गुरुवार, 16 जुलाई 2026

आर्य व ग्राम संस्कृति के जनक गोप हैं।

आर्य व ग्राम संस्कृति के जनक गोप हैं
          
आर्य और किसान एक सिक्के के दो पहलू हैं। क्योंकि आर्य शब्द भी हल और कृषि से ही जुड़ा हुआ है। जग-जाहिर है कि प्रारम्भ में आर्य चरावाहे ही थे जिन्होंने कालान्तर में कृषि संस्कृति का विकास किया। क्योंकि आर्य शब्द जुड़ा है अरि से जिसमें अरि एक वैदिक देव है। जो सदैव अर (आरा) हाथ में लिए रहता है। ऋग्वेद में अरि सर्वोच्च ईश्वरीय शक्ति का भी वाचक है। जिसकी पुष्टि- ऋग्वेद -(१०/२८/१) से होती है-

"विश्वो ह्यन्यो अरिराजगाम ममेदह श्वशुरो ना जगाम ।
जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात्स्वाशितः पुनरस्तं जगायात् ॥१॥

पदान्वय:-  विश्वः । हि । अन्यः । अरिः । आऽजगाम । मम । इत् । अह । श्वशुरः । न । आ । जगाम ।जक्षीयात् । धानाः । उत । सोमम् । पपीयात् । सुऽआशितः । पुनः । अस्तम् । जगायात् ॥१.
ईश्वरोऽप्यरिः” [ निरु० ५। ७]

उपर्युक्त  ऋचा (श्लोक) में अरि शब्द ईश्वर वाची है।
इसके अतिरिक्त यूनानी कथाओं में इस वैदिक देव का वर्णन अरेस (Ares) के रूप में यूनानी युद्ध देवता के लिए है। अरेस नाम की व्युत्पत्ति पारम्परिक रूप से ग्रीक शब्द ἀρή (arē) से जुड़ी हुई है, जो डोरिक भाषा के ἀρά (ara) शब्द का आयोनिक (यूनानी) रूप है, जिसका अर्थ-  "विनाश"।
यूरोपीय विद्वान" वाल्टर बर्कर्ट का कहना है कि "अरेस स्पष्ट रूप से एक प्राचीन अमूर्त संज्ञा है जिसका अर्थ है लड़ाई अथवा युद्ध। वहीं अरि: शब्द कालान्तर में लौकिक संस्कृत में हरि यानी ईश्वर हो गया।

संस्कृत भाषा में "आरा" और "आरि" शब्द आज भी शस्त्रवाची हैं।  परन्तु वर्तमान में लौकिक संस्कृत में "अर्" धातु विद्यमान नहीं है।
सम्भव है कि पुराने जमाने में "अर्" धातु रही हो; जो पीछे से लुप्त हो गई हो। अथवा यह भी हो सकता है कि "ऋ" धातु का ही रूपान्तरण, "अर" हो गया हो (और संस्कृत व्याकरण में ऋ का अर् सम्प्रसारण होता भी है) संस्कृत व्याकरण में य्, व् र्, ल्  अन्त:स्थ वर्णों  का इ, उ, ऋ और लृ में परिवर्तन होना। अथवा सम्प्रसारण की प्रक्रिया है। अर् अथवा ऋ धातु का अर्थ होता है- "हल चलाना"

यह भी सम्भव है कि "हल की गति के कारण ही "ऋ" धातु का अर्थ गतिसूचक हो गया हो। क्योंकि- "ऋ" धातु के पश्चात "यत्" प्रत्यय करने से "अर्य्य और 'ऋ' धातु में " ण्यत्" प्रत्यय करने से "आर्य्य शब्द की सिद्धि होती है।
 ये दोनों शब्द कृदन्त पद हैं। कृदन्त वे पद (शब्द) होते हैं जिनकी व्युत्पत्ति किसी धातु (मूल क्रिया) से हुई हो। विभिन्न भाषाओं के कृषि वाचक धातुओं का विचार करने से जान पड़ता है कि "अर्य" और "आर्य" दोनों शब्दो का धात्वर्थ कृषक ही है। कुल मिलाकर चरावाहे कृषक ही आर्य हैं। इस बात को इतिहास भी मानता है।

कृष्ण और संकर्षण जैसे शब्द भी कृषि मूलक हैं गोप- गोचारण करते थे और इतिहास साक्षी है कि चरावाहों से कृषि संस्कृति का विकास हुआ और कृष्ण और संकर्षण (बलराम) दोनों युग पुरुष कृषि संस्कृति के प्रवर्तक और सूत्रधार थे। इतिहास कारों का निष्कर्ष है कि आर्य चरावाहे ही थे। किन्तु आज जो कृषक और चरवाहे नहीं है जैसे बनिया, ब्राह्मण और अन्य वृत्तियों से युक्त जन समुदाय को आर्य थ्योरी में जोड़ दिया गया। जबकि आर्य थ्योरी के हिसाब से ये लोग आर्य नहीं हो सकते। 
क्योंकि आर्य होने के लिए चरावाहा और कृषक होना आवश्यक है। और ये लोग चरावाहा और कृषक संस्कृति के ठीक विपरित है, क्योंकि इनको ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में कृषि कार्यों से इस लिए रोका गया कि कृषि कार्य से जीवों की हत्या होती है। इस बात की पुष्टि- मनुस्मृति ।।10/83। से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -

"वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्सत्रियोऽपि वा।
हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ।।10/83।

अर्थ-• ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वैश्य वृत्ति से जीवन निर्वाह करते हुए भी कृषि कार्य को कभी न करें अर्थात् इसे यत्न पर्वक त्यागें क्योंकि कि यह हिंसा के अन्तर्गत है।

इस प्रकार से देखा जाए तो ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण और क्षत्रिय न तो पशुपालन कर सकता हैं और ना ही कृषि कार्य। अर्थात् कृषि कार्य वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए निषिद्ध कर दिया गया। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि चरावाहे और कृषक जो आर्य संस्कृति के जनक थे उन्हें ही अनार्य घोषित कर दिया और जो आर्य संस्कृति के विरोधी थे उन्हें आर्य घोषित कर दिया गया।

जबकि सर्वविदित है कि आर्य संस्कृति के जनक गोपेश्वर श्रीकृष्ण और बलराम सहित समस्त गोप ही हैं। इसके साथ ही ये लोग ग्राम संस्कृति के भी जनक है। क्योंकि ग्राम शब्द का मूल अर्थ- ग्रास या घास युक्त भूमि से है। जहाँ पशुपालक- अपना पड़ाव डालते थे; धीरे धीरे उनके ये पड़ाव स्थाई होने लगे और इस प्रकार कालान्तर में  ग्राम-सभ्यता का जन्म हुआ। जबकि नगर सभ्यता व्यापारिक अथवा वाणिज्यिक केन्द्र के रूप में विकसित हुईं जिन्हे आज हम बाजारवाद कह सकते हैं। जहाँ वणिकों की बस्तियाँ ही बहुतायत में होती हैं। इसके विपरित गाँवों में कृषकों की बस्तियाँ देखने को मिलती है।

भारतीय इतिहास ही नहीं अपितु विश्व इतिहास यह उद्घोषणा करता है। कि कुशल चरावाहों के रूप में सम्पूर्ण एशिया की धरा पर अपनी महान सम्पत्ति गौओं के साथ कबीलों के रूप में यायावर जीवन व्यतीत करने वाले आर्य ही कृषक थे। यहीं से इनकी ग्राम- सभ्यता का विकास हुआ था जो अपनी गौओं के साथ साथ विचरण करते हुए ये चरावाहे जहाँ- जहाँ भी विशाल ग्रास-मेदिनी (घास के मैदान) देखते उसी स्थान पर अपना पढ़ाव डाल देते थे। इनके ये पड़ाव स्थाई होते गये और उसी प्रक्रिया के तहत कालान्तर में ग्राम संस्कृति का जन्म व विकास हुआ। ग्राम शब्द (आभीर-पल्लि या गाँव) शब्द का वाचक हो गया।

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