स्कन्द पुराण नागरखण्ड अध्याय (१९३) के श्लोक-
त्वं च विष्णो तया प्रोक्तो मर्त्यजन्म यदाऽप्स्यसि ॥ तत्रापि परभृत्यत्वं परेषां ते भविष्यति ॥ ११ ॥
अनुवाद: हे विष्णु! उसने (सावित्री ने) तुमसे कहा है कि जब तुम मृत्युलोक में जन्म लोगे, तब वहाँ भी तुम्हें दूसरों का सेवक (परभृत्य) बनना पड़ेगा।
तत्कृत्वा रूपद्वितयं तत्र जन्म त्वमाप्स्यसि ॥यत्तया कथितो वंशो ममायं गोपसंज्ञितः ॥तत्र त्वं पावनार्थाय चिरं वृद्धिमवाप्स्यसि ॥ १२ ॥
अनुवाद: तुम दो रूप धारण करके वहाँ जन्म लोगे। सावित्री ने जिस 'गोप' नाम वाले वंश का उल्लेख किया है, उसे पवित्र करने के लिए तुम वहाँ दीर्घकाल तक वृद्धि को प्राप्त करोगे।
एकः कृष्णाभिधानस्तु द्वितीयोऽर्जुनसंज्ञितः ॥तस्यात्मनोऽर्जुनाख्यस्य सारथ्यं त्वं करिष्यसि ॥ १३ ॥
अनुवाद: (उनमें से) एक का नाम 'कृष्ण' होगा और दूसरे का 'अर्जुन'। तुम अपने उस 'अर्जुन' रूपी अंश के सारथी बनोगे।
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यंति श्लाघ्यताम् ॥सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥ १४ ॥
अनुवाद: तुम्हारे उस कार्य (सारथ्य) के कारण, वे गोप जन (अहीर), जो तेरे ही रक्त हैं, सभी लोकों और विशेषकर देवताओं द्वारा भी प्रशंसनीय हो जाएंगे।
यत्रयत्र च वत्स्यंति मद्वं शप्रभवानराः ॥ तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति ॥ १५ ॥
अनुवाद: मेरे वंश से उत्पन्न ये लोग आभीरगण जहाँ-जहाँ भी निवास करेंगे, वहाँ वन में रहने पर भी लक्ष्मी का वास (सुख-समृद्धि) बना रहेगा।
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