शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

नया गीत -

आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया ज्ञानी समाज?

कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

शहर-शहर और गाँव-गाँव में, खुल गए इनके दरबार,

धर्म बेचकर नोट छापते, बैठे ये व्यापारी यार!

​(अंतरा 1)

मंच सजाकर बैठ गए हैं, ज्ञान के झूठे ठेकेदार,

चंदा लेते, कैश बटोरत, करते रोज नया व्यापार।

महंगाई से पिसती जनता, तड़पे दिन और रात,

पर इन ढोंगी बाबाओं की, चमक रही है हर बात।

दूध-खीर के नाम पर देखो, कैसा मायाजाल रचा,

भोली-भाली जनता को दे, प्रसाद का झूठा कच्चा-पक्का सच।

​(अंतरा 2)

पढ़ा-लिखा हर शख्स यहाँ पर, अंधविश्वास में हारा है,

पर्ची वाले बाबाओं का, जादू सर पर चढ़ कर बोला है।

खुद के जीवन के संकट से, जो खुद छूटे ना भाई,

वो दूजे की पीड़ा हरने की, देते रोज़ दुहाई।

गौमाता के नाम पर चंदा, राजनीति का खेल बना,

इन पाखंडी चेलों ने तो, मंदिर को भी मॉल बना!

​(समापन)



जागो अब तो देश के लोगो, पहचानो इनका भेद,

गीता और पुराणों का करते, ये नित रोज उच्छेद।

सच्चे मानस ढूँढने से भी, मुश्किल से अब मिलते हैं,

धर्म की इस पावन बगिया में, केवल कँटे खिलते हैं।




कुकर्मी बाबाओं का पाखंड (दोहा छंद रूप)


​ढोंगी बाबा देश में, जगह जगह लगाते मंच।

,दान करों सम्मान करों जग माया का प्रपंच॥

​भोग-विलास करते देखे, आश्रम बड़े बनाए।

सदगुरु सेवा से मोक्ष मिले,जन्नत स्वप्न दिखाऐ।

 

​महंगाई से देश की, टूट गयी है रीढ।।

लोग लाइन में तप रहे , लगी हुई है भीड़


पढ़ा-लिखा समाज भी, अंधा हुआ है आज।॥

​भविष्य की पर्ची निकाल रहे,वागेश्वर महाराज।।


खुद उलझे जीवन व्यथा, सुलझाएँ सब रोग॥

​दूध-खीर के नाम पर, बताते प्रसादी भोग ।


सच्चे मानस देश में, बचे हुए कुछ शेष॥

​गौमाता के नाम पर, चंदा के नाम पर कैश।


मार्केट सी बन गया ,ईश्वर का  दरबार॥

​पर्ची वाले ढोंग से,  ठगते भैरो सरकार ।


उपर्युक्त पक्तियों को आधार मान कर एक फ्यूजन गील लिखें !





आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया ज्ञानी समाज?

कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

शहर-शहर और गाँव-गाँव में, खुल गए इनके दरबार,

धर्म बेचकर नोट छापते, बैठे ये व्यापारी यार!

​(अंतरा 1)

मंच सजाकर बैठ गए हैं, ज्ञान के झूठे ठेकेदार,

चंदा लेते, कैश बटोरत, करते रोज नया व्यापार।

महंगाई से पिसती जनता, तड़पे दिन और रात,

पर इन ढोंगी बाबाओं की, चमक रही है हर बात।

दूध-खीर के नाम पर देखो, कैसा मायाजाल रचा,

भोली-भाली जनता को दे, प्रसाद का झूठा कच्चा-पक्का सच।

​(अंतरा 2)

पढ़ा-लिखा हर शख्स यहाँ पर, अंधविश्वास में हारा है,

पर्ची वाले बाबाओं का, जादू सर पर चढ़ कर बोला है।

खुद के जीवन के संकट से, जो खुद छूटे ना भाई,

वो दूजे की पीड़ा हरने की, देते रोज़ दुहाई।

गौमाता के नाम पर चंदा, राजनीति का खेल बना,

इन पाखंडी चेलों ने तो, मंदिर को भी मॉल बना!

​(समापन)

जागो अब तो देश के लोगो, पहचानो इनका भेद,

गीता और पुराणों का करते, ये नित रोज उच्छेद।

सच्चे मानस ढूँढने से भी, मुश्किल से अब मिलते हैं,

धर्म की इस पावन बगिया में, केवल कँटे खिलते हैं




आँखों पर पट्टी बाँधे, क्यों सोया ज्ञानी समाज?

कलयुग के इन बहरूपियों का, देखो अजब मिजाज।

शहर-शहर और गाँव-गाँव में, खुल गए इनके दरबार,

धर्म बेचकर नोट छापते, बैठे ये व्यापारी यार!

​(अंतरा 1)

मंच सजाकर बैठ गए हैं, ज्ञान के झूठे ठेकेदार,

चंदा लेते, कैश बटोरत, करते रोज नया व्यापार।

महंगाई से पिसती जनता, तड़पे दिन और रात,

पर इन ढोंगी बाबाओं की, चमक रही है हर बात।

दूध-खीर के नाम पर देखो, कैसा मायाजाल रचा,

भोली-भाली जनता को दे, प्रसाद का झूठा कच्चा-पक्का सच।

​(अंतरा 2)

पढ़ा-लिखा हर शख्स यहाँ पर, अंधविश्वास में हारा है,

पर्ची वाले बाबाओं का, जादू सर पर चढ़ कर बोला है।

खुद के जीवन के संकट से, जो खुद छूटे ना भाई,

वो दूजे की पीड़ा हरने की, देते रोज़ दुहाई।

गौमाता के नाम पर चंदा, राजनीति का खेल बना,

इन पाखंडी चेलों ने तो, मंदिर को भी मॉल बना!

​(समापन)

जागो अब तो देश के लोगो, पहचानो इनका भेद,

गीता और पुराणों का करते, ये नित रोज उच्छेद।

सच्चे मानस ढूँढने से भी, मुश्किल से अब मिलते हैं,

धर्म की इस पावन बगिया में, केवल कँटे खिलते हैं।


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