शनिवार, 29 अगस्त 2026

नया गीत भाग( २)

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

शहर-शहर और गाँव-गाँव में, खुल गए इनके दरबार,
धर्म बेचकर नोट छापते' ,धर्म बना व्यापार! 

इनके नहीं रहीं आते पते ये  लम्पट दगावाज।
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

​(अंतरा 1)

मंच सजाकर बैठ गए हैं, ज्ञान के ठेकेदार,
चंदा लेते, कैश बटोरत, करते रोज व्यापार।

महंगाई में पिसती जनता, हाँफ रही  दिन-रात,  रोजगार नहीं दूर तक   कंगाली के हालात।।

श्रद्धा धर्म के नाम पर नदियों में,बहता दूध।    गरीबों को मुहैया नहीं उसकी एक भी बूँद।

देश की विकट हालाते आज, किसी का राज तो कोई ताक-तैराज।।

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

​(अंतरा 2)

पढ़ा-लिखा हर शख्स यहाँ पर, भावुक अंधविश्वासी हैं। पर्ची वाले शातिर ठग हैं, भीड़ भी अच्छी-खासी है। 

खुद के जीवन के संकट को, जो कभी देख ना पाते हैं। वही पर्चीयाँ खोल खोल कर लोगों का भविष्य बताते हैं। देश विदेशों में सैर करते अपने नहीं खोलते राज।

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

​(समापन)


कुकर्मी बाबाओं का पाखंड (दोहा छंद रूप)
​ढोंगी बाबा देश में, जगह जगह लगाते मंच। दान करों सम्मान करों जग माया का प्रपंच॥

​भोग-विलास करते देखे, आश्रम बड़े बनाए।सदगुरु सेवा से मोक्ष मिले,जन्नत स्वप्न दिखाऐ। 

​महंगाई से देश की, टूट गयी है रीढ।। लोग लाइन में तप रहे , लगी हुई है भीड़

पढ़ा-लिखा समाज भी, अंधा हुआ है आज।॥​भविष्य की पर्ची निकाल रहे, ठागेश्वर महाराज।।

खुद उलझे जीवन पेचों में, सुलझाएँ कैसे रोग॥ सब सुख सुविधाओं को भोगें क्या जाने वे योग!

मार्केट सा बन गया , आज ईश्वर का  दरबार॥ धर्म बोलियों में बिक रहा करते लोग व्यापार ।

उपर्युक्त पक्तियों को आधार मान कर एक फ्यूजन गीत  जनरेट करें  !

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

नया गीत -

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

शहर-शहर और गाँव-गाँव में, खुल गए इनके दरबार,

धर्म बेचकर नोट छापते' इनके कहीं नहीं अते-पते ,धर्म बना व्यापार! ़े लम्पट दगावाज।

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

​(अंतरा 1)

मंच सजाकर बैठ गए हैं, ज्ञान के ठेकेदार,

चंदा लेते, कैश बटोरत, करते रोज व्यापार।

महंगाई में पिसती जनता, हाँफ रही  दिन-रात,  रोजगार नहीं दूर तक  कंगाली के हालात।।

श्रद्धा धर्म क नाम पर नदियों में,बहता दूध।    गरीबों को मुहैया नहीं उसकी एक भी बूँद।

देश की विकट हालाते आज, किसी का राज तो कोई ताक-तैराज।।

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

​(अंतरा 2)

पढ़ा-लिखा हर शख्स यहाँ पर, भावुक अंधविश्वासी हैं। पर्ची वाले शातिर ठग हैं, भीड़ भी अच्छी-खासी है। 

खुद के जीवन के संकट को, जो कभी देख ना पाते हैं। वही पर्चीयाँ खोल खोल कर लोगों का भविष्य बताते हैं। देश विदेशों में सैर करते अपने नहीं खोलते राज।

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

​(समापन)


कुकर्मी बाबाओं का पाखंड (दोहा छंद रूप)

​ढोंगी बाबा देश में, जगह जगह लगाते मंच। दान करों सम्मान करों जग माया का प्रपंच॥

​भोग-विलास करते देखे, आश्रम बड़े बनाए।सदगुरु सेवा से मोक्ष मिले,जन्नत स्वप्न दिखाऐ। 

​महंगाई से देश की, टूट गयी है रीढ।। लोग लाइन में तप रहे , लगी हुई है भीड़

पढ़ा-लिखा समाज भी, अंधा हुआ है आज।॥​भविष्य की पर्ची निकाल रहे, ठागेश्वर महाराज।।

खुद उलझे जीवन पेचों में, सुलझाएँ कैसे रोग॥ सब सुख सुविधाओं को भोगें क्या जाने वे योग!

मार्केट सा बन गया , आज ईश्वर का  दरबार॥धर्म बोलियों में बिक रहा करते लोग व्यापार ।

उपर्युक्त पक्तियों को आधार मान कर एक फ्यूजन गील लिखें !






गुरुवार, 27 अगस्त 2026

आरक्षण के प्रतिमान-

सैद्धान्तिक व विश्लेषणात्मक ऑडियो स्क्रिप्ट

(साउंड डिज़ाइन: पृष्ठभूमि में एक गंभीर और विचारोत्तेजक (thought-provoking) वाद्य यंत्र की हल्की धुन बजती है, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।)

भाग 1: प्रस्तावना - समानता और मूल्यांकन की आवश्यकता

  • वॉयसओवर (VO): "इस देश में व्यवस्था और न्याय के पैमानों पर एक नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। चाहे बात संवैधानिक प्रावधानों की हो या सामाजिक और धार्मिक संरचनाओं की—यह देखना अनिवार्य है कि क्या सभी मनुष्य समान धरातल पर खड़े हैं? समय आ गया है कि व्यवस्थाओं का मूल्यांकन नए दृष्टिकोण से किया जाए।"

भाग 2: व्यक्तित्व, परिवेश और विशेषाधिकार

  • वॉयसओवर (VO): "हर व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसका दायरा उसके परिवेश और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से तय होता है। लेकिन जो लोग संवैधानिक आरक्षण का पुरजोर विरोध करते हैं, उन्हें अपनी सामाजिक और जातीय उच्चता के पारंपरिक विशेषाधिकारों का भी निष्पक्ष आत्मविश्लेषण करना चाहिए। क्या जन्मजात श्रेष्ठता के वे दावे आज भी प्रासंगिक हैं जो सदियों से समाज में असमानता पैदा करते आए हैं?"

भाग 3: धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं पर सवाल

  • वॉयसओवर (VO): "विचारणीय यह भी है कि सदियों से मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं और सांस्कृतिक केंद्रों पर एकाधिकार और वहां प्राप्त होने वाले दान व चढ़ावे के अधिकार को बिना किसी योग्यता के एक वर्ग विशेष से जोड़ना कहाँ तक न्यायसंगत है? यदि हम योग्यता और समानता की बात करते हैं, तो इसकी शुरुआत हर स्तर पर होनी चाहिए।"

भाग 4: निष्कर्ष - साधना, सत्कर्म और वास्तविक पात्रता

  • वॉयसओवर (VO): "सत्य यह है कि साधना, सत्कर्म, और क्षमता के आधार पर ही व्यक्ति अपने अनुकूल पद और सम्मान का वास्तविक अधिकार प्राप्त करता है। जन्म से कोई भी व्यक्ति किसी पद या श्रेष्ठता का पात्र नहीं होता। योग्यता और श्रम ही मनुष्य की असली पहचान तय करते हैं।"

(साउंड डिज़ाइन: संगीत का प्रभाव गहरा होता है और अंत में एक शांत ठहराव के साथ समाप्त होता है।)


______________

आरक्षण पर पाखंड और पुरोहिती की दोहरी नीति

​(आवाज़ में गंभीरता और सवालिया लहजा)

"जब भी देश में आरक्षण की बात आती है, तो योग्यता और मैरिट का ढिंढोरा पीटने वाले सबसे आगे खड़े हो जाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि सदियों से चली आ रही इस व्यवस्था में सबसे बड़ा विरोधाभास कहाँ छिपा है?

बैकग्राउंड में दूर देशीय बाँसुरी व सिंथ का स्वर सुनाई दे " ऑडियो तीन मिनट का जनरेट करें !

​(आवाज़ में दृढ़ता)

आरक्षण पर आपत्ति जताने का नैतिक अधिकार उन लोगों के पास कदापि नहीं है, जो बिना किसी औपचारिक शास्त्रीय, शैक्षणिक या धार्मिक परीक्षा के, केवल परंपरा के नाम पर पुरोहिती के पद पर आज भी कब्जा जमाए बैठे हैं।

​(थोड़ा ठहरकर, सोचने वाले अंदाज़ में)

जरा सोचिए, देश के किसी भी कोने में चले जाइए। क्या कभी किसी ब्राह्मण पुजारी या पुरोहित से यह पूछा जाता है कि उसने वेद, पुराण या कर्मकांड का कौन सी प्रवेश परीक्षा एग्जाम पास किया था? उसकी डिग्री या सर्टिफिकेट क्या है? नहीं! वह पद वंशानुगत और पारंपरिक रूप से बिना किसी प्रतिस्पर्धा के मिल जाता है।


​(तीखे और विश्लेषणात्मक लहजे में)

हैरानी की बात तो यह है कि जो लोग खुद इस विशेषाधिकार का आनंद पीढ़ियों से उठा रहे हैं, वे आज आधुनिक व्यवसायों, राजनीति, और अन्य क्षेत्रों में भी दखल रखते हैं। वे समाज के बाकी हिस्सों को यह सिखाते हैं कि किसे कौन सा काम मिलना चाहिए और किस आधार पर मिलना चाहिए।


​(सुलझे हुए और सीधे स्वर में)

यह दोहरी नीति अब और नहीं चल सकती। अगर योग्यता ही हर चीज का पैमाना है, तो इसकी शुरुआत उस व्यवस्था से क्यों नहीं की जाती जो सदियों से बिना किसी योग्यता के एक ही वर्ग के हाथ में सुरक्षित रही है? आरक्षण केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि यह सदियों के सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व की लड़ाई है।


​(अंत में एक प्रभावशाली और सीधा सवाल)

अगली बार जब कोई आपसे योग्यता के नाम पर आरक्षण पर सवाल करे, तो उनसे बस इतना पूछिए—क्या पुरोहिती के पेशे में आज भी योग्यता और परीक्षा के दरवाजे खुले हैं?"


  • दृश्य 1: वीडियो की शुरुआत (पृष्ठभूमि में प्राचीन भारतीय समाज, खेतों में परिश्रम करते किसान, शिल्पी और गुरुकुलों के मूक दृश्य उभरते हैं। एक गंभीर और ओजस्वी स्वर में वक्ता बोलना शुरू करता है।) सूत्रधार: "आरक्षण... आज के दौर का वह शब्द, जिस पर सबसे ज्यादा बहस होती है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि आरक्षण का विरोध करने की यह मानसिकता आख़िर कहाँ से उपजी है? इसके मूल में कौन सा वैचारिक एकाधिकार छिपा है?"
  • दृश्य 2: सूत्रधार का वॉइसओवर और विजुअल कट (स्क्रीन पर एक तरफ मेहनतकश समाज का कोलाज और दूसरी तरफ ऐतिहासिक रूप से बौद्धिक कर्मकांडों पर एकाधिकार रखने वाले वर्ग का सांकेतिक चित्र आता है।) सूत्रधार: "आरक्षण का विरोध करने वाले प्रायः वे लोग हैं, जो सदियों से 'दान' और 'दक्षिणा' के नाम पर भिक्षा पाने के एकाधिकार का आरक्षण लिए हुए हैं। वे समाज में खुद को स्वघोषित रूप से सर्वश्रेष्ठ और उच्चजातीय मानते हैं। विडंबना यह है कि ये वही लोग हैं, जो आज आरक्षण को समाज का आधार मानकर उस पर सवाल उठाते हैं।"
  • दृश्य 3: मुख्य व्यंग्य और यथार्थ (स्क्रीन पर पसीना बहाते अन्नदाता, श्रमिक और दूसरी तरफ उनके श्रम पर पलने वाली व्यवस्था का प्रतीकात्मक दृश्य दिखाई देता है।) सूत्रधार: "आश्चर्य इस बात का है कि जो लोग हाड़-तोड़ परिश्रम करके, अपना पसीना बहाकर इनकी भिक्षा और जीवन-प्रबंध का सारा इंतजाम करते हैं, वे ही इनकी दृष्टि में 'निम्न' मान लिए जाते हैं। और जो लोग पीढ़ियों से श्रमहीन रहकर केवल बौद्धिक श्रेष्ठता के दम पर जीते आए हैं, वे खुद को 'श्रेष्ठ' घोषित करते हैं।"
  • दृश्य 4: समापन और वैचारिक अपील (स्क्रीन पर कुछ देर के लिए रुकते हुए विचारणीय वाक्य उभरते हैं— "श्रम ही सृजन है, श्रम ही सत्य है।") सूत्रधार: "सवाल विशेषाधिकार का नहीं, बल्कि न्याय का है। जिस दिन समाज श्रम को उसका वास्तविक सम्मान देना सीख जाएगा, उस दिन श्रेष्ठता और निम्नता के सारे कृत्रिम आवरण स्वतः समाप्त हो जाएंगे।" 




मंगलवार, 25 अगस्त 2026

कब्बाली-

कव्वाली: "जीवन की नैया और प्रभु का सहारा"

  • मुख्य गायक (लीड सिंगर): उस्ताद / मुख्य फनकार
  • कोरस (साथी गायक): "वा वाह!..." और हर मुखड़े को दोहराने के लिए।
  • ساز (संगीत): ढोलक, हारमोनियम, और तालियों की गूँज।

1. आहिस्ता-आहिस्ता / आमद (Aamad & Alap)

(संगीत की धीमी और गहरी धुन बजती है। मुख्य गायक दर्द भरे स्वर में अलाप लेता है...)

मुख्य गायक:

नैया पुरानी... भँवर बेहिसाब है !

ऐ जिंदगी, ये कायनाती अजाव हैं। ...

डूबने को है कश्ती, मगर क्या मजाल है...

कोई थामने वाला पतवार परमानुभाव है!

2. महफिल की शुरुआत (Introductory Couplet / Sher)

(हारमोनियम पर तेज सुर और तबले की थाप के साथ)

अन्तरा-(​मुख्य गायक:)

हवाओं का रुख बदल रहा है, पर मेरा यकीन नहीं डगमगाया! 

जुल्म जमाने में  हैं कायनात में जुल्मतों का साया !!

ज़रा गौर फरमाइगा इस शेर पर...

तुफानों की ज़िद है जहाँ आंधियां चलें,

हमारा भी ये फैसला है कि कश्तीयों में  दीपक जले !

​आइए, इस दिल की दास्तां को सुरों में पिरोते हैं!

3. स्थाई (Main Refrain)

(पूरी कव्वाली पार्टी मिलकर ऊंचे स्वर में गाती है, ढोलक की तेज थाप के साथ)

कोरस + मुख्य गायक:

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में आरोहि अथाह पानी!

तूफानों का वेग प्रबल है, लहरों की है तेज़ रवानी...

सुन लो इस जीवन की कहानी!

(संगीत का एक छोटा और तेज़ अंतरा — ताली की थाप के साथ)

4. अंतरा 1 (अंधेरा और नादानी)

(गायक थोड़ा संभलकर, दर्द और तड़प के साथ)

मुख्य गायक:

उठ रही काली घटाऐं, तेज चलती ये हवाऐं...

हर तरफ है अब अंधेरा, हम जाएं तो किधर जाएं?

अरे भंवर के बीच में कश्ती है...

खेवटिया है नादानी, और कभी मंजिल नहीं जानी!

(कोरस इसे दोहराता है)

कोरस: गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी...

5. अंतरा 2 (संसार का मायाजाल)

(लय थोड़ी तेज और संवादात्मक होती है — दर्शकों को समझाते हुए)

मुख्य गायक:

ज़रा सोचिए दोस्तों! ये दुनिया क्या है?

संसार की नदिया अजब, इच्छा लहरों का काफ़िला है...

अरे बुलबुलों सी जिंदगी ये, पानी में पानी मिला है!

यहाँ सब छलावा है...

मोह के भँबर लोभ के गोते, मृत्यु पथ की है निशानी!

(पूरी पार्टी जोश के साथ दोहराती है)

कोरस: गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी...

6. कव्वाली का मुख्य मोड़: रंग / पुकार (The Climax / Tarannum)

(यहाँ संगीत बिल्कुल धीमा हो जाता है, सिर्फ हारमोनियम की हल्की गूँज और फुसफुसाहट जैसा स्वर रहता है)

मुख्य गायक:

थक गए हाथ, टूट गए पतवार... अब जाएं तो कहाँ जाएं?

तभी याद आता है वो बंसीवाला!

ज़रा तड़प के साथ सुनिएगा...

दु:ख सुख यहाँ जीवन के किनारे,

नाव पड़ी मेरी है मझधारे!

भक्ति के लेकर पतवारे,

ये भक्त प्रभु तुझको ही पुकारे...

खबर लेलो वंशी वारे!!

(यहाँ ढोलक की एक जोरदार थाप लगती है और माहौल भक्तिमय हो जाता है)

मुख्य गायक (ऊंचे सुर में):

थक जाएं हम कभी न हारें, सदियों से तेरी बाट निहारें!

खिंजा-फिजा सब आनी-जानी...


7. महा-अंतिम समापन (Grand Finale)

(सभी कलाकार पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ मिलकर इस अंतिम पंक्ति को गाते हैं, तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कव्वाली समाप्त होती है)

कोरस + मुख्य गायक (एक स्वर में):

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी!

तूफानों का वेग प्रबल है, लहरों की है तेज़ रवानी...

सुन लो इस जीवन की कहानी!!

सुन लो... इस जीवन की... कहानी!!!

(ढोलक की लंबी रोल और अंतिम तीव्र थाप के साथ अंत)


सोमवार, 24 अगस्त 2026

गीत


​[स्थाई]

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी

​[अंतरा 1] 

उठ रही काली घटाऐं, तेज चलती ये हवाऐं।
हर तरफ है अब अंधेरा, हम जाएं तो किधर जाऐं।
खेवटिया है नादानी, और कभी मंजिल नहीं जानी।
गहरी नदीयाँ नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी।

​[अंतरा 2]

संसार की नदिया अजब,  इच्छा लहरों का काफ़िला है। बुलबुलों सी जिन्दगी ये, पानी में पानी मिला है। 
मोह के भँबर लोभ के गोते मृत्यु पथ की निशानी
गहरी नदीयाँ  नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी

​[अंतरा 3]

दु:ख सुख यहाँ जीवन के किनारे , नाव पड़ी  मेरी है मझधारे । भक्ति के लेकर पतवारे! ये भक्त प्रभु  तुझको ही पुकारे ! खबर लेलो वंशी वारे।।  
थक जाएं हम कभी न हारें। सदियों से तेरी बाट निहारें। खिंजा फिजा सब आनी जानी।

गहरी नदीयाँ ये नाव पुरानी, भँवरों में ये अथाह पानी। तूफानों का वेग प्रबल है लहरों की है तेज रबानी। सुनलो इस जीवन की कहानी


शनिवार, 22 अगस्त 2026

​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)
यह नग़मा यादव योगेश कुमार रोही के दिल की सदा है, उनके ख़यालात की इबारत।"
​मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)

​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!

​(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)

​बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)

​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?
रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?
अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है।
 ​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

​बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)

​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?
मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?
हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!
ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?
समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?
​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)

इस कब्बाली का ध्रुपद शैली में गायन करें
ऑडियो जनरेट करें !


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" 

मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)

अलीगढ़ जिले के आजादपुर गाँव से यादव योगेश कुमार रोहि की एक रुहानी पेशकश !

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!

(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)

बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)

​सुनसान राहों के मुसाफ़िर, ये कैसी तेरी गफ़लत है?

अज्ञान के इस अंधियारे में, लिपटा हुआ तेरा कुल मत है!

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस छाया है?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी सारा जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)

​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?

मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?

हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!

ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?

समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)

​मोम से नाज़ुक ये सब बंधन, क्यों जकड़ रहे तेरा मन हैं?

कभी महकती रंग-बिरंगी तितलियाँ, कभी बिजली और तूफ़ान हैं!

लब पर तलब और दिल में मतलब, तू किसके पीछे दीवाना है?

तेरी हयातों के जिम्मे सब, ये बोझ तुझे ही उठाना है।

यों हँसी-खेल में नहीं समय बिताना है!

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)

​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!

तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!

संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।

इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से​मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से लिए गए राजा ययाति के इन पवित्र श्लोकों पर चिन्तन आवश्यक है। 

न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १४ ॥

  • अनुवाद: विषयों के भोगने से भोग-वासना कभी शांत नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोग-वासनाएँ भी भोगों से और अधिक प्रबल हो जाती हैं।
  • यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥ १५ ॥

    • अनुवाद: जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष (द्वंद्व भाव )  नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है। फिर उसे ऋणात्मक और धनात्मक आवेश प्रभावित नहीं करते ।
    • या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः जीर्यतो या न जीर्यते ।

      तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥ १६ ॥

      • अनुवाद: विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से उसका त्याग कर पाते हैं। मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही बनी रहती है। अतः जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए।
      • मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ १७ ॥

        • अनुवाद: और तो क्या—अपनी माता, बहन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि इंद्रियाँ इतनी आवेशयुकत बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं (विचलित कर देती हैं)।

नारी की छाँई परे, अन्धे होत भुजंग।

यह इस दोहे और आपकी व्याख्या पर आधारित एक गम्भीर और दार्शनिक ऑडियो स्क्रिप्ट है। इसे आप अपनी वीडियो प्रस्तुति के लिए उपयोग कर सकते हैं:


​ऑडियो स्क्रिप्ट
​(संगीत: बैकग्राउंड में एक गम्भीर, मंद और शास्त्रीय भारतीय वाद्ययंत्र (जैसे कि सारंगी या बांसुरी) की धीमी धुन, जो एक गहन दार्शनिक वातावरण बनाए।)
​वॉइसओवर (धीमी और प्रभावशाली आवाज़ में): कबीर के सिद्धान्तों के जानकार यादव योगेश कुमार रोहि कबीर की एक साखी की व्याख्या विज्ञान सम्मत विधि से करते हैं।-
​"गौर से सुनिए इस दोहे को—
नारी की छाँई परे, अन्धे होत भुजंग।
कबिरा जिनकी कौन गति, जो नित नारी संग ?
​कबीर की दृष्टि यहाँ अत्यंत तीक्ष्ण है। वे कहते हैं कि विलासनी स्त्रियों का प्रभाव इतना गहरा है कि उसकी छाया मात्र पड़ने से जो व्यक्ति अन्धा है 'वह भी विषैले सर्प की भाँति होकर हरकतें करने लगता है।  लेकिन, कबीर का कटाक्ष गहरा है—वे प्रश्न पूछते हैं कि उन लोगों की मानसिक  गति क्या होगी, जो हर क्षण केवल स्त्रियों के संग में डूबे रहते हैं?"
​(थोड़ा अंतराल—संगीत की लय थोड़ी और गम्भीर होती है)
​"इसे विज्ञान के एक सिद्धांत से समझिए—दो विपरीत आवेशीय तत्व, यानी धनात्मक और ऋणात्मक तत्व जब परस्पर मिलते हैं, तो उनमें एक स्वाभाविक 'आकर्षण' या प्रतिक्रिया होती है। भौतिकी में इसे विद्युत उत्पादन कहा जा सकता है, किन्तु मानवीय संबंधों के संदर्भ में, जब यह आकर्षण केवल वासना के धरातल पर हो, तो यह अनुक्रिया नहीं, बल्कि एक 'फॉल्ट' की तरह प्रतिक्रिया करता है।

​प्रकृति का यह नियम है कि समान आयु और विपरीत लिंगीयों पर घटित होता है। कबीर की यह चेतावनी उसी 'फॉल्ट' की ओर संकेत है, जहाँ मनुष्य अपना विवेक खोकर उसी अंधकार में विलीन हो जाता है, जिसे वे 'भुजंग' की प्रवृत्ति कहते हैं।"

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से लिए गए राजा ययाति के चिन्तन से सम्बन्धित इन पवित्र श्लोकों पर चिन्तन आवश्यक है। 

न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १४ ॥

  • : विषयों के भोगने से भोग-वासना कभी शांत नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोग-वासनाएँ भी भोगों से और अधिक प्रबल हो जाती हैं।
  • यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥ १५ ॥
  • : जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष (द्वंद्व भाव )  नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है। फिर उसे ऋणात्मक और धनात्मक आवेश प्रभावित नहीं करते 
  • या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः जीर्यतो या न जीर्यते । तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥ १६ ॥
  • : विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से उसका त्याग कर पाते हैं। मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही बनी रहती है। अतः जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए।
  • मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ १७ ॥
  • : और तो क्या—अपनी माता, बहन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि इंद्रियाँ इतनी आवेशयुकत बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं (विचलित कर देती हैं)।​

​(संगीत धीरे-धीरे शांत होता है और समाप्त होता है)
​सुझाव: इस ऑडियो को रिकॉर्ड करते समय शब्दों के बीच ठहराव (Pauses) का विशेष ध्यान रखें, ताकि सुनने वाले को दोहे का अर्थ और आपकी वैज्ञानिक व्याख्या, दोनों पर विचार करने का समय मिले।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

कव्वाली का अंदाज़ और टेक (मुखड़ा)

(संगीत की हल्की धुन और हारमोनियम के सुरों के बीच मुख्य गायक का आह्वान...)

मुखड़ा (बार-बार दोहराया जाने वाला शेर):

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

****

अर्ज़ किया है...

बन्दिश 1 (प्रथम पद पर आधारित)

​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! गफलत की लत जहालत का साया है ?

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

हरे कृष्णा ! 

बन्दिश 2 (द्वितीय पद पर आधारित)

संसार में जीवन का पाना ! 

और मरके कहाँ जाना।।

 हँसना रोना पीना खाना।

 रहस्य ये तूने क्यों न जाना। समय को यों ही व्यर्थ गवाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

बन्दिश 3 (तृतीय पद पर आधारित)

मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा  मन ! 

ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !

लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

बन्दिश 4 (चतुर्थ पद पर आधारित)


हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


******************************


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)

मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!


(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)

बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)


​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है 

बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)

​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?

मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?

हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!

ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?

समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)


मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा मन ! 

ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !

लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

​_____

बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)

​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!

तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!

संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।

इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!


हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)

यह नग़मा यादव योगेश कुमार रोही के दिल की सदा है, उनके ख़यालात की इबारत।"

​मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)


​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!


तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।


दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!


ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!



​(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)


​बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)



​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?


रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?


अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।


डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है 


​बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)


​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?


मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?


हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!


ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?


समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?


​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)



मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा मन ! 


ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !


लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  


डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


​_____


​बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)


​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!


तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!


संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।


इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!


​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)


​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!


तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।


दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!



हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना


डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।



​(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


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मंगलवार, 18 अगस्त 2026

वर्णमाला का विवेचन-

यह आलेख भाषा विज्ञान, लिपि विकास (विशेषकर देवनागरी और ब्राह्मी), और संस्कृत-अंग्रेजी वर्णमाला के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित एक बेहद महत्वपूर्ण और मौलिक वैचारिक दस्तावेज है।

​आपके द्वारा प्रस्तुत इस शोध-लेख का शोधपरक विश्लेषण, परिष्करण और संपादन निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत है, ताकि इसकी अकादमिक गरिमा, तार्किक प्रवाह और स्पष्टता और अधिक मजबूत हो सके:

​भारतीय लिपि और भाषा विज्ञान: एक शोधात्मक विश्लेषण

प्रस्तुतकर्ता: यादव योगेश कुमार "रोहि"

​1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और लिपियों का विकास क्रम

​भारतीय इतिहास और संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए भाषा और लिपि के विकास का क्रम सबसे प्रामाणिक माध्यम है। पारंपरिक रूप से वेदिक काल से लेकर बौद्ध काल तक मौखिक परंपरा (श्रुति) का प्रधान्य रहा है।

  • पणियों की भूमिका और लिपि का उद्भव: ऋग्वेद में वर्णित 'पणि' (जिन्हें पश्चिमी इतिहास में फोनेशियन या प्यूनिक व्यापारी कहा गया है) समुद्री व्यापार और प्राचीन संस्कृति के संवाहक थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, आदि-सीनाई लिपि से विकसित हुई फोनेशियन वर्णमाला विश्व की कई प्रमुख अक्षरमालाओं की जननी है। इसी श्रृंखला में आगे चलकर आरमैइक (Aramaic) लिपि से ब्राह्मी लिपि और अंततः देवनागरी लिपि का विकास हुआ।
  • संस्कृत, प्रापाली और देवनागरी का कालक्रम:
    • वैदिक भाषा अत्यंत प्राचीन और जटिल होने के कारण सीधे तौर पर जनसामान्य की बोलचाल की भाषा नहीं बन सकी।
    • ​बौद्ध और जैन काल में आम जनता तक अपने विचार पहुँचाने के लिए पाली और अपभ्रंश जैसी लोकभाषाओं का व्यापक प्रयोग हुआ।
    • ​समयान्तर पर वैदिक भाषा के परिमार्जन और लोकभाषाओं के समन्वय से लौकिक संस्कृत का जन्म हुआ और इसे लिखने के लिए देवनागरी लिपि का वैज्ञानिक स्वरूप निखारा गया।

​2. देवनागरी वर्णमाला का वैज्ञानिक विश्लेषण (संस्कृत व्याकरण के संदर्भ में)

​संस्कृत और हिंदी की देवनागरी लिपि दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में से एक है, क्योंकि इसमें उच्चारण स्थल और ध्वनि के बीच सीधा और तार्किक संबंध है।

​क. वर्णों का कुल वर्गीकरण (संस्कृत मानक के अनुसार)

​संस्कृत वर्णमाला में कुल 64 वर्ण माने गए हैं:

  1. स्वर (23):
    • ह्रस्व/लघु स्वर (5): अ, इ, उ, ऋ, लृ
    • दीर्घ स्वर (8): आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ
    • प्लुत स्वर (9): अ३, इ३, उ३ आदि (जिन्हें त्रिमात्रिक स्वरों के रूप में तीन मात्रा के समय के साथ उच्चारित किया जाता है)।
  2. व्यंजन (33):
    • स्पर्श व्यंजन (25): क-वर्ग से प-वर्ग तक (पाँच वर्गीय समूह)।
    • अंतःस्थ व्यंजन (4): य्, र्, ल्, व्
    • उष्म व्यंजन (4): श्, ष्, स्, ह्
  3. अयोगवाह (8): अनुस्वार, विसर्ग, अनुनासिक, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय, ह्रस्व, दीर्घ और ळ।

​3. उच्चारण स्थान और व्याकरणिक विशिष्टताएँ

​क. उच्चारण के आधार पर वर्णों के मुख्य स्थान:

  • कण्ठः: अ, क्, ख्, ग्, घ्, ह्, विसर्ग (ः)
  • तालुः: इ, च्, छ्, ज्, झ्, य्, श्
  • मूर्धा: ऋ, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्, र्, ष्
  • दन्तः: लृ, त्, थ्, द्, ध्, न्, ल्, स्
  • ओष्ठः: उ, प्, फ्, ब्, भ्, म्

​ख. संयुक्त वर्ण "ज्ञ" का शास्त्रीय एवं यथार्थ उच्चारण

​समाज में "ज्ञ" के उच्चारण को लेकर अक्सर यह भ्रम रहता है कि इसे सीधे 'ज्ञ' (ज् + ञ्) बोला जाए। किंतु शिक्षा और व्याकरण ग्रंथों (जैसे तैत्तिरीय प्रातिशाख्य और पाणिनीय व्याकरण) के नियमों के अनुसार:

  • ​जब 'ज्' के तुरंत बाद 'ञ्' आता है, तो प्रातिशाख्य के नियमों (यम के आगम) के तहत बीच में एक नासिक्य ध्वनि (यम) का आगम होता है।
  • ​तदनुसार, प्रक्रिया पूरी होने पर "ज्ञ" का शास्त्र-सम्मत और मूल उच्चारण 'ग्ञ्' (यानी ग्-ग्-ञ् जैसी प्रयुक्त ध्वनि) सिद्ध होता है, जिसे पारंपरिक लोक व्यवहार में भी सुरक्षित रखा गया है।

​4. भारतीय और पाश्चात्य भाषा विज्ञान: स्वर और व्यंजनों की तुलना

​जिस प्रकार संस्कृत व्याकरण में स्वरों और व्यंजनों का कड़े वैज्ञानिक नियमों के तहत विभाजन किया गया है, उसी प्रकार अंग्रेजी सहित अन्य यूरोपीय भाषाओं में भी ध्वनियों का वर्गीकरण मिलता है:

  • अंग्रेजी वर्णमाला (26 अक्षर): इसमें मुख्य रूप से 5 स्थायी स्वर (A, E, I, O, U) और 21 व्यंजन होते हैं।
  • अर्धस्वर (Semi-vowels): अंग्रेजी में 'Y' और 'W' ऐसे वर्ण हैं जो संदर्भ के अनुसार कभी व्यंजन (Consonant) तो कभी स्वर (Vowel) दोनों की भूमिका निभाते हैं (जैसे 'Yellow' में 'Y' व्यंजन है, जबकि 'Baby' या 'Sunny' के अंत में यह ई जैसी स्वर ध्वनि देता है)।
  • सिलेबिक व्यंजन (Syllabic Consonants): अंग्रेजी के कुछ शब्दों (जैसे Bottle, Middle, Rhythm) में 'L', 'N', 'M' जैसे व्यंजन बिना किसी अलग स्वर वर्ण के अपने आप में एक शब्दांश (Syllable) की भूमिका निभाते हैं।

​5. निष्कर्ष

​यह शोध स्पष्ट करता है कि भाषा और लिपियाँ स्थिर नहीं होतीं, बल्कि काल, परिस्थिति और मानव सभ्यता के विकास के साथ निरंतर परिष्कृत होती हैं। प्राचीन पणि (फोनेशियन) व्यापारिक यात्राओं से शुरू हुआ लिपि का सफर ब्राह्मी से होते हुए आज वैज्ञानिक रूप में देवनागरी तक पहुँचा है। संस्कृत का व्याकरण और देवनागरी की वर्णमाला मात्र संवाद का साधन नहीं, बल्कि मानव शरीर के उच्चारण अंगों पर आधारित एक पूर्ण विज्ञान है।


शीर्षक: भारतीय लिपि और भाषा विज्ञान: एक शोधात्मक विश्लेषण

प्रस्तुतकर्ता: यादव योगेश कुमार "रोहि"

[आरंभिक संगीत: एक शांत, गंभीर और पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय वाद्य यंत्र (जैसे हारमोनियम और हल्की मंजीरा गूंज) की सुरीली धुन, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ेगी।]

मुख्य आवाज़ (गंभीर, स्पष्ट और आश्वस्त लहजे में):

​नमस्कार दोस्तों! आज के इस वैचारिक सफर में हम गहराई से समझने जा रहे हैं भाषा विज्ञान, लिपि के विकास और दुनिया की सबसे वैज्ञानिक वर्णमाला के इतिहास को। यह आलेख आधारित है हमारे प्राचीन इतिहास और लिपियों के उस सफर पर, जो पणि व्यापारियों से शुरू होकर देवनागरी तक पहुँचा है।

[भाग 1: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और लिपियों का विकास क्रम]

​भारतीय इतिहास और संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए भाषा और लिपि का विकास सबसे प्रामाणिक माध्यम है। पारंपरिक रूप से वैदिक काल से लेकर बौद्ध काल तक मौखिक परंपरा यानी 'श्रुति' का ही प्राधान्य रहा है।

​ऋग्वेद में वर्णित 'पणि'—जिन्हें पश्चिमी इतिहास में फोनेशियन या प्यूनिक व्यापारी कहा गया है—समुद्री व्यापार और प्राचीन संस्कृति के मुख्य संवाहक थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, आदि-सीनाई लिपि से विकसित हुई फोनेशियन वर्णमाला विश्व की कई प्रमुख अक्षरमालाओं की जननी है। इसी श्रृंखला में आगे चलकर आरमैइक लिपि से ब्राह्मी लिपि और अंततः हमारी अत्यंत वैज्ञानिक देवनागरी लिपि का विकास हुआ।

​जहाँ एक तरफ वैदिक भाषा की जटिलता के कारण वह जनसामान्य की बोलचाल की भाषा नहीं बन सकी, वहीं बौद्ध और जैन काल में आम जनता तक अपने विचार पहुँचाने के लिए पाली और अपभ्रंश जैसी लोकभाषाओं का व्यापक प्रयोग हुआ। समयान्तर पर वैदिक भाषा के परिमार्जन और लोकभाषाओं के समन्वय से लौकिक संस्कृत का जन्म हुआ और इसे संरक्षित करने के लिए देवनागरी लिपि के वैज्ञानिक स्वरूप को निखारा गया।

[भाग 2: देवनागरी वर्णमाला का वैज्ञानिक विश्लेषण]

​संस्कृत और हिंदी की देवनागरी लिपि दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में से एक है, क्योंकि इसमें उच्चारण स्थान और ध्वनि के बीच सीधा और तार्किक संबंध है।

​संस्कृत मानक के अनुसार वर्णमाला में कुल 64 वर्ण माने गए हैं:

  • स्वर (23): जिसमें 5 ह्रस्व या लघु स्वर (अ, इ, उ, ऋ, लृ), 8 दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ), और 9 प्लुत स्वर शामिल हैं।
  • व्यंजन (33): जिनमें 25 स्पर्श व्यंजन, 4 अंतःस्थ व्यंजन (य्, र्, ल्, व्) और 4 उष्म व्यंजन (श्, ष्, स्, ह्) आते हैं।
  • ​साथ ही 8 अयोगवाह भी इस व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं।

[भाग 3: उच्चारण स्थान और "ज्ञ" का रहस्य]

​भाषा विज्ञान में उच्चारण का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। हमारे मुँह के मुख्य अंग—कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ—इन सभी ध्वनियों के उद्गम स्थल हैं।

​लेकिन आइए, समाज में एक बहुत बड़े भ्रम पर बात करते हैं—संयुक्त वर्ण "ज्ञ" का उच्चारण।

अक्सर लोग इसे सीधे तौर पर 'ज् + ञ्' बोलते हैं। किंतु शिक्षा और व्याकरण ग्रंथों—जैसे तैत्तिरीय प्रातिशाख्य और पाणिनीय व्याकरण—के नियमों के अनुसार, जब 'ज्' के तुरंत बाद 'ञ्' आता है, तो प्रातिशाख्य के 'यम' के आगम नियम के तहत बीच में एक नासिक्य ध्वनि का प्रादुर्भाव होता है।

​तदनुसार, प्रक्रिया पूरी होने पर "ज्ञ" का शास्त्र-सम्मत और मूल उच्चारण 'ग्ञ्' (यानी ग्-ग्-ञ् जैसी प्रयुक्त ध्वनि) सिद्ध होता है, जिसे हमारे पारंपरिक लोक व्यवहार में भी हमेशा से सुरक्षित रखा गया है।

[भाग 4: पाश्चात्य भाषा विज्ञान से तुलना]

​जिस प्रकार संस्कृत व्याकरण में स्वरों और व्यंजनों का कड़े वैज्ञानिक नियमों के तहत विभाजन किया गया है, वैसा ही स्वरूप हमें अंग्रेजी सहित अन्य यूरोपीय भाषाओं में भी मिलता है। अंग्रेजी वर्णमाला के 26 अक्षरों में 5 स्थायी स्वर हैं, तो वहीं 'Y' और 'W' जैसे वर्ण संदर्भ के अनुसार कभी व्यंजन तो कभी स्वर दोनों की भूमिका निभाते हैं। यहाँ तक कि अंग्रेजी के कुछ शब्दों (जैसे Bottle या Rhythm) में 'L' और 'N' जैसे व्यंजन बिना किसी अलग स्वर वर्ण के अपने आप में एक शब्दांश की खूबी रखते हैं।

[निष्कर्ष]

​यह शोध स्पष्ट करता है कि भाषा और लिपियाँ कभी स्थिर नहीं होतीं; वे काल, परिस्थिति और मानव सभ्यता के विकास के साथ निरंतर परिष्कृत होती हैं। प्राचीन पणि व्यापारिक यात्राओं से शुरू हुआ लिपि का यह सफर ब्राह्मी से होते हुए आज वैज्ञानिक रूप में देवनागरी तक पहुँचा है।

​संस्कृत का व्याकरण और देवनागरी की यह वर्णमाला मात्र संवाद का साधन नहीं, बल्कि मानव शरीर के उच्चारण अंगों पर आधारित एक पूर्ण और अकादमिक विज्ञान है।

[समाप्त संगीत: हल्की और सुखद पारंपरिक गूँज के साथ ऑडियो का समापन]


हालात, इश्क और बगावत

गीत-हालात, इश्क और बगावत

​गीत परिचय
​गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।

​स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।

​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)
​मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...
कुछ अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!

मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!

​अंतरा (कोरस के साथ):

राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,
जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)

​संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):

​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,
अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!
लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,
दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।
जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, कुछअनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):

स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,
भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !

पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश।

महंगाई बेकाबू आम जन लाचार है, दिनदूनी रात चौगुनी बढती कीमतों की मार है।
बेरोजगारी , रिश्वतघोरी जनता में हाहाकार है।
व्यापारीयों की बहार है।
संशोधित गीत -
उत्तर भारतीय लोक संगीत शैली में कब्बाली का हारमोनियम व ढोलक की ताल पर सम्फोनी व सिंथ के स्वर को साथ  स्पष्ट उच्चारण करते हुए ऑडियो जनरेट करें !

गीत का स्क्रिप्ट नयी शैली में प्रस्तुत कर लिखें
गीत-हालात, इश्क और बगावत

​गीत परिचय
​गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय कब्बाली सूफी शैली में (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण) ।

​स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।

​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)

​मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...
अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!

मंचों पर उपदेश, पंच बैठे अन्यायी,
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!

​अंतरा (कोरस के साथ):
राजनीति का गंदा खेल, विपक्ष बना है द्रोही,
जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आ रोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।
दिन रात आदमी रोजी को, लगा रहा है रेश

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)

​संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):

​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,
अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!

लेते उनसे ज्ञान, मती गयी उनकी मारी,
दौलत के पीछे, बीत गयी उमर सारी।

जीवन के कुछ दिन अभी रह गये शेष।
रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, कुछ अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):
स्वर ईश्वर बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,
भाँग-धतूरा, फूँक रहे, मन्दिर पड़े  पाखंडी !

छल कपट और द्वेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी छाई देश में  मंदी! 

मँहगाई बेसुमार, कहीं बेरोजगारी।
जाति वाद का खेल, कुपात्र अधिकारी । 
 
डिगा नहीं कभी बिका नहीं न कभी किसी से द्वेष।
युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे,पढ़ने वालों को उपदेश।

महंगाई बेकाबू आम जन लाचार है, दिनदूनी रात चौगुनी बढती कीमतों की मार है।

बेरोजगारी ,रिश्वतघोरी जनता में हाहाकार है।
व्यापारीयों की बहार है। 
गीत का स्क्रिप्ट नयी शैली में प्रस्तुत कर लिखें

गीत-हालात, इश्क और बगावत



​मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...
अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!


मंचों पर उपदेश, पंच बैठे अन्यायी,
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!


​अंतरा (कोरस के साथ):

राजनीति का गंदा खेल, विपक्ष बना है द्रोही,
जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, राह में लुटा बटोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष
महिलाओं को दे रहा बैठा बैठा कहीं उपदेश  ।
बेरोजगारी और मंहगायी कालाबाजारी निवेश।
दिन रात आदमी रोजी को, बस लगा रहा है रेश


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)

​संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):


​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,
अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!


लेते उनसे ज्ञान, मती गयी उनकी मारी,
दौलत के पीछे,भागती देशी दुनिया सारी ।
जीवन के कुछ दिन अभी रह गये शेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश, कुछ अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):

स्वर, ईश्वर बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,

भाँग-धतूरा, फूँक रहे, मन्दिर में पड़े  पाखंडी !

छल कपट और द्वेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी छाई देश में मंदी! 


मँहगाई बेसुमार, कहीं बेरोजगारी।
जाति वाद का खेल, कुपात्र अधिकारी । 

डिगा नहीं कभी बिका नहीं न कभी किसी से द्वेष।
युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे,पढ़ने वालों को उपदेश।

महंगाई बेकाबू आम जन लाचार है, दिन दूनी रात चौ गुनी बढती कीमतों की मार है।

बेरोजगारी ,रिश्वतघोरी जनता में हाहाकार है।

स्टोक भरा है चीना का ,व्यापारीयों की  बहार है। 

हिमांचली लोक संगीत शैली  में ऑडियो जनरेट करें !



सोमवार, 17 अगस्त 2026

नारीयाँ ब्यूटीपार्लर में -

गीत स्क्रिप्ट: हालात, इश्क और बगावत

​गीत परिचय

​गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।

​स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।

​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)

​मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...
अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!

मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!

​अंतरा (कोरस के साथ):

राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,

जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)

​संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):

​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,

अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!

लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,

दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।

जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):

स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,

भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !

पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश

संशोधित गीत -
 उत्तर भारतीय लोक संगीत शैली में कब्बाली का हारमोनियम व ढोलक की ताल पर सम्फोनी व सिंथ के स्वर को साथ  स्पष्ट उच्चारण करते हुए ऑडियो जनरेट करें !

गीत

क्या यही देश में होगा अब !
              ,कि सब कायर हो जाऐंगे।।
कल फिर कई जाहिल 
              तुम्हारे  नाफिर हो जाऐंगे।।

  दया " करुणा "अहिंसा के द्रोही
                आशिक नहीं हबशी होंगे।
इनको फाँसी की न मिले सजा तो
                   वे देश वासी बदनशीं होंगे  ।। 

जिनकी शरीयत  में कत्ल को ही मजहब माना जाता है। वे आशिक नहीं हबशी होंगें।

इनके हिमायत करने वाले बड़े बदनशीं होगे-


गीत स्क्रिप्ट: हालात, इश्क और बगावत

​गीत परिचय

  • गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।
  • स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।

​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)

मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...

अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!

मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,

वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!

अंतरा (कोरस के साथ):

राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,

जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)

संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):

​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,

अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!

लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,

दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।

जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):

स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,

भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !

पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​(अंतरा 3: आशिकाना अंदाज और इश्क के मुद्दत)

संगीत का मूड बदलता है (मृदंग और बांसुरी की सुरीली धुन):

​भाई कमाल के आशिक थे तुम भी,

मुद्दतों ये मुद्दा सरफराज करते हैं।

दिल में उमड़ते मोहब्बत के बादल,

आज भी बयाने-अंदाज करते हैं!

​बवाल की परंपरा को आप संजोये हुए हैं,

खामखां इश्क में रोये हुए हैं।

मोहब्बत में कहीं तुम शहादत न करना,

उल्फत की जंग में बहुत तो खोए हुए हैं!

​(अंतिम चरण: संघर्ष और जिंदगी के फुटपाथ)

लय थोड़ी तेज और प्रेरणादायक:

​मजबूरियाँ हालातों की जब से साथ हैं,

सफर में सैकड़ों-हजारों फुटपाथ हैं।

संभल रहा हूँ जिंदगी की दौड़ में गिर कर,

किस्मतों को तराशने वाले भी कुछ हाथ हैं!

कोडा (समापन पंक्तियाँ - धीमी और गहरी आवाज़ में):

जुल्म बना आरोहि...

किस्मतों को तराशने वाले भी कुछ हाथ हैं...

रोहि सुधरेगा नहीं... सदियों तक ये देश!



******

गीत स्क्रिप्ट: हालात, इश्क और बगावत


​गीत परिचय


​गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।


​स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।


​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)


​मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...

अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!


मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,

वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!


​अंतरा (कोरस के साथ):


राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,


जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)


​संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):


​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,


अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!


लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,


दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।


जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):


स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,


भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !


पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश


संशोधित गीत -

 उत्तर भारतीय लोक संगीत शैली में कब्बाली का हारमोनियम व ढोलक की ताल पर सम्फोनी व सिंथ के स्वर को साथ  स्पष्ट उच्चारण करते हुए ऑडियो जनरेट करें !



वर्णमाला-

भारतीय इतिहास का सूत्रपात बुद्ध के समय से ही होता है। 

बुद्ध के जन्म से  तीनसौ वर्ष पूर्व अर्थात्  ईसापूर्व सप्तम सदी तक  देव संस्कृति के अनुयायियों का जीवन यायावर ही रहा  पुराणों और महाकाव्यों की कथाऐं बुद्ध के बाद  किंवदंतियों पर काव्यात्मक शैली में ही लिखी गयीं । 
लिपियों के जनक पणि लोग थे जो समुद्री व्यापारी और भारतीय बनियों के पूर्वज थे ।

पणियों को ही  यूरोपीय भाषाओं में फॉनिशी अथवा प्यूनिक कहा गया है। 

फॉनिशियन लिपि से आरमैइक लिपि विकसित हुई और उसी श्रंखला में आरमैइक से ब्राह्मी और ब्राह्मी लिपि से देवनागरी लिपि विकसित हुई 
देवनागरी लिपि पूर्ण विकसित वैज्ञानिक लिपि है जो सभी ध्वनियों को अभिव्यक्त करने में सक्षम है‌।
शिलालेखों की परम्परा तो बुद्ध के परवर्ती काल से प्रारम्भ हुई । बुद्ध के तीन सौ वर्ष पूर्व ब्राह्मी लिपि विकसित थी
 
बुद्ध का समय अर्थात ईसापूर्व पाँच सौ के पूर्व है।पालि प्राचीन उत्तर भारत के लोगों की भाषा थी जो पूर्व में बिहार से पश्चिम में हरियाणा-राजस्थान तक और उत्तर में नेपाल-उत्तरप्रदेश से दक्षिण में मध्यप्रदेश तक बोली जाती थी।
 गौतम बुद्ध भी इन्हीं प्रदेशों में विहरण करते हुए लोगों को धम्म समझाते रहे। यह हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार में की एक बोली या प्राकृत है।

इसको बौद्ध त्रिपिटक की भाषा के रूप में भी जाना जाता है।
पालि, ब्राह्मी परिवार की लिपियों में लिखी जाती थी।
वेद भी ब्राह्मी लिपि में लिखे थे।
परन्तु भोज पत्र ताड़पत्र और ताम्रपत्रों पर परन्तु ब्राह्मी लिपि का विकास का एक नगरीय रूप देवनागरी हुआ 
यह देवनागरी लिपि प्राचीन भारत में पहली से चौथी शताब्दी ईस्वी तक विकसित हुई जिसमें वैदिक भाषा के संस्कारित रूप संस्कृत को लिखा गया।
और यह लिपि 7 वीं शताब्दी ईस्वी से आज तक नियमित उपयोग में रही है। 

वैसे तो वेद मौखिक श्रुत परम्परा द्वारा  समाज में प्रसारित और संरक्षित रहे हैं जो शूक्ष्मकाय ही थे। परन्तु यह कार्य दुर्बोध होने से लेखन कार्य के लिए देवनागरी लिपि इस्वी सदी में बनायी गयी 
 लिपियाँ पणियों का आविष्कार थीं।
ऋग्वेद में पणियों का वर्णन है।

"असेन्या वः पणयो वचांस्यनिषव्यास्तन्वः सन्तु पापीः । अधृष्टो व एतवा अस्तु पन्था बृहस्पतिर्व उभया न मृळात् ॥६॥ऋ०10/108/6

"फोनेशियन" लोगों को ऋग्वेद में पणि या वणिक्" नाम से सम्बोधित किया है। 
रोमन लोग पणि लोगों को "प्यूनिक" नाम से जानते थे।

वैदिक काल में "पशुपालन" ही जीवन का आधार था और पणि पशुओं को पालने की अपेक्षा समुद्री "व्यापारी" अधिक थे। यद्यपि पणियों और वैदिक पुरोहितों की भाषाएँ तो समान थी परन्तु देव सूची
भिन्न थी । देव पुरोहित इन्द्र की उपासना करते थे तो पणि लोग इन्द्र के शत्रु बल की  इनमें केवल सांस्कृतिक भेद था नकि भाषाई भेद-
कुछ इतिहास कार लोग राग अलापते हैं कि 
फोनेशियन लोगों की भाषा "सेमेटिक"( अफ्रो-एसियाटिक ) परिवार की थी और
 वैदिक लोगों की भाषा "इंडो-यरोपियन" परिवार की थी परन्तु यह बात भी मिथ्या और कम जानकारी  की बजह से ही है।

फ़ोनीशिया मध्य-पूर्व के उर्वर अर्धचंद्र के पश्चिमी भाग में भूमध्य सागर के तट के साथ-साथ स्थित एक प्राचीन सभ्यता थी। बहुत समय तक ये लेग लेबनान में तथा कार्थेज में उपनिवेश में रहते थे।

समुद्री व्यापार के ज़रिये यह १५०० से ३०० ईसा-पूर्व के काल में भूमध्य सागर के दूर-दराज़ इलाक़ों में फैल कर व्यापार करते रहे हैं।

इन्होने जिस अक्षरमाला का आविष्कार किया उस पर विश्व की सारी प्रमुख अक्षरमालाएँ आधारित हैं।
 इनकी लिपियाँ पशु पक्षीयों के आकार पर आधारित थीं धीरे धीरे जिनमें सुधार और स्थायित्व आया।

देवनागरी-सहित भारत की सभी वर्णमालाएँ इसी फ़ोनीशियाई वर्णमाला की संताने हैं।

लौकिक संस्कृत का जन्म प्राकृत के बाद का है , हा प्राचीन यह प्रश्न भी होता है। 
संस्कृत या वैदिक भाषा वैदिक भाषा प्राचीनतम है परंतु अपनी जटिलता के कारण कभी वो जनमानस की भाषा ना बन सकी अतः कोई भी जनसाधारण के लिए लिखे ग्रंथ या शिलालेख की भाषा वैदिक संस्कृत नही बन सका  इस लिए लौकिक संस्कृत के जन्म (जो की वैदिक संस्कृत और लोकभाषायों के मिश्रण) के बाद उपलब्ध  ग्रंथो तथा शिलालेख का रूपांतरण लौकिक संस्कृत में किया गया जो लोकग्राह्य भाषा बनी।

प्राचीनतम लिपि ब्राह्मी लिपि थी जो वैदिक भाषा  के समय विद्यमान थी लेकिन जिस प्रकार वैदिक भाषा का परिमार्जन लौकिक संस्कृत में हुआ  और उसी तर्ज पर ब्राह्मी लिपि का परिमार्जन भी देवनागरी लिपि के रूप में हुआ है।
 पर ये ध्यान देने योग्य है की आज जिस रूप में देवनागरी लिपि हमे देखने को मिलती है प्रारंभ में वो बिलकुल भिन्न थी।
आज से 100 साल पहले तक पाए जाने वाले अनेक देवनागरी के अक्षर आज अपना स्वरूप पूर्ण रूप से बदल चुके है जैसे अ, आ, ल, य ए इत्यादि।

पहली बात संस्कृत भाषा शास्त्रीय भाषा थी जिसमें शास्त्रीय पद्धति के अनुरूप परम्परागत रूप से संस्कृत का प्रयोग हुआ।

और दूसरी बात  यह जन साधारण की भाषा नहीं थी । जबकि बौद्ध और जैन राजाओं ने साधारण लोगों को सूचित करने के लिए ही पाली और अपभ्रंश भाषाओं का प्रयोग किया ।

संस्कृत वैदिक भाषा का संस्कारित ( परिमार्जित) रूप है । सत्य कहें तो संस्कृत तत्सम और पाली और अपभ्रंश तद्भव भाषाएँ हैं। संस्कृत भाषा वैदिक भाषा के सबसे निकटतम है ।

वैदिक भाषा का संस्कारित रूप नगरीय और सभ्य जनों का रूप रहा जबकि पाली अपभ्रंश ग्रामीण, अशिक्षित तथा कामगार लोगों का संवादीय रूप रहा है।

 आदि-सीनाई लिपि > फ़ोनीशियाई वर्णमाला > आरमेइक लिपि > ब्राह्मी लिपि> से देवनागरी लिपि का विकास हुआ है। जो 
दिशा: बाएँ-से-दाएँ लिखी जाती रही है।

पहली बात संस्कृत भाषा शास्त्रीय भाषा थी जिसमें शास्त्रीय पद्धति के अनुरूप परम्परागत रूप से ब्राह्मण शास्त्रों का लेखन हुआ  और दूसरी बात  यह कि संस्कृत जन साधारण की भाषा नहीं थी। 
जबकि बौद्ध और जैन राजाओं ने साधारण लोगों को सूचित करने के लिए ही पाली और अपभ्रंश भाषाओं का प्रयोग किया।

संस्कृत वैदिक भाषा का संस्कारित ( परिमार्जित) रूप है । सत्य कहें तो संस्कृत तत्सम और पाली और अपभ्रंश तद्भव भाषाएँ हैं।

वैदिक भाषा का संस्कारित रूप नगरीय और सभ्य जनों का रूप रहा जबकि पाली अपभ्रंश ग्रामीण अशिक्षित तथा कामगार लोगों का संवादीय रूप रहा है।

देव नागरी लिपि का ध्वनियों का एक वैज्ञानिक विश्लेषण-
वर्णों की विवेचनात्मक व्याख्या :- यादव योगेश कुमार "रोहि"
संस्कृत से सम्बन्धित प्राथमिक ज्ञान... 

> संस्कृत वर्णमाला मे ६४ वर्ण होते हैं।
२३ स्वर , ३३ व्यञ्जन और ८ अयोगवाह ४ यम संज्ञक ...... होते है ।

 स्वर :- ( कुल सङ्ख्या = ६३
_________________________________________

> स्वर को बोलते समय किसी अन्य वर्ण की सहायता नही लेनी पडती है।
स्वर तीन प्रकार के हैं ।

१. हस्व या लघु स्वर - अ, इ, उ, ऋ, ॠ लृ ..... ( ५ )

२. दीर्घ स्वर - आ, ई, ऊ, ॠ , ए, ऐ, ओ, औ ..... ( ८ )

३. प्लुत स्वर – अ३, इ३, उ३, ऋ३, लृ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३ .....
( ९ ) व्यञ्जन :- ( कुल सङ्ख्या = ३३ )
__________________________________________
> " व्यञ्जन " को बोलते समय किसी भी " एक स्वर " की सहायता लेनी पडती है ।
जैसे - ग - ग् + अ , क - क् + अ > व्यञ्जन तीन प्रकार के होते हैं और पाँच प्रकार के वर्ग होते हैं ।

प्रकार : -  १. स्पर्श व्यञ्जन ; २. अन्त:स्थ व्यञ्जन ; ३. उष्म व्यञ्जन

 वर्ग : - क , च , ट , त , प  ये वर्ग हैं 

१. स्पर्श व्यञ्जन –

क वर्ग -- क् ख् ग् घ् ङ्

च वर्ग -- च् छ् ज् झ् ञ्

ट वर्ग -- ट् ठ् ड् ढ् ण्

त वर्ग -- त् थ् द् ध् न्

प वर्ग -- प् फ् ब् भ् म्

_________________________________

२. अन्त:स्थ व्यञ्जन –
य् र् ल् व् 

३. उष्म व्यञ्जन –
श् ष् स् ह्  गरम व्यञ्जन अर्थात्‌ अल्पप्राण वर्ण हैं- कचटतप ,गजडदब ,ङञणनम ।

कठिन व्यंजन अर्थात्‌ महाप्राण वर्ण हैं।
- खछठथफ , घझढधभ , शषसह ।
> " व्यञ्जन " के अंत मे जो भी " स्वर " आता है उसे उस " स्वर का कारांत " कहते है जैसे --
( ०१ ) गति - ग् + अ + त् + इ ( इकारान्त )

( ०२ ) मातृ - म् + आ + त् + ऋ ( ऋकारान्त )

( ०३ ) कमल - क् + अ + म् + अ + ल् + अ

( अकारान्त ) > व्यञ्जन को बोलते समय मुँह के पाँच भागों का प्रयोग होता है ।

१)- कण्ठस्थ  २)- तालव्य  ३)- मूर्धन्य ४)- दन्तस्थ ५)- ओष्ठस्थ > 

____________________________________

अयोगवाह :–( कुल सङ्ख्या = ०८ ) ( ०१ )- अनुस्वार - अं ( ं ) , ( ०२ )- विसर्ग - अ: ( : ) ( ०३ )- अनुनासिक ( ०४ )- जिह्वामूलीय ( ०५ )- उपध्मानीय ( ०६ )- ह्रस्व ( ०७ )- दीर्घ ( ०८ )- ळ > विशेष वर्ण– 

संयुक्त व्यञ्जन -( क्ष  तृ, त्र, ज्ञ, श्र द्य कृ क्र )

वर्तनी (वर्णविन्यास) ( Spelling)

किसी भी भाषा की वर्तनी का अर्थ उस भाषा में शब्दों को वर्णों के निश्चित अनुक्रम से अभिव्यक्त करने की क्रिया या ढंग को कहते हैं।

भाषा के प्रत्येक शब्द की एक अपनी निश्चित वर्तनी होती है।
किसी भी भाषा को उसकी लिपि के माध्यम से उस भाषा के वर्णों को एक निश्चित क्रम में लिखकर कोई शब्द निरूपित किया जाता है ;तो वही वर्णविन्यास उस शब्द की वर्तनी कहलाता है।

हिन्दी के लिए प्रयुक्त देवनागरी लिपि में कुल 53 वर्ण हैं, जिनमें 11 मूल स्वर वर्ण (जिनमें से 'ऋ' का उच्चारण अब स्वर जैसा नहीं होता), 33  मूल व्यञ्जन, 2 उत्क्षिप्त व्यञ्जन, 2 अयोगवाह और 5 +3 =8 संयुक्ताक्षर व्यञ्जन हैं।

कुल 55 वर्ण = (11 मूल स्वर ) + (33 मूल व्यञ्जन ) + (2 उत्क्षिप्त व्यञ्जन ) + (2  अयोगवाह ) + (4 संयुक्ताक्षर व्यञ्जन )

(11 मूल स्वर )

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ

(33 मूल व्यञ्जन )

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड ढ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म

य र ल व

श ष स ह

(2 उत्क्षिप्त व्यञ्जन )

ड़ ढ़

(2 अयोगवाह )

(अं -अन्  )( अ: -अह् )

(इन वर्णों को अब प्रायः वर्णमाला में सम्मिलित नहीं किया जाता)

(5 संयुक्ताक्षर व्यञ्जन )

क्ष त्र ज्ञ श्र द्य ( तृ क्र कृ )

वर्ण (Characters/Letters )

हिन्दी भाषा में प्रयुक्त एकल लिपि -चिह्न वर्ण कहलाता है।
जैसे:- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क, ख आदि।

वर्णमाला (The Devanagari Characters 

[ syllabary ]

वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं।
हिन्दी वर्णमाला में मुख्यत: 52 वर्ण हैं।
उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिन्दी वर्णमाला के दो भेद किए गए हैं:-

1. स्वर (Vowels)

2. व्यञ्जन (Consonants)

स्वर (Vowels)

जिन वर्णों का उच्चारण स्वत्रन्त्र रूप से होता हो और जो व्यञ्जनों के उच्चारण में सहायक हों, वे स्वर कहलाते हैं।

ये संख्या में 11 हैं - अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ। (हिन्दी मे 'ऋ' का उच्चारण स्वर जैसा नहीं होता।

 इसका प्रयोग केवल संस्कृत तत्सम शब्दों में होता है।)
उच्चारण के समय की दृष्टि से स्वर के तीन भेद किए गए हैं-
1. ह्रस्व स्वर (Short vowels)

2. दीर्घ स्वर (Long vowels)

3. प्लुत स्वर (Longer vowels)

1. ह्रस्व स्वर (Short vowels)
जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है ।
उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं।
जैसे:- अ, इ, उ , इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं।

2. दीर्घ स्वर (Long vowels)
जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से अधिक समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। 

ये हिन्दी में सात (7) हैं:- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
विशेष:- दीर्घ स्वरों को ह्रस्व स्वरों का दीर्घ रूप नहीं समझना चाहिए।
यहाँ दीर्घ शब्द का प्रयोग उच्चारण में लगने वाले समय को आधार मानकर किया गया है।

3. प्लुत स्वर (Longer vowels)
जिन स्वरों के उच्चारण में दीर्घ स्वरों से भी अधिक समय लगता है, उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं।

इनमें (३)तीन मात्रा का समय लगता है 
जैसे सुनो ऽ ऽ।

मात्राएँ (स्वर चिह्न) (Dependent vowel signs)

व्यञ्जन के बाद स्वरों के बदले हुए स्वरूप (सांकेतिक रूप) को मात्रा कहते हैं।
स्वरों की मात्राएँ निम्नलिखित हैं:-

स्वर

मात्रा ( स्वर चिह्न )

व्यञ्जन + मात्रा = अक्षर

अ वर्ण (स्वर) की मात्रा नहीं होती।

क् = क +अ 


( क + ा ) = का


ि

( क + ि ) = कि



( क + ी ) = की



( क + ु ) = कु



( क + ू ) = कू



( क + ृ ) = कृ



( क + े ) = के



( क + ै ) = कै



( क + ो ) = को



( क + ौ ) = कौ

लेखन में मात्राएँ सदैव किसी न किसी व्यञ्जन के साथ ही प्रयोग में लाई जाती हैं।

'अ' वर्ण (स्वर) की कोई मात्रा नहीं होती।
व्यञ्जन वर्णों के अपने मूल स्वरूप में 'अ' स्वर अंतर्निहित होता है।

 किसी मात्रा के लगने पर यह अन्तर्निहित 'अ' हट जाता है।

व्यञ्जन (Consonant)

जिन वर्णों के उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है, वे व्यञ्जन कहलाते हैं।
ये मूलतः संख्या में 35 हैं।
इनके निम्नलिखित तीन भेद हैं:-

1. स्पर्श व्यञ्जन (Stop Consonants)

2. उत्क्षिप्त व्यञ्जन (Flap Consonants)

3. अंतःस्थ (अन्तस्थ) व्यञ्जन 
(Approximant Consonants)

4. ऊष्म (संघर्षी) व्यञ्जन (Sibilants)

1. स्पर्श व्यञ्जन (Stop Consonants)
'क' से 'म' तक 20 वर्ण स्पर्श तथा 5 व्यञ्जन स्पर्श संघर्षी व्यञ्जन कहलाते हैं।

इनका उच्चारण करते समय जिह्वा का तालु, दाँत आदि से उच्चारण स्थानों से पूरा स्पर्श होता है।

इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यञ्जन हैं।
हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है जैसे:-

क - वर्ग : - (कोमल तालव्य व्यंजन)
Velar consonants (produced at the soft palate)

क  ख  ग  घ  ङ

च - वर्ग : - (तालव्य व्यञ्जन)

च-वर्ग के व्यंजन स्पर्श-संघर्षी व्यञ्जन कहलाते हैं।
Palatal consonants (produced at the palate)

च छ ज झ ञ

ट - वर्ग : - (मूर्धन्य व्यञ्जन)

Cerebral consonants

(Tongue curls back to touch the palate)

ट ठ ड ढ ण

त - वर्ग : - (दन्त्य व्यञ्जन)

Dental consonants

(Tongue touches the upper teeth)

त थ द ध न

('न' का उच्चारण हिन्दी में वर्त्स्य होता है)

प - वर्ग : - (ओष्ठ्य व्यञ्जन)

Labial consonants (produced with the lips)

प फ ब भ म

स्पर्श:-वर्ग का उच्चारण स्थान👇

1-अघोष अल्पप्राण

2-अघोष महाप्राण

3-सघोष अल्पप्राण

4-सघोष महाप्राण

5-वर्णविचार

Vowels - स्वराःSanskrit Consonants - व्यञ्जनानि (३३)
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ (१३)

अयोगवाह : अनुस्वार (अं) और विसर्गः( अः)

Dependent - ा, ि, ी, ु, ू, ृ, ॄ, े, ै, ो, ौ

Simple- अ, इ, उ, ऋ, ऌ

Dipthongs:- ए , ऐ , ओ , औ

ह्रस्वाः- अ , इ , उ , ऋ , ऌ ,

दीर्घाः- आ , ई , ऊ , ॠ , ए , ऐ , ओ , औ

स्पर्श                              खर                                मृदु                          अनुनासिकाः
Gutturals:कण्ठय           क्         ख्                     ग्             घ्                     

Palatals:तालव्य            च्         छ्                     ज्             झ्                     

Cerebrals:मूर्धन्य           ट्          ठ्                      ड्             ढ्                      ण्

Dentals:दन्त्य                त्          थ्                      द्             ध्                      न्

Labials:ओष्ठय              प्          फ्                     ब्             भ्                      म्

                                    श्         ष्          स          य             र           ल्         व

संयुक्त व्यंजन = त्र , क्ष , ज्ञ ,श्र ,द्य

व्याख्या – सम्यक् कृतम् इति संस्कृतम्।
भाषा – संस्कृत  और लिपि देवनागरी।

उच्चार स्थानह्रस्व – दीर्घ – प्लुत – (स्वर) विचार
कण्ठः – (अ‚ क्‚ ख्‚ ग्‚ घ्‚  ह्‚ : = विसर्गः )

तालुः – (इ‚ च्‚ छ्‚ ज्‚ झ्‚  य्‚ श् )

मूर्धा – (ऋ‚ ट्‚ ठ्‚ ड्‚ ढ्‚ ण्‚ र्‚ ष्)

दन्तः (लृ‚ त्‚ थ्‚ द्‚ ध्‚ न्‚ ल्‚ स्)

ओष्ठः – (उ‚ प्‚ फ्‚ ब्‚ भ्‚ म्‚ उपध्मानीय प्‚ फ्)

नासिका  – (‚ म्‚  ‚ण्‚ न्)

कण्ठतालुः – (ए‚ ऐ )

कण्ठोष्ठम् – (ओ‚ औ)

दन्तोष्ठम् – (व)

जिह्वामूलम् – (जिह्वामूलीय क् ख्)

नासिका –  (• = अनुस्वारः)

संस्कृत की अधिकतर सुप्रसिद्ध रचनाएँ पद्यमय हैं अर्थात् छन्दबद्ध और गेय हैं। 

इस लिए यह जान लेना आवश्यक है कि इन रचनाओं को पढते या बोलते समय किन अक्षरों या वर्णों पर ज्यादा भार देना और किन पर कम देना होता है ।

उच्चारण की इस न्यूनाधिकता को ‘मात्रा’ द्वारा दर्शाया जाता है।
*   जिन वर्णों पर कम भार दिया जाता है, वे हृस्व कहलाते हैं, और उनकी मात्रा १ होती है।
अ, इ, उ, लृ, और ऋ ये ह्रस्व स्वर हैं।

*   जिन वर्णों पर अधिक जोर दिया जाता है, वे दीर्घ कहलाते हैं, और उनकी मात्रा २ होती है।
आ, ई, ऊ, ॡ, ॠ ये दीर्घ स्वर हैं।

*   प्लुत वर्णों का उच्चारण अतिदीर्घ होता है, और उनकी मात्रा ३ होती है जैसे कि, “नाऽस्ति” इस शब्द में ‘नाऽस्’ की ३ मात्रा होगी।
वैसे हि ‘वाक्पटु’ इस शब्द में ‘वाक्’ की ३ मात्रा होती है।

वेदों में जहाँ 3 संख्या लिखी होती है , उसके पूर्व का स्वर प्लुत बोला जाता है।

*   संयुक्त वर्णों का उच्चारण उसके पूर्व आये हुए स्वर के साथ करना चाहिए।

पूर्व आया हुआ स्वर यदि ह्रस्व हो, तो आगे संयुक्त वर्ण होने से उसकी २ मात्रा हो जाती है; और पूर्व अगर दीर्घ वर्ण हो, तो उसकी ३ मात्रा हो जाती है और वह प्लुत कहलाता है।

*   अनुस्वार और विसर्ग – ये स्वराश्रित होने से, जिन स्वरों से वे जुडते हैं उनकी २ मात्रा होती है।
परन्तु ये अगर दीर्घ स्वरों से जुडे, तो उनकी मात्रा में कोई फर्क नहीं पडता।

राम = रा (२) + म (१) = ३   याने “राम” शब्द की मात्रा ३ हुई।

वनम् = व (१) + न (१) + म् (०) = २

वर्ण विन्यास –  १. राम = र् +आ + म् + अ , २.  सीता = स् + ई +त् +आ, ३. कृष्ण = क् +ऋ + ष् + ण् +अ

ज्ञ वर्ण के उच्चारण पर शास्त्रीय दृष्टि
'ज्ञ' वर्ण के उच्चारण पर शास्त्रीय दृष्टि-
संस्कृत भाषा मेँ उच्चारण की शुद्धता का अत्यधिक महत्त्व है।

_______________________________________

शिक्षा व व्याकरण के ग्रन्थों में प्रत्येक वर्ण के उच्चारण स्थान और ध्वनि परिवर्तन के आगमलोपादि नियमों की विस्तार से चर्चा है।

फिर भी "ज्ञ" के उच्चारण पर समाज में बडी भ्रान्ति है।

ज्+ञ्=ज्ञ्
कारणः-'ज्' चवर्ग का तृतीय वर्ण है और 'ञ्' चवर्ग का ही पञ्चम् वर्ण है।
जब भी 'ज्' वर्ण के तुरन्त बाद 'ञ्' वर्ण आता है तो

'अज्झीनं व्यञ्जनं परेण संयोज्यम्' इस महाभाष्यवचन के अनुसार 'ज् +ञ' [ज्ञ] इस रुप में संयुक्त होकर 'ज्य्ञ्' ऐसी ध्वनि उच्चारित होनी चाहिये।।_________________________________________

"ज्ञ"वर्ण का यथार्थ तथा शिक्षा-व्याकरण सम्मत शास्त्रोक्त उच्चारण 'ग्ञ्' ही है। 

जिसे हम सभी परम्परावादी लोग सदा से ही "लोक" व्यवहार में करते आ रहे हैं।
कारणः-
तैत्तिरीय प्रातिशाख्य 2/21/12 का नियम क्या कहता है-

स्पर्शादनुत्तमादुत्तमपराद् आनुपूर्व्यान्नासिक्याः।।

इसका अर्थ है- अनुत्तम, स्पर्श वर्ण के तुरन्त बाद यदि उत्तम स्पर्श वर्ण आता है तो दोनों के मध्य में एक नासिक्यवर्ण का आगम होता है।
_________________________________________

यही नासिक्यवर्ण शिक्षा तथा व्याकरण के ग्रंथों में यम के नाम से प्रसिद्ध है।

'तान्यमानेके' (तै॰प्रा॰2/21/13)
इस नासिक्य वर्ण को ही कुछ आचार्य 'यम' कहते हैँ।
प्रसिद्ध शिक्षाग्रन्थ 'नारदीयशिक्षा' में भी यम का उल्लेख है।

अनन्त्यश्च_भवेत्पूर्वो_ह्यन्तश्च_परतो_यदि।
तत्र_मध्ये_यमस्तिष्ठेत्सवर्णः_पूर्ववर्णयोः।।

औदव्रजि के 'ऋक्तंत्रव्याकरण' नामक ग्रंथ में भी 'यम' का स्पष्ट उल्लेख है।

'अनन्त्यासंयोगे_मध्ये_यमः_पूर्वस्य_गुणः' अर्थात् वर्ग के प्रारम्भिक चार वर्णो के बाद यदि वर्ग का पाँचवाँ वर्ण आता है तो दोनो के बीच 'यम' का आगम होता है,
जो उस पहले अन्तिम-वर्ण के समान होता है।💐

प्रातिशाख्य के आधार पर यम को परिभाषित करते हुए सरल शब्दों में यही बात भट्टोजी दीक्षित भी लिखते हैँ-

"वर्गेष्वाद्यानां_चतुर्णां_पंचमे_परे_मध्य_यमो_नाम_पूर्व_सदृशो_वर्णः_प्रातिशाख्ये_प्रसिद्धः"
-सि॰कौ॰12/ (8/2/1सूत्र पर)

भट्टोजी दीक्षित यम का उदाहरण देते हैँ।
पलिक्क्नी 'चख्खनतुः' अग्ग्निः 'घ्घ्नन्ति'।
यहाँ प्रथम उदाहरण मेँ क् वर्ण के बाद न् वर्ण आने पर बीच में क् का सदृश यम कँ(अर्द्ध) का आगम हुआ है। दूसरे उदाहरण मेँ खँकार तथैव गँकार यम, घँकार यम का आगम हुआ है।

अतः स्पष्ट है कि यदि अनुनासिक स्पर्श वर्ण के तुरन्त बाद अनुनासिक स्पर्श वर्ण आता है; तो उनके मध्य में अनुनासिक स्पर्श वर्ण के सदृश यम का आगम होता है।
प्रकृत स्थल में-
ज् + ञ् इस अवस्था में भी उक्त नियम के अनुसार यम का आगम होगा।

किस अनुनासिक वर्ण के साथ कौन से यम का आगम होगा।विस्तारभय से सार रुप दर्शा रहे हैँ।
तालिक देखें-

स्पर्श अनुनासिक वर्ण यम

क् च् ट् त् प् कँ्

ख् छ् ठ् थ् फ् खँ्

ग् ज् ड् द् ब् गँ्

घ् झ् ढ् ध् भ् घँ्

यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि यम के आगम में जो 'पूर्वसदृश' पद प्रयुक्त हुआ है , उसका आशय वर्ग के अन्तर्गत संख्या क्रमत्वरुप सादृश्य से है
सवर्णरुप सादृश्य से नहीँ।

ये बात उव्वट और माहिषेय के भाष्यवचनों से भी पूर्णतया स्पष्ट है ।

जिसे भी हम विस्तारभय से छोड रहे हैं।
अस्तु हम पुनः प्रक्रिया पर आते हैं-

ज् ञ् इस अवस्था मेँ तालिका के अनुसार 'ग्'यम का आगम होगा-

ज् ग् ञ् ऐसी स्थिति प्राप्त होने पर चोःकु: [अष्टाध्यायी सूत्र 8/2/30] सूत्र प्रवृत्त होता है।

'ज्' चवर्ग का वर्ण है और 'ग' झल् प्रत्याहार मेँ सम्मिलित है, अतः इस सूत्र से 'ज्' को कवर्ग का यथासंख्य 'ग्' आदेश हो जायेगा।
तब वर्णोँ की
स्थिति होगी-
ग् ग् ञ् इस प्रकार हम देखते हैँ कि ज् का संयुक्त रुप से 'ज्ञ' उच्चारण की प्रक्रिया में उपर्युक्त विधि से 'ग् ग् ञ्' इस रुप से उच्चारण होता है।

यहाँ जब ज् रुप ही शेष नहीं रहा तो 'ज् ञ्' इस ध्वनिरुप मेँ इसका उच्चारण कैसे हो सकता है?
अतः 'ज्ञ' का सही एवं शिक्षा-व्याकरणशास्त्र सम्मत उच्चारण 'ग्ञ्' ही है।।

सम्प्रसारण की परिभाषा :-

[सं० सम्प्रसारण] :- फैलाना । विस्तार करना ।
२. संस्कृत व्याकरण में य्, व्  र्, ल् का इ, उ, ऋ और लृ में परिवर्तन ।

यजते, यजति वचिस्वपियजादीनां किति (61 15)

सम्प्रसारणम् -. यजते, यजति इज्यते, इष्टः,
इष्टिः लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् (6117) 

वाचयति, वचति, वाच्यते, वच्यते चन्द्रः संदेशे चुरादिमाह अदादौ (257)
वक्ति, उच्यते, स्वपिसाहचर्याद् (6115) आदादिकस्य संप्रसारणम् 287

 - वक्ति । वक्तः । वक्षि । वच्मि । अन्तवचनस्यानभिधानमाचक्षते । उवाच । ऊचतुः । ऊचुः । उवक्थ । उवचिथ । वक्ता । अवोचत् । अवोचताम् । अवोचन् । ब्रुवो वचिः (2/4/53)
The alphabet is made up of 26 letters, 5 of which are vowels (a, e, i, o, u) and the rest of which are consonants.

A vowel is a sound that is made by allowing breath to flow out of the mouth, without closing any part of the mouth or throat.

A consonant is a sound that is made by blocking air from flowing out of the mouth with the teeth, tongue, lips or palate ('b' is made by putting your lips together, 'l' is made by touching your palate with your tongue).

The letter 'y' makes a consonant sound when at the beginning of a word ('yacht', 'yellow') but a vowel sound when at the end of a word ('sunny', 'baby').

अंग्रेजी वर्णमाला भी 26 अक्षरों से बनी है, जिनमें से 5 स्वर स्थाई  (ए, ई, आई, ओ, यू) हैं और बाकी दो स्वर दौनों भूमिकाओं में हैं ।
स्वर भी और व्यञ्जन भी

एक स्वर एक ध्वनि है जो मुंह या गले के किसी भी हिस्से को बन्द किए बिना श्वाँस को मुंह से बाहर निकलने की अनुमति देता है।

व्यञ्जन एक ध्वनि है जो हवा को मुख से दाँतों, जीभ, होंठ या तालु से बहने से रोककर बनाया जाता है
('बी' आपके होंठों को एक साथ रखकर बनाया गया है, 'एल' आपके तालु को आपकी जीभ से छूकर बनाया गया है। )।

'Y' अक्षर एक शब्द की शुरुआत में 'ध्वनि', 'Yellow  यलो' ),  हो तो यह व्यञ्जन  है और   एक स्वर तब होता है जब एक शब्द जैसे ('सनी Sunny',  Baby 'बेबी') के अंत में  ई  स्वर  की ध्वनि उत्पन्न करता है।
'W' अक्षर भी -वाई के सदृश्य है ।⬇

शब्दों के निर्माण खंडों को सीखना - ध्वनियों, उनके वर्तनी और शब्द भागों
व्यंजन और स्वर के बीच का अंतर
अंग्रेजी में पाँच स्वर और 21 व्यंजन हैं, 

स्वर और व्यंजन ध्वनियाँ हैं, अक्षर नहीं। 

आपके उच्चारण और आप उन्हें कितना पतला करते हैं, इसके आधार पर, लगभग 20 स्वर और 24 व्यंजन हैं।

स्वर और व्यंजन के बीच का अंतर
स्वर एक भाषण ध्वनि है जो आपके मुंह के साथ काफी खुली हुई है, एक बोले गए शब्दांश का नाभिक है।

एक व्यंजन एक ध्वनि है जो आपके मुंह के साथ काफी बंद है।

जब हम बात करते हैं, व्यंजन स्वरों की धारा को तोड़ते हैं (शब्दांश और कोड्स के रूप में कार्य करते हैं), ताकि हम ध्वनि न करें जैसे कि हम सिर्फ चार भरने के लिए दंत चिकित्सक के पास गए हैं और संवेदनाहारी अभी तक खराब नहीं हुई है।

स्वरों की तुलना में संगीतकारों को अधिक सटीक अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है, यही कारण है कि बच्चे उन्हें सीखने में कठिन पाते हैं, और अक्सर भाषण चिकित्सा में समाप्त हो जाते हैं ताकि समझ में न आए कि वे लोगों को मारना शुरू कर दें।

गंभीर भाषण ध्वनि कठिनाइयों (जिसे अक्सर डिस्प्रैक्सिया या एप्रेक्सिया कहा जाता है) वाले कुछ ही बच्चों को स्वरों को सही ढंग से उत्पन्न करने में मदद करने के लिए कभी-कभी चिकित्सा की आवश्यकता होती है।

अधिकांश सिलेबल्स में एक स्वर होता है, हालांकि स्वर जैसे व्यंजन कभी-कभी सिलेबल्स हो सकते हैं।

और मामलों को जटिल करने के लिए, कई अंग्रेजी स्वर तकनीकी रूप से दो या तीन स्वर हैं, जिन्हें एक साथ जोड़ा जाता है।

लगभग लोग स्वर और व्यंजन के बीच एक प्रकार के भाषाई धूसर क्षेत्र पर कब्जा कर लेते हैं, वास्तव में "w" और "y" को अर्धवृत्त के रूप में भी जाना जाता है।

व्यंजन ध्वनि "y" और स्वर ध्वनि "ee" के बीच "देखना / समुद्र / मुझे", और व्यंजन ध्वनि "w" और स्वर ध्वनि "ooh" के बीच "चंद्रमा" या नियम / नियम के बीच बहुत कम अंतर है।

इन ध्वनियों को व्यंजन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि वे आम तौर पर व्यंजन की तरह व्यवहार करते हैं, अर्थात, वे (न इन) शब्दांशों में शब्दांश नाभिक नहीं होते हैं।

सिलेबिक व्यंजन
कई अंग्रेजी बोलियों में, ध्वनि "एल" अपने आप में "बोतल" और "मध्य" जैसे शब्दों में एक शब्दांश हो सकता है। 

यह "बटन" और "हिडन" जैसे शब्दों में ध्वनि "n" का भी सच है।

इन शब्दों में, जीभ ने केवल "t" या "d" कहा है, इसलिए यह पहले से ही स्वर के बिना सीधे "l" या "n" ध्वनि में जाने के लिए सही जगह पर है। हालाँकि, हम अभी भी इस शब्दांश (ले, ऑन, एन) में एक "स्वर वर्ण" लिखते हैं और हम दूसरे शब्दों में एक समान ध्वनि बोलते हैं, जैसे "विशाल" और "डब्बल", "रिबन" और "बेकन"। , "होता है" और "एम्बिगन"।

ध्वनि "एम" भी "लय" और "एल्गोरिथ्म" जैसे शब्दों में एक शब्दांश के रूप में कार्य कर सकता है, क्योंकि ध्वनि "वें" और "एम" एक साथ शारीरिक रूप से बहुत करीब हैं। इस मामले में हम अंतिम शब्दांश में एक "स्वर पत्र" नहीं लिखते हैं, लेकिन हम "स्वरवाद" और "आलोचना" जैसे वर्तनी वाले अधिकांश शब्दों के अंतिम शब्दांश में एक स्वर ध्वनि कहते हैं।
प्रस्तुतीकरण:-
★-Yadav Yogesh Kumar "Rohi"-★

यह आलेख भाषा विज्ञान, लिपि विकास (विशेषकर देवनागरी और ब्राह्मी), और संस्कृत-अंग्रेजी वर्णमाला के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित एक बेहद महत्वपूर्ण और मौलिक वैचारिक दस्तावेज है।

​आपके द्वारा प्रस्तुत इस शोध-लेख का शोधपरक विश्लेषण, परिष्करण और संपादन निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत है, ताकि इसकी अकादमिक गरिमा, तार्किक प्रवाह और स्पष्टता और अधिक मजबूत हो सके:

​भारतीय लिपि और भाषा विज्ञान: एक शोधात्मक विश्लेषण

प्रस्तुतकर्ता: यादव योगेश कुमार "रोहि"

​1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और लिपियों का विकास क्रम

​भारतीय इतिहास और संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए भाषा और लिपि के विकास का क्रम सबसे प्रामाणिक माध्यम है। पारंपरिक रूप से वेदिक काल से लेकर बौद्ध काल तक मौखिक परंपरा (श्रुति) का प्रधान्य रहा है।

  • पणियों की भूमिका और लिपि का उद्भव: ऋग्वेद में वर्णित 'पणि' (जिन्हें पश्चिमी इतिहास में फोनेशियन या प्यूनिक व्यापारी कहा गया है) समुद्री व्यापार और प्राचीन संस्कृति के संवाहक थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, आदि-सीनाई लिपि से विकसित हुई फोनेशियन वर्णमाला विश्व की कई प्रमुख अक्षरमालाओं की जननी है। इसी श्रृंखला में आगे चलकर आरमैइक (Aramaic) लिपि से ब्राह्मी लिपि और अंततः देवनागरी लिपि का विकास हुआ।
  • संस्कृत, प्रापाली और देवनागरी का कालक्रम:
    • वैदिक भाषा अत्यंत प्राचीन और जटिल होने के कारण सीधे तौर पर जनसामान्य की बोलचाल की भाषा नहीं बन सकी।
    • ​बौद्ध और जैन काल में आम जनता तक अपने विचार पहुँचाने के लिए पाली और अपभ्रंश जैसी लोकभाषाओं का व्यापक प्रयोग हुआ।
    • ​समयान्तर पर वैदिक भाषा के परिमार्जन और लोकभाषाओं के समन्वय से लौकिक संस्कृत का जन्म हुआ और इसे लिखने के लिए देवनागरी लिपि का वैज्ञानिक स्वरूप निखारा गया।

​2. देवनागरी वर्णमाला का वैज्ञानिक विश्लेषण (संस्कृत व्याकरण के संदर्भ में)

​संस्कृत और हिंदी की देवनागरी लिपि दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में से एक है, क्योंकि इसमें उच्चारण स्थल और ध्वनि के बीच सीधा और तार्किक संबंध है।

​क. वर्णों का कुल वर्गीकरण (संस्कृत मानक के अनुसार)

​संस्कृत वर्णमाला में कुल 64 वर्ण माने गए हैं:

  1. स्वर (23):
    • ह्रस्व/लघु स्वर (5): अ, इ, उ, ऋ, लृ
    • दीर्घ स्वर (8): आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ
    • प्लुत स्वर (9): अ३, इ३, उ३ आदि (जिन्हें त्रिमात्रिक स्वरों के रूप में तीन मात्रा के समय के साथ उच्चारित किया जाता है)।
  2. व्यंजन (33):
    • स्पर्श व्यंजन (25): क-वर्ग से प-वर्ग तक (पाँच वर्गीय समूह)।
    • अंतःस्थ व्यंजन (4): य्, र्, ल्, व्
    • उष्म व्यंजन (4): श्, ष्, स्, ह्
  3. अयोगवाह (8): अनुस्वार, विसर्ग, अनुनासिक, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय, ह्रस्व, दीर्घ और ळ।

​3. उच्चारण स्थान और व्याकरणिक विशिष्टताएँ

​क. उच्चारण के आधार पर वर्णों के मुख्य स्थान:

  • कण्ठः: अ, क्, ख्, ग्, घ्, ह्, विसर्ग (ः)
  • तालुः: इ, च्, छ्, ज्, झ्, य्, श्
  • मूर्धा: ऋ, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्, र्, ष्
  • दन्तः: लृ, त्, थ्, द्, ध्, न्, ल्, स्
  • ओष्ठः: उ, प्, फ्, ब्, भ्, म्

​ख. संयुक्त वर्ण "ज्ञ" का शास्त्रीय एवं यथार्थ उच्चारण

​समाज में "ज्ञ" के उच्चारण को लेकर अक्सर यह भ्रम रहता है कि इसे सीधे 'ज्ञ' (ज् + ञ्) बोला जाए। किंतु शिक्षा और व्याकरण ग्रंथों (जैसे तैत्तिरीय प्रातिशाख्य और पाणिनीय व्याकरण) के नियमों के अनुसार:

  • ​जब 'ज्' के तुरंत बाद 'ञ्' आता है, तो प्रातिशाख्य के नियमों (यम के आगम) के तहत बीच में एक नासिक्य ध्वनि (यम) का आगम होता है।
  • ​तदनुसार, प्रक्रिया पूरी होने पर "ज्ञ" का शास्त्र-सम्मत और मूल उच्चारण 'ग्ञ्' (यानी ग्-ग्-ञ् जैसी प्रयुक्त ध्वनि) सिद्ध होता है, जिसे पारंपरिक लोक व्यवहार में भी सुरक्षित रखा गया है।

​4. भारतीय और पाश्चात्य भाषा विज्ञान: स्वर और व्यंजनों की तुलना

​जिस प्रकार संस्कृत व्याकरण में स्वरों और व्यंजनों का कड़े वैज्ञानिक नियमों के तहत विभाजन किया गया है, उसी प्रकार अंग्रेजी सहित अन्य यूरोपीय भाषाओं में भी ध्वनियों का वर्गीकरण मिलता है:

  • अंग्रेजी वर्णमाला (26 अक्षर): इसमें मुख्य रूप से 5 स्थायी स्वर (A, E, I, O, U) और 21 व्यंजन होते हैं।
  • अर्धस्वर (Semi-vowels): अंग्रेजी में 'Y' और 'W' ऐसे वर्ण हैं जो संदर्भ के अनुसार कभी व्यंजन (Consonant) तो कभी स्वर (Vowel) दोनों की भूमिका निभाते हैं (जैसे 'Yellow' में 'Y' व्यंजन है, जबकि 'Baby' या 'Sunny' के अंत में यह ई जैसी स्वर ध्वनि देता है)।
  • सिलेबिक व्यंजन (Syllabic Consonants): अंग्रेजी के कुछ शब्दों (जैसे Bottle, Middle, Rhythm) में 'L', 'N', 'M' जैसे व्यंजन बिना किसी अलग स्वर वर्ण के अपने आप में एक शब्दांश (Syllable) की भूमिका निभाते हैं।

​5. निष्कर्ष

​यह शोध स्पष्ट करता है कि भाषा और लिपियाँ स्थिर नहीं होतीं, बल्कि काल, परिस्थिति और मानव सभ्यता के विकास के साथ निरंतर परिष्कृत होती हैं। प्राचीन पणि (फोनेशियन) व्यापारिक यात्राओं से शुरू हुआ लिपि का सफर ब्राह्मी से होते हुए आज वैज्ञानिक रूप में देवनागरी तक पहुँचा है। संस्कृत का व्याकरण और देवनागरी की वर्णमाला मात्र संवाद का साधन नहीं, बल्कि मानव शरीर के उच्चारण अंगों पर आधारित एक पूर्ण विज्ञान है।