अध्याय (2)
गोप (यादवों) की उत्पत्ति
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य प्रमाण सहित बताना है कि गोपों यानी यादवों की उत्पत्ति सर्वप्रथम गोलोक में तथा उसके बाद भू-लोक में कब और कैसे हुई है। इसको अच्छी तरह से समझने के लिए इस अध्याय को मुख्यतः दो भागों तथा चार उप भागों में विभाजित किया गया है। इन समस्त जानकारियों के लिए निम्नलिखित पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत हैं -
(क)- पौराणिक साक्ष्य
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
(क)- पौराणिक साक्ष्य -
(1)- गोलोक में गोपों की उत्पत्ति
यदि गोपों अर्थात् यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक सन्दर्भों को देखा जाए तो लगभग प्रत्येक पुराणों में गोलोक में इनकी प्रथम उत्पत्ति के सन्दर्भ मिलते हैं। जैसे- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(5) के श्लोक संख्या- २५, ४० और ४२ में बहुत ही स्पष्ट रूप से लिखा गया है-
"आविर्बभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपार्श्वतः।
धावित्वा पुष्पमानीय ददावर्घ्यं प्रभोः पदे।२५।
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः।
आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः।४२।
अनुवाद -
गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के वाम-पार्श्व से वामा के रूप में एक कामनाओं की प्रतिमूर्ति- प्रकृति रूपा कन्या उत्पन्न हुई जो कृष्ण के ही समान किशोर-वय थी।२५।
• फिर तो उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• उसी क्षण श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
इसी प्रकार से गोपों की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध अध्याय-(२) के श्लोक- ६०-६१ में लिखा गया है कि -
अथगोलोकनाथस्य लोमनां विवरतो मुने।
भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः।। ६०
रुपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे भभूवः पार्षदा विभोः।। ६१
अनुवाद- ६०-६१
हे मुने ! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से असंख्य गोपगण प्रकट हुए, जो वय, तेज, रुप, गुण, बल तथा पराक्रम में उन्हीं के समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गये।
✳️ ज्ञात हो कि- गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समरूप इसलिए थे, क्योंकि इनकी उत्पत्ति श्रीकृष्ण और श्रीराधा की सूक्ष्मतम इकाई (कोशिका) अर्थात उनके क्लोन से हुई हैं। इसलिए सभी गोप श्रीकृष्ण के समरूप तथा सभी गोपियों श्रीराधा के समरूप उत्पन्न हुईं।
इस बात को आज विज्ञान भी स्वीकारता है कि- समरूपण अर्थात क्लोनिंग विधि से उत्पन्न जीव उसी के समरूप होता है, जिससे उसकी क्लोनिंग की गई होती है।
और विज्ञान के इस समरूपण सिद्धान्त से परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा ने पूर्व काल में ही अपनी सूक्ष्मतम इकाइयों से समरूपण विधि द्वारा गोलोक में गोप-गोपियों की उत्पत्ति कीं थीं।
इस प्रकार से सिद्ध होता है कि गोपों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण से तथा गोपियों की उत्पत्ति श्रीराधा से हुई है। इस बात को प्रमुख देवों सहित परमात्मा श्रीकृष्ण ने भी स्वीकार किया है। जैसे- गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में भगवान शिव ने पूर्व काल में पार्वती को भी ऐसा ही दृष्टान्त सुनाया था। जिसे शिव-वाणी समझ कर इस घटना को पुराणों में सार्वकालिक और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया। जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृतिखण्ड के अध्याय-(४८) के श्लोक संख्या- (४३) में मिलता है। जिसमें शिवजी पार्वती से कहते हैं-
"बभूव गोपीसंघश्च राधाया लोमकूपतः।श्रीकृष्णलोमकूपेभ्यो बभूवुः सर्वबल्लवाः।।४३।
अनुवाद -• श्रीराधा के रोमकूपों से गोपियों का समुदाय प्रकट हुआ है, तथा श्रीकृष्ण के रोमकूपों से सम्पूर्ण गोपों (आभीरों) का प्रादुर्भाव हुआ है।
▪️इस प्रकार से देखा जाए तो शिव जी के कथन से भी यह सिद्ध होता है कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों से प्रारम्भिक रूप से गोलोक में ही हुई है।
▪️इसी तरह से गोप-गोपियों की उत्पत्ति को लेकर परम प्रभु परमात्मा श्रीकृष्ण की वे सभी बातें और प्रमाणित कर देती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने अँश से उत्पन्न गोपों की उत्पत्ति के विषय में स्वयं ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय -(३६) के श्लोक संख्या -(६२) में राधा जी से कहते हैं-
"गोपाङ्गनास्तव कला अत एव मम प्रियाः।
मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः। ६२।
अनुवाद:- हे राधे ! समस्त गोपियाँ तुम्हारी कलाऐं हैं। और सभी गोलोक वासी गोप मेरे रोमकूपों से उत्पन्न मेरी ही कलाऐं तथा अंश हैं।६२।
और ऐसी ही बात भगवान श्रीकृष्ण उस समय भी कहते हैं- जब वे स्वयं भूतल पर गोप जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णि कुल में अवतरित होते हैं।, और कुछ समय पश्चात कंस का वध करके मथुरा के सिंहासन पर पुन: कंस के पिता उग्रसेन को अभिषिक्त करते हैं। और इसके कुछ समय पश्चात उग्रसेन भगवान श्रीकृष्ण से राजसूय यज्ञ के आयोजन का परामर्श करते हैं।। उसी प्रसंग के क्रम में स्वयं श्रीकृष्ण उग्रसेन से कहते हैं कि- "सभी यादव मेरे अंश हैं"। श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय (२) के श्लोक संख्या- (५-६ और- ७) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि-
"सम्यग्व्यवसितं राजन् भवता यादवेश्वर।
यज्ञेन ते जगत्कीर्तिस्त्रिलोक्यां सम्भविष्यति॥५॥
आहूय यादवान्साक्षात्सभां कृत्वथ सर्वतः।
ताम्बूलबीटिकां धृत्वा प्रतिज्ञां कारय प्रभो ॥६॥
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- (५,६,७)- तब श्रीकृष्ण ने कहा- राजन् ! यादवेश्वर ! आपने बड़ा उत्तम निश्चय किया है। उस यज्ञ से आपकी कीर्ति तीनों लोकों में फैल जायगी।
• प्रभो ! सभा में समस्त यादवों को सब ओर से बुलाकर पान का बीड़ा रख दीजिये और प्रतिज्ञा करवाईये कि-
• समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।
▪️ इसके अतिरिक्त गोपों की उत्पत्ति के विषय में कुछ ऐसा ही वर्णन उस समय भी मिलता है, जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भूमण्डल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-( 11 ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहा-
"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः। गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्भवाः।२१।
"राधारोमोद्भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।
अनुवाद (२१-२२)- नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक में जो गोपालगण (आभीर) हैं, वे साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियों श्री राधा के रोम से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आई हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में एक नाम "गोपकृत"
भी है जिसका अर्थ है- नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय -(५९) के श्लोक- (३०) से होती है।
वने वत्सचारी महावत्सहारी
बकारिः सुरैः पूजितोऽघारिनामा ।
वने वत्सकृद्गोपकृद्गोपवेषः*
कदा ब्रह्मणा संस्तुतः पद्मनाभः ॥ ३०
गोपकृत - अर्थात् = नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।
गोपवेशः - अर्थात् = सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला
▪️इस प्रकार से इन अनेक पौराणिक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि सर्वप्रथम गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों से ही गोप और गोपियों की उत्पत्ति हुई है जिन्हें भू-तल पर यादव, अहीर, घोष, गोप, और गोपाला इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।
किन्तु सवाल यह है कि क्या गोलोक के गोप और गोपियाँ ही भू-लोक की गोप- गोपियाँ हैं, या कोई और? इस प्रश्न का समाधान प्रमाण सहित भाग- (दो) में बताया गया है।
(2)- भू-लोक में गोपों की उत्पत्ति
कुछ लोगों को यह संशय हो सकता है कि गोलोक की गोप- गोपियाँ भू-लोक की नहीं हो सकतीं। किन्तु ऐसी बात नहीं है, गोलोक की ही गोप-गोपियाँ भू-लोक की भी हैं। और ये गोलोक से भू-लोक पर एक निश्चित प्रयोजन के तहत् भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही समयं समयं पर भू-लोक पर आती हैं। यह ध्रुव सत्य है। इसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(६) में उस समय होती है जब देवों के निवेदन पर गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने समस्त गोप-गोपियों को बुलाकर कहते हैं-
जनुर्लभत गोपाश्च गोप्यश्च पृथिवीतले।।
गोपानामुत्तमानां च मन्दिरे मन्दिरे शुभे।६९।।
अनुवाद - भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- गोप और गोपियों ! तुम सब भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ घर-घर में जन्म लो ।
तब श्रीकृष्ण का आदेश पाकर सभी गोप-गोपियाँ भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ-शुभ घरों में अवतरित हुए। उनको भूतल पर अवतरित होने की पुष्टि- उस समय भी होती है, जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भू-तल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्री कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(११ ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहते हैं-
"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।
गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्भवाः।२१।
"राधारोमोद्भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।
अनुवाद-नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं जो गोकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक के गोपालगण (आभीर) जो साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियाँ जो श्रीराधा के रोमकूप से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ (भूतल के ) व्रज में उतर आईं हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं हैं।२१-२२।
इसी तरह से समस्त गोलोकवासी गोप जो कभी श्रीकृष्ण के अंश से गोलोक में उत्पन्न हुए थे उन सभी को भू-तल पर गोपकुल के यादव वंश में भगवान श्रीकृष्ण के ही अंश रूप में अवतरित या जन्म लेने की पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजित्खण्ड के अध्याय (२) के श्लोक- ७ से होती है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण यादवों के विश्वजीत युद्ध होने से पहले उग्रसेन से कहते हैं-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अँश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।७।
इसी तरह से गोप और गोपियों को गोलोक से भूतल पर आने की पुष्टि- गर्गसंहिता के गोलोकखण्ड के अध्याय- १५ के श्लोक-६३ से भी होती है। जिसमें लिखा गया है-
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गोपा गोलोके राधिकेच्छया॥ ६३॥
अनुवाद :-आप समस्त गोप तथा गोपियाँ इस भूतल पर गोलोक से आये हुए हो। यह सब राधा जी की ही इच्छा थी।६३।
ठीक इसी तरह की बात गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के अध्याय- ५ के श्लोक संख्या- ३७ में भी लिखी गई कि-
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गावो गोकुले राधिकेच्छया॥ ३७॥
अनुवाद :-आप समस्त गोपगण इस भूतल पर गोलोक से आये हो। इसी तरह से गोपियाँ और गौएँ भी श्रीराधा की इच्छा से ही गोकुल में आयी हैं।३७।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि गोलोक की समस्त गोप तथा गोपियाँ भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर उनके साथ ही गोलोक से भू-लोक पर अवतरित हुए हैं।
इस प्रकार से आप लोगों ने गोप यानी यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक सन्दर्भों को जाना। अब आप लोग यादवों के ऐतिहासिक सन्दर्भों में यानी इनको इतिहास के पन्नों में जान पाएंगे कि इनका वर्णन कब और कैसे किया गया है। इनके ऐतिहासिक संदर्भों को अध्याय (7) के भाग (ख) के शीर्षक (ऐतिहासिक यादव राजा) में विस्तार पूर्वक बताया गया है, वहाँ से इनके ऐतिहासिक सन्दर्भों को पाठक गण जानकारी ले सकते हैं।
इस प्रकार से यह अध्याय यादवों की उत्पत्ति के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय (3) में यादवों की प्रमुख जाति अहीर की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी गई है।
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