यह इस दोहे और आपकी व्याख्या पर आधारित एक गम्भीर और दार्शनिक ऑडियो स्क्रिप्ट है। इसे आप अपनी वीडियो प्रस्तुति के लिए उपयोग कर सकते हैं:
ऑडियो स्क्रिप्ट
(संगीत: बैकग्राउंड में एक गम्भीर, मंद और शास्त्रीय भारतीय वाद्ययंत्र (जैसे कि सारंगी या बांसुरी) की धीमी धुन, जो एक गहन दार्शनिक वातावरण बनाए।)
वॉइसओवर (धीमी और प्रभावशाली आवाज़ में): कबीर के सिद्धान्तों के जानकार यादव योगेश कुमार रोहि कबीर की एक साखी की व्याख्या विज्ञान सम्मत विधि से करते हैं।-
"गौर से सुनिए इस दोहे को—
नारी की छाँई परे, अन्धे होत भुजंग।
कबिरा जिनकी कौन गति, जो नित नारी संग?
कबीर की दृष्टि यहाँ अत्यंत तीक्ष्ण है। वे कहते हैं कि विलासनी स्त्रियों का प्रभाव इतना गहरा है कि उसकी छाया मात्र पड़ने से जो व्यक्ति अन्धा है 'वह भी विषैले सर्प की भाँति होकर हरकतें करने लगता है। लेकिन, कबीर का कटाक्ष गहरा है—वे प्रश्न पूछते हैं कि उन लोगों की मानसिक गति क्या होगी, जो हर क्षण केवल स्त्रियों के संग में डूबे रहते हैं?"
(थोड़ा अंतराल—संगीत की लय थोड़ी और गम्भीर होती है)
"इसे विज्ञान के एक सिद्धांत से समझिए—दो विपरीत आवेशीय तत्व, यानी धनात्मक (Positive) और ऋणात्मक (Negative) तत्व जब परस्पर मिलते हैं, तो उनमें एक स्वाभाविक 'आकर्षण' या प्रतिक्रिया होती है। भौतिकी में इसे विद्युत उत्पादन कहा जा सकता है, किन्तु मानवीय संबंधों के संदर्भ में, जब यह आकर्षण केवल वासना के धरातल पर हो, तो यह अनुक्रिया नहीं, बल्कि एक 'फॉल्ट' की तरह प्रतिक्रिया करता है।
प्रकृति का यह नियम है कि समान आयु और विपरीत लिंगीयों पर घटित होता है। कबीर की यह चेतावनी उसी 'फॉल्ट' की ओर संकेत है, जहाँ मनुष्य अपना विवेक खोकर उसी अंधकार में विलीन हो जाता है, जिसे वे 'भुजंग' की प्रवृत्ति कहते हैं।"
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श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय से लिए गए राजा ययाति के इन पवित्र श्लोकों पर चिन्तन आवश्यक है।
न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १४ ॥
- अनुवाद: विषयों के भोगने से भोग-वासना कभी शांत नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोग-वासनाएँ भी भोगों से और अधिक प्रबल हो जाती हैं।
- यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥ १५ ॥
- अनुवाद: जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष (द्वंद्व भाव ) नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है। फिर उसे ऋणात्मक और धनात्मक आवेश प्रभावित नहीं करते
- या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः जीर्यतो या न जीर्यते । तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥ १६ ॥
- अनुवाद: विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से उसका त्याग कर पाते हैं। मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही बनी रहती है। अतः जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए।
- मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ १७ ॥
- अनुवाद: और तो क्या—अपनी माता, बहन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि इंद्रियाँ इतनी आवेशयुकत बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं (विचलित कर देती हैं)।
(संगीत धीरे-धीरे शांत होता है और समाप्त होता है)
सुझाव: इस ऑडियो को रिकॉर्ड करते समय शब्दों के बीच ठहराव (Pauses) का विशेष ध्यान रखें, ताकि सुनने वाले को दोहे का अर्थ और आपकी वैज्ञानिक व्याख्या, दोनों पर विचार करने का समय मिले।
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