शुक्रवार, 16 जून 2023

आत्मा और जीव के सम्बन्ध- "श्रीकृष्णसर्वस्वम्"

आज भी वास्तविक अध्यात्म का प्रतिपादक श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद है।

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्यायः में  कर्मयोग का विवेचन है।

द्वितीय अध्याय में  श्रीकृष्ण ने श्लोक 11 से श्लोक 30 तक आत्मतत्त्व का विवेचन कर  सांख्ययोग का प्रतिपादन किया ।

बाद में श्लोक 31 से श्लोक 53 तक समस्त बुद्धिरूप कर्मयोग के द्वारा परमेश्वर को पाये हुए स्थितप्रज्ञ सिद्ध पुरुष के लक्षण, आचरण और महत्व का प्रतिपादन किया है। 

इसमें कर्मयोग की महिमा बताते हुए कृष्ण ने 47 तथा 48वें श्लोक में कर्मयोग का स्वरूप बताकर अर्जुन को कर्म करने को कहा।

49 वें श्लोक में समत्व बुद्धिरूप कर्मयोग की अपेक्षा सकाम कर्म का स्थान बहुत नीचा बताया है।  50 वें श्लोक में समत्व बुद्धियुक्त पुरुष की प्रशंसा करके अर्जुन को कर्मयोग में जुड़ जाने के लिए कहा और 51 वे श्लोक में बताया कि समत्व बुद्धियुक्त ज्ञानी पुरुष को परम पद की प्राप्ति होती है।
यह प्रसंग सुनकर अर्जुन ठीक से तय नहीं कर पाया कि मुझे क्या करना चाहिए ।
इसलिए कृष्ण से उसका और स्पष्टीकरण कराने तथा अपना निश्चित कल्याण जानने की इच्छा से अर्जुन कृष्ण से पूछता हैः 

               "अथ तृतीयोऽध्यायः।
                  अर्जुन उवाच
"ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।1।।
अनुवाद-अर्जुन बोलेः हे जनार्दन ! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं ?

"व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्।।2।।
अनुवाद-आप मिले हुए वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं | इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ ।(2)

                'श्रीभगवानुवाच'
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।3।
अनुवाद-श्री भगवनान बोलेः हे निष्पाप ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है | उनमें से सांख्ययोगियों की निष्ठा तो ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है |(3)
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न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।4।।
अनुवाद-मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को यानि योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है |(4)

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।5।।
अनुवाद-निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।6।।
अनुवाद-जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है |(6)

यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।7।।
अनुवाद-किन्तु हे  अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है |(7)

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।8।।
अनुवाद-तू शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा |(8)

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।।9।।
अनुवाद-यज्ञ के निमित्त किये जाने कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है।
इसलिए हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर |(9)
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सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्तिवष्टकामधुक्।।10।।
अनुवाद-प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो |(10)

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।11।।
अनुवाद-तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें  इस प्रकार निःस्वार्थभाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे!(11)
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इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः।।12।।
अनुवाद-यज्ञ के द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता है, वह चोर ही है |(12)
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यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।।17।।
अनुवाद-परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है |(17)

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।18।।
अनुवाद-उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता |(18)
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तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।19।।
अनुवाद-इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भली भाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है |(19)

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।।20।।
अनुवाद-जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे | इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है |(20)

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।21।।
अनुवाद-श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं | वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसके अनुसार बरतने लग जाता है |(21)

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।22।।
अनुवाद-हे अर्जुन ! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है न ही कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ |(22)

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।23।।
अनुवाद-क्योंकि हे पार्थ ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए, क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं |(23)

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।24।।
अनुवाद-इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायें और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ |(24)

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।।25।।
अनुवाद-हे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्ति रहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे |(25)

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्।।26।।
अनुवाद-परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे |(26)
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प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।27।।
अनुवाद-वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है |(27)
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तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।28।।
अनुवाद-परन्तु हे महाबाहो ! गुणविभाग और कर्मविभाग के तत्त्व को जाननेवाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण-ही-गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता |(28)
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प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्न्नविदो मन्दान्कृत्स्न्नविन्न विचालयेत्।।29।।
अनुवाद-प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी विचलित न करे |(29)

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।33।।
अनुवाद-सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करते है| फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा |(33)
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इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेतौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।34।।
अनुवाद-इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं |(34)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।35।।
अनुवाद-अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है |(35)
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                अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।36।।
अनुवाद-अर्जुन बोलेः हे कृष्ण ! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है? (36)

                 श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद् भवः
महाशनो महापाप्मा विद्धेयनमिह वैरिणम्।।37।
अनुवाद-श्री भगवान बोलेः रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खाने वाला अर्थात् भोगों से कभी न अघाने वाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषय में वैरी जान |(37)

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।38।।
अनुवाद-जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है |(38)
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आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।39।।
अनुवाद-और हे अर्जुन ! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने 
वाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है |(39)
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इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।40।।
अनुवाद-इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – ये सब वास स्थान कहे जाते हैं | यह काम( सेक्स प्रवृत्ति) इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है |(40)

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मान प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।41।।
अनुवाद-इसलिए हे अर्जुन ! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल |(41)

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।42।।
अनुवाद-इन्द्रियों को स्थूल शरीर से परे यानि श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं | इन इन्द्रियों से परे मन है, मन से भी परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है |(42)
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एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।43।।
अनुवाद-इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात् सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल |(43)

अर्थात -
इस प्रकार हे अर्जुन ! आत्मा को लौकिक बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर संयम रखो और आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी दुर्जेय शत्रु का दमन करो।

कठोपनिषद् में इसी सत्य को रथ " रथी तथा सारथी के उपमान विधान  से प्रतिपादित किया गया है। शरीर "आत्मा" और बुद्धितत्व  की बहुत ही सुन्दर व्याख्या की गयी है।

"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। 
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।१। 
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।२। 
(कठोपनिषद्-1.3.3-4) 

ॐ तत्सदिति श्रीमद् भगवद् गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मेविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ।3।
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद् गीता के
श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में 'कर्मयोग' नामक तृतीय अध्याय से कुछ श्लोक उद्धृत हैं।

संसार की कामनाओं में काम (उपभोग करने की इच्छा-अथवा बुभुक्षा- का समावेश है और ये कामनाऐं अपनी तृप्ति हेतु अनैतिक और पापपूर्ण परिणामों का कारण बनती हैं । इसी पाप का परिणाम संसार की यातना और असंख्य पीड़ाऐं हैं  इन कामनाओं का दिशा परिवर्तन आध्यात्मिक कारणों से ही सम्भव है।

कठोपनिषद् में वाजश्रवापुत्र ऋषिकुमार नचिकेता और यम देवता के बीच प्रश्नोत्तरों की कथा का वर्णन है। 
बालक नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यमराज उसे उपमाओं के माध्यम से सांसारिक भोगों में लिप्त, जीवात्मा, और उसके शरीर के मध्य का संबंध को स्पष्ट करते हैं ।

संबंधित आख्यान में यम देवता के निम्नांकित श्लोकनिबद्ध दो वचन जीवन सार्थक: उपमा अथवा रूपक के सूचक हैं ! 
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 "आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।३।

 (कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
 (आत्मानम् रथिनम् विद्धि, शरीरम् तु एव रथम्, बुद्धिम् तु सारथिम् विद्धि, मनः च एव प्रग्रहम् ।)

इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो । 
(लगाम – 
इंद्रियों पर नियंत्रण हेतु, 
अगले मंत्र में उल्लेख 
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इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।४।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४) 
(मनीषिणः इंद्रियाणि हयान् आहुः, विषयान् तेषु गोचरान्, आत्मा-इन्द्रिय-मनस्-युक्तम् भोक्ता इति आहुः ।)

मनीषियों, विवेकी पुरुषों, ने इंद्रियों को इस शरीर-रथ को खींचने वाले घोड़े कहा है, जिनके लिए इंद्रिय-विषय विचरण के मार्ग हैं,
इंद्रियों तथा मन से युक्त इस आत्मा को उन्होंने शरीररूपी रथ का भोग करने वाला बताया है

प्राचीन भारतीय विचारकों का चिंतन प्रमुखतया आध्यात्मिक प्रकृति का रहा है । 
ऐहिक सुखों के आकर्षण का ज्ञान उन्हें भी रहा ही होगा  किंतु उनके प्रयास रहे थे कि वे उस आकर्षण पर विजय पायें । 
उनकी जीवन-पद्धति आधुनिक काल की पद्धति के विपरीत रही । 
स्वाभाविक भौतिक आकर्षण से लोग स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करें ऐसा वे सोचते रहे होंगे और उपनिषद् आदि ग्रंथ उनकी इसी सोच को प्रदर्शित करते हैं । 
 उनके दर्शन के अनुसार अमरणशील आत्मा शरीर के द्वारा इस भौतिक संसार से जुड़ी रहती है और यहां के सुख-दुःखों का अनुभव मन के द्वारा करती हैं ।
 मन का संबंध बाह्य जगत् से इंद्रियों के माध्यम से होता है । 
दर्शन शास्त्र में दस इंद्रियों की व्याख्या की जाती हैः पांच ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा) और पांच कर्मेद्रियां (हाथ, पांव, मुख, मलद्वार तथा उपस्थ अर्थात्  जननेद्रिय, पुरुषों में लिंग एवं स्त्रियों में योनि) ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मिलने वाले संवेदन-संकेत को मन अपने प्रकार से व्याख्या करता है, 
सुख या दुःख के तौर पर । 

इंद्रिय-संवेदना क्रमशः देखने, सुनने, सूंघने, चखने तथा स्पर्शानुभूति से संबंधित रहती हैं ।
 किन विषयों में इंद्रियां विचरेंगी और कितना तत्संबंधित संवेदनाओं को बटोरेंगी यह मन के उन पर नियंत्रण पर रहता है ।

इंद्रिय-विषयों की उपलब्धता होने पर भी मन उनके प्रति उदासीन हो सकता है ऐसा मत मनीषियों का सदैव से रहा है ।
उक्त मंत्रों के अनुसार क्या कर्तव्य है और क्या नहीं का निर्धारण बुद्धि करती है और मन तदनुसार इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है ।

इन मंत्रों का सार यह है: भौतिक भोग्य विषयों रूपी मार्गों में विचरण करने वाले इंद्रिय रूपी घोड़ों पर मन रूपी लगाम के द्वारा बुद्धिरूपी सारथी नियंत्रण रखता है ।
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"रथ: शरीर पुरुष सत्य दृष्टतात्मा नियतेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।तैरप्रमत:कुशली सदश्वैर्दान्तै:सुखं याति रथीव धीर:।२३।

षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रयाणां प्रमाथिनाम् । यो धीरे धारयेत् रश्मीन् स स्यात् परमसारथि:।२४।

इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु धृतिं कुर्वीत सारथ्येधृत्या तानि ध्रुवम्।२५।

इन्द्रियाणां विचरतां यनमनोऽनु विधीयते। तदस्य हरते बुदिं नावं वायुरिवाम्भसि ।२६।

येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम्। तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ।२७।

इति महाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेय समस्या पर्वणि ब्राह्मण व्याधसंवादे एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:(211 वाँ अध्याय)
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अनुवाद:-
पुरुष का यह प्रत्‍यक्ष देखने में आने वाला स्‍थूल शरीर रथ है। आत्‍मा (बुद्धि) सारथि है और इन्द्रियों को अश्व बताया गया है। जैसे कुशल, सावधान एवं धीर रथी, उत्तम घोड़ों को अपने वश में रखकर उनके द्वारा सुख पूर्वक मार्ग तै करता है, उसी प्रकार सावधान, धीर एवं साधन-कुशल पुरुष इन्द्रियों को वश में करके सुख से जीवन यात्रा पूर्ण करता है।२३।

जो धीर पुरुष अपने शरीर में नित्‍य विद्यमान छ: प्रमथन शील इन्द्रिय रुपी अश्वों  की बागडोर संभालता है, वही उत्तम सारथि हो सकता है। २४।

सड़क पर दौड़ने वाले घोड़ों की तरह विषयों में विचरने वाली इन इन्द्रियों को वश में करने के लिये धैर्य पूर्वक प्रयत्‍न करे। धैर्यपूर्वक उद्योग करने वाले को उन पर अवश्‍य विजय प्राप्‍त होती है ।२५।

जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्‍त पुरुष की बुद्धि हर लेती है ।२६।

सभी मनुष्‍य इन छ: इन्द्रियों के शब्‍द आदि विषयों में उनसे प्राप्‍त होने वाले सुखरुप फल पाने के सम्‍बन्‍ध में मोह से संशय में पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषों का अनुसंधान करने वाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्‍यानजनित आनन्‍द का अनुभव करता है।२७।
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इस प्रकार श्री महाभारत वनपर्व के अन्‍तर्गत मार्कण्‍डेय समस्‍या पर्व में ब्राह्मण व्‍याध संवाद विषयक दो सौ ग्‍यारहवां अध्‍याय पूरा हुआ

आत्मा को वैदिक सन्दर्भों में "स्वर् अथवा "स्व: कह कर वर्णित किया है। परवर्ती तद्भव रूप में श्वस् धातु भी स्वर् का ही सम्प्रसारित रूप है । आद्य-जर्मनिक भाषाओं:- swḗsa( स्वेसा )तथा swījēn(स्वजेन) शब्द आत्म बोधक हैं । 

अर्थात्( own, relation आत्मसम्बन्ध) प्राचीनत्तम जर्मन- गोथिक में:
 1-swēs (a) 2-`own'; swēs n. (b) `property' 2- पुरानी नॉर्स (Old Norse): svās-s =`lieb, traut' 3-Old Danish: Run. dat. sg. suasum 
4-Old English: swǟs `lieb, eigen' स्वस्-5-Old Frisian: swēs `verwandt'; sīa `Verwandter' 6-Old Saxon: swās `lieb' 7-Old High German: { swās ` 8-Middle High German: swās Indo-European Proto- indo European se-, *sow[e] *swe- स्व 
9-Old Indian: poss. svá- 10-Avestan: hva-हवा xva- जवा 'eigen, suus', hava- hvāvōya, xvāi Other Iranian: 11-OldPersian huva- 'eigen, suus' 12-Armenian: in-khn, gen. in-khean 'selbst', iur 'sui, sibi' 13-Latin: sibī, sē; sovos (OldLat), suus 14-Proto-Baltic: *sei-, *saw-, *seb- Meaning: self Indo-European etymology 15- Old Lithuanian: sawi, sau. संस्कृत भाषाओं में तथा वैदिक भाषाओं में भी स्व: शब्द  आदि काल से आत्म बोधक है। अंग्रेज़ी में (Soul )सॉल आत्मा का वाचक है।

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अर्थात्‌ --जो स्वयं मे स्थित है 'वह सच्चे अर्थों में स्वस्थ है। अत: स्वस्थ और स्वास्थ्य शारीरिक सन्तुलन के पक्ष नहीं थे। अपितु आत्मिक यथा स्थिति का वाचक थे। परन्तु आज इसका विपरीतार्थ है।

योग स्वास्थ्य का साधक है । भागवत उत्थान गुप्तकाल  पञ्चम् सदी में पुन: सम्पादित श्रीमद्भगवत् गीता मे योग की उत्तम परिभाषा बतायी है ।
 भगवद्गीता के अनुसार योग :–👇
 "श्रीमद्भगवत् गीता(2/48) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्द्व भावों में सर्वत्र सम होकर निष्काम कर्म कर ! क्यों कि समता ही योग है। 

समता में ही समग्र सृष्टि के विकास और ह्रास की व्याख्या निहित है. भगवद्गीता के अनुसार -👇 " तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् " अर्थात् इसलिए योग से जुड़ यह योग ही कर्मों में कुशलता है । 
कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्म करना चाहिए इस प्रकार का कर्म करने का कौशल ही योग है। पूर्ण श्लोक इस प्रकार है 👇 ____________________________________ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।। बुद्धि(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्था में ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। तब यह समता योग है । अतः तू योग(समता) में लग जा क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।।।2.50।। 
🌸 पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं। --जो जन्म- जन्म का संस्कार बनती हैं ।
मनरूपी विक्षुब्ध समुद्र के साथ जो व्यक्ति तादात्म्य नहीं करता वह वासनाओं की ऊँची-ऊँची तरंगों के द्वारा न तो ऊपर फेंका जायेगा और न नीचे ही डुबोया जायेगा। 
यहाँ वर्णित मन का बुद्धि के साथ युक्त होना ही बुद्धियुक्त शब्द का अर्थ है। जैसे चक्र के दो अरे होतें हैं ।
जिनके क्रमश: ऊपर आने और जाने से ही चक्र घूर्णन करता है ।
और मन ही इस द्वन्द्व रूपी अरों वाले संसार चक्र में घुमाता है ।
संसार या संसृति चक्र है तो द्वन्द्व रूपी अरे दु :ख -सुख हैं।
योग शब्द यूरोपीय भाषाओं में विशेषत: रोम की प्राचीनत्त भाषाओं लैटिन में यूज (use) के रूप में है । इसमें भी युति( युत्) इसका मूल रूप है --जो पुरानी लैटिन में उति (oeti) है ।👇 
use," frequentative form of past participle stem of Latin uti "make use of, profit by, take advantage of, enjoy, apply, consume," पुरानी लैटिन में युति क्रिया है । जिससे यूज शब्द का विकास हुआ; परन्तु अंग्रेज़ी का यूज (Use) संस्कृत की युज् धातु के अत्यधिक समीप है । 
जिससे (युज् घञ् ) इन धातु प्रत्यय के योग से योग शब्द बनता है । ____________________________________ योग स्वास्थ्य की सम्यक् साधना है । 👇 योग और स्वास्थ्य इन दौनों का पारस्परिक सातत्य समन्वय है । योग’ शब्द ‘युजँ समाधौ’ संयमने च आत्मनेपदीय धातु रूप चुरादिगणीय सेट् उभयपदीय धातु में ‘घञ् " प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। 

इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध। और चित्त की वृत्ति क्या हैं मन की चञ्चलता --जो उसके स्वाभाविक 'व्यापार' का स्वरूप है। योग के अनुसार चित्त की अवस्था जो पाँच प्रकार की मानी गई हैं 👇 
१-क्षिप्त, 
२-मूढ़ 
३-विक्षिप्त, 
४-एकाग्र और 
५-निरुद्ध।
 चित्त की वृत्ति का अर्थ चित्त के कार्य (व्यापार) जो स्वभाव जन्य हैं साधारण रूप में चित्त ही हमारी चेतना का संवाहक है ।

--जो विचार (चिन्तन)और चित्रण (दर्शन) की शक्ति देता है । साँख्य-दर्शन के अनुसार चित्त अन्तःकरण की एक वृत्ति है।
स्वामी सदानन्द ने वेदान्तसार में अन्तःकरण की चार वृत्तियाँ वर्णित की हैं— 👇 
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ।
 १- संकल्प विकल्पात्मक वृत्ति को मन कहते हैं । २-निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि ( -जब आत्मा का प्रकाश मन पर परावर्तित होता है तब निर्णय शक्ति उत्पन्न होती है।
और वही बुद्धि है और इन्हीं दोनों मन और बुद्धि के अन्तर्गत चिन्तनात्मक वृत्ति को चित्त और अस्मिता अथवा अहंता वृत्ति को अंहकार कहते हैं ये ही शूक्ष्म शरीर के साथ सम्पृक्त (जुड़े)रहते हैं । योग के आचार्य पतञ्जलि चित्त को स्वप्रकाश नहीं स्वीकार करते । 
वे चित्त को दृश्य और जड़ पदार्थ मानकर उसको एक अलग प्रकाशक मानते हैं जिसे जीव कहते हैं। उनके विचार में प्रकाश्य और प्रकाशक के संयोग से प्रकाश होता है, अतः कोई वस्तु अपने ही साथ संयोग नहीं कर सकती।

 🌸🌸🌸 योगसूत्र के अनुसार चित्तवृत्ति पाँच प्रकार की है—१:- प्रमाण, २-विपर्यय,३- विकल्प, ४-निद्रा और ५-स्मृति तथा ६-प्रत्यक्ष, ७-अनुमान और ८-शब्दप्रमाण; ये भी चित्त की संज्ञानात्मक वृत्तियाँ-हैं । 
चित्त की पाँच वृत्तियाँ इसकी पाँच अवस्थाऐं ही हैं । नामकरण में भिन्नता होते हुए भी गुणों में समानताओं के स्तर हैं । 
१- एक में दूसरे का भ्रम–विपर्यय है २-स्वरूपज्ञान के बिना कल्पना – विकल्प है 
३-सब विषयों के अभाव का बोध निद्रा है 
४-और कालान्तरण में पूर्व अनुभव का आरोप स्मृति कहलाता है यह जाग्रति का बोध है । 
पच-दशी तथा और अन्य दार्शनिक ग्रन्थों में मन या चित्त का स्थान हृदय या हृत्पझगोलक लिखा है। 
परन्तु आधुनिक पाश्चात्य जीव-विज्ञान ने अंतःकरण के सारे व्यापारों का स्थान मस्तिष्क में माना है जो सब ज्ञानतन्तुओं का केंद्रस्थान है । खोपड़ी के अंदर जो टेढ़ी मेढ़ी गुरियों की सी बनावट होती है, जिसे मेण्डुला कहते है वहीं विचार और चेतना केन्द्रित है । 
वही अंतःकरण है और उसी के सूक्ष्म मज्जा-तन्तु-जाल और कोशों की क्रिया द्वारा सारे मानसिक व्यापारी होते हैं ।
 ये तन्तु और कोश प्राणी की कशेरुका या रीढरज्जु से सम्पृक्त हैं । 
भौतिकवादी वैज्ञानिकों के मत से चित्त, मन या आत्मा कोई पृथक् वस्तु नहीं है, केवल व्यापार- विशेष का नाम है। 

जीव-विज्ञानी कोशिका को जीवन का इकाई मानते हैं । मस्तिष्क के ब्रह्म (Bragma) भाग में पीनियल ग्रन्थि ही आत्मा का स्थान है ।
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 पीनियल ग्रन्थि (जिसे पीनियल पिण्ड, एपिफ़ीसिस सेरिब्रिम, एपिफ़ीसिस या "तीसरा नेत्र" भी कहा जाता है।
यह पृष्ठवंशी मस्तिष्क में स्थित एक छोटी-सी अंतःस्रावी ग्रंथि है। यह सेरोटोनिन और मेलाटोनिन को सृजन करती है, जोकि जागने/सोने के ढर्रे तथा मौसमी गतिविधियों का नियमन करने वाला हार्मोन का रूप है। _____________________________________________
इसका आकार एक छोटे से पाइन शंकु से मिलता-जुलता है (इसलिए तदनुसार इसका नाम करण हुआ ) और यह मस्तिष्क के केंद्र में दोनों गोलार्धों के बीच, खांचे में सिमटी हुई स्थिति में रहती है, जहां दोनों गोलकार चेतकीय पिंड जुड़ते हैं। उपस्थिति मानव में पीनियल ग्रंथी लाल-भूरे रंग की और लगभग चावल के दाने के बराबर आकार वाली (5-8 मिली-मीटर), ऊर्ध्व लघु उभार के ठीक पीछे, पार्श्विक चेतकीय पिण्डों के बीच, स्ट्रैया मेड्युलारिस के पीछे अवस्थित है।
 यह अधिचेतक भाग का अवयव है। 

पीनियल ग्रन्थि एक मध्यवर्ती संरचना है और अक्सर खोपड़ी के मध्य सामान्य एक्स-रे में देखी जा सकती है, क्योंकि प्रायः यह कैल्सीकृत होता है। "पीनियल ग्रन्थि को आत्मा का आसन भी कहा जाता है 

 -- और यह केवल और केवल योग से ही सम्भव है । योग संसार में सदीयों से आध्यात्मिक साधना-पद्धति का सिद्धि-विधायक रूप रहा है। और योग से ही ज्ञान का प्रकाश होता है । और ज्ञान ही जान है । अस्तित्व की पहिचान है ।

 कठोपोपनिषद में एक सुन्दर उपमा के माध्यम से आत्मा, बुद्धि ,मन तथा इन्द्रीयों के सम्बन्ध का पारस्परिक वर्णन इस किया गया है ।👇 ________________________________________________
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।। इन्द्रियाणि हयान् आहु: विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियं मनोयुक्तं भोक्ता इति आहुर्मनीषिणा ।। ( कठोपोपनिषद अध्याय १ वल्ली ३ मन्त्र ३-४ ) अर्थात् मनीषियों ने आत्मा को रथेष्ठा( रथ में बैठने वाला ) ही कहा है । अर्थात् --जो (केवल प्रेरक है और जो केवल बुद्धि के द्वारा मन को प्रेरित ही करता है। --जो स्वयं चालक नहीं है । यह शरीर रथ है । बुद्धि जिसमें सारथी तथा मन लगाम ( प्रग्रह)–पगाह इन्द्रियाँ ही रथ में जुते हुए घोड़े । और आगे तो आप समझ ही गये होंगे । एक विचारणीय तथ्य है कि आत्मा को प्रेरक सत्ता को रूप में स्वीकार किया जा सकती है । --जो वास्तविक रूप में कर्ता भाव से रहित है ।
"भारोपीय भाषाओं में प्रचलित है । ( प्रेत -Spirit ) शब्द आत्मा की प्रेरक सत्ता का ही बोधक है। आत्मा कर्म तो नहीं करता परन्तु प्रेरणा अवश्य करता है। और प्रेरणा कोई कर्म-- नहीं ! अत: आत्मा को प्रेत भी इसी कारण से कहा गया ।

 "प्रेत शब्द पर हम आगे यथास्थान व्याख्या करेंगे।
कठोपोपनिषद का यह श्लोक श्रीमद्भगवत् गीता में भी था ।
परन्तु उसे हटा दिया गया । यह रथेष्ठा ही निष्क्रिय रहकर केवल प्रेरक बना रहता है । वास्तव में रथेष्ठा की लौकिक उपमा बड़ी सार्थक बन पड़ी है रथेष्ठा की केवल इतनी ही भूमिका है कि 'वह प्रेरित करता है ।
और यह शरीर वास्तव में एक रथ के समान है , तथा बुद्धि तो रथ हाँकने वाला सारथि जानलें । और मन केवल प्रग्रह (पगाह)--या लगाम है। अब आत्मा बुद्धि को निर्देशित करती है। जिसका नियन्त्रण बुद्धिके हाथों में मन का नियन्त्रण होता है । विद्वान कहते हैं कि इन्द्रियाँ ही रथ में जुते हुए घोड़े हैं । 
और विषय ही मार्ग में आया हुआ ग्रास( भोजन) आदि।
वस्तुत:-आत्मा ही मन और इन्द्रीयों से युक्त हो कर दु:ख और सुख उपभोग करने वाला भोक्ता है जब ऩसमे अहं का भाव हो जाय ।
परन्तु यह सब अज्ञानता जनित प्रतीति है।
क्यों कि दु:ख और सुख मन के विकल्प और द्वन्द्व की अवस्थाऐं हैं ।
जो परस्पर विरोधाभासी व सापेक्ष हैं । 
परन्तु आनन्द सुख से पूर्णत: भिन्न है । 
आत्मा का स्वरूप इसी लिए (सत्-चित्-(चेतनामय)-आनन्द ) मनीषियों ने कहा है अर्थात्‌ सच्चिदानन्द।
अब अज्ञानता से जीव सुख को ही आनन्द समझता है और सुख की सापेक्षिकता से दु:ख उसे मिलता है। 
और यह द्वन्द्व (परस्पर विरोधी दो भावों का रूप ) ही सृष्टि का मूलाधार है।
यही हम्हें दु:ख और सुख के दो पाटों में पीसता है  _________________________________________________ 
पाँचवीं सदी में कृष्ण के आध्यात्मिक सिद्धान्तों की संग्राहिका उपनिषद् श्रीमद्भगवत् गीता इसी द्वन्द्व से मुक्त करने वाले ज्ञान का प्रतिपादन करती है । 
वस्तुत द्वन्द्व से परे होने के लिए मध्यम अथवा जिसे दूसरे शब्दों में समता का मार्ग भी कह सकते हैं अपनाना पड़ेगा ।
 क्यों संसार द्वन्द्व रूप है ।👇 अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः।।
10.33।। 
मैं अक्षरों (वर्णमाला) में अकार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ मैं अक्षय काल और विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) धाता हूँ।।
अर्थात्‌ ये मेरी विभूतियाँ हैं। 
भाषा में स्वरों की सहायता के बिना शब्दों का उच्चारण नहीं किया जा सकता और उसमें भी "अ"। अ स्वर का ही उदात्त ऊर्ध्वगामी रूप "उ" तथा अनुदात्त निम्न गामी "इ" रूप है। और इन तीनों स्वरों से सम्पूर्ण स्वर विकसित हुए ।
"अ" वर्ण का ही घर्षण रूप "ह" हुआ । 
दौनों का पारस्परिक तादात्म्य-एकरूपता श्वाँस और धड़कन (हृत्स्पन्दन) के समान है ।
"ह" प्रत्येक वर्ण में महाप्राण केरूप मे गुम्फित है । और "अ" आत्मा के रूप में ।
अकार के इस महत्व को पहचान कर ही उपनिषदों में इसे समस्त वाणी का सार कहा गया है।
हिब्रू संस्कृतियों तथा फोएनशियन आदि सैमेटिक भाषाओं अलेफ है ।
मैं समासों में द्वन्द्व हूँ अर्थात्‌ द्वन्द्व ईश्वर की समासीय विभूति है । 
संस्कृत व्याकरण में दो या अधिक (पदों) को संयुक्त करने वाला विधान विशेष समास कहलाता है? जिसके अनेक प्रकार हैं।
समास के दो पदों के संयोग का एक नया ही रूप होता है। 
द्वन्द्व समास में दोनों ही पदों का समान महत्व होता है ?  जबकि अन्य सभासों मे पूर्वपद अथवा उत्तरपद का।  यहाँ भगवान श्रीकृष्ण द्वन्द्व समास को अपनी विभूति बनाते हैं क्योंकि इसमें उभय पदों का समान महत्व है और इसकी रचना भी सरल है।
अध्यात्म ज्ञान के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि आत्मा और अनात्मा दोनों इस प्रकार मिले हैं कि हमें वे एक रूप में ही अनुभव में आते हैं और उनका भेद स्पष्ट ज्ञात नहीं होता ? -जैसे माया और ईश्वर ।
परन्तु विवेकी पुरुष के लिए वे दोनों उतने ही विलग होते हैं जितने कि एक वैय्याकरण के लिए द्वन्द्व समास के दो पद।
 मैं अक्षय काल हूँ पहले भी यह उल्लेख किया जा चुका है कि गणना करने वालों में मैं काल हूँ। 
वहाँ सापेक्षिक काल का निर्देश था ? 
जबकि यहाँ अनन्त पारमार्थिक काल को इंगित किया गया है। 
अक्षय काल को ही महाकाल कहते हैं। संक्षेपत दोनों कथनों का तात्पर्य यह है कि मन के द्वारा परिच्छिन्न रूप में अनुभव किया जाने वाला काल तथा अनन्त काल इन दोनों का अधिष्ठान आत्मा है। 
प्रत्येक क्षणिक काल के भान के बिना सम्पूर्ण काल का ज्ञान असंभव है।
अत: मैं प्रत्येक काल खण्ड में हूँ? तथा उसी प्रकार? सम्पूर्ण काल का भी अधिष्ठान हूँ। मैं धाता हूँ  ईश्वर धाता अर्थात् कर्मफलविधाता है। द्वन्द्व को समझने का माध्यम योग है । 

उस तराजू को योग करते हैं जिसको दौनों पलड़े बराबर हों ।
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अत: मन को ही आत्मा जब बुद्धि या ज्ञान शक्ति के द्वारा वशीभूत कर , इन्द्रीयों पर नियन्त्रण करती है । तब ही (स्व:) की स्थति स्वास्थ्य है । परन्तु कालान्तरण में -जब लोग अल्पज्ञानी हो गये तब अन्त्र (आँत) को ही आत्मा और उसकी क्रिया-विधि के सकारात्मक रूप को स्वास्थ्य कहने लगे । 
यानि शरीर की नीरोग अवस्था । 
परन्तु आधुनिक योग शास्त्र के अनुसार तन ,मन और सामाजिक पृष्ठभूमि पर आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सभ्यता मूलक स्तर पर जो सन्तुष्ट है ; 'वह स्वस्थ है । _________________________________________________ 
यही सृष्टि -सञ्चालन का सिद्धान्त बडा़ अद्भुत कारण है। 
जिसे मानवीय बुद्धि अहंत्ता पूर्ण विधि से कदापि नहीं समझ सकती है। 
विश्वात्मा ही सम्पूर्ण चराचर जगत् की प्रेरक सत्ता है । और आत्मा प्राणी जीवन की , इसी सन्दर्भ में हम सर्व प्रथम आत्मा शब्द पर विचार-विश्लेषण करते हैं! सर्व प्रथम हम आत्मा शब्द पर विचार-विश्लेषण करें ! तो यह शब्द संसार की सम्पूर्ण सभ्य भाषाओं में विशेषत: भारोपीय भाषा परिवार में सदीयों से किन्हीं न किन्हीं रूपों में अवश्य विद्यमान रहा है।
और मानव- जिज्ञासा का चरम लक्ष्य भी आत्मा की ही खोज है ; और होनी भी चाहिए । क्योंकि मानव जीवन का सर्वोपरि मूल्य इसी में निहित है। .मैं यादव योगेश कुमार ''रोहि' इसी महान भाव से प्रेरित होकर उन तथ्यों को यहाँ उद् घाटित कर रहा हूँ। जो स्व -जीवन की प्रयोग शाला में दीर्घ कालिक साधनाओं के प्रयोग के परिणाम स्वरूप प्राप्त किए हैं।

 इन तथ्यों के अनुमोदन हेतु भागवत धर्म के प्रतिनिधि ग्रन्थ एवं औपनिषदीय साहित्य के मूर्धन्य ग्रन्थ श्री-मद्भगवद् गीता तथा अन्य उपनिषदों को उद्धृत किया गया है।

 यद्यपि श्रीमद्भगवद् गीता महाभारत के भीष्म पर्व का ही अंग है । 
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 "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मावान् ( 2-46)   
यावानर्थ उदपाने सर्वत: संप्लुतोदके . तावन्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: (2-45) -
---हे अर्जुुन सारे वेद सत्व, रज, और तम इन तीनों प्राकृतिक गुणों का ही प्रतिपादन करते हैं अर्थात्‌ इन्हीं तीनों गुणों से युक्त हैं इसलिए तुम इन तीनों को त्याग कर दु:ख-दुख आदि द्वन्द्वों को परे होकर  तथा नित्य सत्वगुण में स्थित योग-क्षेम को न चाहने वाले बनकर केवल आत्म-परायण बनो ! जैसे सब ओर से परिपूर्ण जलाशय को प्राप्त होकर छोटे गड्डों से कोई प्रयोजन नहीं रहता ; उसी प्रकार उपर्युक्त वर्णित तथ्यों को जानने वाले निर्द्वन्द्व व्यक्ति का वेदों से कोई प्रयोजन नहीं रहता ! श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा यास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।। (श्रीमद्भगवद् गीता 2/53) जब वेदों के सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि है। समाधि में स्थिर होगी तब तू योग को प्राप्त कर सकेगा ! आशय यह कि वेदौं का अध्ययन व तदनुकूल आचरण करने से व्यक्ति की बुद्धि विचलित हो जाती है ; उसमें सत्य का निर्णय करने व किया उच्च  तत्व को समझने की बुद्धि नहीं रहती है ।
अब बताऐं कि किस प्रकार गीता और वेद समान हैं कभी नहीं  वस्तुत: गीता का प्रतिपाद्य विषय द्रविड़ो की योग पद्धति है ।

 बुद्ध के मध्यम-मार्ग का अनुमोदन "समता योग उच्यते योग: कर्मसुु कौशलम्"  तथ्य से पूर्ण रूपेण है । 
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनञ्जय। सिद्धय-असिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। योग: कर्मसुु कौशलम्" ईश्वर और आत्मा के विषय में बुद्ध के विचार स्पष्ट ही कृष्ण दर्शन के अनुरूप हैं। विशेषत: मज्झ मग्ग ( मध्य मार्ग) महात्मा बुद्ध को उनके अनुयायी ईश्वर में विश्वास न रखने वाला कह कर बुद्ध को नास्तिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में आजकल जो लोग अपने को बौद्धमत का अनुयायी कहते हैं उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की ही भरमार है । 
जो ईश्वर और आत्मा की सत्ता को अस्वीकार करते हैं एक बड़ी कठिनाई महात्मा बुद्ध के यथार्थ विचार जानने में यह है कि उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा अब दीर्घनिकाय, मज्झिनिकाय, विनयमपिटक आदि जो भी ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के नाम से पाये जाते हैं ; उनका संकलन उनके निर्वाण की कई शताब्दियों के पश्चात् किया गया जिनमें से बहुत-सी उक्तियां किंवदन्ती के ही रूप में हैं।
 महात्मा बुद्ध परलोक और पुनर्जन्म को मानते थे।  इससे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। इसलिये उन्हें सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण देना अनावश्यक है। प्रथम प्रमाण के रूप में धम्मपद के जरावग्गो श्लोक (संख्या 153) देखें--- अनेक जाति संसारं, सन्धाविस्सं अनिन्विस। गृहकारकं गवेस्संतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।’ महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा।
 गृह निर्माण करने वाले की खोज में बार-बार जन्म दुःखमय हुआ। श्लोक का यह अर्थ महाबोधि सभा, सारनाथ-बनारस द्वारा प्रकाशित श्री अवध किशोर नारायण द्वारा अनुदित धम्मपद के अनुसार है।
दूसरा प्रमाण ब्रह्मजाल सुत्त का है; जहां महात्मा बुद्ध ने अपने लाखों जन्मों के चित्तसमाधि आदि के द्वारा स्मरण का वर्णन किया है। सैद्धान्तिक कषौटी पर यह तथ्य प्रमाणित भी हो गया है, कि परमाणु अविनाशी है ,और संसार की निर्माण इकाई है परमाणु सृष्टि की पूर्ण इकाई अर्थात् व्यष्टि रूप है।

 संस्कृत साहित्य में अणु शब्द जीव का वाचक है। (अन्- धातु से व्युत्पन्न है। 
"अण्यते येन असौ अणु कथ्यते " अण् :- शब्दे प्राणने च आत्मने पदीय क्रिया रूप (अण--उन् ) क्षुद्रे, सूक्ष्मपरिमाणवति, द्रव्ये, लेशे च । (चिना, काङनी, श्यामा) प्रभृति सूक्ष्मधान्ये पुल्लिङ्गः। “अनणुषु दशमांशोऽणुष्वथैकादशांश” इति लीलावती ।
 अणुशब्दोहि परिमाणविशेषवाची । ग्रीक भाषा में भी ऐटम {Atom}शब्द का अभिधेय अर्थ है----×----अकाट्य तत्व ---अर्थात् जिसे काटा नहीं जा सकता है वही ऐटम है ----- ✳⛔. Atom--a particle of matter so small that so far as the older chemistry goes..Cannot be Cut (Temnein) or divided... अर्थात् पदार्थ का सबसे शूक्ष्मत्तम कण जिसे और काटा नहीं जा सकता है , वही एटम atom है। 
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संस्कृत भाषा में ऐटम शब्द का भाषान्तरण परमाणु शब्द के रूप में किया है, परमाणु शब्द का संस्कृत भाषा में अभिधात्मक अर्थ होता है। .. सबसे शूक्ष्म जीव (अणुः) ...ऐटम शब्द A  नकारात्मक उपसर्ग तथा Tomos क्रियात्मक विशेषण से बना हुआ रूप है .
.Tomos का भी धातु रूप (क्रिया का मूल रूप) Temnein =to cut अर्थात् काटना है । ..Atoms -A priv.and tomos----Verbal adjective form of Temnein Rootword ...A=-privation of tomos..A tomos ... इस शब्द के अतिरिक्त ग्रीक भाषा में सत्तावान् तत्व का वाचक ऐटिमॉन Etymon..शब्द भी है, जिसका मूल रूप (Etymos) है।
 इसी सन्दर्भ में हम यह भी स्पष्ट कर दें की ग्रीक भाषा में ऐटमॉस (Atmos) शब्द का मूल अर्थ वायु तथा बाष्प और शूक्ष्म तत्व भी है। और तो ऑटोस् (Autos) शब्द भी आत्मा का वाचक है । जिसका तादात्म्य संस्कृत स्वत: शब्द से प्रस्तावित है । ________________________________________________
पारसी धर्म ग्रंथ अवेस्ता ए झन्द में संस्कृत शब्द स्वयं ( स्वत:) ख़ुद बन गया और इसी से आगेे चल कर ख़ुदा शब्द का भी विकास हुआ है।

अब हम यह प्रतिपादित करेंगे कि आत्मा और एटम वास्तव में क्या है? (सबसे छोटा आत्मा ) सृष्टि की हर वस्तु की निर्माण की शूक्षत्त्तम इकाई परमाणु है। जो काटा नहीं जा सकता है - संस्कृत भाषा में प्राचीन काल से आत्मा का वाचक प्रेत शब्द है।
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अनुवाद:- (व्युत्पत्ति और अर्थ) "Ātman" (आत्मा, आत्म, आत्मन्) एक संस्कृत शब्द है। जिसका अर्थ है "सार, श्वाँस, आत्मा। "
 यह मूल भारोपीय (एटमेन) से संबंधित है (जिसका मूल अर्थ है "श्वाँस"; cognates:डच भाषा में आडेम (Dutch adem) , पुरानी उच्च जर्मन में (एटम ="सांस," }आधुनिक जर्मन में एटमेन= "साँस लेना" और एटेम "श्वसन, सांस",और  पुरानी अंग्रेज़ी एडियन )। ________________________________________________ 
Ātman, कभी-कभी विद्वानों के साहित्य में (एटमन) के रूप में एक डाइकाट्रिक के बिना वर्तनी,  का अर्थ "वास्तविक स्व" है।
 "सबसे सरल तत्व" और आत्मा।
 
श्रीमद्भगवद् गीता का यह श्लोक प्रमाण रूप में है 👇 नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक । चैनं क्लेदयन्ति आपो न शोषयति मारुत:।। 

अर्थात् शस्त्राणि जिसे काट नहीं सकता , अग्नि जला नहीं सकती और जल भिगोय नहीं सकता, और न वायु जिसे सुखा सकती है , वह आत्मा है  ________________________________________________ 
यह परमाणु भी त्रिगुणात्मक है --सत् धनात्मक तथा तमस् ऋणात्मक तथा रजो गुण न्यूट्रॉन के रूप में मध्यस्थ होने से न्यूट्रल (Neutral) है। परमाणु को जब और शूक्ष्मत्तम रूप में देखा तो अल्फा बीटा गामा कण भी त्रिगुणात्मक ही सिद्ध है।
 भौतिक शास्त्री लेप्टॉन क्वार्क तथा गेज बोसॉन नामक मूल कणों को भी परमाणु के ही मूल में भी स्वीकार करते हैं ।
 परन्तु ये सभी पूर्ण नहीं हैं; केवल उसके अवयव रूप हैं परमाणु का मध्य भाग जिसे नाभिक (Nucleus)भी कहते हैं ,उसी में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन उसी प्रकार समायोजित हैं , 
जैसे सत्य का समायोजन ब्रह्म से हो। .

क्यों कि ब्रह्म द्वन्द्व भाव से सर्वथा परे है।
 परन्तु उसका साक्षात्कार सत्याचरण से ही सम्भव है । 
अत: सत्य और ब्रह्म का इतना सम्बन्ध अवश्य है । विदित हो कि परमाणु के केन्द्र में प्रतिष्ठित प्रोटॉन (Protons) पूर्णतः घन आवेशित कण है और इसी केन्द्र के चारो ओर भिक्षुक के सदृश्य प्रोटॉन के विपरीत ऋण-आवेशित कण इलैक्ट्रॉन हैं। 
जो कक्षाओं में चक्कर काटते रहते हैं । इलैक्ट्रान पर भी प्रोटॉन के धन आवेश के बराबर ही ऋण आवेश की संख्या होती है । 
अर्थात् परमाणु में इलैक्ट्रॉन की संख्या भी प्रोटॉन की संख्या के बराबर होती है इलेक्ट्रॉन ही वस्तु के विद्युतीयकरण के लिए उत्तर दायी है। 
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 परमाणु के द्रव्यमान का 99.94% से अधिक भाग नाभिक में होता है । 
प्रॉटॉन पर सकारात्मक विद्युत आवेश होता है । तथा इलेक्ट्रॉन पर नकारात्मक आवेश होता है । और न्यूट्रॉन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता तथा परमाणु का इलेक्ट्रॉन इस विद्युतीय बल द्वारा एक परमाणु के नाभिक में प्रॉटॉन की ओरआकर्षित होता है तथा परमाणु में प्रॉटॉन और न्यूट्रॉन एक अलग बल अर्थात् परमाणु बल के द्वारा एक दूसरे को आकर्षित करते हैं ।

एैसा ही आकर्षण स्त्री और पुरुष का पारस्परिक रूप से है । 
परमाणु किसी पदार्थ की सबसे पूर्ण सूक्षत्तम इकाई है _______________________________________________ 
यूरोपीय पुरातन भाषाओं में विशेषत: जर्मनिक भाषाओं में आत्मा शब्द अनेक वर्ण--विन्यास के रूप विद्यमान है जैसे - 
1-पुरानी अंगेजी में--Aedm 2-डच( Dutch) भाषा में Adem रूप 3-प्राचीन उच्च जर्मन में Atum = breath अर्थात् प्राण अथवा श्वाँस-- 4-डच भाषा में इसका एक क्रियात्मक रूप (Ademen )--to breathe श्वाँसों लेना परन्तु Auto शब्द ग्रीक भाषा का प्राचीन रूप है । जो की Hotos रूप में था । 
जो संस्कृत भाषा में स्वत: से समरूपित है । 
श्रीमद् भगवद्गीता में कृष्ण के इस विचार को👇 नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: । 
न च एनं क्लेदयन्ति आपो न शोषयति मारुत:।। कृष्ण का यह विचार ड्रयूड Druids अथवा द्रविड दर्शन से प्रेरित है । 
आत्मा नि:सन्देह अजर ( जीर्ण न होने वाला) और अमर (न मरने वाला ) है  आत्मा में मूलत: अनन्त ज्ञान अनन्त शक्ति और यह स्वयं अनन्त आनन्द स्वरूप है। 
क्योंकि ज्ञान इसका परम स्वभाव है ।
 ज्ञान ही शक्ति है और ज्ञान ही आनन्द परन्तु ज्ञान से तात्पर्य सत्य से अन्वय अथवा योग है । __________________________________________
 ज्ञा धातु जन् धातु का ही विपर्यय अथवा सम्प्रसारण रूप है । सत्य ज्ञान का गुण है और चेतना भी ज्ञान एक गुण है सत्य और ज्ञान दौनों मिलकर ही आनन्द का स्वरूप धारण करते हैं। जैसे सत्य पुष्प के रूप में हो तो ज्ञान इसकी सुगन्ध और चेतना इसका पराग और आनन्द स्वयं मकरन्द (पुष्प -रस )है ; 
आत्मा सत्य है । क्योंकि इसकी सत्ता शाश्वत है । एक दीपक से अनेक दीपक जैसे जलते हैं ; 
ठीक उसी प्रकार उस अनन्त सच्चिदानन्द ब्रह्म अनेक आत्माऐं उद्भासित हैं । 
परन्तु अनादि काल से वह सच्चिदानन्द ब्रह्म लीला रत है ;यह संसार लीला है । 
और अज्ञानता ही इस समग्र लीला का कारण है । अज्ञानता सृष्टि का स्वरूप है ; 
उसका स्वभाव है यह सृष्टि स्वभाव से ही अन्धकार उन्मुख है। 
क्यों कि अन्धकार का तो कोई दृश्य श्रोत नहीं है, परन्तु प्रकाश का प्रत्येक श्रोत दृश्य है। अन्धकार तमोगुणात्मक है ,तथा प्रकाश सतो गुणात्मक है यही दौनो गुण द्वन्द्व के प्रतिक्रिया रूप में रजो गुण के कारक हैं यही द्वन्द्व सृष्टि में पुरुष और स्त्री के रूप में विद्यमान है।
 स्त्री स्वभाव से ही वस्तुत: कहना चाहिए प्रवृत्ति गत रूप से भावनात्मक रूप से प्रबल होती हैं ; और पुरुष विचारात्मक रूप से प्रबल होता है। इसके परोक्ष में सृष्टा सृष्टा का एक सिद्धान्त निहित है ।
 वह भी विज्ञान - संगत क्योंकि व्यक्ति इन्हीं दौनों विचार भावनाओं से पुष्ट होकर ही ज्ञान से संयोजित होता है । अन्यथा नहीं , वास्तव में इलैक्ट्रॉन के समान सृष्टि सञ्चालन में स्त्री की ही प्रधानता है। 
..और संस्कृत भाषा में आत्मा शब्द का व्यापक अर्थ है :--जो सर्वत्र चराचर में व्याप्त है । ---आत्मा शब्द द्वन्द्व से रहित ब्रह्म का वाचक भी और द्वन्द्व से संयोजित जीव का वाचक भी है। जैसे समुद्र में लहरें उद्वेलित हैं वैसे ही आत्मा में जीव उद्वेलित है ,वास्तव में लहरें समुद्र जल से पृथक् नहीं हैं ,लहरों का कारक तो मात्र एक आवेश या वेग है । 
ब्रह्म रूपी दीपक से जीवात्मा रूपी अनेक दीपकों में जैसे एक दीपक की अग्नि का रूप अनेक रूपों भी प्रकट हो जा है ।
 परन्तु इन सब के मूल में आवेश अथवा इच्छा ही होती है । और आवेश द्वन्द्व के परस्पर घर्षण का परिणाम है ! 
जीव अपने में अपूर्णत्व का अनुभव करता है । परन्तु यह अपूर्णत्व किसका अनुभव करता है उसे ज्ञाति नहीं :- **************************************
ज्ञान दूर है और क्रिया भिन्न !   
श्वाँसें क्षण क्षण होती विच्छिन्न । 

पर खोज अभी तक जारी है । 
अपने स्वरूप से मिलने की । 
हम सबकी अपनी तैयारी है । 

आशा के पढ़ाबों से दूर निकर 
संसार में किसी पर मोह न कर "
ये हार का हार स्वीकार न कर
मञ्जिल बहुत दूर तुम्हारी है ।

 शोक मोह में तू क्यों खिन्न है । 
कुछ पल के रिश्ते सब भिन्न है ।
 रोहि' मतलब की दुनियाँ सारी है। **************************************

 शक्ति , ज्ञान और आनन्द के अभाव में व्यक्ति अनुभव करता है कि उसका कुछ तो खो गया है ।

 जिसे वह जन्म जन्म से प्राप्त करने में संलग्न है । परन्तु परछाँईयों में ,परन्तु सबकी समाधान और निदान आत्मा का ज्ञान अथवा साक्षात्कार ही है । और यह केवल मन के शुद्धिकरण से ही सम्भव है  और एक संकीर्ण वृत्त (दायरा)भी । 
यह एक बिन्दुत्व का भाव ( बूँद होने का भाव )है ।जबकि स्व: मे आत्म सत्ता का बोध सम्पूर्णत्व के साथ है ; 
यह सिन्धुत्व का भाव (समु्द्र होने का भाव )है । व्यक्ति के अन्त: करण में स्व: का भाव तो उसका स्वयं के अस्तित्व का बोधक है । 
परन्तु अहं का भाव केवल मैं ही हूँ ; इस भाव का बोधक है।
 इसमें अति का भाव ,अज्ञानता है । _________________________________________ 
अल्पज्ञानी अहं भाव से प्रेरित होकर कार्य करते हैं ; तो ज्ञानी सर्वस्व: के भाव से प्रेरित होकर , इनकी कार्य शैली में यही बड़ा अन्तर है।
 संस्कृत भाषा में आत्मा शब्द के अनेक प्रासंगिक अर्थ भी हैं जैसे :---- १--वायु २--अग्नि ३---सूर्य ४--- व्यक्ति --स्त्री पुरुष दौनो का सम्यक् (पूर्ण) रूप ५---ब्रह्म जो कि द्वन्द्व से सर्वथा परे है। 

मिश्र की प्राचीन संस्कृति में आत्मा एटुम (Atum के रूप में सृष्टि का सृजन करने वाले प्रथम देवता के रूप में मान्य है । 
कालान्तरण में मिश्र की संस्कृति में यह रूप "Aten" या "Aton"के रूप में सूर्य देव को दे दिया गया , 
प्राचीन मिश्र के लोग भारतीयों के समान सूर्य को विश्व की आत्मा मानते थे । मिश्र की संस्कृति में आतुम Atum का स्वरूप स्त्री और पुरुष दौनो के समान रूप में था । 

👇और यही (एतुम )वास्तव में सुमेर और बैबीलॉन की संस्कृतियों में आदम के रूप उदित हुआ , जो स्त्री और पुरुष दौनो का वाचक है- और यही से आदम शब्द हिब्रू परम्पराओं में उदय हुआ जिसका समायोजन कुछ अल्पान्तरण के साथ यहूदी.ईसाई तथा इस्लामी शरीयत ने किया है ।
"मिश्र देश वालों की अवधारणा थी; की आतुम( Atum) पूर्ण तथा अनादि देव है ।
 जिसने समग्र सृष्टि का सृजन कर दिया है । इसी सन्दर्भ में भारतीय उपनिषदों ने कहा है आत्मा केविषय में जो ब्रह्म के अर्थ में है-- _______________________________________________ 
पूर्णम् अदः पूर्णम् इदम् पूर्णात् पूर्णम् उद्च्यते । . पूर्णस्य पूर्णम् आदाय पूर्णम् इव अवशिष्यते .।। ________________________________________ 
( सन्दर्भ- ईशावास्योपनिषद) अर्थात् यह आत्मा पूर्ण है और इस पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही अवशेष बचता है । 

गुरुवार, 15 जून 2023

सीता का कामुक वर्णन-


4.1
 
110 )

 

द्वारा: मुहम्मद कासिम अल-हनफी

यह मेरे, एक मुसलमान की ओर से, निरंकुश लेखन, भाषणों और नारों के खिलाफ, सोशल मीडिया पर हिंदुओं द्वारा, और उनकी 'धर्म-सभा' सभाओं में, और उनकी धार्मिक रैलियों में, ब्रह्मांड के एकमात्र निर्माता 'अल्लाह' को बदनाम करने वाली एक प्रतिशोधात्मक कार्रवाई है। ', और रचना का सर्वश्रेष्ठ 'पैगंबर मुहम्मद (ﷺ)'। ये पंक्तियाँ इन निन्दकों और आलोचकों के लिए करारा जवाब होंगी। हमारी खामोशी हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि धैर्य और समझदारी है। जाहिर है, हम मुसलमानों के पास हमेशा हमारे खिलाफ आरोप लगाने वालों के हर एक आरोप का एक स्मार्ट-एलेक रिवाइंडर होता है, खासकर जब यह हमारे सर्वशक्तिमान अल्लाह, या उनके प्यारे पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) की बात आती है, जो सृष्टि का सबसे अच्छा है।

इस कार्य में मैं वाल्मीकि रामायण में वर्णित कुछ यौन सामग्री पर प्रकाश डालने जा रहा हूँ। हिंदू हमेशा अन्य धार्मिक ग्रंथों में कामुकता के बारे में बात करना पसंद करते हैं। निश्चय ही, यह उनके चरित्र का अभिन्न अंग है। ये धर्मांध हमेशा मनगढ़ंत आख्यान या अप्रमाणिक सन्दर्भों का हवाला देकर इस्लाम का उपहास उड़ाते हैं और हिंदुओं की इस मानसिक बीमारी का एकमात्र समाधान उन्हें आईना दिखाना और उनकी ही किताबों से उनके देवताओं और संतों के 'अश्लील कांड' बताना प्रतीत होता है। और याद रखें! मेरा हिंदुओं के धार्मिक व्यक्तित्वों का उपहास करने या उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं है, जो मकड़ी के जाले से भी अधिक नाजुक हैं, और अमिताभ बच्चन द्वारा केबीसी में मनु स्मृति के बारे में एक सरल प्रश्न से आहत हो सकते हैं।

हिंदू साहित्य में विस्तृत अश्लीलता का उल्लेख इन दो जबड़ा तोड़ने वाले लेखों में किया गया है: ' हिंदू धर्म और वासना ', और ' वेदों में अश्लीलता '।

यहां, मैं केवल एक पुस्तक 'वाल्मीकि रामायण' से उद्धृत करूंगा, जिसे हिंदुओं द्वारा राम के जीवन के लिए महान कृति के रूप में स्वीकार किया गया है। हेयर यू गो:

1. सुन्दर काण्ड, अध्याय: 38, श्लोक: 11-27

जब हनुमान सीता से मिलते हैं, तो वे सीता से उन्हें स्मरण की निशानी देने के लिए कहते हैं, जिसे राम पहचान सकें। सीता तब जयंत (इंद्र के पुत्र) द्वारा चित्रकूट पर्वत पर घटित एक कौवे के रूप में प्रच्छन्न रूप से अपनी 'शारीरिक यातना' का प्रसंग सुनाती हैं, और हनुमान से स्मरण के टोकन के रूप में राम के सामने इसे दोहराने का अनुरोध करती हैं। एक थके हुए राम सीता की गोद में सो रहे थे, जब कौवे ने उन पर हमला किया। कहानी जारी है:

एवमुक्ता हनुमता सितार सुरसुतोपमा।
उवाच वचनं मन्दं भाष्पप्रग्रथिताक्षरम्।।5.38.11

इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम्।
शैलस्य चित्रकूटस्य पादे जीवित पुरा।।5.38.12

तापसाश्रमवासिन्याः प्राज्यमूलफालोदके।
तस्मिन्सिद्धाश्रमे देशे मन्दाकिन्या विदूरतः।।5.38.13

तस्योपवनषण्डेषु नानापुष्पसुगन्धिषु।
विहृत्य सलिले क्लिन्ना ममाङके समुपाविषमः।।5.38.14

ततो मांससमायुक्तो व्यासः पर्यतुण्डयत्।
तमहं लोष्टमुद्यम्य वारयामिस्म वायसम्।।5.38.15

दारायण्स च मां काकस्तत्रैव परिलीयते।
न चाप्युपरमनमान्साद्भक्षार्थी बलिभोजनः।।5.38.16

उत्कर्षन्त्यां च रशनां क्रुद्धायां मयि पक्षिणि।
स्रस्यमाने च वसने ततो दृष्टा त्वया ह्यहम्।।5.38.17

त्वयाऽपहसिता चाहं क्रुद्धा संलज्जिता तदा।
भक्षग्रध्नेन काकेन दारिता त्वामुपागता।।5.38.18

आसीनस्य च ते श्रान्ता पुनरुत्संगमविशम्।
क्रुध्यन्ती च प्रहृष्टेन त्वयाऽहं परिसान्तविता।।5.38.19

बाष्पपूर्णमुखी मन्दं चक्षुषी परिमार्जती।
लक्षिताऽहं त्वया नाथ वायसेन प्रकोपिता।।5.38.20

परिश्रमात्प्रसुप्ता च राघवाङकेऽप्यहं चिरम्।
पर्यायेन प्रसुप्तश्च ममाङके भरताग्रजः।।5.38.21

स तत्र पुनरेवथ यस्स्समुपागमत्।
ततस्सुप्तप्रबुद्धां मां रामस्याङकात्समुत्थिताम्।।5.38.22

वायस्सहसाग्म्य विददार स्तनान्तरे।
पुनरथोत्पत्य विददार स मां बृशम् ।।5.38.23

ततस्मुक्षितो रमो मुक्तैशोणितबिन्दुभिः।
वायसेन ततस्तेन बलवत्क्लिश्यमानया।।5.38.24

स माया बोधितश्श्रीमानसुखसुप्तः परन्तपः।
स मां दृष्ट्वा महाबाहु रवितुन्नां स्तनयो स्तदा।।5.38.25

आशीविष इव क्रुद्धश्वसन्वाक्यमभाषत।
केन ते नागनासोरु विक्षतं वैस्तितान्तरम् ।।5.38.26

कः क्रीडति सरोशेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना।
वीक्षमाणस्ततं वै वायसं समुदैक्षत।।5.38.27

नखैसरुधिरास्तिकक्ष्णैर्मामेवाभिमुखं स्थितम्।
पुत्त्रुः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः।।5.38.28

धान्तरगतश्शीघ्रं पवनस्य गतौ समः।

"हनुमान की बात सुनकर भगवान की संतान सीता ने धीमे स्वर में ये शब्द कहे। आँसुओं से छलनी, 'मेरे प्यारे पति के लिए पहचान की यह निशानी ले जाओ':

“Long ago we were staying at Siddhashrama. This hermitage was situated to the northeast at the foot of Chitrakuta Mountain which was not far from the river Mandakini. It had abundant roots, fruits and water. You sported with me in the gardens which were fragrant with many types of flowers and ponds. You sat down on my lap with wet clothes in the hermitage.”

“Then a crow greedy of flesh began to peck my bosom with its beak. I took a clod of earth and warded him off.”

“The crow was an eater of offerings, hungry for food began to peck me again and again for flesh. He did not stop.”

“My upper cloth was slipping. I was trying to pull up my waist string angrily when you saw me.”

“Then you made fun of me, and I became angry. I was abashed. Torn by the voracious bird I sought your shelter.”

“Exhausted, I sat on your lap again. Seeing my angry face you pacified me. You were happy (to see me draw close).”

“O lord when I was angered by the crow and my face was filled with tears you marked me wiping my eyes.”

“Totally exhausted I slept on your lap for a long time, and in turn you slept on my lap later.”

“The crow came back again and clawed me in the space between my breasts even after I woke up after slumber from Rama’s lap. Flying, it tore my bosom again and again.”

“Then, Rama got wet by the discharged drops of blood. Thereafter, that splendorous Rama, the annihilator of enemies, who was in a pleasant slumber, was woken up by that crow and by me who was grievously tormented by the crow.”¹

“O strong-armed Rama, seeing my torn breasts, you became angry like a hissing serpent and hissing said:

‘O Sita, with a beautiful lap like an elephant trunk, by whom is your bosom wounded? Who is sporting with an angry five-hooded snake?’

“Then looking around, you saw the crow facing me with sharp, bloodstained claws.”

“This crow was the best of birds. He was surely Indra’s son who had covered a long distance with great speed and his speed was like the Windgod’s.” [Tr. IIT Kanpur]

 

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=5&language=dv&field_sarga_value=38

¹The translation of this only verse is taken from here: https://www.valmikiramayan.net/utf8/sundara/sarga38/sundara_38_frame.htm

Hindi Translation by Dwaraka Prasad Sharma:

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Now imagine!

A goddess of Hindus Sita is passing her time in romance with her Husband-god Rama, but Jayant, disguised as a crow, comes to tear Sita’s breasts, is also son of Hindu god Indra. I can’t understand which type of divinity this is, and which type of religious book the Ramayana is!

While the name of this ‘Kākāsura (काकासुर)’ is not explicitly mentioned as Jayant in the episode, various commentaries on the epic like the Tilaka and the Bhushana by Govindaraja identify Jayant as the ‘son of Indra’. Govindaraja says only Jayant is known as the son of Indra.

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But, Tulsi Das fabricated the story in his ‘Ramcharitmanas’, and replaces the breast with feet. He writes in Aranya Kanda:

“सीता चरण चोंच हतिभागा। मूढ़ मंद मति कारन कागा।।”

“The stupid fool, who had disguised himself as a crow with a sinister motive, bit Sita in the foot with his beak and flew away.” [Tr. Geeta Press]

But no worries, because such types of textual adulteration are very common in Hindus.

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

 

2. Ayodhya Kanda, Chapter: 91, Verses: 10-91

Having been instructed by Bhardwaja to bring the army to his place, Bharat (brother of Rama) allowed his army also to come to the hermitage. Then, Bhardwaja invokes Vishvakarma, the divine architect and requests him to arrange for a befitting hospitality to Bharat. The reader can refer to this full chapter, but I am quoting certain verses:

तेनैव च मूहूर्तेन दिव्याऽभरणभूषिताः
आगुर्विंशतिसाहस्राः ब्रह्मणा प्रहिताः स्त्रियः।।2.91.43।।

सुवर्णमणिमुक्तेन प्रवालेन च शोभिताः
आगुर्विंशतिसाहास्राः कुबेरप्रहिताः स्त्रियः।।2.91.44।।

याभिर्गृहीतः पुरुषस्सोन्माद इव लक्ष्यते।
आगुर्विंशतिसाहस्रा नन्दनादप्सरोगणाः।।2.91.45।।

अलम्बुसा मिश्रकेशी पुण्डरीकाऽथ वामना
उपानृत्यंस्तु भरतं भरद्वाजस्य शासनात्।।2.91.47।।

सुरास्सुरापाः पिबत पायसं च बुभुक्षिताः।।2.91.52।।

मांसानि च सुमेध्यानि भक्ष्यन्तां यावदिच्छथ।।2.91.53।।

उच्छाद्य स्नापयन्ति स्म नदीतीरेष वल्गुषु।
अप्येकमेकं पुरषं प्रमदास्सप्त चाष्ट च।।2.91.54।।

संवाहन्त्यस्समापेतुर्नार्यो रुचिरलोचनाः
परिमृज्य तथाऽन्योन्यं पाययन्ति वराङ्गनाः।।2.91.55।।

 

“At that very moment twenty thousand women adorned with beautiful ornaments sent by Brahma presented themselves.”

Twenty thousand women adorned with gold, gems and corals sent by Kubera came.”

Troops of twenty thousand apsaras by whom any man when taken hold of in their arms could be intoxicated with intense passion, came from Nandana gardens.”

“Thereafter, the apsaras, Alambusa, Misrakesi, Pundarika and Vamana danced near Bharata at the command of Bharadwaja.”

“‘O wine drinkers, drink as much as you can those who are hungry partake payasam and sacred meat’.”

“Every single warrior was attended by seven or eight women who applied oil and massaged his body and bathed him on the lovely banks of the river.”

Some women with beautiful eyes quickly approached them for massaging. The best of ladies wiped their bodies dry and gave each other wine to drink.” [Tr. IIT Kanpur]

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=2&language=dv&field_sarga_value=91

Hindi Translation by Dwaraka Prasad Sharma:

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One can see in above-mentioned verses, the roots of ‘Dancing/Nautch Girls’ custom. Hindu personalities gained a particular reputation for their licentiousness as a result of the activities of the ‘nautch girls’. As part of the entertainment for the royal family, these highly skilled dancers performed for the ruler and entertained his guests. They also formed part of everyday life for those outside the palaces, as people invited them to perform at celebrations, festivals, and fairs. These women were valued for their intelligence as well as their dancing skills. As a form of side employment they offered sexual services, and they would cover themselves in gold as an outward sign of their wealth. Every Hindu temple of any importance possessed a troupe of nautch girls: some acted as priestesses, married in childhood to the idols and obliged by their vocation to prostitute themselves to men of every caste; others acted as mistresses to the temple priests. Such prostitution was not looked down on, and even distinguished families were proud to have daughters dedicated to the temple’s service. At one time it was estimated that twelve thousand such temple prostitutes existed in Madras alone. For the Hindu deities, the nautch girls were the embodiment of sexuality, highly erotic seductresses who had the ability to charm all males. Indeed, seventeenth-century travelers frequently portrayed India as a hotbed of vice and full of prostitutes. The only reason for this is that the roots of this fornication go back to the Hindu scriptures.

The verses 52-53 are teaching about ‘Date Rape’, because those dancing girls took ‘liquor (सुराः)’ for Bharat & his army. It means the ‘Date Rape Drugs’ originated from this ancient culture of Hinduism.

A ‘date rape drug’ is any drug that incapacitates another person and renders that person vulnerable to a sexual assault, including rape. Alcohol, consumed voluntarily, is the most commonly used drug involved in sexual assaults. Researchers agree that the drug most commonly involved in drug-facilitated sexual assaults is alcohol, which the victim has consumed voluntarily in most cases. In most jurisdictions, alcohol is legal and readily available and is used in the majority of sexual assaults. Many perpetrators use alcohol because their victims often drink it willingly, and can be encouraged to drink enough to lose inhibitions or consciousness. Sex with an unconscious victim is considered rape in most jurisdictions and some assailants have committed ‘rapes of convenience’, assaulting a victim after he or she had become unconscious from drinking too much.

Source: https://www.survive.org.uk/date-rape.html

And the verses 54-55 are encouraging ‘erotic massage’, and beach fornication. The person providing the massage is called a masseur (male) or masseuse (female).

“Erotic massage is a means through which two people in an intimate relationship touch and stimulate each other, communicate love and tenderness too. Touch and massage, therefore, are the perfect tools for sexual foreplay.”

Source: https://www.counselling-directory.org.uk/memberarticles.html

Now the reader can understand the roots of adultery, being committed in massage parlors and at beaches.

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

 

3. Balkanda, Chapter: 48, Verses: 17-31

On enquiry by Rama, sage Vishwamitra relates the story of Gautama’s curse to his wife Ahalya:

तस्यान्तरं विदित्वा तु सहस्राक्षश्शचीपति:।।1.48.17।।

मुनिवेषधरोऽहल्यामिदं वचनमब्रवीत्।
ऋतुकालं प्रतीक्षन्ते नार्थिनस्सुसमाहिते।।1.48.18।।

सङ्गमं त्वहमिच्छामि त्वया सह सुमध्यमे
मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।।1.48.19।।

मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्।
अथाब्रवीत् नरश्रेष्ठ कृतार्थेनान्तरात्मना।।1.48.20।।

कृतार्थाऽस्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमित: प्रभो।
आत्मानं मां च देवेश सर्वदा रक्ष गौतमात्।।1.48.21।।

इन्द्रस्तु प्रहसन् वाक्यमहल्यामिदमब्रवीत्।
सुश्रोणि परितुष्टोऽस्मि गमिष्यामि यथाऽगतम्।।1.48.22।।

एवं सङ्गम्य तु तया निश्चक्रामोटजात्तत:।
स सम्भ्रमात्त्वरन् राम शङ्कितो गौतमं प्रति।।1.48.23।।

गौतमं तं ददर्शाथ प्रविशन्तं महामुनिम्।
देवदानवदुर्धर्षं तपोबलसमन्वितम्।।1.48.24।।

तीर्थेंदकपरिक्लिन्नं दीप्यमानमिवानलम्।
गृहीतसमिधं तत्र सकुशं मुनिपुङ्गवम्।।1.48.25।।

दृष्ट्वा सुरपतिस्त्रस्तो विवर्णवदनोऽभवत्।
अथ दृष्ट्वा सहस्राक्षं मुनिवेषधरं मुनि:।।1.48.26।।

दुर्वृत्तं वृत्तसम्पन्नो रोषाद्वचनमब्रवीत्।
मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते।।1.48.27।।

अकर्तव्यमिदं तस्माद्विफलस्त्वं भविष्यसि
गौतमेनैवमुक्तस्य सरोषेण महात्मना।।1.48.28।।

पेततुर्वृषणै भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात्।
तथा शप्त्वा स वै शक्रमहल्यामपि शप्तवान्।।1.48.29।।

इह वर्षसहस्राणि बहूनि त्वं निवत्स्यसि।
वायुभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।।1.48.30।।

अदृश्या सर्वभूतानां आश्रमेऽस्मिन्निवत्स्यसि। 1.48.31।

“The thousand-eyed Indra, consort of Sachi, having found an opportunity (during the absence of the ascetic), assumed the guise of the ascetic (Gautama) and said to Ahalya:

‘O most beautiful one those overtaken by passion would not await the completion of the menstrual period (favourable for copulation). O woman of fine waist I desire union with you’.”

“O Delight of the Raghus the evil-intentioned Ahalya, inclined towards the king of the celestials and knowing him to be the thousand-eyed Indra in the guise of the ascetic, consented for the union.”

“O Foremost of men with her heart’s desire fulfilled, Ahalya said: “O Chief of the celestials I’m satisfied. O Lord, quit this place: O Lord of the gods, protect yourself and also me from Gautama in all respects.”

“Indra smilingly said to Ahalya, ‘O One with lovely hipsI am gratified. I shall go away the way I have come’.”

“O Rama he (Indra) came out of the leaf hut quickly after his union with her, apprehensive of Gautama.”

“Subsequently, Indra beheld the great ascetic Gautama, unassailable by devatas and danavas, endowed with the power of asceticism, drenched with sacrificial waters, shining like flaming fire, carrying sacrificial firewood and Kusha grass and preeminent among sages, entering that leaf hut.”

“On seeing him, the face of the Lord of the gods (Indra) turned pale with fear. Having seen the wicked Indra with a thousandeyed in the guise of an ascetic, the gentle sage Gautama got enraged and said:

‘O Wicked natured one assuming my form you have done a forbidden act. For that reason you shall be devoid of scrotum.’

“Cursed thus out of anger by eminent Gautama, the testicles of Indra immediately dropped down on the earth.”

“Having thus cursed Indra, he also cursed Ahalya: ‘You will be staying here for thousands of years without food and subsisting on air, lying down in ashes, doing penance, without being seen by any living beings in this ashrama’.” [Tr. IIT Kanpur]

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=48

Geeta Press Hindi translation:

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These verses have the roots of ‘extramarital sex’, because the lady Ahalya, the wife of Hindu Sage Gautama deceived her husband, and Hindu God Indra went into her. ‘Extramarital sex’ occurs when a married person engages in sexual activity with someone other than his or her spouse. This sin destroyed tranquility and peace of uncountable families. See the results of such stories, the survey says:

“48% of women who had extramarital affairs are moms.”

Source: https://www.newindianexpress.com/cities/hyderabad/2021/mar/04/48-of-women-who-had-extramarital-affairs-are-moms-survey-2271811.html

That’s what the feminists could abstract from the lady Ahalya’s erotic story of Valmiki Ramayana, and they call it ‘Freedom of life’.

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

Now coming to the next chapter of the same story —

 

4. Balkanda, Chapter 49, Verses: 1-9

अफलस्तु ततश्शक्रो देवानग्निपुरोगमान्।
अब्रवीत्त्रस्तवदनस्सर्षिस्सङ्घान् सचारणान्।।1.49.1।।

कुर्वता तपसो विघ्नं गौतमस्य महात्मन:।
क्रोधमुत्पाद्य हि मया सुरकार्यमिदं कृतम्।।1.49.2।।

अफलोऽस्मि कृतस्तेन क्रोधात्सा च निराकृता।
शापमोक्षेण महता तपोऽस्यापहृतं मया।।1.49.3।।

तस्मात्सुरवरास्सर्वे सर्षिस्सङ्घास्सचारणा: ।
सुरसाह्यकरं सर्वे सफलं कर्तुमर्हथ।।1.49.4।।

शतक्रतोर्वचश्श्रुत्वा देवास्साग्निपुरोगमा:।
पितृदेवानुपेत्याहु स्सह सर्वैर्मरुद्गणै:।।1.49.5।।

अयं मेषस्सवृषणश्शक्रो ह्यवृषण: कृत:।
मेषस्य वृषणौ गृह्य शक्रायाऽशु प्रयच्छथ।।1.49.6।।

अग्नेस्तु वचनं श्रुत्वा पितृदेवास्समागता:।
उत्पाट्य मेषवृषणौ सहस्राक्षे न्यवेशयन्।।1.49.8।।

तदा प्रभृति काकुत्स्थ पितृदेवास्समागता:।
अफलान् भुञ्जते मेषान् फलैस्तेषामयोजयन्।।1.49.9।।

Deprived of testicles, Indra with a frightened face addressed hordes of rishis and charanas with agni in the forefront:

‘I have accomplished the objective of the devatas by creating obstacles to Gautama’s austerities, evoking in consequence the wrath of the magnanimous sage’.

‘By his (Gautama’s) wrath I have been deprived of my testicles. She (Ahalya) has been deserted by him. He has lost his ascetic energy through the pronouncement of this great curse’.

‘For that reason, O rishis, charanas and great devatas it is your duty to restore my testicles for the benefit I have given you’.

“Hearing Indra, all the devatas accompanied by maruts. Lead by the Firegod devatas approached and said:

‘This ram (which has received the share of your sacrificial offerings) has testicles. As Indra has been deprived of his own take these testicles immediately and graft them on to Indra’.

“Hearing the words of the Firegod the pitrudevatas assembled uprooted the testicles of the ram and grafted them on to Indra.

“O Son of the Kakutsthas, from then on the pitrudevatas have been accepting rams without testicles as offerings in a sacrifice, with ram’s testicles fitted on to Indra.” [Tr. IIT Kanpur]

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=1&language=dv&field_sarga_value=49

Can any Hindu tell me which type of xenotransplantation is this even modern medical science has not reached it yet!?

 

5. Aranya Kanda, Chapter: 46, Verses: 15-21&27

When Ravana arrives in a saint’s robes and starts praising Sita, he says:

का त्वं काञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि।।3.46.15।।
कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव हि बिभ्रती।

ह्रीः कीर्तिः श्रीश्शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने।।3.46.16।।

भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी।
समाश्शिखरिणस्स्निग्धाः पाण्डुरा दशनास्तव।।3.46.17।।

विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके।
विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ।।3.46.18।।

एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रवल्गितौ।
पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धौ तालफलोपमौ।।3.46.19।।

मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ।
चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि।।3.46.20।।

मनो हरसि मे कान्ते नदी कूलमिवाम्भसा।
करान्तमितमध्यासि सुकेशी संहतस्तनी।।3.46.21।।

का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा वरानने।
वसूनां वा वरावोहे देवता प्रतिभासि मे।।3.46.27।।

 

“Who are you with a golden complexion, clad in yellow silk, and looking like a lotus-pond and wearing an auspicious lotus garland?”

“O lady with a beautiful face, with lovely thighs, are you ‘hri’, shyness personified? Are you the auspicious lovely Lakshmi, the goddess of wealth? Are you the goddess of fame? Are you an apsara? Are you Bhuti, the goddess of fortune? Or are you Rati, the goddess of love moving at your free will?”

“Your teeth are even and pointed, white and beautiful. Your eyes are large and clear and sparkling with dark pupils with a red tinge at the corner.”

Your big hips are stout and strong, Your smooth thighs are like the trunk of an elephant, your breasts adorned with gems, are round and robust like palm fruits and drooping with heaviness with projected stiff nipples, shining and delightful, adding beauty.”

“O lady with an elegant smile, beautiful teeth, lovely eyes you are enticing. Your slender waist can be compassed by my fist. Your hair is beautiful and your large breasts are rubbing against each other. You are capturing my mind just as the flow of water in a river touches its banks.”

“O best of women O lady with beautiful buttocks can you be one of the Rudras or Maruts or Vasus? To me, you appear like a goddess.” [Tr. IIT Kanpur]

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=3&language=dv&field_sarga_value=46

Geeta Press Hindi translation:

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Dear Readers!

Have a look at these obscene verses, and see how this Hindu’s religious book ‘Valmiki Ramayana’ is slaying the significance of religiosity, morality, sanctity, piety and devoutness. Imagine when a Hindu becomes addicted to recitation of such vulgar epics, what kind of beatitude & sainthood he/she adorns of!

I feel genuine shame when see any Hindu talking about pietism & divinity.

Furthermore, it’s not about any common woman. It’s about their Goddess Sita Mata’s figure. Ravan described inflection points of Sita’s body to the extent of explaining her waist-to-hip ratio (WHR).

Even he says: “Your smooth thighs are like the trunk of an elephant”, this vulgar verse is indeed innovating the fornication of ‘thigh show’.

And when he says: “Your breasts adorned with gems, are round and robust like palm fruits and drooping with heaviness with projected stiff nipples, shining and delightful”, and he says: “Your slender waist can be compassed by my fist”, it means he is describing ‘hourglass figure’ of Sita.

Now, Hindus should tell me which type of sacredness is this? What does this vulgar book want to explain about your mother goddess Sita? Would you like to explain such private things about your own mother what your religious book does about your Sita Mata!?

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

Again in —

 

6. Sundar Kanda, Chapter: 15, Verses: 28-29

When Hanuman sees Sita in the form, explained:

पूर्णचन्द्राननां सुभ्रूं चारुवृत्तपयोधराम्।।5.15.28।।
कुर्वतीं प्रभयादेवीं सर्वा वितिमिरा दिशः।

तां नीलकेशीं बिम्बोष्ठीं सुमध्यां सुप्रतिष्ठिताम्।।5.15.29।।
सीतां पद्मपलाशाक्षीं मन्मथस्य रतिं यथा।

“Her face resembled the fullmoon which dispelled the encircling gloom by its radiance. She had a slender waist, beautiful round breasts, shapely eyebrows, red lips, dark hair, and eyes like lotus petals with attractive limbs. She was comparable to Rati, consort of Cupid.” [Tr. IIT Kanpur]

 

Geeta Press Hindi translation:

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Once again in —

7. Sundar Kanda, Chapter: 58, Verse: 65

तं दृष्ट्वाथ वरारोहा सीता रक्षोगणेश्वरम्।
सङ्कुच्योरूस्तनौ पीनौ बाहुभ्यां परिरभ्य च।।5.58.65।।

“On seeing Ravana, the king of demons, beautiful Sita, full of fear hid her face and plump breasts between her thighs.” [Tr. IIT Kanpur]

 

Geeta Press Hind translation:

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Further again in —

8. Yuddha Kanda, Chapter: 48, Verses: 9-11

Seeing her husband and Lakshman slain, Sita, afflicted with grief, burst into bitter lamentation, and says mentioning her body parts:

केशाः सूक्ष्माः समा नीला भ्रुवौ चासंहते मम।
वृत्ते चारोमके जंघे दन्ताश्चाविरला मम।।6.48.9

शंखे नेत्रे करौ पादौ गुल्फावूरू समौ चितौ।
अनुवृत्तनखाः स्निग्धाः समाश्चांगुलयो मम।।6.48.10

स्तनौ चाविरलौ पीनौ मामकौ मग्नचूचकौ।
मग्ना चोत्सेधनी नाभिः पार्श्वोरस्कं च मे चितं।।6.48.11

 

“My hairs are fine, equal, and blue; my eye-brows touch each other; my hips are devoid of down and round; and my teeth are close. My temples, and eyes, hands, feet, ankles, and thighs are equal. And my fingers are furnished with round nails, and are plump and even in the middle. And my breasts are close and firm and developed, and have their nipples sunk. And my navel is depressed, with high sides. And my chest is swelling.” [Tr. Manmanath Dutt]

 

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Another one translates:

“My locks are fine, of even length and dark, my eyebrows meet, my legs are round and smooth, my teeth evenly separated, the corners of my eyes are shaped like the conch, my breasts, bands, feet and thighs well proportioned, my nails smooth and polished, my fingers well-shaped, my breasts touch each other and have depressed nipples, my navel too is deeply indented, my bosom well-formed.”

[Tr. Hari Prasad Shashtri]

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Hindi Translation by Dwaraka Prasad Sharma:

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Geeta Press Hindi translation:

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Can any Hindu explain me why your mother Sita’s plump breasts, wide hips and other erogenous zones are highlighted everywhere? Which sort of devotion is taught here in this religious book?

It is not only the evil Ravana, but even Sita herself has a polluted mouth as well. When the fictitious news of Rama’s death (a trick by Ravana) reaches Sita who is held hostage in Lanka, she laments that her body is no longer of any use because her husband has been slain; however, Sita also mutters about all the voluptuous features of her body.

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

 

9. Kishkindha Kand, Chapter: 66, Verses: 10-20

Description of Hanuman’s birth goes on, and starts with how Windgod (वायु देवता) impregnated Hanuman’s mother Anjana, the wife of Kesri. Jambavan (divine-king of bears) tells Hanuman:

दुहिता वानरेन्द्रस्य कुञ्जरस्य महात्मनः।
मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी।।4.66.10।।

विचित्रमाल्याभरणा महार्हक्षौमवासिनी।
अचरत्पर्वतस्याग्रे प्रावृडम्बुदसन्निभे।।4.66.11।।

तस्या वस्त्रं विशालाक्ष्याः पीतं रक्तदशं शुभम्।
स्थितायाः पर्वतस्याग्रे मारुतोऽपहरच्छनैः।।4.66.12।।

स ददर्श ततस्तस्या वृत्तावूरू सुसंहतौ।
स्तनौ च पीनौ सहितौ सुजातं चारु चाननम्।।4.66.13।।

तां विशालायतश्रोणीं तनुमध्यां यशस्विनीम्।
दृष्टवैव शुभसर्वाङ्गीं पवनः काममोहितः।।4.66.14।।

स तां भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां पर्यष्वजत मारुतः।
मन्मथाविष्टसर्वाङ्गो गतात्मा तामनिन्दिताम्।।4.66.15।।

सा तु तत्रैव सम्भ्रान्ता सुव्रता वाक्यमब्रवीत्।
एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति।।4.66.16।।

अञ्जनाया वच्शुत्वा मारुतः प्रत्यभाषत।
न त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत्ते सुभगे भयम्।।4.66.17।।

मनसाऽस्मि गतो यत्त्वां परिष्वज्य यशस्विनीम्।
वीर्यवान्बुद्धिसम्पन्न: पुत्रस्तव भविष्यति।।4.66.18।।

महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः।
लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति हि मत्समः।।4.66.19।।

एवमुक्ता ततस्तुष्टा जननी ते महाकपे।
गुहायां त्वां महाबाहो प्रजज्ञे प्लवगर्षभम्।।4.66.20।।

 

“She was the daughter of a great king of monkeys called Kunjara. That young and beautiful lady had assumed a lustrous human form decked with wonderful garlands, ornaments and silk clothes and was roving on top of the mountain which appeared like a proud raincloud.”

While the large-eyed lady was stationed on the mountain top, the Windgod gently let her auspicious yellow garment with red border fly away.”

“Then he (Windgod) saw her curved, well-set thighs, her beautiful plump breasts and her lovely pleasing face.”

“On seeing the broad hips, slender waist and beautiful limbs of that famous lady the Windgod was infatuated.”

“The Windgod lost his control over himself. His whole being was overpowered by love for her beautiful, flawless body. He embraced her with his long arms.”

“She was bewildered by this and being chaste and strict observer of chastity she said, ‘Who is it that has destroyed my monoandry?”

“On hearing Anjana’s words, the Windgod replied, ‘ O auspicious lady, I do you no harm, O lady of beautiful hips. I reached (enjoyed) you in mind, not body. You need not fear.'”

“O renowned lady I have embraced you and united with you mentally (enjoyed you without physical contact).You will bring forth a son endowed with great wisdom and courage.”

“He will be very powerful, illustrious and will be of great valour and strength. He will be my equal in leaping and flying’.”

“O great monkey O strongshouldered one having been assured that way, your mother was pleased and delivered you, a bull among monkeys, in a cave.” [Tr. IIT Kanpur]

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/sloka?field_kanda_tid=4&language=dv&field_sarga_value=66

Geeta Press Hindi translation:

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Dear Readers!

Are you having a look at these sexually explicit, profane and dirty stories of Valmiki Ramayana!?

Verse no. 11 and 12 talk about ‘Clothing Fetishism’, and the last part of the verse 12 is talking about ‘clothes off sex’ when it says: “The Windgod gently let her auspicious yellow garment with red border fly away.”

Now ‘eye sex’ by Windgod started in verse no. 13 and continues with ‘leg show’, ‘thigh show’, ‘breast show’, and staring at ‘broad hips’ & ‘slender waist’ in verse 14. This ends in verse 15 to 20 with ‘holding hand’, ‘hugging’, ‘impregnation’ and birth of Hanuman in a cave. It isn’t any secret that the Vedas and Puranas are full of sexual tales, essentially these are hardcore pornographic literature. But I never expected such things from Valmiki Ramayana.

I am questioning again: “Why are the full swelling breasts of your mother Sita and Anjana highlighted in this religious text, and their other erogenous body parts as well? Would you like to mention the same about your own mother?”

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

Now, Rama’s body parts explained —

 

10. Sundar Kanda, Chapter: 35, Verse: 17

While requested by Sita, Hanuman explains bodily symbols of Rama:

त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिसमस्त्रिषु चोन्नतः।
त्रिताम्रस्त्रिषु च स्निग्धो गम्भीरस्त्रिषु नित्यशः।।5.35.17।।

Word by word translation by IIT Kanpur:

त्रिस्थिरः has the three stiff limbs (chest, fist and wrists), त्रिप्रलम्बश्च long in three (arms, eyebrows and scrotum), त्रिसमः has three even parts (locks of hair, knees and testicles), त्रिषु elevated in three parts (abdomen, navel and chest), उन्नतः raised, त्रिषु च all the three parts (soles, nails and eyes), स्निग्धः has coppery reddish colour, नित्यशः all over, त्रिषु in the three parts (the underlines of feet, the hair and the reproductive organs), गम्भीरः is majestic.

[He has three stiff parts, three long parts, three even parts, three shining parts, elevated in three parts, has three raised parts, his body has lines in three parts and is of coppery reddish colour in three parts. He has a majestic look.]

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/content?language=dv&field_kanda_tid=5&field_sarga_value=35&field_sloka_value=17

Geeta Press Hindi translation:

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Hindi translation by Dwaraka Prasad Sharma:

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Now, happens the genocide of all sorts of morality, when the sex organs of gods are lifted up by their devotees. Even if a tongue recites these pornographic verses, it will scold itself: ‘Shut the hell up!’

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

 

11. Ayodhya Kanda, Chapter: 19, Verse: 7

Hindu god Rama tells Kaikeyi (mother of Bharat) that had she (or his father) simply asked him, he’d have gladly given away (his right to) the kingdom & everything he possessed, including Sita, to half-brother Bharata:

अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान्धनानि च।
हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरतायाप्रचोदितः।।2.19.7।।

“Unurged, I would have gladly given to Bharata the kingdom, wealth, my most coveted life, and even Sita.” [Tr. IIT Kanpur]

Source: https://www.valmiki.iitk.ac.in/content?language=dv&field_kanda_tid=2&field_sarga_value=19&field_sloka_value=7

Geeta Press Hindi translation:

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I would like to ask which type of ‘spousal abandonment’ is this? And why was the Hindu concept of ‘सात जन्मों का रिश्ता (relationship of seven births)’ forgotten by Rama?

But don’t forget: “Valmiki Ramayana is a religious book of Hindus.”

Hindus claim: “Their scriptures are factual story-teller.”

I say: Being fictional or factual does not matter, the authenticity given by scholars matters.

Hindu frauds like Narsinhanand Saraswati & Pushpendra Kulshreshtha who have venomous mouth against other religious personalities and addicted of mental intoxication when talk about other religions, are bound to answer:

“If your religious books indeed say what I quoted above, what is the difference between your these sacred texts and top-shelf magazines?”

“If it is religious epic, what problems you Hindus face in accepting ‘adult magazines’ as your holy books?”

“After seeing such nudity, the Ramayana should lead the list of well-known erotic magazines like ‘Playboy’, ‘Penthouse’, ‘Playgirl’ and ‘Hustler’. If yes, I agree. If not, why?”

Conclusively, instead of just throwing stones at everything we Muslims propose, why don’t you Hindus contribute some constructive suggestions for a change in yourself? Due to the intense hatred, all you Hindus do is throw stones. You are all over us about our divine faith Islam, but you start pouting when we point out that you have such and such things in your sacred texts! What, you can dish it out, but you can’t take it!? Hindu fanatics also must stop throwing bone to common Hindus by acknowledging the need for their help.

Qur’ān 85:8 tells about the peaceful reason behind their hatred:

“And what did they dislike from the Muslims, except that the Muslims accepted faith in Allah the Most Honourable, the Most Praiseworthy?” [Tr. Kanzul Īmān]

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ईश्वर की प्रतीक विधान प्रतिमा-

ईश्वर सार्वजनिक विषय नहीं है । ईश्वर को मानना भी अपने ऊपर आस्थाओं की चादर डालना है।

उससे केवल मन की उन्मुक्तता और उत्श्रृँखलता पर तो नियन्त्रण किया जा सकता है। परन्तु ईश्वर को नहीं जाना जा सकता है।

क्योंकि वह निराकार और अनन्त है।  जन साधारण की बुद्धि से परे इसी लिए ईश्वरीय प्रतीक के रूप में मूर्ति या ईश्वर की कल्पित प्रतिमा की स्थापना की गयी जो वस्तुत श्रद्धा केन्द्रित करने का अवलम्बन मात्र थी ।

"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।39। (श्रीमद्भगवद्गीता चतुर्थ अध्याय-)
 
अनुवाद:- जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

श्रद्धा से से भी मनस् -शुद्धि द्वारा ज्ञान की ही प्राप्ति होती है।

जन्म और मृत्यु परिवर्तन के ही प्रवाह हैं! न तो आत्मा जन्म ही लेती है और ना ही मरती है।
परन्तु मन जो आत्मा और प्रकृति का मिश्रित रूप है
जागता सोता मरता और जीता है।
ईश्वर आदि ( प्रारम्भ) और अन्त से रहित असीम अस्तित्व है। जिसकी आँशिक अनुभूति तो सम्भव है परन्तु सम्पूर्ण अस्तित्व का दर्शन सम्भव और अनुभूति गद्य नहीं है।
फिर जन साधारण के लिए उसकी व्याख्या भी नहीं की जा सकती है।
अहं( ईगो) जीवन की सत्ता है अहंकार से संकल्प और संकल्प से इच्छाओं का प्रादुर्भाव ही जीवन के लिए उत्तरदायी है।
परन्तु स्व ( स्वयं) रूप ही आत्मा का अस्तित्व बोधक है।

अहं से हम और हम के भाव से स्व( आत्मा) की और जीवन के अग्रसर होने के लिए केवल कृष्ण ने निष्काम( कामना अथवा इच्छा रहित -) कर्म की प्रेरणा दी
अहं जहाँ जीवन को सीमित दायरे में संकुचित और सीमित करता है वहीं स्व का भाव बोध असीम की और अनन्त की अनुभूति का कारण है।

वैदिक काल में भी प्रतिमा शब्द इसी अर्थ में रूढ़ हो गया था।

"कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्।
छन्दः किमासीत्प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे ॥३॥( ऋग्वेद १०/१३०/३)

“{प्रमा= प्रमाणम्} 
“प्रतिमा = हविष्प्रतियोगित्वेन मीयते निर्मीयते इति प्रतिमा देवता ।

परन्तु मूर्ति पूजा तो एक श्रद्धा का निमित्ति कारण है।दर-असल   ईश्वर को  जानना ही श्रेयकर है।

ईश्वरीय सत्ता का आंशिक ज्ञान भी तभी सम्भव है जब अन्त:करण चतुष्टय  पूर्णत: दुर्वासना से रहित हो जाए  ! हमारी वासनाओं के आवेग ही मन में लालच की तरंगे पैंदा करते रहते हैं। जो दर्पण को मलिन करती रहती हैं। 

अन्त:करण एक दर्पण के समान स्वच्छ हो जाए तो साधक ईश्वरीय आंशिक सत्ता की तात्विक अनुभूति सहज कर लेता है।  ईश्वर की पूर्ण सत्ता का अनुभव तो स्वयं ईश्वर भी नहीं कर पाता है।  यही ईश्वरीय असमर्थता है। ईश्वर नाम से अभिहित तत्व स्वयं में अपरिमेय है।

उसके अनन्त अस्तित्व तो मापने का  कोई उपमान अथवा मानक  ही नही है।
 पूर्ण ईश्वर को किसी ने नहीं देखा उसको जानने के सिद्धान्त ही शेष रह जाते हैं। साधक भी ईश्वरीय" सत्ता का आँशिक अनुभव करता है।

वह ईश्वर अपने आप में पूर्ण " अनन्त और अपरिमेय सत्ता है । 

भारतीय मनीषीयों ने अपने साधना काल में उसकी एक आँशिक झलक अनुभत की थी 
तब यह कहा -

"पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

वह ईश्वर अनन्त है, और यह (ब्रह्माण्ड) अनन्त है। अनन्त से अनन्त की प्राप्ति होती है। (तब) अनन्त की अनंतता लेते हुए, भी वह अनंत के रूप में भी अकेला रहता है।

जिस प्रकार गणितीय प्रक्रिया में शून्य से शून्य को घटाया जाता है तो परिणाम शून्य ही आता है। उसी रूप मे ईश्वरीय अनन्तता को समझा जा सकता है।

इसी लिए उस अनन्त अपरिमेय आत्मिक सत्ता को सजीव और निर्जीव से भी पृथक शून्य ( ∅ ) रूप में  उपमित किया गया जिसमें अनन्त काल तक आप परिक्रमण करते रहो कोई अवरोध नहीं आयेगा- आप जीवन पर्यन्त निरन्तर चलते रहोगे -पर उसका कभी गन्तव्य अवरोध नहीं आयेगा-

हमारे सारे धार्मिक उपक्रम मन के शुद्धि करण के उपाय मात्र हैं। यदि यज्ञ अथवा किसी देवता की पूजा करने से अथवा तीर्थ यात्रा अथवा मन्दिर आदि के  द्वारा  मन न शुद्ध हो सके तो ये सारे उपक्रम व्यर्थ ही हैं।

ईश्वरीय सत्ता के अन्वेषण अथवा अनुभूति के इसलिए साधक को निरन्तर मन के शुद्धि करण हेतु तप "संयम " और योग अभ्यास भी करना चाहिए 
प्राचीन काल में साधक ही साधु संज्ञा के अधिकारी होते थे। 

और सन्त भी  पूजा( साधना ) करने वाले होते थे।
अरबी भाषा में प्रचलित शब्द (सनम) देव मूर्ति का वाचक है। 
दरअसल जब लोग ईश्वरी सत्ता की परिकल्पना करते थे तो वे किसी इमेज के रूप में मूर्ति भी  बनाते थे।

अरब  का यह सनम शब्द हिब्रू" अक्काडियन और अनेक सैमेटिक भाषाओं में कही  सनम- तो कहीं  "सलम आदि रूपों में प्रचलित है। 

वैदिक तथा लौकिक संस्कृत में षण्-(सन्) धातु भ्वादिगणीय है। और दूसरी धातु सल्(शल्,) भी है जो स्तुति गमन और पार होने के अर्थ में प्रचलित है। षन् धातु का 
लट् लकार (वर्तमान) में  रूप निम्नलिखित हैं ।

एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः सनति सनतः सनन्ति
(वह पूजा करता है/ वे दोनों पूजा करते हैं/ वे सब पूजा करते हैं।

मध्यमपुरुषः सनसि सनथः सनथ
( तू पूजा करता है/ तुम दोनों पूजा करते हो/तुम सब पूजा करते हो/

उत्तमपुरुषः सनामि सनावः सनामः
( मैं पूजा करता हूँ/ हम दोनों पूजा करते हैं/ हम सब पूजा करते हैं/

मूर्तियों या निर्माण निराकार ईश्वर के साकार प्रतीक के विधान के तौर पर जन साधारण के लिए किया गया था।
अरबी में 
 صنم فروش ( सनम-फ़रोस- , " मूर्ति विक्रेता )        (
है।

सेमिटिक मूल का ‘"सनम’ صنم शब्द बनता है स्वाद-नून-मीम ص ن م तीन वर्णो  से मिलकर यह शब्द बनता है।।

इस्लाम से पहले सैमेटिक संस्कृति मूर्तिपूजक थी मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति  बुतपरस्ती  के माध्यम से  ही प्रकट होती रही है।

प्रतीक, प्रतिमा, सनम या बुत तब तक निर्गुण-निराकारवादियों को नहीं खटकते जब तक वे धर्म के सर्वोच्च प्रतीक के तौर पर पूजित न हों।
मूर्ति पूजा या विधान जनसाधारण के लिए था।

"सनम" का सन्दर्भ भी प्रतिमा के ऐसे ही रूप का है। कुरान की टीकाओं व अरबी कोशों भी सनम को “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” के तौर पर ही व्याख्यायित किया गया है।

अनेक सन्दर्भों से पता चलता है कि "सनम" का व्युत्पत्तिक आधार हिब्रू भाषा का है और वहाँ से अरबी में दाखिल हुआ।

हिब्रू में यह स-ल-म अर्थात( salem) है  एक स्तुति वाचक शब्द है।

जिसमें बिम्ब, छाया अथवा प्रतिमा का आशय है। इस्लाम से पहले काबा में पूजी जाने वाली प्रतिमाओं के लिए भी" सनम शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। 

चूँकि “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध है इसलिए सनम, सनमक़दा और सनमपरस्ती का उल्लेख इस्लामीय शरीयत  के परवर्ती सन्दर्भों में तिरस्कार के नज़रिये से ही प्रचलित हुआ  है।

प्राचीन सेमिटिक भाषाओं में अक्काद प्रमुख संस्कृति है जिसकी रिश्तेदारी हिब्रू और अरबी से रही है। 

उत्तर पश्चिमी अक्काद और उत्तरी अरबी के शिलालेखों में भी सनम का (‘स-ल-म)’ रूप मिलता है। 
दरअसल न और ल में बदलाव  की प्रवृत्ति भारतीय आर्यभाषाओं में भी होती रही है।

मिसाल के तौर पर पश्चिमी बोलियों में लूण ऊत्तर-पूर्वी बोलियों में नून, नोन हो जाता है। इसी तरह नील, नीला जैसे उत्तर-पूर्वी उच्चार पश्चिम की राजस्थानी या मराठी में जाकर लील, लीलो हो जाते हैं।
यही बात सलम के सनम रूपान्तर में सामने आ रही है।

इस सन्दर्भ में S-l-M से यह भ्रम हो सकता है कि इस्लाम की मूल क्रिया धातु s-l-m और सनम वाला s-l-m भी एक है।

दरअसल इस्लाम वाले स-ल-म में (सीन-लाम-मीम س ل م‎ है ! 

जिसमें सर्वव्यापी, सुरक्षित और अखंड सलामती जैसे भाव हैं। जाहिर है ये वही तत्व हैं जिनसे शांति उपजती है।
अत: सल् ( शल्) पार करना - स्तुति करना आदि अर्थ लेकर संस्कृत धातुपाठ में भी उपस्थित है।

जबकि प्रतिमा के अर्थ वाले स-ल-म का मूल स्वाद-लाम-मीम है।

ख़ास बात यह कि प्राचीन सामी सभ्यता में देवी पूजा का बोलबाला था।

लात, मनात, उज्जा जैसी देवियों की प्रतिमाओं की पूजा प्रचलित थी। इसलिए बतौर सनम अनेक बार इन देवियों की प्रतिमाओं का आशय रहा। 

बाद के दौर में सनम प्रतिमा के अर्थ में रूढ़ हो गया।

इस सिलसिले की दिलचस्प बात ये है कि जहाँ बुत, मूर्ति या प्रतिमा जैसे शब्दों का प्रयोग ‘प्रियतम’ के अर्थ में नहीं होता मगर प्रतिमा के अर्थाधार से उठे शब्द में किस तरह प्रियतम का भाव भी समा गया।

संस्कृत धातु पाठ में सन् - धातु का अर्थ पूजा-करना भी है।

यहाँ समझने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में ईश्वर आराधना की प्रमुख दो पद्धति रही हैं- पहली है सगुण  अथवा साकार और दूसरी है निर्गुण अथवा निराकार।

सगुण (साकार)  पद्धति में ईश्वर की उपासना करने वाले समूह में भी प्रतिमा, उस परमशक्ति का रूप नहीं है।
जिस प्रतीक को परमशक्ति माना गया, उसकी प्रतिमा को  मात्र  ईश्वर की मानकर पूजा जाता है।

भारतीय पुराणों में ब्राह्मा के चार पुत्र 
सनत" सनत्कुमार" सनातन" सनन्दन " के नामों में भी यह सन् धातु समाविष्ट है।
चारो शब्दों की व्युत्पत्ति " सन्= पूजायां धातु परक है।

सन्त: शब्द के मूल में भी यही सन् धातु समाविष्ट है 
मत्स्यपुराण के अनुसार संत शब्द की निम्न परिभाषा है :

ब्राह्मणा: श्रुतिशब्दाश्च देवानां व्यक्तमूर्तय:।
सम्पूज्या ब्रह्मणा ह्येतास्तेन सन्तः प्रचक्षते॥
अनुवाद:-
ब्राह्मण ग्रंथ और वेदों के शब्द, ये देवताओं की निर्देशिका मूर्तियां हैं। जिनके अंतःकरण में इनके और ब्रह्म का संयोग बना रहता है, वही सन्त कहलाते हैं।

मनोज्ञैस्तत्र भावैस्ते सुखिनो ह्युपपेदिरे ।
अतः शिष्टान्प्रवक्ष्यामि सतः साधूंस्तथैव च ।१९ ।
सदिति ब्रह्मणः शब्दस्तद्वंतो ये भवंत्युत ।
साजात्याद्ब्रह्मणस्त्वेते तेन सन्तः प्रचक्षते ।२०। 
सन्दर्भ:-
(ब्रह्माण्डपुराण /पूर्वभागः/अध्यायः ३२)

सन्त' शब्द 'सत्' शब्द के कर्ताकारक का बहुवचन है। इसका अर्थ है - साधु, संन्यासी, विरक्त या त्यागी पुरुष या महात्मा आदि अर्थ है।

सच्छब्दस्य प्रथमाबहुवचनान्तरूपञ्च ॥  
(यथा -रघुःवंश महाकाव्य । १।१०। 

रघुवंशम्-1.10

श्लोकः-" तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति सदसद्व्यक्तिहेतवः।
हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा ॥1.10॥
अनुवाद:-
उस वंश को सुनने को सत्य असत्य का निर्णय करने वाले सन्त ही योग्य है। 
सोने की पवित्रता और कलौंच अग्नि ही में देखी जाती है ॥१.१०॥

एक अन्य ग्रन्थ विश्वामित्रसंहिता- के अध्याय 27 के श्लोक 42 में "सन्त" की परिभाषा निम्नलिखित है।

एककालं बलेर्हानौ द्विगुणं च बलिं हरेत् ।
कुर्याच्च पूर्ववच्छेषमिति सन्तः प्रचक्षते ॥ 42॥

प्रस्तुतिकरण :- यादव योगेश कुमार रोहि-
8077160219-

बुधवार, 14 जून 2023

भारत की आत्मा गाँवों में गाँवों की आत्मा ये किसान!

भारत की आत्मा गाँवों में 
गाँवों की आत्मा ये किसान!

अन्न के दाता प्रकृति है माता
घर में भरा है धन -धान्य !!

गाँवों में आते हैं  भिखारी
बाज़ीगर और कभी मदारी।

चैत वैशाख का आया महीना
अन्न किसानों का सब छीना।

खाद"  बीज और खेत- बुबाई।
आधा अनाज बिक जाता भाई।।

रोज द्वार पर भिक्षुक आते
एक तिहाई वे ले जाते।

झाड़ घटक ता ही बस मिलता
और एक चौथाई चूहे ले जाते।।

किसान ही सबसे भला है।
संघर्षों का ये  पुतला है । 
चला जा रहा उसी राह पर 
फिर भी ये कहाँ सम्हला है।

प्रस्तुतिकरण:- 
यादव योगेश कुमार "रोहि" -8077160219-

आज भागवत कथाऐं किस रूप में -


भागवत कथाओं के आयोजन आज  पैसे कमाने और समाज में अश्लीलता को धर्म की चादर में लपेटे हुए मनोरंजन क्लब हैं। 

कथावाचक केवल थोड़ा देशी तरजों पर हारमोनियम बजा लेते हैं और गा लेते हैं परन्तु उन्हें न तो संस्कृत का  ज्ञान है न संस्कृति और शास्त्रों का तो कोई ऑथेण्टिक ज्ञान है ही नहीं ।

भागवत में ये नाम के शास्त्री  केवल उन्हीं प्रसंगों को साप्ताहिक आयोजन में लेते हैं जिनसे चढ़ावा आये - जैसे कृष्ण जन्म- सुदामा कृष्ण मिलन" रुक्मिणी विवाह आदि आदि -

और इनकी फीस कम से कम पचास हजार से प्रारम्भ होकर पन्द्रह सोलह लाख तक है।

समाज के चारित्रिक उत्थान के लिए और उसके आध्यात्मिक ज्ञान के लिए कोई प्रसंग ये नहीं  लेते हैं 

जबकि भागवत पुराण में अनेक आध्यात्मिक प्रसंग हैं  सांख्य योग" भक्ति योग" और ज्ञान योग की मीमांसा भागवत में  है।

शास्त्री भी आज राधा और कृष्ण के नाम पर समाज के नव युवको और युवतियों को नचाते और उनकी कामवासनाओं में  घी डालते रहते हैं।

दरअसल ये कम जानकार केवल हारमोनियम छाप शास्त्री भी प्राय: स्वयं भी लंगोटी के कच्चे और चरित्र से डिगे हुए होते हैं ।

आल्हा के कड़के गाकर ये दान दाता के नाम पर नौजवानों का उत्साह बढ़ाते हैं । 

राधा का भागवत में वर्णन नहीं है परन्तु अन्य प्राचीन अथवा समकालिक पुराणों में वर्णन है।
यद्यपि राधा व्रज की अधिष्ठात्री भक्ति स्वरूपा हैं 
फिर भी ये राधा के नाम पर अश्लीलता ही फैलाते हैं। और तो और भागवत के साप्ताहिक आयोजन से  केवल जनता का मनोरंजन और नये लड़कों का सैटिंग प्लान जरूर हो जाता है विशेषत: ग्रामीण समाज में तो यही चल रहा है।

भारतीय पुराणों में स्वच्छ गंगाजल के साथ साथ कहीं कहीं  कुछ कचड़ा भी समाविष्ट है । क्योंकि परवर्ती काल में जोड़ तोड़ होने से ये विकृति आयी

यद्यपि भारतीय  शास्त्र हमारे सांस्कृतिक व्याख्याता हैं परन्तु  जिनमें प्राचीन समाज में घटित घटनाओं का अतिश्योक्ति पूर्ण काव्यात्मक वर्णन है।
जिसमें स्वच्छ गंगाजल के साथ कुछ कूड़ा कर कट भी है।

आवश्यकता है केवल गंगाजल को ग्रहण करने की

 परन्तु  व्यक्ति गंगाजल को ही कैसे ग्रहण करे 
अब धर्म विवेचना व्यक्ति कर नहीं सकता क्योंकि उसने जीवन के अधिकांश समय को केवल पैसे कमाने और  मोजमस्ती करने और अनैतिकता में ही व्यतीत कर दिया है।
अब वह जल्दी में वास्तविक धर्म को नहीं जान पाता उसका अन्त करण अनेक दुर्वासनाओं से दूषित है। परन्तु जीवन के पापपूर्ण कारनामों कि उसे कुछ आभास होता रहता है इस लिए वह अपने पापों को कम करने के लिए धर्म की शरण लेता है।

वर्तमान में धर्म तत्व के विवेचक कम लोग हैं जो समाज में मंचों पर नहीं आते हैं। केवल एकान्त साधना में जीवन व्यतीत करते हैं। और धर्म के नाम पर आज नकली धर्मगुरु भगवा वेष में समाज में पुजते और ऐष आराम की जिन्दगी बसर कर रहे हैं। 

इनको देखकर कुछ लोग धर्म यही समझ कर आलोचना करते हैं। मेरे विचार से ये दोनों ही एक जैसे हैं। एक सच देखना नहीं चाहता है और दूसरा सच दिखाना नहीं चाहता है।

धर्म कभी समाप्त होने वाली व्यवस्था नहीं है परन्तु समय  देश और परिस्थितियों के अनुरूप धर्म के सिद्धान्त भी बदल जाते हैं। और इसी लिए समय समय पर वह ईश्वरीय सत्ता  विशेष मानवों को नियुक्त करती है। कृष्ण ने धर्म की विवेचना युग के अनुरूप की थी और उद्घोष किया था ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66। श्रीमद्भगवद्गीता

। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।




पुनः पुनर्विचार करें!

'कथा की व्यथा'
*************

पकी फसल घर आते ही
भोला किसान बौराता है।
वो धर्म के धन्धे बाजों की
साजिश में फंस जाता है।।

लगी नौकरी बेटे की या
घर बच्चे का जन्म हुआ।
बोल भागवत देता है
खिलवाऊँगा मैं मालपुआ।।

बजे नगाड़ा सात दिवस
खूब होंय लटके झटके।
कान्हा संग राधा नाच रहीं
क्यों नहीं युवा युवती भटके।।

जब रुक्मणि और सुभद्रा का
प्रेमप्रसंग युवतियां सुनती हैं।
कृष्णार्जुन को आदर्श मान
अनुसरण उन्हीं का करती हैं।।

पाखण्ड बहुत ही फैल रहा
कपोल कथाएं सुन-सुन के।
शोषण होने पर आँख खुले
फिर पछताते सिर धुनधुन के।।

भक्ति में भटका हुआ ग्वाल
नित गोपी के संग नाँच रहा।
अंधविश्वास की चौखट पर
अपनी किस्मत को जाँच रहा।।

ध्वनिप्रदूषण हो हद से ज्यादा
कानों में आवाज पड़े पैनी।
छात्रों की शिक्षा हो बाधित
बीमारों की बढ़ती बेचैनी।।

पॉलीथिन बिछा ट्रॉली में
गर्म खीर भर दी जाती।
फिर प्लास्टिक पात्रों में ही
सब्जी खीर परोसी जाती।।

प्लास्टिक का केमिकल
गर्मखाद्य में घुल जाता है।
पहुँच पेट में 'ब्रोमोनाइड'
केंसर कारक बन जाता है।।

खा-खा करके माल पुआ
तन रोगग्रस्त हो जाता है।
मालामाल चिकित्सक हों
लुट माल हमारा जाता है।।

ढोल ढमाके संग नांचकूद
फिर घड़ाविसर्जन करते हैं।
गाल गुलाल गोपी ग्वाल 
मल-मल मनमानी करते हैं।।

नित युवा नहर में डूब रहे
जीतेजी बाप मर जाता है।
बिलख रहीं माता बहिनें
घर में मातम छा जाता है।।



वीडियो शीर्षक: कथा की व्यथा - धर्म या दिखावा?

वीडियो की रूपरेखा (Video Outline):

  • वीडियो की अवधि: 3-4 मिनट
  • शैली: वृत्तचित्र (Documentary) शैली, गंभीर और प्रभावशाली आवाज (Voice-over)।

​पटकथा (Script):

(दृश्य 1: शुरुआत)

  • दृश्य: स्क्रीन पर 'कथा की व्यथा' शीर्षक उभरता है। पृष्ठभूमि में एक ग्रामीण परिवेश का दृश्य, जहाँ एक किसान अपनी कटी हुई फसल को घर ला रहा है।
  • वाचक (Voice-over): क्या धर्म का अर्थ केवल ढोल-नगाड़े और दिखावा है? क्या हमारी भक्ति हमें सही मार्ग दिखा रही है या हम किसी गहरे चक्रव्यूह में फंसते जा रहे हैं? आज हम बात करेंगे 'कथा की व्यथा' पर।

(दृश्य 2: दिखावे की साजिश)

  • दृश्य: किसान को कुछ चतुर लोगों से घिरे हुए दिखाया जाए जो उसे बड़े आयोजन के लिए उकसा रहे हैं।
  • वाचक: फसल घर आती है तो किसान खुशी मनाना चाहता है, लेकिन यहीं से शुरू होती है धंधेबाजों की साजिश। नौकरी मिलने पर या घर में खुशी आने पर, लोग 'मालपुए' का लालच देकर उसे पाखंड के जाल में फंसा लेते हैं।

(दृश्य 3: मर्यादाओं का हनन और युवा पीढ़ी)

  • दृश्य: कथा पांडाल में तेज संगीत, फिल्मी गानों पर नृत्य और युवा पीढ़ी का उन पर थिरकना।
  • वाचक: सात दिनों तक बजते नगाड़े, अश्लील लटके-झटके और कृष्ण-राधा के नाम पर परोसी जा रही आधुनिक विकृतियाँ। क्या हमारी नई पीढ़ी यहाँ से संस्कार ले रही है या दिग्भ्रमित हो रही है? आदर्शों के नाम पर प्रेम प्रसंगों का गलत चित्रण युवाओं की सोच को बदल रहा है।

(दृश्य 4: स्वास्थ्य और पर्यावरण का संकट)

  • दृश्य: कथा के बाद जूठी प्लास्टिक की प्लेटें, कचरे के ढेर और प्लास्टिक में परोसी जा रही गर्म खीर-सब्जी।
  • वाचक: और अब बात करते हैं उस अदृश्य जहर की। गर्म खीर प्लास्टिक के बर्तनों में? यह 'ब्रोमोनाइड' जैसा केमिकल सीधे आपके पेट में जाकर कैंसर का कारण बन रहा है। एक तरफ धर्म के नाम पर स्वास्थ्य लुटाया जा रहा है, और दूसरी तरफ मालामाल हो रहे हैं निजी चिकित्सक।

(दृश्य 5: सामाजिक दुर्दशा)

  • दृश्य: विसर्जन के समय की अफरा-तफरी, नहरों में डूबते युवाओं के फुटेज (सांकेतिक)।
  • वाचक: शोर का प्रदूषण छात्रों की पढ़ाई को बाधित कर रहा है, बीमारों की बेचैनी बढ़ा रहा है। और अंत में, विसर्जन के नाम पर नहरों में डूबते युवा—यह धर्म नहीं, बल्कि परिवारों का उजड़ना है।

(दृश्य 6: निष्कर्ष/आह्वान)

  • दृश्य: एक शांत, विचारशील चेहरा जो दीपक जलाकर कुछ सोच रहा है। अंत में स्क्रीन पर संदेश: "भक्ति मन में होती है, प्रदर्शन में नहीं।"
  • वाचक: अंधविश्वास की चौखट पर अपनी किस्मत आज़माने से बेहतर है कि हम धर्म के वास्तविक अर्थ को समझें। पाखंड को छोड़ें, विवेक को अपनाएं। सोचने का समय आ गया है—क्या आपकी 'भक्ति' वाकई आपको शांति दे रही है, या सिर्फ 'व्यथा'?

वीडियो सुझाव:

  1. संगीत: शुरू में ग्रामीण धुन रखें जो धीरे-धीरे गंभीर और चेतावनी भरी ध्वनि में बदल जाए।
  2. दृश्य: स्टॉक फुटेज (Stock Footage) का उपयोग करते समय वास्तविकता और विसंगति के बीच का अंतर दिखाएं।
  3. टोन: आवाज़ में तंज (Sarcasm) और संवेदना (Empathy) का मिश्रण होना चाहिए ताकि दर्शक कविता के दर्द को महसूस कर सकें।

​आशा है कि यह पटकथा आपके लेख के संदेश को प्रभावी ढंग से प्रसारित करने में मदद करेगी।

वीडियो शीर्षक: धर्म या 'इवेंट मैनेजमेंट'?—आध्यात्मिक पतन की एक कड़वी सच्चाई

वीडियो की रूपरेखा:

  • शैली: गंभीर, विश्लेषणात्मक (Analytical) और निडर।
  • संगीत: धीमी, गंभीर और सस्पेंस पैदा करने वाली पृष्ठभूमि।
  • दृश्य: एक तरफ शांत मंदिरों की फुटेज, दूसरी तरफ शोर-शराबे वाले कथा पांडालों का तुलनात्मक चित्रण।

​पटकथा (Script)

(दृश्य 1: प्रस्तावना)

  • दृश्य: स्क्रीन पर एक तरफ भागवत पुराण की पुस्तक और दूसरी तरफ नाचते-गाते युवाओं की धुंधली फुटेज।
  • वाचक: क्या धर्म का उद्देश्य केवल सात दिनों का मनोरंजन है? आज हमारे गांवों और शहरों में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हो रहा है या 'इवेंट मैनेजमेंट' के नाम पर किसी 'मनोरंजन क्लब' का संचालन? आज हम बात करेंगे उस 'कचरे' की, जो 'गंगाजल' रूपी शास्त्रों में मिला दिया गया है।

(दृश्य 2: 'हारमोनियम छाप' शास्त्री और व्यापार)

  • दृश्य: हारमोनियम लिए हुए कुछ कथावाचकों के वीडियो क्लिप्स। ग्राफिक्स में फीस के आंकड़े—"50,000 से 16 लाख तक"।
  • वाचक: आज के 'कथावाचक' न तो संस्कृत के ज्ञाता हैं, न ही शास्त्रों के गंभीर अध्येता। वे केवल एक कुशल व्यापारी हैं। सांख्य योग, भक्ति योग या ज्ञान योग जैसे दार्शनिक विषयों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। उनकी पूरी कथा का फोकस है—कृष्ण जन्म, सुदामा मिलन और रुक्मिणी विवाह, क्योंकि ये वो 'प्रसंग' हैं जिनसे चढ़ावा आता है।

(दृश्य 3: राधा के नाम पर अश्लीलता)

  • दृश्य: कथा पांडाल में नाचते युवा-युवतियों के धुंधले दृश्य और आल्हा के कड़के गाते हुए कथावाचकों की क्लिप्स।
  • वाचक: राधा, जो साक्षात भक्ति का स्वरूप हैं, आज उन्हें मात्र एक 'कामुक पात्र' के रूप में मंचों पर प्रस्तुत किया जा रहा है। युवा और युवतियों को मंच पर नचाकर उनकी कामवासनाओं में घी डाला जा रहा है। क्या यह कृष्ण की भक्ति है या युवाओं के लिए एक नया 'सैटिंग प्लान'?

(दृश्य 4: गंगाजल और कूड़ा-करकट)

  • दृश्य: गंगा नदी का निर्मल जल और फिर किनारे पर जमा कचरा। (एक प्रतीकात्मक दृश्य)।
  • वाचक: हमारे पुराण हमारी संस्कृति के व्याख्याता तो हैं, लेकिन समय के साथ इनमें जो 'जोड़-तोड़' की गई, उसने गंगाजल के साथ कचरे को भी समाहित कर दिया है। लोग अब 'गंगाजल' को पहचानना भूल चुके हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपना पूरा जीवन अनैतिकता और केवल धन कमाने में बिता दिया, वह अब पापों के बोझ से दबकर 'धर्म' की शरण लेता है, लेकिन वहां भी उसे मिलता है केवल 'सस्ता मनोरंजन'।

(दृश्य 5: मौन साधक बनाम नकली गुरु)

  • दृश्य: एक एकांत में ध्यान करते हुए साधु की झलक, और दूसरी तरफ ऐशो-आराम में डूबे तथाकथित धर्मगुरुओं के विजुअल्स।
  • वाचक: असली धर्म के मर्मज्ञ आज मंचों पर नहीं, एकांत साधना में लीन हैं। और मंचों पर कौन है? भगवा वेशधारी नकली धर्मगुरु, जो सच दिखाना ही नहीं चाहते। और भीड़? जो सच देखना ही नहीं चाहती। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जहां धर्म को 'राजनीति और व्यापार' की चादर में लपेट दिया गया है।

(दृश्य 6: निष्कर्ष - कृष्ण का मार्ग)

  • दृश्य: गीता के श्लोक सर्वधर्मान्परित्यज्य... का ग्राफिक। अंत में एक जलता हुआ दीपक।
  • वाचक: धर्म समाप्त नहीं होता, केवल उसकी व्याख्याएं बदलती हैं। कृष्ण ने कहा था—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। यह किसी आडंबर की शरण में जाने का नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के विवेक और सत्य की शरण में जाने का आह्वान था। समय आ गया है कि हम कचरे को छोड़कर, उस 'गंगाजल' को ग्रहण करें जिसे युगों से ढक दिया गया है।

(आउटरो)

  • वाचक: क्या आप धर्म की इस 'व्यथा' को समझते हैं? कमेंट में अपनी राय साझा करें।

​निर्माता के लिए सुझाव (Director's Note):

  1. सावधानी: वीडियो बनाते समय किसी व्यक्ति विशेष को लक्षित करने के बजाय, 'व्यवस्था' और 'प्रवृत्ति' (Trend) पर प्रहार करें।
  2. दृश्यांकन: किसी का अपमान न दिखे, इसके लिए फुटेज को बहुत अधिक संपादित (Edit) करें या 'सांकेतिक विजुअल्स' (Stock footage/Graphics) का प्रयोग करें।
  3. गंभीरता: आवाज़ में तंज से अधिक एक 'दुःख और चिंता' का भाव होना चाहिए, ताकि दर्शक इसे केवल आलोचना न मानकर 'आत्म-चिंतन' के रूप में देखें।

रविवार, 11 जून 2023

मोह" लोभ और आवश्यकता-

वासना " तृष्णा " लोभ " मोह " और  लालसा" एक ही परिवार के सदस्य नहीं है। अपितु यह एक भाव ही  सभी अवान्तर भूमिकाओं में भिन्न भिन्न नाम धारण किए हुए है। 
और "आवश्यकता" (जरूरत) नामक जो भाव है वह  इन सबसे पृथक  जीवन के अस्तित्व का अवधारक है। जरूरतें जैविक अवधान हैं सृष्टा द्वारा निर्धारित जीवन का विधान हैं।

और जो वस्तु जीवन के लिए आवश्यक है वहीउसी रूप और अनुपात में उतनी ही सुन्दर भी  है।

यद्यपि प्रत्येक इन्सान में  गुण- दोष होते ही हैं व्यक्ति स्वयं अपने दोषों पर गौर नहीं करता  परन्तु हम्हें तो उसके गुण ही ग्रहण करने चाहिए सायद वे हमारे लिए गुण न हों क्योंकि हम जिसे एक बार शत्रु मान लेते हैं उस व्यक्ति में चाहें कितने भी गुण हों वह हम्हें  दोष ही दिखाई देते हैं। क्यों कि उस शत्रु भाव से हमारे दृष्टि के लेन्स का कलर ही बदल जाता है।

शत्रुता "ईर्ष्या" घृणा अथवा विरोध सभी भाव मूलत: उस व्यक्ति के हमारी प्रति वैचारिक प्रतिकूलता के प्रतिबिम्बित रूप हैं।
यहीं से हमारे मस्तिष्क में पूर्वदुराग्रह का जन्म होता है। 
ऐसी स्थिति में हमारा निर्णय कभी भी निष्पक्ष नहीं होता है।