सूत्रधार:"पुराणों के अनुसार, शिनि के वंशज स्वयं-भोज हुए, उनके पुत्र हृदीक हुए।और हृदीक के पुत्र देवमीढ जिनकी तीन प्रमुख रानियाँ थीं—अश्मिका, सत्प्रभा और गुणवती।"
अश्मिका से सूरसेन का जन्म हुआ। और गुणवती से पर्जन्य, राजन्य और अर्जन्य का जन्म हुआ और देवमीढ की सत्प्रभा नामक पत्नी से सत्यवती नाम की कन्या हुई।
राजा देवमीढ का परिवार जितना विशाल था वे उतने ही न्याय प्रिय व उदार थे।
शुभ्यर्चना अपनी माता गुणवती के पास है और पर्जन्य, राजन्य और अर्जन्य अपने पिता देवमीढ के पास हैं आत्मीयता के भाव को व्यक्त कर रहे हैं।
यदुवंश के वृष्णिकुल में
इतिहास के बिखरे हुए पन्नों पर एक नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। देवमीढ- देवमीढ राजाओं का वंश ही नहीं अपितु लोकतन्त्र की परम्परा है। देवमीढ के गुणवती रानी से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र पर्जन्य जो गोसेवा और वैष्णव भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे उन्होंने मधुपुर(मथुरा) से अपने सभी सहोदरों राजन्य, अर्जन्य, तथा शुभ्यर्चना के साथ गोवर्धन के समीप नन्दीश्वर प्रदेश में प्रस्थान किया । यह एक भौगोलिक दूरी तय करने की यात्रा नहीं थी अपितु यदुवंश के विस्तार का शंखनाद था। गोवर्धन के समीप का वह क्षेत्र जिसे नन्दीश्वर नाम से जाना गया वह अब पर्जन्य परिवार की नवीन कर्मभूमि बनने जा रहा है ।
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