आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
शहर-शहर और गाँव-गाँव में, खुल गए इनके दरबार,
धर्म बेचकर नोट छापते' ,धर्म बना व्यापार!
इनके नहीं रहीं आते पते ये लम्पट दगावाज।
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
(अंतरा 1)
मंच सजाकर बैठ गए हैं, ज्ञान के ठेकेदार,
चंदा लेते, कैश बटोरत, करते रोज व्यापार।
महंगाई में पिसती जनता, हाँफ रही दिन-रात, रोजगार नहीं दूर तक कंगाली के हालात।।
श्रद्धा धर्म के नाम पर नदियों में,बहता दूध। गरीबों को मुहैया नहीं उसकी एक भी बूँद।
देश की विकट हालाते आज, किसी का राज तो कोई ताक-तैराज।।
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
(अंतरा 2)
पढ़ा-लिखा हर शख्स यहाँ पर, भावुक अंधविश्वासी हैं। पर्ची वाले शातिर ठग हैं, भीड़ भी अच्छी-खासी है।
खुद के जीवन के संकट को, जो कभी देख ना पाते हैं। वही पर्चीयाँ खोल खोल कर लोगों का भविष्य बताते हैं। देश विदेशों में सैर करते अपने नहीं खोलते राज।
आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया प्रबुद्ध समाज ?कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।
(समापन)
कुकर्मी बाबाओं का पाखंड (दोहा छंद रूप)
ढोंगी बाबा देश में, जगह जगह लगाते मंच। दान करों सम्मान करों जग माया का प्रपंच॥
भोग-विलास करते देखे, आश्रम बड़े बनाए।सदगुरु सेवा से मोक्ष मिले,जन्नत स्वप्न दिखाऐ।
महंगाई से देश की, टूट गयी है रीढ।। लोग लाइन में तप रहे , लगी हुई है भीड़
पढ़ा-लिखा समाज भी, अंधा हुआ है आज।॥भविष्य की पर्ची निकाल रहे, ठागेश्वर महाराज।।
खुद उलझे जीवन पेचों में, सुलझाएँ कैसे रोग॥ सब सुख सुविधाओं को भोगें क्या जाने वे योग!
मार्केट सा बन गया , आज ईश्वर का दरबार॥ धर्म बोलियों में बिक रहा करते लोग व्यापार ।
उपर्युक्त पक्तियों को आधार मान कर एक फ्यूजन गीत जनरेट करें !
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