सनातन धर्म के प्रबुद्ध अध्येताओं और इतिहास के जिज्ञासुओं ! आज हम इतिहास और पुराणों के उन स्वर्णिम पृष्ठों को खोलने जा रहे हैं, जिन्हें रूढ़िवादिता और अज्ञानता के परदों के पीछे छिपा कर रखा गया।
यादव, गोप अथवा अहीर संस्कृति के इस अकाट्य इतिहास और शास्त्र-सम्मत तथ्यों को अथक परिश्रम से समाज के सामने लाने का श्रेय यादव योगेश कुमार रोहि (अलीगढ़) को जाता है। उनके इस शोध ने यह प्रमाणित किया है कि यादव समाज ब्रह्मा की लौकिक सृष्टि और उनके द्वारा बनाई गई चतुर्वर्ण व्यवस्था से पूर्णतः परे है।
"वैष्णव वर्ण की दिव्य उत्पत्ति
इस शोध के शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार, इन गोपों की उत्पत्ति साक्षात् स्वराट् विष्णु के हृदय-रोमकूपों से हुई है। क्योंकि इनकी उत्पत्ति स्वयं भगवान विष्णु से हुई है, इसीलिए इनका वर्ण आदि काल से 'वैष्णव' है।
चूंकि ब्रह्मा स्वयं भगवान विष्णु के नाभि-कमल से प्रकट हुए हैं, इसलिए विष्णु के हृदय-रोमकूपों से उत्पन्न गोप, आध्यात्मिक और तात्विक दृष्टि से सर्वोच्च और ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय व श्रेष्ठ हैं।
गर्गसंहिता के विश्वजित् खण्ड (अध्याय ११) में साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण सुधर्मा सभा में राजा उग्रसेन से कहते हैं:
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।
जित्वारीनागमिष्यंति हरिष्यंति बलिं दिशाम् ॥७॥
अर्थात्, समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं। वे दोनों लोकों को जीतने की सामर्थ्य रखते हैं और दिग्विजय करके संपूर्ण दिशाओं से उपहार लाएंगे।
इतना ही नहीं, ब्रह्मवैवर्त पुराण (अध्याय ५, श्लोक ४१) में साक्षात् उल्लेख है:
कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो मुने:।
आविर्बभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम: ॥
अर्थात्, गोलोकवासी श्री कृष्ण के रोमकूपों से जिन गोपों की उत्पत्ति हुई, वे रूप, वेश और गुण में साक्षात् श्रीकृष्ण यानी स्वराट्-विष्णु के ही समान थे।
स्वतंत्र पंचम वर्ण (वैष्णव वर्ण)
ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के अनुसार, विराट पुरुष के मुख, बाहु, जंघा और चरणों से क्रमशः चार वर्णों का प्रादुर्भाव हुआ। यह ब्रह्मा की लौकिक व्यवस्था थी।
परन्तु, ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड (अध्याय ११, श्लोक ४३) में स्पष्ट उद्घोष है:
ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रोजातयोयथा।
स्वतन्त्राजातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा ॥
अर्थात्—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे चार वर्ण तो हैं ही, परन्तु इनसे पृथक, इस विश्व में एक पांचवा स्वतंत्र वर्ण है, जिसे 'वैष्णव वर्ण' कहा जाता है, और गोप उसी दिव्य वर्ण के प्रतीक हैं।
पद्मपुराण के उत्तरखण्ड (अध्याय ६८) में स्वयं महादेव कहते हैं कि समस्त वर्णों में वैष्णव वर्ण ही सर्वश्रेष्ठ है।
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