ध्रुपद-कव्वाली का मिश्रित रूप उत्तर भारतीय लोग धुन में -
(तीव्र समवेत स्वर में गायन करें )
यादव योगेश कुमार रोहि की प्रस्तुति-
आज... नज़र के... सामने... जब उसूऽल... टूटने लगे ।ऽऽ...
इज्जत के रखवाले इज्जत लूटने लगे ।...
आज... नज़र के... साऽमने... जब उसूऽल... टूटने लगे ऽऽ...
इज्जत की रखवाले इज्जत लूटने लगे ।...
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जब तालिवो की आबाज को, अधिकारों के अंदाज को दबा दिया जाएगा।
शिक्षा को बाजारों में,रहीसो के आगारों में दामों में बैच दिया जाएगा।
बख्त बड़ा नाजुक, लेकर के दु:ख ऐसे लोगों के कर्मों से आयेगा।
क्या होगा जब सहनशीलता का ही बाँध टूटने लगे।
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाले इज्जत लूटने लगे।...
[कव्वाली काल / तीव्र गति और ताल की शुरुआत]
(हार्मोनियम, ढोलक और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ)
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विकास के विज्ञापनों में चीखती ये नारियाँ ...
कदम कदम पर धोखे, बड़ती गयीं दुश्वारियाँ।
महलों और झोपड़ियों की झगढ़ती दुवारियाँ!
उनको घरों पर लोग, अब दिन में लूटने लगे।
आज... नज़र के... सामने... जब उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले इज्जत लूटने लगे।...
[अंतरा 1 - ध्रुपद का अनुशासन + कव्वाली की तासीर]
(कव्वाल: ज़रा गौर फराइएगा...)
कानून के रखवाले जब अपनी हद को भूल जाएं,
कुर्सी पर शातिर बैठे , चंदा मन्दिर का खाएं!
अपनी ताना शाही में ज़ालिम तेवर दिखाऐ।
जहाँ सच बोलने की सजा जिल्लत होती है।,
वहाँ जालमों के जुल्म ए मिल्लत होती है।
फरेवीयों के हुजूम झूम जुटने लगे
आज... नज़र के... सामने... जब उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
अरे, तालियाँ बजाने वालो ज़रा आँख तो खोलो,
इस जुल्म के दौर में अब तुम भी कुछ तो बोलो!
सहते सहते जुल्म दम घुटने लगे ।
आज... नज़र के... सामने... जब उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
[अंतरा 2 - जोश और लय का उत्थान]
(कव्वाल: दर्द की दास्ताँ सुनिए...)
अस्प तालों की लम्बी कतारों में
इलाज कहाँ तामीर दारों में
शमशान लगे बजारो मे।
जान पर सौदा महज पैसों से होता है।
मायूसी में लाचार कोई ग़म संजोता है।
इंसानियत की महफिल से विश्वास उठने लगे।
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले इज्जत लूटने लगे।...
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