सोमवार, 15 जून 2020

जरासन्ध दमघोष और यदु का वर्णन ...



पुरुवंश में उत्पन्न चेदिराज वसु जिने उपरिचर वसु के नाम से  भी जाना जाता था।
वे प्रति वर्ष इन्‍द्रोत्‍सव मनाया करते थे। उनके अनन्‍त बलशाली और  महापराक्रमी पांच पुत्र थे।

सम्राट वसु ने विभिन्न राज्‍यों पर अपने इन पाँच  पुत्रों को अभिषिक्त कर दिया। उनमें महारथी बृहद्रथ मगध देश आधुनिक- विहार )का विख्‍यात राजा हुआ। 

दूसरे पुत्र का नाम प्रत्‍यग्रह था, तीसरा कुशाम्‍ब था, जिसे मणिवाहन भी कहते हैं। चौथा मावेल्ल था।

पांचवा राजकुमार यदु था, जो युद्ध में किसी से पराजित नहीं होता था। 
यह यदु ययाति पुत्र से भिन्न कुरुंवशी राजा यदु  बताया। और हरिवंश पुराण विष्णु खण्ड में हर्यश्व पुत्र यदु को ययाति पुत्र यदु का ही नवीन  संस्करण बनाकर वर्णन किया गया है। 
और महाभारत आदि पर्व में भी उपरिचर वसु के एक पुत्र यदु को भी पुरुवंशी बताया गया है।
वस्तुत: यदु के दो नये संस्करण उन पुरोहितों के शिष्यों ने किए जो ययाति पुत्र यदु की संस्कृति के खिलाफ थे और पुरु के पक्ष में अपना समर्थन कर रहे थे।

महाभारत के आदिपर्व के  एक प्रसंग नें कहा गया है। कि  सुनीथ( दमघोष) और जरासन्ध परस्पर बान्धव और एक ही वंश के थे।

जरासन्ध पुरुवंशी उपरिचर के पुत्र बृहद्रथ का पुत्र था;  जिसने मगध का शासन सम्हाला ।

अब  समस्या यह उठती है कि मध्यप्रदेश के घोषी लोग जो  दमघोष को अपना पूर्वज केवल दम शब्द के पश्चात् घोष लगने से ही  मानते हैं ।

परन्तु दमघोष के अन्य नाम सुनीथ और श्रुतश्रवस्- भी थे । जो कुरुवंशीय और पाण्डवों के पितृबान्धव थे।
परन्तु उपरिचर वसु की कथा नवीनत्तम कल्पित कथा है।
जबकि दमघोष के पूर्वज हैहय वंशी यादव थे। ऐसा भारत कोश का प्रमाण है।
और घोष / घोषी भारतीय इतिहास में  केवल अहीरों का वाचक है।
और घोषी सनातन अहीर ही हैं।

अत:  इस आधार पर दमघोष कभी भी घोसी अहीरों के पूर्वज नही हैं। यदि इनको पुरुवंशी मान लिया जाय तो-
यद्यपि भारत कोश दमघोष को हैहयवंशी यादव लिखता है ।
परन्तु सन्दर्भ नहीं देता उनके हैहय वंश का होने का यह निष्कर्ष निकलता है। 

कि घोषी ही अहीर हैं और जो यदुवंश से सम्बन्धित अधिक थे ।

एक बात और आज मध्यप्रदेश में घोषी स्वयं को अहीर नहीं मानते हैं क्या उनकी अज्ञानता उन पर हावी है।

यह सत्य है कि यादवों का इतिहास कि़स प्रकार विकृत हुआ 

यद्यपि जरासन्ध दमघोष हैहयवंश के यादव ही थे 'परन्तु उन्हें यादव नहीं माना 

इसी श्रृंखला में प्रस्तुत है हरिवंशपुराण से यह विश्लेषण ...

और यदु को ही सूर्य वंश में घसीटने की भी कोशिश 
ये रहे प्रमाण ....

हरिवंशपुराण हरिवशंपर्व पञ्चम अध्याय में वर्णन है कि 
निषादवंशकर्तासौ बभूव वदतां वर ।
धीवरानसृजच्चाथ वेनकल्मषसम्भवान्।।१९।

•-- वक्ताओं में श्रेष्ठ जनमेजय ! वह निषादों के वंश को चलाने वाला हुआ और उसने धीवरों को जन्म दिया  वे निषाद , धीवर वेन के पाप से उत्पन्न हुए थे ।१९।
( क्या यह सत्य कथन है ?)

ये चान्ये विन्ध्यनिलय तुषार तुम्बरास्तथा ।
अधर्म रुचयो ये च विद्धि तान्  वेनसम्भवान् ।२०।

धीवरों के अतिरिक्त तुषार (तोखारी)
•--तुम्बर ( तोमर) तथा अधर्म से प्रेम करने वाले वन वासी ( गोण्ड- कोल आदि )हैं इन सबको तुम वेन के पाप से उत्पन्न हुआ समझो !
( तोमर जन-जाति राजपूत संघ गुर्जर संघ और जाट संघ में भी समायोजित है ।
'परन्तु हरिवंशपुराण विष्णुपर्व में यहांँ वनवासी के रूप में हैं । 
हरिवंशपुराण हरिवशं पर्व इकतालीसवाँ अध्याय 
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
धर्म संस्थापनार्थाय तदा सम्भवति प्रभु ।।१७।
यह श्लोक श्रीमद्भगवदगीता के श्लोक से साम्य रखता है ।

भागवत धर्म के अधिष्ठात्री देवता के रूप में वर्णन हरिवंशपुराण में है ।
यमुनाया ह्रदे ह्यस्मिन् स्तोष्यामि भुजगेश्वरं ।
दिव्यैर् भागवतैर्मन्त्रै: सर्व लोक प्रभु यत: ।।४२।

तब तक 'मैं यमुना जी के इस कुण्ड के जल
में प्रवेश करके दिव्य भागवत मन्त्रों द्वारा सम्पूर्ण जगत के स्वामी नागराज अनन्त की स्तुति कर लूँ ।४२।

गुह्यं भागवतं देवं सर्वलोकस्य भावनम् ।
श्रीमत्स्वस्तिकमूर्द्धानं प्रणमिष्यामि भोगिनम् ।
सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम् ।।४३।

वे गुह्य स्वरूप भागवत देवता हैं । 
सम्पूर्ण लोकों के उत्पादक और उन्नायक हैं ।
उनका मस्तक कान्ति वान स्वास्तिक चिन्ह से अलंकृत है  वे सर्प-विग्रहधारी अनन्त देवसहस्र शिरों से सुशोभित तथा नील वस्त्रधारण करने वाले हैं । 
'मैं उन्हें परिणाम करुँगा ।४३।

हरिवंशपुराण विष्णुपर्व छब्बीस वें अध्याय में भागवत धर्म के अधिष्ठात्री देवता के रूप में बलराम की स्तुति की गयी है ।

कृष्ण को परामर्श देने वाले बलराम ही थे ।
ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध वर्ण व्यवस्था रहित लोकतन्त्र मूलक भक्तियोग समन्वित भागवत धर्म स्थापन का श्रेय कृष्ण 'ने बलराम को ही दिया ।

यह श्लोक गुप्त काल की धर्म अवधारणा को प्रतिध्वनित करता है ।

यादव शब्द ही कालान्तरण में केवल कुछ यदुवंशीयों  के लिए रूढ़ हो गया था क्या ? जैसा कि निम्नलिखित श्लोक में यादव अलग से कुल बताया गया है ।

भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धक यादव: दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते ।।६५।
हरिवंशपुराण विष्णुपर्व सैंतीस वाँ अध्याय 
जैसे कुक्कुर, भोज, अन्धक ,दाशार्ह ,भैम, यादव, और वृष्णि नाम के वाले प्रसिद्ध होंगे 

दरअसल भारतीय पुराणों में यदु के विषय में जो कथाऐं आलेखित की गयीं  वे यहूदियों के आख्यानकों से ली गयीं 

क्योंकि जो यहूदियों के आख्यानकों में इश्हाक है वही पात्र पुराणों में इक्ष्वाकु है ।

कहीं सैमेटिक तो कहीं हैमेटिक रूप में इसे माना 
भारतीय पुराणों में 
जैसे हरिवंशपुराण विष्णुपर्व सप्तत्रिंशो८ध्याय: 
में वर्णित है कि वैवस्वत मनु के वश में इक्ष्वाकु के पुत्र हर्यश्व से एकरूपता राजा हुए ।
जो प्रजा का रञ्जन करते थे वे राजा ।
मधु असुर की पुत्री मधुवती ये उनका विवाह हुआ।

एक दिन हर्यश्व के बड़े भाई 'ने उसे राज्य से निकाल दिया तब हर्यश्व 'ने अयोध्या छोड़ दी 
तब मधुमती हर्यश्व के मधुवन ले गयी  यही मधपुरी भी था ।

मधु असुर 'ने केवल मधुवन को छोड़कर अपना सारा राज्य अपने जामाता हर्यश्व को दे दिया लवण मधु का पुत्र भी हर्यश्व का सहायक बना ।
यह मधवन  गौंओं से सम्पन्न और लक्ष्मी से सेवित है यहांँ आभीर या गोप जाति ही बहुतायत से है ।

हरिवंश पुराण विष्णु पर्व (संस्कृत) अध्याय 37 श्लोक 16-20

सा तमिक्ष्वांकुशार्दूलं कामयामास कामिनी।
स कदाचिन्नरश्रेष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठे्न माधव।।16।।

राज्यान्निरस्तो विश्वस्त: सोऽयोध्यां सम्परित्यजत्।
स तदाल्प‍परीवार: प्रियया सहितो वने।।17।।

रेमे समेत्य कालज्ञ: प्रियया कमलेक्षण:।
भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा।।18।।

एह्यागच्छ नरश्रेष्ठ त्यज राज्यकृतां स्पृहाम्।
गच्छाव: सहितौ वीर मधोर्मम पितुर्गृहम्।।19।।

रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्रुमम्।
सहितौ तत्र रंस्यावो यथा दिवि गतौ तथा।।20।।
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हरिवंश पुराण विष्णु पर्व (संस्कृत) अध्याय 37 श्लोक 26-30

ततो मधुपुरं राजा हर्यश्व: स जगाम च।
भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुंगव:।।26।।

मधुना दानवेन्द्रेण स साम्न समुदाहृत:।
स्वागतं वत्स हर्यश्व प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्।।27।।

यदेतन्मम राज्यं वै सर्वं मधुवनं विना।
ददामि तव राजेन्द्र वासश्च प्रतिगृह्यताम्।।28।।

वनेऽस्मिल्लँवणश्चायं सहायस्ते भविष्यति।
अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्ववमेष्यति।।29।।
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पालयैनं शुभं राष्ट्रं समुद्रानूपभूषितम्।
गोसमृद्धं श्रिया जुष्टम् आभीर प्रायमानुषम्।।30।।

हरिवंशपुराण विष्णुपर्व में सैंतीसवाँ अध्याय श्लोक संख्या ३० पर 

आभीर नामक यादव जाति का वर्णन है 
अर्थात्‌ तुम समुद्र के जलप्राय प्रदेश से विभूषित इस सुराष्ट्र का पालन करो ! यह गौंओं से सम्पन्न और लक्ष्मी से सेवित है तथा यहीं अधिकतर अहीर ( आभीर ) निवास करते हैं।३०।

इसी अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में वर्णन है कि
ययातमपि वंशस्ते समेष्यति च यादववम्।
अनुवंशं च वंशस्ते सोमस्य भविता किल ।।३४।

तुम्हारा यह वंश ययाति यदु के वंश में मिल जाएगा ।३४।
विदित हो कि हर्यश्व का राज्य आनर्त था ।
सुराष्ट्र ही गुजरात का सूरत है ।
जो  गुजरात प्रदेश के अन्तर्गत थे ।
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•♪---अब समस्या यह है कि जो पुराणों में लिखा गया है
कि हर्यश्व के पुत्र के रूप में ययाति पुत्र यदु ही पुन: यदु रूप उत्पन्न हुए मधुमती के गर्भ से फिर ययाति पुत्र यदु का वंश कहाँ गया ? 

इसी पुराण में वर्णन है कि हर्यश्व का वंश ययाति पुत्र यदु के वंश में मिल जाएगा । 
और सूर्य वंश से इसका कोई सम्बन्ध नहीं होगा।?
वास्तव में ये बातें सिरे से खारिज हैं ।
क्योंकि इक्ष्वाकु वंशी हर्यश्व के द्वारा मधुमती के उदर से यदु का जन्म होता है ।

फिर जब खेत और बीज ही सूर्य वंश या हैमेटिक हैं तो ये पौधा सैमेटिक या सोमवंश का कैसे हुआ ? 
माता यदु की असुर पक्ष से है ।

हरिवंशपुराण विष्णुपर्व सैंतीस वाँ अध्याय 
श्लोक संख्या ४६ पर वर्णित है 👇

तस्यैव च सुवृत्तस्य पुत्रकामस्य धीमत:।
मधुमत्यां सुतो जज्ञे यदुर्नाम महायशा ।४४।

चेदिराज उपरिचर वसु के एक पुत्र का नाम बृहद्रथ था, जिसने पूर्वकाल में मगधदेश के भीतर गिरिब्रज नामक नगर का निर्माण कराया था।
उसी के वंश में महाबली जरासंध पैदा हुआ। उपरिचर वसु के ही वंश में उन दिनों दमघोष पैदा हुए थे, जो चेदि देश के राजा थे। दमघोष के पाँच भयानक पराक्रमी पुत्र हुए, जो वसुदेव की बहिन श्रुतश्रवा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।
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पुत्र की इच्छा रखने वाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धि मान हर्यश्व के मधुवती के गर्भ से महायशस्वी यदु का जन्म हुआ ।४४।
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यदुर्नामाभवत् पुत्रो राजलक्षणपूजित:। यथास्य पूर्वजो राजा पुरु: स सुमहायशा:।।46। ·
अनुवाद:- यदु राजोचित लक्षणों से सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वीय पुरु सम्मानित होते थे।

भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धक यादव: दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते ।।६५।
हरिवंशपुराण विष्णुपर्व सैंतीस वाँ अध्याय 
जैसे कुक्कुर, भोज, अन्धक ,दाशार्ह ,भैम, यादव, और वृष्णि नाम के वाले प्रसिद्ध होंगे 

पुराणों की टीका करने वाले  पण्डितों 'ने इस प्रक्षेपों का निराकरण 
इस प्रकार करते हैं कि ययाति पुत्र यदु ही योग-बल से हर्यश्व के पुत्र रूप में प्रकट हुए ।

'परन्तु यह बात प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध ही है।
सृष्टि- की यह 'परम्परा सदीयों से रही है यह केवल और केवल  यादवों का इतिहास 'न जानना या बिगाड़ना है ।
ताकि उनका स्वाभिमान भी खण्डित 'न हो जाय हरिवंशपुराण के  विष्णुपर्व में वर्णित किया गया है इसी सैंतीसवें अध्याय में श्लोक संख्या (४६) पर 
जब एक वीर हर्यश्व पुत्र यदु महासागर में जल क्रीडा कर रहे थे ; तभी सर्पों के राजा धूम्रवर्ण 'ने अपने लोक समुद्र की गहराईयों में वहाँ अपनी पाँच कन्याऐं पत्नी रूप में यदु को दी और कहा कि तुम्हारे पिता 'ने इस वंश की नींम डालकर तुम जैसे तेजस्वी पुत्र को जन्म  दिया  यदु  तुम्हारे नाम से यह वंश यादव कहलाएगा ।
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सर्पराज 'ने कहा कि तुम से सात कुल विख्यात होंगे 👇

"भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धक यादव: दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते ।।६५।
हरिवंशपुराण विष्णुपर्व सैंतीस वाँ अध्याय 

जैसे कुक्कुर, भोज, अन्धक, यादव ,दाशार्ह ,भैम और वृष्णि के नाम वाले प्रसिद्ध होंगे ।

इन नागकन्याओं से पाँच पुत्र उत्पन्न हुए ।
१-महाबाहुमुचुकुन्द २,पद्मवर्ण३-,माधव, ४-सारस,तथा राजा हरित ये पाँच पुत्र थे ।

राजा यदु अपने बड़े पुत्र माधव को राज्य देकर परलोक को चले गये ।

माधव के पुत्र सत्वत्त नाम से प्रसिद्ध हुए ।
सत्वत्त के पुत्र भीम हुए । 
इनके वंशज भैम कहलाये जब राजा भीम आनर्त देश पर राज्य करते थे और तब अयोध्या मे राम का शासन था । तब इसका समय मधु पुत्र लवण को शत्रुघ्न 'ने मारकर मधुवन का उच्छेद कर डाला ।३९।

और उसी मधुवन के स्थान पर शत्रुघ्न'ने मधुपुरी को बसाया ।।४०।

तस्मिन् मधुवन स्थाने पुरीं च मथुरामिमाम्।
निवेशयामास विभु: सुमित्रानन्दवर्धन: ।।४०।।

'परन्तु जब शत्रुघ्न परलोक पधारे तो पुन: यादव भीम ने इस वैष्णव स्थान मथुरा को पुन: प्राप्त किया ।क्यों कि यह भी के नाना मधु की नगरी थी।
भीम के पुत्र अन्धक मथुरा के राजा हुए और अन्धक के पुत्र रैवत ( ऋक्ष) के पुत्र विश्वगर्भ ( देवमीढ) हुए । ये देवमीढ ही नन्द और वसुदेव के पूर्वजों में थे ।

आनर्त  --+-
आनर्त प्राचीन भारत में गुजरात के उत्तर भाग को कहा जाता था। द्वारावती आधुनिक द्वारका इसकी प्रधान नगरी थी।
महाभारत के अनुसार अर्जुन ने पश्चिम दिशा की विजय-यात्रा में आनर्तों को जीता था।
सभापर्व के एक अन्य वर्णन से ज्ञात होता है कि आनर्त का राजा शाल्व था, जिसकी राजधानी सौभनगर में थी। 

श्री कृष्ण ने इस देश को शाल्व से जीत लिया था।
विष्णु पुराण में आनर्त की राजधानी कुशस्थली 
बताई गई है-

'आनर्तस्यापि रेवतनामा पुत्रो जज्ञे, योऽसावनर्तविशयं बुभुजे पुरीं च कुशस्थलीमध्युवास।'

इस उद्धरण से यह भी सूचित होता है कि आनर्त के राजा रेवत के पिता का नाम आनर्त था। 
इसी के नाम से इस देश का नाम आनर्त हुआ होगा।

रेवत बलराम की पत्नी रेवती के पिता थे।
महाभारत से भी विदित होता है कि आनर्त नगरी, द्वारका का नाम था-

'तमेव दिवसं चापि कौन्तेय: पांडुनंदन:, आनर्त नगरीं रम्यां जगामाशु धनंजय:।'

गिरनार के प्रसिद्ध अभिलेख के अनुसार रुद्रदामन ने 150 ई. के लगभग अपने पहलव अमात्य सुविशाख को आनर्त और सौराष्ट्र आदि जनपदों का शासक नियुक्त किया था-
'कृत्स्नानामानर्त सौराष्ट्राणां पालनार्थं नियुक्तेन पह्लवे कुलैप पुत्रेणामात्येन सुविशाखेन।'

रुद्रदामन ने आनर्त को सिंधु-सौवीर आदि जनपदों के साथ विजित किया था।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
ऐतिहासिक स्थानावली | 
पृष्ठ संख्या= 63-64| विजयेन्द्र कुमार माथुर |
वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | 
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार 
हरिवंश पुराण विष्णु पर्व (संस्कृत) अध्याय 59 श्लोक 16-20
पृथ्वी पति राजा जरासन्ध 'ने चेदिराज सुनीथ के पुत्र शिशुपाल के लिए भयानक पराक्रमी भीष्मक  से उनकी कन्या रुक्मणि को माँगा था ।१९।

क्योंकि जरासन्ध दमघोष का वंशज था ।
विदित हो की चेदिराज उपरिचर वसु के एक पुत्र का नाम बृहद्रथ था जिसने मगध में पहले गिरिव्रज नामक नगर का निर्माण किया था उसी के वंश में जरासन्ध उत्पन्न हुए। उपरिचर वसु के ही वंश में उन्हीं दिनों दमघोष (सुनीथ) उत्पन्न हुए जो चेदि देश के राजा थे । 
दमघोष के पाँच पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए शिशुपाल, दशग्रीव ,रैभ्य,उपदिश,और बली ।
जरासन्ध दमघोष का वंशज या कुटुम्बी था और समान वंश में उत्पन्न हुआ इसलिए दमघोष ने अपना पुत्र शिशुपाल जरासन्ध को सौंप दिया था।

रुक्मिणी त्वयभवद् राजन् रूपेणासदशी भूवि।
चकमे वासुदेवस्तां श्रवादेव महाद्युति:।।16।।
स तया चाभिलषित: श्रवादेव जनार्दन:।
तेजोवीर्यबलोपेत: स मे भर्ता भवेदिति।।17।।
तां ददौ न च कृष्णाय द्वेषाद् रुक्मीि महाबल:।
कंसस्यौ वधसंतापात् कृष्णाययामिततेजसे।।18।।
याचमानाय कंसस्य द्वेष्योदयमिति चिन्तययन्।
चैद्यस्याकर्थे सुनीथस्य जरासंधस्तु् भूमिप:।
वरयामास तां राजा भीष्म कं भीमव्रिकमम्।।19।।

चेदिराजस्यं तु वसोरासीत् पुत्रो बृहद्रथ:।
मगधेषु पुरा येन निर्मितोऽसौ गिरिव्रज:।।20।।

हरिवंश पुराण विष्णु पर्व (संस्कृत) अध्याय 58 श्लोक 21-25

तस्यान्वावाये जज्ञेऽसौ जरासंधो :।
वसोरेव तदा वंशे दमघोषोऽपि चेदिराट्।।21।।

दमघोष पुत्रास्तु पंच भीमपराक्रमा:।
भगिन्यां वसुदेवस्य श्रुतश्रवसि जज्ञिरे।।22।।
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हरिवंशपुराण विष्णुपर्व सैंतीस वाँ अध्याय 
श्लोक संख्या ४६ पर वर्णित है 👇

तस्यैव च सुवृत्तस्य पुत्रकामस्य धीमत:।
मधुमत्यां सुतो जज्ञे यदुर्नाम महायशा ।४४।

चेदिराज उपरिचर वसु के एक पुत्र का नाम बृहद्रथ था, जिसने पूर्वकाल में मगधदेश के भीतर गिरिब्रज नामक नगर का निर्माण कराया था।
उसी के वंश में महाबली जरासंध पैदा हुआ। उपरिचर वसु के ही वंश में उन दिनों दमघोष पैदा हुए थे, जो चेदि देश के राजा थे। दमघोष के पाँच भयानक पराक्रमी पुत्र हुए, जो वसुदेव की बहिन श्रुतश्रवा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।
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पुत्र की इच्छा रखने वाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धि मान हर्यश्व के मधुवती के गर्भ से महायशस्वी यदु का जन्म हुआ ।४४।
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यदुर्नामाभवत् पुत्रो राजलक्षणपूजित:। यथास्य पूर्वजो राजा पुरु: स सुमहायशा:।।46। ·
अनुवाद:- यदु राजोचित लक्षणों से सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वीय पुरु सम्मानित होते थे।

भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धक यादव: दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते ।।६५।
हरिवंशपुराण विष्णुपर्व सैंतीस वाँ अध्याय 
जैसे कुक्कुर, भोज, अन्धक ,दाशार्ह ,भैम, यादव, और वृष्णि नाम के वाले प्रसिद्ध होंगे 
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शिशुपालो दशग्रीवो रैभ्योयऽथोपदिशो बली।
सर्वास्त्रकुशला वीरा वीर्यवन्तो महाबला:।।23।।

निम्नलिखित श्लोक दमघोष जरासन्ध समान कुल में जन्म लिया ।
वंशञ् समानवंशस्य सुनीथ: प्रददौ सुतम्।
जरासंधस्तु सुतवद् ददर्शैनं जुगोप च।।24।।
जरासंधं पुरस्कृत्य वृष्णिशत्रुं महाबलम्।
कृतान्यागांसि चैद्येन वृष्णीनां चाप्रियौषिणा।।25।।


महाभारत के आदि पर्व में चेदि वंश का इतिहास प्रक्षिप्त है।
जबकि भागवत इ दि पुराणों में सही है।

शिनि से ही सत्यक का जन्म हुआ। इसी सत्यक के पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकि के नाम से प्रसिद्ध हुए। सात्यकि का जय, जय का कुणि और कुणि का पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्र के तीसरे पुत्र का नाम वृष्णि था। वृष्णि के दो पुत्र हुए- श्वफल्क और चित्ररथ। श्वफल्क की पत्नी का नाम था गान्दिनी।

उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूर के अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्न हुए- आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूर के दो पुत्र थे- देववान् और उपदेव। श्वफल्क के भाई चित्ररथ के पृथु विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए-जो वृष्णिवंशियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं।

सात्वत के पुत्र अन्धक के चार पुत्र हुए- कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुर का पुत्र वह्नि, वह्नि का विलोमा, विलोमा का कपोतरोमा और कपोतरोमा का अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्व के साथ अनु की बड़ी मित्रता थी। अनु का पुत्र अन्धक, अन्धक का दुन्दुभि, दुन्दुभि का अरिद्योत, अरिद्योत का पुनर्वसु और पुनर्वसु के आहुक नाम का एक पुत्र तथा आहुकी नाम की एक कन्या हुई। आहुक के दो पुत्र हुए- देवक और उग्रसेन। देवक के चार पुत्र हुए- देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं- धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेव जी ने इन सबके साथ विवाह किया था।

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इसी पुराण में  पृथ्वी के प्रथम राजा पृथु का वर्णन यूनानी-माइथॉलॉजी के प्रोटियस् से ग्राह्य है ।
हरिवंशपुराण के निम्नलिखित श्लोक में पृथु की पुत्री है पृथ्वी ।👇

तत८भयुपगमाद् राज्ञ्य: पृथोर्वैन्यस्य भारत ।
दुहितृत्वमनुप्राप्ता देवी पृथ्वीति चोच्यते ।।
पृथुना प्रविभक्ता च शोधिता च वसुंधरा ।।४६।

अर्थात्‌ भरत वंशी राजन्य ! फिर वेनपुत्र राजा पृथु के पुत्री रूप में  स्वीकार करने पर यह देवी उसकी पुत्री बन गयी और पृथ्वी कहलायी । 
इस प्रकार पृथु 'ने पृथ्वी को अनेक
भागों 'में विभक्ति किया और शुद्ध किया ।४६।




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देखें निम्नलिखित यूनानी-माइथॉलॉजी से उद्धृत तथ्य साम्य--
In Greek mythology, Proteus (/ˈproʊtiəs, -tjuːs/;[1] Ancient Greek: Πρωτεύς) is an early prophetic sea-god or god of rivers and oceanic bodies of water, one of several deities whom Homer calls the "Old Man of the Sea" (halios gerôn).

[2] Some who ascribe a specific domain to Proteus call him the god of "elusive sea change", which suggests the constantly changing nature of the sea or the liquid quality of water.
He can foretell the future, but, in a mytheme familiar to several cultures, will change his shape to avoid doing so; he answers only to those who are capable of capturing him. From this feature of Proteus comes the adjective protean, meaning "versatile", "mutable", or "capable of assuming many forms". "Protean" has positive connotations of flexibility, versatility and adaptability.

Name Origin -
Proteus' name suggests the "first" (from Greek "πρῶτος" prōtos, "first"), as prōtogonos (πρωτόγονος) is the "primordial" or the "firstborn".

 It is not certain to what this refers, but in myths where he is the son of Poseidon, it possibly refers to his being Poseidon's eldest son, older than Poseidon's other son, the sea-god Triton. 

The first attestation of the name, although it is not certain whether it refers to the god or just a person, is in Mycenaean Greek; the attested form, in Linear B, is 𐀡𐀫𐀳𐀄, po-ro-te-u.[3][4][5]

Family -
Proteus was generally regarded as the son of the sea-god Poseidon.[6][7] 

The children of Proteus, besides Eidothea, include Polygonus and Telegonus, who both challenged Heracles at the behest of Hera and were killed, one of Heracles' many successful encounters with representatives of the pre-Olympian world order.

Cabeiro, mother of the Cabeiri and the three Cabeirian nymphs by Hephaestus, was also called the daughter of Proteus.[8]

Mythology-
Proteus, prophetic sea-god Edit
According to Homer (Odyssey iv: 355), the sandy island of Pharos situated off the coast of the Nile Delta was the home of Proteus, the oracular Old Man of the Sea and herdsman of the sea-beasts.

In the Odyssey, Menelaus relates to Telemachus that he had been becalmed here on his journey home from the Trojan War. 

He learned from Proteus' daughter Eidothea ("the very image of the Goddess"), that if he could capture her father, he could force him to reveal which of the gods he had offended and how he could propitiate them and return home. 

Proteus emerged from the sea to sleep among his colony of seals, but Menelaus was successful in holding him, though Proteus took the forms of a lion, a serpent, a leopard, a pig, even of water or a tree.

Proteus then answered truthfully, further informing Menelaus that his brother Agamemnon had been murdered on his return home, that Ajax the Lesser had been shipwrecked and killed, and that Odysseus was stranded on Calypso's Isle Ogygia.

According to Virgil in the fourth Georgic, at one time the bees of Aristaeus, son of Apollo, all died of a disease. 

Aristaeus went to his mother, Cyrene, for help; she told him that Proteus could tell him how to prevent another such disaster, but would do so only if compelled.

Aristaeus had to seize Proteus and hold him, no matter what he would change into. Aristaeus did so, and Proteus eventually gave up and told him that the bees' death was a punishment for causing the death of Eurydice.

To make amends, Aristaeus needed to sacrifice 12 animals to the gods, leave the carcasses in the place of sacrifice, and return three days later. 

He followed these instructions, and upon returning, he found in one of the carcasses a swarm of bees which he took to his apiary. The bees were never again troubled by disease.

There are also legends concerning Apollonius of Tyana that say Proteus incarnated himself as the 1st century philosopher.

These legends are mentioned in the 3rd century biographical work Life of Apollonius of Tyana.

Proteus, king of Egypt -
Main article: Proteus of Egypt
In the Odyssey (iv.430ff) Menelaus wrestles with "Proteus of Egypt, 

ग्रीक पौराणिक कथाओं में, प्रोटियस (/ ʊproəti ,s, -tju /s /; [1] प्राचीन ग्रीक: Greekρ:) एक प्रारंभिक भविष्यवक्ता समुद्र-देवता या नदियों और समुद्र के पानी के देवता हैं, कई देवताओं में से एक जिन्हें होमर "ओल्ड मैन ऑफ" कहते हैं। द सी ”(हेलोस गेरोन)।

[२] कुछ लोग जो प्रोटीज को एक विशिष्ट डोमेन बताते हैं, उन्हें "मायावी समुद्र परिवर्तन" का देवता कहते हैं, जो समुद्र के निरंतर बदलते स्वरूप या पानी की तरल गुणवत्ता का सुझाव देता है।

वह भविष्य की भविष्यवाणी कर सकता है, लेकिन, कई संस्कृतियों से परिचित एक मिथक में, ऐसा करने से बचने के लिए अपना आकार बदल देगा; वह केवल उन लोगों को जवाब देता है जो उसे पकड़ने में सक्षम हैं। प्रोटीन की इस विशेषता से विशेषण का अर्थ आता है, जिसका अर्थ है "बहुमुखी", "परस्पर", या "कई रूपों को ग्रहण करने में सक्षम"। "प्रोटियन" में लचीलापन, बहुमुखी प्रतिभा और अनुकूलनशीलता के सकारात्मक अर्थ हैं।

नाम की उत्पत्ति -
प्रोटियस का नाम "प्रथम" (ग्रीक "ῶτρςοō" pr'tos, "प्रथम") से पता चलता है, क्योंकि pr )togonos (πρωτόγονος) "प्रिमोरियल" या "प्रथम" है।

यह निश्चित नहीं है कि यह क्या संदर्भित करता है, लेकिन मिथकों में जहां वह पोसिडॉन का पुत्र है, संभवतः यह पोसिदोन के सबसे बड़े पुत्र, पोसिदोन के दूसरे बेटे, समुद्र-देवता ट्राइटन से बड़ा है।

नाम का पहला सत्यापन, हालांकि यह निश्चित नहीं है कि यह भगवान या सिर्फ एक व्यक्ति को संदर्भित करता है, माइसेनियन ग्रीक में है; अनुप्रमाणित रूप, रैखिक बी में, po, पो-रो-ते-यू है। [३] [४] [५]

परिवार -

प्रोटीन को आमतौर पर समुद्र-देवता पोसिडॉन का पुत्र माना जाता था। [६] [regarded]

प्रोटिओस के बच्चों में ईडोथिया के अलावा, पॉलीगोनस और टेलीगोनस शामिल हैं, जिन्होंने दोनों हेरा के इशारे पर हेराक्लेज़ को चुनौती दी और मारे गए, हेराक्लीज़ के पूर्व ओलंपियन विश्व व्यवस्था के प्रतिनिधियों के साथ कई सफल मुठभेड़ों में से एक।

हेबेस्टस द्वारा कैबेरियो, कैबिरी की मां और तीन कैबेरियन अप्सराओं को प्रोटियस की बेटी भी कहा जाता था। [of]

पौराणिक कथा-

प्रोटीन, भविष्यद्वक्ता समुद्री देवता
होमर (ओडिसी iv: 355) के अनुसार, नील डेल्टा के तट से दूर फैरोस का रेतीला द्वीप, प्रोटियस का घर था, जो समुद्र का अलौकिक ओल्ड मैन और समुद्र-घाटों का चरवाहा था।

 ओडिसी में, मेनलॉस टेलिमैचस से संबंधित है कि ट्रोप युद्ध से अपनी यात्रा के घर पर उसे यहां लाया गया था।

उसने प्रोटियस की बेटी ईडोथिया ("देवी की बहुत छवि") से सीखा, कि यदि वह अपने पिता को पकड़ सकती है, तो वह उसे यह बताने के लिए मजबूर कर सकती है कि उसने किस देवता को नाराज किया था और वह उन्हें कैसे बता सकता था और घर वापस लौट सकता था।

प्रोटीज समुद्र से अपनी कॉलोनी की सीलों के बीच सोने के लिए उभरा, लेकिन मेनलॉस उसे पकड़ने में सफल रहा, हालांकि प्रोटियस ने एक शेर, एक सर्प, एक तेंदुआ, एक सुअर, यहां तक ​​कि पानी या पेड़ का रूप ले लिया।

इसके बाद प्रोटियस ने सच्चाई से जवाब दिया, मेनेलॉस को सूचित करते हुए कि उसके भाई अगेम्नोन की घर लौटने पर हत्या कर दी गई थी, कि अजाक्स द लेवर को मार दिया गया था और उसे मार दिया गया था, और ओडीसियस को कैलिप्सो के आइल ओगियागिया में फंसा दिया गया था।

चौथे जॉर्जीक में वर्जिल के अनुसार, एक समय में अपोलो के बेटे अरिस्टेअस की मधुमक्खियों की बीमारी से मौत हो गई थी।

अरिस्टियस मदद के लिए अपनी माँ साइरेन के पास गया; उसने उसे बताया कि प्रोटियस उसे बता सकता है कि इस तरह की दूसरी आपदा को कैसे रोका जाए, लेकिन मजबूर होने पर ही ऐसा करेगा।

अरिस्टेअस को प्रोटीज को जब्त करना और उसे पकड़ना था, चाहे वह किसी भी स्थिति में बदल जाए। अरिस्टेअस ने ऐसा किया, और प्रोटियस ने अंततः हार मान ली और उसे बताया कि मधुमक्खियों की मौत यूरियाडाइस की मौत का कारण है।

 संशोधन करने के लिए, अरिस्टेअस को देवताओं को 12 जानवरों की बलि देने की जरूरत थी, बलिदान के स्थान पर शवों को छोड़ दें, और तीन दिन बाद वापस आ जाएं।

उसने इन निर्देशों का पालन किया, और लौटने पर, उसने शवों में से एक को मधुमक्खियों के झुंड में पाया, जिसे वह अपने आशिक के पास ले गया था। मधुमक्खियां फिर कभी बीमारी से परेशान नहीं हुईं।

वहाँ भी Tyana के Apollonius से संबंधित किंवदंतियों है कि कहते हैं कि प्रोटियस ने खुद को 1 शताब्दी के दार्शनिक के रूप में अवतार लिया।

 इन किंवदंतियों का उल्लेख तीसरी शताब्दी की जीवनी कार्य लाइफ ऑफ़ एपोलोनियस ऑफ़ टायना में किया गया है।

प्रोटीज, मिस्र का राजा -
मुख्य लेख: मिस्र का प्रोटीन
ओडिसी (iv.430ff) मेनेलॉस कुश्ती में "मिस्र के प्रोटीन,"

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As a concept and as a word, Proteus is not a commonly used term today, but has been adopted by some companies to be an interesting concept for the basis of their business names, ranging from healthcare to industrial supplies all the way to sports nutrition and supplementation.

In medicine, Proteus syndrome refers to a rare genetic condition characterized by symmetric overgrowth of the bones, skin, and other tissues.

 Organs and tissues affected by the disease grow out of proportion to the rest of the body. This condition is associated with mutations of the PTEN gene.

 Proteus also refers to a genus of Gram-negative Proteobacteria, some of which are opportunistic human pathogens known to cause urinary tract infections, most notably. Proteus mirabilis is one of these and is most referenced in its tendency to produce "stag-horn" calculi composed of struvite (magnesium ammonium phosphate) that fill the human renal pelvis.

In Professional Wrestling, British company PROGRESS Wrestling has announced the introduction of a Proteus Championship.

 The current holder of the championship will be allowed to declare the type of match they will defend the championship in, with each new champion being able to set their own match type.

 The name of the championship was chosen due to its ever-changing nature, reflecting the shape-changing abilities of the deity it was named for.

Biology -
The protist Amoeba proteus is named for the Greek god, as it has no fixed shape and constantly changes form.

एक अवधारणा के रूप में और एक शब्द के रूप में भी , प्रोटियस आज आमतौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाने वाला शब्द है, ।
लेकिन कुछ कंपनियों द्वारा अपने व्यवसाय के नाम के आधार पर एक दिलचस्प अवधारणा को अपनाया गया है, स्वास्थ्य सेवा से लेकर औद्योगिक आपूर्ति तक सभी खेल पोषण के लिए और पूरकता के लिए भी ।
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चिकित्सा में, प्रोटियस सिंड्रोम एक दुर्लभ आनुवंशिक स्थिति को दर्शाता है जो हड्डियों, त्वचा और अन्य ऊतकों के सममित अतिवृद्धि द्वारा विशेषता है।

रोग से प्रभावित अंग और ऊतक शरीर के बाकी हिस्सों के अनुपात से बढ़ते हैं।
 यह स्थिति PTEN जीन के उत्परिवर्तन से जुड़ी है।

 प्रोटीन ग्राम-नकारात्मक प्रोटीनोबैक्टीरिया के एक जीनस को भी संदर्भित करता है, जिनमें से कुछ अवसरवादी मानव रोगजनकों का समावेश हैं जिन्हें मूत्र पथ के संक्रमण के कारण जाना जाता है, 
विशेष रूप से प्रोटीज मिराबिलिस इनमें से एक है और इसकी सबसे अधिक संदर्भित "स्टैग-हॉर्न" केल्चुरी (मैग्नीशियम अमोनियम फॉस्फेट) से बना है जो मानव वृक्कीय श्रोणि को भरता है।

प्रोफेशनल रेसलिंग में, ब्रिटिश कंपनी PROGRESS रेसलिंग ने प्रोटियस चैंपियनशिप शुरू करने की घोषणा की है।

 चैंपियनशिप के वर्तमान धारक को उस प्रकार के मैच की घोषणा करने की अनुमति दी जाएगी, जिसमें वे चैंपियनशिप की रक्षा करेंगे, प्रत्येक नए चैंपियन को अपना मैच प्रकार सेट करने में सक्षम होना चाहिए।

 चैंपियनशिप का नाम अपने कभी बदलते स्वभाव के कारण चुना गया था, जिसे देवता की आकार-बदलती क्षमताओं को दर्शाया गया था।

( यूनानी-माइथॉलॉजी से उद्धृत ---

जीवविज्ञान -
प्रोटेस्टिस्ट अमीबा प्रोटक्टस का नाम ग्रीक देवता के लिए रखा गया है, क्योंकि इसका कोई निश्चित आकार नहीं है और यह लगातार रूप बदलता रहता है। [१eb]

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प्रस्तुति-करण:-
यादव योगेश कुमार'रोहि'  8077160219




बुधवार, 10 जून 2020

जिन्दगी है-- सफर ---तन्हाई का ,आश के पढ़ाव-- यहांँ अभी हैं कई ...

जिन्दगी है-- सफर ---तन्हाई का ,
आश के पढ़ाव-- यहांँ अभी हैं कई 

जिन्दगी है सफर ---तन्हाई का ,
आश के पढ़ाव-- यहांँ अभी हैं कई
___________ 
रास्ते मिट गये कहीं अपने सभी ।
मंजिलो से बडी ये दूरी है ।
जिन्दगी है सफर ---तन्हाई का ....
_________________________

पास एहशास, तजुरुबों-- की सदा 
होके रहता है जो किस्मत में बदा--
पास एहशास, तजुरुबों ---की सदा ।
होके रहता है जो किस्मत में बदा
 ।।
किस्मतें भी बनी कर्मों से तेरे ।
जिन्दगी पे भार जन्मों से लदा ।।

जिन्दगी पे भार जन्मों से लदा ।।
__________________________
जिन्दगी है सफर ---तन्हाई का ,
आश के पढ़ाव यहांँ अभी हैं कई ।

जिन्दगी है सफर ---तन्हाई का ,
_________________________

कहीं संचित कहीं प्रारब्ध-- है ये ।
कर्म क्रियमाण के  दो शब्द हैं ये।।
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कहीं संचित कहीं प्रारब्ध है ये ।
कर्म क्रियमाण के  दो शब्द हैं ये।।

श्वाँस धड़कन से यो मिलके के चले ...
अक्श परछाँइयों सा उपलब्ध है ये
अक्श परछाँइयों सा उपलब्ध है ये
________________________

जिन्दगी है ---सफर ---तन्हाई का ,
आश के पढ़ाव यहांँ अभी हैं कई
___________
जिन्दगी है सफर ---तन्हाई का ,
_________________

मेरे चहरे पे जो मुस्कराहट है ।
ये न समझो  सुखों की आहट है ।

मेरे चहरे पे जो मुस्कराहट है ।
ये न समझो  सुखों की आहट है ।
हम ग़मों को दबा के तौर पिऐं 

अन्यथा द़िल में छटपटाहट है ।
अन्यथा द़िल में छटपटाहट है ।

जिन्दगी है- सफर ---तन्हाई का ,
आश के पढ़ाब यहांँ अभी हैं कई ।

जिन्दगी है- सफर ---तन्हाई का ,


जिन्दगी है सफर ---तन्हाई का ,


अहीरों को लाठी संचालको में अग्रगण्य माना जाता है क्यों कि ये भी मार्शल आर्ट का अवयव है।

अहीरों को संस्कृत भाषा में अभीरः कहा 
जिसका अर्थ "निडर" है ।

अहीरों को लाठी संचालको में अग्रगण्य माना जाता है क्यों कि ये भी मार्शल आर्ट का अवयव है।
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अहीरों को संस्कृत भाषा में अभीरः अथवा आभीरः संज्ञा से इस लिए अभिहित किया गया ।
क्यों कि ये जन्म-जात निर्भीक जन-जाति है ।👇
अभीर शब्द में "अण् प्रत्यय समूह अथवा सन्तति वाचक है।
इस तद्धित प्रत्यय के योग करने पर आभीर शब्द बनता है ।
परन्तु यह व्युत्पत्ति संस्कृत के विद्वानों ने ई०पू० द्वितीय सताब्दी में अहीरों की निर्भीकता की प्रवृत्ति को दृष्टि गत करके की थी ।
संस्कृत अभीर:शब्द का मूल तो वीर शब्दः है ।
जो हिब्रू भाषा में अबीर शब्द के मूल के रूप में बीर/ बिर है ।
वैसे अभीर शब्द दागिस्थानी तथा अज़रबेजान की संस्कृतियों में "अवर" (Avar) स्पेन में "आयबरी"
मध्य-अफ्रीका में "अफर" हिब्रू संस्कृतियों में "अबीर"
तथा आद्यभारोपीय भाषाओं में "आर्य्य" तमिल "आयर"
स्कॉटलेण्ड "आयर" आदि रूपों में है ।
यह एक प्रवृत्ति-मूलक विशेषण है ।
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.. संस्कृत भाषा में आभीर शब्द की व्युत्पत्ति केवल अहीरों की यौद्धिक प्रवृत्तियों को दृष्टि से अनेक प्रकार से की है : - 
सबसे पहले अमरकोशः में अमरसिंह ने की इसके जो चन्द्रगुप्त द्वितीय (चौथी शब्ताब्दी) के नवरत्नों में से एक थे। 
कुछ लोग अमरसिंह को विक्रमादित्य (सप्तम शताब्दी) का समकालीन बताते हैं।
कुछ भी सही !
'परन्तु सत्य पूछा जाय तो अमर सिंह  कालिदास के समकालिक गर्दभिल्ल पुत्र भतृहरि के भाई विक्रमादित्य के सभा रत्नों में से एकरूपता थे । 
जिनके आधार पर ईस्वी सन् से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् का प्रचलन हुआ ।
और यही सत्य है ।
सत्य स्वीकार करना ही चाहिए !
संस्कृत में आभीरः, पुल्लिंग विशेषण शब्द है । 
(आ समन्तात् भियं भयं राति ददाति शत्रुणाम् हृत्सु इति आभीर कथ्यते आभीर  (गोप:) यादव का नामान्तरण है ।
आभीर ही  
आहिर इति प्राकृत भाषा में है ।
--जो सर्वत्र  शत्रुओं के हृदय में भय का वातारण उत्पन्न करता है ।
"अ नास्ति भयं यस्मिन् चित्तेषु इति अभीर: और सामूहिक रूप आभीर:
_________________________________________

यह शब्द "अभित: ईरयति गच्छति इति अभीरः" अर्थात् चारो तरफ घूमने वाली एशिया की निर्भीक जनजाति " के रूप मे मिश्र के टैल अमरना में हबीरु भी है ।

अभि एक धातु ( क्रियामूल ) से पूर्व लगने बाला उपसर्ग (Prifix)है ।

तथा ईर् संस्कृत परस्मैपदीय धातु जिसका अर्थ "गमन करना" है ।

इस धातु में कर्तरिसंज्ञा भावे में अच् प्रत्यय के द्वारा निर्मित विशेषण शब्द अभीरः बनता है ।

अभीरः शब्द में श्लिष्ट अर्थ है जो पूर्णतः भाव सम्पूर्क है👇
(अ) निषेधात्मक उपसर्ग तथा भीरः/ भीरु तद्धित पद दौनों के संयोग से बनता है शब्दः अभीर = अर्थात् जो भीरः अथवा कायर न हो वह वीर पुरुष ।

रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने 1900 वीं सदी में
अपना इतिहास के
"अ पीप इन्टू द अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया' इतिहास के ग्रन्थ में लिखा। 

कि अहीरों का सम्बन्ध यहूदियों की अबीर शाखा से रूप में है ।
--जो विश्व में मार्शल आर्ट के जनक हैं ।
यहूदियों को ही उन्होनें इज़राएल के यादव कहा ।
यहूदीयो की भाषा हिब्रू में भी अबीर (Abeer )शब्द का अर्थ वीर तथा सामन्त है।

यद्यपि हिब्रू बाइबिल में तो परमेश्वर के पाँच नामों में से "अबीर" भी एक नाम है ।
परन्तु अबीर का मूल अर्थ "वीर" अथवा "यौद्धा" है ।
..तात्पर्य यह कि इजराईल के यहूदी वस्तुतः यदु की सन्तानें थीं जिन्हें अबीर भी कहा जाता था ।

यद्यपि आभीरः शब्द अभीरः शब्द का ही बहुवचन समूह वाचक रूप है ।
यहूदीयों की हिब्रू बाइबिल के सृष्टि-खण्ड नामक अध्याय Genesis 49: 24 पर ---
अहीर शब्द को जीवित ईश्वर का वाचक बताया है ।
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The name Abir is one of The titles of the living god for some reason it,s usually translated( for some reason all god,s
in Isaiah 1:24 we find four names of
The lord in rapid succession as Isaiah
Reports 
" Therefore Adon - YHWH - Saboath and Abir ---- Israel declares...
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Abir (अभीर )---The name reflects protection more than strength although one obviously -- has to be Strong To be any good at protecting still although all modern translations universally translate this name whith ---- Mighty One , it is probably best translated whith ---
Protector --रक्षक ।
हिब्रू बाइबिल में तथा यहूदीयों की परम्पराओं में ईश्वर के पाँच नाम प्रसिद्ध हैं :----👇
(१)----अबीर (२)----अदॉन (३)---सबॉथ (४)--याह्व्ह्
तथा (५)----(इलॉही)
-------------------------------------------------------------------
हिब्रू भाषा मे अबीर (अभीर) शब्द के बहुत ऊँचे अर्थ हैं- अर्थात् जो रक्षक है, सर्व-शक्ति सम्पन्न है
इज़राएल देश में याकूब अथवा इज़राएल--
( एल का सामना करने वाला )को अबीर
का विशेषण दिया था ।

इज़राएल एक फ़रिश्ता है जो भारतीय पुराणों में यम के समान है ।
जिसे भारतीय पुराणों में ययाति कहा है ।
ययाति यम का भी विशेषण है ।

शुक्रवार, 5 जून 2020

हिब्रू बाइबिल के अनुसार अबीर जन-जाति का इतिहास -

हिब्रू बाइबिल के अनुसार अबीर जन-जाति का  इतिहास - 
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यहूदी लोगों का सम्बन्ध, इब्राहीम (ग्राहम), इसहाक (यशाक), और याकूब (याक़ोक)  तीनों कुलपतियों के साथ शुरू होता है।
भारतीय पुराणों में ये ही पात्र क्रमश: ब्रह्मा , इक्ष्वाकु ,  ययाति , मनु तथा सोम के रूप में वर्णित हैं ।
परन्तु कालान्तरण दौनों संस्कृतियों की कथा-वस्तु में अन्तर एवं मतान्तरण भी आना स्वाभाविक ही है ।
नूह के पुत्र शेम के पहले वंशजों द्वारा विकसित  लड़ाकू  विध्वंसक प्रणाली पर बनाए गए कुलपति, अपनी अनूठी  विवेचना के द्वारा विकास में विभिन्न तत्वों को एक साथ बुनाई करते हैं।
मानवों के पूर्वजों एब्राहम  के जन्म के समय, सेमिटिक लोगों  (शेम के वंशजों ) की मुख्य एकाग्रता "शिनार" अर्थात् सुमेर (उर्फ "बावेल" / मेसापोटेमिया) में  उत्कीर्ण है ;
बावेल के राजा निम्रोद(नमरूद) के शासनकाल और उस समय पूरी ज्ञात दुनिया के शासक के शासनकाल के दौरान मेसापोटेमिया में उनका प्रभाव महसूस किया गया था।
पोशाक, कला, संगीत, आहार और वास्तुकला का सेमिटिक उन्नयन इस क्षेत्र में तेजी से प्रमुख आकर्षण का केन्द्र बन गया और सत्तारूढ़ राजशाही और सैन्य वर्गों से मेसोपोटेमिया में  शीघ्र ही फैल गया और आम आदमी  सभी तरह से निम्न स्तरों पर  चला गया क्योंकि वह जहालत की हालत से उबरना नहीं चाहता था । 
वस्तुत: पिछले समय में अलफ नाम के अबीर ने हमें सिखाया कि सेमिटिक / हिब्रू परम्पराओं के प्राचीन योद्धा भी महान संगीतकार और नर्तक थे। 
अहीरों के नर्तक (हल्लीशम् ) तथा गायन की प्रसिद्ध तो भारतीय पुराणों में भी परिलक्षित होती हैं ।
राग अहीर भी अहीरों के संगीतज्ञ भाव को व्यञ्जित करता है ।
ग्राहम( ए-ब्राहम) निम्रोद के योद्धा तेराह का पुत्र था ।
- जो उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए एक अद्भुत योद्धा होना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं है! ग्राहम को छिपना और बावेल से भागना पड़ा, अपने शिष्यों के 318, योद्धाओं और उनके घर के सदस्यों को हारान में ले जाना पड़ा, बाद में कनान देश की ओर बढ़ गया था।  भगवान ने कनान को अराम के लिए एक पवित्र भूमि के रूप में वादा किया, ताकि वह अपने सन्तानों द्वारा विजय प्राप्त कर सके। 
ए-ब्राहम (ग्राहम )भगवान के विचारों और मानव जाति के प्रति एकेश्वरवादी विश्वास को पेश करने वाले पहले व्यक्ति थे। 
ग्राहम के बेटे यिशाक (इसहाक) भी एक शक्तिशाली योद्धा थे ; और अपने बेटों को अबीरियत  में भी प्रशिक्षित किया था।  
समय के साथ, यह इसहाक के लिए स्पष्ट हो गया कि उसका बेटा याकूब "पवित्रता में डूबा हुआ" था ।
और प्रार्थना और धार्मिकता में अपनी शक्ति का उपयोग करता था, जबकि उसके भाई एसाव (एसाव) ने "टोपी की बूंद पर खून छीन लिया।" 
इसलिए इशहाक (इक्ष्वाकु) ने याकूब (ययाति)को आशीर्वाद दिया।
हमारे पितृसत्ता याकूब, एबरहम के पोते को उनकी शक्ति और प्रतिद्वन्द्विता के लिए "अबीर याकूब" और उनकी महान ताकत के लिए "इज़राइल की चट्टान" भी कहा जाता था; उनका विश्वास एक चट्टान के रूप में अचूक था। 
याकूब ने बारह पुत्रों को जन्म दिया; जैसे-जैसे लड़के बढ़ते गये , उन्हें कनान देश में कई राजाओं और कुलों के साथ कई भयंकर लड़ाई में (उनके पिता के साथ) खींचा गया था। 
शुरुआती दिनों से, उनके कौशल लगभग अलौकिकता के रूप में देखा गया था।
परंपरा यह है कि याकूव (Ya'qovov ) प्रत्येक बेटे को एक विशेष लड़ाई रूप दिया।
बुद्धिमानी और भावनाओं  के साथ, याकूब ने युद्ध में प्रत्येक बेटे की शक्तियों और कमजोरियों को देखा, प्रत्येक बेटे के अद्वितीय शारीरिक और आध्यात्मिक गुणों का आकलन किया - साथ ही इजरायल की भूमि में विभिन्न  क्षेत्रों द्वारा मांगे जाने वाले विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं को जो प्रत्येक पुत्र के वंशज नियत थे अनन्त काल के लिए विरासत के लिए प्रदान किए गये।
प्राचीन यहूदियों का एक मिस्र का चित्रण (उनके दाढ़ी और वस्त्र द्वारा पहचाना गया) 
वह समुदाय के  बुजुर्ग "रब्बा" या आध्यात्मिक नेता थे। 
सभी हब्बानी योद्धाओं जिनमें गुप्त "बानी अबीर" शामिल था, मुख्य रूप से अलफ अबीर के वंश के भीतर एक कोर समूह से खींचे गए थे, जिसे "मातुफ" नाम से जाना जाता था (हालांकि एक बिंदु पर परिवार की एक शाखा " दोह, "कपड़ा रंगों में उनके काम के संदर्भ में भी अबीर का उल्लेख है)। 
उस समय से, "बानी अबीर" में मातुफ परिवार के सदस्यों और दोहा परिवार के सदस्यों दोनों शामिल थे, और इसके अलावा उन्हें "मातुफ दोह" या "मातुफ इल दोह" भी कहा जाता था।
"बनी अबीर" के भीतर, अलफ नाम के अबीर के परिवार को "सोफर" कहा जाता था,
जो बाद में "मातुफ" और "दोह" दोनों को बदलने के लिए आया था। एक "सोफर" आज केवल एक लेखक के रूप में जाना जाता है।
जो टोरा स्क्रोल और अन्य पवित्र ग्रन्थ लिखता है; हालांकि, एक "सोफर" भी एक संरक्षक है, 

पूरे यहूदी समुदाय ने कुछ समय पहले हब्बन को इज़राइल जाने के लिए छोड़ दिया था ।
अबीर प्रणाली पूरी तरह से भूमिगत हो गई थी ।
हजारों सालों से प्राचीन इस्राएली लोगों की तरह रहने के बाद हब्बानी यहूदियों ने इज़राइल देश लौटने के साठ साल बाद, अबीर के हाथों से ज्ञान सीखने वाले हब्बानी अधिकांश दुनिया से चले गए हैं।
केवल कुछ बुजुर्ग लोगों में कुछ नृत्य चालों को देखने की याद शेष रह जाती है - 
जो अभी भी पारिवारिक समारोहों में देखी जाती हैं -  ये विधियाँ लड़ने के रूप में सही ढंग से लागू होती हैं। 
कुछ पुराने टाइमर अभी भी तलवारों के साथ नृत्य करते हैं। आज, युवा हब्बानी अभी भी पारम्परिक पानी की पाइप को धुआं कर सकते हैं, लेकिन कोई भी लंबे बालों को पहनता है और हमारे पूर्वजों को मुंडा नहीं लेता है, या अपने पूर्वजों के वस्त्र में अपने शरीर और सिर लपेटता है। 
आखिरी हब्बानी ने छोड़ा जो अभी भी अपने बालों को पहनता है, जो अभी भी पारंपरिक कपड़ों में कपड़े पहनता है, जो अभी भी अबीर का अभ्यास करता है -  फिलिप द्वारा हिब्रू बाइबिल पढ़ें और आप उन लोगों की लड़ाई की अद्भुत कहानियां देखेंगे जो इज़राइल के भगवान ने अपने लोगों, इज़राइलियों के लिए जीता था 
... वे वास्तव में उन लड़ाइयों में कैसे लड़ते थे?
यदि इस्राएलियों ने कई प्राचीन राष्ट्रों पर अनगिनत जीत हासिल की - 'अमालेकी, कानाई, अम्मोनियों, मोआवियों, बाबुलियों - और यदि सैकड़ों इस्राएली नियमित रूप से हजारों सैनिकों को पराजित करते थे ... उन्होंने इतनी भारी बाधाओं को कैसे दूर किया? ऐतिहासिक रिकॉर्ड ग्रीक और रोमन सेनाओं के खिलाफ जुदेन सशस्त्र प्रतिरोध के बारे में बताते हैं, यह प्रमाणित करते हुए कि वे कई वर्षों तक युद्ध में बहादुरी से लड़े ... उन्होंने विश्व महाशक्तियों की सेनाओं को कैसे पराजित किया जिन्होंने पूरी दुनिया पर विजय प्राप्त की थी?  युद्ध की कला के लिए इस्राएलियों का रहस्य क्या था? क्या वे बस अनियंत्रित और भाग्यशाली किसान थे? या क्या यह संभव है कि वे कुशल और अनुभवी योद्धा थे, एक प्राचीन योद्धा कला के स्वामी जो आज तक जीवित रहे हैं? बहुत से लोग नहीं जानते कि इस्राएली एक शक्तिशाली योद्धा परंपरा है जिसे हजारों वर्षों में  जीविका रखा और विकसित किया गया है अबीर जन-जाति द्वारा ... ..
. बहुत परम्परा जो हम आज सिखाते हैं और अभ्यास करते हैं:  अबीर  यहूदी, हिब्रू-इज़राइली राष्ट्र की युद्ध प्रणाली है।
जैसा कि कोई इज़राइल के बच्चों से अपेक्षा कर सकता है, अबीर एक युद्ध प्रणाली है जो अपने व्यवसायियों द्वारा की गई हर कार्रवाई के संबंध में प्रामाणिक तोराह फैसलों से अविभाज्य है, और अधीनस्थ है।
यह प्रणाली इज़राइल के भगवान, उनके पवित्र तोराह और इज़राइल के लोगों के लिए विश्वास और प्रतिबद्धता की एक गहरी, आध्यात्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करती है 

जो अपने प्रामाणिक कानूनों से जीने वाले राष्ट्र के रूप में है।
अबीर युद्ध प्रणाली शारीरिक मुकाबले के रूप में प्रभावी है, क्योंकि यह एक आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में है। एक अबीर व्यवसायी उपयोगी लड़ाई कौशल प्राप्त करता है जो विभिन्न प्रकार की रक्षात्मक आवश्यकताओं के समाधान प्रदान करता है।

इज़राएल के इतिहास से उद्धृत  अबीर जन-जाति के 
       यलगारी मोज्जे ---

गुरुवार, 4 जून 2020

आर्य्य शब्द की अवधारणा व व्युत्पत्ति...

राजपूत --जो  अहीरों के विषय में नहीं जानते उनके लिए ये संदेश-भारत तथा यूरोप  पश्चिमीय एशिया की लगभग सभी मुख्य भाषाओं में "आर्य" शब्द यौद्धा अथवा वीर के अर्थ में प्राचीनत्तम काल से व्यवहृत होता रहा है।

नि: सन्देह यह आर्य शब्द किसी जन-जाति विशेष का सूचक नहीं कभी नहीं था । 
क्योंकि असीरियन संस्कृति में में भी अार्य शब्द अाल्ल
तथा आला के रूप में प्राप्त है ।

पारसीयों के पवित्र धर्म ग्रन्थ अवेस्ता ए जैंद में अनेक स्थलों पर आर्य शब्द आया है ।
जैसे: अवेस्ता ए जैंद के व्याख्या भाग सिरोज़ह प्रथम के यश्त संख्या  (9) पर, तथा सिरोज़ह प्रथम के यश्त संख्या (25) पर है ।
अवेस्ता में आर्य शब्द का अर्थ होता है । 👇
तीव्र वाण (Arrow) चलाने वाला यौद्धा से है।
—यश्त संख्या (9 )में  स्वयं ईरान शब्द आर्यन् शब्द का तद्भव रूप है !.. 

ईरानी असुर संस्कृति के उपासक असीरियननों से सम्बन्धित लोग थे।

परन्तु भारतीय देव संस्कृति के लोग ---जो  अपने युद्ध निपुणता के कारण स्वयं को वीर: अथवा आर्य: कहते थे। आर्य शब्द केवल गुण वाचक विशेषण था ।
विदित हो कि असुर अथवा ईरानीयों के देव-संस्कृति के अनुयायी चिर सांस्कृतिक प्रतिद्वन्द्वी थे।

ये ईरानी असुर संस्कृति के उपासक आर्य थे।
देव शब्द का अर्थ भी ईरानियों की भाषाओं में निम्न व दुष्ट अर्थों में व्यवहृत है ।👇

…परन्तु अग्नि के अखण्ड उपासक आर्य तो ईरानी भी थे । 
स्वयं ऋग्वेद में असुर शब्द उच्च और पूज्य अर्थों में है :-जैसे "वृहद् श्रुभा असुरो वर्हणा कृतः" ऋग्वेद १/५४/३. तथा और भी महान देवता वरुण के रूप में 
"त्वम् राजेन्द्र ये च देवा रक्षा नृन पाहि असुर त्वं अस्मान् —ऋ० १/१/७४
तथा प्रसाक्षितः असुर यामहि –ऋ० १/१५/४.

ऋग्वेद में और भी बहुत से स्थल हैं जहाँ पर असुर शब्द सर्वोपरि शक्तिवान् ईश्वर का वाचक है | 
पारसीयों ने असुर शब्द का उच्चारण अहुर के रूप में किया है | 
अहु- प्राण (अहुर-प्राणवान)
अतः आर्य विशेषण असुर और देव दौनो ही संस्कृतियों के उपासकों का था ।
यौद्धा होने के कारण ।

आर्य अरि शब्द मूलक है ।
अरि युद्ध का अधिष्ठात्री देवता था ।
--जो विभिन्न संस्कृतियों में काल भेद तथा स्थान व जलवायु के प्रभावात्मक भेद से विभिन्न उच्चारण रूपों में व्यवहृत हुआ ।
यूनानी पुराणों में वर्णित आरीस् युद्ध का अधिष्ठात्री देवता है 👇

Ares (Esriːz); प्राचीन यूनानी:  [árɛːs]) युद्ध का ग्रीक देवता है। वह ज़ीउस और हेरा के पुत्ररूप में वर्णित है ।
बारह ओलंपिक में से एक का नाम आरीस है 
👇

पौराणिक इतिहास कार "हेसियोड" अपने ग्रन्थ थियोगोनी के पृष्ठ संख्या 921में (लोएब क्लासिकल लाइब्रेरी नंबरिंग); तथा यूनानी महाकाव्य इलियड, 5.890-896 में आरीस् का वर्णन है।
इसके विपरीत, आरिस् का रोमन समकक्ष रूव मार्स हे जो जूनो देवी से ओविद (फास्टी 5.229-260) के अनुसार पैदा हुआ था।

ग्रीक साहित्य में, आरीस् अक्सर अपनी बहन के विपरीत युद्ध के भौतिक या हिंसक और अदम्य पहलू का प्रतिनिधित्व करता है।
बख्तरबंद एथेना, जिसके कार्यों में बुद्धि की देवी के रूप में सैन्य रणनीति और जनशक्ति शामिल होती है।

 वाल्टर बर्कर्ट, ग्रीक धर्म (ब्लैकवेल, 1985, 2004 पुनर्मुद्रण, मूल रूप से जर्मन में 1977 प्रकाशित),
पीपी 141; विलियम हैनसेन, क्लासिकल मिथोलॉजी: ए गाइड टू द मिथिकल वर्ल्ड ऑफ़ द ग्रीक्स एंड रोमन्स (ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2005), पृष्ठ 113।

एरेस (Ares)
युद्ध का देवता के प्रतीक 

तलवार, भाला, ढाल, हेलमेट, रथ, ज्वलन्त मशाल, कुत्ता, सूअर, गिद्ध
व्यक्तिगत जानकारी
बातचीत करना
कामोद्दीपक और विभिन्न अन्य
बच्चे
इरोट्स (इरोस और एन्टेरोस), फोबोस, डीमोस, फेलगीस, हरमोनिया, एनियालियोस, थ्रैक्स, ओएनोमॉस, एमेज़ोन और एड्रेस्टिया
माता-पिता
ज़ीउस और हेरा

रोमन समकक्ष
मार्स

पहले ऋग्वेद में अरि: को देव वाचक रूप में देखें -🌸

आर्यों का आदि देव अरि है ।
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आर्यों के आदि उपास्य अरि:  है । 
जब देव सुर संस्कृति का आगमन स्वीडन से हुआ जिसे प्राचीन नॉर्स माइथॉलॉजी में स्वेरिगी (Sverige) कहा गया है जो उत्तरी ध्रुव प्रदेशों पर स्थित है ।

जहाँ छ मास का दिवस तथा छ मास की दीर्घ रात्रियाँ नियमित होती हैं ।

भू- मध्य रेखीय क्षेत्रों में आगमन काल में देव संस्कृति के अनुयायीयों का युद्ध कैल्ट जन जाति के पश्चात् असीरियन लोगों से सामना हुआ था ।

वस्तुत: आर्य विशेषण जर्मनिक जन-जातियाँ ने अपने वीर और यौद्धा पुरुषों के लिए रूढ़ कर लिया ।
--जो प्रारम्भ में मेसोपोटामिया की जन-जाति के देवता एल (El) या इलु का वाचक था ।

जर्मन मूल की भाषाओं में यह शब्द अरीर ( Arier)
तथा (Arisch) के रूप में एडॉल्फ हिट्लर के समय तक रूढ़ रहा ।

यही जर्मनिक जन-जाति के आर्य भारतीय आर्यों के पूर्वज हैं ।
परन्तु एडॉल्फ हिट्लर ने भारतीय आर्यों को 
वर्ण-संकर कहा था। 

जब आर्य सुमेरियन और बैबीलॉनियन तथा असीरियन संस्कृतियों के सम्पर्क में आये ।
तो इन्होंने अनेक देवताओं को अपनी देव- सूची में समायोजित किया 
जैसे विष्णु जो सुमेरियन में (बियस-नु) के रूप मे हिब्रूओं के कैन्नानाइटी देव डेगन (Dagan)
नर-मत्स्य देव  विसार:  संस्कृत भाषा में मछली का वाचक है । 

जो यूरोपीय भाषा परिवार में फिश (Fish)
के रूप में विद्यमान है ।
देव संस्कृति के उपासक जर्मनिक जन-जातियाँ से सम्बद्ध आर्यों का  युद्ध असीरियन लोगों से दीर्घ काल तक हुआ , असीरी  वर्तमान ईराक-ईरान (मैसॉपोटमिया) की संस्कृतियों के पूर्व प्रवर्तक हैं ।ये सैमेटिक थे ।
असुरों की भाषाओं में अरि: शब्द अलि अथवा इलु हो गया है ।
परन्तु इसका सर्व मान्य रूप एलॉह (elaoh) तथा एल (el) ही हो गया है ।
ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के 51 वें सूक्त का 9 वीं ऋचा में अरि: शब्द का ईश्वर के विशेषण रूप में वर्णन करता है !
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"यस्यायं विश्व आर्यो दास: शेवधिपा अरि:
तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत् सोअज्यते रयि:|९ 
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अर्थात्-- जो अरि इस  सम्पूर्ण विश्व का तथा आर्य और दास दौनों के धन का पालक अथवा रक्षक है ,
जो श्वेत पवीरु के अभिमुख होता है ,
वह धन देने वाला ईश्वर तुम्हारे साथ सुसंगत है ।
ऋग्वेद के दशम् मण्डल सूक्त( २८ )
ऋचा संख्या (१)
देखें- यहाँ भी अरि: देव अथवा ईश्वरीय सत्ता का वाचक है ।👇
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" विश्वो ह्यन्यो अरिराजगाम ,
               ममेदह श्वशुरो ना जगाम ।
जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात् 
              स्वाशित: पुनरस्तं जगायात् ।।
ऋग्वेद--१०/२८/१
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ऋषि पत्नी कहती है !  कि  सब देवता  निश्चय हमारे यज्ञ में आ गये (विश्वो ह्यन्यो अरिराजगाम,)
परन्तु मेरे श्वसुर नहीं आये इस यज्ञ में (ममेदह श्वशुरो ना जगाम )यदि वे आ जाते तो भुने हुए  जौ के साथ सोमपान करते (जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात् )और फिर अपने घर को लौटते (स्वाशित: पुनरस्तं जगायात् )
प्रस्तुत सूक्त में अरि: देव वाचक है ।

देव संस्कृति के उपासक आर्यों ने और असुर संस्कृति के उपासक आर्यों ने अर्थात् असुरों ने अरि: अथवा अलि की कल्पना युद्ध के अधिनायक के रूप में की थी।

सुमेरियन और बैबीलॉनियन तथा असीरियन संस्कृतियों के पूर्वजों के रूप में ड्रयूड (Druids )अथवा द्रविड संस्कृति से सम्बद्धता है ।
जिन्हें हिब्रू बाइबिल में द्रुज़ कैल्डीयन आदि भी कहा है 
ये असीरियन लोगों से ही सम्बद्ध हैं।
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हजरत इब्राहीम अलैहि सलाम को मानने वाली 
धार्मिक परम्पराओं में मान्यता है ,कि
कुरान से पहले भी अल्लाह की तीन और किताबें थीं , जिनके नाम तौरेत , जबूर और इञ्जील हैं ।

, इस्लामी मान्यता के अनुसार अल्लाह ने जैसे मुहम्मद साहब पर कुरान नाज़िल की थी ,उसी तरह हजरत मूसा को तौरेत , दाऊद को जबूर और ईसा को इञ्जील नाज़िल की थी 
. यहूदी सिर्फ तौरेत और जबूर को और ईसाई इन तीनों में आस्था रखते हैं ,क्योंकि स्वयं कुरान में कहा है ,
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1-कुरान और तौरेत का अल्लाह एक है:
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"कहो हम ईमान लाये उस चीज पर जो ,जो हम पर भी उतारी गयी है , और तुम पर भी उतारी गयी है , 
और हमारा इलाह और तुम्हारा इलाह एक ही है ।
हम उसी के मुस्लिम हैं " (सूरा -अल अनकबूत 29:46) 
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"We believe in that which has been revealed to us and revealed to you. And our God and your God is one; and we are Muslims [in submission] to Him."(Sura -al ankabut 29;46 )"وَإِلَـٰهُنَا وَإِلَـٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ " 
इलाहुना व् इलाहकुम वाहिद , व् नहनु लहु मुस्लिमून "
यही नहीं कुरान के अलावा अल्लाह की किताबों में तौरेत इसलिए महत्वपूर्ण है 

अब और देखें--- आर्य शब्द के विषय में 
उधर यूरोप में द्वित्तीय महा -युद्ध का महानायक ऐडोल्फ हिटलर( Adolf-Hitler )स्वयं को शुद्ध नारादिक (nordic )आर्य कहता था।

और स्वास्तिक का चिन्ह अपनी युद्ध ध्वजा पर अंकित करता था ; विदित हो कि जर्मन भाषा में स्वास्तिक को हैकैन- क्रूज. (Haken- cruez) कहते थे !

…जर्मन वर्ग की भाषाओं में आर्य शब्द के बहुत से रूप हैं । ऐरे (Ehere) जो कि जर्मन लोगों की एक सम्माननीय उपाधि है। 

..जर्मन भाषाओं में ऐह्रे (Ahere) तथा (Herr) शब्द स्वामी अथवा उच्च व्यक्तिों के वाचक थे ।
आयर लेण्ड की भाषा में आयर (ire )शब्द का अर्थ स्वतन्त्र (आवारा) भी है । 

तमिल शब्द अय्यर और संस्कृत शब्द आभीर शब्दों स्वातन्त्र्तय वीरत्व व घुमक्कड़ता का भाव निहित है ।
और इसी हर्र (Herr) शब्द से यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित सर (Sir )
…..शब्द का विकास हुआ ।
---जो पुल्लिंग में मैडम (madam) शब्द के समानान्तर प्रयुक्त होता है ।
और आरिश (Arisch) शब्द तथा आरिर् (Arier) स्वीडिश ,डच आदि जर्मन भाषाओं में श्रेष्ठ और वीरों का विशेषण है । 
इधर एशिया माइनर के पार्श्व वर्ती यूरोप के प्रवेश -द्वार ग्रीक अथवा आयोनियन भाषाओं में भी आर्य शब्द आर्च (Arch) तथा आर्क (Arck) तथा (Eirean) के रूप मे है | 
हिब्रू बाइबिल में अबीर (Abeer) शब्द वीर अथवा यौद्धा अथवा सामन्त का वाचक है।
जिसका सम्बन्ध हिब्रू क्रिया अ- बिर ( ए-बिर ) से है ।  संस्कृत भाषा आगात अभीर शब्द का विकास भी वीर का हिब्रू करण है 
क्योंकि ए (e) उपसर्ग (Prifix) का सेमेटिक भाषाओं स्वत: आगम है।
जैसे संस्कृत भाषा का ब्रह्मा हिब्रू ए-ब्राह्म संस्कृत बल: हिब्रू ए-विल संस्कृत लघु  ग्रीक ए-लखुस आदि रूप ..
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ग्रीक मूल का शब्द हीरों (Hero) भी वेरोस् अथवा वीरः शब्द का ही विकसित रूप है l
और वीरः शब्द स्वयं आर्य शब्द का प्रतिरूप है ।
वीर शब्द का विकास पहले हुआ फिर उसी से आर्य शब्द का विकास
जर्मन वर्ग की भाषा ऐंग्लो -सेक्शन में वीर शब्द वर( Wer) के रूप में है ।
तथा रोम की सांस्कृतिक भाषा लैटिन में यह वीर शब्द (Vir) के रूप में है ।

आर्य शब्द का अपेक्षा वीर शब्द प्राचीनत्तम है ।
ईरानी आर्यों की संस्कृति में भी वीर शब्द आर्य शब्द का विशेषण है यूरोपीय भाषाओं में भी आर्य और वीर शब्द समानार्थक रहे हैं ।

हम यह स्पष्ट करदे कि आर्य शब्द किन किन संस्कृतियों में प्रचीन काल से आज तक विद्यमान है | 

लैटिन वर्ग की भाषा आधुनिक फ्रान्च में…(Arien) तथा (Aryen )दौनों रूपों में …इधर दक्षिणी अमेरिक की ओर पुर्तगाली तथा स्पेन भाषाओं में यह शब्द आरियो (Ario) के रूप में है पुर्तगाली में इसका एक रूप ऐरिऐनॉ (Ariano) भी है और फिन्नो-उग्रियन शाखा की फिनिश भाषा में (Arialainen) ऐरियल-ऐनन के रूप में है ।
रूस की उप शाखा पॉलिस भाषा में (Aryika) के रूप में है।
कैटालन भाषा में (Ari )तथा (Arica) दौनो रूपों में है स्वयं रूसी भाषा में आरिजक (Arijec) अथवा आर्यक के रूप में है इधर पश्चिमीय एशिया की सेमेटिक शाखा आरमेनियन तथा हिब्रू और अरबी भाषा में क्रमशः (Ariacoi )तथा(Ari )तथा हिब्रू और अरबी भाषा में क्रमशः (Ariacoi )तथा(Ari )तथा अरबी भाषा मे हिब्रू प्रभाव से म-अारि. M(ariyy तथा अरि दौनो रूपों में.. तथा ताज़िक भाषा में ऑरियॉयी (Oriyoyi ) रूप. …इधर बॉल्गा नदी के मुहाने वुल्गारियन संस्कृति में आर्य शब्द ऐराइस् (Arice) के रूप में है ।

वेलारूस की भाषा में (Aryeic )तथा (Aryika) दौनों रूप में..पूरबी एशिया की जापानी कॉरीयन और चीनी भाषाओं में बौद्ध धर्म के प्रभाव से आर्य शब्द (Aria–iin)के रूप में है ।
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अनुभावास्तु तत्र स्युः सहायान्वेषणादयः । 
सञ्चारिणस्तु धृतिमतिगर्वस्मृतितर्करोमञ्चाः ।

स च दानधर्मयुद्धैर्दयथा च 
समन्वितश्चतुर्द्धा स्यात् स च वीरः । 

दानवीरो धर्म- वीरा दयावीरो 
भुद्धवीरश्चेति चतुर्विधः” साहित्य दर्पण ३ पृ० ।

मूल भारोपीय शब्द (wihros) विहिरॉस: -  जिसके दो रूप विकसित हुए हिरॉस् तथा विर संस्कृत: - वीरा, अवेस्तान: - वीरा, लैटिन: - vir,
Umbrian: - viru, लिथुआनियाई: - वेरस, लातवियाई: - वीर, टोचिरियन: - wir, जर्मन: - wer / Werwolf, गॉथिक: - वायर, पुराना नॉर्स: -वर, अंग्रेजी: -वेर / वेयरवोल्फ, ओल्ड फ्रुशियन: -विर  आयरिश: - fer / fear, वेल्श: -ग्राऊर, गोलियाँ: -इइरो-, अल्बेनियाई: - बुरे, कुर्द: -मिरो...
वीरम्, क्ली, (अज् + “स्फायितञ्चिवञ्चीति ।
उणा० १ । १३ । इत्यादिना रक् । 
अजे- र्वीभावः । वीर + अच् वा ) 
श्रृँङ्गी । नडः । इति मेदिनी । रे, ६७ ॥ मरिचम् । पुष्कर- मूलम् । काञ्जिकम् । उशीरम् । आरूकम् । इति राजनिर्घण्टः ॥ वीरशब्दो मेदिन्यां पव- र्गीयवकारादौ दृष्टोऽपि वीरधातोरन्तःस्थवका- रादौ दर्शनादत्र लिखितः ॥

वीरः, पुं, (वीरयतीति । 
वीर विक्रान्तौ + पचा- द्यच् । यौद्वा, विशेषेण ईरयति दूरीकरोति शत्रून् ।
वि + ईर + इगुपधात् कः । 
यद्वा, अजति क्षिपति शत्रून् । 
अज + स्फायितञ्चीत्यादिना रक् । 
अजेर्व्वीः  शौर्य्यविशिष्टः । तत्पर्य्यायः । शूरः २ विक्रान्तः ३ । इत्यमरः  कोश । २ । ८ । ७७ ॥
गण्डीरः ४ तरस्वी ५ । इति जटाधरः ॥ (यथा, महाभारते । १ । १४१ । ४५ । “मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः ।
निर्ज्जिता यत्त्वया वीरास्तस्माद्वीरतरो भवान् ॥
” यथा च ऋग्वेदे । १ । ११४ । ८ । 
“वीरान्मानो रुद्रभामितो वधीर्हविष्यन्तः सद्मि त्वा हवामहे ॥
” “वीरान् वीक्रान्तान् ।” इति सायणः ॥ पुत्त्रः । यथा, ऋग्वेदे । ५ । २० । ४ । “वीरैः स्याम सधमादः ॥” “वीरैः पुत्त्रैश्च सधमादः सहमाद्यन्तः स्याम तथा कुरु ।” इति तद्भाष्ये सायणः ॥ 

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परन्तु सुमेरियन हुर्रीयन (हुर्री) शब्द का विकास अवेस्ता में लिखित (हुर) शब्द से है जो संस्कृत (सुर) शब्द का प्रतिरूप है।

अरब़ी मूल में आज़र भी इसी से सम्बन्धित है 
यद्यपि ये भी देव संस्कृति से सम्बद्ध थे ।
….. आर्य शब्द के विषय में इतने तथ्य अब तक हमने दूसरी संस्कृतियों से उद्धृत किए हैं।
…. परन्तु जिस भारतीय संस्कृति का प्रादुर्भाव देव संस्कृति से हुआ l
आधुनिक इतिहास कारों ने आर्य शब्द जन-जाति विशेष के अर्थ मे रूढ़ कर दिया है ।
_________________________________________ उस के विषय में हम कुछ कहते हैं ।
विदित हो कि यह समग्र तथ्य" 📖" "यादव योगेश- कुमार 'रोहि' " के शोधों पर आधारित हैं ।

भारोपीय आर्यों के सभी सांस्कृतिक शब्द समान ही हैं । 
जैसा कि निम्न तथ्यों में दिग्दर्शन किया गया है। स्वयं आर्य शब्द का धात्विक-अर्थ :- Rootnal-Mean .."आरम् धारण करने वाला वीर । 
संस्कृत तथा यूरोपीय भाषाओं में आरम् Arrown =अस्त्र तथा शस्त्र धारण करने वाला यौद्धा अथवा वीरः आर्य शब्द की व्युत्पत्ति (Etymology) संस्कृत की अर् (ऋृ) धातु मूलक है—अर् धातु के तीन प्राचीनत्तम हैं .. १–गमन करना To go २– मारना to kill ३– हल (अरम्) चलाना (Harrow) मध्य इंग्लिश—रूप Harwe कृषि कार्य करना |
प्राचीन विश्व में सुसंगठित रूप से कृषि कार्य करने वाले प्रथम मानव आर्य ही थे।
इस तथ्य के प्रबल प्रमाण भी हमारे पास हैं ! पाणिनि तथा इनसे भी पूर्व ..कात्स्न्र्यम् धातु पाठ में :-ऋृ (अर्) धातु कृषिकर्मे गतौ हिंसायाम् च..परस्मैपदीय रूप :-ऋणोति अरोति वा अन्यत्र ऋृ गतौ धातु पाठ .३/१६ प० इयर्ति -जाता है l
वास्तव में संस्कृत की अर् धातु का तादात्म्य (identity.) यूरोप की सांस्कृतिक भाषा लैटिन की क्रिया -रूप इर्रेयर Errare =to go से प्रस्तावित है जर्मन भाषा में यह शब्द आइरे irre =togo के रूप में है पुरानी अंग्रेजी में जिसका प्रचलित रूप एर Err है। इसी अर् धातु से विकसित शब्द लैटिन तथा ग्रीक भाषाओं में क्रमशः Araval तथा Aravalis हैं ;

अर्थात् कृषि कार्य.सम्बन्धी देवों की संस्कृति ग्रामीण जीवन मूलक है और कृषि विद्या के  जनक देव संस्कृति के आर्य ही थे 

…सर्व-प्रथम अपने द्वित्तीय पढ़ाव में मध्य -एशिया में ही कृषि कार्य आरम्भ कर दिया था । 

आर्य स्वभाव से ही युद्ध-प्रिय व घुमक्कड़ थे कुशल चरावाहों के रूप में यूरोप तथा सम्पूर्ण एशिया की धरा पर अपनी महान सम्पत्ति गौओं के साथ कबीलों के रूप में यायावर जीवन व्यतीत करते थे 

यहीं से इनकी ग्राम - सभ्यता का विकास हुआ था । अपनी गौओं के साथ साथ विचरण करते हुए जहाँ जहाँ भी ये विशाल ग्रास-मेदिनी (घास के मैदान) देखते और उसी स्थान पर अपना पढ़ाव डाल देते थे । 

संस्कृत तथा यूरोप की सभी भाषाओं में ग्राम शब्द का मूल अर्थ ग्रास-भूमि तथा घास है । __________________________________

जहोवा ,गॉड , ख़ुदा और अल्लाह आदि ईश्वर वाची शब्दों की व्युत्पत्ति वैदिक आर्यों से सम्बद्ध.
विचार विश्लेषण :--यादव योगेश कुमार 'रोहि'

स्पर्धायाम्, शब्दे च ( ह्वयति ह्वयते जुहाव जुहुवतुः जुहुविथ जुहोथ ) 
_____________________________________
यह्व / YHVH / yod-he-vau-he / יהוה,
--
We find, the above word is perhaps used first time in Rigveda Madala 10, 036/01. 
संस्कृत यह्वः (पुं.) / यह्वी (स्त्री.)
ऋग्वेद 1/036/01
प्र वो यह्वं पुरूणां विशां देवयतीनाम् ।
We find, the above word is perhaps used last time in the  Rigveda Madala 10, 110/03. 
ऋग्वेद 10/110/03
त्वं देवानामसि यह्व होता ...
--
The last mention of  यह्व / YHVH /yod-he-vau-he is used as an address to Lord Indra, though Rigveda Mandala 1.164.46 clearly explains all these  devatA are different names and forms of the same Lord (Ishvara)

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् 
एकं सद्विप्रा बहुधा  वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः 
ऋग्वेद 10/110/03

Accordingly the above mantra in veda categorically defines 'Who' is 'यह्वः (पुं.)' / YHVH / yod-he-vau-he / יהוה,
I strongly feel this the conclusivevidence that puts to rest all further doubt and discussion, / speculation about 'God'.
(त्वं देवानामसि यह्व होता )... अर्थात् तुम देवों में यह्व (YHVH) को बुलाने वाले हो !

The last mention of  यह्व / YHVH /yod-he-vau-he is used as an address to Lord Indra, though Rigveda Mandala 1.164.46 clearly explains all these  devatA are different names and forms of the same Lord (Ishvara)

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् 

एकं सद्विप्रा बहुधा  वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः 
ऋग्वेद 10/110/03
Accordingly the above mantra in veda categorically defines 'Who' is 'यह्वः (पुं.)' / YHVH / yod-he-vau-he / יהוה,
I strongly feel this the conclusivevidence that puts to rest all further doubt and discussion, / speculation about 'God'.
(त्वं देवानामसि यह्व होता )... अर्थात् तुम देवों में यह्व (YHVH) को बुलाने वाले हो !
...
in Sanskrit clearly means that 'यह्वः' is either the priest to 'devata,s' or the one who Himself performed vedika sacrifice especially in Agni / Fire for them.
There are at least more than 30 places in entire Rigveda, where  'यह्वः' finds a mention.
And the first time we find यह्वीः / 'yahwI:' in Rigveda is here -
ऋग्वेद
(1.59.04)
अर्थात् यह्व YHVH शब्द अग्नि का भी वाचक है -
क्योंकि जलती हुई झाड़ियों से मूसा अलैहि सलाम को धर्म के दश आदेश यहोवा से प्राप्त हुए -

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बृहती इव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो3 न दक्षः 
स्वर्वते सत्यशुष्माय पूर्वीवैश्वानराय नृतमाय यह्वीः ॥
Obviously, this  'यह्वीः' is in accusative plural case of  'यह्वी' feminine.
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यहोवा वस्तुतः फलस्तीन (इज़राएल)के यहूदीयों का ही सबसे प्रधान व राष्ट्रीय देवता था ।
तथा यहुदह् शब्द का नाम करण यहोवा के आधार पर हुआ ।
यहुदह् शब्द का तादात्म्य वैदिक यदु: से पूर्ण रूपेण प्रस्तावित है ।
परन्तु कालान्तरण में बहुत सी काल्पनिक कथाओं का समायोजन यदु: अथवा यहुदह् के साथ कर दिया गया ।
अतः दो भिन्न व्यक्तित्वों के रूप में यह भासित हुए !
यदु शब्द यज् धातु से उण् प्रत्यय करने पर निर्मित है ।
     यदु: ययातिनृपतेः १ ज्येष्ठपुत्रे यस्य वंशे श्रीकृष्णवतारः , तस्य गोत्रापत्यमण् बहुषु तस्य लुक्  २-यदुवंश्ये ३- दर्शार्हदेशे आभीर देशे च व० व० हेमचन्द्र कोश ।
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यहोवा शब्द के विषय में हिब्रू बाइबिल में उल्लेख है ।
यहोवा (en:Yahweh) यहूदी धर्म में और इब्रानी भाषा में परमेश्वर का नाम है। यहूदी मानते हैं कि सबसे पहले ये नाम परमेश्वर ने हज़रत मूसा को सुनाया था। ये शब्द ईसाईयों और यहूदियों के धर्मग्रन्थ बाइबिल के पुराने नियम में कई बार आता है।
उच्चारण:--------
स्मरण रखें :--कि यहूदियों की धर्मभाषा इब्रानी (हिब्रू) की लिपि इब्रानी लिपि में केवल व्यञ्जन लिखे जा सकते हैं ,और ह्रस्व स्वर तो बिलकुल ही नहीं।
अतः यह शब्द चार व्यञ्जनों से बना हुआ है : י 
(योद) ה   (हे) ו   (वाओ) ה   (हे), या יהוה 
अर्थात्  :---   (य-ह-व-ह ) 
इसमें लोग विभिन्न स्वर प्रवेश कराकर इसे विभिन्न उच्चारण देते हैं, जैसे यहोवा, याह्वेह, याह्वेः, जेहोवा, आदि (क्योंकि प्राचीन इब्रानी भाषा लुप्त हो चुकी है)। यहूदि लोग बेकार में ईश्वर (यहोवा) का नाम लेना पाप मानते थे, इसलिये इस शब्द को कम ही बोला जाता था। ज़्यादा मशहूर शब्द था "अदोनाइ" (अर्थात मेरे प्रभु)। 
बाइबिल के पुराने नियम / इब्रानी शास्त्रों में "एल" और "एलोहीम" शब्द भी परमेश्वर के लिये प्रयुक्त हुए हैं, पर हैरत की बात ये है कि यहूदी कहते हैं कि वो एक हि ईश्वर को मानते हैं, पर "एलोहीम" शब्द बहुवचन है ! यहोवा ही अल्लाह है।

यहशाहा ४५:१८, में परमेश्वर का सही अर्थ समझाता है।
अर्थ:-------
यहूदी और ईसाई मानते हैं ,कि यहोवा का शब्दिक अर्थ होता है : "मैं हूँ जो मैं हूँ" -- अर्थात स्वयंभू परमेश्वर। जब बाइबल लिखी गयी थी, तब यहोवा यह नाम ७००० बार था। - निर्गमन ३:१५, भजन ८३:१८ 
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प्रस्तुति-करण यादव योगेश कुमार 'रोहि'

'हरि का भजन कर मत चल तनकर ...

हरिहरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...
 'हरि बोल 'हरि बोल .....

ओ--- रे मुसाफिर तेरा बड़ी दूर घर ..
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

_____________________________

जब तक है पास कुछ भी तेरे पैसा ---
पराये भी पूछ लेंगे हाल है कैसा ...

लव, तलब ,मतलब , जगत की हलचल
दुनियाँ की दस्तूर है ये हमेशा ...

हालातें सब सिखाती ---इनसे सीख ये लो ।
दुनियाँ  एक भिखारी  ---इससे भीख न लो --
खुद  ही यतन कर   , काबू मन पर 
मन की ही है सारी असर ।

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

ओ--- रे मुसाफिर तेरा बड़ी दूर घर ..

'न दीन है मुहाफिज ,जुल्म काबिज ।
हालत जहालत की , कौन पाक़िज ।।
बेफर्ज हैं यहांँ वारिस,  हकों हुकूमत ...
शख्सियत हैं हालातें की नाफ़िज ।

एहशासों का मरक़ज ----ज्ञान का बीज है ।
सरहद नहीं है जिसकी ----ज्ञान वो चीज़ है ।

तन्हा मनन कर , फिर उस को तनकर ।
पहन उशूलों की चादर ---

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

अलापों में आह , ग़म की सरग़म  ।
सोज़ों के साज पर  --सुनते  हम ..
बेखुदी में खोए   होके बेदम ।
डूबी कश्तीयाँ जहाँ पानी कम ।
खयालों का झोका --- रज़ा की रवानी है ये ।
सपनों के जैसी ----- बस जिन्द़गानी है ये ।
रुशवाई के दर  , मायूसी आकर ।
खबरा- हटों का कहर !

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...


ओ--- रे मुसाफिर तेरा बड़ी दूर घर ..

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...
 का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...




हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...
 'हरि बोल 'हरि बोल .....

ओ--- रे मुसाफिर तेरा बड़ी दूर घर ..
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

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जब तक है पास कुछ भी तेरे पैसा ---
पराये भी पूछ लेंगे हाल है कैसा ...

लव, तलब ,मतलब , जगत की हलचल
दुनियाँ की दस्तूर है ये हमेशा ...

हालातें सब सिखाती ---इनसे सीख ये लो ।
दुनियाँ  एक भिखारी  ---इससे भीख न लो --
खुद  ही यतन कर   , काबू मन पर 
मन की ही है सारी असर ।

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

ओ--- रे मुसाफिर तेरा बड़ी दूर घर ..

'न दीन है मुहाफिज ,जुल्म काबिज ।
हालत जहालत की , कौन पाक़िज ।।
बेफर्ज हैं यहांँ वारिस,  हकों हुकूमत ...
शख्सियत हैं हालातें की नाफ़िज ।

एहशासों का मरक़ज ----ज्ञान का बीज है ।
सरहद नहीं है जिसकी ----ज्ञान वो चीज़ है ।

तन्हा मनन कर , फिर उस को तनकर ।
पहन उशूलों की चादर ---

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

अलापों में आह , ग़म की सरग़म  ।
सोज़ों के साज पर  --सुनते  हम ..
बेखुदी में खोए   होके बेदम ।
डूबी कश्तीयाँ जहाँ पानी कम ।
खयालों का झोका --- रज़ा की रवानी है ये ।
सपनों के जैसी ----- बस जिन्द़गानी है ये ।
रुशवाई के दर  , मायूसी आकर ।
खबरा- हटों का कहर !

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...


ओ--- रे मुसाफिर तेरा बड़ी दूर घर ..

हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
हरि का भजन कर , मत चल तनकर ।
जीवन का है लम्बा सफर ...

सोमवार, 1 जून 2020

उपाध्याय से औझा और झा तक का सफर ...

उपाध्याय -------औझा --------और अन्तिम रूप झा 

ये उपाध्याय वेद वेदांग को  शुल्क लेकर पढ़ानेवाला अध्यापक  और ब्राह्मणों का एक भेद था कभी 'परन्तु
कालान्तरण इनकी श्रृद्धा में मनन का अथवा  ज्ञान का अभाव हो गया देवों को भूत-प्रेत आदि के रूप में  झाड़ने वाले व्यक्ति, सयाने ये बन गये और तन्त्र मन्त्र के रूप में यौनाचार का विधान भी बनाये ताकि वासना तृप्ति हो
 
 ब्राह्मणों की एक जाति  उपाध्याय, है जो प्राकृत अपभ्रंश भाषा में  क्रमश उवज्झाओ, उवज्झाअ, ओज्झाय] रूप में विकसित हुआ।
 ये पूर्वाँचल में सरजूपारी,( सरयूपारीण) मैथिल और गुजराती ब्राह्मणों की एक जाति को समेत्य करता है 
औझा भूत प्रेत झाड़नेवाले । 
सयाने को कहते हैं 
ये लोग हद से ज्यादा अन्धभक्त और अय्याश भी होते हैं 

 भए जीउँ बिनु तनाउत ओझा । 
विष भइ पूरि, काल भए गोझा ।— जायसी ग्रन्थावली