शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

देवता: उर्वशी ऋषि: पुरूरवा ऐळः छन्द: पादनिचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः




मंत्र का मूल भाव:
"इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।
अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरां न मायुं चितयन्त धुनयः ॥"
सरल हिंदी अर्थ:
  • पुरूरवा कहते हैं कि बाण के बिना तरकश (बाण रखने की जगह) की कोई शोभा नहीं होती।
  • वह कहते हैं, "हे उर्वशी! तुम्हारी अनुपस्थिति में मैं सैकड़ों गायों का पालक व सेवक पुरूरवा ! वेग से रहित हो गया हूँ, जैसे बिना बाण के तरकश हे अवीरे ! भेड़ और गो आदि के साथ चलने वाली उर्वशी ! अब मेरे उर (बड़े) कर्म प्रकाशित नहीं होते ! मैं अब शत्रुओं को कँपाने वाला बलवान योद्धा नहीं रहा। बिना तुम्हारे सहयोग के मेरे सैनिक भी मेरी आज्ञा नहीं मानते। तुम लौट आओ।" 
यह मंत्र एक ** analogy (समानता)** का उपयोग करता है। इसमें पुरूरवा खुद को 'तरकश' और उर्वशी को 'बाण' मानते हैं। जैसे तरकश बाण के बिना बेकार है, वैसे ही पत्नी या प्रियतमा के बिना पुरुष अधूरा और शक्तिहीन है।

इषुधेः) इषु कोश से (असना) फेंकने-योग्य-फेंका जानेवाला (इषुः) बाण (श्रिये न) विजयलक्ष्मी गृहशोभा के लिए समर्थ नहीं होता है, तुझ भार्या तुझ प्रजा के सहयोग के बिना, (रंहिः-न) मैं वेगवान् बलवान् भी नहीं बिना तेरे सहयोग के (गोषाः-शतसाः) सैकड़ों गायों का पालक( सेवक)  (अवीरे) हे भेड़ों को पालने वाली उर्वशी। हे आभीरे !   (उरा क्रतौ) विस्तृत संग्रामकर्म में (न विदविद्युतत्) मेरा वेग प्रकाशित नहीं होता बिना तेरे सहयोग के (धुनयः) शत्रुओं को कंपानेवाले हमारे सैनिक (मायुम्) हमारे आदेश को (न चिन्तयन्त) नहीं मानते हैं बिना तेरे सहयोग के ॥३॥


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