शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

इला की कहानी


अत्रि चन्द्रमा "बुध" और इला 'के प्रक्षेित -कथानक हैं-
               ★नारायण उवाच★
अत्रिश्च ब्रह्मणः पुत्रस्तस्य पुत्रो निशाकरः।
स च कृत्वा राजसूयं द्विजराजो बभूव ह ।४। 

अनुवाद– ब्रह्मा के अत्रि हुए और अत्रि के निशाकर जिन्होंने राजसूय यज्ञ करके द्विजराज
की उपाधि पायी।४।

गुरुपत्न्यां च तारायां तस्याभूच्च बुधः सुतः।
बुधपुत्रस्तु चैत्रश्च तत्पुत्रः सुरथः स्मृतः ।५।

अनुवाद– गुरु पत्नी तारा में जिन्होंने बुध नाम का पुत्र उत्पन्न किया और बुध का पुत्र चैत्र हुआ और चैत्र का पुत्र सुरथ हुआ।५।
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उपर्युक्त श्लोक ब्रह्म वैवर्तपुराण महापुराण से हैं जिसमें बुध का पुत्र चैत्र बताया गया है और चैत्र का पुत्र सुर है । यहाँ बुध से पुरूरवा की उत्पत्ति का वर्णन नहीं है।
सन्दर्भ-
ब्रह्म वैवर्तपुराण महापुराण द्वितीय प्रकृतिखण्ड नारदनारायणसंवाद दुर्गोपाख्याने ताराचन्द्रयोर्दोषनिवारणं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।।५८।।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में के उपर्युक्त श्लोकों में बुध की सन्तान चैत्र नाम का पुत्र बताया गया है।

विशेष:-पुरूरवा का कोई वर्णन नहीं है।अत: पुरूरवा गोप है और गोपों की सृष्टि स्वराट विष्णु से ही गोलोक में हुई है।


अत्रि  चन्द्रमा "बुध" और  इला 'के  प्रक्षेित -कथानक हैं- 
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और अधिकतर पुराणों में वर्णन है। कि 
अत्रि और अनुसुया से चन्द्रमा की उत्पत्ति नहीं हुई इसका शास्त्रीय खण्डन हम निम्नलिखित तथ्यों पर करते हैं।-

वैदिक ऋचाओं में अत्रि अग्नि का नामान्तरण है। और आध्यात्मिक रूप से अत्रि की उत्पत्ति निम्न प्रकार - से आत्मा की चतुरीय अवस्था  के रूप में  हुई है। अर्थात जो प्रकृति के तीनों गुणों से परे है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया है कि अत्रि वह साधक बालक है जो सम तत्व को प्राप्त प्रकृति के तीनों गुणों से परे है। देखें निम्न श्लोक-

त्रिगुणायां प्रकृत्यां त्रिर्विष्णावश्च प्रवर्त्तते ।।
तयोर्भक्तिः समा यस्य तेन बालोऽत्रिरुच्यते ।१५ ।।
अनुवाद:-
त्रिगुणात्मक प्रकृति का  वाचक "त्रि"  और  विष्णु का  "अ" है इन दोनों में समान भक्ति रखने वाले बालक को अत्रि कहा जाता है।15। 
ब्रह्मवैवर्तपुराण(ब्रह्मखणड) 
अध्याय ( 22)


                   अत्रि-
टिप्पणी : जब तक हम मनोमय कोश तक सीमित रहते हैं, तब तक हमारी चेतना के तीन रूप होते हैं – भावनामय, क्रियामय और ज्ञानमय। मनोमय से ऊपर उठने पर, विज्ञानमय कोश में पहुँचने पर चेतना सिमट कर एकाकार हो जाती है। वही अ+त्रि= अत्रि है। अत्रि को सबका अत्ता (खाने वाला) भी कहा जाता है और उसकी निष्पत्ति अद् धातु से की जाती है 

ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के ऋषि अत्रि व उनके पुत्र हैं। अत्रि ऋषि की प्रकृति को समझने के लिए वैदिक व पौराणिक साहित्य में विभिन्न प्रयास किए गए हैं।
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महाभारत अनुशासन पर्व ९३./८२ में अत्रि अपने नाम की निरुक्ति करते हुए कहते हैं कि जो अत्रि है, वही अत्रि है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे तुरीया अवस्था को अत्रि कह सकते हैं।

तब यह तीन से परे की अवस्था अत्रि कहलाएगी। पुराणों में अरात्रि की इस अवस्था की व्याख्या अत्रि-पत्नी अनसूया के रूप में की गई है। अनसूया अर्थात् अन्-असूर्या। अत्रि को तुरीयावस्था से सम्बन्धित करने की कल्पना की पुष्टि ऋग्वेद ५.४०.६ की ऋचा से होती है जहाँ अत्रि तुरीय ब्रह्म द्वारा राहु/स्वर्भानु से विद्ध सूर्य को प्राप्त करते हैं।

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वेदों में अत्रि को अग्नि के रूप में वर्णन किया गया है-
जो ईरानी धर्म ग्रन्थ अवेस्ता ए जैंद में अतर" नाम से है।
देखें वेदों की निम्नलिखित ऋचाऐं-

यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः।
अक्षेत्रविद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः॥५॥

स्वर्भानोरध यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन् ।
गूळ्हं सूर्यं तमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददत्रिः ॥६॥

ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन्कीरिणा देवान्नमसोपशिक्षन् ।
अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात्स्वर्भानोरप माया अघुक्षत् ॥८॥

यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः ।
अत्रयस्तमन्वविन्दन्नह्यन्ये अशक्नुवन् ॥९॥
(ऋग्वेद 5/4/5-6-8-9)

अनुवाद:-जब असुर स्वर्भानु के द्वारा  सूर्यदेव तुम्हारे ऊपर अन्धकार फैला दिया, तब सारे लोक ऐसे दिखाई देने लगे, जैसे कोई अपने बहुत से स्वरूपों को न जानते हुए भी मोहग्रस्त हो गया हो।५।

सायण-
इन चार प्रारम्भिक ऋचाओं में अत्रि के कर्म की प्रशंसा कि गयी है।
हे सूर्य ! तुमको असुर स्वर्भानु ने अन्धकार के द्वारा आच्छादित कर दिया ( ढ़क दिया) तब सभी लोक इस प्रकार दिखाई देने लगे जैसे सभी लोग अपने स्वरूपों को न जानते हुए मूढ़ता को प्राप्त हो गये हों।५।
जब असुर स्वर्भानु के पुत्र सूर्य ने तुम्हारे ऊपर अंधकार फैला दिया, तब सारे लोक ऐसे दिखाई देने लगे, जैसे कोई अपना बहुवचन स्वरूप न जानते हुए भी मोहग्रस्त हो गया हो।'५। 

विशेष:-
स्वर्भानु: राहु का एक नाम है , जो आरोही प्रवृत्ति का है, जो ग्रहण का कारण बनता है; वह कश्यप का पुत्र था, जो दानवों या असुरों की माता दनु से उत्पन्न हुआ था; एक अन्य सम्बन्धपरक रूप से उसे हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से उत्पन्न विप्रचिति का पुत्र माना जाता है।५।


जब हे इन्द्र , आप सूर्य के नीचे फैले स्वर्भानु की माया को दूर कर रहे थे , तब अत्रि ने अपनी चौथी पवित्र प्रार्थना द्वारा अन्धकार में छिपे सूर्य को खोज लिया, जिससे इन्द्र के कार्यों में बाधा उत्पन्न हो रही थी।६।
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अनुवाद:- तब यज्ञ का एक ऋत्विक जो चार वेदों का जाननेवाला और पूरे कर्म का निरीक्षण करनेवाला होता उसके रूप में ( अत्रि ) ने मणियों को जोड़कर, देवताओं की स्तुति करके, उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके, आकाश में सूर्य का नेत्र स्थापित किया; उन्होंने स्वर्भानु के मोह को नष्ट कर दिया ।८।

अनुवाद:-सूर्य को, जिसे असुर स्वर्भानु ने अन्धकार से ढक दिया था, बाद में अत्रि के पुत्रों ने पुनः प्राप्त कर लिया; अन्य कोई भी उसे मुक्त कराने में समर्थ नहीं हो सका।९।
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अत्रि ऋषि की एक निरुक्ति शतपथ ब्राह्मण १.४.५.१३ में की गई है जिसका निहितार्थ विचारणीय है। यहाँ प्रजापति द्वारा मन और वाक् के बीच मन को श्रेष्ठ घोषित करने पर वाक् के गर्भ का पतन हो जाता है जो अत्रि बनता है।

चूँकि वाक् मुख से निकलती है, अतः अत्रि को मुख से सम्बन्धित माना गया है जो सर्व प्रकार के अन्न का भक्षण करता है।

जैमिनीय ब्राह्मण २.२१९ में अत्रि व अन्य ऋषियों की प्रकृति की व्याख्या के प्रयास में कहा गया है कि अत्रि की कामना है कि उनकी प्रजा भूयिष्ठ हो। गोपथ ब्राह्मण १.२.१७ इत्यादि में उल्लेख है कि राहु द्वारा ग्रस्त सूर्य की रक्षा केवल अत्रि ही कर पाए, जिसके बदले में उन्होंने अपनी प्रजा को दक्षिणा प्राप्ति का अधिकार दिलाया।

अतः यज्ञ में सर्वप्रथम आत्रेय को हिरण्य दिया जाता है।

जैमिनीय ब्राह्मण २.२८१ के अनुसार पहले चार(अन्नमय, प्राणमय, मनोमय व विज्ञानमय कोश?) मिथुन हैं। यह बृहद् और रथन्तर (बहिर्मुखी व अन्तर्मुखी चेतना?) के दिव्य मिथुन हैं। पांचवें हिरण्यय कोश का मिथुन नहीं होता। अत्रि की कामना है कि यह चार कोश में वीर्य बन जाएं। वही वीर्य है जो आत्मा के वीर्य के अनुदिश वीर्य है।

ऋग्वेद ५.४० में अत्रि द्वारा राहु/स्वर्भानु से विद्ध( आच्छादित) सूर्य की रक्षा करने का उल्लेख है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इस आख्यान का सार्वत्रिक उल्लेख है( जैमिनीय ब्राह्मण १.८०, शतपथ ब्राह्मण ४.३.४.२१, ताण्ड्य ब्राह्मण ६.६.८ व १४.११.१५ इत्यादि)। इस आख्यान में अत्रि द्वारा सूर्य से तम( अन्धकार) का अपाहन (निवारण)  करने पर प्रथम बार कृष्णा अवि ,  दूसरी बार धूम्रा अवि और तीसरी बार फल्गु अवि की उत्पत्ति हुई। ताण्ड्य ब्राह्मण १४.११.१५ के अनुसार यज्ञ में जिन दिनों को छन्दोम कहा जाता है, वही तम का रूप हैं। यहां जिस अवि का उल्लेख है, उसकी व्याख्या उपनिषदों में अविमुक्त/वाराणसी के रूप में की गई है। जाबालोपनिषद २ व ५ तथा रामोत्तरतापिन्युपनिषद ३.१ में उल्लेख है कि अत्रि ने याज्ञवल्क्य से अनन्त, अव्यक्त, परिपूर्णानन्द आत्मा को जानने का उपाय पूछा। याज्ञवल्क्य ने उन्हें उत्तर के रूप में अविमुक्त क्षेत्र की महिमा के रूप में असि और वरणा नदियों के बीच भ्रूमध्य में स्थिति वाराणसी की महिमा बताई।

ऋग्वेद १.११६.८ इत्यादि में असुरों द्वारा ऋबीस? में बद्ध अत्रि की अश्विनौ द्वारा रक्षा करने का उल्लेख है। ऋग्वेद १.११२.७, १.११८.७ तथा १.१८०.४ इत्यादि के उल्लेख के अनुसार अत्रि जिस घर्म से परितप्त हो रहे थे, अश्विनौ ने उस घर्म को ओमान, मधुमान् बना दिया, अथवा उसे शीतल बना दिया(घर्म का एक रूप मनुष्य के अन्दर सर्वदा सुनाई देने वाली घॄं प्रकार की ध्वनि है। यह ओम का रूप बन जाए, यही अभीष्ट है।

ऋग्वेद की ५.७.८ इत्यादि कईं ऋचाओं में अग्नि से अत्रिवत् होकर आने की कामना की गई है। जैसे अत्रि सब कुछ भक्षण कर जाते हैं, वैसे ही अग्नि भी सब कुछ भक्षण कर जाती है।

ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता में अत्रि शब्द अतर के रूप में -अग्नि का वाचक है ।
जो वैदिक ऋचाओं में उद्धृत अत्रि अंगि है और वशिष्ठ का सहवर्ती है।।
वशिष्ठ को ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता में "वहिश्त" तथा अंगिरा को 'अंग्र' और यम को यिम कहा गय है।
ब्रह्माण्ड पुराण में अत्रि की वंशावली ब्राह्मणों की वंशावली के रूप में वर्णित है।
परन्तु अनुसूया नामक उनकी पत्नी का पता ही है 
अनुसूया के माता पिता प्रजापति कर्दम और देवहूति थे।  जबकि अत्रि की दश पत्नीयाँ घृताक्षी अप्सरा और भद्राश्व गन्धर्व की कन्याऐं हैं। निम्नलिखित श्लोकों में उनका वर्णन है।
अत्रि की मद्रा नाम की पत्नी से सोम उत्पन्न हुआ है।

अध्याय- (8) अत्रि का वंश- ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद- 

                                              
अत्रि का वंश- ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद- 


अत्रेर्वशं प्रवक्ष्यामि तृतीयस्य प्रजापतेः॥२/८/७३॥

"अनुवाद:-

मैं तीसरे प्रजापति अत्रि के वंश का वर्णन करूँगा।७३।

तस्य पत्न्यस्तु सुन्दर्यों दशैवासन्पतिव्रताः।
भद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः॥ २/८/७४॥

"अनुवाद:-

उन अत्रि की दस सुन्दर पत्नियाँ थीं जो पतिव्रता थीं। वे सभी दस दिव्य कन्या घृतासी से उत्पन्न भद्राश्व की संतान थे।७४।

भद्रा शूद्रा च मद्रा च शालभा मलदा तथा ।
बला हला च सप्तैता या च गोचपलाः स्मृताः ॥ २/८/७५॥

"अनुवाद:-. 

१-भद्रा , २-शूद्रा , ३-मद्रा ४-, शालभा , ५-मलदा , ६-बला और ७- हला । ये सात (बहुत महत्वपूर्ण थीं) और उनके जैसे अन्य। ८-गोचपला ।७५।

तथा तामरसा चैव रत्नकूटा च तादृशः ।
तत्र यो वंशकृच्चासौ तस्य नाम प्रभाकरः ॥ २/८/७६ ॥

"अनुवाद:-

९-ताम्रसा और १०- रत्नकुटा भी उसी प्रकार से अत्रि की दश पत्नीयाँ थीं उनके वंश को कायम रखने वाले उनके पुत्रों में प्रभाकर नामका एक वंशज भी हुआ ।७६।

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मद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम् ।
स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम् ॥ २/८/७७॥

"अनुवाद:-

उन प्रभाकर अत्रि ने मद्रा नामक पत्नी से प्रसिद्ध पुत्र सोम (चंद्रमा) को जन्म दिया। जब सूर्य पर स्वर्भानु ( राहु ) का प्रहार हुआ, जब वह सूर्य  स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर रहे था।77। 

तमोऽभिभूते लोकेऽस्मिन्प्रभा येन प्रवर्त्तिता।
स्वस्ति तेस्त्विति चोक्तो वै पतन्निह दिवाकरः॥ २/८/७८॥

"अनुवाद:-

और जब यह संसार अंधकार से घिर गया, तब उन्हीं (अर्थात् अत्रि) के द्वारा ही प्रकाश (प्रभा) उत्पन्न हुआ। डूबते हुए सूरज को भी कहा गया “तुम्हारा कल्याण हो।78।

ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य न पपात दिवो महीम् ।
अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः॥ २/८/७९॥

"अनुवाद:-

उस ब्राह्मण ऋषि के कथन के कारण, वह (सूर्य) स्वर्ग से पृथ्वी पर नहीं गिरा।  जिनके द्वारा गोत्रों में श्रेष्ठ गोत्र अत्रि का प्रारम्भ हुआ।79।

यज्ञेष्वनिधनं चैव सुरैर्यस्य प्रवर्तितम् ।
स तासु जनयामास पुत्रानात्मसमानकान् ॥ २/८/८० ॥

"अनुवाद:-

उन्होंने ही यज्ञ के दौरान सुरों की मृत्यु का निवारण किया । उन्होंने उन प्रभाकर अत्रि ने (दस अप्सराओं) से अपने समान  अनेक पुत्र उत्पन्न किए।८०।

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दश तान्वै सुमहता तपसा भावितः प्रभुः ।
स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः ॥ २/८/८१।।

"अनुवाद:-

महान तप से पवित्र हुए भगवान ने दस पुत्र उत्पन्न किये। वे स्वस्त्यात्रेय नाम से विख्यात ऋषिगण वेदों में पारंगत थे।।८१।


तेषां द्वौ ख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ सुमहौजसौ ।
दत्तो ह्यनुमतो ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः ॥ २/८/८२॥

"अनुवाद:-

उनमें दो बहुत प्रसिद्ध थे। वे ब्रह्मज्ञान में बहुत रुचि रखते थे और महान आध्यात्मिक शक्ति वाले थे।दत्त को सबसे बड़ा माना जाता है, दुर्वासा उनके छोटे भाई थे। ८२।

यवीयसी सुता तेषामबला ब्रह्मवादिनी ।
अत्राप्युदाहरन्तीमं श्लोकं पौराणिकाः पुरा ॥ २/८/८३॥

"अनुवाद:-

सबसे छोटी एक पुत्री थी जिसने ब्रह्मज्ञान की व्याख्या की थी। इस संदर्भ में पुराणों के जानकार लोग इस श्लोक का हवाला देते हैं।८३।


अत्रेः पुत्रं महात्मानं शान्तात्मानमकल्मषम् ।
दत्तात्रेयं तनुं विष्णोः पुराणज्ञाः प्रचक्षते ॥२/८/८४॥

"अनुवाद:-

पुराणों के जानकार कहते हैं कि अत्रि के महान् पुत्र दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे अपने हृदय में शान्त और पापों से मुक्त हैं।८४।

तस्य गोत्रान्वयाज्जाताश्चत्वारः प्रथिता भुवि ।
श्यावाश्वा मुद्गलाश्चैव वाग्भूतकगविस्थिराः ॥ २/८/८५॥

"अनुवाद:-

उनके (अत्रि) वंशजों में चार लोग पृथ्वी पर विख्यात हैं - श्यावाश्व , मुद्गल , वाग्भूतक और गविष्ठिर ।८५।


एतेऽत्रीणां तु चत्वारः स्मृताः पक्षा महौजसः।
काश्यपो नारदश्चैव पर्वतोऽरुन्धती तथा ॥ २/८/८६॥

"अनुवाद:- 

निम्नलिखित चार भी अत्रि वंश के ही माने जाते हैं । वे बहुत शक्तिशाली हैं। वे हैं कश्यप , नारद , पर्वत और अरुन्धति ।८६।

सन्दर्भ:-

श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते मध्यभागे तृतीय उपोद्धातपादे ऋषिवंशवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥

विशेष:-दुर्वासा और दत्तात्रेय अत्रि की बड़ी पत्नी भद्रा से उत्पन्न. हुए थे ।जबकि सोम मद्रा नामक पत्नी से हुए थे.....
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शिव के एक हजार नामों में अत्रि भी
उनका एक नाम है और चन्द्रमा उनके शिखर पर सुशोभित होने से  चन्दमा
 को अत्रि  से उत्पन्न करने की कल्पना की गयी।

परन्तु  चन्द्रमा विराट् पुरुष विष्णु के मन से उत्पन्न हुआ है अत: चन्द्रा़मा भी वैष्णव है।  सभी गोप जो विष्णु के शरीर के रोमकूपों से उत्पन्‍न हैं। वह तो वैष्णव हैं ही ।

उपर्युक्त श्लोकों में कहीं भी अत्रि की पत्नी अनसूया का कहींं वर्णन नही है।
अनुसूय कर्दम और  देवहूति की पुत्री है।
ब्रह्माण्ड पुराण में अत्रि की पत्नी के रूप में अनुसूया का कोई वर्णन है।
अत: ये कथाऐं अनुसूया वाली बाद में जोड़ी गयी।

नीचे पुरुष सूक्त से दो ऋचाऐं उद्धृदेवहूति त हैं। जो चन्द्रमा की उत्पत्ति का निर्देशन करती हैं।
"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥१३॥

"नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१४॥ 
(ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ९० ऋचा १३)

श्रीमद्भगवद्गीता में भी विष्णु के विराट रूप में चन्द्रमा उनसे उत्पन्न रूप है। 

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।11.19।। 
"अनुवाद - 
आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुखोंवाले और अपने तेजसे संसारको संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१॥


पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥


एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥


त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥४॥


तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥


यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥६॥



ऋग्वेदः सूक्तं १०.९०-५-६-७
तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥

सायण-भाष्य-

विष्वङ् व्यक्रामदिति यदुक्तं तदेवात्र प्रपञ्च्यते । “तस्मात् आदिपुरुषात् “विराट् ब्रह्माण्डदेहः “अजायत उत्पन्नः । विविधानि राजन्ते वस्तून्यत्रेति विराट् । “विराजोऽधि विराड्देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणं कृत्वा “पुरुषः तद्देहाभिमानी कश्चित् पुमान् अजायत । सोऽयं सर्ववेदान्तवेद्यः परमात्मा स्वयमेव स्वकीयया मायया विराड्देहं ब्रह्माण्डरूपं सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत् । एतच्चाथर्वणिका उत्तरतापनीये विस्पष्टमामनन्ति---- स वा एष भूतानीन्द्रियाणि विराजं देवताः कोशांश्च सृष्ट्वा प्रविश्यामूढो मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव' (नृ. ता. २. १, ९) इति । “स “जातः विराट् पुरुषः “अत्यरिच्यत अतिरिक्तोऽभूत् । विराड्व्यतिरिक्तो देवतिर्यङ्मनुष्यादिरूपोऽभूत् । “पश्चात् देवादिजीवभावादूर्ध्वं “भूमिं ससर्जेति शेषः । “अथो भूमिसृष्टेरनन्तरं तेषां जीवानां “पुरः ससर्ज । पूर्यन्ते सप्तभिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ॥॥१७॥



यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥६॥

सायणभाष्य-

यत् यदा पूर्वोक्तक्रमेणैव शरीरेषुत्पन्नेषु सत्सु "देवाः उत्तरसृष्टिसिद्धयर्थं बाह्यद्रव्यस्यानुत्पन्नत्वेन हविरन्तरसंभवात् पुरुषस्वरूपमेव मनसा हविष्ट्वेन संकल्प्य “पुरुषेण पुरुषाख्येन “हविषा मानसं यज्ञम् “अतन्वत अन्वतिष्ठन् तदानीम् “अस्य यज्ञस्य “वसन्तः वसन्तर्तुरेव “आज्यम् “आसीत् अभूत् । तमेवाज्यत्वेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः । एवं “ग्रीष्म “इध्मः आसीत्। तमेवेध्मत्वेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः। तथा “शरद्धविः आसीत् । तामेव पुरोडाशादिहविष्ट्वेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः । पूर्वं पुरुषस्य हविःसामान्यरूपत्वेन संकल्पः । अनन्तरं वसन्तादीनामाज्यादिविशेषरूपत्वेन संकल्प इति द्रष्टव्यम् ॥

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥७॥

सायणभाष्य-

विष्वङ् व्यक्रामदिति यदुक्तं तदेवात्र प्रपञ्च्यते । “तस्मात् आदिपुरुषात् “विराट् ब्रह्माण्डदेहः “अजायत उत्पन्नः । विविधानि राजन्ते वस्तून्यत्रेति विराट् । “विराजोऽधि विराड्देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणं कृत्वा “पुरुषः तद्देहाभिमानी कश्चित् पुमान् अजायत । सोऽयं सर्ववेदान्तवेद्यः परमात्मा स्वयमेव स्वकीयया मायया विराड्देहं ब्रह्माण्डरूपं सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत् । एतच्चाथर्वणिका उत्तरतापनीये विस्पष्टमामनन्ति---- स वा एष भूतानीन्द्रियाणि विराजं देवताः कोशांश्च सृष्ट्वा प्रविश्यामूढो मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव' (नृ. ता. २. १, ९) इति । “स “जातः विराट् पुरुषः “अत्यरिच्यत अतिरिक्तोऽभूत् । विराड्व्यतिरिक्तो देवतिर्यङ्मनुष्यादिरूपोऽभूत् । “पश्चात् देवादिजीवभावादूर्ध्वं “भूमिं ससर्जेति शेषः । “अथो भूमिसृष्टेरनन्तरं तेषां जीवानां “पुरः ससर्ज । पूर्यन्ते सप्तभिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ॥॥१७॥



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अब प्रमाणित करेंगे कि-
बुध की चन्द्रमा से उत्पत्ति भी पूर्णत: कुछ पुराणों में  काल्पनिक थ्योरी पर  आधारित है जो बाद में जोड़ी गयी है।
जिसे उन्ही के थ्योरी के रूप में उद्धृत करते हैं।


 पुराणों में एक काल्पनिक  कहानी बनाकर जोड़ी गयी ---"चंद्रमा के गुरु थे देवगुरु बृहस्पति। बृहस्पति की पत्नी तारा चंद्रमा की सुन्दरता पर मोहित होकर उनसे प्रेम करने लगी।

 तदोपरांत वह चंद्रमा के संग सहवास भी कर गई एवं बृहस्पति को छोड़ ही दिया। 

बृहस्पति के वापस बुलाने पर उसने वापस आने से मना कर दिया, जिससे बृहस्पति क्रोधित हो उठे तब बृहस्पति एवं उनके शिष्य चंद्र के बीच युद्ध आरंभ हो गया।

 इस युद्ध में असुर गुरु शुक्राचार्य चंद्रमा की ओर हो गये और अन्य देवता बृहस्पति के साथ हो लिये। अब युद्ध बड़े स्तर पर होने लगा। 

क्योंकि यह युद्ध तारा की कामना से हुआ था, अतः यह तारकाम्यम कहलाया।

 इस वृहत स्तरीय युद्ध से सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा को भय हुआ कि ये कहीं पूरी सृष्टि को ही नष्ट न कर जाए, तो वे बीच बचाव कर इस युद्ध को रुकवाने का प्रयोजन करने लगे।

 उन्होंने तारा को समझा-बुझा कर चन्द्र से वापस लिया और बृहस्पति को सौंपा।

 इस बीच तारा के एक सुन्दर पुत्र जन्मा जो बुध कहलाया।

 चंद्र और बृहस्पति दोनों ही इसे अपना बताने लगे और स्वयं को इसका पिता बताने लगे यद्यपि तारा चुप ही रही।

माता की चुप्पी से अशांत व क्रोधित होकर स्वयं बुध ने माता से सत्य बताने को कहा। तब तारा ने बुध का पिता चन्द्र को बताया।

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"दूसरा पौराणिक मत-

दूसरे मत से तारा बृहस्पति की पत्नी थी। चंद्र उनके सौंदर्य से मोहित होकर विवाह प्रस्ताव दिया तो तारा ने उसे ठुकरा दिया। इससे चंद्र क्रोधित हो परे और बलपूर्वक उनका बलात्कार किया। इस बलात्कार के कारण तारा गर्भवती हुई और बुध का जन्म हुआ।



निष्कर्ष- चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है

इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 1.2% है और इसका व्यास 3,474 किमी (2,159 मील) है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग एक-चौथाई है



बुध का व्यास चंद्रमा के व्यास से लगभग 40% अधिक है। बुध का व्यास 4,879 किलोमीटर है, जबकि चंद्रमा का व्यास 3,475 किलोमीटर है. 

अर्थात 1,404 किलोमीटर व्यास बुध का ज्यादा होने से भी वह चन्द्रमा से बड़ा है।

अत:चन्दमा से बुध की उत्पत

_ भी सम्भव नहीं है।_______________________________ 

"अब इला की काल्पनिक सिद्धान्त हीन थ्योरी भी सुने


 जो उसे सैद्धान्तिक रूप से इला को बुध की पत्नी नहीं बनाती हैं क्योंकि गर्भवास की पूर्ण अवधि नौ महीने होती है । और नौ महीनों तक इला का स्त्री बने रहना सम्भव नहीं- क्यों कि उन्हें एक महीना स्त्री और एक महीना पुरुष होना पड़ता है। *********************

इस प्रकार उनका न तो स्त्रीत्व ही सुरक्षित है और न पुरुषत्व ही ।

पुराणों के इसी आख्यान को हम निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत करते हैं जो मनगड़न्त है।


-श्रीमद्भागवत महापुराण (भागवत पुराण) से
वैवस्वत मनु के पुत्र राजा सुद्युनकी कथा

अध्याय एक – राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना (9.1)

1 राजा परीक्षित ने कहा: हे प्रभु श्रील शुकदेव गोस्वामी, आप विभिन्न मनुओं से सारे कालों का विस्तार से वर्णन कर चुके हैं और उनमें असीम शक्तिमान पूर्ण भगवान के अद्भुत कार्यकलापों का भी वर्णन कर चुके हैं। मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने आपसे ये सारी बातें सुनीं।

2-3 द्रविड़ देश के साधु सदृश राजा सत्यव्रत को भगवतकृपा से गत कल्प के अन्त में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ और वह अगले मन्वन्तर में विवस्वान का पुत्र वैवस्वत मनु बना। मुझे इसका ज्ञान आपसे प्राप्त हुआ है। मैंने यह भी जाना कि इक्ष्वाकु इत्यादि राजा उसके पुत्र थे, जैसा कि आप पहले बतला चुके हैं।

4 हे परम भाग्यशाली श्रील शुकदेव गोस्वामी, हे महान ब्राह्मण, कृपा करके हमको उन सारे राजाओं के वंशों तथा गुणों का पृथक-पृथक वर्णन कीजिये, क्योंकि हम आपसे ऐसे विषयों को सुनने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।

5 कृपा करके हमें वैवस्वत मनु के वंश में उत्पन्न उन समस्त विख्यात राजाओं के पराक्रम के विषय में बतलायें जो पहले हो चुके हैं, जो भविष्य में होंगे तथा जो इस समय विद्यमान हैं।

6 सूत गोस्वामी ने कहा: जब वैदिक ज्ञान के पण्डितों की सभा में सर्वश्रेष्ठ धर्मज्ञ श्रील शुकदेव गोस्वामी से महाराज परीक्षित ने इस प्रकार से प्रार्थना की, तो वे इस प्रकार बोले।

7 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजा, अब तुम मुझसे मनु के वंश के विषय में विस्तार से सुनो। मैं यथासम्भव तुम्हें बतलाऊँगा, यद्यपि सौ वर्षों में भी उसके विषय में पूरी तरह नहीं बतलाया जा सकता।

8 जीवन की उच्च तथा निम्न अवस्थाओं में पाये जाने वाले जीवों के परमात्मा दिव्य परम पुरुष कल्प के अन्त में विद्यमान थे, जब न तो यह ब्रह्माण्ड था, न अन्य कुछ था। तब केवल वे ही विद्यमान थे।

9 हे राजा परीक्षित, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की नाभि से एक सुनहला कमल उत्पन्न हुआ, जिस पर चार मुखों वाले ब्रह्माजी ने जन्म लिया।

10 ब्रह्माजी के मन से मरीचि ने जन्म लिया। दक्ष महाराज की कन्या और मरीचि के संयोग से कश्यप प्रकट हुए। कश्यप द्वारा अदिति के गर्भ से विवस्वान ने जन्म लिया।

11-12 हे भारतवंश के श्रेष्ठ राजा, संज्ञा के गर्भ से विवस्वान को श्राद्धदेव मनु प्राप्त हुए। श्राद्धदेव मनु ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था। उन्हें अपनी पत्नी श्रद्धा के गर्भ से दस पुत्र प्राप्त हुए। इन पुत्रों के नाम थे – इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करुषक,   पृषध्र, नभग तथा कवि।

13 आरम्भ में मनु को एक भी पुत्र नहीं था। अतएव आध्यात्मिक ज्ञान में अत्यन्त शक्ति सम्पन्न महर्षि वसिष्ठ ने (उसको पुत्र प्राप्ति के लिए) मित्र तथा वरुण देवताओं को प्रसन्न करने के लिए एक यज्ञ सम्पन्न किया।

14 उस यज्ञ के दौरान मनु की पत्नी श्रद्धा, जो केवल दूध पीकर जीवित रहने का व्रत कर रही थी, यज्ञ करने वाले पुरोहित के निकट गई, उन्हें प्रणाम किया और उनसे एक पुत्री की याचना की।

15 प्रधान पुरोहित द्वारा यह कहे जाने पर "अब आहुति डालो" आहुति डालने वाले (होता) ने आहुति डालने के लिए घी लिया। तब उसे मनु की पत्नी की याचना स्मरण हो आई और उसने वषट शब्दोच्चार करते हुए यज्ञ सम्पन्न किया।

16 मनु ने वह यज्ञ पुत्र प्राप्ति के लिए प्रारम्भ किया था, किन्तु मनु की पत्नी के अनुरोध पर पुरोहित के विपथ होने से इला नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। इस पुत्री को देखकर मनु अधिक प्रसन्न नहीं हुए। अतएव वे अपने गुरु वसिष्ठ से इस प्रकार बोले।

17 हे प्रभु, आप लोग वैदिक मंत्रों के उच्चारण में पटु हैं। तो फिर वांछित फल से विपरीत फल क्यों निकला? यही मेरे लिए शोक का विषय है। वैदिक मंत्रों का ऐसा उल्टा प्रभाव नहीं होना चाहिए था।

18 आप सभी संयमित, मन से संतुलित तथा परम सत्य से परिचित हो। आप सबने अपनी तपस्याओं के द्वारा सारे भौतिक कल्मषों से अपने आप को पूरी तरह स्वच्छ कर लिया है। आप सबके वचन देवताओं के वचनों की तरह कभी मिथ्या नहीं होते। तो फिर यह कैसे सम्भव हुआ कि आप सबका संकल्प विफल हो गया?

19 मनु के इन वचनों को सुनकर अत्यन्त शक्तिसम्पन्न प्रपितामह वसिष्ठ पुरोहित की त्रुटि को समझ गए। अतः वे सूर्यपुत्र से इस प्रकार बोले।

20 तुम्हारे पुरोहित द्वारा मूल उद्देश्य में विचलन के कारण लक्ष्य में यह त्रुटि हुई है। फिर भी मैं अपने पराक्रम से तुम्हें एक अच्छा पुत्र प्रदान करूँगा।

21 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजा परीक्षित, अत्यन्त सुविख्यात एवं शक्तिसम्पन्न वसिष्ठ ने यह निर्णय लेने के बाद, परम पुरुष भगवान विष्णु से इला को पुरुष में परिणत करने के लिए प्रार्थना की।

22 परम नियन्ता परमेश्वर ने वसिष्ठ से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वरदान दिया। इस तरह इला सुद्युम्न नामक एक सुन्दर पुरुष में परिणत हो गई।

23-24 हे राजा परीक्षित, एक बार वीर सुद्युम्न अपने कुछ मंत्रियों और साथियों के साथ, सिंधुप्रदेश से लाये गये घोड़े पर सवार होकर शिकार करने जंगल में गया। वह कवच पहने था और धनुष-बाण से सुसज्जित था। वह अत्यन्त सुन्दर था। वह पशुओं का पीछा करते हुए तथा उनको मारते हुए जंगल के उत्तरी भाग में पहुँच गया।

25 वहाँ उत्तर में मेरु पर्वत की तलहटी में सुकुमार नामक एक वन है जहाँ शिवजी सदैव उमा के साथ आनन्द-विहार करते हैं। सुद्युम्न उस वन में प्रविष्ट हुआ।

26 हे राजा परीक्षित, ज्योंही अपने शत्रुओं को दमन करने में निपुण सुद्युम्न उस जंगल में प्रविष्ट हुआ, त्योंही उसने देखा कि वह एक स्त्री में और उसका घोड़ा एक घोड़ी में परिणत हो गये हैं।

27 जब उसके साथियों ने भी अपने स्वरूपों एवं अपने लिंग को विपरीत लिंग में परिणत हुआ देखा, तो वे सभी अत्यन्त खिन्न हो गये और एक दूसरे की ओर देखते रह गये।

28 महाराज परीक्षित ने कहा: हे सर्वश्रेष्ठ शक्तिसम्पन्न ब्राह्मण, यह स्थान इतना शक्तिशाली क्यों था और किसने इसे इतना शक्तिशाली बनाया था? कृपा करके इस प्रश्न का उत्तर दीजिये, क्योंकि मैं इसके विषय में जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।

29 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: एक बार आध्यात्मिक अनुष्ठानों का दृढ़ता से पालन करने वाले महान साधु पुरुष उस जंगल में शिवजी का दर्शन करने आए। उनके तेज से समस्त दिशाओं का सारा अंधकार दूर हो गया।

30-31 जब देवी अम्बिका ने इन महान साधु पुरुषों को देखा, तो वे अत्यधिक लज्जित हुईं। साधु पुरुषों ने देखा कि गौरीशंकर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिए वे वहाँ से लौट गए और नर-नारायण आश्रम की ओर चल पड़े।

32 तत्पश्चात अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए शिवजी ने कहा, “कोई भी पुरुष इस स्थान में प्रवेश करते ही तुरन्त स्त्री बन जाएगा।”

33 उस समय से कोई भी पुरुष ने उस जंगल में प्रवेश नहीं किया था। किन्तु अब राजा सुद्युम्न स्त्री रूप में परिणत होकर अपने साथियों समेत एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमने लगा।

34 सुद्युम्न सर्वोत्तम सुन्दर स्त्री रूप में परिणत कर दिया गया था और वह अन्य स्त्रियों से घिरी हुई थी। चन्द्रमा के पुत्र बुध को इस सुन्दरी को अपने आश्रम के निकट विचरण करते देखकर उसके साथ भोग करने की चाहत हुई।

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35 उस सुन्दर स्त्री ने भी चन्द्रमा के राजकुमार बुध को अपना पति बनाना चाहा। इस तरह बुध ने उसके गर्भ से पुरूरवा नामक एक पुत्र प्राप्त किया।

36 मैंने विश्वस्त सूत्रों से सुना है कि मनु-पुत्र सुद्युम्न ने इस प्रकार स्त्रीत्व प्राप्त करके अपने कुलगुरु वसिष्ठ का स्मरण किया।

37 सुद्युम्न की इस शोचनीय स्थिति को देखकर वसिष्ठ अत्यधिक दुखी हुए। उन्होंने सुद्युम्न को उसका पुरुषत्व वापस दिलाने की इच्छा से फिर से शिवजी की पूजा प्रारम्भ कर दी।

38-39 हे राजा परीक्षित, शिवजी वसिष्ठ पर प्रसन्न हुए। अतएव शिवजी ने उन्हें संतुष्ट करने तथा पार्वती को दिये गये अपने वचन को रखने के उद्देश्य से उस सन्त पुरुष से कहा, “

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आपका शिष्य सुद्युम्न एक मास तक नर रहेगा और दूसरे मास नारी होगा। इस तरह वह इच्छानुसार जगत पर शासन कर सकेगा।

मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
 इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ ३९ ॥

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40 इस प्रकार गुरु की कृपा पाकर शिवजी के वचनों के अनुसार सुद्युम्न को प्रत्येक दूसरे मास में उसका इच्छित पुरुषत्व फिर से प्राप्त हो जाता था और इस तरह उसने राज्य पर शासन चलाया, यद्यपि नागरिक इससे संतुष्ट नहीं थे।



तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
 दक्षिणापथराजानो बभूवुः धर्मवत्सलाः ॥ ४१॥

41 हे राजन, सुद्युम्न के तीन अत्यन्त पवित्र पुत्र हुए जिनके नाम थे उत्कल, गय तथा विमल, जो दक्षिणा-पथ के राजा बने।

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 ( पुरूरवा या गोप रूप में वर्णन-)
ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
 पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥ ४२॥

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे प्रथमोध्याऽयः ॥१॥

42 तत्पश्चात, समय आने पर जब जगत का राजा सुद्युम्न काफी वृद्ध हो गया, तो उसने अपने गो समुदाय को अपने पुत्र पुरूरवा को सौंपकर और स्वयं जंगल में चला गया।

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वेदाभ्यासरतस्यास्य प्रजाकामस्य मानसाः।
मनसः पूर्वसृष्टा वै जातायत्तेन मानसाः।। ३.५ ।।

मरीचिरभवत्‌ पूर्व ततोऽत्रिर्भगवान् ऋषिः।
अङिगराश्चाभवत्पश्चात् पुलस्त्यस्तदनन्तरम्।३.६।

मत्स्यपुराण /अध्यायः (३)
बह्मा के मन से केवल मरीचि उत्पन्न हुए है। इस लिए वे ही मानस पुत्र कहलाए!

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परावरेषां भूतानां आत्मा यः पुरुषः परः।
 स एवासीद् इदं विश्वं कल्पान्ते अन्यत् न किञ्चन ॥८॥


 तस्य नाभेः समभवत् पद्मकोषो हिरण्मयः ।
 तस्मिन् जज्ञे महाराज स्वयंभूः चतुराननः ॥९॥

मरीचिः मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कश्यपः ।
दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवस्वान् अभवत् सुतः ॥१०॥

(भागवत पुराण स्कन्ध 9/1-अध्याय )

अनुवाद-

8 जीवन की उच्च तथा निम्न अवस्थाओं में पाये जाने वाले जीवों के परमात्मा दिव्य परम पुरुष कल्प के अन्त में विद्यमान थे, जब न तो यह ब्रह्माण्ड था, न अन्य कुछ था। तब केवल वे ही विद्यमान थे।

9 हे राजा परीक्षित, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की नाभि से एक सुनहला कमल उत्पन्न हुआ, जिस पर चार मुखों वाले ब्रह्माजी ने जन्म लिया।

ब्रह्माजी के मनसे मरीचि और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपत्नी दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ॥ 10।

इला शब्द के वैदिक अर्थ हैं।
इला - पृथ्वी । बुद्धिमती स्त्री । गाय। वाणी- (काव्यत्व शक्ति)। आदि-

कृत्वा स्त्रीरूपमात्मानमुमेशो गोपतिध्वजः ।

देव्याः प्रियचिकीर्षुः संस्तस्मिन्पर्वतनिर्झरे । ७.८७.१२ ।



ये तु तत्र वनोद्देशे सत्त्वाः पुरुषवादिनः ।

वृक्षाः पुरुषनामानस्तेऽभवन् स्त्रीजनास्तदा । ७.८७.१३ ।



यच्च किञ्चन तत्सर्वं नारीसञ्ज्ञं बभूव ह ।एतस्मिन्नन्तरे राजा स इलः कर्दमात्मजः ।निघ्नन्मृगसहस्राणि तं देशमुपचक्रमे । ७.८७.१४।

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स दृष्ट्वा स्त्रीकृतं सर्वं सव्यालमृगपक्षकम् ।आत्मनं स्त्रीकृतं चैव सानुगं रघुनन्दन ।। ७.८७.१५ ।।




( वाल्मीकि रामायण में इला की अन्य पुराणों से भिन्न कथा-  )  

वाल्मीकि  रामायणम्‎ - उत्तरकाण्ड सर्गः (87 इला और पुरुरवा की कहानी) भागवत पुराण से भिन्न है।

तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणेनोक्तं वाक्यं वाक्य विशारदः।
प्रत्युवाच महातेजाः प्रहसन्राघवो वचः।। ७.८७.१।

एवमेव नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण ।
वृत्रघातमशेषेण वाजिमेध फलं च यत् । ७.८७.२।

श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापतेः।
पुत्रो बाह्लीश्वरः श्रीमान्-इलो नाम महाशयाः।७.८७.३।

स राजा पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा सुधार्मिकः ।
राज्यं चैव नरव्याघ्र पुत्रवत्पर्यपालयत् । ७.८७.४।

सुरैश्च परमोदारैर्दैतेयैश्च महाधनैः ।
नागराक्षसगन्धर्वैर्यक्षैश्च सुमहात्मभिः।७.८७.५।


पूज्यते नित्यशः सौम्य भयार्तै रघुनन्दन ।
अविभ्यंश्च त्रयो लोकाः सरोषस्य महात्मनः। ७.८७.६ ।

स राजा तादृशो ह्यासीद्धर्मे वीर्ये च निष्ठितः ।
बुद्ध्या च परमोदारो बाह्लीकेशो महायशाः । ७.८७.७ ।

स प्रचक्रे महाबाहुर्मृगयां रुचिरे वने ।
चैत्रे मनोरमे मासि सभृत्यबलवाहनः । ७.८७.८ ।

प्रजघ्ने च नृपोऽरण्ये मृगाञ्छतसहस्रशः।
हत्वैव तृप्तिर्नाभूच्च राज्ञस्तस्य महात्मनः। ७.८७.९।


नानामृगाणामयुतं वध्यमानं महात्मना।
यत्र जातो माहासेनस्तं देशमुपचक्रमे । ७.८७.१०।


तस्मिन्प्रदेशे देवेश शैलराजसुतां हरः।
रमयामास दुर्धर्षः सर्वैरनुचरैः सह । ७.८७.११ ।

कृत्वा स्त्रीरूपमात्मानमुमेशो गोपतिध्वजः।
देव्याः प्रियचिकीर्षुः संस्तस्मिन्पर्वतनिर्झरे । ७.८७.१२ ।


ये तु तत्र वनोद्देशे सत्त्वाः पुरुषवादिनः।
वृक्षाः पुरुषनामानस्ते ऽभवन् स्त्रीजनास्तदा । ७.८७.१३।


यच्च किञ्चन तत्सर्वं नारीसञ्ज्ञं बभूव ह ।
एतस्मिन्नन्तरे राजा स इलः कर्दमात्मजः।

निघ्नन्मृगसहस्राणि तं देशमुपचक्रमे । ७.८७.१४।
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स दृष्ट्वा स्त्रीकृतं सर्वं सव्यालमृगपक्षकम् ।
आत्मनं स्त्रीकृतं चैव सानुगं रघुनन्दन ।। ७.८७.१५ ।।


तस्य दुःखं महच्चासीद्दृष्ट्वा ऽऽत्मानं तथागतम् ।
उमापतेश्च तत्कर्म ज्ञात्वा त्रासमुपागमत् ।। ७.८७.१६ ।।


ततो देवं महात्मानं शितिकण्ठं कपर्दिनम् ।
जगाम शरणं राजा सभृत्यबलवाहनः।। ७.८७.१७।।

ततः प्रहस्य वरदः सह देव्या महेश्वरः ।
प्रजापतिसुतं वाक्यमुवाच वरदः स्वयम् ।७.८७.१८।


उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे कार्दमेय महाबल ।
पुरुषत्वमृते सौम्य वरं वरय सुव्रत ।।७.८७.१९।।


ततः स राजा दुःखार्तः प्रत्याख्यातो महात्मना।
न च जग्राह स्त्रीभूतो वरमन्यं सुरोत्तमात् ।। ७.८७.२०।।


ततः शोकेन महता शैलराजसुतां नृपः ।
प्रणिपत्य ह्युमां देवीं सर्वेणैवान्तरात्मना ।। ७.८७.२१ ।।


ईशे वराणां वरदे लोकानामसि भामिनी।
अमोघदर्शने देवी भज सौम्येन चक्षुषा।। ७.८७.२२ ।।


हृद्गतं तस्य राजर्षेर्विज्ञाय हरसन्निधौ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं देवी रुद्रस्य संमता ।७.८७.२३।


अर्धस्य देवो वरदो वरार्धस्य तव ह्यहम् ।
तस्मादर्धं गृहाण त्वं स्त्रीपुंसोर्यावदिच्छसि ।। ७.८७.२४ ।।


तदद्भुततरं श्रुत्वा देव्या वरमनुत्तमम् ।
सम्प्रहृष्टमना भूत्वा राजा वाक्यमथाब्रवीत् ।। ७.८७.२५ ।।


यदि देवि प्रसन्ना मे रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
मासं स्त्रीत्वमुपासित्वा मासं स्यां पुरुषः पुनः ।। ७.८७.२६ ।।


ईप्सितं तस्य विज्ञाय देवी सुरुचिरानना ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यमेवमेव भविष्यति ।। ७.८७.२७ ।।

राजन्पुरुषभूतस्त्वं स्त्रीभावं न स्मरिष्यसि ।
स्त्रीभूतश्च परं मासं न स्मरिष्यसि पौरुषम् ।। ७.८७.२८।।


एवं स राजा पुरुषो मासं भूत्वाथ कार्दमिः ।
त्रैलोक्यसुन्दरी नारी मासमेकमिला ऽभवत् ।। ७.८७.२९ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्ड

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

यादव वंश के प्रक्षेप-

अहीर (यादव) जाति का क्षत्रिय वर्ण एक ऐतिहासिक एवं पौराणिक विश्लेषण-

 प्रस्तावना
भारतीय समाज की जाति व्यवस्था प्राचीन काल से ही जटिल और बहुस्तरीय रही है। पुराणों, महाकाव्यों और इतिहासकारों के ग्रंथों में विभिन्न जातियों की उत्पत्ति को विभिन्न तरीकों से वर्णित किया गया है, जो कभी-कभी परस्पर विरोधी भी प्रतीत होते हैं। यह लेख मुख्य रूप से अहीर (यादव) जाति पर केंद्रित है, जो प्राचीन काल से ही कृषि, पशुपालन और शासन से जुड़ी रही है। हम देखेंगे कि कैसे पुराणकारों और यथास्थितिवादियों ने शक्तिशाली जातियों को वर्णसंकर या निम्न घोषित करने की कोशिश की, लेकिन शास्त्रीय प्रमाणों से अहीरों का क्षत्रिय वर्ण स्पष्ट होता है। यह विश्लेषण "गोप-आभीर (अहीर)-यादव" नामक पुस्तक से है, जिसमें सभी श्लोकों को मूल रूप में शामिल है। अंत में, यादव वंश की शेजरा (वंशावली) भी प्रस्तुत की गई है, जो पुराणों पर आधारित है।

यह लेख तथ्यों पर आधारित है, जिसमें पुराणों से हम विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के उदाहरणों से शुरू करते हैं और अहीरों के क्षत्रिय होने के प्रमाण पर समाप्त करेंगे।

 1. राजपूत जाति की उत्पत्ति- वर्णसंकर या विदेशी?
मध्यकाल में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध राजपूत जाति को पुराणों में वर्णसंकर घोषित किया गया। ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसे क्षत्रिय पुरुष और करण स्त्री की संतान बताया गया है।

श्लोक-
 क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रों बभूव ह।  
 राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः ॥१११०॥

अर्थ- क्षत्रिय पुरुष तथा करण कन्या के संयोग से राजपूत जाति का उद्भव होता है।

करण स्त्री कौन है? ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखंड, अध्याय 10 में स्पष्ट है कि शूद्र और वैश्य के मिश्रण से करण की उत्पत्ति होती है।

श्लोक-
 इत्येवमाद्या विप्रेन्द्र सच्छूद्राः परिकीर्तिताः।  
 शूद्राविशोस्तु करणोऽम्बष्ठो वैश्याद्दिवजन्मनोः ॥१८॥

आधुनिक अंग्रेज इतिहासकारों ने भी राजपूतों को विदेशी बताया। जेम्स टॉड ने "एनाल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान" में राजपूतों को सीथियन की संतान कहा। इसी प्रकार, स्मिथ ने उन्हें शक और हूण की संतान घोषित किया, जबकि अग्निकुल (चौहान, परमार, चालुक्य) को शक-हूण से जोड़ा और राष्ट्रकूट, चंदेल को गोंड, भर आदि से।

यह दर्शाता है कि शक्तिशाली जातियों को कमतर दिखाने की प्रवृत्ति रही है।

 2. क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति विविध मत-
क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति तीन प्रमुख तरीकों से बताई गई है, जो कभी-कभी विरोधाभासी लगती हैं।

क) ऋग्वेद से-
 बाहू इति। राजन्यः। कृतः ॥१२॥  
 (ऋग्वेद १०/९०/१२)

अर्थ- क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं से हुई।

ख) इक्ष्वाकु वंश से-
भगवान राम इक्ष्वाकु वंशी क्षत्रिय थे। इक्ष्वाकु की उत्पत्ति मनु के नाक छींकने से बताई गई।

श्लोक-
 क्षुवतस्तु मनोः पूर्वमिक्ष्वाकुरभिनिः सृतः ॥८॥  
 (ब्रह्मांड पुराण, मध्यम भाग, अध्याय ६३)

अर्थ- प्राचीन काल में मनु द्वारा नाक से छींकने पर इक्ष्वाकु निकले।

ग) महाभारत से-
परशुराम द्वारा क्षत्रियों के विनाश के बाद, क्षत्रिय स्त्रियों ने ब्राह्मणों से संतान उत्पन्न की।

श्लोक-
 त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा।  
 जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेंद्रे पर्वतोत्तमे ॥४॥  
 तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति।  
 ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥५॥  
 तेभ्यश्च लेभिरे गर्भ क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।  
 ततः सुषुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान ॥७॥  
 कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये।  
 एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ॥८॥  
 जातं वृद्ध च धर्मेण सुदीघेर्णायुषान्वितम्।  
 चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्बाह्यणोत्तराः ॥९॥  
 (महाभारत, आदिपर्व, प्रथम खंड, अध्याय ६४)

अर्थ- क्षत्रिय स्त्रियों ने ब्राह्मणों से गर्भ धारण किया, जिससे क्षत्रिय संतान हुई।

यह मत अमान्य है क्योंकि: (१) क्षत्रिय प्राचीन काल से अस्तित्व में हैं; (२) ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री से संतान ब्राह्मण होती है।

श्लोक-
 भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते।  
 आनुपूर्व्याद् द्वयोर्कीनौ मातृजात्यौ प्रसूयतः ॥४॥  
 (अनुशासनपर्व, अध्याय ४८)

 3. ब्राह्मण जाति की उत्पत्ति
ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ माना गया, जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से बताई गई।

श्लोक-
 ब्राह्मणः। अस्य। मुखम्। आसीत्।

उपाध्याय, दीक्षित आदि दस ब्राह्मण कश्यप के पुत्र कण्वमुनि और आर्यावती से हुए।

श्लोक-
 दशपुत्रास्तयोर्जाता आर्यबुद्धिकरा हि ते।  
 उपाध्यायो दीक्षितश्च पाठकः शुक्लमिश्रकौ ॥७॥  
 अग्निहोत्री द्विवेदी च त्रिवेदी पांड एव च।  
 चतुर्वेदीति कथिता यथा नाम तथा गुणाः ॥८॥  
 (भविष्य पुराण, भाग २, प्रतिसर्ग पर्व, अध्याय २१)

मनु से सभी वर्ण उत्पन्न हुए।

श्लोक-
 ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः।  
 ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ॥१४॥  
 (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ७५)

अर्थ- उन्हीं मनु से ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए। तभी से ब्राह्मण कुल क्षत्रिय से सम्बद्ध हुआ।

 4. अन्य जातियों की उत्पत्ति- वर्णसंकर उदाहरण
बहादुर, जाट आदि को वर्णसंकर कहा गया।

श्लोक-
 म्लेच्छेश्चभुक्त्यत्यस्ताबभूर्यु वर्णसङ्कराः।  
 न वै आदी न वै म्लेच्छाजट्टा जात्या न नेहनाः ॥११२७॥  
 (भविष्य पुराण, अध्याय २, प्रतिसर्ग पर्व)

 5. नंदिनी गाय से जातियों की उत्पत्ति- एक चमत्कारिक कथा
कई जातियों (हूण, पारसी, पहलव, शक, द्रविड़, सिंहल, पौंड्र आदि) की उत्पत्ति नंदिनी गाय के मूत्र, गोबर आदि से बताई गई, जो मनगढ़ंत लगती है।

श्लोक-
 आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ।  
 अंगारवर्ष मुञ्चंती मुहुर्वालधितो महत् ॥३५॥  
 असृजत् पहलवान पुच्छात् प्रस्रवाद् द्रविड़ाव्छकान्।  
 योनिदेशाच्च यवनान शकृतः शबरान बहून ॥३६॥  
 मूत्रतश्चासृजत कांश्चिच्छ्वरांश्चैव पार्श्वतः  
 पौण्ड्रान किरातान यवनान सिंहलान बबार्रान खसान ॥३७॥  
 चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान्।  
 ससर्ज फेनतः सा गौम्लेंच्छान बहुविधानपि ॥३८॥  
 (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १७३)

अर्थ- नंदिनी गाय ने पूंछ से पहलव, थनों से द्रविड़-शक, योनिदेश से यवन, गोबर से शबर, मूत्र से शबर, पार्श्व से पौंड्र आदि, और फेन से चीन-हूण आदि उत्पन्न किए।

यह जबरदस्ती की कथा है, जब उत्पत्ति का ज्ञान न हो।

 6. विरोधाभासी उत्पत्ति- शक जाति का उदाहरण
महाभारत में शक नंदिनी के थन से, लेकिन शिव पुराण में सूर्यवंशी नरिष्यंत से।

श्लोक-
 नरिष्यन्ताच्छका पुत्रा नमगस्य सुतोऽभवत् ॥२२॥  
 (शिव पुराण, उमाकोटि संहिता, अध्याय ३६, पेज १२९७)

अर्थ- नरिष्यंत से शकों का जन्म।

यह हास्यास्पद विरोध है।

 निष्कर्ष- अहीर (यादव) का क्षत्रिय वर्ण
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि जब कोई जाति सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देती है, तो उसे निम्न घोषित किया जाता है-जैसे बुद्ध, मौर्य, कायस्थ, क्षत्रिय, राजपूत, वैश्य आदि। अहीर जाति ने भागवत धर्म और राजनीतिक शक्ति से चुनौती दी, इसलिए उसे शूद्र, महाशूद्र, अत्यज, वर्णसंकर, विदेशी कहा गया। लेकिन शास्त्र कहते हैं-

श्लोक-
 यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ॥३४॥  
 (मत्स्य पुराण, अध्याय ३४/३०; महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ८५; हरिवंश पुराण, हरिवंश पर्व, ३३/५५)

अर्थ- यदु से यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए। अर्थात यादव/अहीर का वर्ण क्षत्रिय है।

पृथ्वीराज रासो में ३६ क्षत्रिय वंशों में अहीर शामिल हैं।

श्लोक-
 रवि ससि जादव वंश, ककुस्थ परमार सदावर।  
 चाहुवान चालुकय, छंद सिलार अभियर। (आभीर)  
 दोयमत मकवान, गरूअ गोहिल गोहिलपुत।  
 चापोत्कट परिवार, राव राठौर रोसजुत।  
 देवरा टांक सैन्धव अनिग, योतिक प्रतिहार दधिषट।  
 कारट्ट‌पाल कोटपाल हुल, हरितट गौर कमाष मट।  
 धन्यपालक निकुंभ वर, राजपाल कविनीस।  
 कालछुरक्कै आदि दे, बरने वंस छत्तीस।

नंदगोप की पुत्री योगमाया को क्षत्रिया कहा गया।

श्लोक-
 निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा  
 विद्याना ब्रहाविद्या त्वमोंकारोऽथ वषट् तथा ॥२३॥  
 (हरिवंश पुराण, विष्णु पर्व, अध्याय ३)

नंदगोप स्वयं क्षत्रिय
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श्लोक-
 एवमिति सार्द्धम। एवं नंदःगोपः क्षत्रा व्रजरक्षाधिकृतेन गोकुले आघोषयत् सर्वत्र घोषितवान् ॥१३॥  
 (अन्वितार्थ प्रकाशिका, अध्याय ३९, दशम स्कंध, पूर्व भाग, पेज १२६०)

कृष्ण कहते हैं-

श्लोक
 क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्या प्रकृतिस्थिताः।  
 यदुवंशे समुत्पन्न क्षात्रं वृत्त मनुष्ठित ॥१०॥  
 (हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व, ८०/१०)

कृष्ण को गोप (अहीर) जाति में जन्मा कहा

श्लोक-
 गोपजातिप्रतिच्छन्नौ देवा गोपालरूपिणः।  
 ईडिरे कृष्णरामौ च नटा इव नटं नृप ॥११॥  
 (भागवत पुराण, १०/१८/११)

इस प्रकार, अहीर का वर्ण क्षत्रिय है। हमें साजिश समझकर अपनी पहचान माननी चाहिए।

 यादव वंश की शेजरा (वंशावली)
पुराणों (मत्स्य, हरिवंश आदि) के आधार पर यादव वंश की संक्षिप्त शेजरा निम्न है-

- ब्रह्मा - अत्रि - सोम (चंद्र)-पुरुरवा - आयु - नहुष - ययाति  
 ययाति के पुत्र यदु (यादव वंश के आदि पुरुष)  
 यदु - सहस्रजित् - शतजित् - हैहय (हैहय वंश)  
 यदु की अन्य शाखाएं- क्रोष्टु - वृजिनवान - स्वाहि - रुशेकु - चित्ररथ - शशबिंदु  
 शशबिंदु - पृथुश्रवा - अंतरा - सुयज्ञ - उशना - शिनेयु - मरुत्त  
 ... (कई पीढ़ियां)  अंधक (अंधक वंश) और वृष्णि (वृष्णि वंश)  
- वृष्णि - युधाजित - अनामित्र - शिनि - सत्यक - युयुधान  
 मुख्य शाखा- यदु  ... - वसुदेव - श्रीकृष्ण और बलराम (यादव कुल के प्रमुख)  
 कृष्ण के वंशज- प्रद्युम्न - अनिरुद्ध - वज्र (मथुरा के यादव राजा)  

यह शेजरा चंद्रवंशी क्षत्रिय परंपरा को दर्शाती है, जिसमें यादवों की राजकीय भूमिका स्पष्ट है। विस्तृत शेजरा के लिए हरिवंश पुराण का अध्ययन करें।


शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

नया सत्र-

२१ -फरवरी - शनिवार को खिटकारी मियाँ मिस्त्री व उनके वेलदार का काम चला-
२२ -फरवरी - रविवार को खिटकारी मियाँ मिस्त्री व उनके वेलदार का काम चला-
२३-फरवरी सोमवार को खिटकारी मिस्त्री व उनके बेलदार का काम चला-
२४- फरवरी को नयीम+ रहीश + भोले + दोजी राम का काम चला-
२५- फरवरी को सभी नहीम+ रहीश + भोले  दोजी का काम चला-
२६-फरवरी को सभी नहीम+ रहीश + भोले  दोजी का काम चला- नोजी पर १०० रुपये पहुचे-
२७- फरवरी को नहीम और रहीश का काम चला -केवल-

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

आवश्यकता कामना और वासना के भेद -

१-आवश्यकता जीवन की मौलिक अनिवार्यता है जिसके अभाव में जीवन का अस्तित्व ही सम्भव नहीं- भोजन वस्त्र और आवास जीवन की मौलिक आवश्यकता हैं।

२-इससे आगे कामनाओं का अस्तित्व मनोवेगों पर आधारित है मनुष्य प्रत्येक कर्म ही कामनाओं की प्रेरणा पर आधारित है। और जीवन का अवलम्बन कर्म है। कामनाओं सञ्चय काम ( sex) के रूप में मन में समाहित है।

३-और अब बात करते हैं वासनाओं की वासना हमारे चित्त में सञ्चित वह संस्कार हैं। जो हमारे मन में पूर्वजन्म से प्रवृत्तियों के रूप में बसे हुए हैं।
जहाँ कामनाओ मन में होती हैं वहीं वासनाऐं चित में बसी हुई होती हैं।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

भागवत पुराण में कलियुग का वर्णन-

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित् । समय बड़ा बलवान् है; ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जायगा, त्यों-त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरणशक्तिका लोप होता जायगा ॥ 1 ॥ कलियुगमें जिसके पास धन होगा, उसीको लोग कुलीन, सदाचारी और सी मानेंगे। जिसके हाथमें शक्ति होगी वही धर्म और न्यायको व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा ॥ 2 ॥ विवाह सम्बन्धके लिये कुल शील-योग्यता आदिकी परख-निरख नहीं रहेगी, युवक-युवतीकी पारस्परिक रुचिसे ही सम्बन्ध हो जायगा। व्यवहारकी निपुणता सच्चाई और ईमानदारीमें नहीं रहेगी जो जितना छल-कपट कर सकेगा, वह उतना ही व्यवहारकुशल माना जायगा। स्त्री और पुरुषको श्रेष्ठताका आधार उनका शील-संयम न होकर केवल रतिकौशल ही रहेगा। ब्राह्मणकी पहचान उसके गुण-स्वभावसे नहीं यज्ञोपवीतसे हुआ करेगी ॥ 3 ॥ वस्त्र, दण्ड-कमण्डलु आदिसे ही ब्रह्मचारी, संन्यासी आदि आश्रमियोंकी पहचान होगी और एक-दूसरेका चिह्न स्वीकार कर लेना ही एकसे दूसरे आश्रम में प्रवेशका स्वरूप होगा। जो घूस देने या घन सर्च करनेमें असमर्थ होगा, उसे अदालतोंसे ठीक-ठीक न्याय न मिल सकेगा। जो बोलचालमें जितना चालाक होगा, उसे उतना ही बड़ा पण्डित माना जायगा ॥ 4 असाधुताकी— दोषी होनेकी एक ही पहचान रहेगी गरीब होना। जो जितना अधिक दम्भ पाखण्ड कर सकेगा, उसे उतना ही बड़ा साधु समझा जायगा। विवाहके लिये एक-दूसरेकी स्वीकृति ही पर्याप्त होगी, शास्त्रीय विधि विधानकी-संस्कार आदिकी कोई आवश्यकता न समझी जायगी। बाल आदि सैंवारकर कपड़े-लत्तेसे लैस हो जाना ही स्नान समझा जायगा ॥ 5 ॥लोग दूरके तालाबको तीर्थ मानेंगे और निकटके तीर्थ गङ्गा-गोमती, माता-पिता आदिकी उपेक्षा करेंगे। सिरपर बड़े-बड़े बाल-काकुल रखाना ही शारीरिक सौन्दर्यका चिह्न समझा जायगा और जीवनका सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा अपना पेट भर लेना। जो जितनी ढिठाईसे बात कर सकेगा, उसे उतना ही सच्चा समझा जायगा ॥ 6 ॥ योग्यता चतुराईका सबसे बड़ा लक्षण यह होगा कि मनुष्य अपने कुटुम्बका पालन कर ले। धर्मका सेवन यशके लिये किया जायगा। इस प्रकार जब सारी पृथ्वीपर दुष्टोंका बोलबाला हो जायगा, तब राजा होनेका कोई नियम न रहेगा; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रोंमें जो बली होगा, वही राजा बन बैठेगा। उस समयके नीच राजा अत्यन्त निर्दय एवं क्रूर होंगे; लोभी तो इतने होंगे कि उनमें और लुटेरोंमें कोई अन्तर न किया जा सकेगा। वे प्रजाकी पूँजी एवं पत्नियोतकको छीन लेंगे। उनसे डरकर प्रजा पहाड़ों और जंगलोंमें भाग जायगी। उस समय प्रजा तरह-तरहके शाक, कन्द-मूल, मांस, मधु, फल-फूल और बीज गुठली आदि खा-खाकर अपना पेट भरेगी ॥ 7 -9 ॥ कभी वर्षा न होगी- सूखा पड़ जायगा; तो कभी कर पर कर लगाये जायँगे। कभी कड़ाके की सर्दी पड़ेगी तो कभी पाला पड़ेगा, कभी आँधी चलेगी, कभी गरमी पड़ेगी तो कभी बाढ़ आ जायगी। इन उत्पातोंसे तथा आपसके सङ्घर्षसे प्रजा अत्यन्त पीड़ित होगी, नष्ट हो जायगी ॥ 10 ॥ लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे दुःखी रहेंगे रोगोंसे तो उन्हें | छुटकारा ही न मिलेगा कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु केवल बीस या तीस वर्षकी होगी ॥ 11 ॥

परीक्षित्! कलिकालके दोष से प्राणियोंके शरीर छोटे-छोटे, क्षीण और रोगग्रस्त होने लगेगे। वर्ण और आश्रमोंका धर्म बतलानेवाला वेद-मार्ग नष्टप्राय हो जायगा ॥ 12 ॥ धर्ममें पाखण्डकी प्रधानता हो जायगी। राजे-महाराजे डाकू लुटेरोंके समान हो जायेंगे। मनुष्य चोरी, | झूठ तथा निरपराध हिंसा आदि नाना प्रकारके कुकर्मोसे जीविका चलाने लगेंगे ॥ 13 ॥ चारों वर्णोंकि लोग शूद्रोके समान हो जायेंगे। गौऐं बकरियोंकी तरह छोटी-छोटी और | कम दूध देनेवाली हो जायेगी। वानप्रस्थी और संन्यासी आदि विरक्त आश्रमवाले भी घर-गृहस्थी जुटाकर गृहस्थोंका सा व्यापार करने लगेंगे। जिनसे वैवाहिक सम्बन्ध है, उन्होंको अपना सम्बन्धी माना जायगा 14 ॥धान, जौ, गेहूं आदि धान्योंके पौधे छोटे-छोटे होने लगेंगे। वृक्षोंमें अधिकांश शमीके समान छोटे और कँटीले वृक्ष ही रह जायेंगे। बादलोंमें बिजली तो बहुत चमकेगी, परन्तु वर्षा कम होगी। गृहस्थोंके घर अतिथि सत्कार या वेदध्वनिसे रहित होनेके कारण अथवा जनसंख्या घट जानेके कारण सूने-सूने हो जायँगे ॥ 15 ॥ परीक्षित् ! अधिक क्या कहें- कलियुगका अन्त होते-होते मनुष्योंका स्वभाव गधों जैसा दुःसह बन जायगा, लोग प्रायः गृहस्थीका भार ढोनेवाले और विषयी हो जायँगे। ऐसी स्थितिमें धर्मकी रक्षा करनेके लिये सत्त्वगुण स्वीकार करके स्वयं भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे ॥ 16 ॥

प्रिय परीक्षित् सर्वव्यापक भगवान् विष्णु सर्वशक्तिमान है। वे सर्वस्वरूप होनेपर भी चराचर जगत्के सच्चे शिक्षक - सद्गुरु हैं। वे साधु-सज्जन पुरुषोंके धर्मकी रक्षाके लिये, उनके कर्मका बन्धन काटकर उन्हें जन्म-म - मृत्युके चक्रसे छुड़ानेके लिये अवतार ग्रहण करते हैं ॥ 17 ॥ उन दिनों शम्भल - ग्राममें विष्णुयश नामके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे। उनका हृदय बड़ा उदार एवं भगवद्भक्तिसे पूर्ण होगा। उन्होंके घर कल्किभगवान् अवतार ग्रहण करेंगे 18 श्रीभगवान् ही अष्टसिद्धियोंके और समस्त सगुणों के एकमान आश्रय हैं। समस्त चराचर जगत्के वे ही रक्षक और स्वामी हैं। वे देवदत्त नामक शीघ्रगामी घोड़ेपर सवार होकर दुष्टोंको तलवारके घाट उतारकर ठीक करेंगे ॥ 19 ॥ उनके रोम-रोम अतुलनीय की किरण छिटकती होंगी। वे अपने शीघ्रगामी मोड़ेसे पृथ्वीपर सर्वत्र विचरण करेंगे और राजाके वेषमें छिपकर रहनेवाले कोटि-कोटि डाकुओंका संहार करेंगे 20 ॥

प्रिय परीक्षित् जब सब डाकुओंका संहार हो चुकेगा, तब नगरकी और देशकी सारी प्रजाका हृदय पवित्रतासे भर जायगा; क्योंकि भगवान् कल्किके शरीरमें लगे हुए अङ्गरागका स्पर्श पाकर अत्यन्त पवित्र हुई वायु उनका स्पर्श करेगी और इस प्रकार वे भगवान्के श्रीविग्रहकी दिव्य गन्ध प्राप्त कर सकेंगे ।। 21 । उनके पवित्र हृदयों में सत्वमूर्ति भगवान् वासुदेव विराजमान होंगे और फिर उनको सन्तान पहलेकी भाँति हृष्ट-पुष्ट और बलवान् होने लगेगी ॥ 22 ॥ प्रजाके नयन-मनोहारी हरि ही धर्मके रक्षक और स्वामी हैं। वे ही भगवान् जब कल्किके रूपमें अवतार ग्रहण करेंगे, उसी समय सत्ययुगका प्रारम्भ हो जायगा और प्रजाकी सन्तानपरम्परा स्वयं ही सत्त्वगुणसे युक्त हो जायगी ॥ 23 ॥ जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक ही समय एक ही साथ पुष्य नक्षत्रके प्रथम पलमें प्रवेश करते हैं, एक राशिपर आते हैं, उसी समय सत्ययुगका प्रारम्भ होता है ॥ 24 ॥ परीक्षित् ! चन्द्रवंश और सूर्यवंशमें जितने राजा हो गये हैं या होंगे, उन सबका मैंने संक्षेपसे वर्णन कर दिया ।। 25 ।। तुम्हारे जन्मसे लेकर राजा नन्दके अभिषेकतक एक हजार एक सौ पंद्रह वर्षका समय लगेगा ॥ 26 ॥ जिस समय आकाशमें सप्तर्षियोंका उदय होता है, उस समय पहले उनमें से दो ही तारे दिखायी पड़ते हैं। उनके बीचमें दक्षिणोत्तर रेखापर समभागमें अश्विनी आदि नक्षत्रोंमेंसे एक नक्षत्र दिखायी पड़ता है ॥ 27 ॥ उस नक्षत्रके साथ सप्तर्षिगण मनुष्योंकी गणनासे सौ वर्षतक रहते हैं। वे तुम्हारे जन्मके समय और इस समय भी मघा नक्षत्रपर स्थित हैं ॥ 28 ॥

स्वयं सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् भगवान् ही शुद्ध सत्त्वमय विग्रहके साथ श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट हुए थे। वे जिस समय अपनी लीला संवरण करके परमधामको पधार गये, उसी समय कलियुगने संसारमें प्रवेश किया। उसीके कारण मनुष्योंकी मति-गति पापकी ओर दुलक गयी ॥ 29 ॥ जबतक लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलोंसे पृथ्वीका स्पर्श करते रहे, तबतक कलियुग पृथ्वीपर अपना पैर न जमा सका ॥ 30 ॥ परीक्षित्! जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्रपर विचरण करते रहते हैं, उसी समय कलियुगका प्रारम्भ होता है। कलियुगकी आयु देवताओंकी वर्षगणनासे बारह सौ वर्षोंकी अर्थात् मनुष्योंकी गणनाके अनुसार चार लाख बत्तीस वर्षकी है ॥ 31 ॥ | जिस समय सप्तर्षि मघासे चलकर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें जा चुके होंगे, उस समय राजा नन्दका राज्य रहेगा। तभी से कलियुगकी वृद्धि शुरू होगी ॥ 32 ॥ पुरातत्त्ववेत्ता ऐतिहासिक विद्वानोंका कहना है कि जिस दिन भगवान् श्रीकृष्णने अपने परम धामको प्रयाण किया, उसी दिन, उसी | समय कलियुगका प्रारम्भ हो गया 33 ॥ परीक्षित् ! जब | देवताओंकी वर्षगणनाके अनुसार एक हजार वर्ष बीत चुकेंगे, तब कलियुगके अन्तिम दिनोंमें फिरसे कल्किभगवान्‌की कृपासे मनुष्योंके मनमें सात्त्विकताका सञ्चार होगा, लोग अपने वास्तविक स्वरूपको जान सकेंगे और तभी से सत्ययुगका प्रारम्भ भी होगा ।। 34 ।।परीक्षित्! मैंने तो तुमसे केवल मनुवंशका, सो भी संक्षेपसे वर्णन किया है। जैसे मनुवंशकी गणना होती है, वैसे ही प्रत्येक युगमें ब्राह्मण, वैश्य और शूद्रोंकी भी वंशपरम्परा समझनी चाहिये ॥ 35 ॥ राजन्! जिन पुरुषों और महात्माओंका वर्णन मैंने तुमसे किया है, अब केवल नामसे ही उनकी पहचान होती है। अब वे नहीं हैं, केवल उनकी कथा रह गयी है। अब उनकी कीर्ति ही पृथ्वीपर जहाँ-तहाँ सुननेको मिलती है ॥ 36 ॥ भीष्मपितामहके पिता राजा शन्तनुके भाई देवापि और इक्ष्वाकुवंशी मरु इस समय कलाप - ग्राममें स्थित हैं । वे बहुत बड़े योगबलसे युक्त हैं ॥ 37 ॥ कलियुगके अन्तमें कल्किभगवान्‌की आज्ञासे वे फिर यहाँ आयेंगे और पहलेकी भाँति ही वर्णाश्रमधर्मका विस्तार करेंगे ॥ 38 ॥ सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग — ये ही चार युग हैं; ये पूर्वोक्त क्रमके अनुसार अपने-अपने समयमें पृथ्वीके प्राणियोंपर अपना प्रभाव दिखाते रहते हैं ॥ 39 ॥ परीक्षित्! मैंने तुमसे जिन राजाओंका वर्णन किया है, वे सब और उनके अतिरिक्त दूसरे राजा भी इस पृथ्वीको 'मेरी-मेरी' करते रहे, परन्तु अन्तमें मरकर धूलमें मिल गये ॥ 40 ॥ इस शरीरको भले ही कोई राजा कह ले; परन्तु अन्तमें यह कीड़ा, विष्ठा अथवा राखके रूपमें ही परिणत होगा, राख ही होकर रहेगा। इसी शरीरके या इसके सम्बन्धियोंके लिये जो किसी भी प्राणीको सताता है, वह न तो अपना स्वार्थ जानता है और न तो परमार्थ । क्योंकि प्राणियोंको सताना तो नरकका द्वार है ॥ 41 ॥ वे लोग यही सोचा करते हैं कि मेरे दादा परदादा इस अखण्ड भूमण्डलका शासन करते थे; अब यह मेरे अधीन किस प्रकार रहे और मेरे बाद मेरे बेटे-पोते, मेरे वंशज किस प्रकार इसका उपभोग करें ॥ 42 ॥ वे मूर्ख इस आग, पानी और मिट्टीके शरीरको अपना आपा मान बैठते हैं और बड़े अभिमानके साथ डींग हाँकते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है। अन्तमें वे शरीर और पृथ्वी दोनोंको छोड़कर स्वयं ही अदृश्य हो जाते हैं ॥ 43 ॥ प्रिय परीक्षित्! जो-जो नरपति बड़े | उत्साह और बल-पौरुषसे इस पृथ्वीके उपभोगमें लगे रहे, उन सबको कालने अपने विकराल गालमें धर दबाया। अब केवल इतिहासमें उनकी कहानी ही शेष रह गयी है 44 ॥

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था की स्थापना

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन श्री आत्मानन्द जी महाराज ने अपने दो सहयोगियों (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) को लेकर किया। उसी समय उन्होंने (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) दोनों को एक ही साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य हंस पद अभिषिक्त किया और अपने स्वयं गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इन तीनों को गोपाचार्य हंस पदनाम नाम से जाना जाता है। ज्ञात हो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा पदनाम कहीं नहीं है। यह आत्मानन्द जी महाराज के अन्तर्मन की उपज है, जो अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता नाम है। गोपाचार्य नाम के बारे में उन्होंने स्वयं कहा है कि- गोपाचार्य नाम इसलिए इकलौता नाम है, क्योंकि यह पदनाम सिर्फ गोपों यानी यादवों के आचार्य या गुरु से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी भी व्यास पीठ, संकराचार्य या अखाड़े इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यादव कथावाचकों के अतिरिक्त और किसी का नहीं है।


संस्था के उद्देश्य एवं उसके द्वारा सृजित प्रमुख पद

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) का मुख्य उद्देश्य विद्वान गोपाचार्यों द्वारा वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारत के प्रत्येक ग्राम सभा स्तर पर राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण करना है। संस्था अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए निम्नलिखित पद सृजित किया है -

(1)- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-

राष्ट्रीय स्तर पर संस्था का एक अध्यक्ष और उसके विकल्प में एक उपाध्यक्ष पद होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्था के निर्देशन में कार्य करेगा और श्रीकृष्ण कथा की व्यवस्था व संचालन में सहयोग करेगा। इसी तरह से भारत के प्रत्येक राज्यों के लिए एक राज्य- अध्यक्ष और क्रमशः जिला- अध्यक्ष होंगे। जो राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्देशन में काम करेंगे। 
वर्तमान में इस संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही जी हैं।


(2)- मंत्री- 

 संस्था का एक मंत्री पद होगा जिसका मुख्य कार्य निम्नलिखित होगा-

(क) सहमति के आधार पर संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय-समय पर आवश्यक नियम बनाना और स्वीकृति प्रदान करना।

(ख) समयं समयं पर संस्था के पदाधिकारियों की बैठकों का आयोजन करना तथा उनके कार्यों की समीक्षा करके राष्ट्रीय अध्यक्ष (संस्था प्रमुख) को सूचित करना।

(ग) संस्था के पदाधिकारिओं और सदस्यों की प्रत्येक गतिविधियों पर पैनी नजर रखना मंत्री पद का मुख्य कार्य होगा। यदि कोई पदाधिकारी या सदस्य संस्था के नियमों के विपरीत कार्य करता है या कोई ऐसा षड्यंत्र रचता है जिससे संस्था की गरिमा प्रभावित हो सकती है, तो मंत्री को यह सर्वाधिकार होगा कि ऐसे सदस्य को राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति से उसकी सदस्यता और उसके पद से बिना देरी किए तत्काल प्रभाव से हटा सकता है। वर्तमान में इस संस्था के मंत्री- श्री श्रवण कुमार यादव जी हैं।


(3)- कोषाध्यक्ष-  

संस्था का एक धनकोष होगा जो भारत के किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में संस्था के नाम से एक खाता के रूप में होगा। जिसकी निगरानी यादव (गोप) समाज का एक पदेन कोषाध्यक्ष करेगा। संस्था के बैंक खाते से धन तभी निकला जा सकेगा जब कोषाध्यक्ष सहित संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मंत्री और कोई एक गोपाचार्य हंस, इन तीनों का एक साथ हस्ताक्षर होगा। 

संस्था के धन की आय-व्यय की आडिट वर्ष में एक बार संस्था की "निगरानी समिति" द्वारा की जाएगी जिसमें संस्था के पांच पदेन सदस्य- राष्ट्रीय अध्यक्ष, एक गोपाचार्य हंस, एक गोपाचार्य, कोषाध्यक्ष, और मंत्री होंगे। वर्तमान में इस संस्था के कोषाध्यक्ष- श्री पंकज सिंह यादव हैं।



(4)- संस्था के पदेन कथावाचक-

 वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करने के लिए संस्था अनिवार्य रूप से यादव समाज से (दो) तरह के कथावाचकों का चयन करेगी जो पूरी तरह से संस्था के नियमों से प्रतिबद्ध होंगे।

(क)- पहले प्रकार के कथावाचकों में गोपाचार्य हंस होंगे जो श्रीकृष्ण कथा के समय दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता रखते हो अर्थात् परम् सत्य की वास्तविकता का बोध कराने की क्षमता रखते हों। गोपाचार्य हंस संस्था के नियमानुसार सफेद वस्त्र व सफेद पगड़ी या साफा को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों और उनके परम् स्वरुप तथा उनकी लीलाओं इत्यादि का वर्णन करेंगे।  अभी वर्तमान में केवल तीन गोपाचार्य हंस- श्री आत्मानन्द जी, श्री योगेश कुमार रोही और श्री माता प्रसाद जी हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ सकती है।




(ख)- 

 दूसरे प्रकार के कथावाचक "गोपाचार्य" होंगे जो ज्ञान, अनुभव और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों को जानने से थोड़ी बहुत पीछे रह गए हैं किन्तु संस्था के प्रति अत्यधिक समर्पित हैं, वे सभी गोपाचार्य होंगे और गोपाचार्य हंस की अनुपस्थिति में संस्था के नियमानुसार हल्के पीले रंग वस्त्र व पगड़ी को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण की कथा कहेंगे। 

भविष्य में तीन गोपाचार्य हंसों के द्वारा इनके ज्ञान और अनुभव की परीक्षा लेकर इनको भी गोपाचार्य हंस पद पर अभिषिक्त किया जा सकेगा। वर्तमान में 15 से अधिक गोपाचार्य हैं।


(5)- संस्था के सदस्य-

संस्था के अनंत सदस्य होंगे जो हर वर्ग से होंगे। इनकी कोई निश्चित सीमा नहीं होगी। जो भी श्रीकृष्ण भक्त स्वेच्छा से संस्था सदस्यता लेना चाहते हैं वे कम से कम 1000₹ की सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ले सकते है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अधिक सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ग्रहण करना चाहता है तो उसके लिए संस्था आभार प्रकट करेगी। प्रत्येक सदस्यता ग्रहण करने वाले सदस्यों को सदस्यता प्रमाण पत्र के साथ एक अच्छा सा पहचान पत्र भी मिलेगा जो मौके पर गले मे धारण करने योग्य होगा।

 कोई भी व्यक्ति संस्था की सदस्यता ग्रहण कर सकता है किन्तु संस्था को यह आशंका हो जाए कि वह व्यक्ति संस्था के प्रति उतना समर्पित नहीं है जितना चाहिए। तो ऐसे व्यक्ति को किसी (दो) सोशल मीडिया (ह्वाट्सएप और फेसबुक) पर प्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा करनी होगी कि- 
"मैं......आज दिनांक....को परमेश्वर श्रीकृष्ण को शाक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित होकर काम करूँगा तथा संस्था के प्रत्येक नियमों का अक्षरशः पालन करूँगा"। 
उसके उपरांत संस्था उसकी सदस्यता स्वीकार करेगी और भविष्य में आवश्कतानुसार उसे किसी पद पर भी अभिषिक्त कर सकेगी।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

पण्डित और राँड़ का मेल -

ब्राह्मणों के लिए पण्डित शब्द का सम्बोधन उसी प्रकार रूढ़ हो गया जैसे किसी विधवा के लिए राड़़ शब्द का सम्बोधन रूढ़ हुआ। परन्तु प्रत्येक ब्राह्मण पण्डित नहीं होता और प्रत्येक विधवा ( राँड़) रण्डिका (रड़िया) नहीं होती है। दर असल राँड़ का मूल रूप (तत्सम) रण्डिका है और  रण्डिका रण्डी ( वेश्या) का पर्याय है।

पण्डित शब्द के अर्थ में गीता के सन्दर्भ विचारणीय हैं।

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।5.18।।
 
पण्डित जन  विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी आत्मा रूप मे समानता  को देखनेवाले होते हैं

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
श्रीमद भगवदगीता – (4.19 )

अर्थ: जिसके सम्पूर्ण कर्म बिना इच्छा और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं ॥

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 11वां श्लोक है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: "ज्ञानी (पंडित) लोग न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं और न ही मृतों के लिए, क्योंकि आत्मा अजर-अमर है।" यह ज्ञान, जीवन और मृत्यु की अनित्यता को समझते हुए मोह और शोक से ऊपर उठने की शिक्षा देता है।
श्लोक और अर्थ:
  • मूल श्लोक: अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
  • अर्थ: हे अर्जुन! तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं (भीष्म, द्रोण आदि), और ज्ञान की बातें भी कर रहे हो। जो बुद्धिमान (पंडित) हैं, वे गतासून् (जिनके प्राण चले गए हैं - मृत) और अगतासून् (जिनके प्राण नहीं गए हैं - जीवित) के लिए शोक नहीं करते।
प्रमुख बिंदु:
  • आत्मा अमर है: पण्डित उसे कहते हैं जो शरीरी (आत्मा) की अमरता और शरीर की नश्वरता को जानता है।
  • अनावश्यक शोक: जीवन और मृत्यु प्रकृति के नियम हैं, अतः इनके लिए विलाप करना मूर्खता है।
  • ज्ञान की बात: पंडित ज्ञानी की बातें तो करते हैं लेकिन वे इन भावनाओं से ऊपर उठे होते हैं। 



इस प्रकार सारे ब्राह्मण पण्डित नहीं होते-

इसी क्रम में राँड़ के  संस्तृत सन्दर्भ-
रण्डा = वेश्या । राँड् इति भाषा ॥  यथा ।  तिष्ठते रण्डा विकर्म्मस्थेभ्यः स्वहृदयं व्यनक्तीत्यर्थः । इति संक्षिप्तसारे तिङन्तपादः ॥