अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफ़तों की हिफाज़तों में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
[अंतरा १]
नारी की झाँई परे अंधे होत भुजंग ।
कबिरा जिन कौन गति ।
जो बैठो नारी के संग ।
बैठो नारी के संग ।
सब भूल गये सत्संग।
नारी का चिन्तन करें करे स्पर्श अंग ।
तिरियन में बैठा हुआ लेता यौवन के रंग ।
[अंतरा २]
ऋण धन के आवेश पास मत करलो।
फॉल्ट न हो जाए थोड़ा धीरज धरलो।
सदभाव के नाम महिला को गले लगा रहे हैं।
और कबीर के नाम को वेदों में दिखा रहे हैं।
[समापन / कोड़ा]
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
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