कव्वाली: "ओ दूर के मुसाफ़िर"
मुखड़ा (स्थायी / बार-बार दोहराया जाने वाला शेर)
ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
ओ दूर के मुसाफ़िर... तुझे चलना है आखिर!
(संगीत का सुंदर आर्तनाद और हारमोनियम पर ताल की तीव्र थाप के साथ मुख्य गायक का प्रवेश...)
बन्दिश 1: غَفْلَت (गफ़लत और जहालत का पर्दा)
सुनसान राहों के मुसाफ़िर, ये कैसी तेरी गफ़लत है?
अज्ञान के इस अंधियारे में, लिपटा हुआ तेरा कुल मत है!
रात ढल चुकी, फिर क्यों तेरी पलकों पर आलस छाया है?
अरे भूल न अपनी साधना को, ये फरेबी सारा जमाना है।
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
बन्दिश 2: حَقِيقَت (संसार की असलियत)
इस रंग-बिरंगे संसार में, जीवन का क्या पाना है?
मुट्ठी में धूल समेटे फिर, तू मरके कहाँ को जाना है?
हँसना-रोना, पीना-खाना, पल-पल दुनिया को लुभाना है!
ये भेद पुराना है फिर भी, तूने रहस्य क्यों न जाना है?
समय को यों ही व्यर्थ गँवाना, क्या तेरी यही बहाना है?
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
बन्दिश 3: مَایَا (मोह-माया और उलझनें)
मोम से नाज़ुक ये सब बंधन, क्यों जकड़ रहे तेरा मन हैं?
कभी महकती रंग-बिरंगी तितलियाँ, कभी बिजली और तूफ़ान हैं!
लब पर तलब और दिल में मतलब, तू किसके पीछे दीवाना है?
तेरी हयातों के जिम्मे सब, ये बोझ तुझे ही उठाना है।
यों हँसी-खेल में नहीं समय बिताना है!
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
बन्दिश 4: اِمْتِحَان (संघर्ष और आत्मबल)
हर एक हार तेरी जीवन में, इक दिन नया उपहार बनेगी!
तू हौसले बुलंद रख अपने, मन के द्वार पे पहरा सख्त रख!
संयम से जीवन बिताना है, नाम अपना अमर कर जाना है।
इतिहास की इस पावन माटी पर, अमिट चिन्ह अपने छोड़ जाना है!
डगर नहीं है सीधी। दूर ठिकाना है। तुझे चलते जाना है!
महा-अंतिम अंतरा (सराबोर और समापन)
ओ दूर के मुसाफ़िर! तुझे चलना है आखिर!
तेरी आँखें उनींदी, डगर नहीं है सीधी।
दूर ठिकाना है, तुझे चलते जाना है!
(ढोलक और कोरस की ऊँची आवाज़ के साथ कव्वाली का यह चरण चरम सीमा पर समाप्त होता है)
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