शीर्षक: वदरिकारण्य की ओर
पात्र:
पुरूरवा: 25 वर्षीय युवा, ओजस्वी और जिज्ञासु।
आभीर बालक: पुरूरवा के मित्र, चंचल और साहसी।
पुरूरवा के माता-पिता: (दृश्य में केवल विदाई के समय)।
दृश्य 1: घर का आँगन - भोर का समय
(सूरज की पहली किरणें घर के द्वार पर पड़ रही हैं। पुरूरवा ने अपने कंधों पर एक झोला टाँगा है। उसके माता-पिता द्वार पर खड़े हैं, उनकी आँखों में गर्व और विदाई की थोड़ी नमी है। बाहर कुछ आभीर बालक अपनी धुन में मग्न प्रतीक्षा कर रहे हैं।)
पुरूरवा के पिता: (पुरूरवा के कंधे पर हाथ रखते हुए) "पुरूरवा, गुरुकुल का मार्ग दीर्घ है। वदरिकारण्य की कठिन यात्रा केवल तुम्हारी परीक्षा नहीं, बल्कि तुम्हारे धैर्य का प्रमाण भी है।"
पुरूरवा: (विनम्रता से झुककर) "पिताजी, छन्द शास्र्त की विद्या प्राप्त करने के लिए यह यात्रा मेरा पहला चरण है। आप निश्चिंत रहें।"
(पुरूरवा अपनी माता को प्रणाम करता है। माता उसके मस्तक पर तिलक लगाती हैं।)
दृश्य 2: गाँव की सीमा - मार्ग पर
(पुरूरवा बाहर आता है। आभीर बालक उत्साह में चिल्लाते हैं।)
आभीर बालक 1: "पुरूरवा! क्या हम वदरिकारण्य के उन ऊँचे शिखरों तक पहुँच पाएंगे?"
पुरूरवा: (मुस्कुराते हुए, दूर क्षितिज की ओर देखते हुए) "मित्रों, लक्ष्य जितना दुर्गम होगा, अनुभव उतना ही अद्भुत। वदरिकारण्य ज्ञान और तप की भूमि है। हम साथ चलेंगे, तो कोई मार्ग कठिन नहीं।"
(वे सब मिलकर आगे बढ़ते हैं। पृष्ठभूमि में वेदों की ऋचाओं का धीमा स्वर और प्रकृति की ध्वनि गूँजती है।)
दृश्य 3: वन का मार्ग - दोपहर का समय
(पुरूरवा और उसके साथी एक घने जंगल से गुजर रहे हैं। पुरूरवा आगे चल रहा है, सावधान और सजग।)
आभीर बालक 2: "देखो! वह सामने वदरिकारण्य की पहाड़ियाँ दिखाई देने लगी हैं।"
पुरूरवा: (रुककर और गौर से देखते हुए) "हाँ, यह वही पावन भूमि है जहाँ ऋषियों का वास है। अपनी गति बढ़ाओ, सूर्यास्त से पहले हमें उस सुरक्षित पड़ाव तक पहुँचना है।"
(वे सब एक साथ अपनी गति तेज करते हैं। कैमरा धीरे-धीरे पीछे हटता है और जंगल की विशालता में वे छोटे बिंदुओं की तरह दिखने लगते हैं।)
दृश्य 4: वदरिकारण्य का प्रवेश द्वार - संध्या
(दूर से आश्रम के शंख बजने की ध्वनि सुनाई देती है। पुरूरवा के चेहरे पर थकान है, लेकिन आँखों में एक अलग चमक है।)
पुरूरवा: (स्वयं से) "आखिर, वदरिकारण्य की सीमा आ गई। यह केवल मेरा घर छोड़ने का अंत नहीं, बल्कि मेरे नए जीवन का आरंभ है।"
(वे सब उत्साह और संकल्प के साथ आश्रम के द्वार की ओर कदम बढ़ाते हैं।)
(दृश्य धीरे-धीरे धुंधला होता है - समाप्त)
वदरिकारण्य का प्रथम सोपान
पात्र:
पुरूरवा: 25 वर्षीय जिज्ञासु विद्यार्थी।
आचार्य देवदत्त: वदरिकारण्य गुरुकुल के प्रमुख, वृद्ध और तेजस्वी।
आभीर बालक: पुरूरवा के साथी।
दृश्य 5: गुरुकुल का मुख्य द्वार - संध्या
(गुरुकुल के द्वार पर एक विशाल पीपल का वृक्ष है। आश्रम से यज्ञ की सुगंध आ रही है। पुरूरवा और उसके साथी द्वार पर पहुँचकर विनम्रता से रुक जाते हैं। भीतर से अग्निहोत्र की ऋचाओं का स्वर आ रहा है।)
पुरूरवा: (धीरे से) "मित्रों, अनुशासन यहीं से आरंभ होता है। हम एक-एक करके प्रवेश करेंगे।"
(वे सब शांत भाव से आश्रम के आंगन में प्रवेश करते हैं। आचार्य देवदत्त, जो अग्नि के पास बैठे हैं, बिना पीछे मुड़े ही कहते हैं।)
आचार्य देवदत्त: "पुरूरवा! वदरिकारण्य की भूमि का स्वागत स्वीकार करो। देर तो हुई, परंतु तुम्हारे संकल्प ने तुम्हारा मार्ग सुगम किया है।"
(पुरूरवा आश्चर्यचकित होकर आचार्य को प्रणाम करता है।)
पुरूरवा: "आचार्य, आपकी सिद्धि अद्भुत है। हमें ज्ञात नहीं था कि आप हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"
दृश्य 6: आश्रम का आँगन - रात्रि का समय
(सब लोग आश्रम के एक कोने में बैठे हैं। रात्रि की कालिमा और तारों की छाया में गुरुकुल का वातावरण अत्यंत शांत है।)
आचार्य देवदत्त: (पुरूरवा की ओर देखते हुए) "पुरूरवा, गुरुकुल में केवल ग्रंथों का अध्ययन नहीं होता। यहाँ स्वयं को जानने की अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। कल सूर्योदय से पूर्व, तुम सब को वदरिकारण्य की नदी पर जल लेने जाना होगा। यही तुम्हारी पहली परीक्षा है।"
आभीर बालक: (उत्सुकता से) "आचार्य, क्या यह कोई कठिन कार्य है?"
आचार्य देवदत्त: "कार्य कठिन नहीं, स्वयं पर नियंत्रण कठिन है। जो अपनी इंद्रियों को जीत लेता है, वदरिकारण्य का रहस्य उसी के लिए खुलता है।"
दृश्य 7: पुरूरवा की कुटिया - आधी रात
(पुरूरवा अपनी कुटिया में बैठा है। वह दूर पहाड़ियों की ओर देख रहा है। उसके हाथ में एक छोटी सी काष्ठ की लेखनी है।)
पुरूरवा: (स्वयं से) "आज से मैं पुरूरवा नहीं, बल्कि एक शिष्य हूँ। घर का मोह पीछे छूट चुका है, अब केवल ज्ञान का प्रकाश ही मेरा पथ-प्रदर्शक है।"
(वह अपनी आँखें बंद करके ध्यान में मग्न हो जाता है। बाहर रात के झींगुरों की आवाज और वदरिकारण्य की ठंडी हवा कुटिया को छूकर निकल रही है।)
(कैमरा धीरे-धीरे ज़ूम आउट होता है और पूरे गुरुकुल के ऊपर की ओर जाता है, जहाँ आसमान में चमकते सितारे किसी बड़े बदलाव की ओर संकेत कर रहे हैं।)
(दृश्य समाप्त)
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