गुरुवार, 20 अगस्त 2026

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

कव्वाली का अंदाज़ और टेक (मुखड़ा)

(संगीत की हल्की धुन और हारमोनियम के सुरों के बीच मुख्य गायक का आह्वान...)

मुखड़ा (बार-बार दोहराया जाने वाला शेर):

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

****

अर्ज़ किया है...

बन्दिश 1 (प्रथम पद पर आधारित)

​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! गफलत की लत जहालत का साया है ?

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

हरे कृष्णा ! 

बन्दिश 2 (द्वितीय पद पर आधारित)

संसार में जीवन का पाना ! 

और मरके कहाँ जाना।।

 हँसना रोना पीना खाना।

 रहस्य ये तूने क्यों न जाना। समय को यों ही व्यर्थ गवाना है।

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

बन्दिश 3 (तृतीय पद पर आधारित)

मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा  मन ! 

ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !

लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

बन्दिश 4 (चतुर्थ पद पर आधारित)


हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


******************************


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)

मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!

ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!


(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)

बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)


​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?

रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?

अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।

डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है 

बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)

​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?

मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?

हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!

ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?

समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)


मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा मन ! 

ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !

लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

​_____

बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)

​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!

तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!

संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।

इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!

महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)

ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!

तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।

दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!


हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना

डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।

ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर" (उम्दा तुकबंदियों और रिदम के साथ परिष्कृत रूप)

यह नग़मा यादव योगेश कुमार रोही के दिल की सदा है, उनके ख़यालात की इबारत।"

​मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)


​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!


तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।


दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!


ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!



​(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)


​बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)



​सुनसान राहों के मुसाफ़िर ! तू गफलत की लत में आया है। तुझपे  जहालतों का साया है ?


रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस ये छाया है ?


अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी जमाना है।


डगर नहीं है सीधी। तेरा दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है 


​बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)


​इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?


मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?


हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!


ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?


समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?


​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)



मोम के नाज़ुक ये बंधन!  क्यों  जकड़ रहे हैं तेरा मन ! 


ये रंग-बिरंगी तितलियाँ ! कहीं तूफान तो कहीं बिजलियाँ !


लब तलब और ये मतलब ! तेरी हयातों के जिम्मे सब। यों नही समय बिताना है।  


डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


​_____


​बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)


​हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!


तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!


संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।


इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!


​डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!


​महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)


​ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!


तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।


दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!



हरेक हार तेरी कभी उपहार बनेगी। हौशले बुलन्द रख! मन के द्वार बन्द रख। संयम से जीवन बिताना। चिन्ह अपने छोड़ जाना


डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।


ओ दूर के मुसाफ़िर ! तुझे चलना हैं आखिर! तेरी आँखें उनीदी ! डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है ।



​(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)


इस कब्बाली का ध्रुपद शैली में गायन करें

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