदृश्य, जहाँ सम्राट पुरूरवा युवावस्था में ध्यानस्थ खड़े हैं।
        • दृश्य (Visual): युवा पुरूरवा संगम तट पर खड़े हैं। उनके चेहरे पर अपार शांति और गंभीरता है। वे कुछ बोलते हैं और उनके मुख से निकले शब्द सुनहरे प्रकाश के रूप में पूरे संसार में फैलने लगते हैं, जो कविता और साहित्य के आरंभ का प्रतीक है। कैमरा धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर जाता है और स्क्रीन पर शीर्षक उभरता है।
        • पार्श्व संगीत (BGM): एक सौम्य, प्रेरणादायक और गूंजता हुआ संगीत जो धीरे-धीरे शांत होता है।
        • पार्श्व स्वर (Voiceover): (संस्कृत श्लोक का गान) ​"गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले। ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥"
        • ​"गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले।

          ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥"


          • Voiceover (हिंदी में): गंगा और यमुना के इसी पावन संगम पर, साहित्य और काव्य के रचयिता... 'पुरूरवा' नाम से विख्यात उस महान आत्मा का इस पृथ्वी पर प्रादुर्भाव हुआ। और यहीं से गूंजी मानव इतिहास की प्रथम कविता।
          • स्क्रीन पर टेक्स्ट (Fade in): "शब्द और अर्थ का आदि स्रोत... प्रथम कवि पुरूरवा"
          • दृश्य (Visual): स्क्रीन धीरे-धीरे काली (Fade to Black) हो जाती है।

कव्वाली-

कव्वाली: कर्म का विधान

लेखन एवं संकल्पना: यादव योगेश कुमार 'रोहि'

[मंच-सज्जा एवं वातावरण]

(मंच पर चार कव्वाल, मुख्य गायक केंद्र में। ढोलक, हारमोनियम और मंजीरे के साथ साज़िंदे। रोशनी मध्यम और पीली।)

[प्रारम्भ: उद्घोष]

(संगीत का धीमा लेकिन गहरा 'अलाप' शुरू होता है। हारमोनियम की रूहानी धुन के बीच, मुख्य गायक माइक के पास आकर बड़ी संजीदगी से उद्घोष करते हैं:)

मुख्य गायक: "अदब ! 'महफ़िल-ए-मुस्तमेअ' में आप सभी का खैरमकदम है। इस कव्वाली का संगीत व गीत, यादव योगेश कुमार 'रोहि' की जानिब से आप तमाम सामाईन की खिदमत में एक रूहानी पेशकश है। इस रूहानी सफर में शामिल होइए, जहाँ बात 'कर्म' की होगी और वहाँ 'किस्मत' के विधान की भी होगी "

(अचानक ढोलक की तीव्र थाप (कहरवा ताल) और पूरे समूह का जोशपूर्ण प्रवेश)आलाप रिदम े स्वर का-

[मुखड़ा]

(समूह - पूरे बल के साथ):

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा! जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!

(मुख्य गायक - खींचकर):

दुःख-सुख की लहरों में... आलाप---

(समूह - तान लेते हुए):

दुःख-सुख की लहरों में, डूब जाना पड़ेगा!

(मुख्य गायक):

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!

[अंतरा 1: दार्शनिक भाव]

(मुख्य गायक):

ज़िन्दगी के सफर में, तन्हाई का आलम है,

उम्मीद के पड़ावों पे,अभी ठहरा हुआ ग़म है।।

मिट गए हैं रास्ते, मंज़िल नहीं मालूम है ,

बेखुदी के आगोश में, मुसाफ़िर अभी गुम है...

(संगीत शांत, केवल हारमोनियम की मींड)

(मुख्य गायक - सूफियाना लहजे में):

पास में एहसास, तजुर्बों की सद़ा है,

होता है वही जो ' किस्मत में बदा है।


(बुलंद आवाज़ में - दर्द की तीव्रता):

मेरे चेहरे पे जो मुस्कराहट है,

मत समझो सुखों की आहट है।

हम दवा-ए-गम वहाँ पीते हैं,

जहाँ खामोशी की पनाघट हैं!

(समूह - लय में):

तन्हाइयों के पथ पर, चलते जाना पड़ेगा!

कोई साथ नहीं है तेरे, गम छुपाना पड़ेगा!

(मुख्य गायक):

जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!

[अंतरा 2: जीवन का सत्य]

(मुख्य गायक):

किस्मतें बनती हैं कर्मों की टकसाल से।

इन कर्मों  का मुझपे भार लदा है...

​कहीं संचित, कहीं प्रारब्ध, ये कर्मों के ही शब्द,

(श्वांस भरते हुए):

श्वांस धड़कन की जैसे  हमकद़ा है।

(समूह के साथ):

तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!

तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!

[अंतरा 3: रूहानी पुकार]

(मुख्य गायक - भावुकता के साथ):

भव सागर है, तेज़ भंवर है,

इन लहरों में अपना घर है ।

कर बैठे, खुद से समझौते!

रोहि तूफानों का मंजर है।

(समूह - तीव्र गति में):

जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!

दुःख-सुख की लहरों में... डूब जाना पड़ेगा!

डूब न जाए जीवन की कश्ती, 

लहर लहर पे छाया कहर है।

मोह के भंवर, लोभ के गोते...

(संगीत बिलकुल धीमा, ढोलक की थाप मद्धम)

'' सब उम्र बीत गई रोते-रोते...

कृष्ण कन्हाई, मेरा हमराही,

(बुलंद आवाज़ - चरम भावुकता):

मेरी निस्बत में तुझे आना पड़ेगा!

मेरी निस्बत में  आना पड़ेगा!

मेरी निस्बत में कान्हा आना पड़ेगा!

[समापन: तकरार एवं क्लाइमेक्स]

(समूह - तीव्र गति में):

जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!

दुःख-सुख की लहरों में... डूब जाना पड़ेगा!

(समूह - लयबद्ध दोहराव):

जो कर्म किए हैं तूने! फल पाना पड़ेगा!

जो कर्म किए हैं तूने! फल पाना पड़ेगा!

(ढोलक की एक ज़ोरदार अंतिम थाप। हारमोनियम का एक लंबा, रूहानी सुर जो धीरे-धीरे  आलाप के साथ शून्य में विलीन हो जाता है।)

(शांत)