मंगलवार, 30 जून 2026

♣•कृष्ण स्तुति के छन्द•♣

आपकी रचित यह श्रीकृष्ण-स्तुति अत्यंत भावपूर्ण और वैदुष्य से परिपूर्ण है। इसमें भक्ति के साथ-साथ यदुवंश के ऐतिहासिक गौरव, कृषि-संस्कृति (सङ्कर्षण/बलराम रूप), और श्रीकृष्ण के साक्षात् दर्शन की जो छटा उकेरी गई है, वह प्राचीन पांडुलिपियों और स्तोत्र साहित्य के गहरे अध्ययन को दर्शाती है।

​छन्द शास्त्र (Prosody) और आलंकारिक नियमों के अंतर्गत, इसे एक सुव्यवस्थित लय और सुन्दर अन्त्यानुप्रास (End-rhyme) में पिरोकर शुद्ध किया गया है, ताकि इसके गायन में एक नैसर्गिक नाद-सौंदर्य उत्पन्न हो सके।

​यहाँ परिष्कृत श्रीकृष्ण-स्तुति प्रस्तुत है:

​श्रीकृष्ण-स्तुति

१.

वन्दे वृन्दावन-वन्दनीयम्, सर्वैश्च लोकैरभिनन्दनीयम्।

सत्कर्म-संकल्प-विचिन्तनीयम्, नमामि देवं मुनि-दर्शनीयम्॥

२.

भक्त-भाव-सुरञ्जनम्, राग-द्वेष-प्रभञ्जनम्।

चित्त-दोष-विमञ्जनम्, नौमि दुष्ट-विभञ्जनम्॥

३.

बर्हि-पिच्छ-सुमस्तकम्, वेणु-शोभित-हस्तकम्।

ज्ञान-रश्मि-प्रभाकरम्, नौमि देवं गुणाकरम्॥

४.

अष्ट-याम-प्रपूजनम्, सर्व-कष्ट-निकृन्तनम्।

भव-बन्ध-विमोचनम्, भक्त-वृन्द-विरोचनम्॥

५.

कृष्णं मेघ-सम-स्वनम्, प्राप्नुयां जीवन-धनम्।

गोप-मण्डल-सर्जकम्, सर्व-सिद्धि-समर्जकम्॥

६.

कृपा-सिन्धुं सुधर्मकम्, नौमि देवं सत्कर्मकम्।

इन्द्र-यज्ञ-निवारणम्, पशु-हिंसा-विदारणम्॥

७.

गो-रजोभिः सुशोभितम्, व्रज-मण्डले संस्थितम्।

कण्ठ-धृत-सुमालकम्, नौम्याभीर-सुबालकम्॥

८.

कृषि-कर्म-सुप्रवीणम्, बर्हि-पिच्छ-विभूषणम्।

तीक्ष्ण-हल-प्रकर्षणम्, वन्दे कृष्ण-सङ्कर्षणम्॥

९.

गोप-गोपी-सुनायकम्, वैष्णव-धर्म-दायकम्।

व्रज-रजो-विभूषणम्, नौमि कोटि-सुपूषणम्॥

१०.

निष्काम-कर्म-बोधकम्, वेणु-गान-प्रमोदकम्।

दीन-बन्धु-सहायकम्, नौमि यादव-विनायकम्॥

११.

किशोर-भाव-व्यञ्जितम्, राग-रङ्ग-सुशोभितम्।

नमामि देवं सद्व्रतम्, पीयूषं च गीतामृतम्॥

१२.

वन-माला-सुधारिणम्, नमामि व्रज-विहारिणम्।

वैजयन्ती-प्रधारिणम्, नाना-लीला-विस्तारिणम्॥

​व्याकरण एवं छन्द-शास्त्रीय विशेषताएँ

  • छन्द (Meter): स्तुति को मुख्य रूप से ८-अक्षरीय लय (प्रमाणिका छन्द या गेय अनुष्टुभ की अष्टपदीय ध्वनि) में ढाला गया है। प्रथम श्लोक मंगलाचरण के रूप में ११ अक्षरों (उपजाति लय) में रखा गया है, जो स्तुति को एक शास्त्रीय गांभीर्य प्रदान करता है।
  • अन्त्यानुप्रास (End Rhyme): आपकी मूल रचना की मांग के अनुसार, प्रत्येक श्लोक के अंत में लयबद्ध तुकान्त (जैसे- नन्दनीयम्/वन्दनीयम्, प्रभञ्जनम्/विभञ्जनम्) का पूर्ण और निर्दोष निर्वाह किया गया है।
  • अलंकार (Figures of Speech):
    • अनुप्रास (Alliteration): 'भक्त-भाव-सुरञ्जनम्' और 'भव-बन्ध-विमोचनम्' में वर्णों की अत्यंत सुंदर और श्रुतिमधुर आवृत्ति है।
    • रूपक (Metaphor): 'ज्ञान-रश्मि-प्रभाकरम्' (ज्ञान की किरणों के सूर्य) और 'गीतामृतम्' (गीता रूपी अमृत) में उत्कृष्ट रूपक का प्रयोग किया गया है जो श्रीकृष्ण के दार्शनिक स्वरूप को पुष्ट करता है।


यहाँ परिष्कृत श्रीकृष्ण-स्तुति का व्याकरण सम्मत और भावानुकूल हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है। इसमें स्तोत्र के मूल दार्शनिक और ऐतिहासिक भावों (जैसे यदुवंश के संदर्भ और कृषि-संस्कृति) को यथावत बनाए रखने का प्रयास किया गया है:

१. जो वृन्दावन में वन्दनीय (पूजनीय) हैं, जो सभी लोकों द्वारा अभिनन्दित (प्रशंसित) हैं, जो सत्कर्मों और शुभ संकल्पों के लिए चिंतन करने योग्य हैं, और जो मुनियों के दर्शन के पात्र हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ।

२. जो भक्तों के भावों को आनंदित करने वाले हैं, जो राग और द्वेष का पूर्णतः नाश करने वाले हैं, जो चित्त के दोषों को धोकर निर्मल करने वाले हैं, उन दुष्टों का विनाश करने वाले प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।

३. जिनके मस्तक पर मोरपंख सुशोभित है, जिनके हाथों में बांसुरी सजी है, जो ज्ञान की रश्मियों के सूर्य हैं, उन समस्त गुणों की खान (गुणाकर) भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ।

४. जिनकी आठों प्रहर पूजा होती है, जो सभी कष्टों को काटने वाले हैं, जो भव-बंधन (संसार के चक्र) से मुक्त करने वाले हैं, और जो भक्त-समूह को आनंदित (प्रकाशित) करने वाले हैं, उन्हें मेरा नमस्कार है।

५. मेघों के समान गम्भीर स्वर वाले उन श्रीकृष्ण को मैं अपने जीवन-धन के रूप में प्राप्त करूँ, जो गोप-मण्डल की रचना करने वाले और समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं।

६. जो कृपा के सागर और उत्तम धर्म वाले हैं, उन सत्कर्म करने वाले देव को मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने इन्द्र-यज्ञ का निवारण किया और पशु-हिंसा का खण्डन (विदारण) किया।

७. जो गायों के खुरों से उड़ी धूल (गोरज) से सुशोभित हैं, जो व्रजमंडल में स्थित हैं, और जिन्होंने कंठ में सुंदर माला धारण की है, उन आभीर (गोप) बालक को मैं नमस्कार करता हूँ।

८. जो कृषि कर्म में अत्यंत निपुण हैं, जो मोरपंख से विभूषित हैं, जो तीक्ष्ण हल खींचने वाले हैं, उन श्रीकृष्ण और संकर्षण (बलराम) की मैं वंदना करता हूँ।

९. जो गोपों और गोपियों के श्रेष्ठ नायक हैं, जो वैष्णव धर्म के प्रदाता हैं, व्रज की धूल ही जिनका आभूषण है, और जो करोड़ों सूर्यों के समान जगत का पोषण करने वाले हैं, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ।

१०. जो निष्काम कर्म का ज्ञान देने वाले हैं, जो बांसुरी के गान से आनंदित करते हैं, जो दीनों और बंधुओं के सहायक हैं, यदुवंश के उन नायक (मार्गदर्शक/विनायक) को मैं नमस्कार करता हूँ।

११. जो किशोर अवस्था के सुंदर भावों से युक्त हैं, जो प्रेम और आनंद के रंगों से सुशोभित हैं, उन उत्तम व्रत वाले और गीता रूपी अमृत का पान कराने वाले प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।

१२. जिन्होंने गले में वनमाला धारण की है, जो व्रज में विहार करने वाले हैं, वैजयंती माला पहनने वाले और विविध प्रकार की लीलाओं का विस्तार करने वाले उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।



कर्म-सिद्धांत, गोलोक रहस्य और आभीर-संस्कृति के इन गूढ़ दार्शनिक और ऐतिहासिक भावों को—जो 'श्रीकृष्ण सारंगिनी' या 'यदुवंश संहिता' जैसे किसी विशद शोध-ग्रंथ के भाषाई सार प्रतीत होते हैं—संस्कृत के शास्त्रीय 'अनुष्टुभ्' छन्द में पिरोकर यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

​आपने अनुवाद में जिन विशिष्ट शब्दों (जैसे- अहं समुच्चय, रोमकूपों से गोपों की सृष्टि, इन्द्रयजन का निवारण) का प्रयोग किया है, उन्हें पूर्णतः संस्कृत श्लोकों के भीतर समाहित किया गया है:

​श्रीकृष्ण-स्तुति (संस्कृत-छन्दोबद्ध भावानुवाद)

१.

वृन्दावने वन्दनीयं सर्व-लोक-भिनन्दितम्।

कर्म-सिद्धान्त-नेतारं श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम्॥

अहं-भावात् तु सङ्कल्पाद् इच्छां चोत्पाद्य लीलया।

येन वै निश्चितं कर्म तं वन्दे जगदीश्वरम्॥

२.

भक्त-भाव-समर्पन्तं राग-रङ्ग-समन्वितम्।

भक्ति-स्नात-मनः-शुद्धं ज्ञान-दीप्ति-प्रदायकम्॥

खल-दण्ड-धरं देवं सुदर्शन-करं प्रभुम्।

श्रीकृष्णं तं नमस्यामो दुष्ट-दर्प-विनाशनम्॥

३.

बर्हि-पिच्छ-किरीटं ते हस्ते मुरलिका शुभा।

ज्ञान-रश्मि-प्रभा-सूर्यो मन-मोहन! त्वमेव हि॥

आत्म-ज्ञान-प्रदो देवो गुणातीतोऽपि सद्-गुरुः।

कल्याण-गुण-कोशं त्वां प्रणमामि मुहुर्मुहुः॥

४.

अष्ट-यामं नमस्यामि त्वां देवं गिरि-धारिणम्।

शोक-कष्ट-हरं साक्षात् हरिं त्वां प्रणमाम्यहम्॥

संसार-द्वन्द्व-बन्ध-घ्नं सर्व-भक्त-प्रियं प्रभुम्।

गोविन्दं त्वां नमस्यामि मोचयन्तं भवाम्बुधेः॥

५.

नीलाम्बुद-श्याम-कान्तिं लभेमहि च जीवनम्।

गोलोके रोम-कूपेभ्यो येन गोपाः पुरा सृताः॥

सर्व-सिद्धि-मयं देवं सर्व-सिद्धि-प्रदायकम्।

त्वां वन्देऽहं जगन्नाथं सृष्टि-कारण-कारणम्॥

६.

कृपा-सिन्धुं स-धर्म-ज्ञं गुरुं चोर्जित-कर्मणम्।

गोविन्दं त्वां नमस्यामो यथार्थ-ज्ञान-दायकम्॥

इन्द्र-यज्ञो निवार्यो यः पशु-हिंसा-निमित्तकः।

अहिंसा-धर्म-संस्थापं तं वन्दे करुणाकरम्॥

७.

गो-निवास-रजः-स्नातं सदा व्रज-विहारिणम्।

वन-माला-धरं देवमाभीर-बाल-रूपिणम्॥

भजेऽहं नन्द-तनयं जगद्-वन्द्यं सनातनम्।

प्रणमामि परं देवं कृष्णं गोकुल-नन्दनम्॥

(आपके क्रम के अनुसार श्लोक ८ अनुपस्थित है)

९.

गोप-गोपी-जनाधीशं वैष्णव-धर्म-संस्थापम्।

भक्त-पोषण-कर्तारं कृष्णं त्वां प्रणमाम्यहम्॥

कोटिशस्त्वां नमस्यामो जगत्-पोषण-कारकम्।

वैष्णवानां परं धर्मं स्थापयन्तं धरातले॥

१०.

निष्काम-कर्म-दातारं वेणु-वाद्य-विशारदम्।

दीन-दुःख-हरं देवं यादव-कुल-नायकम्॥

नमस्यामो वयं कृष्णं सुन्दर-तान-गायकम्।

प्रणमामि परं देवं भक्तानां भव-तारिणम्॥

११.

गोलोके नित्य-किशोरं राग-रङ्ग-सुशोभितम्।

सत्य-व्रत-धरं कृष्णं रास-लीला-विहारिणम्॥

गोपेश्वरं नमस्यामो ज्ञान-गीतामृत-प्रदम्।

यस्य पीयूष-तुल्यं हि ज्ञानं सर्वैर्निषेव्यते॥

१२.

कण्ठे वन-स्रजं धृत्वा सर्व-व्रज-विहारिणम्।

वैजयन्ती-धरं देवं चारु-लीला-प्रसारिणम्॥

केशवं तं नमस्यामो भक्तानां भव-तारिणम्।

प्रणमामि परं देवं कृष्णं गोकुल-नन्दनम्॥

छन्द विवेचन: यह रचना अष्ट-अक्षरीय 'अनुष्टुभ्' छन्द (श्लोक) में की गई है। इस छन्द के प्रत्येक चरण में ८ अक्षर होते हैं, जो स्तुति-गायन और दार्शनिक ग्रंथों (जैसे गीता या महाभारत) के लिए सर्वाधिक उपयुक्त और प्रामाणिक लय है।


इन श्लोकों के गायन के लिए 'अनुष्टुभ्' छन्द की लय (जो रामायण के श्लोकों की लय है) सबसे उपयुक्त है। इसके अतिरिक्त, आप इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत के 'राग भैरवी' या 'राग यमन' की धुन पर भी गा सकते हैं, जो भक्तिपूर्ण और मधुर होती है।

​नीचे इन श्लोकों को गायन हेतु लयबद्ध पद्धति में प्रस्तुत किया गया है:

श्रीकृष्ण-स्तुति: गेय-पद्धति (Musical Notation/Rhythm)

(ताल: कहरवा या दादरा - मध्यम गति)

[मंगलाचरण - लय का आरंभ]

(प्रत्येक चरण के अंत में एक छोटा ठहराव)

​१. वृन्दावने वन्दनीयं, सर्व-लोक-भिनन्दितम्।

कर्म-सिद्धान्त-नेतारं, श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम् ॥

अहं-भावात् तु सङ्कल्पाद्, इच्छां चोत्पाद्य लीलया।

येन वै निश्चितं कर्म, तं वन्दे जगदीश्वरम् ॥

​२. भक्त-भाव-समर्पन्तं, राग-रङ्ग-समन्वितम्।

भक्ति-स्नात-मनः-शुद्धं, ज्ञान-दीप्ति-प्रदायकम् ॥

खल-दण्ड-धरं देवं, सुदर्शन-करं प्रभुम्।

श्रीकृष्णं तं नमस्यामो, दुष्ट-दर्प-विनाशनम् ॥

​३. बर्हि-पिच्छ-किरीटं ते, हस्ते मुरलिका शुभा।

ज्ञान-रश्मि-प्रभा-सूर्यो, मन-मोहन! त्वमेव हि ॥

आत्म-ज्ञान-प्रदो देवो, गुणातीतोऽपि सद्-गुरुः।

कल्याण-गुण-कोशं त्वां, प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥

​४. अष्ट-यामं नमस्यामि, त्वां देवं गिरि-धारिणम्।

शोक-कष्ट-हरं साक्षात्, हरिं त्वां प्रणमाम्यहम् ॥

संसार-द्वन्द्व-बन्ध-घ्नं, सर्व-भक्त-प्रियं प्रभुम्।

गोविन्दं त्वां नमस्यामि, मोचयन्तं भवाम्बुधेः ॥

​५. नीलाम्बुद-श्याम-कान्तिं, लभेमहि च जीवनम्।

गोलोके रोम-कूपेभ्यो, येन गोपाः पुरा सृताः ॥

सर्व-सिद्धि-मयं देवं, सर्व-सिद्धि-प्रदायकम्।

त्वां वन्देऽहं जगन्नाथं, सृष्टि-कारण-कारणम् ॥

(इसी लय को आगे के श्लोकों के लिए निरंतर रखें)

​६. कृपा-सिन्धुं स-धर्म-ज्ञं, गुरुं चोर्जित-कर्मणम्।

गोविन्दं त्वां नमस्यामो, यथार्थ-ज्ञान-दायकम् ॥

इन्द्र-यज्ञो निवार्यो यः, पशु-हिंसा-निमित्तकः।

अहिंसा-धर्म-संस्थापं, तं वन्दे करुणाकरम् ॥

​७. गो-निवास-रजः-स्नातं, सदा व्रज-विहारिणम्।

वन-माला-धरं देव-माभीर-बाल-रूपिणम् ॥

भजेऽहं नन्द-तनयं, जगद्-वन्द्यं सनातनम्।

प्रणमामि परं देवं, कृष्णं गोकुल-नन्दनम् ॥

​९. गोप-गोपी-जनाधीशं, वैष्णव-धर्म-संस्थापम्।

भक्त-पोषण-कर्तारं, कृष्णं त्वां प्रणमाम्यहम् ॥

कोटिशस्त्वां नमस्यामो, जगत्-पोषण-कारकम्।

वैष्णवानां परं धर्मं, स्थापयन्तं धरातले ॥

​१०. निष्काम-कर्म-दातारं, वेणु-वाद्य-विशारदम्।

दीन-दुःख-हरं देवं, यादव-कुल-नायकम् ॥

नमस्यामो वयं कृष्णं, सुन्दर-तान-गायकम्।

प्रणमामि परं देवं, भक्तानां भव-तारिणम् ॥

​११. गोलोके नित्य-किशोरं, राग-रङ्ग-सुशोभितम्।

सत्य-व्रत-धरं कृष्णं, रास-लीला-विहारिणम् ॥

गोपेश्वरं नमस्यामो, ज्ञान-गीतामृत-प्रदम्।

यस्य पीयूष-तुल्यं हि, ज्ञानं सर्वैर्निषेव्यते ॥

​१२. कण्ठे वन-स्रजं धृत्वा, सर्व-व्रज-विहारिणम्।

वैजयन्ती-धरं देवं, चारु-लीला-प्रसारिणम् ॥

केशवं तं नमस्यामो, भक्तानां भव-तारिणम्।

प्रणमामि परं देवं, कृष्णं गोकुल-नन्दनम् ॥

गायकी के लिए सुझाव:

  • लय: इसे बहुत तेज़ न गाएं, इसे एक शांत और गंभीर प्रार्थना की तरह गाएं।
  • भाव: स्तुति में 'अहं-भाव', 'गोकुल-नन्दन' और 'ज्ञान-गीतामृत' जैसे शब्दों पर थोड़ा ठहरें (Pause दें), जिससे इसका दार्शनिक महत्व स्पष्ट हो।
  • वाद्य-यंत्र: यदि आप वाद्य का प्रयोग कर रहे हैं, तो बाँसुरी (Flute) की धीमी धुन या मृदंग/पखावज की गूंज इस स्तुति के लिए सर्वोत्तम रहेगी।




सिनेमैटिक उद्घोष:

​"प्रस्तुत है, यादव योगेश कुमार रोहि द्वारा अनुष्टुप छन्द में रचित यह पावन श्रीकृष्ण-स्तुति। यह स्तुति अत्यंत भावपूर्ण और वैदुष्य से परिपूर्ण है। इसमें भक्ति के साथ-साथ यदुवंश के ऐतिहासिक गौरव, कृषि-संस्कृति, और श्रीकृष्ण के साक्षात् दर्शन की जो छटा उकेरी गई है, वह प्राचीन पांडुलिपियों और स्तोत्र साहित्य के गहरे अध्ययन को दर्शाती है।"

​आप अपनी सुविधानुसार इसे बाँसुरी की धीमी धुन या मृदंग/पखावज की गूंज के साथ, शांत और गंभीर प्रार्थना की लय में गा सकते हैं। दार्शनिक महत्व स्पष्ट करने के लिए 'अहं-भाव', 'गोकुल-नन्दन' और 'ज्ञान-गीतामृत' जैसे शब्दों पर थोड़ा ठहरें (Pause दें)।

​आशा है कि यह मार्गदर्शन आपको इस स्तुति को पूर्ण श्रद्धा और संगीतबद्ध रूप में प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होगा।

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