जीवन-रागः (एक दार्शनिक यात्रा)
(पृष्ठभूमि में: बाँसुरी या सितार की एक धीमी और कोमल धुन शुरू होती है, जो धीरे-धीरे एक गंभीर आलाप का रूप लेती है।)
सूत्रधार (धीमी और भावपूर्ण आवाज़ में):
जीवन... क्या है यह? एक क्षण का स्पंदन? या अनंत काल तक गूँजने वाला एक स्वर? हमारे ऋषियों ने इसे 'राग' कहा है। आइए, जीवन के इसी आलापमयी प्रवाह को एक छंद में महसूस करते हैं।
(संगीत की लय थोड़ी स्थिर होती है)
पाठ (संस्कृत श्लोक का पाठ - गूँजती हुई आवाज़ में):
बालस्य रुदितं यद्धि जीवनस्य च सूचकम्।
सङ्गीतं प्रथमं तद्वै आलाप इव विश्रुतम्॥
सूत्रधार (अनुवाद):
नवजात शिशु का वह प्रथम रुदन, केवल एक ध्वनि नहीं, वह जीवन की उपस्थिति का उद्घोष है। यह उस विराट संगीत का 'आलाप' है, जो अभी शुरू हुआ है।
(संगीत में स्वरों का हल्का विस्तार होता है)
पाठ:
आलापः स्वरविस्तारो गवेषणं यथैव हि।
तद्वज्जीवनरागस्य प्रथमा ध्वनिरुच्यते॥
सूत्रधार (अनुवाद):
जैसे संगीत में 'आलाप' स्वर की संभावनाओं को खोजता है, वैसे ही जीवन की पहली आहट भविष्य की उन तमाम संभावनाओं का बीजारोपण है।
(संगीत थोड़ा गंभीर और भावुक होता है)
पाठ:
जातो रोदिति मर्त्यो वै मरणेऽपि स रोदिति।
रोदयत्यनुगान् सर्वान् गच्छन् वै शान्तिमन्तिमम्॥
सूत्रधार (अनुवाद):
आगमन पर रुदन, और अवसान पर भी रुदन। मनुष्य जब आता है, तब भी रोता है और जब जाता है, तब भी स्वयं के साथ-साथ अपने प्रियजनों की आँखों में जल भर जाता है। यही जीवन का सत्य है।
(संगीत अब एक अखंड लय में ढल जाता है)
पाठ:
आगमाद् गमनं यावद् जीवनं गीतमेव हि।
प्रवाहः स्वररागाणाम् अखण्डः सम्प्रवर्तते॥
सूत्रधार (अनुवाद):
जन्म के उस पहले स्वर से लेकर, मृत्यु की उस परम शांति तक... जो कुछ भी है, वह सब एक गीत है। जन्म और मरण के सुरों का एक अखंड और निरंतर बहता हुआ प्रवाह।
(संगीत धीरे-धीरे कम होते हुए एक अंतहीन मौन में विलीन हो जाता है)
सूत्रधार:
जीवन एक गीत है... क्या आपने आज का अपना स्वर सुन लिया?
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