सोमवार, 17 अगस्त 2026

गीत

क्या यही देश में होगा अब !
              ,कि सब कायर हो जाऐंगे।।
कल फिर कई जाहिल 
              तुम्हारे  नाफिर हो जाऐंगे।।

  दया " करुणा "अहिंसा के द्रोही
                आशिक नहीं हबशी होंगे।
इनको फाँसी की न मिले सजा तो
                   वे देश वासी बदनशीं होंगे  ।। 

जिनकी शरीयत  में कत्ल को ही मजहब माना जाता है। वे आशिक नहीं हबशी होंगें।

इनके हिमायत करने वाले बड़े बदनशीं होगे-


गीत स्क्रिप्ट: हालात, इश्क और बगावत

​गीत परिचय

  • गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।
  • स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।

​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)

मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...

अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!

मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,

वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!

अंतरा (कोरस के साथ):

राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,

जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)

संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):

​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,

अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!

लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,

दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।

जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):

स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,

भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !

पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।

रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!

​(अंतरा 3: आशिकाना अंदाज और इश्क के मुद्दत)

संगीत का मूड बदलता है (मृदंग और बांसुरी की सुरीली धुन):

​भाई कमाल के आशिक थे तुम भी,

मुद्दतों ये मुद्दा सरफराज करते हैं।

दिल में उमड़ते मोहब्बत के बादल,

आज भी बयाने-अंदाज करते हैं!

​बवाल की परंपरा को आप संजोये हुए हैं,

खामखां इश्क में रोये हुए हैं।

मोहब्बत में कहीं तुम शहादत न करना,

उल्फत की जंग में बहुत तो खोए हुए हैं!

​(अंतिम चरण: संघर्ष और जिंदगी के फुटपाथ)

लय थोड़ी तेज और प्रेरणादायक:

​मजबूरियाँ हालातों की जब से साथ हैं,

सफर में सैकड़ों-हजारों फुटपाथ हैं।

संभल रहा हूँ जिंदगी की दौड़ में गिर कर,

किस्मतों को तराशने वाले भी कुछ हाथ हैं!

कोडा (समापन पंक्तियाँ - धीमी और गहरी आवाज़ में):

जुल्म बना आरोहि...

किस्मतों को तराशने वाले भी कुछ हाथ हैं...

रोहि सुधरेगा नहीं... सदियों तक ये देश!



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गीत स्क्रिप्ट: हालात, इश्क और बगावत


​गीत परिचय


​गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।


​स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।


​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)


​मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...

अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!


मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,

वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!


​अंतरा (कोरस के साथ):


राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,


जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)


​संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):


​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,


अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!


लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,


दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।


जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):


स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,


भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !


पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश


संशोधित गीत -

 उत्तर भारतीय लोक संगीत शैली में कब्बाली का हारमोनियम व ढोलक की ताल पर सम्फोनी व सिंथ के स्वर को साथ  स्पष्ट उच्चारण करते हुए ऑडियो जनरेट करें !



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