गुरुवार, 25 जून 2026

कव्वाली-

कव्वाली: कर्म का विधान

लेखन एवं संकल्पना: यादव योगेश कुमार 'रोहि'

[मंच-सज्जा एवं वातावरण]

(मंच पर चार कव्वाल, मुख्य गायक केंद्र में। ढोलक, हारमोनियम और मंजीरे के साथ साज़िंदे। रोशनी मध्यम और पीली।)

[प्रारम्भ: उद्घोष]

(संगीत का धीमा लेकिन गहरा 'अलाप' शुरू होता है। हारमोनियम की रूहानी धुन के बीच, मुख्य गायक माइक के पास आकर बड़ी संजीदगी से उद्घोष करते हैं:)

मुख्य गायक: "अदब ! 'महफ़िल-ए-मुस्तमेअ' में आप सभी का खैरमकदम है। इस कव्वाली का संगीत व गीत, यादव योगेश कुमार 'रोहि' की जानिब से आप तमाम सामाईन की खिदमत में एक रूहानी पेशकश है। इस रूहानी सफर में शामिल होइए, जहाँ बात 'कर्म' की होगी और वहाँ 'किस्मत' के विधान की भी होगी "

(अचानक ढोलक की तीव्र थाप (कहरवा ताल) और पूरे समूह का जोशपूर्ण प्रवेश)आलाप रिदम े स्वर का-

[मुखड़ा]

(समूह - पूरे बल के साथ):

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा! जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!

(मुख्य गायक - खींचकर):

दुःख-सुख की लहरों में... आलाप---

(समूह - तान लेते हुए):

दुःख-सुख की लहरों में, डूब जाना पड़ेगा!

(मुख्य गायक):

जो कर्म किए हैं तूने, फल पाना पड़ेगा!

[अंतरा 1: दार्शनिक भाव]

(मुख्य गायक):

ज़िन्दगी के सफर में, तन्हाई का आलम है,

उम्मीद के पड़ावों पे,अभी ठहरा हुआ ग़म है।।

मिट गए हैं रास्ते, मंज़िल नहीं मालूम है ,

बेखुदी के आगोश में, मुसाफ़िर अभी गुम है...

(संगीत शांत, केवल हारमोनियम की मींड)

(मुख्य गायक - सूफियाना लहजे में):

पास में एहसास, तजुर्बों की सद़ा है,

होता है वही जो ' किस्मत में बदा है।


(बुलंद आवाज़ में - दर्द की तीव्रता):

मेरे चेहरे पे जो मुस्कराहट है,

मत समझो सुखों की आहट है।

हम दवा-ए-गम वहाँ पीते हैं,

जहाँ खामोशी की पनाघट हैं!

(समूह - लय में):

तन्हाइयों के पथ पर, चलते जाना पड़ेगा!

कोई साथ नहीं है तेरे, गम छुपाना पड़ेगा!

(मुख्य गायक):

जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!

[अंतरा 2: जीवन का सत्य]

(मुख्य गायक):

किस्मतें बनती हैं कर्मों की टकसाल से।

इन कर्मों  का मुझपे भार लदा है...

​कहीं संचित, कहीं प्रारब्ध, ये कर्मों के ही शब्द,

(श्वांस भरते हुए):

श्वांस धड़कन की जैसे  हमकद़ा है।

(समूह के साथ):

तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!

तुझे अपने मन को आखिर, समझाना पड़ेगा!

[अंतरा 3: रूहानी पुकार]

(मुख्य गायक - भावुकता के साथ):

भव सागर है, तेज़ भंवर है,

इन लहरों में अपना घर है ।

कर बैठे, खुद से समझौते!

रोहि तूफानों का मंजर है।

(समूह - तीव्र गति में):

जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!

दुःख-सुख की लहरों में... डूब जाना पड़ेगा!

डूब न जाए जीवन की कश्ती, 

लहर लहर पे छाया कहर है।

मोह के भंवर, लोभ के गोते...

(संगीत बिलकुल धीमा, ढोलक की थाप मद्धम)

'' सब उम्र बीत गई रोते-रोते...

कृष्ण कन्हाई, मेरा हमराही,

(बुलंद आवाज़ - चरम भावुकता):

मेरी निस्बत में तुझे आना पड़ेगा!

मेरी निस्बत में  आना पड़ेगा!

मेरी निस्बत में कान्हा आना पड़ेगा!

[समापन: तकरार एवं क्लाइमेक्स]

(समूह - तीव्र गति में):

जो कर्म किए हैं तूने... फल पाना पड़ेगा!

दुःख-सुख की लहरों में... डूब जाना पड़ेगा!

(समूह - लयबद्ध दोहराव):

जो कर्म किए हैं तूने! फल पाना पड़ेगा!

जो कर्म किए हैं तूने! फल पाना पड़ेगा!

(ढोलक की एक ज़ोरदार अंतिम थाप। हारमोनियम का एक लंबा, रूहानी सुर जो धीरे-धीरे  आलाप के साथ शून्य में विलीन हो जाता है।)

(शांत)

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