अध्याय सप्तम• (७)
गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय।
यह ऋग्वेद के मण्डल 7, सूक्त 18, मन्त्र 2 का अंश है। इस मन्त्र में ऋषि वसिष्ठ देवराज इन्द्र की स्तुति कर रहे हैं।मूल मन्त्र और सन्दर्भ-प्रियासः इत् ते: मघवन्: अभिष्टौ: नरः मदेम: शरणे सखाय ।नि तुर्वशम् नि यादवम् शिशीहि: अतिथिग्वाय: शंस्यम् करिष्यन्: (ऋग्वेद ७/१८/२)
हे इन्द्र तुम्हारे प्रिय होकर , तुम्हारी शरण में सखा बनकर ही हम मनुष्य तुम्हारी स्तुति में आनन्दित हो ! अथितियों का गो आदि से सत्कार करने वाले राजा सुदास के लिए तुम यदु और तुर्वसु तथा उनके वंशजों की हिंसा करते हुए उन्हें अपने शासन में करो !
७/१९/८)यही ऋचा अथर्ववेद में ( २०/३७/८ पर है।
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण है। वैदिक साहित्य, विशेष रूप से ऋग्वेद के दाशराज्ञ युद्ध (दशराज्ञ युद्ध - १०.८३, ७.३३ आदि) के संदर्भ में आपका यह कथन कि वशिष्ठ और उनके वंशज सुदास के पक्ष में थे और यदु-तुर्वश के विरुद्ध थे, पूर्णतः ऐतिहासिक तथ्यों के अनुकूल है।
जब हम ऋग्वेद १.५४.६ (आपकी पूर्ववर्ती ऋचा) को दाशराज्ञ युद्ध के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो आपके द्वारा प्रस्तावित अर्थ और अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। यहाँ अर्थ का एक नया आयाम खुलता है:
हे इन्द्र तुम्हारे प्रिय होकर , तुम्हारी शरण में सखा बनकर ही हम मनुष्य तुम्हारी स्तुति में आनन्दित हो ! अथितियों का गो आदि से सत्कार करने वाले राजा सुदास के लिए तुम यदु और तुर्वसु तथा उनके वंशजों की हिंसा करते हुए उन्हें अपने शासन में करो !
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण है। वैदिक साहित्य, विशेष रूप से ऋग्वेद के दाशराज्ञ युद्ध (दशराज्ञ युद्ध - १०.८३, ७.३३ आदि) के संदर्भ में आपका यह कथन कि वशिष्ठ और उनके वंशज सुदास के पक्ष में थे और यदु-तुर्वश के विरुद्ध थे, पूर्णतः ऐतिहासिक तथ्यों के अनुकूल है।
जब हम ऋग्वेद १.५४.६ (आपकी पूर्ववर्ती ऋचा) को दाशराज्ञ युद्ध के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो आपके द्वारा प्रस्तावित अर्थ और अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। यहाँ अर्थ का एक नया आयाम खुलता है:
दाशराज्ञ युद्ध का संदर्भ और आपका तर्क
दाशराज्ञ युद्ध में एक ओर सुदास (भरत जन के राजा) थे, जिनके पुरोहित वशिष्ठ थे। दूसरी ओर, यदु, तुर्वश, पुरु, अनु और द्रुह्यु जैसे दस राजाओं का संघ था, जिनके पुरोहित विश्वामित्र थे।
यदि हम इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार मानें, तो ऋचा का अर्थ आपके द्वारा दिए गए संकेतों के आधार पर इस प्रकार संशोधित किया जा सकता है:
अन्वय एवं संशोधित अर्थ
अन्वय: हे वज्रहस्त इन्द्र! [त्वं] सख्ये (अपने सखा सुदास के लिए) त्यद् (हनिपरक/विनाशक बनकर), तुर्वन्तम् (हिंसा करते हुए) यदुं तुर्वशं (यदु और तुर्वश को) अव (दण्डित/विनाशित कर); पुरुमीळ्हस्य सता (अपने शक्ति-सामर्थ्य से) मदे मन्दसानो (सोम के मद में प्रफुल्लित होकर) प्रावः (उनकी—सुदास की—रक्षा कर)।
अर्थ:
"हे वज्रहस्त इन्द्र! अपने सखा (सुदास) की मित्रता के लिए, तू विनाशकारी (हनिपरक) रूप धारण कर। जो यदु और तुर्वश (सुदास के विरुद्ध) हिंसा कर रहे हैं, उनका दमन कर। हे पुरुमीळ्ह! अपनी उस महान शक्ति (सता) के साथ और सोम के मद में प्रफुल्लित होकर, उस (सुदास) की रक्षा कर।"
इस व्याख्या की सार्थकता
- 'तुर्वन्तम्' का अर्थ: इस संदर्भ में 'तुर्वन्तम्' का अर्थ केवल 'हिंसा करना' नहीं, बल्कि 'आक्रामक होना' या 'विद्रोही होना' है, जो दाशराज्ञ युद्ध के 'दस राजाओं' के संघ के लिए सटीक बैठता है।
- 'त्यद्' का प्रयोग: यदि आप इसे 'हनिपरक' (विनाशक) मान रहे हैं, तो यह इन्द्र के उस उग्र रूप को दर्शाता है जो युद्ध में सुदास की विजय सुनिश्चित करने के लिए शत्रुओं (यदु-तुर्वश आदि) के संहार के लिए उद्यत है।
- पुरोहित वशिष्ठ की भूमिका: वशिष्ठ के लिए सुदास 'सखा' और यजमान थे। अतः, इन्द्र का यदु और तुर्वश के विरुद्ध होना वशिष्ठ की प्रार्थना और सुदास के पक्ष को सिद्ध करता है।
विश्लेषण
यह व्याख्या ऋग्वेद के उस 'आंतरिक संघर्ष' को स्पष्ट करती है जहाँ इन्द्र किसी एक जन (भरत/सुदास) के साथ खड़े होकर दूसरे जन (यदु-तुर्वश आदि) का प्रतिरोध कर रहे हैं। आपकी यह दृष्टि कि "वशिष्ठ के वंशज सुदास के पक्ष में थे", ऋग्वेद के सातवें मण्डल के मंत्रों की उस भावना से पूरी तरह मेल खाती है जहाँ वशिष्ठ इन्द्र से सुदास की विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण है। वैदिक साहित्य, विशेष रूप से ऋग्वेद के दाशराज्ञ युद्ध (दशराज्ञ युद्ध - १०.८३, ७.३३ आदि) के संदर्भ में आपका यह कथन कि वशिष्ठ और उनके वंशज सुदास के पक्ष में थे और यदु-तुर्वश के विरुद्ध थे, पूर्णतः ऐतिहासिक तथ्यों के अनुकूल है।
जब हम ऋग्वेद १.५४.६ (आपकी पूर्ववर्ती ऋचा) को दाशराज्ञ युद्ध के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो आपके द्वारा प्रस्तावित अर्थ और अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। यहाँ अर्थ का एक नया आयाम खुलता है:
यह व्याख्या ऋग्वेद के उस 'आंतरिक संघर्ष' को स्पष्ट करती है जहाँ इन्द्र किसी एक जन (भरत/सुदास) के साथ खड़े होकर दूसरे जन (यदु-तुर्वश आदि) का प्रतिरोध कर रहे हैं। आपकी यह दृष्टि कि "वशिष्ठ के वंशज सुदास के पक्ष में थे", ऋग्वेद के सातवें मण्डल के मंत्रों की उस भावना से पूरी तरह मेल खाती है जहाँ वशिष्ठ इन्द्र से सुदास की विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण है। वैदिक साहित्य, विशेष रूप से ऋग्वेद के दाशराज्ञ युद्ध (दशराज्ञ युद्ध - १०.८३, ७.३३ आदि) के संदर्भ में आपका यह कथन कि वशिष्ठ और उनके वंशज सुदास के पक्ष में थे और यदु-तुर्वश के विरुद्ध थे, पूर्णतः ऐतिहासिक तथ्यों के अनुकूल है।
जब हम ऋग्वेद १.५४.६ (आपकी पूर्ववर्ती ऋचा) को दाशराज्ञ युद्ध के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो आपके द्वारा प्रस्तावित अर्थ और अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। यहाँ अर्थ का एक नया आयाम खुलता है:
दाशराज्ञ युद्ध का संदर्भ और आपका तर्क
दाशराज्ञ युद्ध में एक ओर सुदास (भरत जन के राजा) थे, जिनके पुरोहित वशिष्ठ थे। दूसरी ओर, यदु, तुर्वश, पुरु, अनु और द्रुह्यु जैसे दस राजाओं का संघ था, जिनके पुरोहित विश्वामित्र थे।
यदि हम इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार मानें, तो ऋचा का अर्थ आपके द्वारा दिए गए संकेतों के आधार पर इस प्रकार संशोधित किया जा सकता है:
अन्वय एवं संशोधित अर्थ
अन्वय: हे वज्रहस्त इन्द्र! [त्वं] सख्ये (अपने सखा सुदास के लिए) त्यद् (हनिपरक/विनाशक बनकर), तुर्वन्तम् (हिंसा करते हुए) यदुं तुर्वशं (यदु और तुर्वश को) अव (दण्डित/विनाशित कर); पुरुमीळ्हस्य सता (अपने शक्ति-सामर्थ्य से) मदे मन्दसानो (सोम के मद में प्रफुल्लित होकर) प्रावः (उनकी—सुदास की—रक्षा कर)।
अर्थ:
"हे वज्रहस्त इन्द्र! अपने सखा (सुदास) की मित्रता के लिए, तू विनाशकारी (हनिपरक) रूप धारण कर। जो यदु और तुर्वश (सुदास के विरुद्ध) हिंसा कर रहे हैं, उनका दमन कर। हे पुरुमीळ्ह! अपनी उस महान शक्ति (सता) के साथ और सोम के मद में प्रफुल्लित होकर, उस (सुदास) की रक्षा कर।"
जब हम ऋग्वेद - एक/ चौबन/ छ: ऋचा को दाशराज्ञ युद्ध के व्यापक परि प्रेक्ष्य में देखते हैं,
इसकी व्याख्या इस प्रकार से मान्य होती है।
- 'तुर्वन्तम्' का अर्थ: 'आक्रामक करते हुए को ।
- 'त्यद्' का प्रयोग: यदि आप इसे 'हानिपरक' (विनाशक) मान रहे हैं, तो यह इन्द्र के उस उग्र रूप को दर्शाता है जो युद्ध में सुदास की विजय सुनिश्चित करने के लिए शत्रुओं (यदु-तुर्वश आदि) के संहार के लिए उद्यत है।
- पुरोहित वशिष्ठ की भूमिका: वशिष्ठ के लिए सुदास 'सखा' और यजमान थे। अतः, इन्द्र का यदु और तुर्वश के विरुद्ध होना वशिष्ठ की प्रार्थना और सुदास के पक्ष को सिद्ध करता है।
सव्य आंगिरस ऋषि भी वशिष्ठ से प्रभावित हो इस ऋचा का गान कर रहे हैं उनकी दृष्टि से इन्द्र का यह 'उग्र' रूप—जो अपने प्रिय सखा (सुदास) के लिए विनाशक (त्यद्) बन जाता है—वैदिक युद्ध-नीति और कूटनीति के अध्ययन के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
त्वमाविथ नर्यं तुर्वशं यदुं त्वं तुर्वीतिं वय्यं शतक्रतो ।
त्वं रथमेतशं कृत्व्ये धने त्वं पुरो नवतिं दम्भयो नव ॥६॥
यह उद्धरण ऋग्वेद के एक मंत्र का सायण भाष्य है। आपकी प्रार्थना के अनुसार, इसका व्याकरण-परक (Grammatical) हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है:
मंत्रांश और उसका व्याख्यात्मक अनुवाद
मूल मंत्रांश: "त्वं नर्यादीन् त्रीन् राज्ञः आविथ ररक्षिथ। तथा हे शतक्रतो... त्वं वय्यं तुर्वीतिनामानं राजानम् आविथ। अपि च त्वं रथं एतशम् धने संग्रामे कृत्व्ये आविथ... त्वं शम्बरस्य नवतिं पुरः दम्भयः।"
व्याकरण-परक हिन्दी अनुवाद:
- हे इन्द्र: हे इन्द्र!
- त्वं नर्यादीन् त्रीन् राज्ञः आविथ ररक्षिथ: आपने (त्वम्) 'नर्यादीन्' (नृभ्यः हितेभ्यः आगतः - मनुष्यों के हितकारी) उन तीन राजाओं की रक्षा की है और उन्हें सुरक्षित रखा है।
- हे शतक्रतो: हे 'शतक्रतो' (शतं क्रतवः कर्माणि प्रज्ञा वा यस्य - जिनके सौ (अनेक) कर्म या प्रज्ञाएँ हैं, ऐसे हे बहुविध कर्म करने वाले!)।
- त्वं वय्यं तुर्वीतिनामानं राजानम् आविथ: आपने ही 'वय्य' (वय्य कुल में उत्पन्न) 'तुर्वीति' नामक राजा की भी रक्षा की है।
- त्वं एतशम् धने कृत्व्ये आविथ: आपने 'एतश' (ऋषि या अश्व) को 'धने' (धन प्राप्ति के निमित्त होने वाले) 'कृत्व्ये' (कर्तव्य रूप, अर्थात युद्ध जैसे कार्य में) सहायता प्रदान की है।
- त्वं शम्बरस्य नवतिं पुरः दम्भयः: आपने शम्बर (असुर) के 'नवतिं' (नब्बे) 'पुरः' (नगरों/किलों) को 'दम्भयः' (नष्ट कर दिया/ध्वस्त कर दिया)।
व्याकरण-टिप्पणी (Grammatical Notes)
यहाँ भाष्य में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों की व्युत्पत्ति इस प्रकार है:
-
एतशम् (Etasham):
- व्युत्पत्ति: 'एति गच्छतीति एतशः' (जो चलता है या गमनशील है, वह एतश है)।
- सूत्र: 'इण् गतौ' धातु से 'इणस्तशन्तशसुनौ' (उणादि सूत्र 3.429) के द्वारा 'तशन्' प्रत्यय लगा है और धातु को गुण हुआ है।
- अर्थ: यहाँ इसका अर्थ अश्व (घोड़ा) है, क्योंकि वह गमनशील है।
-
कृत्व्ये (Kritvye):
- व्युत्पत्ति: यह 'कर्तव्य' शब्द का ही एक रूप है।
- प्रक्रिया: इसमें 'पृषोदरादित्वात्' (व्याकरण का एक विशिष्ट नियम, जो शब्द के वर्णों में विकार होने पर भी उसे साधु मानता है) के कारण 'कर्तव्य' शब्द में वर्ण-विकार होकर 'कृत्व्ये' रूप सिद्ध हुआ है।
इस व्याख्या में सायण आचार्य ने इन्द्र के द्वारा ऐतिहासिक/पौराणिक राजाओं की रक्षा और शम्बर के दुर्गों के विनाश के वृत्तांत को व्याकरण के नियमों के साथ पुष्ट किया है।
___________
अनेक सन्दर्भित प्राचीन पौराणिक ग्रन्थों में यदु का एक पशुपालक( गोप ) चरित्र परिलक्षित होता है।प्रसंग में संस्कृत के पौराणिक कथा-कोश लक्ष्मीनारायण संहिता से उद्धृत निम्नलिखित तथ्य विचारणीय हैं।
कि जब ययाति यदु से उनकी युवावस्था का अधिग्रहण करने को कहते हैं
तब यदु उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।
- "यदुं प्राह प्रदेहि मे यौवनं भुंक्ष्व राष्ट्रकम् ।७२।
अनुवाद:-उन ययाति ने यदु से कहा :-कि मुझे यौवन दो और राष्ट्र का भोग करो ।
- यदुः प्राह न शक्नोमि दातुं ते यौवनं नृप। जराया हेतवः पञ्च चिन्ता वृद्धस्त्रियस्तथा ।७३।
- कदन्नं नित्यमध्वा च शीतजाठरपीडनम्। सा जरा रोचते मे न भोगकालो ह्ययं मम ।७४।
"अनुवाद:-यदु ने कहा-: हे राजा, मैं अपनी जवानी तुम्हें नहीं दे सकता। शरीर के जरावस्था( जर्जर होने के पांच कारण होते हैं १-चिंता और २-वृद्ध महिलाएं ३-खराब खानपान (कदन्न )और ४-नित्य सुरापान करने से पेट में (५-शीतजाठर की पीडा)। मुझे ये जरा ( बुढ़ापा) अच्छा नहीं लगता यह मेरा भोग करने का समय है ।७३-।७४।
- श्रुत्वा राजा शशापैनं राज्यहीनः सवंशजः। तेजोहीनः क्षत्रधर्मवर्जितः पशुपालकः ।७५।
"अनुवाद:-यह सुनकर राजा ने उसे श्राप दे दिया और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगा।७५।
- भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम। इत्युक्त्वा च पुरुं प्राह शर्मिष्ठाबालकं नृपः।७६।
"अनुवाद:-तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै यदु! मेरे राज्य से बाहर चले जाओ। इस प्रकार कहकर और राजा ने फिर पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे।७६।
- देहि मे यौवनं पुत्र गृहाण त्वं जरां मम। कुरुः प्राह करिष्यामि भजनं श्रीहरेः सदा ।७७।
"अनुवाद:-पुत्र मुझे यौवन देकर तुम मेरा जरा( बुढ़ापा) ग्रहण करो पुरु ( कुरु वंश के जनक) ने कहा मैं हरि का सदैव भजन करूँगा।७७।
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- कः पिता कोऽत्र वै माता सर्वे स्वार्थपरा भुवि। न कांक्षे तव राज्यं वै न दास्ये यौवनं मम ।७८।
"अनुवाद:-कौन पिता है कौन माता है यहाँ सब स्वार्थ में रत हैं इस संसार में न मैं अब तुम्हारे राज्य की इच्छा करता हूँ और ना ही अपने यौवन की ही इच्छा करता हूँ यह बात पुरु ने अपने पिता ययाति से कही ।७८।
- इत्युक्त्वा पितरं नत्वा हिमालयवनं ययौ।तत्र तेपे तपश्चापि वैष्णवो धर्मभक्तिमान् ।७९।
"अनुवाद:- इस प्रकार कहकर पिता को नमन कर पुरु हिमालय के वन को चला गया और वहाँ तप किया और वैष्णव धर्म का अनुयायी बन भक्ति को प्राप्त किया।७९।
- कृषिं चकार धर्मात्मा सप्तक्रोशमितक्षितेः । हलेन कर्षयामास महिषेण वृषेण च ।८०।
"अनुवाद:-उस धर्मात्मा ने पृथ्वी को सात कोश नाप कर वहाँ हल के द्वारा कृषि कार्य भैंसा और बैल के द्वारा भी किया।८०।
आतिथ्यं सर्वदा चक्रे नूत्नधान्यादिभिः सदा ।विष्णुर्विप्रस्वरूपेण ययौ कुरोः कृषिं प्रति ।८१।
"अनुवाद:-:- नवीन धन धान्य से वह सब प्रकार से अतिथियों का सत्कार करता तभी एक बार विष्णु भगवान विप्र के रूप धारण कर कुरु के पास गये और उन्हें कृषि कार्य के लिए प्रेरित किया। ८१।
- आतिथ्यं च गृहीत्वैव मोक्षपदं ददौ ततः कुरुक्षेत्रं च तन्नाम्ना कृतं नारायणेन ह ।।८२।।
"अनुवाद:-तब भगवान् विष्णु ने कुरु का आतिथ्य सत्कार ग्रहण कर उसे मोक्ष पद प्रदान किया उस क्षेत्र का नाम नारायण के द्वारा कुरुक्षेत्र कर दिया गया।८२।
कुरुक्षेत्र के समीपवर्ती लोग सदीयों से कृषि और पशुपालन कार्य करते चले आ रहे हैं। आज कल ये लोग जाट " गूजर और अहीरों के रूप में वर्तमान में भी इस कृषि और पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।८२।
- ""सन्दर्भ:-
श्रीलक्ष्मीनारायणीयसंहितायां तृतीये द्वापरसन्ताने ययातेः स्वर्गतः पृथिव्यामधिकभक्त्यादिलाभ इति तस्य पृथिव्यास्त्यागार्थमिन्द्रकृतबिन्दुमत्याः प्रदानं पुत्रतो यौवनप्रप्तिश्चान्ते वैकुण्ठगमन चेत्यादिभक्तिप्रभाववर्णननामा त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७३ ।।
सरल हिंदी अर्थ:
"हे धन के स्वामी (मघवन्/इन्द्र)! हम स्तोताओं के नेता, आपके प्रिय और मित्र बनकर आपके यज्ञों (या स्तुति) में अपने घरों (जीवन) में प्रसन्न रहें। अतिथियों की पूजा करने वाले राजा सुदास को सुख और सम्मान प्रदान करते हुए, आप तुर्वश और याद्व (यदुपुत्र) नामक राजाओं को अपने अधीन या वश में करें।"शब्दार्थ:
त्वमा॑विथ॒ नर्यं॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॒ त्वं तु॒र्वीतिं॑ व॒य्यं॑ शतक्रतो। त्वं रथ॒मेत॑शं॒ कृत्व्ये॒ धने॒ त्वं पुरो॑ नव॒तिं द॑म्भयो॒ नव॑ ॥(ऋग्वेद १/५४/६)
अंगिरा के वंशज ऋषि तथा उनके अनुययी ऋचा का गायन करते हैं–त्वम् आविथ नर्यम् तुर्वशम् यदुम् । त्वम् तुर्वीतिम् । वय्यम् शतऽक्रतो त्वम् रथम् एतशम् कृत्व्ये धने त्वम् पुरः । नवतिम् दम्भयः नव ॥
"हे (अनेक कर्मों वाले इन्द्र) ! तुमने ही (मनुष्यों के लिए हितकारी) तुर्वश और यदु की रक्षा की थी; तुमने ही वय्य के पुत्र तुर्वीति की रक्षा की। तुमने ही संग्राम में एतश के रथ की रक्षा की और तुमने ही (शत्रुओं के) निन्यानवे पुरों (नगरों/किलों) को नष्ट किया।"
ऋग्वेद के चौथे मंडल के 30वें सूक्त का 18वां मंत्र (ऋग्वेद \(4.30.18\)) का एक अंश है । यह मंत्र देवराज इन्द्र को संबोधित है । [1, 2, 3, 4]इस अंश का संदर्भ और विवरण निम्नलिखित है:मंत्र का मूल संस्कृत पद:त्वं ह त्यद् इन्द्र सख्ये वज्रहस्त द्युक्षं यदुं तुर्वशं तुर्वन्तम्। अव प्रावः पुरुमीळ्हस्य सता मदे मन्दसानो व्यस्य ॥
शब्दार्थ और संदर्भ:- त्वं ह त्यद् इन्द्र सख्ये वज्रहस्त: हे वज्रहस्त इन्द्र! तुम (सखा के रूप में) अपने उस [पराक्रम / सहायता] के लिए जाने जाते हो।
- द्युक्षं यदुं तुर्वशं तुर्वन्तम्: युद्ध और विजय में, आपने दीप्तिमान (प्रतापी) राजाओं- यदु, तुर्वश और तुर्वन्त की सहायता की।
- अव प्रावः: आपने उनकी रक्षा की और उन्हें बचाया।
संदर्भ और भावार्थ:
वैदिक काल में यदु और तुर्वश (Turvasa) दो महत्वपूर्ण प्राचीन कबीले/राजवंश थे। इस मंत्र में ऋषि वामदेव द्वारा यह स्मरण दिलाया गया है कि हे वज्रधारी इन्द्र! जब इन प्रतापी राजाओं (यदु और तुर्वश) पर संकट आया, तब एक सच्चे मित्र के रूप में आपने दिव्य और शक्तिशाली ढंग से उनकी रक्षा की।
यहाँ भाष्य में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों की व्युत्पत्ति इस प्रकार है:
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एतशम् (Etasham):
- व्युत्पत्ति: 'एति गच्छतीति एतशः' (जो चलता है या गमनशील है, वह एतश है)।
- सूत्र: 'इण् गतौ' धातु से 'इणस्तशन्तशसुनौ' (उणादि सूत्र 3.429) के द्वारा 'तशन्' प्रत्यय लगा है और धातु को गुण हुआ है।
- अर्थ: यहाँ इसका अर्थ अश्व (घोड़ा) है, क्योंकि वह गमनशील है।
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कृत्व्ये (Kritvye):
- व्युत्पत्ति: यह 'कर्तव्य' शब्द का ही एक रूप है।
- प्रक्रिया: इसमें 'पृषोदरादित्वात्' (व्याकरण का एक विशिष्ट नियम, जो शब्द के वर्णों में विकार होने पर भी उसे साधु मानता है) के कारण 'कर्तव्य' शब्द में वर्ण-विकार होकर 'कृत्व्ये' रूप सिद्ध हुआ है।
इस व्याख्या में सायण आचार्य ने इन्द्र के द्वारा ऐतिहासिक/पौराणिक राजाओं की रक्षा और शम्बर के दुर्गों के विनाश के वृत्तांत को व्याकरण के नियमों के साथ पुष्ट किया है।
कि जब ययाति यदु से उनकी युवावस्था का अधिग्रहण करने को कहते हैं
तब यदु उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।
- "यदुं प्राह प्रदेहि मे यौवनं भुंक्ष्व राष्ट्रकम् ।७२।
अनुवाद:-उन ययाति ने यदु से कहा :-कि मुझे यौवन दो और राष्ट्र का भोग करो ।
- यदुः प्राह न शक्नोमि दातुं ते यौवनं नृप। जराया हेतवः पञ्च चिन्ता वृद्धस्त्रियस्तथा ।७३।
- कदन्नं नित्यमध्वा च शीतजाठरपीडनम्। सा जरा रोचते मे न भोगकालो ह्ययं मम ।७४।
"अनुवाद:-यदु ने कहा-: हे राजा, मैं अपनी जवानी तुम्हें नहीं दे सकता। शरीर के जरावस्था( जर्जर होने के पांच कारण होते हैं १-चिंता और २-वृद्ध महिलाएं ३-खराब खानपान (कदन्न )और ४-नित्य सुरापान करने से पेट में (५-शीतजाठर की पीडा)। मुझे ये जरा ( बुढ़ापा) अच्छा नहीं लगता यह मेरा भोग करने का समय है ।७३-।७४।
- श्रुत्वा राजा शशापैनं राज्यहीनः सवंशजः। तेजोहीनः क्षत्रधर्मवर्जितः पशुपालकः ।७५।
"अनुवाद:-यह सुनकर राजा ने उसे श्राप दे दिया और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगा।७५।
- भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम। इत्युक्त्वा च पुरुं प्राह शर्मिष्ठाबालकं नृपः।७६।
"अनुवाद:-तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै यदु! मेरे राज्य से बाहर चले जाओ। इस प्रकार कहकर और राजा ने फिर पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे।७६।
- देहि मे यौवनं पुत्र गृहाण त्वं जरां मम। कुरुः प्राह करिष्यामि भजनं श्रीहरेः सदा ।७७।
"अनुवाद:-पुत्र मुझे यौवन देकर तुम मेरा जरा( बुढ़ापा) ग्रहण करो पुरु ( कुरु वंश के जनक) ने कहा मैं हरि का सदैव भजन करूँगा।७७।
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- कः पिता कोऽत्र वै माता सर्वे स्वार्थपरा भुवि। न कांक्षे तव राज्यं वै न दास्ये यौवनं मम ।७८।
"अनुवाद:-कौन पिता है कौन माता है यहाँ सब स्वार्थ में रत हैं इस संसार में न मैं अब तुम्हारे राज्य की इच्छा करता हूँ और ना ही अपने यौवन की ही इच्छा करता हूँ यह बात पुरु ने अपने पिता ययाति से कही ।७८।
- इत्युक्त्वा पितरं नत्वा हिमालयवनं ययौ।तत्र तेपे तपश्चापि वैष्णवो धर्मभक्तिमान् ।७९।
"अनुवाद:- इस प्रकार कहकर पिता को नमन कर पुरु हिमालय के वन को चला गया और वहाँ तप किया और वैष्णव धर्म का अनुयायी बन भक्ति को प्राप्त किया।७९।
- कृषिं चकार धर्मात्मा सप्तक्रोशमितक्षितेः । हलेन कर्षयामास महिषेण वृषेण च ।८०।
"अनुवाद:-उस धर्मात्मा ने पृथ्वी को सात कोश नाप कर वहाँ हल के द्वारा कृषि कार्य भैंसा और बैल के द्वारा भी किया।८०।
आतिथ्यं सर्वदा चक्रे नूत्नधान्यादिभिः सदा ।विष्णुर्विप्रस्वरूपेण ययौ कुरोः कृषिं प्रति ।८१।
"अनुवाद:-:- नवीन धन धान्य से वह सब प्रकार से अतिथियों का सत्कार करता तभी एक बार विष्णु भगवान विप्र के रूप धारण कर कुरु के पास गये और उन्हें कृषि कार्य के लिए प्रेरित किया। ८१।
- आतिथ्यं च गृहीत्वैव मोक्षपदं ददौ ततः कुरुक्षेत्रं च तन्नाम्ना कृतं नारायणेन ह ।।८२।।
"अनुवाद:-तब भगवान् विष्णु ने कुरु का आतिथ्य सत्कार ग्रहण कर उसे मोक्ष पद प्रदान किया उस क्षेत्र का नाम नारायण के द्वारा कुरुक्षेत्र कर दिया गया।८२।
कुरुक्षेत्र के समीपवर्ती लोग सदीयों से कृषि और पशुपालन कार्य करते चले आ रहे हैं। आज कल ये लोग जाट " गूजर और अहीरों के रूप में वर्तमान में भी इस कृषि और पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।८२।
- ""सन्दर्भ:-
श्रीलक्ष्मीनारायणीयसंहितायां तृतीये द्वापरसन्ताने ययातेः स्वर्गतः पृथिव्यामधिकभक्त्यादिलाभ इति तस्य पृथिव्यास्त्यागार्थमिन्द्रकृतबिन्दुमत्याः प्रदानं पुत्रतो यौवनप्रप्तिश्चान्ते वैकुण्ठगमन चेत्यादिभक्तिप्रभाववर्णननामा त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७३ ।।
"हे धन के स्वामी (मघवन्/इन्द्र)! हम स्तोताओं के नेता, आपके प्रिय और मित्र बनकर आपके यज्ञों (या स्तुति) में अपने घरों (जीवन) में प्रसन्न रहें। अतिथियों की पूजा करने वाले राजा सुदास को सुख और सम्मान प्रदान करते हुए, आप तुर्वश और याद्व (यदुपुत्र) नामक राजाओं को अपने अधीन या वश में करें।"
त्वम् आविथ नर्यम् तुर्वशम् यदुम् । त्वम् तुर्वीतिम् । वय्यम् शतऽक्रतो त्वम् रथम् एतशम् कृत्व्ये धने त्वम् पुरः । नवतिम् दम्भयः नव ॥
"हे (अनेक कर्मों वाले इन्द्र) ! तुमने ही (मनुष्यों के लिए हितकारी) तुर्वश और यदु की रक्षा की थी; तुमने ही वय्य के पुत्र तुर्वीति की रक्षा की। तुमने ही संग्राम में एतश के रथ की रक्षा की और तुमने ही (शत्रुओं के) निन्यानवे पुरों (नगरों/किलों) को नष्ट किया।"
त्वं ह त्यद् इन्द्र सख्ये वज्रहस्त द्युक्षं यदुं तुर्वशं तुर्वन्तम्। अव प्रावः पुरुमीळ्हस्य सता मदे मन्दसानो व्यस्य ॥
- त्वं ह त्यद् इन्द्र सख्ये वज्रहस्त: हे वज्रहस्त इन्द्र! तुम (सखा के रूप में) अपने उस [पराक्रम / सहायता] के लिए जाने जाते हो।
- द्युक्षं यदुं तुर्वशं तुर्वन्तम्: युद्ध और विजय में, आपने दीप्तिमान (प्रतापी) राजाओं- यदु, तुर्वश और तुर्वन्त की सहायता की।
- अव प्रावः: आपने उनकी रक्षा की और उन्हें बचाया।
वैदिक काल में यदु और तुर्वश (Turvasa) दो महत्वपूर्ण प्राचीन कबीले/राजवंश थे। इस मंत्र में ऋषि वामदेव द्वारा यह स्मरण दिलाया गया है कि हे वज्रधारी इन्द्र! जब इन प्रतापी राजाओं (यदु और तुर्वश) पर संकट आया, तब एक सच्चे मित्र के रूप में आपने दिव्य और शक्तिशाली ढंग से उनकी रक्षा की।
अध्याय-७ (गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय) का सारांश और विश्लेषणात्मक व्याख्या नीचे दी गई है। यह अध्याय यादव वंश के पौराणिक इतिहास, यदु के व्यक्तित्व, और उनके वंशजों के गौरवशाली चरित्र को स्थापित करने का एक व्यापक प्रयास है।
अध्याय-७ का सारांश
यह अध्याय यादवों के आदिपुरुष महाराज यदु से लेकर भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण तक की विस्तृत वंशावली और उनके ऐतिहासिक-पौराणिक स्वरूप का वर्णन करता है। इसे तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:
- महाराज यदु का परिचय: यदु शब्द की व्युत्पत्ति ('यज्' धातु से), उनके गुणों (यज्ञपरायणता, न्यायप्रियता, दानशीलता), और वैदिक संदर्भों (ऋग्वेद) के माध्यम से उनके 'गोपालक' स्वरूप की स्थापना की गई है। यहाँ 'दास' शब्द को वैदिक काल के 'दाता' (दानी) अर्थ में सिद्ध कर, उन्हें शूद्र कहे जाने की धारणा का खंडन किया गया है।
- हैहय वंशी यादव: इसमें यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्रजित के वंशज कार्तवीर्यार्जुन के पराक्रम का वर्णन है। उन्हें सुदर्शन चक्र का अवतार और एक महान चक्रवर्ती अहीर सम्राट बताया गया है। अध्याय में परशुराम-कार्तवीर्यार्जुन युद्ध का विश्लेषण करते हुए यह तर्क दिया गया है कि कार्तवीर्यार्जुन का वध नहीं हुआ था, बल्कि उनके नाम से जुड़ी वध की कथा बाद में जोड़ी गई है।
- क्रोष्टा और वंश विस्तार: यदु के दूसरे पुत्र क्रोष्टा की वंश-परंपरा का वर्णन है, जिसमें अन्धक और वृष्णि वंशों का उदय होता है। इसी कड़ी में वसुदेव-देवकी और नन्दबाबा-यशोदा के परिवारों का संबंध स्पष्ट किया गया है, तथा विन्ध्यवासिनी (योगमाया) के कुलदेवी स्वरूप और श्रीकृष्ण के कुलदेवता होने की पुष्टि की गई है।
अध्याय की विश्लेषणात्मक व्याख्या
यह अध्याय ऐतिहासिक तथ्यों को पौराणिक साक्ष्यों के साथ पिरोने का एक साहसी और तार्किक प्रयास है। इसकी मुख्य व्याख्यात्मक विशेषताएं निम्न हैं:
- शब्दों का दार्शनिक और व्युत्पत्तिपरक पुनर्निर्माण: लेखक ने 'यदु' और 'दास' जैसे शब्दों का पारंपरिक अर्थों से इतर वैदिक व्याकरण के आधार पर अर्थ निकाला है। 'दास' शब्द को 'दाता' के रूप में स्थापित करना और मध्यकालीन कुप्रथाओं/पुरोहितवाद के कारण इसके अर्थ में आए विकृत परिवर्तन को रेखांकित करना इस अध्याय का एक सशक्त पक्ष है।
- गोप (यादव) वर्ण की विशिष्टता: अध्याय स्पष्ट करता है कि गोप वर्ण को पारंपरिक 'चातुर्वर्ण्य' (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र) के दायरे में बांधना त्रुटिपूर्ण है। लेखानुसार, गोप गोलोक से उत्पन्न 'वैष्णव' वर्ण के हैं, जो ब्रह्मा की सृष्टि रचना से भिन्न और स्वतंत्र हैं।
- पौराणिक कथानकों का तार्किक विश्लेषण: कार्तवीर्यार्जुन बनाम परशुराम युद्ध के प्रसंग में लेखक ने 'संदेह और विश्लेषण' की पद्धति अपनाई है। किसी के मरने के बाद पुनः जीवित होने जैसी कथाओं को तार्किक कसौटी पर कसना और यह तर्क देना कि "यदि पूजा होती है तो वध कैसे?"—यह शोधपरक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- कुलदेवी/कुलदेवता की स्थापना: नन्दबाबा के परिवार और वासुदेव के परिवार को एक ही मूल (देवमीढ) से जोड़कर उनके बीच के संबंध को व्यावहारिक और पारिवारिक धरातल पर रखा गया है। विन्ध्यवासिनी योगमाया को यादवों की कुलदेवी के रूप में स्थापित करना वंशावली को एक धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र प्रदान करता है।
- प्रजातंत्रीय सोच का बीजारोपण: यदु को 'राजतंत्र' के विकल्प के रूप में 'प्रजातंत्र' का जनक बताना, उनकी प्रशासनिक सूझबूझ को वर्तमान प्रासंगिकता प्रदान करता है।
निष्कर्ष
यह अध्याय केवल एक वंशावली नहीं है, बल्कि यह यादवों के गौरवशाली अतीत को पुनः स्थापित करने का एक वैचारिक दस्तावेज़ है। यह मध्यकालीन अंधविश्वासों और गलत व्याख्याओं के विरुद्ध एक तार्किक प्रतिवाद (counter-narrative) है, जो श्रीकृष्ण को केवल एक अवतार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित, श्रेष्ठ और अत्यंत गौरवपूर्ण कुल (गोप कुल) के नायक के रूप में स्थापित करता है।
यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्र।
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य जातियों की मौलिकता (Originality of species ) एवं इसकी उत्पत्ति सिद्धान्त को बताते हुए यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्रों की जानकारी देना है।
इन सभी बातों की क्रमबद्ध जानकारी के लिए इस अध्याय को निम्नलिखित- (५) भागों में विभाजित किया गया है।
भाग- (१) जातियों की मौलिकता (Originality of species ) एवं आभीर जाति की उत्पत्ति।
भाग- (२) भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।
[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति।
[ख]- ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
[ग] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अन्तर-
[१]- जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२]- यज्ञमूलक एवं भक्तिमूलक अन्तर।
[३]- भेदभाव एवं समतामूलक अन्तर।
भाग- (३) यादवों का वंश।
भाग- (४) यादवों का कुल।
भाग- (५) यादवों का गोत्र।
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भाग-(१)
जातियों की मौलिकता (Originality of species ) एवं आभीर जाति की उत्पत्ति-
जातियों का निर्धारण मनुष्य की एक ही तरह के रक्त सम्बन्धी आनुवांशिक प्रवृत्तियों से होता है। जिसमें प्रवृत्तियाँ व्यक्ति की जन्मजात होती हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके जाति समूहों में सञ्चारित होती रहती है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के अनुरूप ही व्यक्ति का स्वभाव और गुण बनता है, जो उस जाति समूह को उसी के अनुरूप कार्य करने को प्रेरित करता है। और इसी गुण विशेष के आधार पर जाति का निर्धारण होता है।
अर्थात् जन्मजात प्रवृत्ति मूलक आचरण और व्यवहार के आधार पर ही किसी व्यक्ति की जाति का निर्धारण होता है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के कारण समाज में अलग-अलग जातियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव और गुण देखें जातें हैं।
इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जाति व्यक्ति समूहों की प्रवृत्ति मूलक पहचान है जो सभी जाति के मनुष्य समूहों में अलग-अलग देखी जाती है। जैसे वणिक समाज का वर्ण "वैश्य" है जिनका वृत्ति (व्यवसाय) खरीद-फरोख्त करना है। और उसी के अनुसार उनकी स्वभावगत गहराई- लोलुपता और मितव्यता है। यही उनकी जातिगत और वर्णगत पहचान है।
कुल मिलाकर कोई भी जाति अपने समूह की सबसे बड़ी इकाई होती है। और यह ऐसे ही नहीं बनती है। इसके लिए जाति को छोटी-छोटी इकाईयों के विकास क्रमों से गुजरना होता है। जैसे -
किसी भी जाति की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति होता है, फिर कई व्यक्तियों के मिलने से एक परिवार बनता है, और कई परिवारों के मिलने से कुल और अनेक कुलों या गोत्रों से वंश और जाति का निर्माण होता है। एक जाति में कई वंश हो सकते हैं। अर्थात् पुनः कई कुलों के संयोग से उस जाति का एक वंश और वर्ण बनता है। और वर्ण जाति का निर्धारण करता है सरल शब्दों में वंश, वर्ण, कुल, गोत्र और परिवार के सामूहिक रूप को जाति कहा जाता है। इसी को जाति का विकास क्रम कहा जाता है।
किसी भी जाति के विकास क्रम में मनुष्यों की प्रवृत्तियों की बहुत बड़ी भूमिका रहती है क्योंकि मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर अन्ततोगत्वा वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण (चयन) करने में सहायक होती हैं।
व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) में निर्धारित हुआ है।
अब इसी क्रम में हमलोग जानेंगे कि आभीर जाति की उत्पत्ति कैसे हुई और किस आधार पर यादवों की जाति "अहीर" हुई़ ? जिसे- आभीर को गोप, गोपाल, ग्वाल, घोष, वल्लभ, इत्यादि नामों से क्यों जाना जाता है ?
तो इस सम्बन्ध में बता दें कि- अहीर जाति की वृत्ति यानी व्यवसाय पूर्वकाल से ही कृषि और पशु पालन रहा है। यह वृत्ति उन्ही प्रवृत्ति वालों में हो सकती है जो निर्भीक और साहसी हों। चुँकि गोपालक अहीर अपने पशुओं को जंगलों, तपती धूप, आँधी तूफान, ठण्ड और बारिश की तमाम प्राकृतिक झञ्झावातों को निर्भीकता पूर्वक झेलते हुए पशुओं के बीच रहते हैं। पशु ही इन अहीरों की सम्पत्ति और पूँजी थी
ये तो रही अहीर जाति की वृत्ति एवं प्रवृत्ति मूलक पहचान।
किन्तु जबतक गोप (अहीर) जाति के (Blood relations) रक्त सम्बन्धों को न जान लिया जाए, तब तक अहीर जाति की जानकारी अधूरी ही मानी जाएगी।
तो इसके लिए बता दें कि अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- (१९३) के श्लोक -(१४ और १५) में मिलता है।
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यन्ति मद्वंशप्रभवा नराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे ; और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी। तथा मेरे गोप वंश (कुल) के लोग जहाँ भी रहेंगे, वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो। १४-१५।
अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि गायत्री स्वयं अपने को गोप कुल का तथा गोपों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) किस आधार पर कहती हैं ? इसको भी जानना आवश्यक है।
चुँकि भूतल पर देवी गायत्री गोप जाति की सनातनी एवं आदि देवी हैं। इसलिए उन्हें स्वयं तथा अपने गोपों की मूल उत्पत्ति का ज्ञान था कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति गोलोक में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों अर्थात उनके क्लोन( समरूपण) से हुई है। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-5 के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) से है, जिसमें लिखा गया है कि -
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२।
अनुवाद- ४०-४२
• उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा
• फिर तो श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त विद्यमान है। इसी लिए स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के श्लोक-(१४) में ज्ञान की देवी गायत्री ने भी गोपों अर्थात् आभीरों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) कहीं हैं।
✴️ आभीर जाति को यदि शब्द व्युत्पत्ति के हिसाब से देखा जाय तो- अभीर शब्द में 'अण्' तद्धित प्रत्यय करने पर आभीर समूह वाची रूप बनता है। अर्थात् आभीर शब्द अभीर शब्द का ही बहुवचन है। 'परन्तु परवर्ती संस्कृत कोश कारों नें आभीरों की गोपालन वृत्ति और उनकी वीरता प्रवृत्ति को दृष्टि-गत करते हुए अभीर और आभीर शब्दों की दो तरह से भिन्न-भिन्न व्युत्पत्तियाँ कर दीं। जैसे-
ईसा पूर्व पाँचवी सदी में कोशकार अमरसिंह ने अपने कोश अमरकोश में अहीरों की प्रवृत्ति वीरता (निडरता) को केन्द्रित करके आभीर शब्द की व्युत्पत्ति की है। नीचे देखें।
आ= समन्तात् + भी=भीयं (भयम्) + र= राति ददाति शत्रुणां हृत्सु = जो चारो तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करता है वह आभीर कहलाता है।
किन्तु वहीं पर अमरसिंह के परवर्ती शब्द कोशकार- तारानाथ नें अपने ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में अभीर- जाति की शब्द व्युत्पत्ति को उनकी वृत्ति यानी व्यवसाय के आधार पर गोपालन को केन्द्रित करके ही सुनिश्चित किया है। नींचे देखें।
"अभिमुखी कृत्य ईरयति गा- इति अभीर = जो सामने मुख करके चारो-ओर से गायें चराता है या उन्हें घेरता है।
अगर देखा जाय तो उपर्युक्त दोनों शब्दकोश में जो अभीर शब्द की व्युत्पत्ति को बताया गया है उनमें बहुत अन्तर नहीं है। क्योंकि एक नें अहीरों की वीरता मूलक प्रवृत्ति (aptitude ) को आधार मानकर शब्द व्युत्पत्ति को दर्शाया है तो वहीं दूसरे नें अहीर जाति को गोपालन वृत्ति अथवा (व्यवसाय) (profation) को आधार मानकर शब्द व्युत्पत्ति को दर्शाया है।
उदाहरण है जैसे- दूध, दही, अहीर, रतन, बरस, भगत, थन, घर इत्यादि।
किन्तु यहाँ पर हमें अहीर और आभीर, शब्द के बारे में ही विशेष जानकारी देना है कि इनका प्रयोग हिन्दी और संस्कृत ग्रन्थों में कब, कहाँ और कैसे एक ही अर्थ के लिए प्रयुक्त हुआ है।
तो इस सम्बन्ध में सबसे पहले अहीर शब्द के विषय में जानेंगे कि हिन्दी ग्रन्थों में इसका प्रयोग कब और कैसे हुआ। इसके बाद संस्कृत ग्रन्थों में जानेंगे कि आभीर शब्द का प्रयोग गोप, अहीर और यादवों के लिए कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ।
अहीर शब्द का प्रयोग हिन्दी पद्य साहित्यों में कवियों द्वारा बहुतायत रुप से किया गया है। जैसे-
अहीर शब्द का रसखान कवि अपनी रचनाओं में खूब प्रयोग किए हैं-
तातें तिन्हैं तजि जानि गिरयौ गुन सौगुन गाँठि परैगो।
बाँसुरीबारो बड़ो रिझवार है स्याम जु नैसुक ढार ढरैगौ।
लाड़लौ छैल वही तौ अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगौ।।18।
बाँकी धरै कलगी सिर ऊपर बाँसुरी-तान कटै रस बीर के।
कुंडल कान लसैं रसखानि विलोकन तीर अनंग तुनीर के।
डारि ठगौरी गयौ चित चोरि लिए है सबैं सुख सोखि सरीर के।
जात चलावन मो अबला यह कौन कला है भला वे अहीर के।।88।।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण की श्रद्धा में सदैव लीन रहने वाले कवि इशरदास रोहडिया (चारण), जिनका जन्म विक्रम संवत- (1515) में राजस्थान के भादरेस गांँव में हुआ था। जिन्होंने (500) साल पहले दो ग्रन्थ "हरिरस" और "देवयान" लिखे। जिसमें ईशरदासजी द्वारा रचित "हरिरस" के एक दोहे में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि कृष्ण भगवान का जन्म अहीर (यादव) कुल में हुआ था।
नारायण नारायणा! तारण तरण अहीर।
हूँ चारण हरिगुण चवां, सागर भरियो क्षीर।। ५८।
और श्रीकृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि सूरदास जी ने भी श्रीकृष्ण को अहीर कहते हुए उनका स्तवन किया है। सूरसागर के दशमस्कन्ध-(पृष्ठ ४७९) में लिखा है-
ये उपर्युक्त सभी उदाहरण श्रीकृष्ण के अहीर जाति का होने के हैं जो हिन्दी साहित्यिक ग्रन्थों में प्रयुक्त हुए सन्दर्भ प्रस्तुत करते हैं। अब हम लोग आभीर शब्द को जानेंगे जो प्राकृत भाषा के आहीर का तत्सम रूप है, वह संस्कृत ग्रन्थों में कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ हैं। इसके साथ ही आभीर (अहीर) शब्द के पर्यायवाची शब्द - गोप, गोपाल और यादव को भी जानेंगे कि पौराणिक ग्रन्थों में अभीर के ही अर्थ में कैसे प्रयुक्त हुए हैं।
सबसे पहले हम गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय -(७) के श्लोक संख्या- (१४) को लेते हैं जिसमें में भगवान श्रीकृष्ण और नन्दबाबा सहित पूरे अहीर समाज के लिए आभीर शब्द का प्रयोग शिशुपाल उस समय करता है जब सन्धि का प्रस्ताव लेकर उद्धव जी शिशुपाल के यहाँ जाते हैं। किन्तु वह प्रस्ताव को ठुकराते हुए उद्धव जी से श्रीकृष्ण के बारे में कहता है कि-
आभीरस्यापि नन्दस्य पूर्वं पुत्रः प्रकीर्तितः।
वसुदेवो मन्यते तं मत्पुत्तोऽयं गतत्रपः।।१४।
प्रद्युम्नं तस्तुतं जित्वा सबलं यादवैः सह।
कुशस्थलीं गमिश्यामि महीं कर्तुमयादवीम्।। १६।
अनुवाद -
• वह (श्रीकृष्ण) पहले नन्द नामक अहीर का भी बेटा कहा जाता था। उसी को वसुदेव लाज- हया छोड़कर अपना पुत्र मानने लगे हैं।१४।
• मैं उसके पुत्र प्रद्युम्न को यादवों तथा सेना सहित जीत कर भूमण्डल को यादवों से शून्य कर देने के लिए कुशस्थली पर चढ़ाई करूँगा।१६।
उपर्युक्त दोनो श्लोक को यदि देखा जाए तो इसमें भगवान श्रीकृष्ण सहित सम्पूर्ण अहीर अथवा यादव समाज के लिए ही आभीर शब्द का प्रयोग किया गया है किसी अन्य के लिए नहीं।
भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाक्षश्च वीर्यवान्।
कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः।।६।
यवनकाम्भोजास्तथा हंसपथाश्च ये।
शूरसेनाश्च दरन्दा मद्रकेकयाः।।७।
अनुवाद - शक यवन ,काम्बोज, हंस -पथ नाम वाले देशों के निवासी और शूरसेन प्रदेश के अभीर (अहीर) दरद, मद्र, केकय ,तथा एवं हाथी सवार घुड़सवार रथी और पैदल सैनिकों के समूह उत्तम कवच धारण करने उस व्यूह के गरुड़ ग्रीवा भाग में खड़े थे।६-७।
इसी तरह से विष्णुपुराण द्वित्तीयाँश के तृतीय अध्याय का श्लोक संख्या- (१६-१७ और १८ ) में अन्य जातियों के साथ-साथ शूर आभीरों का भी वर्णन मिलता है-
"तथापरान्ताः ग्रीवायांसौराष्ट्राः शूराभीरास्तथार्ब्बुदाः। कारूषा माल्यवांश्चैव पारिपात्रनिवासिनः ।१६।
सौवीरा-सैन्धवा हूणाः शाल्वाः शाकलवासिनः। मद्रारामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकादयस्तथा ।१७।
आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सरितां सदा ।
समीपतो महाभागा हृष्टपुष्टजनाकुलाः ।। १८।
हे महाभाग ! वे लोग सदा आपस में मिलकर रहते हैं और इन्हीं का जलपान करते हैं। उनकी सन्निधि के कारण वे बड़े हृष्ट-पुष्ट रहते हैं।१८।
▪ इसी तरह से महाभारत के उद्योगपर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय में श्लोक संख्या- (१८) और (१९) पर गोपों (अहीरों) को अजेय योद्धा के रूप में वर्णन है-
"मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत् । नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।
अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों (आभीरों) की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं। उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं।।१८।।
इसी तरह से जब भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र की पूजा बन्द करवा दी, तब इसकी सूचना जब इन्द्र को मिली तो वह क्रोध से तिलमिला उठा और भगवान श्रीकृष्ण सहित समस्त अहीर समाज को जो कुछ कहा उसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय -(२५ )के श्लोक - (३) से( ५) में मिलता है। जिसमें इन्द्र ने अपने दूतों से कहा कि-
अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम्
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम्।।३।
वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम्।। ५।
अनुवाद- ओह, इन जंगली ग्वालों (गोपों ) का इतना घमण्ड ! सचमुच यह धन का ही नशा है। भला देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्ण के बल पर उन्होंने मुझ देवराज का अपमान कर डाला।३।
• कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होने पर भी अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्यु का ग्रास है। फिर भी उसी का सहारा लेकर इन अहीरों ने मेरी अवहेलना की है। ५।
उपर्युक्त दो श्लोकों में यदि देखा जाए- तो इनमें गोप शब्द आया है जो अहीर तथा यादव शब्द का पर्यायवाची शब्द है।
इसी तरह से संस्कृत श्लोकों में अहीरों के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग भागवत पुराण स्कन्ध दशम के अध्याय- (६१) के श्लोक (३५) में मिलता है। जिसमें द्यूत- क्रीडा) जूवा खेलते समय रुक्मि बलराम जी को कहता है कि -
नैवाक्षकोविदा यूयं गोपाला वनगोचरा:।
अक्षैर्दीव्यन्ति राजनो बाणैश्च नभवादृशा।।३४।
अनुवाद - बलराम जी आखिर आप लोग वन- वन भटकने वाले गोपाल (ग्वाले) ही तो ठहरे! आप पासा खेलना क्या जाने ? पासों और बाणों से तो केवल राजा लोग ही खेला करते हैं।
इस श्लोक को यदि देखा जाए तो इसमें बलराम जी के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया गया है जो एक साथ- गोप, ग्वाल, अहीर और यादव समाज के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इसलिए गर्गसंहिता के अनुवाद कर्ता, अनुवाद करते हुए गोपाल शब्द को ग्वाल के रूप में लिखते हैं।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को एक ही प्रसंग में एक ही स्थान पर यदुवंश शिरोमणि और गोप (ग्वाला) दोनों शब्दों से सम्बोधित युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के दरम्यान उस समय किया गया।
सदस्याग्र्यार्हणार्हं वै विमृशनतः सभासदः।
नाध्यगच्छन्ननैकान्त्यात् सहदेवस्तदाब्रवीत् ।।१८।
अर्हति ह्यच्युतः श्रैष्ठ्यं भगवान् सात्वतां पतिः।
एष वै देवताः सर्वा देशकालधनादयः।।१९।
यदात्मकमिदं विश्वं क्रतवश्च यदात्मकाः।
अग्निनराहुतयो मन्त्राः सांख्यं योगश्च यत्परः।। २०।
अनुवाद - अब सभासद लोग इस विषय पर विचार करने लगे कि सदस्यों में सबसे पहले किसकी पूजा (अग्रपूजा) होनी चाहिए। जितनी मति, उतने मत। इसलिए सर्वसम्मति से कोई निर्णय न हो सका। ऐसी स्थिति में सहदेव ने कहा। १८
• यदुवंश शिरोमणि भक्त वत्सल भगवान श्रीकृष्ण ही सदस्यों में सर्वश्रेष्ठ और अग्रपूजा के पात्र हैं, क्योंकि यही समस्त देवताओं के रूप में है, और देश, काल, धन आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सब के रूप में भी ये ही हैं।१९।
• यह सारा विश्व श्रीकृष्ण का ही रूप है। समस्त यज्ञ भी श्री कृष्ण स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्णा ही अग्नि, आहुति और मन्त्रों के रूप में है। ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग ये दोनों भी श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए ही हैं।
भगवान श्रीकृष्ण की इतनी प्रशंसा सुनकर शिशुपाल क्रोध से तिलमिला उठा और कहा -
सदस्पतिनतिक्रम्य गोपालः कुलपांसनः।
यथा काकः पुरोडाशं सपर्यां कथमर्हति।। ३४।
अनुवाद - यज्ञ की भूल-चूक को बताने वाले उन सदस्यपत्तियों को छोड़कर यह कुलकलंक ग्वाला (गोपालक) भला, अग्रपूजा का अधिकारी कैसे हो सकता है ? क्या कौवा कभी यज्ञ के पुरोडाश का अधिकारी हो सकता है ? ३४
उपर्युक्त श्लोकों के अनुसार यदि शिशुपाल के कथनों पर विचार किया जाए तो वह श्रीकृष्ण के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया। यहाँ तक तो शिशुपाल का कथन बिल्कुल सही है, क्योंकि - भगवान श्रीकृष्ण- गोप, गोपाल और ग्वाला ही हैं। परन्तु उसकी भाषा में ये शब्द कृष्ण के प्रति क्रोध और घृणा को प्रकट करते हैं। इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में स्वयं अपने को गोप और गोपकुल में जन्म लेने की भी बात कहते हैं जो इस प्रकार है-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है। भगवान श्रीकृष्ण के गोपों में जन्म लेने की बात तुलसीदास नेम विनय पत्रिका में लिखी
भगवान श्रीकृष्ण को गोपजाति के साथ यदुवंश में उत्पन्न होने को प्रमाण सहित अध्याय- (५) में बताया गया है।
और जहाँ तक बात रही आभीर जाति की वंश मूलक पहचान की, तो इनके वंशमूलक पहचान को इसी अध्याय के भाग (३) में आगे बताया गया है।
अब हमलोग इसके अगले भाग-(दो) में आभीर जाति के यादवों के वर्ण को जानेंगे। क्योंकि जाति के बाद वर्ण का निर्धारण होता है।
वर्ण की सामाजिक पृष्ठभूमि के लिए पञ्च प्रथा को जानना पहले आवश्यक है।
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