शह और मात की इस बिसात पर, देखें कैसी सियासत जारी है,
खून-पसीने की इस मिट्टी पर, नफ़रत की भारी आरी है।
मंदिर और मस्जिद के पहरे, इंसानियत के कातिल बन बैठे,
जुबां सिल दी सच कहने वालों की, स्वार्थी सियासत के चालाक बेटे।
गुनाहगार कोई और है लेकिन, बेकसूर हर रोज सजा पाता है,
कागज के एक टुकड़े पर, इंसान का हर किरदार आंका जाता है।
जाति और मजहब के तराजू में, आदमी का हर मोल बिकता है,
चंद लोगों की कुर्सी की खातिर, देश का हर अरमान पिसता है।
हुक्मरानों के इशारों पर, कानून भी अपनी आंखें मूंद लेता है,
हर मजबूर और गरीब का यहां, दम हर रोज घुटता है।
भय के साए में पलते हैं, आज अमन के ये सारे परिंदे,
कब छंटेगा यह नफरत का कोहरा, पूछते हैं ये बुझे हुए नुमाइंदे।
अंबर पर छाई अंधियारी, रजनी के मुख पर कालिख है,
न्याय चक्षु मुंद बैठे सारे, मानवता आज विचलित है।
धर्म और धार्मित के छल से, स्वार्थों का चक्रव्यूह रचित है,
पंख कटे निष्पाप विहग के, निर्दोष आज यहाँ दंडित है।
धर्म-ध्वजा की ओट लिए जो, दानवता का पाखंड पले,
राम-रहीम के नाम व्यर्थ ही, जन-मानस के अंगार जले।
स्वर्ण मुकुट की राजसभा में, नीच स्वार्थी संवाद रचित हैं,
मास्साब भी जाति-मोह में, शिक्षा के मंदिर कलंकित हैं।
शासक के संधान बाण से, अनुचरों के वर्ताव प्रलंबित,
प्रजा विवश इस महाजाल में, श्वास-श्वास से आज कंपित है।
मूक हुई मर्यादा सारी, स्वार्थी जन का मान प्रबल है,
कब टूटेगा मोह-पाश यह, व्याकुल जन-मन आज विकल है।
अंबर पर छाई अंधियारी, रजनी के मुख पर कालिख है,
न्याय चक्षु मुंद बैठे सारे, मानवता आज विचलित है।
यही कसक ले कर आज हम महफिल में आए हैं,
दर्द-ए-दिल सुनाने को हम साज़ सजाए हैं!
स्थाई (मुखड़ा)
अरे, न्याय के मंदिरों में देखो, कैसा अंधेर मचा है,
धर्म की आड़ में देखो, कैसा पाप पला है!
अरे, मासूमों की चीखों पर क्यों पहरा लगा है?
अरे ओ ज़ालिम, ज़रा सोच, तेरा अंत कहाँ है?
इंसाफ की हर एक कश्ती, भंवर में डूबी जाती है,
बताओ इस अँधेरे में, सुबह कहाँ से आती है?
अंतरा 1
राम के नाम पर बैर बढ़ाते, रहीम की शान गिराते हैं,
स्वार्थ के इन चक्रव्यूह में, अपनों को ही तड़पाते हैं!
धर्म-ध्वजा को ओढ़ के जो, दानव रूप छुपाते हैं,
मासूमों के पंख काटकर, खुद को संत बताते हैं।
अरे, मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में, इंसानियत क्यों मरती है?
बताओ किस पापी की नज़र, इस दुनिया पर पड़ती है?
अंतरा 2
शिक्षा के इस पावन मंदिर में, जाति का ज़हर घोला है,
मास्साब भी मौन हुए हैं, किसने मुँह यह खोला है?
स्वर्ण मुकुट की राजसभा में, सौदों के बाज़ार लगे,
जनता की इस लाचारी पर, शातिर सारे मज़े ठगे।
अरे, कुर्सी के इन भूखों को, क्या अपनों की लाज नहीं?
क्या इस अंधे दरबार में, कोई भी सरताज नहीं?
अंतरा 3
शासक के तीरों से देखो, कैसे घायल प्रजा हुई,
न्याय की हर इक मूरत देखो, मूक और बहरी हुई।
कब टूटेगा मोह-पाश यह, व्याकुल मन यह पूछता है,
हर एक बेकसूर परिंदा, तिनका-तिनका ढूंढता है।
अब तो जागो, अब तो उठो, इस चुप्पी को तोड़ो तुम,
भेद-भाव की इन बेड़ियों को, मिलकर आज निचोड़ो तुम!
समापन
रोता है जन-मन विकल हो कर, कब तक यह सह पाएगा?
अरे, इंसाफ का सूरज इक दिन, इस नभ में आ जाएगा!
अर्ज़ किया है...
तिश्नगी की आग में, ईमान सारा जल गया, साज़िशों का दौर ऐसा, मेरा मन बदल गया।
तर्ज-ए-नफ़रत देखकर, हैरान है मेरी जमात ! हूक्मरानों की गौर में राजनीति में जातिवाद
धर्म में पाखंड में, अन्ध भक्तों का दल गया ! मन्दिर मस्जिद के नाम पर दंगा फिर चल गया
(स्थायी)
राम के नाम पर लूट मची है राम पर राजनीति है। हिन्दु हिन्दुत्व का राग अलग सरकार इसी बल जीती है।
कहीँ हिन्दुओं को काफिर नाफिर ये फतबा करते हैं। बुद्ध और बुत के खिलाफ ऐसा कई मर्तवा करते है।
कभी मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुत्व पैसे कार खड़े। अपना रुतवा करने को लोगों में कराते हैं झगड़ा।
कहाँ गया वो चैन मेरा, कहाँ गया वो अमन रे?
खून से लथपथ हुई, आज भारत की चमन रे!
राजनीति की चाल देखो, धर्म के बाजार में,
सत्य और न्याय दोनों, बिक गए दरबार में!
(अंतरा १)
जात-पात के पाश में, उलझी हुई तकदीर है,
हर तरफ छाई यहाँ, कायरों की भीड़ है।
मन्दिरों और मस्जिदों के, नाम पर संग्राम है,
देख लो ऐ हुक्मरानों! ये कैसा इंतजाम है?
जो कहे सच बात डंक की चोट पर,
हो रहा उस बेकसूर पर आज भारी जुल्म रे!
(अंतरा २)
कलम की धार कुंद है, कानून की आँखें अंधी,
सच्चाई के पाँव में, बँधी लोहे की बेड़ी।
मसाहब के हुक्म पर, चलती है यहाँ सरकार,
न्याय की चौखट पे बैठा, अंधा पहरेदार।
कागज के टुकड़ों पे, इंसानों को तोलते,
बोलते सच जो कभी, उनकी जुबां को रौंदते!
(अंतिम बंध)
छोड़ दो यह द्वेष अब, छोड़ दो यह अज्ञान,
सत्य की इस राह पर, फिर जगाओ स्वाभिमान।
हिन्दू हो या मुसलमान, सब इसी धरा के लाल,
प्रेम से सींचो इसे, वरना बिगड़ेंगे हालात!
गा रही यह कव्वाली, आज पीर अवाम की,
देश से न मिटने पाए, लाज मेरे राम की!
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