प्रोजेक्ट: 'गोलोक से प्रतिष्ठानपुर' (ध्वनि-रूपरेखा)
पृष्ठभूमि ध्वनि (Ambient Bed):
- शुरुआत: एक लंबा, गूँजता हुआ शंखनाद (Shankha), जो धीरे-धीरे एक मंद 'तंबूरे' (Tanpura) की गूँज में विलीन हो जाए।
- वातावरण: दूर कहीं बजती हुई बाँसुरी की एक सधी हुई और धीमी तान, जो ऐसा आभास दे जैसे किसी प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में सुनाई दे रही हो।
खंड 1: उत्पत्ति (पद्य - पद्म शैली)
(पुरुष कोरस का समूह - लयबद्ध और गंभीर)
"राधावाण्याः समुत्पन्ना इला देवी प्रकीर्तिता। कृष्णज्ञानसमुद्भूतो बुधश्चेति प्रगीयते॥
गोलोके सम्भवौ तौ हि ग्रहरूपे समाहितौ। कालेन मानवाकारौ अवतीर्णौ धरातले॥"
खंड 2: अर्थ (गद्य शैली)
(एक गंभीर, शांत और प्रभावशाली आवाज - वाचन)
"अर्थात्—राधा जी की वाणी से 'इला' (वाणी की अधिष्ठात्री देवी) उत्पन्न हुईं। उसी प्रकार, श्रीकृष्ण के ज्ञान से 'बुध' का प्रादुर्भाव हुआ। वे दोनों मूलतः गोलोक में ग्रह रूप में स्थित थे, जो समय आने पर धरा पर मानवाकार में अवतरित हुए।"
खंड 3: वाक्-शक्ति का उदय (पद्य - पद्म शैली)
(कोरस का स्वर थोड़ा और गहरा और गूंजता हुआ)
"तयोर्वाग्ज्ञानसम्भूतः वाक्पटुत्वसमन्वितः। शब्दार्थतत्त्वमादाय आद्यः कविः समुद्गतः॥"
खंड 4: धरा पर अवतरण (गद्य शैली)
(उसी गंभीर आवाज में)
"अर्थात्—वाणी और ज्ञान के उस अद्भुत संगम से, शब्द और अर्थ के तत्व को धारण करने वाले 'आदि कवि' का प्राकट्य हुआ।"
खंड 5: प्रतिष्ठानपुर का गौरव (पद्य - पद्म शैली)
(शंख की एक धीमी गूँज के साथ)
"गङ्गायमुनयोः पुण्ये सङ्गमे पावनस्थले। ख्यातः पुरूरवा नाम प्रादुर्भूतो महीतले॥
ब्रह्ममुहूर्ते सुदिने गोशालायाः समीपत:। प्रादुर्बभूव तेजस्वी पुरूरवा नृपसत्तमः॥"
खंड 6: अंतिम व्याख्या (गद्य शैली)
(शांति के साथ समाप्त करते हुए)
"अर्थात्—गंगा-यमुना के पावन संगम स्थल पर, ब्रह्ममुहूर्त के शुभ बेला में गोशाला के निकट उस तेजस्वी राजा पुरूरवा का जन्म हुआ। 'पुरु' (अत्यधिक) शब्द के साथ जब स्तुति का 'रव' जुड़ा, तो वे जगत में 'पुरूरवा' नाम से विख्यात हुए।"
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