आपकी मूल स्क्रिप्ट की लोक-धुन, भक्ति भाव और देहाती संदेशात्मक शैली को ध्यान में रखते हुए, प्रस्तुत हैं दो नए अंतरे:
[अन्तरा - ३]
(भक्ति भाव में बहता हुआ देहाती लोक-स्वर)
मुख्य गायिका:
माया-मोह का चक्र निरन्तर जो चला रहे हैं इस दुनियाँ को,
कर्म हैं इच्छा ,लोभ मन की परीक्षा। ये लाभ लोभ का कारण है ये पता नहीं सगुनियाँ को!
मन के धोखे बड़े अनोखे इस पे विश्वास करो मत भइया।
लोभ के भँबर मोह के गोते ।
सब उमर बीत गई तेरी रोते रोते।
भव सागर है यह कठिन डगर है।
गंगा मैली हुई पाप धोते धोते ।
तृष्णा की लहरों पर नइया। पार करे आजादपुर वाली मइया।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें