बुधवार, 8 जुलाई 2026

कर्म विपाक-(नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ।अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्) ।।


शुभाशुभं च यत्कर्म विना भोगान्न च क्षयः ।
भोगेन शुद्धिमाप्नोति ततो मुक्तिर्भवेन्नृणाम् ।। ४० ।।

इन श्लोकों में 'कर्म-विपाक' (कर्मों के अनुसार मिलने वाली योनियों और कष्टों) का वर्णन है। यहाँ इनका व्याकरणिक और भावपूर्ण हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है:

​श्लोक ६६-६७

मूल:

ततः स्वकुलजातोऽपि निर्व्याधिर्ब्राह्मणः शुचिः ।

ब्राह्मणः क्षत्रियघ्नश्च क्षत्रियो वा विना रणात् ।। ६६ ।।

तप्तशूलं च प्राप्नोति वर्षाणां च सहस्रकम् ।

क्वथितं तप्तलोहेन चाऽऽर्तनादं करोति च ।। ६७ ।।

पदच्छेद एवं व्याकरण:

  • स्वकुलजातोऽपि: स्वकुलजातः + अपि। अपने कुल में उत्पन्न हुआ भी।
  • निर्व्याधिः: व्याधि (रोग) से रहित।
  • क्षत्रियघ्नः: क्षत्रियं हन्तीति (तत्पुरुष समास) - क्षत्रिय को मारने वाला।
  • विना रणात्: युद्ध के बिना (अन्यायपूर्वक मारने पर)।
  • तप्तशूलम्: गर्म किए हुए शूल (भाले) को।
  • क्वथितम्: उबला हुआ (तप्त लोहे में)।
  • आर्तनादम्: दुःखी होकर चिल्लाना।

हिन्दी अनुवाद:

(पाप भोगने के बाद) वह पुनः अपने कुल में उत्पन्न होकर रोगरहित और पवित्र ब्राह्मण होता है। जो ब्राह्मण बिना किसी युद्ध (अन्यायपूर्ण तरीके से) के किसी क्षत्रिय की हत्या करता है, वह (मरने के बाद) एक हजार वर्षों तक 'तप्तशूल' नरक को प्राप्त करता है। वहाँ वह तप्त (गर्म) लोहे से उबाला जाता है और अत्यंत आर्तनाद (दर्द भरी चीखें) करता है।

​श्लोक ६८-६९

मूल:

ततो भवेन्मत्तगजो वर्षाणां शतकं तथा ।

ततो रक्तविकारी च शूद्रो वर्षशतं तथा ।। ६८ ।।

गजदानेन मुक्तश्च व्याधितश्च ततो द्विजः ।

वैश्यघ्नश्चापि वैश्यश्च शूद्रघ्नो वैश्य एव च ।। ६९ ।।

पदच्छेद एवं व्याकरण:

  • मत्तगजः: मदमस्त हाथी।
  • रक्तविकारी: रक्त संबंधी रोगों से ग्रस्त।
  • द्विजः: ब्राह्मण (द्वि-जाति)।
  • वैश्यघ्नः: वैश्य की हत्या करने वाला।

हिन्दी अनुवाद:

तत्पश्चात् वह सौ वर्षों तक मदमस्त हाथी की योनि में रहता है, फिर सौ वर्षों तक रक्त विकारों से ग्रसित शूद्र होता है। हाथी (की योनि) का दान करने से वह इस पाप से मुक्त होता है और पुनः ब्राह्मण योनि में जन्म लेकर (पूर्व पापों के कारण) व्याधिग्रस्त होता है। जो वैश्य की हत्या करता है, चाहे वह ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो या वैश्य हो, और जो शूद्र की हत्या करता है (वह भी इसी श्रेणी में आता है)।

​श्लोक ७०-७१

मूल:

वैश्यघ्नश्चापि शूद्रश्च समं पापं लभेद्ध्रुवम् ।

कृमिकुण्डं च प्राप्नोति वर्षाणां शतकं तथा ।। ७० ।।

कृमिभिर्भक्षितो दुःशी किरातश्च भवेत्ततः ।

वर्षाणां शतकं चैव कृमिव्याधिसमन्वितः ।। ७१ ।।

पदच्छेद एवं व्याकरण:

  • समं पापम्: समान पाप।
  • ध्रुवम्: निश्चित रूप से।
  • कृमिकुण्डम्: कीड़ों से भरे हुए नरक कुंड को।
  • किरातः: भील या वनवासी जाति (नीच योनि)।
  • कृमिव्याधिसमन्वितः: कीड़ों के रोगों से युक्त।

हिन्दी अनुवाद:

वैश्य की हत्या करने वाला और शूद्र की हत्या करने वाला—दोनों समान रूप से पाप के भागी होते हैं। वे सौ वर्षों तक 'कृमिकुण्ड' नरक में पड़ते हैं। वहाँ कीड़ों द्वारा खाए जाने के कारण उनका स्वभाव दुष्ट हो जाता है। तत्पश्चात् वह सौ वर्षों तक कीड़ों के रोगों से युक्त (शरीर में कीड़े पड़ने वाले) किरात (वनवासी) की योनि प्राप्त करता है।

​श्लोक ७२-७३

मूल:

ततो मन्दाग्नियुक्तश्च ब्राह्मणो दैन्यवान्व्रज ।

पञ्चाशद्वर्षपर्यन्तं दुर्बलश्च कृशोदरः ।। ७२ ।।

मुक्तिर्भवति युक्तेन तीर्थे चाश्वप्रदानतः ।

शूद्रघ्नो ब्रह्मणश्चैव कामतोऽकामतोऽपि वा ।। ७३ ।।

पदच्छेद एवं व्याकरण:

  • मन्दाग्नियुक्तः: जिसे भूख न लगती हो (पाचन शक्ति कमजोर)।
  • दैन्यवान्: दरिद्र या दीन।
  • कृशोदरः: दुबले पेट वाला।
  • अश्वप्रदानतः: घोड़े के दान से।

हिन्दी अनुवाद:

इसके बाद वह ब्राह्मण (पुनः जन्म लेने पर) मंदाग्नि से युक्त, दीन, पचास वर्षों तक दुर्बल और कृशोदर (पतले पेट वाला) होता है। तीर्थ में घोड़े के दान (अश्वदान) करने से उसे इस पाप से मुक्ति मिलती है। शूद्र की हत्या करने वाला ब्राह्मण, चाहे वह काम से (जानबूझकर) हो या अकामतः (अनजाने में), उसे इस विधि से प्रायश्चित करना चाहिए।

​श्लोक ७४

मूल:

सावित्री लक्षयाप्येन तदर्धेन शुचिर्भवेत् ।

चतुर्वर्णः कुक्कुरघ्नो ह्यभिशप्तश्च शंभुना ।। ७४ ।।

पदच्छेद एवं व्याकरण:

  • सावित्री लक्षया: सावित्री (गायत्री) मंत्र के एक लाख जप से।
  • तदर्धेन: उसके आधे (पचास हजार) जप से।
  • कुक्कुरघ्नः: कुत्ते को मारने वाला।
  • अभिशप्तः: शापित।

हिन्दी अनुवाद:

एक लाख 'सावित्री' (गायत्री) मंत्र के जप से या उसके आधे जप से वह पवित्र हो जाता है। चारों वर्णों में से जो कोई भी कुत्ते की हत्या करता है, वह भगवान शंभु (शिव) द्वारा शापित माना जाता है।

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