रविवार, 8 फ़रवरी 2026

भगवद्गीता 4:13 — वर्ण व्यवस्थाश्लोक (संक्षेप):चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः…हिंदी अर्थ:मैंने चार वर्णों की रचना गुण और कर्म के आधार पर की है।🔍 विवाद क्यों?

📌 1. भगवद्गीता 4:13 — वर्ण व्यवस्था
श्लोक (संक्षेप):
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः…
हिंदी अर्थ:
मैंने चार वर्णों की रचना गुण और कर्म के आधार पर की है।
🔍 विवाद क्यों?
कुछ लोग इसे जन्म आधारित जाति व्यवस्था का समर्थन मानते हैं, जबकि कई विद्वान कहते हैं कि यह कर्म आधारित सामाजिक वर्गीकरण था, जन्म से नहीं।
📌 2. भगवद्गीता 9:32 — स्त्री और शूद्र पर टिप्पणी
श्लोक (संक्षेप):
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
हिंदी अर्थ:
हे अर्जुन! जो भी मेरी शरण लेते हैं — चाहे वे स्त्रियाँ हों, वैश्य हों या शूद्र — वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
⚠️ विवाद क्यों?
“पापयोनय:” शब्द के कारण इसे अपमानजनक समझा गया। समर्थक कहते हैं — गीता यहाँ भेद मिटाने की बात कर रही है, विरोधी इसे सामाजिक हीनता का प्रमाण मानते हैं।
📌 3. भगवद्गीता 18:41 — जन्म से पेशा?
श्लोक (संक्षेप):
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
हिंदी अर्थ:
चारों वर्णों के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार निर्धारित किए गए हैं।
⚔️ विवाद क्यों?
कुछ इसे जन्म से काम तय करने का धार्मिक आधार मानते हैं — जबकि दूसरे कहते हैं यह प्राकृतिक क्षमता पर आधारित था, न कि जाति पर।
📌 4. भगवद्गीता 2:47 — कर्म करो, फल मत सोचो
श्लोक (संक्षेप):
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
हिंदी अर्थ:
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।
💥 विवाद क्यों?
आलोचक कहते हैं इससे शोषित वर्ग को “फल मत मांगो, बस काम करो” का उपदेश देकर अन्याय को正 ठहराया गया।
📌 5. भगवद्गीता 16:7 — विद्रोह पर दृष्टिकोण
श्लोक (संक्षेप):
नासौ शौचं न चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते…
हिंदी अर्थ:
आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों में न पवित्रता होती है, न सही आचरण, न सत्य।
🔥 विवाद क्यों?
कई बार सत्ता विरोध या सामाजिक विद्रोह को “आसुरी प्रवृत्ति” कहकर दबाने में इसका उपयोग हुआ।
⚖️ निष्कर्ष (साफ शब्दों में)
👉 गीता का मूल संदेश आध्यात्मिक है
👉 लेकिन इतिहास में इन श्लोकों की ऐसी व्याख्याएँ की गईं जिनसे जातिवाद और असमानता को बल मिला
👉 इसलिए आज ये श्लोक धार्मिक कम और सामाजिक बहस ज़्यादा बन चुके हैं

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

योगेश रोहि का जीवन परिचय-

भारतीय अध्यात्म- दर्शन व उपनिषद तथा वेद एवं पुराणों के सम्यक अध्येता गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि- का (जन्म-10 मार्च 1983 ईस्वी सन् को  ग्राम दभारा-पत्रालय फरिहा-जिला फिरोजाबाद) में  हुआ । परन्तु ग्राम आजादपुर पत्रालय पहाड़ीपुर ज़िला अलीगढ़) इनकी कर्मभूमि और साधना स्थली रही ,जो कि इनकी माता जी का जन्म स्थान और इनकी ननिहाल है। पिता श्रीपुरुषोतम सिंह" कृषक होने के साथ साथ एक प्राइमरी जूनियर अध्यापक भी रहे, जो गणित इतिहास" साहित्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समन्वित थे।

श्रीम‌द्भगवद्‌गीता का सांख्ययोग और भक्तियोग मूलक तथ्यो की व्याख्या तथा मन बुद्धि और आत्मा के स्वरूप की अर्थ समन्वित व्याख्या योगेश कुमार रोहि जी को जीवन के निर्माण की प्रक्रिया के यथार्थ बोध के सन्निकट प्रतीत हुई। परिणाम स्वरूप आपको श्रीम‌द्भगवद्‌गीता के अनुशीलन से जीवन की एक सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त हुई।

प्राचीन भारतीय संस्कृति के अन्वेषक, अध्येता होने के साथ साथ आप भारतीय शास्त्रों में विशेषतः भारतीय दर्शन वैशेषिक, सांख्य,  योग और वेदान्त के सै‌द्धान्तिक विवेचक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने में सफल हुए इसके लिए आपने भारतीय पुराणों का सम्यक् अनुशीलन करना ही उचित समझा  ।

महाभारत" वाल्मीकि रामायण आदि महाकाव्यो के अतिरिक्त आपने भारतीय आध्यात्मिकता के दिग्दर्शन उपनिषदों के सम्यक अध्येता के रूप में जीवन का अधिकांश समय व्यतीत किया है। योगेश कुमार रोहि" के सतत् अध्ययन ने दीर्घ काल तक अपने गृह क्षेत्र में ही रहकर भारतीय संस्कृति के अतिरिक्त विश्व की भारोपीय संस्कृतियों के समता मूलक तथ्यों के शोध का कार्य प्रशस्त किया है।

भाषा विज्ञान के क्षेत्र में आपकी पकड़ अधिक प्रसंशनीय है। आपके भाषा अध्ययन के विषय भारत और यूरोप की प्राचीन सांस्कृतिक भाषाएँ रहीं जिसमे संस्कृत ,ग्रीक, लैटिन, और फ्रॉञ्च आदि की शब्द व्युत्पत्ति (Etymology) में गहन रूचि थी 

एक मध्यम किसान परिवार में जन्म, फिर सत्संग से जुड़ाव, फिर लगातार अध्ययन,और  समाज के साथ आपके अनवरत वैचारिक विमर्श ने जीवन को अनुभवों की एक नव्यता प्रदान की है। 

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मजदूरों की डायरी- प्रतिलिपि







विजेन्द्र मिस्त्री का हिसाब १२ जनवरी तक पूर्ण हुआ - 
उन पर ३०० रुपए अतिरिक्त पहुँचे।



१२ जनवरी तक उनका हिसाब फाइनल हुआ 
मुकेश पर ४२५ रुपये अतिरिक्त पहुँचे-


१३- जनवरी को सभी की नागा- लुक्का को १०० रुपये दिए। 

१४- जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम(#) विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला- 


१५ जनवरी को नागा- केवल दुपहर तक लुक्का का काम चला- १०० लुक्का को रुपये दिये-

१६- जनवरी की नागा-

१७- जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला- 
इसी दौरान विजेन्द्र मिस्त्री को ५०० रुपये दिए।(#)


१८- जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला-
इसी दौरान मुकेश को ५०० रुपये दिए।
लुक्का को भी १०० रुपये दिए।(#)


१९- जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला- इसी दौरान मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री को क्रमश ५०० और १००० रुपये दिए। तथा लुक्का को १००० रुपये दिए गये।(#)


२० जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला- इसी दौरान मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री को  पेट्रोल के लिए २०० रुपये दिए।(#)

२१ जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला- इसी दौरान मुकेश को २०० और विजेन्द्र मिस्त्री को ५०० रुपये दिए। (#)



२२ जनवरी को नागा- परन्तु २०० रुपये लुक्का ने लिए

२३ जनवरी की नागा-

२४ जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला-(#)

२५ जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम विजेन्द्र मिस्त्री के साथ चला- इसी दौरान मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री को क्रमश १००० - और १००० रुपये दिए। (#)

२६ जनवरी को नागा- होते हुए भी लुक्का ने १०० रुपये लिए।

२७ जनवरी की नागा-

२८ जनवरी की नागा-

२९ जनवरी को लुक्का और मुकेश का काम चला इसी दौरान मुकेश को ५०० रुपये और विजेन्द्र मिस्त्री को १५०० रुपये दिए। लुक्का को ५०० रुपये दिए जो भोजन व्यवस्था में व्यय हुए।*****(#)



३० जनवरी को नागा- होते हुए भी लुक्का ने १०० रुपये लिए। 

१- फरवरी की नागा-

२-फरवरी को मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री को शराब हेतु २०० रुपये दिए। ठाकुर जी बरला वाले का मुकेश के साथ काम चला-(#)

३- फरवरी को ठाकुर जी को ९०० रुपये दिए। मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री को क्रमश १००० और १००० हजार रुपए दिए। (#)

३- फरवरी को लुक्का की नागा होते हुए भी १०० रुपये दिए 

४ फरवरी को मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री के साथ ठाकुर जी बरला का काम चला-
इसी दौरान मुकेश को १००० रुपये दिए गये।(#)


५ फरवरी को मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री के साथ ठाकुर जी बरला का काम चला-
इसी दौरान ठाकुर जी बरला को ९०० रुपये दिए। (#)


६ फरवरी की नागा होने पर भी ५०० विजेन्द्र मिस्त्री को दिए फोन वे द्वारा- इसी समय लुक्का को २०० रुपए दिए उधार-


७ फरवरी नागा-

८ फरवरी नागा- होते हुए भी मुकेश ने 800 रुपये लिए।


********************************
लुक्का पर अबतक 6300 रुपये पहुँचे-
और 28 दिन की ड्यूटी- 28×400=11200-
4900 रुपये लुक्का को 4 फरवरी को दिए गये।


मुकेश और विजेन्द्र मिस्त्री की 3 फरवरी तक 11 ड्यूटी-
विजेन्द्र मिस्त्री के 11 ड्यूटी के

400 रुपये काट कर 1950 रुपये शेष रहे।


---------------------++++++++++++------केबिल पर

(53) फण्टी केबिल पर गयीं 7 फरवरी को

3 गाटर आठ फुटा-




बुधवार, 28 जनवरी 2026

आह्लाद- उदयबल

भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय ४ 

देशराज एवं वत्सराज आदि राजाओं का आविर्भाव -
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सूतजी ने कहा — भोजराज के स्वर्गारोहण के पश्चात् उनके वंश में सात राजा हुए, किन्तु अल्पायु होने के नाते उन भाग्यहीनों का राजकाल तीन सौ वर्ष के भीतर ही समाप्त हो गया और वे स्वर्गीय होते गये। 

उनके राज्य के अन्तर्गत छोटे-छोटे अनेक राजा हुए । उनके कुल के सातवें राजा का नाम वीरसिंह बताया जाता है । उनके कुल के तीन राजा दो सौ वर्ष के अन्तर्गत स्वर्गीय हो गये थे । दशवें राजा का नाम गंगा सिंह बताया जाता है, जिसने कल्पक्षेत्र में अपने राज्य का धर्मतः उपभोग किया है । अन्तर्वेदी नामक कान्यकुब्ज प्रदेश में जयचन्द्र नामक राजा हुआ तथा इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) में तोमर कुलभूषण अनंगपाल नामक राजा हुआ । इसी भाँति ग्राम-राष्ट्रपाल (जमीदार-तालुकेदार) के रूप में अनेक राजा हुए अग्निवंश का बलवत्तर विस्तार हुआ है । पूर्व में कपिलाश्रम (गङ्गासागर), पश्चिम में वाहीकान्त उत्तर में चीन के अन्त तक और दक्षिण में सेतुबन्ध तक विस्तृत भूमि में साठ लाख बलवान ग्रामाधिप (जमीदार-तालुकेदार) हुए हैं, जो अग्निहोत्र करने वाले तथा गो-ब्राह्मण के हितैषी थे । उन धर्मकुशल राजाओं के समय में द्वापर के समान ही धर्म का प्रचार था, इसी से सभी स्थानों में द्वापर के समय का ही अनुभव हो रहा था । सभी घरों में धन था, प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक थे, गाँव-गाँव में देवता प्रतिष्ठित थे और देश-देश में यज्ञानुष्ठान का महारम्भ हुआ था । उस समय चारों ओर म्लेच्छ राजा आर्य-धर्म के ही अनुयायी थे ।

इसे देखकर घोर कलि म्लेच्छ समेत अत्यन्त भीरु होकर नीलाञ्चल पर पहुँचकर उस बुद्धिमान् ने भगवान् की शरण ली । वहाँ उसने बारह वर्ष तक ध्यानयोग किया-अपने ध्यान में सच्चिदानन्द एवं सनातन भगवान् कृष्ण को देखकर उसने राधा समेत उन भगवान् को मानसिक स्तुति द्वारा प्रसन्न किया जो पुराण (प्राचीन) रूप, अजर और नित्य वृन्दावन में निवास करते हैं । कलि ने कहा — स्वामिन् ! मेरे किये हुए साष्टांग दण्डवत् को आप स्वीकार करें । कृपानिधान ! मैं आपके चरण की शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये । आप समस्त पापों के नाशक तथा समस्त काल रूप भगवान् हैं । आप का रूप सत्ययुग में गौर, त्रेता में रक्तवर्ण, द्वापर में पीतवर्ण और मेरे समय सौभाग्यवश आप कृष्णरूप हैं । 

मेरे पुत्र जिन्हें म्लेच्छ कहा जाता है, आर्यधर्म के अनुयायी हो गये हैं । स्वामिन् ! मेरे लिए चार घरों का निर्माण किया गया है — द्यूत (जूआ खेलने का स्थान) मद्य का स्थान, सुवर्ण-स्थान, और स्त्रियों के हास्य। इन्हें अग्निवंश के क्षत्रियों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है । जनार्दन ! मैं इस समय देह, कुल और राष्ट्र का त्यागकर आपके चरणकमल में स्थित हूँ । यह सुनकर भगवान् कृष्ण ने मन्दमुस्कान करते हुए कहा — कले ! तुम्हारी रक्षा के लिए महाबली मैं उत्पन्न होऊँगा । वहाँ मेरा अंश भूतल में पहुँचकर उन बलशाली राजाओं का विनाश करके महीतल में म्लेच्छ वंश के राजाओं की प्रतिष्ठा करेंगे। इतना कहकर भगवान् उसी स्थान पर अन्तर्हित हो गये और म्लेच्छ समेत कलि को परम आनन्द की प्राप्ति हुई ।
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उस बीच विप्र ! जो घटना घटी मैं बता रहा हूँ, सुनो ! बाक्सर (बक्सर) नामक गाँव में एक व्रतपा नाम की आभीरी (अहीराणी) रहती थी, जिसने नव वर्ष तक अनवरत श्रीदुर्गा जी की उपासना की थी । प्रसन्न होकर उससे चण्डिका देवी ने कहा — शोभने ! वर की याचना करो । आभीरी ने कहा — मातः ! यदि आपको वर प्रदान करना है, तो ईश्वरि (स्वामिनि) मेरे कुल में बलराम और कृष्ण के समान दो बलशाली बालकों की उत्पत्ति हो ।’ इसे स्वीकार करके देवी उसी स्थान पर अन्तर्हित हो गई । वसुमान् नामक एक राजा ने उसके रूप-लावण्य पर मुग्ध होकर उसके साथ धार्मिक विवाह संस्कार सुसम्पन्न करके उसे अपने महल में रख लिया । उस राजा के उस रानी द्वारा ज्येष्ठ देशराज और कनिष्ठ वत्सराज नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए, जो सौ हाथी के समान बलवान् थे । उन दोनों ने मगध के राजा पर विजय प्राप्तकर वहाँ के राजा हो गये ।

वनरस के अधिपति शतयत्त (सैयद) नामक म्लेच्छ अत्यन्त शूर था । उसके शिव की आज्ञावश भीमसेन के अंश से उत्पन्न, वीरण नामक पुत्र हुआ । एक म्लेच्छ ताड़ के बराबर ऊँचाई तक कूदता था इसीलिए उसका तालन नाम रखा गया था । उस समय उससे सैयद का रोमांचकारी युद्ध आरम्भ हुआ । उसमें बलवान् होने के नाते तालन की विजय हुई । पश्चात्, आपस में मित्रता करके वे तीनों शूर जयचन्द्र की परीक्षा के लिए उनके यहाँ गये । (अध्याय ४) 


एतस्मिन्नन्तरे विप्र यथा जातं शृणुष्व तत् ।।
आभीरी वाक्सरे ग्रामे व्रतपा नाम विश्रुता ।।२२।।
अनुवाद- इसके उपरान्त( मध्य ) हे ब्राह्मण जो हुआ वह सुन ! बक्सर (आधुनिक बिहार का एक जिला) नामक गाँव में एक व्रतपा नामकी अहीराणी प्रसिद्ध थी।२२।

नवदुर्गाव्रतं श्रेष्ठं ? नववर्षं चकार ह ।।
प्रसन्ना चण्डिका प्राह वरं वरय शोभने ।।२३ ।।
अनुवाद- उसने नवदुर्गा का व्रत नौ वर्ष तक किया तत्पश्चात प्रसन्न हो कर देवी दुर्गा ने उससे कहा हे प्रिया ! वरदान माँग ।२३।

साह तां यदि मे मातर्वरो देयस्त्वयेश्वरि।।
रामकृष्णसमौ बालौ भवेयाः ममान्वये।।२४ ।।
अनुवाद- तब व्रतपा ने कहा ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो हे देवी बलराम और कृष्ण के समान दो पुत्र मेरे वंश में उत्पन्न हों ।२४।

तथेत्युक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत।।
वसुमान्नाम नृपतिस्तस्या रूपेण मोहितः।।२५।।
अनुवाद - ऐसा ही हो कहकर वह देवी अन्तर् ध्यान हो गयी  वसुमान नामक राजा ने उस व्रतपा के रूप पर मोहित होकर उसके साथ विवाह किया।२५।
 
उद्वाह्य धर्मतो भूपः स्वगेहे तामवासयत् ।।
तस्यां जातौ नृपात्पुत्रौ देशराजस्तु तद्वरः।२६।।
अनुवाद:-विवाह कर धर्म पूर्वक वह राजा उसे अपने घर ले जाकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगा। उस व्रतपा के गर्भ से उस वसुमान राजा के दो श्रेष्ठ पुत्र देशराज और वत्सराज हुए  ।२६।

आवार्य वत्सराजश्च शतहस्तिसमो बले ।।
जित्वा तौ मागधान्देशान्राज्यवन्तौ बभूवतुः।२७।।
अनुवाद- उन दोनों ( व्रतपा और वसुमान) उत्पन्न हुए उन दोनों नें  मगध( पश्चिमी बिहार) को जीतकर उस पर शासन किया ।२७।

इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहासमुच्चये चतुर्थोऽध्यायः।।४।।



भविष्यपुराणम् /पर्व ३ (प्रतिसर्गपर्व)/खण्डः ३/अध्यायः ०९

             ।। सूत उवाच ।। 
कालियं तौ पराजित्य भ्रातरौ नृपसेवकौ ।।
गतौ गोपालके राष्ट्रे भूपतिर्दलवाहनः ।।१।।


सहस्रचण्डिकाहोमे नानाभूपसमागमे ।।
गृहीतौ महिषौ ताभ्यां भूपैरन्यैश्च दुर्जयौ ।। २ ।।


पूर्वं हि नृपकन्याभ्यां प्रत्यहं बन्धनं गतौ ।।
तौ सम्पूज्य विधानेन ददौ ताभ्यां च कन्यके ।।३।।


देवकीं देशराजाय ब्राह्मीं तस्यानुजाय वै ।।
ददौ दुर्गाज्ञया राजा रूपयौवनशालिनीम् ।। ४ ।।


लक्षावृत्तिं तथा वेश्यां गीतनृत्यविशारदाम् ।।
कन्ययोश्च सखीं रम्यां मेघमल्लाररागिणीम् ।।५।।


शतं गजान्रथान्पञ्च हयांश्चैव सहस्रकान् ।।
चत्वारिंशच्च शिबिकाः प्रददौ दलवाहनः ।। ६ ।।


बहुद्रव्ययुतां कन्यां दासदासीसमन्विताम् ।।
उदूह्य वेदविधिना प्रापतुश्च महावतीम् ।। ७ ।।


मलना तां वधूं दृष्ट्वा तस्यै ग्रैवेयकं ददौ ।।
ब्राह्म्यै षोडशशृंगारं तथा द्वादशभूषणम् ।।८।।


राजा च परमानन्दी देशराजाय शूरिणे ।।
ददौ दशपुरं रम्यं नानाजननिषेवितम् ।। ९ ।।


ऊषतुस्तत्र तौ वीरौ राजमान्यौ महाबलौ ।।
एतस्मिन्नन्तरे जातो देवसिंहो हराज्ञया ।। 3.3.9.१० ।।


जाते तस्मिन्कुमारे तु देवकी गर्भमादधौ ।।
दासश्रुता पतेर्देवी सुषुवे पुत्रमूर्जितम् ।। १ १।।


गौरांगं कमलाक्षं च दीप्यमानं स्वतेजसा ।।
तदानंदमयो देवः शक्रः सुरगणैः सह ।। १२ ।।


शंखशब्दं चकारोच्चैर्जयशब्दं पुनःपुनः ।।
दिशः प्रफुल्लिताश्चासन्ग्रहाः सर्वे तथा दिवि ।।१३।।


आयाता बहवो विप्रा वेदशास्त्रपरायणाः ।।
चक्रुस्ते जातकर्मास्य नामकर्म तथाविधम् ।।१४।।


रामांशं तं शिशुं ज्ञात्वा प्रसन्नवदनं शुभम् ।।
भाद्रकृष्णतिथौ षष्ठ्यां चन्द्रवारेऽरुणोदये ।।१५।।


संजातः कृत्तिकाभे च पितृवंशयशस्करः ।।
आह्लादनाम्ना ह्यभवत्प्रश्रितश्च महीतले ।। १६ ।।


मासान्ते च सुते जाते ब्राह्मी पुत्रमजीजनत् ।।
धर्मजांशं तथा गौरं महाबाहुं सुवक्षसम् ।। १७ ।।


तदा च ब्राह्मणाः सर्वे दृष्ट्वा बालं शुभाननम् ।।
प्रसन्नवदनं चारुं पद्मचिह्नपदस्थितम् ।। १८ ।।


तैर्द्विजैश्च कृतो नाम्ना बलखानिर्महाबलः ।।
वर्षान्ते वत्सजे जातं मूलगण्डान्तसम्भवः ।।१९ ।।


चामुण्डो देवकिसुतो निजवंशभयंकरः ।।
जनितारं ततस्त्याज्य इत्यूचुर्द्विजसत्तमाः ।।
न तत्याज सुतं राजा बालत्वेऽपि दयापरः ।। 3.3.9.२० ।।


त्रिवर्षांते गते तस्मिन्बलखानौ सुते शुभे ।।
शूद्र्यां जातः शिखण्डयंशो रूपणो नाम विश्रुतः ।। २१ ।।


वत्सराजो ययौ देशे गुर्जरे च मदालसाम्।
स सुतां च समादाय दिने तस्मिन्समागतः ।। २२।।


प्राप्ते तस्मिन्वत्सराजे जम्बुकः स्वबलैर्वृतः ।।
सप्तलक्षैश्च संप्राप्तो बाहुशाली यतेंद्रियः ।। २३ ।।


रुरोध नगरीं सर्वां राज्ञः परिमलस्य वै ।।
त्रिलक्षैश्च माहावत्यै सार्द्धं तौ जग्मतुः पुरात् ।। २४।।


माहिष्मतैः सप्तलक्षैः सार्द्धं युद्धमभून्महत् ।।
त्रिरात्रं दारुणं घोरं यमराष्ट्रविवर्द्धनम् ।। २५ ।।


शिवस्य वरदानेन भ्रात्रोर्जातः पराजयः ।।
बद्ध्वा तौ जम्बुको राजा लुण्ठयित्वा महावतीम् ।। २६ ।।


वेश्यां लक्षारतिं तस्य तं हतं तद्गजं तथा ।।
ग्रैवेयकं तथा हारं मणिरत्नविभूषितम् ।।२७।।


गृहीत्वा नगरीं सर्वां भस्मयित्वा गृहं ययौ ।।
ये गुप्ता भूतले शूरास्ते शेषाश्च तदाऽभवन् ।।२८।।


दुर्गेषु यानि रत्नानि तानि प्राप्य मुदा ययौ ।।
लुंठिते नगरे तस्मिन्देवकी गर्भमुत्तमम् ।। २९ ।।


कृष्णांशं सप्तमास्यं हि चादधाद्दैवतप्रिया ।।
ज्ञात्वा कुलाधमं पुत्रं चामुण्डं देवकी सती ।। 3.3.9.३० ।।


कल्पक्षेत्रं समागम्य कालिन्द्यां तमपातयत्।।
योजनान्ते गते तस्मित्महीराजपुरोहितः ।।३१।।


सामन्तो नाम तं गृह्य श्वशुरालयमाययौ ।।
जातस्तु दशमासान्ते रात्रौ घोरतमोवृते ।। ३२ ।।


भाद्रकृष्णाष्टमीसौम्ये ब्राह्मनक्षत्रसंयुते ।।
प्रादुरासीज्जगन्नाथो देवक्यां च महोत्तमः ।। ३३ ।।


श्यामांगः स च पद्माक्ष इंद्रनीलमणिद्युतिः ।।
विमानानां सहस्राणां प्रकाशः समजायत ।। ३४ ।।


विस्मिता जननी तत्र दृष्ट्वा बालं तमद्भुतम् ।।
नगरे च महाश्चर्यं जातं सर्वे समाययुः ।। ३५ ।।


उदयः किमहो जातो देवानां सूर्यरूपकः ।।
इत्याश्चर्य्यजुजां तेषां वागुवाचाशरीरिणी ।। ३६ ।।


कृष्णांशो भूतले जातः सर्वानन्दप्रदायकः ।।
स नाम्नोदयसिंहो हि सर्वशत्रुप्रकाशहा ।। ३७ ।।


इत्याकाशवचः श्रुत्वा ते परं हर्ष माययुः ।।
यस्मिन्काले सुतो जातस्तदा च मलना सती ।।३८।।


श्यामांगं सुन्दरं बालं सर्वलक्षणलक्षितम् ।।
सुषुवे परमोदारं फाल्गुनांशं शिवाज्ञया ।। ३९ ।।


तदा तु नगरी सर्वा हर्षभूता बभूव ह ।।
षष्ठाहनि सुते जाते ब्रह्मानन्दगुणाकरे ।। 3.3.9.४० ।।


ब्राह्मी तु सुषुवे पुत्रं पार्षदांशं महाबलम् ।।
श्यामांगं कमलाक्षं च दृढस्कन्धं महाभुजम् ।।४१।।


ब्राह्मणाश्च तदागत्य जातकर्म ह्यकारयन् ।।
सुखखानिर्द्विजैर्नाम्ना कृतस्तु गणकोत्तमैः ।।४२।।


क्रमेण वर्द्धिता बालाः सर्वलोकशिवंकराः ।।
तेषां काली महच्छ्रेष्ठा पितृमातृप्रियंकरी ।। ४३ ।।


तृतीयाब्दे वयः प्राप्ते कृष्णांशे बलवत्तरे ।।
शक्रस्तद्दर्शनकांक्षी हयारूढो जगाम ह ।। ४४ ।।


क्रीडन्स चन्दनारण्ये कृष्णांशो भ्रातृभिः सह ।।
नभस्थं पुरुषं दृष्ट्वा सहस्राक्षं जहास वै ।। ४५ ।।


अश्विनी हरिणी दिव्या उच्चैःश्रवसमन्तिके ।।
गत्वा गर्भमुपादाय स्वगेहं पुनराययौ ।। ४६ ।।


वर्षांतरे च सुषुवे कपोतं तनयं शुभम् ।।
पञ्चाब्दं च समायाते विद्याध्यनमास्थिताः ।।४७।


ब्राह्मणं शिवशर्माणं सर्वविद्याविशारदम् ।।
स्वभक्त्या सेवनं कृत्वा ते चक्रुर्वेदपाठिकाम् ।। ४८ ।।


अष्टाब्दे चैव कृष्णांशो नामपत्रादिकां क्रियाम् ।।
लिखतां बालकानां च कृष्णांशः श्रेष्ठतामगात् ।। ४९ ।।


इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहाससमुच्चये कृष्णांशावतारो नाम नवमोऽध्यायः ।। ९ ।।

भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय ९ कृष्णांश ‘आह्लाद’ (आल्हा) का जन्म-

सूत जी बोले — राज-सेवक दोनों भाइयों ने कालिय (करिया) को पराजित करके गोपालपुर राज्य( ग्वालियर) के अधीश्वर यादव राजा दलवाहन के यहाँ प्रस्थान किया । वहाँ सहस्र चण्डी के अनुष्ठान में हवन का आरम्भ होने जा रहा था, जिसमें अनेक राजागण उपस्थित थे । इन दोनों भाइयों ने (देवी के बलिदानार्थ) उपस्थित उन भैंसों को पकड़कर अपने अधीन कर रखा था जिन्हें अन्य कोई राजा नहीं पकड़ सकता था । राजा की दोनों कन्याओं ने उन्हें पहले ही बाँध रखा था । प्रसन्न होकर राजा ने अपनी दोनों कन्याएँ इन दोनों भाइयों को प्रदान किया । देवकी(दिवला) देशराज को और ब्राह्मी वत्सराज को देकर दुर्गा जी की आज्ञा से उन रूप यौवनशालिनी कन्याओं का पाणिग्रहण संस्कार सविधान सुसम्पन्न कराया। 

उन कन्याओं के साथ लक्षावृत्ति नामक वेश्या, जो नृत्य एवं गान में अत्यन्त निपुण थी, और मेघ मल्हार राग गाने वाली उसकी सुन्दरी सखियाँ भेजी गई तथा सौ हाथी, पाँच सहस्र घोड़े और चालीस पालकी भी राजा दलवान( दलवाहन) ने सप्रेम प्रदान किया । अत्यन्त धनराशि और अनेक दास दासी गणों समेत उन कन्याओं को लेकर सविधान विवाह हो जाने के उपरान्त अपनी महावती पुरी में वे दोनों भाई चले आये । मलना ने उस वधू को देखकर वह अमूल्य (नौलखा) हार, ब्राह्मी को सोलह शृंगार तथा बारह आभूषण प्रदान किया। परमानन्द मग्न होकर राजा परिमल ने दश गाँव जिसमें भाँति-भाँति की जाति के मनुष्य अधिक संख्या में रह रहे थे, वीर देशराज को प्रदान किया । उसी स्थान में ये दोनों पराक्रमी भाई रहने लगे । शिव की आज्ञावश जिस समय देवसिंह ने जन्म ग्रहण किया उसी समय देवकी ने गर्भधारण किया था, समय पाकर गौरवर्ण, कमल नेत्र एवं अपनी आभा से देदीप्यमान सन्तान के उत्पन्न होते ही देवताओं के सहित इन्द्र आनन्दित हुए । शंखों की ध्वनि और बार-बार जय शब्द होने लगे । दिशाएँ हरी-भरी दिखाई देने लगी, उसी भाँति आकाश में ग्रहगण प्रसन्नता प्रकट कर रहे थे । वेद-शास्त्र के पारगामी अनेक ब्राह्मण विद्वानों ने वहाँ एकत्र होकर उस शिशु का जातकर्म एवं नामकरण सविधान सुसम्पन्न किया । शुभ एवं प्रसन्नमुख वाले उस पुत्र को, जो भाद्र कृष्ण की पष्ठी चन्द्रवार के दिन अरुणोदय बेला तथा कृत्तिका नक्षत्र में उत्पन्न एवं अपने पितृवंश को यशस्वी बनाने वाला था, राम का अंश जानकर उसका ‘आह्लाद’ (आल्हा) नामकरण किया । वह बालक इसी नाम से इस भूतल में ख्याति प्राप्त किया। इस बालक के जन्मग्रहण करने के एक मास पश्चात् ब्राह्मी ने भी पुत्ररत्न उत्पन्न किया, जो गौरवर्ण, लम्बी भुजाएँ, विशालवक्षस्थल, तथा धर्म-पुत्र (युधिष्ठर) का अंश था । उस समय ब्राह्मणों ने उस बच्चे को देखकर, जिसका शुभ-प्रसन्नमुख और चरण-तल, सुन्दर कमल चिह्न से विभूपित था, महाबली होने के नाते उसको ‘बलस्वामी बलखानि’ (मलखान) नामकरण ब्राह्मणों ने तीसरे वर्ष की अवस्था प्राप्त होने पर उस सबल एवं कृष्णांश (से उत्पन्न उदय) के दर्शनाभिलाषी इन्द्र घोड़े पर बैठकर वहाँ आये, जहाँ वह चन्दन के वन में अपने भाइयों के साथ बाल-क्रीडा में निमग्न हो रहा था । उस समय आकाश में स्थित इन्द्र को देखकर उस बालक ने अट्टहास (ठठाकर हँसा) किया, इधर हरिणी नामक बड़वा (घोड़ी) भी इन्द्र के उस दिव्य उच्चैःश्रवा नामक घोड़े के पास पहुँचकर उसके द्वारा गर्भ धारणकर पुनः अपने घर लौट आई।पश्चात् वर्ष की समाप्ति में उसने कपोत (कबूतर) नामक एक पुत्र (अश्व) उत्पन्न किया । पाँचवें वर्ष के आरम्भ में इन बालकों ने विद्याध्ययन आरम्भ किया। शिवशर्मा नामक ब्राह्मण की, जो सम्पूर्ण विद्या में निपुण थे, भक्ति-श्रद्धा से सेवा कर रहे थे, जो इन्हें शिक्षा दे रहे थे । आठ वर्ष की अवस्था में वह उदयसिंह अध्ययन करने वाले सभी बालकों में कुशाग्र बुद्धि हुआ, पत्रादि-लेखन भली-भाँति कर लेता था । (अध्याय ९) 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

करक चतुर्दशी का व्रत वामन पुराण में वर्णित है।

🔴 करकचतुर्थीव्रतम् 🔴
( करवा चौथ ) (वामन पुराणोक्त)
➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ कार्तिककृष्णचतुर्थ्यां
(दक्षिणेदेशे आश्विनकृष्णचतुर्थ्यां ) 
करक चतुर्थी- व्रतम् ।
अत्र स्त्रीणामेवाधिकारः । 

प्रथमतः आचम्य मासपक्षाद्युल्लिख्य मम सौभाग्यपुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्रीप्राप्तये करकचतुर्थीव्रतं करिष्ये इति संकल्प्य वटं विलिख्य तदधस्ताच्छिवं गणपतिं षण्मुखयुक्तां गौरीं च लिखित्वा षोडशोपचारैः पूजयेत् ।

🔴 पूजामन्त्र- 

नमः शिवाय शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तति शुभाम् ।।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे । । 

इत्यनेन गौर्याः पूजनम् , ततो नमोन्तनाममन्त्रेण  शिवषण्मुखगणपतीनां पूजा कार्या । ततः सपक्वान्नाक्षत संयुक्तान् दशकरकान् ब्राह्मणेभ्यो दद्यात् । ततः पिष्टकननैवेद्यं भोग्यं सर्व निवेदयेत् । ततश्चन्द्रोदयोत्तरं चन्द्रायार्घ्य दद्यात् ।।

🔴। अथ कथा-

मान्धातोवाच । अर्जुनं तु गते तप्तुमिन्द्रकीलगिरि प्रति ।। 
विषण्णमानसा सुभ्रू द्रौपदी सचिन्तयत् ।। १ ।। 

अहो किरीटिना कर्म समारब्धं सुदुष्करम् ।। 
बहवो विघ्नकर्तारो मार्गे वै परिपन्थिनः ।। २ ।। 

चिन्तयित्वेति सा देवी कृष्णा कृष्णं जगद्‌गुरुम् ।। 
भर्तु । प्रियं चिकीर्षन्ती सापृच्छद्विघ्नवारणम्।। ३।। 

द्रौपद्युवाच  
कथयस्व जगन्नाथ व्रतमेकं सुदुर्लभम् ।। 
यत्कृत्वा सर्वाविघ्नानि विलयं यान्ति तद्वद ।। ४ ।। 
श्रीकृष्ण उवाच 
एवमेव महाभागे शम्भुः पृष्टः किलोमया ।। 
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्राह देवो महेश्वरः ।। ५ ।। 

शृणु देवि वरारोहे वक्ष्यामि त्वां महेश्वरि ।।
सर्वविघ्न- हरेत्याहुः करकाख्यां चतुथिकाम् ।। ६।। 

पार्वत्युवाच 
भगवन् कीदृशी प्रोक्ता चतुर्थी करकाभिधा ।। 
विधानं कीदृशं प्रोक्तं केनेयं च पुरा कृता ॥ ७ ॥ 

ईश्वर उवाच 
शक्रप्रस्थपुरे रम्ये विद्वज्जनसमाकुले ।। 
स्वर्णरौप्यसमाकीर्णे रत्नप्रका- रशोभने ।। ८ ।। 

दिव्यनारीजनालोकवशीकृतगत्रये ।। 
वेदध्वनिसमायुक्ते स्वर्गा दपि मनोहरे ।। ९ ।। 

वेदशर्मा द्विजस्तत्रावसद्देशे विदां वरः ।। 
पत्नी तस्यैव विप्रस्य नाम्ना लीलावती शुभा ।। १० ।। 

तस्यां स जनयामास पुत्रान् सप्तामितौजसः ।। 
कन्यां वीरावतीनाम्नीं सर्वलक्षणसंयुताम् ।। ११ ।।

 नीलात्पलाभनयनां पूर्णेन्दु सदृशाननाम्।।
तां तु काले शुभदिने विधिवच्च द्विजोत्तमः।।१२ ।।
 

ददौ वेदाङ्ग- विदुषे विप्राय विधिपूर्वकम् ।। 
अत्रान्तरे भ्रातृदारैश्चक्रे गौर्या व्रतं चसा ।। १३ ।

चतुर्थ्यां कार्तिकस्याथ कृष्णायां तु विशेषतः ।। 
स्नात्वा सायन्तने काले सर्वास्तः भक्तिभावतः ।। १४ ।। 

विलिख्य वटवृक्षं च गौरीं तस्य तले लिखन् ।। 
शिवेन विघ्ननाथेन षण्मुखेन समन्विताम् ।।१५ ।।
 
गन्धपुष्पाक्षतैर्गोरीं मन्त्रेणानेन पूजयन्' ।। 
नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तृत शुभाम् ।। १६।। 

प्रयच्छ भक्ति- युक्तानां नारीणां हरवल्लभे ।। 
तस्याः पाश्र्व महादेवं विघ्ननाथं षडाननम् ।।१७।।

 पुनः पुष्पाक्षतैर्धूपैरर्चयंश्च पृथक्पृथक् ।। 
पक्वान्नाक्षतसंपन्नान् सदीपान् करकान् दश ।।१८।। 

तथा पिष्टकनैवेद्यं भोज्यं सर्वं न्येवेदयन् ।। 
प्रतीक्षन्त्यः स्त्रियः सर्वाश्चन्द्रमर्थ्यपराः स्थिताः ।। १९ ।। 

सा बाला बिकला दीना क्षुत्तुड्यां परिपीडिता ।। 
निपपात महीपृष्ठे रुरुदुर्बान्धवास्तदा ।। २० ।। 

समाश्वास्य च वा तैस्तां मुखमभ्युक्ष्य वारिणा ।। 
तद्धाता चिन्तयित्वैवमारुरोह महावटम् ।। २१ ।।

 हस्ते चोल्कां समादाय ज्वलन्तीं स्नेहपीडितः ।। 
भगिन्यै दर्शयामास चंद्रं व्याजोदितं तदा ।। २२ ।। 

तं दृष्ट्वा चातिमुत्सृज्य बुभुजे भावसंयुता ।।
 चन्द्रोदयं तमाज्ञाय अर्घ्य दत्त्वा विधानतः ।। २३।।

तद्दोषेण मृतस्त्वस्याः पतिधर्मश्च दूषितः ।। 
पति तथाविधं दृष्ट्वा शिवमभ्यर्च्य सा पुनः ।। २४।। 

व्रतं निरशनं चक्रे यावत्संवत्सरो गतः ।। 
चक्रुः संवत्सरेऽतीते व्रतं तद्धातृयोषितः ।। २५ ।। 

पूर्वोक्तेन विधानेन सापि चक्रे शुभानना ।। 
तदा तत्र शची देवी कन्याभिः परिवारिता ।।२६ ।।
 
एतदेव व्रतं कर्तुमागता स्वर्गलोकतः ।। 
वीरवत्यास्तदाभ्याशमगमद्भाग्यतः स्वयम् ।।२७। 

दृष्ट्वा तां मानुषीं देवीं पप्रच्छ सकलं च सा ।। 
वीरावती तदा पृष्टा प्रोवाच विनमान्विता ।। २८।। 

अहं पतिगृहं प्राप्ता मृतोऽयं मे पतिः प्रभुः ।। 
न जाने कर्मणः कस्य फलं प्राप्तं मयाधुना ।।२९।।
 
मम भाग्यवशाद्देवि आगतासि महेश्वरि ।। 
अनुगृह्णीष्व मां मातर्जीवयाशु पति मम ।। ३० ।।

 इन्द्राण्युवाच ।।
त्वया पितृगृहे पूर्व कुर्वत्या करकव्रतम् ।। 
वृथैवार्घ्यस्तदा दत्तो विना चन्द्रोदयं शुभे ।। ३१।। 

तेन ते व्रतदोषेण स्वामी लोकान्तरं गतः ।। 
इदानीं कुरु यत्नेन करक- व्रतमुत्तमम् ।। ३२ ।।

पति ते जीवयिष्यामि व्रतस्यास्य प्रभावतः ।। 
कृष्ण उवाच 
 तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा व्रतं चक्रे विधानतः ॥ ३३ ।।
 
प्रसन्ना साऽभवद्देवी शक्रस्य प्राणवल्लभा ।। 
तया व्रते कृते देवी जलेनाभ्युक्ष्य तत्पतिम् ।३४।। 

जीवयामास चेन्द्राणी देववच्च बभूव सा ।। 
ततश्चागाद्गृहं स्वीयं रेमे सा पतिना सह ।। ३५ ।। 

धनं धान्यं सुपुत्रांश्च दीर्घमायुः स लब्धवान् ।। 
तस्मात्त्वयापि यत्नेन व्रतमेतद्विधीयताम् ।। ३६।। 

सूत उवाच 
 श्रीकृष्णस्य वचः श्रुत्वा चकार द्रौपदी व्रतम् ।। 
तव्रतस्य प्रभावेण जित्वा तान् कौरवान्रणे ।३७ ।। 

लेभिरे राज्यमतुलं पाण्डवा दुःखनाशनम् ।। 
याः करिष्यन्ति सुभगा व्रतमेतन्निशागमे ।। ३८ ।। 

तासां पुत्रा धनं धान्यं सौभाग्यं चातुलं यशः । 
करकं क्षीरसंपूर्ण तोयपूर्णमथापि वा ।। ३९ ।। 

ददामि रत्नसंयुक्तं चिरं जीवतु मे पतिः ।। 
इति मन्त्रेण करकान् प्रदद्या- द्विजसत्तमे ।। ४० ।।
 
सुवासिनीभ्यो दद्याश्च आदद्यात्ताभ्य एव च ।। 
एवं व्रतं याकुरुते नारी सौभाग्यकाम्यया ।। 
सौभाग्यं पुत्रपौत्रादि लभतेसुस्थिरां श्रियम् ।। ४१।। 

इति वामनपुराणे करकाभिधचतुर्थीव्रतं सम्पूर्णम्।।
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           🔴  हिन्दी रूपान्तरं 🔴

कातिक कृष्ण चतुर्थी के दिन  (  दक्षिणदेश में प्रसिद्ध आश्विनकृष्णा चतुर्थी के दिन)   करक चतुर्थी  व्रत  पालन होता हैं  ।  इस व्रतको करनेका केवल स्त्रियोंकाही अधिकार है; क्योंकि व्रत करनेवाली स्त्रियों की ही फलश्रुति मिलती है। प्रथम आचमन करे फिर "ओम् तत्सत्" इत्यादि रोतिसे देश कालका स्मरण करे, फिर "मम" इत्यादि वाक्य द्वारा संकल्प करे कि, में अपने सौभाग्य एवं पुत्र पौत्रादि तथा निश्चल सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये करकचतुर्थीके व्रतको करूंगा। उस प्रकार संकल्प करनेके पीछे एक बडको लिखे उस, बडके मूलभागमें महादेवजी, गणेशजी, और स्वामिकार्तिकसहित पार्वतीजीका आकार लिखे, (फिर प्राणप्रतिष्ठा करके) षोडशोपचारसे पूजन करे। 

🥀पूजाके मंत्र 

नमः शिवाय शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तति शुभाम् ।।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे । । 

( "शर्वाणी शिवा" ....... के लिये प्रणाम है। हे महेश्वर भगवान्‌की प्यारी! आप अपनी भक्त स्त्रियोंको सौभाग्य और शुभसन्तान प्रदान करें, )

         इस मन्त्रसे गौरी की पूजा करके पीछे, नमः जिनके अन्तमें रहता है ऐसे नाम मन्त्रोंसे शिवजी स्वामिकातिक तथा गणपति देवकी पूजा करनी चाहिए। इसके पीछे पक्वान्न और अक्षतों के साथ दश करवे ब्राह्मणोंको देन चाहिए। पीछे पिष्टकका नैवेद्य और भोज्य सब निवेदन कर दे। पीछे चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमाको अर्थ देना चाहिए ।। 

🔴 व्रत कथा 

मान्धाता कहने लगे कि, जब अर्जुन इन्द्रकील पर्वतपर तप करने चला गया उस समय सुभ्रु द्रौपदीका चित्त कुम्हिला गया और चिन्ता करने लगी ।। १ ।। कि अर्जुनने बडा कठिन काम करना प्रारंभकर दियाहै, यह निश्चय है कि मार्गमें विघ्न करनेवाले बहुतसे वैरी हूं ।। २ ।। कृष्णाकी यह इच्छा थी कि, पतिदेव के काममें कोई विघ्न न आवे इसी चिन्ताको करके जगद्‌गुरु श्रीकृष्ण भगवान्से पूछा ।। ३ ।। द्रौपदी बोली हे जगन्नाथ ! आप एक अत्यन्त गोप्य व्रतको वतावें, जिसके करनेसे सब ओरके विघ्न दूर दल जायें ।। ४ ।। श्रीकृष्ण बोले कि, हे महाभागे ! जैसा आपने मुझसे पूछा है, उसी प्रकार पार्वतोजीने महा- देवजीसे पूछा था उनके प्रश्नको सुनकर महादेवीजीने कहा कि ।। ५ ।। हे विरारोहे ! हे महेश्वरि ! तुम सुनो, मैं तुम्हे सब विघ्नहारिणी करक चतुर्थीका व्रत कहता हूं ।। ६ ।। पार्वतीने पूछा कि हे भगवन् ! करक चतुर्थीका माहात्म्य और इस व्रतको करने की क्या विधि है ? आप कहिये यह व्रत पहिले किसने किया था इसको भी कहिए ।। ७ ।। महादेवजी बोले कि, जहां बहुतसे विद्वान् रहते हैं, जिस जगह बहुतसा चांदी सोना एवम् रत्नोंको शहरपनाह है ।। ८ ।। जो सुंदर स्त्री पुरुषोंके दर्शनसे तोनों भुवनोंको वशीभूत करलेता है, जहां निरन्तर वेदध्वनि होती रहती है ऐसे स्वर्गसे स्वर्गसे भी रमणीय इन्द्रप्रस्थपुरमें ।। ९ ।। वेदशर्मा नामक विद्वान ब्राह्मण निवास करता था, उसकी स्त्रीका नाम लीलावती था वो अच्छी थी ।।१० ।। उस वेदशमसि लीलावतीमें सात परमतेजस्वी पुत्र और एक सर्व लक्षण सुलक्षण वोरावती नामक कन्या उत्पन्न हुई ।। ११ ।। फिर वह ब्राह्मण अपनी नीलकमलसदृश नेत्रवाली पूर्णचन्द्रमाके समान मुख, बाली उस बीरावती कन्याको विवाह योग्य शुभ समयमें ।। १२ ।। वेदवेदाङ्ग (शिक्षाव्याकरणादि) शास्त्रज्ञ उत्तम ब्राह्मणके लिए विधिपूर्वक बानकर दिया, उसीसमय वीरावतीने अपनी भाभियोंके साथ गौरीवत किया ।।१३ ।। फिर जब कातिक बदि चतुर्थी आई उस समय वीरावती और उसकी भाभी सब मिलकर बड़े प्रेमसे सन्ध्याके समय ।। १४ ।। बटके वृक्षको लिखकर उसके मूलमें महेश्वर, गणेश एवं कार्तिकेयके साथ गौरीको लिखके ।। १५ ।। गन्ध, पुष्प और अक्षतोंसे इस गौरी मन्त्रको बोलतों हुई पूजने लगीं कि शर्वाणी शिवाके लिए नमस्कार है, सौभाग्य और अच्छी सन्तति ॥१६ उन स्त्रियोंको दे जो, हे हरकीप्यारी! तेरी भक्तिवाली हो, उसके पार्श्वमें स्थित महादेव, गणेश और स्वामिकार्तिकेयको ।॥१७॥ फिर, धूप, दीप और पुष्प अक्षतोंसे जुवा जुदा पूजन कर पीछे पक्कान अक्षत और दीपकों सहितवश करुए ।। १८ ।। तया पिष्ट- शका नैवेद्य एवम् सब तरह‌का भोज्य, चन्द्रमाको अर्थ देने की प्रतीक्षामें बैठी हुई सब स्त्रियोंने निवेदन कर विया ।। १९ ।। वो बालिकायी भूल प्याससे पीडित थी इस कारण दीन एवम् विकल होकर भूमिपर गिर पडी, उस समय उसके बान्धवगण रोने लगे ।। २० ।। कोई उसको हवा करने लगा, कोई मुलपर पानी छिडकने लगा, उसका भाई कुछ शोच विचारकर एक बड़े भारी पेडपर चढ गया ।। २१ ।। बहिन के प्रेममें पीडित या हाथमें एक जलती हुई मसाल ले रखी थी उस जलती मसाल को ही उसने चन्द्र बताकर दिखा दिया ।। २२ ॥ उसने उसे चांद समझ, दुख छोड, विधिपूर्वक अर्घदेकर भावके साथ भोजनकिया ।। २३ ।। इसी दोषसेउसका पति मर गया, धर्म दूषित हुआ। पतिको मरा देख शिवका पूजन किया ।। २४ ।। फिर उसने एक सालतक निराहार व्रत किया, पर उसकी भाभियोंने संवत्सरके बीत जानेपर वो व्रत किया ।। २५ ।। पहिले कहे हुए विधानसे शोभन मुखवाली वीरावतीने भी व्रत किया, उस समय कन्याओंसे घिरी हुयी शची देवी ।। २६ ॥ इसी व्रतको करनेके लिए स्वर्ग लोकसे चली आई और बीरावतीके भाग्यसे उसके पास अपने आप पहुंच गई ।। २७ ।। शची देवीने उस मानुषीको देखकर उससे सब बातें पूछी, एवम् बीरावतीने नम्रताके साथ सब बातेंबतादी ।। २८ ।। हे देवेश्वरि ! में विवाहके पीछे जब अपने पतिके घर पहुंची तभी मेरा पति मरगया, न जाने मंने ऐसा कौन उग्र पाप किया है, जिसका यह फल मिल रहा है ।। २९ ।। पर फिर भीआज मेरे किसी पुण्यका उदय हुआ है, जिससे हे महेश्वरि! आप यहां पधारी है, आपसे यही प्रार्थना है कि, आप मेरे पतिको शीघ्र जीवित करने की कृपा करें ।। ३० ।। यह सुन इन्द्राणी बोली कि, हे वीरावति ! तुमने अपने पिताके घरपर करकचतुर्थीका व्रत किया था, पर वास्तविक चन्द्रोदयके हुए बिनाही अर्घ देकर भोजन कर लिया था ।। ३१ ।। इस प्रकार अज्ञानसे व्रत भङ्ग करनेपर यत् किञ्चिदपराधके कारण तुम्हारा पति मरगया है, इस कारण आप अपने पतिके पुनर्जीवनके लिए विधिपूर्वक उसी करकचतुर्थीका व्रत करिए ।। ३२ ।। में उस व्रतके ही पुण्य प्रभावसे तुम्हारे पतिको जीवित करूँगी। श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे द्रौपदी ! इन्द्राणीके वचन सुनकर उस बीरावतीने विधिपूर्वक करकचतुर्थीका व्रत किया ।। ३३ ।। उसके व्रतको पूरा हो जानेपर इन्द्राणीभी अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार प्रसन्नता प्रकट करतीहुई एक चुलू जल लेकरवीरावतीके पतिकी मरण- भूमिपर छिडककर उसके पतिको ।। ३४ ।। जीवीत करदिया, वो पति देवताओंके समान हो गया। वीरावती अपने घरपर आकर अपने पतिके साथ क्रीडा करने लगी ।। ३५ ।। वो धन, धान्य सुन्दर पुत्र और दीर्घ आयु पा गया । इससे तुमभी अच्छी तरह इस व्रतको करो ।। ३६ ।। सूतजी शौनकादिक मुनियोंसे कहते हैं कि, इस प्रकार श्रीकृष्ण चन्द्र भगवान्‌के वचनोंको सुनकर द्रौपदीने करक चतुर्थीके व्रतको किया, उसी व्रतके प्रभावसे संग्राममें कौरवोंको पराजित करके ।। ३७ ।। उसके पति पाण्डव सब दुःखोंको मिटानेवाली अतुल राज्य संपत्तिको पा गये । और जो सुभगास्त्रियाँ इस व्रतको संध्याकालमें करेंगी और रात्रिको चन्द्रोदयमें अध्यं देकर भोजन करेंगी ।। ३८ ।। उनस्त्रियोंको पुत्र, घन, धान्य, सौभाग्य और अतुलयशको प्राप्ति होगी । दुग्ध या जलसे भरे हुए रत्नसमेत करवे ।। ३९ ।। में दान करती हूं, इससे मेरा पति चिरंजीवी हो, इस प्रकार कहकर उनको योग्य ब्राह्मणके लिये देना चाहिये, और ।। ४० ।। इस व्रतमें सुहागिन स्त्रियोंके लियेही देना चाहिये, सुहागिन स्त्रियोंसे ही लेना चाहिये। इस प्रकार जो स्त्री अपने सौभाग्यसुख सम्पत्ति के लिये इस व्रतको करती है उसको सौभाग्य पुत्र पौत्रावि तया निश्चलसम्पत्ति मिलती है ।। ४१ ।।

यह वामन पुराणका करक चतुर्थीका व्रत पूरा हुआ ।।
                    

सोमवार, 26 जनवरी 2026

राजपूत उत्पत्ति-

ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन👇

इसी करण कन्या को चारणों ने करणी माता के रूप में अपनी कुल देवी स्वीकार कर लिया है ।

जिसका विवरण हम आगे देंगे -
ज्वाला प्रसाद मिश्र ( मुरादावादी) 'ने अपने ग्रन्थ जातिभास्कर में पृष्ठ संख्या 197 पर राजपूतों की उत्पत्ति का हबाला देते हुए उद्धृत किया कि ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)
← अध्यायः१० ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
श्लोक संख्या १११
_______
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।। 
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।। 
1/10।।111
 ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति 
क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।

तथा स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26 में राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए कहा
" कि क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;और शस्त्र वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है ।👇

( स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26)
और ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति 
क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।
आगरी संज्ञा पुं० [हिं० आगा] नमक बनानेवाला पुरुष ।
 लोनिया
ये बंजारे हैं ।
प्राचीन क्षत्रिय पर्याय वाची शब्दों में राजपूत ( राजपुत्र) शब्द नहीं है ।

विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा
दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं 
और रही बात राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है 
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।
चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में वर्णन है।👇

< ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)
←  ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
अध्यायः १० श्लोक संख्या १११
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।। 
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।। 
1/10/१११

"ब्रह्म वैवर्तपुराण में राजपूतों की उत्पत्ति क्षत्रिय के द्वारा करण कन्या से बताई "🐈
करणी मिश्रित या वर्ण- संकर जाति की स्त्री होती है 
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार करण जन-जाति वैश्य पुरुष और शूद्रा-कन्या से उत्पन्न है।

और करण लिखने का काम करते थे ।
ये करण ही चारण के रूप में राजवंशावली लिखते थे ।
एेसा समाज-शास्त्रीयों ने वर्णन किया है ।

तिरहुत में अब भी करण पाए जाते हैं ।
लेखन कार्य के लिए कायस्थों का एक अवान्तर भेद भी करण कहलाता है  ।

करण नाम की एक आसाम, बरमा और स्याम की  जंगली जन-जाति है ।

क्षत्रिय पुरुष से करण कन्या में जो पुत्र पैदा होता उसे राजपूत कहते हैं।

वैश्य पुरुष और शूद्रा कन्या से उत्पन्न हुए को करण कहते हैं ।

और ऐसी करण कन्या से क्षत्रिय के सम्बन्ध से राजपुत्र (राजपूत) पैदा हुआ।

वैसे भी राजा का  वैध पुत्र राजकुमार कहलाता था राजपुत्र नहीं  ।चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।
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स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड मे अध्याय २६ में 
वर्णित है ।
शूद्रायां क्षत्रियादुग्र: क्रूरकर्मा: प्रजायते।
शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्राम कुशलो भवेत्।१
 तया वृत्या: सजीवेद्य: शूद्र धर्मा प्रजायते ।
राजपूत इति ख्यातो युद्ध कर्म्म विशारद :।।२।

कि राजपूत क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्याओं में उत्पन्न सन्तान है 
जो क्रूरकर्मा शस्त्र वृत्ति से सम्बद्ध युद्ध में कुशल होते हैं ।
ये युद्ध कर्म के जानकार और शूद्र धर्म वाले होते हैं ।

ज्वाला प्रसाद मिश्र' मुरादावादी'ने जातिभास्कर ग्रन्थ में पृष्ठ संख्या १९७ पर राजपूतों की उत्पत्ति का एेसा वर्णन किया है ।
स्मृति ग्रन्थों में राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन है👇
 राजपुत्र ( राजपूत)वर्णसङ्करभेदे (रजपुत) “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां राजपुत्रस्य सम्भवः” 
इति( पराशरःस्मृति )
वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उत्पन्न होता है।

इसी लिए राजपूत शब्द ब्राह्मणों की दृष्टि में क्षत्रिय शब्द की अपेक्षा हेय है ।

राजपूत बारहवीं सदी के पश्चात कृत्रिम रूप से निर्मित हुआ ।
पर चारणों का वृषलत्व कम है । 
इनका व्यवसाय राजाओं ओर ब्राह्मणों का गुण वर्णन करना तथा गाना बजाना है ।

 चारण लोग अपनी उत्पत्ति के संबंध में अनेक अलौकिक कथाएँ कहते हैं;  कालान्तरण में एक कन्या को देवी रूप में स्वीकार कर उसे करणी माता नाम दे दिया  करण या चारण का अर्थ मूलत: भ्रमणकारी होता है ।

चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।
करणी चारणों की कुल देवी है ।
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सोलहवीं सदी के, फ़ारसी भाषा में "तारीख़-ए-फ़िरिश्ता  नाम से भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार, मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता ने राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में लिखा है कि जब राजा, 
अपनी विवाहित पत्नियों से संतुष्ट नहीं होते थे, तो अक्सर वे अपनी महिला दासियो द्वारा बच्चे पैदा करते थे, जो सिंहासन के लिए वैध रूप से जायज़ उत्तराधिकारी तो नहीं होते थे, लेकिन राजपूत या राजाओं के पुत्र कहलाते थे।[7][8]👇
सन्दर्भ देखें:- मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता की इतिहास सूची का ...
[7] "History of the rise of the Mahomedan power in India, till the year A.D. 1612: to which is added an account of the conquest, by the kings of Hydrabad, of those parts of the Madras provinces denominated the Ceded districts and northern Circars : with copious notes, Volume 1". Spottiswoode, 1829. पृ॰ xiv. अभिगमन तिथि 29 Sep 2009

[8] Mahomed Kasim Ferishta (2013). History of the Rise of the Mahomedan Power in India, Till the Year AD 1612. Briggs, John द्वारा अनूदित. Cambridge University Press. पपृ॰ 64–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-108-05554-3.

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विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा
दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं 
'परन्तु कुछ सत्य अवश्य है ।
कालान्तरण में राजपूत एक संघ बन गयी 
जिसमें कुछ चारण भाट तथा विदेशी जातियों का समावेश हो गया।
और रही बात आधुनिक समय में राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है 
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।
जैसे
चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।
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 'परन्तु बहुतायत से चारण और भाट या भाटी बंजारों का समूह ही राजपूतों में विभाजित है ।

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उपसमूह का नाम जनसंख्या।

नाइक 471,000

चौहान 35,000

मथुरा 32,000

 सनार (anar )23,000

लबाना (abana) 19,000

मुकेरी (ukeri )16,000

हंजरा (anjra) 14,000

पंवार 14,000

बहुरूपिया ahrupi 9100

भूटिया खोला 5,900
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परिचय / इतिहास
हिंदू बंजारा, जिन्हें 53 विभिन्न नामों से जाना जाता है, मुख्य रूप से लमबाड़ी या लमानी (53%), और बंजारा (25%) बोलते हैं। 

वे भारत में सबसे बड़े खानाबदोश समूह हैं और पृथ्वी के मूल रोमानी के रूप में जाने जाते हैं। 

रोमनी ने सैकड़ों साल पहले भारत से यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा शुरू की, और अलग-अलग बोलियाँ उन क्षेत्रों में विकसित हुईं जिनमें प्रत्येक समूह बसता था। 

बंजारा का नाम बाजिका( वाणिज्यार )शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है व्यापार या व्यवसाय, और बैंजी से, जिसका अर्थ है पैल्डलर पैक। 
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कई लोग उन्हें मिस्र से निर्वासित किए गए यहूदियों के रूप में मानते हैं, क्योंकि वे मिस्र और फारस से भारत आए थे। 

कुछ का मानना ​​है कि उन्हें मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा अपनी मातृभूमि से निष्कासित कर दिया गया था। 
अब वे भारत के पचास प्रतिशत से अधिक जिलों में स्थित हैं।

उनका जीवन किस जैसा है?
अधिकांश भारतीय रोमानी जैतून की त्वचा, काले बाल और भूरी आँखें हैं। 

हालाँकि हम आम तौर पर इन समूहों को भाग्य से रंग-बिरंगे कारवां में जगह-जगह से यात्रा करने वालों के बैंड के साथ जोड़ते हैं, लेकिन अब बंजारा के साथ ऐसा नहीं है।

 ऐतिहासिक रूप से वे खानाबदोश थे और मवेशी रखते थे, नमक का कारोबार करते थे और माल का परिवहन करते थे। 

अब, उनमें से अधिकांश खेती या पशु या अनाज को पालने-पोसने के लिए बस गए हैं।

 अन्य अभी भी नमक और अन्य वस्तुओं का व्यापार करते हैं। 

कुछ क्षेत्रों में, कुछ सफेदपोश पदों को धारण करते हैं या सरकारी कर्मचारियों के रूप में काम करते हैं।

 वे चमकदार डिस्क और मोतियों के साथ जटिल कढ़ाई वाले रंगीन कपड़े भी सिलते हैं।

 वे गहने और अलंकृत गहने बनाते हैं, जो महिलाएं भी पहनती हैं। 

न केवल बंजारे के पास आमतौर पर एक से अधिक व्यवसाय होते हैं,।
 वे समय पर समाज की जरूरतों के आधार पर, अपनी आय को पूरक करने के लिए अतिरिक्त कौशल का भी उपयोग करते हैं। 

कुछ लोग झाड़ू, लोहे के औजार और सुई जैसी वस्तुएं बनाने में माहिर हैं। 

वे उपकरणों की मरम्मत भी कर सकते हैं या पत्थर के साथ काम कर सकते हैं। 

दूसरों का मानना ​​है कि किसी को "धार्मिक भीख" से जीवन यापन के लिए काम नहीं करना पड़ता है।

 वे विशिष्ट देवता के नाम पर भीख माँगते हुए विशेष श्रृंगार में गाते और पहनते हैं।

 बंजारा को संगीत पसंद है, लोक वाद्य बजाना और नृत्य करना। बंजार भी कलाबाज, जादूगर, चालबाज, कहानीकार और भाग्य बताने वाले हैं। 

क्योंकि वे गरीब हैं, वे डेयरी उत्पादों के साथ अपने बागानों में उगाए गए खाद्य पदार्थ खाते हैं। 

कई घास की झोपड़ियों में रहते हैं, अक्सर विस्तारित परिवारों के साथ।

 अन्य जातियों के साथ न्यूनतम संबंध रखने वाले बंजारा परिवार घनिष्ठ हैं।

 समुदाय के नेता की भूमिका नेता के बेटे को दी जाती है।
 सभी जैविक पुत्रों को पैतृक संपत्ति से बराबर हिस्सा मिलता है।

 विवाह की व्यवस्था की जा सकती है, खासकर तीन पीढ़ियों के रिश्तेदारों के मिलन से बचने के लिए। 

कुछ समूहों में, हालांकि, बहिन से चचेरे भाई को शादी करने की अनुमति है। 

दहेज 20,000 रुपये या लगभग $ 450.00 के रूप में उच्च हो सकता है।
 शादीशुदा महिलाएं हाथी दांत की मेहंदी लगाती हैं।

उनके विश्वास क्या हैं?
बंजारा बहुसंख्यक हिंदू हैं; कुछ ने हिंदू प्रथाओं को अपनी खुद की एनिमेटिड मान्यताओं के साथ जोड़ दिया है। 

अन्य समूह इस्लाम का पालन करते हैं; अभी तक अन्य सिख हैं। 
रोमानी अक्सर लोक मान्यताओं का पालन करते हैं, और इन धार्मिक मान्यताओं के साथ मिश्रित कई वर्जनाएं हैं (चीजें जो कभी नहीं करनी चाहिए।)

 एक हिंदू वर्जना यह है कि एक महिला के बालों को कंघी नहीं करना चाहिए या पुरुषों की उपस्थिति में लंबे समय तक नीचे नहीं रहना चाहिए।

 एक और बात यह है कि एक महिला को बैठे हुए पुरुष के सामने से नहीं गुजरना चाहिए, बल्कि उसके पीछे होना चाहिए। 

भले ही रोमानी भाषण में अनारक्षित हैं, कई में उच्च नैतिक मानक हैं। 
उदाहरण के लिए, शुद्धता बहुत महत्वपूर्ण है।
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कुल या वंश की उच्चता का  निर्धारण व्यक्तियों के संस्कार और व्यवहार से ही किया जाता है ।

श्रेष्ठ वंश में श्रेष्ठ सन्तानें का ही प्रादुर्भाव होता है ।
दोगले और गाँलि- गलोज करने वाले और अय्याश लोग नि: सन्देह अवैध यौनाचारों से उत्पन्न होते हैं ।
भले हीं वे स्वयं को समाज में अपने ही मुख से ऊँचा आँकते हों ।
जिनके पास कुतर्क ,गाली और भौंकने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता !
जिनमें न क्षमा  होती है; और न क्षमता ही ।
 वह  लोग धैर्य  हीन बन्दर के समान चंचल व 
लंगोटी से कच्चे होते हैं ।
और बात बात पर गीदड़ धमकी कभी पुलिस की तो कभी कोर्ट की और गालियाँ तो जिनका वाणी का श्रृँगार होती हैं।

जिनमें मिथ्या अहं और मुर्दों जैसी अकड़ ही होती है ।
ज्ञान के नाम पर रूढ़िवादी पुरोहितों से सुनी सुनायीं किंवदन्तियाँ ही प्रमाण होती हैं ।
'परन्तु पौराणिक या वैदिक कोई साक्ष्य जिनके पास नहीं होता ।

अहीरों को द्वेष वश गालियाँ  देने वाले कुछ चारण बंजारे और माली जन-जाति के लोग इसका प्रबल प्रमाण हैं ।

ये वास्तविक रूप  में अवैध संताने हैं , उन दासी पुत्रों से और क्या अपेक्षा की जा सकती है ?

 कुलहीन, संस्कारहीन मनुष्य से अच्छे तो जानवर है .
विदित हो कि अपनी फेस बुक या ब्लोगर आइडी पर अहीरों को निरन्तर गाली या उनके इतिहास की गलत तरीके से ऐडिटिंग करने वाले ..
ये भाटी भाट या चारण बंजारे का एक समुदाय है ।

जादौन - ये बंजारा समुदाय हैऔर भारत में आने से पहले अफगानिस्तान में जादून/ गादूँन पठान थे 
भारत में बीकानेर और जैसलमैर में जादौन बंजारे हैं ।
आधुनिक समाज शास्त्री यों ने इन्हें छोटी राठौड़ों समुदाय के अन्तर्गत चिन्हित किया है ।
इन्हीं के समानान्तरण जाडेजा हैं 
जाड़ेज़ा - जाम उनार बिन बबिनाह नाम के  मुसलिमों के वंशज हैं ये लोग जो ठीक से हिन्दु भी नहीं हैं इनका जाम जाड़ा भी मुसलिमों से सम्बद्ध था ।

और सैनी - ये माली लोग इनकी हैसियत सिर्फ़ पेड़ पौधों को पानी देने की है .
आज ये शूरसेन से सम्बद्ध होने का प्रयास कर रहे हैं।

विदित हो कि कायस्थों में सैनी और शक्सैनी वे लोग थे; जिन्होंने शक और सीथियनों की सैना में नौकरी की ..
अब य भी स्वयं को राजपूत लिखते हैं ।
 
ये ख़ुद को मालिया राजपूत कहते हैं ; सैना में काम करने कारण ये सैनिक से सैनी उपनाम लगाने लगे . 

और अब सैनी स्वयं को शूरसेन से जोड़ रहे है। 
विदित हो की सिसौदिया आदि राजपूत इन्हें कम ही स्वीकार करते हैं।

जादौन जन-जाति का यदुवंश से प्रत्यक्ष कोई  सम्बन्ध नहीं है ।
अफगानिस्तान के गादौन जादौन पठान जो वनी इज़राएल या यहूदियों की स्वयं को शाखा मानते हैं 
उसी के आधार पर ये भी अपने को यदुवंशी मानने की बात करते हैं ।

जबकि समस्त यदुवंशज स्वयं को गोप अथवा यादव ही मानते थे ।

इस आधार पर कल को कोई वसुदेव सैनी भी लिखा सकता है ।
सूरसैनी नाम ये प्राचीनत्तम ग्रन्थों में किसी यदुवंशी का विवरण नहीं है ।
-सूर सैन के किसी वंशज 'ने भी यह विशेषण कभी अपने नाम के पश्चात नहीं लगाया ।
केवल यादव गोप और घोष विशेषण ही रूढ़ रहे 
आभीर शब्द तो आर्य्य का ही रूपान्तरण है ।
आर्य्य शब्द का प्रयोग 'न करके भारतीय पुरोहित वर्ग 'ने आभीर शब्द का प्रयोग यादवों या गोपों को ईसा० पूर्व द्वत्तीय सदी के समकालिक किया था ।
जो परवर्ती प्राकृत अपभ्रंश और हिन्दी भाषाओं में आहिर अहीर ,अहर आदि रूपान्तरण में प्रकाशित हुआ ।
पोस्ट - योगेश रोहि जी की क़लम से

शनिवार, 24 जनवरी 2026

आज के लोग एक अविमुक्तेश्वरानंद के क्रोधी स्वभाव से परेशान हो चुके हैं मैं सोचती हूँ ये भारतवासी यदि पौराणिक समय मे होते तो बात बात पर श्राप देने वाले ऋषियों से कैसे डील करते जिनमे ऋषि दुर्वासा, महर्षि परशुराम, भृगु और विश्वामित्र शामिल थे जिनके कोप से बड़े बड़े राजाओं की हालत खराब हो जाती थी।

हर एक संत का स्वभाव अलग होता है विचारधारा अलग होती है इसका मतलब ये नहीं कि उसकी प्रमाणिकता को कटघरे में लाकर रख दो। UP के डेप्युटी CM ने क्षमा सहित अविमुक्तेश्वरानंद को स्नान करने का आग्रह किया ये दर्शाता है सत्ता किस तरह अब डेमेज कंट्रोल करने का प्रयास कर रही है।

खैर.....
रामभद्राचार्य को विकलांग होने पर सन्यासी होने का अधिकार नहीं कहने पर समर्थक और भड़क गए तो अविमुक्तेश्वरानंद ने कुछ अलग नहीं कह दिया वही कहा है को शास्त्रों में वर्णित है...

शास्त्रों ने कलौ संन्यासवर्जित: का वर्णन है। पर अब बिना वर्णाश्रम-शुद्धता पुष्टि किये, गुण-लिंग-उद्देश्य का विचार किये हर किसी को सन्यासी बनना है और यदि बाद में अकूत सम्पत्ति और जनबल हो गया तो फिर पीठाधीश्वर, जगद्गुरु, मठाधीश और न जाने क्या क्या उपाधियां भी मिलने लगती हैं जैसे सतुआ बाबा और बाकी के रोल्ड गोल्ड बाबा।

आजकल एक शब्द बड़ा चलन में है दिव्यांग पर उसपर फिर किसी लेख में बात करेंगे....!

पूर्वजन्म के किये गए पाप से ही इस जन्म में विकलांगता होती है, ऐसा सनातन धर्म में शास्त्र प्रमाण हैं। वैसे तो इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, क्योंकि अलग अलग प्रकार की विकलांगता का कारण अलग अलग कर्म हैं। यदि हम कर्मफल को न मानें, तो भला जन्मजात असाध्य रोगों से ग्रस्त अथवा अंगहीनता से व्यथित देह वाले बच्चे ने कौन सा पाप किया था, क्योंकि इस जन्म के कर्म तो अब तक प्रारम्भ भी नहीं हुए है।

और यदि प्रारब्ध को मानते ही नहीं तो किसी को सन्यासी बनाने न बनाने पर कुतर्क करना ही क्यों है फिर। धर्म को माने तो धर्म की बातों को भी मानिए और धर्म को नहीं मानते हो तो कर्मफलों की व्याख्या को भी ठुकरा दीजिये सहूलियत के हिसाब से अपने स्टैंड बदलते रहना तो कोई तर्क की बात नहीं।

हां तो बात करते हैं विकलांगता की....

दीर्घजीवी च क्षीणायुः सुखी दुःखी च निश्चितम्।
अन्धादयश्चाङ्गहीनाः कुत्सितेन च कर्मणा॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृतिखण्ड, २६-०२)

अर्थात- कौन लम्बी आयु वाला होगा और किसकी अकाल मृत्यु होगी, कौन सुखी या दुःखी होगा, ये सब पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर निश्चित होता है।

अन्धो दीपापहारी स्यात्
अन्धो भवति गोघ्नस्तु
(विष्णुधर्मोत्तर पुराण, खण्ड २, अध्याय १२१, ०९)

यानी- अंधकार करने के उद्देश्य से दीपक बुझाने वाला, एवं गोहत्या करने वाला अगले जन्म में अन्धा होता है।

और धर्म शास्त्रों की माने तो रोग, दरिद्रता, अज्ञान, कष्ट और विकलांगता में कोई दिव्यता नहीं होती बल्कि ये
व्यक्ति के पूर्वजन्म के पापकर्म का फल है। 
हां ये बात और है कि सरकार ने तुष्टिकरण के हिसाब से विकलांग को दिव्यांग की उपाधि दे दी है पर शब्द बदल देने से सच नहीं बदल जाता। 

अब कोई कहेगा सन्त सूरदासजी भी तो अंधे थे और अष्टावक्र तो शरीर के 8 हिस्सों से विकलांग थे,
तो किसी के पूर्व जन्म बुरे हैं इसका अर्थ ये नहीं कि 
इस जन्म में अच्छे कर्म करने का अधिकार नहीं। 
पर ईश्वर की भक्ति करने और दंड धारक बन खुद को शाश्त्रार्थ सन्यासी घोषित करने में अंतर है।

जैसे देशभक्ति करना हर एक नागरिक का कर्तव्य है पर देश की सेवा करने के लिए सेना में भर्ती होने के कुछ निश्चित मानक। तो सूरदास जी भक्त थे, विरक्त साधु और परम श्रेष्ठ भक्त थे न कि सन्यासी। इसी तरह अष्टावक्र ने भी कभी दंड नहीं उठाया।

संन्यासोपनिषत्, नारदपरिव्राजकोपनिषत् में भी यही बातें वर्णित है शारीरिक अक्षमता को लेकर।

श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
यानी बुद्धिमान् जन उसी को संन्यास कहते हैं, जिसमें काम्य कर्म का न्यास हो जाता है और उस स्थिति में सभी कर्म इन्द्रियों के द्वारा स्वभावतः ही संचालित होते हैं जिसमें जीव की कोई उत्प्रेरित फलाकांक्षा नहीं होती। पर जो इंद्रियां और अंग पहले से अक्षम हैं उनमें काम्य कर्म का नाश कैसे हो....??