गुरुवार, 13 अगस्त 2026

जादौन-(२)

यहाँ इस ऐतिहासिक और वंशावली आलेख का चतुर्थ पेज (चौथा भाग) प्रस्तुत है:

करौली के जादौनों का इतिहास और वंशावली (क्रमशः)

जादौन और राजपूत वंश से संबंधित ऐतिहासिक मत

  • ​आलेख के अंतिम चरणों में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि मध्यकालीन और आधुनिक इतिहासकारों के बीच जादौन राजवंश की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न मत प्रचलित रहे हैं।
  • ​जहाँ एक ओर गजेटियर और कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों (जैसे कनिंघम) के अभिलेखों में करौली के राजाओं का सीधा संबंध मथुरा के आभीर (पाल) शासक ब्रह्मपाल अहीर और यदुवंशी परंपरा से जोड़ा गया है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक गतिशीलता और समय के प्रभाव के कारण इन राजवंशों का राजपूत संघ में विलय और तदनुरूप राजनीतिक परिवर्तन भी इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

निष्कर्ष और ऐतिहासिक दृष्टिकोण

  • ​आलेख के अंत में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों में उपाधियों (जैसे 'पाल' और 'गोप') के प्रयोग, भौगोलिक प्रवासन (मथुरा से बयाना, तहनगढ़ और करौली तक), तथा कबीलाई व पारंपरिक विरासतों के आधार पर यदुवंशियों और अहीरों के ऐतिहासिक संबंध गहराई से जुड़े हुए हैं।
  • ​यह दस्तावेज प्राचीन पुराणों, ऐतिहासिक रासो ग्रंथों (जैसे 'विजयपाल रासो'), और प्रशासनिक गजेटियर के साक्ष्यों का संकलन करते हुए इस राजवंश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करता है।
  • इस ऐतिहासिक और वंशावली आलेख का पञ्चम पेज (पाँचवाँ भाग) प्रस्तुत है:

    करौली के जादौनों का इतिहास और वंशावली (अंतिम पृष्ठ)

    ऐतिहासिक निष्कर्ष एवं विमर्श

    • ​इस विस्तृत ऐतिहासिक और पौराणिक आलेख के अंतिम चरण में संकलित साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष रेखांकित किया गया है कि करौली के जादौन राजवंश की जड़ें प्राचीन आभीर (पाल) और यदुवंशी परंपराओं में निहित हैं।
    • ​विभिन्न गजेटियर, ऐतिहासिक रासो ग्रंथों (जैसे 'विजयपाल रासो'), और ब्रिटिशकालीन प्रशासनिक साक्ष्यों (कनिंघम के विवरण) के माध्यम से यह प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है कि समयांतर में राजनीतिक परिस्थितियों, भौगोलिक प्रवासन और सामाजिक संघों के निर्माण के बावजूद, इन राजवंशों का पारंपरिक संबंध भगवान श्रीकृष्ण के गोवंश एवं गोपालक (गोप) संस्कृति से जुड़ा रहा है।

    यह आलेख प्राचीन पुराणों, मध्यकालीन रासो साहित्यों, और ऐतिहासिक अभिलेखों का एक व्यापक दस्तावेज है, जो यदुवंशियों, आहीरों और करौली के पाल शासकों के मध्य ऐतिहासिक क्रम को स्पष्ट करता है।


यहाँ इस ऐतिहासिक और वंशावली आलेख का षष्ठम पेज (छठा भाग) प्रस्तुत है:

करौली के जादौनों का इतिहास और वंशावली (अतिरिक्त संदर्भ एवं निष्कर्ष)

ऐतिहासिक शोध और वंशावली का विहंगम दृश्य

  • ​आलेख के इस अंतिम चरण में उन तमाम ऐतिहासिक कड़ियों को समेटा गया है जो यदुवंशियों, आहीरों और मध्यकालीन रियासतों के बीच के संक्रांति काल को दर्शाती हैं।
  • ​इसमें इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि इतिहास को केवल राजवंशों की राजनीतिक विजयों के चश्मे से न देखकर, कबीलाई प्रवासन, भौगोलिक परिस्थितियों (जैसे करौली, बयाना और तहनगढ़ की किलेबंदी), और लोक-संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए।

ऐतिहासिकता का सार

  • ​प्राचीन ग्रंथों (जैसे हरिवंश पुराण और देवीभागवत पुराण) के आख्यानों से लेकर ब्रिटिश और स्थानीय गजेटियरों में दर्ज वंशावली क्रम (ब्रह्मपाल अहीर से लेकर अंतिम पाल शासक तुलसीपाल तक) इस बात के पुष्ट प्रमाण माने जाते हैं कि जन-जातियों का यह रूपांतरण भारतीय सामाजिक इतिहास का एक जीवंत और स्वाभाविक हिस्सा रहा है।

यह आलेख प्राचीन ग्रंथों, लोक-गाथाओं, रासो साहित्यों और प्रशासनिक गजेटियरों के आधार पर तैयार किया गया एक संपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है, जो करौली के जादौन राजवंश और अहीर (पाल) परंपराओं के ऐतिहासिक ताने-बाने को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।


यहाँ इस ऐतिहासिक और वंशावली आलेख का सप्तम पेज (सातवाँ भाग) प्रस्तुत है:

करौली के जादौनों का इतिहास और वंशावली (परिशिष्ट एवं समापन संदर्भ)

ऐतिहासिक स्रोतों का समेकन

  • ​इस अंतिम परिशिष्ट में उन समस्त ऐतिहासिक, पौराणिक एवं लोक-साहित्यिक साक्ष्यों को समेकित किया गया है, जो इस संपूर्ण शोध आलेख के आधार रहे हैं।
  • ​इसमें पुराणों (जैसे हरिवंश पुराण और देवीभागवत पुराण) के मूल श्लोकों के हिंदी अनुवाद, मध्यकालीन रासो ग्रंथों (जैसे 'विजयपाल रासो'), तथा ब्रिटिशकालीन ऐतिहासिक और गजेटियरीय विवरणों के समन्वय पर बल दिया गया है।

अंतिम अवलोकन

  • ​आलेख के इस अंतिम पृष्ठ पर यह स्पष्ट किया गया है कि यदुवंशियों, आहीरों और करौली के पाल राजवंशों का इतिहास भारतीय समाज की क्रमिक विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों की कहानी कहता है।

यह आलेख इस ऐतिहासिक और वंशावली शृंखला का पूर्ण समापन प्रस्तुत करता है।


♦जादौन♦

प्रस्तुत विवरण में करौली के जादौन वंश, अहीर (पाल) राजवंश, पौराणिक संदर्भों (हरिवंश पुराण, देवीभागवत पुराण), तथा ऐतिहासिक ग्रंथों (जैसे जोसेफ डेवी कनिंघम की 'हिस्री ऑफ़ द सिख्स' एवं विभिन्न गजेटियर) के आधार पर यदुवंश और अहीर परंपराओं के ऐतिहासिक वंशावलियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

​आपके द्वारा दिए गए आलेख और साक्ष्यों के मुख्य बिंदुओं को निम्नलिखित रूप में संक्षेपित किया जा सकता है:

​मुख्य बिंदु एवं ऐतिहासिक सारांश

  1. पौराणिक पृष्ठभूमि और गोपालन परंपरा:
    • ​हरिवंश पुराण और देवीभागवत पुराण के चतुर्थ स्कन्ध के संदर्भों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और वसुदेव के गोलोक/मानवयोनि में अवतरण तथा गोपालन से जुड़े आख्यानों को रेखांकित किया गया है। ब्रह्मा और वरुण के शाप तथा कश्यप ऋषि के प्रसंगों के माध्यम से यदुवंशियों का गोप (आभीर) रूप से सीधा संबंध जोड़ा गया है।
  2. करौली के जादौन राजवंश और अहीर (पाल) शासक:
    • ​ऐतिहासिक स्रोतों और गजेटियर के हवाले से करौली के शासकों का निकास मथुरा के यादव/आभीर शासक ब्रह्मपाल अहीर से माना गया है।
    • ​राजा विजयपाल और उनके बाद के क्रमिक पाल वंशावली का उल्लेख मिलता है, जहाँ शासक अपने नाम के साथ 'पाल' उपाधि का प्रयोग करते थे।
  3. राजपूत संघ और जातियों का विकास:
    • ​आलेख में मध्यकालीन व पौराणिक ग्रंथों (जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कन्द पुराण) के हवाले से राजपूतों और अन्य समुदायों (चारण, भाट, बंजारे आदि) की उत्पत्ति एवं वर्णसंकर प्रसंगों पर चर्चा की गई है, तथा यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार कालान्तर में विभिन्न जनसमूह राजपूती व्यवस्था और संघ का हिस्सा बने।
  4. विदेशी व अन्य जनसमूहों से तुलनात्मक मत:
    • ​कनिंघम के इतिहास ग्रन्थ और अन्य colonial/modern संदर्भों के माध्यम से करौली के राजाओं के यदुवंशी होने की स्वीकृति के साथ-साथ उनके गोपी/अहीर पृष्ठभूमि से जुड़ाव पर भी प्रकाश डाला गया है।
  5. प्रस्तुत विवरण में करौली के जादौन वंश, अहीर (पाल) राजवंश, पौराणिक संदर्भों (हरिवंश पुराण, देवीभागवत पुराण), तथा ऐतिहासिक ग्रंथों (जैसे जोसेफ डेवी कनिंघम की 'हिस्री ऑफ़ द सिख्स' एवं विभिन्न गजेटियर) के आधार पर यदुवंश और अहीर परंपराओं के ऐतिहासिक वंशावलियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

    ​आपके द्वारा दिए गए आलेख और साक्ष्यों के मुख्य बिंदुओं को निम्नलिखित रूप में संक्षेपित किया जा सकता है:

    ​मुख्य बिंदु एवं ऐतिहासिक सारांश

    1. पौराणिक पृष्ठभूमि और गोपालन परंपरा:
      • ​हरिवंश पुराण और देवीभागवत पुराण के चतुर्थ स्कन्ध के संदर्भों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और वसुदेव के गोलोक/मानवयोनि में अवतरण तथा गोपालन से जुड़े आख्यानों को रेखांकित किया गया है। ब्रह्मा और वरुण के शाप तथा कश्यप ऋषि के प्रसंगों के माध्यम से यदुवंशियों का गोप (आभीर) रूप से सीधा संबंध जोड़ा गया है।
    2. करौली के जादौन राजवंश और अहीर (पाल) शासक:
      • ​ऐतिहासिक स्रोतों और गजेटियर के हवाले से करौली के शासकों का निकास मथुरा के यादव/आभीर शासक ब्रह्मपाल अहीर से माना गया है।
      • ​राजा विजयपाल और उनके बाद के क्रमिक पाल वंशावली का उल्लेख मिलता है, जहाँ शासक अपने नाम के साथ 'पाल' उपाधि का प्रयोग करते थे।
    3. राजपूत संघ और जातियों का विकास:
      • ​आलेख में मध्यकालीन व पौराणिक ग्रंथों (जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कन्द पुराण) के हवाले से राजपूतों और अन्य समुदायों (चारण, भाट, बंजारे आदि) की उत्पत्ति एवं वर्णसंकर प्रसंगों पर चर्चा की गई है, तथा यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार कालान्तर में विभिन्न जनसमूह राजपूती व्यवस्था और संघ का हिस्सा बने।
    4. विदेशी व अन्य जनसमूहों से तुलनात्मक मत:
      • ​कनिंघम के इतिहास ग्रन्थ और अन्य colonial/modern संदर्भों के माध्यम से करौली के राजाओं के यदुवंशी होने की स्वीकृति के साथ-साथ उनके गोपी/अहीर पृष्ठभूमि से जुड़ाव पर भी प्रकाश डाला गया है।
      • यहाँ इस ऐतिहासिक और वंशावली आलेख का तृतीय पेज (तीसरा भाग) प्रस्तुत है:

        करौली के जादौनों का इतिहास और वंशावली (क्रमशः)

        राजपूत उत्पत्ति और पौराणिक संदर्भों का विश्लेषण

        • ​आलेख में आगे ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रथम खंड, ब्रह्म खंड, अध्याय 10) और स्कन्द पुराण (सह्याद्रि खंड, अध्याय 26) के पौराणिक उद्धरणों का हवाला देते हुए राजपूत वर्ण और संघ के ऐतिहासिक स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है।
        • ​इन ग्रंथों तथा मध्यकालीन इतिहासकारों (जैसे मोहम्मद कासिम फरिश्ता की 'तारीख-ए-फरिश्ता') के हवाले से यह चर्चा की गई है कि राजपूत कोई एक एकल जाति न होकर समय के साथ विभिन्न शासक कुलों, जन-जातियों, चारणों, भाटों और योद्धा समूहों के समायोजन से बना एक व्यापक सामाजिक संघ रहा है।

        बंजारा समुदाय और ऐतिहासिक कबीले

        • ​भारत के खानाबदोश व व्यापारिक समूहों (जैसे बंजारा, रोमानी समुदाय और विभिन्न उपसमूहों) के इतिहास का उल्लेख करते हुए इनके कबीलाई विस्तार और सांस्कृतिक परंपराओं को रेखांकित किया गया है।
        • ​आलेख में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार कालान्तर में कुछ यदुवंशी और अहीर शाखाएँ समय के प्रभाव व भौगोलिक विस्थापन के कारण राजपूत संघ और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं का हिस्सा बनती गईं।

        ऐतिहासिक साक्ष्य और कनिंघम का संदर्भ

        • ​ब्रिटिश इतिहासकार जोसेफ डेवी कनिंघम (Joseph Davey Cunningham) की प्रसिद्ध पुस्तक 'ए हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स' के पृष्ठ 7 का हवाला देते हुए करौली के छोटे रियासती राज्य (Karauli Chiefship) का उल्लेख किया गया है: ​"The raja is admitted by the genealogists to be of the Yadu or lunar race, but people sometimes say that his being an Ahir or cowherd forms his only relation to Krishna, the pastoral Apollo of the Indians." (अर्थात: वंशावली विशेषज्ञों द्वारा राजा को यदु या चंद्रवंशी स्वीकार किया जाता है, परंतु यह भी कहा जाता है कि उनका अहीर या गोपालक होना ही उन्हें भारतीय कथाओं के पादप (ग्वाले) कृष्ण से जोड़ता है।)
        • "The raja is admitted by the genealogists to be of the Yadu or lunar race, but people sometimes say that his being an Ahir or cowherd forms his only relation to Krishna, the pastoral Apollo of the Indians."

          (अर्थात: वंशावली विशेषज्ञों द्वारा राजा को यदु या चंद्रवंशी स्वीकार किया जाता है, परंतु यह भी कहा जाता है कि उनका अहीर या गोपालक होना ही उन्हें भारतीय कथाओं के पादप (ग्वाले) कृष्ण से जोड़ता है।)


          • ​इसके साथ ही, करौली की स्थापना (लगभग 900 ईस्वी में राजा ब्रह्मपाल द्वारा) और उत्तर और पूर्व दिशाओं में प्राकृतिक खड्डों (Ravines) व विशाल दीवारों से सुरक्षित इसके भौगोलिक एवं सामरिक महत्व का विवरण मिलता है।

          यह आलेख प्राचीन पौराणिक कथाओं, गजेटियर के आंकड़ों, और औपनिवेशिककालीन ऐतिहासिक ग्रंथों के आधार पर यदुवंश और अहीर परंपराओं के मध्य संबंधों का विस्तृत दस्तावेज प्रस्तुत करता है।

बुधवार, 12 अगस्त 2026

गजल -

"यह गजल यादव योगेश कुमार रोहि के अनु-भवों की काव्यमयी प्रस्तुति हैं।

मुखड़ा-
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं। 
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
***"
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं। 
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥

१-अन्तरा-
​अपने अहम में गुम है बटोही , चले जिन पथों पे, मंज़िल ना कोई।
खोजते खोजते खुद को रोहि .
मोह के भँबर में जिन्दगी डुबोई।
व्यर्थ ही समय को गंवा रहे हैं, आते हैं पास जो शिष्य के बनके, वोही हमको समझा रहे हैं॥
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥

२-अन्तरा-
​हमारे दिल के गमों की शय पर, उभरते जख्मों की हर-एक तह पर। खुशीयों के होते विलय पर
कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, मंदिर तिजारत के महकमें, पुजारी प्रसाद बिकवा रहे हैं॥
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं। 
शराफतों की हिफाजतों में हम वो कीमत चुका रहे हैं।
****

विशेष: –
हिन्दी भाषा के व्याकरण व वर्तनी के अनुरूप गीत का गायन करें !
प्रस्तुत गीत को  कब्बाली की शैली में 
भारतीय लोक संगीत में हारमोनियम व ढोलक की थाप पर स्त्री पुरुष के युगल स्वर में   गायन करे  -


३-​थोड़ी सी जिंदगी अब सुधर लो,जीवन के सफर को पाथेय धर लो ।
न वक्त ऐसा, रहे हमेशा, पल पल चलना है तुम समहर लो॥
अरमाँ खाक हो गए जल के, आग अभी भी सुलगा रहे हैं।
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
**********
४-​अपने गमों के संग तू अकेला, खुशियों का तेरा झूठा हैं मेला।
ईश्वर के नामों पर कर्म गन्दे,निकम्मे धूर्त फरेबी बन्दे। अन्धों में बैठे धन्धे चला रहे हैं॥

फिर भी वफ़ा की राहों पे चल के, ठोकरों में खुद ही संभल के॥
इन जंझाबतों से निकल के, अब भी हम तो घबरा रहे हैं।
*****
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
हमारे दिल के गमों की शह पर, उभरते जख्मों की हर एक तह पर।
कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, अजीब देखे हैं हम मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥

राजपूतों की उत्पत्ति व मुगलों से उनके वैवाहिक सम्बन्ध -

राजपूतों की उत्पत्ति और मुगलों से उनके वैवाहिक सम्बन्ध-

__________________

राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे इतिहास में कई मत प्रचलित हैं।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजपूत संस्कृत के राजपुत्र शब्द का अपभ्रंश है; राजपुत्र शब्द हिन्दू धर्म ग्रंथों में कई स्थानों पर देखने को मिल जायेगा लेकिन वह जातिसूचक के रूप में नही होता अपितु  किसी भी राजा के संबोधन सूचक शब्द के रूप में होता है । 

परन्तु  अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि पुराणों में एक स्थान पर राजपुत्र जातिसूचक शब्द के रूप में आया है जो कि इस प्रकार है-👇
____________________________________ 
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह।
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।११०।‎

ब्रह्मवैवर्तपुराण 
 (ब्रह्मखण्डः)अध्यायः(१०) का श्लोकसंख्या-( ११०)

इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे जातिसम्बन्धनिर्णयो नाम दशमोऽध्यायः ।१०।

भावार्थ:- क्षत्रिय से करण-कन्या (वैश्य पुरुष और शूद्र कन्या से ) में राजपुत्र और राजपुत्र की कन्या में करण द्वारा 'आगरी' उत्पन्न हुआ।११०।

राजपुत्र के क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या के गर्भ में उत्पन्न होने का वर्णन (शब्दकल्पद्रुम) में भी आया है- 
"करणकन्यायां क्षत्त्रियाज्जातश्च इति पुराणम् ॥" अर्थात:- क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या में उतपन्न संतान...

यूरोपीय विश्लेषक मोनियर विलियमस् ने भी लिखा है कि-
A rajpoot,the son of a vaisya by an ambashtha or the son of Kshatriya by a karan...
~A Sanskrit English Dictionary:Monier-Williams, page no. 873
शब्दकल्पद्रुम व वाचस्पत्य में भी एक अन्य स्थान पर भी राजपुत्र शब्द जातिसूचक शब्द के रूप में आया है; जो कि इस प्रकार है:-

 ३- वर्णसङ्करभेदे राजपुत्र “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां
राजपुत्रस्य सम्भवः” इति पराशरःसंहिता ।

अर्थात:- वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उतपन्न होता है।

 राजपूत शब्द हमें स्कंद पुराण के सह्याद्री खण्ड में भी देखने को मिलता है जो कि इस प्रकार एक वर्णसंकर जाति के अर्थ में है-

"शय्या विभूषा सुरतं भोगाष्टकमुदाहृतम्।
 शूद्रायां क्षत्रियादुग्रः क्रूरकर्मा प्रजायते।।४७।।

"शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्रामकुशलो भवेत्।
तया वृत्त्या स जीवेद्यो शूद्रधर्मा प्रजायते।।४८।।

राजपूत इति ख्यातो युद्धकर्मविशारदः।
वैश्य धर्मेण शूद्रायां ज्ञात वैतालिकाभिध:।४९ ।
___________________________________
उपर्युक्त सन्दर्भ:-(स्कन्दपुराण- आदिरहस्य सह्याद्रि-खण्ड- व्यास देव व सनत्कुमार का संकर जाति विषयक संवाद नामक २६ वाँ अध्याय-श्लोक संख्या- ४७,४८,४९ पर राजपूतों की उत्पत्ति वर्णसंकर के रूप में है ।

( भावार्थ:-क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;

और शस्त्र- वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है )
कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है।

 लेकिन अमरकोष में राजपूत और क्षत्रिय शब्द को परस्पर पर्यायवाची नही बतलाया है; स्वयं देखें-
"मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो क्षत्रियो बाहुजो विराट्।
(राजा राट् पार्थिवक्ष्मा भृन्नृपभूपमहीक्षित:।।
-अमरकोष
अर्थात:मूर्धाभिषिक्त,राजन्य,बाहुज,क्षत्रिय,विराट्,राजा,राट्,पार्थिव,क्ष्माभृत्,नृप,भूप,और महिक्षित ये क्षत्रिय शब्द के पर्याय है।

इसमें 'राजपूत' शब्द या तदर्थक कोई अन्य शब्द नहीं आया है।

पुराणों के निम्न श्लोक को पढ़ें-

"सद्यः क्षत्रियबीजेन राजपुत्रस्य योषिति।
बभूव तीवरश्चैव पतितो जारदोषतः।।
-ब्रह्मवैवर्तपुराण / (ब्रह्मखण्डः)/अध्यायः १०/श्लोकः (९९)

भावार्थ:-क्षत्रिय के बीज से राजपुत्र की स्त्री में तीवर उत्पन्न हुआ।वह भी व्याभिचार दोष के कारण पतित कहलाया।

यदि क्षत्रिय और राजपूत परस्पर पर्यायवाची शब्द होते तो क्षत्रिय पुरुष और राजपूत स्त्री की संतान राजपूत या क्षत्रिय ही होती न कि तीवर या धीवर ! इसके अतिरिक्त शब्दकल्पद्रुम में राजपुत्र को वर्णसंकर जाति लिखा है ।

जबकि क्षत्रिय वर्णसंकर नही...
Manohar Laxman  varadpande(1987). History of Indian theatre: classical theatre. Abhinav Publication. Page number 290
"The word kshatriya is not synonyms with Rajput."

अर्थात- क्षत्रिय शब्द राजपूत का पर्यायवाची नहीं है। मराठी इतिहासकार कालकारंजन  ने अपनी पुस्तक (प्राचीन- भारताचा इतिहास) के हर्षोत्तर उत्तर भारत नामक विषय के प्रष्ठ संख्या (३३८ में राजपूत और वैदिक क्षत्रिय भिन्न भिन्न बतलाये हैं।

 वैदिक क्षत्रियों द्वारा पशुपालन करने का उल्लेख धर्म ग्रंथों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है जबकि राजपूत जाति पशुपालन को अत्यंत घृणित दृष्टि से देखती है और पशुपालन के प्रति संकुचित मानसिकता रखती है...

महाभारत में जरासंध पुत्र सहदेव द्वारा गाय भैंस भेड़ बकरी को युधिष्ठिर को भेंट करने का उल्लेख मिलता है;युधिष्ठिर जो कि एक क्षत्रिय थे पशु पालन करते होंगे तभी कोई भेंट में पशु देगा-
                    ★सहदेव-उवाच★
इमे रत्नानिभूरिणी गोजाविमहिषादयः।।
हस्तिनोऽश्वाश्च गोविन्द वासांसि विविधानिच।
दीयतां धर्मराजाय यथा वा मन्यतेभवान्
~महाभारत सभापर्व(जरासंध वध पर्व)अध्याय: २४श्लोक: ४१-सहदेव ने कहा- प्रभो! ये गाय, भैंस, भेड़-बकरे आदि पशु, बहुत से रत्न, हथी-घोड़े और नाना प्रकार के वस्त्र आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। गोविन्द! ये सब वस्तुएँ धर्मराज युधिष्ठिर को दीजिये अथवा आपकी जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझ सवा के लिये आदेश दीजिये। इसके अतिरिक्त कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता ७/१/४/९ में क्षत्रिय को भेड़ पालने के लिए कहा गया है।

कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत एक संघ है 
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है-
Brajadulal Chattopadhyay 1994; page number 60- प्रारंभिक मध्ययुगीन साहित्य बताता है कि इस नवगठित राजपूत में कई जातियों के लोग शामिल थे। भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने इस ऐतिहासिक तथ्य का पूर्णतः पता लगा लिया है कि जिस काल में इस जाति का भारत के राजनैतिक क्षेत्र में पदार्पण हुआ था, उस काल में यह एक नवागन्तुक जाति समझती जाती थी। बंगाल के अद्वितीय विद्वान स्वर्गीय श्री रमेशचंद्र दत्त महोदय अपने (Civilization in Ancient India) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ के भाग-२ , प्रष्ठ १६४ में लिखते है-

आठवीं शताब्दी के पूर्व राजपूत जाति हिंदू आर्य नहीं समझी जाती थी। देश के साहित्य तथा विदेशी पर्यटकों के भृमण वृत्तान्तों में उनके नाम का उल्लेख हम लोगों को नहीं मिलता और न उनकी किसी पूर्व संस्कृति के चिन्ह देखने में आते हैं।

 डॉक्टर एच० एच० विल्सन् ने यह निर्णय किया है कि ये(राजपूत)उन शक आदि विदेशियों के वंशधर है जो विक्रमादित्य से पहले,सदियों तक भारत में झुंड के झुंड आये थे।

विदेशी जातियां शीघ्र ही हिंदू बन गयी।वे जातियाँ अथवा कुटुम्ब जो शासक पद को प्राप्त करने में सफल हुए हिंदुओं की राज्यशासन पद्धति में क्षत्रिय बनकर तुरन्त प्रवेश कर गए।इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर के परिहार तथा अनेक अन्य राजपूत जातियों का विकास उन बर्बर विदेशियों से हुआ है, जिनकी बाढ़ पाँचवीं तथा छठी शताब्दीयों में भारत में आई थी।

इतिहास-विशारद स्मिथ साहब अपने Early History of India including Alexander's Compaigns, second edition,page no. 303 and 304 में लिखते हैं-
आगे दक्षिण की ओर से बहुत सी आदिम अनार्य जातियों ने भी हिन्दू बनकर यही सामाजिक उन्नति प्राप्त कर ली,जिसके प्रभाव से सूर्य और चंद्र के साथ सम्बन्ध  जोड़ने वाली वंशावलियों से सुसज्जित होकर गोड़, भर,खरवार आदि क्रमशः चन्देल, राठौर,गहरवार तथा अन्य राजपूत जातियाँ बनकर निकल पड़े।

इसके अतिरिक्त स्मिथ साहब अपने The Oxford student's history of India, Eighth Edition, page number 91 and 92 में लिखते हैं- उदाहरण के लिए अवध की प्रसिद्ध राजपूत जाति जैसों को लीजिये।ये भरों के समीपी सम्बन्धी अथवा अन्य इन्हीं की संतान हैं।आजकल इन भरों की प्रतिनिधि, अति ही नीची श्रेणी की एक बहुसंख्यक जाति है।

जस्टिस कैम्पबेल साहब ने लिखा है कि प्राचीन-काल की रीति-रिवाजों (आर्यों की) को मानने वाले जाट, नवीन हिन्दू-धर्म के रिवाजों को मानने पर राजपूत हैं। 

जाटों से राजपूत बने हैं न कि राजपूतों से जाट। जबकि स्व० प्रसिद्ध इतिहासकार  शूरवीर पँवार ने अपने एक शोध आलेख में गुर्जरों को राजपूतों का पूर्वज माना है।

मुहम्मद कासिम फरिश्ता ने भी राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में फ़ारसी में अपनी पुस्तक
"तारीक ऐ फरिश्ता" में अपना मत प्रस्तुत किया है इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया -
Lt Colonel John Briggs ने जो मद्रास आर्मी में थे, किताब के पहले वॉल्यूम ( Volume - 1 ) के Introductory Chapter On The Hindoos में पेज नंबर 15 पर लिखा है-

The origion of Rajpoots is thus related The rajas not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves who although not legitimate successors to the throne ,were Rajpoots or the children of the rajas "अर्थात:- राजा अपनी पत्नियों से संतुष्ट नहीं थे, उनकी महिला दासियो द्वारा अक्सर बच्चे होते थे, जो सिंहासन के लिए वैध उत्तराधिकारी नहीं थे, लेकिन इनको राजपूत या राजा के बच्चे या राज पुत्र कहा जाता था । प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद जी ने अपनी पुस्तक- "A Short History Of Muslim Rule In India" के पेज नंबर 19 पर बताया है की राजपुताना में किसको बोला जाता है राजपूत-
The word Rajput in comman paralance,in certain states of Rajputana is used to denote the illegitimate sons of a Ksatriya chief or a jagirdar.-अर्थात:-राजपुताना के कुछ राज्यों में आम बोल चाल में राजपूत शब्द का प्रयोग एक क्षत्रिय मुखिया या जागीरदार के नाजायज बेटों को सम्बोधित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। विद्याधर महाजन जी ने अपनी पुस्तक "Ancient India" जो की 1960 से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाई जा रही है ,  के पेज 479 पर लिखा है:-The word Rajput is used in certain parts of Rajasthan to denote the illegitimate sons of a Kshatriya Chief ar Jagirdar. अर्थात:- राजपूत शब्द राजस्थान के कुछ हिस्सों में एक क्षत्रिय प्रमुख या जागीरदार के नाजायज बेटों को निरूपित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
History of Rise of Mohammadan power in India, volume 1, chapter 8
The Rajas, not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves, who, although not legitimate successors to the throne,were styled rajpoots, or the children of the rajas. 
The muslim Invaders took full advantage of this realy bad and immoral practice popular among indian kings, to find a good alley among hindoos and to also satisfy their own lust and appointed those son of kings as their Governors.
During mugal period this community became so powerful that they started abusing their own people motherland.
History of Rajsthan book "He was son of king but not from the queen."
राजस्थान का इतिहास भाग-1:-गोला का अर्थ दास अथवा गुलाम होता है। 

भीषण दुर्भिक्षों के कारण राजस्थान में गुलामों की उत्पत्ति हुई थी। इन अकालों के दिनों में हजारों की संख्या में मनुष्य बाजारों में दास बनाकर बेचे जाते थे। पहाड़ों पर रहने वाली पिंडारी और दूसरी जंगली जातियों के अत्याचार बहुत दिनों तक चलते रहे और उन्हीं जातियों के लोगों के द्वारा बाजारों में दासों की बिक्री होती थी, वे लोग असहाय राजपूतों को पकड़कर अपने यहाँ ले जाते थे और उसके बाद बाजारों में उनको बेच आते थे। इस प्रकार जो निर्धन और असहाय राजपूत खरीदे और बेचे जाते थे, उनकी संख्या राजस्थान में बहुत अधिक हो गयी थी और उन लोगों की जो संतान पैदा होती थी, वह गोला के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन गुलाम राजपूतों को गोला और उनकी स्त्रियों तथा लड़कियों को गोली कहा जाता था। इन गोला लोगों में राजपूत, मुसलमान और अनेक दूसरी जातियों के लोग पाये जाते हैं।

बाजारों में उन सबका क्रय और विक्रय होता है। बहुत से राजपूत सामन्त इन गोला लोगों की अच्छी लड़कियों को अपनी उपपत्नी बना लेते हैं और उनसे जो लड़के पैदा होते हैं, वे सामन्तों के राज्य में अच्छे पदों पर काम करने हेतु नियुक्त कर दिये जाते हैं। 

देवगढ़ का स्वर्गीय सामन्त जब उदयपुर राजधानी में आया करता था तो उसके साथ तीन सौ अश्वारोही गोला सैनिक आया करते थे।

 उन सैनिकों के बायें हाथ एक-एक साने का कडा होता था । जैसा कि राजस्थान का इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है कि इन्हें अच्छे पदों पर काम करने के हेतु नियुक्त किया जाता था और history of Rise of Mohammadan में भी लिखा कि मुगल काल में ये शक्तिशाली होने लगे तब इन्होंने सत्ता के लिए लड़ना प्रारम्भ कर दिया जैसा कि ऐतिहासिक ग्रंथो में ऐसे राजाओं के प्रमाण मिल जायेंगे जो जीवन भर सत्ता के लिए लड़ते रहे जैसा कि कर्नल टॉड की किताब राजस्थान का इतिहास में कन्नौज और अनहिलवाडा के राजाओं ने सत्ता के लिए पृथ्वीराज चौहान को शक्तिहीन करने के लिए गजनी के शाहबुद्दीन को आमंत्रित किया !

और अजीत सिंह ने सत्ता के लिए राजा दुर्गादास राठौर को राज्य से निष्कासित करवा दिया।
राणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने सत्ता के लिए विक्रमादित्य की हत्या करवाई... इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा की एक पुस्तक में प्रताप सिंह द्वारा सत्ता के लिए जगपाल को मारने का उल्लेख मिलता है।

पृथ्वीराज उड़ाना और राणा सांगा के मध्य सत्ता के लिए खुनी झगड़ा होने का ऐतिहासिक पुस्तको में जिक्र मिलता है और इसी झगड़े में राणा सांगा अपनी एक आँख और हाथ खो देते है और पृथ्वीराज उड़ाना को मरवा देते है।

कैसे सत्ता के लिए राजकुमार रणमल राठौर राणा मोकल को रेकय से निकलवा देता है और राणा राघव देव की हत्या करवा देता है!!

ऐसे करके ये सत्ता में बने रहे और इनकी वित्तीय स्थिति काफी मजबूत हो गयी...

वित्तमेव कलौ नृणां जन्माचारगुणोदयः। धर्मन्यायव्यवस्थायां कारणं बलमेव हि।।~श्रीमद्भागवत महापुराण द्वादश स्कन्ध द्वितीय अध्याय श्लोक संख्या २। 
भावार्थ:-कलयुग में जिसके पास धन होगा,उसी को लोग कुलीन,सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे।
जिसके हाथ में शक्ति होगी वही धर्म और न्याय की व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा।

राजपूतों ने मुगलों को तो अपनी बेटियाँ दीं राजसत्ताओं के लालच में क्योंकि  कन्या अथवा स्त्री इनके लिए भोग के ही साधन थे।

 हिन्दु स्मृति- ग्रन्थों को आधार मानकर स्त्रियों के प्रति तत्कालीन पुरोहित और राजपूत समाज का दृष्टि कोण  समतामूलक नहीं था लैंगिक स्तर पर स्त्री का बजूद सन्तान उत्पादिका और उपभोग हेतु था।

जब राजपूत और राजपूताना के इतिहास पर चर्चा होती है तो उस काल मे राजपूत शासकों के आश्रित एवं स्वतन्त्र रूप से लिखी गई ख्यातों से तमाम ऐतिहासिक साक्ष्य लिए जाते हैं ।

तथा उनकी पुष्टि करण हेतु अन्य स्रोतों से साम्य करने के बाद उसे इतिहास की शक्ल या प्रारूप दिया जाता है। 

ऐसी ही एक ख्यात का ज़िक्र लेखक और पत्रकार नज़ीर मलिक साहब के हरा ले की जानिब से है जिसमें राष्ट्रकवि "रामाधारी सिंह दिनकर" ने अपनी पुस्तक 
"संस्कृति के चार अध्याय' के पृष्ठ संख्या 232-33 पर दिया है , जिससे पता चलता है कि मुगलों की इच्छा के बाद भी उनकी लड़कियाँ राजपूतों से क्यों नही ब्याही जा सकीं, जब कि राजपूतों की लड़कियां मुगकों के घर आती रहीं।

स्वर्गीय दिनकर जी ने राजस्थान की प्रसिद्ध ख्यात "वीर विनोद" के हवाले से लिखा है कि जब हुमायूँ  अचानक सूरी से हार कर ईरान में शरण लिए हुए था तो एक दिन शेरशाह ने ईरान में हुमायूं से पूछा कि मुगल अपनी बेटियों की शादियां हिन्दुस्थान  की किसी वीर जाति से की है या नहीं।  
इस पर मुगल शासक हुमायूँ ने बादशाह से कहा कि पठान तो हमारे शत्रु हैं,  और राजपूत हमसे बेटी लेंगे नहीं।  

ये बात हुमायूँ को खटक रही  थी अतः मरने से पूर्व उसने अकबर को आदेश दिया कि वह राजपूतों से दोस्ती करने के लिए उससे रोटी-बेटी का सम्बंध बनाने का प्रयास ज़रूर करे। 

हुमायूँ की इसी वादीयत के मुताबिक अकबर ने कई राजपूत सरदारों से कहा कि वे मुगलों की बेटी से शादिया करें। 

लेकिन अकबर का यह प्रस्ताव राजपूत सरदारों के गले नही उतरा। 

राजपूतों का विचार था। कि अगर उन्होंने मुगल शहज़ादियों से शादियां की तो हिन्दू शास्त्र के अनुसार वे सब भ्रष्ट हो जाएँगे और मुसलमान मान लिए जाएँगे। 

"इसलिए आपस मे सोच विचार कर उन्होंने निर्णय लिया कि राजपूत भले अपनी बेटी मुगलों को व्याह कर उसे त्याग देंगे मगर वे मुगलों की बेटी नही लाएंगे। 

सन्दर्भ- (वीर विनोद, द्वितीय खंड, भाग एक, पृष्ठ 170 की पाद टिप्पणी से )

वीर विनोद नामक ख्यात में लिखी बात की पुष्टि करते हुए राजपूतों की वीरता और वफादारी पर कुछ और भी लिखा है जिसे अकबरकालीन किताब "महसिरुल उमरा" से लिया है।

इन बातों से पता चलता है कि मुगलो की ज़्यादातर शहजादियाँ कुँवारी क्यों राह जाती थी ? 

दूसरी बात यह कि तत्कालीन हिन्दू धर्म पर बंदिशें कितनी सख्त थीं कि वहाँ किसी मुलिम को हिन्दू धर्म मे शामिल करने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।                                                  जबकि हिन्दू मुस्लिम तो बन सकता था ।

सती प्रथा बालकन्याविवाह आदि कुप्रथाऐं उपभोगात्मक और निज भोगारक्षण को दृष्टि गत करके बनायी गयी थीं ।
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16 वीं शताब्दी के मध्यकालीन समय के बाद, कई राजपूत शासकों ने मुगल सम्राटों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए और विभिन्न क्षमताओं से उनकी सेवा की। राजपूतों के समर्थन के कारण ही अकबर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने में सक्षम हुआ था।

राजपूत रईसों ने अपने राजनैतिक उद्देश्यों के लिए मुगल बादशाहों और उनके राजकुमारों से अपनी बेटियों की शादी करवाई थी।

उदाहरण के लिए, अकबर ने अपने लिए और अपने पुत्रों व पौत्रों के लिए 40 शादियां सम्पन्न कीं, जिनमें से 17 राजपूत-मुगल गठबंधन थे। 

मुगल सम्राट अकबर के उत्तराधिकारी, उनके पुत्र जहाँगीर और पोते शाहजहाँ की माताएँ राजपूत थीं।

मेवाड़ के सिसोदिया राजपूत परिवार ने मुगलों के साथ वैवाहिक संबंधों में नहीं जुड़ने को सम्मान की बात बना दिया और इस तरह से वे अन्य सभी राजपूत कुलों से विपरीत खड़े रहे थे।

इस समय के पश्चात राजपुतों और मुगलों के बीच वैवाहिक संबंधों में कुुछ कमी आई।

राजपूतों के साथ अकबर के संबंध तब शुरू हुए थे जब वह 1561 में आगरा के पश्चिम में सीकरी के चिस्ती सूफी शेख की यात्रा से लौटा था। 

तभी बहुत राजपूत राजकुमारियों ने अकबर से शादी रचाई थी।

राजपूत-मुग़ल वैवाहिक संबंधों की सूची-
मुख्य राजपूत-मुग़ल वैवाहिक संबंधों की सूची
जनवरी 1562, अकबर ने राजा भारमल की बेटी से शादी की. (कछवाहा-अंबेर)

15 नवंबर 1570, राय कल्याण सिंह ने अपनी भतीजी का विवाह अकबर से किया (राठौर-बीकानेर)

1570, मालदेव ने अपनी पुत्री रुक्मावती का अकबर से विवाह किया. (राठौर-जोधपुर)
1573, नगरकोट के राजा जयचंद की पुत्री से अकबर का विवाह (नगरकोट)

मार्च 1577, डूंगरपुर के रावल की बेटी से अकबर का विवाह (गहलोत-डूंगरपुर)

1581, केशवदास ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर से किया (राठौर-मोरता)
16 फरवरी, 1584, राजकुमार सलीम (जहांगीर) का भगवंत दास की बेटी से विवाह (कछवाहा-आंबेर)
1587, राजकुमार सलीम (जहांगीर) का जोधपुर के मोटा राजा की बेटी से विवाह (राठौर-जोधपुर)
2 अक्टूबर 1595, रायमल की बेटी से दानियाल का विवाह (राठौर-जोधपुर)

28 मई 1608, जहांगीर ने राजा जगत सिंह की बेटी से विवाह किया (कछवाहा-आंबेर)
1 फरवरी, 1609, जहांगीर ने राम चंद्र बुंदेला की बेटी से विवाह किया (बुंदेला, ओर्छा)

अप्रैल 1624, राजकुमार परवेज का विवाह राजा गज सिंह की बहन से (राठौर-जोधपुर)
1654, राजकुमार सुलेमान शिकोह से राजा अमर सिंह की बेटी का विवाह(राठौर-नागौर)

17 नवंबर 1661, मोहम्मद मुअज्जम का विवाह किशनगढ़ के राजा रूप सिंह राठौर की बेटी से(राठौर-किशनगढ़)
5 जुलाई 1678, औरंगजेब के पुत्र मोहम्मद आजाम का विवाह कीरत सिंह की बेटी से हुआ. कीरत सिंह मशहूर राजा जय सिंह के पुत्र थे. (कछवाहा-आंबेर)
30 जुलाई 1681, औरंगजेब के पुत्र काम बख्श की शादी अमरचंद की बेटी से हुए(शेखावत-मनोहरपुर)[13][14][15]
सन्दर्भ★-

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↑ Hansen, Waldemar (1972). The peacock throne : the drama of Mogul India (1. Indian ed., repr. संस्करण). Delhi: Motilal Banarsidass. पपृ॰ 12, 34. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-208-0225-4.
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↑ "पद्मावती : जिनके लिए लड़ रहे हो वो तो आपस में मौज से रहते थे". iChowk.in. 2017-11-26. अभिगमन तिथि 2020-07-12.
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इतिहास के बिखरे हुए पन्नों से -.........

राजपूतों की उत्पत्ति-

इतिहास के बिखरे हुए पन्ने

​राजपूतों की उत्पत्ति और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: एक सम्यक् विश्लेषण

​भारतीय इतिहास में 'राजपूत' शब्द, उनकी उत्पत्ति, और विभिन्न जातियों के साथ उनके संबंधों का विषय अत्यंत व्यापक और बहुआयामी रहा है। प्रस्तुत आलेख में पौराणिक ग्रंथों, स्मृतियों, मूल श्लोकों और ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय साक्ष्यों के आधार पर इस विषय की सम्यक् व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है।

​1. पौराणिक ग्रंथों एवं स्मृतियों में उत्पत्ति के आख्यान और मूल श्लोक

​विभिन्न धार्मिक एवं पौराणिक ग्रंथों में राजपूतों या राजपुत्रों की उत्पत्ति को लेकर जो संदर्भ मिलते हैं, उनके मूल श्लोक और हिंदी अनुवाद निम्नलिखित हैं:

क) ब्रह्मवैवर्त पुराण के संदर्भ-

क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह।राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।११०।‎

हिंदी अनुवाद व व्याख्या:

प्रथम श्लोक के अनुसार, क्षत्रिय पुरुष से करण (चारण) कन्या में 'राजपुत्र' की उत्पत्ति बताई गई है, तथा राजपुतानी (राजपुत्र की स्त्री) में करण पुरुष से 'आगरी' (नमक बनाने वाले या बंजारे से संबंधित समूह) की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। द्वितीय श्लोक में यह वर्णन है कि क्षत्रिय के बीज से राजपुत्र की स्त्री में व्यभिचार दोष के कारण 'तीवर' (धीवर) नामक संतान उत्पन्न हुई।



(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मखण्ड, अध्याय १०, श्लोक ११०)

राजपूत शब्द हमें स्कंद पुराण के सह्याद्री खण्ड में भी देखने को मिलता है जो कि इस प्रकार एक वर्णसंकर जाति के अर्थ में है-

"शय्या विभूषा सुरतं भोगाष्टकमुदाहृतम्। शूद्रायां क्षत्रियादुग्रः क्रूरकर्मा प्रजायते।।४७।।

"शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्रामकुशलो भवेत्।तया वृत्त्या स जीवेद्यो शूद्रधर्मा प्रजायते।।४८।।

राजपूत इति ख्यातो युद्धकर्मविशारदः।वैश्य धर्मेण शूद्रायां ज्ञात वैतालिकाभिध:।४९ ।

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उपर्युक्त सन्दर्भ:-(स्कन्दपुराण- आदिरहस्य सह्याद्रि-खण्ड- व्यास देव व सनत्कुमार का संकर जाति विषयक संवाद नामक २६ वाँ अध्याय-श्लोक संख्या- ४७,४८,४९ पर राजपूतों की उत्पत्ति वर्णसंकर के रूप में है ।

( भावार्थ:-क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;

हिंदी अनुवाद व व्याख्या:

इस खंड के अनुसार, क्षत्रिय पुरुष से शूद्र जाति की स्त्री में जो संतान उत्पन्न होती है, वह उग्र स्वभाव, क्रूरकर्मा, शस्त्रविद्या में कुशल और रणचतुर होती है तथा शूद्र धर्म का पालन करते हुए शस्त्र-वृत्ति से जीविका चलाती है—उसे 'राजपूत' कहा गया है।


पाराशर स्मृति 

शब्दकल्पद्रुम व वाचस्पत्य में भी एक अन्य स्थान पर भी राजपुत्र शब्द जातिसूचक शब्द के रूप में आया है; जो कि इस प्रकार है:-

 ३- वर्णसङ्करभेदे राजपुत्र “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां राजपुत्रस्य सम्भवः” इति पराशरःसंहिता ।

अर्थात:- वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उतपन्न होता है।

हिंदी अनुवाद व व्याख्या:

इस स्मृति ग्रंथ के अनुसार वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में 'राजपुत्र' की उत्पत्ति का संदर्भ दिया गया है।

अमरकोष)

  • व्याख्या: इस प्रसिद्ध कोष में मूर्धाभिषिक्त, राजन्य, बाहुज, क्षत्रिय, विराट, राजा, नृप, भूप आदि को क्षत्रिय का पर्यायवाची बताया गया है, किंतु इसमें 'राजपूत' शब्द या उसका कोई तदर्थक रूप सम्मिलित नहीं है।
  • ​यूरोपीय विद्वान मोनियर विलियम्स ने भी अपने संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश (पृष्ठ ८७३) में इसे वर्णसंकर उत्पत्ति के अंतर्गत परिभाषित किया है।
  • वैदिक एवं महाभारत कालीन साक्ष्य: वैदिक ग्रंथों और महाभारत (जैसे सभापर्व में जरासंध पुत्र सहदेव द्वारा युधिष्ठिर को गो-महिषादि पशुओं की भेंट का प्रसंग, तथा कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता ७/१/४/९) में क्षत्रियों द्वारा पशुपालन का उल्लेख मिलता है, जबकि उत्तरकालीन राजपूत परंपराओं में पशुपालन को भिन्न सामाजिक दृष्टिकोण से देखा गया।

ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण

  • मध्यकालीन फारसी इतिहास: सोलहवीं सदी के फारसी इतिहासकार मोहम्मद कासिम फ़िरिश्ता ने अपनी पुस्तक 'तारीख़-ए-फ़िरिश्ता' में उल्लेख किया है कि राजाओं की वैध पत्नियों के अतिरिक्त अन्य माध्यमों या दासियों से उत्पन्न संतानों को सिंहासन का पूर्ण वैध उत्तराधिकारी नहीं माना जाता था, किंतु वे राजाओं के पुत्र या 'राजपूत' कहलाए।
  • आधुनिक इतिहासकार और विदेशी उत्पत्ति का मत:
    • डॉ. एच.एच. विल्सन और विंसेंट स्मिथ जैसे इतिहासकारों का मत है कि शक, हूण जैसी विदेशी जातियों तथा भर, खरवार जैसी स्थानीय जनजातियों के भारतीय समाज में आत्मसात होने और शासक वर्ग में प्रवेश पाने के फलस्वरूप इस योद्धा समुदाय (राजपूत) का विस्तार हुआ।
    • बृजदुलाल चट्टोपाध्याय जैसे समाजशास्त्रियों के अनुसार, प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में 'राजपूत' कोई एक एकल जाति न रहकर विभिन्न जनसांख्यिकीय समूहों, चारण-भाटों और योद्धा समुदायों का एक वृहद संघ या समागम बनकर उभरा था।

​निष्कर्ष

​राजपूतों की उत्पत्ति से जुड़े पौराणिक आख्यान, श्लोक और ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय विश्लेषण यह दर्शाते हैं कि भारतीय समाज की संरचना अत्यंत जटिल, गतिशील और बहुपरत रही है। वंशावलियों और इतिहास के इन विभिन्न पक्षों का अध्ययन हमें समाज के विकास क्रम को गहराई से समझने में सहायता करता है।



मंगलवार, 11 अगस्त 2026

चौहानों का जाट गूजर और राजपूत संघ में विलय-

गूजर, जाट और राजपूत संघों में विलय हुए चौहान राजपूत: एक ऐतिहासिक विश्लेषण

​[दृश्य 1: परिचय (Introduction)]

  • विजुअल (Visual): पृष्ठभूमि में भारत का प्राचीन मानचित्र और भारतीय इतिहास के महान योद्धाओं (विशेषकर चौहान वंश) की झलकियां। स्क्रीन पर शीर्षक उभरता है: "चौहान जाति का इतिहास: गूजर, जाट और राजपूत संघों में विलय"
  • वॉयसओवर (Voiceover): "भारतीय इतिहास में जब भी पराक्रम, वीरता और आन-बान-शान की बात होती है, तो चौहान राजवंश का नाम सबसे पहले लिया जाता है। पृथ्वीराज चौहान जैसे महान योद्धा इसी वंश की देन रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि समय के साथ राजनीतिक, भौगोलिक और सामाजिक बदलावों के कारण चौहान वंश की कई शाखाएं अलग-अलग समुदायों—विशेषकर गूजर, जाट और राजपूत समाजों का अभिन्न हिस्सा बन गईं? आइए, आज के इस वीडियो में इतिहास के पन्नों को पलटकर इस दिलचस्प सच्चाई को समझते हैं।"

​[दृश्य 2: चौहान वंश की उत्पत्ति और विस्तार (Origin and Expansion)]

  • विजुअल (Visual): सांभर (शाकिंभरी), अजमेर और रणथंभौर के प्राचीन किलों के चित्र।
  • वॉयसओवर (Voiceover): "मूल रूप से चौहान (या चाउहूण/चाहमान) राजवंश की शुरुआत शांभरी (सांभर, राजस्थान) से हुई थी। कालान्तर में यह वंश मध्यकालीन भारत का एक अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक और सैन्य बल बनकर उभरा। अजमेर, दिल्ली, नाडोल, जालौर और रणथंभौर जैसे बड़े क्षेत्रों पर इनका शासन रहा। लेकिन जैसे-जैसे सल्तनत और मुगल काल में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं, राजवंश के कई समूह अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर बस गए और वहां की स्थानीय संस्कृति व समुदायों में घुल-मिल गए।"

​[दृश्य 3: राजपूत संघ और चौहान (Chauhans in Rajput Confederacy)]

  • विजुअल (Visual): राजस्थान के पारंपरिक योद्धा, तलवारें और पगड़ी पहने राजपूत राजाओं की पेंटिंग्स।
  • वॉयसओवर (Voiceover): "सबसे पहले बात करते हैं राजपूत संघ की। राजपूतों की 36 राजकुलों (शाही कुलों) की सूचियों में चौहानों को प्रमुख स्थान प्राप्त है। मध्यकाल में जब राजपूत पहचान एक मजबूत सैन्य और राजनीतिक छतरी के रूप में संगठित हुई, तो चौहानों का मुख्य धड़ा इसी राजपूत संघ का मुख्य स्तंभ बन गया। पृथ्वीराज रासो और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ इस बात के गवाह हैं कि चौहानों ने अपनी क्षत्रिय परंपरा और रक्षात्मक नीतियों के तहत राजपूत पहचान को सबसे प्रमुखता से जीवित रखा।"

​[दृश्य 4: गूजर संघ और चौहान शाखाएं (Chauhans in Gujjar Community)]

  • विजुअल (Visual): उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गुर्जर बहुल क्षेत्रों के दृश्य।
  • वॉयसओवर (Voiceover): "लेकिन इतिहास का एक और पहलू यह भी है कि गुर्जर बहुल क्षेत्रों (जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्से) में रहने वाले कई चौहान गोत्र के लोग समय के साथ गूजर संघ या समाज का हिस्सा बन गए। इतिहासकार बताते हैं कि जब गुर्जर साम्राज्य और उनके प्रभाव क्षेत्र उत्तर-पश्चिम भारत में फैले थे, तब चौहान वंश के कई स्थानीय शासक और योद्धा प्रशासनिक और वैवाहिक संबंधों के चलते गुर्जर समुदाय के साथ पूरी तरह एकीकृत हो गए। आज भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में कई 'चौहान गोत्र' के गुर्जर परिवार मौजूद हैं, जो अपनी इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर गर्व करते हैं।"

​[दृश्य 5: जाट संघ और चौहान गोत्र (Chauhans in Jat Community)]

  • विजुअल (Visual): जाट बहुल कृषि क्षेत्रों, हरियाणवी संस्कृति और पारंपरिक जाट पगड़ी के दृश्य।
  • वॉयसओवर (Voiceover): "इसी प्रकार, कृषि प्रधान और योद्धा स्वभाव वाले जाट समुदाय में भी चौहान गोत्र बड़े पैमाने पर पाया जाता है। हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के शेखावाटी व जाटी क्षेत्रों में कई ऐसे जाट गोत्र हैं जो खुद को ऐतिहासिक रूप से चौहान वंश से जुड़ा हुआ मानते हैं। मध्यकालीन उथल-पुथल के दौर में जब कई क्षत्रिय परिवारों ने अपनी रियासतें खो दीं और कृषि को अपनाया या स्थानीय कृषि-योद्धा जातियों के साथ संबंध स्थापित किए, तब वे जाट समाज का हिस्सा बन गए। यही कारण है कि आज भी कई जाट गोत्रों के कुल-देवता और परंपराएं चौहानों से मिलती-जुलती हैं।"

​[दृश्य 6: निष्कर्ष (Conclusion)]

  • विजुअल (Visual): भारत का तिरंगा झंडा और विभिन्न जातियों/संस्कृतियों के मेल-मिलाप को दर्शाती हुई सौहार्दपूर्ण तस्वीरें।
  • वॉयसओवर (Voiceover): "निष्कर्ष रूप में कहें तो, 'चाउहूण' या चौहान केवल एक सीमित दायरे तक बंधा नाम नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास का एक व्यापक वृत्तांत है। समय, भूगोल और सामाजिक गतिशीलता के चलते इस वंश के वंशज आज राजपूत, गूजर और जाट—तीनों प्रमुख समुदायों में सम्मान के साथ रचे-बसे हैं। नाम और गोत्र भले ही एक ही जड़ से निकले हों, लेकिन आज ये सभी समाज भारत की विविधता और सांस्कृतिक धरोहर की असली ताकत हैं।"

​[दृश्य 7: आउट्रो (Outro)]

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  • वॉयसओवर (Voiceover):
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सोमवार, 10 अगस्त 2026

संशोधित गीत

मुखड़ा )
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
तेरे भजनों को गाएंगे, सजदे में सर झुकाएंगे।
पुकार हमारी सुन ले ओ भक्तों के रखवाले।
********
माया का यह प्रपंच, जग झूठी शान दिखाता है
जो दिखता है चोले में, मन में नहीं वो पाता है
यह झूठा जगत मुसाफिर, मतलब का सब नाता है ।
जिसने करके पाया यहाँ, खाली वो जाता है।
उम्र से  गुजर जाएंगे,तब पढाब अनुभव के पाऐंगे।
ज्ञान की ज्योति को  जलाएंगे, अज्ञान का तमस मिटाएंगे
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
तेरे भजनों को गाएंगे, सजदे में सर झुकाएंगे।
ये भाव हमारे सुन ले ओ भक्तों के रखवाले।

सुख और दुःख की लहरों में, मन क्यों घबराता है पगले।
जो आया है वो जाएगा, आये कितने गये काफिले।
जीवन की प्रयोग शाला में, हर जीव है अपनी उलझन में,
तू धीरज धर, विश्वास बढ़े, प्रभु का सिमरन कर ले मन में ,
कर्म की डोरी थाम के हम तो, भवसागर तर जाएंगे
तेरे भजनों को हम गाएंगे, सजदे में सर को झुकाएंगे।
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
ये भाव हमारे सुन ले ओ भक्तों के रखवाले ।

****
घट-घट वासी वो अंतर्यामी, हर कोने में वो रहता है।
बिन पग के वो सब जग चलता, बिन कानन के बह सुनता है।
जो शरणागत हो जाता है, उसके सारे कष्ट वो हरता है।
अब भेद मिटे द्विविधाओं के, उस मोहन से चित्त को लगाले 
प्रेम की धारा में बह कर, प्रभु चरणन में मिल जाएंगे
तेरे भजनों को हम गाएंगे, सजदे में सर को झुकाएंगे।
घनश्याम मुरली वाले, हम हैं तेरे हवाले
अरदास तुझ से करते, तू ही हमें संभाले
तू ही हमें संभाले,
ये भाव हमारे सुन ले ओ भक्तों के रखवाले ।
""""
उत्तरी भारतीय लोक संगीत शैली में हारमोनियम चीमटा व ढोलक की ताल पर गीत स्त्री पुरुष स्वर में गायें !


अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं। 

शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥

​अपने अहम में गुम है बटोही , चले जिन पथों पे मंज़िल ना कोई।

व्यर्थ ही समय को गंवा रहे हैं, आते हैं पास जो बनके अपने, वो ही आंखें दिखा रहे हैं॥

अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥

​हमारे दिल के गमों की शह पर, उभरते जख्मों की हर एक तह पर।

कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, मंदिर से जारत की महकमें, प्रसाद अब विष मिला रहे हैं॥

​थोड़ी सी जिंदगी अब सुधरलो, जीवन के सफर को पाथेय धरलो ।

न वक्त ऐसा, रहे हमेशा, पल पल चलना तुम संभल के॥

अरमाँ खाक हो गए जल के, आग अभी भी दहक रही है।

अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने ही खंजर दिखा रहे हैं॥

ईश्वर के नामों पर कर्म गन्दे, मंदिर में धन्धे चला रहे हैं॥

​अपने गमों के संग तू अकेला, खुशियों का तेरा झूठा मेला।

फिर भी वफ़ा की राहों पे चल के, ठोकरों में खुद ही संभल के॥

जंझाबतों से खुद निकल के, अब भी हम तो घबरा रहे हैं।

अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥

शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥

हमारे दिल के गमों की शह पर, उभरते जख्मों की हर एक तह पर।

कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, अजीब देखे हैं हम मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥

प्रस्तुत गजल को सुगम संगीत की शैली में 
राग काफी (Kafi Raga) पर आधारित करके गायें और इसे आमतौर पर कहरवा ताल में गाया-बजायें इस अर्ध-शास्त्रीय और गंधार (गा) और निषाद (नी) कोमल स्वरों का प्रयोग इसकी मिठास को और बढ़ाऐं।