श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के इस द्वादश स्कंध के नवें अध्याय में वर्णित यह प्रसंग बहुत ही शिक्षाप्रद और गहन है। इसमें मुनिवर गौतम के क्रोध, भगवती गायत्री की महिमा, और अंत में ब्राह्मणों के पश्चात्ताप के माध्यम से कर्म के सिद्धांत को बहुत ही मार्मिक ढंग से दर्शाया गया है।
मातृकन्यागामिनश्च भगिनीगामिनस्तथा।परस्त्रीलम्पटाः सर्वे भवत ब्राह्मणाधमाः॥ ७६
युष्मार्कं वंशजाताश्च स्त्रियश्च पुरुषास्तथा।महत्तशापदग्धास्ते भविष्यन्ति भवत्समाः॥ ७७
किं मया बहुनोक्तेन मूलप्रकृतिरीश्वरी।गायत्री परमा भूयाद्युष्मासु खलु कोपिता॥ ७८
वागदण्डमीदृशं कृत्वाप्युपस्पृश्य जलं ततः॥ ७९जगाम दर्शनार्थं च गायत्र्याः परमोत्सुकः।
प्रणनाम महादेवौं सापि देवी परात्परा॥ ८०
ब्राह्मणानां कृतिं दृष्ट्वा स्मयं चित्ते चकार ह।अद्यापि तस्या वदनं स्मययुक्तं च दृश्यते॥ ८१
उवाच मुनिवर्यं तं स्मयमानमुखाम्बुजा।भुजङ्गायार्पितं दुग्धं विषायैवोपजायते॥ ८२
शान्तिं कुरु महाभाग कर्मणो गतिरीदृशी।इति देवीं प्रणम्याथ ततोऽगात्स्वाश्रमं प्रति॥ ८३
ततो विप्रैः शापदग्धैर्विस्मृता वेदराशयः।गायत्री विस्मृता सर्वैस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ ८४
ते सर्वेऽथ मिलित्वा तु पश्चात्तापयुतास्तथा।प्रणेमुर्मुनिवर्यं तं दण्डवत्पतिता भुवि॥ ८५
नोचुः किञ्चन वाक्यं तु लजयाधोमुखाः स्थिताः।प्रसीदेति प्रसीदेति प्रसीदेति पुनः पुनः॥ ८६
श्लोकों का हिन्दी अनुवाद
- ७६: "जो मातृगामी, कन्यागामी, भगिनीगामी (बहन के साथ व्यभिचार करने वाले) हैं और परस्त्री लम्पट (पराई स्त्रियों में आसक्त) हैं, वे सभी अधम ब्राह्मण हो जाओ।"
- ७७: "तुम्हारे वंश में उत्पन्न हुए स्त्रियाँ और पुरुष भी इस शाप से दग्ध होकर तुम्हारे समान ही हो जाएँगे।"
- ७८: "मेरे अधिक बोलने से क्या? मूल प्रकृति ईश्वरी गायत्री तुम्हारे ऊपर बहुत कुपित हुई हैं।"
- ७९-८०: "व्याजी बोले- इस प्रकार वाग्दण्ड (वाणी का शाप) देकर और जल का स्पर्श कर, वे (गौतम मुनि) गायत्री के दर्शनार्थ परमोत्सुक होकर गए। वहाँ वे परात्परा देवी को देखकर प्रणाम किए।"
- ८१: "ब्राह्मणों की उस कृति (कार्य) को देखकर वे (गायत्री) मन में मुस्कुराईं। आज भी उनका वह मुख स्मययुक्त (मुस्कान से युक्त) दिखाई देता है।"
- ८२: "मुस्कुराते हुए मुख वाली उन्होंने मुनिवर (गौतम) से कहा- 'भुजंग (सर्प) को पिलाया गया दूध विष के रूप में ही परिणत होता है' (अर्थात दुष्टों को उपदेश देना व्यर्थ है)।"
- ८३: "'हे महाभाग! शांति धारण करें, कर्म की गति ऐसी ही है।' ऐसा कहकर और देवी को प्रणाम कर, वे अपने आश्रम की ओर चले गए।"
- ८४: "तदनन्तर शाप से दग्ध उन विप्रों (ब्राह्मणों) को वेदराशि (वेद) विस्मृत हो गए। यहाँ तक कि उन सभी को गायत्री भी विस्मृत हो गई, जो बड़े आश्चर्य की बात थी।"
- ८५: "वे सभी मिलकर पश्चात्ताप से युक्त हुए और मुनिवर (गौतम) के पास जाकर पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिरकर (दण्डवत) प्रणाम किए।"
- ८६: "वे लज्जा के कारण नीचे मुख किए हुए खड़े थे और कुछ भी बोल न सके, केवल बार-बार 'प्रसीद! प्रसीद! प्रसीद!' (प्रसन्न होइए) कह रहे थे।"
व्याकरण संबंधी मुख्य टिप्पणियाँ
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समास:
- मातृकन्यागामी: मातृगामी च कन्यागामी च (इतरेतर द्वन्द्व)।
- परस्त्रीलम्पटाः: परस्त्रीषु लम्पटाः (सप्तमी तत्पुरुष)।
- मुनिवर्य: मुनीनां वर्यः (षष्ठी तत्पुरुष)।
- स्मयमानमुखाम्बुजा: स्मयमानं मुखं अम्बुजं इव यस्याः सा (बहुव्रीहि समास)।
- दण्डवत्: दण्ड इव (अव्ययीभाव का प्रयोग, सादृश्य अर्थ में)।
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संधि:
- ततोऽगात्: ततः + अगात् (उत्व विसर्ग संधि)।
- तेऽथ: ते + अथ (पूर्व रूप संधि)।
- ततोविप्रैः: ततः + विप्रैः (विसर्ग का लोप या ओत्व)।
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प्रत्यय/विशेष:
- शापदग्धाः: शापेन दग्धाः (तृतीया तत्पुरुष), यहाँ 'दग्ध' में 'क्त' प्रत्यय है।
- स्मयमान: स्मय् धातु के साथ 'शानच्' प्रत्यय (वर्तमान कृदंत) का प्रयोग है।
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