गुरुवार, 17 सितंबर 2026

यादव गोत्र-

वैष्णव वर्ण" की उत्पत्ति श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) से हुई है। जिसमें केवल गोप आते हैं। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के एकादश (११) -अध्याय के श्लोक संख्या (४3) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -

"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।
स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।।४३।

"अनुवाद:- ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र इन चार वर्णों के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाति अथवा वर्ण इस संसार में प्रसिद्ध है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। जो स्वराट
विष्णु (श्रीकृष्ण) से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न होने से वैष्णव संज्ञा से नामित है।४३।

जो  सभी वर्णों में श्रेष्ठ भी है इस बात की पुष्टि - पद्म पुराण के उत्तराखण्ड के अध्याय(६८) श्लोक संख्या १-२-३ से होती है जिसमें भगवान शिव नारद से कहते हैं।

महेश्वर उवाच-
शृणु नारद! वक्ष्यामि वैष्णवानां च लक्षणम् यच्छ्रुत्वा मुच्यते लोको ब्रह्महत्यादिपातकात् ।१।   
            
तेषां वै लक्षणं यादृक्स्वरूपं यादृशं भवेत् ।तादृशंमुनिशार्दूलशृणु त्वं वच्मिसाम्प्रतम्।२।                                                   
विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते। सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णवःश्रेष्ठ उच्यते ।३।   

अनुवाद:-
१-महेश्वर- उवाच ! हे नारद , सुनो, मैं तुम्हें वैष्णव का लक्षण बतलाता हूँ। जिन्हें सुनने से लोग ब्रह्म- हत्या जैसे पाप से मुक्त हो जाते हैं।१।
                    
२-वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ ! उसे तुम सुनो ।२।                                 
३-चूँकि वह विराट विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न होने से ही वैष्णव कहलाते है; और सभी वर्णों मे वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता हैं।३।        

यदि वैष्णव शब्द की व्युत्पत्ति को व्याकरणिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो "शब्द कल्पद्रुम" में विष्णु से ही वैष्णव शब्द की  व्यत्पत्ति बताई गई है-

विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण्- वैष्णव - तथा विष्णु-उपासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा गायत्री आदि।

अर्थात् विष्णु देवता से सम्बन्धित वैष्णव स्त्रीलिंग में (ङीप्) प्रत्यय होने पर वैष्णवी शब्द बना है जो- दुर्गा, गायत्री आदि का वाचक है।

अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि- विष्णु से वैष्णव पद ( विभक्ति युक्त शब्द ) और वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति होती है, जिसे पञ्चमवर्ण के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें केवल- गोप, (अहीर, यादव) जाति ही आती हैं बाकी कोई नहीं।

अहीरों का धर्म भागवत है !
इसी प्रकार से भागवत पुराण में वैष्णव धर्म की प्रवृत्ति के बारे में बहुत ही अच्छा लिखा गया है कि वैष्णव धर्म में ऊँच-नींच एवं जातीय भेद-भाव नहीं है।


न यस्य जन्म कर्मभ्याम् न वर्ण आश्रमजातिभिः।
सज्जते अस्मिन् अहंभावः देहे वै स हरेः प्रियः।।५१।।


न यस्य स्वः पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा।
सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥५२॥
     (श्रीमद्भागवत पुराण- ११/२/५१,५२)


अनुवाद -५१-५२
भागवत धर्म (वैष्णव वर्ण) में न वर्णाश्रमगत भेद है, न जातिगत भेद ही, न जन्मगत भेद है, न कर्मगत । यहाँ तक कि देह-धर्मों का भी भेद नहीं है। ऐसा सर्वभूत शम ही उत्तम भागवत धर्म है ।५१।
• जो धन सम्पत्ति अथवा शरीर आदि में- "यह अपना है और यह पराया" इस प्रकार का भेदभाव नहीं रखता, समस्त पदार्थ में समस्वरूप परमात्मा को देखता है, समभाव रखता है तथा किसी भी घटना अथवा संकल्प से विक्षिप्त न होकर शान्त रहता है, वह भगवान का उत्तम भक्त है।५२।

भगवान श्रीकृष्ण समाज में ऊँच-नींच का भेदभाव रखनें वालों से अपनी भक्ति तथा कृपा से सदैव दूरी बनाकर रखते हैं। और ऐसे लोग जो समाज में भेदभाव पैदा करते हैं उनके लिए दण्ड का प्रावधान करते हुए कहते हैं कि-

यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः सद्यः पुनाति जगदाश्वपचाद्विकुण्ठः।
सोऽहं भवद्‍भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्तिः छिन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम् ॥६॥
                 (भागवत पुराण- ३/१६/६)

अनुवाद:-
मेरी निर्मल सुयश सुधा में गोता लगाने से चाण्डाल पर्यन्त सारा जगत तुरन्त पवित्र होकर कुण्ठा रहित हो जाता है। इसलिए मैं विकुण्ठ कहलाता हूँ। किन्तु मुझे यह पवित्र कीर्ति आप भक्तों से ही प्राप्त होती है। इसलिए जो कोई आपके विरुद्ध आचरण करेगा, मैं उसे तत्काल काट डालुँगा चाहें वह मेरी बाहू (भुजा) ही क्यों न हो।६।

और वैष्णव भक्तों की रक्षा तथा वैष्णव धर्म एवं समता मूलक समाज को स्थापित करने के लिए भगवान समय-समय पर भूतल पर अवतरित भी होते हैं।

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।
                        (श्रीमद्भगवद् गीता- ४/७)

अनुवाद:-
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ।७।

अनेक सम्प्रदायों और मत-मतान्तरो में भटकते हुए व्यक्ति को कहीं शान्ति और सत्य के दर्शन नहीं होते तो भगवान श्रीकृष्ण यह सार्वजनिक घोषणा करते हैं कि-

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।। ६६।
                
  (श्रीमद्भगवद्गीता (१८/६६)
सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आजा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू चिन्ता मत कर।६६।

(व्याख्या)- भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रति यह उद्घोषणा करते हुए कहते हैं कि जिस-जिस धर्म और समाज में भेद-भाव की प्रधानता हो उसे तुरन्त छोड़कर भक्तों को मेरी शरण में आ जाना चाहिए। मैं उन सभी भक्तों को पाखण्डपूर्ण समाज से मुक्त करके अवश्य उनका कल्याण करूँगा।

सभी यादव भगवान श्रीकृष्ण के स्वराट विष्णु अँश से उत्पन्न हुए हैं। इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता विश्वजित्खण्ड के अध्यायः (२) के श्लोक संख्या- ( ७ )से है जिसमें भगवान श्री कृष्ण उग्रसेन से कहते हैं-

ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥

अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्‍छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्‍पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। ७।


भाग- (४) कुल

ज्ञात हो कि- कुल और गोत्र में बहुत अन्तर नहीं होता है। क्योंकि कुल और गोत्र दोनों ही रक्त सम्बन्ध के ही प्रतीक हैं। दोनों में केवल अंग और अंगी जैसा अन्तर है किन्तु दोनों का मूल आधार रक्त सम्बन्ध ही है। जिसमें गोत्र परिवारों एवं परिवारों का एक सामूहिक रूप है, जिसमें उनका एक जनन अर्थात् (Genetic) गोत्र होता है, जो सदैव निर्देशित करता है कि सात पीढ़ी तक एक ही कुल या परिवार में विवाह वर्जित है।
वास्तव में देखा जाए तो गोत्र नाम की आवश्यकता विवाह इत्यादि के समय होती है। बाकी अपनी पहचान इत्यादि के समय गोत्र और कुल का नाम एक ही सन्दर्भ में प्रयुक्त होता। इस भिन्नता को समझने की आवश्यकता है तभी भगवान श्रीकृष्ण सहित यादवों के जन्म और उनके कुल, गोत्र, वर्ण, और वंश  व जाति की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो पाएगा। जैसे-

पौराणिक ग्रन्थों में कहीं-कहीं यादवों के वंश "यदुवंश" को ही "कुल" तथा कहीं-कहीं यादवों के वर्ण "वैष्णव" को कुल और कहीं पर यादवों की जाति गोप को "गोप कुल" मानकर भगवान श्रीकृष्ण को भूतल पर जन्म लेने को बताया गया है। किन्तु सभी तरह से कही गई बातें एक ही है, इसको अच्छी तरह से समझनें की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित (तीन) उदाहरण प्रस्तुत है।

(१)- श्रीकृष्ण का जन्म यदु वंश में -

(क)- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) में सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।


अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदु के वंशज (वृष्णि) कुल में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर गोप रूप में लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करते रहोगे।१६१।

(ख)- गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक संख्या (४५) व (४६) में श्रीकृष्ण का जन्म यादवों के कुल वृष्णि में होने की पुष्टि होती है।

राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५


भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।

अनुवाद - ४५-४६
• राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यदुओं ( यादवों) के वृष्णि नामक कुल में  श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए हैं। अर्थात्  यदु के एक सौ एक कुल हैं जिसमें वृष्णि कुल में कृष्ण का जन्म हुआ है ।४५।
• पृथ्वी का भार उतारने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४६।

(उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को यदुवंश के  कुल में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं उन सभी को दोहराना उचित नही है।)
विशेष:- एक जाति में अनेक वंश और एक वंश में अनेक कुल एक कुल या गोत्र में अनेक परिवार होते हैं। यद्यपि कुल के लिए कभी कभी गोत्र शब्द एक विवाह में वर -वधु के रक्त विभेदक की भूमिका में महत्वपूर्ण होता है।

(२)- श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में -

(क)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें  स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है। जिसमें ब्रह्माजी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि-

अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।

यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।

    
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
       
(ख)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -(४) के श्लोक संख्या- (२२) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है।

(३)- श्रीकृष्ण का जन्म गोप कुल या आभीर जाति में -

यादवत्राणकर्त्रे च शक्रादाभीररक्षिणे ।।
गुरुमातृद्विजानां च पुत्रदात्रे नमोनमः ।।१६।।

जरासंधनिरोधार्त नृपाणां मोक्षकारिणे ।।
नृगस्योद्धारिणे साक्षात्सुदाम्नोदैन्यहारिणे ।। १७।।
हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या - अट्ठावन (५८) में श्रीकृष्ण का जन्म गोप जाति या आभीर जाति में होने को बताया गया है। जिसकी पुष्टि स्वयं श्रीकृष्ण ने ही किये हैं।

एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८


अनुवाद - इसीलिए  व्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।

(हरिवंश पुराण उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को गोपजन्म विशेषण पद से   गोपजाति में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही और भी बहुत से उदाहरण हैं।)

अतः भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से सम्बन्धित उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है किसी भी जाति में एक वंश होता है और वंश में अनेकों कुल और गोत्र होते हैं एक कुल में अनेक परिवार होते हैं।।

 महाभारत काल में यादवों के कुलों की संख्या एक सौ से भी अधिक थी। उन सभी का एक ही मुख्य महाकुल था जिसका नाम था "वैष्णव महाकुल" इसी वैष्णव महाकुल में यादवों के अनेकों कुल- अन्धक, वृष्णि, कुकुर, भोज इत्यादि समाहित थे।
जिनको कुल या खानदान के नाम से जाना भी जाता था। इसकी पुष्टि- वायुपुराण के उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-(३४) के श्लोक- २५५ और २५६ से होती है।

कुलानि दश चैकञ्च यादवानां महात्मनाम्।
सर्व्वमककुलं यद्वद्वर्त्तते वैष्णवे कुले।२५५।

विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।


अनुवाद:- २५५-२५६
यादवों के एक सौ एक वैष्णव महाकुल हैं। उन सभी में स्वराट् विष्णु (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं।२५५।
•  अर्थात् उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।

इसी तरह से मत्स्यपुराण के अध्यायः (४७) के श्लोक (२८)और (२९) में यादवों के मुख्य वैष्णव महाकुल में सौ से अधिक उपकुल होने को बताया गया है-

कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम् ।
सर्वमेतत्कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले।२८।

विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः।२९।

अनुवाद - २८-२९
•  इन महाभाग यादवों के एक सौ एक कुल थे। जो सब-के सब श्रीकृष्ण से सम्बन्धित वैष्णव महाकुल के अन्दर ही विद्यमान थे।।२८।
• भगवान श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) उनके नेता और स्वामी थे। तथा वे सभी यादव श्रीकृष्ण की आज्ञा के अधीन रहते थे "ऐसा कहा जाता है।।२९।

अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि यादवों का एक मुख्य अथवा महाकुल है जिसका नाम है "वैष्णव महाकुल है।" इसी वैष्णव महाकुल में अनेकों उपकुल हैं जो वैष्णव नाम से ही जानें जातें हैं, क्योंकि उन सभी में प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित रहते हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं। इस बात की प्रमाणिकता के लिए नीचे वर्णित वायुपुराण उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-३४ के श्लोक- २५६ को देख सकते हैं-

विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।


अनुवाद:- उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।


भाग- (5) यादवों का गोत्र-

इस भाग का मुख्य उदेश्य किसी जाति के अन्तर्गत गोत्रों का निर्धारिण कब और कैसे होता है इस तथ्य की जानकारी देना है। इसी क्रम में यादवों के प्रमुख गोत्रों के बारे में भी जानकारी देना है कि यादवों में कितने गोत्र और उपगोत्र हैं ?

तो इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि किसी भी जाति में व्यक्ति का गोत्र मुख्यतः तीन प्रकार या कहें तीन तरह से स्थापित होता है-

(१)- जनन या (Genetic) गोत्र।
(२)- स्थानीय गोत्र।
(३)- गुरु गोत्र।




(१)- जनन या (Genetic) गोत्र।

जनन गोत्र को मूल गोत्र भी कहा जाता है। शास्त्रों में जनन गोत्र को ही पिण्ड गोत्र कहा गया है। यह गोत्र अपने नाम की सार्थकता को सिद्ध करते हुए यह पहचान कराता है कि किसी व्यक्ति का जन्मगत आधार क्या है और उसकी प्रारम्भिक उत्पत्ति किससे हुई है। अर्थात उसके प्रथम जनक कौन हैं।
जनन गोत्र में किसी जाति के समस्त व्यक्तियों का रक्त सम्बन्ध होता है जिनके प्रत्येक सदस्यों की (D.N.A.) संरचना लगभग एक समान होती है।
डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (संक्षिप्त रूप में DNA) वह अणु है जो किसी जीव के विकास और प्रवृत्तिमूलक तथ्यो के लिए आनुवंशिक जानकारी कराता है।
ये मनुष्यों के वंशमूलक गुणों का संवाहक है। गोत्र भी वंश मूलक अवयव ही हैं।
गोपों (यादवों) का जनन गोत्र "कार्ष्ण" है।
जो कृष्ण पद में सन्तान वाचक अण् प्रत्यय लगाने पर कृष्ण से "कार्ष्ण" पद बना है। (कृष्णस्येदम् + अण् = कार्ष्ण) जिसका अर्थ है श्रीकृष्ण की सन्तान अर्थात् जो श्रीकृष्ण से उत्पन्न हुआ हो।
और इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि यादवों (गोपों) का जन्म गोपेश्वर श्रीकृष्ण के क्लोन (Clone) से हुआ है, इसलिए समस्त यादवों का जनन गोत्र कार्ष्ण है। इसके बारे में आगे विस्तार बताया गया है कि कैसे यादवों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण से होने की वज़ह से उनका जनन गोत्र "कार्ष्ण" है।

कृष्ण का गोलोक में विराजमान गोपेश्वर ररूप से ही गोपों की उत्पत्ति हुई है।
किन्तु जनन गोत्र की बात तब तक अधूरी रहेगी जब तक भारतीय संस्कृति और शास्त्रों के आधार पर इसकी जानकारी न हो जाए।

भारतीय संस्कृति व पौराणिक ग्रन्थों में मुख्यतः तीन प्रकार के जनन गोत्रों की जानकारी मिलती है -
(१) गोत्र
(२) प्रवर गोत्र
(३) पिण्ड गोत्र


ये तीनों ही प्रकार के गोत्र सन्निकट रक्त सम्बन्धों की श्रृंखला है। इन तीनों के बारे जानना आवश्यक है।

(१)- "गोत्र" शब्द से तात्पर्य विवाह इत्यादि के अवसरों पर अपने किसी आदि पुरुष के नाम पर अपना परिचय देना या उसके नाम का आह्वान करना है।
गोत्र के बारे में भरत मुनि का कहना हैं कि - "गोत्रम्- गवते शब्दयति पूर्व्वपुरुषान् यतिति"।
अर्थात्- जिसके द्वारा अपने "कुल" के पूर्व पुरुष का आह्वान किया जाए वह गोत्र है।

ध्यान रहे अमरकोश के अनुसार गोत्र कुल का भी पर्याय है।

(२)- प्रवर गोत्र

प्रवर का मतलब प्रधान, सर्वश्रेष्ठ या पूज्य होता है। इसी आधार पर "प्रवर" गोत्र की स्थिति बनी है। इस प्रकार के गोत्र श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों के नाम पर ही आधारित होते हैं। जो अधिकांशतः ब्राह्मणों के ही गोत्र हैं।

भारतीय विवाहों में प्रवर गोत्र का भी ध्यान रखा जाता है, अर्थात् समान प्रवर वालों में विवाह वर्जित है। देखिए गौतम, नारद तथा आपस्तम्ब के वचन-
" समानैक: प्रवरो येषां तैः सह न विवाहः" (1.23.12)
A line of ancestors.पूर्वजों की एक पंक्ति प्रवर है।
प्रारम्भ में 'प्रवर' का अर्थ याज्ञिक कार्य से सम्बद्ध अग्नि का आवाहन करने वाले ऋषियों से ही था। वरणीय/ प्रार्थनीय/ आवाहनीय श्रेष्ठ ऋषि 'प्रवर' कहलाते थे। ये ऋषि उद्गाता भी कहे जाते थे। याज्ञिक अनुष्ठान में पुरोहित अपने सर्वश्रेष्ठ पूर्वज ऋषि का नाम-स्मरण करते थे, जो उनके समुदाय या समाज के प्रतीक थे। कालान्तर में ये ऋषि अपने वंशजों की सामाजिक, सांस्कारिक तथा आध्यात्मिक व्यवस्था से जुड़ते चले गए। ये ही ऋषि आगे चलकर प्रवर-प्रवर्तक हुए और उनके नामों पर अनेकों प्रवर गोत्र बने जो सभी ब्राह्मणों के लिए ही हैं।

(३)- पिण्ड गोत्र।

दरअसल देखा जाए तो जनन गोत्र और पिण्ड गोत्र का रक्त सम्बन्धी उत्पति सिद्धान्त एक ही है। बस इन दोनों में थोड़ा बहुत अन्तर है उसे जानना आवश्यक है। इसके लिए नीचे देखें -

(क)- जनन गोत्र-  
जनन गोत्र उस प्रारम्भिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ से किसी जाति विशेष लोगों की प्रारम्भिक उत्पत्ति हुई है। जैसे- गोपों की प्रारम्भिक उत्पत्ति पूर्व काल में गोलोक में श्रीकृष्ण से हुई है। इस लिए गोपों का जनन गोत्र श्रीकृष्ण के नामानुसार कार्ष्ण है। यह गोपों का मूल व प्रारम्भिक गोत्र है।
इसके बारे में आगे विस्तार से बताया गया है।

(ख)- जनन गोत्र की ही तरह पिण्ड गोत्र भी हैं। किन्तु पिण्ड गोत्र "जनन" गोत्र के बाद की उत्पत्ति को दर्शाता है। पिण्ड गोत्र को पितृ- गोत्र भी कहा जाता है, जो किसी जाति विशेष के पूर्वजों के नाम से होता है जिसके कारण अनेक पिण्ड गोत्रों की उत्पत्ति होती है। इसी पितृ गोत्र को ध्यान में रखकर सगोत्र विवाह वर्जित होते है।

किन्तु माता की पाँचवीं तथा पिता की सातवीं पीढ़ियों के बाद सपिण्डता का दोष नहीं रहता है। वर्तमान समय में यादवों में उनके पूर्वजों के नाम पर बहुत से पिण्ड-गोत्र हैं जिनका यहाँ पर वर्णन करना सम्भव नहीं है।

इसी तरह से कुछ लोग अपनी प्रारम्भिक उत्पत्ति या जन्म को किसी ऋषि-मुनि से मानते हुए उनके नाम पर जनन गोत्र का निर्धारण करते हुए अक्सर कहा करते हैं कि मैं इस ऋषि या उस ऋषि का सन्तान हूँ।
इसी तरह से जो लोग अपने को ब्रह्मा की सन्तान मानते हैं। उन सभी का जनन गोत्र कहें या मूल गोत्र- "ब्राह्मी गोत्र" है। जैसे- ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न कुछ ब्राह्मण इत्यादि का गोत्र।

अब आप लोगों यहाँ पर यह सोच रहे होंगे कि कुछ ही ब्राह्मण क्यों ? सभी ब्राह्मण क्यों नहीं ? क्या सभी ब्राह्मण ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न नहीं हैं ? तो इसका जवाब है नहीं। क्योंकि सभी ब्राह्मण ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न नहीं हुए हैं।

 वास्तविकता यह है कि- प्रारम्भ में ब्रह्माजी के मुख से केवल ब्राह्मण पुरुष वर्ग ही उत्पन्न हुआ था न की ब्राह्मणी स्त्रियाँ। क्योंकि किसी भी पौराणिक ग्रन्थों में यह नहीं लिखा गया है कि ब्रह्माजी के मुख से ब्राह्मणों के साथ-साथ ब्राह्मणी स्त्रियाँ भी उत्पन्न हुईं थीं।

यहीं कारण है कि कुछ पौराणिक ग्रन्थों में ब्राह्मणों के जन्म विस्तार को अन्य तरह से बताया गया है। किन्तु यहाँ पर ब्राह्मणों की उत्पत्ति या उनका गोत्र बताना हमारा उद्देश्य नहीं है। फिर भी यदि कोई इन बातों को जानना ही चाहता है तो वह स्कन्दपुराण खण्ड- (३) के अध्याय- (३९ ) के प्रसंगों को पढ़कर इस विषय की जानकारी ले सकता है कि कुछ ब्राह्मणों का जनन का विस्तार कैसे हुआ है।

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि जनन गोत्र व्यक्ति के जन्मगत आधार को दर्शाते हुए यह पहचान कराता है की व्यक्ति की प्रारम्भिक उत्पत्ति जिससे हुई है, उसी के नामानुसार उस व्यक्ति का जनन गोत्र निर्धारित होता है।

✴️ यादवों का जनन गोत्र- "कार्ष्ण"

जनन गोत्र सिद्धान्त के अनुसार यादवों का जनन गोत्र कार्ष्ण है। क्योंकि कृष्ण पद में सन्तान वाचक "अण्" प्रत्यय लगाने पर "कार्ष्ण" पद बना है। (कृष्णस्येदम् + अण् = कार्ष्ण) जिसका अर्थ है श्रीकृष्ण की सन्तान अर्थात् जो श्रीकृष्ण से उत्पन्न हुआ हो।
इस हिसाब से देखा जाए तो आभीर जाति के अन्तर्गत समस्त गोप-गोपियों अर्थात् यादवों का जन्म प्रारम्भिक काल में गोलोक में ही गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से हुआ है। तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि- गोपों में श्रीकृष्ण का तथा गोपियों में श्रीराधा का रक्त अवश्य ही विद्यमान होगा। और रक्त सम्बन्ध हीकिसी जाति या जनन गोत्र का मूल आधार है कि उसमें प्रारम्भिक रक्त किसका है।

इस हिसाब से भी देखा जाए तो समस्त गोपों में श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कुछ कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागरखण्ड के अध्याय- (१९३) के श्लोक -(१४) में मिलता है। जिसमें आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती हैं कि -

"तेनाकृत्येऽपि  रक्तास्ते  गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥

अनुवाद - हे विष्णो (कृष्ण)! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे।१४

देखा जाए तो उपर्युक्त श्लोक में देवी गायत्री बड़े ही स्पष्ट रूप से गोपों (आभीरों) को श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्धी (blood relative) होने को कहतीं हैं। और जहाँ तक गोप और गोपियों का जन्म श्रीकृष्ण और श्रीराधा से होने की बात है तो इसकी पुष्टि के लिए निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत हैं-

(१)-  ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय-(४८) के श्लोक (४३) से है जिसमें शिव जी पार्वती से कहते हैं कि-

"बभूव गोपीसंघश्च राधाया लोमकूपतः।श्रीकृष्णलोमकूपेभ्यो बभूवुः सर्वबल्लवाः।।४३।

अनुवाद -• श्रीराधा के रोमकूपों (कोशिकाओं) से गोपियों का समुदाय प्रकट हुआ है, तथा श्रीकृष्ण के रोमकूपों  (कोशिकाओं) से सम्पूर्ण गोपों का प्रादुर्भाव हुआ है।

(ध्यान रहे रोमकूपों को ही आज विज्ञान की भाषा में कोशिका कहा जाता है)
विशेष:-कोशिका" (Koshika) या "सेल" (Cell) सजीवों के शरीर की सबसे छोटी रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है. यह जीवन की मूलभूत संरचना है जो सभी जीवों को बनाती है. कोशिका के बारे में:
  • रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई:
    कोशिकाएं शरीर की संरचना का निर्माण करती हैं और सभी जैविक क्रियाओं को भी संचालित करती हैं. 
  • कोशिका सिद्धान्त:
    कोशिका सिद्धान्त के अनुसार, सभी जीव एक या एक से अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं, और सभी कोशिकाएं पहले से मौजूद कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं. 
  • कोशिकाएं छोटी लेकिन जटिल:
    कोशिकाएं बहुत छोटी होती हैं, लेकिन इनकी संरचना और कार्य बहुत जटिल होते हैं. 
  • विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं:
    शरीर में विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं होती हैं, जैसे कि रक्त कोशिकाएं, मांसपेशी कोशिकाएं, तंत्रिका कोशिकाएं, आदि. 
  • अंगक:
    कोशिकाओं के अंदर अंगक होते हैं, जो विशिष्ट कार्य करते हैं, जैसे कि ऊर्जा का उत्पादन, पदार्थों का पाचन, और पदार्थों का संश्लेषण. 
  • कोशिका विभाजन:
    कोशिकाएं विभाजित होकर नई कोशिकाएं बनाती हैं, जिससे शरीर का विकास और मरम्मत होती है. 

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(२)- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(५) के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) , जिसमें लिखा गया है कि -

तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च  तत्समः।४०।

कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण   वेषेणैव  च  तत्समः। ४२


अनुवाद- ४०-४२
• उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।

• फिर तो श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप- गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष-रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।

(३)-  ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय -(३६ के श्लोक- ६२) से है जिसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में राधा जी से कहते हैं-

"गोपाङ्गनास्तव कला अत एव मम प्रियाः।
मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः। ६२।

अनुवाद- हे राधे ! समस्त गोपियाँ तुम्हारी कलाऐं हैं। और सभी गोलोक वासी गोप मेरे रोमकूपों से उत्पन्न मेरी ही कलाऐं तथा अंश हैं।६२।

(४) - गर्गसंहिता विश्वजित्खण्ड के अध्याय- (२) के श्लोक संख्या- (७) से है जिसमें भगवान श्री कृष्ण उग्रसेन से कहते हैं-

"ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥

अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्‍छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्‍पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। ७।

अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि गोप और गोपियों (यादवों) का जन्म गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से ही हुआ है। तो जाहिर सी बात है कि गोपों अर्थात् यादवों का जनन (Genetic) गोत्र सिद्धान्त के अनुसार इनका गोत्र भी श्रीकृष्ण के नामानुसार "कार्ष्ण" ही हुआ। यह वैज्ञानिक और ध्रुव सत्य है।

✳️ किन्तु आश्चर्य है कि अधिकांश यादव लोग अपने जनन गोत्र "कार्ष्ण" के स्थान पर एक ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम पर अपना जनन गोत्र स्थापित कर अपने मूल जनन गोत्र को ही भूल गए।
यादवों का जनन गोत्र "कार्ष्ण" है या अत्रि ? इसकी विस्तृत जानकारी इस पुस्तक के अध्याय (१०) में दी गई है। तथा संक्षेप में यहाँ भी (गुरुगोत्र) वाले प्रसंग में दी गई है।

अब हमलोग स्थानीय गोत्रों के बारे में भी जानेंगे।


✴️ (२)- स्थानीय गोत्र-

स्थानीय गोत्र को कभी-कभी कुल या खानदान भी कहा जाता है। स्थानीय गोत्र वे होते हैं- जो किसी व्यक्ति समूह की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हुए स्थान विशेष की पहचाँन कराते हैं। इस तरह के गोत्रों की उत्पत्ति तब होती है जब एक ही जाति और वंश के लोग किसी परिस्थिति विशेष के कारण अपने मूट स्थान से प्रव्रजन (Migrate) कर जाते हैं, अर्थात वे अपने मूल निवास स्थान को छोड़कर अपने समूह सहित अन्यत्र जाकर बस जातें हैं। तब उनके मूल स्थान के नाम पर उनका एक उपगोत्र बन जाता हैं। किन्तु उनका मूल जननगोत्र पूर्ववत बना रहता है।
इस तरह के स्थानीय गोत्र अधिकांशतः गोपों अर्थात यादवों में देखने को मिलता है। यहीं कारण है कि यादवों में इस तरह के गोत्र बहुतायत पाए जाते हैं। देखा जाए तो भारत के हर प्रान्तों में यादवों की पहचान अलग-अलग स्थानीय गोत्रों से होती है। किन्तु उनका मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण" जिसमें श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है वह पूर्ववत बना रहता है।


"कुलानि दश चैकञ्च यादवानां महात्मनाम्।
सर्व्वमककुलं यद्वद्वर्त्तते वैष्णवे कुले ।२५५।

विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।


अनुवाद:- २५५-२५६
• यादवों के एक सौ एक वैष्णव कुल हैं। उन सभी में स्वराट् विष्णु (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं।२५५।
•  उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।

इसी तरह से श्रीमद्भागवतपुराण उत्तरार्द्ध स्कन्ध १० अध्याय-९० के श्लोक- ४४ में यादवों के स्थानीय गोत्रों एवं कुलों की संख्या के बारे में लिखा गया कि-

तन्निग्रहाय हरिणा प्रोक्ता देवा यदोः कुले ।
अवतीर्णाः कुलशतं तेषां एकाधिकं नृप॥४४॥

अनुवाद :- उन दैत्यों का निग्रह (दमन) करने के लिए ही यादव वंश के कुलों में हरि (श्रीकृष्ण ) के कहने पर देवों ने अवतार लिया था। उनके कुलों की संख्या एक सौ एक थीं।४४

इसी तरह से मत्स्यपुराण के अध्यायः (४७) के श्लोक( २८ और २९ )में यादवों के गोत्रों (कुलों) की संख्या के बारे में लिखा गया है कि

"कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम् ।
सर्वमेतत्कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले।२८।

विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः।२९।

अनुवाद - २८-२९
•  इन महाभाग यादवों के एक सौ एक कुल थे। जो सब-के सब श्रीकृष्ण से सम्बन्धित वैष्णव महाकुल के अन्दर ही विद्यमान थे।। २८।
• भगवान श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) उनके नेता और स्वामी थे। तथा वे सभी यादव श्रीकृष्ण की आज्ञा के अधीन रहते थे। ऐसा कहा जाता है।।२९।

इसी तरह से विष्णुपुराण के चौथे अंश के अध्याय- १५ के श्लोक ४७,४८ और ४९ में भी यादवों के गोत्रों (कुलों) की संख्या के बारे में लिखा गया है कि-

देवासुरे हता ये तु दैतेयास्मुमहाबलाः।
उत्पन्नास्ते मनुष्येषु जनोपद्रवकारिणः॥४७।

तेषामुत्सादनार्थाय  भुविदेवा यदो: कुले।
अवतीर्णा: कुलशतं यत्रैकाभ्यधिकं द्विज:।४८।

विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।निदेश्षस्थायिनस्तस्य ववृधुस्सर्वयादवाः॥४९।

अनुवाद:-४७-४८,४९
• देवासुर संग्राम में महाबली दैत्यगण मारे गये थे।
वे मनुष्य लोक में उपद्रव करने वाले राजालोग बनकर उत्पन्न हुए।४७।
• उनका नाश करने के लिए देवों ने यदुवंश में जन्म लिया उस यदुवंश में एक सौ एक कुल थे।४८।
• विष्णु उन सबके प्रमाण में और प्रभुत्व में व्यवस्थित हैं। विष्णु के निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।४९।

तब ऐसे में प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि यादवों में इतनें कुल या स्थानीय गोत्र क्यों और कैसे हुए ? तो यादवों में इतनें कुल (परिवार) या स्थानीय गोत्र होने का मुख्य कारण यह रहा कि- यादवों में स्थान परिवर्तन की परम्परा पूर्वकाल से ही रही है। देखा जाए तो पूर्वकाल में कंस के अत्याचारों से बहुत से यादव मथुरा छोड़कर यत्र-तत्र सर्वत्र बस गए।

इसी तरह से केशी राक्षस के भय से नन्द बाबा के पिता पर्जन्य मथुरा छोड़कर परिवार सहित गोकुल( महावन) में जा बसे। किन्तु वहाँ पर पशुओं के लिए अच्छा चारागाह न होने के कारण नन्द बाबा गोकुल को भी छोड़कर श्रीकृष्ण सहित समस्त गोपों के साथ  व्रज के बृन्दावन में रहने लगे।
इसके अतिरिक्त जब श्रीकृष्ण कंस का वध करके मथुरा में रहने लगे तब वहाँ पर जरासन्ध के बार बार आक्रमण से तंग आकर अपने समस्त गोपों के साथ मथुरा छोड़कर द्वारकापुरी में रहने लगे।
कहने का तात्पर्य यह है कि यादवों में स्थान परिवर्तन की परम्परा पूर्वकाल से ही रही है। जिसके परिणामस्वरूप यादवों के अनेकों स्थानीय गोत्रों (परिवारों) कुलों का उदय हुआ। जैसे- अन्धक, वृष्णि, कुकुर, भोज इत्यादि जितने भी हुए उन सभी का जनन गोत्र "कार्ष्ण" या कहें उनका मुख्य कुल-खान्दान "वैष्णव ही था।

 क्योंकि (स्वराट विष्णु) अर्थात् श्रीकृष्ण उन सबके प्रमाण में और प्रभुत्व में व्यवस्थित थे ऐसी बात उपर्युक्त श्लोकों में लिखी गई है।

ठीक उसी तरह से आज वर्तमान समय में भी यादवों  की पहचान हर प्रान्तों में अलग-अलग गोत्रों, परिवारों, या कुलों से होती हैं। किन्तु उनका मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण गोत्र" ही। जैसे- ढ़़ढ़ोर, ग्वाल, कृष्नौत, मझरौट, मथुरौट, नारायणी, घोसी, घोष, गोल्ला, गवली, मरट्ठा, मथुवंशी, इत्यादि बहुत से स्थानीय उपगोत्र है, उन सभी को यहाँ बता पाना सम्भव नहीं है।


✴️ (३)- गुरु गोत्र- 


तीसरे प्रकार के गोत्र का नाम  "गुरुगोत्र" है। इस तरह का गोत्र तब निर्धारित होता है, जब कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह किसी ऋषि या अपने मनपसन्द के विश्वसनीय सतनामी गुरु या किसी ऋषि मुनि से- दीक्षा, गुरुमंत्र या गुरूमुखी होकर उसका अनुयायी बनकर उसके नाम पर अपने गोत्र का निर्धारण करता हैं तब उस ऋषि या गुरु के नाम से उसका गोत्र निर्धारित होता है। इसलिए इस प्रकार के गोत्र को "गुरुगोत्र " कहा जाता है, जिसमे गोत्र कर्ता (ऋषि) और उसके अनुयायियों में किसी प्रकार का रक्त सम्बन्ध न  होकर केवल गुरु शिष्य का सम्बन्ध रहता है।

इस तरह के गोत्र का मुख्य उद्देश्य- दीक्षा, शिक्षा, पूजा-पाठ, विवाह इत्यादि को सम्पन्न कराना होता है। जैसे यादवों का "गुरुगोत्र" अत्रि है। किन्तु इस अत्रि गोत्र से यादवों का किसी भी तरह से रक्त सम्बन्ध नहीं है।

यादवों के इस वैकल्पिक "गुरुगोत्र" अत्रि नाम की परम्परा का प्रारम्भ सर्वप्रथम भू-तल पर ब्रह्माजी के पुष्कर यज्ञ में अहीर कन्या देवी गायत्री के विवाह के उपरान्त ही प्रचलन में आया। 
जिसमें अहीर कन्या देवी गायत्री का विवाह ब्रह्मा से अत्रि ने ही यज्ञ में मन्त्रोच्चारण से सम्पन्न कराया था। क्योंकि उस यज्ञ के प्रमुख "अध्वर्यु" होता- (यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करनें वाला पुरोहित) अत्रि ही थे। उसी समय से ऋषि अत्रि गोपों के प्रथम ब्राह्मण पुरोहित हुए। और गोपों के प्रत्येक धार्मिक कार्यों को सम्पन्नता का संकल्प लिया तथा गोपों ने भी ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम से गुरुगोत्र स्वीकार किया।

अहीर कन्या देवी गायत्री का ब्रह्मा से विवाह का प्रसंग पद्मपुराण के अध्याय- (१६ और १७) में मिलता है। जिस किसी को यह जानकारी लेनी है तो वह  वहाँ से ले सकता है।

किन्तु अज्ञानता वश ९९% यादव समाज  ने"अत्रि" को ही अपना जनन गोत्र मान लिया, और अपने मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण" को ही भूल गया कि गोपों अर्थात् यादवों का जन्म किसी  ऋषि-मुनि से न होकर सीधे परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से हुआ है।

  आभीर कन्या गायत्री का  विवाह ब्रह्मा से अत्रि ने ही यज्ञ में मन्त्रोच्चारण से सम्पन्न कराया था। क्योंकि उस यज्ञ के प्रमुख "अध्वर्यु" होता (यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करनें वाला पुरोहित) अत्रि ही थे। उसी समय से ऋषि अत्रि गोपों के प्रथम ब्राह्मण पुरोहित हुए। और गोपों के प्रत्येक धार्मिक कार्यों की सम्पन्नता का संकल्प लिया तथा गोपों ने भी ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम से एक वैकल्पिक गोत्र "अत्रि" बनाया जिसका मुख्य उद्देश्य पूजा पाठ एवं विवाह इत्यादि को सम्पन्न कराना ही था।

अहीर कन्या गायत्री का ब्रह्मा से विवाह का प्रसंग पद्मपुराण के अध्याय- (१६ और १७) में मिलता है। जिस किसी को इसकी जानकारी लेनी है वहाँ से ले प्राप्त कर सकता है।




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