दिल्ली जन्तर मन्तर की हकीकत को और अधिक जीवन्त, यथार्थवादी और संघर्षमय रूप में बयां करता हुआ एक नया गीत:
(स्थायी)
जंतर मंतर की धरती पर, धड़कता भारत सारा है, यहाँ किसी का टूटा सपना, तो कोई हारा-हारा है।
नारे गूंजते, बैनर हिलते, उम्मीदें फिर जागती हैं, तपिश धूप की, पाँव के छाले, सच्चाई मांगती हैं!
(अंतरा 1)
लोहे की उन बैरिकेडों के, उस पार सत्ता सोती है, सड़के दिनों से लथपथ है, कोई वेवा छिपकर रोती है।
कोई विधवा बैठी है अपनी, आँखो से आँसू बहाऐ हुए,
कोई किसान खड़ा है यहाँ, अपनी फसल जलाए हुए।
(अंतरा 2)
कैमरों की चमचमाती लाइटें, कुछ पल को आ जाती हैं,
ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर के, टीआरपी ले जाती हैं।
रात ढले जब सन्नाटा इन, सूनी सड़कों पर छाता है,
कौन पूछता है किससे, किसका क्या हाल यहाँ जाता है?
(अंतरा 3)
फाइलों के बंडलों में, दबकर दम घुटता है सबका,
यहाँ हर एक चेहरा चीखता है, दर्द का मारा मारा कबका।
फिर भी जज्बा ज़िंदा है, सीने में आग सुलगती है,
जंतर मंतर की मिट्टी में, हर रोज़ बगावत पलती है!
(स्थायी)
जन्तर मन्तर की गलियां हैं, उम्मीदों का मेला है, हर कोई अपना दर्द लिए, खुद में खड़ा अकेला है।
कोई रोता है हक के खातिर, कोई उम्मीद जगाता है,दिल्ली के इस मंतर पर, सच खून पसीना बहाता है।
(अंतरा 1)
पत्थरों की इन दीवारों ने, कितने तूफ़ान देखे हैं,
आँखों में आंसू और हाथों में, बैनर-निशान देखे हैं।
दूर गाँव से चलकर आया, भूखा-प्यासा इंसान यहाँ,
अपनी टूटी किस्मत का, मांगता है वरदान यहाँ।
(अंतरा 2)
नारे गूंजते हवाओं में, न्याय की गुहार होती है,
सुनने वाले बहरे हैं, बस कागजी तकरार होती है।
बड़े-बड़े महलों तक क्या, इनकी चीखें जाती हैं?
या फाइलें धूल फांकती, और रातें कट जाती हैं?
(अंतरा 3)
फिर भी उम्मीद का दीया, यहाँ हर रोज़ जलता है,
जंतर मंतर की सड़क पर, कारवां हरदम चलता है।
हकीकत ये है इस जहां की, हक मांगना भी जुर्म हुआ,
पर इस जज्बे के आगे, हर पहरा यहाँ गुम हुआ।
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