द्रौपदी के शारीरिक लक्षणों, उनकी हथेलियों और पैरों के तलवों पर कमल और शंख (पद्म और शंख) के दिव्य प्रतीकों का विस्तृत वर्णन महाभारत के विराट पर्व के अंतर्गत ९वें अध्याय में मिलता है।
जब द्रौपदी अज्ञातवास के दौरान राजा विराट की पत्नी महारानी सुदेष्णा के पास दासी (सैरन्ध्री) बनने के लिए जाती हैं, तब महारानी सुदेष्णा उनके अलौकिक सौंदर्य और इन राजसी व दिव्य शुभ-लक्षणों को देखकर चकित रह जाती हैं।
इस प्रसंग का श्लोक और उसका संदर्भ इस प्रकार है:
महाभारत संदर्भ
- पर्व: विराट पर्व (चौथा पर्व)
- उप-पर्व: पाण्डवप्रवेश पर्व
- अध्याय: ९ (कुछ संस्करणों में अध्याय १५ या १६ के रूप में भी गणना मिलती है, क्योंकि विभिन्न प्रकाशनों में अध्यायों का विभाजन थोड़ा भिन्न है)।
मुख्य श्लोक व अर्थ
महाभारत में सुदेष्णा द्रौपदी के पैरों और हाथों के शुभ लक्षणों को देखकर कहती हैं:
अंगुष्ठावेव कुरुते पादौ च सुप्रतिष्ठितौ।
यस्याः पद्मौ च शंखौ च हस्तपादतले तथा ॥
(अर्थ: तुम्हारे पैर भूमि पर पूरी तरह सीधे और सुप्रतिष्ठित टिकते हैं, और तुम्हारी दोनों हथेलियों तथा दोनों पैरों के तलवों में कमल (पद्म) और शंख जैसे दिव्य व शुभ राजसी चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।)
इसके अतिरिक्त, आदि पर्व के अध्याय १६९ में भी द्रौपदी के जन्म के समय उनके दिव्य स्वरूप और नीले कमल जैसी सुगंध का वर्णन है, जो उनके साधारण स्त्री न होने और साक्षात् देवी का अंश होने की पुष्टि करता है।
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