बुधवार, 23 सितंबर 2026

कब्बाली

यह लोक फ्यूजन यादव योगेश कुमार रोहि के द्वारा लिखित व उन्हीं के निर्देशन में 'स्वर साधना संगीत संस्था' द्वारा प्रस्तुत है।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

(इस रचना को कव्वाली और लोकगीत के फ्यूजन के रूप में, तालियों की थाप, ढोलक की तेज़ लय और कोरस के साथ गाने की कल्पना करें)

(आलाप - धीमी और गंभीर आवाज़ में)

मुख्य गायक 1:

(मुखड़ा)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(कोरस - तालियों की थाप के साथ शुरुआत)

अरे जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं!

बड़ी विलक्षण ये माया!

(मुखड़ा - तेज़ लय में)

मुख्य गायक १:

किसान की क्या शान ! धरती उसकी पहचान। खाद बीज मिलते नहीं ,मिले तो मूल्य आसमान ! धूप में तपता रहा! बरसात में भीगता रहा! सर्दी में कोहरे की ठिठुरन। कष्ट सहता है सघन। जो कभी नहीं सो पाया!

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया... 

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

मुख्य गायक 1:

कृष्ण और संकर्षण इस किसान के हैं  पूर्वज !

इसके पशुओं से फीस बनी पैसे को जिसने जन्म दिया। उस किसान का ध्यान नहीं जिसने पैदा अनाज किया‌। दिन रात परिश्रम करता है। विश्राम पेड़ की छाया । 

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया... 

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(मक़्ता / क्लाइमैक्स - बहुत तेज़ और जोश में)

दोनों गायक एक साथ:

बाहर से है चकाचौंध, भीतर से रोहि घोर अंधेरा है।,

ये विकास नहीं है दोखा है, देश आज तंगी ने घेरा है।  बैमानी रिश्वत खोरी है । भोले भालों की कदर नहीं। लुच्चों की सीना जोरी है। नैतिक मर्यादा भी टूट रही बची कुची जो थोरी है। पुण्य गंवा कर भी तूने जो अकूत धन कमाया! यहीं धरी रह जाएगी तेरी सारी दौलत माया।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया... 

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 


(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, यहाँ फरेबों का है साया।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

जयकारा: जोर से - बोल आजादपुर वाली मइया की जय !

(संगीत की तेज़ थाप और ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अंत)

कब्बाली देश की हालत!

यह लोक फ्यूजन यादव योगेश कुमार रोहि के द्वारा लिखित व उन्हीं के निर्देशन में 'स्वर साधना संगीत संस्था' द्वारा प्रस्तुत है।

(इस रचना को कव्वाली और लोकगीत के फ्यूजन के रूप में, तालियों की थाप, ढोलक की तेज़ लय और कोरस के साथ गाने की कल्पना करें)

(आलाप - धीमी और गंभीर आवाज़ में)

मुख्य गायक 1:

(मुखड़ा)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(कोरस - तालियों की थाप के साथ शुरुआत)

अरे जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं!

बड़ी विलक्षण ये माया!

(मुखड़ा - तेज़ लय में)

मुख्य गायक 2:

झूठ का बाज़ार देखो, हर तरफ है सज रहा,       गाँव सीधा किसान इसे ही सच समझ रहा।

मिलावटों के दौर से, हर आदमी गुजरने लगा। और मंहगायी के बाजार से खून सब जरने लगा। 

मेहनत की महीनों की कमाई, पल भर में ही निबट रही, जिन्दगी अब अभावों में गरीबों की कट रही।

ईमानदारी चली गयी, बेईमानी अभी तक डट रही। भखों की ये भीड़ हैं जो रोटियाँ झपट रही।हड़डीयों के कंकाल हैं और खाल से लिपटी काया

मुख्य गायक 1:

विज्ञापनों शोर सुनकर, आदमी घर से निकलकर, बड़ी खरीददारी कर रहा! पर उसको क्या पता, कौन गद्दारी कर रहा!

(कोरस)

अरे उसको क्या पता, कौन गद्दारी कर रहा!

(अंतरा 1 - मिलावट का ज़हर)

मुख्य गायक 1:

मिलावटें इस कदर हैं, आज अपने देश में,

अपराधी भी घूम रहे, संन्यासीयों के वेष में!

बेसन में मक्के का आटा, कहीं देसी घी में चर्बी है, मिठास  खोजता आदमी अब तो चीनी भी कर्बी है।

मुख्य गायक 2:

सीमेंट के कट्टों में देखो, पावर हाउस की राख है,

पेट्रोल में केरोसिन, अब आदमी की क्या साख है।

पीली ईंट घिसी हल्दी में, धनिया में गधे की लीद है,

काली मिर्च में बीज पपीता, नहीं शुद्धता की उम्मीद है ! आदमी को मोशन हो गया ! जब रिफाइड उसने खाया।  

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(अंतरा 2 - अर्थव्यवस्था और विज्ञापन का झूठ)

मुख्य गायक 2:

विज्ञापनों पर जोर देखो, लाउड स्पीकर बज रहा ,भोला गरीब लुट रहा,नहीं वह कुछ समझ रहा!

सत्तासीन नेता कहें, अब जीडीपी में उछाल है,

उद्योगों की क्वालिटी, बिल्कुल ही बेमिसाल है।

मुख्य गायक 1:

विज्ञापन का झूठ देखो, चमक-दमक में तुल गया,

खाने-पीने की चीज़ों में, जाने क्या-क्या घुल गया!

मिलावटी बाज़ार अब तो हर कौने वे  खुल गया,

 फिर इन्सान कमजोर है माल उसने बहुत खाया

(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(अंतरा 3 - शादियों का बाज़ार)

मुख्य गायक 2:

पहले थी रस्में-कसमें, अब तो मंडपों में व्यापार है, शादीयाँ शोदे हैं अब तो यहाँ आशनाई  प्यार है

मुख्य गायक 1:

बोली लगती है दूल्हों की, जहाँ रुपयों का अंबार है,

जिसकी जितनी मोटी गड्डी, मोटा उसका सत्कार है!

(कोरस)

जिसकी जितनी मोटी गड्डी, मोटा उसका सत्कार है! बही बड़ा आदमी है अब जिसने हराम का खाया।


मुख्य गायक 2:

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(कोरस)


(अंतरा 4 - बिकाऊ न्याय व्यवस्था)

मुख्य गायक 1:

इंसाफ की देवी की आँखों पे, नोटों की पट्टी बाँधी  है। बिना खर्चा पानी के कोई काम नहीं, हर विभाग में आँधी है।

मुख्य गायक 2:

मुजरिम तो सरेआम घूमे, पहन के चोला साधू का,

कानून भी अब गुलाम हो गया, पैसे वाले जादू का!

(कोरस)

अरे पैसे वाले जादू का, पैसे वाले जादू का !

मुख्य गायक 1:


(अंतरा 5 - शिक्षा का पतन)

मुख्य गायक 2:

विद्या के मंदिर में भी अब, विद्या का सम्मान नहीं,

डिग्रियां बिकती हैं  लाखों में, लेकिन बंदों में ज्ञान नहीं !

मुख्य गायक 1:

गुरु-शिष्य की वो मर्यादा, अब धूमिल सी ज्योति है। विद्या की अरथी को ढोते ,संज्ञा विद्यार्थी होती है।

तालीम नहीं कोई इल्म नहीं डिग्रीयों की खरीददारी है। अयोग्यों का उन पदों पे होना शिक्षा से गद्दारी है। ये  नैतिक मूल्यों का सफाया ।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

 हकीकत छुप गई सारी, फरेबों का है साया।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं,

बड़ी विलक्षण ये माया, 

(मक़्ता / क्लाइमैक्स - बहुत तेज़ और जोश में)

दोनों गायक एक साथ:

बाहर से है चकाचौंध, भीतर से सब खोखला है,

ये विकास नहीं है यारों, ये तो बस  घपला है!

पैसे का पहिया चल रहा, इंसानियत को कुचल कर। रोहि कोई एक चल रहा है इस भीड़ में सम्हलकर। जो सच को जान पाया।

(कोरस)

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

हकीकत छुप गई सारी, यहाँ फरेबों का है साया।

ये कैसा दौर आया, कलियुग कैसा घोर आया...

जयकारा:

बोल आजादपुर वाली मइया। की जय!

(संगीत की तेज़ थाप और ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अंत)

यहाँ दिए गए विषयों पर आधारित एक शानदार, तीखा और व्यंग्यात्मक कव्वाली-नुमा गीत प्रस्तुत है। कव्वाली के अंदाज़ को महसूस करने के लिए इसे तालियों की थाप और कोरस (हमराही गायकों) के साथ गाए जाने की कल्पना करें:

​"यह लोक फ्यूजन यादव योगेश कुमार रोहि के द्वारा लिखित व उन्हीं के निर्देशन में स्वर साधना संगीत संस्था द्वारा प्रस्तुत है।  

(आलाप - धीमी और गंभीर आवाज़ में)

मुख्य गायक 1:

ये कैसा दौर आया ,कलि युग कैसा घोर आया।... हकीकत छुप गई यारों, फरेबों का  है  साया।।

जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं! बड़ी विलक्षण है माया!

(कोरस - तालियों की थाप के साथ शुरुआत)

अरे जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं! बड़ी विलक्षण है माया!

(मुखड़ा - तेज़ लय में)

मुख्य गायक 2:

झूठ का बाज़ार देखो, हर तरफ से सज रहा ! मिलाबटों के दौर से,हर आदमी गुजर रहा।

पाप का शोर सुनकर, आदमी घर से निकलकर! बड़ी खरीददारी कर रहा ! पर उसको क्या पता कौन गद्दारी कर रहा।

कुछ पल में खर्च हुआ जो महीनों में कमाया 

ये कैसा दौर आया ,कलि युग कैसा घोर आया।... हकीकत छुप गई यारों, फरेबों का  है  साया।।

अन्तरा -(२)अरे, पाप का ढोल देखो, ज़ोर-ज़ोर से बज रहा है... आदमी लुटेरे रहा है यह नहीं वो समझ रहा सत्तासीन नायक गण कहते देश की जीडीपी में बढोत्तरी है। उद्योगों की क्वालिटी खरी है।

​मुख्य गायक 1: (मुस्कुराते हुए और तंज़ कसते हुए)

और नेता ने  कहा... तुमको पता नहीं...

मेरा देश उन्नति कर रहा है! पहले प्रगति कर रहा है।

(कोरस - ज़ोरदार आवाज़ में)

मेरा देश उन्नति कर रहा है! 

पहले प्रगति कर रहा है।

(अंतरा 1 - मिलावट पर चोट)

मुख्य गायक 1:

मिलाबटें इस कदर हैं अपने  देश में 

अपराधी घूम रहा है सन्यासी के वेष में।

अन्तरा- (३) मक्का का चून वेसन में , घी में चर्वी आयी है

मेदा में  मिली एककली , घी में चरबी गली, और वेसन पिसी मक्का चली। तेल के लिए नहीं अब कहीं तिली।  मिलाबटी बाजार खुल गया। यह उद्योग गति पाकर रहा है ।

​" गेंहूँ की मेंदा में हमने एलकली मिली पायी है

 पावर हाउस की राख सीमेंट में कम्पनी ने चलाई है।

पीली ईंट घिसी हल्दी में , पेट्रोल में करोसिन चलाई है। हरे धनिए में गधे की लीद! कुछ लोगों ने मिलायी है बीज पपीता के काली मिर्चन में एक तिहाई है। 

खाने-पीने की चीज़ों में,ज़हर ये कैसा घुल गया? विज्ञापन का झूँठ  !  चमक दमक में तुल गया।  


और नेता ने  कहा... तुमको पता नहीं...

मेरा देश उन्नति कर रहा है! पहले प्रगति कर रहा है।

​मुख्य गायक 2:

मसालों में है ईंट-बजरी, दूध में भी अब पानी है,

हर तरफ बेईमानी ही बेईमानी, क्या अजब कहानी है!

(कोरस)

क्या अजब कहानी है, क्या अजब कहानी है!

​मुख्य गायक 1:

अरे पेट में दाना नहीं, बीमारियों का ज़हर उतर रहा है...

और हमने कहा तुमको पता नहीं...

(कोरस)

मेरा देश तरक्की कर रहा है!

हाँ-हाँ! मेरा देश तरक्की कर रहा है!

(अंतरा 2 - शादियों का बाज़ार)

मुख्य गायक 2:

पहले थी रस्में-कसमें, अब तो मंडप में व्यापार होता है,

लड़के भी बिकते हैं अब, सरेआम बाज़ार होता है!

​मुख्य गायक 1:

बोली लगती है दूल्हों की, रुपयों का अंबार है,

जिसकी जितनी मोटी गड्डी, उसका उतना सत्कार है!

(कोरस)

उसका उतना सत्कार है, उसका उतना सत्कार है!

​मुख्य गायक 2:

रिश्तों के पावन नाम पे देखो, कैसा गंदा सौदा हो रहा है...

और हमने कहा तुमको पता नहीं...

(कोरस)

मेरा देश तरक्की कर रहा है!

जी मेरा देश तरक्की कर रहा है!

(अंतरा 3 - बिकाऊ न्याय व्यवस्था)

मुख्य गायक 1:

इंसाफ की देवी की आँखों पे, नोटों की पट्टी है,

जो सच बोले उसकी तो, इस दुनिया से छुट्टी है!

​मुख्य गायक 2:

मुजरिम तो सरेआम घूमे, पहन के चोला साधु का,

कानून भी अब गुलाम है, बस पैसे वाले जादू का!

(कोरस)

अरे पैसे वाले जादू का, पैसे वाले जादू का!

​मुख्य गायक 1:

अरे मजलूम बेचारा रो रहा है, और जालिम मजे से हंस रहा है...

और हमने कहा तुमको पता नहीं...

(कोरस)

मेरा देश तरक्की कर रहा है!

अजी मेरा देश तरक्की कर रहा है!

(अंतरा 4 - शिक्षा का पतन)

मुख्य गायक 2:

विद्या के मंदिर में भी अब, विद्या का सम्मान नहीं,

डिग्रियां बिकती हैं लाखों में, लेकिन बंदों में ज्ञान नहीं!

​मुख्य गायक 1:

गुरु-शिष्य की वो मर्यादा, जाने कहाँ खो गई है,

तालीम भी अब तो यारों, महज़ एक धंधा हो गई है!

(कोरस)

महज़ एक धंधा हो गई है, महज़ एक धंधा हो गई है!

​मुख्य गायक 2:

संस्कार का सूरज देखो, अंधेरे की ओर ढल रहा है...

और हमने कहा तुमको पता नहीं...

(कोरस - ताली तेज़ करते हुए)

मेरा देश तरक्की कर रहा है!

हाँ-हाँ! मेरा देश तरक्की कर रहा है!

(मक़्ता / क्लाइमैक्स - बहुत तेज़ और जोश में)

दोनों गायक एक साथ:

बाहर से है चकाचौंध, भीतर से सब खोखला है,

ये विकास नहीं है यारों, ये तो बस एक घपला है!

पैसे का पहिया चल रहा है, इंसानियत को कुचल रहा है!

​मुख्य गायक 1: (हाथ उठाकर)

फिर भी सीना तान के हर कोई... सीना तान के हर कोई, यही भ्रम पाल रहा है...

अरे हमने कहा तुमको पता नहीं...

(कोरस - पूरी ऊर्जा के साथ समाप्ति)

मेरा देश तरक्की कर रहा है!

अजी मेरा देश तरक्की कर रहा है!

हाँ-हाँ मेरा देश तरक्की कर रहा है!

(संगीत और ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अंत)

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

मात का भजन -

उद्घोष :  ग्रामीण लोक धुन पर आधारित यह भक्त गीत लिखा है यादव योगेश कुमार रोहि नें 
उन्हीं के निर्देशन में "स्वर साधना संगीत संस्था ने इसे प्रस्तुत किया है।
____
"जयकारा: जोर से -बोल आजादपुर वाली मइया। की जय! काली नदी तट वासिनी मइया की जय!


किऽऽऽस चीज़ पे... किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
​कोरस (तालियों की थाप के साथ दोहराते हुए):
हाँ रे मूरख! तू बस इतना जान!
सदा दिन रहते नहीं स-मा-न!
किस चीज़ पे... अरे किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान!
****

अन्तरा - १]
​(मंजीरे की गूँज तेज़ होती है)
​मुख्य गायिका:
अरमान जो तूने पाले हैं... (आऽऽऽ)
वो खाक में मिलने वाले हैं!
तेरा गुरुर ! करे तुझसे दूर! पाप किए तूने भरपूर!
क्यों होश नहीं तुझे ज्ञान।
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
अन्तरा-२
सब कुछ तो वक्त के हवाले हैं! 
सब एक दिन जाने वाले हैं। 
मौत का खौफ नहीं उनको ,
जो अपना फर्ज सम्हाले हैं।
कर आजादपुर वाली मइया का ध्यान।
मइया करेगी तेरी कल्याण!
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !

अन्तरा(३)
कोई भटका हुआ !
लटका हुआ! 
अटका हुआ सब काम ! कोशिशें करी तमाम!
पर नहीं होगा समाधान !
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
मूरख तू  इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान!

​[अन्तरा -४ 
​मुख्य गायिका:
मन की इच्छाऐं हैं अनन्त !
पर जीवन की जरूरतें छोटी !
रहने, सोने को घर विस्तर, 
रोहि जिन्दा रहने को  रोटी ।!
​कोरस:
आदमी की नीयत खोटी ही कर देती  है हाऽऽन!
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
​कोरस (तालियों की थाप के साथ दोहराते हुए):
हाँ रे मूरख! तू बस इतना जान!
सदा दिन रहते नहीं स-मा-न!

"ये घाती और उत्पाती मन, यदि बुद्धि काना हो इसपे नियमन ! मन की माने वो अज्ञानी ! मन को वश में करता ज्ञानी।
मन खड़ा करदे तूफान ।
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान!
तू वश इतना जान ! सदा दिन रहते नहीं समान!

कुसंग से मन को बचाते रहो...
(ढोलक और तेज़ होती है)
कुसंग से मनको बचाते रहो... तुम भजन मइया के गाते रहो ! ध्यान करो मइया का सदा! दर्शन को दर पे आते रहो।
करो आरती गान!
सदा दिन रहते नहीं समान।
​समवेत स्वर (सभी महिलाएँ एक साथ, पूरी ऊर्जा से):
तुम भजन मइया के गाते रहो! तुम भजन मइया के गाते रहो!
फिर मइया ही सम्हालेगी कमाऽऽन!
हाँ रे मूरख, तू बस इतना जान!
सदा दिन रहते नहीं समान!
किस चीज़ पे तुझे गुमान!
​(लय अचानक दुगुनी होती है)
कोरस (तेज़ गति में):
मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान!
मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान!
किस चीज़ पे तुझे गुमान! किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽऽऽन!
​(ढोलक की एक ज़ोरदार थाप - धा धिन ता! और मंजीरे की गूँज के साथ गीत समाप्त होता है)
समवेत स्वर में: –
बोल आजादपुर वाली मइया। की जय!
विशेष:
उपर्युक्त गीत को उत्तर भारतीय लोक ग्रामीण संगीत धुन व कब्बाली की शैली में राजस्थानी आलाप लेते हुए  द्रुत ताल व विलम्बित लय में लड़कीयों के कोरस स्वर में गाकर ऑडियो में जनरेट करें !

सोमवार, 21 सितंबर 2026

गीत लेखन -


​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा-(१)

कल जो हाल था अपना, वह बिल्कुल आज नहीं हैं ! जो असल सबाल था अपना अब भी आज वहीं है।

ये दुनियाँ की तब्दीली हैं। या बंदिश मन की ढीली हैं। कब क्या होगा ! ये किसे पता ! राहें यहाँ बड़ी कटीली हैं।

तुझे मंजिलों का रोहि नहीं अभी अनुमान!

 ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(२) आदमी का संसार, उसकी खुशीयों का आकार! उसके मन की तरंगें हैं। 

तू मन को समझाना,पल पल ये बताना तेरे सपने  कहाँ तेरे संगे हैं। मिट जाऐंगे जहाँ से तेरे नामोनिशान !

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(३)

​अपनी साँसों का भी कोई पल , हमको विदित नहीं हैं। पल पल नयीं आशाऐं  जीवन क्यों समर्पित यहीं है।

कोई दौलत का दीवाना है , कोई मोहब्बत का दीवाना है ,कोई शौहरत का दीवाना हैं। कोई खोजता, अपना ठिकाना है !  ये ही आदमी का ताना वाना है। क्यों  अपना नहीं तुझे ज्ञान ! 

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(४)

अरमान जो  हमने सम्हाले हैं । वो भी खाक में मिलने वाले हैं । सोचता हूँ देखता रहूँ नजारों को यों हीं। दुनियाँ की हर शय वक्त के हवाले है ?

भटका हुआ ,लटका हुआ, काम सब अटका हुआ। प्रयास करता तू बहुत ! पर काम करती है दुआ। सच को तू पहचान!

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(५) मन की इच्छाऐं अनन्त और जीवन की जरूरतें छोटी !  रहने, सोने को घर विस्तर. रोहि जिन्दा रहने को रोटी। पर नीयत खोटी कर देती सब हान! 

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

अन्तरा(५)पर घाती उत्पाती है ये मन , यदि बुद्धि का न हो इसपे नियमन।  कुसंग से इसको बचाते रहो ! तुम भजन मइया के गाते रहो। फिर मइया ही सम्हालेगी वान !

​किस चीज़ पे तुझे  गुमान! क्यों दिखा रहा  सामान! मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान! ​किस चीज़ पे तुझे  गुमान!

                   



रविवार, 20 सितंबर 2026

आपकी मूल स्क्रिप्ट की लोक-धुन, भक्ति भाव और देहाती संदेशात्मक शैली को ध्यान में रखते हुए, प्रस्तुत हैं दो नए अंतरे:

[अन्तरा - ३]

(भक्ति भाव में बहता हुआ देहाती लोक-स्वर)

मुख्य गायिका:

माया-मोह का चक्र निरन्तर जो चला रहे हैं  इस दुनियाँ को,

कर्म हैं इच्छा ,लोभ मन की परीक्षा। ये लाभ लोभ का कारण  है ये पता नहीं सगुनियाँ को! 

मन के धोखे बड़े अनोखे इस पे विश्वास करो मत भइया।

लोभ के भँबर मोह के गोते । 

सब उमर बीत गई तेरी रोते रोते। 

भव सागर है यह कठिन डगर है। 

गंगा मैली हुई पाप धोते धोते ।

तृष्णा की लहरों पर नइया। पार करे आजादपुर वाली मइया।


आरती माता मइया की !

हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।
आजादपुर है थान तुम्हारों, तुम जग की रखवइया!
हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
अन्तरा~(१)

(भक्ति भाव में बहता हुआ देहाती लोक-स्वर)

मुख्य गायिका:

मोह माया के चक्र निरन्तर, जो चला रहे  इस दुनियाँ को,

कर्म हैं इच्छा , मन की परीक्षा। लाभ लोभ का कारण  है ये पता नहीं सगुनियाँ को! 

मन के धोखे बड़े अनोखे, इस पे विश्वास करो मत भइया।

हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !

जय‌ आजादपुरववाली मइया ।

हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !

सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।

अन्तरा-२

लोभ के भँबर, मोह के गोते । 

उमर बीत गई तेरी रोते रोते। 

भव सागर है  कठिन डगर है। 

गंगा मैली हुई पाप धोते धोते ।

तृष्णा की लहरों पर नइया। पार करे आजादपुर वाली मइया। ये ही खिवैया ये ही करवइया।





चित्र चरित्र बिके नहीं अपना ! बड़ा विचित्र लोभ मोह परखना। वरद हस्त माता तुम रखना!  मन का ना हो कभी भटकना। अपनी कृपा की करना छँइया। बडी पुरातन आजादपुर की मइया! 
हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।
आजादपुर है थान तुम्हारों, किन्तु तुम जग की रखवइया!

*****
अन्तरा-(२)
इस जीवन में जितनी वाधाऐं ! आदमी ने खुद ही बनायी हैं। 
उसके इरादे उसके वादे  और नीयत में खोट समायीं हैं।
ये भाग्य कर्म का लेख नियत है कर्म सही तो सही तबीयत है न कोई बाको मरबइया।
बोलो जय आजादपुर वाली मइया।
बोलो जय आजादपुर वाली मइया।
अन्तरा(३)-
हेरा फेरी या बेईमानी से जो लोग दौलत कमाऐं!    सब लोगों का अनुभव हैं वह व्याजसहित चला जाऐ।  
इन हाथों में पैसा बहुत आया 
और गया भी ! 
पर ईमान से बड़ा कोई 
धन नहीं वह खजाने की चाबी।
जय आजाद पुर वाली मइया। जिसने जो भी मांगा है मिला वही है भइया। 
हृदय भावों की शुद्धि करदे, और विचार निर्मल कर मइया !
सारस पक्षी स्वर हैं सरवत, वैराग्य भरे पुरवइया।
आजादपुर है थान तुम्हारों, तुम जग की रखवइया!