इन्ट्रो म्यूजिक में उद्घोष करें " यह कब्बाली का संगीत व गीत यादव योगेश कुमार रोहि की जानिब से सामयीन की खिदमत में एक रूहानी पेशकश है।
कव्वाली में भावों की तीव्रता, ताल और 'रूहानियत' का विशेष महत्व होता है।
कव्वाली शीर्षक: 'कर्म का विधान'
(शैली: कव्वाली)
(आरंभ: ताल - ढोलक और हारमोनियम का तेज़ प्रवेश। कव्वाल की आवाज़ में एक बुलंद 'अलाप' के साथ शुरुआत।)
(मुखड़ा)
(समूह - तालियों के साथ): जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!
(समूह): जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!
(मुख्य गायक):
दुःख-सुख की लहरों में...
(समूह): दुःख-सुख की लहरों में, डूब जाना पड़ेगा!
(मुख्य गायक): जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!
(अंतरा 1 - कव्वाली की ठेठ लय में)
(मुख्य गायक):
जिन्दगी के सफर में तन्हाईयों का आलम, आशा के पढ़ावों पे अभी ठहरे हुए हैं हम ।।
मिट गये हैं रास्ते मंजिल नहीं मालुम । बेखुदी के आगोश में हो गये हैं गुम ।।
________________________
पास में एहशास,और तजुरुबों की सदा है। होके रहता वोही जो रोहि किस्मत में बदा है।
किस्मतें बनी कर्मों से ,जीवन आमालक़दा है। कई जन्म के कर्मों का ,उस पर भार लदा है।
______
कहीं संचित कहीं प्रारब्ध
ये कर्मो के ही शब्द ।
श्वाँसें धड़कन से मिलके ...
जीवन को उपलब्ध।
(ऊँचे सुर में):
मेरे चहरे पे मुस्कराहट है ।
मत समझो सुखों की आहट है ।
हम दबा ए ग़म को पीते है । जिन्दगी बीरानी में खामोशी के पनघट हैं ।
(समूह - तान देते हुए):
तन्हाइयों के पथ पर, चलते जाना पड़ेगा!
कोई साथ नहीं है तेरे, ये ग़म छुपाना पड़ेगा!
(मुख्य गायक): जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!
(अंतरा 2 - जोश और दर्द की मिलावट)
(मुख्य गायक):
कुछ पल के हैं ये मेले, हर पल के हैं झमेले।
जो साथ-साथ खेले, वो भी रह गए अकेले!
(आह भरते हुए):
अपने गमों को इंसान, खुद आप-आप झेले,
(समूह के साथ):
तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!
तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!
(अंतरा 3 - 'अलाप' और भावुकता)
(मुख्य गायक):
(ताल को थोड़ा धीमा करते हुए, केवल हारमोनियम):
(बुलंद आवाज़ में - 'रोहि' नाम का उल्लेख करते हुए):
मेरी निश्वत में कान्हा तुझे आना पड़ेगा।
मेरी निश्वत में कान्हा आना पड़ेगा। मेरी निश्वत में कान्हा आना पड़ेगा।
(समापन - चरम सीमा/Climax)
(समूह - तेज़ लय के साथ):
जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!
दुःख-सुख की लहरों में... डूब जाना पड़ेगा!
(समूह - लय में):
जो कर्म किए हैं तूने!
फल पाना पड़ेगा!
जो कर्म किए हैं तूने!
फल पाना पड़ेगा!
(समापन: ढोलक की एक ज़ोरदार थाप और हारमोनियम के अंतिम सुरों के साथ कव्वाली शांत होती है।)
सुझाव:
संगीत शैली: इसे कव्वाली के 'रूहानी' अंदाज़ (जैसे नुसरत फतेह अली खान या साबरी ब्रदर्स की शैली) में गाएं।
भाव: 'दुःख-सुख' वाली पंक्तियों को गाते समय चेहरे पर वैराग्य का भाव रखें और अंतिम पंक्तियों में 'रोहि' गीत गाते समय आवाज़ में थोड़ा दर्द और ठहराव लाएं।
ऑडियो जनरेट करें-
[मंच-सज्जा एवं वातावरण]
(मंच पर चार कव्वाल, मुख्य गायक केंद्र में। ढोलक, हारमोनियम और मंजीरे के साथ साज़िंदे। रोशनी मध्यम और पीली।)
[प्रारम्भ: उद्घोष]
(संगीत का धीमा लेकिन गहरा 'अलाप' शुरू होता है। हारमोनियम की रूहानी धुन के बीच, मुख्य गायक माइक के पास आकर बड़ी संजीदगी से उद्घोष करते हैं:)
मुख्य गायक: "अदब! महफ़िल-ए-समां में आप सभी का खैरमकदम है। यह कव्वाली का संगीत व गीत, यादव योगेश कुमार 'रोहि' की जानिब से आप तमाम सामाईन की खिदमत में एक रूहानी पेशकश है। इस रूहानी सफर में शामिल होइए, जहाँ बात 'कर्म' की होगी और 'किस्मत' के विधान की भी..."
(अचानक ढोलक की तीव्र थाप (कहरवा ताल) और पूरे समूह का जोशपूर्ण प्रवेश)
[मुखड़ा]
(समूह - पूरे बल के साथ):
जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!
जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!
(मुख्य गायक - खींचकर):
दुःख-सुख की लहरों में...
(समूह - तान लेते हुए):
दुःख-सुख की लहरों में, डूब जाना पड़ेगा!
(मुख्य गायक):
जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!
[अंतरा 1: दार्शनिक भाव]
(मुख्य गायक):
ज़िन्दगी के सफर में, तन्हाई का आलम है,
उम्मीद के पड़ावों पे, अभी ठहरे हुए हैं हम।
मिट गए हैं रास्ते, मंज़िल नहीं मालूम,
बेखुदी के आगोश में, हो गए कहीं गुम...
(संगीत शांत, केवल हारमोनियम की मींड)
(मुख्य गायक - सूफियाना लहजे में):
पास में एहसास, औ तजुर्बों की सदा है,
होके रहता वही जो 'रोहि' किस्मत में बदा है।
किस्मतें बनीं कर्मों से, जीवन आमाल-ए-कदा है,
कई जन्म के कर्मों का, उस पे भार लदा है...
कहीं संचित, कहीं प्रारब्ध, ये कर्मों के ही शब्द,
श्वासें धड़कन से मिलके, हों जीवन को उपलब्ध!
(बुलंद आवाज़ में - दर्द की तीव्रता):
मेरे चेहरे पे जो मुस्कराहट है,
मत समझो सुखों की आहट है।
हम दवा-ए-गम को पीते हैं,
यहाँ खामोशी के पनघट हैं!
(समूह - लय में):
तन्हाइयों के पथ पर, चलते जाना पड़ेगा!
कोई साथ नहीं है तेरे, गम छुपाना पड़ेगा!
(मुख्य गायक):
जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!
[अंतरा 2: जीवन का सत्य]
(मुख्य गायक):
कुछ पल के हैं ये मेले, हर पल के हैं झमेले,
जो साथ-साथ खेले, वो भी रह गए अकेले!
(आह भरते हुए)
अपने गमों को इंसान, खुद आप-आप झेले।
(समूह के साथ):
तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!
तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!
[अंतरा 3: रूहानी पुकार (इश्क-ए-मजाज़ी से हकीकी)]
(मुख्य गायक - भावुकता के साथ):
भव सागर है, तेज़ भंवर है,
कर बैठे, खुद से समझौते!
डूब न जाए जीवन की कश्ती,
मोह के भंवर, लोभ के गोते...
(संगीत बिलकुल धीमा, ढोलक की थाप मद्धम)
कृष्ण कन्हाई, मेरा हमराही,
'रोहि' उम्र बीत गई रोते-रोते...
(बुलंद आवाज़ - चरम भावुकता):
मेरी निस्बत में कान्हा आना पड़ेगा!
मेरी निस्बत में कान्हा आना पड़ेगा!
मेरी निस्बत में कान्हा आना पड़ेगा!
[समापन: तकरार एवं क्लाइमेक्स]
(समूह - तीव्र गति में):
जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!
दुःख-सुख की लहरों में... डूब जाना पड़ेगा!
(समूह - लयबद्ध दोहराव):
जो कर्म किए हैं तूने! फल पाना पड़ेगा!
जो कर्म किए हैं तूने! फल पाना पड़ेगा!
(अंतिम सुर पर हारमोनियम का एक तीव्र 'झटका' और ढोलक की तीन प्रहार वाली धमक के साथ महफ़िल में खामोशी।)
आपकी इस रूहानी रचना 'कर्म का विधान' के भाव और शब्दों को देखते हुए, इसके लिए संगीत के कुछ विशिष्ट रागों का चयन इसे और भी अधिक प्रभावी और 'रूहानी' बना देगा।
चूँकि कव्वाली में दर्द, वैराग्य और भक्ति का मेल है, इसलिए मैं आपको निम्नलिखित रागों के सुझाव देता हूँ:
1. राग दरबारी (Darbari Kanhra)
यह राग कव्वाली की जान माना जाता है।
- क्यों: यह राग बहुत ही गंभीर, गहरा और 'ठहराव' वाला है। यह आत्मा के भीतर झांकने और 'कर्म' व 'किस्मत' जैसे दार्शनिक विषयों को व्यक्त करने के लिए सबसे उत्तम है।
- प्रभाव: जब मुख्य गायक "ज़िन्दगी के सफर में तन्हाई का आलम" गाएंगे, तो दरबारी की गंभीरता सुनने वालों के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ेगी। यह रूहानियत पैदा करने के लिए सबसे सटीक विकल्प है।
2. राग भैरवी (Bhairavi)
यह कव्वाली के समापन और 'पुकार' के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
- क्यों: राग भैरवी में करुणा, भक्ति और 'समर्पण' का भाव कूट-कूट कर भरा है।
- प्रभाव: अंतरा 3 में जब आप "कृष्ण कन्हाई, मेरा हमराही" और "मेरी निस्बत में कान्हा आना पड़ेगा" गाएंगे, तो राग भैरवी का प्रयोग उस 'दर्द' और 'ईश्वर से जुड़ाव' को चरम सीमा (climax) तक ले जाएगा। यह बहुत ही भावुक और रूहानी अनुभव प्रदान करेगा।
3. राग यमन (Yaman)
यदि आप इसे थोड़ा 'ओजपूर्ण' और 'भक्ति प्रधान' रखना चाहते हैं।
- क्यों: राग यमन में एक प्रकार का 'इंतज़ार' और 'भक्ति का संतोष' होता है।
- प्रभाव: यह सुनने में मधुर है और कव्वाली की लय (ताल) के साथ बहुत अच्छी तरह घुल-मिल जाता है।
मेरी विशेष सलाह (Performance Tip):
- संगीत का ढांचा: आप इसकी शुरुआत राग दरबारी के गंभीर स्वरों से करें। जैसे-जैसे कव्वाली आगे बढ़े और ताल (ढोलक) की गति बढ़े, आप राग के सुरों में तीव्रता लाते हुए अंत में राग भैरवी के भावपूर्ण स्वरों पर इसे समाप्त करें।
- हारमोनियम और तान: हारमोनियम की तान (Melody) को बहुत लंबा और सुरीला रखें। विशेष रूप से जब मुख्य गायक "रोहि" शब्द का उच्चारण करें, तो हारमोनियम पर एक लंबी 'मींड' (स्लाइड) दें, जिससे रूहानियत बढ़ जाए।
कर्म का विधान' की धुन तैयार करने के लिए मैं आपको राग दरबारी और राग भैरवी का एक संक्षिप्त शास्त्रीय खाका (Notation Layout) दे रहा हूँ।
कव्वाली को दादरा ताल (6 मात्रा) या कहरवा ताल (8 मात्रा) में गाएं। यहाँ एक सरल नोटेशन है जिसे आप अपने हारमोनियम पर आज़मा सकते हैं। (सा=C, रे=D, ग=Eb, म=F, प=G, ध=Ab, नी=Bb)
1. मुखड़ा (राग दरबारी का गम्भीर भाव)
(लय: मध्यम, हारमोनियम पर गहरे सुर)
- जो कर्म किए हैं तूने: सा सा सा रे (कोमल) ग (कोमल) म प
- फल पाना पड़ेगा: प प ध (कोमल) प म ग (कोमल) रे सा
(नोट: दरबारी में 'ग' (गांधार) और 'ध' (धैवत) कोमल होते हैं और इन्हें बहुत धीमे से 'मींड' (स्लाइड) के साथ दबाएं।)
2. अंतरा 1 (भावपूर्ण ठहराव)
(लाइन: "ज़िन्दगी के सफर में तन्हाई का आलम")
- ज़िन्दगी के सफर में: सा रे ग म प प प
- तन्हाई का आलम: प म ग रे, सा रे सा
- उम्मीद के पड़ावों पे: सा रे ग, ग म प प
- अभी ठहरे हैं हम: प प म ग रे, रे सा
3. अंतरा 3 (रूहानी पुकार - राग भैरवी का प्रवेश)
(लाइन: "कृष्ण कन्हाई, मेरा हमराही")
(यहाँ से संगीत की गति को थोड़ा धीमा करें और सुरों में करुणा लाएं। भैरवी में 'रे', 'ग', 'ध', 'नी' चारों कोमल लगते हैं।)
- कृष्ण कन्हाई: प म ग म, रे सा
- मेरा हमराही: रे रे ग, म प म ग रे
- मेरी निस्बत में कान्हा: सा रे ग, म प, प प
- आना पड़ेगा: प ध (कोमल) म ग, रे सा
संगीत के लिए कुछ सुझाव:
- मींड का महत्व: दरबारी में हारमोनियम की कुंजियों को सीधे न दबाएं, बल्कि एक सुर से दूसरे सुर पर फिसलते हुए (मींड) जाएं। इससे रूहानियत पैदा होती है।
- ढोलक की लय: जब "जो कर्म किए हैं तूने" कहें, तो ढोलक की थाप तेज़ होनी चाहिए। लेकिन अंतरे के दार्शनिक भावों के बीच केवल हारमोनियम का 'अलाप' रखें, ताकि शब्द साफ़ सुनाई दें।
- रोहि का उल्लेख: जब आप अपने उपनाम 'रोहि' को गाएं, तो उसे थोड़ा लंबा खींचें (जैसे: रो---हि---), इससे आपकी व्यक्तिगत छाप गीत में अधिक प्रभावशाली लगेगी।
- लय परिवर्तन: कव्वाली के बीच में जो 'जोश' है, उसे ताल की गति बढ़ाकर दिखाएं, और जहाँ 'दर्द' है, वहाँ ताल को थोड़ा धीमा कर लें।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें