मंगलवार, 22 सितंबर 2026

मात का भजन -

उद्घोष :  ग्रामीण लोक धुन पर आधारित यह भक्त गीत लिखा है यादव योगेश कुमार रोहि नें 
उन्हीं के निर्देशन में "स्वर साधना संगीत संस्था ने इसे प्रस्तुत किया है।
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"जयकारा: जोर से -बोल आजादपुर वाली मइया। की जय! काली नदी तट वासिनी मइया की जय!


किऽऽऽस चीज़ पे... किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
​कोरस (तालियों की थाप के साथ दोहराते हुए):
हाँ रे मूरख! तू बस इतना जान!
सदा दिन रहते नहीं स-मा-न!
किस चीज़ पे... अरे किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान!
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अन्तरा - १]
​(मंजीरे की गूँज तेज़ होती है)
​मुख्य गायिका:
अरमान जो तूने पाले हैं... (आऽऽऽ)
वो खाक में मिलने वाले हैं!
तेरा गुरुर ! करे तुझसे दूर! पाप किए तूने भरपूर!
क्यों होश नहीं तुझे ज्ञान।
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
अन्तरा-२
सब कुछ तो वक्त के हवाले हैं! 
सब एक दिन जाने वाले हैं। 
मौत का खौफ नहीं उनको ,
जो अपना फर्ज सम्हाले हैं।
कर आजादपुर वाली मइया का ध्यान।
मइया करेगी तेरी कल्याण!
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !

अन्तरा(३)
कोई भटका हुआ !
लटका हुआ! 
अटका हुआ सब काम ! कोशिशें करी तमाम!
पर नहीं होगा समाधान !
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
मूरख तू  इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान!

​[अन्तरा -४ 
​मुख्य गायिका:
मन की इच्छाऐं हैं अनन्त !
पर जीवन की जरूरतें छोटी !
रहने, सोने को घर विस्तर, 
रोहि जिन्दा रहने को  रोटी ।!
​कोरस:
आदमी की नीयत खोटी ही कर देती  है हाऽऽन!
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान !
​कोरस (तालियों की थाप के साथ दोहराते हुए):
हाँ रे मूरख! तू बस इतना जान!
सदा दिन रहते नहीं स-मा-न!

"ये घाती और उत्पाती मन, यदि बुद्धि काना हो इसपे नियमन ! मन की माने वो अज्ञानी ! मन को वश में करता ज्ञानी।
मन खड़ा करदे तूफान ।
किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽन!
क्यों दिखा रहा अभिमान!
तू वश इतना जान ! सदा दिन रहते नहीं समान!

कुसंग से मन को बचाते रहो...
(ढोलक और तेज़ होती है)
कुसंग से मनको बचाते रहो... तुम भजन मइया के गाते रहो ! ध्यान करो मइया का सदा! दर्शन को दर पे आते रहो।
करो आरती गान!
सदा दिन रहते नहीं समान।
​समवेत स्वर (सभी महिलाएँ एक साथ, पूरी ऊर्जा से):
तुम भजन मइया के गाते रहो! तुम भजन मइया के गाते रहो!
फिर मइया ही सम्हालेगी कमाऽऽन!
हाँ रे मूरख, तू बस इतना जान!
सदा दिन रहते नहीं समान!
किस चीज़ पे तुझे गुमान!
​(लय अचानक दुगुनी होती है)
कोरस (तेज़ गति में):
मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान!
मूरख तू बस इतना जान! सदा दिन रहते नहीं समान!
किस चीज़ पे तुझे गुमान! किस चीज़ पे तुझे गुमाऽऽऽऽन!
​(ढोलक की एक ज़ोरदार थाप - धा धिन ता! और मंजीरे की गूँज के साथ गीत समाप्त होता है)
समवेत स्वर में: –
बोल आजादपुर वाली मइया। की जय!
विशेष:
उपर्युक्त गीत को उत्तर भारतीय लोक ग्रामीण संगीत धुन व कब्बाली की शैली में राजस्थानी आलाप लेते हुए  द्रुत ताल व विलम्बित लय में लड़कीयों के कोरस स्वर में गाकर ऑडियो में जनरेट करें !

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