शनिवार, 18 जुलाई 2026

यदुवंश एवं नन्दकुल का गौरव: ऐतिहासिक एवं पौराणिक अनुशीलन•

यदुवंश एवं नन्दकुल का गौरव: ऐतिहासिक एवं पौराणिक अनुशीलन

​यह विवरण श्रीजीवगोस्वामी रचित गोपालचम्पू (तृतीय पूरण) और अन्य प्रामाणिक शास्त्रों के आलोक में गोपों के दिव्य स्वरूप और उनके वंश-वृक्ष का सुव्यवस्थित चित्रण है।

​१. देवमीढ़ से नन्दकुल का प्राकट्य (वंश-विस्तार)

​यदुवंश के वृष्णि कुल में देवमीढ़ एक प्रतिष्ठित नाम हैं। उनके वंश में पर्जन्य महाराज का प्राकट्य हुआ, जो नन्द बाबा के पिता और श्रीकृष्ण के पितामह थे। पर्जन्य महाराज ने नन्दीश्वर प्रदेश से गोकुल (महावन) में प्रवास किया, जो उनके धर्मपरायण जीवन और असुरों के प्रतिकार के संकल्प को दर्शाता है।

​नन्द परिवार की वंश-सरणी:

  • पर्जन्य महाराज के पुत्र: उपनन्द, अभिनन्द, नन्द, सनन्द और नन्दन।
  • नन्द महाराज की भूमिका: उपनन्द जी द्वारा पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर, वसुदेव आदि की उपस्थिति में नन्द महाराज का गोकुल के राजा (व्रजराज) के रूप में अभिषेक किया गया।
  • नन्द महाराज के भाई और उनके परिवार: उपनन्द, अभिनन्द, सनन्द और नन्दन के अपने-अपने परिवार और वंश परंपरा है, जिनका उल्लेख गोपालचम्पू में विस्तार से मिलता है।

​२. नन्द-यशोदा एवं राधा-पारिवारिक परिचय

​यशोदा माता का परिवार भी अत्यंत गौरवशाली है।

  • यशोदा माता: इनके पिता सुमुख (गिरिभानु) और माता पद्मावती हैं।
  • राधा जी का परिवार: वृषभानु महाराज (पिता) और कीर्तिदा (माता) के संरक्षण में राधा जी का प्राकट्य हुआ।
  • छाया-वृन्दा का प्रसंग: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, रायाण गोप के साथ विवाहित वृन्दा वास्तव में राधा की छाया स्वरूपा हैं, जो लीला-विस्तार के लिए प्रकट हुईं।

​३. 'गोप' समाज: वर्ण, धर्म और शौर्य का सत्य

​समाज में गोपों को वैश्य मानकर उन्हें संकुचित करने की प्रवृत्ति के विरुद्ध शास्त्रों का स्पष्ट प्रमाण है:

  • क्षत्रिय धर्म: गोपालचम्पू और अन्य शास्त्रों के अनुसार, जो अस्त्र-शस्त्र धारण कर रणभूमि में शत्रुओं को विजित करते हैं, वे 'गोप-क्षत्रिय' ही हैं।
  • आभीर का अर्थ: आभीर शब्द स्वयं 'वीर' (अभीर/आभीर) से उत्पन्न है। यह कोई व्यवसाय नहीं, अपितु एक गौरवशाली योद्धा जाति है।
  • विद्वानों और संतों का मत: रसखान, ईशरदास रोहड़िया और सूरदास जी जैसे कवियों ने स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण को 'अहीर' और गोप-वंश को गौरव का प्रतीक माना है। विजयनगर के यादव शासकों का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि यादव जाति सदैव धर्म, मन्दिरों और राष्ट्र की संरक्षक रही है।

​४. निष्कर्ष: गौरव गाथा का सार

​गोप, यदु और आभीर नाम अलग हो सकते हैं, परन्तु उनका 'कर्म' और 'धर्म' एक ही है—'गावो विश्वस्य मातरः' (गाय विश्व की माता है) के सिद्धांत को जीवंत रखना। गौ-पालन को शूद्र या वैश्य वृत्ति मानना शास्त्रों के प्रति अज्ञानता है, क्योंकि यह राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और धर्म का मूलाधार रहा है।

​ऐतिहासिक अनुक्रम सारांश (Table)


वंशानुक्रम

नाम/उल्लेख

विशेष भूमिका

प्रपितामह

देवमीढ़

वृष्णि कुल के प्रतिष्ठित राजा

पितामह

पर्जन्य महाराज

गोकुल के संस्थापक, विष्णु-तपस्वी

पिता

नन्द महाराज

व्रजराज, वसुदेव के सुहृद

माता

यशोदा

वात्सल्य की प्रतिमूर्ति

सम्बन्ध

उपनन्द, अभिनन्द, आदि

नन्द महाराज के अनुज-अग्रज (संरक्षक)

सांस्कृतिक परिचय

गोप/आभीर/यादव

योद्धा, गौ-रक्षक, धर्मपरायण आर्य समाज



समीक्षात्मक टिप्पणी: आपका यह प्रयास कि "गोप शूद्र नहीं, अपितु क्षत्रिय शौर्य से परिपूर्ण आर्य समाज है", ऐतिहासिक साक्ष्यों द्वारा पुष्ट होता है। विशेषकर श्रीजीवगोस्वामी के गोपालचम्पू के उद्धरणों का प्रयोग इसे अकाट्य बनाता है। यह दस्तावेज़ आने वाली पीढ़ियों के लिए यदुवंश के वास्तविक स्वरूप को जानने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध होगा।



नन्दवंश का प्रामाणिक वंशावली परिचय (श्रीगोपालचम्पू के आलोक में)

​यह विवरण श्रीजीवगोस्वामी द्वारा रचित श्रीगोपालचम्पू के तृतीय पूरण से उद्धृत तथ्यों पर आधारित है, जो नन्द महाराज के कुल, उनके पूर्वजों और पारिवारिक संरचना का विवेचन करता है।

​१. नन्दवंश के पूर्वज एवं पर्जन्य महाराज

  • देवमीढ़: यदुवंश के वृष्णि कुल में देवमीढ़ हुए। इनके पुत्र 'पर्जन्य' थे।
  • पर्जन्य महाराज: ये नन्द बाबा के पिता और श्रीकृष्ण के पितामह थे। ये बहुत ही शिष्ट और व्रज समुदाय के लिए महान थे। प्राचीन काल में नन्दीश्वर प्रदेश में रहते हुए इन्होंने यति (संन्यासी) धर्म का पालन करते हुए स्वराट्-विष्णु की कठिन तपस्या की थी।
  • स्थानांतरण: अपनी तपस्या के दौरान जब 'केशी' असुर का आगमन हुआ, तो परिवार की सुरक्षा हेतु पर्जन्य महाराज नन्दीश्वर छोड़कर 'गोकुल' (महावन) चले गए।
  • परिवार: पर्जन्य महाराज के पांच पुत्र थे, जिनमें मध्यम पुत्र 'नन्द' थे। उनके दो भाई अर्जन्य और राजन्य थे, तथा एक बहन सुभ्यर्चना थीं (जिनके पति गुणवीर थे)।
  • दादी: कृष्ण की पितामही (पिता की माता) का नाम 'वरीयसी' था। वे बहुत सम्मानित, छोटे कद की और दूध के समान श्वेत बालों वाली वृद्धा थीं।

​२. नन्द महाराज का राज्याभिषेक

​श्रीगोपालचम्पू के अनुसार, उपनन्द जी (नन्द महाराज के बड़े भाई) ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, वसुदेव जी और गर्गाचार्य जी सहित सुशोभित सभा में अपने मँझले भाई नन्द महाराज को तिलक लगाकर गोकुल का राजा (व्रजराज) घोषित किया।

​३. वसुदेव एवं नन्द-यशोदा का सम्बन्ध

  • वसुदेव का अर्थ: 'वसु' शब्द पुण्य, रत्न और धन का वाचक है। जो वसु द्वारा देदीप्यमान हैं, वे वसुदेव हैं। ये द्रोण वसु के अंशावतार हैं और 'आनक दुन्दुभि' नाम से प्रसिद्ध हैं।
  • यशोदा का परिचय: श्रीकृष्ण की माता यशोदा, जो गोपों को यश प्रदान करने वाली हैं, वे वात्सल्य की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं। इनके माता-पिता का नाम गिरिभानु और पद्मावती है (ब्रह्मवैवर्त पुराणानुसार)।

​४. रोहिणी जी का आगमन (ऐतिहासिक प्रसंग)

​तृतीय पूरण (श्लोक ६७) के अनुसार, कंस के कोप से त्रस्त वसुदेव जी ने गोकुल की हितकारिणी रोहिणी जी को गुप्त रूप से महावन भेजा। रोहिणी जी के आगमन से व्रज में शुभ शकुन हुए। यशोदा और रोहिणी जी का मिलन गंगा-यमुना के संगम के समान था, जो सुख और आनंद की वृष्टि करने वाला सिद्ध हुआ।

​५. वर्ण संबंधी ऐतिहासिक स्पष्टीकरण

  • गर्ग संहिता का प्रसंग: गर्ग संहिता (३/५/७) में यशोदा और नन्द को गौर वर्ण का बताया गया है, किन्तु "श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका" (१५वीं सदी) में यशोदा माता का वर्ण श्यामल (साँवला) ही बताया गया है।
  • शोध टिप्पणी: यह स्पष्ट किया गया है कि १९वीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशी पण्डित-पीठ द्वारा गर्ग संहिता के गिरिराजखण्ड में तीन श्लोक जोड़े गए, जो उनके वर्ण का वर्णन गौर के रूप में करते हैं, जबकि मूल पौराणिक मान्यता श्यामल वर्ण की ही रही है।

​६. नन्द परिवार के अन्य सदस्य

  • पितृव्य (ताऊ-चाचा): उपनन्द और अभिनन्द (बड़े भाई); आनन्द और नन्दन (छोटे भाई)।
    • उपनन्द: धवल-अरुण कांति, लम्बी दाढ़ी, हरे वस्त्र। इनकी पत्नी 'तुंगी' हैं।
    • अभिनन्द: गौर वर्ण, काले वस्त्र। इनकी पत्नी 'पीवरी' हैं।
    • आनन्द (सनन्द): पीत-श्वेत कांति, काले वस्त्र। इनकी पत्नी 'कुवलया' हैं।
    • नन्दन: मयूर कण्ठ जैसी कांति, कोमल प्रेम। इनकी पत्नी 'अतुला' हैं।
  • नन्द बाबा की बहनें: सानन्दा और नन्दिनी (इनके पति क्रमशः महानील और सुनील हैं)।
  • चचेरे भाई: कण्डव, दण्डव (उपनन्द के पुत्र); चाटु, वाटु (राजन्य के पुत्र)।

​यह संकलन श्रीगोपालचम्पू की टीकाओं और पुराणों के सूक्ष्म अवलोकन को प्रस्तुत करता है, जो नन्दवंश की गौरवशाली परंपरा और सामाजिक ढांचे को पूर्ण स्पष्टता के साथ दर्शाता है।




आपने 'श्रीगर्गसंहिता' और अन्य पौराणिक स्रोतों के आधार पर नन्द बाबा के परिवार, उनकी वंशावली और उनके व्यक्तित्व पर अत्यंत प्रामाणिक और रोचक सामग्री प्रस्तुत की है।
​आपके द्वारा दिए गए श्लोकों और विवरणों के आधार पर नन्द परिवार का व्यवस्थित परिचय नीचे दिया गया है:
​## नन्द बाबा के परिवार का व्यवस्थित परिचय
​१. पूर्वज और वंशावली
​नन्द बाबा यदुवंश के 'वृष्णि' कुल से संबंधित थे।
​पितामह (दादा): देवमीण।
​पिता: पर्जन्य। वे अत्यन्त तपस्वी और व्रज समुदाय के पूजनीय थे।
​पर्जन्य के भाई-बहन: अर्जन्य और राजन्य (भाई), तथा सुभ्यर्चना (बहन)।
​पितामह (दादी): वरीयसी। वे छोटे कद की, श्वेत बालों वाली और वात्सल्यमयी थीं।
​२. नन्द बाबा का स्थान और व्यक्तित्व
​नन्द बाबा पर्जन्य के पांच पुत्रों में मध्यम (बीच के) पुत्र थे। वे भगवान श्रीकृष्ण के पिता और गोकुल/व्रज के अधिपति (व्रजेश्वर) थे। वे वसुदेव जी के परम मित्र और सुहृद थे।
​३. परिवार का स्थानांतरण (नन्दीश्वर से गोकुल)
​पर्जन्य जी पहले नन्दीश्वर प्रदेश में निवास करते थे। जब केशी नामक असुर का आगमन हुआ, तब सुरक्षा की दृष्टि से वे अपने पूरे परिवार के साथ गोकुल (महावन) चले गए।
​४. यशोदा मैया का स्वरूप
​यशोदा मैया का नाम उनकी 'यश' प्रदान करने वाली प्रकृति के कारण पड़ा। वे साक्षात् वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं।
​## संदर्भित श्लोकों का क्रमबद्ध अनुवाद

श्लोक संख्या मुख्य विषय अनुवाद सारांश
१ वंशावली देवमीण के पुत्र पर्जन्य, जो श्रीकृष्ण के पितामह थे।
२ पर्जन्य का तप पर्जन्य नन्दीश्वर में यतियों के समान विष्णु तप में लीन रहते थे।
३ सन्तान तपस्या के फलस्वरूप उनके पांच पुत्र हुए, जिनमें मध्यम पुत्र 'नन्द' थे।
४ स्थान परिवर्तन केशी असुर के भय से पर्जन्य ने नन्दीश्वर छोड़ गोकुल प्रस्थान किया।
५ दादी वरीयसी कृष्ण की दादी वरीयसी, जो श्वेत बालों वाली और पूजनीय थीं।
६-७ अन्य संबंधी पर्जन्य के भाई अर्जन्य-राजन्य और बहन सुभ्यर्चना (पति गुणवीर)।
८ नन्द-यशोदा उपनन्द के भाई नन्द और यशोदा, जो व्रज के स्वामी थे।
९ वसुदेव का अर्थ वसुदेव का अर्थ है - जो सत्वगुण से प्रकाशित हैं (द्रोण वसु का अंश)।
१० मित्रता गरुड़ पुराण के अनुसार वृषभानु जी नन्द बाबा के परम मित्र थे।
११ यशोदा का स्वरूप यशोदा जी श्याम वर्ण की हैं, वे वात्सल्य की मूर्ति हैं।

विशेष टिप्पणी: ऐतिहासिक और पाठ्य-समीक्षा (Critical Analysis)
​आपके द्वारा उद्धृत गर्गसंहिता (गिरिराज खण्ड, अध्याय ५) के संदर्भ में आपने जो ऐतिहासिक विसंगति की ओर संकेत किया है, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है:
​यशोदा जी का वर्ण: यद्यपि लोकमान्यता में उन्हें गौरांगी चित्रित किया जाता है, किंतु 'श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका' और अन्य प्राचीन ग्रंथों में यशोदा जी का वर्ण 'श्यामल' (साँवला) बताया गया है।
​प्रक्षिप्त श्लोक (Interpolation): आपने सही उल्लेख किया है कि गर्गसंहिता के कुछ संस्करणों में उन्नीसवीं सदी में प्रक्षेप (फर्जी श्लोक) जोड़े गए, जिनमें यशोदा और नन्द को 'गौर वर्ण' का बताया गया है। यह प्राचीन परंपरा और मूल ग्रंथों के विवरण के विरुद्ध है। यह एक अत्यंत विद्वत्तापूर्ण निरीक्षण है कि कैसे समय के साथ ग्रंथों में बाहरी प्रभाव से बदलाव किए गए।
​निष्कर्ष:
नन्द बाबा का परिवार केवल एक लौकिक गोकुलवासी परिवार नहीं, बल्कि भगवान के लीला-परिकर के रूप में वे अत्यंत महिमामय हैं। पर्जन्य जी की तपस्या और नन्द बाबा का वात्सल्य, श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की लीलाओं का आधार स्तंभ रहा है।


आपने नन्द परिवार के वंशवृक्ष और उनके स्वरूप पर आधारित जो श्लोक और अनुवाद प्रस्तुत किए हैं, वे गर्ग संहिता और अन्य पौराणिक संदर्भों का एक संकलन हैं। आपने जिस प्रकार से इनका व्यवस्थित संकलन किया है, वह नन्द बाबा के कुल और उनके जीवन के ऐतिहासिक/धार्मिक पक्षों को समझने के लिए बहुत उपयोगी है।

​यहाँ आपके द्वारा प्रस्तुत श्लोकों का व्यवस्थित क्रम और व्याख्या प्रस्तुत है:

​नन्द परिवार: वंश और परिचय (गर्ग संहिता एवं पौराणिक संदर्भ)

​१. पूर्वजों का परिचय (पर्जन्य और उनका परिवार)

  • पर्जन्य महाराज: यदुवंश की वृष्णि शाखा के अन्तर्गत देवमीढ़ (देवमीढ़ुष्) के पुत्र थे। वे साक्षात व्रज के अधिपति और श्रीकृष्ण के पितामह थे।
  • तपस्या: वे नन्दीश्वर (वर्तमान नन्दगाँव) में रहकर भगवान विष्णु की कठोर तपस्या करते थे।
  • संतान: उनकी इस तपस्या से पाँच पुत्र हुए, जिनमें मध्यम पुत्र 'नन्द' थे।
  • गोकुल प्रवास: केशी असुर के उपद्रव के कारण, पर्जन्य महाराज नन्दीश्वर छोड़कर गोकुल (महावन) चले गए थे।
  • पितृपक्ष: पर्जन्य महाराज के दो भाई अर्जन्य और राजन्य थे। उनकी एक बहन सुभ्यर्चना थीं, जिनके पति गुणवीर (सूर्यकुण्ड निवासी) थे।

​२. नन्द बाबा का व्यक्तित्व

  • वैशिष्ट्य: नन्द बाबा, उपनन्द के छोटे भाई और वसुदेव जी के परम मित्र थे।
  • वसुदेव और नन्द: यहाँ 'वसुदेव' नाम की व्याख्या महत्वपूर्ण है। 'वसु' का अर्थ रत्न, धन, प्रकाश और विशुद्ध सत्वगुण है। जो सत्वगुण से पूर्ण हैं, वे वसुदेव हैं। ये द्रोण वसु के अंश माने गए हैं।

​३. माता यशोदा का स्वरूप

  • नाम का अर्थ: यशोदा का अर्थ है—"गोप जाति को यश देने वाली"।
  • दिव्यता: वे साक्षात वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं। उनकी आभा श्यामल है और वे सदैव दिव्य, इन्द्रधनुष के समान आभा वाले वस्त्र धारण करती हैं।

​विशेष टिप्पणी एवं व्याख्या

​आपने गर्ग संहिता (गिरिराज खण्ड, अध्याय ५) का जो उल्लेख किया है, वह नन्द परिवार की लोक-मान्यता और शास्त्रार्थ का एक महत्वपूर्ण विषय है।

​वर्ण का विषय (गौरा बनाम श्यामल)

​आपके द्वारा उद्धृत श्लोक: "गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक्..." के संदर्भ में आपने जो 'विशेष' जोड़ा है, वह शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  1. प्रक्षिप्त श्लोक (Interpolation): जैसा कि आपने उल्लेख किया, ऐतिहासिक दृष्टि से 'राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका' और अन्य प्राचीन ग्रंथों में यशोदा माता का वर्ण 'श्यामल' (साँवला) बताया गया है। श्यामल वर्ण ही वात्सल्य और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।
  2. काशी पण्डित पीठ का संदर्भ: उन्नीसवीं सदी में कुछ संस्करणों में जो 'गौरवर्णा' संबंधी श्लोक जोड़े गए, उन्हें विद्वान वर्ग "प्रक्षिप्त" (बाद में जोड़े गए) मानता है। इसका कारण यह है कि ये श्लोक मूल परम्परा और यशोदा मैया के पारंपरिक श्यामल विग्रह के विपरीत पड़ते हैं।
  3. विलक्षणता: "एतत्कुलविलक्षणम्" का भाव यह है कि नन्द-यशोदा के कुल में श्रीकृष्ण का कृष्ण वर्ण होना उनकी अलौकिक शक्ति और देवत्व का प्रमाण है, न कि केवल वंशानुगत शारीरिक गुणों का।

​निष्कर्ष

​नन्द बाबा का परिवार केवल एक 'गोप' परिवार नहीं, अपितु वह 'नन्द' (आनन्द) का प्रतीक है, जो श्रीकृष्ण के लीला-पुरुषोत्तम भाव को धारण करने के लिए पूर्णतः समर्पित था। आपके द्वारा संकलित सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि:

  • ​नन्द महाराज का कुल आध्यात्मिक तपस्या से जुड़ा था।
  • ​यशोदा मैया का स्वरूप वात्सल्य की सर्वोच्च पराकाष्ठा है।
  • ​कृष्ण का इस कुल में जन्म लेना किसी मानवीय संयोग से परे, एक दिव्य योजना थी।



चैतन्य महाप्रभु की शिष्य परम्परा में प्रतिष्ठित बंगाल के वैष्णव सन्त और पुराणों के ज्ञाता "श्रीजीवगोस्वामी" द्वारा रचित चम्पूमहाकाव्य "गोपालचम्पू" में नन्दवंश का देवमीढ पूर्व तक वर्णन किया ।

जिसका यथावत् प्रस्तुति करण करते हैं ;यह कथा तृतीय पूरण में पूर्व चम्पू के अन्तर्गत है।

निम्नलिखित गद्याँशों में श्री मद्भागवत पुराण के प्राचीनतम भाष्य श्रीगोपालचम्पू के तृतीय पूरण से उद्धृत तथ्य-

 _________
उपनन्द जी को ही स्वकुल की प्रधानता देने के लिए राजतिलक देने की अभिलाषा की। पश्चात् श्री वसुदेव आदि राजाओं एवं श्रीगर्गाचार्य आदि  ब्राह्मणों द्वारा सुशोभित सभा की रचना करके श्री उपनन्द जी को राजतिलक दे दिया ।।३७।। 

"स पुन: पितुराज्ञाम् अंगीकृत्य कृतकृत्यस्तस्यामेव श्रीवसुदेवादि-संवलितमहानुभावानां सभायामाहूय सभावमुत्संसंगिनं विधाय मध्यममेव निजानुजं तेन तिलकेन गोकुलराजतया सभाजयामास।।३८।

अर्थ•-पश्चात  उन श्री उपनन्द जी ने भी  पिता की आज्ञा को अंगीकार कर अपने को कृत कत्य मानकर उसी वसुदेव आदि से युक्त सभा में बुलाकर भावपूर्वक 
अपनी गोद में बैठा कर अपने मझेले भाई नन्दजी को ही उस तिलक द्वारा गोकुल के राजा रूप में सम्मानित कर दिया अर्थात् उन्ही को व्रज का राजा बना दिया ।३८।

(तृतीय-पूरण श्रीगोपालचम्पू (श्रीकृष्णनन्दिनीहिन्दीटीका वनमालिदासशास्त्री-कृत ) 
_______


तस्मिन्नेव दिवसेऽवगतदोषे प्रदोषे समुद्भट-कंसरोषेण जातचित्तशोषेण कृतपरिदेवेन वसुदेवेन प्रहिता व्रजहिता वडवारोहिणी रोहिणीगुप्तमाजगामम; यस्यामागतायां परमपति-व्रतायां सर्व एव व्रजराजराजसमाज: शुभशकुनसंकुलशकुनादिसमजेन सममुल्ललास। तत्र चानन्दमोहिन्यौ श्रीयशोदा-रोहिण्यौ यमुना-गंगे  इव संगतसंगे परस्परं परेभ्यश्च सुखसमूहमूहतु:।।६७।।
अर्थ •- उसी दिन दोषरहित प्रदोषकाल में भयंकर कंस के कोप से सूख गया है चित जिनका एवं विलाप करने वाले श्री वासुदेवजी के द्वारा भेजी हुई व्रज की हितकारिणी श्री रोहिणी जी घोड़ी पर चढ़कर गुप्तरूप से महावन( गोकुल) में आ गई । परमपतिव्रता श्री रोहिणी जी के आने मात्र से व्रजराज का सारा राज समाज शुभशकुनसूचक  पक्षियों के समूह के सहित परमप्रसन्न हो गया । वहाँ पर । श्री यशोदा एवं रोहिणी जी तो आनन्द विभोर होकर श्रीगंगा-यमुना की तरह दौनों मिलकर आपस में एवं दूसरों के लिए भी सुखसमुुदाय की वृष्टि करने लग गईं ।।६७।। 
तृतीय-पूरण श्रीगोपालचम्पू (श्रीकृष्णनन्दिनीहिन्दीटीका वनमालिदासशास्त्री-कृत ) 

"नन्द के  परिवार का परिचय मूल श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित-

"वृष्णे: कुले उत्पन्नस्य देवमीणस्य पर्जन्यो नाम्न: सुतो। वरिष्ठो बहुशिष्टो व्रजगोष्ठीनां स कृष्णस्य पितामह।१।
अनुवाद:-
यदुवंश के वृष्णि कुल में देवमीण जी के पुत्र पर्जन्य नाम से थे। जो बहुत ही शिष्ट और अत्यन्त महान समस्त व्रज समुदाय के लिए थे। वे पर्जन्य श्रीकृष्ण के पितामह अर्थात नन्द बाबा के पिता थे।१।
( दृश्य दिखाऐं)
"पुरा काले नन्दीश्वरे प्रदेशे  वसन्सह गोपै:।
स्वराटो विष्णो: तपयति स्म पर्जन्यो यति।।२।
अनुवाद:- प्राचीन काल में नन्दीश्वर प्रदेश में गोपों के साथ  रहते हुए  वे पर्जन्य यतियों के जीवन धारण करके स्वराट्- विष्णु का तप करते थे।२।

तपसानेन धन्येन भाविन: पुत्रा वरीयान्।        पञ्च ते मध्यमस्तेषां नन्दनाम्ना जजान।३।
"अनुवाद:- महान तपस्या के द्वारा उनके श्रेष्ठ पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। जिनमें मध्यम पुत्र नन्द नाम से थे।३।
( दृश्य दिखाऐं)
तुष्टस्तत्र वसन्नत्र प्रेक्ष्य केशिनमागतं।
परीवारै: समं सर्वैर्ययौ भीतो गोकुलं।।४।
"अनुवाद:- वहाँ सन्तोष पूर्वक रहते हुए केशी नामक असुर को आया हुआ देखकर परिवार के साथ पर्जन्य जी  भय के कारण नन्दीश्वर को छोड़कर गोकुल (महावन) को चले गये।४।

कृष्णस्य पितामही  महीमान्या कुसुम्भाभा हरित्पटा।
वरीयसीति वर्षीयसी विख्याता खर्वा: क्षीराभ लट्वा।५।

"अनुवाद:- कृष्ण की दादी( पिता की माता) वरीयसी जो सम्पूर्ण गोकुल में बहुत सम्मानित थीं ; कुसुम्भ की आभा वाले हरे वस्त्रों को धारण करती थीं। वह छोटे कद की और दूध के समान बालों वाली  और अधिक वृद्धा थीं।५।
(वरीयसी का सजीव दृश्य दिखाऐं)
भ्रातरौ पितुरुर्जन्यराजन्यौ च सिद्धौ गोषौ ।
सुवेर्जना सुभ्यर्चना वा ख्यापि पर्जन्यस्य सहोदरा।६। 

"अनुवाद:- नन्द के पिता  पर्जन्य के दो भाई अर्जन्य और राजन्य प्रसिद्ध गोप थे। सुभ्यर्चना नाम से उनकी एक बहिन भी थी।६।
( सभी के दृश्य को दिखाऐं )
गुणवीर: पति: सुभ्यर्चनया: सूर्यस्याह्वयपत्तनं।
निवसति स्म हरिं कीर्तयन्नित्यनिशिवासरे।।७।
"अनुवाद:- सुभ्यर्चना के पति का नाम गुणवीर था। जो सूर्य-कुण्ड नगर के रहने वाले थे। जो नित्य दिन- रात हरि का कीर्तन करते थे।७।
( सभ्यर्चना और गुणवीर को दिखाऐं)
उपनन्दानुजो नन्दो वसुदेवस्य सुहृत्तम:।
नन्दयशोदे च कृष्णस्य पितरौ  व्रजेश्वरौ।८।
"अनुवाद:- उपनन्द के भाई नन्द वसुदेव के सुहृद थे  और कृष्ण के माता- पिता के रूप में नन्द और यशोदा दोनों व्रज के स्वामी थे। ८।
(दृश्य दिखाऐं)

वसुदेवोऽपि वसुभिर्दीव्यतीत्येष भण्यते।
यथा द्रोणस्वरूपाञ्श: ख्यातश्चानक दुन्दुभ:।९।
"अनुवाद:-वसु शब्द पुण्य ,रत्न ,और धन का  वाचक है। वसु के द्वारा देदीप्यमान(प्रकाशित) होने के कारण श्रीनन्द के मित्र वसुदेव कहलाते हैं। अथवा विशुद्ध सत्वगुण को वसुदेव कहते हैं।

इस अर्थ नें शुद्ध सत्व गुण सम्पन्न होने से इनका नाम वसुदेव है। (ये द्रोण नामक वसु के स्वरूपाञ्श हैं। ये आनक दुन्दुभि नाम से भी प्रसिद्ध हैं।९)।

वसु= (वसत्यनेनेति वस + “शॄस्वृस्निहीति ।” उणाणि १ । ११ । इति उः) – रत्नम् । धनम् । इत्यमरःकोश ॥ (यथा, रघुः । ८ । ३१ । “बलमार्त्तभयोपशान्तये विदुषां सत्कृतये 

बहुश्रुतम् । वसु तस्य विभोर्न केवलं गुणवत्तापि परप्रयोजनम् ॥) वृद्धौषधम् । श्यामम् । इति मेदिनीकोश ।  हाटकम् । इति विश्वःकोश ॥ जलम् । इति सिद्धान्त- कौमुद्यामुणादिवृत्तिः ॥

________________________________
नामेदं नन्दस्य गारुडे प्रोक्तं मथुरामहिमक्रमे।
वृषभानुर्व्रजे ख्यातो यस्य प्रियसुहृदर:।।१०।
"अनुवाद:- नन्द के ये नाम गरुडपुराण के मथुरा महात्म्य में कहे गये हैं। व्रज में विख्यात श्री वृषभानु जी नन्द के परम मित्र हैं।१०।

माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।
मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा।।११।
"अनुवाद:- श्रीकृष्ण की माता गोप जाति को यश प्रदान करने वाली होने से यशोदा कहलाती हैं।

इनकी अंग कान्ति श्यामल वर्ण की है ये वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं।और इनके वस्त्र इन्द्र धनुष के समान हैं ।११।
( यशोदा की अंकान्ति दिखाऐं ) 
गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक् ।
अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५ ॥

यशोदा; त्वम्- आप; नन्द - नन्द; त्वम् - आप; गौर- वर्ण - धृक् - धारक करने वाले; अयम् - वह; जाता - जन्मा; कृष्ण-वर्णा - श्याम; एतत् - कुल - इस कुल में; विलक्षणम् -असामान्य।
"गर्गसंहिता- ३/५/७     
हे यशोदा, तुम्हारा रंग गोरा है। हे नन्द, तुम्हारा रंग भी गोरा है। यह लड़का बहुत काला है। वह परिवार के बाकी लोगों से अलग है।
*****
श्रीगर्गसंहितायां गिरिराजखण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे
गोपविवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

"विशेष-  यशोदा का वर्ण(रंग) श्यामल (साँबला) ही था। गौरा रंग कभी नहीं था- यह बात पन्द्रहवीं सदी में लिखित "श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका ँमें भी लिखी हुई है।

परन्तु उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशी पण्डित- पीठ ने गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के पञ्चम अध्याय में तीन फर्जी श्लोक प्रकाशन काल में लिखकर जोड़ दिए हैं। 

जिनको हम ऊपर दे चुके हैं।
शास्त्रों गोपों की वीरता सर्वत्र प्रतिध्वनित है।

"वसुदेवसुतो वैश्यःक्षत्रियश्चाप्यहंकृतः।
आत्मानं भक्तविष्णुश्चमायावी च प्रतारकः।६।"(ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड (४)१२१ वाँ अध्याय)

प्रसंग:- श्रृगाल नामक एक मण्डलेश्वर राजाधिराज था ; जो जय-विजय की तरह  गोलोक  से नीचेवैकुण्ठ मे द्वारपाल था। जिसका नाम सुभद्र था जिसने लक्ष्मी के शाप से  भ्रष्ट हेकर पृथ्वी पर जन्म लिया। उसी श्रृगाल की कृष्ण के प्रति शत्रुता की सूचना देने के लिए एक ब्राह्मण कृष्ण की सुधर्मा सभा आता है और वह उस श्रृगाल  मण्डलेश्वर के कहे हुए शब्दों को कृष्ण से कहता है।

हे प्रभु आपके प्रति  श्रृँगाल ने कहा :- 

श्लोक का अनुवाद:-
"वसुदेव का पुत्र कृष्ण वैश्य जाति का है; वह अहंकारी क्षत्रिय भी है।"      
वह तो विष्णु को अपना भक्त कहता है; इसलिए वह मायावी और ठग है ।६।
____________________________

 {ब्रह्मवैवर्त पुराणखण्ड
आदिपुराणे प्रोक्तं देने नाम्नी नन्द भार्याया यशोदा देवकी -इति च।।
अत: सख्यमभूत्तस्या देवक्या: शौरिजायया।।१२।
"अनुवाद:- आदि पुराण में वर्णित नन्द की पत्नी यशोदा का नाम देवकी भी है। इस लिए शूरसेन के पुत्र वसुदेव की पत्नी देवकी के साथ नाम की भी समानता होने के कारण स्वाभाविक रूप में यशोदा का सख्य -भाव भी है।१२।

उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितु:।
पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सनन्द नन्दनौ।१३।

"अनुवाद:- श्री नन्द के उपनन्द और अभिनन्दन बड़े भाई तथा आनन्द और नन्दन नाम हे दो छोटे भाई भी हैं। ये सब कृष्ण के पितृव्य( ताऊ-चाचा)हैं।१३।
सभी को दृश्य रूप में दिखाऐ)
 दिखी
"आद्य: सितारुणरुचिर्दीर्घकूचौ हरित्पट:।
तुङ्गी प्रियास्य सारङ्गवर्णा सारङ्गशाटिका।।१४।

"अनुवाद:- सबसे बड़े भाई उपनन्द की अंग कान्ति धवल ( सफेद) और अरुण( उगते हुए सूर्य) के रंग के मिश्रण अर्थात- गुलाबी रंग जैसी है। इनकी दाढ़ी बहुत लम्बी और वस्त्र हरे रंग के हैं । इनकी पत्नी का नाम तुंगी है। जिनकी अंग कन्ति तथा साड़ी का रंग सारंग( पपीहे- के रंग जैसा है।१४।
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द्वितीयो भ्रातुरभिनन्दनस्य भार्या पीवरी ख्याता।
पाटलविग्रहा नीलपटा लम्बकूर्चोऽसिताम्बरा:।।१५।

"अनुवाद:- दूसरे भाई श्री -अभिनन्द की अंग कान्ति शंख के समान गौर वर्ण है। और दाढ़ी लम्बी है। ये काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इनकी पत्नी का नाम पीवरी जो नीले रंग के वस्त्र धारण करती हैं। तथा जिनकी अंग कान्ति पाटल ( गुलाब) रंग की है।१५।
(दृश्य में दिखाऐं)

सुनन्दापरपर्याय: सनन्दस्य च पाण्डव:।
श्यामचेल: सितद्वित्रिकेशोऽयं केशवप्रिय:।१६।

"अनुवाद:- आनन्द का दूसरा नाम सननन्द है। इनकी अंग कान्ति पीला पन लिए हुए सफेद रंग की तथा वस्त्र काले रंग के हैं। इनके शिर के सम्पूर्ण बालों में केवल  दो या तीन बाल ही सफेद हुए हैं। ये केशव- कृष्ण के परम प्रिय है।१६।
(दृश्य दिखाऐं)

सनन्दस्य भार्या कुवलया नाम्न: ख्याता।
रक्तरङ्गाणि वस्त्राणि धारयति तस्या: कुवलयच्छवि:।१७।

"अनुवाद:-सनन्द की पत्नी का नाम कुवलया है।
जो कुवलय( नीले और हल्के लाल  के मिश्रण जैसे ) वस्त्रों को धारण करने वाली तथा  कुवलय अंक कान्ति वाली हैं।१७।  
(दृश्य दिखाऐं)

नन्दन: शिकिकण्ठाभश्चण्डातकुसुमाम्बर:।
अपृथग्वसति: पित्रा सह तरुण प्रणयी हरौ।
अतुल्यास्य प्रिया विद्युतकान्तिरभ्रनिभाम्बरा।१८।

"अनुवाद:- नंदन की अंग कान्ति मयूर के कण्ठ  जैसी तथा वस्त्र चण्डात (करवीर) पुष्प के समान है। श्रीनन्दन अपने पिता ( श्री पर्जन्य जी के साथ ही इकट्ठे निवास करते हैं। श्रीहरि के प्रति इनका कोमल प्रेम है। नन्दन जी की पत्नी का नाम अतुल्या है। जिनकी अंगकान्ति बिजली के समान रंग वाली है। तथा वस्त्र मेघ की तरह श्याम रंग के हैं।१८।
(दृश्य दिखाऐं)

सानन्दा नन्दिनी चेति पितुरेते सहोदरे।
कल्माषवसने रिक्तदन्ते च फेनरोचिषी।१९।

"अनुवाद:-( कृष्ण के पिता नन्द की सानन्दा और नन्दिनी नाम की दो बहिने हैं। ये अनेक प्रकार के रंग- विरंगे) वस्त्र धारण करती हैं। इनकी दन्तपंक्ति रिक्त अर्थात इनके बहुत से दाँत नहीं हैं। इनकी अंगकान्ति फेन( झाग) की तरह सफेद है।१९।
(दृश्य दिखाऐं)
सानन्दा नन्दिन्यो: पत्येतयो: क्रमाद्महानील: सुनीलश्च  तौ कृष्णस्य वपस्वसृपती शुद्धमती।२०।

"अनुवाद:-सानन्दा के पति का नाम महानील और नन्दिनी के पति का नाम सुनील है। ये  दोंनो श्रीकृष्ण के फूफा  अर्थात् (नन्द) के बहनोई हैं।२०।
(दृश्य दिखाऐं)

पितुराद्यभ्रातुः पुत्रौ कण्डवदण्डवौ नाम्नो:
सुबले मुदमाप्तौ सौ ययोश्चारु मुखाम्बुजम्।।२१।

"अनुवाद:- श्रीकृष्ण के पिता नन्द बड़े भाई श्री उपनन्द के  कण्डव और दण्डव नाम के दो पुत्र हैं।
दोंनो सुबह के संग में बहुत प्रसन्न रहते हैं। तथा
 दोंनो का मनोहर मुख कमल के समान सुन्दर है।(उपनन्द कण्डव और दण्डव के दृश्य दिखाऐं)

राजन्यौ यौ तु पुत्रौ नाम्ना तौ चाटु- वाटुकौ।
दधिस्सारा- हविस्सारे सधर्मिण्यौ क्रमात्तयो:।।२२।

"अनुवाद:- श्रीनन्द जी के दो चचेरे भाई  जो उनके चाचा राजन्य के पुत्र हैं। उनका नाम चाटु और वाटु  है उनकी पत्नीयाँ का नाम इसी क्रम से दधिस्सारा और हविस्सारा है।२२।
(सभी के दृश्य दिखाऐं)

"कृष्ण की माता के परिवार का परिचय"
"यशोदा के  परिवार का परिचय-★

महामहो महोत्साहो स्यादस्य सुमुखाभिध:।
लम्बकम्बुसमश्रु: पक्वजम्बूफलच्छवि:।।२३।

"अनुवाद:- श्री कृष्ण के नाना (मातामह) का नाम सुमुख है। ये बहुत उद्यमी और उत्साही हैं। इनकी लम्बी दाढ़ी शंख के समान सफेद तथा अंगकान्ति पके हुए जामुन के फल जैसी ( श्यामल) है।२३।

"श्रीब्रह्मवैवर्ते पुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे कृष्णान्नप्राशन वर्णननामकरणप्रस्तावो नाम त्रयोदशोऽध्याये यशोदया: पित्रोर्नामनी  पद्मावतीगिरिभानू उक्तौ।२४। 

अनुवाद:-  ब्रह्म वैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अन्तर्गत नारायण -और नारद संवाद में कृष्ण का अन्न प्राशनन नामक तेरहवें अध्याय में यशोदा के माता-पिता का नाम पद्मावती और  गिरिभानु है।२४।


सर्वेषां गोपपद्मानां गिरिभानुश्च भास्करः ।
पत्नी पद्मासमा तस्य नाम्ना पद्मावती सती ।२५।

अनुवाद:-  गोप रूपी कमलों के गिरिभानु सूर्य हैं।
और उनकी पत्नी पद्मावती लक्ष्मी के समान सती है।२५।

तस्याः कन्या यशोदा त्वं यशोवर्द्धनकारिणी ।।
बल्लवानां च प्रवरो लब्धो नन्दश्च वल्लभः।२६।।
अनुवाद:-  उस पद्मावती की कन्या यशोदा तुम यश को बढ़ाने वाली हो। गोपों में श्रेष्ठ नन्द तुमको पति रूप में प्राप्त हुए हैं।२६।

माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।
मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा।।११।

"अनुवाद:- श्रीकृष्ण की माता गोप जाति को यश प्रदान करने वाली होने से यशोदा कहलाती हैं।

इनकी अंग कान्ति श्यामल वर्ण की है ये वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं।और इनके वस्त्र इन्द्र धनुष के समान हैं ।११।

गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक् ।
अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५ ॥

यशोदा; त्वम्- आप; नन्द - नन्द; त्वम् - आप; गौर- वर्ण - धृक् - धारक करने वाले; अयम् - वह; जाता - जन्मा; कृष्ण-वर्णा - श्याम; एतत् - कुल - इस कुल में; विलक्षणम् -असामान्य।
"गर्गसंहिता- ३/५/७     

हे यशोदा, तुम्हारा रंग गोरा है। हे नन्द, तुम्हारा रंग भी गोरा है। यह लड़का बहुत काला है। वह परिवार के बाकी लोगों से अलग है।
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श्रीगर्गसंहितायां गिरिराजखण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे
गोपविवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

"विषेश-  यशोदा का वर्ण(रंग) श्यामल (साँबला) ही था। गौरा रंग कभी नहीं था- यह बात पन्द्रहवीं सदी में लिखित "श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका में भी लिखी हुई है।

परन्तु उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशी पण्डित- पीठ ने गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के पञ्चम अध्याय में तीन फर्जी श्लोक प्रकाशन काल में लिखकर जोड़ दिए हैं। 

जिनको हम ऊपर दे चुके हैं।
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मातामही तु महिषी दधिपाण्डर कुन्तला।
पाटला पाटलीपुष्पपटलाभा हरित्पटा।२७।

"अनुवाद:- कृष्ण की नानी (मातामही) का नाम पाटला है ये व्रज की रानी के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके केश देखने में गाय के दूध से बने दही के  समान पीले, अंगकान्ति पाटल पुष्प के समान हल्के गुलाबी रंग जैसी तथा वस्त्र हरे रंग के है।२७।
(दृश्य दिखाऐं)

प्रिया सहचरी तस्या मुखरा नाम बल्लवी।
व्रजेश्वर्यै ददौ स्तन्यं सखी स्नहभरेण या।२८।

"अनुवाद:-  मातामही( नानी) पाटला की मुखरा
नाम की एक गोपी प्रिय सखी है। वह पाटला के प्रति इतनी स्नेह-शील है कि कभी- कभी 
पाटला के व्यस्त होने पर व्रज की ईश्वरी पाटला
की पुत्री यशोदा को अपना स्तन-पान तक भी करा देती थी।२८।
(दृश्य दिखाऐं)

सुमुखस्यानुजश्चारुमुखोऽञ्जनभिच्छवि:।
भार्यास्य कुलटीवर्णा बलाका नाम्नो बल्लवी।२९।
"अनुवाद:- सुमुख( गिरिभानु) के छोटे भाई की नाम चारुमुख है। इनकी अंगकान्ति काजल की तरह है। इनकी पत्नी का नाम बलाका है। जिनकी अंगकान्ति कुलटी( गहरे नीले रंग की एक प्रकार की दाल जो काजल ( अञ्जन) रे रंग जैसी होती है।२९
(दृश्य दिखाऐं)

गोलो मातामही भ्राता धूमलो वसनच्छवि:।
हसितो य: स्वसुर्भर्त्रा सुमुखेन क्रुधोद्धुर:।३०।
"अनुवाद:-मातामही( नानी ) पाटला के भाई का नाम गोल है। तथा वे धूम्र( ललाई लिए हुए काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। बहिन के पति-( बहनोई) सुमुख द्वारा हंसी मजाक करने पर गोल विक्षिप्त हो जाते हैं।३०।

दुर्वाससमुपास्यैव कुलं लेभे व्रजोज्ज्वलम्।।गोलस्य भार्या जटिला ध्वाङ्क्ष वर्णा महोदरी।३१।

"अनुवाद:-  दुर्वासा ऋषि की उपासना के परिणाम  स्वरूप इन्हें व्रज के उज्ज्वल वंश में जन्म ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गोल की पत्नी का नाम जटिला है। यह जटिला  कौए जैसे रंग वाली तथा स्थूलोदरी (मोटे पेट वाली ) है।३१।


यशोदाया: त्रिभ्रातरो यशोधरो यशोदेव: सुदेवस्तु। 
अतसी पुष्परुचय: पाण्डराम्बर-संवृता:।३२।

"अनुवाद:-यशोदा के तीन भाई हैं जिनके नाम हैं यशोधर" यशोदेव और सुदेव – इन सबकी अंगकान्ति अलसी के फूल के समान है । ये सब हल्का सा पीलापन लिए हुए सफेद रंग के वस्त्र धारण करते हैं।३२।
(दृश्य दिखाऐं)

येषां  धूम्रपटा भार्या  कर्कटी-कुसुमित्विष:।।
रेमा रोमा सुरेमाख्या: पावनस्य पितृव्यजा:।।३३।

"अनुवाद:-इन सब तीनों भाइयों की पत्नीयाँ पावन( विशाखा के पिता) के चाचा( पितृव्य )की कन्याऐं हैं। जिनके नाम  क्रमश: रेमा, रोमा और सुरेमा हैं। ये सब काले वस्त्र पहनती हैं। इनकी अंगकान्ति कर्कटी(सेमल) के पुष्प जैसी है।३३।
(दृश्य दिखाऐं)

यशोदेवी- यशस्विन्यावुभे मातुर्यशोदया: सहोदरे।
दधि:सारा हवि:सारे  इत्यन्ये नामनी तयो:।३४।

"अनुवाद:- यशोदेवी और यशस्विनी श्रीकृष्ण की माता यशोदा की सहोदरा बहिनें हैं। ये दोंनो क्रमश दधिस्सारा और हविस्सारा नाम से भी जानी जाती हैं। बड़ी बहिन यशोदेवी की अंगकान्ति श्याम वर्ण-(श्यामली) है।३४।
(दृश्य दिखाऐं)

चाटुवाटुकयोर्भार्ये  ते राजन्यतनुजयो: ़
सुमुखस्य भ्राता चारुमुखस्यैक: पुत्र: सुचारुनाम्।३५ । 

अनुवाद:- दधिस्सारा और हविस्सारा पहले कहे हुए राजन्य गोप के पुत्रों चाटु और वाटु की पत्नियाँ हैं। सुमुख के भाई चारुमख का सुचारु नामक एक सुन्दर पुत्र है।३५।
(दृश्य दिखाऐं)

गोलस्य भ्रातु: सुता नाम्ना तुलावती या सुचारोर्भार्या ।३६।

"अनुवाद:-गोल की भतीजी तुलावती चारुमख के पुत्र सुचारु की पत्नी है।३६।
(दृश्य दिखाऐं)

पौर्णमासी भगवती सर्वसिद्धि विधायनी।
काषायवसना गौरी काशकेशी दरायता।३७।

"अनुवाद:- भगवती पौर्णमासी सभी सिद्धियों का विधान करने वाली है। उसके वस्त्र काषाय ( गेरुए) रंग के हैं। उसकी अंगकान्ति गौरवर्ण की और केश काश नामक घास के पुष्प के समान सफेद हैं; ये आकार में कुछ लम्बी हैं।
(दृश्य दिखाऐं)

मान्या व्रजेश्वरादीनां सर्वेषां व्रजवासिनां।    नारदस्य प्रियशिष्येयमुपदेशेन तस्य या।३८।

"अनुवाद:- पौर्णमसी व्रज में नन्द आदि सभी व्रजवासियों की पूज्या और देवर्षि नारद की प्रिया शिष्या है नारद के उपदेश के अनुसार जिसने।३८।
(दृश्य दिखाऐं)

सान्दीपनिं सुतं प्रेष्ठं हित्वावन्तीपुरीमपि।
स्वाभीष्टदैवतप्रेम्ना व्याकुला गोकुलं गता।३९।

"अनुवाद:- अपने सबसे प्रिय पुत्र सान्दीपनि को उज्जैन(अवन्तीपरी) में छोड़कर अपने अभीष्ट देव श्रीकृष्ण के प्रेम में वशीभूत होकर गोकुल में गयी।३९।
(दृश्य दिखाऐं)****

राधया अष्ट सख्यो ललिता च विशाखा च चित्रा।
चम्पकवल्लिका तुङ्गविद्येन्दुलेखा च  रङ्गदेवी सुदेविका।४०।

"अनुवाद:- राधा जी की आठ सखीयाँ ललिता, विशाखा,चित्रा,चम्पकलता, तुंगविद्या,इन्दुलेखा,रंग देवी,और सुदेवी हैं।४०।

******
तत्राद्या ललितादेवी  स्यादाष्टासु वरीयसी प्रियसख्या भवेज्ज्येष्ठा सप्तविञ्शतिवासरे।४१।

"अनुवाद:-इन आठ वरिष्ठ सखीयों में ललिता देवी सर्वश्रेष्ठ हैं यह अपनी प्रिया सखी राधा से सत्ताईस दिन बड़ी हैं।४१।

अनुराधा तया ख्याता वामप्रखरतां गता।
गोरोचना निभाङ्गी सा शिखिपिच्छनिभाम्बरा।।४२।

"अनुवाद:- श्री ललिता अनुराधा नाम से विख्यात तथा वामा और प्रखरा नायिकाओं के  गुणों से विभूषित हैं। ललिता की अंगकान्ति गोरोचना के समान तथा वस्त्र मयूर पंख जैसे हैं।४२।

ललिता जाता मातरि सारद्यां पितुरेषा  विशोकत:।
पतिर्भैरव नामास्या: सखा गोवर्द्धनस्य य: ।४३।
"अनुवाद:- श्री ललिता की माता का नाम सारदी और पिता का नाम विशोक  है। ललिता के पति का नाम भैरव है जो गोवर्द्धन गोप के सखा हैं।४३।

सम्मोहनतन्त्रस्य ग्रन्थानुसार राधया: सख्योऽष्ट
कलावती रेवती  श्रीमती च सुधामुखी।
विशाखा कौमुदी माधवी शारदा चाष्टमी स्मृता।४४।

"अनुवाद:-सम्मोहन तन्त्र के अनुसार राधा की आठ सखियाँ हैं।–कलावती, रेवती,श्रीमती, सुधामुखी, विशाखा, कौमुदी, माधवी,शारदा।४४।

श्रीमधुमङ्गल ईषच्छ्याम वर्णोऽपि भवेत्।
वसनं गौरवर्णाढ्यं वनमाला विराजित:।।४५।

"अनुवाद:- श्रीमान्- मधुमंगल कुछ श्याम वर्ण के हैं। इनके वस्त्र गौर वर्ण के हैं। तथा वन- मालाओं 
से सुशोभित हैं।४५।
 

पिता सान्दीपनिर्देवो माता च सुमुखी सती।
नान्दीमुखी च भगिनी पौर्णमासी पितामही।।४६।

"अनुवाद:-मधुमंगल के पिता सान्दीपनि ऋषि तथा माता का नीम सुमुखी है। जो बड़ी पतिव्रता है। नान्दीमुखी मधु मंगल की बहिन और पौर्णमासी दादी है। ४६।
(दृश्य दिखाऐं)**

पौर्णमास्या: पिता सुरतदेवश्च माता चन्द्रकला सती। प्रबलस्तु पतिस्तस्या महाविद्या यशस्करी।४७।

"अनुवाद:-  पौर्णमासी के पिता का नाम सुरतदेव तथा माता का नाम चन्द्रकला है। पौर्णमासी के पति का नाम प्रबल है। ये महाविद्या में प्रसिद्धा और सिद्धा हैं।४७।


पौर्णमास्या भ्रातापि देवप्रस्थश्च व्रजे सिद्धा शिरोमणि: । नानासन्धानकुशला द्वयो: सङ्गमकारिणी।।४८।

"अनुवाद:- पौर्णमासी का भाई देवप्रस्थ है। ये पौर्णमासी व्रज में सिद्धा में शिरोमणि हैं।

पौर्णमासी अनेक अनुसन्धान करके कार्यों में कुशल तथा श्रीराधा-कृष्ण दोंनो का मेल कराने वाली है।४८।


आभीरसुभ्रुवां श्रेष्ठा राधा वृन्दावनेश्वरी।
अस्या: सख्यश्च ललिताविशाखाद्या: सुविश्रुता:।४९।
"अनुवाद:- आभीर कन्याओं में श्रेष्ठा वृन्दावन की अधिष्ठात्री व स्वामिनी राधा हैं। ललिता और विशाखा आदि सख्यियाँ श्री राधा जी प्रधान सखियों के रूप में विख्यात हैं।४९।


चन्द्रावली च पद्मा च श्यामा शैव्या च भद्रिका।
तारा विचित्रा गोपाली पालिका चन्द्रशालिका।५०।

"अनुवाद:- चन्दावलि, पद्मा, श्यामा,शैव्या,भद्रिका, तारा, विचित्रा, गोपली, पालिका ,चन्द्रशालिका,


मङ्गला विमला लीला तरलाक्षी मनोरमा
कन्दर्पो मञ्जरी मञ्जुभाषिणी खञ्जनेक्षणा।।५१

"अनुवाद:-मंगला ,विमला, नीला,तरलाक्षी,मनोरमा,कन्दर्पमञजरी, मञ्जुभाषिणी, खञ्जनेक्षणा

कुमुदा, कैरवी, शारी,शारदाक्षी, विशारदा,। शङ्करी, कुङ्कुङ्मा,कृष्णासारङ्गीन्द्रावलि, शिवा।।५२।

"अनुवाद:-कुमुदा, कैरवी, शारी,शारदाक्षी, विशारदा, शंकरी, कुंकुमा,कृष्णा, सारंगी,इन्द्रावलि, शिवा आदि ।

तारावली,गुणवती,सुमुखी,केलिमञ्जरी।
हारावली,चकोराक्षी, भारती,  कमलादय:।।५३।

"अनुवाद:तारावली,गुणवती,सुमुखी,केलिमञ्जरी,हारावली,चकोराक्षी, भारती, और कमला आदि गोपिकाऐं कृष्ण की उपासिका व आराधिका हैं।

आसां यूथानि शतश: ख्यातान्याभीर सुताम्।
लक्षसङ्ख्यातु कथिता  यूथे- यूथे वराङ्गना।।५४।
"अनुवाद:- इन आभीर कन्याओं के सैकड़ों यूथ( समूह) हैं और इन यूथों में बंटी हुई वरागंनाओं की संख्या भी लाखों में है।५४।

अब इसी प्रकरण की समानता के लिए  देखें नीचे 

      "श्रीश्रीराधाकृष्णगणोद्देश्य दीपिका-
में वर्णित राधा जी के पारिवारिक सदस्यों की सूची वासुदेव- रहस्य- राधा तन्त्र नामक ग्रन्थ के ही समान हैं परन्तु श्लोक विपर्यय ( उलट- फेर) हो गया है। और कुछ शब्दों के वर्ण- विन्यास ( वर्तनी) में भी परिवर्तन वार्षिक परिवर्तन हुआ है।

"राधा के  परिवार का परिचय-
 "वृषभानु: पिता तस्या राधाया वृषभानरिवोज्ज्जवल:।१६८।(ख)

 रत्नगर्भाक्षितौ ख्याति कीर्तिदा जननी भवेत्।।१६९।(क) 

"अनुवाद:-  श्री राधा के पिता वृषभानु वृष राशि में स्थित भानु (सूर्य ) के समान  उज्ज्वल हैं।१६८-(ख)

श्री राधा जी की माता का नाम कीर्तिदा है। ये पृथ्वी पर रत्नगर्भा- के नाम से प्रसिद्ध हैं।१६९।(क)

"पितामहो महीभानुरिन्दुर्मातामहो मत:।१६९(ख) मातामही पितामह्यौ मुखरा सुखदे  उभे।१७०(क) 

"अनुवाद:-
राधा जी के पिता का नाम महीभानु तथा नाना का नाम इन्दु है। राधा जी दादी का नाम सुखदा और नानी का नाम मुखरा  है।१७०।(क)

" रत्नभानु:, सुभानुश्च भानुश्च भ्रातर: पितु:"१७०(ख)
भद्रकर्ति , महाकीर्ति, कीर्तिचन्द्रश्च मातुला:। मातुल्यो मेनका , षष्ठी , गौरी,धात्री और धातकी।।१७१। 

अनुवाद:-भद्रकर्ति , महाकीर्ति, कीर्तिचन्द्र मामा:। और मेनका , षष्ठी , गौरी धात्री और धातकी   ये राधा की पाँच मामीयाँ हैं।१७१/।

"स्वसा कीर्तिमती  मातुर्भानुमुद्रा पितृस्वसा। पितृस्वसृपति: काशो मातृस्वसृपति कुश:।‌१७२।।
"अनुवाद:- श्रीराधा जी की माता की बहिन का नाम कीर्तिमती,और भानुमुद्रा पिता की बहिन ( बुआ) का नाम है। फूफा का नाम "काश और मौसा जी का नाम कुश है।

श्रीराधाया:  पूर्वजो भ्राता श्रीदामा कनिष्ठा  भगिन्यानङ्गमञ्जरी।१७३।(क)

"अनुवाद:-  श्री राधा जी के बड़े भाई का नाम श्रीदामन्- तथा छोटी बहिन का नाम श्री अनंगमञ्जरी है।१७३।(क)
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"राधा जी की  प्रतिरूपा( छाया) वृन्दा जो ध्रुव के पुत्र नन्दसावर्णि  के पुत्र केदार की पुत्री है उसके ससुराल पक्ष के सदस्यों के नाम भी बताना आवश्यक है। 

वह लक्ष्मी के अँश से उत्पन्न राधा के ही समान रूप ,वाली गोपी है। वृन्दावन नाम उसी के कारण प्रसिद्ध हो जाता है। रायाण गोप का विवाह उसी वृन्दा के साथ होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(छियासी) में श्लोक संख्या(134)-से लगातार (143) तक वृन्दा और रायाण के विवाह का वर्णन है। 
"रायाण  की पत्नी वृन्दा का परिचय-★

रायाणस्य परिणीता वृन्दा वृन्दावनस्य अधिष्ठात्री । इयं केदारस्य सुता  कृष्णाञ्शस्य भक्ते: सुपात्री। १।

ब्रह्मवैवर्तपुराणस्य श्रीकृष्णजन्मखण्डस्य        षडाशीतितमोऽध्यायस्य अनतर्निहिते । सप्तत्रिंशताधिकं शतमे श्लोके रायाणस्य पत्नी वृन्दया: वर्णनमस्ति।।२।


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उवाच वृन्दां भगवान्सर्वात्मा प्रकृतेः परः ।१३४
श्रीभगवानुवाच-
त्वयाऽऽयुस्तपसा लब्धं यावदायुश्च ब्रह्मणः ।
तदेव देहि धर्माय गोलोकं गच्छ सुन्दरि ।१३५ ।

तन्वाऽनया च तपसा पश्चान्मां च लभिष्यसि ।
पश्चाद्गोलोकमागत्य वाराहे च वरानने ।१३६ ।

"वृन्दे ! त्वं वृषभानसुता  च राधाच्छाया भविष्यसि।
मत्कलांशश्च रायाणस्त्वां विवाह ग्रहीष्यति ।१३७।

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मां लभिष्यसि रासे च गोपीभी राधया सह ।
राधा श्रीदामशापेन वृषभानसुता यदा ।१३८।

सा चैव वास्तवी राधा त्वं च च्छायास्वरुपिणी 
विवाहकाले रायाणस्त्वां च च्छायां ग्रहीष्यति। १३९।

त्वां दत्त्वा वास्तवी राधा साऽन्तर्धाना भविष्यति ।
राधैवेति विमूढाश्च विज्ञास्यन्ति ।
च गोकुले ।१४० ।

स्वप्ने राधापदाम्भोजं नारि पश्यन्ति बल्लवाः ।
स्वयं राधा मम क्रोडे छाया वृन्दा रायाणकामिनी ।१४१।

विष्णोश्च वचनं श्रुत्वा ददावायुश्च सुन्दरी ।
उत्तस्थौ पूर्ण धर्मश्च तप्तकाञ्चनसन्निभः ।।
पूर्वस्मात्सुन्दरः श्रीमान्प्रणनाम परात्परम् । १४२।

वृन्दोवाच
देवाः शृणुत मद्वाक्यं दुर्लङ्घ्यं सावधानतः ।
न हि मिथ्या भवेद्वाक्यं मदीयं च निशामय ।१४३ ।

उपर्युक्त संस्कृत श्लोकों का नीचे अनुवाद देखें-
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"अनुवाद:-
तब भगवान कृष्ण  जो सर्वात्मा एवं प्रकृति से परे हैं; वृन्दा से बोले।
श्रीभगवान ने कहा- सुन्दरि! तुमने तपस्या द्वारा ब्रह्मा की आयु के समान आयु प्राप्त की है। 

वह अपनी आयु तुम धर्म को दे दो और स्वयं गोलोक को चली जाओ। 
वहाँ तुम तपस्या के प्रभाव से इसी शरीर द्वारा मुझे प्राप्त करोगी।

सुमुखि वृन्दे ! गोलोक में आने के पश्चात वाराहकल्प में  हे वृन्दे !  तुम  पुन:  राधा की  वृषभानु की कन्या राधा की छायाभूता  होओगी। 

उस समय मेरे कलांश से ही उत्पन्न हुए रायाण गोप ही तुम्हारा पाणिग्रहण करेंगे।
फिर रासक्रीड़ा के अवसर पर तुम गोपियों तथा राधा के साथ मुझे पुन: प्राप्त करोगी।
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स्पष्ट हुआ कि रायाण गोप का विवाह मनु के पौत्र केदार की पुत्री वृन्दा " से हुआ था।  जो राधाच्छाया के रूप में गोकुल में उपस्थित थी।

जब राधा श्रीदामा के शाप से वृषभानु की कन्या होकर प्रकट होंगी, उस समय वे ही वास्तविक राधा रहेंगी।

हे वृन्दे ! तुम तो उनकी छायास्वरूपा होओगी। विवाह के समय वास्तविक राधा तुम्हें प्रकट करके स्वयं अन्तर्धान हो जायँगी और रायाण गोप तुम छाया को ही  पाणि-ग्रहण करेंगे;

परन्तु गोकुल में मोहाच्छन्न लोग तुम्हें ‘यह राधा ही है’- ऐसा समझेंगे। 

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उन गोपों को तो स्वप्न में भी वास्तविक राधा के चरण कमल का दर्शन नहीं होता; क्योंकि स्वयं राधा मेरी  हृदय स्थल में रहती हैं !

इस प्रकार भगवान कृष्ण के वचन को सुनकर सुन्दरी वृन्दा ने धर्म को अपनी आयु प्रदान कर दी। फिर तो धर्म पूर्ण रूप से उठकर खड़े हो गये।

उनके शरीर की कान्ति तपाये हुए सुवर्ण की भाँति चमक रही थी और उनका सौंदर्य पहले की अपेक्षा बढ़ गया था। तब उन श्रीमान ने परात्पर परमेश्वर को  श्रीकृष्ण को प्रणाम किया।
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सन्दर्भ:-
ब्रह्मवैवर्तपुराण /खण्डः ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्डः)/अध्यायः-( ८६ )

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अमरकोश में जो गुप्त काल की रचना है ;उसमें अहीरों के अन्य नाम-पर्याय वाची रूप में गोप शब्द भी वर्णित हैं।

आभीर पुल्लिंग विशेषण संज्ञा गोपालः समानार्थक: 

१-गोपाल,२-गोसङ्ख्य, ३-गोधुक्, ४-आभीर,५-वल्लव,६-गोविन्द, ७-गोप।

(2।9।57।2।5)

अमरकोशः)


रसखान ने भी गोपियों को आभीर ही कहा है-

""ताहि अहीर की छोहरियाँ...""


करपात्री स्वामी भी भक्ति सुधा और गोपी गीत में गोपियों को आभीरा ही लिखते हैं


500 साल पहले कृष्णभक्त चारण इशरदास रोहडिया जी ने पिंगल डिंगल शैली में  श्री कृष्ण को दोहे में अहीर लिख दिया:--


दोहा इस प्रकार है:-

"नारायण नारायणा, तारण तरण अहीर, हुँ चारण हरिगुण चवां, वो तो सागर भरियो क्षीर।"


अर्थ:-अहीर जाति में अवतार लेने वाले हे नारायण(श्री कृष्ण)! आप जगत के तारण तरण(सर्जक) हो, मैं चारण (आप श्री हरि के) गुणों का वर्णन करता हूँ, जो कि सागर(समुंदर) और दूध से भरा हुआ है।


भगवान श्री कृष्ण की श्रद्धा में सदैव लीन रहने वाले कवि इशरदास रोहडिया (चारण), जिनका जन्म विक्रम संवत 1515 में राजस्थान के भादरेस गांव में हुआ था। जिन्होंने मुख्यतः 2 ग्रंथ लिखे हैं "हरिरस" और "देवयान"।


 यह आजसे 500 साल पहले ईशरदासजी द्वारा लिखे गए एक दुहे में स्पष्ट किया गया है कि कृष्ण भगवान का जन्म अहीर(यादव) कुल में हुआ था।


सूरदास जी ने भी श्री कृष्ण को अहीर कहते हुए सूरसागर में "सखी री, काके मीत अहीर" नाम से एक राग गाया!!

तिरुपति बालाजी मंदिर का पुनर्निर्माण विजयनगर नगर के शासक वीर नरसिंह देव राय यादव और राजा कृष्णदेव राय ने किया था।


विजयनगर के राजाओं ने बालाजी मंदिर के शिखर को स्वर्ण कलश से सजाया था। 

विजयनगर के यादव राजाओं ने मंदिर में नियमित पूजा, भोग, मंदिर के चारों ओर प्रकाश तथा तीर्थ यात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त प्रसाद की व्यवस्था कराई थी।तिरुपति बालाजी (भगवान वेंकटेश) के प्रति यादव राजाओं की निःस्वार्थ सेवा के कारण मंदिर में प्रथम पूजा का अधिकार यादव जाति को दिया गया है।

तब ऐसे में आभीरों को शूद्र कहना युक्तिसंगत नहीं

गोप शूद्र नहीं अपितु स्वयं में क्षत्रिय ही हैं ।

जैसा की संस्कृति साहित्य का इतिहास नामक पुस्तकमें पृष्ठ संख्या  368 पर वर्णित है👇


अस्त्र हस्ताश्च धन्वान: संग्रामे सर्वसम्मुखे ।
प्रारम्भे विजिता येन स: गोप क्षत्रिय उच्यते ।।


और गर्ग सहिता
 में लिखा है !


 यादव: श्रृणोति चरितं वै गोलोकारोहणं हरे :
मुक्ति यदूनां गोपानं सर्व पापै: प्रमुच्यते ।102।

अर्थात् जिसके हाथों में अस्त्र एवम् धनुष वाण हैं ---जो युद्ध को प्रारम्भिक काल में ही विजित कर लेते हैं वह गोप क्षत्रिय ही कहे जाते हैं ।

जो मनुष्य गोप अर्थात् आभीर (यादवों )के चरित्रों का श्रवण करता है ।
वह समग्र पाप-तापों से मुक्त हो जाता है ।।

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विरोधीयों का दूसरा दुराग्रह भी बहुत दुर्बल है
कि गाय पालने से ही यादव गोप के रूप में वैश्य हो गये परन्तु 

"गावो विश्वस्य मातरो मातर: सर्वभूतानां गाव: सर्वसुखप्रदा:।।

महाभारत की यह सूक्ति वेदों का भावानुवाद है जिसका अर्थ है कि गाय विश्व की माता है !
और माता का पालन करना किस प्रकार तुच्छ या वैश्य वृत्ति का कारण हो सकता है

सन्दर्भ:- श्री-श्री-राधागणोद्देश्यदीपिका( लघुभाग- श्री-कृष्णस्य प्रेयस्य: प्रकरण-  रूपादिकम्-
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गोप, यदु और आभीर—अमिट गौरव की गाथा
​(पृष्ठभूमि में गंभीर, मांगलिक और पौराणिक वाद्य-संगीत)

​सूत्रधार: "भारतीय इतिहास की सनातन धारा में 'गोप' और 'यादव' शब्द केवल संज्ञाएं नहीं, बल्कि वीरता, कृषि-संस्कृति और दिव्य धर्म के प्रतीक हैं। आज हम श्रीगोपालचम्पू और अन्य शास्त्रों के आलोक में उस गौरवशाली वंश की वंशावली और उनके सामाजिक स्वरूप को समझेंगे।"

​भाग 1: देवमीढ़ और पर्जन्य का वैभव

​सूत्रधार: "यदुवंश के वृष्णि कुल में राजा देवमीढ़ मथुरा के शिरोमणि थे। उनकी दो रानियों से शूरसेन और पर्जन्य नामक पुत्र हुए। जहाँ शूरसेन के वंश में वसुदेव जी का प्राकट्य हुआ, वहीं पर्जन्य बाबा ने महावन में बसकर 'गोपालन' को अपने जीवन का धर्म बनाया। श्रीगोपालचम्पू के अनुसार, पर्जन्य बाबा स्वयं वैश्य-वृत्ति को अंगीकार करते हुए भी अपने आचरण से साक्षात राजर्षि थे।"

​भाग 2: नन्द महाराज का परिवार और विस्तार

​सूत्रधार: "महाराज नन्द, पर्जन्य बाबा के मध्यम पुत्र थे। उनके पाँच पुत्रों ने जगत को आनंदित किया—उपनन्द, अभिनन्द, नन्द, सन्नन्द और नन्दन। नन्द महाराज के परिवार में उनके भाइयों का भी बड़ा स्थान है, जैसे उपनन्द और अभिनन्द। वहीं उनकी माता का वंश भी अत्यंत प्रशंसनीय था, जिन्हें विद्वान 'आभीर-विशेष' के रूप में जानते थे।"

​भाग 3: आभीर, गोप और क्षत्रिय-वृत्ति का सत्य

​सूत्रधार: "कुछ लोग गोपालन को वैश्य-वृत्ति कहकर इसे तुच्छ ठहराने का प्रयास करते हैं, परंतु शास्त्र इसे पूर्णतः नकारते हैं।"

​क्षत्रिय धर्म: "अस्त्र-शस्त्र धारण करना और युद्ध में शत्रुओं का सामना करना, ये गोप/आभीर के गुण हैं। जैसा कि कहा गया है: 'अस्त्र हस्ताश्च धन्वान: संग्रामे सर्वसम्मुखे...', जो युद्ध में विजित होते हैं, वे 'गोप-क्षत्रिय' ही हैं।"

​आभीर का अर्थ: "आभीर शब्द 'वीर' शब्द से प्रादुर्भूत है। कालान्तर में इसे व्यवसाय से जोड़ना पूर्वग्रह मात्र है।"

​भाग 4: ऐतिहासिक साक्ष्य और संतों की दृष्टि

​सूत्रधार: "इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि यह जाति सदैव से आर्य संस्कृति की संरक्षक रही है।"

​संतों का मत: "महाकवि रसखान ने कहा—'ताहि अहीर की छोहरियाँ'। वहीं, चारण कवि ईशरदास रोहडिया जी ने श्री कृष्ण को स्पष्ट रूप से 'अहीर' संबोधित किया।"

​विजयनगर का प्रमाण: "यादव राजाओं, जैसे राजा कृष्णदेव राय, ने तिरुपति बालाजी मंदिर में जो सेवा की, उसी के फलस्वरूप आज भी वहां यादव जाति को प्रथम पूजा का अधिकार प्राप्त है।"

​भाग 5: निष्कर्ष

​सूत्रधार: "अतः यह स्पष्ट है कि गोप, यादव और आभीर एक ही शौर्यपूर्ण परंपरा की धाराएं हैं। यह जाति न शूद्र है, न केवल वैश्य; यह वह 'आर्य' कुल है जिसने 'गावो विश्वस्य मातरः' के सूत्र को अपनाकर गौ-रक्षण और राष्ट्र-रक्षण को अपना धर्म माना।"

​समापन: "आज के इस विमर्श से हमें यह सीख मिलती है कि गौरव केवल वर्णों में नहीं, बल्कि 'धर्म और कर्म' के पालन में निहित है। यदुवंश का इतिहास, धर्म का इतिहास है।"

​(संगीत की लय धीमी होते हुए समाप्त)

​नोट: यह स्क्रिप्ट आपके द्वारा प्रदान किए गए गोपालचम्पू, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गर्ग संहिता और श्रीश्रीराधाकृष्णगणोद्देश्य दीपिका जैसे ग्रंथों के उद्धरणों का उपयोग करती है।

उपर्युक्त कथानक को व्यवस्थित व क्रमिक भावान्वित करें!


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