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यादव योगेश कुमार रोहि की प्रस्तुति
स्थाई (मुखड़ा)
हम वक्त की राहों के मुसाफ़िर ! यों ही चलते जाते हैं।
मंजिलों का पता नहीं, कभी दिन तो कभी रातें हैं।।
अंतरा १
महफ़िल में हँसे तब हज़ारों चेहरे, गम का अंधेरा जब दिल पर ठहरे।
जिसको सहारा दिया उसकी सदा पर, उसने भी हमके दिए जख्म गहरे ?
तू क्यों ढूँढता है वफ़ा को तिलिस्मी दिलों में ? ये सब काग़ज़ी सिलसिले रोहि इन महफिलो में।
सभी लोग अपने ही मतलबों को आते हैं।
हम वक्त की राहों के मुसाफ़िर ! यों ही चलते जाते हैं। मंजिलों का पता नहीं,कभी दिन तो कभी रातें हैं।
अंतरा २
जलाए थे, हमने जो चाहत के दिए थे, आँधीयों के झोंकों ने सब बुझा दिए हैं।
जिनकी खातिर लुटा दी बहारें, उन्होंने ही विश्वास में घात किए हैं ।
दूर के दृश्य सुहाने लगते हैं ! पास आने पर वो दर करते हैं। उम्मीदों की आग में लोग सुलगते हैं। नीदें हराम हैं वे रात रात भर जगते हैं। कभी गम तो कभी खुशीयों पल आते हैं
हम वक्त की राहों के मुसाफ़िर ! यों ही चलते जाते हैं। मंजिलों का पता नहीं, कभी दिन तो कभी रातें हैं।
गीत के अनुरूप संगीत देकर ऑडियो जनरेट करें
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