भगवान स्वराट् विष्णु के आभीर (गोप) कुल में अवतार का रहस्य: शास्त्रीय श्लोक एवं हिंदी अनुवाद
प्रस्तावना एवं कश्यप ऋषि का शाप
श्लोक 1 (हरिवंश एवं देवीभागवत पुराण आधारित)
पुरा कश्यपसंज्ञोऽसौ वरुणाद् गौरवादितान्। गृह्हीत्वा न प्रतिन्यस्य ददौ शापं च वेधसा ॥१॥
आभीरेषु च गोपेषु जन्म लभस्व भूतले। वसुदेवत्वमापन्नो गोसेवां कुरु सर्वदा ॥२॥
- हिंदी अनुवाद: प्राचीन काल में जो वसुदेव थे, वे पूर्वजन्म में कश्यप ऋषि थे। उन्होंने वरुण देवता की कुछ श्रेष्ठ गायें धरोहर के रूप में ली थीं और समय पर वापस नहीं लौटाईं। इस पर वरुण की शिकायत करने पर ब्रह्मा जी ने उन्हें लोक-मर्यादा की रक्षा के लिए यह शाप दिया कि उन्हें पृथ्वी लोक पर व्रज की आभीर (गोप) जाति में वसुदेव के रूप में जन्म लेकर निरंतर गोसेवा और कृषि कार्य करना होगा।
सतयुग का सृष्टि यज्ञ और आभीर कन्या गायत्री
श्लोक 2 (गोपों की उत्पत्ति एवं सावित्री-गायत्री प्रसंग)
ब्रह्माण्डसृष्टिकाले तु गोपगणा न संति वै। विष्णुरोमोद्भवास्ते तु वैष्णवा ब्रह्मनिर्मितात् ॥३॥
सावित्री विरहात्तत्र शक्रप्रेरितया तया। आभीरकन्या गायत्र्या यज्ञः संपूरितः पुरा ॥४॥
- हिंदी अनुवाद: सृष्टि के आदि काल में ब्रह्मा द्वारा किए जा रहे यज्ञ में गोप लोग उपस्थित नहीं थे, क्योंकि वे ब्रह्मा की साधारण सृष्टि नहीं, अपितु भगवान स्वराट् विष्णु के हृदय-रोम कूपों से उत्पन्न वैष्णव वर्ण के थे, जिनसे ब्रह्मा भी अपरिचित थे। जब यज्ञ के मुहूर्त काल में माता सावित्री व्यस्तता के कारण उपस्थित नहीं हो सकीं, तब भगवान विष्णु के परामर्श से इंद्र देव द्वारा आनर्त देश से आभीर (गोप) कन्या गायत्री को बुलाकर यज्ञ संपन्न कराया गया।
भगवान विष्णु का गोपों को वरदान
श्लोक 3 (पद्म पुराण सृष्टि खण्ड, अध्याय सत्रह पर आधारित)
शोकसंतप्तगोपानां दृष्ट्वा तां वेदनामपि। स्वराट् विष्णुः स्वयं तत्र प्रादुरासीद्वरप्रदः ॥५॥आभीरकुलजातानां यदुवंशान्तरे पुनः। चतुर्थवृष्णिकुलेऽहं अवतीर्णो भविष्यामि ॥६॥
- हिंदी अनुवाद: यज्ञ के उपरांत जब आभीर (गोप) कन्या के वहाँ लाये जाने से गोपगण शोकसंतप्त और चिंतित हो उठे, तब साक्षात् स्वराट् भगवान विष्णु ने प्रकट होकर उन्हें अभयदान दिया और यह ऐतिहासिक वचन दिया कि "मैं स्वयं अपनी संपूर्ण कलाओं के साथ आभीर जाति के यदुवंश के अंतर्गत चतुर्थ वृष्णि कुल में अवतार ग्रहण करूँगा।"
अन्य पुराणों के प्रमाण और उपसंहार
श्लोक 4 (स्कन्द पुराण नागर खंड आधारित)
हरिवंशे च भागे च देवीभागवते तथा। स्कान्दे नागरखण्डे च प्रमाणं स्पष्टमीरितम् ॥७॥
कश्यपस्य शापस्तु सावित्रीयागसंयुतः। कारणं त्रिदिवेशस्य आभीरे अवतारणे ॥८॥
- हिंदी अनुवाद: हरिवंश पुराण, देवीभागवत पुराण तथा स्कन्द पुराण के नागर खंड में भी भगवान विष्णु के आभीर जाति में अवतरण के अकाट्य प्रमाण स्पष्ट रूप से वर्णित हैं। इस प्रकार महर्षि कश्यप का शाप, सावित्री यज्ञ का यह विलक्षण प्रसंग और गोपों के प्रति विष्णु का आश्वासन—ये सभी समवेत कारण द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के आभीर कुल में प्राकट्य की पृष्ठभूमि का निर्माण करते हैं।
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