शनिवार, 25 जुलाई 2026

जन्तर मन्तर‌

दिल्ली जन्तर मन्तर की हकीकत को और अधिक जीवन्त, यथार्थवादी और संघर्षमय रूप में बयां करता हुआ एक नया गीत:

(स्थायी)

जंतर मंतर की धरती पर, धड़कता भारत सारा है, यहाँ किसी का टूटा सपना, तो कोई हारा-हारा है।

नारे गूंजते, बैनर हिलते, उम्मीदें फिर जागती हैं, तपिश धूप की, पाँव के छाले, सच्चाई मांगती हैं!

(अंतरा 1)

लोहे की उन बैरिकेडों के, उस पार सत्ता सोती है, सड़के दिनों से लथपथ है, कोई वेवा छिपकर रोती है।

कोई विधवा बैठी है अपनी, आँखो से आँसू बहाऐ हुए, 

कोई किसान खड़ा है यहाँ, अपनी फसल जलाए हुए।

(अंतरा 2)

कैमरों की चमचमाती लाइटें, कुछ पल को आ जाती हैं,

ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर के, टीआरपी ले जाती हैं।

रात ढले जब सन्नाटा इन, सूनी सड़कों पर छाता है,

कौन पूछता है किससे, किसका क्या हाल यहाँ जाता है?

(अंतरा 3)

फाइलों के बंडलों में, दबकर दम घुटता है सबका,

यहाँ हर एक चेहरा चीखता है, दर्द का मारा मारा कबका।

फिर भी जज्बा ज़िंदा है, सीने में आग सुलगती है,

जंतर मंतर की मिट्टी में, हर रोज़ बगावत पलती है!


(स्थायी)

जन्तर मन्तर की गलियां हैं, उम्मीदों का मेला है, हर कोई अपना दर्द लिए, खुद में खड़ा अकेला है।

कोई रोता है हक के खातिर, कोई उम्मीद जगाता है,दिल्ली के इस मंतर पर, सच खून पसीना बहाता है।

(अंतरा 1)

पत्थरों की इन दीवारों ने, कितने तूफ़ान देखे हैं,

आँखों में आंसू और हाथों में, बैनर-निशान देखे हैं।

दूर गाँव से चलकर आया, भूखा-प्यासा इंसान यहाँ, 

अपनी टूटी किस्मत का, मांगता है वरदान यहाँ।

(अंतरा 2)

नारे गूंजते हवाओं में, न्याय की गुहार होती है,

सुनने वाले बहरे हैं, बस कागजी तकरार होती है।

बड़े-बड़े महलों तक क्या, इनकी चीखें जाती हैं?

या फाइलें धूल फांकती, और रातें कट जाती हैं?

(अंतरा 3)

फिर भी उम्मीद का दीया, यहाँ हर रोज़ जलता है,

जंतर मंतर की सड़क पर, कारवां हरदम चलता है।

हकीकत ये है इस जहां की, हक मांगना भी जुर्म हुआ,

पर इस जज्बे के आगे, हर पहरा यहाँ गुम हुआ।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

राधा और कृष्ण का प्रथम मिलन -

राधे और कृष्ण का द्वितीय मिलन बरसाने और नन्द गाँव के मध्य स्थित संकेत नाम स्थान पर हुआ जब वृषभानु अपने पैतृक स्थान लावण्य ग्राम जा रहे थे और नन्द बाबा  उनसे मिलने बरसाने जा रहे थे उस समय राधा के साथ ललिता सखी और कृष्ण के साथ सुबल गोप बालक था। प्रथम मिलन बरसाने के पास प्रेम सरोवर के तट पर जब नन्द बाबा कृष्ण को लेकर अपने सखा वृषभानु से मिलने बरसाने जा रहे थे।

तृतीय मिलन मथुरा के पास भाण्डीर वन में हुआ।


: श्री राधा-कृष्ण के अलौकिक मिलन के तीन पवित्र स्थल: संकेत, प्रेम सरोवर और भाण्डीर वन

[दृश्य 1: परिचय / हुक]

  • विजुअल (Visual): पृष्ठभूमि में बरसाना या वृंदावन का शांत और सुंदर दृश्य, प्रातःकाल का समय, मधुर बांसुरी की धुन। स्क्रीन पर टेक्स्ट: श्री राधा-कृष्ण के दिव्य मिलन की कथा
  • वॉイスओवर (Voiceover): "वृंदावन और बरसाना की हर एक गली, हर एक कण में राधा और कृष्ण का प्रेम आज भी जीवंत है। क्या आप जानते हैं कि ब्रज में इन दोनों प्रेम स्वरूपों का मिलन केवल एक बार नहीं, बल्कि तीन प्रमुख पवित्र स्थानों पर हुआ था? आइए, आज जानते हैं उनके इन तीन अलौकिक मिलन स्थलों और उनसे जुड़ी पावन कथा के बारे में।"

[दृश्य 2: प्रथम मिलन - प्रेम सरोवर]

  • विजुअल: बरसाना के पास स्थित 'प्रेम सरोवर' का सुंदर शॉट, पानी में तैरते हंस और शांत वातावरण। स्क्रीन पर टेक्स्ट: प्रथम मिलन: प्रेम सरोवर
  • वॉイスओवर: "प्रथम मिलन - प्रेम सरोवर: इनका सबसे पहला मिलन बरसाना के पास स्थित प्रेम सरोवर के तट पर हुआ था। जब नंद बाबा कन्हैया को साथ लेकर अपने सखा वृषभानु जी से मिलने बरसाने जा रहे थे, तब संयोगवश राधा रानी अपनी सखियों के साथ उसी सरोवर के पास खेल रही थीं। वहीं से गुजरते हुए जब कृष्ण की दृष्टि राधा जी पर पड़ी, और राधा रानी ने कान्हा को देखा, तो वह क्षण इतिहास बन गया — वही उनका प्रथम मिलन था।"

नन्द ग्राम और बरसाना: संक्षिप्त वीडियो पटकथा

वीडियो पटकथा (Short Script)

  • अवधि: 1 से 1.5 मिनट
  • पृष्ठभूमि संगीत: हल्की बांसुरी की धुन

दृश्य 1: परिचय (0:00 - 0:20)

  • दृश्य: नंदगाँव और बरसाना की पहाड़ियों और मंदिरों का सुंदर ड्रोन शॉट।
  • वॉयस-ओवर:
  • ​"ब्रज की धूल में आज भी राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम की खुशबू बसती है। आइए, आज आपको ले चलते हैं भगवान कृष्ण की क्रीड़ास्थली नंदगाँव और राधारानी की नगरी बरसाना की यात्रा पर।"


    दृश्य 2: नंदगाँव (0:20 - 0:40)

    • दृश्य: नंदीश्वर पर्वत पर स्थित नंद बाबा का मंदिर और गाँव के दृश्य।
    • वॉयस-ओवर:
    • ​"मथुरा से 50 किमी दूर नंदीश्वर पर्वत पर बसा नंदगाँव वही पावन भूमि है, जहाँ कंस के भय से आकर नंद बाबा बसे थे। यहीं कान्हा ने अपना बचपन बिताया, मैया यशोदा का दुलार पाया और ग्वाल-बालों के साथ लीलाएं कीं।"


      दृश्य 3: बरसाना (0:40 - 1:00)

      • दृश्य: बरसाना का प्रसिद्ध लाड़ली जी (राधा रानी) मंदिर।
      • वॉयस-OVER:
      • ​"नंदगाँव से मात्र 8 किमी दूर है वृषभान दुलारी श्री राधा रानी का जन्मस्थान—बरसाना। चार पहाड़ियों पर स्थित यहाँ का 'लाड़ली जी मंदिर' देश-विदेश के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।"


        दृश्य 4: लट्ठमार होली और निष्कर्ष (1:00 - 1:15)

        • दृश्य: लट्ठमार होली के रंग-बिरंगे दृश्य। अंत में 'राधे-राधे' का लोगो या टेक्स्ट।
        • वॉयस-OVER:
        • ​"द्वापर युग की याद ताजा करती यहाँ की विश्वप्रसिद्ध 'लट्ठमार होली' इस संस्कृति को आज भी जीवंत रखती है। आध्यात्मिक शांति और दिव्यता के अनुभव के लिए एक बार ब्रज जरूर आएं। राधे-राधे!"




हाँ, आपका यह विचार और पौराणिक प्रसंग बिलकुल सही है। इसे और अधिक स्पष्ट रूप से इस प्रकार समझा जा सकता है:

1. पर्जन्य महाराज और नंदीश्वर पर्वत का संबंध

  • ​पुराणों और ब्रज के इतिहास के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के दादा पर्जन्य महाराज (जो नंद बाबा के पिता थे) पहले इसी नंदगाँव के नंदीश्वर पर्वत के आसपास निवास करते थे।
  • ​पर्जन्य महाराज ने यहीं नंदीश्वर पर्वत के समीप तपस्या भी की थी।

2. गोकुल (महावन) प्रस्थान क्यों हुआ?

  • ​पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब कंस के द्वारा भेजे जाने वाले असुरों (जैसे केशी आदि) के उपद्रव और अत्याचार बहुत बढ़ गए, तब सुरक्षा की दृष्टि से पर्जन्य महाराज और पूरा गोप समुदाय नंदीश्वर पर्वत (नंदगाँव) को छोड़कर गोकुल (महावन) जाकर बस गया था।
  • ​यहीं गोकुल में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव और शुरुआती बाल-लीलाएं (जैसे पूतना उद्धार आदि) हुईं।

3. वापस नंदगाँव (नंदीश्वर पर्वत) वापसी

  • ​गोकुल में असुरों का उत्पात बहुत अधिक बढ़ जाने के बाद, नंद बाबा (जो पर्जन्य महाराज के पुत्र थे) ने अपने परिवार, कुल गुरुओं और सगे-सम्बन्धियों (विशेषकर वृषभानु जी आदि के परामर्श से) के साथ वापस सुरक्षित स्थान की खोज की।

  • ​तब वे सब गोकुल (महावन) को छोड़कर वापस अपने पुराने स्थान यानी नंदगाँव की नंदीश्वर पहाड़ी पर लौट आए और यहीं स्थायी रूप से बस गए।

निष्कर्ष:

​गोवर्धन के पास स्थित नंदगाँव का नंदीश्वर पर्वत वही ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल है, जहाँ पहले पर्जन्य महाराज रहते थे, बीच में केशी व अन्य असुरों के भय से वे गोकुल चले गए थे, और बाद में नंद बाबा के नेतृत्व में सभी ग्वाल-बाल वहीं लौट आए, जहाँ श्रीकृष्ण ने अपनी अधिकांश बाल और किशोरावस्था की लीलाएं (जैसे गोचारण, लट्ठमार होली आदि) कीं।  

ब्रज क्षेत्र में स्थित संकेत (जिसे 'संकेत वन' या 'संकेत तीर्थ' भी कहा जाता है) बरसाना से लगभग 4 से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

​यह वही ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल है (जो नंदगाँव और बरसाना के ठीक मध्य में स्थित है), जहाँ भगवान कृष्ण और राधा रानी की पहली मुलाकात (प्रथम मिलन) और उनकी बाल-लीलाओं से जुड़े प्रसंग माने जाते हैं।  

[दृश्य 3: द्वितीय मिलन - संकेत तीर्थ]

  • विजुअल: बरसाना और नंदगाँव के मध्य स्थित 'संकेत' नामक स्थान का दृश्य, बड़े-बड़े प्राचीन वृक्ष और शांत मार्ग। स्क्रीन पर टेक्स्ट: द्वितीय मिलन: संकेत (लावण्य ग्राम मार्ग)
  • वॉイスओवर: "द्वितीय मिलन - संकेत: दोनों का दूसरा मिलन बरसाना और नंदगाँव के मध्य स्थित 'संकेत' नामक स्थान पर हुआ। एक बार जब वृषभानु जी अपने पैतृक स्थान लावण्य ग्राम जा रहे थे और उधर से नंद बाबा उनसे मिलने बरसाने आ रहे थे, तब मार्ग में यह दिव्य मिलन हुआ। इस विशेष अवसर पर राधा रानी के साथ उनकी प्रिय सखी ललिता थीं, और कान्हा के साथ उनके परम मित्र और सखा सुबल गोप बालक उपस्थित थे।"

[दृश्य 4: तृतीय मिलन - भाण्डीर वन]

  • विजुअल: मथुरा के पास स्थित प्राचीन 'भाण्डीर वन' और विशाल वटवृक्ष का दृश्य, जहां विवाह स्थल का प्रतीक हो। स्क्रीन पर टेक्स्ट: तृतीय मिलन: भाण्डीर वन (मथुरा)
  • वॉイスओवर: "तृतीय मिलन - भाण्डीर वन: श्री राधा और कृष्ण का तृतीय मिलन मथुरा के पास स्थित भाण्डीर वन में हुआ था। यह वही पावन वन है जहां आगे चलकर ब्रह्मा जी ने स्वयं इन दोनों का अलौकिक गंधर्व विवाह संपन्न कराया था। भाण्डीर वन का यह मिलन इन दोनों के शाश्वत प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।"

[दृश्य 5: उपसंहार / आउट्रो]

  • विजुअल: राधा-कृष्ण की मनमोहक झांकी या सुंदर प्रेम छवि, स्क्रीन पर लाइक, शेयर और सब्सक्राइब का संकेत।
  • वॉイスओवर: "राधा-कृष्ण का यह प्रेम केवल संयोग नहीं, बल्कि इस सृष्टि का सबसे पवित्र और निष्कलंक सत्य है। अगर आपको ब्रज की इन पावन कथाओं के बारे में यह जानकारी अच्छी लगी हो, तो वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब अवश्य करें। बोलो श्री राधा-कृष्ण भगवान की जय

नन्द परिवार की अन्तिम पटकथा -

दृश्य - २: पात्रों का क्लोज-अप और भाव
​[कैमरा मूवमेंट]
धीमे से ज़ूम इन (Zoom In) होता है नन्द बाबा और माता यशोदा पर।
​नन्द बाबा: वे गौर वर्ण के हैं, उनके चेहरे पर एक शांत और तेजवान मुस्कान है। वे अपने मित्र श्री वृषभानु जी के साथ हुई किसी मधुर चर्चा में मग्न प्रतीत होते हैं।
​माता यशोदा: आभीक जाति को यश प्रदान करने वाली माँ यशोदा की अंग कान्ति श्यामल वर्ण की है। वे साक्षात वात्सल्य की प्रतिमूर्ति लग रही हैं। उन्होंने इन्द्रधनुष के रंगों के समान सुंदर और सतरंगी वस्त्र धारण किए हैं, जो उनके व्यक्तित्व को और भी दिव्य बनाते हैं।
​दृश्य - ३: बाल-कृष्ण की नटखट लीला
​[मध्य दृश्य]
​नन्द और यशोदा के ठीक बीच में चार वर्ष के कन्हैया बैठे हैं।
​कन्हैया कभी अपनी मैया यशोदा के सतरंगी आंचल को खींचते हैं, तो कभी बाबा नन्द की दाढ़ी से खेलने लगते हैं।
​यशोदा जी उन्हें स्नेह से अपने पास खींचती हैं और उनके माथे पर प्यार से हाथ फेरती हैं।
​दृश्य - ४: संवाद एवं समापन
(प्रांगण में पक्षियों की चहचहाहट और पृष्ठभूमि में मंद बाँसुरी की धुन बजती है)
​माता यशोदा: (बाल-कृष्ण को लाड़ करते हुए, प्रेम भरे स्वर में) "ऐ कान्हा! चुपचाप बैठ जा मेरे लाल, वरना अभी तेरी मैया तुझसे रूठ जाएगी।"
​नन्द बाबा: (ठहाका लगाकर हंसते हुए, गर्वित नेत्रों से कान्हा को देखकर) "अरे यशोदा, इसे मत डाँट! ये तो पूरे गोकुल की आँख का तारा है। भला आज तक कोई इसे रोक पाया है?"
​[कैमरा एक्शन]
बाल-कृष्ण दोनों की ओर देखते हैं और अपनी किलकारियों के साथ खिलखिलाकर हँसते हैं। उनके मुख की मधुर मुस्कान से पूरा प्रांगण आलोकित हो उठता है।
​[दृश्य समाप्त]
कैमरा धीरे-धीरे वाइड शॉट की ओर वापस जाता है और स्क्रीन धीरे से ब्लैक आउट (Fade to Black) हो जाती है।

बुधवार, 22 जुलाई 2026

कब्बाली २-

ध्रुपद-कव्वाली का मिश्रित रूप उत्तर भारतीय लोग धुन में -

(तीव्र समवेत स्वर में गायन करें )

यादव योगेश कुमार रोहि की प्रस्तुति-

आज... नज़र के... सामने... जब  उसूऽल... टूटने लगे  ।ऽऽ...
इज्जत के रखवाले  इज्जत लूटने लगे ।...

आज... नज़र के... साऽमने... जब  उसूऽल... टूटने लगे  ऽऽ...
इज्जत की रखवाले   इज्जत लूटने लगे ।...
********
जब तालिवो की आबाज को, अधिकारों के अंदाज को दबा दिया जाएगा।
शिक्षा को बाजारों में,रहीसो के आगारों में दामों में बैच दिया जाएगा।
बख्त बड़ा नाजुक, लेकर के दु:ख ऐसे  लोगों के कर्मों से आयेगा।
क्या होगा जब सहनशीलता का ही बाँध टूटने लगे।

आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाले इज्जत लूटने लगे।...

​[कव्वाली काल / तीव्र गति और ताल की शुरुआत]
(हार्मोनियम, ढोलक और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ)
******
विकास के विज्ञापनों में चीखती ये नारियाँ ...
कदम कदम पर धोखे, बड़ती गयीं दुश्वारियाँ।
महलों और झोपड़ियों की झगढ़ती  दुवारियाँ!
उनको  घरों पर लोग, अब दिन में लूटने लगे।

आज... नज़र के... सामने... जब  उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले  इज्जत लूटने लगे।...

​[अंतरा 1 - ध्रुपद का अनुशासन + कव्वाली की तासीर]
(कव्वाल: ज़रा गौर फराइएगा...)
कानून के रखवाले जब अपनी हद को भूल जाएं,
कुर्सी पर शातिर बैठे , चंदा  मन्दिर का खाएं!
अपनी ताना शाही में ज़ालिम तेवर दिखाऐ।
जहाँ सच बोलने की सजा  जिल्लत होती है।,
वहाँ जालमों के जुल्म ए मिल्लत  होती है।
फरेवीयों के हुजूम झूम जुटने लगे 
आज... नज़र के... सामने... जब  उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...

अरे, तालियाँ बजाने वालो ज़रा आँख तो खोलो,
इस जुल्म के दौर में अब तुम भी कुछ तो बोलो!
सहते सहते जुल्म दम घुटने लगे ।

आज... नज़र के... सामने... जब  उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
​[अंतरा 2 - जोश और लय का उत्थान]
(कव्वाल: दर्द की दास्ताँ सुनिए...)
अस्प तालों की लम्बी  कतारों में 
इलाज कहाँ तामीर दारों में
शमशान लगे  बजारो मे।
जान पर सौदा महज पैसों से होता है।
मायूसी में लाचार कोई ग़म संजोता है।
इंसानियत की महफिल से विश्वास उठने लगे।
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले  इज्जत लूटने लगे।...

*****
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कब्बाली-

​ध्रुपद-कव्वाली का मिश्रित रूप
​[आलाप / ध्रुपद शैली - गंभीर और ठहरी हुई शुरुआत]
(तानपुरा और पखावज की गंभीर गूंज के साथ)
(तीव्र समवेत स्वर में गायन करें )
आज... नज़र के... सामने... जब  उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...

आज... नज़र के... साऽमने... जब  उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाले ही  इज्जत लूटने लगे।...
********
जब तालिवो की आबाज को, सिकञ्जो में दबा दिया जाएगा।
शिक्षा को बाजारों में, हाटागारें में बैच दिया जाएगा।
बख्त बड़ा नाजुक लोगों के कर्मों से आयेगा।
क्या होगा जब सहनशीलता का ही बाँध टूटने लगे।
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाली में मुस्तैद इज्जत लूटने लगे।...

​[कव्वाली काल / तीव्र गति और ताल की शुरुआत]
(हार्मोनियम, ढोलक और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ)
******
विकास के विज्ञापनों में चीखती ये नारियाँ हैं...
कदम कदम पर धोखे, बड़ती गयीं दुश्वारियाँ।
महलों और झोपड़ियों की झगढ़ती  दुवारियाँ!
अपने घरों पर लोग, अब दिन में लूटने लगे हैं।

आज... नज़र के... सामने... जब  उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...

​[अंतरा 1 - ध्रुपद का अनुशासन + कव्वाली की तासीर]
(कव्वाल: ज़रा गौर फराइएगा...)
कानून के रखवाले जब अपनी हद को भूल जाएं,
कुर्सी के खातिर भी चंदा भी मन्दिर का खाएं!
जहाँ सच बोलने की सजा सिर्फ जिल्लत होती है।,
वहाँ जालमों के जुल्म ए मिल्लत  होती है।
अरे, तालियाँ बजाने वालो ज़रा आँख तो खोलो,
इस जुल्म के दौर में अब तुम भी कुछ तो बोलो!
सहते सहते जुल्म दम घुटने लगे हैं।

आज... नज़र के... सामने... जब  उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
​[अंतरा 2 - जोश और लय का उत्थान]
(कव्वाल: दर्द की दास्ताँ सुनिए...)
अस्पतालों की लम्बी  कतारों में 
शमशान की पंगत‌ मानों बजारो में।
जान पर सौदा महज पैसों से होता है।
मायूसी में लाचार ग़म संजोता है।
इंसानियत की महफिल से विश्वास उठने लगे हैं
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले  इज्जत लूटने लगे।...

 नहीं छपती खबर अखवारों में!
,सच की खबर जो पसंदगी।
महंगाई के बोझ तले,दब गयी है जिन्दगी।
रोज़गार के झूठे दावे, बार बार Ufff दगी।
नये प्रयोगों से लगने को ठग जुटने लगे है।
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाली में मुस्तैद इज्जत लूटने लगे।...
अरे, कब तक ये छलावा यूँ ही सहते जाओगे,
भूखे प्यासे रहकर क्या मुकद्दर आज़माओगे?
​[समापन / द्रुपद और कव्वाली का संयुक्त चरम (Climax)]
(तेज़ ताल, पखावज की गूंज और बुलंद स्वर)
मगर ज़मीर की लौ को बुझा नहीं सकता रोहि !
अंधेरे के साये में अरमां सजो नहीं सकता कोई!
वक्त की इस आंधी में चैन से  सो नहीं सकता कोई ,
अव्यवस्था की इस चादर को तार-तार करना होगा!
हाँ, तार-तार करना होगा...
व्यवस्था की इस चादर को तार-तार करना होगा!
*****

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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

नन्द परिवार की मर्दुमसुमारी

कृष्ण की दादी(नन्द की माता) वरीयसी जो सम्पूर्ण गोकुल में बहुत सम्मानित थीं ; कुसुम्भ की आभा वाले हरे वस्त्रों को धारण करती थीं। वह छोटे कद की और दूध के समान बालों वाली  और अधिक वृद्धा हैं

नन्द के पिता  पर्जन्य के दो भाई अर्जन्य और राजन्य प्रसिद्ध घोष (गोप) थे। सुभ्यर्चना नाम से

सुभ्यर्चना के पति का नाम गुणवीर था। जो (सूर्य-कुण्ड) नगर के रहने वाले थे। जो नित्य दिन- रात हरि का कीर्तन करते थे।७।

उपनन्द आदि सभी भाईयो में मझले  भाई नन्द वसुदेव के सुहृद थे  और कृष्ण के माता- पिता के रूप में नन्द और यशोदा दोनों व्रज के स्वामी थे। ८।
श्री नन्द के उपनन्द और अभिनन्दन बड़े भाई तथा आनन्द और नन्दन नाम हे दो छोटे भाई भी हैं। ये सब कृष्ण के पितृव्य( ताऊ-चाचा)हैं।१३।

सबसे बड़े भाई उपनन्द की अंग कान्ति धवल ( सफेद) और अरुण (उगते हुए सूर्य) के रंग के मिश्रण अर्थात- गुलाबी रंग जैसी है। इनकी दाढ़ी बहुत लम्बी और वस्त्र हरे रंग के हैं । इनकी पत्नी का नाम तुंगी है। जिनकी अंग कन्ति तथा साड़ी का रंग सारंग( पपीहे- के रंग जैसा है।१४।

दूसरे भाई श्री -अभिनन्द की अंग कान्ति शंख के समान गौर वर्ण है। और दाढ़ी लम्बी है। ये काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इनकी पत्नी का नाम पीवरी जो नीले रंग के वस्त्र धारण करती हैं। तथा जिनकी अंग कान्ति पाटल ( गुलाब) रंग की है।

आनन्द का दूसरा नाम सनन्द है। इनकी अंग कान्ति पीलापन लिए हुए सफेद रंग की तथा वस्त्र काले रंग के हैं। इनके शिर के सम्पूर्ण बालों में केवल  दो या तीन बाल ही सफेद हुए हैं। ये केशव- कृष्ण के परम प्रिय है।१६।

सनन्दस्य भार्या कुवलया नाम्न: ख्याता।
रक्तरङ्गाणि वस्त्राणि धारयति तस्या: कुवलयच्छवि:।१७।
"अनुवाद:-सनन्द की पत्नी का नाम कुवलया है।
जो कुवलय( नीले और हल्के लाल  के मिश्रण जैसे ) वस्त्रों को धारण करने वाली तथा  कुवलय अंक कान्ति वाली हैं।१७।  

नंदन की अंग कान्ति मयूर के
कण्ठ  जैसी तथा वस्त्र चण्डात (करवीर) पुष्प के समान है। श्रीनन्दन अपने पिता ( श्री पर्जन्य जी के साथ ही इकट्ठे निवास करते हैं। श्रीहरि के प्रति इनका कोमल प्रेम है। नन्दन जी की पत्नी का नाम अतुल्या है। जिनकी अंगकान्ति बिजली के समान रंग वाली है। तथा वस्त्र मेघ की तरह श्याम रंग के हैं।१८।

कृष्ण के पिता नन्द की सानन्दा और नन्दिनी नाम की दो बहिने हैं। ये अनेक प्रकार के रंग- विरंगे) वस्त्र धारण करती हैं। इनकी दन्तपंक्ति रिक्त अर्थात इनके बहुत से दाँत नहीं हैं। इनकी अंगकान्ति फेन( झाग) की तरह सफेद है।१९।

सानन्दा के पति का नाम महानील और नन्दिनी के पति का नाम सुनील है। ये  दोंनो श्रीकृष्ण के फूफा  अर्थात् (नन्द) के बहनोई हैं।२०।

कृष्ण के पिता नन्द बड़े भाई श्री उपनन्द के  कण्डव और दण्डव नाम के दो पुत्र हैं।
दोंनो सुबह के संग में बहुत प्रसन्न रहते हैं। तथ
 दोंनो का मनोहर मुख कमल के समान सुन्दर है।

श्रीनन्द जी के दो चचेरे भाई  जो उनके चाचा राजन्य के पुत्र हैं। उनका नाम चाटु और वाटु  है उनकी पत्नीयाँ का नाम इसी क्रम से दधिस्सारा और हविस्सारा है।२२।

मर्दुमसुमारी ( जनसंख्या) के अन्तर्गत सभी आगत सदस्यों के नाम व पिता, पत्नि व सन्तानों के नामों का उद्घोष कर व्यक्ति का परिचय लेते हैं। विडियो पटकथा की स्क्रिप्ट जनरेट करें ! 



गोकुल का वंशावली परिचय: नन्द बाबा परिवार (मर्दुमसुमारी विशेष विडियो स्क्रिप्ट)
​[दृश्य 1: सूत्रधार का परिचय एवं मंच सज्जा]
​दृश्य: पृष्ठभूमि में प्राचीन गोकुल की जीवंत और भव्य झाँकी। पारंपरिक वेशभूषा में एक सूत्रधार (एंकर) स्क्रीन पर प्रकट होते हैं।
​पृष्ठभूमि संगीत: मधुर बाँसुरी की धुन और गोकुल के वातावरण का प्राकृतिक संगीत।
​सूत्रधार:
​"प्रणाम गोकुलवासियों! मर्दुमसुमारी (जनगणना) के इस विशेष सत्र में आज हम साक्षात् ब्रज के उस प्रतिष्ठित और आदरणीय परिवार का परिचय प्राप्त करने जा रहे हैं, जिनके आँगन में स्वयं परब्रह्म श्रीकृष्ण ने बाललीलाएँ कीं। आइए, पर्जन्य महाराज के इस यशस्वी परिवार के प्रत्येक सदस्य के इतिहास और परिचय से जुड़ते हैं!"


​[दृश्य 2: मूल पुरुष एवं परिवार की नींव - पर्जन्य महाराज और वरीयसी जी]
​विजुअल ग्राफिक्स: स्क्रीन पर पर्जन्य महाराज और उनकी पत्नी वरीयसी जी का सात्विक चित्रण।
​सूत्रधार: आइए, पर्जन्य महाराज के इस यशस्वी परिवार के प्रत्येक सदस्य के इतिहास और परिचय से जुड़ते हैं!"

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​कुल के मूल आधार: गोकुल के सम्मानित महापुरुष पर्जन्य महाराज। उनके दो प्रसिद्ध भाई अर्जन्य और राजजन्य हैं, जो गोधन (गायों) के स्वभाव के विशेषज्ञ के रूप में संपूर्ण ब्रज में विख्यात हैं।
​माता वरीयसी: पर्जन्य जी की अर्द्धांगिनी और नन्द बाबा की माता वरीयसी जी संपूर्ण गोकुल में अत्यंत सम्मानित हैं।
​विशेषताएँ: ये कुसुम्भ की आभा वाले हरे वस्त्र धारण करती हैं। छोटे कद की, दूध के समान श्वेत केशों वाली और अधिक वृद्धा हैं, जिनका आशीर्वाद पूरे परिवार के सिर पर है।
​उपलक्ष्य (नन्द की बुआ): पर्जन्य महाराज की छोटी बहन सुभ्यर्चना हैं, जिनका विवाह सूर्यकुण्ड नगर के शासक गुणवीर से हुआ था। गुणवीर जी नित्य दिन-रात अपनी गायक मंडली के साथ हरि कीर्तन में लीन रहते थे।
​[दृश्य 3: ब्रज के स्वामी - नन्द बाबा एवं उनके भाई-बहन]
​विजुअल ग्राफिक्स: नन्द बाबा और यशोदा मैया का चित्र। साथ ही ताऊ-चाचाओं की वंशावली चार्ट।
​सूत्रधार:
​नन्द बाबा: उपनन्द आदि सभी भाइयों में मझले, वसुदेव जी के अनन्य सुहृद और हमारे आराध्य श्रीकृष्ण के पिता के रूप में विश्व-विख्यात। माता यशोदा के साथ ये संपूर्ण ब्रज के स्वामी हैं।
​पितृव्य (ताऊ और चाचागण): नन्द बाबा के कुल चार भाई हैं—उपनन्द, अभिनन्दन, आनन्द (सनन्द) और नन्दन।
​[दृश्य 4: ताऊ एवं चाचाओं का विस्तृत विवरण (मर्दुमसुमारी डेटा)]

क्रम सदस्य का नाम संबंध अंग कान्ति (रंग) वस्त्र का प्रकार/रंग पत्नी का नाम पत्नी की विशेषता / वस्त्र
1. उपनन्द सबसे बड़े भाई धवल और अरुण (गुलाबी) लम्बी दाढ़ी, हरे वस्त्र तुंगी अंगकान्त व साड़ी: सारंग (पपीहे के रंग जैसी)
2. अभिनन्दन दूसरे बड़े भाई शंख के समान गौर वर्ण काले वस्त्र, लंबी दाढ़ी पीवरी अंगकान्त: पाटल (गुलाब) रंग, नीले वस्त्र
3. आनन्द (सनन्द) भाई (केशव के प्रिय) पीलापन लिए हुए श्वेत काले वस्त्र (सिर पर मात्र 2-3 बाल श्वेत) कुवलया कुवलय अंक कान्ति, कुवलय (नीले-हल्के लाल) वस्त्र
4. नन्दन भाई (पिता के साथ निवास)

​विशेष संताने एवं परिवार:
​उपनन्द जी के पुत्र: कण्डव और दण्डव। ये दोनों प्रातःकाल अत्यधिक प्रसन्नचित्त रहते हैं और इनके मनोहर मुख कमल के समान सुंदर हैं।
​राजन्य जी के पुत्र (नन्द बाबा के चचेरे भाई): चाटु और वाटु।
​चाटु की पत्नी: दधिस्सारा
​वाटु की पत्नी: हविस्सारा
​[दृश्य 5: नन्द बाबा की बहनें एवं फूफागण]
​विजुअल ग्राफिक्स: सानन्दा और नन्दिनी जी का पारिवारिक चित्र।
​सूत्रधार:
​कृष्ण के पिता नन्द जी की दो बहनें—सानन्दा और नन्दिनी हैं। ये अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करती हैं। फेन (झाग) जैसी सफेद अंगकान्ति और दन्तपंक्ति रिक्त (दाँतों की उम्रजन्य स्थिति) है।
​फूफागण (बहनोई):
​सानन्दा के पति: महानील
​नन्दिनी के पति: सुनील
(ये दोनों श्रीकृष्ण के फूफा हैं).
​[दृश्य 6: समापन]
​दृश्य: सभी पारिवारिक सदस्यों के चित्रों का कोलाज और पृष्ठभूमि में उत्सव का माहौल।
​सूत्रधार:
​"गोकुल की इस आधिकारिक मर्दुमसुमारी (जनगणना) के अंतर्गत हमने नन्द बाबा के इस विशाल, सुसंस्कृत और परम पवित्र परिवार का लेखा-जोखा दर्ज कर लिया है। यह वह परिवार है जिसके कण-कण में गोविंद की प्रीति रसी बसी है।"
​आउरो (Outro): स्क्रीन पर धन्यवाद संदेश और ब्रज रज की छवि के साथ दृश्य समाप्त



वीडियो पटकथा: उपलक्ष्य (नन्द की बुआ)

पात्र परिचय:

  1. पर्जन्य महाराज: ब्रज के मुख्य राजा (वृषभानु/नन्द बाबा के समकक्ष, वृद्ध एवं प्रतापी)।
  2. सुभ्यर्चना: पर्जन्य महाराज की छोटी बहन, नन्द बाबा की बुआ (भक्ति-भाव से परिपूर्ण, शांत एवं सौम्य)।
  3. गुणवीर: सूर्यकुण्ड नगर के शासक, सुभ्यर्चना के पति (संगीतज्ञ, सदा हरि गुणगान में मग्न)।
  4. गायक मंडली: गुणवीर के दरबार के साधु-संत एवं संगीतकार।
  5. सहयोगी पात्र: दास-दासी एवं ब्रजवासी।

दृश्य 1: सूर्यकुण्ड नगर - गुणवीर का महल (प्रातःकाल)

  • स्थान: सूर्यकुण्ड नगर, राजमहल का मुख्य दीवान-हॉल।
  • दृश्य (Visual): प्रातःकाल की सूर्य किरणें महल की झरोखों से अंदर आ रही हैं। वातावरण में पवित्रता और शांति है। महाराज गुणवीर अपने सिंहासन के समीप जमीन पर कालीन पर बैठे हैं। उनके हाथ में मंजीरा है और चारों ओर उनकी गायक मंडली मृदंग, करताल और तानपूरे के साथ बैठी है।
  • अभिनय: गुणवीर तल्लीनता से आँखें बंद करके कीर्तन कर रहे हैं। उनके चेहरे पर अलौकिक आनंद का भाव है।
  • ध्वनि / पार्श्व संगीत: मधुर और गूंजता हुआ हरि कीर्तन — "हरि बोल, हरि बोल, गोविंद हरि बोल..."


    दृश्य 2: महल का आंतरिक भाग - सुभ्यर्चना की कुटी/कक्ष

    • स्थान: उसी महल का एक शांत कोना, जिसे पूजा कक्ष बनाया गया है।
    • दृश्य (Visual): भगवान स्वराट विष्णु की सुंदर शालीग्राम एवं विग्रह प्रतिमा फूलों से सुसज्जित है। सुभ्यर्चना (पर्जन्य महाराज की बहन) श्वेत-पीताम्बर वस्त्र धारण किए हुए, हाथ में धूप-दीपक लिए प्रभु की आरती उतार रही हैं।
    • अभिनय: उनके चेहरे पर पूर्ण संतोष और सेवा-भाव झलकता है। वे अपने नाम 'सुभ्यर्चना' को वास्तव में सार्थक करती हुई पूरी निष्ठा से पूजा में लीन हैं।

    दृश्य 3: ब्रज से आगमन - पर्जन्य महाराज का प्रवेश

    • स्थान: सूर्यकुण्ड नगर के मुख्य द्वार और राजमहल का प्रांगण।
    • दृश्य (Visual): ब्रज के राजा पर्जन्य महाराज अपने कुछ सैनिकों और मंत्रियों के साथ सूर्यकुण्ड नगर पहुंचते हैं। द्वार पर संतरी उनका स्वागत करते हैं। पर्जन्य महाराज महल के भीतर प्रवेश करते हैं, तो उन्हें चारों ओर से मधुर संगीत की ध्वनि सुनाई देती है।
    • कैमरा एंगल (Camera Angle): पर्जन्य महाराज के चेहरे के भावों पर क्लोज-अप (Close-up) — उनके चेहरे पर अपनी बहन और बहनोई के प्रति अगाध स्नेह और आदर का भाव स्पष्ट दिखता है।

    दृश्य 4: मिलन और कीर्तन का आनंद

    • स्थान: दीवान-हॉल जहाँ कीर्तन चल रहा है।
    • दृश्य (Visual): पर्जन्य महाराज हॉल में प्रवेश करते हैं। गुणवीर कीर्तन में इतने मग्न हैं कि उन्हें आरंभ में आने का पता नहीं चलता।
    • अभिनय:
      • ​पर्जन्य महाराज मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर थोड़ी देर चुपचाप खड़े होकर संगीत का आनंद लेते हैं।
      • ​कीर्तन समाप्त होने पर गुणवीर आँखें खोलते हैं, सामने साले साहब (पर्जन्य महाराज) को देखकर तुरंत खड़े होते हैं और प्रसन्नता से दौड़कर गले मिलते हैं।
      • ​ठीक उसी समय, हाथों में पूजा की थाल लिए सुभ्यर्चना वहाँ आती हैं। अपने भाई पर्जन्य महाराज को देखकर उनकी आँखें भर आती हैं।

    दृश्य 5: समापन दृश्य (Climax & Emotional Peak)

    • दृश्य (Visual):
      • ​सुभ्यर्चना आगे बढ़कर अपने भाई पर्जन्य महाराज के चरण छूती हैं, और पर्जन्य महाराज स्नेह से उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं।
      • ​बैकग्राउंड में गायक मंडली फिर से मृदंग की थाप के साथ মৃদু स्वर में प्रभु स्मरण शुरू करती है।
      • ​चारों ओर भक्ति, प्रेम और पारिवारिक आत्मीयता का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
    • नरेटर (Voiceover):

      "जहाँ सांसारिक मोह-माया से परे केवल हरि का गुणगान हो, और जहाँ हर श्वास भगवान की अर्चना हो—ऐसी थी पर्जन्य महाराज की बहन सुभ्यर्चना और उनके पति गुणवीर की पावन नगरी।"


      • फ़ेड आउट (Fade Out) के साथ स्क्रीन पर टेक्स्ट:
        • उपलक्ष्य: नन्द की बुआ और सूर्यकुण्ड का पवित्र धाम।



उपनन्द आदि सभी भाईयो में मझले  भाई नन्द वसुदेव के सुहृद थे  और कृष्ण के माता- पिता के रूप में नन्द और यशोदा दोनों व्रज के स्वामी थे।


श्री नन्द के उपनन्द और अभिनन्दन बड़े भाई तथा आनन्द और नन्दन नाम के दो छोटे भाई भी हैं। ये सब कृष्ण के पितृव्य( ताऊ-चाचा)हैं।


सबसे बड़े भाई उपनन्द की अंग कान्ति धवल ( सफेद) और अरुण (उगते हुए सूर्य) के रंग के मिश्रण अर्थात- गुलाबी रंग जैसी है। इनकी दाढ़ी बहुत लम्बी और वस्त्र हरे रंग के हैं । इनकी पत्नी का नाम तुंगी है। जिनकी अंग कन्ति तथा साड़ी का रंग सारंग( पपीहे- के रंग जैसा है।


दूसरे भाई श्रीअभिनन्द की अंग कान्ति शंख के समान गौर वर्ण है। और दाढ़ी लम्बी है। ये काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इनकी पत्नी का नाम (पीवरी) जो नीले रंग के वस्त्र धारण करती हैं। तथा जिनकी अंग कान्ति पाटल ( गुलाब) रंग की है।


आनन्द का दूसरा नाम सनन्द है। इनकी अंग कान्ति पीलापन लिए हुए सफेद रंग की तथा वस्त्र काले रंग के हैं। इनके शिर के सम्पूर्ण बालों में केवल  दो या तीन बाल ही सफेद हुए हैं। ये केशव- कृष्ण के परम प्रिय है।१६।


सनन्द की पत्नी का नाम कुवलया है।

जो कुवलय( नीले और हल्के लाल  के मिश्रण जैसे ) वस्त्रों को धारण करने वाली तथा  कुवलय अंक कान्ति वाली हैं।


नंदन की अंग कान्ति मयूर के

कण्ठ  जैसी तथा वस्त्र चण्डात (करवीर) पुष्प के समान है। श्रीनन्दन अपने पिता ( श्री पर्जन्य जी के साथ ही इकट्ठे निवास करते हैं। 


श्रीहरि के प्रति इनका कोमल प्रेम है। नन्दन जी की पत्नी का नाम अतुल्या है। जिनकी अंगकान्ति बिजली के समान रंग वाली है। तथा वस्त्र मेघ की तरह श्याम रंग के हैं।


कृष्ण के पिता नन्द की सानन्दा और नन्दिनी नाम की दो बहिने हैं। ये अनेक प्रकार के रंग- विरंगे) वस्त्र धारण करती हैं। इनकी दन्तपंक्ति रिक्त अर्थात इनके बहुत से दाँत नहीं हैं। इनकी अंगकान्ति फेन( झाग) की तरह सफेद है।


सानन्दा के पति का नाम महानील और नन्दिनी के पति का नाम सुनील है। 

ये  दोंनो श्रीकृष्ण के फूफा  अर्थात् (नन्द) के बहनोई हैं।


कृष्ण के पिता नन्द बड़े भाई श्री उपनन्द के  कण्डव और दण्डव नाम के दो पुत्र हैं।

दोंनो सुबह के संग में बहुत प्रसन्न रहते हैं। तथ

 दोंनो का मनोहर मुख कमल के समान सुन्दर है।


श्रीनन्द जी के दो चचेरे भाई  जो उनके चाचा राजन्य के पुत्र हैं। उनका नाम चाटु और वाटु  है उनकी पत्नीयाँ का नाम इसी क्रम से दधिस्सारा और हविस्सारा है।।


सूत्रधार:"पुराणों के अनुसार, शिनि के वंशज स्वयं-भोज हुए,  उनके पुत्र हृदीक हुए।और हृदीक के  पुत्र देवमीढ जिनकी तीन प्रमुख रानियाँ थीं—अश्मिका, सत्प्रभा और गुणवती।"
अश्मिका से सूरसेन का जन्म हुआ।  और गुणवती से पर्जन्य, राजन्य और अर्जन्य का जन्म हुआ और देवमीढ की  सत्प्रभा नामक पत्नी से सत्यवती नाम की कन्या हुई।
राजा देवमीढ का परिवार जितना विशाल था वे उतने ही न्याय प्रिय व उदार थे।
शुभ्यर्चना अपनी माता गुणवती के पास है और पर्जन्य, राजन्य और अर्जन्य अपने पिता देवमीढ के पास हैं आत्मीयता के भाव को व्यक्त कर रहे हैं।
यदुवंश के वृष्णिकुल में 
इतिहास के बिखरे हुए पन्नों पर एक नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। देवमीढ- देवमीढ राजाओं का वंश ही नहीं अपितु लोकतन्त्र की परम्परा है। देवमीढ के गुणवती रानी से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र पर्जन्य जो गोसेवा और वैष्णव भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे उन्होंने मधुपुर(मथुरा) से अपने सभी सहोदरों राजन्य, अर्जन्य, तथा शुभ्यर्चना के साथ गोवर्धन के समीप नन्दीश्वर प्रदेश में प्रस्थान किया । यह एक भौगोलिक दूरी तय करने की यात्रा नहीं थी अपितु यदुवंश के विस्तार का शंखनाद था। गोवर्धन के समीप का वह क्षेत्र जिसे नन्दीश्वर नाम से जाना गया वह अब पर्जन्य परिवार की नवीन कर्मभूमि बनने जा रहा है ।