दृश्य 4: व्रजराज नन्द और माता यशोदा का परिचय
सूत्रधार (आवाज):
मर्दुमसुमारी (जनसंख्या) के अंतर्गत इन सभी आगत सदस्यों का परिचय पूर्ण होने के बाद, अब गोकुल के प्राण नन्द और यशोदा का दिव्य दर्शन होता है:
नन्द बाबा: वे गौर वर्ण के हैं, उनके चेहरे पर एक शांत और तेजवान मुस्कान शोभायमान है। वे अपने परम मित्र श्री वृषभानु जी के साथ हुई किसी मधुर चर्चा में मग्न प्रतीत होते हैं।
माता यशोदा: आभीर जाति को यश प्रदान करने वाली माँ यशोदा की अंग कान्ति श्यामल वर्ण की अत्यंत सुंदर छवि है। वे साक्षात वात्सल्य की प्रतिमूर्ति लग रही हैं। उन्होंने इंद्रधनुष के रंगों के समान सुंदर और सतरंगी वस्त्र धारण किए हैं, जो उनके व्यक्तित्व को और भी दिव्य बनाते हैं।
दृश्य 5: बाल-कृष्ण की नटखट लीला
(दृश्य में नन्द और यशोदा के ठीक बीच में चार वर्ष के कन्हैया बैठे हैं। प्रांगण में पक्षियों का कलरव गूँज रहा है। कन्हैया कभी मैया यशोदा के सतरंगी आंचल को खींचते हैं, तो कभी बाबा नन्द की दाढ़ी से खेलने लगते हैं। यशोदा जी उन्हें स्नेह से पास खींचती हैं और माथे पर हाथ फेरती हैं।)
माता यशोदा:
(बाल-कृष्ण को लाड़ करते हुए, प्रेम भरे स्वर में)
"ऐ कान्हा! चुपचाप बैठ जा मेरे लाल, वरना अभी तेरी मैया तुझसे रूठ जाएगी।"
नन्द बाबा:
(ठहाका लगाकर हंसते हुए, गर्वित नेत्रों से कान्हा को देखकर)
"अरे यशोदा, इसे मत डाँटो! ये तो पूरे गोकुल की आँख का तारा है। भला आज तक कोई इसे रोक पाया है?"
(बाल-कृष्ण दोनों की ओर देखते हैं और अपनी किलकारियों के साथ खिलखिलाकर हँसते हैं। उनके मुख की मधुर मुस्कान से पूरा प्रांगण आलोकित हो उठता है।)
(संगीत तेजी से गूँजता है और कथा का यह दृश्य प्रेम और आनंद के साथ विश्राम लेता है।)
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