गुरुवार, 6 अगस्त 2026

ओ३म् का विधान -

शुरुआत - मधुर पृष्ठभूमि संगीत के साथ]
​वक्ता:
ओ३म। आध्यात्मिक चेतना के उद्घोषक और स्वानुभूत सत्य के संवाहक यादव योगेश कुमार रोहि जी के अंतस से प्रस्फुटित विचार केवल शब्द नहीं, अपितु आत्मा के धरातल पर कसी गई कसौटियां हैं। साधना, कर्म और जीवन के अंतर्द्वंद्व को स्पष्ट करती उनकी यह विचार-शृंखला मानव मात्र के कल्याण के लिए एक अनुपम उपदेश है।
​आइए, महर्षि पाणिनि के व्याकरण और माहेश्वर सूत्रों पर आधारित उनके इस गहन वैचारिक सिद्धांत—"माहेश्वर सूत्र और वर्ण-विज्ञान की थ्योरी" को श्रवण करते हैं।
​अध्याय १: प्रस्तावना और माहेश्वर सूत्र
​व्याकरण के महद् ग्रन्थ ‘अष्टाध्यायी’ में महर्षि पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के विशाल कलेवर का सम्यक व सम्पूर्ण विवेचन लगभग चार हजार सूत्रों में लिपिबद्ध किया है। यद्यपि यह पाणिनि द्वारा भाषा का उत्पत्ति-मूलक विश्लेषण नहीं है, तथापि इन सूत्रों में संशोधन की गुंजाइश बनी रहती है।
​कदाचित् सन्धि-विधान के निमित्त ही पाणिनि मुनि ने माहेश्वर सूत्रों की संरचना की है। यदि ये सूत्र शिव से प्राप्त होते, तो इनमें चार सन्धि-स्वर (ए, ऐ, ओ, औ) का समावेश नहीं होता तथा अन्त:स्थ वर्ण (य, व, र, ल) भी नहीं होते, क्योंकि ये सभी सन्धि-संक्रमण से व्युत्पन्न स्वर हैं।
​अध्याय २: माहेश्वर सूत्रों की संरचना और क्रम
​पाणिनि के माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या चौदह (१४) है, जिनका उच्चारण इस प्रकार है:
​१. अइउण् । २. ॠॡक् । ३. एओङ् । ४. ऐऔच् । ५. हयवरट् । ६. लण् । ७. ञमङणनम् । ८. झभञ् । ९. घढधष् । १०. जबगडदश् । ११. खफछठथचटतव् । १२. कपय् । १३. शषसर् । १४. हल्।
​इन चौदह सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों को एक विशिष्ट क्रम से समायोजित किया गया है:
​प्रथम दो सूत्रों में: मूल स्वर
​परवर्ती दो सूत्रों में: सन्धि-स्वर
​तत्पश्चात: अन्तःस्थ (वस्तुतः अर्धस्वर) एवं अनुनासिक वर्ण।
​जब भी पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या नियमों में विशेष वर्ण-समूहों के प्रयोग की आवश्यकता होती है, वे इन वर्णों को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर संक्षेप में ग्रहण करते हैं।
​अध्याय ३: स्वर और व्यंजन का मौलिक अन्तर
​दूरस्थ श्रवणीयता: स्वर में दूरस्थ श्रवणीयता व्यंजन की अपेक्षा अधिक होती है; स्वर दूर तक सुनाई देता है।
​नाद प्रवाहिता: स्वर में नाद-प्रवाहिता अधिक होती है।
​घर्षण और स्पर्श: स्वरों के उच्चारण में अंगों का परस्पर स्पर्श और घर्षण नहीं होता है। इसके विपरीत, व्यंजनों के उच्चारण में अंतोमुखीय अंगों में न्यूनाधिक घर्षण होता है, जिसके आधार पर उन्हें अल्पप्राण और महाप्राण कहा जाता है।
​स्वर की परिभाषा: स्वर वे हैं जिनके उच्चारण काल में श्वास मार्ग में कोई अवरोध न हो और ध्वनि मुख के अन्दर किसी भाग में न ठहरकर सरलता से बाहर निकल जाए।
व्यंजन की परिभाषा: व्यंजन वे ध्वनियां हैं जिनके उच्चारण काल में श्वास और नादयुक्त ध्वनियां अंतोमुखीय उच्चारण अवयवों को स्पर्श करते हुए रुक-रुक कर बाहर निकलती हैं।
​अध्याय ४: प्रत्याहार की अवधारणा
​माहेश्वर सूत्रों को ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहा जाता है—“प्रत्याह्रियन्ते संक्षिप्य गृह्यन्ते वर्णां अनेन”।
​अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के ७१वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन सहेता’ द्वारा पाणिनि ने प्रत्याहार बनाने की विधि का निर्देश किया है—आदि वर्ण, अंतिम इत् वर्ण के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है।
​उदाहरण:
​अच् = अ इ उ ऋ ॡ ए ऐ ओ औ।
​हल् = हयवरट् के ‘ह’ से लेकर चतुर्दश सूत्र हल् के ‘ल्’ तक के वर्ण।
​अध्याय ५: ध्वनियों का विकास और मूल स्वर
​अ, इ, उ, ऋ, ॡ मूल स्वर हैं। इनमें ए, ओ, ऐ, औ संध्याक्षर होने से मौलिक नहीं हैं (यथा: अ + इ = ए, अ + उ = ओ)। अतः मूल स्वर वस्तुतः तीन ही माने जा सकते हैं—अ, इ, उ।
​मूल स्वर अ (ह्रस्व) से ही इ और उ का विकास हुआ है।
​उ स्वर ‘अ’ का उदात्तगुणी (ऊर्ध्वगामी) रूप है, तथा इ स्वर अनुदात्तगुणी (निम्नगामी) रूप है।
​‘ह’ वर्ण का विकास भी इसी ह्रस्व ‘अ’ से महाप्राण के रूप में हुआ है, जिसका उच्चारण स्थान काकल है।
​अध्याय ६: वर्णों का वर्गीकरण एवं पाणिनि शिक्षा
​पाणिनी शिक्षा के अनुसार, मूल स्वर पाँच हैं, जिनके उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा अनुनासिक-निरानुनासिक भेदों से कुल योग २५ होता है। स्पर्श व्यंजन २५ (कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग) और स्फुट वर्ण १३ होते हैं।
​अध्याय ७: अन्तःस्थ, ऊष्म वर्ण और जलवायुगत प्रभाव
​स्वर और व्यंजनों के मध्य में स्थित होने के कारण य, व, र, ल को ‘अन्तःस्थ’ कहा जाता है:
​इ + अ = य (विपरीत: अ + इ = ए)
​उ + अ = व (विपरीत: अ + उ = ओ)
​ऊष्म वर्ण (श, ष, स):
यूरोपीय जलवायु (शीत प्रधान) के प्रभाव के कारण वहां जिह्वा का रक्त-संचरण मन्द रहता है, जबकि तवर्ग की उच्चारण तासीर समशीतोष्ण वायुमंडलीय है जो भारतीय जलवायु का गुण है। यही कारण है कि अंग्रेजी जैसी यूरोपीय भाषाओं में तवर्ग तथा स वर्णों की उच्चारण प्रकृति में भिन्नता पाई जाती है।
​[समाप्ति - शांत एवं प्रेरणादायी संगीत के साथ]
​वक्ता:
यादव योगेश कुमार रोहि जी के इन अमोघ विचारों ने संस्कृत व्याकरण के शाश्वत सत्यों को एक नई वैचारिक ऊँचाई प्रदान की है। यह थ्योरी भाषा विज्ञान और साधना का अद्भुत संगम है।
​ओ३म। तत्सत्।
_______     
​[दृश्य 2: मूल स्वरों का वास्तविक स्वरूप]
​दृश्य (Visual): स्क्रीन पर बड़े अक्षरों में 'अ', 'इ', 'उ' दिखाई देते हैं, और फिर एक एनीमेशन के जरिए दिखाया जाता है कि कैसे 'अ + इ = ए' और 'अ + उ = ओ' बनते हैं। इसके बाद 'ए', 'ओ', 'ऐ', 'औ' को 'संध्याक्षर' के रूप में अलग दर्शाया जाता है।
​वाचक (Voiceover): "व्याकरण में हम कई स्वर पढ़ते हैं, लेकिन क्या वे सभी मौलिक हैं? ज़रा गौर कीजिए— 'ए', 'ओ', 'ऐ' और 'औ' संध्याक्षर यानी दो स्वरों के मेल से बनते हैं। जैसे 'अ' और 'इ' मिलकर 'ए' बनाते हैं, और 'अ' और 'उ' मिलकर 'ओ' बनाते हैं। यही कारण है कि मौलिक रूप से मूल स्वर वस्तुतः केवल तीन ही हैं— अ, इ और उ।"
​[दृश्य 3: 'अ' से 'इ', 'उ' और 'ह' का विकास]
​दृश्य (Visual): स्क्रीन पर एक केंद्रीय 'अ' (ह्रस्व) अक्षर से दो दिशाओं में तीर का निशान जाता है—ऊपर की ओर 'उ' (ऊर्ध्वगामी) और नीचे की ओर 'इ' (निम्नगामी)। इसके बाद 'अ' से ही 'ह' वर्ण (काकल से निकलने वाली महाप्राण ध्वनि) का उद्भव दिखाया जाता है।
​वाचक (Voiceover): "इन सबकी जड़ में है केवल ह्रस्व 'अ'! इसी से बाक़ी स्वरों का विकास हुआ है। ऊर्जा के स्तर पर, 'उ' स्वर 'अ' का ऊर्ध्वगामी यानी उदात्तगुणी रूप है, और 'इ' स्वर इसका निम्नगामी यानी अनुदात्तगुणी रूप है। इतना ही नहीं, हमारी भाषा का 'ह' वर्ण भी इसी ह्रस्व 'अ' से एक महाप्राण ध्वनि के रूप में विकसित हुआ है, जिसका उच्चारण स्थान हमारा काकल यानी Glottis है।"
​[दृश्य 4: पाणिनि शिक्षा और वर्णों का वर्गीकरण]
​दृश्य (Visual): स्क्रीन पर पाणिनि शिक्षा के समीकरण दिखाई देते हैं—5 मूल स्वर × 5 भेद (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, अनुनासिक, निरानुनासिक) = 25 कुल योग। साथ ही स्पर्श व्यंजनों (25) और स्फुट वर्णों (13) का चार्ट उभरता है।
​वाचक (Voiceover): "पाणिनि शिक्षा के अनुसार, मूल स्वर पाँच हैं, जिनके उदात्त, अनुदात्त, स्वरित और अनुनासिक-निरानुनासिक भेदों से कुल योग 25 हो जाता है। इसके अलावा, 25 स्पर्श व्यंजन और 13 स्फुट वर्ण मिलकर इस पूरी वर्णमाला को एक संपूर्ण ढांचा प्रदान करते हैं।"
​[दृश्य 5: अन्तःस्थ, ऊष्म वर्ण और जलवायु का प्रभाव]
​दृश्य (Visual): स्क्रीन पर य, व, र, ल वर्ण आते हैं, और इसके साथ ही भारत और यूरोप के जलवायु व भौगोलिक वातावरण को दर्शाते हुए ग्राफिक्स चलते हैं।
​वाचक (Voiceover): "अब बात करते हैं 'अन्तःस्थ' वर्णों— य, व, र, ल की, जो स्वर और व्यंजनों के मध्य स्थित हैं। जैसे— इ + अ = य और उ + अ = व। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ऊष्म वर्णों (श, ष, स) और भाषा पर जलवायु का गहरा असर पड़ता है! यूरोपीय जलवायु शीत-प्रधान होने के कारण वहाँ जिह्वा का रक्त-संचरण मन्द रहता है, जबकि 'तवर्ग' की उच्चारण तासीर समशीतोष्ण है जो भारतीय जलवायु का गुण है। यही कारण है कि यूरोपीय भाषाओं और भारतीय भाषाओं के उच्चारण में भिन्नता पाई जाती है।"
​[दृश्य 6: उपसंहार / निष्कर्ष]
​दृश्य (Visual): स्क्रीन पर शांत एवं प्रेरणादायी संगीत के बीच सुंदर सुलेख (Calligraphy) में 'ध्वनि ही ब्रह्म है' जैसा संदेश उभरता है, और वाचक का चेहरा या एक शांत प्राकृतिक दृश्य दिखाई देता है।
​वक्ता (स्क्रीन पर या वॉइसओवर): "यादव योगेश कुमार रोहि जी के इन अमोघ विचारों ने संस्कृत व्याकरण के शाश्वत सत्यों को एक नई वैचारिक ऊँचाई प्रदान की है। यह थ्योरी केवल व्याकरण नहीं, बल्कि भाषा विज्ञान और साधना का एक अद्भुत संगम है।"


व्युत्पत्ति-भावयुक्त संस्कृत छन्द (हिन्दी अनुवाद सहित)

​प्रथम छन्द: रवि (सूर्य) की व्युत्पत्ति और भाव

रौति प्रकृष्टनादवान् ओंकाररूपभास्वरः।

निरन्तरं नदत्प्रभुः स एव रविरीड्यते॥


  • व्युत्पत्ति-भाव: जो निरन्तर 'ॐ' (प्रणव) के प्रकृष्ट नाद से गुंजायमान और प्रकाशमान है—'रौति' (शब्द करता हुआ प्रकाश फैलाता है) धातु से जो 'रवि' बनता है—वही पूजनीय सूर्य है।
  • हिन्दी अनुवाद: जो ओंकार के रूप में भास्वर है, जिसका प्रभुत्व निरन्तर नादयुक्त है, और जो प्रकृष्ट शब्द (नाद) करता हुआ प्रकाशित होता है, वही 'रवि' (सूर्य) नाम से वन्दनीय है।

​द्वितीय छन्द: व्योम (आकाश) की व्युत्पत्ति और भाव

विशेषेण यतो ह्यस्मिन् व्याप्स्यते सर्वमण्डलम्।

तस्माद् व्योमेति गीयते सचराचरविस्तृतम्॥


  • व्युत्पत्ति-भाव: जिसमें चर और अचर सम्पूर्ण विश्व विशेष रूप से व्याप्त रहता है—'व्यप्' धातु से 'व्योम' शब्द की निष्पत्ति होती है—जिसका अर्थ है विशेष रूप से फैला हुआ या समाहित करने वाला।
  • हिन्दी अनुवाद: जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर ब्रह्मांड विशेष रूप से व्याप्त (समाहित) है, इसीलिए वह महान् आकाश 'व्योम' नाम से गाया जाता है।





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