तन्त्रमतेऽस्या उत्पत्यादिविवरणानि यथा -कात्यायन्युवाच ।
“वासुदेव महाबाहो मा भयं कुरु पुत्त्रक ।
मथुरां गच्छ तातेति तव सिद्धिर्भविष्यति ॥
गच्छ गच्छ महाबाहो पद्मिनीसङ्गमाचर ।
पद्मिनी मम देवेश व्रजे राधा भविष्यति ।
अन्याश्च मातृकादेव्यः सदा तस्यानुचारिकाः ॥
वासुदेव उवाच । शृणु मातर्म्महामाये चतुवर्गप्रदायिनि । त्वां विना परमेशानि ! विद्यासिद्धिर्न जायते ॥ पद्मिनीं परमेशानि ! शीघ्रं दर्शय सुन्दरि ! । प्रत्ययं मम देवेशि ! तदा भवति मानसम् ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य वासुदेवस्य तत्क्षणात् ।आविरासीत्तदा देवी पद्मिनी परसंस्थिता ॥ रक्तविद्युल्लताकारा पद्मगन्धसमन्विता । रूपेण मोहयन्ती सा सखीगणसमन्विता ॥ सहस्रदलपद्मान्तर्म्मध्यस्थानस्थिता सदा । सखीगणयुता देवी जपन्ती परमाक्षरम् ॥ एकाक्षरी महेशानि ! सा एव परमाक्षरा । कालिका या महाविद्या पद्मिन्या इष्टदेवता । वासुदेवो महाबाहुर्दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥ पद्मिन्युवाच । व्रजं गच्छ महाबाहो शीघ्रं हि भगवन् ! प्रभो ! । त्वया सह महाबाहो कुलाचारं करोम्यहम् ॥ वासुदेव उवाच । शृणु पद्मिनि मे वाक्यं कदा ते दर्शनं भवेत् । कृपया वद देवेशि ! जपं किंवा करोम्यहम् ॥ पद्मिन्युवाच ।
तवाग्रे देवदेवेश मम जन्म भविष्यति । गोकुले माथुरे पीठे वृकभानुगृहे ध्रुवम् ॥ दुःखं नास्ति महाबाहो मम संसर्गहेतुना । कुलाचारोपयुक्ता या सामग्री पञ्चलक्षणा ॥ मालायां तव देवेश सदा स्थास्यति नान्यथा । इत्युक्त्वा पद्मिनी सा तु सुन्दर्य्या दूतिका तदा ॥ अन्तर्ध्यानं ततो गत्वा मालायां सहसा क्षणात् । वासुदेवोऽपि तां दृष्ट्वा क्षीराब्धिं प्रययौ ध्रुवम् ॥ त्यक्त्वा काशीपूरं रम्यं महापीठं दुरासदम् । प्रययौ माथुरं पीठं पद्मिनी परमेश्वरी ॥ यत्र कात्यायनी दुर्गा महामायास्वरूपिणी । नारदार्द्यैर्म्मुनिश्रेष्ठैः पूजिता संस्तुता सदा ॥ कात्यायनी महामाया यमुनाजलसंस्थिता । यमुनाया जलं तत्र साक्षात् कालीस्वरूपिणी ॥ बहुपत्रयुतं रम्यं शुक्लपीतं महाप्रभम् । रक्तं कृष्णं तथा चित्रं हरितं सर्व्वमोहनम् । कालिन्द्याख्या महेशानि यत्र कात्यायनी परा ॥ कालिन्दी कालिका माता जगतां हितकाम्यया । साराध्यास्ते महेशानि ! देवर्षिसंस्तुता परा । सहस्रदलपत्रान्तर्म्मध्येच माथुरमण्डलम् ॥ केशबन्धे महेशानि ! यत् पद्मं सततं स्थितम् । पद्ममध्ये महेशानि ! केशपीठं मनोहरम् ॥ केशबन्धं महेशानि ! व्रजं माथुरमण्डलम् । यत्र कात्यायनी माया महामाया जगन्मयी ॥ व्रजं वृन्दावनं देवि ! नानाशक्तिसमन्वितम् । शक्तिस्तु परमेशानि ! कलारूपेण साक्षिणी । शक्तिं विना परं ब्रह्म न भाति शवरूपवत् ॥
“ इति वासुदेवरहस्ये राधातन्त्रे षष्ठः पटलः ॥
देव्युवाच । “ व्रजं गत्वा महादेवाकरोत् किं पद्मिनी तदा । कस्य वा भवने सा तु जाता सा पद्मिनी परा ॥ तत् सर्व्वं परमेशान विस्ताराद्वद शङ्कर । यदि नो कथ्यते देव विमुञ्चामि तदा तनुम् ॥ ईश्वर उवाच । पद्मिनी पद्मगन्धा सा वृकभानुगृहे प्रिये ! ।
आविरासीत्तदा देवी कृष्णस्य प्रथमं प्रिया ।
चैत्रे मासि सिते पक्षे नवम्यां पुष्यसंयुते ॥ कालिन्दीजलकल्लोले नानापद्मगणावृते । अविरासीत्तदा पद्मा मायाडिम्बमुपाश्रिता ॥ डिम्बोभूत्वा तदा पद्मा स्थिता कनकमध्यतः । कोटिचन्द्रप्रतीकाशं डिम्बं मायासमन्वितम् ॥ पुष्ययुक्तनवम्यां वै निश्यर्द्धे पद्ममध्यतः । आविरासीत्तदा पद्मा रङ्गिणी कुसुमप्रभा ॥ तरुणादित्यसङ्काशे पद्मे परमकामिनी । वृकभानुपुरं देवि ! कालिन्दीपारमेव च ।
नाम्ना पद्मपुरं रम्यं चतुर्व्वर्गसमन्वितम् ॥ डिम्बज्योतिर्म्महेशानि ! सहस्रादित्यसन्निभम् । तत्क्षणात् परमेशानि गाढध्वान्तविनाशकृत् ॥ वृकभानुर्म्महात्मा स कालिन्दीतटमास्थितः । महाविद्यां महाकालीं सततं प्रजपेत्सुधीः ॥ आविरासीन्महामाया तदा कात्यायनी परा । शृणु पुत्त्र महाबाहो वृकभानो महीधर । सिद्धोऽसि पुरुषश्रेष्ठ वरं वरय साम्प्रतम् ॥ वृकभानुरुवाच । सिद्धोऽहं सततं देवि ! त्वत्प्रसादात् सुरेश्वरि ! । त्वत्प्रसादान्महामाये यथा मुक्तो भवाम्यहम् ॥ त्वत्प्रसादान्महामाये असाध्यं नास्ति भूतले । आत्मनः सदृशाकारां कन्यामेकां प्रयच्छ मे ॥ तच्छ्रुत्वा परमेशानि ! तदा कात्यायनी परा । मेषगम्भीरया वाचा यदाह वृकभानवे ॥ तच्छृणुष्व महेशानि ! पीयूषसदृशं वचः । भक्त्या त्वदीयपत्न्यास्तु तुष्टाहं त्वयि सुन्दरि ! ॥ एतद्धि वचनं वत्स ! तव पत्न्या सुयुज्यते । इत्युक्त्वा सहसा तत्र महामाया जगन्मयी ॥ प्रददौ परमेशानि ! तस्मै डिम्बं मनोहरम् । वृकभानुर्म्महात्मा स तत्क्षणाद्गृहमाययौ ॥
भार्य्या तस्य विशालाक्षी विशालकटिमोहिनी । रत्नप्रदीपमाभाष्य
प्रस्तुत श्लोक 'वासुदेवरहस्य' के 'राधातन्त्र' के छठे पटल से उद्धृत हैं। यहाँ तन्त्रशास्त्र के दृष्टिकोण से राधा (पद्मिनी) की उत्पत्ति का विवरण दिया गया है। इसका व्यवस्थित हिन्दी अनुवाद निम्नलिखित है:
प्रथम भाग: वासुदेव और पद्मिनी का संवाद
कात्यायनी ने कहा: "हे वासुदेव! हे महाबाहो! भय मत करो, पुत्र। तुम मथुरा जाओ, वहाँ तुम्हारी सिद्धि होगी। हे महाबाहो! जाओ और पद्मिनी का संग करो। हे देवेश! वह पद्मिनी ब्रज में 'राधा' होगी और अन्य मातृका देवियाँ उसकी सदा अनुचारिका (सहायिका) रहेंगी।"
वासुदेव ने कहा: "हे मातर्! हे महामाये! हे चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्रदान करने वाली! सुनो, तुम्हारे बिना विद्या की सिद्धि नहीं होती। हे परमेशानि! उस पद्मिनी के शीघ्र दर्शन कराओ, जिससे मेरा मन आश्वस्त हो सके।"
वासुदेव के ये वचन सुनकर, देवी पद्मिनी तत्काल प्रकट हुईं। वे रक्त विद्युत (लाल बिजली) के समान कान्ति वाली, पद्म (कमल) की सुगन्ध से युक्त, अपने सखीगणों के साथ सुशोभित थीं। वे सदा सहस्रदल कमल के मध्य में स्थित रहकर 'परमाक्षर' का जप करती हैं। हे महेशानि! वे एकाक्षरी और स्वयं 'परमाक्षर' हैं। जो कालिका महाविद्या है, वही पद्मिनी की इष्टदेवी है। उन्हें देखकर वासुदेव विस्मय में पड़ गए।
पद्मिनी ने कहा: "हे महाबाहो! हे भगवन! शीघ्र ब्रज जाइए। मैं आपके साथ कुलाचार करूँगी।"
वासुदेव ने पूछा: "हे पद्मिनी! बताओ, तुम्हारे दर्शन फिर कब होंगे? मैं क्या जप करूँ?"
पद्मिनी ने उत्तर दिया: "हे देवदेवेश! मेरा जन्म तुम्हारे समक्ष गोकुल (मथुरा पीठ) में वृकभानु के घर निश्चित रूप से होगा। मेरे संसर्ग के कारण तुम्हें कोई दुःख नहीं होगा। कुलाचार के लिए उपयुक्त जो पञ्चलक्षणा सामग्री है, वह सदैव तुम्हारी माला में स्थित रहेगी।" ऐसा कहकर वे सुन्दरी दूतिका की भाँति माला में अन्तर्ध्यान हो गईं। वासुदेव ने भी उन्हें देखकर काशीपुर त्याग कर माथुर पीठ की ओर प्रस्थान किया।
द्वितीय भाग: राधोत्पत्ति का विवरण (ईश्वर-पार्वती संवाद)
देवी पार्वती ने पूछा: "हे महादेव! ब्रज जाकर पद्मिनी ने क्या किया? वह किसके घर जन्मी? हे परमेशान! यह सब विस्तार से बताइए, अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।"
ईश्वर (शिव) ने कहा: "हे प्रिये! वह पद्मगन्धा पद्मिनी वृकभानु के घर प्रकट हुई। वह भगवान कृष्ण की प्रथम प्रिया है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि, जब पुष्य नक्षत्र था, तब कालिन्दी (यमुना) के जल में अनेक कमलों के बीच वह माया-डिम्ब (अंडे के आकार के तेज) का आश्रय लेकर प्रकट हुई।"
"वह डिम्ब स्वर्ण के मध्य स्थित था और करोड़ों चन्द्रमाओं के समान चमक रहा था। पुष्य युक्त नवमी की अर्धरात्रि में उस पद्म के मध्य से वह पद्मा (राधा) प्रकट हुई, जो कुसुम के समान प्रभा वाली और परम कामिनी थी। वृकभानुपुर (जो कालिन्दी के पार स्थित था और जिसे 'पद्मपुर' कहा जाता है) में उसका प्राकट्य हुआ। वह डिम्ब हजारों सूर्यों के समान तेजस्वी था, जिसने उस क्षण गहन अंधकार को नष्ट कर दिया।"
"वृकभानु महात्मा कालिन्दी तट पर स्थित होकर निरंतर महाविद्या महाकाली का जप करते थे। तब महामाया कात्यायनी प्रकट हुईं और बोलीं- 'हे पुत्र वृकभानु! तुम सिद्ध हो गए हो, वर मांगो।' वृकभानु ने कहा- 'हे देवि! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे अपने समान ही एक कन्या प्रदान करें।' तब कात्यायनी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वह दिव्य डिम्ब प्रदान किया। वृकभानु उसे लेकर अपने घर आए, जहाँ उनकी विशाल नेत्रों वाली पत्नी ने उसे ग्रहण किया।"
नोट: यह पाठ तन्त्रशास्त्र की पद्धति के अनुसार राधा के प्राकट्य को एक दिव्य, आध्यात्मिक घटना के रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ उन्हें महामाया कात्यायनी का ही स्वरूप माना गया है।
आपने 'राधातन्त्र' के छठे पटल से उद्धृत जो संस्कृत अंश प्रस्तुत किया है, वह राधातत्त्व की उत्पत्ति और वासुदेव (श्रीकृष्ण) के साथ उनके आध्यात्मिक सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाला एक अत्यंत गूढ़ एवं महत्त्वपूर्ण तन्त्रोक्त विवरण है।
इसका व्यवस्थित हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है:
राधातन्त्र: छठा पटल (हिन्दी अनुवाद)
कात्यायनी का वासुदेव को आदेश
कात्यायनी ने कहा— "हे महाबाहो वासुदेव! तुम डरो मत, पुत्र। तुम मथुरा जाओ, वहाँ तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। हे तात! जाओ, वहाँ पद्मिनी (राधा) का संगम प्राप्त करो। हे देवेश! वह पद्मिनी ब्रज में 'राधा' के रूप में प्रकट होगी और अन्य मातृका देवियाँ सदा उसकी अनुचरिका (सहचरी) होंगी।"
वासुदेव की प्रार्थना और पद्मिनी का आविर्भाव
वासुदेव ने कहा— "हे माते! हे महामाये! हे चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्रदान करने वाली! आपके बिना विद्या-सिद्धि प्राप्त नहीं होती। हे परमेशानि! उस पद्मिनी को शीघ्र दर्शन दें, जिससे मेरा मन आश्वस्त हो सके।" वासुदेव के इन वचनों को सुनते ही तत्क्षण वहां रक्त-बिजली के समान कान्ति वाली, कमल की सुगंध से युक्त, अपने रूप से मोहित करने वाली और सखी-गणों से घिरी हुई देवी 'पद्मिनी' प्रकट हो गईं। वह सहस्त्रदल कमल के मध्य में विराजमान होकर परमाक्षर (बीज मंत्र) का जप कर रही थीं। वही 'कालिका' महाविद्या हैं, जो पद्मिनी की इष्टदेवता हैं। उन्हें देखकर वासुदेव विस्मय में पड़ गए।
पद्मिनी का वरदान
पद्मिनी ने कहा— "हे महाबाहो! शीघ्र ब्रज जाओ। मैं तुम्हारे साथ कुलाचार (तन्त्रोक्त साधना) करूँगी।" वासुदेव ने पूछा कि वह पुनः उन्हें कब दिखेंगी। तब पद्मिनी ने कहा— "हे देवदेवेश! मैं निश्चित रूप से गोकुल के माथुर पीठ में वृषभानु (वृकभानु) के घर में जन्म लूँगी। मेरे संसर्ग से तुम्हें कोई दुःख नहीं होगा। कुलाचार की सामग्री और माला में मैं सदा निवास करूँगी।" यह कहकर वह सुन्दरी पद्मिनी अन्तर्ध्यान हो गईं और वासुदेव माथुर पीठ (मथुरा/वृन्दावन) की ओर चल पड़े।
ईश्वर-पार्वती संवाद: राधा (पद्मिनी) का प्राकट्य
(आगे पार्वती जी पूछती हैं कि पद्मिनी का जन्म किसके घर में और कैसे हुआ?)
ईश्वर ने कहा— "हे प्रिये! वह पद्मगन्धा पद्मिनी वृकभानु के घर में कृष्ण की प्रथम प्रिया के रूप में अवतरित हुईं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, जब पुष्य नक्षत्र था, तब कालिन्दी (यमुना) के जल में कमल के पुष्पों के बीच वह माया-डिम्ब (प्रकाशपुंज/अंडे) के रूप में प्रकट हुईं। वह डिम्ब करोड़ों चन्द्रमाओं के समान प्रकाशमान था।
आधी रात के समय उस डिम्ब से वह रङ्गिणी (राधा) प्रकट हुईं। उनका रूप उगते हुए सूर्य के समान था। वृषभानु ने कालिन्दी के तट पर महाकाली की निरंतर आराधना की थी, जिससे प्रसन्न होकर कात्यायनी देवी ने उन्हें दर्शन दिए। कात्यायनी ने कहा— 'हे पुत्र! मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, वर मांगो।'
वृकभानु ने कहा— 'हे देवि! आपकी कृपा से मुझे सब कुछ प्राप्त है, बस मेरी इच्छा है कि मुझे मेरे ही अनुरूप एक कन्या प्राप्त हो।' तब कात्यायनी ने उनकी पत्नी की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वह दिव्य 'डिम्ब' (दिव्य प्रकाशमय कन्या रूप) प्रदान किया, जिसे लेकर वृकभानु अपने घर गए।"
विवरण का सार (मुख्य बिंदु):
तन्त्र दृष्टिकोण: यहाँ राधा को केवल लौकिक नायिका नहीं, बल्कि 'पद्मिनी' नाम की महाविद्या, 'कालिका' का स्वरूप और 'महामाया' के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
ब्रज और मथुरा का महत्त्व: कात्यायनी देवी द्वारा वासुदेव को 'माथुर मण्डल' (वृन्दावन) जाने का निर्देश दिया गया है।
शक्ति तत्त्व: इस लेख में स्पष्ट किया गया है कि शक्ति के बिना ब्रह्म 'शव' के समान है, अर्थात् शक्ति (राधा) ही परमात्मा (कृष्ण) को क्रियाशील और पूर्ण बनाती है।
प्राकट्य तिथि: राधा का प्राकट्य चैत्र शुक्ल नवमी (पुष्य नक्षत्र) को यमुना जल में हुआ, जो उनके दिव्य (अयोनिसम्भव) स्वरूप को दर्शाता है।
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