★-"इतिहास के बिखरे हुए पन्ने"-★
शनिवार, 29 अगस्त 2026
नया गीत भाग( २)
शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
नया गीत -
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
शहर-शहर और गाँव-गाँव में, खुल गए इनके दरबार,
धर्म बेचकर नोट छापते' इनके कहीं नहीं अते-पते ,धर्म बना व्यापार! ़े लम्पट दगावाज।
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
(अंतरा 1)
मंच सजाकर बैठ गए हैं, ज्ञान के ठेकेदार,
चंदा लेते, कैश बटोरत, करते रोज व्यापार।
महंगाई में पिसती जनता, हाँफ रही दिन-रात, रोजगार नहीं दूर तक कंगाली के हालात।।
श्रद्धा धर्म क नाम पर नदियों में,बहता दूध। गरीबों को मुहैया नहीं उसकी एक भी बूँद।
देश की विकट हालाते आज, किसी का राज तो कोई ताक-तैराज।।
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
(अंतरा 2)
पढ़ा-लिखा हर शख्स यहाँ पर, भावुक अंधविश्वासी हैं। पर्ची वाले शातिर ठग हैं, भीड़ भी अच्छी-खासी है।
खुद के जीवन के संकट को, जो कभी देख ना पाते हैं। वही पर्चीयाँ खोल खोल कर लोगों का भविष्य बताते हैं। देश विदेशों में सैर करते अपने नहीं खोलते राज।
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
(समापन)
कुकर्मी बाबाओं का पाखंड (दोहा छंद रूप)
ढोंगी बाबा देश में, जगह जगह लगाते मंच। दान करों सम्मान करों जग माया का प्रपंच॥
भोग-विलास करते देखे, आश्रम बड़े बनाए।सदगुरु सेवा से मोक्ष मिले,जन्नत स्वप्न दिखाऐ।
महंगाई से देश की, टूट गयी है रीढ।। लोग लाइन में तप रहे , लगी हुई है भीड़
पढ़ा-लिखा समाज भी, अंधा हुआ है आज।॥भविष्य की पर्ची निकाल रहे, ठागेश्वर महाराज।।
खुद उलझे जीवन पेचों में, सुलझाएँ कैसे रोग॥ सब सुख सुविधाओं को भोगें क्या जाने वे योग!
मार्केट सा बन गया , आज ईश्वर का दरबार॥धर्म बोलियों में बिक रहा करते लोग व्यापार ।
उपर्युक्त पक्तियों को आधार मान कर एक फ्यूजन गील लिखें !
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
आरक्षण के प्रतिमान-
सैद्धान्तिक व विश्लेषणात्मक ऑडियो स्क्रिप्ट
(साउंड डिज़ाइन: पृष्ठभूमि में एक गंभीर और विचारोत्तेजक (thought-provoking) वाद्य यंत्र की हल्की धुन बजती है, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।)
भाग 1: प्रस्तावना - समानता और मूल्यांकन की आवश्यकता
- वॉयसओवर (VO): "इस देश में व्यवस्था और न्याय के पैमानों पर एक नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। चाहे बात संवैधानिक प्रावधानों की हो या सामाजिक और धार्मिक संरचनाओं की—यह देखना अनिवार्य है कि क्या सभी मनुष्य समान धरातल पर खड़े हैं? समय आ गया है कि व्यवस्थाओं का मूल्यांकन नए दृष्टिकोण से किया जाए।"
भाग 2: व्यक्तित्व, परिवेश और विशेषाधिकार
- वॉयसओवर (VO): "हर व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसका दायरा उसके परिवेश और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से तय होता है। लेकिन जो लोग संवैधानिक आरक्षण का पुरजोर विरोध करते हैं, उन्हें अपनी सामाजिक और जातीय उच्चता के पारंपरिक विशेषाधिकारों का भी निष्पक्ष आत्मविश्लेषण करना चाहिए। क्या जन्मजात श्रेष्ठता के वे दावे आज भी प्रासंगिक हैं जो सदियों से समाज में असमानता पैदा करते आए हैं?"
भाग 3: धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं पर सवाल
- वॉयसओवर (VO): "विचारणीय यह भी है कि सदियों से मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं और सांस्कृतिक केंद्रों पर एकाधिकार और वहां प्राप्त होने वाले दान व चढ़ावे के अधिकार को बिना किसी योग्यता के एक वर्ग विशेष से जोड़ना कहाँ तक न्यायसंगत है? यदि हम योग्यता और समानता की बात करते हैं, तो इसकी शुरुआत हर स्तर पर होनी चाहिए।"
भाग 4: निष्कर्ष - साधना, सत्कर्म और वास्तविक पात्रता
- वॉयसओवर (VO): "सत्य यह है कि साधना, सत्कर्म, और क्षमता के आधार पर ही व्यक्ति अपने अनुकूल पद और सम्मान का वास्तविक अधिकार प्राप्त करता है। जन्म से कोई भी व्यक्ति किसी पद या श्रेष्ठता का पात्र नहीं होता। योग्यता और श्रम ही मनुष्य की असली पहचान तय करते हैं।"
(साउंड डिज़ाइन: संगीत का प्रभाव गहरा होता है और अंत में एक शांत ठहराव के साथ समाप्त होता है।)
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आरक्षण पर पाखंड और पुरोहिती की दोहरी नीति
(आवाज़ में गंभीरता और सवालिया लहजा)
"जब भी देश में आरक्षण की बात आती है, तो योग्यता और मैरिट का ढिंढोरा पीटने वाले सबसे आगे खड़े हो जाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि सदियों से चली आ रही इस व्यवस्था में सबसे बड़ा विरोधाभास कहाँ छिपा है?
बैकग्राउंड में दूर देशीय बाँसुरी व सिंथ का स्वर सुनाई दे " ऑडियो तीन मिनट का जनरेट करें !
(आवाज़ में दृढ़ता)
आरक्षण पर आपत्ति जताने का नैतिक अधिकार उन लोगों के पास कदापि नहीं है, जो बिना किसी औपचारिक शास्त्रीय, शैक्षणिक या धार्मिक परीक्षा के, केवल परंपरा के नाम पर पुरोहिती के पद पर आज भी कब्जा जमाए बैठे हैं।
(थोड़ा ठहरकर, सोचने वाले अंदाज़ में)
जरा सोचिए, देश के किसी भी कोने में चले जाइए। क्या कभी किसी ब्राह्मण पुजारी या पुरोहित से यह पूछा जाता है कि उसने वेद, पुराण या कर्मकांड का कौन सी प्रवेश परीक्षा एग्जाम पास किया था? उसकी डिग्री या सर्टिफिकेट क्या है? नहीं! वह पद वंशानुगत और पारंपरिक रूप से बिना किसी प्रतिस्पर्धा के मिल जाता है।
(तीखे और विश्लेषणात्मक लहजे में)
हैरानी की बात तो यह है कि जो लोग खुद इस विशेषाधिकार का आनंद पीढ़ियों से उठा रहे हैं, वे आज आधुनिक व्यवसायों, राजनीति, और अन्य क्षेत्रों में भी दखल रखते हैं। वे समाज के बाकी हिस्सों को यह सिखाते हैं कि किसे कौन सा काम मिलना चाहिए और किस आधार पर मिलना चाहिए।
(सुलझे हुए और सीधे स्वर में)
यह दोहरी नीति अब और नहीं चल सकती। अगर योग्यता ही हर चीज का पैमाना है, तो इसकी शुरुआत उस व्यवस्था से क्यों नहीं की जाती जो सदियों से बिना किसी योग्यता के एक ही वर्ग के हाथ में सुरक्षित रही है? आरक्षण केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि यह सदियों के सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व की लड़ाई है।
(अंत में एक प्रभावशाली और सीधा सवाल)
अगली बार जब कोई आपसे योग्यता के नाम पर आरक्षण पर सवाल करे, तो उनसे बस इतना पूछिए—क्या पुरोहिती के पेशे में आज भी योग्यता और परीक्षा के दरवाजे खुले हैं?"
- दृश्य 1: वीडियो की शुरुआत (पृष्ठभूमि में प्राचीन भारतीय समाज, खेतों में परिश्रम करते किसान, शिल्पी और गुरुकुलों के मूक दृश्य उभरते हैं। एक गंभीर और ओजस्वी स्वर में वक्ता बोलना शुरू करता है।) सूत्रधार: "आरक्षण... आज के दौर का वह शब्द, जिस पर सबसे ज्यादा बहस होती है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि आरक्षण का विरोध करने की यह मानसिकता आख़िर कहाँ से उपजी है? इसके मूल में कौन सा वैचारिक एकाधिकार छिपा है?"
- दृश्य 2: सूत्रधार का वॉइसओवर और विजुअल कट (स्क्रीन पर एक तरफ मेहनतकश समाज का कोलाज और दूसरी तरफ ऐतिहासिक रूप से बौद्धिक कर्मकांडों पर एकाधिकार रखने वाले वर्ग का सांकेतिक चित्र आता है।) सूत्रधार: "आरक्षण का विरोध करने वाले प्रायः वे लोग हैं, जो सदियों से 'दान' और 'दक्षिणा' के नाम पर भिक्षा पाने के एकाधिकार का आरक्षण लिए हुए हैं। वे समाज में खुद को स्वघोषित रूप से सर्वश्रेष्ठ और उच्चजातीय मानते हैं। विडंबना यह है कि ये वही लोग हैं, जो आज आरक्षण को समाज का आधार मानकर उस पर सवाल उठाते हैं।"
- दृश्य 3: मुख्य व्यंग्य और यथार्थ (स्क्रीन पर पसीना बहाते अन्नदाता, श्रमिक और दूसरी तरफ उनके श्रम पर पलने वाली व्यवस्था का प्रतीकात्मक दृश्य दिखाई देता है।) सूत्रधार: "आश्चर्य इस बात का है कि जो लोग हाड़-तोड़ परिश्रम करके, अपना पसीना बहाकर इनकी भिक्षा और जीवन-प्रबंध का सारा इंतजाम करते हैं, वे ही इनकी दृष्टि में 'निम्न' मान लिए जाते हैं। और जो लोग पीढ़ियों से श्रमहीन रहकर केवल बौद्धिक श्रेष्ठता के दम पर जीते आए हैं, वे खुद को 'श्रेष्ठ' घोषित करते हैं।"
- दृश्य 4: समापन और वैचारिक अपील (स्क्रीन पर कुछ देर के लिए रुकते हुए विचारणीय वाक्य उभरते हैं— "श्रम ही सृजन है, श्रम ही सत्य है।") सूत्रधार: "सवाल विशेषाधिकार का नहीं, बल्कि न्याय का है। जिस दिन समाज श्रम को उसका वास्तविक सम्मान देना सीख जाएगा, उस दिन श्रेष्ठता और निम्नता के सारे कृत्रिम आवरण स्वतः समाप्त हो जाएंगे।"
मंगलवार, 25 अगस्त 2026
कब्बाली-
कव्वाली: "जीवन की नैया और प्रभु का सहारा"
- मुख्य गायक (लीड सिंगर): उस्ताद / मुख्य फनकार
- कोरस (साथी गायक): "वा वाह!..." और हर मुखड़े को दोहराने के लिए।
- ساز (संगीत): ढोलक, हारमोनियम, और तालियों की गूँज।
1. आहिस्ता-आहिस्ता / आमद (Aamad & Alap)
(संगीत की धीमी और गहरी धुन बजती है। मुख्य गायक दर्द भरे स्वर में अलाप लेता है...)
मुख्य गायक:
नैया पुरानी... भँवर बेहिसाब है !
ऐ जिंदगी, ये कायनाती अजाव हैं। ...
डूबने को है कश्ती, मगर क्या मजाल है...
कोई थामने वाला पतवार परमानुभाव है!
2. महफिल की शुरुआत (Introductory Couplet / Sher)
(हारमोनियम पर तेज सुर और तबले की थाप के साथ)
अन्तरा-(मुख्य गायक:)
हवाओं का रुख बदल रहा है, पर मेरा यकीन नहीं डगमगाया!
जुल्म जमाने में हैं कायनात में जुल्मतों का साया !!
ज़रा गौर फरमाइगा इस शेर पर...
तुफानों की ज़िद है जहाँ आंधियां चलें,
हमारा भी ये फैसला है कि कश्तीयों में दीपक जले !
आइए, इस दिल की दास्तां को सुरों में पिरोते हैं!
3. स्थाई (Main Refrain)
(पूरी कव्वाली पार्टी मिलकर ऊंचे स्वर में गाती है, ढोलक की तेज थाप के साथ)
कोरस + मुख्य गायक:
गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में आरोहि अथाह पानी!
तूफानों का वेग प्रबल है, लहरों की है तेज़ रवानी...
सुन लो इस जीवन की कहानी!
(संगीत का एक छोटा और तेज़ अंतरा — ताली की थाप के साथ)
4. अंतरा 1 (अंधेरा और नादानी)
(गायक थोड़ा संभलकर, दर्द और तड़प के साथ)
मुख्य गायक:
उठ रही काली घटाऐं, तेज चलती ये हवाऐं...
हर तरफ है अब अंधेरा, हम जाएं तो किधर जाएं?
अरे भंवर के बीच में कश्ती है...
खेवटिया है नादानी, और कभी मंजिल नहीं जानी!
(कोरस इसे दोहराता है)
कोरस: गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी...
5. अंतरा 2 (संसार का मायाजाल)
(लय थोड़ी तेज और संवादात्मक होती है — दर्शकों को समझाते हुए)
मुख्य गायक:
ज़रा सोचिए दोस्तों! ये दुनिया क्या है?
संसार की नदिया अजब, इच्छा लहरों का काफ़िला है...
अरे बुलबुलों सी जिंदगी ये, पानी में पानी मिला है!
यहाँ सब छलावा है...
मोह के भँबर लोभ के गोते, मृत्यु पथ की है निशानी!
(पूरी पार्टी जोश के साथ दोहराती है)
कोरस: गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी...
6. कव्वाली का मुख्य मोड़: रंग / पुकार (The Climax / Tarannum)
(यहाँ संगीत बिल्कुल धीमा हो जाता है, सिर्फ हारमोनियम की हल्की गूँज और फुसफुसाहट जैसा स्वर रहता है)
मुख्य गायक:
थक गए हाथ, टूट गए पतवार... अब जाएं तो कहाँ जाएं?
तभी याद आता है वो बंसीवाला!
ज़रा तड़प के साथ सुनिएगा...
दु:ख सुख यहाँ जीवन के किनारे,
नाव पड़ी मेरी है मझधारे!
भक्ति के लेकर पतवारे,
ये भक्त प्रभु तुझको ही पुकारे...
खबर लेलो वंशी वारे!!
(यहाँ ढोलक की एक जोरदार थाप लगती है और माहौल भक्तिमय हो जाता है)
मुख्य गायक (ऊंचे सुर में):
थक जाएं हम कभी न हारें, सदियों से तेरी बाट निहारें!
खिंजा-फिजा सब आनी-जानी...
7. महा-अंतिम समापन (Grand Finale)
(सभी कलाकार पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ मिलकर इस अंतिम पंक्ति को गाते हैं, तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कव्वाली समाप्त होती है)
कोरस + मुख्य गायक (एक स्वर में):
गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी!
तूफानों का वेग प्रबल है, लहरों की है तेज़ रवानी...
सुन लो इस जीवन की कहानी!!
सुन लो... इस जीवन की... कहानी!!!
(ढोलक की लंबी रोल और अंतिम तीव्र थाप के साथ अंत)
सोमवार, 24 अगस्त 2026
गीत
[स्थाई]
[अंतरा 1]
[अंतरा 2]
[अंतरा 3]
शनिवार, 22 अगस्त 2026
ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर"
मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)
ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!
(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)
बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)
सुनसान राहों के मुसाफ़िर, ये कैसी तेरी गफ़लत है?
अज्ञान के इस अंधियारे में, लिपटा हुआ तेरा कुल मत है!
रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस छाया है?
अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी सारा जमाना है।
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)
इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?
मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?
हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!
ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?
समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)
मोम से नाज़ुक ये सब बंधन, क्यों जकड़ रहे तेरा मन हैं?
कभी महकती रंग-बिरंगी तितलियाँ, कभी बिजली और तूफ़ान हैं!
लब पर तलब और दिल में मतलब, तू किसके पीछे दीवाना है?
तेरी हयातों के जिम्मे सब, ये बोझ तुझे ही उठाना है।
यों हँसी-खेल में नहीं समय बिताना है!
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)
हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!
तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!
संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।
इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)
ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)
शुक्रवार, 21 अगस्त 2026
श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय सेमात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्
श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से लिए गए राजा ययाति के इन पवित्र श्लोकों पर चिन्तन आवश्यक है।
न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १४ ॥
- अनुवाद: विषयों के भोगने से भोग-वासना कभी शांत नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोग-वासनाएँ भी भोगों से और अधिक प्रबल हो जाती हैं।
- अनुवाद: जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष (द्वंद्व भाव ) नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है। फिर उसे ऋणात्मक और धनात्मक आवेश प्रभावित नहीं करते ।
- अनुवाद: विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से उसका त्याग कर पाते हैं। मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही बनी रहती है। अतः जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए।
- अनुवाद: और तो क्या—अपनी माता, बहन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि इंद्रियाँ इतनी आवेशयुकत बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं (विचलित कर देती हैं)।
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥ १५ ॥
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः जीर्यतो या न जीर्यते ।
तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥ १६ ॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ १७ ॥
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