रविवार, 1 मार्च 2026

इला की कहानी-+

          

मत्स्यपुराण/अध्यायः (११)

     📚 आदित्याख्यानम्।
आदित्यवंशमखिलं वद सूत ! यथाक्रमम्।
सोमवंशञ्च तत्वज्ञ! यथावद्वक्तुमर्हसि।।११.१।।

विवस्वान् कश्यपात् पूर्वमदित्यामभवत्सुतः।।
तस्य पत्नीत्रयं तद्वत् संज्ञा राज्ञी प्रभा तथा।
रैवतस्य सुता राज्ञी रेवतं सुषुवे तनुम्।
प्रभा प्रभातं सुषुवे त्वाष्ट्री संज्ञा तथा मनुम्।११.२।।

यमश्च यमुना चैव यमलौ तु बभूवतुः।
ततस्तेजोमयं रूपमसहन्ती विवस्वतः।।११.३ ।।

नारीमुत्पादयामास स्वशरीरादनिन्दिताम्।
त्वाष्ट्री स्वरूपेण नाम्ना छायेतिभामिनी तदा।। ११.४ ।।

किङ्करोमीति पुरतः स्थितां तामभ्यभाषत।
छाये! त्वं भज भर्तारमस्मदीयं वरानने!।।११ .५ ।।

अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय।
तथेत्युक्ता तु सा देवमगमत् क्वापि सुव्रता।११.६।

कामयामास देवोऽपि संज्ञेयमिति चादरात्।
जनयामास तस्यां तु पुत्रञ्च मनुरूपिणम्।११.७।

सवर्णत्वाच्च सावर्णिम् मनोर्वैवस्वतस्य च।
ततः शनिञ्च तपतीं विष्टिं चैव क्रमेण तु।११.८ ।।

छायायां जनयामास संज्ञेयमिति भास्करः।
छाया स्वपुत्रेऽभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तथा।। ११.९ ।।

पूर्वो मनुस्तु चक्षाम न यमः क्रोधमूर्च्छितः।
सन्तर्जयामास तदा पादमुद्यम्य दक्षिणम्।११.१०।

शशाप च यमं छाया सक्षतः कृमिसंयुतः।
पादोऽयमेको भविता पूय शोणित विस्रवः।। ११.११ ।।

निवेदयामास पितुर्धर्म्मः शापादमर्षितः।
निष्कारणमहं शप्तो मात्रा देव! सकोपया।। ११.१२ ।।

बालभावान् मया किञ्चिदुद्यतश्चरणः सकृत्।
मनुना वार्यमाणापि मम शापमदाद्विभो।११.१३ ।।

प्रायेण माता सास्माकं शापेनाहं यतो हतः।
देवोऽप्याह यमं भूयः किङ्करोमि महामते।। ११.१४ ।।

मौर्ख्यात् कस्य न दुःखं स्यादथवा कर्म्म सन्ततेः।
अनिवार्याभवस्यापि का कथान्येषु जन्तुषु।। ११.१५ ।।

कृकवाकुर्म्मया दत्तो यः कृमीन् भक्षयिष्यति।
क्लेदञ्च रुधिरञ्चैव वत्सायमपनेष्यति।११.१६।

एवमुक्तस्तपस्तेपे यमस्तीव्रं महायशाः।
गोकर्णतीर्थे वैराग्यात् फलपत्रानिलाशनः।। ११.१७ ।।

आराधयन् महादेवं यावद्वर्षायुतायुतम्।
वरं प्रादान् महादेवः सन्तुष्टः शूलभृत्तदा।११.१८।

वव्रे सलोकपालत्वं पितृलोके नृपालयम्।
धर्म्माधर्म्मात्मकस्यापि जगतस्तु परीक्षणम्।। ११.१९ ।।

एवं स लोकपालत्वमगमच्छूलपाणिनः।
पितॄणाञ्चाधिपत्यञ्च धर्म्माधर्म्मस्य चानघ।। ११.२० ।।

विवस्वानथ तज्ज्ञात्वा संज्ञायाः कर्म्मचेष्टितम्।
त्वष्टुः समीपमगमदाचचक्षे च रोषवान्।११.२१ ।।

तमुवाच ततस्त्वष्टा सान्त्वपूर्वं द्विजोत्तामाः।
तवासहन्ती भगवन्!महस्तीव्रं तमोनुदम्।११.२२।

व़डवारूपमास्थाय मत्सकाशमिहागता।
निवारिता मया सातु त्वया चैव दिवाकर!।। ११.२३।

यस्मादविज्ञाततया मत्सकाशमिहागता।
तस्मान्मदीयं भवनं प्रवेष्टुं न त्वमर्हसि।।११.२४ ।।

एवमुक्ता जगामाथ मरुदेशमनिन्दिता।
वडवा रूपमास्थाय भूतले सम्प्रतिष्ठिता।।११.२५।।

तस्मात्प्रसादं कुरु मे यद्यनुग्रह भागहम्।
अपनेष्यामि ते तेजो यन्त्रे कृत्वा दिवाकर!।। ११.२६ ।।

रूपं तव करिष्यामि लोकानन्दकरं प्रभो!।
तथेत्युक्तः स रविणा भ्रमौ कृत्वा दिवाकरम्।। ११.२७ ।।

पृथक् चकार तत्तेजश्चक्रं विष्णोरकल्पयत्।
त्रिशूलञ्चापि रुद्रस्य वज्रमिन्द्रस्य चाधिकम्।।११.२८।।

दैत्यदानवसंहर्तुः सहस्र किरणात्मकम्।
रूपञ्चाप्रतिमञ्चक्रे त्वष्टा पद्भ्यामृते महत्।। ११.२९ ।।

न शशाकाथ तद् द्रष्टुं पादरूपं रवेः पुनः।
अर्चास्वपि ततः पादौ न कश्चित् कारयेत् क्वचित्।। ११.३० ।।

यः करोति स पापिष्ठां गतिमाप्नोति निन्दिताम्।
कुष्ठरोगमवाप्नोति लोकेऽस्मिन् दुःखसंयुतः।। ११.३१ ।।

तस्माच्च धर्म्मकामार्थी चित्रेष्वायतनेषु च।
न क्वचित्कारयेत्पादौ देवदेवस्य धीमतः।। ११.३२।।

ततः स भगवान्! गत्वा भूर्लोकममराधिपः।
कामयामास कामार्तो मुख एव दिवाकरः।। ११.३३ ।।

अश्वरूपेण महता तेजसा च समावृतः।
संज्ञा च मनसा क्षोभमगमद्भयविह्वला।११.३५ ।।

नासा पुटाभ्यामुत्सृष्टं परोऽयमितिशङ्कया।
तद्रेतसस्ततो जातावश्विनावितिनिश्चितम्।११.३६।

दस्रौ सुतत्वात् सञ्जातौ नासत्यौ नासिकाग्रतः।
ज्ञात्वाचिराच्च तं देवं सन्तोषमगमत्परम्।।
विमानेनागमत् स्वर्गं पत्या सह मुदान्विता।। ११.३७ ।।

सावर्णोऽपि मनुर्मेरावद्याप्यास्ते तपोधनः।
शनिस्तपोबलादाप ग्रहसाम्यं ततः पुनः।११.३८ ।।

यमुना तपती चैवपुनर्नद्यौ बभूवतुः।
विष्टिर्घोरात्मिका तद्वत् कालत्वेन व्यवस्थिता।। ११.३९ ।।

मनोर्वैवस्वतस्यासन् दशपुत्रा महाबलाः।
इलस्तु प्रथमस्तेषां पुत्रेष्ट्यां समजायत।११.४० ।।

इक्ष्वाकुः कुशनाभश्च अरिष्टो धृष्ण एव च।
नरिष्यतः करूपश्च शर्य्यातिश्च महाबलः।।
पृषध्रश्चाथ नाभागः सर्वे ते दिव्यमानुषाः।११.४१।।

अभिषिच्य मनुः पुत्रमिलं ज्येष्ठं स धार्मिकः।
जगाम तपसे भूयः स महेन्द्रवनालयम्।११.४२ ।।

अथ दिग्जयसिध्यर्थमिलः प्रायान् महीमिमाम्।
भ्रमन् द्वीपानि सर्वाणि क्ष्माभृतः संप्रधर्षयन्।। ११.४३ ।।

जगामोपवनं शम्भोरश्वाकृष्टः प्रतापवान्।
कल्पद्रुमलताकीर्णं नाम्ना शरवणं महत्।१०.४४ ।

रमते यत्र देवेशः शम्भुः सोमार्द्धशेखरः।
उमया समयस्तत्र पुरा शरवणे कृतः।। ११.४५ ।।

पुन्नामसत्त्वं यत् किञ्चिदागमिष्यति ते वने।
स्त्रीत्वमेष्यति तत्सर्वं दश योजन मण्डले।। ११.४६ ।।

अज्ञातसमयो राजा इलः शरवणे पुरा।
स्त्रीत्वमाप विशन्नेव व़डवात्त्वं हयस्तदा।११.४७ ।।

पुरुषत्वं हृतं सर्वं स्त्रीरूपे विस्मितो नृप।
इलेति साभवन्नारी पीनोन्नत घनस्तनी।११.४८ ।।

उन्नतश्रोणिजघना पद्म पत्रायतेक्षणा।
पूर्णेन्दुवदना तन्वी विलासोल्लासितेक्षणा।। ११.४९ ।।

मूलोन्नतायतभुजा नीलकुञ्चितमूर्धजा।
तनुलोमा सुदशना मृदुगम्भीरभाषिणी।११.५० ।।

श्यामगौरेण वर्णेन हंसवारणगामिनी।
कार्मुक भ्रू युगोपेता तनु ताम्र नखाङ्करा।। ११.५१ ।।

भ्रमन्ती च वने तस्मिन् चिन्तयामास भामिनी।
को मे पिताऽथवा भ्राता का मे माता भवेदिह।। ११.५२।।

कस्य भर्तुरहं दत्ता कियद्वत्स्यामि भूतले।
इति चिन्तयती दृष्टा सोमपुत्रेण साङ्गना।।११.५३।।

इलारूपसमाक्षिप्त मनसा वरवर्णिनीम्।
बुधस्तदाप्तये यत्नमकरोत् कामपीड़ितः।११.५४।

विशिष्टाकारवान् दण्डी सकमण्डलु पुस्तकः।
वेणुदण्डकृतानेक पवित्रक गणित्रकः।।११.५५ ।।

द्विजरूपः शिखी ब्रह्मनिगदन् कर्णकुण्डलः।
वटुभिश्चान्वितोयुक्तैः समित्पुष्पकुशोदकैः।। ११.५६ ।।

किलान्विषन्वने तस्मिन्नाजुहाव स तामिलाम्।
बहिर्वनस्यान्तरितः किल पादप मण्डले।। ११.५७।

ससम्भ्रममकस्मात्तां सोपालम्भमिवावदत्।
त्यक्त्वाग्नि होत्रशुश्रूषां क्व गता मन्दिरान्मम।। ११.५८ ।।

इयं विहारवेला ते ह्यतिक्रामति साम्प्रतम्।
एह्येहि पृथुसुश्रोणि! सम्भ्रान्ता केन हेतुना ।। ११.५९ ।।

इयं सायन्तनीवेला विहारस्येह वर्तते।
कृत्वोपलेपनं पुष्पैरलंकुरु गृहं मम।। ११.६० ।।

सात्त्वब्रवीद्विस्मृताहं सर्वमेतत्तपोधन!।
आत्मानं त्वाञ्च भर्तारं कुलञ्च वद मेऽनघ।। ११.६१ ।।

बुधः प्रोवाच तां तन्वीमिला त्वं वरवर्णिनि!।
अहञ्च कामुको नाम बहुविद्योबुधः स्मृतः।। ११.६२ ।।

तेजस्विनः कुले जातः पिता मे ब्राह्मणाधिपः।
इति सा तस्य वचनात् प्रविष्टा बुधमन्दिरम्।। ११.६३ ।।

रत्नस्तम्भसमायुक्तं दिव्यमाया विनिर्मितम्।
इला कृतार्थमात्मानं मेने तद्भवनस्थिता।११.६४ ।।

अहोवृत्तमहोरूपमहोधनमहोकुलम्।
मम चास्य च मे भर्तुरहोलावण्यमुत्तमम्।११.६५।

रेमे च सा तेन सममतिकालमिला ततः।
सर्वभोगमये गेहे यथेन्द्रभवने तथा।। ११.६६ ।।

Matsya Purana (Matsyapurana )

अध्याय 11 - Adhyaya 11

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सूर्यवंश और चन्द्रवंशका वर्णन तथा इलाका वृत्तान्त

ऋषियों ने पूछा-तत्त्वज्ञ सूतजी! अब आप हम लोगोंसे सम्पूर्ण सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका क्रमशः यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये ॥ 1 ॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो। पूर्वकालमें महर्षि कश्यपसे अदितिको विवस्वान् (सूर्य) पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे। उनकी संज्ञा, राज्ञी तथा प्रभा नामकी तीन पत्रियाँ थीं। इनमें रेवतकी कन्या राज्ञीने रैवत नामक पुत्रको तथा प्रभाने प्रभात नामक पुत्रको उत्पन्न किया। संज्ञा त्वाष्ट्र (विश्वकर्मा) की पुत्री थी। उसने वैवस्वत मनु और यम नामक दो पुत्र एवं यमुना नामकी एक कन्याको उत्पन्न किया। इनमें यम और यमुना जुड़वे पैदा हुए थे। कुछ समयके पश्चात् जब सुन्दरी त्वाष्ट्री (संज्ञा) विवस्वान्के तेजोमय रूपको सहन न कर सकी, तब उसने अपने शरीरसे अपने ही रूपके समान एक अनिन्द्यसुन्दरी नारीको उत्पन्न किया। वह 'छाया' नामसे प्रसिद्ध हुई। उस छायाको अपने सामने खड़ी देखकर संज्ञाने उससे कहा-'वरानने छाये! तुम हमारे पतिदेवकी सेवा करना, साथ ही मेरी संतानोंका माताके समान स्नेहसे पालन-पोषण करना।" तब बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'- कहकर वह सुव्रता पतिकी सेवाभावनासे विवस्वान्देवके निकट गयी। इधर विवस्वान्देव भी 'यह संज्ञा ही है'- ऐसा समझकर छायाके साथ आदरपूर्वक पूर्ववत् व्यवहार करते रहे। यथासमय उन्होंने उसके गर्भसे मनुके समान रूपवाले एक पुत्रको उत्पन्न किया। ये वैवस्वत मनुके सवर्ण (रूप-रंगवाला) होनेके कारण 'सावर्णि' नामसे प्रसिद्ध हुए। तदुपरान्त सूर्यने "यह संज्ञा ही है- ऐसा मानकर छायाके गर्भसे क्रमशः एक शनि नामका पुत्र और तपती एवं विष्टि नामको दो कन्याओंको भी उत्पन्न किया। छाया अपने पुत्र मनुके प्रति अन्य संतानोंसे अधिक स्नेह रखती थी। उसके इस व्यवहारको संज्ञा नन्दन मनु तो सहन कर लेते थे, परंतु यम (एक दिन सहन न होनेके कारण) क्रुद्ध हो उठे और अपने दाहिने पैरको उठाकर छायाको मारनेकी धमकी देने लगे। तब छायाने यमको शाप देते हुए कहा- 'तुम्हारे इस एक पैरको कीड़े काट खायेंगे और इससे पीब एवंरुधिर टपकता रहेगा।' इस शापको सुनकर अमर्षसे भरे ह यम पिताके पास जाकर निवेदन करते हुए बोले- 'देव क्रुद्ध हुई माताने मुझे अकारण ही शाप दे दिया है। विभो ! बालचापल्यके | कारण मैंने एक बार अपना दाहिना पैर कुछ ऊपर उठा दिया था, (इस तुच्छ अपराधपर) भाई मनुके मना करनेपर भी उसने मुझे ऐसा शाप दे दिया है। चूँकि इसने हमपर शापद्वारा प्रहार किया है इसलिये यह हम लोगोंकी माता नहीं प्रतीत होती (अपितु बनावटी माता है)।' यह सुनकर विवस्वान्देवने | पुनः यमसे कहा 'महाबुद्धे! मैं क्या करूँ? अपनी मूर्खता के कारण किसको दुःख नहीं भोगना पड़ता अथवा (जन्मान्तरीय शुभाशुभ कर्मपरम्परका फलभोग अनिवार्य है। यह नियम तो शिवजीपर भी लागू है, फिर अन्य प्राणियोंके लिये तो कहना ही क्या है। इसलिये बेटा! मैं तुम्हें यह एक मुर्गा (या मोर) दे रहा हूँ, जो पैरमें पड़े हुए कीड़ोंको खा जायगा और उससे निकलते हुए मजा (पीच) एवं खूनको भी दूर कर देगा' ॥2- 17 ॥

पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महायशस्वी यमके मनमें विराग उत्पन्न हो गया। वे गोकर्णतीर्थमें जाकर फल, पत्ता और वायुक्का आहार करते हुए कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये। इस प्रकार वे बीस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना करते रहे। कुछ समयके पश्चात् त्रिशूलधारी महादेव उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर प्रकट हुए। तब यमने उनसे वररूपमें लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और जगत्के धर्म-अधर्मका निर्णायक पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। महादेवजीने उन्हें सभी वरदान दे दिये। निष्याप शौनक इस प्रकार यमको शूलपाणि भगवान् शंकरसे लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और धर्माधर्मके निर्णायक पदकी प्राप्ति हुई है। इधर विवस्वान् संज्ञाकी उस कर्मचेष्टको जानकर त्वष्टा (विश्वकर्मा) के निकट गये और क्रुद्ध होकर उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाये। द्विजवरो ! तब त्वष्टाने सान्त्वनापूर्वक विवस्वानसे कहा- 'भगवन्! अन्धकारका विनाश करनेवाले आपके प्रचण्ड तेजको न सहन करनेके कारण संज्ञा घोड़ीका रूप धारण करके यहाँ मेरे समीप अवश्य आयी थी, परंतु दिवाकर! मैंने उसे यह कहते हुए (घरमें घुसनेसे) मना कर दिया- 'चूँकि तू | अपने पतिदेवको जानकारीके बिना छिपकर यहाँ मेरे पास आयी है, इसलिये मेरे भवनमें प्रवेश नहीं कर सकती।' इस प्रकार मेरे निषेध करनेपर आपके और मेरे- दोनों स्थान निराश होकर वह अनिन्दिता संज्ञा मरुदेशको चली गयी और यहाँ उसी घोड़ी-रूपसे हो भूतलपर स्थित है।इसलिये 'दिवाकर! यदि मैं आपका अनुग्रह-भाजन हूँ तो आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये (और मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये)। प्रभो! मैं आपके इस असह्य तेजको (खरादनेवाले) यन्त्रपर चढ़ाकर कुछ कम कर दूंगा। इस प्रकार आपके रूपको लोगोंके लिये आनन्ददायक बना दूँगा।' सूर्यद्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लिये जानेपर त्वष्टाने सूर्यको अपने (खराद) यन्त्रपर बैठाकर उनके कुछ तेजको छाँटकर अलग कर दिया। उस छाँटे हुए तेजसे उन्होंने विष्णुके सुदर्शनचक्रका भगवान् रुद्रके त्रिशूलका और दैत्यों एवं दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्रके वज्रका निर्माण किया। इस प्रकार त्वष्टाने पैरोंके अतिरिक्त सूर्यके सहस्र किरणोंवाले रूपको अनुपम सौन्दर्यशाली बना दिया। उस समय वे सूर्यके पैरोंके तेजको देखने में समर्थ न हो सके (इसलिये वह तेज ज्यों-का त्यों बना ही रह गया)। अतः अर्चा-विग्रहों में भी कोई सूर्यके चरणोंका निर्माण नहीं करता) कराता। यदि कोई वैसा करता है तो उसे (मरनेपर) अत्यन्त निन्दित पापिष्ठ गति प्राप्त होती है तथा इस लोकमें वह दुःख भोगता हुआ कुष्ठरोगी हो जाता है। इसलिये धर्मात्मा मनुष्यको चित्रों | एवं मन्दिरोंमें कहीं भी बुद्धिमान् देवदेवेश्वर सूर्यके पैरोंको नहीं (बनाना) बनवाना चाहिये ॥ 18-33 ॥

त्वष्टाद्वारा संज्ञाका पता बतला दिये जानेपर वे देवेश्वर भगवान् सूर्य भूलोकमें जा पहुँचे। वहाँ उनके द्वारा संज्ञासे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई यह एकदम तथ्य बात है। संज्ञाकी नासिकाके अग्रभागसे उत्पन्न होनेके कारण वे दोनों नासत्य और दस्र नामसे भी विख्यात हुए। कुछ दिनोंके पश्चात् अश्वरूपधारी सूर्यदेवको पहचानकर त्वाष्ट्री (संज्ञा) परम सन्तुष्ट हुई और हर्षपूर्ण चित्तसे पतिके साथ विमानपर बैठकर स्वर्गलोक (आकाश) को चली गयी छायी संतानोंमें) तपोधन साथ मनु आज भी सुमेरुगिरिपर विराजमान हैं शनिने अपनी तपस्याके प्रभावसे ग्रहोंकी समता प्राप्त की। बहुत दिनोंके बाद यमुना और पीये दोनों कन्याएँ नदीरूपमें | परिणत हो गयीं। उसी प्रकार भयंकर रूपवाली तीसरी कन्या विष्टि (भद्रा) काल (करण) रूपमें अवस्थित हुई। वैवस्वत मनुके दस महाबली पुत्र उत्पन्न हुए थे उनमें | इल ज्येष्ठ थे, जो पुत्रेष्टि यज्ञके फलस्वरूप पैदा हुए थे।शेष नौ पुत्रोंके नाम हैं- इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, नरिष्यन्त, करूप, शर्याति, पृषध और नाभाग। ये सब के-सब महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं दिव्य पुरुष थे। वृद्धावस्था आनेपर परम धर्मात्मा महाराज मनु अपने ज्येष्ठ पुत्र इलको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं तपस्या करनेके लिये महेन्द्रपर्वतके वनमें चले गये। तदनन्तर नये भूपाल इल दिग्विजय करनेकी इच्छासे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगे। वे भूपालोंको पराजित करते हुए सभी द्वीपोंमें घूम रहे थे। इसी बीच प्रतापी इस घोड़ा दौड़ाते हुए शिवजीके उपवनके निकट जा पहुँचे। यह महान् उपवन कल्पद्रुम और लताओंसे भरा हुआ 'शरवण' नामसे प्रसिद्ध था। उस उपवनमें चन्द्रार्धको ललाटमें धारण करनेवाले देवेश्वर शम्भु उमाके साथ कीडा करते हैं। उन्होंने इस शरवणके विषयमें पहले ही उमाके साथ यह समय (शर्त) निर्धारित कर दिया था कि 'तुम्हारे इस दस योजन विस्तारवाले वनमें जो कोई भी पुरुषवाचक जीव प्रवेश करेगा, वह स्त्रीत्वको प्राप्त हो जायगा।' राजा इलको पहलेसे इस 'समय' (शर्त) के विषयमें जानकारी नहीं थी, अतः वे स्वच्छन्दगतिसे शरवणमें प्रविष्ट हुए। प्रवेश करते ही वे स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये। उसी समय वह घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें परिवर्तित हो गया। इलके शरीरसे सारा पुरुषत्व नष्ट हो गया। इस प्रकार स्त्री-रूप हो जानेपर राजाको परम विस्मय हुआ ॥ 34-47 ll

वह नारी इला नामसे प्रख्यात हुई। उसका रूप बड़ा सुन्दर था। उसके नेत्र कमलदलके समान बड़े बड़े थे उसके मुखको कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश थी। उसका शरीर हलका था। उसके नेत्र चकित से दीख रहे थे। उसके बाहुमूल उन्नत और भुजाएँ लम्बी थीं तथा बाल नीले एवं घुंघराले थे। उसके शरीरके रोएँ सूक्ष्म और दाँत अत्यन्त मनोहर थे। वह मृदु और गम्भीर स्वरसे बोलनेवाली थी। उसके शरीरका रंग श्याम-गौरमिश्रित था। वह हंस और हस्तीकी-सी चालसे चल रही थी। उसकी दोनों भौंहें धनुषके आकारके सदृश थीं। वह छोटे एवं ताँबेके समान लाल नखाडुरोंसे विभूषित थी। इस प्रकार वह सुन्दरी 'नारी' उस वनमें भ्रमण करती हुई सोचने लगी कि इस घोर वनमें कौन मेरा पिता अथवा भाई है तथा कौन मेरी माता है। मैं किस पतिके हाथमें समर्पित की गयी हूँ अर्थात् कौन मेरा पति है। इस भूतलपर मुझे कितने दिनोंतक रहना पड़ेगा!' इस प्रकार वह चिन्तन कर ही रही थी कि इसी बीच सोम-पुत्र बुधने उसे देख लिया और वे उसे प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करने लगे।उस समय बुधने एक विशिष्ट वेष-भूषावाले दण्डीका रूप धारण कर लिया। उनके हाथोंमें कमण्डलु और पुस्तक शोभा पा रहे थे। उन्होंने बाँसके डंडेमें अनेकों पवित्र वस्तुओंको बाँध रखा था। वे ब्रह्मचारी वेषमें लम्बी-मोटी शिखा धारण किये हुए थे। समिधा, पुष्प, कुश और जल लिये हुए वटुकोंके साथ वे वेदका पाठ कर रहे थे। वे अपनेको ऐसा प्रकट कर रहे थे मानो उस वनमें किसी वस्तुकी खोज कर रहे हों। इस प्रकार उस वनके बहिर्भागमें वृक्षसमूहोंके झुरमुटमें बैठकर वे उस इलाको बुलाने लगे। इलाके निकट आनेपर वे अकस्मात् चकपकाये हुएकी भाँति उलाहना देते हुए उससे बोले— 'सुन्दरि ! अग्रिहोत्र आदि सेवा-शुश्रूषाका परित्याग करके तुम मेरे घरसे कहाँ चली आयी हो ?' यह सुनकर इलाने कहा— 'तपोधन! मैं अपनेको, आपको, पतिको और कुलको इन सभीको भूल गयी हूँ, अतः निष्पाप ! आप अपने और मेरे कुलका परिचय दीजिये।' इलाके इस प्रकार पूछनेपर बुधने उस सुन्दरीसे कहा 'वरवर्णिनि तुम इला हो और मैं बहुत-सी विद्याओंका ज्ञाता बुध नामसे प्रसिद्ध मैं तेजस्वी कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और मेरे पिता ब्राह्मणोंके अधिपति हैं।' बुधके इस कथनपर विश्वास करके इला बुधके उस भवनमें प्रविष्ट हुई, जिसमें रत्नोंके खम्भे लगे थे तथा जिसका निर्माण दिव्य मायाके द्वारा हुआ था। उस भवनमें पहुँचकर इला अपनेको कृतार्थ मानने लगी। (वह कहने लगी) 'कैसा सुन्दर चरित्र है। कैसा अद्भुत रूप है! कितना प्रचुर धन है! कैसा ऊँचा कुल है तथा मेरा और मेरे पतिदेवका कैसा अनुपम सौन्दर्य है!' तदनन्तर वह इला बुधके साथ बहुत समयतक उस सम्पूर्ण भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न घरमें उसी प्रकार सुखसे रहने लगी, जैसे इन्द्रभवनमें हो ॥ 48- 66 ll

मत्स्य पुराण








अध्याय द्वादश (१२)

सूर्यवंशवर्णनम्।।

सूत उवाच।
अथान्विषन्तो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः।
इक्ष्वाकु प्रमुखा जग्मु स्तदाशरवणान्तिकम्।। १२.१ ।।

ततस्ते दद्रृशुः सर्वे वडवामग्रतः स्थिताम्।
रत्नपर्याणकिरणदीप्तकायामनुत्तमाम्।। १२.२ ।।

पर्याणप्रत्यभिज्ञानात् सर्वे विस्मयमागताः।
अयं चन्द्रप्रभो नाम वाजीतस्य महात्मनः।। १२.१३ ।।

अगमद्वडवा रूपमुत्तमं केन हेतुना।
ततस्तु मैत्रावरुणिं पप्रच्छुस्ते पुरोधसम्।। १२.४ ।।

किमित्येतदभूच्चित्रं वद योग विदाम्वर!।
वशिष्ठश्चाब्रवीत् सर्वं द्रृष्ट्वा तद्ध्यानचक्षुषा।। १२.५ ।।

समयः शम्भुदयिता कृतः शरवणे पुरा।
यः पुमान् प्रविशेदत्र स नारीत्वमवाप्स्यति।। १२.६ ।।

अयमश्वोऽपि नारीत्वमगाद्राज्ञा सहैवतु।
पुनः पुरुषतामेति यथासौ धनदोपमः।। १२.७ ।।

तथैव यत्नः कर्तव्य चाराध्यैव पिनाकिनम्।
ततस्ते मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेश्वरः।। १२.८ ।।

तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः पार्वतीपरमेश्वरौ।
तावूचतुरलङ्घ्योऽयं समयः किन्तु साम्प्रतम्।। १२.९ ।।

इक्ष्वाकोरश्वमेधेन यत्‌ फलं स्यात्तदावयोः।
दत्त्वा किम्पुरुषो वीरः स भविष्यत्यसंशयम्।। १२.१० ।।

तथेत्युक्तास्ततस्तेस्तु जग्मुर्वैवस्वतात्मजाः।
इक्ष्वाकोश्चाश्वमेधेन चेलः किम्पुरुषोऽभवत्।। १२.११ ।।

मासमेकम्पुमान्वीरः स्त्री च मासमभूत् पुनः।
बुधस्य भवने तिष्ठन्निलो गर्भधरोऽभवत्।। १२.१२ ।।

अजीजनत् पुत्रमेकमनेक गुणसंयुतम्।
बुधश्चोत्पाद्य तं पुत्रं स्वर्लोकमगमत्ततः।। १२.१३ ।।

इलस्य नाम्ना तद्वर्षमिलावृतमभूत्तदा।
सोमार्कवंशयोरादाविलोऽभून्मनुनन्दनः।। १२.१४ ।।

एवं पुरूरवाः पुंसोरभवद्वंशवर्द्धनः।
इक्ष्वाकुरर्कवंशस्य तथैवोक्तस्तपोधनाः।। १२.११५ ।।

इलः किम्पुरुषत्वे च सुद्युम्न इति चोच्यते।
पुनः पुत्रत्रयमभूत् सुद्युम्नस्यापराजितम्।। १२.१६ ।।

उत्कलो वै गयस्तद्वद्धरिताश्वश्च वीर्य्यवान्।
उत्कलस्योत्कला नाम गयस्यतु गयामता।। १२.१७ ।।

हरिताश्वस्य दिक्‌पूर्वो विश्रुता कुरुभिः सह।
प्रतिष्ठानेऽभिषिच्याथ स पुरूपवसं सुतम्।। १२.१८ ।।

जगामेलावृतं भोक्तुं वर्षं दिव्यफलाशनम्।
इक्ष्वाकुर्ज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान्।। १२.१९ ।।

नरिष्यन्तस्य पुत्रोऽभूच्छुचो नाम महाबलः।
नाभागस्याम्बरीषस्तु धृष्टस्य च सुतत्रयम्।। १२.२० ।।

धृतकेतुश्चित्रनाथो रणधृष्टश्च वीर्य्यवान्।
आनर्तो नाम शर्यातेः सुकन्याचैव दारिका ।। १२.२१ ।।

आनर्तस्याभवत्पुत्रो रोचमानः प्रतापवान्।
आनर्तो नाम देशोऽभून्नगरीच कुशस्थली।। १२.२२ ।।

रोचमानस्य पुत्रोऽभूदेवो रैवत एव च।
ककुद्मीचापरान्नाम ज्येष्ठः पुत्रशतस्य च।। १२.२३ ।।

रेवती तस्य सा कन्या भार्या रामस्य विश्रुता।
करूषस्य तु कारूषा बहवः प्रथिता भुवि।। १२.२४ ।।

पृषध्रो गोवधाच्छूद्रो गुरुशापादजायत।
इक्ष्वाकुवंशं वक्ष्यामि श्रृणुध्वमृषिसत्तमाः!।। १२.२५ ।।

इक्ष्वाकोः पुत्रतामाप विकुक्षिर्नाम देवराट्।
ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद्दश पञ्च च तत्सुताः।। १२.२६ ।।

मेरोरुत्तरतस्तेतु जाताः पार्थिवसत्तमाः।
चतुर्दशोत्तरञ्चान्यच्छ्रुतमस्य तथाभवत्।। १२.२७ ।।

मेरोर्दक्षिणतो ये वै राजानः सम्प्रकीर्त्तिताः।
ज्येष्ठः ककुत्स्थो नाम्नाऽभूत्तत्सुतस्तु सुयोधनः।। १२.२८ ।।

तस्य पुत्रः पृथुर्नाम विश्वगश्च पृथोः सुतः।
इन्दुस्तस्य च पुत्रोऽभूद्युवनाश्वस्ततोऽभवत्।। १२.२९ ।।

श्रावस्तश्चमहातेजा वत्सकस्तत्सुतोऽभवत्।
निर्मिता येन श्रावस्ती गौड देशे द्विजोत्तमाः।। १२.३० ।।

श्रावस्ताद् बृहदश्वोऽभूत् कुवलाश्वस्ततोऽभवत्।
धुन्धुमारत्वमगमद् धुन्धुं नाम्ना हतः पुरा।। १२.३१ ।।

तस्य पुत्रास्त्रयो जाता दृढाश्वो दण्डप एव च।
कपिलाश्वश्च विख्यातो धौन्धुमारिः प्रतापवान्।। १२.३२ ।।

द्रुढाश्वस्य प्रमोदश्च हर्यश्वस्तस्य चात्मजः।
हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत्संहताश्वस्ततोऽभवत्।। १२.३३ ।।

अकृताश्वोरणाश्वश्च संहताश्व सुतावुभौ।
युवनाश्वोरणाश्वस्य मान्धाता च ततोऽभवत्।। १२.३४ ।।

मान्धातुः पुरुकुत्सो धर्म्मसेनश्च पार्थिवः।
मुचुकुन्दश्च विख्यातः शत्रुजिच्च प्रतापवान्।। १२.३५ ।।

पुरुकुत्सस्य पुत्रोऽभूद्वसूदो नर्म्मदापतिः।
सम्भूतिस्तस्यपुत्रोऽभूत्त्रिधन्वा च ततोऽभवत्।। १२.३६ ।।

त्रिधन्वनः सुतोजातस्त्रय्यारुण इति स्मृतः।
तस्मात्सत्यव्रतो नाम तस्मात्सत्यरथः स्मृतः।। १२.३७ ।।

तस्य पुत्रो हरिश्चन्द्रो हरिश्चन्द्राच्च रोहितः।
रोहिताच्च वृको जातो वृकाद् बाहुरजायत।। १२.३८ ।।

सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद्राजा परमधार्मिकः।
द्वे भार्य्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा।। १२.३९ ।।

ताभ्यामाराधितः पूर्वमौर्वोऽग्निः पुत्रकाम्यया।
और्वस्तुष्टस्तयोः प्रादाद्यथेष्टं वरमुत्तमम्।। १२.४० ।।

एका षष्टिसहस्राणि सुतमेकं तथापरा।
गृह्णातु वंशकर्तारं प्रभाऽगृह्णाद्‌ बहूंस्तदा।। १२.४१ ।।

एकं भानुमती पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम्।
ततः षष्ठिसहस्राणि सुषुवे यादवी प्रभा।। १२.४२ ।।

खनन्तः पृथिवीं दग्धा विष्णुना येऽश्वमार्गणे।
असमञ्जसस्तु तनयो योंऽशुमान्नाम विश्रुतः।। १२.४३ ।।

तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात्तु भगीरथः।
येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता।। १२.४४ ।।

भगीरथस्य तनयो नाभाग इति विश्रुतः।
नाभागस्यांबरीषोऽभूत्सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत्।। १२.४५ ।।

तस्यायुतायुः पुत्रोऽभूद्रृतुपर्णस्ततोऽभवत्।
तस्य कल्माषपादस्तु सर्वकर्मा ततः स्मृतः ।।१२.४६ ।।

तस्यानरण्यः पुत्रोऽभूत् निघ्नस्तस्य सुतोऽभवत्।
निघ्नपुत्रावुभौ जातौ अनमित्ररघू नृपौ।।१२.४७।।

अनिमित्रो वनमगाद्भविता स कृते नृपः।
रघोरभूद् दिलीपस्तु दिलीपादजकस्तथा।। १२.४८ ।।

दीर्घबाहुरजाज्जातश्चाजपालस्ततो नृपः।
तस्माद्दशरथो जातस्तस्य पुत्र चतुष्टयम्।। १२.४९ ।।

नारायणात्मकाः सर्वे रामस्तेष्वग्रजोऽभवत्।
रावणान्तकरस्तद्वद्रघूणां वंशवर्धनः।। १२.५०।।

वाल्मीकिस्तस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः।
तस्य पुत्रौ कुशलवाविक्ष्वाकुकुलवर्धनौ।। १२.५० ।।

अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः।
नलस्तु नैषधस्तस्मान्नभस्तस्मादजायत।। १२.५१ ।।

नभसः पुण्डरीकोऽभूत् क्षेमधन्वा ततः स्मृतः।
तस्य पुत्रोऽभवद्वीरो देवानीकः प्रतापवान्।। १२.५२ ।।

अहीनगुस्तस्य सुतः सहस्राश्वस्ततः परः।
ततश्चन्द्रावलोकस्तु तारापीडस्ततोऽभवत्।। १२.५३ ।।

तस्यात्मजश्चन्द्रगिरिः भानुश्चन्द्रस्ततोऽभवत्।
श्रुतायुरभवत्तस्माद् भारते यो निपातितः।। १२.५४ ।।

नलौद्वावेवविख्यातौ वंशे कश्यपसम्भवे।
वीरसेनसुतस्तद्वन्नैषधश्च नराधिपः।। १२.५५ ।।

एते वैवस्वते वंशे राजानो भूरिदक्षिणाः।
इक्ष्वाकुवंशप्रभवाः प्राधान्येन प्रकीर्त्तिताः।। १२.५६

इलाका वृत्तान्त तथा इक्ष्वाकु वंशका वर्णन

सूतजी कहते हैं-ऋपियो (बहुत दिनोंतक राज इसके राजधानी न लौटनेपर सशङ्कित होकर) उनके छोटे भाई मनु-पुत्र इक्ष्वाकु आदि राजा इल (सुद्युम्र) का अन्वेषणः करते हुए उसी शरवणके निकट जा पहुँचे। वहाँ उन सभीने मार्गके अग्रभागमें खड़ी हुई एक अनुपम घोड़ीको देखा, जिसका शरीर रत्ननिर्मित जीनकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा | था। तत्पश्चात् जीनको पहचानकर वे सभी बन्धु आश्चर्यचकित हो गये (और परस्पर कहने लगे) 'अरे! यह तो हमारे भाई महात्मा राजा इलका चन्द्रप्रभ नामक घोड़ा है! किस कारण यह सुन्दर घोड़ीके रूपमें परिणत हो गया!' तब वे सभी लौटकर अपने कुल पुरोहित महर्षि वसिष्ठके पास जाकर पूछने लगे 'योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ऐसी आश्चर्यजनक घटना क्यों घटित हुई? इसका रहस्य हमें बतलाइये। तब महर्षि वसिष्ठ ध्यानदृष्टिद्वारा सारा वृत्तान्त | जानकर इक्ष्वाकु आदिसे बोले— 'राजपुत्रो ! पूर्वकालमें शम्भु पत्नी उमाने इस शरवणके विषयमें ऐसा समय (शर्त) निर्धारित कर रखा है कि 'जो पुरुष इस शरवणमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री रूपमें परिवर्तित हो जायगा।' इसी कारण राजा इलके साथ-ही-साथ यह घोड़ा भी स्त्रीत्वको प्राप्त हो गया है। अब जिस प्रकार राजा इल कुबेरकी भाँति पुनः पुरुषत्वको प्राप्त कर सकें, तुमलोगोंको पिनाकधारी शंकरकी आराधना करके वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।' महर्षि वसिष्ठकी आज्ञा पाकर वे सभी मनु-पुत्र वहाँ गये, जहाँ | देवाधिदेव महेश्वर विराजमान थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न स्तोत्रोंद्वारा पार्वती और परमेश्वरका स्तवन किया। (उस स्तवनसे प्रसन्न होकर) पार्वती और परमेश्वरने कहा- 'राजकुमारो यद्यपि मेरे इस नियम (शर्त) का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, तथापि इस समय उसके निवारणके लिये मैं एक उपाय बतला रहा हूँ। यदि इक्ष्वाकुद्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञका जो कुछ फल हो, वह सारा का सारा हम दोनोंको समर्पित कर दिया जाय तो राजा इल निःसंदेह किम्पुरुष (किन्नर) हो जायेंगे।' यह सुनकर 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'- यों कहकर वैवस्वत मनुके वे सभी पुत्र राजधानीको लौट आये। घर आकर इक्ष्वाकुने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया और उसका पुण्य फल पार्वती परमेश्वरको अर्पित कर |दिया, जिसके परिणामस्वरूप इल किम्पुरुष हो गये।वहाँ थे वीरवर एक मास पुरुषरूपमें रहकर पुनः एक मास स्त्री हो जाते थे। बुधके भवनमें स्त्रीरूपसे रहते समय इलने गर्भ धारण कर लिया था। उस गर्भसे अनेक गुणोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रको उत्पन्नकर बुध भूलोकसे पुन: स्वर्गलोकको चले गये॥ 113॥ तभीसे इलके नामपर उस वर्षका नाम इलावृत पड़ गया। इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंशके आदिमें सर्वप्रथम मनु-नन्दन इल ही राजा हुए थे। तपोधन ऋषियो! जैसे इलकी पुरुषावस्थामें उत्पन्न हुए राजा पुरूरवा चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, वैसे ही महाराज इक्ष्वाकु सूर्य वंशके विस्तारक कहे गये हैं। किम्पुरुषयोनिमें रहते समय इल | सुधुन नामसे कहे जाते थे उन के पुनः उत्कल, गय और पराक्रमी हरिताश्व नामक तीन अपराजेय पुत्र उत्पन्न हुए थे। इलने (अपने इन चारों पुत्रोंमेंसे) उत्कलको उत्कल (उड़िसा), गयको गयाप्रदेश और हरिताश्वको कुरुप्रदेशकी सीमावर्तिनी पूर्व दिशाका प्रदेश (राज्य) समर्पित किया। तत्पश्चात् अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरुरवाका प्रतिष्ठानपुरमें अभिषेक करके वे स्वयं दिव्य फलाहारका उपभोग करनेके लिये इलावृतवर्षमें चले गये। (सुद्युम्नके बाद) मनुके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु मध्यदेशके अधिकारी हुए। (मनुके अन्य पुत्रोंमें) नरिष्यन्तके शुच नामक महाबली पुत्र हुआ। नाभागके अम्बरीष और धृष्टके भृष्टकेतु, चित्रनाथ और रण नामक तीन पराक्रमी पुत्र हुए। शर्यातिके आनर्त नामक एक पुत्र तथा सुकन्या नाम्री एक पुत्री हुई आनर्तके रोचमान नामका एक प्रतापी पुत्र हुआ। आनर्तद्वारा शासित देशका नाम आनर्त (गुजरात) पड़ा और कुशस्थली (द्वारका) नगरी उसकी राजधानी हुई। रोचमानका पुत्र रेव हुआ, जो रेवत और ककुयी नामसे भी पुकारा जाता था। वह रोचमानके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ था। उसके रेवती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई, जो बलरामजीकी भार्यारूपसे विख्यात है। करूषके बहुत-से पुत्र थे, जो भूतलपर कारूप नामसे विख्यात हुए। पृषत्र गौकी हत्या कर देनेके कारण गुरुके शापसे शूद्र • हो गया ॥14- 243 ॥श्रेष्ठ ऋषियो । अब मैं इक्ष्वाकु वंशका वर्णन करने रहा हूँ आपलोग ध्यानपूर्वक सुनिये। देवराज विकुक्षि इक्ष्वाकुके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। वे इक्ष्वाकुके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ थे। उन (विकुक्षि) के पंद्रह पुत्र थे, जो सुमेरुगिरिकी उत्तर दिशामें श्रेष्ठ राजा हुए। विकुक्षिके एक सौ चौदह पुत्र और हुए थे, जो सुमेरुगिरिकी दक्षिण दिशाके शासक कहे गये हैं। विकुक्षिका ज्येष्ठ पुत्र ककुत्स्थ नामसे विख्यात था। उसका पुत्र सुयोधन हुआ। सुयोधनका पुत्र पृथु पृथुका पुत्र विश्वग, विश्वगका पुत्र इन्दु और इन्दुका पुत्र युवनाश्व | हुआ। युवनाश्वका पुत्र श्रावस्त हुआ, जिसे वत्सक भी | कहा जाता था। द्विजवरो! उसीने गौडदेशमें श्रावस्ती नामकी नगरी बसायी थी। श्रावस्तसे बृहदश्व और उससे कुबलाश्वका जन्म हुआ, जो पूर्वकालमें धुन्धुद्वारा मारे जानेके कारण धुन्धुमार नामसे विख्यात था। धुन्धुमारके दृढाश्व, दण्ड और कपिलाश्व नामक तीन पुत्र हुए थे, जिनमें प्रतापी कपिलाश्च धौन्धुमारि नामसे भी प्रसिद्ध था दृढावका पुत्र प्रमोद और उसका पुत्र हर्यश्व हुआ हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ तथा उससे संहताश्वका जन्म हुआ संहताश्वके अकृताश्च और रणाश्व नामक दो पुत्र हुए। उनमें रणाश्वका पुत्र युवनाश्व हुआ तथा उससे मान्धाताकी उत्पत्ति हुई। मान्धाताके पुरुकुत्स, राजा धर्मसेन और शत्रुओंको पराजित करनेवाले सुप्रसिद्ध प्रतापी मुचुकुन्द-ये तीन पुत्र हुए। इनमें पुरुकुत्सका पुत्र नर्मदापति वसुद हुआ। उसका पुत्र सम्भूति हुआ और सम्भूतिसे त्रिधन्वाका जन्म हुआ। त्रिधन्वासे उत्पन्न हुआ पुत्र त्रय्यारुण नामसे प्रसिद्ध हुआ। उससे सत्यव्रत और सत्यव्रतसे सत्यरथका जन्म हुआ। सत्यरथसे हरिश्चन्द्र, | हरिश्चन्द्रसे रोहित, रोहितसे वृक और वृकसे बाहुकी उत्पत्ति हुई। बाहुके पुत्र राजा सगर हुए, जो परम धर्मात्मा थे। उन सगरके प्रभा और भानुमती नामवाली दो पत्त्रियाँ थीं। उन दोनोंने पूर्वकालमें पुत्रकी कामनासे और्वानिकी आराधना की थी। उनकी आराधनासे संतुष्ट होकर उन्हें यथेष्ट उत्तम वर प्रदान करते हुए और्वने कहा- 'तुम दोनोंमेंसे एकको साठ हजार पुत्र होंगे और दूसरीको केवल एक वंशप्रवर्तक पुत्र होगा। (तुम दोनोंमें जिसकी जैसी इच्छा हो, वह वैसा वरदान ग्रहण करे।) ' तब प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको स्वीकार किया और भानुमतीने एक ही पुत्र माँगा। कुछ दिनोंके | पश्चात् भानुमतीने असमञ्जसको पैदा किया तथा यदुवंशको कन्या प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया, जो अश्वमेध यज्ञके अश्वको खोजमें जिस समय पृथ्वीको खोद रहे थे, उसी समय उन्हें विष्णु (भगवदवतार कपिल) ने जलाकर भस्म कर दिया ।। 25-42 ॥असमञ्जसका पुत्र अंशुमान् नामसे विख्यात हुआ। उसके पुत्र दिलीप और दिलीपसे भगीरथ हुए, जो तपस्या करके भागीरथी गङ्गाको स्वर्गसे भूतलपर ले आये। भगीरथके पुत्र नाभाग नामसे प्रसिद्ध हुए। नाभाग के पुत्र अम्बरीष और उनसे सिन्धुद्वीपका जन्म हुआ। सिन्धुद्वीपका पुत्र अयुतायु हुआ तथा उससे ऋतुपर्णकी उत्पत्ति हुई। ऋतुपर्णका पुत्र कल्माषपाद और उससे सर्वकर्मा पैदा हुआ। उसका पुत्र अनरण्य और अनरण्यका पुत्र निघ्न हुआ। निघ्नके अनमित्र और राजा रघु नामके दो पुत्र हुए, जिनमें अनमित्र वनमें चला गया, जो कृतयुगमें राजा होगा। रघुसे दिलीप तथा दिलीपसे अज हुए। अजसे दीर्घबाहु और उससे राजा अजपाल हुए। अजपालसे दशरथ पैदा हुए, जिनके चार पुत्र थे। वे सब के सब नारायणके अंशसे प्रादुर्भूत हुए थे। उनमें श्रीराम सबसे ज्येष्ठ थे, जो रावणका अन्त करनेवाले तथा रघुवंशके प्रवर्धक थे। भृगुवंशप्रवर महर्षि वाल्मीकिने श्रीरामके चरित्रका (रामायणरूपमें विस्तारपूर्वक) वर्णन किया है। श्रीरामके कुश और लव नामक दो पुत्र हुए, जो इक्ष्वाकु कुलके विस्तारक थे। कुशसे अतिथि और उससे निषधका जन्म हुआ। निषधका पुत्र नल हुआ और उससे नमकी उत्पत्ति हुई। नभसे पुण्डरीकका तथा उससे क्षेमधन्वाका जन्म हुआ। क्षेमधन्वाका पुत्र प्रतापी वीरवर देवानीक हुआ। उसका पुत्र अहीनगु तथा उससे सहस्राश्वका जन्म हुआ। सहस्राश्वसे चन्द्रावलोक और उससे तारापीडकी उत्पत्ति हुई। तारापीडसे चन्द्रागिरि और उससे भानुचन्द्र पैदा हुआ। भानुचन्द्रका पुत्र श्रुतायु हुआ, जो महाभारत युद्धमें मारा गया था। महर्षि कश्यपद्वारा उत्पन्न हुए इस वंशमें नल नामसे दो राजा विख्यात हुए हैं, उनमें एक वीरसेनका पुत्र तथा दूसरा राजा निषधका पुत्र था इस प्रकार वैवस्वतवंशीय महाराज इक्ष्वाकुके वंशमें उत्पन्न होनेवाले ये सभी राजा अतिशय दानशील | थे। मैंने इनका मुख्यरूपसे वर्णन कर दिया ।। 43-57॥




अध्यायः समाप्त-




📚: श्रीमद्भागवतपुराण/स्कन्धः ९/अध्यायः (१)

मरीचिः मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कहे यु ।
 दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवस्वान् अभवत् सुतः ॥ १० ॥

 ततो मनुः श्राद्धदेवः संज्ञायामास भारत ।
 श्रद्धायां जनयामास दश पुत्रान् स आत्मवान् ॥ ११ ॥

 इक्ष्वाकुनृगशर्याति दिष्टधृष्ट करूषकान् ।
 नरिष्यन्तं पृषध्रं च नभगं च कविं विभुः ॥ १२ ॥

 अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल ।
 मित्रावरुणयोः इष्टिं प्रजार्थं अकरोद् विभुः ॥१३॥

 तत्र श्रद्धा मनोः पत्‍नी होतारं समयाचत ।
 दुहित्रर्थं उपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता ॥ १४ ॥

 प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायन् तत् सुसमाहितः ।
 हविषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन् द्विजः ॥१५॥

 होतुस्तद् व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत् ।
 तां विलोक्य मनुः प्राह नाति हृष्टमना गुरुम् ॥१६॥

 भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् ।
 विपर्ययं अहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया ॥ १७।।

 यूयं मंत्रविदो युक्ताः तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
 कुतः संकल्पवैषम्यं अनृतं विबुधेष्विव ॥ १८ ॥

 निशम्य तद्वचः तस्य भगवान् प्रपितामहः ।
 होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥ १९ ॥

 एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः ।
 तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥ २०॥

 एवं व्यवसितो राजन् भगवान् स महायशाः ।
 अस्तौषीद् आदिपुरुषं इलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥ २१ ॥

 तस्मै कामवरं तुष्टो भगवान् हरिरीश्वरः ।
 ददौ इविलाभवत् तेन सुद्युम्नः पुरुषर्षभः ॥ २२ ॥

 स एकदा महाराज विचरन् मृगयां वने ।
 वृतः कतिपयामात्यैः अश्वं आरुह्य सैन्धवम् ॥२३॥

 प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्च परमाद्‍भुतान् ।
 दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ २४ ॥

 सु कुमातो वनं मेरोः अधस्तात् प्रविवेश ह ।
 यत्रास्ते भगवान् शर्वो रममाणः सहोमया ॥ २५ ॥

 तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्नः परवीरहा ।
 अपश्यत् स्त्रियमात्मानं अश्वं च वडवां नृप ॥२६॥

 तथा तदनुगाः सर्वे आत्मलिङ्‌ग विपर्ययम् ।
 दृष्ट्वा विमनसोऽभूवन् वीक्षमाणाः परस्परम् ॥ २७ ॥

 श्रीराजोवाच ।
 कथं एवं गुणो देशः केन वा भगवन् कृतः ।
 प्रश्नमेनं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः ॥ २८ ॥

 श्रीशुक उवाच ।
 एकदा गिरिशं द्रष्टुं ऋषयस्तत्र सुव्रताः ।
 दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन् ॥२९।।

 तान् विलोक्य अम्बिका देवी विवासा व्रीडिता भृशम् । भर्तुरङ्‌गात समुत्थाय नीवीमाश्वथ पर्यधात् ॥ ३० ॥

 ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्‌गं रममाणयोः ।
 निवृत्ताः प्रययुस्तस्मात् नरनारायणाश्रमम् ॥ ३१।।

 तदिदं भगवान् आह प्रियायाः प्रियकाम्यया ।
 स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति ॥ ३२ ॥

 तत ऊर्ध्वं वनं तद्वै पुरुषा वर्जयन्ति हि ।
 सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम् ॥ ३३ ॥

 अथ तां आश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम् ।
 स्त्रीभिः परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान् बुधः ॥ ३४ ॥

 सापि तं चकमे सुभ्रूः सोमराजसुतं पतिम् ।
 स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥ ३५ ॥

 एवं स्त्रीत्वं अनुप्राप्तः सुद्युम्नो मानवो नृपः ।
 सस्मार स कुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥ ३६ ॥

 स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः ।
 सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वं उपाधावत शंकरम् ॥३७ ॥
 तुष्टस्तस्मै स भगवान् ऋषये प्रियमावहन् ।
 स्वां च वाचं ऋतां कुर्वन् इदमाह विशाम्पते ॥३८ ॥
 मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
 इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ ३९ ॥
आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया ।
पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः ॥ ४० ॥
तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुः धर्मवत्सलाः ॥ ४१ ॥

ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥ ४२ ॥

वैवस्वत मनुके पुत्र राजा सुद्युन की कथा

राजा परीक्षितने पूछा-भगवन्! आपने सब मन्वन्तरों और उनमें अनन्त शक्तिशाली भगवान्के द्वारा किये हुए ऐश्वर्यपूर्ण चरित्रोंका वर्णन किया और मैने उनका श्रवण भी किया ॥ 1 ॥ आपने कहा कि पिछले कल्पके अन्तमें द्रविड़ देशके स्वामी राजर्षि सत्यव्रतने भगवान्की सेवासे ज्ञान प्राप्त किया और वही इस कल्पमें वैवस्वत मनु हुए। आपने उनके इक्ष्वाकु आदि नरपति पुत्रोंका भी वर्णन किया ।। 2-3 ॥ ब्रह्मन् ! अब आप कृपा करके उनके वंश और वंशमें होनेवालोका अलग-अलग चरित्र वर्णन कीजिये। महाभाग ! हमारे हृदयमें सर्वदा ही कथा सुननेकी उत्सुकता बनी रहती है ॥ 4 ॥ वैवस्वत मनुके वंशमें जो हो चुके हों, इस समय विद्यमान हों और आगे होनेवाले हो— उन सब पवित्रकीर्ति पुरुषोंके पराक्रमका वर्णन कीजिये ।। 5 ।।

सूतजी कहते हैं- शौनकादि ऋषियो ! ब्रह्मवादी ऋषियोंको सभामें राजा परीक्षित्ने जब यह प्रश्न किया, तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवान् श्रीशुकदेवजीने कहा ॥ 6 ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! तुम मनुवंशका वर्णन संक्षेपसे सुनो। विस्तारसे तो सैकड़ों वर्ष भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 7 ॥। जो परम पुरुष परमात्मा छोटे-बड़े सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, प्रलयके समय केवल वही थे; यह विश्व तथा और कुछ भी नहीं था ॥ 8 ॥ महाराज! उनकी नाभिसे एक सुवर्णमय कमलकोष प्रकट हुआ। उसीमें चतुर्मुख ब्रह्माजीका आविर्भाव हुआ ।। 9 ।। ब्रह्माजीके मनसे मरीचि और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपत्नी दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ ॥ 10 ॥ विवस्वान्की संज्ञा नामक पत्नीसे श्राद्धदेव मनुका जन्म हुआ। परीक्षित्! परम मनस्वी राजा श्राद्धदेवने अपनी पत्नी श्रद्धाके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न किये। उनके नाम थे— इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूष, नरिष्यन्त, पृषभ, नभग और कवि ।। 11-12 ।।

वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठने उन्हें सन्तान प्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुणका यज्ञ कराया था ॥ 13 ॥ यज्ञके आरम्भ में केवल दूध पीकर रहनेवाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो 14 तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कारका उच्चारण | करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी ।। 15 । जब होताने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञके फलस्वरूप पुत्रके स्थानपर इला नामकी कन्या हुई। उसे देखकर श्राद्धदेव मनुका मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजीसे कहा- | 16 || 'भगवन्! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया ? अरे, यह तो बड़े दुःखकी बात है। वैदिक कर्मका ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये 17 ॥ आप लोगोंका मन्त्रज्ञान तो पूर्ण है ही इसके अतिरिक्त आपलोग जितेन्द्रिय भी है तथा तपस्याके कारण निष्पाप हो चुके है देवताओगे असत्यकी प्राप्तिके समान आपके संकल्पका यह उलटा | फल कैसे हुआ ?' ।। 18 ।।परीक्षित् | हमारे वृद्धमपितामह भगवान् वस्ने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होताने विपरीत संकल्प किया है। इसलिये उन्होंने चैवस्वत मनुसे कहा- ॥ 19 ॥ 'राजन् ! तुम्हारे होताके विपरीत संकल्पसे ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तपके प्रभावसे मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा' ॥ 20 ॥

परीक्षित्! परम यशस्वी भगवान् वसिष्ठने ऐसा निश्चय करके उस इला नामकी कन्याको ही पुरुष बना देनेके लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायणको स्तुति की ॥ 21 ॥ सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभावसे वह कन्या ही सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी ॥ 22 ॥

महाराज! एक बार राजा सुद्युन शिकार खेलनेके लिये सिन्धुदेशके घोड़ेपर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंके साथ वनमें गये ॥ 23 ॥ वीर सुद्युम्न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत वाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये ।। 24 । अन्तमें सुधुम्र मेरुपर्वतकी तलहटीके एक वनमें चले गये। उस वनमें भगवान् शङ्कर पार्वतीके साथ विहार करते रहते हैं ।। 25 । उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्नने देखा कि मैं स्त्री हो गया हूँ और घोड़ा घोड़ी हो गया है ।। 26 ॥ परीक्षित् । साथ ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनेको स्त्रीरूपमें देखा। वे सब एक-दूसरेका मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया ।। 27 ।।

राजा परीक्षितने पूछा- भगवन्! उस भूखण्ड में ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया ? किसने उसे ऐसा बना दिया था ? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ।। 28 ।।श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक दिन भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये ॥ 29 ॥ उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं। ऋषियोंको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं। झटपट उन्होंने भगवान् शङ्करकी गोदसे उठकर वस्त्र धारण कर लिया ॥ 30 ॥

ऋषियोंने भी देखा कि भगवान् गौरी-शङ्कर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँसे लौटकर वे भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये ॥ 31 ॥ उसी समय भगवान् शङ्करने अपनी प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन्न करनेके लिये कहा कि 'मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थानमें प्रवेश करेगा, वहीं स्त्री हो जायेगा' ॥ 32 ॥ परीक्षित्! तभीसे पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते। अब सुन स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे ॥ 33 ॥

उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे आश्रमके पास ही बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है। उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाय 34 ॥ उस सुन्दरी स्त्रीने भी चन्द्रकुमार बुधको पति बनाना चाहा। इसपर बुधने उसके गर्भसे पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्न किया ।। 35 ।। इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युन स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया ।। 36 ।।

सुधुनकी यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपा अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुसुको पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शङ्करकी आराधना की ।। 37 ।। भगवान् शङ्कर वसिष्ठजीपर प्रसन्न हुए। परीक्षित् । उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये अपनी वाणीको सत्य रखते हुए ही यह बात कही- ll 38 ll'वसिष्ठ ! तुम्हारा यह यजमान एक महीनेतक पुरुष रहेगा और एक महीनेतक स्त्री। इस व्यवस्थासे सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वीका पालन करे' ॥ 39 ॥ इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्थापूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे । परंतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी ॥ 40 ॥ उनके तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल । परीक्षित्! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए ॥ 41 ॥

बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरीके अधिपति सुद्युम्नने अपने पुत्र पुरूरवाको राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करनेके लिये वनकी यात्रा की ॥ 42 ॥



📚: भागवत पुराण स्कन्ध (९) अध्याय १४




चंद्रवंशवर्णनं, बुधस्य जन्म, तस्मान्मनुपुत्र्यामिलायां जातस्य पुरूरवस उपाख्यानं च -

श्रीशुक उवाच ।
 अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः ।
 यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥ १ ॥
 सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात् ।
 जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः ॥ २ ॥
 तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
 विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥ ३ ॥
 सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम् ।
 पत्‍नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात् ॥ ४ ॥
 यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात् ।
 नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः ॥ ५ ॥
 शुक्रो बृहस्पतेर्द्वेषाद् अग्रहीत् सासुरोडुपम् ।
 हरो गुरुसुतं स्नेहात् सर्वभूतगणावृतः ॥ ६ ॥
 सर्वदेवगणोपेतो महेन्द्रो गुरुमन्वयात् ।
 सुरासुरविनाशोऽभूत् समरस्तारकामयः ॥ ७ ॥
 निवेदितोऽथाङ्‌गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत् ।
 तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छद् अन्तर्वत्‍नीमवैत् पतिः ॥ ८ ॥
 त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रात् आहितं परैः ।
 नाहं त्वां भस्मसात्कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति ॥ ९ ॥
 तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम् ।
 स्पृहामाङ्‌गिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च ॥ १० ॥
 ममायं न तवेत्युच्चैः तस्मिन् विवदमानयोः ।
 पप्रच्छुः ऋषयो देवा नैवोचे व्रीडिता तु सा ॥ ११ ॥
 कुमारो मातरं प्राह कुपितोऽलीकलज्जया ।
 किं न वोचस्यसद्‌वृत्ते आत्मावद्यं वदाशु मे ॥ १२ ॥
 ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् ।
 सोमस्येत्याह शनकैः सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥ १३ ॥
 तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।
 बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥ ॥
 ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां य उदाहृतः ।
 तस्य रूपगुणौदार्य शीलद्रविणविक्रमान् ॥ १५ ॥
 श्रुत्वोर्वशीन्द्रभवने गीयमानान् सुरर्षिणा ।
 तदन्तिकमुपेयाय देवी स्मरशरार्दिता ॥ १६ ॥
 मित्रावरुणयोः शापाद् आपन्ना नरलोकताम् ।
 निशम्य पुरुषश्रेष्ठं कन्दर्पमिव रूपिणम् ।
 धृतिं विष्टभ्य ललना उपतस्थे तदन्तिके ॥ १७ ॥
 स तां विलोक्य नृपतिः हर्षेणोत्फुल्ललोचनः ।
 उवाच श्लक्ष्णया वाचा देवीं हृष्टतनूरुहः ॥ १८ ॥
 श्रीराजोवाच ।
 स्वागतं ते वरारोहे आस्यतां करवाम किम् ।
 संरमस्व मया साकं रतिर्नौ शाश्वतीः समाः ॥ १९ ॥
 उर्वश्युवाच ।
 कस्यास्त्वयि न सज्जेत मनो दृष्टिश्च सुन्दर ।
 यदङ्‌गान्तरमासाद्य च्यवते ह रिरंसया ॥ २० ॥
 एतौ उरणकौ राजन् न्यासौ रक्षस्व मानद ।
 संरंस्ये भवता साकं श्लाघ्यः स्त्रीणां वरः स्मृतः ॥ २१ ॥
 घृतं मे वीर भक्ष्यं स्यात् नेक्षे त्वान्यत्र मैथुनात् ।
 विवाससं तत् तथेति प्रतिपेदे महामनाः ॥ २२ ॥
 अहो रूपमहो भावो नरलोकविमोहनम् ।
 को न सेवेत मनुजो देवीं त्वां स्वयमागताम् ॥ २३ ॥
 तया स पुरुषश्रेष्ठो रमयन्त्या यथार्हतः ।
 रेमे सुरविहारेषु कामं चैत्ररथादिषु ॥ २४ ॥
 रममाणस्तया देव्या पद्मकिञ्जल्क गन्धया ।
 तन्मुखामोदमुषितो मुमुदेऽहर्गणान् बहून् ॥ २५ ॥
 अपश्यन् उर्वशीं इन्द्रो गन्धर्वान् समचोदयत् ।
 उर्वशीरहितं मह्यं आस्थानं नातिशोभते ॥ २६ ॥
 ते उपेत्य महारात्रे तमसि प्रत्युपस्थिते ।
 उर्वश्या उरणौ जह्रुः न्यस्तौ राजनि जायया ॥ २७ ॥
 निशम्याक्रन्दितं देवी पुत्रयोः नीयमानयोः ।
 हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना ॥ २८ ॥
 यद् विश्रम्भादहं नष्टा हृतापत्या च दस्युभिः ।
 यः शेते निशि संत्रस्तो यथा नारी दिवा पुमान् ॥ २९ ॥
 इति वाक् सायकैर्बिद्धः प्रतोत्त्रैरिव कुञ्जरः ।
 निशि निस्त्रिंशमादाय विवस्त्रोऽभ्यद्रवद् रुषा ॥ ३० ॥
 ते विसृज्योरणौ तत्र व्यद्योतन्त स्म विद्युतः ।
 आदाय मेषावायान्तं नग्नमैक्षत सा पतिम् ॥ ३१ ॥
 ऐलोऽपि शयने जायां अपश्यन् विमना इव ।
 तच्चित्तो विह्वलः शोचन् बभ्रामोन्मत्तवन् महीम् ॥ ३२ ॥
 स तां वीक्ष्य कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यां च तत्सखीः ।
 पञ्च प्रहृष्टवदनाः प्राह सूक्तं पुरूरवाः ॥ ३३ ॥
 [१]अहो जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि ।
 मां त्वमद्याप्यनिर्वृत्य वचांसि कृणवावहै ॥ ३४ ॥
 सुदेहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया ।
 खादन्त्येनं वृका गृध्राः त्वत्प्रसादस्य नास्पदम् ॥ ३५ ॥
 उर्वश्युवाच ।
 मा मृथाः पुरुषोऽसि त्वं मा स्म त्वाद्युर्वृका इमे ।
 क्वापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा ॥ ३६ ॥
 स्त्रियो ह्यकरुणाः क्रूरा दुर्मर्षाः प्रियसाहसाः ।
 घ्नन्त्यल्पार्थेऽपि विश्रब्धं पतिं भ्रातरमप्युत ॥ ३७ ॥
 विधायालीकविश्रम्भं अज्ञेषु त्यक्तसौहृदाः ।
 नवं नवमभीप्सन्त्यः पुंश्चल्यः स्वैरवृत्तयः ॥ ३८ ॥
 संवत्सरान्ते हि भवान् एकरात्रं मयेश्वरः ।
 वस्यत्यपत्यानि च ते भविष्यन्त्यपराणि भोः ॥ ३९ ॥
 अन्तर्वत्‍नीमुपालक्ष्य देवीं स प्रययौ पुरीम् ।
 पुनस्तत्र गतोऽब्दान्ते उर्वशीं वीरमातरम् ॥ ४० ॥
 उपलभ्य मुदा युक्तः समुवास तया निशाम् ।
 अथैनमुर्वशी प्राह कृपणं विरहातुरम् ॥ ४१ ॥
 गन्धर्वान् उपधावेमान् तुभ्यं दास्यन्ति मामिति ।
 तस्य संस्तुवतस्तुष्टा अग्निस्थालीं ददुर्नृप ।
 उर्वशीं मन्यमानस्तां सोऽबुध्यत चरन् वने ॥ ४२ ॥
 स्थालीं न्यस्य वने गत्वा गृहानाध्यायतो निशि ।
 त्रेतायां सम्प्रवृत्तायां मनसि त्रय्यवर्तत ॥ ४३ ॥
 स्थालीस्थानं गतोऽश्वत्थं शमीगर्भं विलक्ष्य सः ।
 तेन द्वे अरणी कृत्वा उर्वशीलोककाम्यया ॥ ४४ ॥
 उर्वशीं मन्त्रतो ध्यायन् अधरारणिमुत्तराम् ।
 आत्मानं उभयोर्मध्ये यत्तत् प्रजननं प्रभुः ॥ ४५ ॥
 तस्य निर्मन्थनात् जातो जातवेदा विभावसुः ।
 त्रय्या स विद्यया राज्ञा पुत्रत्वे कल्पितस्त्रिवृत् ॥ ४६ ॥
 तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तं अधोक्षजम् ।
 उर्वशीलोकमन्विच्छन् सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ४७ ॥
 एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाङ्‌मयः ।
 देवो नारायणो नान्य एकोऽग्निर्वर्ण एव च ॥ ४८ ॥
 पुरूरवस एवासीत् त्वयी त्रेतामुखे नृप ।
 अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वमेयिवान् ॥ ४९ ॥


इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
 हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥


 ऋ. [१०.९५.१]

चन्द्रवंशका वर्णन

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अब मैं तुम्हें चन्द्रमाके पावन वंशका वर्णन सुनाता हूँ। इस वंशमें पुरूरवा आदि बड़े-बड़े पवित्रकीर्ति राजाओंका कीर्तन किया जाता है ॥ 1 ॥सहस्त्रों वाले विराट् पुरुष नारायणके नाभिसर काजीकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजीक पुत्र हुए। वे अपने गुणांक कारण ब्रह्माजीके समान ही थे॥ 2 ॥ उन्हें अत्रिके नेत्रोंसे अमृतमय चन्द्रमाका जन्म हुआ। ब्रह्माजीने चन्द्रमाको ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रोंका अधिपति दिया ॥ 3 ॥ उन्होंने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पतिकी पत्नी ताराको हर लिया ॥ 4 ॥ देवगुरु बृहस्पतिने अपनी पत्नीको लौटा देनेके लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नीको नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थितिमें उसके लिये देवता और दानवमें घोर संग्राम छिड़ गया ॥ 5 ॥ शुक्राचार्यजीने बृहस्पतिजीके द्वेषसे असुरोके साथ चन्द्रमाका पक्ष ले लिया और महादेवजीने स्नेहवश समस्त भूतगणों के साथ अपने विद्यागुरु अङ्गिराजीके पुत्र बृहस्पतिका पक्ष लिया || 6 || देवराज इन्द्रने भी सम देवताओंके साथ अपने गुरु बृहस्पतिजीका ही पक्ष लिया। इस प्रकार ताराके निमित्तसे देवता और असुरोंका संहार करनेवाला घोर संग्राम हुआ ।। 7 ।।

तदनन्तर अङ्गिरा ऋषिने ब्रह्माजीके पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इसपर ब्रह्माजीने चन्द्रमाको बहुत डाँटा-फटकारा और ताराको उसके पति बृहस्पतिजीके हवाले कर दिया। जब बृहस्पतिजीको यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- ॥ 8 ॥ दुष्टे ! मेरे क्षेत्रमें यह तो किसी दूसरेका गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तानकी कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही ।। 9 ।। अपने पतिकी बात सुनकर तथ अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोनेके समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भसे अलग कर दिया। उस बालकको देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय ॥ 10 ॥ अब वे एक दूसरेसे इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।' ऋषियों और देवताओंने तारासे पूछा कि 'यह किसका लड़का है।' परन्तु ताराने लज्जावश कोई उत्तर न दिया ॥ 11 ॥ बालकने अपनी माताको झूठी लजासे क्रोधित होकर कहा-'दुष्टे तू बतलाती क्यों नहीं? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र से शीघ्र बतला दे ॥ 12 ॥उसी समय ब्रह्माजीने ताराको एकान्तमें बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब ताराने धीरेसे कहा कि 'चन्द्रमाका।' इसलिये चन्द्रमाने उस बालकको ले लिया ॥ 13 ॥ परीक्षित् ! ब्रह्माजीने उस बालकका नाम रखा 'बुध', क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमाको बहुत आनन्द हुआ ll 14 ll

परीक्षित्! बुधके द्वारा इलाके गर्भसे पुरूरवाका जन्म हुआ। इसका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। एक दिन इन्द्रकी सभा में देवर्षि नारदजी पुरूरवाके रूप, गुण, उदारता, शील स्वभाव, धन-सम्पत्ति और पराक्रमका गान कर रहे थे। उन्हें सुनकर उर्वशीके हृदयमें कामभावका उदय हो आया और उससे पीड़ित होकर वह देवाङ्गना पुरूरवाके पास चली आयी ।। 15-16 ॥ यद्यपि उर्वशीको मित्रावरुणके शापसे ही मृत्युलोकमें आना पड़ा था, फिर भी पुरुषशिरोमणि पुरूरवा मूर्तिमान् कामदेवके समान सुन्दर हैं—यह सुनकर सुर-सुन्दरी उर्वशीने धैर्य धारण किया और वह उनके पास चली आयी ॥ 17 ॥ देवाङ्गना उर्वशीको देखकर राजा पुरूरवाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने बड़ी मीठी वाणीसे कहा ।। 18 ।।

राजा पुरूरवाने कहा - सुन्दरी ! तुम्हारा स्वागत है। बैठो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ ? तुम मेरे साथ विहार करो और हम दोनोंका यह विहार अनन्त कालतक चलता रहे ॥ 19 ॥

उर्वशीने कहा- 'राजन्! आप सौन्दर्यके मूर्तिमान् स्वरूप है भला ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आपमें आसक्त न हो जाय ? क्योंकि आपके समीप आकर मेरा मन रमणकी इच्छासे अपना धैर्य खो बैठा है ॥ 20 ॥ राजन् ! जो पुरुष रूप गुण आदिके कारण प्रशंसनीय होता है, वही स्त्रियों को अभीष्ट होता है। अतः मैं आपके साथ अवश्य विहार करूँगी। परन्तु मेरे प्रेमी महाराज मेरी एक शर्त है मैं आपको धरोहरके रूपमें भेड़के दो बच्चे सौंपती हूँ आप इनकी रक्षा करना ॥ 21 ॥वीरशिरोमणे । मैं केवल घी खाऊँगी और मैथुनके अतिरिक्त और किसी भी समय आपको वस्त्रहीन न देख सकूंगी।' परम मनस्वी पुरुरवाने ठीक है—ऐसा कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली ।। 22 ।। और फिर उर्वशीसे कहा- तुम्हारा यह सौन्दर्य अद्भुत है। तुम्हारा भाव अलौकिक है। यह तो साम | मनुष्यसृष्टिको मोहित करनेवाला है। और देवि । कृपा करके तुम स्वयं यहाँ आयी हो। फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो सेवन न करेगा ? ॥ 23 ॥ तुम्हारा परीक्षित् | तब उर्वशी कामशास्त्रोक्त पद्धतिसे पुरुषश्रेष्ठ पुरूरवाके साथ विहार करने लगी। वे भी देवताओंकी विहार स्थली चैत्ररथ, नन्दनवन आदि उपवनोंमें उसके साथ स्वच्छन्द विहार करने लगे ॥ 24 ॥ देवी उर्वशीके शरीरसे कमलकेसरकी-सी सुगन्ध निकला करती थी। उसके साथ राजा पुरूरवाने बहुत वर्षतक आनन्द विहार किया। वे उसके मुखकी सुरभिसे अपनी सुध-बुध खो बैठते थे ॥ 25 ॥ इधर जब इन्द्रने उर्वशीको नहीं देखा, तब उन्होंने गन्धर्वोको उसे लानेके लिये भेजा और कहा- 'उर्वशीके बिना मुझे यह स्वर्ग फीका जान पड़ता है' ॥ 26 ॥ वे गन्धर्व आधी रातके समय घोर अन्धकारमें वहाँ गये और उर्वशीके दोनों भेड़ोंको, जिन्हें उसने राजाके पास धरोहर रखा था, चुराकर चलते बने || 27 || उर्वशीने जब गन्धर्वोंक द्वारा ले जाये जाते हुए अपने पुत्रके समान प्यारे भेड़ोंकी 'बें-बें' सुनी, तब वह कह उठी कि 'अरे, इस कायरको अपना स्वामी बनाकर मैं तो मारी गयी। यह नपुंसक अपनेको बड़ा वीर मानता है। यह मेरे भेड़ोंको भी न बचा सका ।। 28 । इसीपर विश्वास करनेके कारण लुटेरे मेरे बच्चोंको लूटकर लिये जा रहे हैं। मैं तो मर गयी। देखो तो सही, यह दिनमें तो मर्द बनता है और रातमें स्त्रियोंकी तरह डरकर सोया रहता है' ॥ 29 ॥ परीक्षित् ! जैसे कोई हाथीको अंकुशसे बेध डाले, वैसे ही उर्वशीने अपने वचन-बाणोंसे राजाको बींध दिया। राजा पुरूरवाको बड़ा क्रोध आया और हाथमें तलवार लेकर वस्त्रहीन अवस्थामें ही वे उस | ओर दौड़ पड़े ॥ 30 ॥ गन्धवनेि उनके झपटते ही भेड़ोंको तो वहीं छोड़ दिया और स्वयं बिजलीकी तरह चमकने लगे। जब | राजा पुरूरवा भेड़ोंको लेकर लौटे, तब उर्वशीने उस प्रकाशमें उन्हें वस्त्रहीन अवस्थामें देख लिया। (बस, वह उसी समय उन्हें छोड़कर चली गयी ॥ 31 ॥ परीक्षित् राजा पुरूरवाने जब अपने शयनागारमें अपनी | प्रियतमा उर्वशीको नहीं देखा तो वे अनमने हो गये। उनका | चित्त उर्वशीमें ही बसा हुआ था। वे उसके लिये शोकसे विह्वल । हो गये और उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीमें इधर-उधर भटकनेलगे ॥ 32 ॥ एक दिन कुरुक्षेत्रमें सरस्वती नदीके तटपर उन्होंने उर्वशी और उसकी पाँच प्रसन्नमुखी सखियोंको | देखा और बड़ी मीठी वाणीसे कहा- ॥ 33 ॥ 'प्रिये ! तनिक ठहर जाओ। एक बार मेरी बात मान लो । निष्ठुरे ! अब आज तो मुझे सुखी किये बिना मत जाओ। क्षणभर ठहरो; आओ हम दोनों कुछ बातें तो कर लें ॥ 34 ॥ देवि! अब इस शरीरपर तुम्हारा कृपा प्रसाद नहीं रहा, इसीसे तुमने इसे दूर फेंक दिया है। अतः मेरा यह सुन्दर शरीर अभी ढेर हुआ जाता है और तुम्हारे देखते-देखते इसे भेड़िये और गीध रखा जायेंगे ॥ 35 ॥

उर्वशीने कहा- राजन् ! तुम पुरुष हो । इस प्रकार मत मरो देखो, सचमुच ये भेड़िये तुम्हें खा न जाये ! स्त्रियोंकी किसीके साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियाँका हृदय और भेड़ियोंका हृदय बिलकुल एक जैसा होता है ॥ 36 ॥ स्त्रियाँ निर्दय होती हैं। क्रूरता तो उनमें स्वाभाविक ही रहती है। तनिक सी बातमें चिढ़ जाती है और अपने सुखके लिये बड़े-बड़े साहसके काम कर बैठती हैं, थोड़े-से स्वार्थके लिये विश्वास दिलाकर अपने पति और भाईतकको मार डालती हैं ॥ 37 ॥ इनके हृदयमें सौहार्द तो है ही नहीं भोले-भाले लोगोंको झूठ-मूठका विश्वास दिलाकर फाँस लेती हैं और नये-नये पुरुषकी चाटसे कुलटा और स्वच्छन्दचारिणी बन जाती हैं ॥ 38 ॥ तो फिर तुम धीरज धरो। तुम राजराजेश्वर हो । घबराओ मत। प्रति एक वर्षके बाद एक रात तुम मेरे साथ रहोगे। तब तुम्हारे और भी सन्तानें होंगी ॥ 39 ॥

राजा पुरूरवाने देखा कि उर्वशी गर्भवती है, इसलिये वे अपनी राजधानीमें लौट आये एक वर्षके बाद फिर वहाँ गये। तबतक उर्वशी एक वीर पुत्रकी माता हो चुकी थी ॥ 40 ॥ उर्वशीके मिलनेसे पुरूरवाको बड़ा सुख मिला और वे एक रात उसीके साथ रहे। प्रातः काल जब वे विदा होने लगे, तब विरहके दुःखसे वे अत्यन्त दीन हो गये। उर्वशीने उनसे कहा- ॥ 41 ॥ तुम इन गन्धवकी स्तुति करो, ये चाहें तो तुम्हें मुझे दे सकते हैं। तब राजा पुरूरवाने गन्धर्वोकी स्तुति की। परीक्षित् ! राजा पुरूरवाकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर गन्धवनि उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्निस्थापन करनेका पात्र) दी। राजाने समझा यही उर्वशी है, इसलिये उसको हृदयसे लगाकर वे एक वनसे दूसरे वनमें घूमते रहे ॥ 42 ॥जब उन्हें होश हुआ, तब वे स्थालीको वनमें छोड़कर अपने महलमें लौट आये एवं रातके समय उर्वशीका ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब त्रेतायुगका प्रारम्भ हुआ, तब उनके हृदयमें तीनों वेद प्रकट हुए ॥ 43 ॥ फिर वे उस स्थानपर गये, जहाँ उन्होंने वह अग्निस्थाली छोड़ी थी। अब उस स्थानपर शमीवृक्षके गर्भ में एक पीपलका वृक्ष उग आया था, उसे देखकर उन्होंने उससे दो अरणियाँ (मन्थनकाष्ठ) बनायीं। फिर उन्होंने उर्वशीलोककी कामनासे नीचेकी अरणिको उर्वशी, ऊपरकी अरणिको पुरूरवा और बीचके काष्ठको पुत्ररूपसे चिन्तन करते हुए अग्नि प्रज्वलित करनेवाले मन्त्रोंसे मन्थन किया ।। 44-45 ॥ उनके मन्थनसे 'जातवेदा' नामका अग्नि प्रकट हुआ। राजा पुरूरवाने अग्निदेवताको त्रयीविद्याके द्वारा आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि – इन तीन भागों में विभक्त करके पुत्ररूपसे स्वीकार कर लिया ॥ 46 ॥ फिर उर्वशीलोककी इच्छासे पुरूरवाने उन तीनों अग्नियोंद्वारा सर्वदेवस्वरूप इन्द्रियातीत यज्ञपति भगवान् श्रीहरिका यजन किया ॥ 47 ॥

परीक्षित्! त्रेताके पूर्व सत्ययुगमें एकमात्र प्रणव (ॐ कार) ही वेद था। सारे वेद-शास्त्र उसीके अन्तर्भूत थे। थे देवता थे एकमात्र नारायण; और कोई न था। अग्नि भी तीन नहीं, केवल एक था और वर्ण भी केवल एक 'हंस' ही था ॥ 48 ॥ परीक्षित् ! त्रेताके प्रारम्भमें पुरूरवासे ही वेदत्रयी और अग्नित्रयीका आविर्भाव हुआ। राजा पुरूरवाने अग्निको सन्तानरूपसे स्वीकार करके गन्धर्वलोककी प्राप्ति की ।। 49 ।।



📚: वैवस्वत मनोः वंशजानां वर्णनं एवं पुरूरवसोः उत्पत्तिः

दशमोऽध्यायः

वैशम्पायन उवाच
मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै नव तत्समाः ।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव च ।। १
नरिष्यंश्च तथा प्रांशुर्नाभागारिष्टसप्तमाः ।
करूषश्च पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ।। २ ।।
अकरोत् पुत्रकामस्तु मनुरिष्टिं प्रजापतिः ।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशाम्पते ।। ३ ।।
अनुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत ।
तस्यां तु वर्तमानायामिष्ट्यां भरतसत्तम ।। ४ ।।
मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुहोत् ।
आहुत्यां हूयमानायां देवगन्धर्वमानुषाः ।। ५ ।।
तुष्टिं तु परमां जग्मुर्मुनयश्च तपोधनाः ।
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ।। ६ ।।
तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता ।
दिव्यसंहनना चैव इला जज्ञे इति श्रुतिः ।। ७ ।।
तामिलेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा ।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह ।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ।। ८ ।।
इलोवाच
मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर ।
तयोः सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत्।। ९ ।।
सैवमुक्त्वा मनुं देवं मित्रावरुणयोरिला ।
गत्वान्तिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।। 1.10.१० ।।
अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवौ किं करवाणि वाम्।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ।। ११ ।।
तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्मपरायणाम् ।
मित्रश्च वरुणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ।। १२ ।।
अनेन तव धर्मेण प्रश्रयेण दमेन च ।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरवर्णिनि ।। १३ ।।
आवयोस्त्वं महाभागे ख्यातिं कन्येति यास्यसि ।
मनोर्वंशधरः पुत्रस्त्वमेव च भविष्यसि ।। १४ ।।
सुद्युम्न इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु शोभने ।
जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोर्वंशविवर्धनः ।। १५ ।।
निवृत्ता सा तु तच्छुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकम्।
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्त्रिता ।। १६ ।।
सोमपुत्राद् बुधाद् राजंस्तस्यां जज्ञे पुरूरवाः ।
जनयित्वा सुतं सा तमिला सुद्युम्नतां गता ।। १७ ।।
सुद्युम्नस्य तु दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ।
उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वश्च भारत ।। १८ ।।
उत्कलस्योत्कला राजन् विनताश्वस्य पश्चिमा।
दिक् पूर्वा भरतश्रेष्ठ गयस्य तु गया पुरी ।। १९ ।।
प्रविष्टे तुं मनौ तात दिवाकरमरिंदम ।
दशधा तद्दधत्क्षत्रमकरोत् पृथिवीमिमाम् ।। 1.10.२० ।।
यूपाङ्किता वसुमती यस्येयं सवनाकरा ।
इक्ष्वाकुर्ज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान् ।। २१ ।।
कन्याभावाच्च सुद्युम्नो नैनं गुणमवाप्तवान् ।
वसिष्ठवचनाच्चासीत् प्रतिष्ठाने महात्मनः ।। २२ ।।
प्रतिष्ठा धर्मराजस्य सुद्युम्नस्य कुरूद्वह ।
तत्पुरूरवसे प्रादाद् राज्यं प्राप्य महायशाः ।। २३ ।।
सुद्युम्नः कारयामास प्रतिष्ठाने नृपक्रियाम् ।
उत्कलस्य त्रयः पुत्रास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ।
धृष्टकश्चाम्बरीषश्च दण्डश्चेति सुतास्त्रयः ।। २४ ।।
यश्चकार महात्मा वै दण्डकारण्यमुत्तमम्।
वनं तल्लोकविख्यातं तापसानामनुत्तमम् ।।२५ ।।
तत्र प्रविष्टमात्रस्तु नरः पापात् प्रमुच्यते।
सुद्युम्नश्च दिवं यात ऐलमुत्पाद्य भारत ।। २६ ।।
मानवेयो महाराज स्त्रीपुंसोर्लक्षणैर्युतः ।
धृतवान् य इलेत्येव सुद्युम्नश्चातिविश्रुतः ।। २७ ।।
नरिष्यतः शकाः पुत्रा नाभागस्य तु भारत ।
अम्बरीषोऽभवत् पुत्रः पार्थिवर्षभसत्तमः ।। २८ ।।
धृष्णोस्तु धार्ष्टकं क्षत्रं रणधृष्टं बभूव ह ।
करूषस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ।। २९ ।।
सहस्रं क्षत्रियगणो विक्रान्तः सम्बभूव ह ।
नाभागारिष्टपुत्राश्च क्षत्रिया वैश्यतां गताः ।। 1.10.३० ।।
प्रांशोरेकोऽभवत् पुत्रः शर्यातिरिति विश्रुतः ।
नरिष्यतस्य दायादो राजा दण्डधरो दमः ।
शर्यातेर्मिथुनं चासीदानर्तो नाम विश्रुतः ।। ३१ ।।
पुत्रः कन्या सुकन्याख्या या पत्नी च्यवनस्य ह।
आनर्तस्य तु दायादो रेवो नाम महाद्युतिः ।। ३२ ।।
आनर्तविषयश्चासीत् पुरी चास्य कुशस्थली ।
रेवस्य रैवतः पुत्रः ककुद्मी नाम धार्मिकः ।। ३३ ।।
ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद् राज्यं प्राप्य कुशस्थलीम्।
स कन्यासहितः श्रुत्वा गान्धर्वं ब्रह्मणोऽन्तिके ।। ३४ ।।
मुहूर्तभूतं देवस्य गतं बहुयुगं प्रभो ।
आजगाम युवैवाथ स्वां पुरीं यादवैर्वृताम्।। ३५ ।।

कृतां द्वारवतीं नाम्ना बहुद्वारां मनोरमाम् ।
भोजवृष्ण्यन्धकैर्गुप्तां वासुदेवपुरोगमैः ।। ३६ ।।

ततः स रैवतो ज्ञात्वा यथातत्त्वमरिंदम ।
कन्यां तां बलदेवाय सुव्रतां नाम रेवतीम् ।। ३७ ।।

दत्त्वा जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः ।
रेमे रामोऽपि धर्मात्मा रेवत्या सहितः सुखी ।।३८।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ऐलोत्पत्तिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ।। १० ।।




📚: वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग-(87)


इला का कहानी-

श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापतेः ।
पुत्रो बाह्लीश्वरः श्रीमानिलो नाम महाशयाः ।। ७.८७.३ ।।

स राजा पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा सुधार्मिकः ।
राज्यं चैव नरव्याघ्र पुत्रवत्पर्यपालयत् ।। ७.८७.४ ।।

सुरैश्च परमोदारैर्दैतेयैश्च महाधनैः ।
नागराक्षसगन्धर्वैर्यक्षैश्च सुमहात्मभिः ।। ७.८७.५ ।।

पूज्यते नित्यशः सौम्य भयार्तै रघुनन्दन ।
अबिभ्यंश्च त्रयो लोकाः सरोषस्य महात्मनः ।। ७.८७.६ ।।

स राजा तादृशो ह्यासीद्धर्मे वीर्ये च निष्ठितः ।
बुद्ध्या च परमोदारो बाह्लीकेशो महायशाः ।। ७.८७.७ ।।

स प्रचक्रे महाबाहुर्मृगयां रुचिरे वने ।
चैत्रे मनोरमे मासि सभृत्यबलवाहनः ।। ७.८७.८ ।।

प्रजघ्ने च नृपो ऽरण्ये मृगाञ्छतसहस्रशः ।
हत्वैव तृप्तिर्नाभूच्च राज्ञस्तस्य महात्मनः ।। ७.८७.९ ।।

नानामृगाणामयुतं वध्यमानं महात्मना ।
यत्र जातो माहासेनस्तं देशमुपचक्रमे ।। ७.८७.१० ।।

तस्मिन्प्रदेशे देवेश शैलराजसुतां हरः ।
रमयामास दुर्धर्षः सर्वैरनुचरैः सह ।। ७.८७.११ ।।

कृत्वा स्त्रीरूपमात्मानमुमेशो गोपतिध्वजः ।
देव्याः प्रियचिकीर्षुः संस्तस्मिन्पर्वतनिर्झरे ।। ७.८७.१२ ।।

ये तु तत्र वनोद्देशे सत्त्वाः पुरुषवादिनः ।
वृक्षाः पुरुषनामानस्ते ऽभवन् स्त्रीजनास्तदा ।। ७.८७.१३ ।।

यच्च किञ्चन तत्सर्वं नारीसञ्ज्ञं बभूव ह ।
एतस्मिन्नन्तरे राजा स इलः कर्दमात्मजः ।
निघ्नन्मृगसहस्राणि तं देशमुपचक्रमे ।। ७.८७.१४ ।।

स दृष्ट्वा स्त्रीकृतं सर्वं सव्यालमृगपक्षकम् ।
आत्मनं स्त्रीकृतं चैव सानुगं रघुनन्दन ।। ७.८७.१५ ।।

तस्य दुःखं महच्चासीद्दृष्ट्वा ऽ ऽत्मानं तथागतम् ।
उमापतेश्च तत्कर्म ज्ञात्वा त्रासमुपागमत् ।। ७.८७.१६ ।।

ततो देवं महात्मानं शितिकण्ठं कपर्दिनम् ।
जगाम शरणं राजा सभृत्यबलवाहनः ।। ७.८७.१७ ।।

ततः प्रहस्य वरदः सह देव्या महेश्वरः ।
प्रजापतिसुतं वाक्यमुवाच वरदः स्वयम् ।। ७.८७.१८ ।।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे कार्दमेय महाबल ।
पुरुषत्वमृते सौम्य वरं वरय सुव्रत ।। ७.८७.१९ ।।

ततः स राजा दुःखार्तः प्रत्याख्यातो महात्मना ।
न च जग्राह स्त्रीभूतो वरमन्यं सुरोत्तमात् ।। ७.८७.२० ।।

ततः शोकेन महता शैलराजसुतां नृपः ।
प्रणिपत्य ह्युमां देवीं सर्वेणैवान्तरात्मना ।। ७.८७.२१ ।।

ईशे वराणां वरदे लोकानामसि भामिनी ।
अमोघदर्शने देवी भज सौम्येन चक्षुषा ।। ७.८७.२२ ।।

हृद्गतं तस्य राजर्षेर्विज्ञाय हरसन्निधौ ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं देवी रुद्रस्य संमता ।। ७.८७.२३ ।।

अर्धस्य देवो वरदो वरार्धस्य तव ह्यहम् ।
तस्मादर्धं गृहाण त्वं स्त्रीपुंसोर्यावदिच्छसि ।। ७.८७.२४ ।।

तदद्भुततरं श्रुत्वा देव्या वरमनुत्तमम् ।
सम्प्रहृष्टमना भूत्वा राजा वाक्यमथाब्रवीत् ।। ७.८७.२५ ।।

यदि देवि प्रसन्ना मे रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
मासं स्त्रीत्वमुपासित्वा मासं स्यां पुरुषः पुनः ।। ७.८७.२६ ।।

ईप्सितं तस्य विज्ञाय देवी सुरुचिरानना ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यमेवमेव भविष्यति ।। ७.८७.२७ ।।

राजन्पुरुषभूतस्त्वं स्त्रीभावं न स्मरिष्यसि ।
स्त्रीभूतश्च परं मासं न स्मरिष्यसि पौरुषम् ।। ७.८७.२८ ।।

एवं स राजा पुरुषो मासं भूत्वाथ कार्दमिः ।
त्रैलोक्यसुन्दरी नारी मासमेकमिला ऽभवत् ।। ७.८७.२९ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ।। ८७ ।।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

इला की कहानी


अत्रि चन्द्रमा "बुध" और इला 'के प्रक्षिप्त -कथानक हैं-

   (अत्रि की उत्पत्ति का पौराणिक सन्दर्भ-)
               ★नारायण उवाच★
अत्रिश्च ब्रह्मणः पुत्रस्तस्य पुत्रो निशाकरः।
स च कृत्वा राजसूयं द्विजराजो बभूव ह ।४। 

अनुवाद– ब्रह्मा के अत्रि हुए और अत्रि के निशाकर जिन्होंने राजसूय यज्ञ करके द्विजराज
की उपाधि पायी।४।

गुरुपत्न्यां च तारायां तस्याभूच्च बुधः सुतः।
बुधपुत्रस्तु चैत्रश्च तत्पुत्रः सुरथः स्मृतः ।५।

अनुवाद– गुरु पत्नी तारा में जिन्होंने बुध नाम का पुत्र उत्पन्न किया और बुध का पुत्र चैत्र हुआ और चैत्र का पुत्र सुरथ हुआ।५।
************************************
उपर्युक्त श्लोक ब्रह्म वैवर्तपुराण महापुराण से हैं जिसमें बुध का पुत्र चैत्र बताया गया है और चैत्र का पुत्र सुर है । यहाँ बुध से पुरूरवा की उत्पत्ति का वर्णन नहीं है।
सन्दर्भ-
ब्रह्म वैवर्तपुराण महापुराण द्वितीय प्रकृतिखण्ड नारदनारायणसंवाद दुर्गोपाख्याने ताराचन्द्रयोर्दोषनिवारणं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।।५८।।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में के उपर्युक्त श्लोकों में बुध की सन्तान चैत्र नाम का पुत्र बताया गया है।

विशेष:-पुरूरवा का कोई वर्णन नहीं है।अत: पुरूरवा गोप है और गोपों की सृष्टि स्वराट विष्णु से ही गोलोक में हुई है।

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और अधिकतर पुराणों में वर्णन है। कि 
अत्रि और अनुसुया से चन्द्रमा की उत्पत्ति नहीं हुई इसका शास्त्रीय खण्डन हम निम्नलिखित तथ्यों पर करते हैं।-

वैदिक ऋचाओं में अत्रि अग्नि का नामान्तरण है। और आध्यात्मिक रूप से अत्रि की उत्पत्ति निम्न प्रकार - से आत्मा की चतुरीय अवस्था  के रूप में  हुई है। अर्थात जो प्रकृति के तीनों गुणों से परे है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया है कि अत्रि वह साधक बालक है जो सम तत्व को प्राप्त प्रकृति के तीनों गुणों से परे है। देखें निम्न श्लोक-

त्रिगुणायां प्रकृत्यां त्रिर्विष्णावश्च प्रवर्त्तते ।।
तयोर्भक्तिः समा यस्य तेन बालोऽत्रिरुच्यते ।१५ ।।
अनुवाद:-
त्रिगुणात्मक प्रकृति का  वाचक "त्रि"  और  विष्णु का  "अ" है इन दोनों में समान भक्ति रखने वाले बालक को अत्रि कहा जाता है।15। 
ब्रह्मवैवर्तपुराण(ब्रह्मखणड) 
अध्याय ( 22)


                         (अत्रि-)
टिप्पणी : जब तक हम मनोमय कोश तक सीमित रहते हैं, तब तक हमारी चेतना के तीन रूप होते हैं – भावनामय, क्रियामय और ज्ञानमय। मनोमय से ऊपर उठने पर, विज्ञानमय कोश में पहुँचने पर चेतना सिमट कर एकाकार हो जाती है। वही अ+त्रि= अत्रि है। अत्रि को सबका अत्ता (खाने वाला) भी कहा जाता है और उसकी निष्पत्ति अद् धातु से की जाती है 

ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के ऋषि अत्रि व उनके पुत्र हैं। अत्रि ऋषि की प्रकृति को समझने के लिए वैदिक व पौराणिक साहित्य में विभिन्न प्रयास किए गए हैं।
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महाभारत अनुशासन पर्व ९३./८२ में अत्रि अपने नाम की निरुक्ति करते हुए कहते हैं कि जो अत्रि है, वही अत्रि है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे तुरीया अवस्था को अत्रि कह सकते हैं।

तब यह तीन से परे की अवस्था अत्रि कहलाएगी। पुराणों में अरात्रि की इस अवस्था की व्याख्या अत्रि-पत्नी अनसूया के रूप में की गई है। अनसूया अर्थात् अन्-असूर्या। अत्रि को तुरीयावस्था से सम्बन्धित करने की कल्पना की पुष्टि ऋग्वेद ५.४०.६ की ऋचा से होती है जहाँ अत्रि तुरीय ब्रह्म द्वारा राहु/स्वर्भानु से विद्ध सूर्य को प्राप्त करते हैं।

*********
वेदों में अत्रि को अग्नि के रूप में वर्णन किया गया है-
जो ईरानी धर्म ग्रन्थ अवेस्ता ए जैंद में अतर" नाम से है।
देखें वेदों की निम्नलिखित ऋचाऐं-

यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः।
अक्षेत्रविद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः॥५॥

स्वर्भानोरध यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन् ।
गूळ्हं सूर्यं तमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददत्रिः ॥६॥

ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन्कीरिणा देवान्नमसोपशिक्षन् ।
अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात्स्वर्भानोरप माया अघुक्षत् ॥८॥

यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः ।
अत्रयस्तमन्वविन्दन्नह्यन्ये अशक्नुवन् ॥९॥
(ऋग्वेद 5/4/5-6-8-9)

अनुवाद:-जब असुर स्वर्भानु के द्वारा  सूर्यदेव तुम्हारे ऊपर अन्धकार फैला दिया, तब सारे लोक ऐसे दिखाई देने लगे, जैसे कोई अपने बहुत से स्वरूपों को न जानते हुए भी मोहग्रस्त हो गया हो।५।

सायण-
इन चार प्रारम्भिक ऋचाओं में अत्रि के कर्म की प्रशंसा कि गयी है।
हे सूर्य ! तुमको असुर स्वर्भानु ने अन्धकार के द्वारा आच्छादित कर दिया ( ढ़क दिया) तब सभी लोक इस प्रकार दिखाई देने लगे जैसे सभी लोग अपने स्वरूपों को न जानते हुए मूढ़ता को प्राप्त हो गये हों।५।
जब असुर स्वर्भानु के पुत्र सूर्य ने तुम्हारे ऊपर अंधकार फैला दिया, तब सारे लोक ऐसे दिखाई देने लगे, जैसे कोई अपना बहुवचन स्वरूप न जानते हुए भी मोहग्रस्त हो गया हो।'५। 

विशेष:-
स्वर्भानु: राहु का एक नाम है , जो आरोही प्रवृत्ति का है, जो ग्रहण का कारण बनता है; वह कश्यप का पुत्र था, जो दानवों या असुरों की माता दनु से उत्पन्न हुआ था; एक अन्य सम्बन्धपरक रूप से उसे हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से उत्पन्न विप्रचिति का पुत्र माना जाता है।५।


जब हे इन्द्र , आप सूर्य के नीचे फैले स्वर्भानु की माया को दूर कर रहे थे , तब अत्रि ने अपनी चौथी पवित्र प्रार्थना द्वारा अन्धकार में छिपे सूर्य को खोज लिया, जिससे इन्द्र के कार्यों में बाधा उत्पन्न हो रही थी।६।
_
अनुवाद:- तब यज्ञ का एक ऋत्विक जो चार वेदों का जाननेवाला और पूरे कर्म का निरीक्षण करनेवाला होता उसके रूप में ( अत्रि ) ने मणियों को जोड़कर, देवताओं की स्तुति करके, उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके, आकाश में सूर्य का नेत्र स्थापित किया; उन्होंने स्वर्भानु के मोह को नष्ट कर दिया ।८।

अनुवाद:-सूर्य को, जिसे असुर स्वर्भानु ने अन्धकार से ढक दिया था, बाद में अत्रि के पुत्रों ने पुनः प्राप्त कर लिया; अन्य कोई भी उसे मुक्त कराने में समर्थ नहीं हो सका।९।
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अत्रि ऋषि की एक निरुक्ति शतपथ ब्राह्मण १.४.५.१३ में की गई है जिसका निहितार्थ विचारणीय है। यहाँ प्रजापति द्वारा मन और वाक् के बीच मन को श्रेष्ठ घोषित करने पर वाक् के गर्भ का पतन हो जाता है जो अत्रि बनता है।

चूँकि वाक् मुख से निकलती है, अतः अत्रि को मुख से सम्बन्धित माना गया है जो सर्व प्रकार के अन्न का भक्षण करता है।

जैमिनीय ब्राह्मण २.२१९ में अत्रि व अन्य ऋषियों की प्रकृति की व्याख्या के प्रयास में कहा गया है कि अत्रि की कामना है कि उनकी प्रजा भूयिष्ठ हो। गोपथ ब्राह्मण १.२.१७ इत्यादि में उल्लेख है कि राहु द्वारा ग्रस्त सूर्य की रक्षा केवल अत्रि ही कर पाए, जिसके बदले में उन्होंने अपनी प्रजा को दक्षिणा प्राप्ति का अधिकार दिलाया।

अतः यज्ञ में सर्वप्रथम आत्रेय को हिरण्य दिया जाता है।

जैमिनीय ब्राह्मण २.२८१ के अनुसार पहले चार(अन्नमय, प्राणमय, मनोमय व विज्ञानमय कोश?) मिथुन हैं। यह बृहद् और रथन्तर (बहिर्मुखी व अन्तर्मुखी चेतना?) के दिव्य मिथुन हैं। पाँचवें हिरण्यय कोश का मिथुन नहीं होता। अत्रि की कामना है कि यह चार कोश में वीर्य बन जाएं। वही वीर्य है जो आत्मा के वीर्य के अनुदिश वीर्य है।

ऋग्वेद ५.४० में अत्रि द्वारा राहु/स्वर्भानु से विद्ध( आच्छादित) सूर्य की रक्षा करने का उल्लेख है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इस आख्यान का सार्वत्रिक उल्लेख है( जैमिनीय ब्राह्मण १.८०, शतपथ ब्राह्मण ४.३.४.२१, ताण्ड्य ब्राह्मण ६.६.८ व १४.११.१५ इत्यादि)। इस आख्यान में अत्रि द्वारा सूर्य से तम( अन्धकार) का अपाहन (निवारण)  करने पर प्रथम बार कृष्णा अवि ,  दूसरी बार धूम्रा अवि और तीसरी बार फल्गु अवि की उत्पत्ति हुई। ताण्ड्य ब्राह्मण १४.११.१५ के अनुसार यज्ञ में जिन दिनों को छन्दोम कहा जाता है, वही तम का रूप हैं। यहां जिस अवि का उल्लेख है, उसकी व्याख्या उपनिषदों में अविमुक्त/वाराणसी के रूप में की गई है। जाबालोपनिषद २ व ५ तथा रामोत्तरतापिन्युपनिषद ३.१ में उल्लेख है कि अत्रि ने याज्ञवल्क्य से अनन्त, अव्यक्त, परिपूर्णानन्द आत्मा को जानने का उपाय पूछा। याज्ञवल्क्य ने उन्हें उत्तर के रूप में अविमुक्त क्षेत्र की महिमा के रूप में असि और वरणा नदियों के बीच भ्रूमध्य में स्थिति वाराणसी की महिमा बताई।

ऋग्वेद १.११६.८ इत्यादि में असुरों द्वारा ऋबीस? में बद्ध अत्रि की अश्विनौ द्वारा रक्षा करने का उल्लेख है। ऋग्वेद १.११२.७, १.११८.७ तथा १.१८०.४ इत्यादि के उल्लेख के अनुसार अत्रि जिस घर्म से परितप्त हो रहे थे, अश्विनौ ने उस घर्म को ओमान, मधुमान् बना दिया, अथवा उसे शीतल बना दिया(घर्म का एक रूप मनुष्य के अन्दर सर्वदा सुनाई देने वाली घॄं प्रकार की ध्वनि है। यह ओम का रूप बन जाए, यही अभीष्ट है।

ऋग्वेद की ५.७.८ इत्यादि कईं ऋचाओं में अग्नि से अत्रिवत् होकर आने की कामना की गई है। जैसे अत्रि सब कुछ भक्षण कर जाते हैं, वैसे ही अग्नि भी सब कुछ भक्षण कर जाती है।

ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता में अत्रि शब्द अतर के रूप में -अग्नि का वाचक है ।
जो वैदिक ऋचाओं में उद्धृत अत्रि अंगि है और वशिष्ठ का सहवर्ती है।।
वशिष्ठ को ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता में "वहिश्त" तथा अंगिरा को 'अंग्र' और यम को यिम कहा गय है।
ब्रह्माण्ड पुराण में अत्रि की वंशावली ब्राह्मणों की वंशावली के रूप में वर्णित है।
परन्तु अनुसूया नामक उनकी पत्नी का पता ही है 
अनुसूया के माता पिता प्रजापति कर्दम और देवहूति थे।  जबकि अत्रि की दश पत्नीयाँ घृताक्षी अप्सरा और भद्राश्व गन्धर्व की कन्याऐं हैं। जैसा निम्नलिखित श्लोकों में उनका वर्णन है। अत्रि की मद्रा नाम की पत्नी से सोम उत्पन्न हुआ है। जो अत्रि की एक पत्नी अनुसूया से भिन्न है।

अध्याय- (8) अत्रि का वंश- ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद- 
                                              
अत्रि का वंश- ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद- 


अत्रेर्वशं प्रवक्ष्यामि तृतीयस्य प्रजापतेः॥२/८/७३॥
"अनुवाद:-
मैं तीसरे प्रजापति अत्रि के वंश का वर्णन करूँगा।७३।

तस्य पत्न्यस्तु सुन्दर्यों दशैवासन्पतिव्रताः।
भद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः॥ २/८/७४॥
"अनुवाद:-
उन अत्रि की दस सुन्दर पत्नियाँ थीं जो पतिव्रता थीं। वे सभी दस दिव्य कन्या घृतासी से उत्पन्न भद्राश्व की संतानें थे।७४।

भद्रा शूद्रा च मद्रा च शालभा मलदा तथा ।
बला हला च सप्तैता या च गोचपलाः स्मृताः ॥ २/८/७५॥
"अनुवाद:-. 
१-भद्रा , २-शूद्रा , ३-मद्रा ४-, शालभा , ५-मलदा , ६-बला और ७- हला । ये सात (बहुत महत्वपूर्ण थीं) और उनके जैसे अन्य। ८-गोचपला ।७५।

तथा तामरसा चैव रत्नकूटा च तादृशः ।
तत्र यो वंशकृच्चासौ तस्य नाम प्रभाकरः ॥ २/८/७६ ॥
"अनुवाद:-
९-ताम्रसा और १०- रत्नकुटा भी उसी प्रकार से अत्रि की दश पत्नीयाँ थीं उनके वंश को कायम रखने वाले उनके पुत्रों में प्रभाकर नामका एक वंशज भी हुआ ।७६।

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मद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम् ।
स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम् ॥ २/८/७७॥
"अनुवाद:-
उन प्रभाकर अत्रि ने मद्रा नामक पत्नी से प्रसिद्ध पुत्र सोम (चन्द्रमा) को जन्म दिया। जब सूर्य पर स्वर्भानु ( राहु ) का प्रहार हुआ, जब वह सूर्य  स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर रहा था।77। 

तमोऽभिभूते लोकेऽस्मिन्प्रभा येन प्रवर्त्तिता।
स्वस्ति तेस्त्विति चोक्तो वै पतन्निह दिवाकरः॥ २/८/७८॥

"अनुवाद:-
और जब यह संसार अंधकार से घिर गया, तब उन्हीं (अर्थात् अत्रि) के द्वारा ही प्रकाश (प्रभा) उत्पन्न हुआ। डूबते हुए सूरज को भी कहा गया “तुम्हारा कल्याण हो।78।

ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य न पपात दिवो महीम् ।
अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः॥ २/८/७९॥
"अनुवाद:-
उस ब्राह्मण ऋषि के कथन के कारण, वह (सूर्य) स्वर्ग से पृथ्वी पर नहीं गिरा।  जिनके द्वारा गोत्रों में श्रेष्ठ गोत्र अत्रि का प्रारम्भ हुआ।79।

यज्ञेष्वनिधनं चैव सुरैर्यस्य प्रवर्तितम् ।
स तासु जनयामास पुत्रानात्मसमानकान् ॥ २/८/८० ॥
"अनुवाद:-
उन्होंने ही यज्ञ के दौरान सुरों की मृत्यु का निवारण किया । उन्होंने उन प्रभाकर अत्रि ने (दस अप्सराओं) से अपने समान अनेक  पुत्र उत्पन्न किए।८०।

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दश तान्वै सुमहता तपसा भावितः प्रभुः ।
स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः ॥ २/८/८१।।
"अनुवाद:-
महान तप से पवित्र हुए भगवान ने दस पुत्र उत्पन्न किये। वे स्वस्त्यात्रेय नाम से विख्यात ऋषिगण वेदों में पारंगत थे।।८१।

तेषां द्वौ ख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ सुमहौजसौ ।
दत्तो ह्यनुमतो ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः ॥ २/८/८२॥
"अनुवाद:-
उनमें दो बहुत प्रसिद्ध थे। वे ब्रह्मज्ञान में बहुत रुचि रखते थे और महान आध्यात्मिक शक्ति वाले थे। दत्त को सबसे बड़ा माना जाता है, दुर्वासा उनके छोटे भाई थे। ८२।

यवीयसी सुता तेषामबला ब्रह्मवादिनी ।
अत्राप्युदाहरन्तीमं श्लोकं पौराणिकाः पुरा ॥ २/८/८३॥

"अनुवाद:-
सबसे छोटी एक पुत्री थी जिसने ब्रह्मज्ञान की व्याख्या की थी। इस संदर्भ में पुराणों के जानकार लोग इस श्लोक का हवाला देते हैं।८३।


अत्रेः पुत्रं महात्मानं शान्तात्मानमकल्मषम् ।
दत्तात्रेयं तनुं विष्णोः पुराणज्ञाः प्रचक्षते ॥२/८/८४॥
"अनुवाद:-
पुराणों के जानकार कहते हैं कि अत्रि के महान् पुत्र दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे अपने हृदय में शान्त और पापों से मुक्त हैं।८४।

तस्य गोत्रान्वयाज्जाताश्चत्वारः प्रथिता भुवि ।
श्यावाश्वा मुद्गलाश्चैव वाग्भूतकगविस्थिराः ॥ २/८/८५॥

"अनुवाद:-
उनके (अत्रि) वंशजों में चार लोग पृथ्वी पर विख्यात हैं - श्यावाश्व , मुद्गल , वाग्भूतक और गविष्ठिर ।८५।


एतेऽत्रीणां तु चत्वारः स्मृताः पक्षा महौजसः।
काश्यपो नारदश्चैव पर्वतोऽरुन्धती तथा ॥ २/८/८६॥

"अनुवाद:- 
निम्नलिखित चार भी अत्रि वंश के ही माने जाते हैं । वे बहुत शक्तिशाली हैं। वे हैं कश्यप , नारद , पर्वत और अरुन्धति ।८६।

सन्दर्भ:-
श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते मध्यभागे तृतीय उपोद्धातपादे ऋषिवंशवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥

विशेष:-दुर्वासा और दत्तात्रेय अत्रि की बड़ी पत्नी भद्रा से उत्पन्न. हुए थे ।जबकि सोम अत्रि की मद्रा नामक पत्नी से हुए थे यहाँ अनुसूया की किसी सन्तान का वर्णन नहीं है। ....
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शिव के एक हजार नामों में अत्रि भी
उनका एक नाम है और चन्द्रमा उनके शिखर पर सुशोभित होने से चन्द्रमा
को अत्रि  से उत्पन्न करने की कल्पना की गयी।

परन्तु  चन्द्रमा विराट् पुरुष विष्णु के मन से उत्पन्न हुआ है अत: चन्द्रमा भी वैष्णव है।  सभी गोप जो विष्णु के शरीर के रोमकूपों से उत्पन्‍न हैं। वह तो वैष्णव हैं ही ।

उपर्युक्त श्लोकों में कहीं भी अत्रि की पत्नी अनसूया का कहींं वर्णन नहीं है।
अनुसूय कर्दम और  देवहूति की पुत्री है।
ब्रह्माण्ड पुराण में अत्रि की पत्नी के रूप में अनुसूया का कोई वर्णन नहीं है।
अत: ये कथाऐं अनुसूया वाली बाद में जोड़ी गयी।

नीचे पुरुष सूक्त से दो ऋचाऐं उद्धृत हैं। जो चन्द्रमा की उत्पत्ति का निर्देशन करती हैं।
"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥१३॥

"नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१४॥ 
(ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ९० ऋचा १३)

श्रीमद्भगवद्गीता में भी विष्णु के विराट रूप में चन्द्रमा उनसे उत्पन्न रूप है। 

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।11.19।।श्रीमद्भगवद्गीता)
"अनुवाद - 
आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुखोंवाले और अपने तेजसे संसार को संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१॥

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥४॥

तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥६॥


ऋग्वेदः सूक्तं १०.९०-५-६-७
तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥

सायण-भाष्य-
विष्वङ् व्यक्रामदिति यदुक्तं तदेवात्र प्रपञ्च्यते । “तस्मात् आदिपुरुषात् “विराट् ब्रह्माण्डदेहः “अजायत उत्पन्नः । विविधानि राजन्ते वस्तून्यत्रेति विराट् । “विराजोऽधि विराड्देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणं कृत्वा “पुरुषः तद्देहाभिमानी कश्चित् पुमान् अजायत । सोऽयं सर्ववेदान्तवेद्यः परमात्मा स्वयमेव स्वकीयया मायया विराड्देहं ब्रह्माण्डरूपं सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत् । एतच्चाथर्वणिका उत्तरतापनीये विस्पष्टमामनन्ति---- स वा एष भूतानीन्द्रियाणि विराजं देवताः कोशांश्च सृष्ट्वा प्रविश्यामूढो मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव' (नृ. ता. २. १, ९) इति । “स “जातः विराट् पुरुषः “अत्यरिच्यत अतिरिक्तोऽभूत् । विराड्व्यतिरिक्तो देवतिर्यङ्मनुष्यादिरूपोऽभूत् । “पश्चात् देवादिजीवभावादूर्ध्वं “भूमिं ससर्जेति शेषः । “अथो भूमिसृष्टेरनन्तरं तेषां जीवानां “पुरः ससर्ज । पूर्यन्ते सप्तभिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ॥॥१७॥


यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥६॥

सायणभाष्य-

यत् यदा पूर्वोक्तक्रमेणैव शरीरेषुत्पन्नेषु सत्सु "देवाः उत्तरसृष्टिसिद्धयर्थं बाह्यद्रव्यस्यानुत्पन्नत्वेन हविरन्तरसंभवात् पुरुषस्वरूपमेव मनसा हविष्ट्वेन संकल्प्य “पुरुषेण पुरुषाख्येन “हविषा मानसं यज्ञम् “अतन्वत अन्वतिष्ठन् तदानीम् “अस्य यज्ञस्य “वसन्तः वसन्तर्तुरेव “आज्यम् “आसीत् अभूत् । तमेवाज्यत्वेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः । एवं “ग्रीष्म “इध्मः आसीत्। तमेवेध्मत्वेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः। तथा “शरद्धविः आसीत् । तामेव पुरोडाशादिहविष्ट्वेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः । पूर्वं पुरुषस्य हविःसामान्यरूपत्वेन संकल्पः । अनन्तरं वसन्तादीनामाज्यादिविशेषरूपत्वेन संकल्प इति द्रष्टव्यम् ॥

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥७॥

सायणभाष्य-

विष्वङ् व्यक्रामदिति यदुक्तं तदेवात्र प्रपञ्च्यते । “तस्मात् आदिपुरुषात् “विराट् ब्रह्माण्डदेहः “अजायत उत्पन्नः । विविधानि राजन्ते वस्तून्यत्रेति विराट् । “विराजोऽधि विराड्देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणं कृत्वा “पुरुषः तद्देहाभिमानी कश्चित् पुमान् अजायत । सोऽयं सर्ववेदान्तवेद्यः परमात्मा स्वयमेव स्वकीयया मायया विराड्देहं ब्रह्माण्डरूपं सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत् । एतच्चाथर्वणिका उत्तरतापनीये विस्पष्टमामनन्ति---- स वा एष भूतानीन्द्रियाणि विराजं देवताः कोशांश्च सृष्ट्वा प्रविश्यामूढो मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव' (नृ. ता. २. १, ९) इति । “स “जातः विराट् पुरुषः “अत्यरिच्यत अतिरिक्तोऽभूत् । विराड्व्यतिरिक्तो देवतिर्यङ्मनुष्यादिरूपोऽभूत् । “पश्चात् देवादिजीवभावादूर्ध्वं “भूमिं ससर्जेति शेषः । “अथो भूमिसृष्टेरनन्तरं तेषां जीवानां “पुरः ससर्ज । पूर्यन्ते सप्तभिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ॥॥१७॥


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अब प्रमाणित करेंगे कि-
बुध की चन्द्रमा से उत्पत्ति भी पूर्णत: कुछ पुराणों में  काल्पनिक थ्योरी पर  आधारित है जो बाद में जोड़ी गयी है।
जिसे उन्ही के थ्योरी के रूप में उद्धृत करते हैं।

पुराणों में एक काल्पनिक  कहानी बनाकर जोड़ी गयी ---"चन्द्रमा के गुरु थे देवगुरु बृहस्पति। बृहस्पति की पत्नी तारा चन्द्रमा की सुन्दरता पर मोहित होकर उनसे प्रेम करने लगी।

तदोपरान्त वह चन्द्रमा के संग सहवास भी कर गई एवं बृहस्पति को छोड़ ही दिया। 

बृहस्पति के वापस बुलाने पर उसने वापस आने से मना कर दिया, जिससे बृहस्पति क्रोधित हो उठे तब बृहस्पति एवं उनके शिष्य चन्द्र के बीच युद्ध आरम्भ हो गया।

इस युद्ध में असुर गुरु शुक्राचार्य चंद्रमा की ओर हो गये और अन्य देवता बृहस्पति के साथ हो लिये। अब युद्ध बड़े स्तर पर होने लगा। 

क्योंकि यह युद्ध तारा की कामना से हुआ था, अतः यह तारकाम्यम कहलाया।

इस वृहत स्तरीय युद्ध से सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा को भय हुआ कि ये कहीं पूरी सृष्टि को ही नष्ट न हो जाए, तो वे बीच बचाव कर इस युद्ध को रुकवाने का प्रयोजन करने लगे।

उन्होंने तारा को समझा-बुझा कर चन्द्र से वापस लिया और बृहस्पति को सौंपा।

इस बीच तारा के एक सुन्दर पुत्र जन्मा जो बुध कहलाया।

चन्द्र और बृहस्पति दोनों ही इसे अपना बताने लगे और स्वयं को इसका पिता बताने लगे यद्यपि तारा चुप ही रही।

माता की चुप्पी से अशांत व क्रोधित होकर स्वयं बुध ने माता से सत्य बताने को कहा। तब तारा ने बुध का पिता चन्द्रमा को बताया।

समीक्षा- उपर्युक्त पौराणिक मत पूर्णत: असंगत व काल्पनिक है।
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"दूसरा पौराणिक मत-

दूसरे मत से तारा बृहस्पति की पत्नी थी। चंद्र उनके सौंदर्य से मोहित होकर विवाह प्रस्ताव दिया तो तारा ने उसे ठुकरा दिया। इससे चंद्र क्रोधित हो परे और बलपूर्वक उनका बलात्कार किया। इस बलात्कार के कारण तारा गर्भवती हुई और बुध का जन्म हुआ।

समीक्षा- दूसरा मत भी पूर्णत: काल्पनिक है। क्योंकि सत्य सदैव एक रूप होता है । उसमें कोई विकल्प नहीं होता परन्तु असत्य अनेक विकल्पों वाला बहुरूपिया होता है।

निष्कर्ष- चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जो बुध ग्रह से बहुत छोटा है।

इस चन्द्रमा का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 1.2% है और इसका व्यास 3,474 किमी (2,159 मील) है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग एक-चौथाई है


बुध का व्यास चन्द्रमा के व्यास से लगभग 40% अधिक है। बुध का व्यास 4,879 किलोमीटर है, जबकि चंद्रमा का व्यास 3,475 किलोमीटर है. 

अर्थात 1,404 किलोमीटर व्यास बुध का ज्यादा होने से भी वह बुध चन्द्रमा से बड़ा है।

अत: चन्द्रमा से बुध की उत्पत्ति भी सम्भव नहीं है। क्योंकि छोटी वस्तु जिसका घनत्व और भार कम है उससे अधिक घनत्व और भार की वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती है।
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"अब इला की काल्पनिक सिद्धान्त हीन थ्योरी भी सुने


जो उसे सैद्धान्तिक रूप से इला को बुध की पत्नी नहीं बनाती हैं क्योंकि गर्भवास की पूर्ण अवधि नौ महीने होती है । और नौ महीनों तक इला का स्त्री बने रहना सम्भव नहीं- क्यों कि उन्हें एक महीना स्त्री और एक महीना पुरुष होना पड़ता है। *********************

इस प्रकार उनका न तो स्त्रीत्व ही सुरक्षित है और न पुरुषत्व ही ।

पुराणों के इसी आख्यान को हम निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत करते हैं जो मनगड़न्त है।

-श्रीमद्भागवत महापुराण (भागवत पुराण) से
वैवस्वत मनु के पुत्र राजा सुद्युन की कथा

अध्याय एक – राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना (9.1)

1 राजा परीक्षित ने कहा: हे प्रभु श्रील शुकदेव गोस्वामी, आप विभिन्न मनुओं से सारे कालों का विस्तार से वर्णन कर चुके हैं और उनमें असीम शक्तिमान पूर्ण भगवान के अद्भुत कार्यकलापों का भी वर्णन कर चुके हैं। मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने आपसे ये सारी बातें सुनीं।

2-3 द्रविड़ देश के साधु सदृश राजा सत्यव्रत को भगवतकृपा से गत कल्प के अन्त में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ और वह अगले मन्वन्तर में विवस्वान का पुत्र वैवस्वत मनु बना। मुझे इसका ज्ञान आपसे प्राप्त हुआ है। मैंने यह भी जाना कि इक्ष्वाकु इत्यादि राजा उसके पुत्र थे, जैसा कि आप पहले बतला चुके हैं।

4 हे परम भाग्यशाली श्रील शुकदेव गोस्वामी, हे महान ब्राह्मण, कृपा करके हमको उन सारे राजाओं के वंशों तथा गुणों का पृथक-पृथक वर्णन कीजिये, क्योंकि हम आपसे ऐसे विषयों को सुनने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।

5 कृपा करके हमें वैवस्वत मनु के वंश में उत्पन्न उन समस्त विख्यात राजाओं के पराक्रम के विषय में बतलायें जो पहले हो चुके हैं, जो भविष्य में होंगे तथा जो इस समय विद्यमान हैं।

6 सूत गोस्वामी ने कहा: जब वैदिक ज्ञान के पण्डितों की सभा में सर्वश्रेष्ठ धर्मज्ञ श्रील शुकदेव गोस्वामी से महाराज परीक्षित ने इस प्रकार से प्रार्थना की, तो वे इस प्रकार बोले।

7 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजा, अब तुम मुझसे मनु के वंश के विषय में विस्तार से सुनो। मैं यथासम्भव तुम्हें बतलाऊँगा, यद्यपि सौ वर्षों में भी उसके विषय में पूरी तरह नहीं बतलाया जा सकता।

8 जीवन की उच्च तथा निम्न अवस्थाओं में पाये जाने वाले जीवों के परमात्मा दिव्य परम पुरुष कल्प के अन्त में विद्यमान थे, जब न तो यह ब्रह्माण्ड था, न अन्य कुछ था। तब केवल वे ही विद्यमान थे।

9 हे राजा परीक्षित, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की नाभि से एक सुनहला कमल उत्पन्न हुआ, जिस पर चार मुखों वाले ब्रह्माजी ने जन्म लिया।

10 ब्रह्माजी के मन से मरीचि ने जन्म लिया। दक्ष महाराज की कन्या और मरीचि के संयोग से कश्यप प्रकट हुए। कश्यप द्वारा अदिति के गर्भ से विवस्वान ने जन्म लिया।

11-12 हे भारतवंश के श्रेष्ठ राजा, संज्ञा के गर्भ से विवस्वान को श्राद्धदेव मनु प्राप्त हुए। श्राद्धदेव मनु ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था। उन्हें अपनी पत्नी श्रद्धा के गर्भ से दस पुत्र प्राप्त हुए। इन पुत्रों के नाम थे – इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करुषक,   पृषध्र, नभग तथा कवि।

13 आरम्भ में मनु को एक भी पुत्र नहीं था। अतएव आध्यात्मिक ज्ञान में अत्यन्त शक्ति सम्पन्न महर्षि वसिष्ठ ने (उसको पुत्र प्राप्ति के लिए) मित्र तथा वरुण देवताओं को प्रसन्न करने के लिए एक यज्ञ सम्पन्न किया।

14 उस यज्ञ के दौरान मनु की पत्नी श्रद्धा, जो केवल दूध पीकर जीवित रहने का व्रत कर रही थी, यज्ञ करने वाले पुरोहित के निकट गई, उन्हें प्रणाम किया और उनसे एक पुत्री की याचना की।

15 प्रधान पुरोहित द्वारा यह कहे जाने पर "अब आहुति डालो" आहुति डालने वाले (होता) ने आहुति डालने के लिए घी लिया। तब उसे मनु की पत्नी की याचना स्मरण हो आई और उसने वषट् शब्दोच्चार करते हुए यज्ञ सम्पन्न किया।

16 मनु ने वह यज्ञ पुत्र प्राप्ति के लिए प्रारम्भ किया था, किन्तु मनु की पत्नी के अनुरोध पर पुरोहित के विपथ होने से इला नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। इस पुत्री को देखकर मनु अधिक प्रसन्न नहीं हुए। अतएव वे अपने गुरु वसिष्ठ से इस प्रकार बोले।

17 हे प्रभु, आप लोग वैदिक मन्त्रों के उच्चारण में पटु हैं। तो फिर वाँछित फल से विपरीत फल क्यों निकला? यही मेरे लिए शोक का विषय है। वैदिक मन्त्रों का ऐसा उल्टा प्रभाव नहीं होना चाहिए था।

18 आप सभी संयमित, मन से संतुलित तथा परम सत्य से परिचित हो। आप सबने अपनी तपस्याओं के द्वारा सारे भौतिक कल्मषों से अपने आप को पूरी तरह स्वच्छ कर लिया है। आप सबके वचन देवताओं के वचनों की तरह कभी मिथ्या नहीं होते। तो फिर यह कैसे सम्भव हुआ कि आप सबका संकल्प विफल हो गया?

19 मनु के इन वचनों को सुनकर अत्यन्त शक्तिसम्पन्न प्रपितामह वसिष्ठ पुरोहित की त्रुटि को समझ गए। अतः वे सूर्यपुत्र से इस प्रकार बोले।

20 तुम्हारे पुरोहित द्वारा मूल उद्देश्य में विचलन के कारण लक्ष्य में यह त्रुटि हुई है। फिर भी मैं अपने पराक्रम से तुम्हें एक अच्छा पुत्र प्रदान करूँगा।

21 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजा परीक्षित, अत्यन्त सुविख्यात एवं शक्तिसम्पन्न वसिष्ठ ने यह निर्णय लेने के बाद, परम पुरुष भगवान विष्णु से इला को पुरुष में परिणत करने के लिए प्रार्थना की।

22 परम नियन्ता परमेश्वर ने वसिष्ठ से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वरदान दिया। इस तरह इला सुद्युम्न नामक एक सुन्दर पुरुष में परिणत हो गई।

23-24 हे राजा परीक्षित, एक बार वीर सुद्युम्न अपने कुछ मंत्रियों और साथियों के साथ, सिंधुप्रदेश से लाये गये घोड़े पर सवार होकर शिकार करने जंगल में गया। वह कवच पहने था और धनुष-बाण से सुसज्जित था। वह अत्यन्त सुन्दर था। वह पशुओं का पीछा करते हुए तथा उनको मारते हुए जंगल के उत्तरी भाग में पहुँच गया।

25 वहाँ उत्तर में मेरु पर्वत की तलहटी में सुकुमार नामक एक वन है जहाँ शिवजी सदैव उमा के साथ आनन्द-विहार करते हैं। सुद्युम्न उस वन में प्रविष्ट हुआ।

26 हे राजा परीक्षित, ज्योंही अपने शत्रुओं को दमन करने में निपुण सुद्युम्न उस जंगल में प्रविष्ट हुआ, त्योंही उसने देखा कि वह एक स्त्री में और उसका घोड़ा एक घोड़ी में परिणत हो गये हैं।

27 जब उसके साथियों ने भी अपने स्वरूपों एवं अपने लिंग को विपरीत लिंग में परिणत हुआ देखा, तो वे सभी अत्यन्त खिन्न हो गये और एक दूसरे की ओर देखते रह गये।

28 महाराज परीक्षित ने कहा: हे सर्वश्रेष्ठ शक्तिसम्पन्न ब्राह्मण, यह स्थान इतना शक्तिशाली क्यों था और किसने इसे इतना शक्तिशाली बनाया था? कृपा करके इस प्रश्न का उत्तर दीजिये, क्योंकि मैं इसके विषय में जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।

29 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: एक बार आध्यात्मिक अनुष्ठानों का दृढ़ता से पालन करने वाले महान साधु पुरुष उस जंगल में शिवजी का दर्शन करने आए। उनके तेज से समस्त दिशाओं का सारा अंधकार दूर हो गया।

30-31 जब देवी अम्बिका ने इन महान साधु पुरुषों को देखा, तो वे अत्यधिक लज्जित हुईं। साधु पुरुषों ने देखा कि गौरीशंकर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिए वे वहाँ से लौट गए और नर-नारायण आश्रम की ओर चल पड़े।

32 तत्पश्चात अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए शिवजी ने कहा, “कोई भी पुरुष इस स्थान में प्रवेश करते ही तुरन्त स्त्री बन जाएगा।”

33 उस समय से कोई भी पुरुष ने उस जंगल में प्रवेश नहीं किया था। किन्तु अब राजा सुद्युम्न स्त्री रूप में परिणत होकर अपने साथियों समेत एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमने लगा।

34 सुद्युम्न सर्वोत्तम सुन्दर स्त्री रूप में परिणत कर दिया गया था और वह अन्य स्त्रियों से घिरी हुई थी। चन्द्रमा के पुत्र बुध को इस सुन्दरी को अपने आश्रम के निकट विचरण करते देखकर उसके साथ भोग करने की चाहत हुई।

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35 उस सुन्दर स्त्री ने भी चन्द्रमा के राजकुमार बुध को अपना पति बनाना चाहा। इस तरह बुध ने उसके गर्भ से पुरूरवा नामक एक पुत्र प्राप्त किया।

36 मैंने विश्वस्त सूत्रों से सुना है कि मनु-पुत्र सुद्युम्न ने इस प्रकार स्त्रीत्व प्राप्त करके अपने कुलगुरु वसिष्ठ का स्मरण किया।

37 सुद्युम्न की इस शोचनीय स्थिति को देखकर वसिष्ठ अत्यधिक दुखी हुए। उन्होंने सुद्युम्न को उसका पुरुषत्व वापस दिलाने की इच्छा से फिर से शिवजी की पूजा प्रारम्भ कर दी।

38-39 हे राजा परीक्षित, शिवजी वसिष्ठ पर प्रसन्न हुए। अतएव शिवजी ने उन्हें संतुष्ट करने तथा पार्वती को दिये गये अपने वचन को रखने के उद्देश्य से उस सन्त पुरुष से कहा, “

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आपका शिष्य सुद्युम्न एक मास तक नर रहेगा और दूसरे मास नारी होगा। इस तरह वह इच्छानुसार जगत पर शासन कर सकेगा।

मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
 इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ ३९ ॥

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40- इस प्रकार गुरु की कृपा पाकर शिवजी के वचनों के अनुसार सुद्युम्न को प्रत्येक दूसरे मास में उसका इच्छित पुरुषत्व फिर से प्राप्त हो जाता था और इस तरह उसने राज्य पर शासन चलाया, यद्यपि नागरिक इससे संतुष्ट नहीं थे।


तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुः धर्मवत्सलाः ॥ ४१॥

41 हे राजन, सुद्युम्न के तीन अत्यन्त पवित्र पुत्र हुए जिनके नाम थे उत्कल, गय तथा विमल, जो दक्षिणा-पथ के राजा बने।

समीक्षाएँ-

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 ( पुरूरवा या गोप रूप में वर्णन-)
ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
 पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥ ४२॥

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे प्रथमोध्याऽयः ॥१॥

42 तत्पश्चात, समय आने पर जब जगत का राजा सुद्युम्न काफी वृद्ध हो गया, तो उसने अपने गो समुदाय को अपने पुत्र पुरूरवा को सौंपकर और स्वयं जंगल में चला गया।

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वेदाभ्यासरतस्यास्य प्रजाकामस्य मानसाः।
मनसः पूर्वसृष्टा वै जातायत्तेन मानसाः।। ३.५ ।।

मरीचिरभवत्‌ पूर्व ततोऽत्रिर्भगवान् ऋषिः।
अङिगराश्चाभवत्पश्चात् पुलस्त्यस्तदनन्तरम्।३.६।

मत्स्यपुराण /अध्यायः (३)
बह्मा के मन से केवल मरीचि उत्पन्न हुए है। इस लिए वे ही मानस पुत्र कहलाए!

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परावरेषां भूतानां आत्मा यः पुरुषः परः।
 स एवासीद् इदं विश्वं कल्पान्ते अन्यत् न किञ्चन ॥८॥


 तस्य नाभेः समभवत् पद्मकोषो हिरण्मयः ।
 तस्मिन् जज्ञे महाराज स्वयंभूः चतुराननः ॥९॥

मरीचिः मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कश्यपः ।
दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवस्वान् अभवत् सुतः ॥१०॥

(भागवत पुराण स्कन्ध 9/1-अध्याय )

अनुवाद-

8 जीवन की उच्च तथा निम्न अवस्थाओं में पाये जाने वाले जीवों के परमात्मा दिव्य परम पुरुष कल्प के अन्त में विद्यमान थे, जब न तो यह ब्रह्माण्ड था, न अन्य कुछ था। तब केवल वे ही विद्यमान थे।

9 हे राजा परीक्षित, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की नाभि से एक सुनहला कमल उत्पन्न हुआ, जिस पर चार मुखों वाले ब्रह्माजी ने जन्म लिया।

ब्रह्माजी के मनसे मरीचि और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपत्नी दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ॥ 10।

इला शब्द के वैदिक अर्थ हैं।
इला - पृथ्वी । बुद्धिमती स्त्री । गाय। वाणी- (काव्यत्व शक्ति)। आदि-

कृत्वा स्त्रीरूपमात्मानमुमेशो गोपतिध्वजः ।

देव्याः प्रियचिकीर्षुः संस्तस्मिन्पर्वतनिर्झरे । ७.८७.१२ ।



ये तु तत्र वनोद्देशे सत्त्वाः पुरुषवादिनः ।

वृक्षाः पुरुषनामानस्तेऽभवन् स्त्रीजनास्तदा । ७.८७.१३ ।



यच्च किञ्चन तत्सर्वं नारीसञ्ज्ञं बभूव ह ।एतस्मिन्नन्तरे राजा स इलः कर्दमात्मजः ।निघ्नन्मृगसहस्राणि तं देशमुपचक्रमे । ७.८७.१४।

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स दृष्ट्वा स्त्रीकृतं सर्वं सव्यालमृगपक्षकम् ।आत्मनं स्त्रीकृतं चैव सानुगं रघुनन्दन ।। ७.८७.१५ ।।




( वाल्मीकि रामायण में इला की अन्य पुराणों से भिन्न कथा-  )  

वाल्मीकि  रामायणम्‎ - उत्तरकाण्ड सर्गः (87 इला और पुरुरवा की कहानी) भागवत पुराण से भिन्न है।

तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणेनोक्तं वाक्यं वाक्य विशारदः।
प्रत्युवाच महातेजाः प्रहसन्राघवो वचः।। ७.८७.१।

एवमेव नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण ।
वृत्रघातमशेषेण वाजिमेध फलं च यत् । ७.८७.२।

श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापतेः।
पुत्रो बाह्लीश्वरः श्रीमान्-इलो नाम महाशयाः।७.८७.३।

स राजा पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा सुधार्मिकः ।
राज्यं चैव नरव्याघ्र पुत्रवत्पर्यपालयत् । ७.८७.४।

सुरैश्च परमोदारैर्दैतेयैश्च महाधनैः ।
नागराक्षसगन्धर्वैर्यक्षैश्च सुमहात्मभिः।७.८७.५।


पूज्यते नित्यशः सौम्य भयार्तै रघुनन्दन ।
अविभ्यंश्च त्रयो लोकाः सरोषस्य महात्मनः। ७.८७.६ ।

स राजा तादृशो ह्यासीद्धर्मे वीर्ये च निष्ठितः ।
बुद्ध्या च परमोदारो बाह्लीकेशो महायशाः । ७.८७.७ ।

स प्रचक्रे महाबाहुर्मृगयां रुचिरे वने ।
चैत्रे मनोरमे मासि सभृत्यबलवाहनः । ७.८७.८ ।

प्रजघ्ने च नृपोऽरण्ये मृगाञ्छतसहस्रशः।
हत्वैव तृप्तिर्नाभूच्च राज्ञस्तस्य महात्मनः। ७.८७.९।


नानामृगाणामयुतं वध्यमानं महात्मना।
यत्र जातो माहासेनस्तं देशमुपचक्रमे । ७.८७.१०।


तस्मिन्प्रदेशे देवेश शैलराजसुतां हरः।
रमयामास दुर्धर्षः सर्वैरनुचरैः सह । ७.८७.११ ।

कृत्वा स्त्रीरूपमात्मानमुमेशो गोपतिध्वजः।
देव्याः प्रियचिकीर्षुः संस्तस्मिन्पर्वतनिर्झरे । ७.८७.१२ ।


ये तु तत्र वनोद्देशे सत्त्वाः पुरुषवादिनः।
वृक्षाः पुरुषनामानस्ते ऽभवन् स्त्रीजनास्तदा । ७.८७.१३।


यच्च किञ्चन तत्सर्वं नारीसञ्ज्ञं बभूव ह ।
एतस्मिन्नन्तरे राजा स इलः कर्दमात्मजः।

निघ्नन्मृगसहस्राणि तं देशमुपचक्रमे । ७.८७.१४।
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स दृष्ट्वा स्त्रीकृतं सर्वं सव्यालमृगपक्षकम् ।
आत्मनं स्त्रीकृतं चैव सानुगं रघुनन्दन ।। ७.८७.१५ ।।


तस्य दुःखं महच्चासीद्दृष्ट्वा ऽऽत्मानं तथागतम् ।
उमापतेश्च तत्कर्म ज्ञात्वा त्रासमुपागमत् ।। ७.८७.१६ ।।


ततो देवं महात्मानं शितिकण्ठं कपर्दिनम् ।
जगाम शरणं राजा सभृत्यबलवाहनः।। ७.८७.१७।।

ततः प्रहस्य वरदः सह देव्या महेश्वरः ।
प्रजापतिसुतं वाक्यमुवाच वरदः स्वयम् ।७.८७.१८।


उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे कार्दमेय महाबल ।
पुरुषत्वमृते सौम्य वरं वरय सुव्रत ।।७.८७.१९।।


ततः स राजा दुःखार्तः प्रत्याख्यातो महात्मना।
न च जग्राह स्त्रीभूतो वरमन्यं सुरोत्तमात् ।। ७.८७.२०।।


ततः शोकेन महता शैलराजसुतां नृपः ।
प्रणिपत्य ह्युमां देवीं सर्वेणैवान्तरात्मना ।। ७.८७.२१ ।।


ईशे वराणां वरदे लोकानामसि भामिनी।
अमोघदर्शने देवी भज सौम्येन चक्षुषा।। ७.८७.२२ ।।


हृद्गतं तस्य राजर्षेर्विज्ञाय हरसन्निधौ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं देवी रुद्रस्य संमता ।७.८७.२३।


अर्धस्य देवो वरदो वरार्धस्य तव ह्यहम् ।
तस्मादर्धं गृहाण त्वं स्त्रीपुंसोर्यावदिच्छसि ।। ७.८७.२४ ।।


तदद्भुततरं श्रुत्वा देव्या वरमनुत्तमम् ।
सम्प्रहृष्टमना भूत्वा राजा वाक्यमथाब्रवीत् ।। ७.८७.२५ ।।


यदि देवि प्रसन्ना मे रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
मासं स्त्रीत्वमुपासित्वा मासं स्यां पुरुषः पुनः ।। ७.८७.२६ ।।


ईप्सितं तस्य विज्ञाय देवी सुरुचिरानना ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यमेवमेव भविष्यति ।। ७.८७.२७ ।।

राजन्पुरुषभूतस्त्वं स्त्रीभावं न स्मरिष्यसि ।
स्त्रीभूतश्च परं मासं न स्मरिष्यसि पौरुषम् ।। ७.८७.२८।।


एवं स राजा पुरुषो मासं भूत्वाथ कार्दमिः ।
त्रैलोक्यसुन्दरी नारी मासमेकमिला ऽभवत् ।। ७.८७.२९ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्ड