ध्रुपद-कव्वाली का मिश्रित रूप
[आलाप / ध्रुपद शैली - गंभीर और ठहरी हुई शुरुआत]
(तानपुरा और पखावज की गंभीर गूंज के साथ)
(तीव्र समवेत स्वर में गायन करें )
आज... नज़र के... सामने... जब उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
आज... नज़र के... साऽमने... जब उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
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जब तालिवो की आबाज को, सिकञ्जो में दबा दिया जाएगा।
शिक्षा को बाजारों में, हाटागारें में बैच दिया जाएगा।
बख्त बड़ा नाजुक लोगों के कर्मों से आयेगा।
क्या होगा जब सहनशीलता का ही बाँध टूटने लगे।
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाली में मुस्तैद इज्जत लूटने लगे।...
[कव्वाली काल / तीव्र गति और ताल की शुरुआत]
(हार्मोनियम, ढोलक और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ)
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विकास के विज्ञापनों में चीखती ये नारियाँ हैं...
कदम कदम पर धोखे, बड़ती गयीं दुश्वारियाँ।
महलों और झोपड़ियों की झगढ़ती दुवारियाँ!
अपने घरों पर लोग, अब दिन में लूटने लगे हैं।
आज... नज़र के... सामने... जब उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
[अंतरा 1 - ध्रुपद का अनुशासन + कव्वाली की तासीर]
(कव्वाल: ज़रा गौर फराइएगा...)
कानून के रखवाले जब अपनी हद को भूल जाएं,
कुर्सी के खातिर भी चंदा भी मन्दिर का खाएं!
जहाँ सच बोलने की सजा सिर्फ जिल्लत होती है।,
वहाँ जालमों के जुल्म ए मिल्लत होती है।
अरे, तालियाँ बजाने वालो ज़रा आँख तो खोलो,
इस जुल्म के दौर में अब तुम भी कुछ तो बोलो!
सहते सहते जुल्म दम घुटने लगे हैं।
आज... नज़र के... सामने... जब उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले ही इज्जत लूटने लगे।...
[अंतरा 2 - जोश और लय का उत्थान]
(कव्वाल: दर्द की दास्ताँ सुनिए...)
अस्पतालों की लम्बी कतारों में
शमशान की पंगत मानों बजारो में।
जान पर सौदा महज पैसों से होता है।
मायूसी में लाचार ग़म संजोता है।
इंसानियत की महफिल से विश्वास उठने लगे हैं
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत के रखवाले इज्जत लूटने लगे।...
नहीं छपती खबर अखवारों में!
,सच की खबर जो पसंदगी।
महंगाई के बोझ तले,दब गयी है जिन्दगी।
रोज़गार के झूठे दावे, बार बार Ufff दगी।
नये प्रयोगों से लगने को ठग जुटने लगे है।
आज... नज़र के... साऽमने... जब हर उसूऽल... टूटने लगेऽऽ...
इज्जत की रखवाली में मुस्तैद इज्जत लूटने लगे।...
अरे, कब तक ये छलावा यूँ ही सहते जाओगे,
भूखे प्यासे रहकर क्या मुकद्दर आज़माओगे?
[समापन / द्रुपद और कव्वाली का संयुक्त चरम (Climax)]
(तेज़ ताल, पखावज की गूंज और बुलंद स्वर)
मगर ज़मीर की लौ को बुझा नहीं सकता रोहि !
अंधेरे के साये में अरमां सजो नहीं सकता कोई!
वक्त की इस आंधी में चैन से सो नहीं सकता कोई ,
अव्यवस्था की इस चादर को तार-तार करना होगा!
हाँ, तार-तार करना होगा...
व्यवस्था की इस चादर को तार-तार करना होगा!
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