शीर्षक: यादव चेतना का स्वर: भारतीय अस्मिता का आधार
अवधि: लगभग 2 से 2.5 मिनट
पात्र/स्वर: एक मुख्य उद्घोषक (गंभीर, ओजस्वी और ऊर्जावान स्वर)
संगीत निर्देश: शुरुआत में एक हल्की और गूंजती हुई लोक धुन (योगेश कुमार रोहि की शैली में), जो धीरे-धीरे एक जोशपूर्ण और तालबद्ध संगीत में बदल जाएगी।
(संगीत की शुरुआत: बांसुरी की सधी हुई तान के साथ मृदंग/ढोल की गूंज, जो धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ती है। पीछे बैकग्राउंड में एक प्रेरणादायी धुन बजती है।)
उद्घोषक (गंभीर और ओजस्वी स्वर में):
भारतीय धरा की प्राचीन मिट्टी... इसके कण-कण में बसी संस्कृति, और इस संस्कृति को अपने सीने पर सहेजकर रखने वाले गोपालक व कृषि संस्कृति के सच्चे सूत्रधार—अहीर समाज!
(संगीत का स्वर थोड़ा और तेज और स्पष्ट होता है।)
उद्घोषक:
यही वे लोग हैं, जिनकी परंपरा से आज तक भारत की मूल अस्मिता जीवन्त है। लेकिन विडंबना देखिए... इस देश का दुर्भाग्य कि आज कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले समूहों द्वारा इसी समाज के प्रति द्वेष और हेय दृष्टि का भाव रखा जाता है। यह रुख हमारी राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक अखंडता के लिए शुभ संकेत कतई नहीं है!
(संगीत की लय बदलती है—अब यह एक स्वाभिमान और गर्व से भरी धुन में ढलती है।)
उद्घोषक:
यह सिर्फ एक समाज की बात नहीं है, यह उस संस्कृति की बात है जिसके बिना भारत अधूरा है। "यादव संस्कृति से ही भारतीय संस्कृति ज़िंदा है"—इसी अमिट भाव को स्वर देने आ रहा है एक नया स्वाभिमान गीत!
(संगीत पूरी ऊर्जा के साथ उभरता है, ढोल और नगाड़ों की गूंज के साथ)
उद्घोषक (उत्साह और गर्व के साथ):
संगीतकार योगेश कुमार रोहि की अद्भुत धुनों के सटीक समायोजन से निर्मित, यह स्वाभिमान गीत अब उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के आज़ादपुर गाँव से उठकर पूरे देश में... हर यादव के हृदय में... यादव चेतना का बुलंद स्वर बनने जा रहा है!
(गीत की मुखड़े की लाइनें गूंजती हैं—कोरस में कुछ आवाज़ें जुड़ती हैं)
कोरस/गायक (ऊंचे स्वर में):
माटी के माथे का तिलक हैं, हम अहीर इस देश की शान...
गोपालक संस्कृति के ध्वजवाहक, अमर रहे भारत की शान!
(संगीत अपने चरम पर पहुँचकर एक खूबसूरत और प्रेरणादायक स्वर के साथ धीमा होता है।)
उद्घोषक (धीमी और प्रभावशाली आवाज़ में):
आइए, इस चेतना का हिस्सा बनिए। सुनिए और महसूस कीजिए अपने स्वाभिमान की इस नई गूंज को।
(संगीत का अंतिम सिम्फनी प्रभाव और फिर सन्नाटा।)
यहाँ अहीरों (आभीरों) के सांस्कृतिक योगदान, पौराणिक महत्व और उनके मूल स्वभाव पर आधारित एक कव्वाली फ्यूजन (Qawwali Fusion) गीत है। इसमें कव्वाली की पारम्परिक तालियों और हारमोनियम के साथ मॉडर्न बीट्स का मिश्रण है। आपकी शर्त के अनुसार मुखड़े में 'याद' और 'आभीर' शब्दों का प्रयोग किया गया है, और किसी ऐतिहासिक महापुरुष का नाम नहीं लिया गया है।
गीत का शीर्षक: गूंजता आभीर है
शैली: कव्वाली फ्यूजन (सूफी-रॉक और लोक-संगीत का मिश्रण)
म्यूजिक हिंट: हारमोनियम की तेज तान के साथ मॉडर्न बेस (Bass) और ड्रम बीट्स। बैकग्राउंड में कव्वाली की तालियों (Clapping) की लयबद्ध आवाज़।
(आलाप - ऊंचे और सूफी स्वर में)
हो....
धर्म की ध्वजा, और इस माटी का सम्मान,
युगों-युगों से गा रहा, यश जिनका वेद पुरान...
(मुखड़ा)
मुख्य गायक (Lead Singer):
रखना दिलों में 'यादव को', ये शौर्य की तासीर है,
रखना दिलों में 'यादव को', ये शौर्य की तासीर है!
कोरस (Humnawa):
(हाँ तासीर है, शौर्य की तासीर है!)
मुख्य गायक:
संस्कृति की धड़कनों में, आभीर' वो वीर है,
भारत की धरा पर, जिनका रुतवा ए तासीर है !
कोरस (तालियों के साथ):
(रुतवा ए तासीर है, हाँ जिनका रुतवा ए तासीर है!)
रखना दिलों में 'यादवों ',को ये शौर्य की तासीर है...
(म्यूजिक ड्रॉप: कव्वाली की तालियों के साथ अचानक मॉडर्न ड्रम बीट्स और सिंथेसाइज़र का फ्यूजन)
(अंतरा 1: संस्कृति और पौराणिक योगदान)
मुख्य गायक:
गौ-माता के रक्षक हैं ये, प्रकृति के रखवाले हैं, इनके घर जन्में कन्हैया मुरली वाले हैं।
(कोरस: प्रकृति के रखवाले हैं , हाँ प्रकृति के रखवाले हैं)
बंसी की मधुरिम तानों से, किए दिशा में उजियाले हैं ।
दूध-दही की नदियों से ही, सींचा देश का भाल,
धर्म-कर्म की राह पे चलते, बनके माटी के लाल।
मुख्य गायक (तेज लय में - तराना स्टाइल):
अरण्य और वेदों में... (कोरस: वाह वाह !)
अरण्य और वेदों में, इनकी ही तस्वीर है!
भारत की धड़कनों में, जो गूंजता 'आभीर' है!
कोरस:
(रखना दिलों में 'यादवों '.दिल में ..)
(अंतरा 2: शौर्य और मूल प्रवृत्ति)
मुख्य गायक:
सीधे-सच्चे मन के हैं, पर रण में हैं तूफान,
(कोरस: रण में हैं तूफान, जी रण में हैं तूफान)
न्याय की खातिर दे देते हैं, हंसकर अपनी जान।
करुणा का सागर बहता है, इनके गहरे सीने में,
पर अड़ जाएं तो ला दें सर्दी, दुश्मन को पसीने में।
मुख्य गायक:
इनके ही बाहुबल से... (तालियां तेज़ होती हैं)
इनके ही बाहुबल से, रक्षित देश की प्राचीर है!
संस्कृति की धड़कनों में, गूंजता 'आभीर' है!
कोरस:
(रखना दिलों में 'यादवों '.को ..)
(अंतरा 3: फ्यूजन क्लाइमैक्स - लोक परंपरा और कर्म)
मुख्य गायक (सूफी अंदाज़ में, बिना बीट के केवल हारमोनियम पर):
हल से माटी चीर के जिसने, सोना है उपजाया,
लोक-गीत और उत्सव को, सदियों तक महकाया।
त्याग, तपस्या, मेहनत ही, जिनका सच्चा ईमान,
इनके पसीने से ही महकता, अपना हिंदुस्तान।
मुख्य गायक (कव्वाली की तेज लय - बीट ड्रॉप के साथ):
ये वो मुकद्दर हैं... (कोरस: हाँ!)
ये वो सिकंदर हैं... (कोरस: हाँ!)
कौम ये ऐसी, जो माटी की तकदीर है!
भारत की धड़कनों में, जो गूंजता 'आभीर' है!
(समापन - तेज़ तालियों और फ्यूजन ढोलक के साथ)
सब एक साथ (Chorus & Lead in high energy):
रखना दिलों में 'यादव को ', ये शौर्य की तासीर है,
संस्कृति की धड़कनों में, गूंजता एक नाम 'आभीर' है!
गूंजता आभीर है... हाँ गूंजता आभीर है!
(हो... गूंजता आभीर है!)
(संगीत एक सूफी ईडीएम (Sufi EDM) बीट के साथ फेड आउट (Fade out) होकर समाप्त होता है...)
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