भागवत कथाओं के आयोजन आज पैसे कमाने और समाज में अश्लीलता को धर्म की चादर में लपेटे हुए मनोरंजन क्लब हैं।
कथावाचक केवल थोड़ा देशी तरजों पर हारमोनियम बजा लेते हैं और गा लेते हैं परन्तु उन्हें न तो संस्कृत का ज्ञान है न संस्कृति और शास्त्रों का तो कोई ऑथेण्टिक ज्ञान है ही नहीं ।
भागवत में ये नाम के शास्त्री केवल उन्हीं प्रसंगों को साप्ताहिक आयोजन में लेते हैं जिनसे चढ़ावा आये - जैसे कृष्ण जन्म- सुदामा कृष्ण मिलन" रुक्मिणी विवाह आदि आदि -
और इनकी फीस कम से कम पचास हजार से प्रारम्भ होकर पन्द्रह सोलह लाख तक है।
समाज के चारित्रिक उत्थान के लिए और उसके आध्यात्मिक ज्ञान के लिए कोई प्रसंग ये नहीं लेते हैं
जबकि भागवत पुराण में अनेक आध्यात्मिक प्रसंग हैं सांख्य योग" भक्ति योग" और ज्ञान योग की मीमांसा भागवत में है।
शास्त्री भी आज राधा और कृष्ण के नाम पर समाज के नव युवको और युवतियों को नचाते और उनकी कामवासनाओं में घी डालते रहते हैं।
दरअसल ये कम जानकार केवल हारमोनियम छाप शास्त्री भी प्राय: स्वयं भी लंगोटी के कच्चे और चरित्र से डिगे हुए होते हैं ।
आल्हा के कड़के गाकर ये दान दाता के नाम पर नौजवानों का उत्साह बढ़ाते हैं ।
राधा का भागवत में वर्णन नहीं है परन्तु अन्य प्राचीन अथवा समकालिक पुराणों में वर्णन है।
यद्यपि राधा व्रज की अधिष्ठात्री भक्ति स्वरूपा हैं
फिर भी ये राधा के नाम पर अश्लीलता ही फैलाते हैं। और तो और भागवत के साप्ताहिक आयोजन से केवल जनता का मनोरंजन और नये लड़कों का सैटिंग प्लान जरूर हो जाता है विशेषत: ग्रामीण समाज में तो यही चल रहा है।
भारतीय पुराणों में स्वच्छ गंगाजल के साथ साथ कहीं कहीं कुछ कचड़ा भी समाविष्ट है । क्योंकि परवर्ती काल में जोड़ तोड़ होने से ये विकृति आयी
यद्यपि भारतीय शास्त्र हमारे सांस्कृतिक व्याख्याता हैं परन्तु जिनमें प्राचीन समाज में घटित घटनाओं का अतिश्योक्ति पूर्ण काव्यात्मक वर्णन है।
जिसमें स्वच्छ गंगाजल के साथ कुछ कूड़ा कर कट भी है।
आवश्यकता है केवल गंगाजल को ग्रहण करने की
परन्तु व्यक्ति गंगाजल को ही कैसे ग्रहण करे
अब धर्म विवेचना व्यक्ति कर नहीं सकता क्योंकि उसने जीवन के अधिकांश समय को केवल पैसे कमाने और मोजमस्ती करने और अनैतिकता में ही व्यतीत कर दिया है।
अब वह जल्दी में वास्तविक धर्म को नहीं जान पाता उसका अन्त करण अनेक दुर्वासनाओं से दूषित है। परन्तु जीवन के पापपूर्ण कारनामों कि उसे कुछ आभास होता रहता है इस लिए वह अपने पापों को कम करने के लिए धर्म की शरण लेता है।
वर्तमान में धर्म तत्व के विवेचक कम लोग हैं जो समाज में मंचों पर नहीं आते हैं। केवल एकान्त साधना में जीवन व्यतीत करते हैं। और धर्म के नाम पर आज नकली धर्मगुरु भगवा वेष में समाज में पुजते और ऐष आराम की जिन्दगी बसर कर रहे हैं।
इनको देखकर कुछ लोग धर्म यही समझ कर आलोचना करते हैं। मेरे विचार से ये दोनों ही एक जैसे हैं। एक सच देखना नहीं चाहता है और दूसरा सच दिखाना नहीं चाहता है।
धर्म कभी समाप्त होने वाली व्यवस्था नहीं है परन्तु समय देश और परिस्थितियों के अनुरूप धर्म के सिद्धान्त भी बदल जाते हैं। और इसी लिए समय समय पर वह ईश्वरीय सत्ता विशेष मानवों को नियुक्त करती है। कृष्ण ने धर्म की विवेचना युग के अनुरूप की थी और उद्घोष किया था ।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66। श्रीमद्भगवद्गीता
। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।
पुनः पुनर्विचार करें!
'कथा की व्यथा'
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पकी फसल घर आते ही
भोला किसान बौराता है।
वो धर्म के धन्धे बाजों की
साजिश में फंस जाता है।।
लगी नौकरी बेटे की या
घर बच्चे का जन्म हुआ।
बोल भागवत देता है
खिलवाऊँगा मैं मालपुआ।।
बजे नगाड़ा सात दिवस
खूब होंय लटके झटके।
कान्हा संग राधा नाच रहीं
क्यों नहीं युवा युवती भटके।।
जब रुक्मणि और सुभद्रा का
प्रेमप्रसंग युवतियां सुनती हैं।
कृष्णार्जुन को आदर्श मान
अनुसरण उन्हीं का करती हैं।।
पाखण्ड बहुत ही फैल रहा
कपोल कथाएं सुन-सुन के।
शोषण होने पर आँख खुले
फिर पछताते सिर धुनधुन के।।
भक्ति में भटका हुआ ग्वाल
नित गोपी के संग नाँच रहा।
अंधविश्वास की चौखट पर
अपनी किस्मत को जाँच रहा।।
ध्वनिप्रदूषण हो हद से ज्यादा
कानों में आवाज पड़े पैनी।
छात्रों की शिक्षा हो बाधित
बीमारों की बढ़ती बेचैनी।।
पॉलीथिन बिछा ट्रॉली में
गर्म खीर भर दी जाती।
फिर प्लास्टिक पात्रों में ही
सब्जी खीर परोसी जाती।।
प्लास्टिक का केमिकल
गर्मखाद्य में घुल जाता है।
पहुँच पेट में 'ब्रोमोनाइड'
केंसर कारक बन जाता है।।
खा-खा करके माल पुआ
तन रोगग्रस्त हो जाता है।
मालामाल चिकित्सक हों
लुट माल हमारा जाता है।।
ढोल ढमाके संग नांचकूद
फिर घड़ाविसर्जन करते हैं।
गाल गुलाल गोपी ग्वाल
मल-मल मनमानी करते हैं।।
नित युवा नहर में डूब रहे
जीतेजी बाप मर जाता है।
बिलख रहीं माता बहिनें
घर में मातम छा जाता है।।
वीडियो शीर्षक: कथा की व्यथा - धर्म या दिखावा?
वीडियो की रूपरेखा (Video Outline):
- वीडियो की अवधि: 3-4 मिनट
- शैली: वृत्तचित्र (Documentary) शैली, गंभीर और प्रभावशाली आवाज (Voice-over)।
पटकथा (Script):
(दृश्य 1: शुरुआत)
- दृश्य: स्क्रीन पर 'कथा की व्यथा' शीर्षक उभरता है। पृष्ठभूमि में एक ग्रामीण परिवेश का दृश्य, जहाँ एक किसान अपनी कटी हुई फसल को घर ला रहा है।
- वाचक (Voice-over): क्या धर्म का अर्थ केवल ढोल-नगाड़े और दिखावा है? क्या हमारी भक्ति हमें सही मार्ग दिखा रही है या हम किसी गहरे चक्रव्यूह में फंसते जा रहे हैं? आज हम बात करेंगे 'कथा की व्यथा' पर।
(दृश्य 2: दिखावे की साजिश)
- दृश्य: किसान को कुछ चतुर लोगों से घिरे हुए दिखाया जाए जो उसे बड़े आयोजन के लिए उकसा रहे हैं।
- वाचक: फसल घर आती है तो किसान खुशी मनाना चाहता है, लेकिन यहीं से शुरू होती है धंधेबाजों की साजिश। नौकरी मिलने पर या घर में खुशी आने पर, लोग 'मालपुए' का लालच देकर उसे पाखंड के जाल में फंसा लेते हैं।
(दृश्य 3: मर्यादाओं का हनन और युवा पीढ़ी)
- दृश्य: कथा पांडाल में तेज संगीत, फिल्मी गानों पर नृत्य और युवा पीढ़ी का उन पर थिरकना।
- वाचक: सात दिनों तक बजते नगाड़े, अश्लील लटके-झटके और कृष्ण-राधा के नाम पर परोसी जा रही आधुनिक विकृतियाँ। क्या हमारी नई पीढ़ी यहाँ से संस्कार ले रही है या दिग्भ्रमित हो रही है? आदर्शों के नाम पर प्रेम प्रसंगों का गलत चित्रण युवाओं की सोच को बदल रहा है।
(दृश्य 4: स्वास्थ्य और पर्यावरण का संकट)
- दृश्य: कथा के बाद जूठी प्लास्टिक की प्लेटें, कचरे के ढेर और प्लास्टिक में परोसी जा रही गर्म खीर-सब्जी।
- वाचक: और अब बात करते हैं उस अदृश्य जहर की। गर्म खीर प्लास्टिक के बर्तनों में? यह 'ब्रोमोनाइड' जैसा केमिकल सीधे आपके पेट में जाकर कैंसर का कारण बन रहा है। एक तरफ धर्म के नाम पर स्वास्थ्य लुटाया जा रहा है, और दूसरी तरफ मालामाल हो रहे हैं निजी चिकित्सक।
(दृश्य 5: सामाजिक दुर्दशा)
- दृश्य: विसर्जन के समय की अफरा-तफरी, नहरों में डूबते युवाओं के फुटेज (सांकेतिक)।
- वाचक: शोर का प्रदूषण छात्रों की पढ़ाई को बाधित कर रहा है, बीमारों की बेचैनी बढ़ा रहा है। और अंत में, विसर्जन के नाम पर नहरों में डूबते युवा—यह धर्म नहीं, बल्कि परिवारों का उजड़ना है।
(दृश्य 6: निष्कर्ष/आह्वान)
- दृश्य: एक शांत, विचारशील चेहरा जो दीपक जलाकर कुछ सोच रहा है। अंत में स्क्रीन पर संदेश: "भक्ति मन में होती है, प्रदर्शन में नहीं।"
- वाचक: अंधविश्वास की चौखट पर अपनी किस्मत आज़माने से बेहतर है कि हम धर्म के वास्तविक अर्थ को समझें। पाखंड को छोड़ें, विवेक को अपनाएं। सोचने का समय आ गया है—क्या आपकी 'भक्ति' वाकई आपको शांति दे रही है, या सिर्फ 'व्यथा'?
वीडियो सुझाव:
- संगीत: शुरू में ग्रामीण धुन रखें जो धीरे-धीरे गंभीर और चेतावनी भरी ध्वनि में बदल जाए।
- दृश्य: स्टॉक फुटेज (Stock Footage) का उपयोग करते समय वास्तविकता और विसंगति के बीच का अंतर दिखाएं।
- टोन: आवाज़ में तंज (Sarcasm) और संवेदना (Empathy) का मिश्रण होना चाहिए ताकि दर्शक कविता के दर्द को महसूस कर सकें।
आशा है कि यह पटकथा आपके लेख के संदेश को प्रभावी ढंग से प्रसारित करने में मदद करेगी।
वीडियो शीर्षक: धर्म या 'इवेंट मैनेजमेंट'?—आध्यात्मिक पतन की एक कड़वी सच्चाई
वीडियो की रूपरेखा:
- शैली: गंभीर, विश्लेषणात्मक (Analytical) और निडर।
- संगीत: धीमी, गंभीर और सस्पेंस पैदा करने वाली पृष्ठभूमि।
- दृश्य: एक तरफ शांत मंदिरों की फुटेज, दूसरी तरफ शोर-शराबे वाले कथा पांडालों का तुलनात्मक चित्रण।
पटकथा (Script)
(दृश्य 1: प्रस्तावना)
- दृश्य: स्क्रीन पर एक तरफ भागवत पुराण की पुस्तक और दूसरी तरफ नाचते-गाते युवाओं की धुंधली फुटेज।
- वाचक: क्या धर्म का उद्देश्य केवल सात दिनों का मनोरंजन है? आज हमारे गांवों और शहरों में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हो रहा है या 'इवेंट मैनेजमेंट' के नाम पर किसी 'मनोरंजन क्लब' का संचालन? आज हम बात करेंगे उस 'कचरे' की, जो 'गंगाजल' रूपी शास्त्रों में मिला दिया गया है।
(दृश्य 2: 'हारमोनियम छाप' शास्त्री और व्यापार)
- दृश्य: हारमोनियम लिए हुए कुछ कथावाचकों के वीडियो क्लिप्स। ग्राफिक्स में फीस के आंकड़े—"50,000 से 16 लाख तक"।
- वाचक: आज के 'कथावाचक' न तो संस्कृत के ज्ञाता हैं, न ही शास्त्रों के गंभीर अध्येता। वे केवल एक कुशल व्यापारी हैं। सांख्य योग, भक्ति योग या ज्ञान योग जैसे दार्शनिक विषयों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। उनकी पूरी कथा का फोकस है—कृष्ण जन्म, सुदामा मिलन और रुक्मिणी विवाह, क्योंकि ये वो 'प्रसंग' हैं जिनसे चढ़ावा आता है।
(दृश्य 3: राधा के नाम पर अश्लीलता)
- दृश्य: कथा पांडाल में नाचते युवा-युवतियों के धुंधले दृश्य और आल्हा के कड़के गाते हुए कथावाचकों की क्लिप्स।
- वाचक: राधा, जो साक्षात भक्ति का स्वरूप हैं, आज उन्हें मात्र एक 'कामुक पात्र' के रूप में मंचों पर प्रस्तुत किया जा रहा है। युवा और युवतियों को मंच पर नचाकर उनकी कामवासनाओं में घी डाला जा रहा है। क्या यह कृष्ण की भक्ति है या युवाओं के लिए एक नया 'सैटिंग प्लान'?
(दृश्य 4: गंगाजल और कूड़ा-करकट)
- दृश्य: गंगा नदी का निर्मल जल और फिर किनारे पर जमा कचरा। (एक प्रतीकात्मक दृश्य)।
- वाचक: हमारे पुराण हमारी संस्कृति के व्याख्याता तो हैं, लेकिन समय के साथ इनमें जो 'जोड़-तोड़' की गई, उसने गंगाजल के साथ कचरे को भी समाहित कर दिया है। लोग अब 'गंगाजल' को पहचानना भूल चुके हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपना पूरा जीवन अनैतिकता और केवल धन कमाने में बिता दिया, वह अब पापों के बोझ से दबकर 'धर्म' की शरण लेता है, लेकिन वहां भी उसे मिलता है केवल 'सस्ता मनोरंजन'।
(दृश्य 5: मौन साधक बनाम नकली गुरु)
- दृश्य: एक एकांत में ध्यान करते हुए साधु की झलक, और दूसरी तरफ ऐशो-आराम में डूबे तथाकथित धर्मगुरुओं के विजुअल्स।
- वाचक: असली धर्म के मर्मज्ञ आज मंचों पर नहीं, एकांत साधना में लीन हैं। और मंचों पर कौन है? भगवा वेशधारी नकली धर्मगुरु, जो सच दिखाना ही नहीं चाहते। और भीड़? जो सच देखना ही नहीं चाहती। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जहां धर्म को 'राजनीति और व्यापार' की चादर में लपेट दिया गया है।
(दृश्य 6: निष्कर्ष - कृष्ण का मार्ग)
- दृश्य: गीता के श्लोक सर्वधर्मान्परित्यज्य... का ग्राफिक। अंत में एक जलता हुआ दीपक।
- वाचक: धर्म समाप्त नहीं होता, केवल उसकी व्याख्याएं बदलती हैं। कृष्ण ने कहा था—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। यह किसी आडंबर की शरण में जाने का नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के विवेक और सत्य की शरण में जाने का आह्वान था। समय आ गया है कि हम कचरे को छोड़कर, उस 'गंगाजल' को ग्रहण करें जिसे युगों से ढक दिया गया है।
(आउटरो)
- वाचक: क्या आप धर्म की इस 'व्यथा' को समझते हैं? कमेंट में अपनी राय साझा करें।
निर्माता के लिए सुझाव (Director's Note):
- सावधानी: वीडियो बनाते समय किसी व्यक्ति विशेष को लक्षित करने के बजाय, 'व्यवस्था' और 'प्रवृत्ति' (Trend) पर प्रहार करें।
- दृश्यांकन: किसी का अपमान न दिखे, इसके लिए फुटेज को बहुत अधिक संपादित (Edit) करें या 'सांकेतिक विजुअल्स' (Stock footage/Graphics) का प्रयोग करें।
- गंभीरता: आवाज़ में तंज से अधिक एक 'दुःख और चिंता' का भाव होना चाहिए, ताकि दर्शक इसे केवल आलोचना न मानकर 'आत्म-चिंतन' के रूप में देखें।
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