"यह गजल यादव योगेश कुमार रोहि के अनु-भवों की काव्यमयी प्रस्तुति हैं।
मुखड़ा-
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
***"
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
१-अन्तरा-
अपने अहम में गुम है बटोही , चले जिन पथों पे, मंज़िल ना कोई।
खोजते खोजते खुद को रोहि .
मोह के भँबर में जिन्दगी डुबोई।
व्यर्थ ही समय को गंवा रहे हैं, आते हैं पास जो शिष्य के बनके, वोही हमको समझा रहे हैं॥
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
२-अन्तरा-
हमारे दिल के गमों की शय पर, उभरते जख्मों की हर-एक तह पर। खुशीयों के होते विलय पर
कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, मंदिर तिजारत के महकमें, पुजारी प्रसाद बिकवा रहे हैं॥
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफतों की हिफाजतों में हम वो कीमत चुका रहे हैं।
****
विशेष: –
हिन्दी भाषा के व्याकरण व वर्तनी के अनुरूप गीत का गायन करें !
प्रस्तुत गीत को कब्बाली की शैली में
भारतीय लोक संगीत में हारमोनियम व ढोलक की थाप पर स्त्री पुरुष के युगल स्वर में गायन करे -
३-थोड़ी सी जिंदगी अब सुधर लो,जीवन के सफर को पाथेय धर लो ।
न वक्त ऐसा, रहे हमेशा, पल पल चलना है तुम समहर लो॥
अरमाँ खाक हो गए जल के, आग अभी भी सुलगा रहे हैं।
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
**********
४-अपने गमों के संग तू अकेला, खुशियों का तेरा झूठा हैं मेला।
ईश्वर के नामों पर कर्म गन्दे,निकम्मे धूर्त फरेबी बन्दे। अन्धों में बैठे धन्धे चला रहे हैं॥
फिर भी वफ़ा की राहों पे चल के, ठोकरों में खुद ही संभल के॥
इन जंझाबतों से निकल के, अब भी हम तो घबरा रहे हैं।
*****
अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
शराफ़तों की हिफाजतो में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
हमारे दिल के गमों की शह पर, उभरते जख्मों की हर एक तह पर।
कुछ तो बिजली गिरा रहे हैं, अजीब देखे हैं हम मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥
******
मंदिर तिजारत के महकमे, पुजारी प्रसाद बिकवा रहे हैं...
(व्यंग्य और दर्द भरे लहजे में) पुजारी प्रसाद बिकवा रहे हैं!
युगल स्वर (कोरस):
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफ़तों की हिफाज़तों में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥"
[तीसरा अन्तरा]
पुरुष स्वर:
थोड़ी सी जिंदगी अब सुधार लो, जीवन के सफर को पाथेय धर लो।
न वक्त ऐसा, रहे हमेशा, पल-पल चलना है तुम समहर लो॥
स्त्री स्वर:
अरमाँ खाक हो गए जल के, आग अभी भी सुलगा रहे हैं...
(गंभीर स्वर में) आग अभी भी सुलगा रहे हैं!
युगल स्वर (कोरस):
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं॥"
[चौथा अन्तरा - कब्बाली का उरूज / क्लाइमेक्स]
(ढोलक की थाप तेज़ हो जाती है। हारमोनियम पर तीव्र स्वर गूंजते हैं। दोनों कलाकार सवाल-जवाब के अंदाज़ में गाते हैं)
स्त्री स्वर:
अपने गमों के संग तू अकेला, खुशियों का तेरा झूठा है मेला।
पुरुष स्वर:
ईश्वर के नामों पर कर्म गंदे, निकम्मे धूर्त फरेबी बन्दे...
अंधों में बैठे धंधे चला रहे हैं!
स्त्री स्वर:
फिर भी वफ़ा की राहों पे चल के, ठोकरों में खुद ही संभल के।
इन जंझावतों से निकल के...
पुरुष स्वर:
अब भी हम तो घबरा रहे हैं!
(दोनों मिलकर ज़ोरदार लय में)
अब भी हम तो घबरा रहे हैं!!
[अंतिम समापन - समापन बंदिश]
(संगीत धीमा होता है। ढोलक की थाप सिर्फ एक-एक अंतराल पर बजती है। दोनों कलाकार बेहद भावुक होकर अंतिम पंक्तियां दोहराते हैं)
युगल स्वर (साथ मिलकर):
"अजीब देखे हैं हमने मंज़र, अपने अपने को खा रहे हैं।
शराफ़तों की हिफाज़तों में, हम वो कीमत चुका रहे हैं॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें